Wednesday, February 21, 2024
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81. औरंगजेब का चौथा शहजादा बागी हो गया!

जब औरंगजेब और उसके तीन शहजादे आजम, अकबर तथा कामबख्श उदयपुर और चित्तौड़ में हिन्दू मंदिरों को तुड़वा रहे थे तब वीर दुर्गादास ने दक्खिन के मोर्चे पर नियुक्त शहजादे मुअज्जम को पत्र लिखा कि जिस प्रकार तुम्हारा पिता दक्खिन की सूबेदारी छोड़कर आगरा चला आया था और बादशाह बन गया था, उसी प्रकार तुम भी राठौड़ों की सहायता से आगरा के बादशाह बन सकते हो किंतु शहजादे मुअज्जम ने वीर दुर्गादास के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब का सबसे बड़ा शहजादा मुहम्मद सुल्तान इस समय दिल्ली के सलीमगढ़ दुर्ग में बंद था।

जब आजम ने वीर दुर्गादास के पत्र का जवाब नहीं दिया तो दुर्गादास ने मारवाड़ में कैम्प कर रहे शहजादे अकबर से सम्पर्क किया तथा उसे समझाया कि अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ ने भारत की हिन्दू शक्तियों से मेल-मिलाप रखकर इतने बड़े देश पर राज्य किया किंतु औरंगजेब हिन्दुओं को मारकर इस देश पर राज्य करना चाहता है जो कि संभव नहीं है। कुछ ही समय में बुंदेले, मराठे, जाट, सतनामी, सिक्ख एवं राजपूत, मुगलों के राज्य को पूरी तरह नष्ट कर देंगे, तब तुम लोग बादशाह नहीं बन पाओगे। अतः बुद्धिमानी इसी में है कि समय रहते तुम अपने पिता का पक्ष छोड़कर राजपूतों के पक्ष में आ जाओ और हमारे सहयोग से बादशाह बनकर मुगलों के राज्य को बचा लो।

औरंगजेब ने अपने पिता को बंदी बनाकर और भाइयों तथा भतीजों को मारकर मुगलिया तख्त प्राप्त किया था इसलिये वह हर किसी के प्रति आशंकित रहता था। इस शंकालु प्रवृत्ति के कारण वह अपने पुत्रों को न केवल प्रशासन के महत्वपूर्ण कार्यों से दूर रखता था, अपितु उनके पीछे गुप्तचर भी लगाये रखता था। इस कारण वह अपना कोई योग्य उत्तराधिकारी तैयार नहीं कर सका। औरंगजेब अपने अमीरों, उमरावों, एवं सेनापतियों को भी संदेह की दृष्टि से देखता था। इसलिए वह राज्य के छोटे-से-छोटे काम को स्वयं करने का प्रयत्न करता था। फलतः उसके मंत्री और अधिकारी निर्णय लेने में असमर्थ हो गये।

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औरंगजेब के सेनापति घोर संकट में भी असहाय होकर बादशाह के आदेशों के लिए मुँह ताकते रहते थे। जब तक बादशाह में शारीरिक योग्यता रही, उसने सल्तनत को नियंत्रित रखा किन्तु उसकी वृद्धावस्था आते-आते सल्तनत छिन्न-भिन्न होने लगी। शहजादा अकबर इन समस्त परिस्थितियों को समझ रहा था। वह औरंगजेब का चौथे नम्बर का पुत्र था। उसका जन्म 11 सितम्बर 1657 को औरंगाबाद में हुआ था। उसकी माँ दिलरास बानू ईरान की शहजादी थी। जब अकबर एक महीने का था तो उसकी माँ दिलरास बानू का निधन हो गया और जब औरंगजेब ने शाहजहाँ को बंदी बनाया था तब अकबर केवल नौ माह का शिशु था। मातृ-विहीन अकबर का पालन-पोषण औरंगजेब के आदेश से अकबर की सबसे बड़ी पुत्री जेबुन्निसा के संरक्षण में हुआ था।

चूंकि जेबुन्निसा स्वयं भी बहुत अच्छे स्वभाव की और विदुषी महिला थी, इसलिए उसने अपने मातृविहीन भाई अकबर को बहुत प्यार से पाला और पढ़ा-लिखा कर विद्वान बनाया। जिस प्रकार जेबुन्निसा भी अपने ताऊ दारा शिकोह की तरह सूफी मत में अधिक विश्वास रखती थी, उसी प्रकार अकबर भी दूसरे धर्मों के प्रति कट्टर नहीं था। अकबर की पत्नी सलीमा बानू बेगम दारा शिकोह की पौत्री थी तथा वह भी दूसरे धर्मों के लोगों के प्रति सहानुभूति रखती थी।

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चूंकि अकबर अपने पिता का चौथे नम्बर का शहजादा था, इसलिए उसे सहज रूप से अपने पिता का तख्त प्राप्त नहीं हो सकता था। इसके लिए उसे एक न एक दिन बगावत का रास्ता अपनाना ही पड़ता। यह एक अच्छा प्रस्ताव था कि वीर राजपूत जाति स्वयं आगे होकर उसे सहायता देने का प्रस्ताव दे रही थी। इसलिए जब अकबर को वीर दुर्गादास का प्रस्ताव मिला तो औरंगजेब का मन डोल गया।

शहजादा अकबर अपने पिता औरंगजेब के आदेश से राठौड़ों के विरुद्ध लड़ अवश्य रहा था किंतु उसे समझ में आ रहा था कि राजपूतों से लड़कर राज्य नहीं किया जा सकता। अतः अकबर ने जोधपुर के हाकिम तहव्वर खाँ के माध्यम से दुर्गादास से बात की और अपने पिता औरंगजेब से विद्रोह करने को तैयार हो गया।

1 जनवरी 1681 को मारवाड़ राज्य के नाडोल नामक स्थान पर शहजादे अकबर तथा वीर दुर्गादास की एक गुप्त बैठक हुई जिसके पश्चात् अकबर ने स्वयं को दिल्ली एवं आगरा का नया बादशाह घोषित कर दिया तथा औरंगजेब को उसके पद से हटा दिया। अकबर के इस फैसले पर उसके साथ चले रहे मुल्ला-मौलवियों ने अपनी छाप लगाई तथा यह घोषित किया कि चूंकि औरंगजेब का आचरण इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है, इसलिए उसे बादशाह बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

यह समाचार सुनकर औरंगजेब के पैरों के तले से जमीन खिसक गई। औरंगजेब अपने इस मातृ-विहीन पुत्र को सबसे अधिक प्यार करता था। यहाँ तक कि एक बार स्वयं औरंगजेब ने उससे कहा कि केवल अल्लाह इस बात का गवाह है कि मैंने अपने बेटों में सबसे ज्यादा प्यार केवल तुझसे किया है।

औरंगजेब की शाही सेना उस समय अकबर के पास थी जिसमें 70 हजार सैनिक थे। अकबर इस सेना को लेकर औरंगजेब को कैद करने के लिए अजमेर के लिए रवाना हो गया। यह खबर सुनकर औरंगजेब की स्थिति दयनीय हो गई। उस समय उसके पास अंगरक्षकों, खानसामों, बावर्चियों, भिश्तियों और अन्य सैनिक-असैनिक कर्मचारियों को मिलाकर लगभग दस हजार आदमी थे। फिर भी औरंगजेब, षड़यंत्रों की दुनिया का पुराना खिलाड़ी था, इसलिए उसने अपने बेटे के सामने हिम्मत नहीं हारी। उसने शहजादे मुअज्जम के पास अपने संदेश वाहक दौड़ाए कि वह अपनी सेना लेकर तुरंत अजमर पहुंचे।

औरंगजेब ने इनायत खाँ को अजमेर का फौजदार नियुक्त किया। बहरमंद खाँ को सैन्य अभियान का कमाण्डर बनाया तथा उसे निर्देश दिये कि शाही सैनिकों के चारों ओर किलेबंदी की जाये तथा अजमेर की तरफ आने वाले मार्गों की रक्षा की जाये।

असद खाँ बटलाया को पुष्कर की तरफ आने वाले मार्ग तथा झील पर नियुक्त किया गया। अबू नासर खाँ को असद खाँ का नायब नियुक्त करके अजमेर के पश्चिम की ओर दृष्टि रखने का काम दिया गया। अकबरी महल के निकट अजमेर की गलियों में तोपें लगा दी गईं जिसमें आजकल राजकीय संग्रहालय चल रहा है। 

अहमदाबाद के नाजिम हाफिज मोहम्मद अमीन तथा अन्य अधिकारियों को निर्देश दिये गये कि वे हर समय शस्त्र लेकर तैयार रहें तथा अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहें। उम्दतुलमुल को किलेबंदी की निगरानी रखने का काम दिया गया। शहजादे के वकीलों शुजात खाँ तथा बादशाह खाँ को गढ़ बीठली में बंदी बना लिया गया। हिम्मत खाँ को गढ़ बीठली का कमाण्डर नियुक्त किया गया।

इधर औरंगजेब तेजी से अजमेर की किलेबंदी कर रहा था और उधर अनुभवहीन अकबर, औरंगजेब की दयनीय स्थिति का आकलन नहीं कर सकने के कारण कदम-कदम सूंघता हुआ बहुत धीमी गति से अजमेर की ओर बढ़ रहा था। 15 दिन में उसने 120 मील की दूरी तय की। ये 15 दिन औरंगजेब जैसे अनुभवी सेनापति के लिए पर्याप्त थे। उसने आस-पास के सरदारों को बुलाकर काफी सेना एकत्रित कर ली। यहाँ तक कि दक्षिण में नियुक्त मुअज्जम भी तेज गति से चलता हुआ अजमेर आकर अपने पिता से मिल गया। इससे औरंगजेब की सेना भी बहुत विशाल हो गई।

17 जनवरी 1681 को शहजादा अकबर अपने राजपूत साथियों के साथ, अजमेर से 22 मील दक्षिण में स्थित बुधवाड़ा नामक स्थान पर पहुँच गया। अकबर की सहायता के लिए न केवल पच्चीस हजार राठौड़ सरदार मौजूद थे अपितु उदयपुर के महाराणा जयसिंह के भी 6 हजार सैनिक अकबर की सहायता के लिए आ गए थे। औरंगजेब भी अजमेर से निकलकर दौराई आ गया परंतु यहाँ से आगे बढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई।

अब अकबर तथा औरंगजेब की सेनाओं के बीच की दूरी केवल 3 मील रह गई थी। जैसे-जैसे दोनों सेनाओं के बीच की दूरी घटती जाती थी, वैसे-वैसे बादशाही अमीर अकबर की सेना से निकलकर औरंगजेब के लश्कर में मिलते जाते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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