Sunday, July 14, 2024
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16. क्या मुहम्मद बिन तुगलक पागल था!

इस शृंखला में मैंने चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत के एक प्रमुख शासक मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में अब तक पन्द्रह कड़ियां प्रस्तुत की हैं, जिनमें उसके काल में हुई प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया है। यह सोलहवीं तथा अंतिम कड़ी है।

मुहम्मद बिन तुगलक आज से लगभग छः सौ पहले के भारत का शासक था। उस समय के भारत में मुस्लिम शासकों का दृष्टिकोण अपने राजकोष को सोने-चांदी से भरने, हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने, अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करने तथा अपने विरोधियों के प्राण लेने तक सीमित होता था किंतु मुहम्मद बिन तुगलक ने इन कार्यों पर ध्यान देने की बजाय ऐसे कार्य करने के प्रयास किए जो किसी भी बड़े राष्ट्र के शासक को करने चाहिए।

मुहम्मद बिन तुगलक के निर्णय तथा योजनाएं अपने समय से बहुत आगे थे जिन्हें समझ पाना उस काल के मंत्रियों एवं सेनापतियों के लिए अत्यंत कठिन था। इस कारण कुछ इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक पर पागल होने के आरोप लगाए हैं।

इस कड़ी में हम इतिहासकारों के इसी आरोप की जांच करेंगे कि क्या मुहम्मद सचमुच पागल था!

मुहम्मद बिन तुगलक का व्यक्तित्व प्रतिभा, महत्वाकांक्षा और दुर्भाग्य का अनोखा सम्मिश्रण दिखाई देता है। उसकी समस्त योजनाओं पर इन्हीं तीन बातों का प्रभाव दिखाई देता है। उसकी प्रतिभा ने उसे नई योजनाएं बनाने के लिए प्रेरित किया, उसकी महत्वाकांक्षाओं ने उसे पिता और भाई की हत्या जैसे क्रूर कर्म करने के लिए प्रेरित किया और उसके दुर्भाग्य ने उसकी प्रत्येक योजना को विफल कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

उस काल में सल्तनत के मंत्री प्रायः मुल्ला-मौलवी और उलेमा हुआ करते थे, उनका दृष्टिकोण संकुचित होता था और वे राज्य को अपने हिसाब से चलाना चाहते थे जिनमें दूसरे धर्म वालों के लिए जगह नहीं होती थी। मुहम्मद को यह बात पसंद नहीं थी, इसलिए वह मुल्ला-मौलवियों की सलाह की उपेक्षा करता था।

यदि कोई मुल्ला-मौलवी, मुफ्ती या काजी जनता पर अत्याचार करता हुआ पाया जाता था तो सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक उस मुल्ला-मौलवी को दण्डित करता था। यहाँ तक कि उन्हें सरेआम कोड़ों से पिटवाता था!

सुल्तान ने उलेमाओं को न्याय करने के अधिकार से वंचित कर दिया जिसे वे अपना एकाधिकार समझते थे। इस कारण राज्य में उलेमाओं का वर्चस्व समाप्त हो गया और वे सुल्तान के विरोधी होकर उसकी निंदा करते थे।

जियाउद्दीन बरनी नामक एक उलेमा तो सुल्तान का इतना विरोधी था कि उसने अपनी पुस्तक में सुल्तान के काल की घटनाओं को पूरी तरह बिगाड़कर लिखा ताकि सुल्तान को सिरफिरा सिद्ध किया जा सके!

मुहम्मद बिन तुगलक भारत के देशी अमीरों की अयोग्यता के कारण अपनी सल्तनत में विदेशी अमीरों को उच्च पद देता था। इस कारण देशी अमीर सुल्तान के विरोधी हो गए। हालांकि विदेशी अमीर धोखेबाज थे और अवसर मिलते ही बगावत कर देते थे।

मुहम्मद बिन तुगलक के दुर्भाग्य से उसके शासन काल में दो-आब में लम्बा दुर्भिक्ष पड़ा। इस कारण सुल्तान अपना दरबार सरगद्वारी ले गया और वहाँ पर ढाई वर्ष तक रहकर अकाल-पीड़ितों की सहायता करता रहा। उसने किसानों को लगभग 70 लाख रुपये तकावी के रूप में बँटवाये तथा बड़ी संख्या में कुएँ खुदवाए।

मुहम्मद बिन तुगलक में महान् आदर्शवाद के साथ नृशंसता, अपार उदारता के साथ निर्दयता तथा आस्तिकता के साथ-साथ घोर नास्तिकता मौजूद थी। इसलिये कुछ इतिहासकारों ने उसे विभिन्नताओं का सम्मिश्रण कहा है।

इब्नबतूता लिखता है- मुहम्मद दान देने तथा रक्तपात करने में सबसे आगे है। उसके द्वार पर सदैव कुछ दरिद्र मनुष्य धनवान होते हैं तथा कुछ प्राण दण्ड पाते देखे जाते हैं। अपने उदार तथा निर्भीक कार्यों और निर्दय तथा हिंसात्मक व्यवहारों के कारण जन साधारण में उसकी बड़ी ख्याति है। यह सब होते हुए भी वह बड़ा विनम्र तथा न्यायप्रिय व्यक्ति है। धार्मिक अवसरों के प्रति उसकी बड़ी सहानुभूति है। वह प्रार्थना बड़ी सावधानी से करता है और उसका उल्लंघन करने पर कठोर दण्ड की आज्ञा देता है। उसका वैभव विशाल है और उसका आमोद-प्रमोद साधारण सीमा का उल्लंघन कर गया है किन्तु उसकी उदारता उसका विशिष्ट गुण है।

बरनी लिखता है- सुल्तान की शारीरिक तथा मानसिक शक्तियाँ असीम गुण-सम्पन्न नहीं समझी जा सकतीं और उसकी साधारण दयालुता तथा उसकी सैयदों तथा इस्लाम-भक्त मुसलमानों को मृत्यु-दण्ड देने की उत्कण्ठा तथा उसकी आस्तिकता गर्म एवं ठण्डी साँस लेने के समान प्रतीत होती हैं। यह एक ऐसा रहस्य है जो बुद्धिभ्रम उत्पन्न कर देता है।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि ऊपर से देखने पर हमें प्रतीत होता है कि मुहम्मद विरोधी तत्त्वों का आश्चर्यजनक योग था किन्तु वास्तव में वह ऐसा नहीं था। गवेषणात्मक दृष्टि से देखने पर ये विभिन्नताएँ निर्मूल सिद्ध हो जाती हैं। वह मध्यकालीन शासकों में सर्वाधिक विद्वान् तथा प्रतिभाशाली था। उसकी योजनाएँ, उसकी बुद्धिमत्ता तथा उसके व्यापक दृष्टिकोण की परिचायक हैं। उसकी विफलताएं, उसकी मूर्खता की परिचायक नहीं हैं। उसके विचार तथा सिद्धान्त गलत नहीं थे। उसे विफलता कर्मचारियों की अयोग्यता तथा प्रजा के असहयोग के कारण मिलती थी। सुल्तान के आदर्श ऊँचे थे। उसने अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप में बदले का प्रयास किया। उसकी योजनाएँ विपरीत परिस्थितियों के कारण असफल रहीं परन्तु अनुकूल परिस्थितियों में उनकी सफल कार्यान्विती हो सकती थी।

मुहम्मद बिन तुगलक उदार तथा दानी सुल्तान था। वह अपराधियों तथा कर्त्तव्य भ्रष्ट लोगों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था परन्तु उसमें रक्त-रंजन की भावना नहीं थी। वह प्रायः उन विद्रोहियों को क्षमा कर देता था जिन्होंने भूत काल में राज्य की सेवा की थी।

प्रायः ऐसा हुआ कि जिन लोगों को उसने सम्मान तथा उच्च पद दिये, वे ही उसके शत्रु हो गये। ऐसी दशा में सुल्तान का अत्यंत क्रोधित हो जाना अस्वाभाविक नहीं था।

जब राज्य में चारों ओर अशांति फैली थी तब विरोधियों तथा आज्ञा का उल्लघंन करने वालों को कठोरता से दंड देना सुल्तान की रक्त-रंजन की प्रवृत्ति का द्योतक नहीं माना जा सकता। मुहम्मद बिन तुगलक के समक्ष जैसी परिस्थितियाँ थीं और जिस युग में वह शासन कर रहा था, उनमें मुहम्मद बिन तुगलक ने जैसा व्यवहार किया वैसा करना स्वाभाविक ही था।

मुहम्मद बिन तुगलक में उच्चकोटि की धार्मिकता थी परन्तु वह उलेमाओं के हाथ की कठपुतली नहीं बना। उसका दृष्टिकोण बड़ा व्यापक था। उसने राजनीति को धर्म से अलग रखा। 

एल्फिन्सटन पहला इतिहासकार था जिसने सुल्तान में पागलपन का कुछ अंश होने का लांछन लगाया। परवर्ती यूरोपीय इतिहासकारों हैवेल, इरविन, स्मिथ तथा लेनपूल ने भी एल्फिन्स्टन के इस मत का अनुमोदन किया परन्तु आधुनिक इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते।

यद्यपि बरनी तथा इब्नबतूता ने सुल्तान के कार्यों की तीव्र आलोचना की है तथापि उस पर पागलपन का लांछन नहीं लगाया है। गार्डिनर ब्राउन ने लिखा है- उसके समय के किसी भी व्यक्ति ने इस बात की ओर संकेत नही किया है कि वह पागल था। उसके व्यावहारिक तथा सक्रिय चरित्र से यह पता नहीं लगता कि वह कोरा-काल्पनिक था।

इसी के साथ मुहम्मद बिन तुगलक पर यह शृंखला समाप्त होती है। इस ऐतिहासिक विवेचन में रुचि प्रदर्शित करने वाले समस्त दर्शकों के प्रति आभार।

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