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वृत्रासुर ने इन्द्र को स्वर्ग से निकाल दिया (19)

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वृत्रासुर - bharatkaitihas.com
वृत्रासुर ने उसी समय स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया तथा देवताओं को मारने लगा। इन्द्र ने ऐरावत पर चढ़कर वृत्रासुर पर आग्नेय-अस्त्रों से प्रहार किया

पिछली कड़ी में हमने वैदिक ब्राह्मण के आधार पर देवराज इन्द्र द्वारा वृत्रासुर के वध की कथा की चर्चा की थी। इस कड़ी में तथा इसके बाद की एक और कड़ी में हम पुराणों में आए हुए संदर्भों के आधार पर इन्द्र द्वारा वृत्रासुर का वध किए जाने की चर्चा करेंगे।

पुराणों में आए संदर्भों के अनुसार एक बार देवराज इंद्र के मन में अभिमान पैदा हो गया जिसके फलस्वरूप उसने देवगुरु बृहस्पति का अपमान कर दिया। उसके आचरण से क्षुब्ध होकर देवगुरु बृहस्पति इंद्रपुरी छोड़कर अपने आश्रम में चले गए। जब इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ तो उसे अत्यंत पश्चताप हुआ।

देवराज इंद्र देवगुरु को मनाने के लिए उनके आश्रम में पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर देवगुरु से कहा- ‘आचार्य। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। उस समय क्रोध में भरकर मैंने आपके लिए जो अनुचित शब्द कह दिए थे, मैं उनके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं। आप देवों के कल्याण के लिए पुनः इंद्रपुरी लौट चलिए।

इंद्र का शेष वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि देवगुरु अदृश्य हो गए। इंद्र निराश होकर इंद्रपुरी लौट गया।

जब दैत्य-गुरु शुक्राचार्य को बृहस्पति के स्वर्ग छोड़कर चले जाने की बात ज्ञात हुई तो उन्होंने दैत्यों से कहा कि यही सही अवसर है जब तुम देवलोक पर अधिकार कर सकते हो। आचार्य बृहस्पति के चले जाने से देवों की शक्ति आधी रह गई है।’

 दैत्यगुरु की बात मानकर दैत्यों ने अमरावती पर आक्रमण कर दिया। देवताओं को स्वर्ग छोड़कर भागना पड़ा। देवराज इन्द्र पितामह ब्रह्मा की शरण में पहुंचा। पुराणों में देवताओं के लोक को देवलोक, अमरावती, स्वर्गपुरी, इन्द्रपुरी, बासवपुर आदि कहा गया है।

ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा- ‘यह तुम्हारे अहंकार के कारण हुआ है। तुम गुरु बृहस्पति के पास जाओ, वे ही तुम्हें दैत्यों पर विजय प्राप्त करने का कोई उपाय बताएंगे।’

इंद्र ने ब्रह्माजी को बताया- ‘देवगुरु बृहस्पति अदृश्य हो गए हैं।’

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इस पर ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा- ‘तुम भू-लोक में स्थित महर्षि त्वष्टा के महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप के पास जाओ और उसे अपना पुरोहित नियुक्त करके शत्रुओं के नाश के लिए यज्ञ करो।’

ब्रह्माजी के आदेश से देवराज इन्द्र महर्षि विश्वरूप के पास पहुंचा। विश्वरूप के तीन मुख थे। पहले मुख से वह सोमरस पीता था। दूसरे मुख से मदिरा पान करता था और तीसरे मुख से अन्न खाता था। इन्द्र ने विश्वरूप से प्रार्थना की कि वह इन्द्र के शत्रु के नाश के लिए पुरोहित बनकर यज्ञ करवाए। विश्वरूप ने देवों के यज्ञ का पुरोहित बनना स्वीकार कर लिया तथा देवराज को नारायण कवच प्रदान करते हुए कहा- ‘यह कवच दैत्यों से युद्ध के समय तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें विजयश्री भी दिलवाएगा।’

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देवराज इन्द्र ने नारायण कवच धारण करके स्वर्ग में रह रहे दैत्यों पर आक्रमण किया। दैत्य पराजित हो गए तथा स्वर्ग छोड़कर भाग गए। एक बार पुनः दैत्यों एवं देवों में भयंकर युद्ध हुआ किंतु इन्द्र के पास नारायण कवच होने के कारण दैत्य इन्द्र को परास्त नहीं कर सके। स्वर्ग पर अधिकार कर लेने के पश्चात् देवराज इन्द्र ने विश्वरूप को पुरोहित बनाकर एक यज्ञ आरम्भ किया ताकि भविष्य में फिर कभी भी दैत्य, देवताओं को परास्त नहीं कर सकें। जब विश्वरूप यज्ञ में आहुतियां देने लगा तो एक दैत्य ब्राह्मण का वेश बनाकर विश्वरूप के पास पहुंचा और उसके कान में कहा- ‘देवताओं की विजय तथा दैत्यों के पराभव के लिए किए जा रहे यज्ञ में पुरोहिती करके तुमने अच्छा काम नहीं किया है क्योंकि तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि तुम स्वयं भी एक दैत्य-माता के पुत्र हो! यदि तुमने यह यज्ञ सम्पन्न करवा दिया तो तुम्हारा मातृकुल सदैव के लिए नष्ट हो जाएगा।’ इस पर विश्वरूप ने आहुतियों में बोले जाने वाले मंत्रों में देवताओं के साथ-साथ दैत्यों की विजय के मंत्र भी पढ़ दिए। इस कारण जब यज्ञ समाप्त हुआ तो देवताओं को उसका कोई भी लाभ नहीं मिला। न दैत्यों की शक्ति में कोई कमी आई। इन्द्र को विश्वरूप द्वारा किए गए कपट की जानकारी हो गई और इन्द्र ने विश्वरूप के तीनों सिर काट दिए।

इन्द्र द्वारा यज्ञस्थल पर ही पुरोहित की हत्या कर दिए जाने की सर्वत्र निंदा होने लगी तथा उसे ब्रह्म-हत्या का दोषी ठहराया गया। जब इंद्र के द्वारा विश्वरूप की हत्या की सूचना विश्वरूप के पिता महर्षि त्वष्टा को मिली तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने इंद्र के नाश के लिए एक यज्ञ किया।

यज्ञ पूर्ण होने पर वृत्रासुर नामक विशालाकाय असुर प्रकट हुआ। उसके एक हाथ में गदा और दूसरे में शंख था। त्वष्टा ने वृत्रासुर से कहा- ‘इन्द्र एवं समस्त देवताओं को नष्ट कर दो।’

वृत्रासुर ने उसी समय स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया तथा देवताओं को मारने लगा। इन्द्र ने ऐरावत पर चढ़कर वृत्रासुर पर आग्नेय-अस्त्रों से प्रहार किया किन्तु वृत्रासुर ने इन्द्र के अस्त्र-शस्त्र छीनकर दूर फेंक दिए और अपना भयंकर मुख खोलकर इन्द्र को खाने के लिए दौड़ा। यह देखकर इन्द्र भयभीत हो गया और स्वर्ग से भाग गया। देवराज इन्द्र पुनः पितामह ब्रह्माजी की शरण में पहुंचा और उन्हें वृत्रासुर के बारे में बताया।

इस पर ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया- ‘वृत्रासुर को मारने के लिए वज्र नामक शस्त्र की आवश्यकता है। यह शस्त्र उस ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति की अस्थियों से बनाया जा सकता है जिसने दीर्घ काल तक बिना किसी प्राप्ति की अभिलाषा के भगवान की तपस्या की हो।

अतः तुम्हें धरती पर जाकर महर्षि दधीचि से उनकी अस्थियां प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि इस सम्पूर्ण सृष्टि में केवल वही ऐसे ब्रह्मज्ञानी हैं जो बिना किसी अभिलाषा के ईश्वर का तप कर रहे हैं तथा वे सहर्ष अपनी अस्थियां जगत के कल्याण के लिए प्रदान कर देंगे।’

ब्रह्माजी की बात सुनकर देवराज इन्द्र की चिंता और भी बढ़ गई क्योंकि अपने अहंकार के कारण इन्द्र ने एक बार महर्षि दधीचि का घनघोर अपमान किया था। इसलिए इन्द्र ने पितामह ब्रह्मा से पूछा- ‘क्या वृत्रासुर को मारने का और कोई उपाय नहीं है?

ब्रह्माजी ने बताया- ‘वृत्रासुर को मारने के लिए केवल महर्षि दधीचि की अस्थियों से ही वज्र बनाया जाना संभव है।’

यह सुनकर देवराज इन्द्र फिर से चिंता में डूब गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दधीचि ऋषि ने वृत्रासुर के नाश के लिए अपनी हड्डियां दे दीं (20)

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दधीचि ऋषि - bharatkaitihas.com
दधीचि ऋषि ने वृत्रासुर के नाश के लिए अपनी हड्डियां दे दीं

इस धारावाहिक की पिछली कड़ी में हमने त्वष्टा के यज्ञ से उत्पन्न वृत्रासुर की चर्चा की थी जिसने त्वष्टा के कहने पर इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। ब्रह्माजी ने इन्द्र को सलाह दी कि वृत्रासुर को मारने हेतु वज्र बनाने के लिए वह दधीचि ऋषि की अस्थियों को प्राप्त करे।

वैदिक ग्रंथों में जिन ऋषियों का उल्लेख हुआ है, उनमें दधीचि ऋषि का नाम भी बहुत आदर से लिया जाता है। दधीचि वैदिक युग के ऋषि थे। विभिन्न ग्रंथों में इनके जन्म के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ मिलती हैं।

यास्क द्वारा लिखित निरुक्त के अनुसार दधीचि की माता का नाम चित्ति और पिता का नाम अथर्वा था। माता चित्ति से ही इन्हें दधीचि नाम मिला। कुछ पुराणों के अनुसार ऋषि दधीचि कर्दम ऋषि की कन्या शांति एवं अथर्वा के पुत्र थे जबकि कुछ पुराणों में दधीचि को शुक्राचार्य का पुत्र तथा भगवानन शिव का भक्त बताया गया है।

महर्षि दधीचि की तपस्या के सम्बन्ध में भी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। पुराणों में आए प्रसंगों के अनुसार दधीचि का आश्रम नैमिशायरण्य में स्थित था। कुछ लोग आधुनिक बिहार के सिवान जिले में स्थित मिश्रिख तीर्थ को महर्षि दधीचि की तपोभूमि मानते हैं। कुछ प्राचीन ग्रंथों में इस स्थान को दध्यंच कहा गया है।

दधीचि की पत्नी का नाम गभस्तिनी था। महर्षि दधीचि वेदों के ज्ञाता और अत्यंत दयालु स्वभाव के ऋषि थे। उनके व्यवहार से उस वन के पशु-पक्षी तक संतुष्ट रहते थे, जहाँ उनका आश्रम था। कुछ ग्रंथों के अनुसार दधीचि का आश्रम गंगा के तट पर स्थित था। महर्षि दधीचि के आश्रम में जो भी अतिथि आता, महर्षि तथा उनकी पत्नी उसकी श्रद्धापूर्वक सेवा करते थे।

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महर्षि दधीचि इस ब्रह्माण्ड में अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें ब्रह्मविद्या का ज्ञान था। इसलिए देवराज इन्द्र एक बार महर्षि दधीचि से ब्रह्मविद्या प्राप्त करने आया। महर्षि ने देखा कि इन्द्र अहंकार से भरा हुआ है तथा ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के उपयुक्त नहीं है। इसलिए महर्षि ने इन्द्र को ब्रह्मविद्या देने से मना कर दिया।

अहंकारी इन्द्र ने महर्षि की बात समझने के स्थान पर इसे अपना घोर अपमान माना तथा ऋषि से कहा- ‘आप मुझे यह विद्या नहीं दे रहे हैं तो न सही, किंतु किसी और व्यक्ति को भी मत देना। यदि आपने किसी और व्यक्ति को यह विद्या सिखाई तो मैं आपका सिर आपके धड़ से अलग कर दूंगा।’

इस पर महर्षि ने कहा- ‘यदि कोई योग्य व्यक्ति ब्रह्मविद्या लेने के लिए मेरे पास आएगा तो मैं यह विद्या उसे अवश्य ही प्रदान करूंगा।’

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कुछ समय पश्चात् इन्द्रलोक में निवास करने वाले अश्विनी कुमारों ने महर्षि दधीचि के पास पहुंचकर ब्रह्मविद्या देने की याचना की। ऋषि दधीचि ने विनम्रता से युक्त अश्विनी कुमारों को ब्रह्मविद्या के उपयुक्त पात्र पाया। इसलिए महर्षि दधीचि ने अश्विनी कुमारों को ब्रह्मविद्या देने का निर्णय लिया तथा अश्विनी कुमारों को इन्द्र द्वारा दी गई धमकी के बारे में भी बता दिया। इस पर अश्विनी कुमारों ने एक योजना बनाई तथा महर्षि दधीचि का सिर उनके धड़ से अलग करके उसके स्थान पर अश्व का सिर लगा दिया। महर्षि ने अश्विनी कुमारों को ब्रह्मविद्या प्रदान कर दी। जब इन्द्र को इस बात की जानकारी हुई तो वह धरती पर आया तथा उसने महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस पर अश्विनी कुमारों ने महर्षि का वास्तविक सिर दधीचि के धड़ पर लगा दिया। इससे कुपित होकर इन्द्र ने अश्विनी कुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया किंतु ब्रह्मज्ञानी हो जाने के कारण अश्विनी कुमारों को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ा। इसलिए जब ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा कि वृत्रासुर को मारने हेतु वज्र का निर्माण करने के लिए वह दधीचि ऋषि की अस्थियां प्राप्त करे तो इन्द्र दधीचि के पास नहीं जा सका।

उधर देवलोक पर वृत्रासुर के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे थे। इसलिए देवराज इन्द्र को इन्द्रलोक की रक्षा करने एवं देवताओं की भलाई के लिए देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में जाना पड़ा। ब्रह्मज्ञानी महर्षि दधीचि को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि एक दिन इसी इन्द्र ने उनका घनघोर अपमान किया था। इसलिए महर्षि ने इन्द्र को पूरा सम्मान दिया तथा उससे पूछा- ‘मैं देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हूँ?’

इन्द्र आदि देवताओं ने ऋषि को ब्रह्माजी द्वारा कही गई बात बताई तथा महर्षि की अस्थियों का दान माँगा। महर्षि दधीचि ने जगत् के कल्याण के लिए तुरंत अपनी अस्थियों का दान देना स्वीकार कर लिया। उन्होंने समाधि लगाई और अपनी देह त्याग दी।

उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष यह समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर से माँस हटाकर अस्थियां कौन निकाले? कोई भी देवता इस कार्य को करने में सक्षम नहीं था। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपने योगबल से महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब वहाँ केवल अस्थियों का पिंजर रह गया।

जब महर्षि दधीचि की पत्नी गभस्तिनी आश्रम में आई तो अपने पति की मृत-देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने का हठ करने लगी। देवताओं ने ऋषि-पत्नी को बहुत समझाया कि वह सती नहीं हो। ऋषि-पत्नी उस समय गर्भवती थी। देवताओं ने उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी किंतु गभस्तिनी ने जीवित रहना स्वीकार नहीं किया तथा अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर सती हो गई।

देवताओं ने गभस्तिनी के गर्भ को बचाने के लिए एक पीपल वृक्ष को उसका लालन-पालन करने का दायित्व सौंपा। कुछ समय बाद वह गर्भ शिशु बन गया। पीपल द्वारा पालन-पोषण किए जाने के कारण उस बालक का नाम पिप्पलाद रखा गया। पिप्पलाद भी अपने पिता की तरह महाज्ञानी हुए।

दधीचि के वंशज आज भी धरती पर मौजूद हैं तथा दाधीच कहलाते हैं। मानव कल्याण के लिए अपनी जीवित देह का दान करने वाले एकमात्र महर्षि दधीचि ही हुए हैं, उनके जैसा लोक-कल्याणकारी व्यक्ति इस धरती पर और कोई दूसरा नहीं हुआ।

चौदह मनुओं की कथा (21)

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चौदह मनुओं की कथा - bharatkaitihas.com
चौदह मनुओं की कथा

चौदह मनुओं की कथा भारतीय पुराण साहित्य की विलक्षण संकल्पना है। यह कथा सृष्टि के नवीन रूप धारण करके बार-बार संभव होने के प्रति आश्वस्त करती है। अर्थात् सृष्टि कभी पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होती। पहली सृष्टि में अर्जित ज्ञान अलगी सृष्टि में बीज रूप में स्थानांतरित होता है।

हिन्दू मानते हैं कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में मानव जाति का प्राचीनतम इतिहास दिया गया है तथा इन ग्रंथों में दी गई अधिकांश कथाएं सत्य हैं। इस मत को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि भारतीय धर्मग्रंथों में दिए आख्यानों में वर्णित भौगोलिक घटनाओं की पुष्टि यहूदी एवं ईसाई धर्मग्रंथों में वर्णित भौगोलिक घटनाओं से होती है।

यह सही है कि प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रंथों में दी गई कथाओं में मानव जाति का प्राचीन इतिहास ढूंढा जा सकता है किंतु इस इतिहास के साथ एक कठिनाई यह है कि यह इतिहास कम से कम तीन सृष्टियों का इतिहास है।

पहली सृष्टि देवताओं की है, दूसरी सृष्टि स्वायंभू अथवा स्वायंभुव मनु की है तथा तीसरी सृष्टि वैवस्वत मनु की है। देवताओं की सृष्टि की कुछ स्मतियां स्वायंभू मनु की सृष्टि में प्रचलित थीं वहीं स्मृतियां वर्तमान वैवस्वत मनु की सृष्टि में भी चली आईं। इनके साथ ही बहुत सी स्मृतियां और कथाएं जो स्वायंभू मनु की सृष्टि से सम्बन्धित थीं, वे भी भी वैवस्वत मनु की सृष्टि में चली आईं।

ये तीनों सृष्टियां एक के बाद एक करके अस्तित्व में आई थीं किंतु इनकी स्मृतियां एवं कथाएं आपस में इतनी घुल-मिल गई हैं कि इन्हें अलग किया जाना असम्भव प्रायः हो गया है।

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कुछ विद्वानों का विचार है कि देव-सृष्टि तथा मानव सृष्टियों से अलग भी कुछ अलौकिक सृष्टियां हैं, उनकी कथाएं भी धरती के मानवों की कहानियों के साथ मिल गई हैं। इन्द्र, अग्नि, बृहस्पति, वरुण, मित्रावरुण सहित अन्य देवतागण एवं अप्सराएं देवलोक वाली सृष्टि का हिस्सा हैं जबकि सृष्टि-कर्त्ता ब्रह्मा, पालनकर्त्ता भगवान विष्णु, सृष्टि हर्त्ता भगवान शिव, अन्नपूर्णा भगवती दुर्गा, बुद्धि के देवता गणेश देवलोक से भी अलग हैं और अलौकिक हैं। ये अमरावती में निवास नहीं करते हैं अर्थात् ये पांचों (विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश एवं ब्रह्मा) स्वर्ग के देवी-देवता नहीं हैं। इस कारण इनकी कथाओं का सम्बन्ध देवलोक अथवा स्वर्गलोक वाली सृष्टि से नहीं है।

मधु-कैटभ, भस्मासुर, त्वष्टा, विश्वरूप तथा वृत्रासुर, हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष आदि असुरों के विनाश की कथाएं पाठक के मन में भ्रम उत्पन्न करती हैं कि ये कौनसे लोक की घटनाएं हैं। वस्तुतः ये पात्र विनाशकारी प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं तथा प्राकृतिक घटनाओं के मानवीकरण की उपज हैं। जबकि दैत्य गुरु-शुक्राचार्य, राजा बली, प्रहलाद आदि दैत्यगण देव संस्कृति के समानांतर चल रही दैत्य संस्कृति के पात्र हैं।

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देवलोक एवं दैत्यलोक इसी धरती पर ही स्थित रहे होंगे। देवलोक पहाड़ों पर स्थित होना अनुमानित है, मनुष्य लोक धरती पर था एवं दैत्यलोक समुद्र में स्थित छोटे-छोटे द्वीपों को कहते थे। हिन्दू धर्म-ग्रंथों की कथाओं के सम्बन्ध में असमंजस का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमारे लाखों प्राचीन ग्रंथ कई हजार वर्षों की अवधि में शकों, कुषाणों, हूणों, तुर्कों, मंगोलों एवं मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट कर दिए गए। ग्रंथों के विनष्टीकरण की प्रक्रिया में जो थोड़ी-बहुत कमी शेष रह गई थी, वह अंग्रेजों ने पूरी कर दी। बहुत से अंग्रेज शासक एवं लेखक प्राचीन भारतीय ग्रंथों, शिलालेखों, मूर्तियों एवं सिक्कों को पानी के जहाजों में भर-भर कर लंदन ले गए। इनमें से बहुत सी सामग्री आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गई है किंतु इन तक पहुंच पाना अत्यंत ही कठिन है। विपुल प्राचीन ग्रंथों के नष्ट हो जाने अथवा हम से दूर चले जाने के कारण हमारे प्राचीनतम इतिहास की कड़ियां बीच-बीच में से टूट गई हैं। इस कारण जब हम वेदों, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में आई कथाओं एवं संदर्भों के आधार पर इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं तो वह इतना असंगत एवं असम्बद्ध हो जाता है कि दूसरे धर्मों के लोग हमें ढोंगी एवं मिथ्या कहकर हमारा उपहास उड़ाने लगते हैं।

उदाहरण के लिए हम ‘मनु’ पर विचार करते हैं जिसे मानव सृष्टि का प्रथम पुरुष माना जाता है। विभिन्न भाषाओं एवं धर्मों में आए मनुष्य-वाची शब्द मैन, मान, मन, मनुज तथा मानव; ‘मनु’ शब्द से बने हैं किंतु हिन्दू धर्म-ग्रंथों में वर्णित मनु कोई एक पुरुष नहीं है। मनु कई हैं तथा समय के साथ उनकी संख्या में वृद्धि होती रही है। महाभारत में 8 मनुओं का उल्लेख है। श्वेतवराह-कल्प में 14 मनुओं का उल्लेख है। जैन ग्रन्थों में 14 कुलकरों का वर्णन है। 

हिन्दू धर्म-ग्रंथों में ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहा गया है। प्रत्येक कल्प के बाद ब्रह्मा की रात्रि आती है। अर्थात् इस समय सृष्टि प्रलय चक्र में चली जाती है। एक कल्प में 14 मनु होते हैं तथा प्रत्युक मनु के काल को मन्वन्तर कहते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर का एक मनु होता है। जब सृष्टि एक मन्वन्तर से दूसरे मन्वन्तर में जाती है तब सृष्टि का नाश तो नहीं होता किंतु उसका नवीनीकरण होता है। सृष्टि के नवीनीकरण की यह भूमिका एक मनु को निभानी पड़ती है।

हिन्दू धर्म के अनुसार वर्तमान में हम वराह-कल्प में रहते हैं। इस कल्प के छः मनु बीत चुके हैं जिनके नाम इस प्रकार से हैं- स्वायंभू मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तापस मनु, रैवत मनु और चाक्षुषी मनु। वर्तमान समय सातवें मनु अर्थात् वैवस्वत मनु का है जिसे श्राद्धदेव मनु भी कहते हैं।

जब वैवस्वत मनु का मन्वन्तर समाप्त हो जाएगा तब सात मनु और होंगे जिनके नाम सावर्णि-मनु, दक्ष-सावर्णि-मनु, ब्रह्म-सावर्णि-मनु, धर्म-सावर्णि-मनु, रुद्र-सावर्णि-मनु, देव-सावर्णि-मनु या रौच्य-मनु और इन्द्र-सावर्णि-मनु या भौत-मनु होंगे।

वराह-कल्प के प्रथम मनु का नाम स्वायंभू-मनु था, जिनके साथ मिलकर शतरूपा नामक स्त्री ने प्रथम मानव सृष्टि उत्पन्न की। स्वायंभू-मनु एवं शतरूपा स्वयं धरती पर उत्पन्न हुए अर्थात् उनका कोई माता या पिता नहीं था। इसी मनु की सन्तानें मानव अथवा मनुष्य कहलाती हैं। स्वायंभू-मनु को आदि-मनु भी कहा जाता है। चौदह मनुओं की कथा हमें बताती है कि स्वायंभू-मनु के कुल में स्वायंभू सहित क्रमशः चौदह मनु होने हैं जिनमें से अब तक सात हो चुके हैं।

कुछ ग्रंथों के अनुसार इस समय वैवस्वत-मनु तथा सावर्णि-मनु की अन्तर्दशा चल रही है। सावर्णि-मनु का आविर्भाव विक्रम सम्वत प्रारम्भ होने से 5630 वर्ष पूर्व हुआ था।

जब हम पौराणिक ग्रंथों से हिन्दुओं का प्राचीन इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं तो प्रायः स्वायंभू-मनु से लेकर वैवस्वत मनु तक के मन्वन्तरों में घटी घटनाओं को आपस में मिला देते हैं। जिस प्रकार हर मन्वन्तर का मनु अलग होता है, उसी प्रकार हर मन्वन्तर के सप्तऋषि भी अलग होते हैं।

कुछ विद्वानों का मानना है कि हर मनवन्तर में लगभग एक जैसी घटनाएं घटित होती हैं, इस कारण घटनाओं को अलग करके पहचान पाना कठिन हो जाता है कि कौनसी घटना कौनसे मन्वंतर से चली आई है! इस प्रकार चौदह मनुओं की कथा में अलग-अलग सृष्टियों की स्मृतियां संचित हैं। उन्हें अलग करके पहचानना संभव नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वायंभू मनु तथा उनके वंशजों की कथा (22)

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स्वायंभू मनु - bharatkaitihas.com
स्वायंभू मनु तथा उनके वंशजों की कथा

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि वराह कल्प के प्रथम मनु का नाम स्वायंभू मनु था, जिनके साथ मिलकर शतरूपा नामक स्त्री ने प्रथम मानव सृष्टि उत्पन्न की। स्वायंभू मनु एवं शतरूपा स्वयं धरती पर उत्पन्न हुए अर्थात् उनका कोई माता या पिता नहीं था। इन्हीं मनु की सन्तानें मानव अथवा मनुष्य कहलाती हैं। स्वायंभू मनु को आदि मनु भी कहा जाता है। स्वायंभुव मनु के कुल में स्वायंभुव सहित क्रमशः 14 मनु हुए।

इस कड़ी में हम स्वायंभुव मनु पर चर्चा करेंगे। बहुत से विद्वानों को मानना है कि मनु शब्द की उत्पत्ति मन से हुई है, वे प्राणी जिनके पास मन है, वे मनु, मनुज, मनुष्य, मान एवं मैन आदि कहलाते हैं। ऋग्वेद में मनु का उल्लेख एक बार हुआ है, वहाँ उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा न मानकर गुणवाचक संज्ञा माना गया है।

पुराणों ने ‘मन’ की शक्ति से संचालित होने वाले प्राणियों के आदि पुरुष की मनु के रूप में कल्पना की तथा मनु की संतानों को मनुष्य कहा। पुराणों ने ही ऋग्वेद में गुणवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त ‘मनु’ को मानव घोषित किया।

हरिवंश पुराण के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा ने अपनी देह क दो भाग करके एक भाग से मनु नामक पुरुष तथा दूसरे भाग से शतरूपा नामक स्त्री का निर्माण किया। इस प्रकार ब्रह्मा ने ही अपने शरीर के कुछ अंश से निर्मित अयोनिजा शतरूपा को उत्पन्न किया। शतरूपा ने दस हजार वर्ष तक तप करके स्वायंभू मनु को पति के रूप में प्राप्त किया।

विभिन्न पुराणों में आई कथाओं के अनुसार स्वायंभू-मनु सहित प्रत्येक मनु के काल खण्ड को एक मन्वन्तर कहा जाता है। प्रत्येक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग होते हैं तथा प्रत्येक चर्तुयुग में चार युग होते हैं जिन्हें सत्युग, द्वापर, त्रेता और कलियुग कहा जाता है।

शतरूपा संसार की प्रथम स्त्री थी, ऐसी हिंदू मान्यता है। ब्रह्मांड पुराण के अनुसार शतरूपा का जन्म ब्रह्मा के वामांग से हुआ था तथा वह स्वायंभू-मनु की पत्नी थी। सुखसागर के अनुसार सृष्टि की वृद्धि के लिए ब्रह्माजी ने अपने शरीर को दो भागों में बाँट लिया जिनके नाम ‘का’ और ‘या’ अर्थात् ‘काया’ हुए। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम स्वायंभू-मनु और स्त्री का नाम शतरूपा था।

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स्वायंभू-मनु एवं शतरूपा के सात पुत्र तथा तीन पुत्रियां हुईं जिनमें से दो पुत्रों के नाम प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और तीन कन्याओं के नाम आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। हिंदू पुराणों के अनुसार इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के समस्त मानवों की उत्पत्ति हुई।

मत्स्य पुराण में ब्रह्मा के शरीर के बाएं भाग से उत्पन्न स्त्री का नाम अंगजा, शतरूपा तथा सरस्वती बताया गया है। मत्स्य पुराण में लिखा है कि ब्रह्मा से शतरूपा के स्वायंभू-मनु तथा मरीचि आदि सात पुत्र हुए। हरिहर पुराण के अनुसार शतरूपा ने घोर तपस्या करके स्वायँभुव-मनु को पति रूप में प्राप्त किया और इनसे ‘वीर’ नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

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मार्कण्डेय पुराण में शतरूपा के दो पुत्रों प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और ऋद्धि तथा प्रसूति नामक दो कन्याओं का उल्लेख हुआ है। कहीं-कहीं तीसरी कन्या देवहूति का नाम भी मिलता है। शिव पुराण तथा वायु पुराण में दो कन्याओं प्रसूति एवं आकूति का नाम है। वायु पुराण के अनुसार ब्रह्मा के शरीर से दो अंश प्रकट हुए जिनमें से एक से मनु तथा दूसरे से शतरूपा उत्पन्न हुई। देवी भागवत पुराण में शतरूपा की कथा कुछ अलग दी गई है। कुछ पुराणों के अनुसार स्वायंभू मनु एवं शतरूपा की पुत्री आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह कर्दम प्रजापति के साथ हुआ। सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि इसी देवहूति की संतान बताए गए हैं। स्वायंभू-मनु के दो पुत्रों प्रियव्रत और उत्तानपाद में से बड़े पुत्र उत्तानपाद की दो पत्नियां थीं- सुनीति और सुरुचि। स्वायंभू-मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिससे दस पुत्र हुए। स्वायम्भू-मनु के काल में मरीचि, अंगिरस, अत्रि, पुलह, कृतु, पुलस्त्य और वशिष्ठ नामक सप्तऋषि हुए। राजा मनु एवं इन ऋषियों ने प्रजा को सभ्य, सुखी और सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया।

जब महाराज मनु को प्रजा का पालन करते हुए मोक्ष की अभिलाषा हुई तो वे संपूर्ण राजपाट अपने बड़े पुत्र उत्तानपाद को सौंपकर रानी शतरूपा के साथ नैमिषारण्य तीर्थ चले गए। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी मनु एवं शतरूपा तथा उनके पुत्र उत्तानपाद का उल्लेख इस प्रकार किया है-

स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।

नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू।।

राजा उत्तानपाद की बड़ी रानी सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था और छोटी रानी सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था। राजा उत्तानपाद अपनी छोटी रानी सुरुचि पर अधिक आसक्त थे। इस कारण वे सुरुचि के पुत्र को अधिक प्रेम करते थे। जब बालक ध्रुव पाँच वर्ष के हुए तब एक बार महाराज उत्तनापाद सुरुचि के साथ सिंहासन पर बैठे हुए थे और सुरुचि का पुत्र उत्तम उनकी गोद में खेल रहा था।

इसी समय सुनीति का पुत्र ध्रुव भी वहाँ आया और अपने पिता की गोद में बैठने का हठ करने लगा। राजा ने ध्रुव को भी गोद में बैठा लिया किंतु विमाता सुरुचि ने धु्रव को राजा उत्तानपाद की गोद से यह कहकर उतार दिया कि- ‘यदि तुम्हें अपने पिता की गोद में बैठना था तो तुम्हें मेरी कोख से जन्म लेना चाहिए था!’

इस पर बालक ध्रुव रोता हुआ अपनी माता के पास गया। जब माता ने ध्रुव से रोने का कारण पूछा तो बालक ध्रुव ने सारी बात अपनी माता को बताई तथा अपने माता से पूछा- ‘मैं अपने पिता की गोद में क्यों नहीं बैठ सकता?’

इस पर रानी सुनीति ने कहा- ‘तुम्हारे भाई उत्तम ने अवश्य ही पिछले जन्म में उत्तम कर्म किए हैं, इसलिए वह अपने पिता की गोद में बैठा है। तुम भी भगवान की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न करो। वे सबके पिता हैं, वे अवश्य ही तुम्हें अपनी गोद में बैठाएंगे।’

माता सुनीति की बात सुनकर बालक ध्रुव के पूर्व-संस्कार जागृत हो गए और वे भगवान की तपस्या करने वन जाने को उद्धत हुए। इस पर माता सुनीति ने कहा- ‘अभी तुम्हारी आयु वन जाने की नहीं है। तुम यहीं रहकर भगवान की पूजा और दान-पुण्य करो।’

बालक ध्रुव ने भगवान को प्रसन्न करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय कर लिया था। इसलिए ध्रुव ने कहा- ‘माता! आपका कहना सत्य है किंतु आज से मेरे माता-पिता भगवान् विष्णु हुए।’

जब ध्रुव वन में जाकर घनघोर तपस्या करने लगे तो देवर्षि नारद ने उनके समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे राजा उत्तानपाद से कहकर ध्रुव को आधा राज्य दिलवा सकते हैं। इस पर ध्रुव ने नारदजी का प्रस्ताव मानने से मना कर दिया। इस पर देवर्षि नारद ने ध्रुव को ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करने का उपदेश दिया।

जब राजा उत्तानपाद को अपने पुत्र के वन में जाकर तप करने की सूचना मिली तो राजा बहुत लज्जित हुआ और राजा ने ध्रुव से पुनः राजमहल में लौटने का आग्रह किया किंतु ध्रुव अपने संकल्प पर अडिग रहे। इस पर देवराज इन्द्र ने धु्रव की तपस्या भंग करने के उपाय किए परन्तु बालक ध्रुव अडिग होकर तपस्या करते रहे।

अंत में भगवान श्रीहरि विष्णु, भक्तराज ध्रुव के समक्ष प्रकट हुए। श्रीहरि ने ध्रुव से कहा- ‘मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक तुम्हें मेरे भक्त के रूप में आदर दिया जाएगा। अब तुम घर जाओ।’

श्रीहरि विष्णु के आदेश से भक्त ध्रुव फिर से अपने पिता के राज्य में आ गए। राजा उत्तानपाद ने ध्रुव को अपना सम्पूर्ण राज्य सौंप दिया और स्वयं वन में तपस्या करने चले गए।

श्रीहरि की कृपा से वर्तमान कल्प में स्वायंभू-मनु के मन्वन्तर सहित कुल छः मन्वन्तर बीत चुके हैं तथा सातवें मन्वनतर का भी पर्याप्त समय बीत चुका है किंतु भक्तराज ध्रुव को आज भी उसी तरह स्मरण किया जाता है, जिस तरह वैवस्वत मनु के मन्वन्तर की सृष्टि के अन्य बड़े भक्तों को स्मरण किया जाता है। स्वायंभू-मनु के वंशजों में स्वायंभू-मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को भी बहुत आदर से याद किया जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अश्वत्थामा के आँसू

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अश्वत्थामा के आँसू

अश्वत्थामा के आँसू एक हास्य व्यंग्य नाटिका है जिसे देश के कई हिस्सों में मंचित किया गया है। इस नाटिका के माध्यम से नाटककर डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार पर गहरी चोट की है।

भूमिका

महाभारत का युद्ध हुए 5300 वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत हो चुका है किंतु आज भी महाभारत की कथा का रोमांच भारत की जनता के सिर चढ़कर बोलता है। महाभारत के पात्रों के स्वभाव, चरित्र एवं कृत्य आज भी मानव सभ्यता में उसी प्रकार पाये जाते हैं, जिस प्रकार आज से 5300 वर्ष पहले थे।

यही कारण है कि आधुनिक काल में भी महाभारत के पात्रों को लेकर विविध प्रकार के साहित्य का सृजन होता रहा है जिसमें कविता, गीत, खण्ड काव्य, कहानी, उपन्यास एवं नाटक आदि प्रमुख हैं।

अश्वत्थामा के आँसू हास्य-व्यंग्य नाटिका में महाभारत के पात्रों को आधार बनाकर आज के भारत में मची विद्रूपताओं का चित्रण किया गया है। नाटिका के संवादों को लिखते समय इस बात को ध्यान रखा गया है कि चुटीले संवाद पाठक को बांधे रखें तथा महाभारत के पात्रों का मूल चरित्र एवं स्वभाव अक्षुण्ण रहे।

धृतराष्ट्र एवं गांधारी के संवादों में छलकता पुत्र प्रेम महाभारत की मूल कथा को आगे बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है। उसकी गति भूतकाल तथा वर्तमान काल दोनों ओर है। इसी प्रकार शकुनि, शिशुपाल, धृतराष्ट्र आदि के संवाद इस ओर संकेत करते हैं कि बुराई कभी अपनी गलती स्वीकार नहीं करती। अश्वत्थामा मानव मन की ऐसी अवस्था का प्रतीक है जो जीतने की जिद में नीचे से नीचे गिरता चला जाता है।

द्रौपदी यद्यपि इस नाटिका की पात्र नहीं है किंतु नाटक का बहुत बड़ा भाग उसकी महाभारत कालीन पृष्ठभूमि के साथ-साथ आज की निरीह जनता तथा भारतीय नारी दोनों की स्थिति का चित्रण करता हुआ प्रतीत होता है।

आशा है अश्वत्थामा के आँसू नाटिका पाठकों को पसंद आयेगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पात्र परिचय

संजय :   महाभारत का पात्र जिसने धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध का विवरण सुनाया था। इस नाटक का सूत्रधार भी यही है।

विदुर :   धृतराष्ट्र के मंत्री।

दुर्योधन : धृतराष्ट्र एवं गांधारी का पुत्र, कुछ पात्र इसे सुयोधन कहते हैं।

दुःशासन : धृतराष्ट्र एवं गांधारी का दूसरा पुत्र, कुछ पात्र इसे सुशासन कहते हैं।

शकुनि : गांधार नरेश, गांधारी का भाई, लंगड़ा कर चलने वाला पात्र।

शिशुपाल : चेदिराज, श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र।

कर्ण :     भीष्म पितामह इसे सूतपुत्र कहते हैं। दुर्योधन इसे अंगराज कहता है।

अश्वत्थामा : द्रोणाचार्य का पुत्र, माथे से रक्त बहाने वाला पात्र। माना जाता है कि वह अब तक धरती पर है।

युधिष्ठिर :  ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र।

धृतराष्ट्र :  नेत्रहीन, कुरुवंशी राजा।

गांधारी : धृतराष्ट्र की पत्नी, आँखों पर पट्टी बांध कर रहती है।

श्रीकृष्ण : माथे पर मोर मुकुट, गले में वैजयंती माला, एक हाथ में चक्र और दूसरे हाथ में बांसुरी है। कुछ पात्र इन्हें देवकीनंदन कहकर संबोधित करते हैं।

भीष्म :    कुछ पात्र इन्हें गंगापुत्र तथा शांतनुपुत्र कहते हैं।

नारद :   एक हाथ में वीणा तथा दूसरे हाथ में खड़ताल लिये हैं।

मंच पर प्रकाश होता है। महाभारत कालीन राजदरबार का दृश्य दिखायी देता है। चारों ओर खूब अच्छी सजावट है जो स्वर्ग की असीम शांति और समृद्धि की परिचायक है। मंच के मध्य में एक बड़ा सिंहासन है जिसके दोनों ओर महाभारत कालीन आकृतियों के आसन रखे हैं। अभी समस्त आसन रिक्त हैं। दरबार में प्रवेश के लिये मंच के पार्श्व में तोरणद्वार बना हुआ है। दूसरी तरफ नेपथ्य से आने के लिये रास्ता है। पार्श्व वाले तोरणद्वार से निकलकर संजय मंच पर आता है तथा दर्शकों के ठीक सामने आकर खड़ा हो जाता है।

संजय : महाभारत का युद्ध समाप्त हुए आज पाँच हजार एक सौ वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच महाभारत के कई पात्र नर्क में अपनी अवधि बिताकर स्वर्ग आ चुके हैं। आज महाराज धृतराष्ट्र ने नववर्ष के आगमन पर स्वर्ग में विशेष दरबार का आयोजन किया है। कुछ पात्र जिन्हें सदैव के लिये नर्क भेजा गया था, वे भी इस सभा में भाग लेने के लिये आमंत्रित किये गये हैं। महाभारत का एक पात्र ऐसा भी है जो आज तक धरती पर है, जी हाँ ठीक समझे आप, अश्वत्थामा। उसे भी आज के दरबार में आने के लिये स्वर्गाधिपति धर्मराज ने विशेष अनुमति प्रदान की है। (कुछ रुककर)  निःसंदेह आप सब दर्शकों को भी आज के दिन धर्मराज की विशेष अनुमति से स्वर्ग में आयोजित होने वाले इस ऐतिहासिक दरबार को देखने का अवसर दिया गया है। (चारों ओर देखकर रहस्य उद्घाटित करने की मुद्रा में)  आप लोगों की सुविधा के लिये बता दूँ कि मैं महाभारत का ऐतिहासिक पात्र संजय हूँ। जी हाँ वही संजय जिसने धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में अठारह दिन तक चली महाभारत का आँखों देखा हाल महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया था किंतु आज इस नाटक में मैं आपके लिये सूत्रधार का तथा यहाँ आयोजित होने वाली सभा के लिये प्रहरी का कार्य करूंगा। महाराज धृतराष्ट्र का विशेष अनुचर तो मैं हूँ ही। (कुछ क्षण रुककर तोरणद्वार की ओर संकेत करता है)  लीजिये वह देखिये, मंत्रिवर विदुरजी आ रहे हैं।

संजय अपनी पगड़ी संभालता है। विदुरजी पार्श्व के तोरणद्वार से निकल कर आते हैं तथा सिंहासन के पास के कौने में खड़े हो जाते हैं जहाँ से वे समस्त सभासदों को सुगमता से सम्बोधित कर सकते हैं। संजय उनका अभिवादन करता है।

संजय (तोरणद्वार की ओर देखकर चौंकते हुए) : अरे! यह क्या? स्वर्ग से आने वाले आये नहीं, नर्क वाले पहले आ गये। (दर्शकों की ओर देखकर)  आप लोग किंचित् अपने हृदय को थाम कर बैठिये। सीधे नर्क से चले आ रहे हैं गांधार नरेश शकुनि, अंगराज कर्ण, कुमार दुर्योधन, कुमार दुःशासन और चेदिराज शिशुपाल जिन्हें आप भलीभांति पहचानते हैं।

पार्श्व के तोरणद्वार से उसी क्रम में महाभारत के पात्र मंच पर आते हैं जिस क्रम में उनके नाम बोले गये हैं। शकुनि लंगड़ा कर चलता हुआ मंच के मध्य में आकर खड़ा हो जाता है। उसने अपने हाथ में जुआ खेलने के पासे पकड़ रखे हैं जिन्हें वह हथेलियों के बीच घुमा रहा है। उसके शेष साथी कभी दरबार में पड़े रिक्त आसनों को तो कभी दर्शकों को देखते हैं।

शकुनि : देखो भांजे! ये देखो। (रिक्त आसनों की ओर संकेत करता है।)

दुर्योधन : क्या देखूं मामाश्री ?

शकुनि : ये रिक्त आसन देखो वत्स! सुना है कि वो निकम्मे पाण्डुपुत्र यहीं स्वर्ग में रहते हैं किंतु अब तक नहीं आये जबकि हम सहस्रों योजन दूर स्थित नर्क से चलकर सबसे पहले आ गये हैं।

दुःशासन : सबसे पहले नहीं मामाश्री, सबसे दूसरे कहिये। वो देखिये काका विदुर।

सब लोग चौंक कर कौने में खड़े हुए विदुर को देखते हैं।

दुर्योधन : प्रणाम करता हूँ काकाश्री।

विदुर (चौंककर) : सुखी रहो वत्स।

विदुर का आशीर्वाद सुनकर दुर्योधन और उसके साथी हँस पड़ते हैं।

विदुर (हैरान होकर) : तुम हँस रहे हो वत्स?

दुर्योधन (उद्दण्डता से) : हँसें नहीं तो क्या करें मामाश्री ? सुखी रहने के लिये हमें आपके आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं है। हम नर्क में बड़े ही सुखी हैं।

कर्ण (उपेक्षा भाव से) : आपने सोचा होगा कि हम नर्क में दुःखी होंगे और आपके समक्ष रुदन करते हुए प्रकट होंगे।

विदुर (झैंपकर) : नहीं-नहीं मैंने ऐसा तो नहीं………।

विदुर मौन रहकर सिर झुका लेते हैं।

दुर्योधन : मामाश्री मजाक कर रहे हैं काकाश्री। आप उदास न हों। वस्तुतः अब नर्क में पहले जैसी स्थितियां नहीं रहीं। अब वहाँ मानवाधिकार आयोग, महिला अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग जैसी ह्यूमन राइट संस्थाएं काम करने लगी हैं। जिसके चलते नर्क का ह्यूमन फेस सामने आ चुका है। हमारा संकेत उसी ओर था।

संजय (असमंजस से) : ह्यूमन राइट……. ह्यूमन फेस!

दुःशासन : अरे वह देखो गुरुपुत्र अश्वत्थामा।

पार्श्व में बने तोरण द्वार से अश्वत्थामा प्रवेश करता है। उसके माथे से रक्त बह रहा है तथा चेहरे पर उदासी है। उसकी सिसकियों से दरबार गूंजने लगता है। दुर्योधन दौड़कर उसे गले लगा लेता है।

दुर्योधन :  भ्राता अश्वत्थामा! तुम रो क्यों रहे हो? तुम्हारे माथे से यह रक्त कैसे प्रवाहित हो रहा है?

अश्वत्थामा (सिसकियां भरते हुए) : केवल मैं, केवल मैं तुम्हारा गुरुपुत्र अश्वत्थामा महाभारत का पात्र होते हुए भी धरती पर अपनी सम्पूर्ण पीड़ा के साथ जीवित हूँ। क्या तुम तक मेरी सिसकियां नहीं पहुंचतीं सुयोधन?

दुःशासन : भ्राता सुयोधन तुम्हें धरती का राज्य देकर आये थे। न तो पाण्डुपुत्र और न वह छलिया कृष्ण, कोई भी तो तुम्हें तंग करने के लिये नहीं है वहाँ, फिर भी तुम इतने दुःखी क्यों हो?

अश्वत्थामा (पीड़ा से कराहकर) : यही तो…….यही तो मेरे कष्ट का कारण है सुशासन। न तो वहाँ पाण्डुपुत्र हैं और न छलिया कृष्ण। अब मैं लड़ूं तो किससे लड़ूं? कैसे अपने मन का संताप कम करूं?

संजय (तोरणद्वार की ओर देखकर) : माननीय सभासदो! माननीय धर्मराज। (थोड़ा विराम देकर मध्यम आवाज में)  आइये धर्मराज। इधर पधारिये। आपका स्वागत है। (रिक्त आसनों की ओर संकेत करता है।)

सब चौंककर पार्श्व की ओर देखते हैं। धर्मराज युधिष्ठिर पार्श्व के तोरणद्वार से निकलकर मंच पर प्रवेश करते हैं तथा विदुरजी के चरणों में प्रणाम निवेदन करते हैं।

विदुर : सुखी रहो वत्स……..नहीं-नहीं……….।

युधिष्ठिर चौंककर विदुरजी की ओर देखते हैं। दुर्योधन और उसके साथी ठहाका लगाकर हँसते हैं।

शकुनि : किंचित् देखो तो भांजे।

दुर्योधन : क्या देखो देखो लगा रखी है मामाश्री? क्या देखूं?

शकुनि : उतावले न हो वत्स। (व्यंग्य से मुँह बिगाड़कर)  किंचित् अपने भ्राता धर्मराज युधिष्ठिर को देखो। यह आज अकेले ही क्यों चले आ रहे हैं? क्या माता कुंती, महारानी द्रौपदी और इनके चारों श्रेष्ठ अनुज स्वर्ग में इनके साथ नहीं रहते! क्या स्वर्ग में पाण्डुपुत्रों के चूल्हे अलग जलते हैं!

शकुनि की बात पर दुर्योधन और उसके साथी ठहाका लगा कर हँस पड़ते हैं।

दुःशासन : एक बात है मामाश्री, आप कौड़ी दूर की लाते हैं।

शकुनि : अरे हम कौड़ी दूर की न लाते तो महाभारत थोड़े ही होता।

कर्ण : क्या बात कही है गांधार नरेश। वाह-वाह आनंद आ गया।

युधिष्ठिर: मैं आप सब महानुभावों को प्रणाम करता हूँ। वस्तुतः बात यह है कि मेरे चारों अनुज रहते तो स्वर्ग में मेरे साथ ही हैं किंतु मैं इस भय से उन्हें साथ नहीं लाया कि कहीं आप लोगों को फिर से अपने सामने देखकर वे क्रोधित न जायें। स्वर्ग में क्रोध करना वर्जित है।

शकुनि : ये लो, इनका फण्डा सुनो! ये स्वर्ग में रहकर भी भयभीत रहते हैं तथा इनके भाई अब भी क्रोधित होते हैं!

युधिष्ठिर: फण्डा क्या………? (बात अधूरी रह जाती है।)

दुःशासन (क्रोध से दांत पीस कर) : जब वे कायर, द्यूतक्रीड़ा में परास्त होकर भी क्रोधित नहीं हो सके तो अब क्या खाकर क्रोधित होंगे भ्राता युधिष्ठिर?

संजय : माननीय सभासदो! माननीय अध्यक्ष…….नहीं-नहीं, माननीय महाराज।

सब चौंककर संजय को देखते हैं। संजय नेपथ्य वाले द्वार से निकलकर आते हुए महाराज धृतराष्ट्र का स्वागत करता है। धृतराष्ट्र ने अपना एक हाथ महारानी गांधारी के कंधे पर रख रखा है। महारानी गांधारी ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है।

विदुर: आपका स्वागत है महाराज और महारानी आपका भी।

युधिष्ठिर आगे बढ़कर धृतराष्ट्र और गांधारी के चरणों में सिर झुकाते हैं।

युधिष्ठिर: पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर आपके श्री चरणों में प्रणाम करता है महाराज।

धृतराष्ट्र (युधिष्ठिर की बात अनसुनी करके) : मेरे पुत्र, मेरे पुत्र कहाँ हैं विदुर?

विदुर: वे भी इसी कक्ष में उपस्थित हैं महाराज।

धृतराष्ट्र (व्याकुल होकर) : वत्स सुयोधन! वत्स सुशासन! कहाँ हो तुम लोग? तुम आगे बढ़कर अपने नेत्रहीन पिता के वक्ष से क्यों नहीं लग जाते?  

दुर्योधन (उपेक्षा से) : स्वर्ग में निवास करके भी आपका पुत्र मोह नहीं गया पिताश्री?

गांधारी (रुष्ट होकर) : अपने वृद्ध  पिता से संभाषण करने का यह कौनसा ढंग है पुत्र?

दुर्योधन : माताश्री! हमारे नर्क में पिता और पुत्र में कोई भेद नहीं होता।

गांधारी : क्यों? क्यों नहीं होता?

दुर्योधन : बात यह है माताश्री कि नर्क का अब बहुत एडवासंमेंट हो चुका है। आज का नर्क पहले वाला नर्क नहीं रहा।

गांधारी : क्या हो चुका है?

दुर्योधन : एडवासंमेंट माताश्री, एडवांसमेंट।

गांधारी (खीझकर) : एडवांसमेंट माने क्या?

शकुनि : उन्नति, समृद्धि , बढ़ोत्तरी, जो तुम्हारे स्वर्ग में संभव नहीं बहना।

धृतराष्ट्र : (क्रोधित होकर) : तो तुम अब भी मेरे पुत्र के पीछे लगे हुए हो शकुनि!

विदुर (हस्तक्षेप करते हुए) : विगत पाँच सहस्र एवं एक शत वर्षों में स्वर्ग में कुछ नहीं बदला जबकि नर्क में इतना बदलाव आ गया! ऐसा कैसे हुआ?

कर्ण : बात यह है मंत्रिवर कि स्वर्ग में आने वाले आप अंतिम व्यक्ति थे। विगत पाँच हजार एक सौ वर्षों में स्वर्ग में एक भी व्यक्ति धरती से स्वर्ग में नहीं आया जबकि धरती से आने वाला हर व्यक्ति नर्क में ही आया है और प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ एडवांसमेंट लाया है।

शकुनि : यही कारण है विदुरजी कि आज नर्क में जमीनों के भाव आसमान छू रहे हैं जबकि आपके स्वर्ग में कोई गज भर जमीन खरीदने को तैयार नहीं।

संजय : माननीय सभासदो, माननीय देवकीनंदन श्रीकृष्ण।

सब चौंककर पार्श्व में बने तोरणद्वार की ओर देखते हैं। देवकीनंदन श्रीकृष्ण प्रवेश करते हैं।

दुर्योधन : काका संजय को क्या हो गया? (संजय की नकल उतारता है)  माननीय सभासदो! माननीय फलाना! पहले की तरह क्यों नहीं कहते? (उच्च स्वर में)  सावधान ऽऽऽ…. होशियारऽऽऽ….। यदुकुल भूषण, वृष्णिवंशी, कंस चाणूर हंता, मथुरा नरेश, श्रीमान् देवकी नंदन श्रीकृष्ण पधार रहे हैं। क्या यह धरती पर चलने वाली संसद है?

शकुनि : एडवांसमेंट भांजे, एडवांसमेंट।

धृतराष्ट्र (अपने आसन से खड़े होकर) : तुम्हारा स्वागत है वासुदेव।

श्रीकृष्ण : (आगे आकर) : जब मुझे ज्ञात हुआ कि महाराज ने आज नववर्ष के उपलक्ष्य में विशेष सभा का आयोजन किया है तो मैं भी आप सबसे मिलने चला आया।

शिशुपाल (चीखकर) : तुम यहाँ भी आ धमके ग्वाले! तुम्हें कोई बुलाता नहीं, फिर भी तुम बेशर्म की तरह चले आते हो?

श्रीकृष्ण (हँसकर) : जहाँ मेरे चाहने वाले होते हैं, वहाँ मुझे जाना ही होता है चेदिराज। (एक आसन पर बैठ जाते हैं।)

शिशुपाल : तुम और तुम्हारे चाहने वाले! दोनों पाखण्डी हैं।

युधिष्ठिर: चुप हो जाईये चेदिराज। श्रीकृष्ण हम सबके पूज्य हैं।

शिशुपाल : तुम मुझे आंखें दिखाकर शांत नहीं कर सकते युधिष्ठिर। यह ग्वाला अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। चलाये यह अपना सुदर्शन, काट ले मेरा सिर। यह सहस्र बार मेरा सिर काटे तब भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। मैं कल भी था, आज भी हूँ और आने वाले हर कल में रहूंगा। (दोनों भुजाएं ऊपर उठाकर अपने बल का प्रदर्शन करता है।)

धृतराष्ट्र : शांत हो जाईये आप सब। मैंने आप लोगों को यहाँ पर झगड़ने के लिये नहीं बुलाया है।

शकुनि : बिल्कुल ठीक है महाराज। हम बिल्कुल भी नहीं लड़ेंगे। आप बताईये कि आपने हमें यहाँ क्यों बुलाया है?

धृतराष्ट्र (क्रोधित होकर) : मैंने अपने पुत्रों को यहाँ बुलाया था, तुम्हें और सूतपुत्र कर्ण को नहीं।

दुर्योधन (तीव्र स्वर में) : आप मामा शकुनि और मेरे मित्र अंगराज कर्ण का इस प्रकार अपमान नहीं कर सकते पिताश्री।

धृतराष्ट्र (कातर स्वर में) : तुम इन दुष्टों का साथ छोड़ दो वत्स! धर्मराज तुम्हारी त्रुटियों को क्षमा करके तुम्हें स्वर्ग में बुला लेंगे।

दुर्योधन (और अधिक तीव्र स्वर में) : आपके प्रिय पाण्डुपुत्रों के साथ स्वर्ग में रहने की अपेक्षा मैं मामाश्री शकुनि और अंगराज कर्ण के साथ नर्क में रहना अधिक पसंद करता हूँ पिताश्री।

श्रीकृष्ण : आप लोग तो फिर लड़ने लगे।

सब शांत हो जाते हैं

धृतराष्ट्र : हमें हस्तिनापुर से यहाँ आये हुए पूरे पाँच सहस्र एवं एक शत वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। हम जानना चाहते हैं कि इतनी अवधि के व्यतीत हो जाने के पश्चात् हम भरतवंशियों का भारत किस स्थिति में है?

शकुनि (व्यंग्य से) : आइडिया बुरा नहीं।

धृतराष्ट्र : आइडिया क्या?

दुःशासन : पिताश्री! आज भरतवंशियों का भारत उतना बुरा नहीं है जितना आपके समय में था। यदि हम आपके शासन में धरती पर पैदा न होकर आज पैदा हुए होते तो हमें बहुत आराम होता।

गांधारी : किंतु वत्स तुम धरती पर नहीं, तुम तो घड़े में पैदा हुए थे।

दुःशासन (झल्लाकर) : घड़े से निकल कर तो हम धरती पर ही आये थे।

धृतराष्ट्र : तुम्हारे कहने का आशय क्या है वत्स?

दुःशासन : कहूं तो तब न, जबकि माताश्री कुछ कहने दें।

धृतराष्ट्र : तुम निर्भय होकर अपनी बात कहो वत्स।

दुःशासन : केवल एक साड़ी खींचने पर…….सुन रहे हैं आप पिताश्री केवल एक साड़ी खींचने पर महाभारत हो गया जिसमें अठारह अक्षौहिणी सेना को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। जबकि आज भारत वर्ष में हर दिन साड़ियां खींची जाती हैं, चलती हुई ट्रेनों में, बसों में, घरों में, स्कूलों में, मंदिरों में और अस्पतालों में, हर स्थान पर साड़ियां खींची जा रही हैं फिर भी किसी सुशासन को कोई अंधा बाप उस तरह नहीं धिक्कारता जिस तरह आपने मुझे धिक्कारा।

गांधारी : तुम्हारा आरोप मिथ्या है पुत्र! सच पूछो तो महाराज ने कभी तुम्हें धिक्कारा ही नहीं। यदि वे तुम्हें धिक्कारते तो महाभारत हुआ ही नहीं होता।

धृतराष्ट्र : तुम बताओ संजय, इस समय हम भरतवंशियों के भारत की क्या अवस्था है?

शकुनि : संजय आपको क्या बतायेगा महाराज! आप मुझसे पूछिये। मैं बताता हूँ। अब भारत वर्ष में आपकी तरह वंशानुगत राजे महाराजे नहीं होते। आज के राजे-महाराजे प्रजा के द्वारा चुने जाते हैं।

संजय : आप मिथ्या भाषण कर रहे हैं गांधार नरेश। भले ही आज भारत के राजे-महाराजे प्रजा के द्वारा चुने जाते हों किंतु वे होते तो वंशानुगत ही हैं।

शकुनि : बिल्कुल ठीक कहा तुमने। मैं अपनी भूल स्वीकार करता हूँ। वे वंशानुगत ही होते हैं।

धृतराष्ट्र (उत्साहित होकर) : तो क्या आज भी भारत पर भरतवंशियों का शासन है? कुरुवंशियों का शासन है?

संजय : क्षमा करें महाराज! भारत वर्ष में वंशानुगत राज्य परंपरा चल रही है, इसका अर्थ यह नहीं है कि वहाँ भरतवंशियों अथवा कुरुवंशियों का शासन है। राजवंश बदल चुके हैं महाराज।

धृतराष्ट्र : क्या आज के राजा भी हमारी तरह राजसभाओं का आयोजन करते हैं?

शकुनि : राजसभाएं तो होती हैं महाराज किंतु राजा लोग आपकी तरह मुकुट लगा कर नहीं आते। उन सभाओं में दांव तो चलते हैं किंतु वहाँ मेरी तरह पासे नहीं फैंके जाते।

धृतराष्ट्र : तो क्या अब राजसभाओं में द्यूत क्रीड़ा नहीं होती?

शकुनि : अब द्यूतक्रीड़ा की आवश्यकता नहीं रह गयी महाराज। सारा खेल राजसभा के बाहर ही खेल लिया जाता है।

धृतराष्ट्र : तुम्हारी पहेलियों की जटिलता अब तक विद्यमान है गांधार नरेश।

शकुनि : पहेली कैसी और जटिलता कैसी महाराज? मुझ सीधे सच्चे मनुष्य को आपने कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया इसीलिये तो महाभारत का युद्ध हो गया महाराज।

धृतराष्ट्र (खीझकर) : महाभारत! महाभारत! महाभारत! समाप्त हो गया महाभारत।

शकुनि : नहीं महाराज! महाभारत समाप्त नहीं हुआ। वह कभी समाप्त नहीं होता, चलता रहता है।

धृतराष्ट्र : मैं आदेश देता हूँ कि तुम अपनी जिह्वा को विराम दो। कहने दो संजय को कुछ।

शकुनि हँस कर चुप हो जाता है।

संजय : गांधार नरेश सत्य कहते हैं महाराज। अब राजसभाओं में द्यूत क्रीड़ा की आवश्यकता नही रह गयी। अब द्यूत क्रीड़ा किये बिना ही महारानी द्रौपदी के वस्त्रों का हरण कर लिया जाता है।

धृतराष्ट्र (उत्तेजित होकर) : द्रौपदी मेरी पुत्रवधू! क्या वह अब भी हस्तिनापुर में है?

संजय : हाँ महाराज! किंतु अब महारानी द्रौपदी ने अपना नाम बदल लिया है।

धृतराष्ट्र (हैरान होकर) : नाम बदल लिया है! मेरी पुत्रवधू जो भारत वर्ष की महारानी है, उसने अपना नाम बदल लिया है!

संजय : हाँ महाराज, अब महारानी द्रौपदी अपने आप को जनता कहती हैं।

धृतराष्ट्र : जनता माने क्या?

संजय : जब प्रजा राजा का चयन करने लगती है तो प्रजा को जनता कहने लगते हैं महाराज।

धृतराष्ट्र : अच्छा! बहुत अच्छा। मेरी पुत्री वहाँ सुख से तो है?

संजय : क्षमा करें महाराज। द्रौपदी के भाग्य में सुख नहीं होता। आज भी हर दिन उसका चीरहरण होता है।

धृतराष्ट्र : चीर हरण होता है? तो क्या अब वहाँ मेरी तरह कोई धृतराष्ट्र नहीं है जो द्रौपदी का चीर हरण रोक सके?

श्रीकृष्ण : झूठ मत बोलिये महाराज। द्रौपदी का चीर हरण आपने नहीं रुकवाया था।

धृतराष्ट्र : मैंने प्रिय पाण्डुपुत्रों को उनका राज्य तो लौटाया था?

श्रीकृष्ण : किंतु वह राज्य आपके पुत्रों ने फिर से द्यूत क्रीड़ा करके हड़प लिया था और पाण्डवों को वनवास दे दिया था।

दुःशासन : देखा पिता श्री। इन लोगों के मन में कितना मैल भरा हुआ है। द्यूत क्रीड़ा के लिये ये ही सदैव तत्पर रहते हैं किंतु जब हम जीत जाते हैं तो उसे यह हड़प लेना कहते हैं।

संजय : माननीय सभासदो! माननीय गंगापुत्र भीष्म।

सब हड़बड़ा कर उठ खड़े होते हैं। पार्श्व में बने तोरण द्वार से पितामह भीष्म प्रवेश करते हैं।

धृतराष्ट्र : आपका स्वागत है तात् श्री ।

भीष्म : आयुष्मान हों महाराज। (आसनों की तरफ मुँह घुमाकर)  यह गंगापुत्र भीष्म अब उतना आदरणीय नहीं रहा जिसके सम्मान में आप खड़े रहें। कृपा करके आप सब आसन ग्रहण करें। मेरा सम्मान तो उसी दिन नष्ट हो गया था जब मेरे स्थान पर सूतपुत्र कर्ण को कौरवों का सेनापति बनाया गया था।

सब बैठते हैं। केवल भीष्म पितामह खड़े रहते हैं। उनकी दृष्टि श्रीकृष्ण पर जाकर ठहर जाती है।

भीष्म : मैं गंगापुत्र भीष्म आपको प्रणाम करता हूँ देवकीनंदन।

श्रीकृष्ण (खड़े होकर) : मेरा प्रणाम भी स्वीकार करें तात्।

भीष्म : आज बहुत दिनों बाद आप सबको एक साथ देखकर मेरे नेत्र शीतल हुए।

शकुनि (व्यंग्य से) : यह क्यों नहीं कहते कि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को देखकर नेत्र शीतल हुए।

भीष्म (क्रोधित होकर) : छोटे आदमी की बात भी छोटी होती है शकुनि।

शकुनि : शांत हो जाइये गंगापुत्र। अब राजसभा में किसी के छोटेपन को लेकर कटाक्ष नहीं किया जा सकता।

भीष्म : यह मत भूलो शकुनि कि हम राजसिंहासन की मर्यादा से बंधे हुए हैं अन्यथा तुम्हारा मुँह तो अभी बंद कर देते।

शकुनि : मर्यादा! क्या खूब मर्यादा है? भूल हम नहीं कर रहे, आप कर रहे हैं। शकुनि का मुँह बंद कर देने से महाभारत को नहीं रोका जा सकता। वह होकर रहता है।

धृतराष्ट्र (तंग आकर) : तुम हर बात में अपना खूंटा गाढ़ देते हो गांधार नरेश।

शकुनि : मेरे इन खूंटों से ही आपके पुत्रों का भाग्य मजबूती से बंधा हुआ है महाराज। (व्यंग्य से)  कहो तो इन खूंटों के रस्से ढीले कर दूँ?

गांधारी : चुप रहो भ्राता। मेरी पुत्रवधू द्रौपदी का समाचार हमें अच्छी तरह जान लेने दो।

भीष्म (व्यग्र होकर) : क्या कोई पुत्री द्रौपदी का समाचार लेकर आया है?

धृतराष्ट्र : हाँ तात्। संजय कहता है कि वह अब तक धरती पर ही है तथा उसने अपना नाम बदल कर जनता रख लिया है। आजकल भारत वर्ष के राजा बिना द्यूत क्रीड़ा का आयोजन किये ही मेरी पुत्रवधू का हर दिन चीर हरण करते हैं।

भीष्म : गंगा माँ की सौगंध। मैं अभी हस्तिनापुर जाकर अपनी बच्ची को ले आता हूँ। वह भरतवंशियों के कुल की लाज है।

दुर्योधन : ताकि यहाँ प्रिय सुशासन उसकी साड़ी खींच सके।

दुर्योधन के साथी ठहाका लगा कर हँस पड़ते हैं।

भीष्म : चुप रहो उद्दण्ड। क्या कुरुक्षेत्र के मैदान में पराजय का मुख देखकर भी बुद्धि  नहीं आयी तुम्हें?

गांधारी (व्याकुल होकर) : इस अबोध पर क्रोध न करें तात्श्री।

भीष्म : महारानी गांधारी! यह उद्दण्ड, अबोध नहीं है। न ही आप अबोध हैं। अबोध है हम सबका भवितव्य।

शकुनि (व्यंग्य से) : क्या अब भी भवितव्य का कुछ अंश शेष बचा है शांतनु पुत्र?

धृतराष्ट्र : कैसे खेद की बात है, हम अपनी पुत्रवधू द्रौपदी का समाचार जानने को उत्सुक हैं और आप लोग व्यर्थ की बातें करके व्यवधान उत्पन्न कर रहे हैं। तुम बोलो संजय। (व्यग्र होकर)  तुम चुप क्यों हो जाते हो?

संजय : महाराज! मैं कह रहा था कि अब भारत वर्ष में द्रौपदी का चीरहरण बिना द्यूतक्रीड़ा के किया जाता है। द्रौपदी राजपुरुषों से अपनी सुरक्षा और सलामती के बारे में प्रश्न पूछना चाहती है किंतु कुछ राजपुरुष द्रौपदी से धन की मांग करते हैं। वे राजसभा में द्रौपदी के प्रश्नों को तभी पूछते हैं जब द्रौपदी राजसभा के बाहर उन राजपुरुषों को धन प्रदान करती है।

धृतराष्ट्र : यह क्या कह रहे हो संजय? राजपुरुषों को भला धन और स्वर्ण की क्या कमी?

संजय : मैं आपका भृत्य हूँ महाराज। जैसा देखता हूँ वैसा ही कहता हूँ। अभी कुछ दिवस पूर्व ही भारत वर्ष की राजसभा से एकादश राजपुरुषों को निष्कासित किया गया है।

धृतराष्ट्र : निष्कासित किया गया है किंतु क्यों?

दुःशासन (उद्दण्डता से) : क्या उन्होंनें द्रौपदी की साड़ी बहुत जोर से खींची थी?

दुर्योधन और उसके साथी हँस पड़ते हैं।

संजय : नहीं इसके लिये नहीं।

धृतराष्ट्र : फिर किसके लिये?

संजय : जब ये राजपुरुष द्रौपदी से धन स्वीकार कर रहे थे तब किसी ने स्टिंग ऑपरेशन कर दिया।

धृतराष्ट्र : स्टिंग ऑपरेशन क्या?

दुःशासन : यही तो कठिनाई है। इस स्वर्ग के लोग कितने अल्पज्ञ हैं? जबकि अब तक कितने ही स्टिंग ऑपरेशन करने वाले लोग धरती से हमारे नर्क में आ चुके हैं।

शकुनि (व्यंग्य से) : किंतु यह तो अन्याय हुआ वत्स। स्टिंग ऑपरेशन करने वालों को तो कम से कम स्वर्ग में आ ही जाना चाहिये था।

धृतराष्ट्र : तुम चुप रहो गांधार नरेश। कोई मुझे बताये कि स्टिंग ऑपरेशन क्या होता है?

दुर्योधन : मैं बताता हूँ तात्श्री। यह जो संजय आपको आँखों देखा हाल सुनाता है, ठीक उसी तरह…….।

दुर्योधन की बात अधूरी रह जाती है। देवर्षि नारद हाथ में वीणा लेकर प्रवेश करते हैं।

संजय : माननीय सभासदो! माननीय देवर्षि।

नारद : नारायण! नारायण!

दुःशासन : लो ये आ गये स्टिंग ऑपरेशन करने वाले।

धृतराष्ट्र : आपका स्वागत है देवर्षि। क्या आजकल आप स्टिंग ऑपरेशन करते हैं?

नारद : नारायण! नारायण! मैं भला क्या करूंगा! मैं ठहरा रमता जोगी। आज यहाँ तो कल वहाँ। मैंने कोई स्टिंग ऑपरेशन नहीं किया।

शकुनि : इनसे संभल के रहना महाराज। इनकी मीठी बातों में न आ जाना। ये स्टिंग ऑपरेशन कर चुकेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा।

धृतराष्ट्र (खीझकर) : ओह! आखिर आप लोग मुझे बताते क्यों नहीं कि स्टिंग ऑपरेशन क्या होता है?

शकुनि : ये मीडिया वाले भी न, पूछो मत इनकी। महाराज मैं बताता हूँ। जब कोई राजपुरुष द्रौपदी से उत्कोच स्वीकार करता है तो नारदजी के साथी उनका चित्र उतार लेते हैं। जब उन चित्रों को सार्वजनिक किया जाता है तो उसे स्टिंग ऑपरेशन कहते हैं।

धृतराष्ट्र : साधु नारदजी। हमें यह जानकर अच्छा लगा कि आपके कुछ साथी भी हैं और वे हमारी पुत्रवधू द्रौपदी की सहायता कर रहे हैं।

नारद : आपकी इस सहृदयता से मैं अभिभूत हूँ महाराज। अन्यथा धरती के राजपुरुष तो हमें धिक्कार की दृष्टि से ही देखते हैं। नारायण, नारायण।

धृतराष्ट्र : तुम कुछ बता रहे थे संजय।

संजय : महाराज! अभी कुछ दिवस पूर्व आपके भारत वर्ष में चलती हुई ट्रेन की जनरल बोगी में महारानी द्रौपदी के वस्त्र खींचे गये।

धृतराष्ट्र : ट्रेन क्या, और वो……..जनरल बोगी क्या?

संजय : स्वचालित रथों की दीर्घ शृंखला को ट्रेन कहते हैं महाराज। उसमें राजपुरुषों, श्रेष्ठियों और श्रीमंतों के लिये विशेष रथ जोते जाते हैं। जबकि जनता के लिये जोते जाने वाले रथों को जनरल बोगी कहते हैं।

धृतराष्ट्र (प्रसन्न होकर) : अच्छा! जो रथ हमारी पुत्री द्रौपदी के लिये जोता जाता है उसे जनरल बोगी कहते हैं।

संजय : हाँ महाराज! उसे जनरल बोगी कहते हैं।

धृतराष्ट्र : तो क्या जनरल बोगी में हमारी पुत्री अकेली होती है?

संजय : नहीं महाराज। उसमें सौ से दो सौ तक व्यक्ति होते हैं।

धृतराष्ट्र (आश्चर्य से) : तो क्या इतने लोगों के बीच पुत्री द्रौपदी का चीरहरण हुआ। किसी ने रोका नहीं?

दुःशासन (व्यंग्य से) : किसे, सुशासन को?

गांधारी (बीच में बात काटकर) : महाराज ने कभी सुशासन को नहीं रोका अन्यथा………।

शकुनि : अन्यथा महाभारत नहीं हुआ होता। (हँसता है।)

धृतराष्ट्र : मैं अपनी नहीं, देवकी नंदन की बात कर रहा हूँ, ये तो थे!

शकुनि : देवकीनंदन को तो पाण्डुपुत्रों से ही अवकाश नहीं महाराज फिर द्रौपदी का चीर हरण होने से कौन रोकता?

भीष्म : तुम देवकीनंदन को अपने व्यंग्य बाणों से दूर ही रखो शकुनि।

दुःशासन : इतना ही नहीं महाराज। राजधानी इंद्रप्रस्थ जिसे आजकल दिल्ली कहते हैं, वहाँ तो चलती हुई कारों में चीर हरण हो रहा है। आपने बिना कारण ही मुझे निकम्मे पाण्डुपुत्रों के सम्मुख अपमानित किया।

धृतराष्ट्र : कार क्या?

संजय : ये भी एक प्रकार के स्वचालित रथ होते हैं महाराज।

धृतराष्ट्र (व्यथित होकर) : हे ईश्वर! यह मैं क्या सुन रहा हूँ? राजधानी हस्तिनापुर में चलते हुए रथों में चीर हरण हो रहे हैं?

दुर्योधन : हमारी राजधानी हस्तिनापुर नहीं पिताश्री, पाण्डुपुत्रों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ कहिये।

दुःशासन : केवल चीर हरण नहीं बलात्कार हो रहे हैं महाराज, बलात्कार। जब तक बलात्कार ही न हो तब तक चीर हरण का क्या लाभ?

शकुनि : चीर हरण या बलात्कार ही नहीं। आज द्रौपदी पर होने वाले अत्याचारों की कोई गिनती ही नहीं। आज द्रौपदी का दिन दहाड़े अपहरण कर लिया जाता है। उस पर एसिड फैंका जाता है।

धृतराष्ट्र : एसिड क्या?

शकुनि : अब हम आपको क्या-क्या समझायेंगे? हमने कोई गुरुकुल खोल लिया है क्या?

धृतराष्ट्र (लगभग गिड़गिड़ाते हुए) : किंतु एसिड के बारे में तो बता दो।

नारद : एसिड माने अम्ल, तेजाब। जिससे त्वचा झुलस जाती है और द्रौपदी जीवित ही नर्क की ज्वाला में धधकने लगती है। यदि उसका भाग्य अच्छा होता है तो उसके प्राण पंखेरू उड़ जाते हैं।

गांधारी (दु:खी होकर) : अच्छा! इतना अंधेर!

धृतराष्ट्र : और…….और क्या हो रहा है मेरी पुत्रवधू के साथ?

संजय : महाराज कुछ राजपुरुष तो द्रौपदी के टुकड़े करके उसे तंदूर में झौंक देते हैं।

धृतराष्ट्र (उत्तेजित होकर) : यह क्या कह रहे हो तुम?

संजय : मैं सही कह रहा हूँ महाराज।

धृतराष्ट्र : तुम्हारी बातें सुनने में अच्छी तो नहीं हैं किंतु फिर भी तुम बोलते जाओ संजय, और क्या हो रहा है द्रौपदी के साथ?

संजय : महाराज आज धरती पर बहुत सी द्रौपदियां अपना पेट पालने के लिये नाममात्र के कपड़े पहन कर अर्धरात्रि तक मदिरालयों में मदिरा बेचने का काम करती हैं। यदि वे अर्धरात्रि के बाद मदिरा देने से मना करती हैं तो राजपुरुषों के सम्बन्धी रुष्ट होकर उन्हें पिस्तौल से गोली मार देते हैं।

गांधारी : पिस्तौल क्या?

शकुनि : यह एक प्रकार का आग्नेय अस्त्र होता है बहना।

दुःशासन : देखा आपने महाराज! आज के राजपुरुष और उनके सम्बम्न्धी क्या-क्या नहीं कर रहे द्रौपदी के साथ किंतु आपने केवल एक द्रौपदी के लिये मेरी प्रताड़ना की और महाभारत हो गया।

धृतराष्ट्र (अत्यंत कातर होकर) : इसका अर्थ यह हुआ कि आज की अपेक्षा तो हमारा शासन ही अच्छा था।

दुर्योधन : क्षमा करें पिताश्री! हम आपके शासन की प्रशंसा नहीं कर सकते। शासन तो आज का ही अच्छा है। आपने बात-बात में इन निकम्मे पाण्डुपुत्रों का पक्ष लिया किंतु आज यदि सुशासन धरती पर होता तो उसकी वैसी दुर्गति नहीं हुई होती जैसी कि आपके शासन में हुई।

गांधारी : अपनी जिह्वा को विराम दो सुयोधन। महाराज ने कभी भी तुम्हें या वत्स सुशासन को कुछ नहीं कहा। यदि कहा होता तो………..।

शकुनि (बात काटकर) : तो महाभारत नहीं हुआ होता।

दुर्योधन : माताश्री! आप रट्टू तोते की तरह एक ही संवाद बार-बार बोलकर हम सब का समय क्यों नष्ट कर रही हैं?

संजय : अभी जो वृत्तांत आपको बताया गया वह सिक्के का एक पहलू था महाराज। सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो पहले वाले पहलू से नितांत भिन्न है।

धृतराष्ट्र : सिक्का क्या?

शकुनि : मुद्रा महाराज! मुद्रा। जिस प्रकार आपके शासन में स्वर्ण मुद्रा और रजत मुद्राओं का प्रचलन था, अब भारतवर्ष में सस्ती धातुओं से बनी मुद्राओं का प्रचलन है जिसे सिक्का कहते हैं।

धृतराष्ट्र : तो मुझे बताओ कि सिक्के का दूसरा पहलू क्या है?

संजय : सिक्के का दूसरा पहलू यह है महाराज कि अब द्रौपदी उतनी निरीह भी नहीं रही जितनी कि वह आपके काल में हुआ करती थी।

धृतराष्ट्र : किंचित् विस्तार से कहो संजय। क्या तुम भी शकुनि की तरह पहेलियां बुझाने लगे?

संजय : महाराज आज की द्रौपदी पुरुषों की भांति मर्दाने वस्त्र धारण करके राजकीय सेवाओं से लेकर श्रेष्ठियों की पण्यशालाओं में धनार्जन करने के लिये जाती है। उसके अपने बैंक एकाउंट्स हैं।

धृतराष्ट्र : बैक एकाउण्ट्स क्या?

शकुनि : ऐसी पण्यशाला जहाँ द्रौपदी अपनी मुद्राएं अलग रख सकती है।

धृतराष्ट्र : हाय! मेरी पुत्री को यह दिन भी देखने पड़े!

संजय : शोक न कीजिये महाराज। यह आज की द्रौपदी के लिये गर्व की बात है न कि कष्ट की।

धृतराष्ट्र : और, और क्या करती है वह?

संजय : उसके साथ कार्यालयों, वीथियों एवं पण्यशालाओं में कोई अभद्रता नहीं हो इसके लिये केंद्रीय राजधानी से लेकर प्रांतीय राजधानियों में महिला आयोग बन गये हैं।

धृतराष्ट्र : ये महिला आयोग क्या करते हैं संजय?

संजय : यदि कोई व्यक्ति द्रौपदी का चीरहरण करता है या उस पर तेजाब फैंकता है तो ये महिला आयोग उस व्यक्ति को दण्ड दिलवाते हैं।

गांधारी (व्याकुल होकर) : किसे पुत्र सुशासन को?

दुर्योधन (रुष्ट होकर) : भ्राता सुशासन ने द्रौपदी पर अम्ल नहीं फैंका माताश्री।

भीष्म (असमंजस से) : द्रौपदी की रक्षा के लिये इतनी अच्छी व्यवस्था की गयी है, यह तो बहुत अच्छी बात है किंतु इनके होते हुए भी हमारी द्रौपदी का चीरहरण कर लिया जाता है! उस पर तेजाब फैंका जाता है! दुःखद आश्चर्य है।

धृतराष्ट्र : सिक्के के दूसरे पहलू में और क्या है संजय?

संजय : महाराष्ट्र। आज की द्रौपदी की रक्षा के लिये राष्ट्र में इस तरह के विधान बनाये गये हैं कि उसके श्वसुर गृह में भी उस पर कोई आँखें टेढ़ी न कर सके। यदि कोई सास, श्वसुर, पति या पति के ज्येष्ठ या लघु भ्राता उस पर कोई अत्याचार करें तो द्रौपदी उस विधान के तहत अपने श्वसुर गृह के सदस्यों को कारागृह में डलवा सकती है।

भीष्म : अति उत्तम। यह व्यवस्था तो हमारे पूर्वजों को भी करनी चाहिये थी।

संजय : सिक्के के दूसरे पहलू का वर्णन पूरा सुन लीजिये तात्श्री।

भीष्म : बोलते जाओ संजय, बोलते जाओ। सिक्के का यह दूसरा पहलू बहुत अच्छा लग रहा है।

संजय : जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि आज की द्रौपदी अब उतनी निरीह नहीं रह गयी है। इसलिये आज की द्रौपदी अपनी बदली हुई परिस्थिति का भरपूर लाभ भी उठाती है।

धृतराष्ट्र : लाभ…..अर्थात्?

संजय : यदि श्वसुर गृह का कोई सदस्य द्रौपदी की बात मानने से मना कर देता है तो कुछ द्रौपदियां श्वसुर गृह के सदस्यों पर मिथ्या आरोप लगाकर उन्हें कारागृह का मार्ग दिखा देती है महाराज।

धृतराष्ट्र : किस प्रकार के मिथ्या आरोप?

संजय : महाराज! वे श्वसुर गृह के सदस्यों पर आरोप लगाती हैं कि उन्होंने दहेज की लालसा में मुझे प्रताड़ित किया तथा जीवित ही लाक्षागृह में झौंक देने का प्रयास किया।

धृतराष्ट्र : दहेज माने।

संजय : आपके शासन काल में पुत्रवधू को प्राप्त करने के लिये श्वसुर या पति द्वारा गौ दान किया जाना आवश्यक था, उसके ठीक विपरीत अब पुत्री का विवाह करने के लिये पुत्री का पिता वर पक्ष को वस्त्र, धन, स्वर्ण, आभूषण एवं अन्य सामग्री प्रदान करता है, उसे दहेज कहते हैं।

शकुनि : इसका अर्थ यह हुआ कि यदि आज पुत्र सुशासन धरती पर होता तो द्रौपदी उसे कारागृह में डलवा देती?

संजय : मैंने यह नहीं कहा कि द्रौपदी की प्रताड़ना करने वाले को द्रौपदी कारागृह में डलवा देती है।

धृतराष्ट्र (आश्चर्य से) : तो फिर तुमने क्या कहा संजय?

नारद : महाराज! संजय ने यह कहा कि यदि द्रौपदी राजकीय रक्षकों के समक्ष जाकर यह कह भर दे कि मेरी प्रताड़ना की गयी है तो आरोपित व्यक्ति को कारागृह का सुख प्राप्त हो सकता है। नारायण-नारायण।

धृतराष्ट्र : तुम्हारे सिक्के के दूसरे पहलू में और भी कुछ कहने को है संजय?

संजय : हाँ महाराज। आज द्रौपदी द्वारा आरोपित सहस्रों श्वसुर, पति तथा पति के स्वजन कारागृहों में अपनी दुर्दशा पर रो रहे हैं। राष्ट्र के न्यायालयों में ऐसे अभियोगों की बाढ़ आ गयी है महाराज। वृद्ध  दम्पत्ति इस आशा में अपने पुत्रों के विवाह करते हैं कि पुत्रवधू उन्हें वृद्धावस्था में सुख प्रदान करेगी किंतु विधान के बल पर द्रौपदियां उन्हें कारागृह का सुख उपलब्ध करवा देती है।

भीष्म : पुत्री द्रौपदी! तुझसे ऐसी आशा न थी।

दुःशासन : संजय की बातों का अर्थ यह हुआ कि यदि आज हम धरती पर होते तो द्रौपदी हमें नहीं, धर्मराज युधिष्ठिर तथा उनके पाँचों भ्राताओं को कारागृह का मार्ग दिखाती।

शकुनि : और साथ में महारानी कुंती को भी।

दुःशासन : मैं तो पहले ही कहता था कि आज के भारत वर्ष में पिताश्री के शासन की अपेक्षा काफी सुख है।

शकुनि : ठीक कहते हो भांजे। इस वाचाल संजय ने हमें व्यर्थ ही भयभीत कर दिया था।

दुर्योधन : इसका अर्थ है कि संजय हमारा समय व्यर्थ कर रहा है!

दुःशासन : भ्राता श्री ठीक कह रहे हैं। यहाँ हमारा समय व्यर्थ किया जा रहा है।

शिशुपाल : यदि ऐसा है तो फिर यहाँ से चल देना ही उचित है। इन लोगों में कोई सुधार नहीं हुआ। आज भी इनके पास घुमा-फिरा कर कहने के लिये वही घिसी-पिटी बातें हैं।

कर्ण : मैंने तो पहले ही कहा था कौरवनंदन कि स्वर्ग में चलकर अपना समय नष्ट न करें।

दुर्योधन : तुमने ठीक कहा था मित्र।

शकुनि : आप सदैव ठीक ही कहते हैं अंगराज।

दुर्योधन : हाँ-हाँ, हमें यहाँ से चलना चाहिये। मुझसे अश्वत्थामा के आँसू देखे नहीं जाते।

दुर्योधन और उसके साथी उठकर तोरण द्वार से बाहर चले जाते हैं। गांधारी और धृतराष्ट्र व्याकुल होकर अपने आसनों से खड़े हो जाते हैं।

गांधारी : हमें इस तरह छोड़कर मत जाओ पुत्र।

धृतराष्ट्र : सुयोधन! अपने नेत्रहीन पिता से इस तरह मुँह मत फेरो वत्स।

अश्वत्थामा (सिर पकड़ कर) : आप अपने पुत्रों की ओर ही देखते रहेंगे महाराज! या मुझ अश्वत्थामा की भी सुधि लेंगे ?

धृतराष्ट्र (आश्चर्य से) : अपने पुत्रों की ओर देखते रहेंगे? हम तो नेत्रहीन हैं। हमने तो आज तक अपने पुत्रों का मुँह नहीं देखा। फिर भी हम पर यह आरोप!

भीष्म : आपके पुत्र इस योग्य हैं भी नहीं महाराज कि आप उनका मुख देखें।

अश्वत्थामा : मैं तो यह सोचकर इस सभा में आया था कि आप लोग मुझे धरती से मुक्त करवाने के लिये कोई प्रयास करने वाले हैं किंतु देखता हूँ कि मेरे आंसुओं से तो आपको कोई प्रयोजन ही नहीं है। आप तो अपने पुत्रों के मोह से ही ग्रस्त हैं।

धृतराष्ट्र : मैं नेत्रहीन भला अपने पुत्रों के लिये क्या कर सकता हूँ?

श्रीकृष्ण : आपकी नेत्रहीनता आज भी भारत वर्ष के लिये अभिशाप बनी हुई है महाराज। कितना अच्छा हुआ होता कि भरतवंशियों को अपने राजसिंहासन के लिये नेत्रहीन राजा न मिला होता। काश काल का कठोर आघात अब भी आपकी आँखें खोल सके!

धृतराष्ट्र : नहीं-नहीं। हमें आँखों की आवश्यकता नहीं। हमारी आँखें बंद ही रहें तो अच्छा है। जब हम उस युग में द्रौपदी की दुर्दशा को नहीं देख सके तो इस युग में चलते हुए रथों में द्रौपदी का चीर हरण होता हुआ कैसे देख सकेंगे। अम्ल से जला हुआ उसका मुख कैसे देखेंगे?

अश्वत्थामा : और यह देख सकेंगे कि किस प्रकार द्रौपदी अपने श्वसुर गृह के सदस्यों पर मिथ्या आरोप लगाकर उनके लिये कारागृह का मार्ग प्रशस्त करती है!

नारद : महाराज! न तो आप द्रौपदी पर होने वाले अत्याचार देख सकेंगे और न द्रौपदियों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार देख सकेंगे। सत्य कहा आपने, आप नेत्रहीन ही रहें, इसी में हम सब की भलाई है।

धृतराष्ट्र (कांपकर) : देवर्षि!

भीष्म : शांत हो जायें महाराज। द्रौपदी की समस्या आपसे नहीं सुलझेगी। यदि आप कुछ कर सकते हैं तो अश्वत्थामा के लिये कुछ करने का प्रयास करें ताकि इसके आंसू रोके जा सकें।

श्रीकृष्ण : इतिहास के साथ यही विडम्बना है महाराज। हम इतिहास से चिपके हुए तो रहना चाहते हैं किंतु उससे कोई सीख नहीं लेना चाहते। यही कारण है कि इतिहास इस अश्वत्थामा की तरह पुस्तकों में दबा हुआ सिसकता रहता है और निर्दयी काल वर्तमान को और अधिक क्रूर बनाता हुआ चला जाता है।

नारद : नारायण! नारायण!

अश्वत्थामा अपने माथे से बहने वाले रक्त को रोकता हुआ सिसक पड़ता है। नेपथ्य से करुणा सूचक संगीत बजता है। धृतराष्ट्र और गांधारी अपने अपने स्थान पर सिर झुका कर खड़े रहते हैं।

यवनिका पतन (अश्वत्थामा के आँसू)

जावा द्वीप पर अंतिम दिन (37)

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जावा द्वीप पर अंतिम दिन

आज हमारा जावा द्वीप पर अंतिम दिन था। 23 अप्रेल को हमें जावा द्वीप से विदाई लेनी थी। आज भी मैं प्रातः 6 बजे चाय पीने होटल की लॉबी में आया तो मुस्कुराहट से भरी वही लड़की, कल वाले स्थान पर खड़ी हुई अतिथियों का चाय पर स्वागत कर रही थी। आज हमें जकार्ता से नई दिल्ली के लिए हवाई जहाज पकड़ना था। मैं दीपा को अपने साथ ले आया था। उसने दीपा से हाथ मिलाया।

मैं दीपा को उसके पास छोड़कर चाय के लिए बढ़ गया। इसी बीच विजय भी वहीं आ गया। हमने रिसेप्शन काउंटर पर खड़े युवक से एयरपोर्ट के लिए होटल की तरफ से उपलब्ध कराई जाने वाली फ्री कैब सर्विस के बारे में पूछा। उसने बताया कि दो सर्विस हैं- प्रातः सात बजे और प्रातः आठ बजे। आप जिसमें जाना चाहें, उसे अभी बुक करा लें।

इस समय साढ़े छः बज चुके थे। हमने सात बजे वाली कैब बुक कर ली। केवल पैंतीस मिनट में हम सब तैयार होकर नीचे आ गए। कैब हमारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। होटल पॉप से जकार्ता एयरपोर्ट केवल दो किलोमीटर दूर है। उसने लगभग 7.20 पर हमें इण्टरनेशनल टर्मिनल पर छोड़ दिया।

करेंसी एक्सचेंज

हमारी फ्लाइट 11.30 बजे थी। यह ‘इण्डोनेशिया एयर एशिया’ की इण्टरनेशनल फ्लाइट थी जो हमें कुआलालम्पुर छोड़ने वाली थी और वहाँ से हमें नई दिल्ली के लिए दूसरी फ्लाइट लेनी थी। एयर पोर्ट पर पहुंचकर हमने सबसे पहला काम करेंसी बदलने का किया। हमारी जेब में रखी इण्डोनेशियाई करंसी आगे कुछ काम नहीं आने वाली थी।

हमने एक काउण्टर पर इण्डोनेशियाई करंसी देकर डॉलर ले लिए क्योंकि यदि हम भारतीय मुद्रा प्राप्त करने का प्रयास करते तो हमें अधिक शुल्क देना पड़ता। डॉलर को भारत में आसान दरों पर भारतीय रुपए में बदला जा सकता है। करंसी एक्सचेंज की यह प्रक्रिया अपनाने से काफी बचत होती है।

हमने एयरपोर्ट पर बोर्डिंग करने से पहले ही बाहर वेटिंग रूम में नाश्ता करने का विचार किया क्योंकि यदि हम अंदर जाने की प्रक्रिया आरम्भ कर देते तो उसमें कम से कम दो घण्टे लगने थे। मधु और भानु ने अभी सुबह की चाय भी नहीं पी थी और न ही दीपा ने दूध पिया था।

जकार्ता एयर पोर्ट

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यह एक बहुत बड़ा एयर पोर्ट है, काफी साफ-सुथरा और आधुनिक कम्प्यटराईज्ड उपकरणों से सुसज्जित। जकार्ता में वायु-सेवाएं ई.1928 से आरम्भ हो गई थीं। पुराना एयरपोर्ट छोटा होने के कारण ई.1985 में नया एयरपोर्ट बनाया गया। इसे सुकार्णो हात्ता इण्टरनेशनल एयरपोर्ट कहा जाता है। यह संसार का सातवां सर्वाधिक एयर कनैक्टिविटी वाला एयरपोर्ट है तथा जकार्ता-सिंगापुर एयर रूट से जुड़ा हुआ है जो कि संसार के सर्वाधिक व्यस्त एयर-रूट में से एक है। इस एयरपोर्ट से प्रतिवर्ष 3.70 लाख हवाई उड़ानें होती हैं जिनमें 5.87 करोड़ यात्री विश्व भर की यात्रा करते हैं तथा 3.42 लाख मैट्रिक टन कार्गो ढोया जाता है। नाश्ता करने और चाय पीने के बाद हमने बोर्डिंग औपचारिकताएं आरंभ कीं जिनमें लगभग 2 घण्टे लग गए। कुछ समय टर्मिनल पर विश्राम करने को भी मिल गया। ठीक 11.30 बजे हमारी फ्लाइट ने जकार्ता की धरती छोड़ दी। इसी के साथ हमारा जावा द्वीप पर अंतिम दिन पूरा हुआ। यह हमारी न केवल जकार्ता से अपिुत जावा से और इण्डोनेशिया से भी विदाई थी।

जब हम कुआलालम्पुर एयर पोर्ट पर उतरे तो हमारी घड़ियों में दोपहर के ढाई बजे थे। कुआलालम्पुर का समय जकार्ता से एक घण्टा आगे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में तीन नहीं अपितु दो घण्टे ही लगे थे। कुलालालम्पुर एयरपोर्ट भी जकार्ता एयरपोर्ट की तरह चमचमाता हुआ और शानदार है। यहाँ से अगली फ्लाईट मलेशियाई समय के अनुसार सायं 7.00 बजे मिलनी थी। इसलिए हमने यह समय एयरपोर्ट देखने में व्यतीत किया।

सारा नजारा उलट गया

हमने यहाँ कुछ फल लेने का निश्चय किया किंतु भाव सुनकर फल खरीदने का उत्साह जाता रहा। अब तक हम 1 भारतीय रुपए में 200 इण्डोनेशियन रुपए की दर से रुपया इस्तेमाल करने के अभ्यस्त हो गये थे किंतु यहाँ हमें 15 भारतीय रुपयों के बदले 1 मलेशियन रुपए की दर से खरीदरारी करनी थी जिसे रिंग्गिट कहते हैं।

कुआलालम्पुर एयरपोर्ट पर सामान्य आकार का एक भारतीय सेब छः रिंग्गिट या डेढ़ डॉलर या नब्बे भारतीय रुपए का था जबकि भारत में हमें यह 20 से 25 भारतीय रुपए में मिलता है। इसकी अपेक्षा चाय काफी सस्ती थी। एक कप चाय हमें 75 भारतीय रुपए में मिल गई। यहाँ चारों तरफ एक अजीब सी गंध फैली हुई थी। हमने अनुमान लगाया कि यह अवश्य ही मछलियों और झींगों के उबाले जाने से निकलती होगी। इसलिए चाय हलक के नीचे बड़ी कठिनाई से नीचे उतर पाई।

दीपा की भूख

देखते ही देखते शाम के 7 बज गए और हमें नई दिल्ली के लिए फ्लाईट मिल गई। हवाई जहाज फिर से समुद्रों के ऊपर उड़ान भरने लगा। यह 10.30 बजे दिल्ली पहुंचने वाली थी किंतु इस उड़ान में वास्तव में हमें साढ़े पांच घण्टे लगने वाले थे। एक घण्टे बाद दीपा रोने लगी।

लगभग एक घण्टे तक उसे लड्डू, मठरी, खाखरे, बिस्कुट आदि से बहलाने का प्रयास किया गया। भानु ने उसे मिल्क पाउडर से दूध बनाकर दिया किंतु वह चुप नहीं हुई। अंत में विजय ने एयरहोस्टेस से उबले हुए चावल का एक डिब्बा लेने का निर्णय किया। चावल देखकर दीपा खुश हो गई।

इधर दीपा चावल खाती जा रही थी और उधर अंधेरे आकाश में, हमारा हवाई जहाज धरती से लगभग तीस हजार फुट ऊपर, एक हजार किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से समुद्रों के ऊपर उड़ा जा रहा था। जाने कितने समुद्र, जाने कितने द्वीप, जाने कितने देश और जाने कितने लोग जो हमें दिखाई नहीं दे रहे थे किंतु वे सब थे और उनके ऊपर से होकर हवाई जहाज पूरे वेग से उड़ रहा था।

मैंने विचार किया, इन  अंधेरों, इन समुद्रों और इन दूरियों के बीच तरह-तरह की संस्कृतियां हँसती-मुस्कुराती हैं। मुझे याद आ रहे थे तेजी से पीछे छूटते बाली द्वीप के वे निर्धन हिन्दू जिनके पास गाय नहीं है, गंगाजी नहीं हैं, दूध-घी की नदियां नहीं हैं। गेहूं नहीं है, फिर भी वे इन सब चीजों से प्रेम करते हैं क्योंकि वे स्वयं को हिन्दू मानने और कहने में गर्व की अनुभूति करते हैं और इस अनुभूति को जीवित रखने के लिए हजारों साल से संघर्ष कर रहे हैं किंतु दुनिया की किसी भी संस्कृति को उनकी इस अनुभूति की किंचिंत परवाह नहीं है, यहाँ तक कि गाय, गंगा और गेहूं के देश में रहने वाले भारत को भी नहीं।

हम बाली द्वीप के हिन्दुओं को अजायबघर में रखी वस्तुओं की नुमाइश की तरह देखने जाते हैं और अपने देश में आकर फिर से अपनी ही जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं। कौन जाने बाली के हिन्दू कब तक इस संघर्ष को जीवित रख सकेंगे! मैंने यह प्रश्न स्वयं से इसलिए भी किया कि जब हजारों साल तक हिन्दू धर्म की छांव में रहने वाले जावा के हिन्दू, इस्लाम को अपनाकर श्रीकृष्ण की प्रतिमा के ‘घटत कच’ होने का अनुमान लगाते हैं तब हमें यह पता लग जाता है कि उन्हें बाली द्वीप के हिन्दुओं से कितनी सहानुभूति है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पागल सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक – अनुक्रमणिका

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पागल सुल्तान - bharatkaitihas.com
पागल सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक

पागल सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर दिल्ली सल्तनत के सुल्तन मुहम्मद बिन तुगलक के इतिहास के अध्यायों का क्रम दिया गया है। इस पृष्ठ पर दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करने से सीधे ही सम्बन्धित अध्याय को पढ़ा जा सकता है।

1.उसने उलेमाओं और काजियों पर कोड़े बरसाए!

2 सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने महल के तालाब में पिघला हुआ सोना भर दिया !

3. शहजादे जूना खाँ ने अपने पिता सुल्तान गयासुद्दीन की हत्या कर दी!

4. मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली की सड़कों पर सोने की अशर्फियां लुटा दीं!

5. किसानों की आय बढ़ाने का सपना देखने वाला पहला मुस्लिम शासक था वह!

6. सुल्तान द्वारा की गई कर-वृद्धि से गंगा-यमुना क्षेत्र के किसान जंगलों में भाग गए!

7. सुल्तान दिल्ली के कुत्ते-बिल्लियों और भिखारियों को पकड़कर दौलताबाद ले गया!

8. मुहम्मद बिन तुगलक ने सोने-चांदी के सिक्कों की जगह ताम्बे के सिक्के ढलवाए!

9. मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों से लड़ने की बजाय उन्हें सोने-चांदी के रुपए दिए।

10. कटोच राजपूतों ने मुहम्मद बिन तुगलक को पहाड़ी तलवार का स्वाद चखाया!

11. मुहम्मद बिन तुगलक ने ईरान, तिब्बत तथा चीन को जीतने के सपने देखे!

12. सुल्तान ने अपने चचेरे भाई के टुकड़े करके चावल में पकवाए!

13. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हो गई किंतु मुहम्मद बिन तुगलक कुछ नहीं कर सका!

14. चित्तौड़ के स्वतंत्र राज्य की पुनर्स्थापना हो गई और मुहम्मद बिन तुगलक कुछ नहीं कर सका!

15. बहमनी साम्राज्य की स्थापना हो गई किंतु मुहम्मद बिन तुगलक कुछ नहीं कर सका!

16. क्या मुहम्मद बिन तुगलक पागल था!

उलेमाओं और काजियों पर कोड़े बरसाए (1)

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उलेमाओं और काजियों पर कोड़े बरसाए - bharatkaitihas.com
उलेमाओं और काजियों पर कोड़े बरसाए

मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने सिपहसालारों का मांस चावल के साथ रांधकर उसके परिवार वालों को खाने के लिए भिजवाया। उसने उलेमाओं और काजियों पर कोड़े बरसाए

मुहम्मद बिन तुगलक ने ई.1325 से ई.1351 अर्थात् 26 साल की दीर्घ अवधि तक भारत पर शासन किया। उसका व्यक्तित्व आकर्षक तथा प्रभावोत्पादक था। उसके समान विद्वान एवं प्रतिभावान सुल्तान उसके पूर्व दिल्ली के तख्त पर नहीं बैठा था। वह उलेमाओं और काजियों की धूर्त्तता और मक्कारियों को अच्छी तरह समझता था। इसलिए उसने अपने राज्य में उलेमाओं और काजियों की एक न चलने दी।

मुहम्मद बिन तुगलक फारसी का ज्ञाता, उच्च कोटि का साहित्यकार तथा विद्याव्यसनी शासक था। वह तार्किक, सत्यान्वेषी तथा ओजस्वी वक्ता था। उसे अरबी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उसने साहित्य का गहन अध्ययन किया था। दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, गणित, ज्योतिष आदि शास्त्रों में उसकी विशेष रुचि थी। वह न केवल शुद्ध बौद्धिक शास्त्रों में, अपितु भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा आयुर्वेद आदि विद्याओं के अध्ययन में भी रुचि रखता था और उनका अनुशीलन करता था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

 
 

मुहम्मद बिन तुगलक के ये सब गुण सिक्के के एक पहलू की तरह थे। सिक्का का दूसरा पहलू बहुत भयावह एवं दरिंदगी से भरा हुआ था। खिलजियों का सर्वनाश उसी ने किया था। उसने अपने पिता की हत्या करके उसका राज्य और धन हड़प लिए। उसने अपने अमीरों की खाल खिंचवा ली तथा उनमें भूसा भरकर पूरे हिंदुस्तान में घुमाया।

उसने अपने सिपहसालारों का मांस चावल के साथ रांधकर उसके परिवार वालों को खाने के लिए भिजवाया। उसने उमेमाओं को कठोर दण्ड दिए और काजियों पर कोड़े बरसाए। मुहम्मद बिन तुगलक में महान आदर्शवाद के साथ नृशंसता, अपार उदारता के साथ निर्दयता तथा आस्तिकता के साथ-साथ घोर नास्तिकता मौजूद थी।

उसका दुर्भाग्य उससे दो कदम आगे चलता था। उसे किसी अच्छे काम का श्रेय नहीं मिला। किसी ने उसे विश्व का महान बादशाह माना तो किसी ने पागल कहकर उसकी भर्त्सना की। अनेक इतिहासकारों ने उसे मुस्लिम जगत् का विद्वानतम मूर्ख सुल्तान कहा तो अनेक इतिहासकारों ने उसे विभिन्नताओं का सम्मिश्रण बताया।

अंततः वह इतिहास में पागल बादशाह के रूप में विख्यात हुआ जिसने सोने-चांदी की जगह तांबे का सिक्का चलाया। जब वह अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि ले गया तो अपने साथ दिल्ली के लूले-लंगड़े भिखारियों एवं कुत्ते-बिल्लियों को भी ले गया। उनमें से बहुत से रास्ते में ही मर गए। उसने अपना राज्य इतना फैला दिया कि चौहदवीं शताब्दी के सीमित साधनों और अविश्वसनीय सूबेदारों के कारण नियंत्रण में रखना अत्यंत कठिन था।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि सुल्तान की सयैदों तथा इस्लाम-भक्त मुसलमानों को मृत्यु दण्ड देने की उसकी उत्कण्ठा तथा उसकी आस्तिकता गर्म तथा ठण्डी सांस लेने के समान प्रतीत होती है। यह एक ऐसा रहस्य है जो बुद्धिभ्रम उत्पन्न कर देता है।

इब्नबतूता ने लिखा है कि मुहम्मद दान देने तथा रक्तपात करने में सबसे आगे है। उसके द्वार पर सदैव कुछ दरिद्र मनुष्य धनवान होते हैं तथा कुछ प्राण दण्ड पाते हुए देखे जाते हैं। अपने उदार तथा निर्भीक कार्यों तथा और निर्दय तथा हिंसात्मक व्यवहारों के कारण जनसाधारण में उसकी बड़ी ख्याति है।

पढ़िए इस पागल बादशाह का वास्तविक और निष्पक्ष इतिहास, इस वी-ब्लॉग में।

इस पागल बादशाह की अच्छाइयां एवं बुराइयां आपके सामने कड़ी दर कड़ी शीशे की तरह साफ होती चली जाएंगी। आपने इतिहास की इतनी नंगी सच्चाइयों को पहले कभी नहीं देखा होगा, वह भी पूरी लेखकीय ईमानदारी के साथ जिसमें इतिहास की पवित्रता की रक्षा की गई हो।

अगली कड़ी में पढ़िए- सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने महल के तालाब में पिघला हुआ सोना भर दिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने महल में पिघला हुआ सोना भर दिया (2)

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सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने महल में पिघला हुआ सोना भर दिया

मक्कार गाजी खाँ , सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के नाम से दिल्ली का शासक बन गया और उसका पुत्र जूना खाँ हाथ मलता रह गया! जूना खाँ इसके लिए तैयार नहीं था।

मुहम्मद बिन तुगलक के बचपन का नाम फखरुद्दीन मुहम्मद जूना खाँ था। वह अपने चार भाइयों में सबसे बड़ा, सर्वाधिक महत्वाकांक्षी एवं सबसे प्रतिभावान था। उसका पालन-पोषण एक सैनिक की भांति हुआ था। जूना खाँ के पिता गाजी तुगलक ने उसकी शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध किया था। दिल्ली सल्तनत के अंतिम खिलजी सुल्तान खुसरोशाह ने गाजी खाँ तुगलक को कुछ घोड़ों का अध्यक्ष नियुक्त किया था। कुछ समय बाद गाजी खाँ के पुत्र जूना खाँ ने सुल्तान खुसरोशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचना आरम्भ किया।

जूना खाँ सुल्तान खुसरोशाह को मारकर स्वयं दिल्ली का तख्त हथियाना चाहता था। जूना खाँ का अहसान फरामोश पिता गाजी खाँ भी इस षड़यंत्र में शामिल हो गया। जब जूना खाँ ने सुल्तान खुसरोशाह को मार दिया तो गाजी खाँ गयासुद्दीन तुगलक के नाम से दिल्ली का सुल्तान बन गया और उसका पुत्र जूना खाँ हाथ मलता रह गया!

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

सुल्तान गयासुद्दीन ने तख्त पर बैठते ही अपने बड़े पुत्र जूना खाँ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया ताकि जूना खाँ बगावत न करे! कुछ दिन बाद सुल्तान ने शहजादे जूना खां को उलूग खाँ की उपाधि दी तथा उसे सल्तनत का विस्तार के लिये जाजनगर और वारंगल के अभियान पर भेज दिया।

शहजादे जूना खां ने जाजनगर पर विजय प्राप्त करके वारंगल को घेर लिया। कहने को तो जूना खां वारंगल के मोर्चे पर था किंतु उसका दिल हर समय दिल्ली के लिये तड़पता रहता था। उसे लगता था कि उसके पिता ने उसके साथ धोखा किया है। खिलजी सुल्तान खुसरोशाह को तख्त से हटाने की सारी साजिश जूना खां ने रची थी किंतु तख्त पर उसका पिता गाजी खां बैठ गया था।

इतना ही नहीं, गाजी खां ने खिलजियों की अकूत सम्पदा पर भी खुद ही अधिकार कर लिया था। यह सम्पदा दिल्ली के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन एबक के समय से ही भारतीय राजाओं से लूटकर एकत्रित की जा रही थी। इसमें अल्लाऊद्दीन खिलजी द्वारा राजपूताना, गुजरात एवं दक्षिण के राजाओं से लूटा गया अपार सोना-चांदी एवं हीरे-जवाहरात भी शामिल थे।

इस कारण सुल्तान का राजकोष धन तथा रत्नों से लबालब भरा हुआ था। तुगलक कालीन इतिहासकार इब्नबतूता ने लिखा है- ‘गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलकाबाद में एक महल बनवाया जिसकी ईंटें स्वर्ण से ढकी गईं। इस महल के भीतर दुनिया भर की विलासिता का बहुमूल्य सामान संग्रह किया गया। सुल्तान ने महल के भीतर एक सरोवर बनवाया जिसमें स्वर्ण को पिघलाकर भरा गया।’

पिता के अधिकार में चले गये विपुल धन और उसकी सत्ता ने शहजादे जूना खाँ को जुनूनी बना दिया। वह बचपन से ही अत्यंत महत्वाकांक्षी था लेकिन महत्वाकांक्षा के मार्ग में पिता के आ जाने से वह तड़प उठा था। अभी शहजादा वारंगल में ही था कि उसे अपने पिता सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु का समाचार मिला।

वह उसी समय वारांगल से दिल्ली के लिये दौड़ पड़ा। उसे भय था कि उसके भाइयों अथवा सल्तनत के अमीरों में से कोई भी दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लेगा! जब शहजादा जूना खाँ दिल्ली पहुँचा तो उसने अपने पिता को जीवित देखा, इस पर जूना खाँ बड़ा निराश हुआ। सुल्तान ने जूना खाँ को वारांगल का मोर्चा छोड़कर आने के लिए कड़ी फटकार भी लगाई।

जूना खाँ समझ गया कि दिल्ली का तख्त अपने आप उसके कदमों में आकर नहीं गिरेगा, न ही सल्तनत का ताज खुद ब खुद उसके सिर पर आकर सजेगा! तख्त और ताज को पाने के लिए उसे स्वयं ही कुछ करना होगा किंतु क्या करना होगा, यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था! अगली कड़ी में देखिए- जूना खाँ द्वारा अपने पिता की हत्या का षड़यंत्र!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादे जूना खाँ ने सुल्तान गयासुद्दीन की हत्या कर दी (3)

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शहजादे जूना खाँ ने सुल्तान गयासुद्दीन की हत्या कर दी

अब तक आप पढ़ चुके हैं कि किस प्रकार शहजादे जूना खाँ ने दिल्ली सल्तनत के खिलजी सुल्तान खुसरोशाह की हत्या कर दी और स्वयं दिल्ली के तख्त पर बैठने का प्रयास किया किंतु जब जूना खां का पिता गाजी तुगलक दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तो जूना खाँ के हसीन सपने धरे के धरे रह गए किंतु उसने हिम्त नहीं हारी, वह हर हाल में दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था। अब देखिए आगे।

ई.1324 में जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बंगाल विजय के लिये गया तब वह शहजादे जूना खाँ को राजधानी में छोड़ गया ताकि सुल्तान की अनुपस्थिति में कोई अमीर बगावत करके दिल्ली पर अधिकार नहीं कर ले।  शहजादे जूना खाँ इसे अपने लिए अच्छा अवसर समझा तथा उसने अपने पिता सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के विरुद्ध षड़यंत्र रचना आरम्भ किया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

कुछ महीने बाद जब सुल्तान गयासुद्दीन लखनौती तथा तिरहुत पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त दिल्ली लौटने लगा तो उसने शहजादे जूना खाँ को आज्ञा भेजी कि राजधानी से बाहर एक महल बनाया जाये जिससे सुल्तान उसमें रात्रि व्यतीत करके दूसरे दिन समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश कर सके।

इस पर जूना खाँ ने मीर-इमारत अहमद अयाज नामक एक अमीर को लकड़ी का एक महल बनाने की आज्ञा दी। जब सुल्तान वापस आया तब शहजादे ने बड़े समारोह के साथ उसका स्वागत किया। तुगलकाबाद से तीन-चार मील दूर अफगानपुर में सुल्तान को प्रीतिभोज देने के लिए एक शामियाना लगवाया गया। जब भोजन समाप्त हो गया तब समस्त आमन्त्रित अतिथि शामियाने के बाहर निकल गये।

केवल सुल्तान तथा उसका एक छोटा पुत्र महमूद खाँ, जिसमें सुल्तान की विशेष अनुरक्ति थी, शामियाने के भीतर रह गये। इसी समय शहजादे जूना खाँ ने सुल्तान से पूछा कि क्या जो हाथी बंगाल से लाये गये हैं, उनका संचालन किया जाये!

सुल्तान इस प्रस्ताव से सहमत हो गया। जब हाथियों का संचालन हो रहा था तब अचानक शामियाना गिर पड़ा और सुल्तान तथा उसके अल्पवयस्क पुत्र महमूद खाँ की मृत्यु हो गई। उसी रात को सुल्तान का शरीर तुगलकाबाद के मकबरे में दफन कर दिया गया।

इब्नबतूता ने सुल्तान की मृत्यु का सारा दोष जूना खाँ पर डाला है। राजनीति वैसे भी किसी को सगा नहीं मानती किंतु चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत की राजनीति रक्त-रंजित षड़यन्त्रों से भरी हुई थी।

इस युग में कोई किसी का कुछ नहीं लगता था। राज्य सत्ता, स्त्री, सम्पत्ति तथा भूमि के लिये लोग अपने भाई, बहिन, पुत्र, पिता तथा पत्नी तक के प्राण ले लेते थे।

जूना खाँ ने भी यही किया था। उसने राज्य, धन और अधिकार हड़पने के लिये अपने पिता तथा भाई के प्राण ले लिये थे।

आखिर उसके पिता गयासुद्दीन ने भी इसी राज्य, धन और अधिकार पाने के लिये पूर्ववर्ती सुल्तान खुसरोशाह के प्राण हर लिए थे।

सुल्तान की मृत्यु के तीन दिन बाद जूना खाँ, मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तथा चालीस दिन तक काले वस्त्र पहन कर अफगानपुरी में शोक मनाता रहा।

जब मरहूम सुल्तान गयासुद्दीन के समस्त अन्तिम संस्कार सम्पन्न हो गये तब जूना खाँ ने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। मार्च 1325 में भव्य समारोह के साथ जूना खाँ का राज्याभिषेक हुआ।

वह मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसे अपने पिता से अत्यन्त संगठित तथा सुव्यवस्थित विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था।

तत्कालीन लेखक मेंहदी हुसैन के अनुसार इतना विशाल साम्राज्य तब तक किसी भी तुर्क सुल्तान को अपने पिता से नहीं मिला था। उसके पिता का राजकोष धन तथा रत्नों से परिपूर्ण था। इसलिए मुहम्मद बिन तुगलक को सुल्तान बनते समय किसी भी प्रकार का आर्थिक संकट नहीं था।

तख्त पर बैठते समय मुहम्मद बिन तुगलक के तीन भाई जीवित थे किंतु किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। इस प्रकार उसे न बाह्य आक्रमणों का भय था और न आन्तरिक विद्रोह का।

अगली कड़ी में पढ़िए- मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली की सड़कों पर सोने की अशर्फियां लुटा दीं!

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