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कुंवर भीमसिंह

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कुंवर भीमसिंह

कुंवर भीमसिंह मेवाड़ पर आक्रमण करने वाले मुगल सैनिकों के लिए साक्षात् काल बन गया। उसने मेवाड़ से लेकर गुजरात तक के क्षेत्र में मुगलों की चौकियां नष्ट कर दीं तथा सैंकड़ों मुगल सैनिकों को मार डाला।

ईस्वी 1680 के मध्य में जब औरंगजेब उदयपुर और चित्तौड़ में कई सौ मंदिरों को गिराकर अजमेर लौट गया तब महाराणा राजसिंह अरावली के दुर्गम पहाड़ों से निकलकर नाई गांव में आया। औरंगजेब ने अपने शहजादे अकबर को एक सेना के साथ चित्तौड़ में नियुक्त कर दिया था किंतु उदयपुर में वह किसी मुगल अधिकारी को नियुक्त करने का साहस नहीं कर सका। इसलिए उदयपुर नगर इस समय नितांत निर्जन पड़ा था।

महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब द्वारा मेवाड़ क्षेत्र में तोड़े गए मंदिरों का बदला लेने के लिए औरंगजेब द्वारा शासित क्षेत्र की मस्जिदों को तोड़ने का निर्णय किया। महाराणा ने औरंगजेब द्वारा मेवाड़ में तोड़े गए मंदिरों के पुनर्निर्माण के लिए औरंगजेब के कोषागारों से रुपया लूटने की योजना बनाई।

इन दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महाराणा राजसिंह ने अपने कुंवर भीमसिंह को गुजरात की तरफ भेजा। कुंवर भीमसिंह ने सबसे पहले ईडर पर आक्रमण किया तथा वहाँ के शाही थानों का रुपया लूट कर ईडर को लगभग नष्ट कर दिया।

इसके बाद भीमसिंह गुजरात के वड़नगर कस्बे में पहुंचा। वहाँ के मुगल अधिकारियों से कुंवर भीमसिंह ने 40 हजार रुपए छीन लिए। इसके बाद भीमसिंह ने अहमदनगर पहुंचकर वहाँ से दो लाख रुपए वसूल किए। बॉम्बे गजेटियर तथा राजप्रशस्ति के अनुसार कुंवर भीमसिंह ने गुजरात में एक बड़ी मस्जिद गिरवाई तथा गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित 300 अन्य मस्जिदें गिरा दीं।

महाराणा का मंत्री दयालदास मेवाड़ी सेना के साथ मालवा की तरफ भेजा गया। इस प्रदेश पर भी इन दिनों मुगलों का शासन था। दयालदास ने अनेक मुगल थानेदारों को मार डाला तथा अनेक थानों से पेशकश एवं दण्ड वसूल किया।

मंत्री दयालदास ने मालवा के कई स्थानों पर मुगल थानों को उजाड़कर मेवाड़ी थाने स्थापित कर दिए। इनमें से बहुत से क्षेत्र महाराणा कुंभा एवं महाराणा सांगा के समय मेवाड़ के अधीन हुआ करते थे। मंत्री दयालदास ने भी मालवा क्षेत्र में बहुत सी मस्जिदें गिराकर मेवाड़ में तोड़े गए मंदिरों का बदला लिया।

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महाराणा के मंत्री दयालदास को मालवा के मुगल थानों से इतना अधिक सोना प्राप्त हुआ कि वह इस सोने को ऊंटों पर लदवाकर उदयपुर ले आया। मेवाड़ी सेनाएं जगह-जगह धावे मारकर मुगलों के थाने उठा रही थीं किंतु इस काल के मुगलिया लेखकों ने बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी जीत के दावे और मेवाड़ी सेना की पराजय के किस्से लिखे हैं जो न केवल तथ्यों के तार्किक विश्लेषण के आधार पर अपितु तत्कालीन अन्य स्रोतों के आधार पर गलत सिद्ध हो जाते हैं।

कई लेखकों ने तो बादशाह की चाटुकारिता करने के लिए बड़े हास्यास्पद किस्से गढ़े हैं जिनमें से एक यह भी है कि जब बादशाह मेवाड़ से वापस अजमेर चला गया तो कुंवर भीमसिंह डर के मारे मेवाड़ छोड़कर गुजरात की तरफ भाग गया।

यह कैसा भय था कि राजकुमार तब डरा जब औरंगजेब मेवाड़ से चला गया! यह कैसा भय था कि भयभीत राजकुमार अपना राज्य छोड़कर औरंगजेब के राज्य की तरफ भागा! यह कैसा भय था कि भयभीत राजकुमार ने औरंगजेब के राज्य में 301 मस्जिदें तोड़ीं तथा स्थान-स्थान पर मुगलों के खजाने लूट लिए!

इस प्रकार मेवाड़ी सरदार तथा राजकुमार मुगलों के थाने और खजाने लूटते जा रहे और तत्कालीन मुगलिया इतिहासकार अपनी पुस्तकों में झूठ दर्ज करते जा रहे थे।

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उन दिनों ये खजाने वस्तुतः प्रत्येक थाने पर हुआ करते थे जिन्हें आज की भाषा में गवर्नमेंट ट्रेजरी या राजकीय कोषागार कहा जाता है। इन खजानों मे स्थानीय किसानों एवं व्यापारियों आदि से वसूले गए कर एवं चुंगी की राशि रहती थी जो स्थानीय मुगल कर्मचारियों के वेतन आदि का भुगतान करने के बाद शेष बची राशि प्रांतीय सूबेदार से होती हुई दिल्ली एवं आगरा के कोषागारों में पहुंचाई जाती थी।

महाराणा राजसिंह द्वारा बदनोर के ठिकाणेदार सांवलदास राठौड़ को बदनोर के निकट ठहरी हुई मुगल सेना पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। इस मुगल सेना में 12 हजार सिपाही थे।

वीर सांवलदास की सेना ने रात के समय मुगल शिविर पर कई ओर से एक साथ आक्रमण किया। इसका परिणाम यह हुआ कि मुगल सेनापति रुहिल्ला खाँ रात में ही बदनौर छोड़कर अजमेर भाग गया। राठौड़ों ने उसके डेरे लूट लिए।

महाराणा के आदेश से ठाकुर केसरी सिंह ने चित्तौड़ में ठहरी हुई मुगल सेना पर आक्रमण किया तथा मुगलों के 18 हाथी, 2 घोड़े और कई ऊंट छीनकर ले आया। महाराणा के कुंवर गजसिंह ने बेगूं में ठहरी हुई मुगल सेना पर हमला बोला और बेगूं को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इसमें वे मस्जिदें भी शामिल थीं जो मुगलों द्वारा बनाई गई थीं।

महाराणा राजसिंह के कुंअर जयसिंह ने बहुत से मेवाड़ी सरदारों के साथ चित्तौड़ में तैनात शहजादे अकबर पर रात के समय हमला बोला। इस हमले में मुगलों के एक हजार सिपाही और तीन हाथी मारे गए। अकबर भी रातों-रात चित्तौड़ छोड़कर भाग गया तथा राजपूतों ने मुगलों के 50 शाही घोड़े, शाही निशान तथा शाही नक्कारा आदि छीन लिए और तंबू तोड़ डाले।

इन हमलों से घबरा कर औरंगजेब ने महाराणा से सुलह-संधि की बात चलाई किंतु दुर्भाग्यवश 22 अक्टूबर 1680 को किसी ने महाराणा राजसिंह को धोखे से जहर मिश्रित भोजन खिला दिया जिससे महाराणा की मृत्यु हो गई। महाराणा का निधन भारत-भूमि के लिए बहुत बड़ी क्षति थी।

महाराणा राजसिंह मुगलों के विरुद्ध जीवन भर लड़ता रहा। उसने औरंगजेब के विरुद्ध कई बड़ी कार्यवाहियां की थीं। जब औरंगजेब ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से विवाह करना चाहा तो महाराणा राजसिंह ने चारुमती के प्राणों और धर्म की रक्षा करने के लिए उससे विवाह किया।

जब औरंगजेब ने ब्रज भूमि के मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया तो महाराणा राजसिंह ने ब्रज भूमि से लाए गए श्रीनाथजी के विग्रह को मेवाड़ राज्य में प्रतिष्ठित करवाया तथा महाराणा ने स्वयं सीहोड़ गांव तक आकर भगवान श्रीनाथजी की अगवानी की।

श्रीनाथजी का यह विग्रह भारत भर के हिन्दुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। भगवान की प्रतिमा अथवा मूर्ति को विग्रह कहा जाता है। इस विग्रह को महाप्रभु वल्लभाचार्य ने आगरा के शासक सिकन्दर लोदी के समय में गिरिराज पर्वत से खोजा था तथा भक्त-कुल-शिरोमणि सूरदास को इस विग्रह की सेवा में नियुक्त किया था। भक्तराज सूरदास जब तक जीवित रहे, वे नित्य-प्रतिदिन इस प्रतिमा के समक्ष कीर्तन एवं नृत्य करते रहे। सूरदास के हजारों पदों को सबसे पहले भगवान की इसी प्रतिमा ने सुना था।

ई.1679 में जब औरंगजेब ने भारत में जजिया कर लगाया था, तब महाराणा राजसिंह ने छत्रपति शिवाजी की तरह औरंगजेब को पत्र लिखकर धिक्कारा था। जब औरंगजेब ने जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह की सुन्नत करके उसे मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रचा तो महाराणा राजसिंह ने ही राजकुमार अजीतसिंह को संरक्षण दिया था।

इन सब कारणों से महाराणा राजसिंह औरंगजेब की आंखों में उसी तरह खटकता था जिस तरह बुंदेलखण्ड का वीर राजा छत्रसाल, जोधपुर का महाराजा जसवंतसिंह तथा मराठों का राजा छत्रपति शिवाजी खटकता था। औरंगजेब, शस्त्र और सेना के बल पर राजसिंह को नहीं जीत सकता था किंतु हिन्दुओं के दुर्भाग्य ने महाराणा राजसिंह को अकस्मात् मृत्यु के हाथों में सौंप दिया था।

अब औरंगजेब मेवाड़ की तरफ से निश्चिंत होकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति मराठों के विरुद्ध लगा सकता था। दुर्दैव से मराठों के राजा छत्रपति शिवाजी भी 4 अप्रेल 1680 को चिरनिद्रा में सो चुके थे।

आगे बढ़ने से पहले हम कुछ प्रमुख हिन्दू राजाओं की हत्याओं का उल्लेख करना चाहेंगे। इन हत्याओं ने भारतीय इतिहास की विजय-धारा को अवरुद्ध करके उसे पराभव के मुख में धकेल दिया था। इनमें से पहली हत्या थी सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जिसे ई.1192 में उसके ही सेनापतियों एवं हिन्दू राजाओं ने मुहमम्द गौरी के साथ षड़यंत्र करके मार डाला था।

दूसरी हत्या थी महाराणा कुंभा की जिसे उसके ही पुत्र ऊदा ने ई.1468 में राज्य के लोभ में षड़यंत्र करके मार डाला था। तीसरी बड़ी हत्या थी महाराणा सांगा की जिसकी हत्या ई.1528 में उसके अपने सरदारों ने की थी क्योंकि वह खानवा के युद्ध के बाद बाबर से लड़ाई जारी रखना चाहता था।

चौथी बड़ी हत्या थी महाराणा राजसिंह की। जिन दिनों राजसिंह मुगलों के विरुद्ध बड़ी कार्यवाही करने में संलग्न था, उसी दौरान महाराणा को भोजन में विष मिलाकर दे दिया। माना जाता है कि यह हत्या महाराणा राजसिंह के ही किसी सामंत ने करवाई थी, क्योंकि महारणा राजसिंह औरंगजेब से युद्ध जारी रखना चाहता था और कुछ सामंत इस युद्ध को बंद कर देना चाहते थे।

इन हत्याओं के क्रम में पांचवी हत्या छत्रपति शिवाजी की बताई जाती है। हालांकि उनकी हत्या हुई या बीमारी से मृत्यु इस सम्बन्ध में इतिहासकारों में मतभेद है। इसकी विवेचना हम फिर कभी करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब का चौथा बेटा

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औरंगजेब का चौथा बेटा - bharatkaitihas.com
औरंगजेब का चौथा बेटा

मजहबी कट्टरता का शिकार औरंगजेब अपनी और अपने पूरे परिवार की जिंदगी को नर्क बना चुका था। उसके बेटे-बेटियों में से अधिकांश या तो जेल में सड़ रहे थे या फिर मौत के मुंह में जा चुके थे। अपने भाई बहिनों का हश्र देखकर औरंगजेब का चौथा बेटा अकबर बागी हो गया।

जब औरंगजेब और उसके तीन शहजादे आजम, अकबर तथा कामबख्श उदयपुर और चित्तौड़ में हिन्दू मंदिरों को तुड़वा रहे थे तब वीर दुर्गादास ने दक्खिन के मोर्चे पर नियुक्त शहजादे मुअज्जम को पत्र लिखा कि जिस प्रकार तुम्हारा पिता दक्खिन की सूबेदारी छोड़कर आगरा चला आया था और बादशाह बन गया था, उसी प्रकार तुम भी राठौड़ों की सहायता से आगरा के बादशाह बन सकते हो किंतु शहजादे मुअज्जम ने वीर दुर्गादास के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया।

औरंगजेब का सबसे बड़ा शहजादा मुहम्मद सुल्तान इस समय दिल्ली के सलीमगढ़ दुर्ग में बंद था। जब आजम ने वीर दुर्गादास के पत्र का जवाब नहीं दिया तो दुर्गादास ने मारवाड़ में कैम्प कर रहे शहजादे अकबर से सम्पर्क किया तथा उसे समझाया कि अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ ने भारत की हिन्दू शक्तियों से मेल-मिलाप रखकर इतने बड़े देश पर राज्य किया किंतु औरंगजेब हिन्दुओं को मारकर इस देश पर राज्य करना चाहता है जो कि संभव नहीं है।

कुछ ही समय में बुंदेले, मराठे, जाट, सतनामी, सिक्ख एवं राजपूत, मुगलों के राज्य को पूरी तरह नष्ट कर देंगे, तब तुम लोग बादशाह नहीं बन पाओगे। अतः बुद्धिमानी इसी में है कि समय रहते तुम अपने पिता का पक्ष छोड़कर राजपूतों के पक्ष में आ जाओ और हमारे सहयोग से बादशाह बनकर मुगलों के राज्य को बचा लो।

औरंगजेब ने अपने पिता को बंदी बनाकर और भाइयों तथा भतीजों को मारकर मुगलिया तख्त प्राप्त किया था इसलिये वह हर किसी के प्रति आशंकित रहता था। इस शंकालु प्रवृत्ति के कारण वह अपने पुत्रों को न केवल प्रशासन के महत्वपूर्ण कार्यों से दूर रखता था, अपितु उनके पीछे गुप्तचर भी लगाये रखता था।

इस कारण वह अपना कोई योग्य उत्तराधिकारी तैयार नहीं कर सका। औरंगजेब अपने अमीरों, उमरावों, एवं सेनापतियों को भी संदेह की दृष्टि से देखता था। इसलिए वह राज्य के छोटे-से-छोटे काम को स्वयं करने का प्रयत्न करता था। फलतः उसके मंत्री और अधिकारी निर्णय लेने में असमर्थ हो गये।

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औरंगजेब के सेनापति घोर संकट में भी असहाय होकर बादशाह के आदेशों के लिए मुँह ताकते रहते थे। जब तक बादशाह में शारीरिक योग्यता रही, उसने सल्तनत को नियंत्रित रखा किन्तु उसकी वृद्धावस्था आते-आते सल्तनत छिन्न-भिन्न होने लगी। शहजादा अकबर इन समस्त परिस्थितियों को समझ रहा था।

औरंगजेब का चौथा बेटा अकबर 11 सितम्बर 1657 को औरंगाबाद में पैदा हुआ था। उसकी माँ दिलरास बानू ईरान की शहजादी थी। जब अकबर एक महीने का था तो उसकी माँ दिलरास बानू का निधन हो गया और जब औरंगजेब ने शाहजहाँ को बंदी बनाया था तब अकबर केवल नौ माह का शिशु था। मातृ-विहीन अकबर का पालन-पोषण औरंगजेब के आदेश से अकबर की सबसे बड़ी पुत्री जेबुन्निसा के संरक्षण में हुआ था।

चूंकि जेबुन्निसा स्वयं भी बहुत अच्छे स्वभाव की और विदुषी महिला थी, इसलिए उसने अपने मातृविहीन भाई अकबर को बहुत प्यार से पाला और पढ़ा-लिखा कर विद्वान बनाया। जिस प्रकार जेबुन्निसा भी अपने ताऊ दारा शिकोह की तरह सूफी मत में अधिक विश्वास रखती थी, उसी प्रकार अकबर भी दूसरे धर्मों के प्रति कट्टर नहीं था। अकबर की पत्नी सलीमा बानू बेगम दारा शिकोह की पौत्री थी तथा वह भी दूसरे धर्मों के लोगों के प्रति सहानुभूति रखती थी।

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औरंगजेब का चौथा बेटा अकबर चूंकि चौथे नम्बर का शहजादा था, इसलिए उसे सहज रूप से अपने पिता का तख्त प्राप्त नहीं हो सकता था। इसके लिए उसे एक न एक दिन बगावत का रास्ता अपनाना ही पड़ता। यह एक अच्छा प्रस्ताव था कि वीर राजपूत जाति स्वयं आगे होकर उसे सहायता देने का प्रस्ताव दे रही थी। इसलिए जब अकबर को वीर दुर्गादास का प्रस्ताव मिला तो औरंगजेब का मन डोल गया।

औरंगजेब का चौथा बेटा अकबर अपने पिता औरंगजेब के आदेश से राठौड़ों के विरुद्ध लड़ अवश्य रहा था किंतु उसे समझ में आ रहा था कि राजपूतों से लड़कर राज्य नहीं किया जा सकता। अतः अकबर ने जोधपुर के हाकिम तहव्वर खाँ के माध्यम से दुर्गादास से बात की और अपने पिता औरंगजेब से विद्रोह करने को तैयार हो गया। 1 जनवरी 1681 को मारवाड़ राज्य के नाडोल नामक स्थान पर शहजादे अकबर तथा वीर दुर्गादास की एक गुप्त बैठक हुई जिसके पश्चात् अकबर ने स्वयं को दिल्ली एवं आगरा का नया बादशाह घोषित कर दिया तथा औरंगजेब को उसके पद से हटा दिया।

अकबर के इस फैसले पर उसके साथ चले रहे मुल्ला-मौलवियों ने अपनी छाप लगाई तथा यह घोषित किया कि चूंकि औरंगजेब का आचरण इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है, इसलिए उसे बादशाह बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

यह समाचार सुनकर औरंगजेब के पैरों के तले से जमीन खिसक गई। औरंगजेब अपने इस मातृ-विहीन पुत्र को सबसे अधिक प्यार करता था। यहाँ तक कि एक बार स्वयं औरंगजेब ने उससे कहा कि केवल अल्लाह इस बात का गवाह है कि मैंने अपने बेटों में सबसे ज्यादा प्यार केवल तुझसे किया है।

औरंगजेब की शाही सेना उस समय अकबर के पास थी जिसमें 70 हजार सैनिक थे। अकबर इस सेना को लेकर औरंगजेब को कैद करने के लिए अजमेर के लिए रवाना हो गया। यह खबर सुनकर औरंगजेब की स्थिति दयनीय हो गई। उस समय उसके पास अंगरक्षकों, खानसामों, बावर्चियों, भिश्तियों और अन्य सैनिक-असैनिक कर्मचारियों को मिलाकर लगभग दस हजार आदमी थे।

फिर भी औरंगजेब, षड़यंत्रों की दुनिया का पुराना खिलाड़ी था, इसलिए उसने अपने बेटे के सामने हिम्मत नहीं हारी। उसने शहजादे मुअज्जम के पास अपने संदेश वाहक दौड़ाए कि वह अपनी सेना लेकर तुरंत अजमर पहुंचे।

औरंगजेब ने इनायत खाँ को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया। बहरमंद खाँ को सैन्य अभियान का कमाण्डर बनाया तथा उसे निर्देश दिये कि शाही सैनिकों के चारों ओर किलेबंदी की जाये तथा अजमेर की तरफ आने वाले मार्गों की रक्षा की जाये।

असद खाँ बटलाया को पुष्कर की तरफ आने वाले मार्ग तथा झील पर नियुक्त किया गया। अबू नासर खाँ को असद खाँ का नायब नियुक्त करके अजमेर के पश्चिम की ओर दृष्टि रखने का काम दिया गया। अकबरी महल के निकट अजमेर की गलियों में तोपें लगा दी गईं जिसमें आजकल राजकीय संग्रहालय चल रहा है। 

अहमदाबाद के नाजिम हाफिज मोहम्मद अमीन तथा अन्य अधिकारियों को निर्देश दिये गये कि वे हर समय शस्त्र लेकर तैयार रहें तथा अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहें। उम्दतुलमुल को किलेबंदी की निगरानी रखने का काम दिया गया। शहजादे के वकीलों शुजात खाँ तथा बादशाह खाँ को गढ़ बीठली में बंदी बना लिया गया। हिम्मत खाँ को गढ़ बीठली का कमाण्डर नियुक्त किया गया।

इधर औरंगजेब तेजी से अजमेर की किलेबंदी कर रहा था और उधर औरंगजेब का चौथा बेटा अकबर अनुभवहीन होने के कारण औरंगजेब की दयनीय स्थिति का आकलन नहीं कर सका। इस कारण वह कदम-कदम सूंघता हुआ बहुत धीमी गति से अजमेर की ओर बढ़ रहा था। 15 दिन में उसने 120 मील की दूरी तय की। ये 15 दिन औरंगजेब जैसे अनुभवी सेनापति के लिए पर्याप्त थे।

उसने आस-पास के सरदारों को बुलाकर काफी सेना एकत्रित कर ली। यहाँ तक कि दक्षिण में नियुक्त मुअज्जम भी तेज गति से चलता हुआ अजमेर आकर अपने पिता से मिल गया। इससे औरंगजेब की सेना भी बहुत विशाल हो गई।

17 जनवरी 1681 को शहजादा अकबर अपने राजपूत साथियों के साथ, अजमेर से 22 मील दक्षिण में स्थित बुधवाड़ा नामक स्थान पर पहुँच गया। अकबर की सहायता के लिए न केवल पच्चीस हजार राठौड़ सरदार मौजूद थे अपितु उदयपुर के महाराणा जयसिंह के भी 6 हजार सैनिक अकबर की सहायता के लिए आ गए थे। औरंगजेब भी अजमेर से निकलकर दौराई आ गया परंतु यहाँ से आगे बढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई।

अब औरंगजेब का चौथा बेटा तथा औरंगजेब की सेनाओं के बीच की दूरी केवल 3 मील रह गई थी। जैसे-जैसे दोनों सेनाओं के बीच की दूरी घटती जाती थी, वैसे-वैसे बादशाही अमीर अकबर की सेना से निकलकर औरंगजेब के लश्कर में मिलते जाते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब का छल

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औरंगजेब का छल

मजहबी कट्टरता से पीड़ित औरंगजेब अपने शत्रुओं के विनाश के लिए किसी भी प्रकार का नीच कार्य कर सकता था। इस मामले में वह अपनी औलादों को भी नहीं बख्शता था। औरंगजेब का छल उसके पूरे जीवन में दिखाई देता है। औरंगजेब ने अपने पुत्र अकबर को खत्म करने के लिए एक झूठा पत्र लिख कर वीर दुर्गादास तक पहुंचा दिया!

अजमेर के निकट दौराई के मैदान में औरंगजेब तथा शहजादे अकबर की सेनाएं एक-दूसरे से तीन मील की दूरी पर पड़ाव डाले हुए थीं। औरंगजेब को वे पुराने दिन याद आ गए जब यहाँ से कुछ ही दूरी पर तारागढ़ की पहाड़ी की तलहटी में औरंगजेब तथा उसके बड़े भाई दारा शिकोह की सेनाओं के बीच में अंतिम युद्ध हुआ था और जिसके बाद दारा शिकोह भारत छोड़कर भाग गया था।

उस समय यदि आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह औरंगजेब के पक्ष में नहीं आया होता और मारवाड़ का राजा महाराजा जसवंतसिंह इस युद्ध से दूर नहीं रहा होता और यदि किशनगढ़ का महाराजा रूपसिंह राठौड़ तथा बूंदी का महाराजा छत्रसाल हाड़ा जीवित होते तो औरंगजेब का छल भी उसे अपने भाई दारा पर विजय नहीं दिलवा सकता था किंतु समय का पहिया काफी आगे घूम चुका था।

महाराजा जयसिंह, महाराजा जसवंतसिंह, महाराजा रूपसिंह तथा महाराजा छत्रसाल हाड़ा जीवन के रंगमंच पर अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करके जा चुके थे और औरंगजेब के मुकाबले में तब अनुभवहीन वली-ए-अहद दारा शिकोह खड़ा था और आज उसका अपना अनाड़ी शहजादा मुहम्मद अकबर खड़ा था।

अंतर केवल इतना आया था कि औरंगजेब को अब आम्बेर के कच्छवाहों की पहले जैसी सेवाएं प्राप्त नहीं थीं और मारवाड़ के पच्चीस हजार राठौड़ आज औरंगजेब के विरुद्ध अपनी भुजाओं पर तलवारों को तोल रहे थे। एक बड़ा अंतर और आया था, इस बार छः हजार मेवाड़ी वीर भी औरंगजेब के विरुद्ध सिर पर केसरिया बांध कर खड़े थे जिनसे औरंगजेब के पूर्वजों की लड़ाई पिछले आठ सौ सालों से लगातार चल रही थी।

औरंगजेब के लिए सबसे खराब बात यह थी कि उसके अपने 70 हजार मुगल सैनिक अकबर के नियंत्रण में थे। औरंगजेब ने वीर दुर्गादास द्वारा रचे गए इस चक्रव्यूह को भेदने का निर्णय लिया। इसके लिए ताकत की नहीं छल-बल और षड़यंत्र की आवश्यकता थी, दुर्दैव से औरंगजेब का छल उसे कभी भी हौंसला नहीं हारने देता था।

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औरंगजेब ने सबसे पहले अकबर के सबसे कमजोर सेनापति पर अपना जाल फैंका। पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब ने तहव्वर खाँ को अजमेर और जोधपुर का सूबेदार नियुक्त किया था और इस समय वह शहजादे अकबर का मुख्य सेनापति था जबकि तहव्वर खाँ का श्वसुर इनायत खाँ इस समय औरंगजेब का मुख्य सेनापति था।

औरंगजेब ने इनायत खाँ को आदेश दिये कि वह तहव्वर खाँ को अपने पास बुला ले और यदि वह नहीं आये तो तहव्वर खाँ के परिवार को समाप्त कर दे। इस पर इनायत खाँ ने अपने जवांई तहव्वर खाँ को बादशाह के आदेशों की सूचना भिजवाई कि या तो वह तुरंत आकर बादशाह से मिले या फिर बादशाह उसके बीवी-बच्चों को मार देगा।

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तहव्वर खाँ समझ गया कि औरंगजेब का छल ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। तहव्वर खाँ, एक पहर रात गये अकबर का शिविर छोड़कर औरंगजेब के लश्कर में चला गया। रात्रि में ही वह औरंगजेब से मिलने उसकी ड्यौढ़ी पर हाजिर हुआ। तहव्वर खाँ से कहा गया कि वह शस्त्र बाहर रखकर बादशाह से मिलने भीतर जाये किंतु तहव्वर खाँ ने शस्त्र बाहर रखने से मना कर दिया क्योंकि वह हमेशा शस्त्र लेकर ही बादशाह के समक्ष जाया करता था किंतु बादशाह के सिपाहियों ने तहव्वर खाँ की यह मांग स्वीकार नहीं की तथा तहव्वर खाँ को उसी स्थान पर मार दिया।

जिस रात तहव्वर खाँ, अकबर को छोड़कर औरंगजेब के पास गया, उसी रात औरंगजेब ने एक षड़यंत्र रचा। यह वही षड़यंत्र था जो किसी समय शेरशाह सूरी ने मारवाड़ के राव मालदेव के विरुद्ध रचा था। औरंगजेब ने राजपूतों को धोखा देने के लिये अकबर के नाम एक झूठा पत्र लिखकर दुर्गादास के शिविर में पहुँचवा दिया। यह पत्र इस प्रकार से था- मैं तेरे द्वारा राठौड़ों को धोखा देकर फँसा लाने से बहुत प्रसन्न हूँ। कल प्रातःकाल होते ही, मैं आगे से उन पर आक्रमण करूंगा और तू पीछे से हमला बोल देना। इस उपाय से राजपूत आसानी से नष्ट हो जायेंगे।

 जब यह पत्र दुर्गादास को मिला तो वह समझ नहीं सका कि यह औरंगजेब का छल है। अतः इस सम्बन्ध में अपना संदेह मिटाने के लिये वह अकबर के शिविर में पहुँचा परंतु उस समय अर्द्धरात्रि से भी अधिक समय बीत चुका था तथा अकबर गहरी नींद में सोया हुआ था। दुर्गादास ने अकबर के अंगरक्षकों से अकबर को जगाने के लिये कहा किंतु ऐसा करने की आज्ञा न होने के कारण अंगरक्षकों ने इस बात को मानने से मना कर दिया। इससे दुर्गादास क्रुद्ध होकर लौट गया।

इसके बाद दुर्गादास ने तहव्वर खाँ को अपने शिविर में बुलवाया। राठौड़ों ने तहव्वर खाँ की बहुत तलाश की परंतु उसके शाही सेना में चले जाने का समाचार मिला। इससे राठौड़ों का संदेह गहरा गया। उसी समय दुर्गादास को सूचित किया गया कि अकबर के साथ की पूरी मुस्लिम फौज औरंगजेब की तरफ जा रही है।

इस पर वीर दुर्गादास ने भी अपने राजपूत सिपाहियों को तुरंत शिविर छोड़कर मारवाड़ की तरफ रवाना हो जाने के आदेश दिए। इस प्रकार प्रातःकाल होने के तीन घण्टे पूर्व राजपूत भी अकबर का साथ छोड़कर चले गए।

प्रातःकाल होने पर अकबर के मूर्ख अंगरक्षकों ने उसे सूचित किया कि रात में ही समस्त मुगल सेना और राजपूत सेनाएं, शिविर छोड़कर जा चुकी हैं। अब तो अकबर बहुत घबराया। उसके पास केवल 350 निजी अंगरक्षक एवं असैन्य कर्मचारी ही रह गये थे। अकबर समझ गया कि यदि बादशाह तक इस सूचना के पहुंचने से पहले उसने दौराई का मैदान नहीं छोड़ा तो वह औरंगजेब द्वारा पकड़ लिया जाएगा। इसलिये अकबर अपनी एक बेगम, 25 दासियां तथा जवाहरातों से भरा हुआ एक बक्सा लेकर राठौड़ों के जाने की दिशा में रवाना हुआ।

इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि जब अकबर सुबह उठा तो उसने देखा कि वह अकेला ही रह गया है तो उसने अपनी बेगमों को घोड़ों पर बैठाया और अपना खजाना ऊंटों पर लादकर उसी दिशा में भागा जिस दिशा में राजपूतों के जाने की सूचना मिली थी। उसका जो सामान एवं कुटुम्बी तम्बू में छूट गए थे, उन्हें औरंगजेब ने अपने पास मंगवा लिया।

अकबर द्वारा जल्दबाजी में छोड़े गए सामान में एक पत्रावली भी थी जिसमें औरंगजेब की बड़ी शहजादी जेबुन्न्सिा एवं अकबर के बीच चल रहे पत्र व्यवहार की प्रतियां मौजूद थीं। दुर्दैव से यह पत्रावली भी औरंगजेब के हाथ लग गई।

इन पत्रों से ज्ञात हुआ कि शहजादी जेबुन्निसा ने अकबर को इस बात के लिए उकसाया था कि वह अपने पिता औरंगजेब से विद्रोह कर दे ताकि औरंगजेब को हटाकर अकबर को बादशाह बनाया जा सके क्योंकि औरंगजेब अपनी गलत नीतियों के चलते, चगताइयों के महान बादशाह बाबर द्वारा जीते गए मुगल साम्राज्य को नष्ट कर रहा था। 

जब मेरवाड़ा की पहाड़ियों में रहने वाली मेर जाति के आदिवासियों ने देखा कि शहजादा अकबर बहुत थोड़े से आदमियों के साथ राठौड़ों की तरफ जा रहा है तो वे तीर कमान लेकर उसका मार्ग रोककर खड़े हो गये। इस पर अकबर के साथ के स्त्री-पुरुषों ने मेरों पर तीर बरसाये किंतु मेर उन पर भारी पड़े। यह देखकर अकबर ने मेरों को जवाहरात से भरा बक्सा देकर उनसे सुरक्षित मार्ग खरीद लिया।

रबड़िया गांव के पास पहुंचकर अकबर ने दुर्गादास से भेंट की। तब जाकर दुर्गादास को सारी सच्चाई का पता लगा। उसने अपने आदमी मेरों के पीछे भेजे। दुर्गादास के आदमी जवाहरात से भरा हुआ बक्सा मेरों से वापस छीनकर लाए और अकबर को सौंप दिया।

हालांकि राजपूतों के खेमे में अब भी 25 हजार मारवाड़ी राजपूत एवं 6 हजार मेवाड़ी राजपूत मौजूद थे किंतु अब औरंगजेब के पास एक लाख से अधिक सैनिक हो गए थे। इस विशाल सेना से दौराई के खुले मैदान में युद्ध करने में कोई बुद्धिमानी नहीं थी। इसलिये दुर्गादास अकबर को अपने साथ लेकर मारवाड़ की तरफ रवाना हो गया। अकबर के भाग जाने से बादशाही शिविर में बड़ा आनंद मनाया गया।

इसके बाद औरंगजेब अपने सेनापतियों- शाहबुद्दीन खाँ, कुली खाँ, इंद्रसिंह आदि को बागियों का पीछा करने की आज्ञा देकर स्वयं अजमेर दुर्ग में लौट गया। औरंगजेब ने शहजादे मुअज्जम को भी अकबर को वापस लाने के लिये उसके पीछे भेजा किंतु अकबर को अपने बाप पर कतई विश्वास नहीं था। इसलिए अकबर ने अपने बड़े भाई मुअज्जम के साथ चलने से साफ इनकार कर दिया।

अकबर ने दुर्गादास से प्रार्थना की कि मैं अपने पिता औरंगजेब के जीवित रहते मारवाड़ या मेवाड़ में सुरक्षित नहीं हूँ। इसलिए मुझे शंभाजी के पास महाराष्ट्र भिजवा दिया जाए। इस पर वीर दुर्गादास ने अकबर तथा उसके हरम को अपने संरक्षण में लेकर दक्खिन पहुंचाने का निश्चय किया। उसने सत्रह हजार मारवाड़ी सिपाही और छः हजार मेवाड़ी सिपाहियों को मारवाड़ में शाही सेनाओं से युद्ध जारी रखने के लिए कहा और स्वयं आठ हजार राठौड़ सैनिकों को लेकर दक्खिन के लिए रवाना हो गया।

मुगलों की एक सेना अब भी दुर्गादास तथा अकबर के पीछे लगी हुई थी किंतु दुर्गादास ने दक्खिन जाने के लिए दुर्गम मार्ग अपनाया। 9 मई 1681 को अकबरपुर के पास दुर्गादास तथा शहजादे अकबर ने नर्मदा नदी पार की तथा वहाँ से महाराष्ट्र की राह पकड़ी। दुर्गादास और अकबर ने शंभाजी के पास जाने के लिए सीधे मार्ग का अनुसरण करने की बजाय टेढ़े-मेढ़े एवं दुर्गम मार्ग का अनुसरण किया ताकि औरंगजेब के सेनापति उनकी योजना को न समझ सकें।

अंत में इन लोगों ने मुगल सीमा पार कर ली तथा वे शंभाजी के राज्य में प्रवेश कर गए। इस सीमा पर शंभाजी के कई नामी-गिरामी मंत्रियों ने व्यक्तिशः उपस्थित होकर वीर दुर्गादास एवं शहजादे अकबर का स्वागत किया तथा उन्हें ससम्मान शंभाजी के पास ले गए।

शंभाजी ने अकबर को आश्वासन दिया कि वह शीघ्र ही एक बड़ी सेना लेकर औरंगजेब पर आक्रमण करने के लिए उत्तर भारत की तरफ अभियान करेगा। तब तक अकबर एक बादशाह की तरह शंभाजी के राज्य में अतिथि बनकर रह सकता है। वीर दुर्गादास ने अपने चार हजार राजपूत अकबर की रक्षा के लिए नियुक्त कर दिए।

जब औरंगजेब को शहजादे अकबर के शंभाजी की शरण में पहुंच जाने की सूचना मिली तो उसने भी दक्खिन की तरफ जाने का विचार किया। औरंगजेब ने शहजादे मुअज्जम शाह के पुत्र अजीमुद्दीन तथा वजीर जुमलात उल मुल्क असद खाँ को अजमेर में छोड़ दिया तथा स्वयं 8 सितम्बर 1681 को शंभाजी पर आक्रमण करने दक्खिन को चल दिया, जहाँ से वह कभी वापस लौटकर नहीं आया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादी जेबुन्निसा

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शहजादी जेबुन्निसा

औरंगजेब की सबसे बड़ी शहजादी जेबुन्निसा थी जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- ‘स्त्रियों का गहना।’ उसका जन्म 15 फरवरी 1638 को औरंगजेब की पहली बेगम दिलरास बानू के पेट से हुआ था जो कि ईरान के शाह वंश की शहजादी थी। इस राजवंश को ईरान के इतिहास में सफावी वंश के नाम से भी जाना जाता है।

जेबुन्निसा के जन्म के समय औरंगजेब दक्खिन का सूबेदार था तथा दौलताबाद के मोर्चे पर नियुक्त था। जब जेबुन्निसा चार वर्ष की थी तब औरंगजेब ने अपनी प्यारी बेटी की शिक्षा के लिए अपने दरबार में रहने वाली हाफिजा मरियम नामक एक विदुषी स्त्री को नियुक्त किया तथा उस्तानी बी नामक एक औरत को शहजादी को कुरान पढ़ाने के लिए नियुक्त किया। उस्तानी बी के प्रयत्नों से जेबुन्निसा ने केवल तीन साल की अवधि में सम्पूर्ण कुरान कण्ठस्थ कर ली।

इस प्रकार सात वर्ष की आयु में शहजादी जेबुन्निसा ने हाफिजा की उपाधि प्राप्त की। जेबुन्निसा की इस प्रतिभा से औरंगजेब बहुत प्रसन्न हुआ। इस अवसर पर औरंगजेब ने बड़ा उत्सव मनाया तथा औरंगाबाद की जनता को एक बड़ी दावत थी। सरकारी कर्मचारियों को एक दिन की छुट्टी दी गई तथा शहजादी को सोने की 30 हजार अशर्फियां पुरस्कार के रूप में दी गईं। शहजादी को कुरान पढ़ाने वाली उस्तानी बी को भी सोने की तीस हजार अशर्फियां दी गईं।

इसके बाद शहजादी जेबुन्निसा को विभिन्न विषयों की शिक्षा देने के लिए मोहम्मद सईद अशरफ मजनडारानी नामक शिक्षक को नियुक्त किया गया। वह भी अपने समय का प्रसिद्ध फारसी कवि था। औरंगजेब ने शहजादी जेबुन्निसा के लिए इस्लामिक दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र तथा साहित्य के साथ-साथ फारसी, अरबी तथा उर्दू पढ़ाने का भी प्रबंध किया। इस काल में इबरात लिखने की कला अर्थात् कैलिग्राफी को बहुत अच्छा माना जाता था। शहजादी जेबुन्निसा को कैलिग्राफी आर्ट भी सिखाई गई।

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विविध विषयों की शिक्षा प्राप्त करने के कारण जेबुन्निसा विदुषी बन गई तथा उसने दिल्ली में संसार के अनेक देशों से श्रेष्ठ पुस्तकें मंगवाकर एक विशाल पुस्तकालय बनाया। इस पुस्तकालय में पुस्तकों के संग्रहण, रख-रखाव, पाण्डुलिपियों के प्रतिलिपिकरण, जिल्दसाजी आदि कामों के लिए बहुत से शिक्षित लोगों को वेतन देकर नौकरी पर रखा गया। इस पुस्तकालय में साहित्य के साथ-साथ धर्म, दर्शन, विधि, इतिहास एवं तकनीकी आदि विषयों की पुस्तकों को रखा गया।

सुशिक्षित होने के कारण जेबुन्निसा दयालु हृदय की स्वामिनी थी तथा हर समय किसी न किसी की सहायता करने के लिए तत्पर रहती थी। विधवाओं तथा अनाथों को संरक्षण देना उसे विशेष रूप से प्रसिद्ध था। अपनी बुआ जहानआरा की तरह जेबुन्निसा भी हज के लिए मक्का एवं मदीना जाने वाले यात्रियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाती थी।

हालांकि औरंगजेब को चित्रकला, मूर्तिकला एवं संगीतकला से घृणा थी किंतु जेबुन्निसा को संगीत तथा साहित्य में बहुत रुचि थी और वह अपने समय की अच्छी गायिका थी।

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शहजादी जेबुन्निसा अपने ताऊ दारा शिकोह से अत्यंत प्रभावित थी तथा ‘मकफी’ के नाम से कविताएं लिखा करती थी। मकफी ईरानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है- ‘अदृश्य।’ संभवतः अपने पिता औरंगजेब के भय से वह किसी के समक्ष अपनी कविताओं का उल्लेख नहीं करती थी इसलिए उसने अपना छद्म नाम ‘मकफी’  अर्थात् ‘अदृश्य’ रखा था। जेबुन्निसा अपने पिता औरंगजेब की लाड़ली बेटी थी तथा औरंगजेब उसका बहुत सम्मान करता था। इस कारण जब औरंगजेब किसी से नाराज होता था तो जेबुन्निसा औरंगजेब से प्रार्थना करके उस व्यक्ति को क्षमा दिलवा देती थी।

जब 9 जून 1658 को औरंगजेब ने आगरा के लाल किले में घुसकर अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बनाया था उस समय जेबुन्निसा इक्कीस साल की युवती थी। औरंगजेब उसकी विद्वता से इतना अधिक प्रभावित था कि वह राजनीतिक मसलों पर इस बेटी की राय लेने लगा तथा उन पर अमल भी करने लगा। कुछ मुगल तवारीखों में लिखा है कि जब जेबुन्निसा औरंगजेब के दरबार में आया करती थी तो औरंगजेब अपने समस्त शहजादों को जेबुन्निसा की अगवानी करने के लिए भेजता था। जब भी शहजादी औरंगजेब के दरबार में आती थी, तब हर बार ऐसा ही किया जाता था।

जेबुन्निसा की चार छोटी बहिनें भी थीं- जीनत-उन्निसा, जुब्दत-उन्निसा, बद्र-उन्निसा तथा मेहर-उन्निसा किंतु उन चारों में से किसी को भी औरंगजेब के दरबार में आने का सम्मान प्राप्त नहीं था। मुगलिया तवारीखों में लिखा है कि अपनी माँ दिलरास बानो की तरह शहजादी जेबुन्निसा का कद लम्बा, शरीर पतला, रंग गोरा, चेहरा गोल तथा आकर्षक था। उसके बांए गाल पर एक तिल था जो शहजादी के दैहिक सौंदर्य में वृद्धि करता था। शहजादी की आंखें गहरी काली तथा बाल घुंघराले एवं काले थे। उसके दांत छोटे तथा होठ पतले थे।

शहजादी जेबुन्निसा बहुत साधारण कपड़े पहनती थी। उसके चोगे का रंग सफेद होता था तथा वह गले में सफेद मोतियों की एक माला धारण करती थी।

लाहौर संग्रहालय में शहजादी जेबुन्निसा का एक पोट्रेट रखा हुआ है जो मुगलिया तवारीखों में किए गए शहजादी के रूप-रंग के वर्णन से मेल खाता है। जेबुन्निसा ने अंगिया-कुर्ती नामक महिलाओं के एक वस्त्र का डिजाइन तैयार किया था जो कि तुर्किस्तान में पहनी जाने वाली पोषाक में परिवर्तन करके, भारतीय परिस्थितियों के अनुसार बनाया गया था। उसने कई गीतों की धुनें तैयार कीं तथा अनेक बाग लगवाए।

जेबुन्निसा ने जेल में जो कविताएं लिखीं, वह उसकी मृत्यु के बाद दीवान-ए-मकफी के नाम से संकलित एवं प्रकाशित की गईं जिसमें पांच हजार पद हैं। मखजन-उल-गालिब के लेखक ने लिखा है कि जेबुन्निसा ने लगभग 15 हजार पदों की रचना की थी किंतु अब ये पद उपलब्ध नहीं हैं। शहजादी जेबुन्निसा ने कुछ फारसी ग्रंथों के उर्दू में अनुवाद भी किए। जेबुन्निसा ने मोनिस-उल रोह, जेब-उल मोन्शायत तथा जेब-उल तफारिस नामक पुस्तकें लिखीं।

जेबुन्निसा के काल में मौलाना अब्दुल कादर बेदिल, कलीम काशानी, साएब तबरिज़ी तथा घनी कश्मीरी नामक बड़े-बड़े फारसी कवि मौजूद थे। उन्हीं दिनों हाफिज शेराजी नामक एक बड़ा कवि हुआ जिसका जेबुन्निसा की कविता पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। जेबुन्निसा ने फारसी कविता की जो शैली तैयार की उसे फारसी काव्य की भारतीय शैली कहा जाता है। आगे चलकर जेबुन्निसा इस्लामिक दर्शन की गंभीर तत्ववेत्ता सिद्ध हुई।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार ई.1662 में औरंगजेब ने शहजादी जेबुन्निसा को दिल्ली के सलीमगढ़ दुर्ग में बंदी बना लिया जो कि शाहजहानाबाद के एक छोर पर स्थित था तथा वर्तमान में पुरानी दिल्ली में स्थित है। जेबुन्निसा को बंदी बनाए जाने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं।

ई.1662 में जब औरंगजेब गंभीर रूप से बीमार पड़ा था तो चिकित्सकों की सलाह पर उसे हवा-पानी बदलने के लिए लाहौर ले जाया गया। औरंगजेब का हरम भी उसके साथ लाहौर गया। उस समय अकील खान नामक एक युवक लाहौर का गवर्नर था। उसका पिता औरंगजेब का मंत्री था।

जब जेबुन्निसा इस युवक के सम्पर्क में आई तो उन दोनों के बीच प्रेम-प्रसंग आरम्भ हो गया। जब औरंगजेब ने जेबुन्निसा से इसके बारे में पूछा तो जेबुन्निसा ने अपने पिता के भय से इस प्रसंग से साफ इन्कार कर दिया क्योंकि औरंगजेब के मरहूम परबाबा अकबर के समय से शहजादियों के विवाह पर रोक लगाई हुई थी।

कुछ दिनों में औरंगजेब को विश्वास हो गया कि शहजादी ने अपने पिता से झूठ बोला था। इसलिए औरंगजेब जेबुन्निसा से नाराज हो गया और उसे कैद करके दिल्ली भेज दिया किंतु यह बात सही प्रतीत नहीं होती है क्योंकि औरंगजेब ई.1662 में बीमार पड़ा था जबकि जेबुन्निसा ई.1681 के बाद बंदी बनाई गई थी। औरंगजेब तो स्वयं ही अपनी शहजादियों के विवाह करने के पक्ष में था, इसलिए इसी अपराध के लिए वह अपनी बड़ी पुत्री को दण्डित कैसे कर सकता था!

एक अन्य कथा के अनुसार जब औरंगजेब को ज्ञात हआ कि जेबुन्निसा एक कवयित्री है तथा संगीत से भी प्रेम करती है तो औरंगजेब ने उसे कुफ्र समझकर कैद कर लिया। यह बात भी विश्वास करने योग्य प्रतीत नहीं होती क्योंकि औरंगजेब के राज में बहुत से कवि एवं संगीतकार रहते थे। जब वे स्वतंत्र थे तो इसी अपराध के लिए शहजादी को बंदी नहीं बनाया जा सकता था।

औरंगजेब कालीन कुछ अन्य संदर्भ कहते हैं कि जब ई.1681 में औरंगजेब के शहजादे मुहम्मद अकबर ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह किया था तब शहजादी जेबुन्निसा के कुछ पत्र औरंगजेब द्वारा पकड़ लिए गए जो कि शहजादी ने अपने विद्रोही भाई अकबर को लिखे थे।

औरंगजेब द्वारा अपने पुत्र-पुत्रियों एवं बहिनों को लिखे गए पत्रों से ज्ञात होता है कि वह अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था किंतु वह अपने विरुद्ध किए गए विद्रोह को सहन नहीं कर सकता था। इसीलिए उसने अपनी प्यारी बहिन रौशनआरा तक को जहर दे दिया था जिसने औरंगजेब के राज्य को उखाड़ने का षड़यंत्र किया था। इसी बहिन ने औरंगजेब को राज्य दिलवाया था।

औरंगजेब ने अपने बड़े बेटे सुल्तान मुहम्मद को भी इसीलिए जेल में डाल रखा था क्योंकि वह औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करके स्वयं बादशाह बनना चाहता था तथा अपने श्वसुर शाहशुजा से जा मिला था।

औरंगजेब ने अपनी बड़ी बहिन जहानआरा को भी तब तक जेल में डाले रखा था जब तक कि शाहजहाँ मर नहीं गया। इसी बहिन ने औरंगजेब को पालपोस कर बड़ा किया था।

अतः शहजादी जेबुन्निसा को जेल में डाले जाने का एकमात्र कारण वे पत्र ही माने जा सकते हैं जिनमें औरंगजेब को हटाकर उसके स्थान पर अकबर को बादशाह बनाए जाने का समर्थन किया गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादी जेबुन्निसा का अंत

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शहजादी जेबुन्निसा का अंत

शहजादी जेबुन्निसा का अंत औरंगजेब के क्रूर कृत्यों की लम्बी सूची में शामिल एक और कारनामा थी जिसके कारण जेबुन्निसा जेल में ही तिल-तिल कर मर गई!

शहजादी जेबुन्निसा के कुछ पत्र औरंगजेब के बागी शहजादे अकबर के दौराई सैनिक शिविर से पकड़े गए थे तथा औरंगजेब ने शहजादी जेबुन्निसा को राजद्रोह के आरोप में सलीमगढ़ की जेल में बंद कर दिया था। यह एक हैरानी की बात है कि औरंगजेब अपनी पांच पुत्रियों में से सबसे अधिक प्रेम अपनी बड़ी पुत्री जेबुन्निसा से करता था और अपने पांच पुत्रों में से सर्वाधिक प्रेम अपने चौथे नम्बर के पुत्र अकबर से करता था किंतु इन दोनों ने ही औरंगजेब को मुगलों के तख्त से उतारने का षड़यंत्र रचा।

माना जाता है कि औरंगजेब की कट्टर नीतियों से तंग आकर जेबुन्निसा ने अपने बागी भाई अकबर का साथ दिया था। अकबर ने अपने पिता औरंगजेब पर आरोप लगाया था कि वह जो कुछ कर रहा है, वह इस्लाम के अनुसार नहीं है। अकबर की बहिन जेबुन्निसा ने अकबर के इस आरोप का समर्थन किया था।

औरंगजेब ने शहजादी जेबुन्निसा की समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली तथा उसे मिलने वाली चार लाख रुपए सालाना की पेंशन भी बंद कर दी। एक बार जेल में जाने के बाद शहजादी फिर कभी वहाँ से बाहर नहीं निकल सकी। अपने यौवन के चरम पर वह जेल में गई।

कहा जाता है कि जेबुन्निसा का बाबा शाहजहाँ जेबुन्निसा का विवाह दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह से करना चाहता था ताकि आगे चलकर दारा शिकोह तथा उसके बाद सुलेमान शिकोह हिन्दुस्थान का बादशाह बने तो जेबुन्निसा को हिन्दुस्थान की मल्लिका बनाया जा सके किंतु न तो शाहजहाँ का भाग्य ऐसा था कि वह हिन्दुस्थान का बादशाह बना रह सके, न दारा शिकोह का भाग्य ऐसा था कि अपने बाप के तख्त पर बैठ सके। न सुलेमान का भाग्य ऐसा था कि उसका विवाह जेबुन्निसा से हो सके और उसे हिन्दुस्तान की मल्लिका बना सके।

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जेबुन्निसा पर लाहौर के गवर्नर अकील खान से प्रेम करने का आरोप लगा किंतु वह प्रेम परवान नहीं चढ़ सका। तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार ईरान के शासक शाह अब्बास (द्वितीय) के पुत्र मिर्जा फारूक ने शहजादी जेबुन्निसा से विवाह करने का प्रस्ताव भिजवाया था किंतु शहजादी ने यह शर्त रखी कि वह विवाह करने से पहले शहजादे को अपनी आंखों से देखेगी। न तो कभी ईरान का शहजादा भारत आया और न कभी शहजादी जेबुन्निसा फारूक से विवाह करने के लिए ईरान गई।

अपने पिता औरंगजेब के दरबार में जेबुन्निसा अत्यंत सम्मानित अतिथि की हैसियत से प्रवेश करती थी किंतु उसी पिता ने शहजादी को जीवन भर के लिए जेल में पटक दिया था। अधूरी हसरतें लिए यह विदुषी और परम सुंदरी शहजादी जेल में ही तिल-तिल कर मरती रही और अपने दुर्भाग्य को कोसती रही।

जब ई.1686 में उसने सुना कि उसका भाई अकबर भारत छोड़कर ईरान भाग गया है तो जेबुन्निसा की समस्त आशाएं भी समाप्त हो गईं। अब उसके पास जेल से निकलने का एक ही रास्ता बचा था कि उसका पिता औरंगजेब जितनी जल्दी हो सके अल्ला मियां को प्यारा हो जाए किंतु कुदरत ने यह सुख जेबुन्निसा की किस्मत में लिखा ही नहीं था।

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जेबुन्निसा बीस साल तक जेल में जीवित रही। अंत में ई.1702 में वह बीमार पड़ गई और सात दिन की बीमारी के बाद बंदी अवस्था में ही उसकी मृत्यु हो गई। उस समय जेबुन्निसा 63 साल की वृद्धा थी। शहजादी जेबुन्निसा का अंत मुगलों के इतिहास पर ऐसा कलंक है जिसे किसी भी बहाने से धोया नहीं जा सकता। औरंगजेब भी तब तक 83 वर्ष का वृद्ध था फिर भी वह अपनी बेटी को कभी क्षमा नहीं कर सका जिससे उसने कभी सर्वाधिक स्नेह किया था। जिस समय जेबुन्निसा की मृत्यु हुई, उस समय औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर मराठों और शियाओं से जबर्दस्त संघर्ष कर रहा था।

उन दिनों दिल्ली के उत्तर में स्थित कश्मीरी गेट के बाहर एक बाग हुआ करता था जिसमें तीस हजार पेड़ थे तथा उसे तीस हजारी बाग कहा जाता था। जेबुन्निसा की देह को उसी बाग में दफनाया गया तथा वहीं पर उसकी कब्र बनाई गई। शहजादी जेबुन्निसा का अंत हो गया किंतु वह अपनी कब्र में भी शांति से नहीं लेटी रह सकी। जब अंग्रेजों के समय में रेल लाइन बनाई गई तब जेबुन्निसा के मकबरे को तथा कब्र के पत्थर को आगरा के पास सिकंदरा में स्थित जेबुन्निसा के पूर्वज जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर के मकबरे में स्थानांतरित कर दिया गया।

लाहौर में भी एक मकबरे को जेबुन्निसा का मकबरा कहा जाता है किंतु उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। शहजादी जेबुन्निसा का अंत दिल्ली में हुआ था न कि लाहौर में।

जेबुन्निसा की मृत्यु के लगभग 22-23 साल बाद उसकी बिखरी हुई कविताओं का एक संग्रह तैयार किया गया जिसका नाम दीवान-ए-मखफी रखा गया। इस संकलन में 421 गजलें तथा कुछ रुबाइयां थीं। ईस्वी 1730 में इस पाण्डुलिपि में कुछ अन्य गजलें भी जोड़ी गईं।

ई.1929 में दिल्ली की एक प्रिण्टिंग प्रेस में जेबुन्निसा की कविताओं का दीवान प्रकाशित हुआ। ई.2001 में इस पुस्तक को ईरान में छापा गया। इस दीवान की कुछ पाण्डुलिपियां पेरिस के राष्ट्रीय पुस्तकालय, लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम तथा जर्मनी की तुबिनजेन विश्वविद्यालय में रखी हुई हैं।

यहाँ हम एक और शहजादे की चर्चा करना चाहते हैं जिसे इतिहास में नेकूसियर के नाम से जाना जाता है। जब औरंगजेब ने ई.1681 में शहजादी जेबुन्निसा को बंदी बनाया था तब औरंगजेब केवल इसी कार्यवाही से संतुष्ट नहीं हुआ था। उस समय अकबर का एक पुत्र नेकुसियर आगरा के लाल किले में निवास कर रहे औरंगजेब के हरम में पलता था जिसकी आयु उस समय केवल 2 साल थी। औरंगजेब ने उसे भी अपने हरम से अलग करके, आगरा के लाल किले में ही बंदी बना लिया।

औरंगजेब अब तक अपने बाप, भाई-भतीजों और बेटे-बेटियों को ही जेल में डालता रहा था किंतु अब उसने पहली बार अपना विषैला पंजा अपने पोते की तरफ बढ़ाया था। औरंगजेब का यह पोता ई.1695 तक जेल में ही बंद रहा। इस कारण अकबर अपने इस पुत्र का मुख कभी नहीं देख सका।

जब वह 16 साल का हुआ तब औरंगजेब ने उसे जेल से मुक्त करके असम का गवर्नर बनाकर दिल्ली से दो हजार किलोमीटर दूर भेज दिया। उस समय तक अकबर को भारत छोड़कर ईरान भागे हुए नौ साल हो चुके थे इसलिए नेकूसियर द्वारा औरंगजेब के विरुद्ध बगावत करने की संभावना नहीं थी।

कुछ ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार औरंगजेब की मृत्यु के बाद सैयद बंधुओं ने इसी नेकूसियर को कुछ दिन के लिए बादशाह घोषित किया था। जबकि कुछ अन्य संभर्द बताते हैं कि आगरा के स्थानीय गवर्नर बीरबल ने ई.1719 में नेकूसियर को बंदीगृह से बाहर निकाला तथा उसे बादशाह घोषित कर दिया।

उन दिनों मुगलों के तख्त पर वही शहजादा बैठ सकता था जो सैयद बंधुओं द्वारा पसंद किया जाता था। सैयद बंधुओं ने बीरबल तथा नेकूसियर को पकड़ने के लिए एक सेना भेजी। इस सेना ने नेकूसीयर को बंदी बना लिया।

नेकूसीयर को कुछ दिन के लिए आगरा के लाल किले में बंदी बनाकर रखा गया किंतु कुछ दिन बाद दिल्ली के सलीमगढ़ दुर्ग की जेल में भेज दिया जहाँ नेकूसियर के सबसे बड़े ताऊ मुहम्मद सुल्तान ने जीवन के 16 साल, नेकूसियर की सबसे बड़ी बुआ जेबुन्निसा ने जीवन के 20 साल तथा नेकूसीयर के एक अन्य ताऊ मुअज्जम शाह ने जीवन के 7 साल बिताए थे।

उन सबने सुख की कामना की थी किंतु उन्हें अपार दुःख की प्राप्ति हुई क्योंकि औरंगजेब रूपी सांप उन सबकी जन्म-कुण्डली में बड़ी मजबूती से कुण्डली मारकर बैठ गया था जिसने एक-एक करके अपने समूचे कुनबे को डस लिया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बेगम जहांजेब बानू

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बेगम जहांजेब बानू
बेगम जहांजेब बानू

बेगम जहांजेब बानू का नाम मुगलों के इतिहास में खो सा गया है किंतु वह एक शानदार महिला थी जो स्वयं हाथ में हथियार लेकर औरंगजेब की सेना से मुकाबले करने के लिए युद्धक्षेत्र में उतरी थी

औरंगजेब के बागी बेटे अकबर को मराठों के राजा शंभाजी के राज्य में रहते हुए अठारह माह बीतने को आए। शंभाजी ने उसे आश्वासन दिया था कि मराठों और राजपूतों की संयुक्त सेना द्वारा औरंगजेब पर आक्रमण करके अकबर को दिल्ली एवं आगरा के तख्त पर बिठाया जाएगा किंतु शंभाजी जंजीरा के सिंधियों, मैसूर के चिक्कादेव राय तथा गोआ के पुर्तगालियों के हमलों में इतना घिर गया था कि वह अपने राज्य से निकलने के लिए सोच ही नहीं पाता था।

अकबर की निराशा दिन पर दिन बढ़ती जाती थी। इसलिए अकबर ने भारत छोड़कर ईरान जाने की योजना बनाई ताकि वह खुली हवा में सांस ले सके। यहाँ उसे शंभाजी के राज्य में औरंगजेब के गुप्तचरों के भय से छिपकर रहना पड़ता था। इसलिए ई.1682 में अकबर चुपचाप अपने साथी राजपूत सैनिकों को लेकर गोआ के लिए रवाना हो गया।

गोआ के निकट विंगुर्ला में उसने ईरान जाने के लिए एक जहाज किराए पर लिया और उस पर सवार हो गया किंतु शंभाजी के मंत्री कवि कलश को इस बात का पता लग गया। वह वीर दुर्गादास को लेकर अकबर के जहाज पर पहुंचा और उसे समझा-बुझा कर जहाज से नीचे उतार लाया। अकबर फिर से इस आशा में भारत में रुकने को तैयार हो गया कि एक दिन मराठों और राजपूतों की सेना की सहायता से दिल्ली और आगरा के लाल किलों का स्वामी हो जाएगा।

शंभाजी निश्चित रूप से औरंगजेब को समाप्त करके अकबर को नया बादशाह बनाना चाहता था किंतु शंभाजी अपने शत्रुओं से घिरा ही रहा। यहाँ तक कि एक बार पुर्तगालियों ने शंभाजी को बुरी तरह से घेर लिया तथा शंभाजी का बच निकलना कठिन हो गया। इस पर शहजादे अकबर ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करके शंभाजी को छुड़वाया।

इस घटना के बाद फरवरी 1685 तक शहजादा अकबर शंभाजी के राज्य में स्थित रत्नागिरि जिले में ठहरा रहा तथा अपनी सहायता के लिए कवि कलश को बुलाता रहा किंतु कवि कलश भी अपने शत्रुओं से इतना घिरा हुआ था कि वह भी अकबर की सहायता के लिए नहीं आ सका।

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कवि कलश इलाहाबाद का रहने वाला कन्नौजिया ब्राह्मण था तथा शंभाजी के परिवार का परम्परागत पण्डा था। उसने ही शिवाजी के निधन के बाद शंभाजी का भव्य राज्याभिषेक करवाया था और शंभाजी ने उसे कवि कलश की उपाधि देकर अपना मंत्री बना लिया था। इस समय शंभाजी के राज्य का सारा भार कवि कलश पर था और शंभाजी हर समय आमोद-प्रमोद में डूबा रहता था।

अकबर यद्यपि शंभाजी के राज्य में किसी अज्ञात गांव में रहता था तथापि वह अपनी जीवन शैली एक बादशाह की तरह दिखाने का प्रयास करता था और निकटवर्ती जंगलों में शिकार खेलकर अपना समय व्यतीत करता था। एक दिन शंभाजी, अकबर से मिलने के लिए आया। उस समय वीर दुर्गादास राठौड़ भी अकबर के पास ही था।

शंभाजी ने अकबर को आश्वासन दिया कि वह थोड़ा और इंतजार करे, जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल होंगी, औरंगजेब के विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी किंतु शंभाजी की ओर से कुछ नहीं किया गया यहाँ तक कि औरंगजेब स्वयं अपने तीन शहजादों आजम, मुअज्जम और कामबख्श को लेकर अकबर, शंभाजी और दुर्गादास को पकड़ने या मार डालने के लिए दक्खिन में आ पहुंचा।

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औरंगजेब स्वयं तो अपनी पुरानी राजधानी औरंगाबाद में आकर ठहर गया तथा अपने सेनापतियों को मराठों पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। उसने शहजादे आजम को आदिलशाही राज्य पर हमला करने के लिए भेजा। आजम ने अपनी सेना लकर धरूर पर धावा बोला। इस दौरान उसने अपनी बेगम जहांजेब बानू को अपने सैनिक शिविर में ही छोड़ दिया तथा बूंदी के राव अनिरुद्धसिंह हाड़ा को जहांजेब बानू की रक्षा पर नियुक्त किया।

पाठकों को स्मरण होगा कि बेगम जहांजेब बानू, मरहूम शहजादे दारा शिकोह की पुत्री थी तथा अपने चाचा औरंगजेब की बड़ी लाड़ली थी। मुगलों के इतिहास में इसे जानी बेगम कहा जाता था। फ्रैंच इतिहासकार निकोलस मनूची ने लिखा है कि जानी बेगम अपने पिता की तरह बुद्धिमान, दयालु तथा बहुत सुंदर थी।

जब मराठों को ज्ञात हुआ कि शहजादा आजमशाह अपनी सेना को लेकर धरूर पर आक्रमण करने के लिए गया है तो उन्होंने मुगलों के डेरे लूटने के लिए शाह आजम के शिविर पर हमला किया। जब बेगम जहांजेब बानू को ज्ञात हुआ कि उनके शिविर को मराठों ने घेर लिया है तो उसने राव अनिरुद्धसिंह हाड़ा को अपने डेरे में बुलाया तथा उससे फारसी भाषा में बड़े भावपूर्ण शब्दों में कहा- ‘शर्म ए चगताइया या राजपूतिया एकस्त’ अर्थात्- राजपूतों के लिए चगताइयों यानि मुगलों की मान-प्रतिष्ठा उनकी अपनी ही है। मैं तुम्हें अपना बेटा बनाती हूं। तुम मेरे साथ ही रहना और मेरा ध्यान रखना।

जानी बेगम द्वारा कहे गए इन शब्दों का आशय यह था कि जब मैं मराठों से युद्ध करूं तो तुम मेरे साथ रहना तथा यदि हम हारने लगें तो तुम मराठों को कुछ देर के लिए रोकना ताकि मैं अपने पेट में तलवार भौंककर देह छोड़ सकूं और मराठे मुझे पकड़ न सकें। इसके बाद जानी बेगम तलवारें और भाले लेकर एक हाथी पर चढ़ गई ताकि मराठों से मुकाबला किया जा सके।

बेगम जहांजेब बानू और मराठों के इस दल के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें वीर अनिरुद्धसिंह हाड़ा बुरी तरह घायल हो गया किंतु उसने मराठों को बेगम के हाथी तक नहीं पहुंचने दिया। बेगम भी पूरे समय तक रणक्षेत्र में टिकी रही और अपने भाले से मराठा वीरों का सामना करती रही। अंत में अनिरुद्धसिंह की मोर्चाबंदी और बहादुरी काम आई तथा मराठे वहाँ से भाग गए।

जहांजेब बेगम के साथ भी किस्मत ने बड़ा मजाक किया था। उसके पिता दारा शिकोह को शाहजहाँ ने वली-ए-अहद अर्थात् भावी बादशाह घोषित किया था किंतु औरंगजेब ने दारा शिकोह का सिर कटवा दिया। जानी बेगम का पति आजमशाह ई.1707 में तीन महीनों के लिए मुगलों का बादशाह हुआ किंतु उसके बादशाह बनने से दो साल पहले ही ई.1705 में जानी बेगम की अकस्मात् मृत्यु हो गई। इस प्रकार जानी बेगम अपने पिता और पति को बादशाह बनते हुए नहीं देख सकी।

अकबर को शंभाजी की शरण में आए हुए अब पांच साल से कुछ अधिक हो गए थे। जब उसका पिता औरंगजेब औरंगाबाद में आकर बैठ गया तो शहजादा अकबर समझ गया कि मराठे और राजपूत चाहे कितने ही वीर क्यों न हों, वे अकबर को उसके बलशाली पिता औरंगजेब के हाथों में पड़ने से बचा नहीं पाएंगे। इसलिए सितम्बर 1686 में अकबर चुपचाप ईरान भाग गया।

अकबर का पहला विवाह अपने ताऊ दारा शिकोह के सबसे बड़े पुत्र सुलेमान शिकोह की सबसे बड़ी पुत्री सलीमा बानू बेगम से हुआ था जिसके पेट से नेकूसियर का जन्म हुआ था। जब अकबर ईरान भागा तो उसके दोनों पुत्र तथा दोनों पुत्रियां भारत में ही छूट गए जिनमें से एक पुत्र तथा एक पुत्री मुगल हरम में थे और दूसरा पुत्र तथा दूसरी पुत्री दक्खिन में थे। इन दोनों को राजपूतों ने पाल-पोस कर बड़ा किया। इनमें से नेकूसियर जो इस समय केवल 9 साल का था, आगे चलकर ई.1719 में कुछ महीनों के लिए मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल हुआ।

जब अकबर ईरान पहुंच गया तो ईरान के शाह ने अकबर से कहा- ‘वह नित्य प्रतिदिन अल्लाह से प्रार्थना किया करे कि उसका पिता मर जाए ताकि अकबर को एक दिन मुगलों का बादशाह बनने का अवसर मिल सके।’

इस पर अकबर ने शाह से कहा- ‘देखते हैं, पहले कौन मरता है, मैं या मेरा पिता।’ अंत में ई.1706 में अकबर की मृत्यु हो गई जबकि औरंगजेब ई.1707 में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुअज्जम

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मुअज्जम

औरंगजेब की तरह औरंगजेब की औलादें भी सत्ता की लालची थीं। इस कारण औरंगजेब अपने औलादों को एक-एक करके जेल में डाल रहा था। शहजादे मुअज्जम का भाग्य भी अन्य शहजादों अथवा शहजादियों से अलग नहीं था। एक दिन उसे भी जेल में सड़ने के लिए डाला ही जाना था।

औरंगजेब के तीसरे नम्बर के शहजादे मुअज्जम का जन्म 14 अक्तूबर 1643 को औरंगजेब की दूसरी बेगम नवाब बाई के पेट से हुआ था। उस समय औरंगजेब दक्खिन का सूबेदार था तथा बुरहानपुर मोर्चे पर नियुक्त था। जब मुअज्जम 9 साल का हुआ तो उसके बाबा शाहजहाँ ने उसे लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। शहजादा 6 साल तक इस पद पर कार्य करता रहा तथा ई.1659 में मात्र 16 साल की आयु में दक्खिन का सूबेदार बनाकर भेज दिया गया। उन दिनों औरंगाबाद मुगलों के दक्खिनी सूबे की राजधानी था।

इस समय तक मुअज्जम यौवन की दहलीज पर पैर रख चुका था इसलिए उसके मन में औरतों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना स्वाभाविक था। माता-पिता से दूर रहने के कारण उसे बुरी प्रवृत्ति के लोगों ने घेर लिया। उनके प्रभाव से वह विलासी बन गया और अपना अधिकांश समय शराब पीने, नृत्य देखने तथा शिकार खेलने में व्यय करने लगा।

शहजादे की अकर्मण्यता का लाभ उठाकर छत्रपति शिवाजी ने मुगलों के क्षेत्र पर धावे मारने आरम्भ कर दिए। छत्रपति ने न केवल सूरत बंदरगाह को दो बार लूटा अपितु औरंगाबाद में स्थित मुगल छावनी पर भी कई बार धावे मारे। इस दौर में शिवाजी के राज्य का तेजी से विस्तार हुआ।

मुअज्जम की असफलताओं से चिंतित होकर औरंगजेब ने अपने सर्वाधिक विश्वसनीय सेनापति मिर्जाराजा जयसिंह को दक्खिन में अभियान करने के लिए नियुक्त किया। मिर्जाराजा जयसिंह ने ई.1665 में शिवाजी को अनेक मोर्चों पर परास्त किया तथा उन्हें पुरंदर की संधि करने के लिए विवश कर दिया।

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ई.1666 में छत्रपति शिवाजी के आगरा से निकल भागने के बाद मई 1667 में औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह को अपमानजनक तरीके से दक्खिन की सूबेदारी से हटा दिया तथा शहजादे को पुनः दक्खिन का सूबेदार बना दिया। इस बार महाराजा जसवंतसिंह को मुअज्जम की सहायता के लिए नियुक्त किया गया।

एक तरफ तो महाराजा जसवंतसिंह के गरिमामय व्यवहार एवं शिवाजी के पुत्र शंभाजी से हुई दोस्ती से प्रभावित होने के कारण तथा दूसरी ओर औरंगजेब द्वारा युद्धों के लिए लगातार बनाए जा रहे दबाव से तंग आकर ई.1670 में मुज्जम ने औरंगजेब को हटाने का षड़यंत्र किया तथा स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया।

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जब औरंगजेब को यह सूचना मिली तो उसने महाराजा जसवंतसिंह को अफगानिस्तान के मोर्चे पर भेज दिया तथा मुअज्जम की माँ बेगम नवाब बाई को दक्खिन में भेजा ताकि वह अपने पुत्र को समझा-बुझा कर बागी होने से रोक सके। बेगम नवाब बाई मुअज्जम को समझा-बुझा कर औरंगजेब के दरबार में लेकर उपस्थित हुई। औरंगजेब ने शहजादे को अपने पास ही रख लिया ताकि उस पर कड़ी दृष्टि रखी जा सके।

ई.1680 में जब औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य पर अत्याचार आरम्भ किए तथा राजपूतों से बड़ा झगड़ा मोल ले लिया तो मुअज्जम अपने पिता की नीतियों से पुनः नाराज हो गया और उसने पुनः विद्रोह कर दिया। शहजादे को स्पष्ट दिखने लगा था कि उसका पिता अपनी मजहबी नीतियों के कारण राजपूत राजाओं से बुरी तरह से पेश आ रहा था जिसके कारण राजपूत जाति औरंगजेब तथा मुगल सल्तनत की शत्रु होती जा रही थी। मुअज्जम द्वारा दूसरी बार किए गए विद्रोह के कारण औरंगजेब बुरी तरह से हिल गया। क्योंकि तब तक शहजादा अकबर भी राजपूतों के साथ मिलकर बगावत की घोषणा कर चुका था और राजपूतों की सहायता से मराठा शासक शंभाजी की शरण में जा चुका था।

औरंगजेब का बड़ा पुत्र सुल्तान मुहम्मद भी 16 साल तक जेल में सड़ने के बाद मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। यहाँ तक कि औरंगजेब की बड़ी बेटी जेबुन्निसा और एक पोता नेकूसियर भी जेल में पड़े हुए थे। इसलिए औरंगजेब ने शांति से काम लिया तथा मुअज्जम को किसी तरह समझा-बुझा कर फिर से अपने पक्ष में किया। इसके बाद मुअज्जम ई.1687 तक शांत बना रहा।  

ई.1681 में मुअज्जम को अपने सौतेले भाई अकबर का विद्रोह कुचलने के लिए दक्खिन के मोर्चे पर भेजा गया। मुइन फारूकी नामक एक तत्कालीन इतिहासकार ने लिखा है कि मुअज्जम ने दो साल तक अपने भाई अकबर के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। इस कारण ई.1683 में औरंगजेब ने मुअज्जम को आदेश दिए कि वह अकबर को पकड़ने के लिए कोंकण क्षेत्र में अभियान करे ताकि अकबर ईरान नहीं जा सके। मुअज्जम ने कोंकण में अभियान तो किया किंतु इस बार पुनः वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल हो गया।

इस पर औरंगजेब ने मुअज्जम को गोलकुण्डा पर आक्रमण करने के आदेश दिए। इस बार शहजादा मुअज्जम गोलकुण्डा के शासक अबुल हसन से मिल गया। औरंगजेब के गुप्तचरों ने मुअज्जम तथा अबुल हसन के बीच चल रहे गुप्त-पत्राचार को पकड़ लिया। औरंगजेब समझ गया कि मुअज्जम बगावत करने पर उतारू है। इसलिए 21 फरवरी 1687 को औरंगजेब ने शहजादे मुअज्जम को बंदी बना लिया तथा उसे दिल्ली के लिए रवाना कर दिया।

मुअज्जम के हरम की औरतों पर भी इस बगावत में शामिल होने के आरोप लगाए गए तथा उन्हें भी बंदी बना लिया गया। मुअज्जम के समस्त नौकरों एवं दासियों को मुअज्जम की सेवा से हटाकर शाही सेवा में रख लिया गया। कुछ नौकरों को बंदी बना लिया गया।

औरंगजेब ने शहजादे मुअज्जम को सजा दी कि वह छः माह तक अपने बाल और नाखून नहीं काटेगा। उसे पीने के लिए गर्म खाना और ठण्डा पानी नहीं दिया जाएगा। कोई भी व्यक्ति बादशाह की अनुमति प्राप्त किए बिना मुअज्जम से नहीं मिलेगा। सात साल तक मुअज्जम सलीमगढ़ जेल में पड़ा सड़ता रहा।

इसके बाद ई.1694 में औरंगजेब ने मुअज्जम को फिर से अपने परिवार के साथ रहने की अनुमति प्रदान कर दी। उसे अपने पुराने नौकरों को फिर से नौकरी पर रखने की अनुमति भी दे दी गई। फिर भी शहजादे की गतिविधियों पर कड़ी दृष्टि रखी गई।

ई.1695 में शहजादे मुअज्जम को जेल से निकालकर लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया गया तााकि उसे मराठों से दूर रखा जा सके। इसके बाद जब तक औरंगजेब जीवित रहा, तब तक उसे किसी भी सैन्य अभियान पर नहीं भेजा गया।

पंजाब की सूबेदारी के दौरान मुअज्जम को गुरु गोबिंदसिंह से युद्ध करना था किंतु उसने कभी भी आनंदपुर साहब पर आक्रमण नहीं किया। जब औरंगजेब ने उसे आदेश भिजवाए कि वह आनंदपुर पर हमला करके सिक्खों के गुरु गोबिंदसिंह को दण्डित करे तो मुअज्जम ने ऐसा करने से मना कर दिया।

ई.1699 में जब काबुल का सूबेदार मर गया तब औरंगजेब ने मुअज्जम को काबुल का सूबेदार बना दिया। ई.1707 तक वह इसी पद पर रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वीर राजाराम जाट

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वीर राजाराम जाट
वीर राजाराम जाट

वीर राजाराम जाट ने औरंगजेब से बदला लेने के लिए उसके पूर्वज बादशाह अकबर की हड्डियाँ आग में डाल दीं! इस कारण औरंगजेब ने वीर राजाराम को मृत्युदण्ड देना निश्चित किया!

इधर औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर मराठों तथा शिया मुसलमानों से लड़ने में व्यस्त था और उधर उत्तर भारत में मुगल सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह प्रचण्ड होता जा रहा था। एक तरफ तो मारवाड़ और मेवाड़ के राजपूत तथा मध्य भारत के बुंदेले मुगलों से दुश्मनी निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे तो दूसरी तरफ जाटों और सिक्खों को रोक सकने वाला कोई नहीं था।

इस काल में जाट एवं सिक्ख काफी मुखर होकर मुगल सल्तनत को बर्बाद करने पर तुले हुए थे। यद्यपि आम्बेर के कच्छवाहे और बूंदी के हाड़े अब भी औरंगजेब के साथ थे किंतु वे भी बहुत टूटे हुए दिल से मोर्चों पर डटे हुए थे।

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1670 में इस्लाम स्वीकार करने से इन्कार कर देने के कारण वीर गोकुला जाट को औरंगजेब के हाथों जिस प्रकार की दर्दनाक और अपमान जनक मृत्यु प्राप्त हुई थी, वैसी ही दर्दनाक और अपमान जनक मृत्यु औरंगजेब ने उद्धव बैरागी तथा कई और लोगों को भी दी थी। इस कारण देश में चारों ओर मुगलों के विरुद्ध वातावरण घनघोर वातावरण बना हुआ था।

गोकुला के दर्दनाक अंत से बुरी तरह आहत हुए जाट धीरे-धीरे सिनसिनी गांव के निवासी ब्रजराज जाट तथा उसके भाई भज्जासिंह जाट के नेतृत्व में एकत्रित होने लगे। जाटों को मुख्य झगड़ा इस बात को लेकर था कि मुगल सेनाएं राजस्व वसूली के नाम पर किसानों से लूट पाट कर रही थीं।

ई.1682 में ब्रजराज मुगलों से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुआ। उसकी मृत्यु के कुछ समय बाद उसकी पत्नी के गर्भ से एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम बदनसिंह रखा गया। आगे चलकर बदनसिंह भी जाटों का प्रमुख नेता बना। ब्रजराज का छोटा भाई भज्जासिंह एक साधारण किसान था। यह परिवार सिनसिनी गांव का रहने वाला था। भज्जासिंह का पुत्र राजाराम भी अपने बाप-दादों की तरह विद्रोही प्रवृत्ति का था।

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कहते हैं मऊ के थानेदार लालबेग ने एक अहीर की स्त्री का बलात् शील भंग किया। जब यह बात राजाराम को ज्ञात हुई तो उसने लालबेग की हत्या कर दी। उसकी इस वीरता से प्रसन्न होकर जाट उसके पीछे हो लिये और राजाराम निर्विवाद रूप से उनका नेता बन गया।

शीघ्र ही राजाराम ने मिट्टी के परकोटों से घिरी पक्की गढ़ैयां  अर्थात् छोटे दुर्ग बनाने आरम्भ कर दिये। जब राजाराम की स्थिति काफी मजबूत हो गई तो उसने आगरा सूबे पर आक्रमण करने शुरू कर दिये। इस पर औरंगजेब ने राजाराम को दिल्ली बुलवाया तथा उससे समझौता करके उसे मथुरा की सरदारी और 575 गांवों की जागीर प्रदान कर दी।

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राजाराम ने अपनी जागीर अपने भाई-बंधुओं में बन्दूकची सवार की नियमित शर्त पर वितरित कर दी तथा इस प्रकार अपनी नियमित सेना खड़ी कर ली। औरंगजेब ने सोचा था कि जागीर प्राप्त करके राजाराम मुगलों के साथ हो जायेगा तथा जाटों को नियंत्रण में रखेगा किंतु राजाराम ने मुगलों की बिल्कुल भी परवाह नहीं की। उन्होंने आगरा-मथुरा के क्षेत्र में सरकारी खजानों, व्यापारियों तथा सैनिक चौकियों को लूटना जारी रखा।

मुगलिया रिकॉर्ड के अनुसार चारों ओर लुटेरे ही लुटेरे दिखाई देने लगे जिनके कारण आगरा और दिल्ली के बीच सरकारी माल तथा व्यापारियों का निकलना दुष्कर हो गया। इस लूटपाट से जाटों की गढ़ियां माल से भरने लगीं। इस पर औरंगजेब ने शफी खाँ को आगरा का सूबेदार बनाकर जाटों का दमन करने के लिये भेजा। जब शफी खाँ ने जाटों को तंग करना शुरु किया तो राजाराम ने आगरा के दुर्ग पर चढ़ाई कर दी। शफी खाँ डरकर किले में बंद हो गया। राजाराम और उसके साथियों ने जी भरकर आगरा परगने को लूटा।

शफी खाँ की विफलता के बाद औरंगजेब ने कोकलतास जफरजंग को आगरा भेजा किंतु वह भी राजाराम को दबाने में असफल रहा। ई.1687 में औरंगजेब ने अपने पोते बेदार बख्त को विशाल सेना देकर जाटों के विरुद्ध कार्यवाही करने भेजा।

बेदार बख्त के आगरा पहुंचने से पहले ही मार्च 1688 के अंतिम सप्ताह में राजाराम ने रात्रि के समय सिकन्दरा स्थित औरंगजेब के परबाबा शहंशाह अकबर के मकबरे को घेर लिया। उसने अकबर की कब्र खुदवाकर उसकी हड्डियां आग में झौंक दीं तथा मकबरे की छत पर लगे सोने-चांदी के पतरों को उतार लिया।

जाटों ने अकबर के मकबरे के मुख्य द्वार पर लगे कांसे के किवाड़ों को तोड़ डाला। वहाँ से चलकर उन्होंने मुगलों के गांवों को लूटा। खुर्जा परगना भी उसके द्वारा बुरी तरह से लूटा गया। पलवल का थानेदार जाटों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

जब शहजादा बेदार बख्त जाटों के विरुद्ध अप्रभावी सिद्ध हुआ तो औरंगजेब ने आम्बेर नरेश बिशनसिंह अर्थात् विष्णु सिंह कच्छवाहे को जाटों के विरुद्ध भेजा। महाराजा बिशनसिंह तथा राजाराम की सेनाओं में आमने-सामने युद्ध हुआ जिसमें वीर राजाराम काम आया।

महाराजा बिशनसिंह ने वीर राजाराम जाट का सिर काटकर औरंगजेब को भेज दिया। राजाराम का प्रबल सहायक रामचेहर भी इस युद्ध में पकड़ा गया। उसका सिर काटकर आगरा के किले के सामने लटका दिया गया। राजाराम के कटे हुए सिर को देखकर औरंगजेब ने बड़ा उत्सव मनाया।

वीर राजाराम जाट की मृत्यु से भी औरंगजेब संतुष्ट नहीं हो सका। उसने राजा बिशनसिंह को निर्देश दिए कि वह अपना काम जारी रखे तथा सम्पूर्ण जाट जाति को समाप्त कर दे। महाराजा बिशनसिंह जाटों का जन्मजात शत्रु था क्योंकि जाट उसके आम्बेर राज्य में लूटपाट किया करते थे। उसने जाटों के विरुद्ध भयानक अभियान चलाया जिसमें बहुत बड़ी संख्या में जाट मारे गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शंभाजी

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शंभाजी
शंभाजी

छत्रपति शिवाजी के पुत्र शंभाजी अपने पिता की तरह सफलताएं अर्जित नहीं कर पाए किंतु हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उनका बलिदान शिवाजी के बलिदान किसी भी तरह कम नहीं था। हिन्दू धर्म युगों तक शंभाजी का ऋणी रहेगा। अपने प्राणों की परवाह किए बिना शंभाजी ने बड़ी घृणा से औरंगजेब के मुंह पर थूक दिया!

पाठकों को स्मरण होगा कि 4 अप्रेल 1680 को छत्रपति शिवाजी का निधन हो जाने के बाद उनके बड़े पुत्र शंभाजी ने मराठों का नेतृत्व संभाला। शंभाजी की माता सईबाई शिवाजी की पटरानी थी किंतु उसका निधन शिवाजी के जीवन काल में ही हो गया था। शिवाजी के निधन के समय शिवाजी की तीन रानियां जीवित थीं।

ये तीनों ही शंभाजी की सौतेली माता थीं। इनमें से सोयरा बाई पर छत्रपति शिवाजी की हत्या का आरोप लगा। इस कारण शंभाजी ने उसे प्राणदण्ड दिया। शिवाजी की रानी पुतली बाई, शिवाजी की देह के साथ सती हो गई। शिवाजी की तीसरी रानी सकवर बाई को कुछ दिनों बाद औरंगजेब की सेना ने पकड़कर कैद कर लिया।

सम्भाजी की पत्नी येशुबाई तथा येशूबाई का पुत्र साहूजी भी सकवर बाई के साथ औंरगजेब के हाथों बंदी बना लिए गए। शिवाजी के परिवार के सदस्य बहुत लम्बे समय तक औरंगजेब की कैद में रहे। इन लोगों को औरंगजेब ने बहुत अपमानित किया एवं ना-ना प्रकार के दुःख दिए। फिर भी शंभाजी ने औरंगजेब के सामने झुकने से मना कर दिया और अपने पिता शिवाजी महाराज द्वारा देखा गया हिन्दू पदपादशाही का सपना साकार करने में लगे रहे।

जब ई.1681 में शंभाजी ने औरंगजेब के बागी पुत्र अकबर को अपने राज्य में शरण दी तो औरंगजेब शंभाजी के प्राणों का प्यासा हो गया क्योंकि अब औरंगजेब को यह खतरा सताने लगा कि यदि असंतुष्ट मुगल शहजादों तथा राजपूतों के साथ मराठों का भी गठजोड़ हो गया तो वह आने वाले समय में मुगलिया सल्तनत के लिए अत्यंत खतरनाक सिद्ध होगा।

औरंगजेब स्वयं दक्खिन के मोर्चे पर आकर बैठ गया तथा अपनी समस्त शक्ति झौंककर शंभाजी महाराज को पकड़ने का प्रयास करने लगा किंतु वह कभी भी शंभाजी को सम्मुख युद्ध में परास्त नहीं कर सका।

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इस तरह औरंगजेब को शंभाजी से संघर्ष करते हुए आठ-नौ साल बीत गए। 15 फरवरी 1689 को औरंगजेब के सेनापति मुकरब खाँ को सूचना मिली कि शंभाजी अपने दो सौ सैनिकों के साथ अपने राज्य के संगमेश्वर नामक गांव में आया हुआ है जबकि उसकी सेना रायगढ़ छावनी में है। मुकरब खाँ को यह सूचना शंभाजी की पत्नी येसूबाई के भाई गणोजी शिर्के ने दी थी जो कि शंभाजी से असंतुष्ट चल रहा था और शंभाजी से बदला लेना चाहता था।

मुकरब खाँ ने उसी समय 5000 सिपाहियों को लेकर शंभाजी को घेर लिया। शंभाजी के मुट्ठी भर सिपाही पांच हजार मुगल सैनिकों के मुकाबले में अधिक समय तक नहीं टिक सके तथा मुगलों ने शंभाजी तथा उनके मंत्री कवि कलश को जीवित ही पकड़ लिया।

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जब शंभाजी तथा कवि कलश को औरंगजेब के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो दोनों ने बड़ी निर्भीकता से औरंगजेब का सामना किया। शंभाजी की वीरता देखकर औरंगजेब ने उनसे कहा कि मेरे चार पुत्रों में से यदि एक भी तुम्हारे जैसा हुआ होता तो समूचा हिन्दुस्तान मुग़ल सल्तनत में समा गया होता। शंभाजी उस समय भी औरंगजेब को मारकर हिन्दू पद-पादशाही स्थापित करने की बात करते रहे। इस पर औरंगजेब ने शंभाजी महाराज को मृत्युदण्ड सुनाया।

जब यह बात पादशाह बेगम जीनत उन्निसा को ज्ञात हुई तो उसने अपने पिता औरंगजेब से प्रार्थना की कि शंभाजी महाराज को यह अवसर दिया जाए कि यदि वह इस्लाम कबूल कर ले तो उसे नहीं मारा जाएगा। यदि शंभाजी इस्लाम स्वीकार कर लेता है तो मैं उससे विवाह कर लूंगी। कुछ फारसी तवारीखों के अनुसार स्वयं औरंगजेब ने शंभाजी को अपने सामने बुलाकर यह प्रस्ताव दिया किंतु जब शंभाजी ने यह सुना कि औरंगजेब उससे मुसलमान बनने के लिए कह रहा है तो शंभाजी ने बड़ी घृणा के साथ औरंगजेब के मुंह पर थूक दिया।

भारत जैसे विशाल साम्राज्य का स्वामी औरंगजेब एक छोटे से हिन्दू राजा द्वारा किए गए इस अपमान से तिलमिला गया। इससे पहले किसी ने भी औरंगजेब का इतना अपमान करने का साहस नहीं किया था। क्रोध से पागल हुए औरंगजेब ने जल्लादों को बुलाकर आदेश दिया कि शंभाजी को दर्दनाक मृत्यु दी जाए।

इस आदेश के बाद 15 दिनों तक शंभाजी का एक-एक अंग काटा गया। पहले हाथ-पैरों की एक-एक अंगुली काटी गई। उसके बाद हाथ और पैर काटे गए। शम्भाजी की आखें निकाल ली गईं, जीभ खींच ली गई, चमड़ी उतार ली गई एक-एग अंग काटकर नदी में फैंक दिया गया।

15 दिन तक दी गई भयानक याताअनों से तड़पने के बाद 11 मार्च 1689 को सम्भाजी के प्राण निकल गए। इतिहासकारों के अनुसार 15वें दिन शंभाजी का सिर कलम किए जाने से उनकी मृत्यु हुई।

 कवि कलश का भी यही हाल किया गया। इस प्रकार मुगलों को देश से बाहर निकालकर हिन्दू पदपादशाही की स्थापना का स्वप्न देखने वाले छत्रपति शिवाजी के परिवार को मुगलों के हाथों बहुत भयानक यातनाएं झेलनी पड़ीं किंतु यह परिवार कभी मुगलों के सामने झुकने को तैयार नहीं हुआ।

शिवाजी तथा उनके परिवार ने जीवन की नहीं मृत्यु की साधना की, सुख के रूप में मिलने वाली गुलामी की नहीं अपितु दुख के साथ मिलने वाली स्वतंत्रता की साधना की। यही कारण था कि पिता और पुत्र अर्थात् शिवाजी और शंभाजी भारत के इतिहास में सम्राट पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप की तरह आदर के पात्र बन गए। वे ऐतिहासिक नायकों की श्रेणी से निकलकर मिथकों के नायक बन गए।

कहा जाता है कि छत्रपति शंभाजी महाराज के टुकड़े तुलापुर की नदी में फेंकें गए। नदी के किनारे रहने वाले लोगों ने शंभाजी के शरीर के टुकड़े एकत्रित करके सिल दिए तथा उनका अंतिम संस्कार किया। इन लोगों को अब ‘शिवले’ नाम से जाना जाता है। ये लोग आज भी प्रतिवर्ष शंभाजी की स्मृति में एक माह के उत्सव का आयोजन करते हैं जो भारत की वीर-पूजन परम्परा का महत्वपूर्ण आयोजन है।

औरंगजेब ने सोचा था कि शंभाजी की हत्या के बाद मराठा शक्ति बिखर जाएगी किंतु हुआ ठीक उलटा। शंभाजी के बलिदान के बाद मराठों ने अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन किया जिसके कारण औरंगजेब मराठों को कभी नहीं जीत सका तथा उसके मरते ही जाटों, राजपूतों, सिक्खों और मराठों ने मुगलों के कफन में आखिरी कीलें ठोक दीं।

औरंगजेब की पुत्री जीनत उन्निसा अपने पिता के इस हैवानियत भरे कारनामे से इतनी दुखी हुई कि वह फिर कभी किसी से विवाह करने को तैयार नहीं हुई। वह अविवाहित ही मृत्यु को प्राप्त हुई। यहाँ हम थोड़ी सी चर्चा जीनत उन्निसा के सम्बन्ध में करना चाहेंगे।

जीनत उन्निसा औरंगजेब की दूसरे नम्बर की बेटी थी। उसका जन्म 5 अक्टूबर 1643 को औरंगाबाद में दिलरास बानू की कोख से हुआ था। जीनत उन्निसा को औरंगजेब ने पादशाह बेगम घोषित किया था। औरंगजेब के शासन के आरम्भिक काल में औरंगजेब की बहिनें रौशनआरा तथा जहानआरा इसी पद पर रह चुकी थीं।

जीनत उन्निसा को मुगलिया इतिहास में उसकी दयालुता एवं भलाई के कामों के लिए जाना जाता है। अपनी बड़ी बहिन जेबुन्निसा तथा छोटी बहिन जुब्दत उन्निसा की भांति जीनत उन्निसा भी इस्लामिक दर्शन एवं कुरान की जानकार थी।

जीनत उन्निसा अपने सगे भाई आजमशाह से बहुत घृणा करती थी जबकि अपने सबसे छोटे सौतेले भाई कामबख्श से बहुत प्रेम करती थी। इसलिए जब भी औरंगजेब कामबख्श से नाराज होता था, तब जीनत उन्निसा दौड़कर अपने पिता के पास जाती थी और उससे प्रार्थना करती थी कि वह कामबख्श को क्षमा कर दे।

यही कारण था कि जहाँ औरंगजेब ने अपने अन्य शहजादों को कभी न कभी जेल में अवश्य डाला था किंतु जीनत उन्निसा के रहते कामबख्श के लिए जेल के दरवाजे कभी नहीं खुल सके।

अपने जीवन के अंतिम भाग में जब औरंगजेब अकेला पड़ गया तब जीनत तथा उसकी सौतेली माता उदयपुरी महल ही औरंगजेब का सहारा बनीं।

औरंगजेब के दक्खिन प्रवास के दौरान बादशाह के डेरे की सारी व्यवस्थाएं जीनत ही संभालती थी। ई.1700 में जीनत उन्निसा ने दिल्ली में लाल किले के पास यमुनाजी की तरफ एक मस्जिद बनाई जिसे जीनत उल मस्जिद कहा जाता था। जीनत की मृत्यु के बाद जीनत को उसी मस्जिद में दफनाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुरु गोविन्दसिंह

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गुरु गोविन्दसिंह
गुरु गोविन्दसिंह

गुरु तेग बहादुर के पुत्र गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्ख समुदाय को अभूतपूर्व संगठन, अद्भुत अनुशासन एवं धर्म के प्रति अनन्य निष्ठा में बांध दिया। संसार में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन काल में इतनी बड़ी सफलताएं प्राप्त कीं।

हम चर्चा कर चुके हैं कि जहांगीर ने ई.1606 में गुरु अर्जुन देव पर भयानक अत्याचार किए थे। इसके बाद से सिक्खों ने स्वयं को धार्मिक समुदाय के साथ-साथ सैनिक समुदाय के रूप में ढाल लिया था। औरंगजेब का समय आते-आते सिक्खों की शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हो गई थी। इस शक्ति को कुचलने के लिए औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को दिल्ली बुलवाकर उनका सिर कलम करवाया।

यह एक असंभव सी बात थी कि इतिहास के पन्नों में सिमटा कोई धीरोदात्त नायक न केवल अपने जीवन काल में अपितु युगों-युगों तक विशाल जनसमुदाय को धार्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना से आप्लावित रख सके। गुरु गोविंदसिंह ने यह चमत्कार कर दिखाया।

जब गुरु तेगबहादुर देश की धर्म-प्राण जनता में शौर्य एवं साहस का प्रचार करते हुए ई.1666 में पूर्वी भारत के पटना नगर में पहुंचे, तब वहीं पटना में ही गोविन्दसिंह का जन्म हुआ। गुरु तेगबहादुर लगभग पाँच वर्ष तक पटना में रहकर धर्म-प्रचार एवं सामाजिक जनजागृति का कार्य करते रहे। इसके बाद वे पंजाब के आनन्दपुर नामक स्थान पर आए और वहीं पर उन्होंने अपना डेरा लगाया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब बालक गोविंदसिंह छः वर्ष के हुए तो पिता तेगबहादुर ने उनकी शिक्षा-दीक्षा का समुचित प्रबंध किया। बालक गोविंदसिंह को साहिबचन्द ग्रन्थी ने संस्कृत और हिन्दी तथा काजी पीर मुहम्मद ने फारसी भाषा एवं साहित्य का ज्ञात करवाया। बालक गोविंदसिंह ने शीघ्र ही इन भाषाओं पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार जीवन के आरम्भिक भाग में गोविंदसिंह के मन में साहित्य के प्रति जो अनुराग उत्पन्न हुआ वह सम्पूर्ण जीवन तक चलता रहा।

नौ वर्ष की आयु में जब गोविन्दसिंह के पिता दिल्ली में शहीद हुए तब सिक्ख पंथ का भार बालक गोविन्द सिंह के कन्धों पर आ गया और वे सिक्खों के दसवें गुरु हुए। जब उन्होंने देखा कि मुगलों का प्रतिरोध किए बिना धर्म का बचना कठिन है तो उन्होंने पंथ के समस्त शिष्यों को सैनिक समुदाय में परिवर्तित कर दिया। भारतवासियों के नाम उनका सबसे बड़ा संदेश था-

‘सकल जगत में खालसा पंथ गाजे,

जगे धर्म हिंदू सकल भंड भाजे!’

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अर्थात्- मेरी इच्छा है कि सम्पूर्ण विश्व में खालसा पंथ की जयजयकार गूंजे, हिन्दू धर्म नींद से जागकर खड़ा हो जाए ताकि संसार भर में धर्म के नाम पर चल रहे समस्त पाखण्ड नष्ट हो जाएं। गुरु गोविंदसिंह ने आनंदपुर को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया जिसे अब सिक्ख समुदाय बड़े आदर से आनंदपुर साहब कहता है। गुरु गोविन्द सिंह ने आनन्दपुर नगर की सुरक्षा के लिए उसके आस-पास चार किले बनवाये- 1. आनन्दगढ़ 2. केशगढ़ 3. लौहगढ़ 4. फतेहगढ़।

गुरु गोविंदसिंह की गतिविधियों से नाराज होकर औरंगजेब ने गुरु पर कार्यवाही करने के लिए एक सेना भेजी। ई.1690 में गोविन्द सिंह एवं मुगल सेना बीच नादोन का युद्ध हुआ जिसमें गुरु गोविन्द सिंह की सेना की विजय हुई। इस युद्ध से गुरु की समझ में आ गया कि औरंगजेब से भविष्य में भी युद्ध होते रहेंगे जिसके लिए बहुत बड़ी तैयारी की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने कुछ समर्पित एवं विश्वसनीय लोगों का एक छोटा समूह बनाने का निश्चय किया जिनका अनुकरण करके जन-सामान्य अपने गुरु पर अटूट विश्वास एवं श्रद्धा रख सके।

इसके लिए उन्होंने एक विलक्षण योजना बनाई। उन्होंने पंजाब सूबे में दूर-दूर तक फैले  सिक्खों को आनन्दपुर के वैशाखी मेले में आने के लिए आमंत्रित किया। गुरु के आह्वान पर बड़ी संख्या में सिक्ख आनंदपुर के वैशाखी मेले में आ गए।

गुरु गोविन्दसिंह ने एक बड़े चबूतरे पर चारों ओर से कनात खड़ी करवाकर उसके भीतर कुछ बकरे बँधवा दिए। तत्पश्चात वे तलवार खींच कर कनात से बाहर आए और विशाल जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म की रक्षा के लिए महाचण्डी आपका बलिदान चाहती है। आप लोगों में से जो कोई भी अपने धर्म के लिए अपने प्राण देने को तैयार हो वह कनात के भीतर आ जाए, मैं अपने हाथों से महाचण्डी के आगे उसका बलिदान करूँगा।

गुरु के पुकारने पर एक आदमी सामने आया। गुरु उसे लेकर कनात के भीतर गए तथा उन्होंने उस व्यक्ति को तो वहीं बैठा दिया और एक बकरे की गरदन काट डाली। कुछ ही क्षणों में कनात से बाहर रक्त की धार दिखाई दी। इसके बाद गुरु रक्त से सनी हुई तलवार लेकर कनात से बाहर आए तथा उन्होंने किसी दूसरे व्यक्ति को सामने आने का आह्वान किया।

इस प्रकार एक-एक करके पाँच वीर सामने आए। इनमें लाहौर का दयाराम खत्री, दिल्ली का धर्मदास जाट, द्वारका का मोहकमचंद दर्जी, जगन्नाथ का हिम्मत भीवर एवं बीदर का साहबचंद नाई शामिल थे। जब गुरु फिर पुकार लगाई तो कोई व्यक्ति अपने बलिदान के लिए प्रस्तुत नहीं हुआ।

इस पर गुरु ने उन पाँच वीरों को कनात से बाहर निकाला और कहा- ये ‘पाँच प्यारे’ धर्म के खालिस अर्थात् शुद्ध सेवक हैं और इन्हें साथ लेकर मैं आज से ‘खालसा-धर्म’ की नींव डालता हूँ।  उसी समय, उन्होंने एक कड़ाह में पवित्र जल भरवाया, उनकी धर्मपत्नी ने उसमें बताशे घोले और गुरु ने तलवार से उस जल को हिलाया और अपनी तलवार से ही उस जल को पाँच प्यारों पर छिड़का। इस प्रक्रिया को गुरु ने ‘अमृत छकने’ की रस्म बताया।

गुरु तथा उनकी पत्नी ने इस अमृत को वहाँ उपस्थित समस्त लोगों को पीने के लिए दिया। इस अमृत को पीकर गुरु गोबिंदसिंह के अनुयाई खालसा-धर्म में दीक्षित हुए। इस प्रकार गुरु गोविंदसिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की। 30 मार्च 1699 को गुरु गुरु गोविन्दसिंह ने खालसा पंथ की शिक्षाओं को अंतिम रूप दिया।

इस पंथ के अनुयाई, हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए हर समय प्राणोत्सर्ग करने के लिए तैयार रहते थे। गुरु गोविन्द सिंह ने 20,000 सैनिकों की खालसा सेना भी तैयार की।

गुरु गोविंदसिंह अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि केवल ‘शाप’ ही नहीं ‘शर’ का भी प्रयोग करो। गुरु की कविताओं में अद्भुत ओज था। जिस परमात्मा को गुरु नानक ‘निरंकार पुरुख’ कहते थे, गुरु गोविन्दसिंह ने उसे असिध्वज, महाकाल और महालौह कहा।

सिक्ख-धर्म का वर्तमान संगठन काफी अंशों तक गुरु गोविन्दसिंह द्वारा ही किया गया। उन्होंने सिक्खों में पगड़ी बाँधने की प्रथा प्रारम्भ की तथा ‘पंच-ककारों’ अर्थात् (1.) कंघी, (2.) कच्छ, (3.) कड़ा, (4.) कृपाण तथा (5.) केश को धारण करना अनिवार्य बनाया।

गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्ख पंथ में मदिरा और तम्बाकू सेवन को वर्जित किया। सिक्खों के लिए जो कर्म निषिद्ध हैं उनका उल्लेख रहतनामा नामक ग्रंथ में मिलता है। इस ग्रंथ में केश-कर्तन को महान् अपराध माना गया है।

इसके बाद गुरु गोविंदसिंह ने औरंगजेब की सेनाओं द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का विरोध और अधिक तेज कर दिया। सिक्ख लड़ाके बड़ी फुती से खेतों के बीच से निकलकर मुगल सेनाओं पर धावा बोलते थे और उन्हें नुक्सान पहुंचाकर आनन-फानन में अदृश्य हो जाते थे।

गुरु गोविन्दसिंह की तैयारियों एवं कार्यवाहियों से औरंगजेब घबरा गया। वह विगत दो दशकों से दक्खिन के मोर्चे पर था इसलिए उसने लाहौर के सूबेदार को आदेश दिए कि गुरु की राजधानी आनन्दपुर पर हमला किया जाए।

इस समय औरंगजेब का तीसरे नम्बर का पुत्र मुअज्जम लाहौर का सूबेदार था। उसने आनंदपुर साहिब पर आक्रमण करने से मना कर दिया। इस पर औरंगजेब ने सरहिन्द के सूबेदार वजीरखाँ को आदेश दिए कि वह आनन्दपुर पर हमला करके गुरु गोविंदसिंह को समाप्त कर दे।

गुरु के शिष्यों ने तलवार और भाले लेकर मुगलों का सामना किया किंतु विशाल मुगल सेना के समक्ष अधिक समय तक नहीं टिक सके। इस पर गुरु अपने शिष्यों को लेकर आनंदपुर से निकल गए। इस दौरान मची अफरा-तफरी में उनके दो पुत्र जोरावर सिंह और फतेहसिंह अपने परिवार से बिछड़ गए।

किसी व्यक्ति ने इन दोनों गुरु-पुत्रों को सरहिन्द के सेनापति वजीर खाँ को सौंप दिया। वजीर खाँ ने उन बालकों से इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा परन्तु उन बालकों ने भी अपने दादा की भांति, इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

इस पर 27 दिसम्बर 1704 को दुष्ट वजीर खाँ ने गुरुपुत्रों को जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया। कहा जाता है कि उस समय गुरुपुत्रों की माता भी उनके साथ थी जो यह भयावह दृश्य देखकर मृत्यु को प्राप्त हो गई।

जब गुरु गोविंदसिंह को अपने पुत्रों की शहीदी का पता चला तो उन्होंने औरंगजेब की धर्मान्ध नीति के विरुद्ध उसे फारसी भाषा में एक लम्बा पत्र लिखा जिसे सिक्खों के इतिहास में ‘जफरनामा’ के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ हेाता है- ‘विजय की चिट्ठी।’ इस पत्र में औरंगजेब के शासन-काल में हो रहे अन्याय तथा अत्याचारों का मार्मिक उल्लेख है।

इस पत्र में गुरु की तरफ से औरंगजेब को नेक कर्म करने और मासूम प्रजा का खून न बहाने की नसीहत दी गई तथा धर्म एवं ईश्वर की आड़ में मक्कारी और हिंसा न करने की चेतावनी भी दी गई। गुरु ने औरंगजेब को योद्धा की तरह रणक्षेत्र में आकर युद्ध करने की चुनौती दी तथा लिखा कि तेरी सल्तनत नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है।

गुरु-पुत्रों की शहीदी के बाद सिक्ख समुदाय वजीर खाँ तथा औरंगजेब का शत्रु हो गया। सिक्खों ने पंजाब सूबे की राजधानी लाहौर सहित विभिन्न कस्बों में मारकाट एवं लूटमार मचा दी जिसका सामना करना मुगलों के वश में नहीं था। सिक्खों ने मुगलों के अनेक भवनों को लूट लिया और बहुतों को नष्ट कर दिया। वजीर खाँ ने भी सिक्खों से निबटने की बड़ी तैयारी की।

ई.1705 में चमकौर अथवा मुक्तसर नामक स्थान पर दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह के दो पुत्र अजीत सिंह और जुझारु सिंह भी काम आए।

सिक्खों द्वारा पंजाब के प्रमुख स्थान सरहिंद को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया तथा लाहौर सहित आसपास के अनेक मुगल भवनों के पत्थरों को तोड़कर अमृतसर के स्वर्णमंदिर एवं अन्य भवनों को भेज दिया गया। इन युद्धों के दौरान ‘आदि ग्रन्थ’ लुप्त हो गया। अतः शुरु ने इसका पुनः संकलन करवाया गया। इसी कारण इसे ‘दशम् पादशाह का ग्रन्थ’ भी कहा जाता है।

औरंगजेब की सेनाएं लगातार हारती जा रही थीं किंतु औरंगजेब दक्खिन का मोर्चा छोड़ सकने की स्थिति में नहीं था इसलिए उसने गुरु से सन्धि करने के लिए उन्हें दक्षिण में आने के लिए आमंत्रित किया। गुरु गोविंदसिंह दक्षिण की तरफ रवाना हुए किंतु गुरु द्वारा औरंगजेब से भेंट किए जाने से पहले ही औरंगजेब का निधन हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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