फीरोजशाह तुगलक का चरित्र एक कट्टरपंथी सुल्तान के रूप में किया जाता है जिसने केवल मुसलमानों को ही अपनी प्रजा समझा तथा हिन्दुओं को जिम्मी मानकर शासन किया।
अच्छाइयों एवं बुराइयों का अद्भुत सम्मिश्रण
फीरोज तुगलक में कई अच्छाईयां थीं जिनके कारण उसका शासन काल मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल की अशान्ति, अराजकता तथा विद्रोह से मुक्त रहा। फीरोज के समकालीन इतिहासकारों ने उसे एक आदर्श सुल्तान बताया है और लिखा है कि नासिरूद्दीन महमूद के उपरांत इतना उदार, दयालु, न्यायप्रिय, शिष्ट तथा ईश्वर से डरने वाला कोई सुल्तान नहीं हुआ।
जियाउद्दीन बरनी तथा शम्से सिराज अफीफ ने फीरोज के शासन की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। उसे उदार, न्याय प्रिय तथा दयालु शासक बताया है। उसने अपनी प्रजा को सुख तथा शान्ति प्रदान करने, दीन दुखियों, बेरोजगारों तथा किसानों के हितों के लिए कई उल्लेखनीय कार्य किये। फिर भी उसमें कई कमजोरियां एवं बुराईयां थीं जिनके कारण उसे अच्छाइयों एवं बुराइयों का अद्भुत सम्मिश्रण कहा जा सकता है।
उसके सम्पूर्ण शासन काल, चरित्र एवं स्वभाव को देखने से सहज ही अनुमान हो जाता है कि उसमें एक ही समय में अच्छाई और बुराई का प्राबल्य रहता था। सुल्तान का स्वभाव उसका सबसे बड़ा शत्रु था। उसकी उदारता तथा दयालुता उसके अच्छे कार्यों को चौपट कर देती थी।
फीरोजशाह तुगलक का चरित्र
(1.) सुल्तान बनने की इच्छा नहीं होते हुए भी सुल्तान बनना
फीरोज तुगलक धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था उसे राज्य की बिल्कुल आकांक्षा नहीं थी। इसलिये उसने अमीरों के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया जो उसे सुल्तान बनाना चाहते थे और मक्का जाने की इच्छा प्रकट की परन्तु अमीरों के दबाव के कारण उसने राज्य की बागडोर ग्रहण करना स्वीकार कर लिया।
इतना ही नहीं, उसने तख्त पर अपना अधिकार पक्का करने के लिये विद्रोही प्रधान मंत्री ख्वाजाजहाँ की हत्या करवा दी और विगत सुल्तान के कथित पुत्र को भी अपने मार्ग से हटा दिया। फीरोज तुगलक ने दिल्ली के तख्त पर अपने अधिकार को पुष्ट बनाने के लिये अपने को खलीफा का नायब घोषित कर दिया।
उसने खुतबे तथा मुद्राओं में खलीफा के नाम के साथ-साथ अपना नाम भी खुदवाया। इस प्रकार उसमें एक ओर यह अच्छाई थी कि वह सुल्तान बनने के स्थान पर धार्मिक यात्रा पर जाना चाहता था किंतु दूसरी ओर यह बुराई थी कि वह सुल्तान बना रहने के लिये अपने विरोधियों की हत्या करवा रहा था।
(2.) माता के हिन्दू होने पर भी हिन्दुओं से घृणा
फीरोज तुगलक का पिता मुलसलमान तथा मात्रा हिन्दू थी। स्वाभाविक रूप से उसे हिन्दुओं से भी सहानुभूति होनी चाहिये थी किंतु राजपूत स्त्री का पुत्र होते हुए भी फीरोज कट्टर मुसलमान था और उसे हिन्दुओं से घोर घृणा थी। उसने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया।
वह हिन्दू प्रजा को मुसलमान बनने के लिए प्रोत्साहित करता था और जो हिन्दू, मुसलमान हो जाते थे उन्हें जजिया कर से मुक्त कर देता था। उसके शासन काल में हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार होता था। एक ब्राह्मण को महल के सामने यह आरोप लगाकर जिन्दा जलवा दिया गया कि वह मुसलमानों को इस्लाम त्यागने के लिए उकसाता है।
जाजनगर तथा नगरकोट के आक्रमण के समय उसने हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। उसने ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगा दिया जो अरब आक्रमण के समय से ही इस कर से मुक्त थे। शाक्त सम्प्रदाय के हिन्दुओं का उसने विशेष रूप से दमन किया। इस प्रकार उसमें एक ओर यह अच्छाई थी कि उसने अपनी प्रजा पर 23 प्रकार के कर हटा दिये किंतु दूसरी ओर यह बुराई थी कि उसने ब्राह्मणों पर भी जजिया लगा दिया।
(3.) मुसलमान होने पर भी मुसलमानों से घृणा
एक ओर फीरोज तुगलक मुस्लिम प्रजा को सुखी बनाने का प्रयास कर रहा था किंतु दूसरी ओर वह शिया सम्प्रदाय के मुसलमानों के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं करता था। सूफियों को भी वह घृणा की दृष्टि से देखता था क्योंकि उनके विचार वेदान्त-दर्शन से साम्य रखते थे। इस प्रकार फीरोज ने एक कट्टर सुन्नी मुसलमान की भांति शासन किया। इसी से बरनी तथा अफीफ ने उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। इस प्रकार उसमें एक ओर यह अच्छाई थी कि वह सुन्नी प्रजा को सुखी बना रहा था किंतु दूसरी ओर यह बुराई थी कि वह शियाओं और सूफियों को घृणा से देखता था।
(4.) मुस्लिम प्रजा के प्रति करुणा किंतु हिन्दू प्रजा पर अत्याचार
जिस व्यक्ति में राज्य की आकांक्षा नहीं हो उस व्यक्ति द्वारा अपनी हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों प्रजाओं से अच्छा व्यवहार किये जाने की आशा थी किंतु वह भी अन्य मध्यकालीन कट्टर मुस्लिम शासकों की तरह संकीर्ण धार्मिक विचारों का था। उसने अपनी हिन्दू प्रजा का अत्यधिक उत्पीड़न किया।
वह बंगाल में मुस्लिम औरतों का क्रंदन सुनकर जीती हुई बाजी हारकर लौट पड़ा किंतु मार्ग में उसने जाजनगर तथा जगन्नाथ पुरी पर आक्रमण करके हिन्दू सैनिकों का वध करने में संकोच नहीं किया। जाजनगर के राजा ने सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली और प्रतिवर्ष कुछ हाथी कर के रूप में भेजने का वचन दिया।
फिर भी सुल्तान ने धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता का परिचय दिया। उसने पुरी में जगन्नाथ मन्दिर को नष्ट-भ्रष्ट करवा दिया और मूर्तियों को समुद्र में फिंकवा दिया। जाजनगर को जीतने के बाद मार्ग में बहुत से सामन्तों तथा भूमिपतियों पर विजय प्राप्त करता हुआ फीरोज दिल्ली लौटा। उसने नगर कोट में भी हिन्दुओं को बड़ी संख्या में मारा तथा वहाँ के राजा से विपुल धन लेकर वहाँ से घेरा हटाया। इसीलिये इतिहासकारों ने लिखा है कि ‘फीरोज न तो अशोक था न अकबर जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया था, वरन् वह औरंगजेब की भांति कट्टरपंथी था।’
(5.) मुहम्मद बिन तुगलक से प्रेम होते हुए भी उसकी नीतियों से दूरी
फीरोज तुगलक, अपने पूर्ववर्ती सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से बहुत प्रेम करता था। मुहम्मद बिन तुगलक की गलतियों की क्षमा दिलवाने हेतु उसने जनता से क्षमा पत्र प्राप्त करके मुहम्मद बिन तुगलक की कब्र में गढ़वाये। अतः आशा की जानी चाहिये थी कि वह सल्तनत का प्रबंध उन्हीं नियमों पर करता जिन नियमों पर मुहम्मद बिन तुगलक ने किया था किंतु फीरोज तुगलक ने मुहम्मद बिन तुगलक के शासन की समस्त नीतियों को त्याग दिया।
मुहम्मद बिन तुगलक ने शासन में उलेमाओं के परामर्श एवं उनकी भूमिका समाप्त कर दी थी किंतु फीरोज तुगलक ने उलेमाओं से परामर्श लिये बिना कोई कार्य नहीं किया। मुहम्मद बिन तुगलक ने भारतीय अमीरों की अयोग्यता को देखते हुए विदेशी अमीरों को शासन में उच्च अधिकार दिये थे किंतु फीरोज ने भारत के तुर्की अमीरों तथा उलेमाओं को ही उच्च पदों पर नियुक्त किया तथा कुछ ही दिनों में उलेमाओं के हाथ की कठपुतली बन गया। इस प्रकार उसमें एक ओर यह अच्छाई थी कि वह अपने पूर्ववर्ती सुल्तान से प्रेम करता था किंतु दूसरी ओर यह बुराई थी कि उसने पूर्ववर्ती सुल्तान की नीतियों को त्याग दिया।
(6.) मुहम्मद तुगलक की नीतियां छोड़ने पर भी जागीर प्रथा का सुदृढ़ीकरण
अलाउद्दीन खिलजी ने राज्याधिकारियों को उनकी सेवाओं के बदले में जागीर देने की प्रथा को समाप्त कर दिया था। वह अधिकारियों को नकद वेतन देता था किंतु मुहम्मद बिन तुगलक को यह प्रथा फिर से चलानी पड़ी थी। फीरोज तुगलक ने एक ओर तो मुहम्मद बिन तुगलक की नीतियों को छोड़कर हर क्षेत्र में नई व्यवस्थायें लागू कीं किंतु दूसरी ओर उसने जागीर प्रथा को नियमित रूप से स्थापित कर दिया। इसका परिणाम सल्तनत के लिए बुरा हुआ। जब तुगलक वंश डगमगाने लगा तब ये जागीरदार अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयत्न करने लगे।
(7.) राजकोष खाली होने पर भी कर्जों की माफी तथा धन की बर्बादी
मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की विफलताओं एवं विद्रोहों के कारण राज्य की आर्थिक दशा खराब हो चुकी थी। ख्वाजाजहाँ ने भी अमीरों का समर्थन प्राप्त करने के लिये काफी धन लुटा दिया था। अतः सुल्तान होने के नाते फीरोज तुगलक का कर्त्तव्य था कि वह सरकारी खजाने को भरने के लिये उपाय करे किंतु उसने इसके विपरीत कार्य किया।
उसने किसानों पर चढ़े हुए सरकारी कर्ज को माफ कर दिया तथा लोगों से पूर्ववर्ती सुल्तान के लिये क्षमादान पत्र लिखवाने में बहुत सा धन बांट दिया। इससे सरकारी कोष लगभग पूरी तरह खाली हो गया। उसने युद्ध में मिला लूट का सामान सेना तथा राज्य में उसी अनुपात में बांटने की व्यवस्था की जैसे कुरान द्वारा निश्चित किया गया है, अर्थात् पांचवां भाग राज्य को और शेष सेना को।
इस प्रकार उसमें यह अच्छाई थी कि वह प्रजा की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये हर तरह के उपाय कर रहा था किंतु दूसरी ओर यह बुराई थी कि शासन को मजबूत बनाने के लिये वह राजकोष की पूर्ति नहीं कर रहा था।
(8.) आर्थिक आधार पर कर हटाकर धार्मिक आधार पर करों का आरोपाण
अब तक के सुल्तान राजकोष की पूर्ति जनता पर कर बढ़ाकर करते थे किंतु फीरोज ने कर बढ़ाने के स्थान पर व्यापार, कृषि एवं जागीरदारी व्यवस्था को चुस्त बनाने का प्रयास किया जिससे राजस्व में वृद्धि हो। उसके प्रयासों से जनता में खुशहाली आई, लोगों की आय बढ़ी तथा सरकार के कोष में भी धन की पर्याप्त आमदनी हुई। इसी प्रकार एक ओर तो फीरोज तुगलक हिन्दू प्रजा के उत्पीड़न में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था और दूसरी तरफ उसने जनता पर से 23 प्रकार के कर समाप्त कर दिये।
हिन्दू प्रजा पर केवल खिराज, जकात, जजिया तथा खाम कुल चार कर रखे गये। सरकारी मालगुजारी कम कर दी। किसानों का बोझ घटाने के लिए प्रान्तीय तथा स्थानीय अधिकारियों से धन के रूप में भेंट लेना बन्द कर दिया। कृषि की रक्षा करने के लिए फीरोज तुगलक ने चार नहरें बनवाईं तथा कई कुएं खुदवाये। इस प्रकार फीरोज में यह अच्छाई थी कि वह जनता पर आर्थिक आधार पर कर हटा रहा था किंतु दूसरी ओर यह बुराई थी कि वह धार्मिक आधार पर कर लगा रहा था।
(9.) सैनिक क्षमता होते हुए भी विद्रोही प्रांतों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही नहीं
सुल्तान होने के नाते फीरोज का कर्त्तव्य था कि जिन प्रान्तों ने मुहम्मद बिन तुगलक के समय विद्रोह कर दिया था, उन्हें फिर से सल्तनत के अधीन लाये किंतु फीरोज तुगलक ने इस कार्य में कोई रुचि नहीं दिखाई। उसने अमीरों के कहने से बंगाल पर आक्रमण करके उस पर विजय प्राप्त की किंतु उस पर अधिकार किये बिना ही उसे छोड़ दिया।
उसने जाजनगर, नगरकोट तथा सिंध पर आक्रमण करके उन्हें फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। इस प्रकार उसमें यह अच्छाई थी कि वह बंगाल जैसे दूरस्थ प्रांत पर भी सफल सैनिक अभियान कर सकता था किंतु दूसरी ओर यह बुराई भी थी कि वह जीती हुई बाजी को भी धार्मिक उदारता के कारण छोड़ रहा रहा था।
(10.) यातनाओं के क्षमा पत्र लिखवाने में नई यातनाएँ
जिन लोगों को मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में यातनाएँ सहनी पड़ी थीं तथा क्षति उठानी पड़ी थी, उन्हें धन देकर संतुष्ट किया गया और उनसे क्षमा-पत्र लिखवा कर मुहम्मद बिन तुगलक की कब्र में गड़वाया गया जिससे उसका परलोक सुधर जाय।
जिन लोगों ने क्षमा-पत्र लिखने से मना कर दिया गया, उन लोगों को सेना की तरफ से उत्पीड़ित किया गया। इस प्रकार एक गलती को सुधारने के लिये फिर वही गलती दोहराई गई। इस प्रकार वह चाहता था कि हिन्दू जनता पुराने सुल्तान के अत्याचारों को माफ कर दे किंतु दूसरी ओर स्वयं भी हिन्दू जनता पर अत्याचार कर रहा था।
(11.) कटट्टर मुस्लिम होते हुए भी हिन्दू ग्रंथों का फारसी में अनुवाद
वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इस्लाम की मान्यता के अनुसार उसने हिन्दू प्रजा पर समस्त धार्मिक कर लगाये तथा जगन्नाथपुरी के मंदिर की मूर्तियों को तोड़कर समुद्र में फिंकवा दिया किंतु दूसरी ओर वह इतना उदार था कि उसने ज्वालामुखी मन्दिर से प्राप्त संस्कृत की पुस्तकों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया।
(12.) दण्ड विधान की कठोरता समाप्त किंतु न्याय में पक्षपात
फीरोज ने इस्लाम आधारित शासन की स्थापना की। वह अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था परन्तु उसने दण्ड विधान की कठोरता को हटा दिया। अंग भंग करने के दण्ड पर रोक लगा दी। प्राणदण्ड भी बहुत कम दिया जाता था। सुल्तान की उदारता के कारण कई बार दण्ड के भागी लोग भी दण्ड पाने से बच जाते थे। शरीयत के नियमों के अनुसार न्याय किया जाता था। मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था फिर भी फीरोज तुगलक के काल में न्याय उतना पक्षपात रहित तथा कठोर नहीं था जितना मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में।
(13.) वृद्ध सैनिकों के स्थान पर उनके परिवार के सदस्यों को ही नौकरी
एक ओर तो फीरोज तुगलक सेना को चुस्त बनाने का प्रयास कर रहा था जिस कारण उसने घुड़सवारों को आदेश दिया कि वे उत्तम घोड़ों को सैनिक दफ्तर में लाकर रजिस्ट्री कराएं। घोड़ों के निरीक्षण के लिए उसने नायब अर्जे मुमालिक की नियुक्ति की किंतु दूसरी ओर उसने सैनिकों के साथ इतनी दया दिखाई कि वृद्ध, रुग्ण तथा अक्षम सैनिकों को भी सेना से अलग नहीं किया।
फीरोज ने एक नया नियम बनवाया कि जब कोई सैनिक वृद्धावस्था के कारण असमर्थ हो जाए तो उसके स्थान पर उसके पुत्र, दामाद या उसके गुलाम को रख लिया जाए। इस नियम के कारण बहुत से योग्य सैनिकों का स्थान कमजोर सैनिकों ने ले लिया। इस प्रकार एक ओर वह सेना को चुस्त बनाना चाहता था और दूसरी ओर उसकी नीतियों ने कमजोर सैनिकों को सेना में स्थान दे दिया।
(14.) गुलामों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि
फीरोज तुगलक एक ओर जनता की आय बढ़ाने के लिये उपाय कर रहा था किंतु दूसरी ओर उसके शासन काल में बेकारी बढ़ती जा रही थी। इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिये उसने राज्य में लोगों को गुलामों की नौकरी दिलवाने के लिये दीवाने बन्दगान की अध्यक्षता में अलग से गुलाम विभाग खोला।
उसने 40,000 गुलामों को विभिन्न विभागों में नियुक्त किया। कुछ गुलामांे को सुल्तान के अंग-रक्षकों में भर्ती कर लिया गया। शेष 1,60,000 गुलाम साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में भेज दिये गये और प्रांतीय गवर्नरों तथा अधिकारियों के संरक्षण में रखे गये। उन दिनों मध्यम श्रेणी के लोगों में भी बेकारी की समस्या विकराल रूप धारण कर रही थी। नगरों में बेकार लोगों की संख्या इतनी बढ़ गई कि उनकी समस्या सुलझाने के लिये सुल्तान ने बेकारी का अलग विभाग खोला।
कोतवाल को आदेश दिया गया कि वह बेकार लोगों की सूची बनाये। बेकार लोगों को दीवान के पास आवेदन भेजना पड़ता था और योग्यतानुसार लोगों को काम दिया जाता था। शिक्षित व्यक्तियों को महल में नौकर रख लिया जाता था। जो लोग किसी अमीर का गुलाम बनना चाहते थे, उन्हें सिफारिशी चिट्ठियां दी जाती थीं। इस निर्णय से सल्तनत में गुलामों की संख्या तेजी से बढ़ गई। मध्यम वर्ग के लोग भी गुलाम हो गये। ये गुलाम दिल्ली सल्तनत के लिये भारी बोझ बन गये।
(15.) राजकोष खाली होने पर भी लोक सेवा के विपुल कार्य
फीरोज तुगलक के शासन काल में लोक सेवा के इतने कार्य किये गये जितने उससे पहले के किसी भी सुल्तान के समय में नहीं किये गये थे। निर्माण कार्यों में उसकी विशेष रुचि थी। उसने फीरोजाबाद, जौनपुर, फतेहाबाद तथा हिसार नामक नगरों का निर्माण करवाया।
बरनी के कथनानुसार फीरोज ने 50 बांधों, 40 मस्जिदों, 30 कॉलेजों, 20 महलों, 100 सरायों, 200 नगरों, 30 झीलों, 100 औषधालयों, 5 मकबरों, 100 स्नानागारों, 10 स्तंभों, 40 सार्वजनिक कुओं तथा 150 पुलों का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली के निकट लगभग 1,200 बाग लगवाये। अन्य कई स्थानों पर भी बाग लगवाये।
उसने अलाउद्दीन द्वारा बनवाये गये 30 उपवनों का जीर्णोद्धार करवाया। एक ओर कर माफ कर देने से उसका खजाना खाली था तथा वह साम्राज्य विस्तार करके धन एकत्रित नहीं कर रहा था, किंतु दूसरी ओर वह स्थायी निर्माण कार्यों पर विपुल धन खर्च कर रहा था।
(16.) उत्तराधिकारियों को सशक्त बनाने में विफलता
फीरोज के अन्तिम दिनों में उसका राज्य दलबन्दी का शिकार हो गया। वृद्ध हो जाने के कारण के कारण सुल्तान शासन को नहीं सम्भाल सका। शासन की सारी शक्ति खान-ए-जहाँ के हाथों में चली गई। खान-ए-जहाँ तख्त प्राप्त करने के लिये शाहजादे मुहम्मद को अपने मार्ग से हटाने का उपाय खोजने लगा।
उसने सुल्तान को समझाया कि शाहजादा कुछ असंतुष्ट अमीरों से मिलकर सुल्तान को मारने का षड्यन्त्र रच रहा है। सुल्तान ने उसकी बात का विश्वास करके शहजादे को कैद करने की आज्ञा दे दी परन्तु शाहजादा राजवंश की स्त्रियों के साथ चुपके से पालकी में बैठकर सुल्तान के सामने उपस्थित हुआ और सुल्तान के चरणों में गिरकर उसे समझाया कि खान-ए-जहाँ स्वयं तख्त पाना चाहता है इसलिये उसने शहजादे पर षड्यंत्र का आरोप लगाया है।
इस पर फीरोज ने शहजादे की बात का विश्वास कर लिया और खान-ए-जहाँ को पदच्युत करके बंदी बना लेने की आज्ञा दे दी। जब खान-ए-जहाँ को इसकी सूचना मिली तब वह मेवाड़ की ओर भाग गया। शासन सूत्र शहजादे के हाथों में आ गया। कुछ दिनों बाद जब शाहजादे का विरोध हुआ तथा गृहयुद्ध की स्थिति आ गई तो शाहजादा सिरमूर की पहाड़ियों की ओर भाग गया। तब फीरोज ने फिर से शासन अपने हाथों में ले लिया।
अत्यंत वृद्ध हो जाने के कारण वह शासन को नहीं संभाल सका। उसने अपने सारे अधिकार अपने पोते तुगलक शाहबीन फतह खाँ को दे दिये। इस प्रकार उसमें एक ओर यह अच्छाई थी कि वह अपने विरुद्ध कार्य करने वालों को क्षमा कर देता था दूसरी ओर उसमें यह बुराई थी कि दृढ़ निश्चय के अभाव के कारण अपनी तथा अपने उत्तराधिकारियों की स्थिति कमजोर बना दी।
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि फीरोज तुगलक दयालु शासक था तथा प्रजा को सुखी बनाना चाहता था किंतु उसका धार्मिक दृष्टिकोण इतना संकीर्ण था कि उसके हर कार्य में राजनीतिज्ञता का अभाव हो गया। इससे हिन्दू प्रजा पर अत्याचार और अन्याय होता था। फीरोज का शासन उदार था किंतु केवल मुस्लिम प्रजा के लिये।
उसके शासन में कठोरता थी तो केवल हिन्दू प्रजा के लिये। वह दोषी मुस्लिमों को दण्ड नहीं दे पाता था तथा हिन्दुओं को क्षमा नहीं कर पाता था। वह अच्छे तथा बुरे दोनों प्रकार के मुस्लिम अधिकारियों के साथ दया तथा सहानुभूति दिखाता था। शासन के दोषों को सुधारने की बजाय वह स्वयं अनुचित साधनों के प्रयोग करने वालों की यदा-कदा सहायता करता था।
इतना होने पर भी फीरोज की शासन व्यवस्था ठीक तरह से चलती रही। न तो उसके समय में कोई बड़ा विद्रोह हुआ और न उसके समय में कोई भयानक अकाल पड़ा किंतु उसकी उदार नीतियों के कारण उसकी शासन-व्यवस्था शिथिल पड़ गई किंतु फीरोज की उदारता और धार्मिक संकीर्णता से मुसलमानों का नैतिक पतन आरम्भ हो गया और उनकी आकांक्षा तथा उनका उत्साह मन्द पड़ गया।
यद्यपि फीरोज के कृत्यों से उसकी प्रजा को सुख पहुँचा, परन्तु उसकी नीति के अन्तिम परिणाम बहुत बुरे हुए और सल्तनत कमजोर हो गई। यद्यपि फीरोज अपने सुधारों के लिए प्रसिद्ध है, परन्तु उसके सुधारों में दूरदर्शिता का अभाव था। जागीर प्रथा, गुलामों की संख्या में वृद्धि, सैनिकों के पदों को आनुवांशिक बनाना आदि ऐसे सुधार थे जिनका राज्य के स्थायित्व पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि फीरोज में अच्छाइयाँ और बुराइयां दोनों थीं किंतु अच्छाइयों की अधिक मात्रा मुस्लिम जनता के लिये थी और बुराइयों की अधिक मात्रा हिन्दू प्रजा के लिये थी। उसके द्वारा किये गये कृषि सुधार एवं कर सुधार कोई अत्यंत श्रेष्ठ शासक ही कर सकता था किंतु उसने इस बात का पूरा प्रयास किया कि सुधारों का लाभ मुस्लिम जनता को मिले न कि हिन्दू जनता को।
इसलिये डॉ. ईश्वरी प्रसाद की यह उक्ति ठीक ही प्रतीत होती है कि फीरोज में उस विशाल हृदय तथा व्यापक दृष्टिकोण वाले बादशाह (अकबर) की प्रतिभा का शतांश भी नहीं था जिसने सार्वजनिक हितों का उच्च मंच से समस्त सम्प्रदायों तथा धर्मों के प्रति शान्ति सद्भावना तथा सहिष्णुता का सन्देश दिया।
फीरोजशाह का मूल्यांकन उसके कार्यों से नहीं अपितु उसकी मजहबी कट्टरता से किया जा सकता है। वह इस्लाम के सिद्धांतों में अटूट विश्वास रखता था और भारत से हिन्दुओं का सफाया करना चाहता था।
फीरोजशाह के कार्यों का मूल्यांकन
(1.) शासक के रूप में
सुन्नी प्रजा के लिये फीरोजशाह का शासन बड़ा उदार था। धार्मिक संकीर्णता के कारण वह अच्छे तथा बुरे दोनों प्रकार के अधिकारियों के साथ दया तथा सहानुभूति दिखलाता था और अनुचित साधनों का प्रयोग करने वालों की भी सहायता करता था। उसमें राजनीतिज्ञता का अभाव था। इस कारण वह राजनीति को धर्म से अलग नहीं कर सका।
वह उलेमाओं तथा मौलवियों के परामर्श के बिना कोई काम नहीं करता था। वह कुरान के नियमों के अनुसार शासन करता था। इससे हिन्दू प्रजा का अन्याय होता था। समस्त इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि फीरोज में उच्च कोटि की धर्मिक असहिष्णुता थी और हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार होता था। इस प्रकार फीरोजशाह का मूल्यांकन उसकी शिया प्रजा के लिए अलग था और अन्य मतों के मुसलमानों के लिए अलग था। हिन्दुओं को तो वह अपनी प्रजा मानता ही नहीं था।
(2.) सुधारक के रूप में
यद्यपि फीरोजशाह अपने सुधारों के लिए प्रसिद्ध है, परन्तु उसके सुधारों में दूरदर्शिता का अभाव था। जागीर प्रथा, गुलामों संख्या में वृद्धि, सैनिकों के पदों को आनुवांशिक बनाना आदि ऐसे सुधार थे जिनका राज्य के स्थायित्व पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
(3.) सेनानायक के रूप में
फीरोजशाह बड़ी ही साधारण योग्यता का व्यक्ति था। न उसमें महात्वाकांक्षा थी और न दृढ़ संकल्प। सामरिक दृष्टिकोण से उसका व्यक्तित्वि बड़ा ही छोटा था। उसमें संगठन तथा संचालन शक्ति का सर्वथा अभाव था। न वह साम्राज्य की वृद्धि कर सका और न उसे छिन्न-भिन्न होने से रोक सका। उसकी सेना का संगठन दोषपूर्ण था। जागीरदारी प्रथा तथा सैनिकों के पद को वंशानुगत बनाकर उसने शासन में एसे दोष उत्पन्न कर दिये जिनसे तुगलक-वंश का पतन आरम्भ हो गया।
(4.) फीरोज की सफलताएँ
फीरोजशाह के कार्यों की चाहे जितनी आलोचना की जाय किंतु मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल की अशान्ति, अराजकता तथा विद्रोह को शान्त करने में फीरोज को अपार सफलता प्राप्त हुई। इसमें सन्देह नहीं कि फीरोज अपनी प्रजा को सुख तथा शन्ति प्रदान कर सका। दीन दुखियों, बेरोजगारों तथा किसानों के हितों के लिए उसने कई उल्लेखनीय कार्य किये।
(5.) फीरोज की विफलताएँ
इतनी सफलता होते हुए भी फीरोजशाह के कार्यों में न कोई मौलिकता थी और न दूरदृष्टि। सुल्तान का स्वभाव उसका सबसे बड़ा शत्रु था। उसकी उदारता तथा दयालुता उसके अच्छे कार्यों को चौपट कर देती थी। चौदहवीं शताब्दी में सफलता पूर्वक शासन करने के लिए सुल्तान में जिस कठोरता का समावेश होना चाहिए था, उसका फीरोज में अभाव था। सारांश यह है कि यद्यपि फीरोज के कृत्यों से उसकी मुस्लिमम प्रजा को सुख पहुँचा, परन्तु उसकी नीति के अन्तिम परिणाम बुरे हुए और सल्तनत कमजोर हो गई।
फीरोजशाह के सम्बन्ध में इतिहासकारों की धारणा
(1.) बरनी तथा अफीफ का मत
फीरोजशाह तुगलक के समकालीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी तथा शम्से सिराज अफीफ ने फीरोज के शासन की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। उसे उदार, न्याय प्रिय तथा दयालु शासक बताया है। बरनी तथा अफीफ द्वारा की गई यह प्रशंसा स्वाभाविक है। वे दोनों ही उलेमा थे। सुल्तान उलेमाओं का बड़ा आदर करता था और उन्हीं के परामर्श से सब कार्य करता था। यही कारण है कि फीरोज के समकालीन इतिहासकारों ने उसे एक आदर्श सुल्तान बताया है। उन्होंने लिखा है कि नासिरूद्दीन महमूद के उपरांत इतना उदार, दयालु, न्यायप्रिय, शिष्ट तथा ईश्वर से डरने वाला कोई सुल्तान नहीं हुआ।
(2.) मोरलैण्ड की धारणा
डब्ल्यू. एच. मोरलैण्ड ने फीरोजशाह के सम्बन्ध में लिखा है- ‘उसका शासन काल संक्षिप्त स्वर्ण युग था जिसका धुंधला स्वरूप अब भी उत्तरी भारत के गांवों में परिलक्षित होता है।’
(3.) हैवेल के विचार
हैवेल ने लिखा है कि वह एक बुद्धिमान तथा उदार शासक था। क्रूरता, निर्दयता तथा भ्रष्टाचार की लम्बी श्ंृखला जो तुर्की वंश के अन्धकारपूर्ण इतिहास का निर्माण करती है, उसमें उसका शासन काल एक स्वागतीय विशृंखलता है।
(4.) सर हेग की धारणा
सर हेग के विचार में फीरोजशाह के राज्य काल की समाप्ति के साथ एक अत्यंत उज्जवल युग का अवसान होता है।
(5.) हेनरी इलियट तथा एल्फिन्स्टन का मत
हेनरी इलियट तथा एल्फिन्स्टन ने फीरोजशाह को अकबर का समकक्षी कहने में संकोच नहीं किया है। हेनरी इलियट ने लिखा है कि वह चौदहवीं शताब्दी का अकबर था।
(6.) डॉ. ईश्वरी प्रसाद की धारणा
डॉ. ईश्वरी प्रसाद उपरोक्त इतिहासकारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने लिखा है- ‘फीरोज में उस विशाल हृदय तथा व्यापक दृष्टिकोण वाले बादशाह (अकबर) की प्रतिभा का शतांश भी नहीं था जिसने सार्वजनिक हितों का उच्च मंच से समस्त सम्प्रदायों तथा धर्मों के प्रति शान्ति सद्भावना तथा सहिष्णुता का सन्देश दिया।’
(7.) स्मिथ का मत
विन्सेंट स्मिथ ने हेनरी इलियट के मत का विरोध किया है और इसे मूर्खतापूर्ण बतलाया है। स्मिथ ने लिखा है- ‘फिरोज के लिये अपने युग में इतना ऊँचा उठना सम्भव नहीं था जितना अकबर उठा सका था।’
इतिहासकारों के उपर्युक्त विभिन्न मतों से फीरोज के सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा बनाना कठिन है। वास्तविकता का अन्वेषण फीरोज के कृत्यों का मूल्यांकन, आलोचनात्मक तथा तर्कपूर्ण विवेचन द्वारा किया जा सकता है।
फीरोजशाह के अन्तिम दिवस
फीरोज के अन्तिम दिन सुख तथा शांति से नहीं बीते। उसने शहजादे फतेह खाँ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया किंतु 1374 ई. में शहजादे की मृत्यु हो गई। इससे सुल्तान को भीषण आघात पहुंचा। शासन में शिथिलता आने लगी और राज्य दलबन्दी का शिकार हो गया।
फीरोज ने अपने दूसरे शहजादे जफर खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया किंतु उसकी भी मृत्यु हो गई। वृद्ध हो जाने के कारण फीरोज शासन को नहीं सम्भाल सका। शासन की सारी शक्ति खान-ए-जहाँ के हाथों में चली गई। फीरोज ने अपने तीसरे शहजादे मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी चुना किंतु खान-ए-जहाँ तख्त प्राप्त करने के लिये शाहजादे मुहम्मद को अपने मार्ग से हटाने का उपाय खोजने लगा।
उसने सुल्तान को समझाया कि शाहजादा कुछ असंतुष्ट अमीरों से मिलकर सुल्तान को मारने का षड्यन्त्र रच रहा है। सुल्तान ने षड्यंत्र करने वालों को कैद करने की आज्ञा दे दी परन्तु शाहजादा राजवंश की स्त्रियों के साथ चुपके से पालकी में बैठकर सुल्तान के सामने राजप्रासाद में उपस्थित हुआ और सुल्तान के चरणों में गिरकर उसे समझाया कि खान-ए-जहाँ स्वयं तख्त पाना चाहता है इसलिये उसने शहजादे पर षड्यंत्र का आरोप लगाया है।
फीरोज के मन में यह बात बैठ गई। उसने खान-ए-जहाँ को पदच्युत करके बंदी बना लेने की आज्ञा दे दी। जब खान-ए-जहाँ को इसकी सूचना मिली तब वह मेवाड़ की ओर भाग गया।
शाहजादा फिर से सुल्तान का कृपापात्र बन गया और विलासिता का जीवन व्यतीत करने लगा। उसने कई अयोग्य मित्रों को नौकरियां दे दीं। इससे योग्य तथा अनुभवी अफसरों में असंतोष फैलने लगा और धीरे-धीरे शाहजादे का विरोध होने लगा। अंत में गृहयुद्ध की स्थिति आ गई। इस युद्ध से घबराकर शाहजादा सिरमूर की पहाड़ियों की ओर भाग गया।
वृद्ध फीरोज ने फिर से शासन अपने हाथों में ले लिया। अत्यंत वृद्ध हो जाने के कारण वह शासन को नहीं संभाल सका। उसने अपने सारे अधिकार अपने पोते तुगलक शाहबीन फतह खाँ को दे दिये। थोड़े दिन बाद 20 सितम्बर 1388 को 80 वर्ष की आयु में फीरोज तुगलक की मृत्यु हो गई।
फीरोजशाह तुगलक 80 वर्ष की आयु में मरा था। तुगलक राज्य का पतन उसके जीवन काल में ही होने लगा था। उसके प्रधानमंत्री खान-ए-जहाँ तथा शहजादे मुहम्मद ने राज्य पर अधिकार करने का प्रयत्न किया। इस पर दोनों को ही दिल्ली छोड़कर भाग जाना पड़ा था। इसलिये 80 साल का फीरोजशाह तब तक शासन करता रहा जब तक कि उसकी मृत्यु नहीं हो गई।
गयासुद्दीन तुगलक (द्वितीय)
फीरोजशाह तुगलक की मृत्यु के उपरान्त उसका पौत्र गियासुद्दीन तुगलकशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। तुगलकशाह, शाहजादे फतेह खाँ का पुत्र था। तुगलकशाह ने गयासुद्दीन तुगलक (द्वितीय) की उपाधि धारण की। वह अल्प वयस्क तथा अनुभव शून्य था। इस कारण गम्भीर परिस्थितियों को संभालने में सक्षम नहीं था।
राज्य मिलते ही वह आमोद-प्रमोद में मग्न हो गया और शासन का कार्य अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया। इस कारण राज्य के अमीर उससे असन्तुष्ट हो गये। जब उसने जफर खाँ के पुत्र अबूबक्र को कारागार में डाल दिया, तब अमीरों ने सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर 19 फरवरी 1389 को सुल्तान तुगलकशाह की हत्या कर दी।
अबूबक्र
गयासुद्दीन तुगलक (द्वितीय) के बाद अबूबक्र दिल्ली के तख्त पर बैठा। फीरोजशाह के छोटे पुत्र मुहम्मद ने उसके विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। इस संघर्ष में मुहम्मद को सफलता प्राप्त हुई और अबू बक्र मारा गया।
नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह
फीरोजशाह का छोटा पुत्र मुहम्मद नासिरूद्दीन, अबूबक्र को मारकर नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। मुहम्मदशाह ने गुजरात को फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिये सेनापति जफर खाँ को गुजरात पर आक्रमण करने भेजा।
जफर खाँ ने गुजरात पर विजय प्राप्त कर ली तथा वह सुल्तान की ओर से गुजरात पर शासन करने लगा। इसके बाद सुल्तान ने इटावा तथा अन्य स्थानों के हिन्दुओं के विद्रोह का दमन किया। यद्यपि इन विद्रोहों को दबाने में वह सफल रहा परन्तु स्वास्थ्य बिगड़ जाने से 15 जनवरी 1394 को उसकी मृत्यु हो गई।
हुमायूँ
नासिरूद्दीन मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमायूं, अलाउद्दीन सिकंदरशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा परन्तु तख्त पर बैठने के लगभग छः माह बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।
महमूद नासिरूद्दीन
हुमायूँ की मृत्यु के बाद नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह का सबसे छोटा पुत्र महमूद नासिरूद्दीन के नाम से तख्त पर बैठा। इस सुल्तान को चारों ओर से भयानक उपद्रवों का सामना करना पड़ा। सुल्तानों की आवाजाही में राजधानी दिल्ली में भिन्न-भिन्न दलों तथा वर्गों में संघर्ष चल रहे थे।
राजधानी के बाहर हिन्दू सरदार तथा मुसलमान सूबेदार अपना-अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। ख्वाजाजहाँ ने जौनपुर में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। खोखरों ने उत्तर में विद्रोह कर दिया। गुजरात, मालवा तथा खानदेश स्वतंत्र हो गये। दुर्भाग्य से इसी समय दिल्ली में गृहयुद्ध आरम्भ हो गया।
फीरोज तुगलक का एक पोता नसरत खाँ कुछ अमीरों तथा सरदारों की सहायता से दिल्ली का तख्त प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगा। महमूद ने इन विपत्तियों का सामना सफलतापूर्वक किया परन्तु इसी बीच उसे तैमूर लंग के आक्रमण की सूचना मिली। यह एक ऐसी विकराल समस्या थी जिसका सामना करना महमूद के लिये असम्भव था।
तैमूर के लौट जाने के कुछ समय उपरान्त नसरतशाह ने दिल्ली पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया परन्तु महमूदशाह के मन्त्री मल्लू खाँ ने उसे दिल्ली से मार भगाया। इसके बाद महमूदशाह की स्थिति बड़ी डावांडोल हो गई। 1412 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसके साथ ही तुगलक वंश का भी अन्त हो गया।
मुहम्मदशाह की मृत्यु के पूर्व ही दौलत खाँ ने दिल्ली पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। 1414 ई. में मुलतान के सूबेदार खिज्र खाँ ने दौलत खाँ को परास्त करके दिल्ली पर अधिकार कर लिया और नये राजवंश की स्थापना की।
तुगलक राज्य का पतन के कारण
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में तुगलक वंश का राज्य अपने चरम पर पहुँच गया था तथा उसके अंतिम दिनों में तुगलकिया सल्तनत का पतन आरम्भ हो गया था। फीरोज इस पतनोन्मुख साम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने से बचा नहीं पाया। फीरोज के उत्तराधिकारियों के समय में साम्राज्य तेजी बिखर गया। तुगलक वंश के पतन के निम्नलिखित कारण थे-
(1.) साम्राज्य की विशालता
तुगलक साम्राज्य की विशालता पराकाष्ठा को पहुँच गयी थी। संचार तथा यातायात के साधनों के अभाव में दिल्ली से इतने विशाल साम्राज्य का शासन सुचारू रीति से चलना सम्भव नहीं था। विशेषकर दक्षिण भारत पर नियंत्रण रखना असम्भव था। वास्तव में मुहम्मद बिन तुगलक की दक्षिण विजय से दिल्ली सल्तनत को लाभ के स्थान पर हानि ही हुई। इससे उनके सैनिक उत्तरदायित्व तथा व्यय में वृद्धि हो गई। सुल्तानों का प्रायः दक्षिण अभियान पर जाना उत्तर के लिए घातक सिद्ध हो जाता था। जब सुल्तान दिल्ली में रहता था तब दक्षिण में अशांति फैल जाती थी।
(2.) अयोग्य उत्तराधिकारी
तुगलकों की सल्तनत, पूर्ववर्ती शासक वंशों की भांति, सैनिक शक्ति के आधार पर खड़ी की गई थी। ऐसा शासन तब तक ही स्थायी रहता है जब तक शासक की भुजाओं में बल होता है। विद्रोही तत्त्व सेना के ही बल पर ऐसे शासन को उखाड़ फैंकते हैं। फीरोज के अयोग्य वंशज सैनिक शक्ति के बल पर इतनी बड़ी सल्तनत को अपने अधिकार में नहीं रख सकते थे। उसका नष्ट होना अवश्यम्भावी थी।
(3.) निश्चित उत्तराधिकार के नियम का अभाव
दिल्ली सल्तनत के राजवंशों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। इसलिये प्रायः प्रत्येक सुल्तान को अपने शासन के आरम्भ में षड्यंत्रों, कुचक्रों, विद्रोहों तथा प्रतिद्वन्द्वियों का सामना करना पड़ता था। इससे दरबार में राजनैतिक दलबन्दियों को प्रोत्साहन मिलता था और प्रत्येक दल, दुर्बल शहजादों को तख्त पर बिठा कर उन्हें कठपुतली की भांति नचाता था। ऐसी दशा में तुगलक वंश का पतनोन्मुख हो जाना स्वाभाविक ही था।
(4.) सूबेदारों तथा सेनापतियों की स्वार्थपरता
विभिन्न सूबों के पदाधिकारी तथा सेनापति स्वार्थी एवं महात्वाकांक्षी थे। अवसर पाते ही वे विद्रोह करके अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना का सपना देखते थे। इसी प्रकार जनता में भी सुल्तान तथा शासक वंश के प्रति निष्ठा नहीं थी। इसलिये जनता भी प्रायः विद्रोह का झण्डा उठाये रखती थी।
(5.) साम्राज्य में संगठन का अभाव
किसी भी सुल्तान द्वारा सल्तनत को एक सुदृढ़ तथा सुसंगठित इकाई बनाने का प्रयास नहीं किया गया था। शासन में एकरूपता, दृढ़ता तथा संगठन का सर्वथा अभाव था। प्रान्तीय शासकों को व्यापक अधिकार प्रदान किये गये थे। वास्तव में तुगलक सल्तनत, अर्द्ध स्वतंत्र राज्यों का एक असम्बद्ध सा संघ बनकर रह गया था। केन्द्रीय सरकार का साम्राज्य के विभिन्न भागों पर दृढ़ नियंन्त्रण नहीं था। इससे विघटनकारी प्रवृत्तियां सदैव क्रियाशील रहती थीं। इस कारण तुगलक वंश तेजी से पतन की ओर बढ़ा।
(6.) शासन का विदेशीपन
दिल्ली सल्तनत में शासन का संचालन तुर्क तथा विदेशी अमीरों द्वारा होता था। इन लोगों को भारतीयों की आशा, अभिलाषा तथा आकांक्षाओं के साथ कोई सहानुभूति नहीं थी। उन्होंने स्वयं को विजेता समझा और हिन्दू जनता के साथ पराजितों का सा व्यवहार किया। इस कारण जब शासन में षड़यंत्र चलते थे, तब जनता उनसे विमुख रहती थी। सुल्तान को संकट काल में जनता से कोई सहायता नहीं मिल पाती थी। यही कारण था कि फीरोज तुगलक के बाद तुगलक वंश बड़ी आसानी से नष्ट हो गया।
(7.) हिन्दुओं की शासन प्रतिभा से स्वयं को वंचित रखना
न केवल तुगलक वंश के सुल्तानों ने, वरन् दिल्ली सल्तनत के समस्त शासकों ने हिन्दुओं को शासन में भाग लेने से वंचित कर दिया। इससे मुस्लिम सुल्तान, हिन्दुओं की उस प्रतिभा के उपयोग से वंचित रह गये जिसका सदुपयोग कर अकबर ने एक सबल साम्राज्य की स्थापना की थी।
(8.) मुसलमानों में परस्पर द्वेष की भावना
मुसलमानों में कुलीय उच्चता का भाव अधिक था। तुर्की अमीर अपने को अन्य अमीरों से बड़ा समझते थे। उलेमा अपने आप को अमीरों से भी बड़ा समझते थे। तुर्कों के विभिन्न कबीले भी एक दूसरे को द्वेष की दृष्टि से देखते थे। कोई अफगानी था तो कोई ईरानी। कोई खिलजी था तो कोई तुगलक। कोई चगताई था तो कोई मंगोल। इन कारणों से दरबार में भिन्न-भिन्न अमीरों एवं उलेमाओं में घात-प्रतिघात चलते रहते थे जिन्हांेने तुगलक वंश का पतन कर दिया।
(9.) राज परिवार में शंका और संदेह का वातावरण
गयासुद्दीन तुगलक के समय से ही तुगलक वंश में पिता अपने पुत्रों को और पुत्र अपने पिता को शंका की दृष्टि से देखने लग गये थे और एक दूसरे की हत्या करने का षड़यंत्र रचते थे। इन हत्याओं एवं षड़यंत्रों के कारण तुगलक वंश की नींव दुर्बल हो गई।
(10.) योग्य सेनापतियों तथा शासकों का अभाव
अलाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिनों से ही सल्तनत में योग्य सेनापतियों तथा मन्त्रियों का अभाव हो गया था। यद्यपि मुहम्मद बिन तुगलक ने विदेशी अमीरों में से योग्य व्यक्तियों को चुनना आरम्भ किया था, परन्तु इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ, क्योंकि देशी अमीर इससे अप्रसन्न हो गये। फीरोज के समय में भी योग्य सेनापति तथा मंत्री नहीं मिले। इसलिये साम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने से बचाने वाला कोई व्यक्ति नहीं था।
(11.) सेना का पतन
दिल्ली सल्तनत की सेना में जो कौशल, योग्यता, साहस तथा शक्ति बलबन तथा अलाउद्दीन के समय में थी, वह तुगलक सुल्तानों के समय में नहीं रह गई। सैनिक शक्ति के क्षीण हो जाने से तुगलक वंश पतनोन्मुख हो गया। उसमें न तो आन्तरिक विद्रोहों को दबाने की क्षमता रह गई और न विदेशी आक्रमणों से सल्तनत की रक्षा करने की।
(12.) मुसलमान अमीरों का नैतिक पतन
इन दिनों मुसलमान अमीरों का नैतिक पतन अपने चरम पर था। उनमें औरतों एवं हिंजड़ों को राजदरबार में नचाने की प्रवृत्ति जोरों पर थी। वे तीतर-बटेर और मुर्गे लड़ाते थे। कबूतर पालने में समय खर्च करते थे। वेश्यावृत्ति तथा लौण्डेबाजी में प्रवृत्त रहते थे। शराब तथा रिश्वत का बोलबाला था। निरंतर विलासिता में लगे रहने से तुर्की अमीरों में अपने पूर्वजों जैसा पौरुष तथा साहस नहीं बचा था। इस कारण उनका पतन अवश्यम्भावी था।
(13.) हिन्दुओं का विद्रोह
यद्यपि दिल्ली के सुल्तानों ने हिन्दुओं को सदैव निर्बल बनाने का प्रयत्न किया परन्तु हिन्दू अपनी विनष्ट स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त करने का सदैव प्रयत्न करते रहे। जब कभी हिन्दू अवसर पाते थे, विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे। हिन्दुओं को राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक तीनों प्रकार की असुविधाओं का समना करना पड़ता था। ऐसी दशा में उनके द्वारा सल्तनत की जड़ खोदने का प्रयास करना स्वाभाविक ही था।
(14.) रिक्त राजकोष
साम्राज्य को सुदृढ़ तथा सुव्यवस्थित रखने के लिए धन की आवश्यकता होती है परन्तु खुसरोशाह परवानी के युद्ध, मुहम्मद तुगलक की योजनाओं की विफलता तथा दुर्भिक्ष के कारण राजकोष रिक्त हो गया था। ऐसी दशा में राज्य का पतन अवश्यम्भावी था। साम्राज्य की मशीन ढीली होने लगी।
(15.) मुहम्मद तुगलक की योजनाओं की विफलता
मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की असफलता के भी तुगलक वंश के पतन में बड़ा योग मिला। प्रजा पहले से ही तुगलक वंश को अश्रद्धा की दृष्टि से देखती थी। मुहम्मद तुगलक की योजनाओं की विफलता से जनता की अवशिष्ट श्रद्धा तथा सहानुभूति भी समाप्त हो गई। तुगलकों के विरुद्ध चारों ओर असंतोष और विद्रोह की अग्नि भड़कने लगी।
(16.) मुहम्मद तुगलक की कठोर दण्ड नीति
मुहम्मद बिन तुगलक अत्यंत छोटे-छोटे अपराधों के लिये मृत्यु दण्ड तथा अंग-भंग करने के दण्ड देता था। इससे तुगलकों के शत्रुओं की संख्या अधिक हो गई। उसकी इस क्रूर नीति के कारण मित्र भी उसके सशंकित रहने लगे और साम्राज्य की सेवा की ओर से विमुख हो गये। सुल्तान की कठोर नीति के कारण ही विदेशी अमीरों ने उसके विरुद्ध दक्षिण भारत में प्रबल संगठन बना लिया जिसे छिन्न-भिन्न करना सुल्तान के लिए असम्भव हो गया।
(17.) विदेशी अमीरों की उच्च पदों पर नियुक्ति
जब मुहम्मद बिन तुगलक ने देखा कि देशी अमीरों का पतन हो गया और उनमें योग्यता का अभाव है तब उसने उन योग्य विदेशी अमीरों को राज्य में ऊँचे पद देना आरम्भ किया जो सुल्तान की उदारता से आकृष्ट होकर मध्य-एशिया तथा ईरान से आकर उसके दरबार में रह रहे थे। इससे दरबार में हमेशा के लिये दो विरोधी दल खड़े हो गये।
(18.) फीरोज की दुर्बलताएं
चौदहवीं शताब्दी की परिस्थितियों में शासन करने के लिये एक दृढ़-प्रतिज्ञ तथा कठोर शासक की आवश्यकता थी परन्तु फीरोज अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति बड़ा उदार था। उसमें न महत्वाकांक्षाएं थीं और न युद्ध प्रवृत्ति। उसकी उदारता का लोगों ने बड़ा दुरुपयोग किया जिससे शासन की कड़ियां शिथिल पड़ गईं। सरकारी कर्मचारियों तथा सैनिकों में भ्रष्टाचार तथा घूसखोरी फैल गई। इससे शासन व्यवस्था खोखली पड़ गई और सल्तनत दु्रतगति से पतनोन्मुख हो गई। फीरोज धर्मान्ध था और मुसलमानों का अत्यधिक पक्ष लेता था। हिन्दू प्रजा को उसने कोई अधिकार नहीं दिये। इन बातों के परिणाम अच्छा नहीं हुए।
(19.) धर्म-प्रभावित राय
फीरोज तुगलक राजनीति को धर्म से अलग नहीं कर सका। वह कठमुल्लों तथा मुफ्ती लोगों से प्रभावित रहता था। फीरोज के धार्मिक पक्षपात का राज्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। इससे हिन्दुओं में बड़ा असंतोष फैला और ऐसी प्रतिक्रिया आरम्भ हुई जिसका परिणाम तुगलक वंश के लिए अच्छा नहीं हुआ।
(20.) गुलाम प्रथा
फीरोज के शासन काल में गुलामों की संख्या में इतनी अधिक वृद्धि हो गई कि वे राज्य के लिए भार हो गये। वे हिन्दू गुलाम जो नाममात्र के लिए मुसलमान हो गये थे, प्रायः विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे। उनमें राजभक्ति का सर्वथा अभाव था और वे सदैव षड्यंत्र रचा करते थे। फीरोज तुगलक ने गुलामों की दशा सुधारने के लिये कई कदम उठाये इससे सल्तनत की आर्थिक दशा पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा।
(21.) जागीर प्रथा
फीरोज तुगलक द्वारा पुनः स्थापित की गई जागीर प्रथा का भी साम्राज्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। ये जागीरदार धीरे-धीरे अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे। ज्यों-ज्यों तुगलक साम्राज्य की शृंखलाएं ढीली पड़ने लगीं, त्यों-त्यों इन जागीरदारों ने अवसर पाकर स्वयं को स्वतंत्र कर लिया।
(22.) सेना में वंशानुगत पद
फीरोज अपने सैनिकों के साथ बड़ी सहानुभूति दिखाता था। जब कोई सैनिक वृद्ध हो जाता था, तब उसका पुत्र अथवा उसका कोई निकटवर्ती सम्बन्धी या गुलाम उसके स्थान पर भर्ती कर लिया जाता था। इससे सेना की योग्यता तथा रण कुशलता नष्ट हो गई। चौदहवीं शताब्दी में सल्तनत का स्थायित्व सेना की योग्यता पर ही निर्भर था।
(23.) फीरोज की अस्थिर तथा दुर्बल बाह्य नीति
फीरोज की अस्थिर तथा दुर्बल बाह्य नीति का सल्तनत की सुरक्षा तथा सुदृढ़ता पर बुरा प्रभाव पड़ा। उसने दक्षिण को पुनः जीतने का कोई प्रयत्न नहीं किया। राजपूताना के हिन्दू राज्य जिन्होंने सुल्तान से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था, उनके भी पुनः जीतने का उसने प्रयत्न नहीं किया। उसने बंगाल पर विजय प्राप्त की परन्तु अपनी दुर्बल बाह्य नीति के कारण उसने उसे खो दिया। फीरोज की दुर्बल बाह्य नीति से साम्राज्य की प्रतिष्ठा को बहुत बड़ा धक्का लगा और दूर-दूर के प्रान्तों को स्वतंत्र होने का प्रोत्साहन मिला।
(24.) तैमूर का आक्रमण
तुगलक साम्राज्य पर तैमूर लंग के आक्रमण से बहुत बड़ा आघात लगा। इस आक्रमण के पहले तुगलक साम्राज्य जर्जर हो गया था। तैमूर ने उस पर ऐसा घातक प्रहार किया कि तुगलक राज्य का पतन हो गया।
तुगलक वंश के क्रूर अंत के बाद दिल्ली में सैयद वंश का शासन आरम्भ हुआ। सैयद वंश के सुल्तान नाम मात्र के लिए दिल्ली के शासक थे। उनमें शासन करने की प्रतिभा का नितांत अभाव था।
सैयद वंश का शासन
तुगलक वंश के अन्तिम सुल्तान महमूद की 1413 ई. में मृत्यु हो गई। इसके बाद दिल्ली में खिज्र खाँ ने एक नये राजवंश की स्थापना की जो सैयद वंश के नाम से प्रसिद्ध है। सैयद स्वयं को पैगम्बर का वंशज बताते हैं। कहा जाता है कि बुखारा के सैयद जलाल नामक फकीर ने खिज्र खाँ को सैयद कहकर पुकारा था, तभी से वह सैयद कहलाने लगा।
ख्रिज खाँ के सैयद कहलाये जाने का एक और कारण है। कहा जाता है कि उसके चरित्र में सैयदों की समस्त विशेषताएँ विद्यमान थीं। वह दयालु, साहसी, विनम्र, वचन पालक तथा धार्मिक व्यक्ति था। ये सब गुण पैगम्बर तथा उनके वंशजों में पाये जाते हैं। चूंकि इस नये राजवंश की स्थापना खिज्र खाँ ने की, इसलिये इस वंश का नाम सैयद वंश पड़ गया।
खिज्र खाँ (1414-1421 ई.)
खिज्र खाँ एक सैयद था। बचपन में मुल्तान के गवर्नर मलिक नसीरूल्मुल्क दौलत ने उसका पालन पोषण किया था। नसीरूल्मुल्क की मृत्यु के उपरान्त खिज्र खाँ बंगाल का गवर्नर हो गया। 1398 ई. में सरग खाँ ने मुल्तान पर आक्रमण करके खिज्र खाँ को कैद कर लिया परन्तु खिज्र खाँ कैद से निकल भागा और 1398 ई. में उसने तैमूर लंग की नौकरी कर ली।
जब तैमूर दिल्ली को नष्ट-भ्रष्ट करने के उपरान्त भारत से जाने लगा तो वह खिज्र खाँ को अपना प्रतिनिधि बना गया। दिल्ली की दशा उत्तरोत्तर बिगड़ती ही जा रही थी। खिज्र खाँ ने अवसर पाकर दौलत खाँ लोदी को परास्त किया तथा 23 मई 1414 को दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उसने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित नहीं किया। वह समरकंद के सुल्तान की अधीनता में दिल्ली पर शासन करता रहा।
सल्तनत की दशा
खिज्र खाँ के दिल्ली के तख्त पर बैठते समय सल्तनत की स्थिति डावाँडोल थी। सल्तनत की शान समाप्त हो चुकी थी। प्रान्तपति एक-एक करके स्वतंत्र हो रहे थे। राजधानी दिल्ली की दशा भी अस्त-व्यस्त थी। प्रबल सुल्तान के अभाव में अमीरों के दल परस्पर लड़ रहे थे। दोआब में विद्रोह की आग भड़क रही थी और हिन्दू-सरदार कर देना बन्द कर रहे थे।
मालवा, गुजरात तथा जौनपुर के राज्य स्वतन्त्र होकर अपने पड़ौसियों के साथ संघर्ष कर रहे थे। वे प्रायः दिल्ली राज्य पर भी धावा बोल देते थे। मेवातियों में भी बड़ा असन्तोष था। उन्होंने भी दिल्ली को कर देना बन्द कर दिया था। उत्तरी सीमा पर खोखर जाति मुल्तान तथा लौहार में लूटमार कर रही थी। सरहिन्द में भी उपद्रव मचा हुआ था। इस प्रकार साम्राज्य पूरी तरह डांवाडोल एवं छिन्न-भिन्न था। इन्हीं परिस्थितियों में खिज्र खाँ ने दिल्ली सल्तनत का शासन अपने हाथों में लिया।
विद्रोहों का दमन
खिज्र खाँ ने सल्तनत में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने का प्रयत्न किया। उसने पंजाब को दिल्ली से मिलाकर सल्तनत को फिर से संगठित करने का कार्य आरम्भ किया। वह पंजाब तथा दोआब के विद्रोहों को दबाने में भी सफल रहा। दोआब में कटेहर का विद्रोह बड़ा भयानक था। इस विद्रोह को दबाने के लिए चार बार सेनाएँ भेजनी पड़ीं।
1414 ई. में खोर, कम्पिला तथा साकित के विद्रोह का बड़ी कठोरता के साथ दमन किया गया। इसके पाँच वर्ष बाद कटेहर में फिर उपद्रव आरम्भ हो गया परन्तु यह विद्रोह भी शान्त कर दिया गया। इसके बाद खिज्र खाँ को इटावा की ओर ध्यान देना पड़ा। यहाँ पर एक राजपूत सरदार ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया।
विद्रोहियों को चारों ओर से घेर लिया गया और उन्हें दिल्ली सल्तनत के आधिपत्य को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया। दोआब में शान्ति स्थापित करने के लिए कई बार सेनाएँ भेजनी पड़ीं। पंजाब में स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकी। 1417 ई. में मलिक तुर्कान ने सरहिन्द को घेर लिया परन्तु उसे परास्त करके दिल्ली के अधीन किया गया। इसके दो वर्ष बाद 1419 ई. में सरंग खाँ ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया परन्तु अन्त में वह भी परास्त कर दिया गया।
खिज्र खाँ की मृत्यु
1421 ई. में खिज्र खाँ मेवात गया। वहाँ उसने विद्रोहियों के एक दल को नष्ट किया। इसके बाद वह ग्वालियर की ओर गया। वहाँ के राजा ने कर देने का वचन दिया। जब खिज्र खाँ दिल्ली लौट रहा था तब वह रास्ते में ही बीमार पड़ा और 20 मई 1421 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।
मुबारकशाह (1421-1433 ई.)
खिज्र खाँ ने मरते समय, शाहजादे मुबारक खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। वह मुबारकशाह के नाम से तख्त पर बैठा। उसने समरकंद से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया और स्वतन्त्रापूर्वक दिल्ली में शासन करने लगा। उसने अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं और अपने नाम में खुतबा पढ़वाया।
उसने राज्य में अनुशासन लाने के लिये अमीरों की शक्ति को कम करने के उपाय किये। वह प्रायः अमीरों का एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरण कर देता था। इससे किसी अमीर का किसी एक स्थान में अधिक प्रभाव नहीं बढ़ने पाता था परन्तु इससे अमीरों की शासन पर पकड़ ढीली पड़ने लगी और उनमें सुल्तान के प्रति असन्तोष भी बढ़ने लगा।
अपने पिता की भाँति मुबारक का जीवन भी पंजाब तथा दोआब में विद्रोहों का दमन करने में व्यतीत हुआ। पंजाब में सबसे भयानक विद्रोह जसरथ खोखर का था। कटेहर, मेवात, इटावा, ग्वालियर तथा कालवी में भी विद्रोह हुए परन्तु समस्त जगह विद्रोहों को सफलतापूर्वक दबा दिया गया। 1433 ई. में काबुल के शासक शेख अली ने पंजाब पर आक्रमण किया।
उसने लाहौर को लूटा और बहुत से स्थानों पर अधिकार कर लिया। आक्रमणकारी शीघ्र ही मुल्तान पहुँच गये। मुबारक स्वयं एक सेना लेकर आक्रमणकारियों का सामना करने के लिए आगे बढ़ा और उन समस्त जिलों पर फिर से अधिकार कर लिया जो विद्रोहियों के अधिकार में चले गये थे। इसी समय मुबारक के प्रधानमन्त्री सरवर-उल-मुल्क ने षड्यन्त्र रच कर 1433 ई. में मुबारक की हत्या करवा दी।
मुहम्मद मीन फरीदी (1433-1445 ई.)
मुबारक की मृत्यु के उपरान्त शाहजादा मुहम्मद मीन फरीदी, मुहम्मदशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। इसे मुबारकशाह ने गोद लिया था। प्रधानमन्त्री सरवर-उल-मुल्क ने राज्य की वास्तविक शक्ति अपने हाथों में रखने का प्रयत्न किया। उसने खान-ए-जहाँ की उपाधि धारण की और अपने समर्थकों को राज्य में उच्च पद देने आरम्भ किये।
इससे अमीरों में असंतोष बढ़ने लगा। अंत में अमीरों ने कमाल-उल-मुल्क के नेतृत्व में विद्रोह का झण्डा बुलंद किया। सुल्तान पहले से ही सरवर से अप्रसन्न था। उसने सरवर तथा उसके साथियों की हत्या करवा दी और कमाल-उल-मुल्क को अपना प्रधानमन्त्री बना लिया किंतु राज्य में शांति स्थापित नहीं हो सकी।
कुछ ही समय बाद इब्राहिम शर्की ने कुछ परगनों पर अधिकार स्थापित करके विद्रोह का झण्डा बुलंद किया। ग्वालियर के राय ने दिल्ली को कर देना बन्द कर दिया। जसरथ खोखर ने लाहौर तथा सरहिन्द के गवर्नर बहलोल खाँ लोदी को दिल्ली का तख्त छीनने के लिए प्रोत्साहित किया। इन कुचक्रों तथा विद्रोहों के फलस्वरूप दिल्ली सल्तनत उत्तरोत्तर पतनोन्मुख होती चली गई। 1445 ई. में मुहम्मद मीन फरीदी की मृत्यु हो गई।
अलाउद्दीन आलमशाह (1445-1451 ई.)
मुहम्मदशाह की मृत्यु के उपरान्त अमीरों ने उसके पुत्र अलाउद्दीन आलमशाह को गद्दी पर बैठाया। नया सुल्तान अयोग्य था। वह शासन के कार्यों की उपेक्षा करता था। 1451 ई. में वह बदायूँ चला गया और वहीं पर रहने लगा। दरबारियों तथा अमीरों ने उसके इस कदम का विरोध किया परन्तु सुल्तान ने उनकी एक नहीं सुनी।
सुल्तान ने जब अपने वजीर हमीद खाँ के मरवाने का प्रयत्न किया तब हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिये आमन्त्रित किया। बहलोल लोदी ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया तथा निर्विरोध दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार सैयद वंश का शासन समाप्त हो गया। अलाउद्दीन बदायूं में निवास करता रहा। 1478 ई. में वहीं पर उसकी मृत्यु हुई।
बहलोल लोदी ने लोदी वंश का शासन स्थापित किया। उसे दिल्ली का तख्त अनायास ही प्राप्त हुआ। जब सैयद शासक दिल्ली छोड़कर भाग गया तब बहलोल लोदी के लिए दिल्ली के तख्त पर बैठना बहुत आसान था।
लोदी वंश
लोदी अफगान थे। अफगानों को पठान भी कहा जाता है। अफगान अथवा पठान उस पर्वतीय प्रदेश के निवासी थे जो पूर्व में मुल्तान तथा पेशावर से लेकर पश्चिम में सुलेमान पर्वत तथा गजनी तक फैला हुआ है। ये लोग लम्बे कद, गोरे रंग तथा बलिष्ठ शरीर के होेते थे।
कठिन जीवन जीने के कारण ये लोग बड़े लड़ाका तथा दुःसाहसी प्रवृत्ति के होते थे तथा कई कबीलों में विभक्त थे। इन लोगों में किसी वंश विशेष की प्रमुखता नहीं थी। पशु पालन तथा घोड़ों का व्यापार इनका मुख्य व्यवसाय था।
इनकी आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी इसलिये ये अपने धनी पड़ौसियों को लूटते थे। बहुत से अफगान जीवन यापन करने के लिये तुर्क सुल्तानों की सेना में भर्ती हो गये थे। भारत के तुर्क सुल्तान उन्हें अपनी सेना में तो भर्ती करते थे किंतु उन्हें हेय दृष्टि से देखे जाने के कारण उन्हें शासन में उच्च पद नहीं देते थे।
बहलोल लोदी (1451-1489 ई.)
बहलोल लोदी का प्रारम्भिक जीवन
भारत में प्रथम अफगान साम्राज्य की स्थापना बहलोल लोदी ने की थी। बहलोल के पिता का नाम मलिक काला था जो दौराबा का शासक था। जब बहलोल माता के गर्भ में था तब एक दिन घर की छत गिर पड़ी और उसकी माता छत के नीचे दबकर मर गई। मलिक काला ने तुरन्त अपने स्त्री का पेट चिरवा कर बच्चे को बाहर निकलवा लिया।
बच्चे का नाम बहलोल रखा गया। कुछ समय बाद एक युद्ध में मलिक काला की भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार बहलोल बचपन में ही माता-पिता की छत्रछाया से वंचित हो गया। उसका पालन-पोषण उसके चाचा सुल्तानशाह ने किया जो सरहिन्द का गर्वनर था। बहलोल की प्रतिभा से प्रभावित होकर सुल्तानशाह ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इस प्रकार सुल्तानशाह की मृत्यु के उपरान्त बहलोल सरहिन्द का गवर्नर बन गया। उसने स्वयं को दिल्ली साम्राज्य से स्वतन्त्र घोषित कर दिया।
दिल्ली के तख्त की प्राप्ति
सैयद वंश के सुल्तानों के समय में बहलोल लोदी की शक्ति में बहुत वृद्धि हुई। अलाउद्दीन आलमशाह के शासन काल में सुल्तान के प्रधानमन्त्री हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को दिल्ली का तख्त लेने के लिए आमन्त्रित किया। इस प्रकार 1451 ई. में वह निर्विरोध दिल्ली का सुल्तान बन गया तथा लोदी वंश का शासन स्थापित हो गया।
बहलोल लोदी के कार्य
(1.) हमीद खाँ को कारागार में डालना
बहलोल लोदी वीर तथा साहसी व्यक्ति था। दिल्ली के तख्त पर बैठते ही उसने अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए उसने अपने मन्त्री हमीद खाँ को कारागार में डाल दिया।
(2.) महत्वपूर्ण पदों पर अफगानों की नियुक्ति करना
बहलोल ने शासन के प्रमुख पदों पर अपने विश्वस्त अफगान अधिकारियों को नियुक्त किया। दुर्गों की रक्षा के लिए भी उसने योग्य अफगान सेनापतियों को नियुक्त किया। दिल्ली के निकटस्थ प्रान्तों तथा जिलों में भी उसने अत्यन्त विश्वासपात्र अफगानों को नियुक्त किया। इस प्रकार शासन के प्रमुख पदों पर तुर्कों की जगह अफगान छा गये।
(3.) प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित करना
दिल्ली में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद बहलोल लोदी ने पंजाब को संगठित और सुव्यवस्थित किया। इसके बाद बहलोल ने जौनपुर के शर्की शासकों को अपने अधीन किया। बहलोल लोदी को जौनपुर के विरुद्ध कठिन संघर्ष करना पड़ा किंतु अंत में उसने जौनपुर पर अधिकार कर लिया और अपने पुत्र बारबकशाह को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।
जौनपुर पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने से बहलोल लोदी की शक्ति बहुत बढ़ गई। उसने कालपी, धौलपुर तथा अन्य स्थानों पर भी अधिकार कर लिया। बहलोल ने ग्वालियर के विद्रोही राजा पर आक्रमण कर दिया और उसे कर देने के लिए बाध्य किया। ग्वालियर से लौटने के बाद 1489 ई. में बहलोल लोदी ज्वर से पीड़ित हो गया तथा उसकी मृत्यु हो गई।
बहलोल के कार्यों का मूल्याकंन
बहलोल लोदी वीर तथा साहसी सेनानायक था। वह दिल्ली में लोदी वंश की सत्ता का संस्थापक था। उसका व्यक्तिगत जीवन बहुत अच्छा था। वह विश्वसनीय, स्वामिभक्त, उदार तथा दयालु व्यक्ति था। इस्लाम में उसकी बड़ी निष्ठा थी। वह दम्भ तथा आडम्बर से दूर रहता था। उसे सज-धज तथा ठाठ-बाट का शौक नहीं था। व
ह कभी किसी भिक्षुक को निराश नहीं करता था। यद्यपि बहलोल स्वयं विद्वान् नहीं था परन्तु विद्वानों का आदर करता था और उन्हें प्रश्रय देता था। वह न्याय प्रिय शासक था। उसने दिल्ली सल्तन के खोये हुए गौरव को एक बार फिर बढ़ाया तथा प्रांतीय शासकों को अपने अधीन करके उत्तरी भारत में राजनीतिक एकता स्थापित की।
सिकन्दर लोदी (1489-1517 ई.)
सिकन्दर लोदी का प्रारम्भिक जीवन
सिकन्दर लोदी के बचपन का नाम निजाम खाँ था। वह बहलोल लोदी का पुत्र था और एक सुनार स्त्री के पेट से उत्पन्न हुआ था। वह प्रायः दिल्ली में ही अपने पिता के साथ रहता था। वह रूपवान् तथा साहसी युवक था। अपने पिता के जीवन काल में वह अनेक उच्च पदों पर काम कर चुका था।
वह सरहिन्द के शासक के रूप में प्रांतीय शासन का, अपने पिता की अनुपस्थिति में राजधानी में रहकर केन्द्रीय शासन का तथा युद्ध के मैदान में रहकर सैन्य नेतृत्व का अनुभव प्राप्त कर चुका था। 1489 ई. में बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद अमीरों तथा सरदारों ने निजाम खाँ को सिकन्दर खाँ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।
सिकन्दर लोदी की समस्याएँ तथा उनका निवारण
(1.) बारबकशाह का दमन
बारबकशाह सिकंदर लोदी का भाई था। उसने स्वयं को जौनपुर का स्वतन्त्र शासन घोषित कर दिया। सिकन्दर ने जौनपुर पर आक्रमण कर बारबकशाह को बन्दी बना लिया। जौनपुर फिर से दिल्ली के अधीन हो गया।
(2.) हुसैनशाह शर्की का दमन
जौनपुर के जमींदारों ने जौनपुर के पुराने प्रांतपति हुसैनशाह को अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। फलतः वह एक विशाल सेना लेकर जौनपुर की तरफ बढ़ा। दिल्ली की सेना भी उसका मार्ग रोकने के लिये आगे बढ़ी। बनारस के निकट दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ। इस युद्ध में हुसैनशाह की पराजय हो गई और वह जान बचाकर लखनौती की ओर भाग गया और वहीं पर गुप्त रूप से अपना जीवन बिताने लगा। सिकन्दर लोदी ने जौनपुर में अपना अधिकारी नियुक्त कर दिया।
(3.) विद्रोही जमींदारों का दमन
बहलोल लोदी जमींदारी प्रथा का पोषक था। उसने अपने जमींदारों को सदैव प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया परन्तु सिकन्दर लोदी जमींदारी प्रथा का घोर विरोधी था। उसने जमींदारों से राजस्व कर का हिसाब देने के लिए कहा। इससे जमींदारों में बड़ा असन्तोष फैला और वे षड्यन्त्र रचने लगे। सुल्तान को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने जमींदारों को बड़ी क्रूरता के साथ दण्डित किया।
(4.) विद्रोही राजपूतों का दमन
सिकन्दर के अन्तिम दिन राजपूतों के विद्रोह का दमन करने में व्यतीत हुए। उसने विद्रोही राजपूतों का सामना किया और धौलपुर, ग्वालियर, नरवर तथा चन्देरी को अपने अधीन किया। सिकन्दर का अन्तिम संघर्ष रणथम्भौर के शासक से हुआ। इस संघर्ष में सिकन्दर लोदी को सफलता प्राप्त हुई। कुछ समय पश्चात् ग्वालियर के राजा ने पुनः विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया।
सिकंदर लोदी की मृत्यु
ई.1517 में सिकंदर लोदी बीमार पड़ा। 1 दिसम्बर 1517 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।
सिकन्दर लोदी के चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन
(1.) प्रतिभाशाली शासक
सिकन्दर लोदी प्रतिभावान् तथा रूपवान् सुल्तान था। वह लोदी वंश के शासकों में सर्वाधिक योग्य था। वह साहसी सेनानायक एवं सफल शासक था। उसने शासन में कई नई व्यवस्थायें कीं। उसने अपने भाइयों को राज्याधिकारियों के साथ काम पर लगाया। वह राजकीय नौकरियों पर नियुक्ति देने में वंश का ध्यान रखता था। उसकी स्मरण-शक्ति विलक्षण थी और ज्ञानकोष वृहत् था। वह स्वयं अच्छा कवि था और इस्लामी विद्वानों का आदर करता था।
(2.) अफगान सरदारों एवं अमीरों पर नियंत्रण
सिकन्दर लोदी ने अफगान सरदारों एवं अमीरों को नियन्त्रण में रखने का हर संभव प्रयास किया और उनके स्वतन्त्र होने के समस्त प्रयासों को विफल किया। सुल्तान अमीरों से सदैव शंकित रहता था इसलिये अमीरों तथा उनके सेवकों की नियुक्त स्वयं करता था।
(3.) विद्रोही हिन्दूसरदारों का दमन
सिकन्दर लोदी के समय में विद्रोह करने वाले हिन्दू जमींदारों को बलपूर्वक दबाया गया और उन पर कड़ा नियन्त्रण रखा गया।
(4.) राज्य की आय पर नियंत्रण
सिकन्दर लोदी ने राज्य की आय पर सल्तनत का नियन्त्रण स्थापित किया। सरकारी धन हड़पने का प्रयास करने वाले प्रांतपतियों तथा अधिकारियों को कठोर दण्ड दिया जाता था।
(5.) अपराधों पर नियंत्रण
सिकंदर लोदी के शासनकाल में सड़कें सुरक्षित थीं। लोगों को चोरों तथा डाकुओं का भय नहीं था।
(6.) गुप्तचर विभाग की स्थापना
सिकन्दर लोदी ने गुप्तचर विभाग की भी व्यवस्था की। इससे उसे अमीरों एवं अधिकारियों की गुप्त कार्यवाहियों की सूचना मिल जाती थी।
(7.) समुचित न्याय व्यवस्था
सिकंदर लोदी गरीबों के हितों का ध्यान रखता था। इसलिये उसने न्याय की समुचित व्यवस्था करने का प्रयत्न किया। सर्वोच्च न्यायाधीश का कार्य सुल्तान स्वयं करता था और आवश्यक परामर्श लेने के लिये उलेमाओं को अपने साथ रखता था। उसने मुस्लिम प्रजा के लिये निष्पक्ष तथा शीघ्र न्याय की व्यवस्था की। हिन्दुओं के प्रति उसका दण्ड-विधान बड़ा कठोर था।
(8.) कृषि की उन्नति का प्रयास
सिकंदर लोदी के शासन में कृषकों की दशा बड़ी असन्तोषजनक थी। इसलिये उसने कृषि की उन्नति का प्रयास किया। उसने भूमि की नाप करवाकर भूमि कर निर्धारित करवाया। इस कार्य के लिये उसने एक प्रामाणिक गज की व्यवस्था की जा 30 इंच का होता था और ‘गज-सिकन्दर’ के नाम से विख्यात हुआ। उत्तर भारत के बहुत से क्षेत्रों में इस गज का प्रयोग बहुत दिनों तक होता रहा।
(9.) व्यापार वृद्धि के प्रयास
सिकन्दर लोदी ने गल्ले पर से चुंगी हटा दी और व्यापारियों तथा सौदागरों की सुरक्षा की व्यवस्था की।
(10.) इस्लाम से प्रेम
सिकन्दर लोदी को इस्लाम के उन्नयन का बड़ा उत्साह था। उसमें धार्मिक कट्टरता कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह मुल्ला-मौलवियों का बड़ा आदर करता था। न्याय कार्य में उलेमाओं की सलाह लेना आवश्यक समझता था। उसने अपने राज्य में सैंकड़ों मस्जिदों का निर्माण करवाया।
(11.) हिन्दुओं से घृणा
सिकन्दर लोदी को हिन्दुओं से घोर घृणा थी। उसने बड़ी संख्या में हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया। उसने आदेश जारी किया कि कोई हिन्दू मथुरा के घाट पर स्नान न करे। उसने मथुरा सहित अन्य तीर्थों पर बहुत सी मस्जिदें बनवाईं जिससे वहाँ पर हिन्दुओं का प्रभाव घटे।
उसने अपनी सल्तनत के भिन्न-भिन्न भागों में हिन्दू-मन्दिरों को नष्ट करने की आज्ञा दी। हिन्दुओं के साथ उसे लेश-मात्र सहानुभूति नहीं थी और उन्हें दण्ड देने में संकोच नहीं होता था। उसने मूर्ति-पूजा समाप्त करने का हर संभव प्रयास किया। वह मंदिरों से देव मूर्तियां तोड़कर कसाइयों को दे दिया करता था जो मांस तौलने के लिए उनका बाट बनाया करते थे। इस प्रकार सिकन्दर ने इस्लाम के उन्नयन एवं हिन्दू धर्म के विनाश के लिये फीरोजशाह तुगलक की नीति का अनुगमन किया।
निष्कर्ष
सिकन्दर लोदी प्रतिभावान, स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक था। हिन्दुओं के साथ उसका व्यवहार बड़ा कठोर था। उसे भयंकर विद्रोहों का सामना करना पड़ा, जिनका दमन करने में वह सफल रहा। वह जौनपुर को दिल्ली सल्तनत का अविच्छिन अंग बनाने तथा सल्तनत में आन्तरिक शान्ति स्थापित करने में सफल रहा। उसने इस्लामी साहित्य तथा संस्कृति के सम्वर्द्धन में बड़ा योग दिया। वह दीन-दुुखियों पर दया दिखाता था।
मुस्लिम प्रजा के प्रति उसमें उच्च-कोटि की न्यायप्रियता थी। दुष्टों को दण्ड देने में वह किंचित् भी संकोच नहीं करता था। उसने भूमिपतियों पर नियन्त्रण रखने का पूरा प्रयास किया। उसने प्रान्तीय गवर्नरों के हिसाब का निरीक्षण करवाकर सरकारी धन हड़पने वालों को कठोर दण्ड दिया।
इस प्रकार सिकन्दर एक सफल शासक प्रतीत होता है परन्तु उसकी उदारता केवल मुस्लिम प्रजा के लिये थी तथा सफलता केवल व्यक्तिगत थी। उसने बहुसंख्यक हिंदू प्रजा के लिये और अपने अपने उत्तराधिकारियों के लिए अच्छी परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं कीं।
इब्राहीम लोदी (1517-1526 ई.)
दिल्ली के तख्त की प्राप्ति
सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद 1517 ई. में इब्राहीम लोदी निर्विरोध दिल्ली के तख्त पर बैठा। वह वीर तथा साहसी तो था परन्तु वह उद्दण्ड तथा सदैव सशंकित रहने वाला व्यक्ति था। इन दुर्बलताओं के कारण वह किसी अफगान सरदार अथवा अमीर का विश्वासपात्र नहीं बन सका और उसे भयानक विपत्तियों का सामना करना पड़ा।
इब्राहीम के युद्ध
इब्राहीम लोदी को अपने शासन काल में आद्योपरान्त भयानक आन्तरिक संघर्षों तथा बाह्य युद्धों का सामना करना पड़ा। उसे निम्नलिखित युद्ध करने पड़े-
(1.) चाचा जलाल से युद्ध
तख्त पर बैठते ही इब्राहीम को कुछ अमीरों ने समझाया कि वह अपने चाचा जलाल को, जो कालपी का गवर्नर था, जौनपुर का स्वतन्त्र शासक बना दे जिससे वह सन्तुष्ट रहे। सुल्तान ने इस परामर्श को स्वीकार कर लिया और जलाल को जौनपुर भेज दिया। इब्राहीम लोदी को शीघ्र ही अपनी भूल का अहसास हो गया कि उसने जौनपुर को स्वतन्त्र करके बहुत बड़ी भूल की है।
उसने जलाल को वापस आगरा आने के आदेश दिये परन्तु जलाल ने आगरा आने से इन्कार कर दिया। इतना ही नहीं जलाल ने अवध पर आक्रमण करके वहाँ के गवर्नर सईद खाँ को परास्त कर दिया। इब्राहीम ने अपनी सेना को जलाल का पीछा करने की आज्ञा दी।
जलाल को इसकी सूचना मिली तो वह कालपी भाग गया। अब सुल्तान की सेना ने कालपी में घेरा डाला। जलाल आगरा की ओर भागा। वहाँ से वह ग्वालियर के राजा के पास गया। अन्त में वह गोंडवाना पहुँचा। वहाँ पर उसे गोंडों ने घेरकर उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार इब्राहीम लोदी का जलाल से पीछा छूट गया।
(2.) ग्वालियर के विरुद्ध अभियान
इब्राहीम लोदी ने तख्त पर बैठते ही ग्वालियर पर सैनिक अभियान किया। उसने 1517 ई. में एक सेना ग्वालियर पर चढ़ाई करने के लिए भेजी। जलाल के विद्रोह के कारण ग्वालियर अभियान में बड़ी बाधा उत्पन्न हुई परन्तु अन्त में ग्वालियर का राजा विक्रमादित्य, ग्वालियर का दुर्ग इब्राहीम लोदी को देने के लिए तैयार हो गया। इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर के राजा को शम्साबाद का हाकिम नियुक्त करके अपनी सेवा में रख लिया।
(3.) राणा सांगा से युद्ध
मेवाड़ का राणा संग्रामसिंह उस काल में महत्वाकांक्षी एवं वीर हिन्दू शासक हुआ। उसे सांगा के नाम से भी जाना जाता है। उसका राज्य इब्राहीम लोदी के राज्य की सीमा से लगता था। राणा ने अपने राज्य के विस्तार के लिये इब्राहीम के राज्य की सीमा पर आक्रमण कर दिया।
जब लोदी की सेनाएं राणा का सामना करने र्गईं तो राणा ने लोदी की सेनाओं को परास्त कर दिया। राणा को जीत तो मिली किंतु वह स्वयं बुरी तरह घायल हो गया। इस पर लोदी ने नई सेना को राणा संग्रामसिंह पर आक्रमण करने भेजा। इस बार फिर लोदी की सेना परास्त हुई और राणा ने उसे बयाना की ओर खदेड़ दिया।
अब इब्राहीम स्वयं राणा का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। इस युद्ध में किसी भी पक्ष को सफलता नहीं मिली और दोनों ओर की सेनाएँ पीछे हट गईं। कुछ समय उपरान्त राणा ने चन्देरी पर अधिकार कर लिया और इब्राहीम लोदी उसे वापस लेने में असमर्थ रहा।
(4.) अफगान अमीरों से युद्ध
तुर्क अमीरों की तरह अफगान अमीरों में भी स्वतंत्रता का भाव अधिक था। चूंकि उनमें उत्तराधिकार का नियम निर्धारित नहीं था इसलिये वे सुल्तान को अमीरों में से ही एक मानते थे। इस कारण उन्हें यह सह्य नहीं था कि सुल्तान उनके अधिकारों को सीमित करे। अतः जब इब्राहीम लोदी ने अफगान अमीरों के पदों और अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया तो अफगान अमीरों ने सुल्तान इब्राहीम लोदी का विरोध किया।
इससे सुल्तान तथा अफगान सरदारों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। अमीर खुल्लम-खुल्ला विद्रोह पर उतर आये। सुल्तान ने विद्रोहियों का नृशंसतापूर्वक दमन किया। विद्रोही अमीर आजम खाँ का कारागार में ही वध किया गया। इसके बाद सुल्तान ने विद्रोही प्रांतपतियों को उन्मूलित करना आरम्भ किया।
दरिया खाँ नूहानी ने बिहार में स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया। इब्राहीम ने इन विद्रोहों को दबाने का प्रयत्न किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। पंजाब में दौलत खाँ ने विद्रोह कर दिया और उसने काबुल के शासक बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया।
(5.) काबुल के शासक बाबर से युद्ध
: काबुल के शासक बाबर की दृष्टि बहुत दिनों से भारत पर लगी हुई थी। पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ का निमन्त्रण पाकर 1524 ई. में उसने पंजाब पर आक्रमण किया। बाबर ने लाहौर तथा दिपालपुर पर अधिकार कर लिया। इसी बीच बाबर को बल्ख की रक्षा के लिए काबुल लौटना पड़ा।
1525 ई. में उसने फिर पंजाब के लिए प्रस्थान किया। दिसम्बर के महीने में उसने पंजाब में प्रवेश किया। पंजाब में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के उपरान्त बाबर ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया तथा पानीपत पहुँच कर डेरा डाला। इब्राहीम भी अपनी सेना लेकर आ गया। भीषण संग्राम के उपरान्त इब्राहीम की सेना परास्त हो गई। 20 अप्रेल 1526 को इब्राहीम लोदी युद्ध क्षेत्र में ही मारा गया जिससे दिल्ली सल्तनत से लोदी वंश का शासन समाप्त हो गया।
इब्राहीम का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन
इब्राहीम लोदी, दिल्ली सल्तनत का तीसरा और अन्तिम लोदी शासक था। यद्यपि वह दानशील, संगीत-प्रेमी तथा विद्वानों का आश्रयदाता था तथापि उसमें साहस, शौर्य तथा बुद्धि का अभाव था। उसमें कुशल शासक के गुणों का अभाव था। वह घमण्डी, जिद्दी तथा अनुदार था। जिससे अप्रसन्न हो जाता था, उसे कभी क्षमा नहीं करता था।
उसने सुल्तान की शक्ति को प्रबल बनाने का प्रयास किया परन्तु इस प्रयास में उसने अफगान अमीरों को अपना शत्रु बना लिया। इससे सल्तनत की सैनिक शक्ति का आधार ही खिसक गया। वह राणा सांगा को नहीं दबा सका। इस कारण राणा सांगा ने चन्देरी पर अधिकार कर लिया और बयाना तथा आगरा पर शिकंजा कस लिया।
इब्राहीम लोदी बिहार तथा पंजाब के प्रांतपतियों को भी नहीं दबा सका। बिहार में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हो गई और पंजाब के प्रांतपति ने बाबर को देश पर आक्रमण करने के लिये बुला लिया। बाबर ने लोदी सल्तनत को ध्वस्त कर दिया। वस्तुतः इब्राहीम लोदी स्वयं तो अपनी असफलताओं के लिये दोषी था ही किंतु साथ ही वह पूरा युग और उसकी परिस्थितयाँ भी उसकी असफलताओं के लिये जिम्मेदार थे।
अफगान सरदारों में अपने सुल्तान के प्रति वफादार रहने तथा सल्तनत को मजबूत बनाने के लिये पर्याप्त विवेक नहीं था। वे अपने स्वार्थ में डूबे हुए थे और सल्तनत की जड़ों पर चोट कर रहे थे। राणा सांगा जैसे प्रतिद्वंद्वी का उदय और बाबर जैसे दुर्दान्त आक्रांता का आक्रमण भी युगीन परिस्थितियों की देन थे जिन पर इब्राहीम लोदी विजय प्राप्त नहीं कर सका।
दिल्ली सल्तनत का पतन सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद भारत में मध्य एशियाई मुगलों का शासन स्थापित हुआ।
1206 ई. में दिल्ली सल्तनत का उदय हुआ था। गुलाम वंश का शासन काल दिल्ली सल्तनत की बाल्यावस्था का काल था, अलाउद्दीन खिलजी का शासन काल दिल्ली सल्तनत की प्रौढ़ावस्था का काल था, तुगलक वंश का उत्तरार्द्ध दिल्ली सल्तनत की वृद्धावस्था का काल था।
सैयद वंश और लोदी वंश के शासन काल में दिल्ली सल्तनत का अस्थिपंजर ही शेष बचा था। इब्राहीम लोदी के काल में 1526 ई. में दिल्ली सल्तनत का अवसान हो गया।
दिल्ली सल्तनत के पतन के कारण
दिल्ली सल्तनत के पतन के कई कारण थे जिनमें से कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार से हैं-
(1.) भारत की उष्ण जलवायु
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि तुर्क तथा अफगान लोग शीत कटिबन्ध से आये थे। भारत की जलवायु उष्ण होने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा जिससे वे निर्बल तथा आलसी हो गये; परन्तु ऐतिहासिक तथ्यों से इस मत की पुष्टि नहीं होती।
प्रायः यही तर्क हिन्दुओं की पराजय के सम्बन्ध में भी दिया जाता है परन्तु हिन्दुओं ने कई बार मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त करके अपने बल का परिचय दिया था। इसी प्रकार तुर्कों का साहस तथा बल भारत की उष्ण जलवायु के कारण कम नहीं हुआ था। अनेक बार दिल्ली की सेनाओं ने शीत-प्रधान देशों से आये आक्रांताओं का सफलतापूर्वक सामना किया था। अतः दिल्ली सल्तनत के पतन के कुछ और ही कारण थे।
(2.) निरंकुश शासन पद्धति
दिल्ली की सल्तनत स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश थी। जनता को शासन में भाग लेने से वंचित कर दिया गया। वास्तव में इस शासन का आधार सैनिक-बल था, प्रजा की सद्भावना नहीं। शक्ति के बल पर शासन कभी स्थायी नहीं हो पाता। केवल प्रतिभावान एवं बलशाली सुल्तान ही ऐसे शासन को चला सकते थे।
अयोग्य तथा विलासी सुल्तानों के हाथों में सल्तनत का नष्ट-भ्रष्ट होना अवश्यम्भावी था। इसलिये कुतुबुद्दीन, बलबन तथा अलाउद्दीन खिलजी आदि प्रतिभावान सुल्तान सफलतापूर्वक शासन करते थे परन्तु अयोग्य सुल्तानों के समय में सल्तनत छिन्न-भिन्न होने लगती थी। लोदी वंश के समय में यह अपने विनाश को पहुँच गई।
(3.) साम्राज्य का अति विस्तार
मुहम्मद बिन तुगलक के काल में दिल्ली सल्तनत का विस्तार अपने चरम पर पहुँच गया। संचार तथा यातायात के सीमित साधनों के कारण इतनी विशाल सल्तनत का संचालन दिल्ली अथवा किसी भी एक केन्द्र से होना अत्यंत दुष्कर था। इससे दूरस्थ प्रान्तों में विद्रोह होने लगे और प्रान्तपति स्वतन्त्र होने लगे। अतः साम्राज्य का अति विस्तार उसके पतन का कारण सिद्ध हुआ।
(4.) मुहम्मद बिन तुगलक की नीति
: मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं तथा नीतियों का भी साम्राज्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। राजकोष रिक्त हो गया और शासन का आर्थिक आधार कमजोर हो गया। योजनाओं के विफल हो जाने से प्रजा में बड़ा असन्तोष फैला और शासन के प्रति उसकी श्रद्धा तथा सहानुभूति कम हो गयी।
(5.) फीरोजशाह की दोषपूर्ण नीतियाँ
दिल्ली सल्तनत के लिये, फीरोजशाह तुगलक की नीतियां मुहम्मद बिन तुगलक से भी अधिक अहितकर सिद्ध हुईं। मुस्लिम प्रजा के प्रति फीरोज की उदारता तथा हिन्दू प्रजा के लिये फीरोज की धर्मान्धता मानवता की सीमा का उल्लघंन करती थी जो सल्तनत के लिए बड़ी अहितकर सिद्ध हुई।
सेनापतियों को नगद वेतन के स्थान पर जागीर प्रथा को पुनः मजबूत बनाना, लोगों को नौकरी देने के लिये गुलाम प्रथा को बढ़ावा देना, राज्य में उलेमाओं के हस्तक्षेप को बढ़ावा देना तथा सैनिक की नौकरी को वंशानुगत बनाना आदि दोषपूर्ण नीतियां सल्तनत की भीतरी शक्ति को खोखला बनाने के लिये पर्याप्त थीं।
(6.) फीरोज के अयोग्य उत्तराधिकारी
फीरोज की मृत्यु के उपरान्त कोई ऐसा योग्य सुल्तान न हुआ जो दिल्ली सल्तनत को छिन्न-भिन्न होने से बचा सकता।
(7.) उत्तराधिकार के अनिश्चित नियम
मुसलमानों में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। अतः प्रत्येक सुल्तान की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार के लिये अमीरों तथा शहजादों में संषर्ष आरम्भ हो जाता था। इन संघर्षों का सल्तनत के स्थायित्व पर बुरा प्रभाव पड़ता था।
(8.) दरबार में दलबन्दी
: मुस्लिम राज्य व्यवस्था में अमीर तथा उलेमा ही प्रायः नये सुल्तान का निर्वाचन करते थे। इन अमीरों तथा उलेमाओं में दलबन्दी का जोर रहता था। सुल्तान तथा सल्तनत पर प्रभाव स्थापित करने के लिये प्रायः इन दलों में खूनी संघर्ष होते थे तथा हत्याओं का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला चलता रहता था जो अंततः सुल्तान तथा सल्तनत के लिये घातक सिद्ध होता था।
(9.) धार्मिक असहिष्णुता
दिल्ली सल्तनत के अधिकतर सुल्तानों में धार्मिक असहिष्णुता कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने हिन्दुओं पर घनघोर अत्याचार किये। उनके मन्दिरों को तोड़ा तथा उन पर असह्य कर लगाये। इससे हिन्दुओं में सुल्तान तथा सल्तनत के प्रति घृणा का स्थाायी भाव बना रहा। हिन्दुओं को जब कभी अवसर मिलता था, वे विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे। शासन और प्रजा के बीच घृणा तथा विद्रोह की भावना का दिल्ली सल्तनत के स्थायित्व पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
(10.) अन्तर्जातीय विवाह
कुछ इतिहासकारों के विचार में अन्तर्जातीय विवाहों से मुसलमानों में वर्णसंकर प्रजा उत्पन्न हो गई। इससे मुसलमानों का भद्र समाज पतित हो गया। क्योंकि भारत की निम्न कोटि की जातियों ने ही अधिक संख्या में इस्लाम स्वीकार किया था जिनमें सामरिक प्रवृत्ति नहीं थी। इस कारण विदेशी मुसलमानों में भारतीय मुसलमानों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न नहीं हो सकी तथा मुसलमान भी दो वर्गों अर्थात् विदेशी मुसलमानों तथा भारतीय मुसलमानों में बंट गये। इस कारण सल्तनत की शक्ति क्षीण हो गई।
(11.) मंगोल आक्रमण
दिल्ली सल्तनत पर मंगोलों के आक्रमणों का घातक प्रभाव पड़ा। गुलाम वंश के शासन काल से ही दिल्ली सल्तनत पर मंगोलों के आक्रमण आरम्भ हो गये थे और वे निरन्तर चलते ही रहे।
तैमूर लंग का आक्रमण दिल्ली सल्तनत के लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ। उसने सल्तनत की जड़ों को हिला दिया। बाबर ने दिल्ली सल्तन को जड़ से उखाड़ फेंका और नये शासन की स्थापना की।
(12.) लोदी सुल्तानों की नीति
लोदी वंश के सुल्तानों ने जिस सामन्तीय नीति का अनुसरण किया, वह सल्तनत के लिए बड़ी घातक सिद्ध हुई। धीरे-धीरे भूमिपतियों की शक्ति इतनी बढ़ गई कि उन पर नियंत्रण रखना कठिन हो गया। अमीरों तथा सरदारों ने अपने स्वार्थ के लिए सल्तनत के हितों की उपेक्षा की। प्रान्तीय गवर्नरों के विद्रोहों से सल्तनत में अशांति फैल जाती थी। इन परिस्थितियों के सम्मिलित प्रभाव से दिल्ली सल्तनत का मंगोलों के हाथों समूल विनाश हो गया।
जब तुगलक शासकों के कमजोर पड़ जाने पर दिल्ली सल्तनत बिखरने लगी तो अफगानिस्तानी कबीलों के मुखियाओं में दिल्ली सल्तनत के प्रांतों को स्वतंत्र करने की होड़ मची जिससे प्रान्तीय राज्यों का उद्भव हुआ।
केन्द्रीय शक्ति का पराभव
तुगलकों के पराभव तथा मुगलों के उदय के बीच के काल में भारत में अनेक प्रान्तीय राज्यों का उद्भव हुआ। इसका मूल कारण केन्द्रीय शक्ति का कमजोर पड़ जाना था। मुहम्मद बिन तुगलक के समय से ही प्रांतपतियों पर केन्द्रीय शक्ति की पकड़ ढीली पड़ने लगी थी। कई प्रांतपति स्वयं को पूरी तरह स्वतंत्र करने में सफल रहे थे।
फीरोज तुगलक के समय यद्यपि सल्तनत के अधीन बचे हुए प्रांतपतियों ने विद्रोह नहीं किये किंतु उन पर केन्द्रीय शक्ति का भय लगभग समाप्त ही हो गया। केन्द्रीय शक्ति के पराभव के कारण, समूचा देश कई छोटे प्रांतीय राज्यों में विभक्त हो गया। इन राज्यों के कभी न खत्म होने वाले युद्धों, लूटमार तथा विध्वंसात्मक कार्यवाहियों से देश में अशान्ति एवं अव्यवस्था व्याप्त हो गई जिससे देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास को गहरा आघात लगा।
बाबर के भारत आगमन के समय प्रांतीय राज्य
बाबर ने अपने आत्मचरित ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) में लिखा है-
‘उन दिनों जब मैंने हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त की, यहाँ पर पाँच मुसलमान और दो काफिर बादशाह शासन करते थे। वे एक-दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखते थे। इस देश में उनके सिवा और भी बहुत से छोटे-छोटे राजा थे। वे राव और राजा के नाम से विख्यात थे। उनकी संख्या बहुत अधिक थी और वे थोड़े-थोड़े स्थानों के अधिकारी थे।
इन छोटे राजाओं में से अधिकांश पहाड़ियों पर रहा करते थे। पाँच मुसलमान बादशाहों में पहला था अफगान सुल्तान जिसकी राजधानी दिल्ली थी, दूसरा गुजरात में सुल्तान मुजफ्फर था, तीसरा मुस्लिम राज्य दक्षिण में बहमनी राज्य था, चौथी मुस्लिम बादशाहत मालवा में थी, पाँचवाँ बादशाह बंगाल में नुसरतशाह था। हिन्दुस्तान के काफिर राज्यों में विस्तार एवं सेना की अधिकता की दृष्टि से सबसे बड़ा विजयनगर का राजा है तथा दूसरा राणा सांगा है।’
बाबर ने प्रान्तीय राज्यों की पूरी सूची नहीं दी है किंतु उस समय भारत में काश्मीर, मुल्तान, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, आसाम मालवा, खानदेश, मेवाड़, मारवाड़, उड़ीसा आदि प्रांतीय राज्य प्रमुख थे। दक्षिण में विजयनगर और बहमनी राज्य थे जिनका दिल्ली सल्तनत से अब कोई राजनीतिक सम्पर्क नहीं था। समस्त राज्य अपनी-अपनी सीमाओं को बढ़ाने के लिये प्रायः पड़ौसी राज्यों से लड़ते रहते थे। इस कारण उनकी सीमाएँ निरन्तर घटती-बढ़ती रहती थीं।
बंगाल
बंगाल भारत के अत्यधिक समृद्ध प्रदेशों में से एक था। 1205 ई. में इख्तियारूद्दीन मुहम्मद-बिन-बख्तियार खिलजी ने बंगाल को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। यद्यपि वह कुतुबुद्दीन ऐबक के अधीन नहीं था किंतु उसने स्वयं को कुतुबुद्दीन के प्रति विश्वसनीय बनाये रखा। उसके बाद बंगाल पर फिर कभी हिन्दुओं का शासन नहीं हो सका।
बंगाल के स्वतंत्र शासक
दिल्ली से अत्यधिक दूर होने के कारण बंगाल के अधिकांश सूबेदारों ने केन्द्रीय सत्ता से सम्बन्ध विच्छेद कर अपनी स्वतन्त्र सत्ता की स्थापना के प्रयास किये। किसी भी सूबेदार के निर्बल होने की स्थिति में अन्य कोई भी ताकतवर व्यक्ति उसे पदच्युत करके सत्ता हथिया लेता था।
बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-
‘बंगाल की यह बड़ी विचित्र प्रथा है कि राज्य वंशागत अधिकार से बहुत कम प्राप्त होता है। बादशाह का अर्थ उसके राजतख्त से समझा जाता है। बंगाल वाले केवल तख्त तथा पद का सम्मान करते हैं।… जो कोई बादशाह की हत्या करके राजतख्त पर आरूढ़़ हो जाता है, वही बादशाह हो जाता है। बंगाल वालों का कथन है कि हम राजतख्त के भक्त हैं। जो कोई राजतख्त पर आरूढ़ होता है, हम उसके आज्ञाकारी बन जाते हैं।’
अलीमर्दा खाँ
इख्तियारूद्दीन खिलजी की मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार ने दिल्ली से सम्बन्ध-विच्छेद करने का प्रयत्न किया। अलीमर्दा खाँ ने लखनौती में स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया परन्तु स्थानीय खिलजी सरदारों ने उसे कैद करके कारागार में डाल दिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को शासक बना दिया।
अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा और दिल्ली पहुँच कर कुतुबुद्दीन ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। अलीमर्दा खाँ बंगाल का गवर्नर बना दिया गया। उसने ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और दिल्ली को वार्षिक कर देने के लिए उद्यत हो गया।
अलीमर्दा खाँ ने बंगाल पर बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन किया और कुतुबुद्दीन ऐबक के मरते ही अलाउद्दीन का विरुद धारण करके अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया।
गयासुद्दीन खिलजी
इल्तुतमिश के समय में हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने निर्विरोध इल्तुतमिश के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया।
इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट गया परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने 1226 ई. में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने के लिए भेजा। नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला।
नासिरुद्दीन महमूद
इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया। आगे चलकर जब नासिरुद्दीन दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसके पूरे शासन काल में लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में सात-आठ शासक हुए। नासिरुद्दीन दिल्ली की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में स्थायी रूप से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।
अलाउद्दीन जैनी
इल्तुतमिश ने 1230 ई. में पुनः बंगाल पर आक्रमण किया और फिर से बंगाल पर अधिकार करके अलाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। 1243 ई. में जाजनगर के राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया जिससे वहाँ पर बड़ी गड़बड़ी फैल गई।
तुगरिल खाँ
बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण कर दिया। इस पर जाजनगर के राजा ने तुगरिल खाँ का सामना किया तथा उसे परास्त कर दिया। तुगरिल खाँ ने बलबन से सहायता मांगी। इस पर बलबन को बंगाल में कार्यवाही करने का अवसर मिल गया। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा।
इस पर तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया। 1279 ई. में बलबन बीमार पड़ा। इससे प्रेरित होकर तुगरिल खाँ ने स्वयं को फिर से स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण की। उसने अपने नाम की मुद्रायें भी चलाई और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया।
तुगरिल खाँ के इस व्यवहार से सुल्तान को बड़ी चिन्ता हुई, उसने तुगरिल के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में सुल्तान अपने पुत्र बुगरा खाँ को साथ लेकर एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। तुगरिल खाँ भयभीत होकर अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में चला गया।
लखनौती पर सुल्तान का अधिकार स्थापित हो गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ पकड़ा गया। उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया और स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल खाँ के साथियों तथा सम्बन्धियों को भी कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक निरन्तर हत्याकाण्ड चलता रहा।
बुगरा खाँ
विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल खाँ की हुई थी।
बलबन की मृत्यु के बाद 1282 ई. में बुगरा खाँ ने बंगाल में एक नये वंश की स्थापना की जो दिल्ली से लगभग स्वतंत्र होकर शासन करता रहा। खिलजियों के समय में बंगाल स्वतंत्र राज्य बना रहा। अलाउद्दीन खलजी ने बंगाल पर कोई चढ़ाई नहीं की।
नासिरूद्दीन
गयासुद्दीन तुगलक के समय में बंगाल में शमसुद्दीन के तीन पुत्रों- शिहाबुद्दीन, गयासुद्दीन बहादुर तथा नासिरूद्दीन में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। इस झगड़े में गयासुद्दीन बहादुर को सफलता प्राप्त हुई। उसने अपने भाइयों शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन को लखनौती से मार भगाया और स्वयं को बंगाल का सुल्तान घोषित कर दिया।
शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। गयासुद्दीन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर बंगाल पर आक्रमण किया। बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन बहादुर ने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का सामना किया परन्तु परास्त हो गया और कैद कर लिया गया। गयासुद्दीन तुगलक ने नासिरूद्दीन को लखनौती का शासक बना दिया। इस प्रकार बंगाल पर फिर से दिल्ली सल्तनत का अधिकार स्थापित हो गया।
फखरूद्दीन
मुहम्मद बिन तुगलक के समय पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने 1337 ई. में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली साम्राज्य की दशा को देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। सुल्तान की असमर्थता के कारण बंगाल स्वतंत्र हो गया।
शम्सुद्दीन इलियास
1345 ई. में हाजी इलियास ‘शम्सुद्दीन इलियास’ के नाम से बंगाल का शासक बना। उसके काल में फीरोज तुगलक ने बंगाल को पुनः अधिकार में लाने का प्रयास किया किन्तु वह बंगाल को जीतने के बाद मुस्लिम स्त्रियों का करुण क्रंदन सुनकर बंगाल पर अपना अधिकार किये बिना ही लौट गया।
सिकन्दर
1357 ई. में इलियास की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दर बंगाल का सुल्तान बना। उसके समय में भी फीरोज तुगलक ने बंगाल पर आक्रमण किया परन्तु इस बार भी फिरोज को निराश होकर वापस दिल्ली लौटना पड़ा। सिकन्दरशाह ने अपनी नई राजधानी पंडुवा में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। उसके बाद गियासुद्दीन आजम सुल्तान बना। वह एक योग्य शासक था। 1410 ई. में उसकी मृत्यु के बाद सैफुद्दीन इम्जाशाह सुल्तान बना। वह एक निर्बल शासक सिद्ध हुआ।
गणेश तथा उसके वंशज
पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में एक हिन्दू राजा गणेश ने बंगाल के तख्त पर कब्जा कर लिया। गणेश के पुत्र जादू ने इस्लाम धर्म स्वीकार करके जलालुद्दीन मुहम्मद शाह की उपाधि धारण की। उसने 1431 ई. तक शासन किया। उसके बाद तीन-चार निर्बल शासकों ने बंगाल पर शासन किया।
नासिरूद्दीन
गणेश के निर्बल वंशजों के बाद नसिरूद्दीन बंगाल का सुल्तान बना जिसने 17 वर्ष तक बंगाल पर शासन किया।
विभिन्न शासक
1460 ई. में उसकी मृत्यु के बाद बारबकशाह सुल्तान बना। बारबकशाह के बाद शम्मसुद्दीन युसुफशाह ने 1481 ई. तक बंगाल पर शासन किया। उसके उत्तराधिकारी सिकन्दर द्वितीय को पदच्युत करके जलाजुद्दीन फतेहशाह नया सुल्तान बना परन्तु 1486 ई. में उसके हब्शी गुलामों के नेता बारबकशाह ने उसे मौत के घाट उतार कर तख्त पर कब्जा कर लिया। इसी प्रकार, 1490 ई. में एक अन्य हब्शी सिद्दी बद्र ने सुल्तान महमूदशाह द्वितीय को मौत के घाट उतार कर तख्त पर अधिकार कर लिया।
अलाउद्दीन हुसैनशाह
1493 ई. में अलाउद्दीन हुसैनशाह बंगाल का सुल्तान बना। उसके वंशजों ने लगभग 50 वर्ष तक बंगाल पर शासन किया। 1494 ई. में अलाउद्दीन ने जौनपुर के भगोड़े शासक हुसैन को अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया। इस कारण उसका सिकन्दर लोदी के साथ संघर्ष हो गया परन्तु अंत में दोनों पक्षों के मध्य सन्धि हो गई जिसके अनुसार बिहार की पूर्वी सीमा दोनों राज्यों के बीच की सीमा निश्चित कर दी गई। अलाउद्दीन हुसैनशाह ने उड़ीसा तक अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने मगध तथा कूच बिहार में स्थित कामतपुर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।
नासिरूद्दीन नुसरतशाह
1518 ई. में अलाउद्दीन हुसैनशाह की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र नासिरूद्दीन नुसरतशाह के नाम से तख्त पर बैठा। वह भी अपने पिता की भाँती भला तथा सफल शासक हुआ। उसने तिरहुत राज्य को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। नुसरतशाह को बंगला साहित्य और भवन-निर्माण में गहरी रुचि थी।
उसने बड़ी सोना मस्जिद और जामा मस्जिद का निर्माण करवाया और महाभारत का बंगला भाषा में अनुवाद करवाया। बाबरनामा के अनुसार बंगाल का यह मुसलमानी राज्य तत्कालीन हिन्दुस्तान में बड़ा शक्तिशाली और सम्मानित गिना जाता था। वी.ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘नुसरतशाह नाम अब भी समस्त बंगाल में सुपरिचित है।
उसके चौबीस वर्ष के शासनकाल में कोई विद्रोह अथवा उपद्रव नहीं हुआ। उसका शासन शान्तिपूर्ण तथा सुखमय रहा, प्रजा उससे प्रेम करती थी तथा पड़ौसी उसका सम्मान करते थे।’ बाबर के आक्रमण के समय यही नुसरतशाह बंगाल का सुल्तान था।
गुजरात
महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर को लूटकर अथाह सम्पत्ति प्राप्त की थी तब से हर मुसलमान शासक गुजरात को लूटने के लिए लालायित रहता था। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों द्वारा गुजरात पर कई आक्रमण किये गये। 1297 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिलाने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद लगभग एक शताब्दी तक गुजरात दिल्ली सल्तनत के अधीन बना रहा।
जफर खाँ
1391 ई. में नासिरुद्दीन मुहम्मद तुगलक ने जफर खाँ को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया। तैमूर के आक्रमण के समय जफर खाँ ने स्वयं को दिल्ली के प्रभुत्व से मुक्त कर लिया तथा मुजफ्फरशाह के नाम से गुजरात का स्वतंत्र शासक बन गया। मध्ययुगीन हिन्दू राज्यों की भाँति गुजरात के नये मुस्लिम राजवंश का इतिहास भी पड़ौसी राज्यों के विरुद्ध संघर्ष से भरा पड़ा है।
अहमदशाह
कुछ दिनों बाद मुजफ्फरशाह के नाती अहमदशाह ने उसे विष देकर मार डाला और स्वयं सुल्तान बन गया। उसने 1411 ई. से 1442 ई. तक शासन किया।
डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव अहमदशाह की गणना गुजरात के महानतम शासकों में करते हैं। उसने मालवा, असीरगढ़, राजस्थान तथा अन्य पड़ौसी राज्यों के विरुद्ध युद्ध लड़े और राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। अपने सम्पूर्ण राज्यकाल में उसने कभी हार नहीं खाई।
उसने अहमदाबाद के वैभवशाली नगर की नींव डाली। वह धर्मान्ध शासक था और अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा के साथ उसका व्यवहार असहिष्णुतापूर्ण था। उनके धार्मिक स्थलों एवं मूर्तियों को नष्ट करना उसके लिए सामान्य बात थी। उसकी मृत्यु के बाद तीन-चार निर्बल शासक हुए।
महमूद बेगड़ा
1458 ई. में अहमदशाह का एक पौत्र अब्दुल फतेह खाँ ‘महमूदशाह’ की उपाधि धारण करके गुजरात के तख्त पर बैठा। इतिहास में वह ‘महमूद बेगड़ा’ के नाम से विख्यात है। वह वीर, योद्धा, महान् विजेता तथा सफल शासक था। उसने 53 वर्ष तक शासन किया। उसने चम्पानेर, बड़ौदा, जूनागढ़, कच्छ आदि कई क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया।
भारतीय शासकों में वह पहला शासक था जिसने विदेशी शक्तियों की बढ़ती सामुद्रिक शक्ति के खतरे को गम्भीरता से महसूस किया और तुर्की तथा कालीकट के हिन्दू राजा के साथ मिलकर 1507 ई. में चौल बन्दरगाह के निकट पुर्तगालियों को पराजित किया।
1509 ई. में पुर्तगालियों ने ड्यू के निकट गुजरात और कालीकट की संयुक्त सेना को परास्त कर भारतीय समुद्र पर पुनः अपना दबदबा कायम कर लिया। 1509 ई. में महमूद बेगड़ा की मृत्यु हो गई। एक मुस्लिम इतिहासकार ने उसके बारे में लिखा है- ‘उसने गुजरात राज्य के प्रताप तथा ऐश्वर्य की वृद्धि की, वह अपने से पहले और बाद के समस्त सुल्तानों में श्रेष्ठ है।’
मुजफ्फरशाह (द्वितीय)
बेगड़ा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुजफ्फरशाह (द्वितीय) सुल्तान बना। उसने मेदिनीराय को परास्त करके महमूद खलजी को पुनः मालवा के तख्त पर बैठाया। इसलिये उसे महाराणा सांगा से युद्ध करना पड़ा जिसमें मुजफ्फरशाह परास्त हुआ। अप्रैल 1526 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
निर्बल शासक
मुजफ्फरशाह (द्वितीय) के बाद सिकन्दर और महमूद (द्वितीय) नामक अयोग्य एवं निर्बल शासक हुए जिससे गुजरात में अशान्ति फैल गई और राज्य शक्ति भी कमजोर हो गई।
बहादुरशाह
जुलाई 1526 में मुजफ्फरशाह (द्वितीय) का एक अन्य पुत्र बहादुरशाह सुल्तान बना। वह योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने गुजरात को पुनः सबल बनाया तथा देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। बाबर के आक्रमण के समय बहादुरशाह ही गुजरात पर शासन कर रहा था।
मालवा
1310 ई. में अलाउद्दीन खलजी ने मालवा को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। तैमूर के आक्रमण के समय यह प्रदेश दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र हो गया और मालवा का सूबेदार दिलावर खाँ गोरी स्वतन्त्र शासक बन गया।
गोरी वंश: गोरी खाँ तथा उसके वंशजों ने 1401 ई. से 1436 ई. तक मालवा पर शासन किया। उसका वंश गोरी वंश कहलाता है। 1406 ई. में दिलावर खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलपखाँ, हुसंगशाह के नाम से मालवा का सुल्तान बना। वह वीर, साहसी पराक्रमी तथा साहसी शासक था।
उसने उड़ीसा, दिल्ली, गुजरात, जौनपुर तथा बहमनी राज्यों के विरुद्ध युद्ध किये परन्तु इन युद्धों से मालवा को विशेष लाभ नहीं हुआ। उसने माण्डू को अपनी राजधानी बनाया। माण्डू दुर्ग-रक्षित नगर था तथा एक ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ था। अब उसके केवल भग्नावशेष बचे हैं, जो सुन्दर जामी मस्जिद, हिंडोला महल, जहाज महल, हुसंग का मकबरा, बाजबहादुर तथा रूपमती के महल तथा अन्य सुन्दर भवनों के लिए विख्यात हैं।
1435 ई. में हुसंगशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गाजी खाँ ‘महमूदशाह’ के नाम से मालवा का सुल्तान हुआ। वह एक अयोग्य शासक था। उसमें अपने प्रतिद्वंद्वियों का सामना करने की शक्ति नहीं थी।
खलजी वंश
1436 ई. में सुल्तानद महमूदशाह गोरी को उसके वजीर महमूद खाँ खलजी ने जहर देकर मार डाला और मालवा के तख्त पर अधिकार कर लिया। महमूद खाँ खलजी ने 33 वर्ष शासन किया। उसका वंश खिलजी वंश कहलाता है। उसके वंशजों ने 1531 ई. तक मालवा पर शासन किया।
महमूद खाँ खलजी का अधिकांश समय गुजरात, दिल्ली, बहमनी और मेवाड़ के शासकों से लड़ने में व्यतीत हुआ। इतिहासकार श्रीराम शर्मा के शब्दों में- ‘सम्भवतः ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो जबकि वह युद्ध क्षेत्र में न उतरा हो। इसलिये उसका शिविर उसका घर तथा युद्ध भूमि उसका विश्रामगृह बन गई।’
परिणामस्वरूप उसके राज्य की सीमाएँ दक्षिण में सतपुड़ा तक, पश्मिच में गुजरात की सीमाओं तक, पूर्व में बुन्देलखण्ड तक और उत्तर में मेवाड़ तथा बून्दी राज्य तक जा पहुँची। सुल्तान महमूद विनम्र, वीर, न्यायप्रिय तथा विद्वान शासक था। उसके शासनकाल में हिन्दू तथा मुसलमान समस्त जनता सुखी थी और एक-दूसरे के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करती थी।
1469 ई. में सुल्तान महमूद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गियासुद्दीन के नाम से मालवा के तख्त पर बैठा। वह अत्यधिक भोग-विलासी था। उसके हरम में लगभग 15,000 स्त्रियां थी। 1500 ई. में उसी के पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार डाला और तख्त पर अधिकार कर लिया। वह भी अपने पिता की तरह व्याभिचारी तथा प्रजा पीड़क था।
1510 ई. में एक दिन मदिरा के नशे में एक झील में गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र महमूद (द्वितीय) मालवा का सुल्तान बना। उसके समय में मालवा शीघ्रता से पतन की ओर अग्रसर हुआ। उसके हिन्दू प्रधानमंत्री को मुसलमान अमीरों ने मार डाला। उसका दूसरा मंत्री मुहाफिज खाँ, जो खाण्डू का सूबेदार भी था, अत्याचारी निकला।
इस कारण चारों ओर से विद्रोह फूट पड़े। शीघ्र ही मालवा में तीन सुल्तान हो गये जिन्होंने एक-दूसरे को चुनौती दी। अन्त में, चन्देरी के मेदिनीराय की सहायता से महमूद (द्वितीय) को अपने प्रतिद्वन्द्वियों को मार भगाने में सफलता मिली परन्तु उसे इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ा।
अब शासन पर मेदिनीराय का वास्तविक अधिकार हो गया। उसने राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने विश्वस्त हिन्दुओं को नियुक्त किया जिसके कारण से मालवा के स्थानीय मुस्लिम सरदारों में जबरदस्त असंतोष उत्पन्न हुआ। उन्होंने गुजरात के मुस्लिम सुलतान से साँठ-गाँठ करके मेदिनीराय को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया परन्तु मेदिनीराय ने मेवाड़ के महाराणा सांगा से सहयोग लेकर गुजरात एवं मालवा के विद्रोही मुस्लिम सरदारों की सेनाओं को परास्त करके खदेड़ दिया।
मालवा का सुल्तान बन्दी बना लिया गया। महाराणा सांगा ने उदारता दिखाते हुए कुछ दिनों बाद सुल्तान महमूद (द्वितीय) को रिहा कर उसका राज्य भी उसे वापस लौटा दिया। 1531 ई. में गुजरात के बहादुरशाह ने मालवा को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। महमूद तथा उसके पुत्रों को चम्पानेर में बंदी बनाकर रखने का आदेश दिया गया परन्तु मार्ग में ही उनका वध कर दिया गया। इस प्रकार प्रांतीय राज्य मालवा की स्वतंत्र सत्ता का अंत हो गया।
खानदेश
फीरोजशाह तुगलक के समय में मध्य भारत में ताप्ती नदी की घाटी में स्थित खानदेश दिल्ली का एक सूबा था।
मलिक राजा फारूकी
फिरोजशाह तुगलक ने मलिक राजा फारूकी को खानदेश का सूबेदार नियुक्त किया। फीरोजशाह की मृत्यु के बाद केन्द्रीय सत्ता के कमजोर पड़ते ही फारूकी ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद कर लिये तथा स्वयं को खानदेश का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। कुछ समय बाद ही उसे गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह (प्रथम) से युद्ध करना पड़ा जिसमें वह परास्त हुआ। 1399 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
मलिक नासिर
मलिक राजा फारूकी के बाद उसका लड़का मलिक नासिर सुल्तान बना। उसने असीरगढ़ को जीता किन्तु उसे गुजरात के सुल्तान अहमदशाह से परास्त होकर उसकी प्रभुसत्ता को स्वीकार करना पड़ा। बहमनी सुल्तान के हाथों भी उसे पराजय का स्वाद चखना पड़ा। 1438 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसके दो उत्तराधिकारी अयोग्य निकले।
आदिल खाँ (द्वितीय)
1457 ई. में आदिल खाँ (द्वितीय) खानदेश का सुल्तान बना। वह योग्य तथा पराक्रमी शासक था। उसने एक तरफ तो गोंडवाना को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधारों को लागू कर शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।
दाऊद
1501 ई. में आदिल खाँ (द्वितीय) की मृत्यु के बाद उसका भाई दाऊद खानदेश का सुल्तान बना परन्तु 1508 ई. में उसका देहान्त हो गया और उसका पुत्र गाजी खाँ खानदेश का सुल्तान बना परन्तु एक सप्ताह बाद ही उसे जहर देकर मार दिया गया।
आदिल खाँ (तृतीय)
दाऊद की मृत्यु के बाद खानदेश के तख्त के दो दावेदार उठ खड़े हुए। एक दावेदार का पक्ष अहमदनगर के सुल्तान ने लिया तो दूसरे दावेदार का समर्थन गुजरात के सुल्तान ने किया। अन्त में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा समर्थित दावेदार आदिल खाँ (तृतीय) के नाम से खानदेश का शासक हुआ। उसे गुजरात के करद शासक की भाँति शासन करना पड़ा।
महमूद (प्रथम)
1520 ई. में आदिल खाँ (तृतीय) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूद (प्रथम) सुल्तान बना। वह भी गुजरात की अधीनता में रहा। उसमें न तो शक्ति थी और न योग्यता।
डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘दिल्ली से दूर होने तथा इसकी आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण इस युग की राजनीति में खानदेश का कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रहा।’
काश्मीर
कश्मीर में 1399 ई. तक हिन्दू शासक का शासन था। 1399 ई. में काश्मीर के हिन्दू शासक रामचन्द्र की उसके मन्त्री शाह मिर्जा ने हत्या कर दी और स्वयं स्वतंत्र शासक बन गया।
जैनुलओबेदीन
शाह मिर्जा के वंश में 1420 ई. में जैनुलओबेदीन नामक शासक हुआ जो अपने पूर्ववर्ती शासकों की अपेक्षा अधिक उदार और धर्म सहिष्णु शासक था। जैनुलओबेदीन के अन्य राज्यों के मुसलमान बादशाहों और हिन्दू राजाओं के साथ अच्छे सम्बन्ध थे। उसने हिन्दू जनता पर से जजिया कर हटा दिया तथा गौ-वध का निषेध कर दिया।
वह काश्मीरी, फारसी, हिन्दी और तिब्बती भाषाओं का विद्वान था। उसने महाभारत तथा राजतरंगिणी नामक संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद कराया। अनेक फारसी ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद कराया। उसने अपने राज्य में शान्ति एवं व्यवस्था कायम की तथा जनता पर करों का बोझ कम किया। उसके शासन काल में काश्मीर की असाधारण भौतिक उन्नति हुई। 1470 ई. में जैनुलओबेदीन की मृत्यु हो गई।
हैदरशाह
जैनुलओबेदीन के बाद उसका पुत्र हैदरशाह काश्मीर का सुल्तान बना। उसने अपने पिता की धर्म सहिष्णु नीतियों को जारी रखा।
हैदरशाह के उत्तराधिकारी
हैदरशाह के उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य निकले। परिणामस्वरूप काश्मीर में अराजकता फैल गई और मुस्लिम सरदार अनेक गुटों में बँट गये। सुल्तान इन सरदारों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया। दिल्ली से बहुत दूर स्थित होने और साथ ही आन्तरिक अवस्था बिगड़ी हुई होने के कारण उत्तरी भारत की राजनीति में काश्मीर कोई विशेष भूमिका अदा नहीं कर पाया।
मिर्जा हैदर
1540 ई. में मुगल बादशाह हुमायूं के एक सम्बन्धी मिर्जा हैदर ने काश्मीर पर अधिकार जमा लिया परन्तु एक दशक के बाद ही काश्मीरी सरदारों ने उसे पदच्युत कर दिया। अन्त में 1586 ई. में मुगल बादशाह अकबर ने काश्मीर को जीतकर मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।
जौनपुर
1359-60 ई. में फीरोज तुगलक ने इस नगर की नींव डाली थी। गोमती नदी पर स्थित यह नगर शीघ्र ही उन्नति पर पहुँच गया और कुछ समय के लिये तो दिल्ली के बराबर स्तर पर आ गया।
मलिक सरवर: जौनपुर के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक मलिक सरवर, फीरोज तुगलक के पुत्र सुल्तान मुहम्मद का गुलाम था जो अपनी योग्यता से 1389 ई. में सल्तनत का वजीर बना। सुल्तान मुहम्मद ने उसे ‘मलिक-उस-शर्क’ (पूर्व का स्वामी) की उपाधि से विभूषित किया। 1394 ई. में उसे दोआब का विद्रोह दबाने के लिए भेजा गया।
उसने उस विद्रोह को ही नहीं दबाया अपितु अलीगढ़ से लेकर बिहार में तिरहुत तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अपना अधिकार कर लिया। उसने इस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था कायम की तथा अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाया। यद्यपि उसने स्वयं को कभी सुल्तान घोषित नहीं किया किंतु वह एक स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार करने लगा।
तैमूर के आक्रमण के समय उसने अपने स्वामी सुल्तान महमूद को कोई सहायता नहीं भेजी। 1399 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसके पीछे उसका वंश शर्की-वंश कहलाया।
मुबारकशाह
मलिक सरवर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुबारकशाह जौनपुर के तख्त पर बैठा। उसने सुल्तान की उपाधि धारण की और अपने नाम का खुतबा भी पढ़वाया। सुल्तान महमूद के वजीर मल्लू इकबालखाँ ने जौनपुर को जीतने का अथक प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। 1402 ई. में मुबारकशाह की मृत्यु हो गई।
इब्राहीमशाह
मुबारकशाह का उत्तराधिकारी इब्राहीमशाह शर्की वंश का महानतम शासक हुआ। उसने 35 वर्ष राज्य किया। उसके समय में दिल्ली और जौनपुर के सम्बन्धों में कटुता आ गई। सैय्यद सुल्तानों के साथ भी उसके सम्बन्ध खराब रहे। इसका मुख्य कारण दोनों राज्यों की विस्तारवादी नीति थी।
इब्राहीमशाह ने बंगाल को जीतने का प्रयास किया परन्तु उसे कोई सफलता नहीं मिली। इब्राहीमशाह सांस्कृतिक दृष्टि से जौनपुर को उन्नति की ओर ले जाने में सफल रहा। उसके समय में जौनपुर उत्तरभारत का एक महान् सांस्कृतिक केन्द्र बन गया। उसने विद्वानों को उदारतापूर्वक आश्रय प्रदान किया जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। इब्राहीमशाह ने अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। 1440 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
महमूदशाह
इब्राहीमशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूदशाह सुल्तान बना। उसे चुनार का दुर्ग जीतने में सफलता मिली परन्तु वह कालपी दुर्ग को जीतने में असफल रहा। उसने दिल्ली पर भी आक्रमण किया परन्तु कालपी दुर्ग को जीतने में असफल रहा। बहलोल लोदी ने उसे परास्त करके खदेड़ दिया। महमूदशाह के इस कृत्य से दिल्ली और जौनपुर की प्रतिद्वन्द्विता और भी अधिक तीव्र हो गई।
मुहम्मदशाह
महमूदशाह के बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह सुल्तान बना। उसके समय में भी दिल्ली और जौनपुर का संघर्ष जारी रहा।
हुसैनशाह
कुछ समय बाद मुहम्मदशाह के भाई ने उसकी हत्या करवा दी और वह स्वयं हुसैनशाह के नाम से तख्त पर बैठा। उसके समय में बहलोल लोदी ने जौनपुर पर जोरदार आक्रमण किया। 1479 ई. में हुसैनशाह बुरी तरह परास्त होकर बिहार की ओर भाग गया। बहलोल लोदी ने जौनपुर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।
बारबकशाह
इस प्रकार दिल्ली सल्तनत से अलग होने के 75 वर्ष बाद जौनपुर पुनः दिल्ली सल्तनत का सूबा बन गया। बहलोल लोदी ने जौनपुर का भाग अपने बड़े पुत्र बारबकशाह को सौंप दिया। बहलोल की मृत्यु के बाद उसका तीसरा पुत्र निजामखाँ ‘सिकन्दरशाह’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा।
इस अवसर पर जौनपुर के शासक बारबकशाह ने दिल्ली की अधीनता मानने से मना कर दिया परन्तु सिकन्दर ने उसे पराजित करके दिल्ली के अधीन किया। बारबकशाह अयोग्य निकला और जौनपुर में विद्रोह उठ खड़ा हुआ। अन्त में सिकन्दर लोदी ने विद्रोह का दमन किया और जौनपुर में एक नये सूबेदार को नियुक्त किया। बारबकशाह को कारागार में डाल दिया गया।
जलाल
सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस अवसर पर इब्राहीम के भाई शहजादा जलाल ने अपने आपको जौनपुर-कालपी का सुल्तान घोषित कर दिया। अतः भाई-भाई में युद्ध छिड़ गया। अन्त में, इब्राहीम लोदी विजयी रहा। उसने जौनपुर के स्वतंत्र शासक की हत्या करवा दी।
सिन्ध और मुल्तान
712 ई. में मुहम्मद-बिन-कासिम ने सिन्ध के हिन्दू राज्य पर विजय प्राप्त की थी। 1110 ई. में महमूद गजनवी ने इस प्रदेश को अपने राज्य में मिला लिया। मुहम्मद गोरी और इल्तुतमिश ने भी इस राज्य पर विजय प्राप्त की किंतु उनका अधिकार स्थायी नहीं रहा तथा सूमड़ा राजपूतों ने इस प्रदेश पर अधिकार कर इस्लाम धर्म को अपना लिया।
फीरोज तुगलक ने यद्यपि उन्हें अपने अधीन किया था किन्तु तैमूर के आक्रमण के बाद वे पुनः स्वतंत्र हो गये। इसी समय मुल्तान का प्रान्त भी दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया था। बलूचियों ने जो लंगा कहलाते थे, वहाँ एक नये राजवंश की स्थापना कर ली। लोदी शासकों ने उन्हें अपनी अधीनता में लाने का प्रयास किया परन्तु वे असफल रहे।
जब बाबर ने कन्धार के शासक शाहबेग अरघुन को परास्त कर कन्धार पर अधिकार कर लिया तो शाहबेग भागकर सिन्ध की तरफ आ गया। इन दिनों सिन्ध और मुल्तान के मध्य संघर्ष चल रहा था। अवसर का लाभ उठाते हुए शाहबेग ने सिन्ध के शासक जाम फीरोज को पराजित कर सिन्ध पर अधिकार जमा लिया।
उसके उत्तराधिकारी शाह हुसैन अरघुन ने लंगाओं को परास्त करके मुल्तान को जीत लिया। बाबर के आक्रमण के समय शाह हुसैन का राज्य पूरी तरह संगठित नहीं हो पाया था।
मेवाड़
पन्द्रवीं सदी के अन्त तथा सोलहवीं सदी के आरम्भ में राजस्थान में तीन प्रमुख स्वतंत्र राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़ और आम्बेर। इन तीनों राज्यों ने उत्तर भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। छठी शताब्दी में गुहिल नामक योद्धा ने मेवाड़ राज्य की स्थाना की। राजा समरसिंह के समय में मेवाड़ की सीमाओं का काफी विस्तार हुआ।
1303 ई. में अलाउद्दीन खलजी ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को जा घेरा। घमासान युद्ध में मेवाड़ का शासक राणा रतनसिंह पराजित होकर मारा गया तथा उसकी रानी पड्डिनी ने अन्य राजपूत ललनाओं के साथ जौहर किया। अलाउद्दीन खलजी की मृत्यु के बाद गुहिल वंशी राणा हम्मीर ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
मेवाड़ के शासकों में महाराणा कुम्भा सर्वाधिक प्रतापी शासक हुआ। उसने न केवल विरासत में प्राप्त राज्य की रक्षा की अपितु उत्तर और पूर्व में उसकी सीमाओं का विस्तार भी किया। कुम्भा का महत्त्व इस बात में है कि अपने समय के शक्तिशाली मालवा और गुजरात के सुल्तानों तथा मारवाड़ के राठौड़ों के निरन्तर आक्रमणों के विरुद्ध लड़ते हुए न केवल अपने राज्य को सुरक्षित रखा अपितु उसका विस्तार भी किया।
वह एक प्रजापालक एवं वीर शासक था। वह विद्वानों, साहित्यकारों एवं कलाकारों का आश्रयदाता था और स्वयं भी अच्छा विद्वान तथा श्रेष्ठ संगीतकार था। 1468 ई. में उसके पुत्र ऊदा (उदयकरण अथवा उदयसिंह) ने उसकी हत्या कर दी। मेवाड़ के सरदारों ने पितृघाती ऊदा के स्थान पर कुम्भा के छोटे पुत्र रायमल को तख्त पर बैठाया।
रायमल ने 1509 ई. तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद उसका तीसरा पुत्र संग्रामसिंह जो इतिहास में राणा सांगा के नाम से विख्यात है, मेवाड़ का शासक बना। भारत के इतिहास में महाराणा सांगा का विशिष्ठ स्थान है। उसे अन्तिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है।
गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है- ‘गुजरात, मालवा तथा दिल्ली के सुल्तानों को परास्त करके उसने राणा कुम्भा के आरम्भ किये हुए कार्य को आगे बढ़ाया।’
बाबर ने भी लिखा है- ‘राणा सांगा अपनी शूरवीरता तथा तलवार के बल पर बहुत शक्तिशाली हो चुका था। मालवा, गुजरात और दिल्ली का कोई सुल्तान अपने ही बलबूते पर उसे पराजित करने की स्थिति में नहीं था। उसका मुल्क 10 करोड़ की आमदनी का था। उसकी सेना में एक लाख सवार थे। उसके साथ 7 राजा, 9 राव और 104 छोटे सरदार रहा करते थे।’
राणा सांगा अपने युग का सर्वाधिक शक्तिशाली हिन्दू शासक था। राजपूताने के राजा, राव तथा रावल उसके नेतृत्व को स्वीकार करते थे। उसने उत्तरी भारत की राजनीति में सक्रिय भाग लेकर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। बाबर ने भी दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के विरुद्ध राणा सांगा से सहयोग माँगा था और अंत में बाबर को भारत पर अधिकार करने के लिये सांगा से ही खानवा के मैदान में निर्णायक युद्ध लड़ना पड़ा था।
मारवाड़
राजस्थान का दूसरा महत्त्वपूर्ण राज्य मारवाड़ का था। यहाँ पर कन्नौज से आये गहड़वाल वंशी राठौड़ राजपूतों का शासन था जो मुहम्मद गौरी द्वारा कन्नौज के राजा जयचंद को मार दिये जाने के बाद कन्नौज छोड़कर मरुस्थल में आ गये थे। उन्होंने बहुत छोटे से राज्य से शुरुआत करके अपने राज्य को काफी विस्तृत कर लिया था।
राणा कुम्भा के शासन के आरम्भ में मारवाड़ का राव रणमल अपने कई सरदारों एवं सैनिकों के साथ चित्तौड़ में ही था। मेवाड़ी और मारवाड़ी सामन्तों के द्वेष के चलते मेवाड़ी सरदारों ने एक रात्रि में अचानक रणमल तथा उसके राठौड़ सरदारों को मौत के घाट उतार दिया। रणमल का पुत्र जोधा अपने 700 सैनिकों के साथ किसी प्रकार मेवाड़ से भाग निकला।
इस जघन्य नरसंहार के बाद मेवाड़ी सेना ने मारवाड़ राज्य पर भी अधिकार जमा लिया परन्तु 1453 ई. के आस-पास जोधा अपने पैतृक राज्य से मेवाड़ की सेना को खदेड़ने तथा उस पर अपना अधिकार जमाने में सफल रहा। 1459 ई. में उसने मारवाड़ की तत्कालीन राजधानी मण्डौर से 6 मील की दूरी पर स्थित एक पहाड़ी पर जोधपुर के प्रसिद्ध दुर्ग की नींव डाली और जोधपुर नगर बसाया। तब से यही जोधपुर नगर मारवाड़ राज्य की राजधानी बन गया।
राव जोधा एक पराक्रमी एवं महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने आस-पास के क्षेत्रों को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। कुम्भा की मृत्यु के बाद उसने अजमेर और सांभर पर भी अधिकार कर लिया। उसके एक पुत्र बीकाजी ने अपने लिए एक पृथक् राज्य बीकानेर की स्थापना की।
उसके उत्तराधिकारी सातल ने जैसलमेर राज्य से कुन्थल का क्षेत्र छीन लिया। सातल के उत्तराधिकारी सूजा ने बाड़मेर, कोटड़ा और जैतारण के क्षेत्रों को जीतकर जोधपुर राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। 1515 ई. में राव सूजा की मृत्यु के बाद उसका पौत्र गांगा मारवाड़ का शासक बना। दिल्ली सल्तनत पर इस समय इब्राहीम लोदी का शासन था और मेवाड़ पर राणा सांगा का शासन था।
राव गांगा ने राणा सांगा के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाये रखे और सांगा के कई अभियानों में सहयोग दिया। खानवा के युद्ध के समय भी गांगा ने अपने पुत्र मालदेव को सेना सहित सांगा की सहायता के लिये भेजा था। उस समय राजपूताना के अधिकांश राज्य मेवाड़ के राणा सांगा के नेतृत्व को स्वीकार करते थे और उसी के आदेशानुसार चलते थे। माना जाता है कि सांगा देश से म्लेच्छों को बाहर निकालकर हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता था तथा राजपूताना के लगभग समस्त हिन्दू नरेश इस कार्य में उसकी सहायता कर रहे थे।
आम्बेर
आम्बेर कछवाहा राजपूतों का राज्य था। बारहवीं सदी में नरवर के राजकुमार दूलहराय ने, ढूंढाड़ क्षेत्र में शासन कर रहे बड़गूजरों को परास्त करके दौसा तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों को जीत लिया तथा कछवाहा राज्य की नींव रखी। उसके एक वंशज काकिल देव ने मीणों को परास्त कर आम्बेर पर अपना अधिकार जमाया और आम्बेर को अपनी राजधानी बनाया।
कछवाहों को बारहवीं सदी में कुछ समय के लिए चौहानों के सामन्तों के रूप में शासन करना पड़ा। सोलहवीं शताब्दी में आम्बेर नरेश चन्द्रसेन का पुत्र पृथ्वीराज कच्छवाहा, महाराणा सांगा का सामन्त था। उसने खानवा के युद्ध में मुगलों के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया।
उड़ीसा
उड़ीसा का विशाल हिन्दू राज्य गंगा के डेल्टा से गोदावरी के मुहाने तक फैला हुआ था। राज्य का पहला शक्तिशाली शासक अनन्तवर्मन (1076-1148 ई.) हुआ। उसने पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था। इस वंश का शासक नरसिंह प्रथम (1238-64 ई.) भी पराक्रमी शासक हुआ।
उसने तुर्कों के आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया और अपने राज्य की रक्षा की परन्तु उसके बाद उसके वंश का पतन आरम्भ हो गया। 1434 ई. के आस-पास कपिलेन्द्र ने बहमनी और विजयनगर के आक्रमणों से अपने राज्य की सफलतापूर्वक रक्षा की। 1407 ई. के आस-पास पुरुषोत्तम उड़ीसा का शासक बना।
अपने शासन के प्रारम्भ में उसे पराजयों का सामना करना पड़ा। विजयनगर राज्य ने कृष्णा नदी के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया तो बहमनी राज्य ने गोदावरी-कृष्णा दोआब छीन लिया किन्तु पुरुषोत्तम ने अपने शासन के अन्तिम वर्षों में बहमनी राज्य से दोआब का क्षेत्र पुनः छीन लिया। उसने विजयनगर से भी गुंटूर जिले तक का क्षेत्र वापस जीत लिया।
1497 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र प्रतापरुद्र शासक बना। उसने 1540 ई. तक शासन किया। वह चैतन्य महाप्रभु का शिष्य बन गया और राज्य की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाया। विजयनगर ने उड़ीसा राज्य पर कई आक्रमण किये तथा गोदावरी के दक्षिण के समस्त भाग पर अधिकार कर लिया। गोलकुण्डा के सुल्तान ने भी उड़ीसा पर आक्रमण किया और लूटमार में काफी धन-सम्पदा ले गया।
इस प्रकार, उड़ीसा राज्य शक्तिहीन होता चला गया और 1568 ई. में बंगाल के सुल्तान ने इसे अपने राज्य में मिला लिया। दिल्ली से दूर स्थित होने के कारण इस राज्य का उत्तर भारत की राजनीति में कोई प्रभाव नहीं था किन्तु इसने लम्बे समय तक बहमनी और बंगाल की शक्ति को विस्तारित होने से अवश्य रोके रखा। दिल्ली का कोई भी सुल्तान उड़ीसा पर स्थायी नियंत्रण नहीं रख पाया।
कामरूप
तेरहवीं सदी के प्रारम्भ में ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी में अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य थे जिनमें कामरूप का राज्य अधिक महत्त्वपूर्ण था। उस युग में इसे कामत राज्य कहा जाता था। इसके पूर्व में अहोमों का आसाम राज्य था तो पश्चिम में बंगाल के सुल्तानों का राज्य था।
पन्द्रवी सदी में खैनवंश ने इस राज्य पर अधिकार कर लिया और कामतपुर को अपनी राजधानी बनाया। 1498 ई. में बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैनशाह ने इस वंश के अन्तिम शासक नीलाम्बर को पदच्युत कर दिया परन्तु 1515 ई. में कूच जाति का विषसिंह कामरूप का राजा बन बैठा।
इस वंश में नरनारायण एक योग्य शासक हुआ परन्तु पारिवारिक कलह के कारण् उसे राज्य का विभाजन करना पड़ा और एक भाग अपने भतीजे रघुदेव को देना पड़ा। इससे दोनों ही राज्यों की शक्ति कमजोर हो गई। कामरूप का पश्चिमी भाग मुसलमानों ने हड़प लिया और पूर्वी भाग अहोमों ने छीन लिया।
आसाम
तेरहवीं सदी के आरम्भ में अहोमों ने आसाम पर अधिकार कर लिया था। ये लोग शान जाति के थे। अहोमों ने लगभग 600 वर्षों तक आसाम पर शासन किया। उन्होंने लम्बे समय तक बंगाल के सुल्तानों को पूर्व की ओर बढ़ने से रोका परन्तु जब अहोमों ने कामरूप के एक भाग को जीत लिया तो बंगाल की सीमाएँ आसाम से जा मिलीं और बंगाल के सुल्तानों के आक्रमणों का मार्ग खुल गया। अहोमों ने वीरता के साथ उनके आक्रमणों का सामना किया और अपने राज्य की स्वतंत्रता को बनाये रखा।
मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अन्तिम भाग में दिल्ली साम्राज्य का विशृंखलन आरम्भ हो गया और प्रान्तीय गवर्नर स्वतंत्र होने लगे। इसी अशान्ति के बीच, दक्षिण भारत में ‘सादा अमीरों’ (विदेशी अमीरों) ने हसन कांगू के नेतृत्व में विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया और दौलताबाद में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।
हसन कांगू ने ‘अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह’ की उपाधि धारण की तथा अपने राज्य का नाम बहमनी राज्य रखा। 1347 ई. से 1527 ई. तक इस वंश में 14 शासक हुए जिनमें अलाउद्दीन हसन बहमनशाह (1347 से 1358 ई.), मुहम्मद शाह प्रथम (1358 से 1375 ई.), मुहम्मद द्वितीय (1378 से 1397 ई.) ताजुद्दीन फिरोजशाह (1397 से 1422 ई.), अहमदशाह प्रथम (1422 से 1435 ई.) और अलाउद्दीन द्वितीय (1435-1457 ई.) अधिक प्रसिद्ध हुए।
इनमें से मुहम्मद (द्वितीय) को छोड़कर समस्त सुल्तान क्रूर और धर्मान्ध थे। इस कारण उनका अपने पड़ौसी विजयनगर के हिन्दू राज्य से निरन्तर संघर्ष चलता रहा। फलस्वरूप राज्य की आन्तरिक स्थिति बिगड़ती चली गई। अन्त में सम्पूर्ण राज्य पाँच राज्यों- बीजापुर, गोलकुण्डा, बरार, बीदर और अहमदनगर में विभाजित हो गया।
ये पाँचों राज्य भी पारस्परिक द्वेष एवं संघर्ष के कारण कमजोर होते चले गए। बाबर के आक्रमण के समय इन राज्यों में अव्यवस्था फैली हुई थी।
बहमनी नाम क्यों पड़ा ?
ब्राह्मणी राज्य की अवधारणा
हसन कांगू ने अपने राज्य को बहमनी नाम क्यों दिया, इस सम्बन्ध में अलग-अलग मान्यतायें हैं। फरिश्ता का कहना है कि हसन पहले दिल्ली के गंगा नामक एक ब्राह्मण ज्योतिषी के यहाँ नौकर था। एक दिन अपने स्वामी का खेत जोतते समय हसन को स्वर्ण-मुद्राओं से भरा हुआ एक पात्र मिला।
हसन ने वह पात्र अपने स्वामी को दे दिया। ब्राह्मण हसन की ईमानदारी तथा स्वामि-भक्ति से बहुत प्रसन्न हुआ। उस ब्राह्मण का सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से परिचय था। ब्राह्मण ने सुल्तान से हसन की प्रशंसा की। सुल्तान ने हसन की ईमानदारी से प्रभावित होकर उसे राज्य में नौकरी दे दी।
ज्योतिषी ने हसन के राजा बनने की भविष्यवाणी की और उससे वचन लिया कि जब उसकी भविष्यवाणी सत्य हो जाय तब हसन उसे अपना प्रधानमंत्री बना ले। हसन ने ब्राह्मण की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। हितैषी ब्राह्मण के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिये राजपद प्राप्त करने पर उसने अपना नाम ‘ब्राह्मणी’ अथवा बहमनी रखा और उसका राज्य ‘बहमनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस मत को स्वीकार करने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हसन कांगू एक धर्मांध सुल्तान था, हिन्दुओं के प्रति उसका व्यवहार असहिष्णुतापूर्ण था इसलिये यह संभव नहीं है कि उसने अपने राज्य का नाम ब्राह्मणी राज्य रखा हो।
ईरानी बहमन वंश की अवधारणा
मेजर हेग ने फरिश्ता के इस मत को अस्वीकार करते हुए लिखा है कि हसन ने कभी अपना नाम ब्राह्मणी नहीं रखा। उसकी मुद्राओं, मस्जिद के शिलालेखों तथा ग्रन्थों में भी उसका राजकीय नाम बहमनशाह मिलता है। आधुनिक इतिहासकारों की धारणा है कि हसन फारस के बादशाह बहमन बिन असफन्द यार का वंशज था। इस कारण उसका वंश बहमनी कहलाया। यह अवधारणा ही अधिक सही प्रतीत होती है।
बहमनी वंश के शासक
अलाउद्दीन हसन बहमनशाह
बहमनी राज्य के संस्थापक अलाउद्दीन हसन बहमनशाह अर्थात् हसन कांगू ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया। उसने अपने पड़ौसी राज्यों पर आक्रमण कर उत्तर में बाणगंगा से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया।
उसने अपने राज्य को प्रशासन की दृष्टि से चार भागों- गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर में विभाजित किया जिन्हें अतरफ कहा जाता था। प्रत्येक अतरफ में एक प्रांतपति की नियुक्ति की गई। 1358 ई. में हसन कांगू की मृत्यु हो गई। वह एक कट्टर मुस्लिम एवं धर्मान्ध शासक सिद्ध हुआ।
मुहम्मदशाह (प्रथम)
हसन कांगू के बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह (प्रथम) बहमनी राज्य का शासक हुआ। उसने अपने पिता के विजय अभियान को जारी रखा तथा विजयनगर एवं तेलंगाना (वारंगल) के राजाओं के साथ सफलतापूर्वक युद्ध किया। वारंगल के शासक कापय नायक और विजयनगर के शासक बफुका ने मुहम्मदशाह के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा लिया।
मुहम्मदशाह ने कापय नायक से गोलकुण्डा का किला छीन लिया। तब से गोलकुण्डा दुर्ग को बहमनी राज्य तथा तेलंगाना राज्य की सीमा मान लिया गया। मुहम्मदशाह का शासन कठोर था। वह दुराचारियों का कठोरता से दमन करता था। उसने अपने राज्य में मद्यपान का निषेध कर दिया।
मुजाहिद शाह बहमनी
मुहम्मदशाह (प्रथम) की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र अलाउद्दीन 1373 ई. में बहमनी के तख्त पर बैठा। उसे मुजाहिद शाह बहमनी (प्रथम) भी कहा जाता है। मुजाहिद का अपने सेनापतियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं था। इससे सेनापतियों में उसके विरुद्ध असंतोष फैल गया। उसने दो बार विजयनगर पर आक्रमण किया जिसमें उसे बड़ी क्षति उठानी पड़ी। 1378 ई. में मुजाहिद के चचेरे भाई दाऊद ने उसकी हत्या कर दी परन्तु एक वर्ष के उपरान्त दाऊद का भी वध कर दिया गया।
मुहम्मदशाह (द्वितीय)
दाऊद की मृत्यु के बाद मुहम्मदशाह (द्वितीय) बहमनी के तख्त पर बैठा। इसे मुजाहिद (द्वितीय) भी कहा जाता है। वह शान्ति प्रिय सुल्तान था। उसने अपने पूर्वजों की युद्ध नीति को त्याग दिया। वह धार्मिक प्रवृत्ति का सुल्तान था। उसने अपने राज्य में कई मस्जिदें बनवाईं और मदरसे तथा मकतब स्थापित किये। वह अपनी प्रजा के सुख का ध्यान रखता था। उसने विजयनगर राज्य से अच्छे सम्बन्ध बनाये। 1397 ई. में उसका निधन हुआ।
ताजुद्दीन फीरोजशाह
मुहम्मदशाह (द्वितीय) के बाद ताजुद्दीन फीरोजशाह गुलबर्गा के सिंहासन पर बैठा। वह बड़ा ही धर्मान्ध सुल्तान था। उसके समय में विजयनगर राज्य के साथ पुनः संघर्ष उठ खड़ा हुआ। विजयनगर पर उसने तीन बार चढ़ाई की जिनमें से दो बार वह विजयी हुआ।
तीसरी बार में उसे विजयनगर के राजा देवराय (द्वितीय) ने बुरी तरह परास्त किया तथा उसके राज्य के बहुत बड़े भूभाग पर अधिकार कर लिया। बहमनी राज्य को जन-धन की बड़ी हानि उठानी पड़ी। इस कारण ताजुद्दीन फीरोजशाह राज्य कार्य से उदासीन रहने लगा। अपने अंतिम दिनों में वह बीमार रहता था। 1422 ई. में उसके भाई अहमदशाह ने उसे अपदस्थ कर दिया।
अहमदशाह
ताजुद्दीन फीरोजशाह के बाद उसका भाई शिहाबुद्दीन अहमद (प्रथम) बहमनी राज्य के तख्त पर बैठा। उसे अहमदशाह भी कहते हैं। उसने गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को अपनी राजधानी बनाया। उसने भी विजयनगर राज्य पर आक्रमण करके सहस्रों हिन्दुओं को मार दिया।
1424 ई. में अहमदशाह ने वारंगल के राजा पर आक्रमण करके उसके राज्य का बहुत बड़ा भाग अपने राज्य में मिला लिया। उसने मालवा पर आक्रमण करके वहाँ के शासक हुसैनशाह को परास्त किया। उसने गुजरात पर भी आक्रमण किया किंतु परास्त होकर लौट आया। 1435 ई. में अहमदशाह की मृत्यु हो गई।
अलाउद्दीन अहमद (द्वितीय)
अहमदशाह के बाद उसका पुत्र जफर खाँ 1435 ई. में अलाउद्दीन अहमद के नाम से बहमनी राज्य के तख्त पर बैठा। उसने कोंकण के राजा को परास्त किया। अलाउद्दीन ने विजयनगर पर आक्रमण करके देवराय (द्वितीय) को परास्त किया तथा उससे भारी धन वसूल किया। अलाउद्दीन ने संगमेश्वर के हिन्दू राजा की पुत्री से बलपूर्वक विवाह किया। 1457 ई. में अलाउद्दीन की मृत्यु हो गई।
हुमायूँशाह (जालिम)
अलाउद्दीन के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँशाह 1457 ई. में तख्त पर बैठा। वह बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी शासक था। उसके अत्याचारों के कारण लोग उसे जालिम कहते थे। इस निर्दयी सुल्तान को महमूद गवां नामक बड़े ही राजभक्त मंत्री की सेवाएँ प्राप्त थीं जिसने राज्य को नष्ट होने से बचाया। 1461 ई. में हुमायूँशाह की मृत्यु हो गयी।
निजामशाह
जालिम हुमायूँशाह के बाद उसका आठ साल का पुत्र निजामशाह गद्दी पर बैठा। उसकी माँ मखदूमजहाँ उसकी संरक्षिका नियुक्त हुई। बहमनी राज्य के लिये यह बड़े संकट का काल था। उड़ीसा तथा तेलंगाना के हिन्दू राजाओं ने बहमनी राज्य पर आक्रमण कर दिया परन्तु बहमनी राज्य की सेना ने उन्हें पीछे धकेल दिया।
इसी संकटकाल में मालवा के शासक महमूद खिलजी ने बहमनी राज्य पर आक्रमण करके बीदर पर अधिकार कर लिया परन्तु गुजरात के शासक महमूद बेगड़ा के हस्तक्षेप से उसे बहमनी राज्य से बाहर निकाल दिया गया। 1463 ई. में केवल दस साल की आयु में निजामशाह की अचानक मृत्यु हो गई।
मुहम्मद शाह (तृतीय)
निजामशाह के बाद उसका चाचा मुहम्मदशाह (तृतीय) 1463 ई. में बहमनी राज्य का शासक हुआ। वह मदिरा तथा व्यभिचार में व्यस्त रहता था। इसलिये राज्य की वास्तिविक शक्ति सुल्तान के मन्त्री महमूद गवां के हाथों में चली गई।
महमूद गवां (प्रधानमंत्री)
महमूद गवां ने योग्यतापूर्वक शासन किया। उसने पड़ौसी राज्यों को परास्त करके बहमनी राज्य का विस्तार किया। उसने कोंकण के सरदार से बीसलगढ़ जिले को छीना, उड़ीसा के राजा से कर वसूल किया, विजयनगर के राजा के साथ युद्ध करके गोआ का बंदरगाह छीन लिया तथा कांची पर भी अधिकार कर लिया।
महमूद गवां ने राज्य के समस्त विभागों में सुधार किये। उसने राज्य की आर्थिक दशा तथा न्याय-व्यवस्था में कई सुधार किये। उसने मालगुजारी वसूलने की समुचित व्यवस्था की। उसने सेना में भी कई सुधार किये। रिश्वत तथा घूसखोरी का बुरी तरह दमन किया। शिक्षा की भी उत्तम व्यवस्था की।
महमूद गवां एक विदेशी अमीर था इसलिये दक्षिण के अमीरों ने सुल्तान को महमूद गवां के विरुद्ध भड़काया। शराब के नशे में धुत्त सुल्तान ने महमूद गवां का वध करने के आदेश दे दिये। इस प्रकार इस योग्य मन्त्री गवां की हत्या करवा दी गई। बाद में सुल्तान को अपनी भूल का पता लगा। उसके मन में इतनी ग्लानि उत्पन्न हुई कि उसने आत्महत्या कर ली। महमूद गवां के मरते ही बहमनी राज्य का पतन आरम्भ हो गया।
महमूदशाह
1482 ई. में सुल्तान महमूदशाह की मृत्यृ के उपरान्त उसका बारह वर्षीय पुत्र महमूदशाह तख्त पर बैठा। वह नाम मात्र का शासक था। उसने 26 वर्ष तक शासन किया परन्तु शासन की वास्तविक शक्ति उसके मन्त्री बरीद के हाथ में रही। महमूदशाह जीवन भर आमोद-प्रमोद में लगा रहा। वह राज्य के कार्यों में रुचि नहीं लेता था। इससे प्रान्तीय गवर्नर, केन्द्रीय शक्ति की उपेक्षा करने लगे और स्वतंत्र होने का प्रयत्न करने लगे।
कलीमुल्लाह
महमूदशाह के बाद उसका पुत्र कलीमुल्लाह तख्त पर बैठा। वह भी अपने पिता की तरह नाम मात्र का शासक था। 1526 ई. में अमीर बरीद ने कलीमुल्लाह को तख्त से उतार दिया और स्वयं सुल्तान बन गया। इस प्रकार बहमनी वंश का अन्त हो गया।
बहमनी राज्य की विच्छिन्नता
1527 ई. में बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पांच राज्यों में विभक्त हो गया- (1.) बरार में इमादशाही राज्य, (2.) अहमदनगर में निजामशाही राज्य, (3.) बीजापुर में आदिलशाही राज्य, (4.) गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा (5.) बीदर में बरीदशाही राज्य।
बहमनी राज्य के पतन के कारण
बहमनी राज्य लगभग 180 साल तक चला। इसके 14 सुल्तानों में से 5 की हत्या हुई, 3 पदच्युत किये गये, 2 को अंधा किया गया और 2 अधिक मद्यपान के कारण मरे। बहमनी राज्य का पतन उसकी आन्तरकि दुर्बलताओं के कारण हुआ। इस राज्य के पतन के निम्नलिखित कारण थे-
(1.) राज्य के अमीरों का अन्तर्कलह
बहमनी राज्य के अमीरों में विभिन्न वर्ग तथा सम्प्रदाय उत्पन्न हो गये जो एक दूसरे को समाप्त करना चाहते थे। पूरे 180 साल तक बहमनी राज्य के विदेशी अमीरों तथा दक्षिणी अमीरों में घोर संघर्ष चला। तुर्क अमीर मंगोलों को घृणा की दृष्टि से देखते थे, अफगान अमीर तुर्कों से घृणा करते थे, अबीसीनिया के अमीर अरबों से नफरत करते थे और भारतीय मुसलमान, जो यहीं पैदा हुए थे, विदेशी मुसलमानों से घृणा करते थे। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्गों तथा सम्प्रदायों में संघर्ष तथा कलह के कारण राज्य की शासन-व्यवस्था सदैव डांवाडोल रही और अंत में राज्य का पतन हो गया।
(2.) पड़ौसी राज्यों से निरंतर युद्ध
बहमनी राज्य अपनी स्थापना से लेकर अपने नष्ट होने तक साम्प्रदायिक कट्टरता का शिकार रहा। वह अपने पड़ौस में स्थित विजयनगर राज्य तथा वारांगल राज्य को समाप्त करने का प्रयास करता रहा। इस प्रयास में हर समय युद्ध चलता रहा तथा इन तीनों राज्यों की शक्ति क्षीण होती रही। परस्पर वैमनस्य के कारण तीनों ही राज्यों ने एक दूसरे को कंगाली और बदहाली में पहुँचा दिया।
(3.) प्रधानमंत्री महमूद गवां की हत्या
शराब के नशे में धुत्त मुहम्मदशाह (तृतीय) ने अमीरों के कहने पर प्रधानमंत्री मूहमद गवां का वध करवा दिया। उसने अपने बल से राज्य की विघटनकारी शक्तियों को नियंत्रित कर रखा था। इस योग्य मन्त्री के मरते ही राज्य का छिन्न-भिन्न होना आरम्भ हो गया। प्रान्तीय गवर्नरों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया और उन्हें दबाना संभव नहीं रहा।
(4.) महमूदशाह का दुराचारण
महमूदशाह का दुराचरण भी बहमनी साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी था। उसने 26 साल तक बहमनी राज्य पर शासन किया। वह मूर्ख तथा आचरण-भ्रष्ट सुल्तान था। वह अपना समय मूर्खों, गायकों तथा नर्तकों की संगति में व्यतीत करता था। इससे अमीर एवं सरकारी कर्मचारी कर्त्तव्य-भ्रष्ट हो गये। साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा और प्रान्तीय गवर्नर स्वतंत्र होने लगे।
(5.) शासन का अमीर बरीद के हाथों में चले जाना
1578 ई. में अहमदशाह की मृत्यु के उपरान्त बहमनी राज्य के जितने भी शासक हुए, वे नाम मात्र के शासक थे और वास्तविक शक्ति अमीर बरीद के हाथों में थी। अमीर बरीद का अनियन्त्रित प्रभाव बहमनी राज्य के पतन का कारण सिद्ध हुआ। उसने अन्तिम सुल्तान कलीमुल्लाह का अन्त कर दिया और स्वयं सुल्तान बन गया। इस प्रकार बहमनी राज्य का अन्त हो गया।
विजयनगर राज्य मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिन्दू राज्य था। उस काल में विजयनगर राज्य जैसा कोई अन्य विशाल हिन्दू राज्य अस्तित्व में नहीं था।
विजयनगर राज्य की स्थापना
विजयनगर राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सेवेल ने सात मतों का उल्लेख किया है जिनमें से सर्वाधिक विश्वसनीय मत यह है कि इस राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने की। ये दोनों भाई वारंगल के काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव की सेवा में थे।
जब मुसलमानों ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त की तब इन दोनों भाइयों को कैद करके दिल्ली ले जाया गया। जब दक्षिण भारत पर दिल्ली सल्तनत शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सकी तब मुहम्मद बिन तुगलक ने हरिहर तथा बुक्का को मुक्त करके उन्हें रायचूर दोआब का सामन्त बनाकर दक्षिण भेज दिया।
इन दोनों भाइयों का परम सहायक तथा नेता उस समय का प्रकाण्ड पण्डित माधव विद्यारण्य था जिसने इस वंश की उसी प्रकार सहायता की जिस प्रकार आचार्य कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की की थी। माधव विद्यारण्य के अनुज वेदों के टीकाकार सायणाचार्य ने भी इन दोनों भाइयों का पथ प्रदर्शन किया।
अपने गुरु तथा सहायक के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे विद्यानगर अथवा विजयनगर नामक नगर की नींव डाली। मुहम्मद बिन तुगलक के शासन के अन्तिम भाग में हरिहर ने स्वयं को विजयनगर का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया।
विजयनगर के राजवंश
विजयनगर में 1336 ई. से 1416 ई. तक चार राजवंशों ने शासन किया। इनमें से प्रथम दो राजवंश बहमनी राज्य के शासकों के समकालीन थे। जिस समय तृतीय राजवंश विजयनगर के तख्त पर बैठा उस समय बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पाँच राज्यों में विभक्त हो चुका था। अतः तीसरें एवं चौथे राजवंशों को मुसलमानों के साथ वैसा भीषण संघर्ष नहीं करना पड़ा, जैसा प्रथम दो राजवंशों को करना पड़ा था।
(1) प्रथम राजवंश: संगम वंश (1436-1486 ई.)
इस वंश के प्रथम दो शासक हरिहर तथा बुक्का के पिता का नाम संगम था। इसलिये इस वंश को संगम वंश भी कहते हैं। हरिहर तथा बुक्का ने स्वतन्त्र शासक की उपाधियां धारण नहीं कीं परन्तु इस वंश के तीसरे शासक हरिहर (द्वितीय) ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण करके अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा की।
इस वंश के राजाओं को बहमनी वंश के राजाओं के साथ निरन्तर संघर्ष करना पड़ा और प्रायः पराजय का ही आलिंगन करना पड़ा। बहमनी राज्य के शासक इतने प्रबल नहीं थे कि वे विजयनगर राज्य की स्वतंत्र सत्ता को उन्मूलित कर सकते, अथवा उसके बहुत बड़े भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर सकते।
बहमनी राज्य की सेनायें प्रायः रायचूर दोआब में घुसकर लूटपाट मचाती थीं। विजयनगर की सेनायें, उन्हें वहाँ से मार भगाती थीं और फिर से रायचूर दोआब पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेती थीं। इस वंश के राजाओं ने दक्षिण के हिन्दू राजाओं के विरुद्ध भी युद्ध किया जिनके फलस्वरूप उनका राज्य सुदूर दक्षिण तक फैल गया था।
इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक देवराय (द्वितीय) था जिस पर बहमनी सुल्तानों ने कई आक्रमण किये। इनमें से कई युद्धों में देवराय विजयी रहा तो कुछ युद्धों में वह परास्त भी हुआ। इन युद्धों से विजयनगर राज्य को जन-धन की बड़ी हानि उठानी पड़ी।
(2) द्वितीय राजवंश: सलुव वंश (1486-1505 ई.)
देवराय (द्वितीय) के बाद उसके दो अयोग्य पुत्रों ने क्रम से शासन किया। इस वंश के अन्तिम शासक विरुपाक्ष को 1486 ई. में गद्दी से उतार कर तेलगांना के सामन्त नरसिंह सलुव ने स्वयं को विजयनगर का शासक घोषित कर दिया। इस प्रकार विजयनगर में संगम वंश का अंत हो गया तथा सलुव-वंश की स्थापना हुई।
नरसिंह ने छः वर्ष तक शासन किया। वह योग्य तथा लोकप्रिय शासक सिद्ध हुआ। इस वंश के शासन काल में शासन में बड़ी प्रगति हुई। इस वंश के राजाओं को भी बहमनी राज्य के शासकों से युद्ध करने पड़े जिनमें विजयनगर को प्रायः असफलता ही प्राप्त हुई किंतु उनका राज्य चलता रहा।
उन्होंने तामिल प्रदेश के हिन्दू राजाओं को कई युद्धों में परास्त किया। इस वंश का शासन चिरस्थायी सिद्ध नहीं हुआ। इस वंश के अन्तिम शासक को उसके सेनापति वीर नरसिंह नायक ने तख्त से उतारकर उसकी हत्या कर दी और स्वयं विजयनगर का शासक बन गया। इस प्रकार विजयनगर में तीसरे राजवंश की स्थापना हुई।
(3) तृतीय राजवंश: तुलुव वंश (1505-1570 ई.)
1505 ई. में वीर नरसिंह नायक ने विजयनगर में नये राजवंश की नींव डाली जो तुलुव-वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस राजवंश का सर्वाधिक योग्य तथा प्रतिभाशाली शासक कृष्णदेव राय था जो वीरनरसिंह नायक का छोटा भाई था। कृष्ण देव राय ने 1509 से 1530 ई. तक शासन किया।
वह वीर, साहसी, महान् विजेता, न्याय प्रिय तथा सफल शासक था। उसने अनेक युद्ध किये तथा समस्त में सफलता प्राप्त की। 1513 ई. में उसने उड़ीसा के राजा गजपति प्रतापरुद्र को युद्ध में परास्त कर वहाँ की राजकुमारी से विवाह किया। 1520 ई. में उसने बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह पर विजय प्राप्त की और उसके राज्य को लूटा।
पश्चिमी समुद्र तट पर बसे हुए पुर्तगालियों के साथ उसकी मैत्री थी। इस प्रकार कृष्णदेव राय ने अपने बाहुबल से अपने राज्य की सीमा में बड़ी वृद्धि की। इससे पड़ौसी मुसलमान शासकों को ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वे विजयनगर के विरुद्ध संगठित होने लगे। कृष्णदेव राय की मृत्यु के उपरान्त उसका उत्तराधिकारी सदाशिव विजयनगर के तख्त पर बैठा।
उसके मन्त्री रामराय ने पड़ौसी मुसलमान राज्यों के साथ युद्ध किया और मुसलमानों पर बड़ा अत्याचार किया। मुसलमान राज्यों के लिए यह असह्य हो गया। बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा तथा बीदर के सुल्तानों ने अपने मतभेद भुलाकर विजयनगर के विरुद्ध एक संघ बनाया। बरार का सुल्तान इस संघ से अलग रहा।
1564 ई. के अन्तिम सप्ताह में मुसलमानों ने विजयनगर राज्य पर आक्रमण किया। कृष्णा नदी के किनारे तालीकोट नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में रामराय परास्त हो गया और उसका वध कर दिया गया। हिन्दू सैनिकों की भी बड़ी नृशंसतापूर्वक हत्या की गई।
इसके बाद विजयी सेनाओं ने विजयनगर की ओर कूच किया और नगर को नष्ट कर डाला। हजारों हिन्दू मौत के घाट उतार दिये गये। नगर की समस्त सम्पदा लूट ली गई तथा विजयनगर का यथा शक्ति विनाश किया गया। तालीकोट के युद्ध के बाद विजयनगर का पतन आरम्भ हो गया। इस वंश ने 1570 ई. तक विजयनगर पर शासन किया।
(4) चतुर्थ राजवंश: अरविंदु वंश (1570-1614 ई.)
तालीकोट के युद्ध के उपरान्त रामराय के भाई तिरूमल्ल ने सदाशिव के नाम पर शासन करना आरम्भ किया परन्तु 1570 ई. में उसने सदाशिव को अपदस्थ कर दिया और स्वयं विजयनगर का सम्राट बन गया। इस प्रकार एक नये राजवंश की स्थापना हुई जो अरविन्दु वंश के नाम से प्रसिद्ध है।
उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र रंग द्वितीय हुआ। वह योग्य शासक था। उसके बाद उसका भाई बैंकट द्वितीय सिंहासन पर बैठा। उसने 1586 ई. से 1614 ई. तक शासन किया। उसके काल में राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। उसने मैसूर के पृथक राज्य को मान्यता देकर बहुत बड़ी भूल की। इस वंश में कई निर्बल राजा हुए जो साम्राज्य को ध्वस्त होने से नहीं बचा सके। इस वंश का अंतिम स्वतन्त्र शासक रंग (तृतीय) अयोग्य राजा था। उसके बाद विजयनगर राज्य ध्वस्त हो गया।
विजयनगर राज्य का शासन प्रबंध
विजयनगर राज्य का शासन प्रबन्ध उस काल में अच्छे शासन प्रबन्ध का द्योतक है। अध्ययन की दृष्टि से विजयनगर राज्य के शासन प्रबंधन को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1.) केन्द्रीय शासन, (2.) प्रांतीय शासन तथा (3.) स्थानीय शासन। विजयनगर के शासन की निम्नलिखित विशेषतायें थीं-
केन्द्रीय शासन
(1.) सम्राट ही शासन का केन्द्र बिंदु था
विजयनगर साम्राज्य का शासन सैनिक शक्ति पर आधारित था। सम्राट ही समस्त शासन की धुरी था जिसके पास असीमित अधिकार थे। वह स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन करता था। सम्राट की सहायता तथा परामर्श के लिए मन्त्रिपरिषद् होती थी परन्तु सम्राट उनके परामर्श को मानने के लिये बाध्य नहीं था।
मंत्रिपरिषद् के सदस्य सम्राट द्वारा नियुक्त किये जाते थे। शासन, सेना तथा न्याय सम्बन्धी समस्त अधिकार सम्राट में निहित थे। सम्राट स्वयं शासकीय आज्ञायें देने से लेकर सेनापति तथा न्यायाधीश का कार्य करता था। उसके कार्यों में राजकीय पदाधिकारी सहायता किया करते थे। इन पदाधिकारियों में प्रधानमन्त्री, कोषाध्यक्ष तथा सेनापति प्रमुख थे।
(2.) राजदरबार में राजाज्ञाओं का लेखन
शासन सम्बन्धी आज्ञाएँ देने का कार्य राजदरबार में होता था। सम्राट लिखित आज्ञाएँ नहीं देता था। जब सम्राट कोई आज्ञा देता था तो राज्याधिकारी उसे पंजिका में लिखते थे। वही सम्राट की आज्ञा का प्रमाण होता था। जब सम्राट किसी पर दया दिखाता था तो सम्राट उसे मोम लगी मुहरें देता था जिससे यह प्रमाणित हो जाता था कि सम्राट ने उसके ऊपर कृपा की है।
(3.) सामन्ती पद्धति से सेना का संगठन
विजयनगर राज्य का दक्षिण के मुसलमान राज्यों के साथ निरन्तर संघर्ष चलता रहा। इसलिये राज्य को सेना की ओर विशेष रूप से ध्यान देना पड़ता था। सेना का संगठन सामन्तीय था। सेना दो प्रकार की होती थी। एक सम्राट की सेना जिसकी संख्या कम थी और दूसरी प्रांतपतियों की सेना जिसकी संख्या अधिक थी।
युद्ध के समय प्रांतपति अपनी सेना लेकर सम्राट की सहायता करते थे। सारी सेना तीन अंगों- हाथी, घोड़े तथा पैदल में विभक्त थी। सेना में सर्वाधिक संख्या पैदल सैनिकों की थी। राज्य की अधिकांश सेना प्रजापतियों तथा स्थानीय अधिकारियों के अधीन रहती थी, इसलिये उसमें सामन्तशाही सेना के समस्त दोष पाये जाते थे।
विजयनगर के राजाओं ने अश्वारोहियों की संख्या में वृद्धि तथा सैनिकों के प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। प्रांतपतियों की सेनाओं में भर्ती किये जाने वाले सैनिकों में सम्राट के प्रति वैसी स्वामिभक्ति नहीं होती थी, जैसी स्थानीय सेना के सैनिकों में होती थी। यही कारण था कि संख्या में अधिक होते हुए भी वे मुसलमान सेनाओं के विरुद्ध असफल हो जाती थीं।
(4.) विधर्मियों से अच्छा व्यवहार
विजयनगर राज्य की स्थापना का उद्देश्य हिन्दू संस्कृति, हिन्दू धर्म तथा हिन्दू जनता की रक्षा करना था। अतः राज्य के शासन में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। वे राज्य के उच्च पदों पर आसीन थे। हिन्दू धर्म संसार का सबसे उदार और सहिष्णु धर्म है। इस कारण विजयनगर राज्य में धर्मान्धता तथा धार्मिक असहिष्णुता नहीं थी।
जैन और बौद्ध भी वैष्णवों की तरह सुख से रहते थे। मुसलमानों पर किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं होता था। विजयनगर के कुछ राजाओं ने मुस्लिम सैनिकों को अपनी सेना में भर्ती किया और उनके लिए मस्जिदें बनवाईं।
(5.) कर नीति
राज्य की आय का प्रधान साधन भूमिकर था। सारी भूमि सम्राट की थी। सम्राट अपनी भूमि अपने प्रांतपतियों में बाँट देता था। ये प्रांतपति अपनी भूमि किसानों को दे देते थे जिन्हें भूमि की उपज का निश्चित अंश कर के रूप में प्रांतपति को देना पड़ता था। भूमिकर के साथ-साथ किसानों को चारागाह तथा विवाह कर भी देना पड़ता था। बाहर से आने वाली समस्त आवश्यक वस्तुओं पर, जिनके अन्तर्गत पशु भी थे, चुुंगी देनी पड़ती थी। वेश्याओं को भी कर देना पड़ता था। देश धन-धान्य से पूर्ण था और बस्ती बड़ी घनी थी।
(6.) दरबार की शोभा
विजयनगर के शासक प्राचीन हिन्दू राजाओं की तरह अपने राजदरबार की शोभा का बड़ा ध्यान रखते थे। होली, दीपावली, महानवमी आदि पर्वों के अवसर पर राज्य में आनंद एवं उत्सव मनाया जाता था। उस समय दरबार को विभिन्न प्रकार से अलंकृत किया जाता था जिसकी शोभा देखने योग्य होती थी।
प्रान्तीय शासन
शासन की सुविधा के लिए विजयनगर का राज्य लगभग दो सौ प्रान्तों में विभक्त किया गया था। प्रत्येक प्रान्त का शासन एक प्रांतपति को सौंपा गया। प्रांतपति की नियुक्त सम्राट करता था। ये प्रांतपति या तो राजवंश के होते थे, या शक्तिशाली सामंत। प्रांतपति अपने प्रांत के आंतरिक मामलों में स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश शासक होते थे।
उनकी अपनी सेनाएँ होती थीं। प्रांतपति भी दरबार का आयोजन करते थे। उन्हें केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में कार्य करना पड़ता था और अपने प्रान्त के सुशासन तथा सुव्यवस्था के लिये सम्राट के प्रति उत्तरदायी रहना पड़ता था। प्रान्त की आय का आधा भाग केन्द्रीय राजकोष में भेजा जाता था।
आय का शेष भाग प्रांतपति अपने कुटुम्ब, अपनी सेना तथा प्रान्त के शासन पर व्यय करता था। जो प्रांतपति क्रूरता से शासन करते थे, अथवा राजद्रोही हो जाते थे, या लगान देना बन्द कर देते थे, उन्हें सम्राट द्वारा कठोर दण्ड दिया जाता था और वे अपने पद से हटा दिये जाते थे।
स्थानीय शासन
शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक प्रान्त को कई जिलों में विभक्त किया गया था जिसे नाडू अथवा कोट्टम कहते थे। प्रत्येक जिला कई परगनों में विभक्त रहता था और शासन की सबके छोटी इकाई गाँव होती थी। गाँव का प्रबन्ध गाँव की पंचायतों द्वारा होता था। ये सब स्थानीय संस्थाएँ थीं जिनके प्रधान अयगर कहलाते थे।
अयगरों को या तो जागीरें दी जाती थीं या खेतों की उपज का कुछ भाग वेतन के रूप में दिया जाता था। इनका पद वंशानुगत होता था। अयगर गाँव के झगड़ों का निर्णय करते थे, राजकीय कर वसूल करते थे और शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखते थे। ग्राम सभा की सहायता के लिये चौधरी, लेखक, चौकीदार, तौला इत्यादि होते थे। ये पद वंशानुगत होते थे। उन्हें कृषि उपज का एक भाग वेतन के रूप में मिलता था।
न्याय व्यवस्था
सम्राट न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी था। वह स्वयं अंतिम अपील सुनता था तथा महत्त्वपूर्ण अभियोगों का निर्णय करता था। मन्त्रीगण न्याय कार्य में सम्राट की सहायता करते थे। राज्य में बहुत से राजकीय न्यायालय थे जिनमें न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्राट के द्वारा की जाती थी। गांव वाले गांव सभाओं अथवा पंचायतों के माध्यम से न्याय प्राप्त करते थे। ग्राम पंचायतों के निर्णय के विरुद्ध राजा से अपील की जा सकती थी।
राज्य की न्याय व्यवस्था परम्परागत नियमों, रीति रिवाजों तथा राज्य के संवैधानिक व्यवहारों पर आधारित थी। दण्ड विधान कठोर था। चोरी, व्यभिचार तथा राजद्रोह के मामलों में अंग-भंग तथा मृत्यु दण्ड दिया जाता था। मामूली अपराध के लिये आर्थिक दण्ड दिया जाता था। ब्राह्मण प्राणदण्ड से मुक्त थे।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि विजयनगर राज्य की आन्तरिक शासन व्यवस्था में अनेक विशेषताएँ थीं। धार्मिक सहिष्णुता के साथ-साथ इस व्यवस्था में लोकहित की रक्षा का समुचित प्रबन्ध था। केन्द्रीय शक्ति दृढ़ता से प्रांतपतियों, स्थानीय शासकों एवं प्रजा पर शासन करती थी। अपराधियों एवं विद्रोही प्रांतपतियों को कठोर दण्ड दिये जाते थे।
सामन्तीय व्यवस्था होने के कारण प्रजा पर कर अधिक थे फिर भी प्रजा सुखी एवं समृद्ध थी। इस शासन-व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष इसका सामन्तीय स्वरूप था। सम्राट सैन्य शक्ति के लिये सामंतों पर निर्भर था। सामंती सैनिक सम्राट के प्रति स्वामिभक्त नहीं थे इसी कारण विजयनगर का राज्य अपने पड़ौसी मुस्लिम राज्यों से प्रायः हार जाता था।
विजयनगर की सामाजिक दशा मध्यकालीन दक्षिण भारत के समस्त राज्यों में सबसे अच्छी थी। सभी लोगों को अपने काम का चयन करने तथा अपनी परम्पराओं के अनुसार जीवन जीने की छूट थी।
विजयनगर की सामाजिक दशा
सामाजिक दशा
विजयनगर राज्य में के समाज में हिन्दू परम्पराओं के अनुसार ब्राह्मणों का बड़ा आदर था। उन्हें प्राणदण्ड से मुक्त रखा गया था। ब्राह्मण शाकाहारी तथा पवित्र आचरण वाले होते थे। अन्य जातियों में मांसाहार प्रचलित था। हिन्दू देवी-देवताओं को भेड़ों तथा भैंसों की बलि दी जाती थी। सती प्रथा भी प्रचलन में थी। तेलगू विधवा स्त्रियाँ जीवित ही धरती में गाड़ दी जाती थीं।
द्वन्द्व-युद्ध का बड़ा आदर होता था परन्तु इसके लिए मन्त्री की आज्ञा लेनी पड़ती थी। राज प्रासाद में कई स्त्रियाँ लेखिका का कार्य करती थीं। वेश्या-कर्म प्रचलित था। सरायों में वेश्याएं उपलब्ध होती थीं। इन वेश्याओं को राजकीय कर देना पड़ता था। प्रजा सुखी थी। अब्दुर्रज्जाक के अनुसार साधारण जनता भी जवाहर तथा सोने के आभूषण पहनती थीं। आमोद-प्रमोद के अनेक साधन उपलब्ध थे।
साहित्य तथा कला
विजयनगर के शासकों ने हिन्दू-कला तथा हिन्दू-संस्कृति की उन्नति में बड़ा योग दिया। उनके आश्रय में संस्कृत, तमिल, कन्नड़ तथा तेलगू भाषाओं के साहित्य की उन्नति हुई। उनके दरबार में संस्कृत तथा तेलगू के बड़े-बड़े विद्वान रहते थे। विजयनगर के कुछ सम्राट स्वयं अच्छे कवि तथा संगीतज्ञ हुए।
विजयनगर राज्य के विद्वानों में सायण का नाम अग्रणी है। उसने संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण तथा आरण्यक पर टीकाएँ लिखीं। सायण के भाई माधव विद्यारण्य भी संस्कृत के उच्चकोटि के विद्वान थे। अलसनी नामक विद्वान तेलगू का बहुत बड़ा कवि था। कृष्णदेवराय के काल में वह राष्ट्रकवि था।
स्थापत्य
विजयनगर के राजाओं में भवन निर्माण के प्रति बड़ी रुचि थी। विजयनगर की राजधानी में भव्य भवन तथा मन्दिरों का निर्माण हुआ। इन उदार राजाओं ने बड़े-बड़े तड़ाग, जलकुण्ड तथा झीलें बनवाने में बड़ा धन व्यय किया। महलों तथा मन्दिरों पर भांतिभांति की चित्रकारी की गई थी।
कृष्णदेवराय ने हजारा मंदिर अर्थात् सहस्र स्तम्भों वाला मंदिर बनवाया जिसे हिन्दुओं की मंदिर स्थापत्य कला का सर्वोच्च आदर्श माना जाता है। विट्ठल स्वामी का मंदिर भी उस युग की स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है। दुर्भाग्य से उस काल के लगभग समसत भव्य भवन मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दिये गये। उनमें से कुछ ही भवनों के भग्नावशेष अब देखने को मिलते हैं।
आर्थिक दशा
विदेशी यात्रियों ने विजयनगर राज्य के गौरव की बड़ी प्रंशसा की है तथा विजय नगर राज्य की उस काल में विश्व के धनी राज्यों में गिनती की है। राज्य की राजधानी विशाल एवं भव्य भवनों तथा विस्तृत बाजारों से विभूषित थी। सारा नगर सड़कों, बागों, उपवनों, झीलों आदि से अलंकृत था। नगर अपनी सम्पत्ति तथा वैभव के लिये प्रसिद्ध था। देश की भूमि उर्वरा थी।
खनिज पदार्थों का बाहुल्य था और सामुद्रिक व्यापार उन्नत दशा में था। इससे देश में धन की कमी नहीं थी। समुद्र तट पर बहुत अच्छे बन्दरगाह थे। पुर्तगालियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। अरबी घोड़ों का व्यापार जोरों पर था। हीरे, पन्ने, मोती, नीलम आदि खुले बाजार में बेचे जाते थे।
विजयनगर की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि एवं पशुपालन था। शासन की ओर से सिंचाई की व्यवस्था की जाती थी। इस कारण कृषि भरपूर होती थी। कृषि के बाद दूसरा आधार उद्योग धंधे थे जिनमें वस्त्र तथा धातुओं के उद्योग प्रमुख थे। इत्र का उद्योग भी उन्नत दशा में था। उद्योगों तथा व्यवसायों के अलग-अलग संघ थे।
लेन-देने का काम सोने-चांदी की मुद्राओं से होता था। अंतरदेशीय तथा विदेशी व्यापार दोनों उन्नत अवस्था में थे। साम्राज्य में अनेक अच्छे बंदरगाह थे। पुर्तगाल, अफ्रीका, ईरान, अरब, बर्मा, श्रीलंका, मलाया, चीन आदि बहुत से देशों के साथ बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार होता था।
वस्त्र, चावल, लोहा, शोरा, शक्कर तथा मसालों का व्यापार किया जाता था और घोड़े, हाथी, मोती, ताम्बा, कोयला, पारा, रेशम आदि बाहर से मंगाये जाते थे। राज्य के पास अपना जहाजी बेड़ा भी था और जहाज निर्माण उद्योग भी उन्नत अवस्था में था।
इटली के यात्री निकोलो कोण्टी ने 1420 ई. में विजयनगर की यात्रा की। उसने लिखा है- ‘नगर की परिधि 60 मील है। उसकी दीवारें पर्वत शिखरों तक पहुंचती हैं। नगर में लगभग 90 हजार व्यक्ति अस्त्र-शस्त्र धारण करने योग्य हैं। राजा भारत के अन्य समस्त राजाओं से अधिक शक्तिशाली है।’
इसी प्रकार 1442-43 ई. में विजयनगर की यात्रा करने वाले ईरानी कूटनीतिज्ञ तथा पर्यटक अब्दुल रज्जाक ने लिखा है- ‘राजा के कोषगृह में गड्ढे बनाये गये हैं जिनमें पिघला हुआ सोना भर दिया गया है। सोने की ठोस शिलाएं बनाई गई हैं। देश की समस्त उच्च एवं नीची जातियों के निवासी कानों, कण्ठों, बाजुओं, कलाइयों तथा उंगलियों में जवाहरात तथा सोने के आभूषण पहनते हैं।’
पुर्तगाली यात्री पेइज ने लिखा है- ‘राजा के पास भारी कोष, अनेक हाथी तथा सैनिक हैं। इस नगर में प्रत्येक राष्ट्र और जाति के लोग मिलेंगे क्योंकि यहाँ व्यापार अधिक होता है और हीरे आदि बहुमूल्य पत्थर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। संसार में यह सबसे अधिक सम्पन्न नगर है। यहाँ चावल, गेहूँ आदि अनाज के भण्डार भरे हैं।’
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