एक बड़े से साइन बोर्ड पर रोमन लिपि में बड़े-बड़े अक्षरों में रावत जालान लिखा हुआ था। पिताजी ने अनुमान लगाया कि जोधपुर में कुछ अग्रवाल परिवार अपना सरनेम जालान लगाते हैं। हो न हो यह जोधपुर के ही किसी अग्रवाल परिवार की दुकान हो। इसी प्रकार जोधपुर में रावत मिष्ठान भण्डार है जो कि जोधपुर के एक माली परिवार का है।
गैम्बीरा लोका जू से लौटते हुए हमने अपनी गाड़ी के ड्राइवर मि. अंतो से अनुरोध किया कि हमें व्हीट फ्लोर, कुकिंग ऑइल, मिल्क और वेजीटेबल्स खरीदनी हैं इसलिए किसी डिपार्टमेंटल स्टोर पर ले चले। हमारे पास अब बहुत कम घी और आटा बचे थे।
हमें आज शाम के साथ-साथ अगले तीन दिन का भोजन बनाकर अपने साथ लेना था जिसके लिए यह सामग्री पर्याप्त नहीं थी। सौभाग्य से मसाले अब भी पर्याप्त मात्रा में थे। मि. अंतो ने कुछ क्षण के लिए सोचा और फिर हमें एक मॉल ले जाने का निश्चय किया।
रावत जालान
जब हम मॉल पहुंचने वाले थे कि पिताजी की दृष्टि एक बड़े साइन बोर्ड पर पड़ी जिस पर रोमन लिपि में बड़े-बड़े अक्षरों में ‘रावत जालान’ लिखा हुआ था। पिताजी ने अनुमान लगाया कि जोधपुर में कुछ अग्रवाल परिवार अपना सरनेम जालान लगाते हैं। हो न हो यह जोधपुर के ही किसी अग्रवाल परिवार की दुकान हो। इसी प्रकार जोधपुर में रावत मिष्ठान भण्डार है जो कि जोधपुर के एक माली परिवार का है।
पिताजी ने अनुमान लगाया कि संभवतः जोधपुर के किसी अग्रवाल परिवार एवं माली परिवार ने मिलकर यह स्टोर खोला हो। अतःयहाँ पूछने से हमें यह ज्ञात हो जाएगा कि जोगजकार्ता में गेहूं का आटा कहाँ मिल जायेगा तथा उसे जावाई भाषा में क्या कहते हैं! चूंकि सड़क काफी व्यस्त थी, अतः केवल विजय को उस दुकान पर भेजा गया।
विजय ने जाकर देखा कि वह एक दवाईयों का बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर है। विजय ने जाकर रावत तथा जालान के बारे में पूछा तो वहाँ के इण्डोनेशियाई कर्मचारी विजय का सवाल ही नहीं समझ सके। बाद में हमें इण्टरनेट से ज्ञात हुआ कि इण्डोनेशियाई भाषा में Rawat Jalan का अर्थ Hospitalization street होता है। वहाँ उन शब्दों का आशय दवाइयों की बड़ी दुकान से था।
सोयाबीन के तेल और गेहूं के आटे की खोज
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यह बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर था जहाँ मि. अंतो हमें लेकर गया। इस स्टोर में सैंकड़ों लम्बी-लम्बी रैक लगी हुई थीं जिनमें किराणे से लेकर सब्जी और फल, मछली, अण्डा और पैक्ड फूट उपलब्ध थे। हमने इस विशाल स्टोर में गेहूं का आटा और कुकिंग ऑइल ढूंढना आरम्भ किया। कुछ कर्मचारियों से भी पूछा किंतु कोई कर्मचारी हमारी बात नहीं समझ पाया। हमें कुछ रैक्स में नारियल तथा सूरजमुखी के कुकिंग ऑइल मिले किंतु समस्या यह आ गई कि इन पर झींगों के चित्र बने हुए थे। इन चित्रों से आशय यह था कि इनमें झींगे तले जा सकते हैं किंतु हम ऐसा तेल कैसे खरीद सकते थे जिन पर झींगे बने हुए हों। हमने एक कर्मचारी से व्हीट फ्लोर के बारे में पूछा। सौभाग्य से यह कर्मचारी थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानता था। उसने मुझे एक रैक दिखाया। मैंने वहाँ पैकेट उठा कर देखे तो निराशा ही हाथ लगी क्योंकि वह चावल का आटा था और इससे रोटियां नहीं बन सकती थीं। मैं वहाँ से पूरी तरह निराश होकर मुड़ ही रहा था कि मेरी दृष्टि एक रैक में रखे हुए पैकेट पर पड़ी मैंने अनमने ढंग से उसे भी उठाया तो खुशी से उछल पड़ा। इस पर Wheat flour लिखा हुआ था।
अब चाहे यह कितने भी महंगा क्यों न हो, खरीदना ही था। उस पूरे डिपार्टमेंटल स्टोर में व्हीट फ्लोर का यह अकेला ही पैकेट बचा था। दूध के पैकेट, आलू-प्याज, टमाटर तथा कुछ फल भी हमें मिल गए। अब केवल तेल की समस्या शेष थी।
अंत में हमने नारियल तेल का एैसा पैकेट खरीदने का निर्णय लिया जिस पर किसी झींगे या मछली आदि का चित्र नहीं बना हुआ था। जब मैंने ऐसा एक पैकेट छांटा ही था कि अचानक विजय की दृष्टि एक रैक पर पड़ी। इसमें सोयाबीन के तेल की एक लीटर की शीशी रखी हुई थी। इसका यहाँ होना किसी चमत्कार से कम नहीं था। पिताजी सोयाबीन के तेल को खाने के लिए उपयुक्त नहीं मानते किंतु यहाँ सोयाबीन का तेल हमें किसी वरदान से कम नहीं लगा।
तीन दिन की तैयारी
हमारी खोज पूरी हो चुकी थी। अपने अपार्टमेंट पहुंचकर हमने मि. अन्तो को कल की तरह चाय पिलाई। उसके लिए चाय का पिया जाना एक आश्चर्यजनक घटना से कम नहीं होती थी। हमने उसके दिन भर के पेमेंट्स किए तथा मि. अन्तो को प्रातः सात बजे आने का अनुरोध किया। इसके बाद मधु और भानु ने मिलकर 21, 22 और 23 अप्रेल के खाने की तैयारी की। इसमें से 21 अप्रेल का दिन ट्रेन में, 22 अप्रेल का दिन होटल में तथा 23 अप्रेल का दिन हवाई जहाज में बीतने वाला था।
इस दौरान हमें कहीं से शाकाहारी भोजन मिलने की आशा नहीं थी। मधु ने हमारे द्वारा खरीदा गया व्हीट फ्लोर का पैकेट खोल कर देखा, उसमें बहुत बारीक मैदा थी। मधु ने वह मैदा, हमारे पास उपलब्ध आटे में मिला दी। अब आसानी से ढाई दिन के लिए पूरियां बनाई जा सकती थीं।
तीसरे दिन की शाम को साढ़े दस बजे तो हमें दिल्ली पहुंच ही जाना था। पूरियां तलने के बाद मधु ने कुछ आलू उबालकर अपने साथ रख लिए। बिना छिले हुए आलू यदि फ्रिज या एसी में रहें तो दो-ढाई दिन तक खराब नहीं होते। कच्ची प्याज, लाल टमाटर और नमकीन भुजिया भी तरकारी की तरह प्रयुक्त हो सकते हैं।
आज 21 अप्रेल को हमें योग्यकार्ता से विदा लेनी थी और इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता के लिए रवाना होना था। हमने एक लक्जरी ट्रेन से रिजर्वेशन करवा रखा था। यह ट्रेन प्रातः 8.57 पर योग्यकार्ता से चलकर सायं 4.52 पर जकार्ता पहुंचने वाली थी।
रेलवे स्टेशन हमारे सर्विस अपार्टमेंट से केवल 8-9 किलोमीटर की दूरी पर था। फिर भी हमने टैक्सी ड्राइवर मि. अन्तो के सुझाव पर प्रातः 7 बजे निकलने का समय निर्धारित किया। उसका कहना था कि प्रातः के समय ऑफिस जाने वाले ट्रैफिक की काफी भीड़ होती है, जाम भी लग जाते हैं, इसलिए मार्ग में एक से डेढ़ घण्टा लग सकता है। हम लोग प्रातः चार बजे उठकर ही चलने की तैयारी करने लगे। प्रातः 6 बजे से वर्षा आरम्भ हो गई तथा प्रातः सात बजते-बजते वर्षा काफी तेज हो गई।
ट्रेन का समय प्रातः 8.57 पर था और मुझे आशंका थी कि कहीं ऐसा न हो, मि. अन्तो नहीं आए और हमारी ट्रेन चूक जाए किंतु मिस्टर अन्तो प्रातः 7 बजे से पहले ही आ गया। मुझे उसकी यह अनुशासन-प्रियता देखकर अच्छा लगा। उसने आते ही कहा- मिस्टर मोहन, वर्षा हो रही है और सड़क पर ट्रैफिक काफी है, इसलिए हमें तुरंत निकलना चाहिये। हम तैयार तो थे ही, तुरंत चल पड़े। मैं मि. अन्तो की छतरी लेकर मिस रोजोविता को गुडबाय कहने के लिए सामने के घर तक गया। घर का दरवाजा किसी युवक ने खोला।
मैंने कहा- ‘हम जा रहे हैं, आपका घर बहुत आराम देह था। हमने यहाँ अच्छा समय व्यतीत किया। कृपया घर संभाल लें।’
युवक ने मुस्कुरा कर मुझे धन्यवाद दिया तथा कहा-‘घर संभालने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपकी यात्रा शुभ हो।’
मि. अन्तो ठीक कह रहा था। सड़क पर बहुत ट्रैफिक था, यहाँ कार्यालयों का समय प्रातः शीघ्र ही आरम्भ हो जाता होगा। हमें 7 किलोमीटर की दूरी पार करने में लगभग एक घण्टा लगा।
मि. अन्तो से विदा
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हम लगभग 8 बजे जोगजकार्ता स्टेशन पहुंच गए। हल्की बूंदा-बादी अब भी हो रही थी। मि. अन्तो ने छतरी बाहर निकाली किंतु हमने मना कर दिया। हमने जिस समय मि. अन्तो से रेलवे स्टेशन का किराया तय किया था, उस समय हम योग्यकार्ता से लगभग 30 किलोमीटर दूर (मासप्रियो के अपार्टमेंट में) थे किंतु इस समय हम केवल 7 किलोमीटर दूर से आए थे। इसलिए किराया कम ही बनता था किंतु हमने मि. अन्तो से किराया कम करने के लिए नहीं कहा तथा पूरा पेमेंट किया किंतु हमें आश्चर्य हुआ जब उसने 25 हजार इण्डिोनेशियाई रुपए वापस हमारे हाथ में रख दिए। भारत में तो ऐसा होना अत्यंत कठिन है। मि. अन्तो एक पढ़-लिखा, सुशिक्षित, सुसभ्य मुस्लिम युवक है। वह चाहता तो उसे आसानी से कोई व्हाइट कॉलर जॉब भी मिल सकता है किंतु वह जो भी काम कर रहा था, उसे कितने ढंग और प्रेम से कर रहा था, यह सीखने और समझने वाली बात थी। भारत में इतना पढ़ा-लिखा लड़का शायद ही टैक्सी ड्राइवर का काम करे। हालांकि मैंने दिल्ली में उन लड़कों को देखा है जो पार्ट टाइम जॉब के रूप में उबर और ओला की टैक्सियां चलाते हैं और अच्छा खासा कमा लेते हैं।
उनका व्यवहार परम्परागत भारतीय ड्राइवरों की तुलना में बेहद शालीन है हालांकि शालीनता के मामले में मि. अन्तो उनसे भी बहुत आगे है।
जोगजकार्ता स्टेस्यन के भीतर
हमें योग्यकार्ता से विदा लेकर जिस ट्रेन से जकार्ता जाना था, उसका नाम अरगो लावू था। यह एक लक्जरी ट्रेन थी जिसके एक्जीक्यूटिव क्लास में हमारा रिजर्वेशन था। हम अपनी इस यात्रा को यादगार बनाना चाहते थे। हमें ज्ञात था कि यह ट्रेन पूरे दिन चावल, केले और मक्का के खेतों से भरे हुए हरे मैदानों से होकर गुजरने वाली थी। इसलिए हमने सीटों का चयन खिड़की के पास किया था। इसके लिए इण्डोनेशिया सरकार ने हमसे कुछ अधिक किराया लिया था।
ट्रेन आने में अभी एक घण्टे का समय था किंतु इस ट्रेन में जाने वाले यात्रियों के लिए बोर्डिंग खुल चुका था। यह ठीक वैसी ही व्यवस्था थी जैसी कि एयर पोर्ट पर हुआ करती है। हमने अपने बोर्डिंग पास स्टेशन के गेट पर खड़ी लेडी ऑफिसर्स को दिखाए। वे नेवी ब्लू रंग की शानदार यूनीफॉर्म में थीं। इस प्रकार की वर्दी सर्दियों में भारतीय नेवी के अफसर पहनते हैं।
लेडी ऑफिसर्स का व्यवहार, उनकी यूनीफॉर्म की ही तरह शानदार था। उन्होंने बड़ी विनम्रता से हमें अपने पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा। लेडी ऑफिसर्स ने हमारे पासपोर्ट का हमारे बोर्डिंग पास से मिलान किया और हमें स्टेशन के भीतर जाने का अनुरोध किया। उन्होंने हमें बताया कि हमारी ट्रेन प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर आएगी।
हम लोग स्टेशन के मुख्य भवन में से होते हुए एक नम्बर प्लेटफार्म को पार करते हुए दो नम्बर प्लेटफार्म पर जाकर खड़े हो गए। भारतीय होने के नाते हम ऐसा ही करने के अभ्यस्त थे। प्लेटफॉर्म नम्बर 1 से प्लेटफॉर्म नम्बर 2 के बीच जाने के लिए रेल की पटरियां पार करनी पड़ीं।
यात्रियों की सुविधा के लिए दोनों प्लेटफार्म्स के बीच एक पतली सी सड़क बनी हुई थी। हमें कोई पुल पार नहीं करना पड़ा। जबकि भारत में किसी भी रेलवे स्टेशन पर बिना पुल पार किए, एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाया ही नहीं जा सकता।
प्लेटफॉर्म नम्बर दो बहुत ही संकरा था। कठिनाई से 10 फुट चौड़ा। इसके दोनों ओर पटरियां बनी हुई थीं और इसके दूसरी ओर एक ट्रेन लगी हुई थी। हमें अनुमान था कि यह हमारी ट्रेन नहीं है। हमें खड़े हुए अभी दो मिनट हुए होंगे कि एक रेलवे कर्मचारी हमारे पास आया। इसने भी अन्य अधिकारियों की तरह पी कैप से लेकर ब्लैक शू तक पूरी वर्दी बहुत सलीके से पहन रखी थी।
उसने हमारे निकट आकर विनम्रता से पूछा- ‘व्हिच ट्रेन प्लीज!’
जब हमने ‘अर्गो लावू’ कहा तो उसने कहा- ‘दिस इज नॉत (नॉट) अरगो लावू। कम विद मी प्लीज।’ हम अपना सामान लेकर उसके पीछे चल दिए। वह हमें फिर से प्लेटफार्म नम्बर एक पर ले गया और हमसे वहाँ रखीं शानदार कुर्सियों पर बैठने का अनुरोध किया। हमें यह बहुत सुविधा जनक भी लगा क्योंकि प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर खड़े होने के लिए समुचित स्थान नहीं था। इस समय सवा आठ बज चुके थे। हमने वहीं पर नाश्ता करने का निश्चय किया।
हम नाश्ता करके चुके ही थे कि वही कर्मचारी पुनः हमारे पास आया और बोला- ‘योअर त्रेन इज कमिंग, यू मे कम दीयर, ऑन प्लेतफॉर्म नम्बर तू।’ हमने उसका अनुसरण किया।
अरगो लावू
अरगो लावू एक शानदार चमचमाती हुई ट्रेन है। जिस एसी चेयर कार में हमारा रिजर्वेशन था, उसमें दोनों तरफ दो-दो आरामदेह कुर्सियां लगी हुई थीं। कोच की सफाई देखते ही बनती थी। इसके कांच पूरी तरह साफ और पारदर्शी थे जिनसे बाहर का दृश्य बहुत साफ दिखाई देता था। कोच में सामने की ओर लगे टीवी स्क्रीन पर ट्रेन की स्पीड, ट्रेन के चालक तथा ट्रेन के सिक्योरिट ऑफिसर के नाम एवं सैलफोन नम्बर डिस्पले हो रहे थे।
सिक्योरिटी ऑफिसर की तस्वीर भी इस स्क्रीन पर डिस्प्ले हो रही थी। पूरे मार्ग में ट्रेन संभवतः तीन-चार स्टेशनों पर ही रुकी थी किंतु जब भी ट्रेन किसी स्टेशन से गुजर रही होती थी तो उसका नाम भी स्क्रीन पर डिस्पले होता था। थोड़ी देर में एक ट्रेन हॉस्टेस अपनी ट्रॉली के साथ आई। यह एयर हॉस्टेस जैसी ही वर्दी पहने हुए थी और जिस प्रकार हवाई जहाज की एयर हॉस्टेस, यात्रियों को चाय-बिस्कुट बेचती हैं, यह भी बेच रही थी।
हमने अुनमान लगाया कि भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी संभवतः इसी प्रकार की ट्रेन हॉस्टेस भारत की ट्रेनों में नियुक्त करना चाहते हैं। वे ट्रेन हॉस्टेस तो नियुक्त कर सकते हैं किंतु भारत की ट्रेनों में तो यात्रियों के चलने भर के लिए भी जगह नहीं होती, ये ट्रेन हॉस्टेस कहाँ होकर निकलेंगी। भारत के लोग कंधा छीले बिना तो दो कदम आगे नहीं बढ़ सकते।
इन ट्रेन हॉस्टेसों के कंधे छिल-छिलकर लहू-लुहान हो जाया करेंगे। भारत के एक रेलमंत्री ने तो स्लीपर कोच में साइड अपर और साइड लोअर के बीच साइड मिडिल बर्थ भी लगा दी थी। इसके बाद तो कंधों के साथ-साथ घुटने भी छिलने लग गए थे। पूरा दिन अरगो लावू चावल और मक्का के खेतों से होकर गुजरती रही। नारियल और केले के झुरमुट भी दिखाई देते रहे। शाम सवा चार बजे यह गंबीरी जकार्ता स्टेशन पर पहुंची।
हम अपनी यात्रा के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुके थे। अब हमें इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में तीन दिन व्यतीत करने थे और उसके बाद भारत के लिए प्रस्थान करना था।
गम्बीरी स्टेस्यन
यह भारत के किसी भी व्यस्त रेलवे स्टेशन जैसा था किंतु इस स्टेशन को देखना, विश्व इतिहास के दर्शन करने से कम नहीं था। इस रेलवे स्टेशन का निर्माण डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में हुआ था। वर्तमान में बिजनिस क्लास और एक्जीक्यूटिव क्लास ट्रेन इस स्टेशन पर ठहरती हैं। इकॉनोमी क्लास ट्रेन पकड़ने के लिए पासार सेनेन स्टेशन जाना होता है।
गम्बीरी स्टेशन पर ट्रेनों के रुकने का सिलसिला ई.1871 से आरम्भ हुआ। उस समय इसका नाम ‘वेल्टेव्रेडेन स्टेशन’ हुआ करता था। ई.1884 में पुराने स्टेशन की जगह नया वर्तमान स्टेशन बनाया गया। ई.1927 में इस स्टेशन को फिर से बनाया गया। इस बार इसे ‘आर्क डेको स्टाइल’ में बनाया गया जिससे यहाँ से गाड़ियों का आवागमन काफी सुविधाजनक हो गया।
ई.1937 में इस स्टेशन का नाम बदलकर ‘बाताविया कोनिंग्सप्लीन’ (डच भाषा में इसका अर्थ होता है- हॉलैण्ड के राजा का स्थान) कर दिया गया। 27 दिसम्बर 1949 को इण्डोनेशिया डच सत्ता से स्वतंत्र हो गया। उसके बाद इण्डोनेशिया सरकार ने स्टेशन का नाम बदलकर ‘जकार्ता गम्बीर स्टेस्यन’ कर दिया। ई.1990 में इसे जोगलो आर्चीटैक्चरल स्टाइल में बनाया गया तथा इसे लाइमग्रीन रंग से सजाया गया।
रोटी की दुकान
हम लोग अपना सामान लेकर रेलवे स्टेशन के मुख्य भवन से बाहर आ गए। यहाँ हमारी दृष्टि एक छोटी सी दुकान पर पड़ी जिस पर रोमन लिपि में लिखा था- ‘रोटी’। हमने दुकान में झांककर देखा, वहाँ मैदा से बनी हुई छोटे-छोटे आकार की बाटी जैसी रोटियां थीं। हमने दुकानदार से कोई पूछताछ नहीं की क्योंकि तरकारी के नाम पर क्या कुछ मिलने की संभावना थी, वह हमसे छिपा नहीं था।
उत्तरा कहाँ है ?
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हम लोग अपना सामान लेकर रेलवे स्टेशन के मुख्य भवन से बाहर आ गए। हमने वहाँ से होटल पॉप के लिए कार-टैक्सी करनी चाही किंतु वहाँ खड़े कार-टैक्सी चालकों ने हमसे पांच लाख इण्डोनेशाई रुपए भाड़ा मांगा जो भारतीय मुद्रा में 2500 रुपए होते हैं। हमें ज्ञात था कि गंबीरी रेलवे स्टेशन से होटल पोप 29 किलोमीटर है। हम एक हजार रुपए का भुगतान करने को तैयार थे किंतु वे तैयार नहीं हुए। इस पर विजय ने उबर टैक्सी सेवा बुक की। थोड़ी ही देर में टैक्सी वाला रेलवे स्टेशन पहुंच गया और उसने हमसे कहा कि वह साउथ लॉबी में खड़ा है। हमने पास खड़े व्यक्तियों से पूछना चाहा कि जहाँ हम खड़े हैं, यह नॉर्थ लॉबी है कि साउथ। संयोगवश वहाँ हमें एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जो अंग्रेजी भाषा समझ सकता हो। अंत में हमने स्टेशन के भीतर जाकर रेलवे ऑथोरिटीज से पूछा तो उसने बताया कि आप नॉर्थ लॉबी में खड़े हैं। उसने एक तरफ संकेत करते हुए कहा कि यहाँ से बाहर निकलते ही साउथ लॉबी है। हम अपना सामान लेकर नॉर्थ लॉबी से साउथ लॉबी की ओर रवाना हुए तो अचानक मेरी दृष्टि पत्थर और सीमेंट से बने एक चौड़े खम्भे पर गई।
वहाँ लोहे की एक प्लेट लगी हुई थी जिस पर रोमन लिपि में लिखा था – UTTARA LOBY. ओह! ये तो इतना आसान था! वास्तव में जकार्ता के लोग उसे जावाई भाषा में उत्तरा लॉबी कहते हैं। यदि हम पूछते कि उत्तर लॉबी कौनसी है तो हमें तुरंत ही जवाब मिल जाता। हिन्दी भाषा का शब्द हजारों किलोमीटर दूर जावा द्वीप पर बहुतायत से प्रचलित था और हम उसे अंग्रेजी में ढूंढ रहे थे।
केवल एक हजार तीस रुपए
‘होटल पॉप’ गंबीरी रेलवे स्टेशन से लगभग 29 किलोमीटर दूर था। इस होटल का चयन विजय ने इसलिए किया था क्योंकि यह जकार्ता इण्टरनेशनल एयरपोर्ट से मात्र ढाई किलोमीटर दूर था। जकार्ता शहर विश्व के सबसे व्यस्ततम ट्रैफिक वाले शहरों में से है, इसिलए हम चाहते थे कि हम एयरपोर्ट जाते समय स्थानीय ट्रैफिक में न फंस जाएं।
इस टैक्सी का ड्राइवर बहुत ही ढीला था, बिल्कुल अनाड़ियों की तरह कार चला रहा था। जब सड़क खाली होती थी तब भी स्पीड नहीं बढ़ाता था। हमने उससे कई बार अनुरोध किया कि वह अपनी कार की स्पीड बढ़ाए। वह अंग्रेजी न समझ में आने का नाटक करता रहा। पिताजी उस पर एक बार जोर से खीझ गए, तब जाकर उसकी समझ में आया कि हम क्या चाहते हैं।
जकार्ता शहर वास्तव में घनीभूत भीड़ वाला शहर है। जब हम होटल पॉप पहुंचे तो चारों तरफ घना अंधेरा हो चुका था। हमने टैक्सी का भुगतान किया, बिल केवल 1030 रुपए (भारतीय मुद्रा के अनुसार) आया था। जबकि स्टेशन के बाहर खड़े कार टैक्सी वाले हमसे ढाई हजार रुपए की मांग कर रहे थे।
होटल पॉप
होटल पॉप पहुंचकर कहीं घूमने जाने का प्रश्न ही नहीं था। हमें होटल में बने एक डिपार्टमेंटल स्टोर से बिना दूध की चाय मिल गई। दीपा का मिल्क पाउडर का डिब्बा इस समय हमारे लिए वरदान सिद्ध हुआ। चाय काफी महंगी थी, पर चाय उपलब्ध थी, यही बड़ी उपलब्धि थी। यह एक सुविधाजनक एवं बहुत बड़ा होटल था।
हमने कुछ देर टीवी देखा और खाना खाकर सो गए। होटल साफ-सुथरा एवं विभिन्न सुख-सुविधाओं से सुसज्जित था किंतु यहाँ वे आराम नहीं थे जो सर्विस अपार्टमेंट में उपलब्ध होते हैं। घर और होटल में जितना फर्क होना चाहिए, वह तो था ही।
मुस्कुराहट से भरी वह इण्डोनेशियन लड़की
22 अप्रेल को प्रातः पांच बजे आंख खुल गई। लगभग छः बजे मैं नीचे गया ताकि चाय की उपलब्धता के बारे में जाना जा सके। रिसेप्शन काउंटर पर कोई कर्मचारी नहीं था किंतु काउंटर के पास की लॉबी में 18-19 वर्ष की पतली-दुबली सुंदर सी लड़की खड़ी थी। मैंने उसकी तरफ देखा, वह एक दीवार से पीठ टिकाए शांत मुद्रा में खड़ी थी।
उसे देखकर कहा जा सकता था कि वह अभी नहाकर अपनी ड्यूटी पर आई है अर्थात् रात्रि कालीन स्टाफ में से नहीं है। मैंने उससे गुड मॉर्निंग कहा तो उसने मुस्कुराकर बहुत ही संजीदगी से जवाब दिया। संभवतः उसे केवल इतनी ही अंग्रेजी आती थी। क्योंकि इसके बाद उसने एक भी शब्द नहीं बोला, केवल मुस्कुराती रही और कुछ भी पूछने पर संकेत भर करती रही।
मैंने उससे पूछा कि यहाँ चाय कहां मिलेगी! वह निश्चित ही समझ गई थी कि इस समय आदमी को किस चीज की आवश्यकता हो सकती है! उसने चाय की एक बड़ी सी केटली की तरफ संकेत किया। मेरी प्रसन्नता का पार नहीं था। वहाँ न केवल लगभग 8 लीटर बड़ी चाय की केटली थी जिसमें चाय भरी हुई थी बल्कि मिल्क पाउडर के छोटे-छोटे पाउच भी रखे हुए थे।
मैंने एक कप चाय तो उसी समय बनाकर पी ली और दल के शेष सदस्यों को यह खुशखबरी सुनाने के लिए अपने कमरों की तरफ लौट गया।
कुछ ही देर में हम सब उस लॉबी में थे। इस दौरान मधु को एक भारतीय व्यक्ति मिला जिसने हिन्दी में कुछ कहा। मधु हिन्दी सुनकर चौंकी, उससे कुछ और पूछ पाती तब तक वह भारतीय भला मानुस तेजी से चलता हुआ दूर चला गया और फिर कभी दुबारा दिखाई नहीं दिया।
हमारे पास फ्री नाश्ते के कूपन थे किंतु हम उन्हें किसी भी तरह काम में नहीं ले सकते थे क्योंकि नाश्ते में हमारे काम का कुछ भी नहीं था। इसलिए हमने एक-एक कप चाय और पी तथा अपने कमरों में तैयार होने के लिए चले गए। इस दौरान दीपा ने होटल के पूरे फ्रंट व्यू का जायजा लिया और मैंने लॉबी में गेस्ट्स की सुविधा के लिए रखे कम्पयूटरों पर ई-मेल वगैरा देखे।
यदि वहाँ होते भारतीय लड़के-लड़कियां
हम लगभग एक घण्टा उस लॉबी में रहे। इस बीच हमने देखा कि दुनिया के बहुत से देशों के पर्यटक यहाँ ठहरे हुए थे। वे चाय और नाश्ते के लिए इसी लॉबी में पहुंच रहे थे। इतने लोग वहाँ थे किंतु किसी तरह की चिल्ल-पौं नहीं थी। मुस्कुराहट से भरी वह इण्डोनेशियाई लड़की पूरे समय खड़ी रही और अतिथियों को अटैण्ड करती रही।
वह बिना बोले ही अपना काम बड़ी कुशलता से कर रही थी। उसने किसी अतिथि को किसी तरह की कोई समस्या नहीं आने दी। मैंने मन में विचार किया कि यदि इसकी जगह भारतीय कर्मचारी होती तो वह अवश्य ही वहाँ पड़ी कुर्सियों को खींचकर बैठ जाती और पूरे समय सैलफोन पर बात करती रहती।
मुस्कुराना तो दूर, वह अतिथियों को ढंग से जवाब भी नहीं देती क्योंकि उसकी प्राथमिकताएं और प्रशिक्षण सभी कुछ भिन्न तरह का होता। यदि उसके स्थान पर कोई भारतीय पुरुष कर्मचारी होता तो आधा समय वह अपने स्थान पर ही नहीं मिलता और जोर-जोर से बोलकर स्वयं ही वहाँ की शांति को भंग कर रहा होता।
घटत कचा
हमने आज का पूरा दिन जकार्ता शहर देखने लिए निर्धारित किया हुआ था। हमें ज्ञात हुआ कि जकार्ता में मोनास नेशनल म्यूजियम से तीन बस सेवाएं चलती हैं जो पर्यटकों को जकार्ता शहर की निःशुल्क यात्रा करवाती है। इनमें से पहली बस सेवा सांस्कृतिक स्थलों के लिए, दूसरी बस सेवा पुराने जकार्ता शहर के लिए तथा तीसरी बस सेवा नए जकार्ता शहर के लिए है।
होटल पॉप से मोनास नेशनल म्यूजियम लगभग 24 किलोमीटर दूर है। इसलिए हमने उबर की टैक्सी बुक कर ली। लगभग 10 मिन्ट में टैक्सी आ गई। टैक्सी ड्राइवर 25-26 साल का गोरा-चिट्टा और सॉफ्ट-स्पीकिंग नौजवान था। उसके कपड़े काफी महंगे प्रतीत होते थे। उसने हाथों में रुद्राक्ष की वैसी ही माला पहन रखी थी जिसका मूल्य हमें तनाहलोट की चीनी दुकान में छः लाख इण्डोनेशियाई रुपए बताया गया था।
मैंने मार्ग में उससे पूछा कि उसका मुख्य कार्य टैक्सी चलाना है या कुछ और! उसने हमें बताया कि उसका एक गैराज है तथा वह केबल सप्लाई का काम करता है। रविवार को उसके गैरेज की छुट्टी होती है, इसदिन वह उबर के लिए टैक्सी चलाता है। मैंने उससे पूछा कि क्या इस काम में बहुत अच्छी आमदनी होती है! उसने जवाब दिया कि कभी-कभी बहुत अच्छी आय होती है किंतु नॉरमल दिनों में भी कम नहीं होती।
रास्ते में सड़क के किनारे एक विशाल चौराहे के बीच में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथ का मॉडल बना हुआ था जिसे घोड़े खींच रहे थे। मैंने टैक्सी चालक से पूछा कि यह किसका स्टेच्यू है! उसने कहा कि या तो यह घटत कचा है या भीमा है। उसका उत्तर चौंकाने वाला था। वह भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बारे में नहीं जानता था। उसके लिए श्रीकृष्ण से लेकर भीम और घटोत्कच एक जैसे ही थे।
इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता
निःशुल्क पर्यटन बस सेवा बुण्डारन होटल इण्डोनेशिया से आरम्भ होकर उत्तर की ओर थामरिन जालान स्थित सरीनाह डिपार्टमेंटल स्टोर तक जाती है और वहाँ से नेशनल म्यूजियम होती हुई जालान जुआण्डा में स्थित जालान महापहित तक जाती है और अंत में इस्ताना नेगारा अर्थात् नेगारा महल तक जाकर समाप्त हो जाती है। नेशनल म्यूजियम के पास ही मर्डेका स्क्वायर स्थित है।
हमें मोनास नेशनल म्यूजियम के सामने से लाल रंग की एक बस मिली जो ओल्ड सिटी का दौरा करवाती थी। यह भीड़भाड़ से भरा हुआ बहुत बड़ा शहर है। इसमें एक करोड़ से अधिक जनसंख्या निवास करती है। संसार में 34 शहर ऐसे हैं जिनकी जनंसख्या 1 करोड़ से ऊपर है, जकार्ता उनमें से एक है। यह साउथ-ईस्ट एशिया का सबसे बड़ा शहर है।
नए जकार्ता शहर में सड़क के किनारे विशाल मॉल, मार्केट, होटल, पैलेशियल बिल्डिंग्स और सरकारी कार्यालय खड़े हैं। यहाँ की सड़कें बहुत चौड़ी और साफ-सुथरी हैं। पूरी दुनिया से लोग जकार्ता शहर देखने आते हैं इसलिए विश्व भर के पर्यटकों का तांता लगा रहता है।
ई.2020 तक इस शहर की जनसंख्या 16 करोड़ को पार कर जाने वाली है। इसलिए इण्डोनिशयाई सरकार ने वृहत् जकार्ता योजना पर काम करना आरम्भ कर दिया है जिसके तहत आसपास के गांवों और कस्बों को जकार्ता शहर में मिला लिया जाएगा। लगभग 40 मिनट में यह राउण्ड पूरा हो गया। इस बीच बस, कुछ म्यूजियम्स के सामने रुकी किंतु हमने बस में बैठे-बैठे ही शहर देखने का निर्णय लिया और बस के अंतिम पड़ाव पर उतर पड़े।
फिर से तुम पास आए
पुराने शहर में कुछ देर चहल-कदमी करने के बाद हमें पीले रंग की एक बस मिली जो हमें नए जकार्ता के स्थलों को दिखाती हुई फिर से नेशनल म्यूजियम ले जाने वाली थी। इस बस को 20-22 साल की एक लड़की चला रही थी। बस में दो लड़कियां टूरिस्ट गाईड के रूप में काम कर रही थीं तथा हर टूरिस्ट प्लेस के बारे में माइक्रोफोन पर बता रही थीं। यह विवरण इण्डोनेशियाई भाषा में होने से हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
अचानक उनमें से एक टूरिस्ट गाइड अपने स्थान से उठकर हमारे पास आई और बोली- इण्डिया! हमने हाँ कहा तो उसने अगला वाक्य टूटी-फूटी अंग्रेजी में बोला जिससे हमें अनुमान हुआ कि यह लड़की भारत गई थी और उसने दिल्ली शहर देखा है। मैंने मुस्कुराकर उसे ग्रीट किया और फिर से बाहर देखने लगा।
मेरी रुचि बातों में न देखकर वह अपने स्थान पर चली गई और थोड़ा उच्च स्वर में वही गीत गाने लगी जो बोरोबुदुर स्मारक परिसर के मार्केट में दो युवक गिटार बजाते हुए गा रहे थे- ‘तुम पास आए, यूं मुस्कुराए, क्या करूं हाए कि कुछ-कुछ होता है।’
मैंने अनुमान लगाया कि इण्डोनेशिया में यह भारतीय फिल्म बहुत लोकप्रिय रही होगी! थोड़ी ही देर में मोनास एरिया आ गया जहाँ नेशनल म्यूजियम स्थित है। हम यहीं उतर गए क्योंकि इसके सामने ही मर्डेका स्क्वायर बना हुआ है। हम कुछ समय इसी क्षेत्र में गुजारना चाहते थे।
इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता का मर्डेका स्क्वायर
किसी समय यह स्थान जंगली भैंसों के चरने का स्थान हुआ करता था जो अधिक पानी में सुगमता से रह सकते थे। जावा के लोगों ने इन्हीं भैंसों के सहारे चावल की खेती आरम्भ की थी। 18वीं शताब्दी ईस्वी में डच लोगों ने इस स्थान पर कई महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण किया। ईस्ट-इण्डीज औपनिवेशिक सरकार के समय इस स्थान को कोनिंगस्प्लेइन अर्थात राजा का मैदान कहा जाता था।
मर्डेका इण्डोनेशियाई शब्द है जिसका अर्थ है आजादी। अर्थात् डच लोगों के समय में जो राजाओं का स्थान था, वह अब आजादी का मैदान बन गया है। जकार्ता का राष्ट्रीय स्मारक जिस स्थान पर बना हुआ है, वह मर्डेका स्क्वैयर के नाम से जाना जाता है। इसे इण्डोनेशियाई भाषा में ‘मैदान मर्डेका’ तथा ‘लापंगान मर्डेका’ भी कहा जाता है।
राष्ट्रीय स्मारक के चारों ओर चार मैदान स्थित हैं। इनके लिए भी मेदान (डमकंद) शब्द प्रयुक्त होता है। उत्तर दिशा वाले मैदान को मेदान उत्तरा कहा जाता है। ये दोनों ही शब्द हिन्दी भाषा के हैं। मर्डेका स्क्वैयर जकार्ता के ठीक केन्द्र में एक किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में स्थित है। यदि इसके अंतर्गत निकटवर्ती मैदानों को सम्मिलित कर लिया जाए तो इसका क्षेत्रफल 75 हैक्टेयर होता है।
इस प्रकार यह संसार का सबसे बड़ा स्क्वैयर है। इसके मध्य में स्थित राष्ट्रीय स्मारक को स्थानीय भाषा में मोनास कहा जाता है। राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न कार्यक्रम, मिलिट्री परेड, नागरिक प्रदर्शन आदि इसी स्थान पर आयोजित होते हैं। सप्ताहंत की छुट्टियों में हजारों लोग अपने परिवारों के साथ यहाँ पहुंचते हैं। इसके चारों ओर विभिन्न सरकारी भवन स्थित हैं जिनमें मर्डेका पैलेस, नेशनल म्यूजियम, सुप्रीम कोर्ट, रेडियो ऑफ रिपब्लिक इण्डोनेशिया सहित विभिन्न सरकारी मंत्रालय भी शामिल है।
इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता का राष्ट्रीय स्मारक
मर्डेका मैदान के मध्य में इण्डोनेशिया का राष्ट्रीय स्मारक बना हुआ है। यह 132 मीटर ऊंची लाट है। इसे इण्डोनेशिया के राष्ट्रीय स्वातंत्र्य संग्राम का प्रतीक कहा जाता है। जब ई.1950 में डच सरकार ने इण्डोनेशिया को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी तो इण्डोनेशिया की राजधानी योग्यकार्ता से जकार्ता लाई गई।
राष्ट्रपति सुकार्णो की पहल पर ई.1961 में मर्डेका स्कैवयर में राष्ट्रीय स्मारक का निर्माण आरम्भ किया गया। यह ई.1975 में बनकर तैयार हुआ तथा देश की जनता को समर्पित किया गया। इस लाट के ऊपरी हिस्से में 14.5 टन कांसे से 14 मीटर ऊंची एवं 6 मीटर चौड़ी, आग की लपटें बनाई गई हैं जिन पर 50 किलो स्वर्ण से बनी हुई चद्दर मंढी हुई है। यह प्रातः 8 बजे से सायं 4 बजे तक खुला रहता है। सायंकाल में 7 बजे से 10 बजे तक रात्रि कालीन पर्यटन के लिए पुनः खोला जाता है। सोमवार को पूरी तरह छुट्टी रहती है।
संसार का सबसे बड़ा शिवलिंग
इस स्मारक के निर्माण के लिए इण्डोनेशिया सरकार ने दो बार खुली प्रतियोगिताएं आयोजित कीं तथा दोनों ही बार एक ही डिजाइन चुना गया। जब यह डिजाइन राष्ट्रपति सुकार्णो को दिखाया गया तो उसे यह पसंद नहीं आया।
सुकार्णो इस स्थान पर एक विशालाकाय शिवलिंग का निर्माण करना चाहता था जो जावा की संस्कृति का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर सके। वह यह भी चाहता था कि इस शिवलिंग को इस तरह बनाया जाए कि उसके आधार की योनि, चावल कूटने की ओखली की तरह दिखाई दे और शिवलिंग, चावल कूटने के मूसल की तरह हो।
सुकार्णो के मस्तिष्क में जितनी विशाल योजना थी, यदि उसे अपनाया जाता तो इण्डोनेशिया की आर्थिक स्थिति ही डांवाडोल हो जाती। अतः 132 मीटर ऊंचे शिवलिंग का निर्माण किया गया जो चावल कूटने के मूसल को भी प्रदर्शित करता है तथा इसके आधार पर योनि को इस तरह बनाया गया है जो चावल कूटने की ओखली का प्रतिनिधित्व करती है।
इसी तरह का एक छोटा स्मारक सेंट्रल जोगजा में भी बनाया गया है। इण्डोनेशिया के राष्ट्रीय स्मारक के रूप में बने शिवलिंग को सकारात्मकता, शक्ति एवं दिन का प्रतीक माना जाता है जबकि इसके आधार में बनी योनि जीव के शाश्वत अस्तित्व, संतुलन, सामंजस्य, ऊर्वरता एवं रात्रि का प्रतीक है।
इस स्मारक को इण्डोनेशिया के स्थानीय पुष्प ‘एमोर्फोफलुस टिटेनम’ का प्रतीक भी माना जाता है। इस पुष्प के आधार भाग में एक योनि जैसी संरचना बनी होती है जिसके बीच स्तंभाकार रचना बाहर निकलती हुई दिखाई देती है। इस प्रकार यह संसार का सबसे बड़ा शिवलिंग है जो अपने आधार से 132 मीटर अर्थात् 433 फुट लम्बा है।
इस लाट के भीतर म्यूजियम स्थापित किया गया है। इसके बाहरी हिस्से में प्रस्तर शिलाएं लगाई गई हैं जिन पर इण्डोनेशिया का इतिहास लिखा गया है। इसके आधार भाग में बने स्वातंत्र्य द्वार की बाईं दीवार पर इण्डोनेशिया का राष्ट्रीय चिह्न गरुड़ अंकित है जिसे यहाँ गरुड़ पंचशील कहा जाता है तथा Garuda Pancasila लिखा जाता है।
मर्डेका स्क्वैयर से वापसी
अभी लगभग साढ़े चार ही बजे थे कि अंधेरा घिरने लगा। आकाश में काले बादलों के समूह चारों तरफ उमड़-घुमड़ने लगे। आज न तो पुतु हमारे साथ था और न मि. अंतो। इसलिए हमने तत्काल होटल वापस लौटने का निर्णय लिया। विजय ने उबर की टैक्सी बुक की। केवल पांच मिनट में टैक्सी आ गई और हम अपने होटल लौट पड़े। हमने होटल पहुंचकर उसी छोटे से डिपार्टमेंटल स्टोर से चाय खरीदी। यह एक अच्छी और सुविधाजनक दुकान थी। जहाँ जरूरत की बहुत सारी चीजें उपलब्ध थीं।
लेखकीय – पोप के देश में ग्यारह दिन पृष्ठ पर लेखक डॉ. मोहन लाल गुप्ता द्वारा इटली में बिताए गए 11 दिनों के अनुभव के आधार पर यात्रा वृत्तांत लिखा गया है।
हमारे लिए ये महंगी विदेश यात्राएं उस देश के इतिहास और संस्कृति को आत्मसात् करने और बाद में उसे ज्यों की त्यों पन्नों पर उतार देने की परिश्रम-युक्त प्रक्रिया का साधन हैं। वर्ष 2019 की गर्मियों में हमरे परिवार द्वारा की गई रोम यात्रा ऐसी ही एक प्रक्रिया का अंग थी।
17 मई से 28 मई 2019 तक ग्यारह दिनों की इस यात्रा में, हम इटली और उसके नगरों की सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास को जितना देख, सुन और समझ पाए, वही इस पुस्तक के पन्नों में लिखा गया है किंतु इस तरह की यात्राओं में केवल उस देश में गुजारे गए दिन ही लेखन का हिस्सा नहीं होते, अपितु उस देश की यात्रा से पहले बहुत कुछ पढ़ना और समझना होता है। निश्चित रूप से इटली की यात्रा से पहले पढ़ा गया और समझा गया इतिहास एवं भूगोल भी इस पुस्तक के महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं।
11 दिन के इटली प्रवास के दौरान हमने चार दिन रोम में, तीन दिन फ्लोरेंस में, एक दिन पीसा में और तीन दिन वेनिस में बिताए। इस दौरान अनेक रोचक एवं खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए, उन्हें भी ज्यों का त्यों लिखने का प्रयास किया गया है।
पोप के देश में ग्यारह दिन पुस्तक मुद्रित प्रारूप में भी उपलब्ध है जिसे आप अमेजन डॉट इन से क्रय कर सकते हैं।
भारत में अत्यंत प्राचीन काल से रोम को दुनिया की नाभि कहा जाता है। यह तो तय है कि रोम धरती के मध्य में नहीं है, तो फिर रोम को दुनिया की नाभि क्यों कहा जाता है! निश्चित रूप से रोम ने यूरोप को ज्ञान-विज्ञान, धर्म और दर्शन दिया। कानून और नियम दिए, भोजन एवं परिधान शैली दी। एक समय था जब यूरोप एवं भू-मध्य-सागरीय देशों की राजनीति रोम से संचालित होती थी। संभवतः इन्हीं सब कारणों से रोम को दुनिया की नाभि कहा जाता होगा।
हम वर्ष 2017 में इण्डोनेशिया के बाली एवं जावा द्वीपों का भ्रमण कर चुके थे तथा इस बार यूरोप के किसी देश को देखना चाहते थे। इसलिए हमने ‘दुनिया की नाभि’ अर्थात् ‘रोम’ को देखने का निर्णय लिया। उसके साथ ही इटली के पीसा, फ्लोरेंस तथा वेनेजिया नामक नगरों के भ्रमण का भी कार्यक्रम बनाया। आज 17 मई थी, आज ही हमें दुनिया की नाभि के लिए प्रस्थान करना था।
इस बार भी हमारे समूह में वर्ष 2017 में इण्डोनेशिया की यात्रा करने वाले सदस्य ही थे। अर्थात् पिताजी श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता, मैं, मेरी पत्नी मधुबाला, पुत्र विजय, पुत्रवधू भानुप्रिया और पौत्री दीपा! चार साल की दीपा, शैतानियां जिसके दिमाग से निकलकर दुनिया में पनाह पाती हैं। वह भी अपने छोटे से बैग के साथ तैयार थी, जिसमें उसके बिस्किट और पानी की बोतल थी।
दीपा का पासपोर्ट
हम सबने अपना-अपना पासपोर्ट अपने-अपने बैग या जेब में रखा तो लघु यायावर दीपा ने भी विजय और भानु से अपना पासपोर्ट मांगा, किंतु यह देखकर उसकी निराशा का पार नहीं था कि उसके मम्मी-पाना ने उसे पासपोर्ट देने से मना कर दिया। बड़ी कठिनाई से उसे समझाया गया कि उसका पासपोर्ट मम्मी के पास ही होना जरूरी है अन्यथा प्लेन में नहीं घुसने दिया जाएगा।
इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
हमारी फ्लाइट दिल्ली के इंदिरागांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दोपहर 12.15 बजे की थी। इसलिए हम विजय के नोएडा स्थित घर से प्रातः 8.30 बजे ही घर से निकल गए।
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टैक्सी ने हमें 10.05 पर एयरपोर्ट छोड़ दिया। प्रातः काल में डेढ़ घण्टे की यात्रा के बाद सबसे पहले टॉयलेट ढूंढना स्वाभाविक बात है किंतु एयरपोर्ट के टर्मिलन-3 पर टॉयलेट इतनी दूर बना हुआ है कि वृद्ध व्यक्ति को वहाँ तक जाने और वापस आने में 20-25 मिनट लग जाते हैं। हम जब तक टॉयलेट से मुक्त होकर वापस आए, तब तक 10.25 हो गए। 10.30 पर हमने एयरपोर्ट के भीतर सिक्योरिटी जोन पार किया और सुरक्षा जांच के बाद 10.45 पर हम इमीग्रेशन काउंटर तक जाने वाली क्यू में लग गए। यह एयर इण्डिया की फ्लाइट थी। दुनिया भर के लिए एयर इण्डिया की फ्लाइट इसी समय दोपहर में उड़ती हैं। इसलिए इमीग्रेशन काउण्टर पर लम्बी-लम्बी कतारें लगी हुई थीं। हमारी फ्लाइट 12.50 बजे थी इसलिए इमीग्रेशन पॉइंट को ठीक 11.50 पर बंद हो जाना था किंतु जिस गति से ‘क्यू’ आगे सरक रही थी, तब तक हमारे लिए काउंटर पर पहुँचना कठिना हो गया। पिताजी ने एयर इण्डिया के कर्मचारी से बार-बार अनुरोध किया कि हमारी फ्लाइट छूट जाएगी, आप हमें आगे जाने दीजिए किंतु वह कर्मचारी यह कहकर टालता रहा कि- ‘जल्दी मत कीजिए सर, आपका नम्बर आ जाएगा।’
हमें एक-एक क्षण भारी लग रहा था। यदि यह फ्लाइट छूट गई तो हमारे आगे के सारे कार्यक्रम एवं बुकिंग बिगड़ जाएंगी। अंत में काफी देर बाद उस कर्मचारी की जगह नया कर्मचारी आया। पिताजी ने उससे भी, आगे जाने देने के लिए अनुरोध किया। इस पर वह कर्मचारी बोला- ‘आप जल्दी कीजिए सर, आगे जाइए। आपकी फ्लाइट का टाइम हो रहा है।’
उस कर्मचारी के सहयोग से हम ‘क्यू’ से बाहर निकलकर काउंटर पर पहुँचे। तब तक 11.45 हो चुके थे। इमीग्रेशन अधिकारी ने हमें टोका कि इतनी लेट क्यों आए हो? हम कुछ जवाब दे पाते उससे पहले ही एक यात्री ‘काउण्टर’ पर बैठे अधिकारी से लड़ने लगा कि वह उसे विण्डो के पास वाली सीट एलॉट करे। अधिकारी ने बताया कि ऐसा करना उसके अधिकार में नहीं है।
सभी सीटें बुक हैं तथा सभी यात्रियों ने अपनी मर्जी से अपनी सीटें तय की हैं, यहाँ तक कि आपने भी अपनी मर्जी से यह सीट चुनी थी। अब मैं इसे बदल नहीं सकता किंतु वह यात्री बहुत जिद्दी था। वह मान ही नहीं रहा था और हमें विलम्बर हुआ जा रहा था। हमें लग रहा था कि आज हमें एक ऐसी गलती की सजा मिलने वाली है जो हमने नहीं की थी।
भागते-दौड़ते पहुँचे विमान में
किसी तरह इमीग्रेशन अधिकारी ने हमारा सामान लिया और हमें भीतर जाने के लिए संकेत कर दिया। तब 12.20 हो चुके थे। वहाँ से भी काफी लम्बा चलना पड़ता है और टी-3 पर 26 गेट बने हुए हैं। हमें 17 नम्बर गेट पर जाना था जो लगभग अंत में पड़ता था। वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते 12.40 हो गए। सीट तक पहुँचते-पहुँचते 12.45 हो गए।
सीट पर बैठते ही खाना
हम प्रातः आठ बजे नाश्ता करके घर से निकले थे, उसके बाद कुछ खाने का समय ही नहीं मिला था। पिताजी को तथा मुझे डाइबिटीज की बीमारी है। अब तक तो चिंता के कारण शरीर सहयोग कर रहा था किंतु हवाई जहाज में सीट पर बैठते ही लगा कि रक्त में ‘शुगर लेवल लो’ हो रहा है। अभी सामान भी ढंग से नहीं जमा पाया था कि मैंने बैग में से निकालकर खाना शुरु कर दिया। पिताजी को बहुत कम मामलों में ‘शुगर लो’ होती है। इस मामले में उनकी सहन शक्ति मुझसे अधिक है। इसलिए वे कुछ देर और प्रतीक्षा कर सकते थे।
पहाड़, जंगल और समुद्र का सिलसिला
शाम साढ़े पाँच बजे (इटली का समय) ऊंचे पहाड़ों का सिलसिला आरम्भ हुआ जिन पर बर्फ जमी हुई थी और उनके बीच-बीच में झीलें और घने जंगल दिखाई दे रहे थे। इतनी ऊंचाई से देखने पर नीचे के पहाड़ गोल दिखाई दे रहे थे जिनसे अनुमान होता था कि इन पहाड़ों पर पिछले सैंकड़ों सालों से बरसात हो रही है। पहाड़ों का सिलसिला हरे-भरे मैदानों में जाकर समाप्त हुआ जहाँ करीने से खेतों की कतारें सजी हुई थीं।
इनके बीच-बीच में मानव बस्तियां हैं जिनके घरों की छतें मिट्टी के केलू से बनी हैं और झौंपड़ीनुमा आकृति में निर्मित हैं। शीघ्र ही खेतों का सिलसिला समाप्त हो गया और समुद्र शुरु हो गया। काफी देर तक समुद्र के किनारे-किनारे उड़ते रहने के बाद विमान काफी नीचे हो गया और फिर रोम की ऐतिहासिक भूमि को स्पर्श कर गया।
17 मई 2019 को सायं सात बजे हम इटली की राजधानी रोम से 35 किलोमीटर दूर लिओनार्डो दा विंची इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे। इसी के साथ रोम में पहला दिन आरम्भ हो गया।
लियोनार्डो दा विंची एयरपोर्ट पर
सायं 7.00 बजे हम रोम से 35 किलोमीटर दूर लिओनार्डो दा विंची एयरपोर्ट पर उतरे। फ्लाइट 2.15 की थी किंतु भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध खराब होने से फ्लाइट दिल्ली से पाकिस्तान के ऊपर होकर जाने की बजाय बम्बई होकर अरब सागर के ऊपर से होती हुई भू-मध्य सागर को पार करती हुई इटली पहुँची। यह 7 घण्टे की उड़ान थी जो लगभग 9.30 घण्टे की हो गई।
लगेज की प्राप्ति
एयरपोर्ट पर लगेज की प्राप्ति एक कठिन काम होता है। कार्गो से समान उतार कर रिवॉल्विंग बेल्ट पर पटक दिया जाता है। लोग उसमें से अपना सामान चुनकर उठा लेते हैं। आजकल सारे बैग एक जैसे होते हैं। इन्हें पहचानना कठिन होता है। गलती होने की संभावना रहती है। सामान बैल्ट पर घूमता रहता है। लोग भीड़ लगा लेते हैं और किसी दूसरे का सामान उतार लेते हैं।
जब उन्हें पता चलता है कि यह उनका नहीं है तो वे उसे बैल्ट के पास ही इधर-उधर पटक देते है। हमारे लगेज में सुषमा ने घर पर ही पीले रिबन बांध दिए थे। यदि ये नहीं होते तो हमारे लिए एयरपोर्ट पर अपने बैग पहचान पाना संभव नहीं था। हमारी 6 अटैचियों में से तीन अटैचियां लोगों ने रिवॉल्विंग बेल्ट से नीचे उतार कर लुढ़का दी थीं। पिताजी की अैटेची का ताला सिक्योरिटी चैक वालों ने तोड़ दिया था। खैर जैसे-तैसे हमने अपना सामान लिया।
धुएं के बादल
एयरपोर्ट से बाहर आते ही सिगरेट के धुंए के छोटे-छोटे बादलों से हमारा सामना हुआ। वहाँ सैंकड़ों आदमी और औरत अकेले खड़े हुए अथवा समूह में खड़े होकर सिगरेट एवं सिगार पी रहे थे। भारत में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान वर्जित है। इसलिए हम इस धुंए के आदी नहीं थे। इतनी बड़ी संख्या में स्त्रियों एवं पुरुषों को सिगरेट पीते हुए देखकर आश्चर्य भी हुआ और हमें उस हवा में सांस लेने में कठिनाई भी हुई।
बिना सैलफोन-सिम के
इस समय हमारे सैलफोन में इटली में काम करने वाली कोई सिम नहीं थी। हालांकि इण्डोनेशिया यात्रा में हम दिल्ली से ही सिम लेकर चले थे जिसने इण्डोनेशिया में सफलतापूर्वक काम किया था किंतु विजय अपनी विगत कोरिया यात्रा में दिल्ली से जो सिम लेकर गया था उसने कोरिया में काम नहीं किया था। इसलिए इस बार हमने इटली में ही सिम लेने का निर्णय लिया था। एयरपोर्ट के भीतर कुछ लोग सिम बेच रहे थे किंतु वे बहुत महंगी थीं। अतः हमने एयरपोर्ट की बजाय बाजार से सिम लेने का निर्णय लिया।
पैंतीस हजार के बदले साढ़े अट्ठाइस हजार रुपए
सिम को एक दिन के लिए टाला जा सकता था किंतु करेंसी को नहीं टाला जा सकता था क्योंकि बाहर निकलते ही टैक्सी वाले को यूरो में पेमेंट करना पड़ेगा। पिछली बार की इण्डोनेशिया ट्रिप की तरह इस बार भी हम दिल्ली से यूएस डॉलर लेकर चले थे। हमने एक ‘मनी-एक्सचेंजर’ से अपनी मुद्रा यूरो में बदली।
एयरपोर्ट पर हमें 500 डॉलर (लगभग 35000 भारतीय रुपए) के बदले 358 यूरो (लगभग 28640) रुपए मिले। यह बहुत महंगा सौदा था किंतु इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। उसके पास वाले एक काउण्टर पर तो इससे भी कम यूरो मिल रहे थे।
टैक्सी वाले से सम्पर्क नहीं
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एयरपोर्ट से बाहर आते-आते सायं के आठ बज चुके थे किंतु बाहर काफी उजाला था और लगता था कि अभी सूर्यदेव की विदाई में कम से कम दो घण्टे बाकी हैं। विजय ने अपने सैलफोन पर एयरपोर्ट के वाई-फाई की सहायता से ऊबर के एप पर एक टैक्सी बुक करवाई। टैक्सी तो बुक हो गई और वह एयरपोर्ट के आस-पास कहीं आकर भी खड़ी हो गई किंतु सैलफोन में सिम नहीं होने के कारण हम उससे बात नहीं कर सकते थे। अतः टैक्सी वाले से सम्पर्क नहीं हो सका। बसें भी बड़ी संख्या में आ रही थीं किंतु हम किसी से बात करके यह पता नहीं कर सकते थे कि हमें अपने सर्विस अपार्टमेंट तक जाने के लिए कौनसी बस मिलेगी और कहाँ से मिलेगी! ‘गूगल’ बस का नम्बर तो बता सकता था किंतु वहाँ छोटे-छोटे बस स्टॉप की भीड़ में से सही बस स्टॉप हमें चुनकर नहीं दे सकता था। बस स्टॉप की पहचान कर पाना दुविधाजनक था, साथ ही इतने सामान के साथ बस की यात्रा भी कठिन थी। हमने एयरपोर्ट के बाहर एक कतार देखी। लोग टैक्सी पकड़ने के लिए कतार में खड़े हुए थे। हम भी उसी कतार में लग गए। बहुत सी टैक्सियां एक साथ और लगातार तेजी से स्टॉप पर आकर रुक रही थीं। इसलिए वहाँ टैक्सियों की भीड़ सी लगी हुई थी।
प्रत्येक टैक्सी कुछ सैकेण्ड्स के लिए ही रुक पाती थी। इतनी देर में इटली के नागरिक उन्हें अपनी भाषा में बात करके तय कर लेते थे। हमने भी कई टैक्सी वालों से बात करने का प्रयास किया किंतु वे अंग्रेजी नहीं जानते थे, केवल इटालियन भाषा बोल रहे थे।
अंत में हमने तय किया कि केवल उस स्थान का नाम बोलना है, जहाँ हमें जाना है। हम लोग छः व्यक्ति थे और साथ में सामान भी था, इसलिए हमें बड़ी टैक्सी की आवश्यकता थी। एक टैक्सी वाले ने उस स्थान पर चलना स्वीकार कर लिया, वह अंग्रेजी भी जानता था। उसने 60 यूरो मांगे। यह भारत में टैक्सी की प्रचलित दरों से दस गुना था।
32 किलोमीटर के पाँच हजार रुपए
भारत में टैक्सी लगभग 20 रुपए किलोमीटर में मिल जाती है किंतु यह हमसे 150 रुपए प्रति किलोमीटर मांग रही थी जो कि एक्सचेंज का कमीशन चुकाने के बाद लगभग 200 रुपए प्रति किलोमीटर बैठ रहा था। विजय ने पहले ही गूगल पर सर्च करके देख लिया था, इटली में एयरपोर्ट से टैक्सी भाड़े की यही दर प्रचलित थी। अतः हमने टैक्सी तय कर ली। अब तक रात के लगभग 9.15 बज चुके थे और पूरी तरह अंधेरा हो गया था।
टैक्सी काफी देर तक सुनसान सड़कों से गुजरी। बीच में पहाड़, समुद्र का किनारा और जंगल जैसे क्षेत्र भी आए। लगभग तीस मिनट तक निर्जन स्थानों में चलने के बाद टैक्सी ने नगरीय क्षेत्र में प्रवेश किया। यहाँ भी सड़कें लगभग खाली थीं। लगभग सवा दस बजे हम वेटिकन सिटी के उस क्षेत्र में पहुँचे जहाँ हमने सर्विस अपार्टमेंट बुक कर रखा था।
विजय ने एयरपोर्ट के वाई-फाई का प्रयोग करके सर्विस अपार्टमेंट की मालकिन को व्हाट्सैप पर मैसेज कर दिया था कि हम लोग एयरपोर्ट पहुँच गए हैं और टैक्सी पकड़कर सर्विस-अपार्टमेंट पहुँचेंगे।
सड़कों पर सन्नाटा
इस समय हमारी घड़ियों में रात के डेढ़ बज रहे थे क्योंकि घड़ियां भारतीय समय दिखा रही थीं। इटली के समय के अनुसार हम रात 10.15 पर विया ग्रिगोरिया में बिल्डिंग संख्या 7/133 के सामने उतरे। सड़कों पर कोई मनुष्य दिखाई नहीं दे रहा था। केवल तेज गति से भाग रही कारों एवं बसों की रौशनियां हमारे निकट से होकर तेजी से निकल रही थीं। हमें बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह शहर इतनी जल्दी सो जाता है। भारत में तो इस समय तक केवल गांव ही सो पाते हैं, छोटे-छोटे कस्बे भी इस समय तक तो जागते ही रहते हैं। किससे पूछें कि हम सही स्थान पर उतरे हैं कि नहीं! टैक्सी वाला हमें सड़क के किनारे पर उतार कर चला गया था।
मिस एंजिला से भेंट
जिस अपार्टमेंट के सामने हम उतरे थे, उसकी दूसरी मंजिल की बालकनी में कुछ नीग्रो जैसे दिखने वाले युवक-युवतियाँ बैठे हुए बातें कर रहे थे। हमने उनसे बात करने का प्रयास किया किंतु वे हमारी बात नहीं समझ पाए। इतने में एक बहुत छोटी सी कार हमारे पास आकर रुकी। यह भारत की नैनो जैसी कार थी।
कार में से लगभग 50 साल की एक दीर्घकाय महिला उतरी। उसने दूर से ही हमें हाथ से संकेत करके बता दिया कि मैं आ गई हूँ। विजय ने बताया कि यही मकान मालकिन है जिसका सर्विस अपार्टमेंट हमने बुक करवाया है। उस महिला ने हमारे निकट आकर हमसे हाथ मिलाया, वैलकम कहा और दो मिनट देरी से आने के लिए क्षमा मांगी। हमारा अपार्टमेंट चौथी मंजिल पर था। अपार्टमेंट मालकिन ने सामान उठाने में हमारी सहायता की, हालांकि हम मिस एंजिला को ऐसा करने से मना करते रहे। भीतर एक बहुत छोटी सी लिफ्ट लगी हुई थी जिसमें मुश्किल से चार व्यक्ति एक साथ आ सकते थे।
मिस एंजिला वैसे तो गोरी-चिट्टी लम्बी और भरे हुए शरीर की एटैलियन महिला थी। उसकी देहयष्टि अमरीकी स्त्रियों की तरह तथा चेहरे-मोहरे की बनावट भारतीय थी। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट एवं आत्मविश्वास देखते ही बनता था। वह केवल इटैलियन भाषा जानती थी किंतु उसे अंग्रेजी के दो-चार शब्द आते थे जिनके माध्यम से वह विदेशी अतिथियों से बात कर लेती थी। उसने हमें अपने मकान के बारे में बताया तथा उसमें उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी दी।
यह तीन शयनागारों वाला एक शानदार फ्लैट था जिसमें आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित रसोईघर, स्नानघर, डाइनिंग रूम आदि थे। घर दिखाने के बाद एंजिला ने हमसे पासपोर्ट लेकर स्कैन किए तथा वेटिकन सिटी का 20 यूरो (1600 भारतीय रुपए) म्युनिसिपल टैक्स और 87.5 यूरो (7000 भारतीय रुपए) चार दिन के लिए मकान का बिजली-पानी का व्यय मांगा। मकान का किराया विजय पहले ही ऑनलाइन भुगतान कर चुका था।
हिदायतें और फ्लाइंग-किस
मिस एंजिला ने सर्विस अपार्टमेंट के चाबियों के दो सैट हमें दिए। इनमें एक-एक चाबी वह भी थी जो बिल्डिंग के मुख्य दरवाजे पर लगती थी। जाते समय उसने मधु और भानु को हिदायत दी कि वे अपना बैग अपनी बगल में पीछे की ओर न लटकाएं। उसे कंधे पर लटकाकर आगे पेट की तरफ रखें तथा रात में कभी भी दस बजे से अधिक लेट न हों। कोई भी दुर्घटना हो सकती है।
इसके बाद उसने हम सबकी ओर देखकर फ्लाइंग किस उछाला और इटली में हमारे प्रवास के लिए शुभकामनाएं देकर चली गई। जाते समय उसके चेहरे पर जो प्रसन्नता थी, उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वह हमें अपने गेस्ट के रूप में देखकर अत्यंत प्रसन्न है।
अपने अतिथियों से उसे मोटी कमाई हुई थी। चार रात रुकने के लिए हमने लगभग 65 हजार रुपए किराया तथा लगभग 1600 रुपए बिजली-पानी के लिए दिए थे। म्युनिसिपलिटी टैक्स के लगभग 7000 रुपए तो अलग थे ही।
जेब खाली
हमें एयरपोर्ट से 500 डॉलर अर्थात् 35 हजार भारतीय रुपए के बदले 358 यूरो मिले थे। जिनमें से 60 यूरो टैक्सी वाला ले जा चुका था और 107.50 यूरो मिस एंजिला ने ले लिए। अब हमारी जेब में केवल 190.5 यूरो बचे थे। हमें लगा जैसे हमारी जेबें खाली हो गई हैं। अभी तो रोम में एक दिन भी नहीं बीता था।
पूड़ियां और पचकूटा
मिस एंजिला के जाते ही हमने अपना सामान खोला और सबसे पहले खाना निकालकर खाया। मधु एवं भानु ने नौएडा में ही आज रात के लिए पूड़ियां और कैर-कुमटी-सांगरी की सब्जी बनाकर रख ली थीं जो कई दिनों तक खराब नहीं होतीं। ताकि इटली पहुँचते ही खाना न बनाना पड़े। जब हम सोए तब तक उस घर के मुख्य द्वार के पास लगी विशालाकाय घड़ी में रात के बारह बज रहे थे। इसी के साथ हमारा रोम में पहला दिन पूरा हो चुका था।
बायोलॉजिकल वाच
मुझे सोए हुए अभी लगभग डेढ़ घण्टे ही हुए थे कि मेरी आंख खुल गई। मैंने उठकर समय देखा, दीवार घड़ी में इस समय रात के डेढ़ बज रहे थे। इस समय नींद खुलने पर मुझे आश्चर्य हुआ किंतु जब मैंने भारतीय समय का हिसाब लगाया तो बात समझ में आ गई। भारत में इस समय पाँच बज रहे थे। हालांकि शरीर ने अभी केवल दो घण्टे ही नींद ली थी किंतु वह अपने प्रतिदिन के समय पर स्वतः उठ गया था।
यह ‘बायोलॉजिकल वॉच’ भी अजीब है, हाथ में बंधी हुई घड़ी में दूसरे देश के अनुसार समय बदला जा सकता है किंतु उस तरह का समायोजन अपने शरीर में नहीं किया जा सकता। वहाँ तो प्रकृति का जादू ही काम करता है। शरीर भारत में जीने का आदी था, भले ही वह रोम चला आया था किंतु उसकी बायोलॉजिक वाच अब भी भारत की घड़ियों के हिसाब से चल रही थी। मैं शौचादि से निवृत्त होकर फिर सो गया। मैंने देखा कि मधु भी उठ गई है। उसे तो प्रतिदिन मुझसे भी पहले उठने की आदत है।
म्यूजिकल हूटर
अभी आंख लगी ही थी कि सड़क से आती एक तेज आवाज से नींद फिर टूट गई। यह एक म्यूजिकल सायरन और हूटर की मिली जुली आवाज थी। मैंने अनुमान लगाया कि यह समधुर संगीतमय ध्वनि पास ही स्थित किसी चैपल या चर्च से आ रही है। हो सकता है कि वेटिकन के सेंट पीटर्स चर्च से ही आ रही हो।
वह भी इस स्थान से केवल एक किलोमीटर दूर था। फिर मन में विचार आया कि संभवतः इटली में पुलिस की गाड़ियां इस प्रकार का हूटर बजाती होंगी। संभव है कि कहीं आग लगी हो और अग्निशमन वाहन इस तरह का हूटर बजाता हुआ जा रहा हो! अगले दिन सड़क पर जब हमने इस तरह का हूटर फिर सुना तो ज्ञात हुआ कि इटली में इस तरह का हूटर एम्बुलेंस बजाती हैं।
मुझे इसकी आवाज अच्छी लगी। इसे सुनकर मन खराब नहीं होता था, जबकि भारत में एम्बुलेंस की गाड़ियों के हूटर, सुनने वाले के कानों में दहशत सी भर देते हैं। यहाँ तक कि एम्बुलेंस के भीतर लेटा हुआ मरीज भी उस आवाज से घबरा जाता है। इस आवाज के बीच उसे अपनी बीमारी कई गुना अधिक महसूस होती है।
हमारा आज रोम में दूसरा दिन था। आज से ही हमें रोम का वास्तविक भ्रमण आरम्भ करना था। एक समय था जब पूरी दुनिया में यह कहावत प्रचलित थी- ऑल रोडस् लीड टू रोम’ अर्थात् दुनिया की सारी सड़कें रोम तक ले जाती हैं। आज उसी रोम की सड़कों पर हमें चलना था।
सैलफोन चार्जर का टण्टा
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रोम में दूसरा दिन सेलफोन चार्जर के टण्टे से आरम्भ हुआ। सुबह उठकर जब मैंने अपना सैलफोन चार्ज करने के लिए ‘इलैक्ट्रिक प्लग’ में लगाना चाहा तो ‘चार्जर’ की ‘पिन’ ने हाथ खड़े कर दिए। वह भारतीय मानक के हिसाब से बनी थी और इटली के ‘इलैक्ट्रिक सॉकेट’ में नहीं घुस सकती थी। इसके लिए हमें ऐसा ‘कनैक्टर’ चाहिए जो एक ओर से भारतीय मानक के उपकरण को स्वीकार करे और दूसरी ओर से इटली के मानक से बने ‘पिन’ को स्वीकार करे। मैंने और विजय ने निर्णय लिया कि तैयार होकर निकटवर्ती बाजार से ‘इलैक्ट्रिक कनैक्टर’ तथा सिम खरीदने का प्रयास किया जाए। तब तक दूसरे सदस्य भी तैयार हो जाएंगे। अतः विजय और मैं प्रातः 9 बजे बिल्डिंग से बाहर निकलकर निकट की दुकानों में गए। इस समय तक कुछ ही दुकानें खुली थीं। एक दुकान पर एक स्त्री झाड़ू लगा रही थी। एक अपटूडेट फिरंगी औरत को झाड़ू लगाते हुए देखकर हमें आश्चर्य हुआ। हमने उसे अपनी समस्या बताई। वह अंग्रेजी भाषा नहीं जानती थी फिर भी उसने अनुमान लगा लिया कि हम क्या चाहते हैं? उसने हमें तीन यूरो में एक इलैक्ट्रिक कनैक्टर तो दे दिया किंतु सिम खरीदने के लिए उसने हमें अगली गली पार करके एक चौराहे पर जाने के लिए कहा।
मैंने और विजय ने आसपास की गलियों में चक्कर लगाए किंतु हमें ‘सैलफोन सिम’ की कोई दुकान नहीं मिली। हम वापस ‘सर्विस अपार्टमेंट’ लौट आए। तब तक भानु और मधु ने सुबह का नाश्ता और दोपहरा का ‘लंच’ बना लिया था।
हम बस चूक गए
विजय ने आज के दिन के लिए सिस्टीन चैपल म्यूजियम के टिकट ‘ऑनलाइन बुक’ करवा रखे थे। पाँच टिकट लगभग 10 हजार भारतीय रुपए में आए थे। हम इन टिकटों पर दोपहर बारह बजे से तीन बजे तक ही म्यूजियम देख सकते थे। हमें अधिकतम दोपहर साढ़े बारह बजे तक म्यूजियम में प्रवेश करना आवश्यक था, उसके बाद हमारे लिए प्रवेश बंद हो जाना था। ‘गूगल सर्च’ से मिली सूचना के अनुसार हमारे सर्विस अपार्टमेंट से सिस्टीन चैपल का एक घण्टे का रास्ता था। अतः हमने एक घण्टे का अतिरिक्त मार्जिन लेकर प्रातः 10 बजे वाली बस से चलने का निर्णय लिया। गूगल के अनुसार ठीक 10 बजे एक बस हमें अपने घर के सामने की सड़क पार करके मिलनी थी। हम ठीक 10 बजे घर से निकले। हमें घर का ताला लगाने और बिल्डिंग से बाहर आने में लगभग 5 मिनट लग गए। तब तक बस जा चुकी थी।
रोमन बस में पहली यात्रा
अगली बस साढ़े दस बजे थी। हम उसकी प्रतीक्षा में खड़े हो गए। उसी समय बरसात आरम्भ हो गई। न तो बस स्टॉप पर कोई शेल्टर या शेड था और न आसपास। हम सड़क के किनारे खड़े-खड़े भीगते रहे। ठीक साढ़े दस बजे दूसरी बस आई और हम उसमें चढ़े। बस में कोई कण्डक्टर नहीं था।
मैंने दस यूरो का एक नोट ड्राइवर की तरफ बढ़ाया और उससे टिकट मांगा। बस ड्राइवर बड़ी कठिनाई से समझ पाया कि मैं क्या चाहता हूँ। उसने कहा-‘नो टिकट।’ हमें सुखद आश्चर्य हुआ कि यहाँ की बसें कितनी अच्छी हैं जो विदेशी पर्यटकों को निःशुल्क यात्रा करवाती हैं। मन में यह भी विचार आया कि आज शनिवार है, संभवतः शनिवार और रविवार के वीकएण्ड्स पर बसों में टिकट नहीं लगता हो!
यहाँ अंग्रेजी समझने वाला कोई नहीं था किंतु बस में इलैक्ट्रोनिक पैनल पर बस-स्टॉप के नाम लिखे हुए आ रहे थे। उनकी भाषा भले ही इटैलियन रही होगी किंतु रोमन लैटर्स में लिखे होने के कारण हम उन्हें आसानी से पढ़ पा रहे थे। हमने उसी पैनल पर दृष्टि गड़ा दी। मैंने विजय से तीन-चार बार पूछा कि हमें कहा उतरना है, वह धैर्य-पूर्वक जवाब देता रहा-‘ओटावियानो।’
मुझे यह शब्द याद रख पाना कठिन हो रहा था। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इलैक्ट्रोनिक पैनल पर पीसा और वैनेजिया जैसे स्थान भी डिस्प्ले हो रहे थे। ये इटली के बड़े शहर तो हैं ही, साथ ही रोम के मुहल्लों के नाम भी हैं। बहुत से स्थानों के नाम ‘विया’ और ‘पिज्जा’ शब्द से आरम्भ होते थे और बहुत से स्थानों के नामों के बीच में ‘डेल्ला’ शब्द लिखा आ रहा था। हमने अनुमान लगाया कि इनमें से ‘विया’ का अर्थ ‘गली’ है, ‘पिज्जा’ का अर्थ ‘चौक’ है तथा ‘डेल्ला’ का अर्थ ‘मुहल्ला’ है।
बाद में ज्ञात हुआ कि विया और पिज्जा के सम्बन्ध में हमारे अनुमान सही थे किंतु ‘डेल्ला’ का अर्थ ‘ऑफ दी’ अर्थात् ‘का’ था। इसे यूं समझा जा सकता है- ‘विया डेल्ला पिज्जा’ का अर्थ होगा ‘चौक की गली।’
लम्बी कतारें
हम लगभग आधे घण्टे में ओटावियानो नामक बस स्टॉप पर पहुँच गए थे जहाँ से उतरकर हमें पैदल ही सिस्टीन चैपल तक जाना था। इस क्षेत्र में अधिक लोग थे। जहाँ हम ठहरे हुए थे, उस क्षेत्र में बहुत कम लोग दिखाई देते थे। हम आसपास के लोगों से पूछते हुए चैपल की तरफ बढ़े। कुछ ही देर में हमने सड़क के एक छोर पर, देश-विदेश से आए हुए स्त्री-पुरुषों की एक लम्बी कतार देखी। हम समझ गए कि हमारा गंतव्य भी यही है। उस कतार के निकट जाने पर ज्ञात हुआ कि यह एक नहीं तीन कतारें हैं तथा ये कम से कम 700 मीटर लम्बी हैं।
बांग्लादेशी गाइड
वहाँ बहुत सारे ‘टूरिस्ट-गाइड’ भी घूम रहे थे जो पैसा लेकर लोगों को म्यूजियम और चैपल दिखाते थे। उनके हाथों में छतरियां, नक्शे, पर्यटक गाइड बुक, टिकट, टॉर्च आदि लगे हुए थे। वे गाइड पर्यटकों को डराते फिर रहे थे कि यदि उन्होंने गाइड से टिकट नहीं खरीदा तो आपका पूरा दिन यहीं खड़े-खड़े बीत जाएगा और आप म्यूजियम नहीं देख पाएंगे।
इन गाइडों में पचास प्रतिशत इटली के तथा पचास प्रतिशत भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के थे। हमने उन्हें शक्लों से ही पहचाना लिया था। भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के गाइड, हमसे हिन्दी में बात करते थे। एक गाइड ने कहा कि यदि आपने पहले ही टिकट ले लिया है तो उसे हमसे अपग्रेड करवा लो अन्यथा आप केवल आधा म्यूजियम ही देख पाएंगे। उसके बाद आपको वापस यहीं आना पड़ेगा और लगभग दो किलोमीटर पैदल चलकर दूसरी तरफ जाना पड़ेगा।
हम आपको भीतर से ही दूसरी तरफ ले जाएंगे। हमने गाइड लोगों की कोई बात नहीं मानी किंतु कुछ देर बाद पर्यटकों की लम्बी लाइनें देखकर हमें भी लगने लगा कि हम भी सारे दिन लाइन में ही खड़े रह जाएंगे। ठीक उसी समय एक गाइड ने हमसे हिन्दी में पूछा कि-‘क्या आप गाइड लेंगे? आपको इस लाइन में नहीं लगना पड़ेगा।’
मैंने भी हिन्दी में पूछा- ‘कहाँ से हो?’
उसने कहा- ‘बांग्लादेश से।’
हमने उसे अपने टिकट दिखाए तो वह बोला कि- ‘आपको लाइन में लगने की जरूरत नहीं है, न गाइड की जरूरत है, आप तो सीधे आगे चले जाइए, आपको तुरंत एण्ट्री मिल जाएगी। आप जल्दी कीजिए नहीं तो आप को घुसने नहीं देंगे, आपका टाइम हो गया है।’
पाकिस्तानियों के मन में भारतीयों का भय!
बाद में विजय ने बताया कि हो सकता है कि इनमें से कुछ लोग पाकिस्तान के भी हों किंतु वे हमें यह बताएंगे कि वे बांग्लादेशी हैं क्योंकि वे जानते हैं कि कोई भी भारतीय पर्यटक किसी पाकिस्तानी गाइड की सेवाएं लेना पसंद नहीं करेगा। मुझे विजय की बात में दम लगा क्योंकि स्वयं को बांग्लादेशी बताने वाले गाइड की हिन्दी में बांग्ला भाषा का पुट न होकर उर्दू मिश्रित पंजाबी का पुट था।
एण्ट्री पास
हम तेजी से आगे की तरफ बढ़ गए। हम लोगों ने जब तक मुख्य दरवाजा पार किया तब तक 12.20 हो गए। यहाँ खड़े होकर मैंने परिवार के सभी सदस्यों से कहा कि यदि वे भीतर की भीड़ में अलग हो जाएं तो हम इसी मुख्य दरवाजे पर आकर मिलेंगे। इस जगह को ध्यान से देख लें। हम मेन गेट से घुस कर थोड़ा आगे चले कि 12.25 हो गए। अब इलेक्ट्रोनिक वेंडिंग मशीन से एण्ट्री पास निकालने में केवल 5 मिनट बचे थे। विजय ने हमें मुख्य द्वार के भीतर बने हॉल में छोड़ दिया और वह सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चला गया।
तरह-तरह की कतारें
जिस हॉल में विजय हमें छोड़कर वेंडिंग मशीन की खोज में गया था, उस हॉल में कई कमरों के दरवाजे खुलते थे जिनके सामने लोग कतारें बनाकर खड़े थे। हम समझ नहीं पाए कि ये कतारें किसलिए हैं। हो सकता है कि ये कतारें उन लोगों की हों जो ऑनलाइन बुकिंग कराए बिना ही यहाँ आए हों और अब यहाँ से टिकट खरीद रहे हों।
हम भी उसी दिशा में आगे बढ़ते रहे जिस दिशा में सीढ़ियां चढ़कर विजय गया था। ऊपर पहुँचते ही हमें विजय दिख गया। उसने अपने ‘बुकिंग लैटर’ पर बने ‘बारकोड’ की सहायता से ‘वेंडिंग मशीन’ के ‘स्कैनर’ को ‘बारकोड’ दिखाकर ‘एण्ट्री-पास’ निकाल लिए थे।
मुझे यह सब देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि विजय को कैसे पता चल गया कि वेंडिंग मशीन कहाँ लगी होगी तथा उसमें बारकोड कहाँ दिखाना पड़ेगा। उसे यह भी कैसे पता चलता है कि जो कागज उसके हाथ में है, वह ‘एण्ट्री-पास’ नहीं है, केवल ‘बुकिंग स्टेटस’ के बारे में जानकारी देता है तथा इसमें एक ‘बारकोड’ है जिसकी सहायता से ‘एण्ट्री-पास’ निकलेगा! मेरी पीढ़ी के अधिकांश लोगों के लिए यह सब समझ पाना बहुत उलझन भरा है।
म्यूजियम में
अब हम आराम से अगले ढाई घण्टे तक म्यूजियम देख सकते थे। यह एक बहुमंजिला विशाल भवन था जिसमें दो म्यूजियम एक साथ बने हुए हैं तथा प्रत्येक म्यूजियम कई-कई मंजिलों में बना हुआ है। प्रत्येक मंजिल में भी कई-कई हॉल हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा म्यूजियम कहलाता है।
यहाँ सैंकड़ों देशों से आए हजारों लोग झुण्ड बनाकर घूम रहे थे। बहुत से पर्यटक झुण्डों के आगे-आगे कोई लेडी या जेंट्स गाइड अपने कंधे पर एक विशेष रंग के कपड़े की झण्डी बनाकर चल रहा था। ताकि उस समूह के सदस्य उस झण्डे को देखकर उसके पीछे-पीछे चलते रहें। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो निश्चित रूप से पूरा समूह केवल दो से तीन मिनट में उस भीड़ में घुल-मिल कर एक दूसरे से बिछड़ जाता। यह ठीक वैसा ही था जैसे भारत में लोग बाबा रामदेव के मंदिर की पैदल यात्रा जाते समय करते हैं या फिर ध्यानू भगत के वंशज नगर कोट वाली देवी के मंदिर जाते समय मोरपंख अपने कंधों पर रख लेते हैं।
थोड़ा आगे चलते ही हमें भारी भीड़ का सामना करना पड़ा। हजारों लोग, बड़े-बड़े समूह, दुनिया के अलग-अलग देशों से आए लोग। कोई बाईं ओर चलने वाले तो कोई सड़क के दाईं ओर चलने वाले। सबकी अलग-अलग भाषाएं, अलग-अलग वेशभूषा, अलग-अलग आदतें। अलग-अलग चेहरे।
हमने पहला कक्ष देखा। यहाँ मिस्र देश के शिलालेख, मूर्तियां आदि रखी थीं। हमने यहाँ कुछ फोटो लिए और वीडियो बनाए तथा दूसरे कक्ष की ओर बढ़ गए। इस कक्ष में बहुत कम उजाला था। कमरे में कांच के रैक ररखे हुए थे जिनमें लाइटिंग की गई थी ताकि दर्शक, प्रदर्शित की गई सामग्री को अच्छी तरह से देख सकें।
इस कक्ष के एक रैक में मिस्र से लाई गई ममियाँ भी रखी थीं। कुछ ममियाँ कॉफीन में थीं और कुछ के कॉफीन उनके पास रखे हुए थे। अभी हमें यह कक्ष देखते हुए पाँच मिनट ही हुए थे कि मैंने अपने पास खड़ी मधु से पूछा- ‘पिताजी कहाँ हैं?’
मधु ने कहा- ‘पीछे वाले कमरे में।’
मैंने उसी समय पीछे वाले कमरे में जाकर देखा, पिताजी वहाँ नहीं थे। मैंने उस कमरे के दूसरी तरफ निकल कर देखा, पिताजी वहाँ भी नहीं थे। मैं वापस उस कमरे में लौटा, जहाँ मैं खड़ा हुआ मिस्र की ममियों को देख रहा था, पिताजी उस कक्ष में भी नहीं थे। हम चारों (मैं, मधु, विजय एवं भानु) तत्काल ही पिताजी को ढूंढने के काम में जुट गए। पिताजी कहीं भी नहीं मिले।
लगभग डेड़ वर्ष पहले ‘ऑप्टिकल नर्व का हैमरेज’ हो जाने से उनकी दाहिनी आंख में रक्त के थक्के जम गए थे, जिसके कारण उन्हें दाहिनी आंख से दिखना बंद हो गया है, बाईं आंख में भी कैटरैक्ट उभर आने से, उससे भी साफ नहीं दिख रहा। यही कारण रहा होगा कि वे कमरे में अंधेरा होने से हमें देख नहीं पाए होंगे और सीधे आगे निकल गए होंगे। हमने सभी संभावित स्थानों पर जाकर पिताजी को तलाशा किंतु वे जाने किस कक्ष या गलियारे में पहुँच गए थे। ऊपर की एक और मंजिल में भी जाकर देखा, पिताजी वहाँ भी नहीं थे और इतने कम समय में इससे अधिक ऊपर वे जा नहीं सकते थे।
अतः मैं नीचे की मंजिल में आ गया और म्यूजियम के मुख्य भवन से एकदम बाहर निकल आया। मेरे सामने एक और हॉल था तथा बाईं ओर एक लॉन के लिए रास्ता जा रहा था। मैंने अनुमान लगाया कि हो सकता है कि पिताजी सामने वाले हॉल में न जाकर लॉन की तरफ गए होंगे।
लॉन में भी सैंकड़ों लोग थे जो कुछ खा-पी रहे थे। मैंने पिताजी को यहाँ भी खूब ढूंढने का प्रयास किया। आगे का रास्ता सिस्टीन चैपल की तरफ जा रहा था। मैं सिस्टीन चैपल के भीतर घुस गया तथा काफी भीतर तक जाकर देख आया। पिताजी कहीं नहीं थे। निराश होकर मैं लौट पड़ा तथा उसी लॉन को पार करके म्यूजियम के मुख्य भवन से बाहर आ गया। यहाँ विजय, भानु और मधु चिंतित मुद्रा में खड़े दिखाई दिए। पिताजी कहीं नहीं थे!
हमने म्यूजियम में स्थान-स्थान पर नियुक्त सुरक्षा कर्मचारियों से सहायता लेने का विचार किया किंतु कोई भी व्यक्ति अंग्रेजी नहीं जानता था। हम चाहते थे कि संग्रहालय के कर्मचारी एक घोषणा कर दें तो संभवतः पिताजी उसे सुनकर घोषणा-कक्ष तक पहुँच जाएं और हम उनसे वहाँ सम्पर्क कर लें किंतु यह संभव नहीं था। अंत में हमने म्यूजियम परिसर से एकदम बाहर निकलने का निर्णय लिया जहाँ हजारों लोगों की भीड़, म्यूजियम परिसर में प्रवेश पाने के लिए कतारों में खड़ी थी और जहाँ हमने तय किया था कि हम यहाँ मिलेंगे।
मैंने विजय और भानु से निकास-द्वार पर बने प्रतीक्षालय में रुकने के लिए कहा ताकि यदि पिताजी यहाँ से होकर बाहर निकलें तो वे उन्हें वहीं रोक लें। मैं और मधु संग्रहालय-परिसर से बाहर आए, हजारों लोगों की भीड़ अब भी कतारों में खड़ी थी। मैंने वहाँ खड़े एक कर्मचारी से पिताजी की कमीज के रंग तथा चेहरे-मोहरे के बारे में बताकर पूछा कि क्या किसी इण्डियन ने यहाँ आकर कुछ पूछताछ की थी?
सौभाग्य से वह अंग्रेजी जानता था किंतु उसने बताया कि उसका ऐसे किसी इण्डियन से सम्पर्क नहीं हुआ है।
वहाँ से भी निराश होकर मैं और मधु फिर से निकास गेट पर बने प्रतीक्षालय में पहुँचे जहाँ विजय और भानु बैठे हुए थे। तब तक विजय ने प्रतीक्षालय में बने सिक्योरिटी ऑफिस में उनके मुख्य अधिकारी से बात करके म्यूजियम के सभी भागों में और सभी मंजिलों में तैनात सुरक्षाकर्मियों को संदेश करवा दिया था कि यदि कोई इण्डियन टूरिस्ट कुछ पूछताछ करे तो उसे निकास-द्वार पर पहुँचा दें।
सिक्योरिटी वालों के पास ‘पब्लिक एड्रेस सिस्टम’ नहीं था। वे केवल ‘वॉकी-टॉकी’ से बात कर सकते थे। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, यदि कभी इस म्यूजियम में आग लग जाए या भूकम्प आ जाए तो म्यूजियम का प्रबंधन, पर्यटकों को सीधे संदेश नहीं दे पाएगा न उन्हें निकास-द्वारों की तरफ जाने के लिए गाइड कर सकेगा। वे अपने कर्मचारियों को वॉकी-टॉकी पर संदेश देंगे और वे कर्मचारी उन पर्यटकों को बाहर की तरफ जाने के लिए उनका मार्गदर्शन करेंगे!
जिस स्थान पर हर समय देश-विदेश के हजारों पर्यटक रहते हों, वहाँ की सुरक्षा व्यवस्था में इतनी भारी कमी! क्या किसी का ध्यान इस तरफ नहीं गया! जबकि पर्यटकों के बिछड़ जाने की समस्या तो लगभग प्रतिदिन ही उत्पन्न होती होगी।
अब हमने विजय और भानु को तो उसी सिक्योरिटी ऑफिस के निकट बैठे रहने के लिए कहा और मैंने तथा मधु ने एक बार फिर से उसी स्थान पर जाने का निर्णय लिया जहाँ से पिताजी अलग हुए थे तथा उसके बाद सिस्टीन चैपल के दूसरी तरफ निकल कर वहाँ बने निकास-द्वार तक जाने का निर्णय लिया, संभव है कि पिताजी वहाँ तक पहुँच गए हों। इस समय तक दीपा को अनुमान हो चुका था कि कुछ गंभीर बात हो गई है। उसने मुझसे पूछा- ‘बड़े बाबा कहाँ गए?’
मैंने उसे बताया- ‘बड़े बाबा भीड़ में हमसे अलग हो गए हैं, हम सब मिलकर उन्हें ढूंढ रहे हैं।’
इस समय तक मेरी चिंता चरम पर पहुँच चुकी थी। मुझे अपने आप पर हैरानी हो रही थी कि मैंने एक साथ कितनी सारी गलतियां कर डाली थीं! न तो पिताजी की जेब में इस समय कोई यूरो या डॉलर था, भारतीय मुद्रा वे लेकर नहीं आए थे। न कोई डेबिट या क्रेडिट कार्ड था जो इटली में कार्य कर सके। न उनके पास उस सर्विस अपार्टमेंट का पता था, जहाँ हम ठहरे हुए थे।
न उस स्थान का नाम उन्हें याद होगा, जिस इलाके में हम ठहरे हुए थे। न उनके पास कोई टेलिफोन नम्बर था जिसके माध्यम से वे हमसे सम्पर्क कर सकें। न पिताजी के पास मकान मालकिन का कोई टेलिफोन नम्बर था जिससे वे सम्पर्क कर सकें। न पीने का पानी था, न उनके पास खाने के लिए कोई बिस्किट आदि थे।
न उनके पास कोई दवाई थी, जबकि उन्हें डायबिटीज है। कुछ ही समय में उन्हें कुछ खाने की आवश्यकता होगी और यदि खाने को नहीं मिला तो पैसे के अभाव में वे खरीद कर भी कुछ नहीं खा पाएंगे। तब क्या होगा!
यह सोच-सोचकर मेरे पैरों के नीचे से धरती सरकी जा रही थी। इस समय पिताजी के पास केवल उनका पासपोर्ट था।
मैं जानता था कि इस परिसर के कर्मचारी पिताजी को नहीं ढूंढ पाएंगे। हजारों लोगों की चलती हुई भीड़ और सैंकड़ों कक्षों तथा गलियारों में बंटी हुई भीड़ में से एक इण्डियन टूरिस्ट को ढूंढ निकालना उनके वश की बात नहीं थी। विशाल गलियारों, आहतों, छतों, जीनों को पार करते हुए हम एक बार फिर उसी लॉन में पहुँच गए जहाँ हम पहले भी कई बार पिताजी को ढूंढ चुके थे। अचानक मधु बोली- ‘ये रहे पिताजी!’ मधु के स्वर में हर्ष-मिश्रित उत्तेजना थी!
पिताजी लॉन के एक किनारे पर बैठे हुए, अपने पास से निकल रही भीड़ में से हमारे चेहरे ही तलाश रहे थे। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने आंखें फाड़-फाड़कर देखा, पिताजी सचमुच वहीं बैठे थे। इस स्थान पर मैं पहले भी कितनी ही बार उन्हें देख गया था। मेरा पूरा विश्वास है कि मैं अकेला होता तो इस समय भी पिताजी को नहीं देख पाता। इस विषय में मधु की दृष्टि अधिक स्थिर एवं तीक्ष्ण है।
मैंने उनसे कहा कि- ‘आपको यहाँ नहीं बैठना चाहिए था, अपितु उस एण्ट्री गेट पर पहुँचना चाहिए था जो स्थान हमने मिलने के लिए तय किया था।’
पिताजी ने कहा कि- ‘यही तो वह स्थान है, तुमने यहीं मिलने का तो तय किया था, इसलिए मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ।’
पिताजी हजारों लोगों की भीड़, लम्बे गलियारों और एक के बाद एक करके आने वाले विशालाकाय द्वारों के कारण कन्फ्यूज हो गए थे और सही स्थान का स्मरण नहीं रख पाए थे। बाद में ज्ञात हुआ कि जिस समय मैंने एक हॉल में जाकर देखने की बजाय लॉन में जाकर देखने का निर्णय लिया था, मैं वहीं चूक गया, पिताजी उस समय उसी हॉल में थे जो मैंने यह सोचकर छोड़ दिया था कि पिताजी लॉन में गए होंगे न कि हॉल में! यदि मैं उस समय इस हॉल में चला गया होता तो पिताजी केवल पाँच मिनट में मिल गए होते, हमें दो घण्टे नहीं लगते!
हमने पिताजी को पीने का पानी दिया, खाने के लिए बिस्किट दिए और पिताजी को अपने साथ लेकर उस म्यूजियम के निकासद्वार की तरफ बढ़े जहाँ हमने विजय एवं भानु को छोड़ा था। म्यूजियम के विशाल गलियारे, छतें, बारामदे और जीने पीछे छूटते जा रहे थे, मैं उनकी ओर ललचाई हुई दृष्टि से देख रहा था, हम तुम्हें देखने के लिए आए थे किंतु बिना देखे ही जा रहे हैं।
जो कुछ भी हमने देखा था, उसे देखा हुआ नहीं माना जा सकता था! इस समय तक हम इतने थक चुके थे कि हम दुबारा म्यूजियम में जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकते थे। वैसे भी हमारी मानसिकता इस समय उस इंसान के जैसी हो रही थी जिसका खोया हुआ खजाना लाख प्रयास के बाद वापस मिल गया हो और अब वह उसे दुबारा नहीं गंवाना चाहता हो! वैसे भी टिकट पर अंकित समय अब तक समाप्त हो गया था। हम परमात्मा का धन्यवाद देकर, विया ग्रिगोरिया की तरफ जाने वाली बस पकड़ने के लिए बस स्टैण्ड की तरफ बढ़ गए।
भारतीयों का भाषा ज्ञान
हम भारत में रहते हुए यह सोचते हैं कि भारतीयों के अतिरिक्त पूरी दुनिया अंग्रेजी जानती है किंतु इटली में आकर अनुभव हुआ कि भारतीय जितनी अंग्रेजी जानते हैं, इटली के लोग तो उनके सामने अनपढ़ जैसे हैं। वे केवल एक ही भाषा जानते हैं, जो उनकी माँ बोलती है, केवल इटैलियन। मेरा अनुमान था कि अधिकतर यूरोपियन अपने देश की भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी और आसपास के अन्य यूरोपीय देश की भाषा भी जानते होंगे, किंतु शायद यह स्थिति बहुत कम लोगों के साथ है।
भारत के देहाती कम से कम दो और भारतीय शहरी कम से कम तीन भाषाएं जानते हैं जिनमें से एक वहाँ की क्षेत्रीय भाषा, दूसरी हिन्दी और तीसरी अंग्रेजी होती ही है। करोड़ों भारतीय अपना प्रांत छोड़कर किसी दूसरे प्रांत में जा बसते हैं, इस कारण वे दूसरे प्रांतों की भाषा भी सीख ही जाते हैं। भाषा की समस्या हमें इण्डोनेशिया में भी आई थी, अधिकतर लोग केवल जावाई भाषा बोल पाते थे, वहाँ के शहरी क्षेत्रों में भी बहुत कम लोग अंग्रेजी समझ सकते थे।
खरीददारी
हम बस पकड़कर सर्विस अपार्टमेंट में लौट आए। थोड़ी देर विश्राम करके मैं और विजय बाजार गए ताकि शाम के लिए सब्जी, दूध, सैलफोन की सिम आदि खरीद कर ला सकें तथा करंसी एक्सचेंज करवाई जा सके। मैंने और विजय ने बाजार में सबसे पहले सैलफोन में सिम डलवाईं। बाजार में हमें 500 डॉलर के बदले में 410 यूरो मिले, जबकि पिछली रात को एयरपोर्ट पर हमें केवल 358 डॉलर मिले थे। एयरपोर्ट पर दो सिम के लिए 5000 रुपए मांगे जा रहे थे जबकि बाजार में हमें वही सिम लगभग 3000 रुपए में मिल गईं।
सबकी जेब में 100-100 यूरो
बाजार से लौटकर मैंने सबको 100-100 यूरो दिए। भारत में हर समय इतना रुपया (8000 रुपए) लेकर कौन चलता है किंतु यहाँ इन रुपयों में अधिक कुछ नहीं आने वाला था। फिर भी यह एक समय के नाश्ते, पानी की बोतल तथा घर लौटने तक के लिए टैक्सी किराए के लिए पर्याप्त थे। विजय ने सर्विस अपार्टमेंट का पता, मकान मालकिन का नाम, उसके टेलिफोन नम्बर और हमारे सैलफोन नम्बर पर्चियों पर लिखकर दिए ताकि सभी सदस्य अपने-अपने बैग में रखें।
यहाँ हमने एक गलती और की जिसका अनुमान हमें भारत लौटने के बाद ही हुआ। हमें दीपा के कोट की जेब में भी सर्विस अपार्टमेंट का पता और हमारे सैलफोन नम्बर लिखकर रखने थे किंतु यह बात हमारे मस्तिष्क में तब आई ही नहीं। हालांकि यह एक तसल्ली-दायक बात थी कि दीपा स्वयं ही भीड़ देखकर अपनी माँ की गोद में चढ़ जाती थी या विजय के कंधों पर लद लेती थी।
इस प्रकार रोम में दूसरा दिन पूरा हुआ जो इतिहास की जानकारियों से कम, हमारी अपनी गलतियों से अधिक भरा हुआ था।
सवेरे ढाई बजे आंख खुली। भारत में इस समय छः बज रहे होंगे। मैं शौच से निवृत्त होकर फिर से सो गया। दुबारा नींद आने की कोई संभावना नहीं थी। फिर भी लेटा रहा। बाकी सब सदस्य भी भारतीय समय के अनुसार उठ गए। आज हमारा रोम में तीसरा दिन था।
मधु और भानु ने सुबह की चाय के आयोजन के बाद, नाश्ते और भोजन का उपक्रम किया ताकि आज थोड़ी जल्दी निकल सकें और 10 बजे की बस पकड़ सकें।
आज रविवार था। प्रातः आठ बजे गिरजाघर से आती घण्टे की आवाज दूर-दूर तक हवा में फैल गई। हमने अनुमान लगाया कि यह अवश्य ही सेंट पीटर्स गिरिजाघर से आ रही होगी। सुबह का नाश्ता करके और दोपहर का भोजन लेकर प्रातः 10 बजने से पाँच मिनट पहले ही घर से निकल गए।
हम फिर बस चूके!
हम जब तक अपनी बिल्डिंग के बाहर निकलकर सड़क पर आए, तब तक बस आ चुकी थी। हमें सड़क पार करके बस तक पहुँचना था किंतु सड़क पर तेज ट्रैफिक चल रहा था, रैडलाइट होने से पहले नहीं निकल सकते थे। हमारे देखते ही देखते बस निकल गई। उसे रोका नहीं जा सकता था। न चिल्लाकर, न हाथ के संकेत से। यह भारत नहीं था, यह तो हमें पता था किंतु अभी हमें इटली के हिसाब से चलना सीखने में कुछ समय लगने वाला था!
कल वाली बरसात फिर से चालू!
कुछ ही मिनटों में कल की तरह बरसात आरम्भ हो गई और कल की तरह हम फिर भीगने लगे। ऐसा लगता था कि जैसे शहर की बसें घड़ी देखकर चल रही हैं, वैसे ही बरसात भी घड़ी देखकर आरम्भ होती है। कल संग्रहालय में हुई आपा-धापी की मानसिक थकान में छतरी खरीदने का ध्यान नहीं रहा। मिस एंजिला ने अपने अपार्टमेंट में दो छतरियां रख रखी थीं, वे पर्यटकों के प्रयोग के लिए ही थीं किंतु आदत नहीं होने के कारण हम वे छतरियाँ भी नहीं ले पाए। पिताजी को बरसात में भीगने के बाद प्रायः बुखार आ जाता है किंतु अब भीगने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था।
यहाँ की ट्रैफिक व्यवस्था और बस-स्टॉप की स्थिति भारत से बिलकुल अलग है। सड़क के दोनों तरफ चौड़े फुटपाथ बने होते हैं तथा उनके बीच में स्थित मुख्य सड़क तीन भागों में बंटी हुई होती है। एक तरफ के किनारे का हिस्सा कार, साइकिल एवं दो-पहिया वाहनों के लिए किसी एक दिशा में जाने के लिए होता है तथा सड़क के दूसरी तरफ का हिस्सा कार, साइकिल एवं दो-पहिया वाहनों के लिए दूसरी अर्थात् विपरीत दिशा में जाने के लिए है।
बीच के चौड़े हिस्से के दोनों तरफ पुनः फुटपाथ जैसी जगह बनी होती है जिस पर बस स्टैण्ड बने होते हैं और यह हिस्सा बस एवं ट्राम के आने-जाने के लिए होता है। इस प्रकार जब हम बस स्टॉप पर खड़े होते हैं तो हमारे एक तरफ बसें तथा दूसरी तरफ कारें बड़ी तेजी से चल रही होती हैं और दोनों तरफ के वाहन बस-स्टॉप पर खड़े यात्रियों पर बरसात का पानी उछालते हुए चलते हैं। इस कारण हम न केवल बरसात में भीग रहे थे अपितु दोनों तरफ से आ रहे सड़क के पानी की बौछारों से भी भीग रहे थे।
मत पधारो म्हारे देस!
ऐसा लगता था मानो रोम के लोग विदेशी पर्यटकों को देखकर नाराज थे और अपने वाहनों से हम पर पानी की तेज बौछारें डालकर हमें संदेश दे रहे थे– ‘क्यों आए हो हमारे देश! शांति से जीने दो हमें, वापस चले जाओ।’
इटली के लोगों के चेहरों पर हमारे प्रति बेरुखी देखकर यह तो हमें कल ही अनुमान हो गया कि जिन लोगों की आजीविका पर्यटकों से चलती है, उन्हें छोड़कर यहाँ आम आदमी विदेशी पर्यटकों को देखकर प्रसन्न नहीं होता। ऐसा होना स्वाभाविक ही लगता था। यह सही है कि पर्यटकों के आगमन से नगर की आय बढ़ती है किंतु नागरिकों की शांति एवं सुरक्षा भी भंग होती है!
दीपा का खेल!
दीपा को हर ओर से आती पानी की बौछारें किसी रोचक खेल जैसी लगीं। अपने भीग जाने की चिंता से बेपरवाह, वह उस खेल का आनंद उठाने लगी। लगभग आधे घण्टे यही स्थिति रही। सौभाग्य से बस स्टॉप एक घने पेड़ के नीचे बना हुआ था, इसलिए उसकी थोड़ी-बहुत आड़ मिल गई।
नो टिकट!
अगली बस ठीक साढ़े दस बजे आ गई। मैंने फिर बस के ड्राइवर से टिकट मांगा और उसने कहा- ‘नो टिकट!’ मुझे यह सुनकर बहुत अच्छा लगा। मुझे उससे इसी उत्तर की आशा थी, क्योंकि आज रविवार था और मेरे हिसाब से आज के दिन विदेशी पर्यटकों से टिकट नहीं लिया जाना था।
वृद्धों का देश
इटली की जनसंख्या बहुत कम है, इटली के लोग बहुत शांति के साथ रहते हैं। उनके पास धन-सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। बहुत कम लोग ही वहाँ विवाह करते हैं, करते भी हैं तो अधिक बड़ी आयु में ताकि वे अधिक समय तक स्वतंत्रता पूर्वक जी कर देख सकें। उन्हें विवाह और परिवार जैसी पवित्र और आवश्यक संस्थाएं अनावश्यक एवं बन्धनकारी लगती हैं। यही कारण है कि यदि पर्यटकों को छोड़ दें तो रोम की सड़कों पर वृद्ध स्त्री-पुरुष अधिक दिखाई दे रहे थे।
जिस प्रकार भारत में बच्चों के झुण्ड स्कूल जाते और लौटते हुए दिखाई देते हैं, उस प्रकार के झुण्ड रोम में दिखाई नहीं दे रहे थे। जिस क्षेत्र में हम ठहरे हुए थे, वहाँ पाँच-छः मंजिल वाले इतने विशाल भवन थे कि उनमें से प्रत्येक के भीतर पचास से सौ की संख्या में फ्लैट बने हुए थे। उन फ्लैट्स की बालकनी से प्रायः वृद्ध महिलाएं झांकती हुई दिखाई देती थीं।
सड़कों पर भी जो वृद्ध महिलाएं सामान खरीदने निकलती थीं, वे अपने साथ एक छोटी और हल्की ट्रॉली रखती थीं ताकि उन्हें सामान उठाकर न चलना पड़े। युवा लोग वृद्धों को रास्ता देते हैं तथा तेजी से चलते हुए वाहन, सड़क पार कर रहे पैदल यात्री को रास्ता देते हैं। अधिकतर वृद्धों के पास कुत्ते होते हैं जिनका ‘मल’ उठाने के लिए उनके पास प्लास्टिक की थैलियां और खुरपी होती हैं।
बस का रूट डाइवर्ट
अभी बस दस मिनट ही चली होगी कि हमारी बस एक चौरोहे से वापस मुड़ गई। ड्राइवर ने इटैलियन भाषा में घोषणा की कि आज इस क्षेत्र में पर्यावरण चेतना सम्बन्धी रैली निकल रही है, इसलिए बस का रूट डाइवर्ट किया जा रहा है। हमने कुछ शब्दों के सहारे तथा बस से बाहर लड़के-लड़कियों के हाथों में लगी तख्तियों को देखकर यह समझ लिया कि बस का मार्ग बदला गया है, और इस कारण बदला गया है।
हमें आश्चर्य हुआ, जब हम अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के सहारे इटैलियन भाषा में दिए गए संदेश को समझ सकते हैं तो यहाँ के लोग हमारे द्वारा अंग्रेजी में पूछी गई बात का जवाब क्यों नहीं दे पाते हैं। हमें वहीं उतर जाना पड़ा क्योंकि हमें अगले बस स्टॉप से दूसरी बस पकड़नी थी और वह स्थान गूगल पर बताई जा रही दिशा के अनुसार आगे की ओर ही पड़ता था तथा यहाँ से अधिक दूर भी नहीं था।
घटिया छतरी की खरीद!
बस से उतरते ही मुझे एक छतरी वाला दिखाई दिया। मैंने उससे एक छतरी खरीद ली। हालांकि मैं महसूस कर रहा था कि यह छतरी बहुत घटिया बनी हुई है तथा हवा के तेज झौंके को सहन नहीं कर पाएगी। फिर भी हमारे पास और कोई चारा नहीं था। कम से कम एक छतरी तो पिताजी के लिए लेनी ही थी क्योंकि बरसात अब भी हो रही थी।
छतरी वाले ने पाँच यूरो मांगे, मैंने ढाई यूरो में देने को कहा। छतरी वाला कुछ ना-नुकर के बाद तीन यूरो में बेचने को तैयार हो गया। दो सौ चालीस भारतीय रुपए में छतरी महंगी नहीं थी, यदि उसकी कमानियों में कुछ ताकत होती। भारत में इतनी नाजुक छतरी बिकती हुई मैंने कभी नहीं देखी थी। यह छतरी जरा सी तेज हवा चलते ही दूसरी ओर मुड़ जाती थी।
‘यूरीनल’ नहीं ‘टॉयलेट’
दूसरी बस से उतरते ही सबसे पहले मैंने वहाँ खड़े एक ‘वेण्डर’ से ‘यूरीनल’ के बारे में पूछा। मौसम ठण्डा था, बरसात में भीग भी चुके थे और अब हमें घर से निकले हुए कम से कम डेढ़ घण्टे हो चुके थे। इसलिए लघुशंका की इच्छा होना स्वाभाविक ही था। वैसे भी डाइबिटीज होने के कारण मुझे बार-बार पेशाब जाना पड़ता है। वह वेण्डर मेरी बात नहीं समझ पाया। मैंने कई लोगों से पूछा किंतु कोई व्यक्ति यह नहीं जान पाया कि आखिर मैं चाहता क्या था!
अंत में विजय ने मुझे बताया कि यहाँ से सौ मीटर चलकर बाईं ओर एक ‘मॉल’ बना हुआ है, उसमें यूरीनल की सुविधा है। मैंने उससे पूछा कि- ‘तुझे कैसे पता चला?’ विजय ने बताया कि- ‘उस आदमी ने मुझे बताया।’ उसने अंगुली से एक दुकानदार की ओर संकेत किया। मुझे हैरानी हुई, मैंने कहा कि इस व्यक्ति से तो मैंने दो-तीन बार पूछा था किंतु यह यूरीनल समझ ही नहीं पाया। विजय ने कहा कि- ‘मैंने टॉयलेट के बारे में पूछा था।’ हम समझ गए कि इटैलियन भाषा में ‘टॉयलेट’ शब्द तो है किंतु ‘यूरीनल’ नहीं है।
मेरूलाना प्लाजो
दूसरी बस से उतरकर हमें लगभग सवा किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। हमें मेरूलाना प्लाजो जाना था, जहाँ से हमें अगले दिन के लिए कोलोजियम तथा रोमन फोरम के खण्डहरों को देखने के लिए बोर्डिंग पास लेने थे। कल के लिए टिकटों की बुकिंग तो विजय ने भारत में ही ऑन लाइन करवा ली थी किंतु यहाँ भुगतान करके बोर्डिंग पास लेने थे। यहाँ जाते ही मुझे फिर से लघुशंका के लिए जाना पड़ा। सौभाग्य से वहाँ पर यह सुविधा उपलब्ध थी। हम सभी ने इस सुविधा का उपयोग किया। मेरूलाना प्लाजो एक महंगा रेस्टोरेंट था। वहाँ देश-विदेश से आए धनी-पर्यटकों की हल्की-भीड़ थी।
त्रास्तेवेरा
मेरूलाना से निकलकर हम फिर से बस-स्टॉप पर जाकर खड़े हो गए। आधे घण्टे खड़े रहने पर भी कोई ट्राम नहीं आई। हमने किसी नौजवान दम्पत्ति से बस नहीं आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि आज शहर में विशाल पर्यावरण रैली निकल रही है। इस कारण संभवतः इस रूट की बस-सर्विस सस्पैण्ड कर दी गई होगी।
आप इस गली में घूमकर चले जाएं, वहाँ आपको मैट्रो मिल सकती है। काफी देर बाद हमें एक मैट्रो मिली। उसने हमें त्रास्तेवेरा उतार दिया। यह रोम का सबसे धनी आवासीय-क्षेत्र है। यहाँ की चौड़ी-चौड़ी सड़कें, उनके दोनों ओर खड़े फूलों के वृक्ष तथा बड़े-बड़े आवासीय भवन बरसात में भीगकर छायाचित्रों एवं कलैण्डरों में दिखने वाले दृश्य उत्पन्न कर रहे थे।
विजय ने गूगल पर देखकर बताया कि यह क्षेत्र रोम के पुराने क्षेत्रों में से एक है तथा यहाँ रोम के सर्वाधिक धनी लोग निवास करते हैं। यदि वर्षा नहीं हो रही होती तो हम थोड़ी देर और पैदल चलकर इस क्षेत्र में घूमकर आते।
पियाजा वेनेजिया (वेनिस चौक)
त्रस्तेवेरा से हम पुनः एक ट्राम पकड़कर पियाजा वेनेजिया गए तथा इस क्षेत्र में स्थित एक शिाल चौक में उतरे। संभवतः यह रोम का सबसे सुंदर और भव्य स्थान है तथा इसे रोम का ‘सेंट्रल हब’ कहा जा जाता है। यहाँ कई दिशाओं से सड़कें आकर मिल जाती हैं, इनमें ‘विया डेल फोरी’ ‘इम्पीरियलाई’ तथा ‘विया डेल क्रोसो’ प्रमुख हैं। ‘ट्राजन्स फोरम’ यहाँ से अधिक दूर नहीं है। यहाँ से एक मुख्य गली कोलोजियम की तरफ जाती है, इस गली को ‘विया डे फोरी इम्पीरियलाई’ कहते हैं।
रोम में किसी एक स्थान पर यदि सर्वाधिक पर्यटक एक साथ दिखाई देते हैं, तो वह स्थान यही है। यहाँ ‘कैपिटोलाइन हिल’ नामक पहाड़ी की तलहटी में एक विशाल चौराहे के बीच में सफेद रंग का एक विशाल भवन है जिसे ‘पलाज्जो वेनेजिया’ कहा जाता है। इस भवन का निर्माण वेनेटियन कार्डिनल पिएत्रो बार्बो (बाद में पोप पॉल द्वितीय) ने करवाया था।
कहने को यह एक भवन है किंतु आकार में इतना बड़ा है कि किसी मौहल्ले से कम नहीं है। रियासती काल में यह भवन वेनिस गणतंत्र का दूतावास था। ई.1920 से 40 के दशक में मुसोलिनी इस भवन की सीढ़ियों पर खड़े होकर रोम की जनता को सम्बोधित किया करता था।
पलाज्जो वेनेजिया के निकट ही, वेनिस के महान् संत मार्क के नाम पर ‘सेंट मार्क चर्च’ बना हुआ है। पलाज्जो वेनेजिया के निकट ‘ऑल्टेयर डेल्ला पैट्रिया’ में इटली के प्रथम राजा विट्टोरिया एमेनुएल (द्वितीय) का स्मारक बना हुआ है जिसके एक हिस्से में इटली के किसी अज्ञात प्रमुख योद्धा की कब्र स्थित है। ई.2009 में जब यहाँ मैट्रो रेल बनाने के लिए धरती की खुदाई की गई तो रोमन सम्राट हैड्रियन के पुस्तकालय के अवशेष प्राप्त हुए थे।
हम पहले उल्लेख कर आए हैं कि रोमन सम्राट नेरवा के दत्तक पुत्र ट्राजन को महान् विजेता माना जाता है। उसके समय रोमन सेनाओं ने डेसिया, अरब, मेसोपोटामिया और आर्मेनिया पर विजय प्राप्त की तथा उसके काल में महान् रोमन साम्राज्य अपने चरम विस्तार को प्राप्त कर गया था। उसे सीनेट ने सर्वश्रेष्ठ एम्परर का सम्मान दिया था। वह लगभग 20 साल तक रोम पर शासन करता रहा।
7 अगस्त 117 को 63 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। ट्राजन के उत्तराधिकारी हैड्रियन के काल में रोम में वास्तुकला अपने चरम पर पहुँच गई थी। उसके समय में रोम में विशाल भवनों का निर्माण हुआ तथा भवनों के नए डिजाइन विकसित हुए। यह पूरा क्षेत्र वस्तुतः उसी काल के रोमन सम्राटों से सम्बद्ध है। इस बहु-मंजिला भवन में प्रवेश करने के लिए बहुत सी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
इस भवन में अब सैनिक संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। इस भवन के चारों ओर तथा ऊपर रोम के प्राचीन राजाओं-रानियों, विख्यात धनी-सामंतों, योद्धाओं, दार्शनिकों आदि की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं एवं शिल्प लगे हैं। इनमें से अधिकांश शिल्प फ्लोरेंस एवं रोम के महान् मूर्तिकारों ने गढ़े हैं जिनमें लियोनार्डो दा विंची (ई.1452-1519), माइकेल एंजिलो (ई.1475-1564) तथा राफिएलो सैंजिओ आदि सम्मिलित हैं।
इस स्थान पर पहुँचते-पहुँचते बरसात रुक गई थी किंतु तेज और ठण्डी हवा चल रही थी। हमने इसी चौक के एक हिस्से में बने हुए पार्क में लगी बेंचों पर बैठकर दोपहर का खाना खाया जो भानु और मधु घर से बनाकर अपने साथ लाई थीं। रोम में इस स्थान पर बैठकर लंच करना इतिहास के दो हजार साल पुराने पन्नों में प्रवेश करने जैसा था। भवन के पीछे की तरफ ईटों से निर्मित कुछ पुराने खण्डहर दिखाई दे रहे थे जिनमें बहुत बड़ी संख्या में छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थीं।
संभवतः उनका प्रयोग प्राचीन रोमन सम्राटों के सेवकों के निवास के रूप में होता होगा। कौन जाने कभी ग्लेडिएटर्स इनमें रहे हों! इस चौराहे पर एक ओर बस स्टैण्ड तथा ट्राम स्टैण्ड बना हुआ है। हम एक बस पकड़कर सेंट पीटर्स चर्च के लिए रवाना हो गए। आज के लिए हमारा निर्धारित लक्ष्य केवल यही बचा था।
विदाउट टिकट होते-होते बचे
कल से हम रोम की बसों और ट्रामों में घूम रहे थे किंतु हमें कहीं भी टिकट नहीं लेना पड़ा था। जब भी हम बस के ड्राइवर से टिकट मांगते थे तो वह कहता था कि ‘नो टिकट!’ हम सोचते थे कि शनिवार और रविवार होने से विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट की अनिवार्यता नहीं थी किंतु जैसे ही हम पियाजा वेनेजिया से बस में सवार हुए, एक टिकट चैकर बस में चढ़ा।
उसने हमसे टिकट मांगा। विजय ने अपनी जेब से वे पाँचों पास निकालकर टिकट चैकर की तरफ बढ़ा दिए जो हमने मेरूलाना प्लाजो से प्राप्त किए थे। टिकट-चैकर ने वे पास बस में लगी एक मशीन के स्कैनर के पास ले जाकर स्कैन किए और हमें लौटा दिए। टिकट-चैकर की इस कार्यवाही से मैं चक्कर में पड़ गया। अभी रविवार समाप्त कहाँ हुआ था! आज तो हमसे टिकट मांगा ही नहीं जाना चाहिए था! कुछ दिन बाद जब पीसा की मीनार देखने गए तब हमें यह बात समझ में आई कि हम क्या गलती कर रहे थे!
दरअसल टिकट बस में नहीं मिलता था। इसलिए हर ड्राइवर कहता था- ‘नो टिकट!’ और हम समझते थे कि हमें टिकट लेना जरूरी नहीं है। जबकि हमें बस में बैठने से पहले बस या ट्राम का टिकट बसस्टॉप के आसपास स्थित किसी दुकान से खरीदना था तथा उसे बस या ट्राम में लगी मशीन के स्कैनर पर स्कैन करके उसे वेलिडेट करना था, ऐसा किए बिना हम बस में वैध-यात्री नहीं थे, हम विदाउट टिकट थे किंतु बस का ड्राइवर इस बात को अंग्रेजी में नहीं बोल सकता था, इसलिए प्रत्येक ड्राइवर केवल ‘नो टिकट!’ बोलकर चुप हो जाता था।
कुछ दिन बाद जब वेनेजिया गए तब जाकर यह समझ में आया कि ऐसा तो संभव ही नहीं था कि इटली में किसी विदेशी पर्यटक से भारी शुल्क और भारी कर वसूल किए बिना उसे कोई सुविधा उपलब्ध करा दी जाती। हमें तो ईश्वर का धन्यवाद देना चाहिए कि हम दो दिन की यात्रा में विदाउट टिकट नहीं पकड़े गए थे अन्यथा हमसे कितनी पैनल्टी वसूल की जाती इसका हम अनुमान भी नहीं लगा सकते थे! एक ऐसे अपराध की पैनल्टी जिसे हमने किया नहीं था किंतु हमसे हो गया था!
सेंट पीटर चौक
सायं लगभग साढ़े तीन बजे हम सेंट पीटर्स चौक पहुँचे। यह एक विशाल वृत्ताकार क्षेत्र है जो चारों ओर विशाल वर्तुलाकार प्रस्तर-स्तम्भों एवं बारामदों से घिरा हुआ है। इसी चौक में सेंट पीटर्स बेसिलिका बनी हुई है। चौक के मध्य में एक विशाल स्तम्भ है। उसके निकट ही कुर्सियां लगी हुई हैं जहाँ पोप महीने में कुछ दिन देशी-विदेशी पर्यटकों, श्रद्धालुओं एवं जिज्ञासुओं से मिलते हैं।
इस समय ये कुर्सियां खाली थीं। चौक के एक तरफ मनुष्यों की एक साथ तीन-चार लम्बी कतारें लगी हुई थीं जिनमें देश-विदेश से आए हजारों पर्यटक खड़े थे। इन कतारों में लगकर ही बेसिलिका में प्रवेश किया जा सकता था। हम इतने थके हुए थे कि हमारे लिए इन कतारों में खड़े होना संभव नहीं था।
दिन भर बरसात में भीगते रहने से शरीर बहुत थक गया था तथा इस समय तक लघु-शंका की इच्छा भी बहुत प्रबल हो चुकी थी किंतु आस-पास कहीं भी पेशाबघर नहीं बना हुआ था। हमने कुछ लोगों से पूछा भी किंतु वहाँ सब हमारे जैसे थे। कौन बता सकता था! अतः हम लगभग एक घण्टा सेंट पीटर चौक में रुककर अपने सर्विस अपार्टमेंट के लिए रवाना हो गए।
यहाँ से हमारा घर लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था। फिर भी हमें बस की सहायता लेनी ही पड़ी जिसने हमें ठीक हमारे अपार्टमेंट के सामने उतार दिया। बाकी का दिन हमने सर्विस अपार्टमेंट में ही व्यतीत किया। इस समय का उपयोग मैंने विगत दो दिन की यात्रा का विवरण लिखने में किया।
आज हमारा रोम में चौथा दिन था। आज हमें विश्व इतिहास में बदनाम कोलोजियम को देखने जाना था। यह वही स्थान था जहाँ ईसा की आरम्भिक शताब्दियों में रोमनवासियों ने हजारों योद्धाओं का रक्त केवल अपने मनोरंजन के लिए बहा दिया था।
रोम में तीसरा दिन अनुभवों से भरा रहा था और आज चौथे दिन हमें प्रातःकाल में कोलोजियम के लिए निकलना था। हमारे पास कोलोजियम, रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल के टिकट थे जो हमने कल मेरूलाना प्लाजो से प्राप्त किए थे। ये तीनों स्थान एक दूसरे से सटे हुए हैं।
कोलोजियम में प्रवेश करने के लिए हमें 12 बजे का समय दिया गया था। हमने प्रातः 9.30 बजे अपार्टमेंट से निकलने का निश्चय किया ताकि कोलोजियम में प्रवेश करने से पहले हम, रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल देख सकें किंतु अपार्टमेंट से निकलने में विलम्ब हो गया और हम प्रातः10.15 पर सर्विस अपार्टमेंट से निकल सके।
इस प्रकार आज तीसरे दिन भी हमें साढ़े दस बजे वाली बस मिली। अब तक हमें अनुमान हो चुका था कि हम दक्षिणी रोम में प्रवास कर रहे थे और हमें यहाँ से मध्य रोम अथवा उत्तरी रोम की ओर जाना पड़ता था। इस बस ने हमें ‘विया अर्जेण्टीनिया’ नामक बस-स्टॉप पर उतारा। वहाँ से हमें कॉलोजियम के लिए दूसरी बस मिली। हम प्रातः 11.15 पर कॉलोजियम के सामने उतर गए।
कोलोजियम के सामने
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हम उस विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक भवन के ठीक सामने खड़े थे जो इस बात का साक्षी था कि मनुष्य कितना हिंसक, कितना अत्याचारी और कितना निर्दयी हो सकता है! यह वही कोलोजियम था जिसका निर्माण ईसा के जन्म के लगभग 70 वर्ष बाद रोमन सम्राट वेस्पेसियन के समय में रोम-वासियों के मनोरंजन के लिए करवाया गया था। यह वही कोलोजियम था जिसमें हजारों ग्लेडियेटरों को रोमन-वासियों का मनोरंजन करने के लिए अपने प्राण गंवाने पड़े थे। यह वही कोलोजियम था जिसमें रोम के राजा और धनी-सामंत धन कमाने के लिए हजारों ग्लेडियेटरों को एक-दूसरे के प्राण लेने पर विवश करते थे। यह वही कोलोजियम था जिसमें एक भूखे शेर ने ईसाई संत एण्ड्रोक्लस के समक्ष सिर झुकाकर, स्वयं पर किए गए उपकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी। यह वही कोलोजियम था जिसमें एक दिन ग्लेडिएटरों ने ‘स्पार्तक’ नामक ग्लेडिएटर के नेतृत्व में बंद कोठरियों के दरजवाजे तोड़ डाले थे और रोम की सड़कों पर आकर बहुत से ‘पैट्रिशियन’ अर्थात् धनी-सामंतों को मार दिया था। यह वही कोलोजियम था जिसकी कोठरियों में बंद छः हजार ग्लेडिएटरों को एक साथ ‘एपियन’ नामक सड़क पर सूली पर चढ़ा दिया गया था किंतु अभी हमारे लिए कोलोजियम के दरवाजे एक घण्टे बाद खुलने वाले थे।
रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल में विफलता
हम मध्याह्न 12.00 बजे से 12.25 तक कोलोजियम में प्रवेश ले सकते थे। इस समय सवा ग्यारह ही बजे थे इसलिए हमने पहले, रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल देखने का निर्णय लिया किंतु हमें यह देखकर निराशा हुई कि वहाँ पहले से ही पर्यटकों की बहुत लम्बी कतारें लगी हुई थीं। अतः पिताजी ने रोमन फोरम की लाइन में लगने से मना कर दिया और वे कोलोजियम के बाहर ही एक छोटे से खाली चबूतरे पर बैठ गए।
200 रुपए की एक पॉलीथीन
हम कतारों में तो लग गए किंतु असमंजस में थे, संभवतः हमारे पास इतना समय नहीं था कि हम रोमन फोरम तथा पेलेंटाइन हिल देखकर 12.25 से पहले बाहर आ सकें। इतने में ही बरसात आरम्भ हो गई। हमने अनुमान लगाया कि साढ़े ग्यारह बज गए क्योंकि विजय ने सुबह ही गूगल पर देखकर रोम के मौसम विभाग द्वारा की गई भविष्यवाणी के बारे में बता दिया था कि आज बारसात साढ़े ग्यारह बजे आरम्भ होगी।
कल जो छतरी हमने रास्ते से खरीदी थी, आज उसे सर्विस अपार्टमेंट में ही भूल आए थे। वैसे भी इतनी तेज बारिश में वह किसी काम की नहीं थी। यहाँ बहुत से बांग्लादेशी विक्रेता हाथों में छतरियां एवं मोमजामे की बरसातियां (कामचलाऊ रेनकोट) बेच रहे थे। जैसे ही बरसात आरम्भ हुई, वैसे ही छतरियों एवं मोमजामे की बरसातियों की बिक्री होने लगी। हमने भी चार बरसातियां खरीदीं, एक पिताजी के लिए, एक भानु के लिए, एक मेरे लिए और एक मधु के लिए। विजय और दीपा घर से वाटर-प्रूफ विण्ड चीटर पहनकर आए थे जिनमें कैप भी लगी थीं। इसलिए उन्हें बरसातियों की आवश्यकता नहीं थी।
बांग्लादेशी विक्रेताओं ने हमसे प्रत्येक बरसाती के लिए पाँच डॉलर मांगे। भारत में इस तरह की पॉलीथीन की कीमत मुश्किल से 30-40 रुपए होती। यह इतनी पतली पॉलीथीन थी कि जरा सा नाखून लगते ही फट जाती। थोड़े से मोलभाव के बाद हमें प्रत्येक बरसाती के लिए ढाई यूरो अर्थात् 200 भारतीय रुपए चुकाने पड़े।
बरसात तेज होती देखकर हम लोग कतारों से बाहर निकल गए और वहीं आ गए जहाँ पिताजी बैठे हुए थे। तब तक विजय ने दौड़कर पिताजी को पॉलीथीन की बरसाती पहना दी थी।
पर्यटकों को जानबूझ कर सुविधाओं से वंचित किया जा रहा था
हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि देश-विदेश से आए हजारों पर्यटक बरसात में खड़े-खड़े भीग रहे थे किंतु उनके लिए सरकार, नगर पालिका, कोलोजियम प्रबंधन, एनजीओ (स्वयं सेवी संगठन) आदि की तरफ से, किसी तरह के शेड, चबूतरे, बरामदे, लॉन, कुर्सी, प्याऊ, पेशाबघर आदि की व्यवस्था नहीं थी।
ऐसा लगता था कि यह सब सोच-समझ कर किया जा रहा था ताकि बंग्लादेशियों की पॉलिथीन एवं छतरियां बिक सकें। यह ठीक वैसा ही था जैसा कुछ साल पहले तक भारत में कुछ रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन के आगमन के समय रेलवे के नलों में पेयजल की आपूर्ति बंद कर दी जाती थी ताकि लोग वेण्डर्स से पानी की बोतलें खरीदें तथा 10 रुपए की बोतल के लिए 20 रुपए चुकाएं। हालांकि श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में इस तरह की व्यवस्थाओं में सुधार आया है।
अस्सी रुपए में लघुशंका
अब मुझे लघुशंका से निवृत्त होने की इच्छा होने लगी। हमने बांग्लादेशियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि कोलोजियम के पीछे एक टॉयलेट है। मैं किसी तरह पूछता हुआ और ढूंढता हुआ वहाँ तक पहुँचा, मुझे लगभग पौन किलोमीटर चलना पड़ा था। टॉयलेट के बाहर एक अफ्रीकी नस्ल का कर्मचारी बैठा हुआ सबसे 1 यूरो चार्ज कर रहा था, संभवतः वह नाइजीरियन था। मैं ठिठक गया, एक बार पेशाब करने के अस्सी रुपए! थी तो यह ज्यादती किंतु किया क्या जा सकता था!
कोलोजियम में प्रवेश
जब तक मैं टॉयलेट से लौटकर आया, तब तक बारह बज चुके थे और हम कोलोजियम में प्रवेश ले सकते थे। बारिश अब भी तेज थी। कोलोजियम के सामने दो तरह की कतारें थीं। एक तरफ की कतारों में वे पर्यटक थे जिन्होंने अभी-अभी टिकट खरीदे थे। उन्हें छोटे-छोटे समूहों में भीतर भेजा जा रहा था।
दूसरी तरफ की कतार के लोगों को तत्काल कोलोजियम में जाने दिया जा रहा था। यह कतार बहुत छोटी थी। चूंकि हमारे पास पहले से ही टिकट बुकिंग थी इसलिए हम तत्काल कोलोजियम में प्रवेश पा गए। बरसात की आपाधापी में हमारे छः टिकटों में से दो टिकट भीग गए इसलिए वे स्कैनर के सामने काम नहीं कर पाए। काउण्टर पर बैठी लड़की ने अपने से वरिष्ठ अधिकारी से बात की तो वह समस्या को तत्काल समझ गया और उसने हम सभी को भीतर जाने की अनुमति दे दी।
कॉलेजियम
यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज से लगभग दो हजार साल पहले बनी यह बिल्डिंग आज भी उन्मत्त भाव से खड़ी है। कुछ हिस्सों की अवश्य ही सरकार द्वारा मरम्मत करवाई गई है। कॉलेजियम का मुख्य डिजाइन इस प्रकार है कि बीच में वृत्ताकार मैदान है। उसके चारों तरफ छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई हैं जिनमें ग्लेडियेटर्स बंद रहते थे।
ऊपर की मंजिल में छज्जेदार एवं खुली बालकनियां बनी हुई हैं। इन बालकनियों में रोमन सम्राट एवं राजपरिवार के सदस्य, धनी-सामंत तथा जन-सामान्य बैठा करता था। यहाँ से ये लोग सामने मैदान में चल रहे भयानक रक्तपात के दृश्यों को देखते थे। प्रत्येक ग्लेडिएटर अपने प्राण बचाने के लिए अपने प्रतिद्धंद्वी के प्राण लेता था। इस प्रयास में प्रत्येक ग्लेडिएटर तब तक लड़ता रहता था जब तक कि वह किसी अन्य प्रतिद्वंद्वी द्वारा न मार दिया जाए।
जो ग्लेडियेटर लड़ने से मना करता था, उस पर भूखे शेर छोड़ दिए जाते थे और रोम के राजा एवं प्रजा उन भूखे शेरों द्वारा मनुष्यों की हड्डियों को चबाए जाने के वीभत्य दृश्य देखकर तालियां बजाते थे। इन सारे दृश्यों के दो परिणाम होते थे- पहला परिणाम मनोरंजन के रूप में मिलता था और दूसरा परिणाम धनी-सामंतों एवं राजा को होने वाली विपुल धनराशि के रूप में मिलता था।
हमने लगभग डेढ़ घण्टा कोलोजियम में बिताया। बाहर अब बरसात थम चुकी थी किंतु इस समय तक पिताजी पूरी तरह थक चुके थे। इसलिए हम अपने सर्विस अपार्टमेंट को लौट लिए। घर आकर भोजन किया तथा कुछ देर विश्राम करने के बाद सायं 4 बजे के आसपास हम लोग पेंथिऑन तथा पियाजा नवोना देखने के लिए निकल गए। इस बार पिताजी घर पर ही रहे। थकान हो जाने के कारण उन्होंने चलने से मना कर दिया। उन्हें हल्का सा बुखार भी हो आया था।
पेंथिऑन का रोमांच (मंगल देवता का प्राचीन मंदिर)
कुछ वर्ष पहले मैंने एक अमरीकी लेखक डेन ब्राउन का उपन्यास एंजिल्स एण्ड डेमॉन्स पढ़ा था। इस उपन्यास में रोम शहर में स्थित प्राचीन भवनों, चौराहों, फव्वारों, चित्रों, चर्चों को आधार बनाते हुए एक अद्भुत काल्पनिक कथा गढ़ी गई है। धर्म और विज्ञान के बीच हुए युद्ध एवं एक कार्डिनल द्वारा किए जा रहे षड़यंत्रों के कथानक ने उपन्यास को अत्यंत रोचक बना दिया है।
एण्टी मैटर को चुराने से लेकर उसके नष्ट होने के बीच होने वाली हत्याओं के सिलसिले को समाप्त करके जब पाठक उपन्यास पूरा करता है तो रोम शहर के पुराने चर्च, कब्रिस्तान, बेसिलिका, टॉवर, फव्वारे, चौराहे आदि जीवंत होकर पाठक की आंखों में तैरने लगते है। पाठक की स्मृति में पेंथिऑन की भी एक अमिट छाप अंकित हो जाती है। वही पेंथिऑन हमारे सामने था। इस प्राचीन रोमन मंदिर का वर्णन इस पुस्तक में पहले ही कर दिया गया है।
यह भवन ईसा के जन्म से पहले, ई.पू.31 में तत्कालीन रोमन शासक मार्कस एग्रिप्पा (लूसियस का पुत्र) के समय बनना आरम्भ हुआ। उसने एक्टियम के युद्ध में रोमन सेनाओं की विजय के उपलक्ष्य में तीन भवन बनाने का निर्णय लिया। इनमें से पहला भवन मंगल देवता का मंदिर (मार्स टेम्पल) था, दूसरा भवन एग्रिप्पा सार्वजनिक स्नानागार था तथा तीसरा भवन नेप्च्यून देवता (वरुण देवता) का मंदिर था। ये भवन प्रथम रोमन सम्राट ऑगस्टस सीजर ऑक्टेवियन के समय बनकर पूरे हुए। उस युग के भवनों को ऑगस्टस शैली के भवन कहा जाता है जिनमें से पैंथिऑन भी एक है।
आज भी रोम नगर के मध्य में ये तीनों संरचनाएं देखी जा सकती हैं जो उत्तर से दक्षिण में एक सीध में बनी हुई हैं। इनमें से मंगल देवता का मंदिर तथा वरुण देवता का मंदिर जनसामान्य के लिए नहीं थे, इनका उपयोग केवल सम्राट एवं उसके परिवार के सदस्य करते थे। जबकि एग्रिप्पा स्नानागार सार्वजनिक उपयोग के लिए था। पेंथिऑन के सामने आज भी लैटिन भाषा में एक प्राचीन शिलालेख लगा है जिसमें इसे पैंथिऑन डोम कहा गया है।
ई.54 से 68 के बीच नीरो रोम का सम्राट हुआ। उसके समय रोम में भयानक आग लगी जिसमें ये तीनों भवन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। उसने रोम के क्षतिग्रस्त भवनों को दुबारा से बनवाया। नीरो ने अथवा उसके बाद के किसी राजा ने इस भवन का पुनर्निर्माण करवाया। यह राजा वेस्पेयिन भी हो सकता है जिसने रोम पर लगभग साढ़े नौ साल राज्य किया। ई.80 में रोमन सम्राट टाइटस के समय रोम में बड़ा ज्वालामुखी फटा जिसके कारण रोम में एक बार पुनः भयानक आग लग गई।
इस दौरान रोम के कई भवनों को क्षति पहुँची। नव-निर्मित पैंथिऑन भी इस आग की भेंट चढ़ गया। टाइटस के उत्तराधिकारी डोमिशियन ने पैंथिऑन को पुनः बनवाया। ई.97 से ई.117 तक ट्राजन नामक महान् रोमन सम्राट ने शासन किया। उसके समय में ई.110 में रोम पर आक्रमण करने वाले कुछ शत्रुओं ने पैंथिऑन को पुनः जला दिया। ट्राजन ने रोम नगर का पुनर्निर्माण करवाया। उसके समय में रोमन स्थापत्य एवं शिल्प अपनी नई ऊंचाइयों पर पहुँचा।
ई.114 में उसने पैंथिऑन को नए सिरे से बनवाना आरम्भ किया। उसके उत्तराधिकारी सम्राट हैड्रियन ने ट्राजन के समय आरम्भ हुए भवनों को पूरा करवाया। इस काल का शिलालेख भवन की दीवार में लगा हुआ है।
इस पुनर्निर्माण के बाद पैंथिऑन को फिर कभी पुनर्निर्मित नहीं किया गया। यही कारण है कि इन भवनों में आज भी ट्राजन एवं हैड्रियन युग की ईटें लगी हुई हैं। इसके निर्माण के बाद की शताब्दियों में हुए लेखकों के विवरणों में इस भवन के उल्लेख मिलते हैं। ई.202 में सैप्टिमियस सेरेवस तथा उसके पुत्र कैरेकाला ने इस भवन की मरम्मत करवाई।
उस काल का एक शिलालेख आज भी भवन की दीवार में लगा हुआ है। ई.337 में रोमन सम्राट कॉन्स्टेन्टीन द्वारा ईसाई धर्म स्वीकार करने से पहले तक यह भवन रोम के राजाओं का प्रमुख देवालय बना रहा किंतु ई.337 के बाद यह मंदिर उजड़ने लगा। ई.609 में बिजैन्तिया के रोमन सम्राट फोकस ने पैंथिऑन भवन पोप बोनीफेस (चतुर्थ) को दे दिया।
उसने इस प्राचीन रोमन मंदिर को ईसा मसीह की माता मैरी तथा ईसाई धर्म में तब तक हुए शहीद संतों के नाम पर ‘सांक्टा मारिया एण्ड मारटायर्स रोटोण्डा’ नामक चर्च में बदल दिया। उस समय पोप द्वारा यह घोषणा की गई कि इस स्थान पर जिन्हें एंजिल (देवता) कहकर पूजा जाता था, वास्तव में वे डेमॉन्स (राक्षस) थे। संभवतः अमरीकी लेखक मार्क डेन को अपने उपन्यास का शीर्षक ‘एंजील्स एण्ड डेमॉन्स’ रखने का विचार यहीं से आया होगा। इस उपन्यास में पैंथिऑन की चर्चा बहुत विस्तार से की गई है।
सम्राट फोकस के आदेश से शहीद ईसाई संतों के अवशेष ‘कब्रिस्तानों’ से निकालकर पैंथिऑन के सीमा-क्षेत्र में गाढ़े गए। कहा जाता है कि ईसाई संतों के अवशेष 28 गाड़ियों में भरकर इस स्थान पर लाए गए। सम्राट पाफकस ने रोम के समस्त भवनों से धातुओं की चद्दरें उतार कर कुस्तुंतुनिया भिजवा दीं। ताम्बे, कांसे और पीतल की ये चद्दरें प्राचीन रोमन सम्राटों द्वारा रोम के राजकीय भवनों एवं देवालयों को सजाने के लिए लगाई गई थीं।
जब रोम की राजनीतिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई तब रोम के प्रमुख राजकीय एवं सार्वजनिक भवनों से संगमरमर के अलंकृत पत्थर, पट्टिकाएं तथा मूर्तियां भी लूट ली गईं। इनमें से कुछ सामग्री आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में देखी जा सकती है।
जब कुस्तुंतुनिया के पतन के बाद 15वीं शताब्दी ईस्वी में रोम में पुनर्जागरण का युग आरम्भ हुआ तब पैंथिऑन डोम के भीतरी भाग को रोम के प्रसिद्ध चित्रकारों द्वारा महत्त्वपूर्ण चित्रों से सजाया गया जिनमें मेलोज्जो दा फोरली तथा फिलिप्पो ब्रूनेलेश्ची का चित्र ‘घोषणा’ सर्वप्रमुख माना जाता है।
पुनर्जागरण युग के कई महत्त्वपूर्ण कलाकारों के शवों को भी पैंथिऑन परिसर में दफनाया गया। इनमें चित्रकार राफेल तथा एनीबाले कैराकी, गीतकार अर्कान्जिलो, शिल्पकार बलडेसर पेरुजी, आदि सम्मिलित थे।
सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में पोप उरबान अष्टम् बारबेरिनी (ई.1623-44) ने पैंथिऑन के पोर्टिको में लगी ब्रोंज की भारी भरकम चद्दरें उखाड़ लीं। इस धातु के 90 प्रतिशत भाग का उपयोग सैंट एन्जिलो कैसल के लिए तोपें तथा उनके गोले बनाने में किया गया तथा शेष 10 प्रतिशत धातु का उपयोग रोम के सुप्रसिद्ध वास्तुकार बरनिनी द्वारा सेंट पीटर बेसिलिका के ऊपर दिखाई देने वाली ‘टेकरी’ बनाने में किया गया।
पैंथिऑन के दोनों ओर सजावट के लिए बनाई गई संरचनाओं को पोप उरबान (अष्टम्) ने ‘गधे के कान’ घोषित करके उन्हें भी हटवा दिया तथा उनके स्थान पर ईटों के दो कॉलम खड़े करवा दिए जो उन्नीसवीं सदी के अंत तक अपने स्थान पर मौजूद रहे। उस काल के एक कवि ने अपनी कविता में लिखा है कि जो काम बारबेरियन (बर्बर आक्रान्ता) नहीं कर पाए वह बरबेरिनिस (पोप उरबान अष्टम् के वंशज) ने कर दिखाया।
इटली के एकीकरण के बाद इटली के प्रथम सम्राट विटोरियो एमेनुएल (द्वितीय) का शव इसी परिसर में दफनाया गया। उसके बाद सम्राट उम्बेरतो (प्रथम) तथा उसकी रानी माग्रेरिटा के शव भी यहीं दफनाए गए। वर्तमान में पैंथिऑन एक कैथोलिक चर्च है। हर समय हजारों पयर्टकों की भारी भीड़ के बीच भी चर्च की गतिविधियां चलती रहती हैं।
भारी भीड़ के बीच ही, चर्च में विवाह भी करवाए जाते हैं। पैंथिऑन का मुख्य भीतरी भवन गोलाकार डोम है जिसका व्यास 142 फुट तथा फर्श से छत के गुम्बद तक की ऊँचाई भी 142 फुट है। इसके सामने एक बड़ा बरामदा बना हुआ है। यह चर्च जिस विशाल चौक में खड़ा है उसे ‘पियाजा डेल्ला रोटोण्डा’ अर्थात् ‘रोटोण्डा का चौक’ कहा जाता है।
इस भवन को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि महान् रोमन सम्राटों के शासन काल में, विशेषकर ट्राजन एवं हैड्रियन के समय में रोम में किस प्रकार के भवन बन रहे थे! उस काल में रोम में इस प्रकार के और भी भवन बने थे किंतु उनमें से अधिकांश नष्ट हो चुके हैं किंतु एग्रिप्पा सार्वजनिक स्नानागार के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं जिसका निर्माण पैंथिऑन के साथ करवाया गया था। ये भवन ईसाई धर्म के जन्म लेने से पहले के रोम का दर्शन करवाते हैं।
पियाजा नवोना
पैंथिऑन से निकलकर हम लोग पियाजा नवोना अर्थात् नवोना चौक गए। वर्ष 2000 में अमरीकी लेखक डेन ब्राउन द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘एंजील्स एण्ड डेमॉन्स’ में इस फव्वारे की भी विपुल चर्चा की गई है, जिसके बाद से यह फव्वारा विश्व-भर के पर्यटन मानचित्र पर आ गया है। पैंथिऑन तथा पियाजा नवोना के बीच लगभग आधा किलोमीटर की दूरी है। एक पतली सी गली से होकर वहाँ तक पहुँचा जा सकता है।
बीच में एक सड़क भी पार करनी होती है जिस पर तेज गति से वाहन चलते हैं किंतु वे पदयात्रियों को देखते ही एकदम यंत्रवत् स्थिर हो जाती हैं। पियाजा नवोना एक विशाल आयताकार चौक है जिसके दोनों छोर पर दो कलात्मक फव्वारे बने हुए हैं। इन दोनों के मध्य में भी एक अलग तरह का फव्वारा है। ये तीनों फव्वारे संगमरमर से बनी मूर्तियों से सजाए गए हैं। इनमें से बहुत सी मूर्तियां मनुष्यों के आकार से भी बड़ी हैं। ये मूर्तियां प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की हैं जिनमें से अधिकांश नग्न हैं। प्राचीन रोमन लोग देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाओं की ही पूजा किया करते थे।
रोमन सम्राट डोमिशियन ने पहली शताब्दी ईस्वी में इसी स्थान पर एक स्टेडियम का निर्माण करवाया था जिसे ‘स्टेडियम ऑफ डोमिशियन’ तथा ‘सर्कस एगोनालिस’ कहा जाता था। इस स्टेडियम में खेल-प्रतियोगिताएं होती थीं जिन्हें देखने के लिए सम्राट अपने परिवार एवं सामंतों सहित आता था।
बाद की शताब्दियों में इसे ‘नवोना’ कहा जाने लगा। आज भी इस चौक का आकार एक स्टेडियम जैसा ही है जिसके चारों तरफ विगत दो हजार सालों में भवनों की एक विशाल शृंखला उग आई है। रोमन सम्राट इनोसेंट (दशम्) के शासन काल (ई.1644-55)में इस क्षेत्र में ‘बैरोक रोमन स्थापत्य शैली’ में विशाल भवनों का निर्माण करवाया गया।
सम्राट इनोसेंट का राजमहल ‘पलाज्जो पैम्फिली’ भी पियाजा नवोना की तरफ मुंह करके बनाया गया था। इस चौक के केन्द्र में बना फव्वारा फोण्टाना देई क्वात्रो फियूमी (चार नदियों वाला फव्वारा) कहलाता है। इसे ई.1651 में जियान लॉरेन्जो बरनिनी ने डिजाइन किया था। इसके ऊपर एक विशाल स्तम्भ खड़ा है जिसे ऑबलिस्क ऑफ डोमिशियन कहा जाता है। इसे टुकड़ों के रूप में सर्कस ऑफ मैक्सीन्टियस से लाया गया था।
इसी चौक में दो और फव्वारे बनाए गए हैं। इसके दक्षिणी छोर पर फोण्टाना डेई मोरो स्थित है। इसे ई.1575 में जियाकोमो डेल्ला पोर्ता ने डिजाइन किया था। ई.1673 में बरनिनी ने इसमें मूर तथा डॉल्फिन की प्रतिमाएं बनाई। इसके चारों ओर एक कलात्मक खाई बनाई गई है। इसके बाईं ओर के छोर पर फाउण्टेन ऑफ नेपच्यून स्थित है जिसे ई.1574 में जियाकोमो डेल्ला पोर्ता ने डिजाइन किया था। इस फव्वारे में स्थित स्टेच्यू ऑफ नेपच्यून ई.1878 में एण्टोनियो डेल्ला बिट्टा ने बनाई थी ताकि इस फव्वारे का दृश्य फोण्टाना डेई मोरो के साथ संतुलन स्थापित कर सके।
इस चौक का उपयोग नाटक आदि खेलने के लिए भी किया जाता था, यह परम्परा आज भी जारी है। ई.1652 से ई.1866 तक अगस्त माह के प्रत्येक शनिवार एवं रविवार को इस चौक में पैम्फिली परिवार के लोग एकत्रित होकर उत्सव का आयोजन करते थे। किसी समय इस क्षेत्र में एक बाजार स्थापित किया गया था जिसे ई.1869 में निकटवर्ती कैम्पो डे फियोरी में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान समय में क्रिसमस के दिनों में इस चौक में अस्थाई बाजार लगता है।
जब हम इस चौक पर पहुँचे तो संध्या होने वाली थी। हालांकि रोम में सूर्य का प्रकाश रात नौ बजे तक रहता है, इसलिए चिंता की बात नहीं थी। हम कुछ समय इस स्थान पर रुक सकते थे। इस स्थान पर देश-विदेश से आए हजारों दर्शक थे। कुछ स्थानीय कलाकार सर्कस जैसे खेल दिखाकर पर्यटकों से चंदा मांग रहे थे।
कुछ युवक मण्डलियां सर्कस एवं नृत्य-नाटिका का सम्मिलित प्रदर्शन करके यूरो एकत्रित कर रहे थे। कुछ संगीत मण्डलियां वाद्य बजाकर लोगों का मनोरंजन कर रहे थे। हमारे सामने ही दूर देशों से आए युवक-युवतियों ने उस संगीत पर नृत्य करना आरम्भ किया और थोड़ी ही देर में वे एक गोल घेरे में ऐसे नाचने लगे जैसे वे एक-दूसरे को जानते हैं और वर्षों से इसी तरह नृत्य करने के अभ्यस्त हैं।
चौक के चारों ओर भारतीय थड़ियों जैसी स्टॉल लगी हुई थीं जिनमें रखे कुछ लैम्पों से आग की लपटें निकल रही थीं। कुछ महंगे रेस्टोरेंट्स वालों ने भी अपनी कुर्सियां चौक में लगा रखी थीं जिन पर बैठकर विदेशी पर्यटक जमकर अल्कोहल पी रहे थे।
सिगरेट के धुएं से बनते छल्ले, संगीत की लहरियां, युवक-युवतियों के नृत्य, थड़ियों पर कई फुट ऊंची उठती आग की लपटें, फव्वारों की जल-धाराएं सब मिलकर ऐसा दृश्य उत्पन्न कर रहे थे मानो हम ऐसी धरती पर आ गए हैं जहाँ न कोई दुःख है, न चिंता है, न भय है, न किसी तरह का संघर्ष है, न कोई प्रतियोगिता है, न कोई उद्विग्नता है। बस चारों ओर नृत्य है, शराब है, संगीत है, यौवन है, मादकता है, विलासिता है, भोग की इच्छा है। संभवतः इसी सबकी कामना में दुनिया भर के देशों से धनी पर्यटक इटली आते हैं।
आज की शाम वे सब यहाँ हैं, कल कहीं और होंगे, उनकी जगह नए पर्यटक होंगे। सुख प्राप्त करने की अभिलाषा कल भी यहाँ इसी प्रकार नृत्य करेगी, शराब ढलेगी और इटैलियन फूड स्टॉल्स के लैम्पों से निकलती आग की लपटें इसी प्रकार आकाश को चूम लेने के लिए लपकती रहेंगी। न जाने कब से यह सिलसिला चल रहा है और कौन जाने कब तक जारी रहेगा!
मन का एक कौना बार-बार सचेत करने का प्रयास करता था, पर्यटकों की ये समस्त चेष्टाएं, अपने द्वारा अर्जित किए गए धन को भोगने की अभिलिप्सा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इनमें से अधिकांश लोग नहीं जानते कि सुख कहाँ से आता है और उसकी सृजना कैसे होती है!
वे इसी को सुख समझ रहे थे, जो कि केवल आज शाम से अधिक समय तक उनके साथ नहीं रहने वाला था। हाँ इतना अवश्य था कि इन क्षणों में वे अपने उन हजारों दुःखों को भूले हुए थे जिनके कारण प्राणी का जीवन इस धरती पर हर समय कष्टमय और संकटग्रस्त रहता है!
सब-अर्बन स्टेशन
पियाजा नवोना की रंगीनियों से निकलकर हमने बस पकड़ी और रेल्वे स्टेशन आ गए। यहाँ हमें फ्लोरेंस जाने वाली ट्रेनों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी थी। आज 20 मई थी तथा 22 मई की सुबह हमें फ्लोरेंस के लिए ट्रेन पकड़नी थी। यह ट्रेन मुख्य रोम रेल्वे स्टेशन से मिलनी थी किंतु जहाँ हम ठहरे हुए थे वहाँ से रोम का मुख्य स्टेशन लगभग 5 किलोमीटर दूर था।
अतः हम चाहते थे कि हमारे अपार्टमेंट से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित सब-अर्बन स्टेशन से हमें रोम रेल्वे स्टेशन के लिए कोई ट्रेन मिल जाए। रेल्वे स्टेशन पर कार्यरत रेलवे कर्मचारियों से पूछताछ में ज्ञात हुआ कि रेलवे ट्रेन से जाने की बजाय बस से जाना अधिक सुगम होगा।
हमें इसी सबअर्बन स्टेशन के बाहर से 63 नम्बर की बस मिलेगी जो हमें रोम के मुख्य रेल्वे स्टेशन पर छोड़ देगी। हालांकि हमारे पास मेरूलाना प्लाजो से लिए गए पास थे जिससे हम चार दिनों तक रोम में किसी भी बस और ट्राम में निःशुल्क यात्रा कर सकते थे किंतु हमारे पास सामान अधिक था।
हमें इतने सारे सामान को सर्विस अपार्टमेंट से घसीटकर रेल्वे स्टेशन के बस-स्टॉप तक लाना उचित नहीं लगा। अतः हमने निर्णय लिया कि रोम के मुख्य स्टेशन तक जाने के लिए ट्रेन या बस का उपयोग करने की बजाय कार-टैक्सी करना अधिक उचित होगा। बड़ा विचित्र शहर है, यहाँ न ऑटो रिक्शा है, न तांगा है, न साइकिल रिक्शा है। शहर में यात्रा करने के केवल तीन ही साधन हैं, बस, ट्राम और कार-टैक्सी। तीनों ही बहुत महंगे हैं।
विशाल दरवाजों एवं आश्चर्यजनक आर्चों का देश!
रोम के भवनों में विशाल दरवाजों तथा तरह-तरह के आर्च का प्रयोग आम बात है। इन भवनों के गोल, तिकोने, फ्लैट आर्च देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। कुछ पत्थर तो ऐसे भी हैं जो एक की बजाय दो आर्च का हिस्सा हैं। आधा पत्थर इधर वाली आर्च का और आधा हिस्सा दूसरी तरफ वाली आर्च का। बाद में हमें ऐसे आर्च और विशाल दरवाजे फ्लोरेंस में भी देखने को मिले।
इटली के भिखारी
सबअर्बन रेल्वे स्टेशन के ठीक सामने बनी एक पुलिया के नीचे हमने एक परिवार को देखा। एक बहुत सुंदर इटैलियन युवती, दो छोटे बच्चे और उनका पिता। भारत में ऐसी अच्छी शक्ल-सूरत वाले भिखारी देखने को नहीं मिलते। हमें आश्चर्य हुआ कि यहाँ भी भिखारी होते हैं! उस भिखारी दम्पत्ति ने कुछ आशा भरी दृष्टि से हमें देखा। मुझे उनकी आंखों में याचना के स्थान पर आक्रामकता अधिक दिखाई दी। इसलिए मैंने चाहकर भी उनसे बात नहीं की। कौन जाने कब ये लोग क्या नाटक कर बैठें!
हम स्टेशन परिसर से बाहर निकलकर पैदल ही सर्विस अपार्टमेंट की तरफ चल दिए जो इस स्थान से कठिनाई से 400 मीटर की दूरी पर था। रोम तथा वेनिस की गलियों में हमने इक्का-दुक्का कुछ और भिखारियों को भी देखा। वे शरीर से अत्यंत कमजोर थे तथा सभी वृद्धावस्था में दिखाई देते थे।
उनके शरीर पर पैण्ट-शर्ट एवं कोट, हाथ में मोबाइल फोन, भीख मांगने का कटोरा और एक ट्रैवलर बैग जैसा बैग भी था। किसी भी भिखारी के पास वैसी गठरी नहीं थी जैसी भारत के भिखारियों के पास होती है। इटली में भिखारियों की संख्या इतनी कम है कि मेरे अनुमान से सरकार बड़ी आसानी से उनका पुनर्वास कर सकती है।
संभवतः पूरे इटली में दो-सौ से अधिक भिखारी नहीं होंगे, या फिर और भी कम। इटली के भिखारी बड़ी आशा भरी दृष्टि से पर्यटकों की तरफ देखते हैं तथा अपनी समझ के अनुसार अभिवादन भी करते हैं किंतु वे पर्यटकों को तंग नहीं करते।
हम यहाँ किसी भी भिखारी को कुछ भी देने की स्थिति में नहीं थे। एक यूरो से कम तो क्या देते जो कि भारत में 80 रुपए का मूल्य रखता था। इतना हम देना नहीं चाहते थे और इससे कम देने पर कौन जाने कोई भिखारी हमारे साथ बदतमीजी ही कर ले, जैसे कि भारत के भिखारी कर लेते हैं!
किन्नरों से सामना नहीं!
सबअर्बन स्टेशन से हम पैदल ही अपने फ्लैट की ओर चल पड़े। इसी के साथ हमारा रोम में चौथा दिन पूरा हो गया। इटली की अपनी ग्यारह दिन की यात्रा में हमारा सामना किसी भी किन्नर से नहीं हुआ। कौन जाने यहाँ किन्नर होते भी हैं कि नहीं!
आज रोम में हमारा पांचवाँ दिन था। आज हमें सेंट एंजिलो कैसल जाना था। इस कारण आज का दिन भी बहुत से नए अनुभवों वाला होने वाला था।
शरीर भारतीय समय को भूलकर इटली का समय अपनाने लगा है। हालांकि अब भी आंख एक बार तो भारतीय समय के अनुसार प्रातः पाँच बजे खुल जाती है किंतु अब दोबारा सोने पर वापस नींद भी आ जाती है और इटली के समयानुसार प्रातः पांच बजे खुल जाती है। आज सुबह से ही बरसात आरम्भ हो गई थी। पिताजी ने हमारे साथ नहीं चलने का निर्णय लिया तथा घर पर ही विश्राम करने की इच्छा व्यक्त की। हमने उनसे कहा कि पिछले दिन दिनों से सायं काल में बरसात नहीं हो रही है, यदि आज भी मौसम अच्छा रहा तो आप हमारे साथ लंच के बाद चले चलना।
मरकातो फूडो
मैं सुबह आठ बजे तैयार हो कर मरकातो फूडो देखने चला गया। यह एक सब्जी एवं फल बाजार था किंतु कुछ दुकानों पर कच्चा मांस भी बिक रहा था जिसे कांच की अलमारियों में प्रदर्शित किया गया था। सारी सब्जियां और फल ताजी थे। अधिकतर वृद्ध महिलाएं इस बाजार में खरीदरारी कर रही थीं।
सेंट एंजेलो कैसल
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हमारे पास मेरूलाना प्लाजो से खरीदे गए टिकट थे जिनसे हम इटली के कुछ निश्चित स्थल देख सकते थे। इनमें सेंट एंजेलो कैसल भी सम्मिलित था। हमने वहीं जाने का निर्णय लिया। आज हम प्रातः नौ बजे घर से निकलने में सफल हो गए। बस भी जल्दी ही मिल गई। हमारे अपार्टमेंट से सेंट एंजिलो कैसल मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर था इसलिए हमें वहाँ पहुँचने में अधिक समय नहीं लगा। जिस समय हम सेंट एंजेलो कैसल में घुसे, वर्षा शुरु हो गई थी। यह एक प्राचीन गोलाकार दुर्ग है जो पार्को एड्रियानो क्षेत्र में टिब्रिस (ट्रेवी तथा टाइबर) नदी के तट पर स्थित है। एक तरह से टाइबर नदी इस दुर्ग की प्रथम रक्षा पंक्ति का निर्माण करती है। इस दुर्ग का निर्माण दूसरी शताब्दी ईस्वी के रोमन सम्राट हैड्रियन ने करवाया था। हैड्रियन तथा उसके परिवार के सदस्यों की समाधियाँ आज भी इस दुर्ग में स्थित हैं। हैड्रियन ई.117 में रोम का सम्राट बना था तथा उसकी मृत्यु ई.138 में ‘बेई’ नामक स्थान पर हुई थी। हैड्रियन की रानी सबीना तथा उसके एक दत्तक पुत्र भी संभवतः राजा के साथ ही मारे गए थे। राजा तथा उसके परिवार के लोगों के अवशेष लाकर इस दुर्ग में दफनाए गए। राजा ने अपनी मृत्यु से पहले ही यहाँ अपने लिए तथा अपने परिवार के सदस्यों के लिए कब्रें बनवा दी थीं।
परवर्ती काल में रोम के पोप ने इसे अपना आवास बना लिया। किसी युग में यह रोम का सबसे ऊंचा भवन था। आज भी बहुत कम भवन इस दुर्ग की ऊंचाई के बराबर हैं। हम इस दुर्ग के चारों ओर वैसे ही घूमते हुए चढ़ रहे थे जिस प्रकार पहाड़ी क्षेत्रों में बसें घुमावदार सड़कों पर चढ़ती हैं।
इस दुर्ग की छत पर मिशेल आर्केन्जिल नामक देवी की विशाल प्रतिमा लगी हुई है जिसके नाम पर इस दुर्ग का नामकरण किया गया है। इस दुर्ग तक पहुँचने के लिए ट्रेवी नदी पर बने हुए पोंटे सेंट एंजिलो नामक एक पुल को पार करना होता है जिसके दोनों तरफ प्राचीन कालीन ईसाई देवदूतों एवं देवियों की मूर्तियां लगी हुई हैं। हैड्रियन के बाद रोम के राजाओं के शवों को यहीं लाकर दफनाया जाता रहा।
यहाँ दफनाया जाने वाला अंतिम राजा कैराकैला था जिसकी मृत्यु ई.217 में हुई थी। ई.401 में इस दुर्ग को सैनिक मुख्यालय में बदल दिया गया। इसके कारण दुर्ग में स्थित प्राचीन काल के अनेक निर्माण ध्वस्त हो गए। ई.410 में जब विसिगोथ लुटेरों ने रोम में लूट मचाई तो इस दुर्ग में स्थित शाही कब्रों को भी खोद दिया गया ताकि वहाँ से कीमती सामग्री प्राप्त की जा सके। ई.537 में गोथ आक्रांताओं ने इसी प्रक्रिया को फिर से दोहराया तथा हैड्रियन एवं उसके बाद के सम्राटों के काल में बनी अनेक कीमती प्रतिमाओं को तोड़ डाला।
इन विध्वंसों के दौरान सम्राट हैड्रियन की कब्र पर रखा एक कीमती पत्थर साबुत बचा रहा जिसे बाद में सेंट पीटर्स बेसिलिका में सम्राट ऑट्टो की कब्र को ढंकने के लिए भेज दिया गया। जब रोम में ईसाई धर्म का बोलबाला हो गया तो इस दुर्ग में स्थित रोमन पैगन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को भी तोड़ डाला गया जिनमें से कुछ के खण्ड दुर्ग में हुई खुदाई एवं सफाई आदि के समय मिले हैं।
इन्हें दुर्ग के गलियारों में लगा दिया गया है। प्राचीन निर्माण के कुछ स्तम्भों के टुकड़े भी अब पर्यटकों एवं इतिहासकारों की सुविधा के लिए दुर्ग परिसर में प्रदर्शित किए गए हैं।
ई.590 में रोम में भयानक प्लेग फैल गया था जिसमें बहुत से रोमवासी मारे गए थे। उस समय रोम में पोप ग्रेगरी (प्रथम) का शासन था। एक लोक किंवदंती के अनुसार तब देवी आर्क एंजिल मिशेल इस दुर्ग की छत पर प्रकट हुई थी। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में एक यात्री ने इस लोक किंवदन्ती को रोमन लोगों के मुंह से सुना था तथा उस समय उसने दुर्ग पर एक देवी की प्रतिमा भी देखी थी।
उस काल में पोप ग्रेगरी (प्रथम) रोमन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को नष्ट करवा रहा था। पोप ग्रेगरी (प्रथम) ने भी इस देवी की तलवार से खून टपकता हुआ देखा था। फिर भी पोप ने पैगन देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाना जारी रखा। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में पोप निकोलस (तृतीय) ने सेंट पीटर्स बेसिलिका से इस दुर्ग तक एक छतदार गलियारा बनवाया जिसे पैसेटो बोर्गो कहा जाता था। अब यह गलियारा मौजूद नहीं है। इसका उल्लेख केवल पुस्तकों में मिलता है।
ई.1527 में जब चार्ल्स (पंचम) ने रोम को घेर लिया तब पोप क्लेमेंट (सप्तम्) ने इसी दुर्ग में शरण ली थी। पोप के सिपाही इस दुर्ग की छतों पर खड़े होकर शत्रु सेना पर गोलियां बरसाया करते थे। लिओ (दशम्) ने मैडोना के साथ राफेएलो डा मॉण्टेलुपो के द्वारा एक चैपल का निर्माण करवाया।
ई.1536 में मॉण्टेलुपो ने सेंट मिशेल की एक संगमरमर की मूर्ति भी बनाई जिसके हाथ में एक तलवार थी। इस मूर्ति को दुर्ग के ऊपर स्थापित कर दिया गया। बाद में पोप पॉल (तृतीय) ने इस दुर्ग में एक विलासिता पूर्ण महल का निर्माण करवाया ताकि यदि भविष्य में फिर कभी रोम पर आक्रमण हो तो पोप इस महल में निवास कर सके।
ई.1753 में दुर्ग के ऊपर लगी हुई सेंट मिशेल की संगमरमर की प्रतिमा को एक नई कांस्य प्रतिमा द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया जिसका निर्माण फ्लेमिश शिल्पी पीटर एण्टोन वॉन वरशेफेल्ट ने किया था। अब यही मूर्ति दुर्ग पर लगी हुई दिखाई देती है। पुरानी प्रतिमा अब भी दुर्ग के भीतर एक खुले चौक में लगी हुई है। रोम के पोप शासकों ने इस दुर्ग का उपयोग बंदीगृह के रूप में भी किया। जियोर्डानो ब्रूनो को जीवित जलाने से पहले छः साल तक इसी दुर्ग में बंदी बनाकर रखा गया था। बेनवेनूटो सेलिनी नामक एक शिल्पी को भी इसी दुर्ग में बंदी बनाया गया। उस पर मुकदमा चलाने के लिए जेल में कोर्ट लगाई गई थी।
अब इस दुर्ग में एक संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। संसार भर से लगभग 12-13 लाख लोग इस दुर्ग को देखने के लिए प्रति वर्ष आते हैं। हम भी दुर्ग में लगी मूर्तियों को देखते हुए आगे बढ़ते रहे। दुर्ग भव्य और अद्भुत है किंतु भारत के रहस्यमय किलों के सामने यह एक बहुत छोटे परिंदे के जैसा है। इसके भीतर सुरंगनुमा मार्गों पर चलना भी किसी रहस्य को उजागर करने से कम नहीं है।
ये सुरंगनुमा मार्ग एक समान ऊंचाई पर ऊंचे उठते जाते हैं जिन पर कभी रोमन योद्धा घोड़ों पर सवार होकर सरपट दौड़ लगाते होंगे। इन सुरंगनुमा गलियारों के दोनों ओर छोटी-छोटी कोठरियां हैं जिन्हें देखकर भय लगता है।
राजकीय बंदी विद्रोही दार्शनिक एवं प्रतिद्वन्द्वी राजकुमार कभी इन्हीं कोठरियों में बंदी रखे जाते होंगे। बीच-बीच में शाही निवास के महल भी बने हुए हैं। इन महलों में संसार के श्रेष्ठ फ्रैस्कों (भित्तिचित्र) बने हुए हैं जिनमें बाइबिल की कथाएं तथा विभिन्न पोप से जुड़े हुए धार्मिक प्रसंग उत्कीर्ण हैं। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ एक गोल जादुई डिब्बे में बंद है।
हम सबसे ऊपर की मंजिल पर पहुँच गए जहाँ आजकल शस्त्रों का संग्रहालय स्थापित है। यहाँ तक पहुँचने के मार्ग में एक रेस्टोरेंट भी है जिसमें विदेशी पर्यटकों की अच्छी-खासी भीड़ थी। संग्रहालय के बाहर घुमावदार बरामदा बना हुआ है जिसमें खड़े होकर दुर्ग के एक हिस्से की छत पर पुरानी तोपों का संग्रहालय है।
बहुत से गोले भी सजाकर रखे गए हैं जो कभी तोपों में प्रयुक्त होने के लिए बनाए गए होंगे किंतु कभी भी तोपों में नहीं डाले गए। संभवतः ये तोपें और गोले उस समय के हैं जब पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में रोम के पोप दुर्ग में निवास करते होंगे।
ये तोपें सोलहवीं सदी ईस्वी की उन भारतीय तोपों से बिल्कुल अलग हैं जिनका प्रयोग मुगलों के समय भारत में किया जाता था। रोम के दुर्ग की तोपें बहुत कुछ वैसी ही हैं जिनका उल्लेख भारतीय प्राचीन ग्रंथों में चरिष्णु के नाम से किया गया है। इनसे गोला फैंकने की तकनीक बहुत कुछ भारतीय गोफन जैसी रही होगी।
जब हम इन तोपों को देखने में व्यस्त थे, तभी दुर्ग के बाहर बह रही ट्रेवी नदी का कोई पक्षी उड़कर इसी बरामदे के बाहर आकर बैठ गया। दीपा तुरंत ही उस पक्षी की ओर आकर्षित हुई। वह पक्षी और दीपा दोनों एक दूसरे को काफी देर तक देखते रहे। मानो दोनों के बीच कोई मूक संवाद चल रहा हो। मैंने इस दृश्य को अपने सैलफोन के कैमरे में कैद कर लिया। आज यह रोम यात्रा की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक है।
संग्रहालय देखने के बाद हम दुर्ग की छत पर पहुँचे। यहाँ से पूरा रोम दिखाई देता है। शताब्दियों एवं सहस्राब्दियों के अंतराल में बसा हुआ यह विशाल शहर ऐसा लगता है मानो किसी ने एक विशाल कैनवास पर रंगों से भवनों, सड़कों, नदियों और ऊँचे-ऊँचे गिरजाघरों को आकार दे दिया हो। सेंट पीटर्स स्क्वैयर तथा सेंट पीटर्स बेसिलिका यहाँ से बहुत साफ दिखाई देते हैं।
सेंट पीटर्स बेसिलिका के गुम्बद की लगभग 10-12 अनुकृतियां भी चारों तरफ दिखाई देती हैं मानो किसी ने इस भव्य पैरोनोमा को पूर्णता प्रदान करने के लिए इतने सारे विशाल चर्चों का निर्माण किया हो!
हम बहुत देर तक रोम शहर को देखते रहे। किसी ने सच ही कहा है- ‘रोम वाज नॉट बिल्ट इन ए डे!’ जहाँ तक पर्यटकों को जाने की अनुमति है उसके पास भी एक ऊंची दीवार है जिस पर सेंट एंजिलो मिशेल की मूर्ति लगी हुई है। इसी मूर्ति के कारण इस दुर्ग को अब सेंट एंजिलो कैसल कहा जाता है। कैसल के सामने एक इटैलियन युवती गिटार बजा रही थी और इटैलियन भाषा में कोई गीत गा रही थी।
रोम शहर की सफाई-व्यवस्था
दुर्ग के नीचे बह रही नदी की कलकल ध्वनि को तो यहाँ से नहीं सुना जा सकता किंतु नदी में तैरते रहने वाले सफेद बगुलों जैसे पक्षी पूरे परिवेश को जीवंत बनाए रहते हैं। नदी में तैरते हुए पक्षियों के झुण्ड भी यहाँ से साफ दिखाई देते हैं। इन पक्षियों की उपस्थिति दर्शकों को अचम्भित करती है।
पूरे रोम शहर में एक भी गाय, साण्ड, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, कौआ, बंदर गिलहरी, छिपकली, मक्खी, मच्छर आदि देखने को नहीं मिलता किंतु रोम वासियों ने जैसे इन पक्षियों पर अनुकम्पा करके उन्हें शहर के आकाश में उड़ने की अनुमति दे रखी है। ये पक्षी इस शहर में प्रकृति की मनुष्येतर जैविक उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
कुछ बूढ़ी औरतें और काले रंग के लम्बे ओवरकोट पहने इटेलियन युवतियां तरह-तरह की नस्ल के पालतू कुत्ते लेकर यदा-कदा शहर की सड़कों के किनारे बने फुटपाथों पर चलती हुई दिखाई दे जाती हैं किंतु वे इतने अनुशासित लगते हैं मानो उन पर भी महान् रोम के महान् इतिहास का महान् गौरव हावी हो गया है!
ट्रेवी नदी के पक्षियों और इटैलियन युवतियों के कुत्तों के अतिरिक्त संभवतः और किसी मनुष्येतर प्राणी को शहर में प्रवेश करके मनुष्यों को देखने की अनुमति नहीं है। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रतीत हुआ। पूरा शहर साफ है, गंदगी और दुर्गंध का नामोनिशान नहीं है।
सड़क के किनारे हर 10-20 मीटर की दूरी पर लोहे के स्टैण्डों पर प्लास्टिक के बैग लटके हुए हैं। हर दुकान के आगे भी ये बैग लगे हुए हैं जिनमें कचरा डाला जाता है। लगभग हर आधा किलोमीटर पर प्लास्टिक के बड़े कंटेनर लगे हुए हैं जिनमें बड़ा कचरा डाला जा सकता है।
ट्रेवी फाउण्टेन
सेंट एंजिलो कैसल से निकलकर हम ट्रेवी फाउण्टेन पहुँचे। यहाँ बहुत भीड़ थी, इतनी कि फव्वारे के पास पहुँचने के लिए पैर धरने तक के लिए जगह नहीं थी। इटली की राजधानी रोम एक ऐसा नगर है जिसमें कई जिले हैं। इनमे से एक जिला ट्रेवी कहलाता है।
इस जिले में फोन्टाना डी ट्रेवी नामक फव्वारा स्थित है जो 86 फुट ऊँचा तथा 161 फुट चौड़ा है। यह रोम नगर में बैरोक शैली में निर्मित एकमात्र फव्वारा है तथा संसार के प्रसिद्धतम फव्वारों में से एक है। विभिन्न दशों में बनने वाले अनेक चलचित्रों में इस फव्वारे को दर्शाया गया है। संभवतः यही कारण है कि दुनिया भर से आए पर्यटकों की भीड़ सबसे ज्यादा यहीं पर होती है।
यह फव्वारा उस स्थान पर बना हुआ है जहाँ तीन सड़कें आकर समाप्त होती हैं। इसलिए इसे लैटिन भाषा में ट्रायवे कहा जाता है जो संस्कृत के शब्द त्रि-वाय से साम्य रखता है। इसे ‘एक्वा वर्जिन’ अर्थात् पवित्र जल भी कहा जाता है। इस फव्वारे के लिए जल की आपूर्ति एक प्राचीन काल में निर्मित नहर से होती है जिसका निर्माण रोमन साम्राज्ञी एग्रिप्पा के स्नानघर में पर्वतों के पवित्र जल की आपूर्ति के लिए किया गया था। यह नहर रोम से 13 किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ों से निकाली गई थी।
नहर काफी घूमकर आती है इसलिए इसकी कुल लम्बाई 22 किलोमीटर हो जाती है। जब रानी एग्रिप्पा मर गई तो इस नहर से रोम नगर को जल की आपूर्ति होने लगी। बाद के किसी काल में नहर के ऊपर एक फव्वारा बना दिया गया जिस पर एग्रिप्पा तथा त्रिविया नामक रोमन देवियों की सुंदर एवं विशाल मूर्तियां लगाई गईं। समय के साथ यह फव्वारा बिखरने लगा तथा देवियों की मूर्तियां भी टूट गईं।
ई.1629 में रोम के पोप उरबान (अष्टम्) ने गियान लॉरेंजो बरनिनी नामक एक शिल्पी से एक नया फव्वारा डिजाइन करने को कहा। बरनिनी ने नया डिजाइन तो तैयार कर दिया किंतु उसके कार्यान्वित होने से पहले ही पोप उरबान (अष्टम्) की मृत्यु हो गई। फिर भी बरनिनी ने इस फव्वारे में कुछ परिवर्तन किए जो आज भी मौजूद हैं। बाद में पियात्रो दा कोरटाना ने एक प्रभावशाली मॉडल बनाया किंतु फव्वारे का पुननिर्माण नहीं किया जा सका।
ई.1730 में पोप क्लेमेंट बारहवें ने इस फव्वारे का नया डिजाइन तैयार करने के लिए आर्चीटैक्चर्स की एक प्रतियोगिता आयोजित करवाई जिसमें एलेसैण्ड्रो गैलिली ने निकोला साल्वी के डिजाइन को परास्त कर दिया किंतु इससे रोम में विद्रोह हो गया और अंत में फव्वारे के पुनर्निर्माण का काम निकोला सालवी को दिया गया।
ई.1732 में फव्वारे के पुनर्निर्माण का काम आरम्भ हुआ। ई.1751 में सालवी की मृत्यु हो गई तथा उसका काम अधूरा रह गया किंतु अपनी मृत्यु से पहले उसने अपने द्वारा बनाए गए डिजाइन को फव्वारे के पीछे एक फूलदान में छिपा दिया ताकि उस डिजाइन को सालवी के शत्रु नष्ट न कर दें। इस फूलदान को ‘एसो दी कोप्पे’ कहा जाता है जिसका अंग्रेजी में उच्चारण एस ऑफ कप्स किया जाता है।
फव्वारे की सजावट के लिए चार शिल्पी पिएत्रो ब्राक्की, फिलिप्पो डेल्ला वाल्ले, जियोवान्नी ग्रोस्सी तथा एण्ड्रिया बरगोण्डी की सेवाएं प्राप्त की गईं। ज्यूसेप्पे पानिनी को आर्चीटैक्चर नियुक्त किया गया। ई.1762 में पानिनी ने ट्रेवी फाउण्टेन को अंतिम रूप दिया। इस नए डिजाइन में, पुराने फव्वारे में लगी एग्रिप्पा तथा त्रिविया नामक रोमन देवियों की पुरानी मूर्तियों को हटा दिया गया तथा उनके स्थान पर समुद्रों एवं नदियों के देवता ओसेनस तथा समृद्धि एवं आरोग्य की देवियों की मूर्तियां लगाई गईं।
पोप क्लेमेंट अष्टम् ने 22 मई 1762 को इस फव्वारे का उद्घाटन किया। इस फव्वारे के निर्माण में ट्रावरटाइन नामक पत्थर का उपयोग किया गया है जो रोम से 35 किलोमीटर पूर्व में स्थित ट्रिवोली से लाया गया है। इसके बाद भी कई बार इस फव्वारे का जीर्णोद्धार किया गया किंतु मूल डिजाइन में परिवर्तन नहीं किया गया। इस फव्वारे में पलाज्जो पोली नामक दीवार नुमा संरचना बनाई गई है जो किसी स्टेज के पीछे लगे पर्दे की तरह दिखाई देती है। इस दीवार में दो मंजिलें बनी हुई प्रतीत होती हैं।
नीचे की मंजिल में तीन बड़े आले हैं जिनमें एक-एक प्रतिमा लगी हुई है। बीच का आला तथा बीच की प्रतिमा सबसे बड़ी है, यह ओसेनस देवता की है तथा इसे मूर्तिकार पिएत्रो ब्राक्की ने बनाया था। ओसेनस एक रथ पर खड़े हैं तथा दो सेवक उस रथ के वेगवान घोड़ों को नियंत्रित कर रहे हैं।
ओसेनस प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मों में समुद्रों एवं नदियों के देवता के रूप में पूजे जाते थे। ओसनेस के पास के एक आले में समृद्धि की देवी है जो अपने कलश से जल गिरा रही है तथा दूसरी तरफ के आले में आरोग्य की देवी है जिसके हाथ में पकड़े हुए प्याले में से एक सांप कुछ पीता हुआ दिखाया गया है।
ऊपर वाली मंजिल के दो आलों में दो अलग-अलग दृश्य उत्कीर्ण हैं जिनमें रानी एग्रिप्पा के स्नानघर के लिए नहर निकालने का आदेश देने एवं नहर के पूरा होने पर रानी के चरणों में सूचना निवेदन करने के दृश्य दर्शाए गए हैं। शेष आले खिड़की के रूप में बनाए गए हैं। दीवार के ऊपर, मध्य भाग में एक मुकुट बनाया गया है जो रोम के अधिकांश भवनों में दिखाई देता है।
पलाज्जो पोली नामक दीवार के चरण भाग में प्राकृतिक चट्टान की आकृति में एक बड़ा प्लेटफार्म बनाया गया है। ओसोनस के रथ के नीचे से पानी बहकर चट्टान पर आता है और झरने की तरह सामने के कुण्डों में गिरता है। पूरा दृश्य कृत्रिम होते हुए भी प्राकृतिक लगता है। पर्यटक इन कुण्डों में दाएं हाथ से सिक्का उछालते हैं। सिक्के को बाएं कंधे के पीछे की ओर उछाला जाता है।
मान्यता है कि इससे उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। प्रतिदिन औसतन 300 यूरो इस फव्वारे में उछाले जाते हैं। वर्ष 2016 में 15 लाख अमरीकी डॉलर अर्थात् 10.35 करोड़ भारतीय रुपए इन कुण्डों में डाले गए। हम प्रातः नौ बजे के घर से निकले थे और इस समय ढाई बजने को आए थे। हम घर के लिए लौट पड़े जो यहाँ से केवल चार-साढ़े चार किलोमीटर ही दूर था।
चिएसा सेंट एग्नेसे इन एगोने
सायं चार बजे हम पिताजी को साथ लेकर पियाजा नोवाना गए। यहाँ का परिवेश आज भी कल की तरह गीत-संगीत, नृत्य, वाइन, पिज्जा, पास्ता, कॉफी से सराबोर है। चौक में बने तीनों फव्वारों को देखते हुए हम एक चर्च गए। चर्च के बाहर पीतल की एक चमचमाती प्लेट लगी है जिस पर रोमन लिपि एवं इटैलियन भाषा में ‘चिएसा सेंट एग्नेसे इन एगोने’ लिखा हुआ है तथा चर्च के नाम के नीचे स्थान का नाम ‘पियाजा नोवाना’ अंकित है।
मैं अपने जीवन में इससे पहले चर्च एवं मस्जिद में एक-दो बार ही गया हूँ जबकि गुरुद्वारों और सूफी दरवेशों की मजारों पर बीसियों बार जाने का अवसर मिला है। निश्चित रूप से हिन्दू धर्म के वैष्णव मंदिरों के बाद, ईसाई धर्म के कैथोलिक चर्च अत्यधिक भव्य एवं आकर्षक होते हैं। यह भी एक भव्य चर्च है जिसके भीतर संसार के कीमती फ्रैस्को बने हुए हैं।
चर्च की चारों दीवारों एवं गुम्बद की भीतरी छत पर इन फ्रैस्को की सहायता से कैथोलिक धर्म की जानकारी देने वाला पैरोरोमा ही बना दिया गया है। पूरे चर्च में कॉलम्स के सहारे-सहारे पैडस्टल खड़े करके उन पर प्राचीन काल के संतों की प्राचीन मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं। बहुत से भित्तिचित्रों एवं मूर्तियों के निकट इंग्लिश, इटैलियन, स्पेनिश एवं फ्रैंच भाषाओं में ईसाई संतों के नाम एवं उनसे सम्बद्ध घटनाएं अंकित की गई हैं।
आज चर्च में कोई म्यूजिकल कंसर्ट होने वाली थी जिसकी तैयारियां चल रही थीं। चर्च के भीतर देश-विदेश से आए सैंकड़ों लोग मौजूद थे किंतु कोई भी पर्यटक न तो बात कर रहा था, न किसी का सैलफोन बज रहा था और न बच्चे इधर-उधर दौड़कर शांति भंग कर रहे थे। यहाँ तक कि पर्यटक चलने में भी इतनी सावधानी बरत रहे थे कि उनके पैरों की आहट भी सुनाई नहीं देती थी।
दुनिया के विभिन्न देशों से आए कुछ लोग लकड़ी की पॉलिशदार बैंचों पर बैठकर प्रार्थना कर रहे थे। चर्च में प्रवेश करते ही एक नोटिस बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है- ‘फोटो खींचना मना है’ किंतु सभी पर्यटक अपने मोबाइल फोन और कैमरों से फोटो एवं वीडियो शूट कर रहे थे। मैंने कुछ देर तक तो नोटिस बोर्ड पर लिखी सूचना का पालन किया और उसके बाद उन सैंकड़ों पर्यटकों की तरह कुछ चित्र तो उतार ही लिए जो बड़ी उत्सुकता से वहाँ अंकित फ्रैस्को को अपने कैमरों में बंद कर रहे थे।
पिताजी ने संगमरमर से बने एक पैनल की ओर मेरा ध्यान खींचा जिसमें किसी सामंत पुत्र के ईसाई होने तथा भिखारी का जीवन जीने की इच्छा प्रकट करने की कहानी अंकित है। इसी पैनल में उस संत की मृत्यु का दृश्य भी अंकित है जिसके निकट तत्कालीन पोप, संत के सामंत पिता और कुछ देवदूत खड़े हुए उसे शांति के साथ शरीर छोड़ते हुए देख रहे हैं।
यहाँ कुछ पैनल प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाकर भी लगाए गए हैं। यहाँ से हमें पिताजी को पैंथियम दिखाने ले जाना था किंतु पिताजी थक चुके थे और उन्होंने घर लौटने की इच्छा व्यक्त की। हम उसी समय बस पकड़कर अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट आए। इसी के साथ रोम में पांचवाँ दिन लगभग पूरा हो गया।
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काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं—
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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...