Monday, May 20, 2024
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अध्याय – 10 : मुगल स्थापत्य का पतनकाल औरंगजेब कालीन भवन

शाहजहाँ तथा मुमताज महल की चैदह संतानें थीं। उनमें से मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब छठा था। उसका जन्म 3 नवम्बर 1618 को उज्जैन के निकट दोहद में हुआ था। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया था तब औरंगजेब आठ साल का था। उस समय औरंगजेब तथा उसके भाई दारा को नूरजहाँ के पास बंधक के रूप में रखा गया। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के समक्ष समर्पण किया, तब दोनों भाईयों को मुक्त किया गया। इस कारण जब औरंगजेब 10 साल का हुआ, तब उसकी शिक्षा आरम्भ हो सकी। औरंगजेब ने कुरान तथा हदीस का ज्ञान प्राप्त किया।

उसने स्वयं को कट्टर सुन्नी मुसलमान बनाया। वह चित्रकला तथा संगीत आदि ललित कलाओं से दूर रहता था। उसे यह पसंद नहीं था कि उसके पिता शाहजहाँ तथा तीनों भाई चित्रकला, संगीत तथा स्थापत्य में रुचि रखते थे। उसकी दृष्टि में ये सब इस्लाम विरोधी कार्य थे। उसे यह भी पसंद नहीं था कि मुगल शासन में काफिर हिन्दुओं को बहुत बड़ी भूमिका दी गई थी। औरंगजेब चाहता था कि भारत को पूरी तरह ‘दारुल इस्लाम’ अर्थात् ‘इस्लाम का घर’ बनाया जाए। ई.1657 में जब शाहजहाँ बीमार पड़ा तब औरंगजेब ने उसे आगरा के लाल किले में कैद कर लिया। औरंगजेब ने अपनी बड़ी बहन जहांआरा को भी शाहजहाँ के साथ ही कैद कर लिया। इसके बाद औरंगजेब अपने तीन भाइयों- दारा शिकोह, शाहशुजा तथा मुराद बक्श की हत्या करके स्वयं मुगलों के तख्त पर आसीन हो गया।

बादशाह बनने के बाद उसने भारत के समस्त हिन्दू राजाओं को अटक नदी के पार ले जाकर एक साथ उनकी सुन्नत करने का षड़यंत्र रचा किंतु एक सूफी फकीर ने औरंगजेब के षड़यंत्र का पर्दा फाश कर दिया और हिन्दू राजाओं ने अटक नदी के पूर्वी किनारे पर ही अपनी नावें जला दीं और नदी के पार जाने से मना कर दिया। इस पर औरंगजेब ने हाथ में कुरान लेकर शपथ ग्रहण की कि वह भविष्य में फिर कभी ऐसा नहीं करेगा। इस घटना के बाद से औरंगजेब ने हिन्दू राजाओं को एक-एक करके नष्ट करने का निश्चय किया जिससे समस्त भारत में राजपूत, मराठे, जाट, सिक्ख तथा सतनामियों आदि ने मुगल सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और स्थान-स्थान पर युद्ध आरम्भ हो गए।

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औरंगजेब के विध्वंस कार्य

औरंगजेब के काल में भवनों का निर्माण न के बराबर हुआ। केवल गिनती की कुछ मस्जिदें और मकबरे ही बने किंतु सैंकड़ों की संख्या में हिन्दू भवनों को तोड़ा गया। बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा स्थलों को गिरवाना तथा देव मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार ही हुआ था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवा दी। तख्त पर बैठते ही उसने बिहार के अधिकारियों को निर्देश दिये कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने हिन्दू मन्दिर हैं उन सबको गिरवा दिया जाये। औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का तीसरा मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। बनारस में विश्वनाथ के मन्दिर को गिरवाकर वहाँ विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया गया, जो आज भी विद्यमान है। मथुरा में केशवराय मन्दिर की भी यही दशा की गई। मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया गया।

ई.1680 में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के समस्त हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया। आम्बेर के राजपूतों ने अकबर के शासन-काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण आम्बेर के कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी। यह औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें। उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो। इस प्रकार औरंगजेब ने हर प्र्रकार से हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलने का काम किया।

औरंगजेब ने हिन्दुओं के धर्म के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी उन्मूलित करने का प्रयत्न किया। उसके आदेश से थट्टा, मुल्तान तथा बनारस में स्थित समस्त हिन्दू शिक्षण संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। मुसलमान विद्यार्थियों को हिन्दू पाठशालाओं में पढ़ने की अनुमति नहीं थी। हिन्दू पाठशालाओं में न तो हिन्दू धर्म की कोई शिक्षा दी जा सकती थी और न इस्लाम विरोधी बात कही जा सकती थी।

औरंगजेब के निर्माण कार्य

दिलरास बानो का मकबरा (बीबी का मकबरा) औरंगाबाद

 औरंगजेब के शासनकाल में महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर के निकट औरंगजेब की मरहूम बेगम रबिया-उद्-दौरानी उर्फ दिलरास बानो बेगम का मकबरा बनवाया गया। इस मकबरे का निर्माण शहजादे आजमशाह ने अपनी माँ की स्मृति में ई.1651-61 के दौरान करवाया। मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे अभिलेख के अनुसार यह मक़बरा अताउल्ला और हंसपत राय नामक वास्तुकारों द्वारा अभिकल्पित और निर्मित किया गया। इसे ‘बीबी का मकबरा’ तथा दक्कन का ताज’ भी कहा जाता है। इसका डिजाइन ताजमहल का डिजाइन तैयार करने वाले शिल्पी अहमद लाहौरी के पुत्र अताउल्लाह ने तैयार किया था। इसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया किंतु इसकी मीनारों में संतुलन न हो पाने के कारण पूरे भवन का सामन्जस्य बिखर गया। यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों तथा अन्य सजावटों में कोई विशेषता नहीं है।

ग़ुलाम मुस्तफा की पुस्तक ‘तारीख नामा’ के अनुसार इस मकबरे के निर्माण पर 6,68,203 रुपये व्यय हुए थे। इस मक़बरे का गुम्बद पूरी तरह संगमरमर के पत्थर से बना हुआ है तथा शेष निर्माण पर सफेद प्लास्टर किया गया है। इस के निर्माण के लिए संगमरमर मकराना की खदानों से लाया गया था। आज़मशाह इसे ताजमहल से भी अधिक भव्य बनाना चाहता था किंतु औरंगज़ेब द्वारा दिए गए खर्च में वह संभव नहीं हो पाया।

लाल किला मस्जिद, दिल्ली

औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले में एक मस्जिद बनवाई, जो उसकी सादगी का परिचय देती है। इसे मोती मस्जिद भी कहा जाता है। यह मस्जिद उच्च कोटि के संगमरमर से निर्मित की गई है।

बादशाही मस्जिद लाहौर

औरंगजेब ने ई.1673-74 में लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है। इसमें गोलाकार बंगाली छत और फूले हुए गुम्बद बनाए गए हैं। मस्जिद का मुख्य भवन एवं मीनारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं जबकि भवन के ऊपर के गुम्बद तथा मीनारों के ऊपर के बुर्ज सफेद संगमरमर से बनाए गए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में यह तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है। अपने निर्माण के समय यह विश्व की सबसे बड़ी मस्जिद थी। इस समय यह विश्व की सातवें नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है तथा पाकिस्तान में तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। यह लाहौर दुर्ग के पास ही स्थित है तथा लाल पत्थर से बनी मण्डलीय मस्जिदों में अंतिम मस्जिद है। इसके बाद मुगलों ने ऐसी मस्जिद फिर कभी नहीं बनाई।

औरंजेब द्वारा निर्मित लाहौर की बादशाही मस्जिद, शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में बनवाई गई जामा मस्जिद की अनुकृति पर बनी है किंतु यह दिल्ली की जामा मस्जिद की तुलना में बहुत बड़ी है तथा ईदागाह के रूप में भी प्रयुक्त होती है। इसका दालान 2 लाख 76 हजार वर्ग फुट में विस्तृत है जिसमें एक लाख लोग नमाज पढ़ सकते हैं। मस्जिद के चारों ओर बनी मीनारें 196 मीटर ऊँची हैं। महाराजा रणजीतसिंह के शासन में इस मस्जिद को बहुत क्षति पहुंची। मस्जिद परिसर में एक छोटा संग्रहालय भी बनाया गया है।

जीनत-अल-मस्जिद, दिल्ली

औरंगजेब की दूसरे नम्बर की पुत्री जीनत-उन्निसा ने ई.1707 में दिल्ली के शाहजहाँनाबाद में खैराती दरवाजा के पास जीनत-अल-मस्जिद बनवाई। उस समय यमुना नदी इस मस्जिद के पास से होकर बहती थी इस कारण इसे घाट मस्जिद भी कहा जाता था। औरंगजेब के समय में यह क्षेत्र शाहजहाँनाबाद के दरियागंज क्षेत्र के अंतर्गत था। दरियागंज नामक बाजार की स्थापना मुगलों ने ही की थी जिसका आशय यमुना नदी के तट पर स्थित बाजार से था किंतु जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार किया तो उन्होंने यमुना के बहाव की दिशा में परिवर्तन कर दिया। इसके बाद दरिया अर्थात् यमुना, दरियागंज से दूर चली गई किंतु बाजार पूर्ववत् दरियागंज कहलाता रहा। शाहजहाँ द्वारा बनाई गई दिल्ली की जामा मस्जिद के स्थापत्य से साम्य होने से इसे दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद भी कहा जाता है।

शाहजहाँ अपनी पौत्री जीनत-उन्निसा से बहुत प्रेम करता था इसी कारण जीनत-उन्निसा ने अपने बाबा द्वारा बनाई गई मस्जिद के नक्शे पर ही यह मस्जिद भी बनवाई। कुछ किंवदन्तियों के कारण इसे घटा मस्जिद (बादल मस्जिद) एवं घाटा मस्जिद (नुक्सान मस्जिद) भी कहा जाता है। इस मस्जिद के पास ही जीनत-उन्निसा का मकबरा भी था। जब ई.1857 में बादशाह बहादुरशाह जफर ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ दिया तब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार करके, उसके भीतर स्थित बहुत से भवनों को नष्ट कर दिया। उसी समय अंग्रेजों ने जीनत-उन्निसा का मकबरा भी गिरा दिया तथा जीनत-उन्निसा द्वारा बनवाई गई मस्जिद में बेकरी स्थापित कर दी।

जीनत-उन्निसा का जन्म औरंगजेब की प्रिय बेगम दिलरास बानो के पेट से हुआ था जिसका मकबरा औरंगजेब के पुत्र आजमशाह ने औरंगाबाद में बनाया था और बीबी का मकबरा के नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार जीनत-उन्निसा द्वारा निर्मित मस्जिद को मिनी जामा मस्जिद कहा जाता है, उसी प्रकार बीबी का मकबरा को मिनी ताजमहल कहा जाता है। ये दोनों ही इमारतें औरंगजेब के पुत्र एवं पुत्री ने बनाई थीं किंतु दोनों ने ही अपने बाबा शाहजहाँ के स्थापत्य का अनुकरण किया। इससे प्रतीत होता है कि औरंगजेब की औलादें, अपने पिता औरंगजेब की बजाय अपने बाबा शाहजहाँ से अधिक प्रेम करती थीं।

लालबाग किला, ढाका

औरंगजेब के तीसरे शहजादे मुहम्मद आज़म शाह को बंगाल का सूबेदार बनाया गया था। उसने ई.1678 में लालबाग किले का निर्माण आरम्भ करवाया किंतु यह काम अधूरा ही रह गया। उस समय इसे औरंगाबाद का किला कहते थे। अब यह दुर्ग बांगलादेश की राजधानी ढाका के दक्षिण-पश्चिमी भाग में बुरीगंगा नदी के निकट स्थित है तथा लाल बाग का किला कहलाता है। मुहम्मद आजम के बाद औरंगजेब का मामा शाइस्ता खान बंगाल का सूबेदार हुआ। वह ई.1688 तक बंगाल में रहा किंतु उसने किले का काम पूरा नहीं करवाया। ई.1684 में शाइस्ता खान की बेटी ‘बीबी ईरान दुख्त परी’ की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद शाहस्ता खान ने इस दुर्ग को अशुभ जानकर ढाका छोड़ दिया और मुर्शिदाबाद में जाकर रहने लगा। ई.1787 में जोहान जोफनी द्वारा इस किले के भवनों को चित्रित किया गया। ई.1844 में इस क्षेत्र को लालबाग कहा जाने लगा।

लंबे समय तक किले को तीन इमारतों- (1.) मस्जिद, (2.) बीबी परी का मकबरा और (3.) दीवान-ए-आम का संयोजन माना जाता था जिसक  साथ दो दरवाजे और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त किले की दीवार का हिस्सा भी था। बांग्लादेश के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में अन्य संरचनाएं भी सामने आई हैं। किले की दक्षिणी दीवार के दक्षिणी-पश्चिमी कोने पर एक विशाल बुर्ज बनी हुई है। इसके साथ ही अस्तबल तथा प्रशासनिक खण्ड के भवन बने हुए हैं। किले के पश्चिमी भाग में एक ‘रूफ-गार्डन’ बना हुआ है। इसमें जलाशय तथा फव्वारों की भी व्यवस्था है। दुर्ग की दीवार में थोड़ी-थाड़ी दूरी पर दो मंजिले बुर्ज बने हुए हैं।

दीवान-ए-आम परिसर के पूर्व की ओर स्थित बंगाल के मुगल सूबेदार का दो मंजिला आवास है। अंग्रेजी फैक्टरी के गवर्नर की रिपोर्ट में कहा गया है कि शाइस्ता खान इस कमरे में रहता था। बाद में कुछ यूरोपीय लोगों को इसी भवन में कैद करके रखा गया। बीबी पारी के मकबरे में भीतरी भाग सफेद संगमरमर से ढका हुआ है जबकि बाहरी भाग लाल पत्थर से बना है। इस मकबरे में केंद्रीय कमरे के चारों ओर आठ कमरे बनाए गए हैं। दक्षिण-पूर्वी कोने के कमरे में एक और छोटी कब्र है। इस किले में शालीमार बाग की भांति एक उद्यान भी बनाया गया था।

रौशनआरा का मकबरा, दिल्ली

शाहजहाँ की पुत्री रौशन आरा का निधन ई.1671 में हुआ। उसका मकबरा दिल्ली में बनाया गया। इस मकबरे के चारों ओर बड़ा उद्यान था जिसका कुछ हिस्सा अब भी बचा हुआ है।

आलमगीरी दरवाजा, लाहौर

लाहौर दुर्ग के आलमगीरी दरवाजे का निर्माण औरंगजेब के काल में ई.1673 करवाया गया। वर्तमान समय में यही दरवाजा किले के मुख्य द्वार के रूप में प्रयुक्त होता है। यह दरवाजा बादशाही मस्जिद की तरफ खुलता था जिसका निर्माण भी औरंजेब ने करवाया था।

पिंजोर गार्डन, पंचकूला

पिंजोर गार्डन चण्डीगढ़ से 22 किलोमीटर दूर है तथा हरियाणा प्रांत के पंचकूला जिले में स्थित है। यह 17वीं शती का मुगल उद्यान है जिसे अब यदुवेन्द्र गार्डन कहा जाता है। इसका निर्माण औरंगजेब के काल में औरंगजेब के धाय-भाई मुजफ्फर हुसैन ने करवाया था जिसे नवाब फिदाई खान कोका भी कहते थे। इसी धाय-भाई ने लाहौर की बादशाही मस्जिद के निर्माण कार्य की देख-रेख की थी। जिस समय पिंजोर का उद्यान बनवाया गया, उस समय औरंगजेब लाहौर में प्रवास कर रहा था तथा यह औरंगजेब के शासन के शुरुआती वर्ष थे।

अंग्रेज महिला लेखक एवं चित्रकार सी.एम. विलियर्स स्टुअर्ट ने ई.1913 में कुछ दिनों तक इस उद्यान में निवास किया। उसने अपनी पुस्तक गार्डन्स ऑफ द ग्रेट मुगल्स में लिखा है- ‘जब दीर्घकालीन निर्माण प्रक्रिया पूरी होने के बाद फिदाई खान अपने हरम की औरतों को लेकर पिंजौर बाग में रहने के लिए आया तो उसने देखा कि बाग में काम करने वाले बहुत से लोगों के गले में गांठें उभरी हुई थीं जिन्हें गण्डमाला (घेंघा) कहा जाता था। आसपास के गांवों की जो औरतें मुगल हरम की औरतों को फल, फूल एवं सब्जियां बेचने आती थीं, वे भी इस बीमारी से ग्रस्त थीं। उन्होंने हरम की औरतों को बताया कि यहाँ की हवा एवं पानी में कुछ दोष है जिसके कारण यहाँ रहने वाले लोग इस बीमारी से ग्रस्त होकर कुरूप हो जाते हैं। अतः फिदाई खाँ कुछ ही दिनों में इस बाग को छोड़कर चला गया ताकि उसके हरम की औरतें सुंदर बनी रह सकें।’

माना जाता है कि स्थानीय राजाओं ने फिदाई खाँ तथा औरंगजेब को इस इलाके से दूर रखने के लिए यह योजना बनाई थी कि उन्हें गण्डमाला से ग्रस्त स्त्री-पुरुष दिखाकर औरंगजेब तथा फिदाई खाँ के मन में भय उत्पन्न किया जा सके। इस कारण यह बाग उजाड़ हो गया। ई.1775 में पटियाला नरेश अमरसिंह ने सिरमूर नरेश जगत प्रकाश से यह उद्यान खरीदा। ई.1793 में इस बाग के एक हिस्से को हटाकर वहाँ सड़क बना दी गई। अंग्रेजों के समय यह बाग पूरी तरह उजड़ गया तथा इसमें जंगली झाड़ियां उग आईं। महाराजा पटियाला ने इस बाग में गुलाबों की खेती करवाई ताकि महाराजा के लिए गुलाब का इत्र तैयार करवाया जा सके। पटियाला नरेश यदुवेन्द्रसिंह (ई.1914-74) ने इस उद्यान को फिर से लगवाया तथा इसका खोया हुआ स्वरूप पुनर्जीवित किया। तब से यह बाग यदुवेन्द्र गार्डन कहलाने लगा।

यह बाग श्रीनगर के शालीमार बाग की शैली पर बना हुआ है तथा सात सीढ़ीदार क्यारियों (टैरेस-बैड) में लगा हुआ है। बाग का मुख्य द्वार बाग के सबसे ऊँचे टैरेस में खुलता है। यहाँ पर एक महल बना हुआ है जिसका निर्माण राजस्थानी-मुगल शैली में हुआ है। इसे शीशमहल कहा जाता है। इससे लगता हुआ हवामहल बनाया गया है। दूसरी टैरेस पर रंगमहल बना हुआ है जिसमें मेहराबदार दरवाजे बने हुए हैं। तीसरी टैरेस में सरू के पेड़ (साइप्रस ट्री) तथा फूलों की क्यारियां लगी हुई हैं। चैथी टैरेस में जल महल बना हुआ है। इसके पास ही एक चैकोर फव्वारा लगा हुआ है तथा आराम करने के लिए एक बरामदा भी बना हुआ है।

अगली टैरेस पर पुनः पेड़ एवं फव्वारे लगे हुए हैं। सबसे नीचे की टैरेस पर मुक्ताकाश थियेटर बना हुआ है, इसे तश्तरी के आकृति में बनाया गया है। आजादी के बाद मुक्ताकाश थियेटर में एक मंदिर तथा संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। यह बाग इतना सुंदर है कि इसमें कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी। इस काल में केन्द्रीय सत्ता के कमजोर हो जाने के कारण स्थापत्य शैली भी स्थानीय सत्ता की भांति आंचलिक प्रभाव ग्रहण करने लगी क्योंकि भवनों का निर्माण कार्य मुगल शहजादों के हाथों से निकलकर अवध के नवाब तथा अन्य आंचलिक प्रमुखों के हाथों में चला गया था। कुछ भवन खानदेश और दक्षिण के अन्य भागों में भी बने किंतु वे शाहजहाँ कालीन स्थापत्य का स्तर प्राप्त करने में असफल रहे।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’

सफदर जंग का मकबरा, दिल्ली

ई.1753-54 में दिल्ली में वजीर सफदर जंग का मकबरा बना जो मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला (ई.1719-1748) का शक्तिशाली वजीर था तथा अवध का नवाब था। यह मकबरा दक्षिण दिल्ली में श्री औरोबिंदो मार्ग पर लोधी मार्ग के पश्चिमी छोर के ठीक सामने स्थित है। इस मकबरे का ऊध्र्व अनुपात (वर्टिकल प्रपोरशन) आवश्यकता से कहीं अधिक है फिर भी इसे मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है।

मकबरे में सफदरजंग और उसकी बेगम की कब्र बनी हुई है। केन्द्रीय भवन में सफ़ेद संगमरमर से निर्मित एक बड़ा गुम्बद है। शेष भवन लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है। इसका स्थापत्य हुमायूँ के मकबरे की डिजाइन पर ही आधारित है। मोती महल, जंगली महल और बादशाह पसंद नाम से पैवेलियन भी बने हुए हैं। चारों ओर पानी की चार नहरें हैं, जो चार इमारतों तक जाती हैं। मकबरे का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में है जो श्री औरोबिन्दो मार्ग पर खुलता है। मकबरे के कुछ कक्ष आवासीय प्रयोग हेतु बनाए गए हैं। मुख्य भवन से जुड़ी हुई चार अष्टकोणीय मीनारें हैं।

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, सरहिंद

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, मुगल काल की ऐतिहासिक इमारतें हैं। उस्ताद का मकबरा शाहजहाँ के काल में महत्वपूर्ण शिल्पी एवं प्रधान भवन-निर्माता सैयद खाँ  चग़ताई की स्मृति में बनवाया गया था। सैयद खाँ, जहाँगीर के काल में पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया गया था। संभवतः इस नियुक्ति के कुछ दिनों बाद ही ई.1606 में उसकी मृत्यु हो गई।

शार्गिद का मकबरा उस काल के एक और प्रसिद्ध शिल्पी तथा भवन-निर्माता ख्वाजा खाँ की स्मृति में बनवाया गया था। अनुमान लगाया जाता है कि ख्वाजा खाँ, सैयद खाँ का शिष्य रहा होगा। क्योंकि इस सम्बन्ध में और कोई तथ्य उपलब्ध नहीं होता है। ये मकबरे पंजाब के फतेहगढ़ एवं सरहिंद क्षेत्र में स्थित हैं तथा वर्तमान समय में तलानिया गांव के बाहर खण्डहरों के रूप में खड़े हैं। ये मकबरे रौजा शरीफ के स्मारक से केवल 2.5 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इन मकबरों के भीतर की दीवारों पर बने वृक्षों के अलंकरण से अनुमान होता है कि ये जहाँगीर कालीन निर्माण हैं।

मुगलों के आगमन के समय सरहिंद, पंजाब का प्रसिद्ध क्षेत्र था। मुगल काल में भी सरहिंद की प्रमुखता बनी रही। यह दिल्ली से लाहौर जाने के मार्ग पर स्थित था। ई.1710 में बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद को मुगलों का प्रमुख स्थान होने के कारण जलाकर नष्ट कर दिया। उन दिनों सिक्ख सेनाएं गुरुगोविंद सिंह के पुत्रों की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए पूरे पंजाब में मुगलों पर कहर ढा रही थीं। इस अवसर पर हुए ‘चप्पर-चिरी’ के युद्ध में वजीर खाँ भी मारा गया जो मुगलों की तरफ से पंजाब में सूबेदार नियुक्त था तथा लाहौर दुर्ग में रहा करता था। जब सिक्खों ने सरहिंद को नष्ट किया था, तब भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे मौजूद थे किंतु सिक्खों की सेना ने उन्हें नष्ट नहीं किया।

इन मकबरों की दीवारों पर सुंदर भित्तिचित्र बनाए गए थे किंतु अब दीवारों का प्लास्टर हट जाने से भित्तिचित्र भी नष्ट हो गए हैं। उस्ताद के मकबरे की अपेक्षा शागिर्द का मकबरा थोड़ी अच्छी हालत में हैं।

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, नकोदर

पंजाब के जालंधर जिले के नकोदर नामक स्थान पर भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे बने हुए हैं। शाहजहाँ के काल में ये मकबरे ‘हदीरों वाला बाग’ के भीतर बनाए गए थे। इनकी बाहरी एवं भीतरी दीवारों का अलंकरण बताता है कि ये शाहजहाँ काल के निर्माण हैं। उस काल में हदीरों वाला बाग में महल, बड़े दरवाजे तथा मकबरे, कुएं, पानी के हौद आदि भी बनाए गए थे। हदीरों वाला बाग अब नष्ट हो गया है किंतु मकबरे अब भी अच्छी स्थिति में हैं।

यहाँ उस्ताद के मकबरे का सम्बन्ध जहाँगीर कालीन मुहम्मद मुोमन हुसैनी से है जो जहाँगीर का दरबारी अमीर हुआ करता था। इस मकबरे पर एक शिलालेख लगा है जिसमें ई.1612-13 की तिथि का उल्लेख है। शागिर्द के मकबरे में ई.1657 की तिथि का एक शिलालेख लगा है। इस शिलालेख के अनुसार यह मजार हाजी जमाल की है। इन दोनों लेखों में प्रयुक्त अक्षरों की बनावट बिल्कुल एक जैसी है जिससे अनुमान होता हे कि इन्हें एक ही व्यक्ति ने लिखा है। इन लेखों की लिखावट से अनुमान लगाया जाता है कि ये दोनों कब्रें एक-दूसरे से सम्बद्ध व्यक्तियों की हैं किंतु उनमें गुरु-शिष्य जैसे किसी सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है।

निकटवर्ती भोलापुर गांव में भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे हैं। ग्वालियर में भी उस्ताद-शागिर्द का एक मकबरा है जिसमें उस्ताद के रूप में बाबर के समकालीन संगीतकार मुहम्मद गौस की कब्र है जबकि शागिर्द की कब्र सुप्रसिद्ध गायक तानसेन की है। भारत के मुसलमानों में यह परम्परा रही है कि शिष्य की कब्र गुरु के चरणों की तरफ बनाई जाती है।

जफर महल, महरौली

दक्षिणी दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित ज़फ़र महल मुगल काल का अंतिम ऐतिहासिक भवन माना जाता है। इस भवन का निर्माण ग्रीष्मकालीन महल के रूप में करवाया गया था। इसके भीतरी ढांचे का निर्माण मुगल बादशाह अकबर (द्वितीय) द्वारा करवाया गया तथा बाहरी भाग और दरवाजे का निर्माण बहादुरशाह (द्वितीय) द्वारा 19वीं सदी में करवाया गया। भारत के इतिहास में उसे बहादुरशाह ज़फ़़र भी कहते हैं।

 उस समय महरौली क्षेत्र में घने जंगल थे जिनके कारण यहाँ ठण्डक रहती थी। ज़फ़र महल के निकट ही बहादुर शाह प्रथम की कब्र है जिसका निर्माण बहादुरशाह प्रथम के पुत्र जहांदार शाह ने करवाया था। मुगल बादशाह शाहआलम को भी इसी क्षेत्र में दफ़नाया गया था। शाहआलम के पुत्र अकबरशाह (द्वितीय) की कब्र भी ज़फ़र महल के पास ही है। बहादुरशाह ज़फ़र ने अपनी वसीयत में मृत्यु के बाद अपने शव को जफ़र महल में दफ़नाए जाने की इच्छा व्यक्त की थी किंतु ई.1857 की सैनिक क्रांति के बाद अंग्रेजों ने बहादुरशाह को रंगून भेज दिया और वहीं उसकी मृत्यु हुई। अंग्रेजों ने उसे रंगून में ही दफ़ना दिया।

संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से बनी इस तीन मंजिला इमारत का प्रवेशद्वार 50 फुट ऊँचा और 15 मीटर चैड़ा है। इस प्रवेश द्वार को हाथी दरवाजा कहा जाता है। इस दरवाजे से हौदे सहित एक सुसज्जित हाथी आराम से पार हो सकता था। इस द्वार का निर्माण बहादुर शाह ज़फ़र ने करवाया था। इस सम्बन्ध में प्रवेश द्वार पर एक अभिलेख भी लगा हुआ है- ‘इस द्वार को मुगल बादशाह ज़फ़र ने अपने शासन के 11वें वर्ष में ई.1847-48 में बनवाया।’ मुगल शैली में निर्मित एक विशाल छज्जा इस द्वार की महत्वपूर्ण विशेषता है। प्रवेश द्वार पर घुमावदार बंगाली गुंबजों और छोटे झरोखों का निर्माण किया गया है।

जफर महल को प्राचीन इमारत संरक्षण अधिनियम के तहत ई.1920 में संरक्षित इमारत घोषित किया गया था किंतु इसकी दक्षिणी और पूर्वी दीवार के पास अतिक्रमण कर लिए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस महल में एक संग्रहालय स्थापित करने की योजना पर कार्य कर रहा है।

जफर महल के मुख्य दरवाजे की मेहराब के ऊपरी भाग में दोनों तरफ पत्थर के दो कमल लगाए गए हैं। हुमायूँ के मकबरे के मुख्य दरवाजे के ईवान पर फारसी शैली के दो सितारे अंकित किए गए थे किंतु मुगलों की इस अंतिम इमारत में सितारों की जगह कमल ने ले ली थी जो इस बात की प्रतीक थी कि अब उनका नाता मध्य एशिया से समाप्त हो गया था और वे पूर्णतः भारतीय हो गए थे किंतु यह उनकी भारत से भी विदाई की बेला थी।

संभवतः इसी व्यथा को बहादुरशाह जफ़र ने अपनी एक नज़्म में इस प्रकार व्यक्त किया था- ‘दो गज ज़मीं भी न मिली कू-ए-यार में।’

अर्थात् मुझे अपने मित्रों के देश में दो गज जमीं भी नहीं मिल सकी।

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