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अकबर की रणथंभौर विजय – रणथंभौर दुर्ग की सोने-चांदी की चाबियां अकबर के पास आ गईं (90)

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अकबर की रणथंभौर विजय - रणथंभौर दुर्ग की सोने-चांदी की चाबियां अकबर के पास आ गईं

मुगल बादशाह अकबर की रणथंभौर विजय ने ही मुगलों के लिए सम्पूर्ण राजपूताने की विजय का वास्तविक मार्ग खोला। अकबर की रणथंभौर विजय ने राजपूत राजाओं को स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब अकबर को रोक पाना कठिन है।

 डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विवरण

 डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि लगभग डेढ़ माह तक अकबर (AKBAR) रणथम्भौर दुर्ग  (Ranthanhor Fort) पर घेरा डाले पड़ा रहा। इस दौरान दोनों ही पक्षों को अपार जन-धन की हानि हुई। वे लिखते हैं कि रणथंभौर का पतन किस प्रकार हुआ, इस सम्बन्ध में दो मत हैं।

कर्नल टॉड के अनुसार सुरजनराय ने ऐसा प्रबल प्रतिरोध किया कि अकबर (AKBAR) को यह निश्चय करना पड़ा कि इस संघर्ष को अधिक दिनों तक नहीं चलाना चाहिए और हाड़ा सरदार को समझा-बुझाकर किला उससे ले लेना चाहिए।

अकबर की रणथंभौर विजय के सम्बन्ध में दूसरा मत अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) एवं मुल्ला बदायूंनी का है। उनके अनुसार राव सुरजन हाड़ा ने अपने सर्वनाश से घबराकर रणथंभौर का किला बादशाह को समर्पित कर दिया।

अबुल फजल का विवरण

अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने लिखा है कि दुर्ग नष्ट होते देखकर राव सुरजन का दिल बैठ गया। उसने दरबारियों के द्वारा बीच-बचाव करवाया और अपने पुत्रों दूदा तथा भोज को बादशाह के दरबार में भेजकर संधि की बात करनी चाही।

दोनों राजकुमारों ने मुगल बादशाह के उच्च अधिकारियों के माध्यम से बादशाह से भेंट की तथा अपने पिता द्वारा किए गए अपराधों की क्षमा मांगी।

इस पर बादशाह अकबर ने राव सुरजन को क्षमा कर दिया तथा दोनों राजकुमारों को खिलअत पहना कर वापस अपने पिता के पास भेज दिया। राव सुरजन ने अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए बादशाह से प्रार्थना की कि एक दरबारी उसको ले जाए और से मिलवा दे।

अकबर (AKBAR) ने सुरजन की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अर्थात् खानेजहाँ को इस काम के लिए नियुक्त किया।

अबुल फजल लिखता है कि जब हुसैन कुली खाँ रणथंभौर दुर्ग के समीप पहुंचा तो राव सुरजन ने बाहर आकर उसका स्वागत किया और फिर वह सबको अपने निवास स्थान पर ले गया।

22 मार्च 1569 को राव सुरजन दुर्ग से बाहर आकर शाही दरबार में हाजिर हुआ और उपयुक्त भेंटों के साथ उसने दुर्ग की चाबियां जो सोने और चांदी की बनी हुई थीं, बादशाह को अर्पित कर दीं।

अबुल फजल लिखता है कि बादशाह द्वारा सुरजन के साथ कृपापूर्ण व्यवहार किया गया जिससे उसको शांति हो गई और वह स्वयं को सुरक्षित समझने लगा।

राव सुरजन ने कुछ दरबारियों द्वारा बादशाह से कहलवाया कि मैं तीन दिन दुर्ग में रहकर अपने कुटुंब आदि को बाहर ले आऊंगा और तत्पश्चात दुर्ग शाही सेवकों को सुपुर्द करके मैं राजधानी आगरा के लिए रवाना हो जाऊंगा। मेरे पुत्र बादशाह के साथ रहेंगे।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘बादशाह ने राव सुरजन के इस प्रस्ताव को स्वीकार करके उसे वापस किले में जाने की अनुमति दे दी। सुरजन ने तीन दिन पश्चात् रणथंभौर दुर्ग अकबर के सेनानायक मिहतर खाँ के सुपुर्द कर दिया। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को इस दुर्ग को जीतने में एक वर्ष लगा था परंतु अकबर की रणथंभौर विजय एक महीने में पूरी हो गई।

अगले दिन शहंशाह ने कुछ अंगरक्षकों के साथ किले का मुआइना किया। जब उसने रणथंभौर दुर्ग में प्रवेश किया तो अल्लाह हू अकबर (AKBAR) के नारों से आकाश गूंज उठा।’

जब शहंशाह द्वारा रणथंभौर की व्यवस्था कर दी गई तो खानेजहाँ और मुजफ्फर खाँ को दाहिने मार्ग से राजधानी की ओर प्रस्थान करने को कहा गया और शहंशाह अपने घनिष्ठ दरबारियों के साथ अजमेर-दरगाह की यात्रा पर रवाना हो गया।

मार्ग में वह प्रतिदिन शिकार करता था। अंत में वह अजमेर पहुंच गया और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गया और वहाँ के लोगों में रुपए उछाले।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी का विवरण

बदायूंनी के विवरण की चर्चा हम पिछली कड़ी में विस्तार से कर चुके हैं। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर (AKBAR) की रणथंभौर विजय पर मौलाना शीरी ने एक कविता लिखी जिसमें उसने लिखा कि जब शहंशाह के सौभाग्य से काफिरों की मजबूती ले ली गई, तब शीरी ने उसकी तारीफ दी- ‘काफिरी तोड़ बादशाह’।

अर्थात् शीरी ने अकबर को पाप को नष्ट करने वाले बादशाह की उपाधि दी।

अकबर की रणथंभौर विजय पर शाह फतहउल्लाह शीराजी के भाई मीर फारिगी ने भी एक कविता लिखी जिसमें उसने कहा-

जब विजय का गुलाब

शाह की फतह वाले बाग में खिला

तो तारीख का ऐलान करने वाले ने कहा

उन्होंने किला जल्दी ही ले लिया।

ब्लॉकमैन का विवरण

ब्लॉकमैन द्वारा अनूदित आईने अकबरी के अनुसार 21 मार्च 1569 को सुरजन हाड़ा, अकबर (AKBAR) की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने अकबर को दुर्ग की चाबियां सौंप दीं तथा महाराणा की सेवा छोड़कर अकबर की सेवा स्वीकार कर ली।

अकबर ने सुर्जन हाड़ा को गढ़कण्टक (गढ़कटंगा) का दुर्गपति बना दिया और बनारस तथा चुनार के सूबे भी उसे दे दिए। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी एवं अबुल फजल (ABUL FAZAL) द्वारा लिखे गए ये विवरण हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों से मेल नहीं खाते।

अकबर ने मुगल सल्तनत में रणथंभौर के नाम से एक सरकार का गठन किया। इस सरकार में 73 महाल थे और 60,24,196 बीघा 11 बिस्वा भूमि थी। इस सरकार की कुल राजस्व आय 8,98,245 दम्म थी। अकबर (AKBAR) ने रणथंभौर दुर्ग में शाही टकसाल भी स्थापित की और इसे जगन्नाथ कच्छवाहा को जागीर में दे दिया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

राव सुरजन हाड़ा के समक्ष नौकर बनकर उपस्थित हुआ अकबर (91)

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राव सुरजन हाड़ा का समर्पण - bharatkaitihas.com
राव सुरजन हाड़ा का समर्पण

जब कुंवर मानसिंह (Kunwar Mansingh) ने अकबर (AKBAR) को राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) की शर्तें सुनाईं तो अकबर को इन शर्तों पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मानसिंह अकबर को नौकर के रूप में अपने साथ रणथंभौर दुर्ग में ले गया ताकि अकबर अपने कानों से राव सुरजन हाड़ा की शर्तें सुन सके।

अकबरनामा और आइने अकबरी के विवरण

21 मार्च 1569 को मुगल बादशाह अकबर ने रणथंभौर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी, अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा ब्लॉकमैन ((HEINRICH BLOCHMANN)) द्वारा अनूदित आईने अकबरी के आधार पर हमने विगत कड़ियों में अकबर की रणथंभौर विजय का प्रकरण लिखा था। इन लोगों द्वारा लिखे गए विवरण हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों से मेल नहीं खाते।

हिन्दू लेखकों के विवरण

डॉ. मथुरालाल शर्मा ने कोटा राज्य का इतिहास में लिखा है कि चित्तौड़ विजय से उत्साहित होकर ई.1569 के आरम्भ में बादशाह ने रणथंभौर दुर्ग विजय की तैयारी की। वह एक बार पहले भी विफल हो चुका था। इसलिए खूब सेना सजाई गई। चित्तौड़ विजय के अनुभव से भी काम लिया गया।

रणथंभौर दुर्ग का घेरा

 चारों ओर सुरंग खोदे गए और खाइयों में बारूद भरा गया। वी. ए. स्मिथ ने अकबर AKBAR : The Great Mughal में लिखा है कि उसे अनुमान था कि घेरा बहुत लम्बा चलेगा।

सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में लिखा है कि कुछ मास तक घेरा जारी रहा। अकबर (AKBAR) इस दुर्ग को तोड़ने के लिये आगरा से भारी भरकम तोपें खींच कर लाया। इन तोपों को खींचने के लिये बैलों की 100-100 जोड़ियां जोती गईं। इन तोपों से 30-30 मन के गोले दुर्ग की प्राचीरों पर बरसाये गये।

लगभग एक माह तक राव सुरजन हाड़ा वीरता पूर्वक अकबर का सामना करता रहा। रणथंभौर दुर्ग के लिये यह पहला अवसर था जब उसने तोप के गोलों का स्वाद चखा था।

जब तोपखाना अप्रभावी रहा तो बादशाह ने दुर्ग की दीवार की ऊंचाई तक साबात बनवाया जहाँ से पत्थर फैंकने की चर्खियों की सहायता से 30 मन भार के लोहे के गोले तथा 60 मन भार के पत्थर के गोले दुर्ग पर फैंके गये।

प्रत्येक चर्खी का संचालन 200 जोड़ी बैल करते थे जो पहाड़ी पर बड़े वेग से भागते थे और चर्खी से छूटा हुआ लोहे या पत्थर का गोला दुर्ग के अन्दर जाकर गिरता था। इससे दुर्ग की एक दीवार टूट गई और उसके अन्दर स्थित कुछ भवन भी नष्ट हो गये।

राजा भगवंतसिंह का प्रस्ताव

वंश भास्कर में लिखा है कि कुछ मास तक घेरा जारी रहा परंतु राव सुर्जन वीरतापूर्वक सामना करता रहा। तब भगवन्तसिंह कछावे (Raja Bhagwant Singh Kachchhwaha) ने अकबर से कहा कि रणथंभौर को जीतना चित्तौड़ जैसा सरल कार्य नहीं है। वहाँ देवयोग से जयमल मारा गया, अन्यथा कई साल तक घेरा जारी रखना पड़ता। अब यहाँ राव सुर्जन की चाही हुई शर्तें मंजूर करके युक्ति-पूर्वक दुर्ग पर अधिकार करना चाहिए।

राव सुर्जन से संधि की बात

वंश भास्कर में लिखा है कि बादशाह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मानसिंह ने राव सुर्जन से संधि की बात चलाई।

राव सुर्जन ने सात शर्तें पेश कीं और कहा कि यदि इनको स्वीकार कर लिया जावे तो रणथंभौर दुर्ग समर्पित कर दिया जाएगा। जब अकबर को ये शर्तें सुनाई गईं तो उसको विश्वास नहीं हुआ और उसने कहा कि तुम हिन्दू, हिंदुओं को ही चाहते हो और हमको धोखा देकर कल्पित बात कहते हो।

तब मानसिंह बादशाह को नौकर का वेष धारण करवा कर अपने साथ  सुर्जन के पास गढ़ के अंदर ले गया और उसके सामने शर्तों की बातें होने लगीं। मानसिंह ने सुर्जन से कहा कि इस विषय में हठ न करो और बादशाह का आदेश अपने सिर पर धारण करो।

इस पर राव सुर्जन ने क्रुद्ध होकर अपनी मूँछ पर हाथ रक्खा और कहा कि इस दुर्ग पर आपका अधिकार तभी हो सकता है जब सम्पूर्ण हाड़ा कुल नष्ट हो जाए या मेरे पुरातन-कुल-धर्म की रक्षा हो सके, ऐसी शर्तें आप स्वीकार कर लें।

इस विषय में सविस्तार बातचीत हो चुकने के बाद मानसिंह और अकबर वापस आए और बादशाह ने  शर्तें लिखकर भिजवा दीं। महाकवि सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में इस संधि का रोचक वर्णन किया है।

राव सुरजन हाड़ा की शर्तें

इन शर्तों में राव सुरजन हाड़ा द्वारा रखी गई समस्त सात शर्तें शमिल थीं। केवल एक शर्त अकबर (AKBAR) द्वारा जोड़ी गई थी। राव सुरजन की शर्तें इस प्रकार थीं-

1. बादशाह को लड़की नहीं दी जायेगी।

2. नौरोजा में बून्दी की रमणियां नहीं जायेंगी।

3. बून्दी नरेश अटक नदी के पार नौकरी करने नहीं जायेगा।

4. शाही महल के दरवाजे तक बून्दी वालों का नक्कारा बजता रहेगा।

5. बून्दी के घोड़ों पर दाग नहीं लगेंगे।

6. बून्दी राज्य में जजिया नहीं लगेगा।

7. बून्दी के राजा किसी अन्य आर्य राजा के नेतृत्व में नहीं लड़ेंगे।

8. बून्दी राज्य में मंदिर नहीं तोड़े जायेंगे।

9. जैसे मुगलों का राज्य दिल्ली है, वैसे हाड़ों की राजधानी बून्दी मानी जायेगी।

रणथंभौर पर अकबर का अधिकार

अकबर (AKBAR) द्वारा जोड़ी गई शर्त इस प्रकार थी- दीवाने आम तथा दीवाने खास में बून्दी नरेश शस्त्र लेकर नहीं जायेगा। संधि हो जाने के पश्चात् 21 मार्च 1569 को राव सुरजन हाड़ा, बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने बादशाह को दुर्ग की चाबियां सौंप दीं तथा महाराणा की सेवा छोड़कर अकबर (AKBAR) की सेवा स्वीकार कर ली।

देश का दुर्भाग्य

यह देश के लिये बहुत दुर्भाग्य का दिन था। यदि रणथंभौर का दुर्गपति बादशाह अकबर की सेवा में नहीं गया होता तो मेवाड़ के महाराणाओं ने निश्चित रूप से भारत का इतिहास बदल दिया होता। आगे चलकर बूंदी के चौहानों ने मुगलों की जैसी सेवा की, वैसी सेवा तो आम्बेर के कच्छवाहों ने भी नहीं की। इसके बाद 18वीं सदी तक यह दुर्ग मुगलों के अधीन बना रहा।

हिंदुओं को हिंदुओं से ही नष्ट करवाओ

डॉ मथुरालाल शर्मा ने लिखा है कि अकबर ने दस शर्तें स्वीकार करते हुए यह भी आदेश दिया कि रणथंभौर की एवज में राव सुर्जन सात परगने ले सकता है। बादशाह ने मानसिंह के माध्यम से कहलवाया कि यदि और अधिक राज्य की आवश्यकता है तो वह गोंडवाना को विजय कर सकता है।

उस समय तक गोंडवाना पर अकबर का अधिकार नहीं हुआ था। वंश भास्कर के अनुसार राव सुर्जन अकबर (AKBAR) की इस कूटनीतिक चाल को नहीं समझ सका कि बादशाह हिंदुओं को हिंदुओं से ही नष्ट करवाना चाहता है। इसलिए राव ने बादशाह से कहलवाया कि पहले गोंड राज्य को जीतकर बादशाह को भेंट करूंगा, तब मैं बादशाह से सात परगने लूंगा।

रणथंभौर दुर्ग से बहुमूल्य वस्तुओं का निष्कासन

वंश भास्कर लिखता है कि सब बातें निश्चित हो जाने पर राव सुर्जन ने किले में से अपनी सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति अर्थात् भगवान विष्णु की दो प्रतिमाएं और दो तोपें निकालीं तथा किला अकबर (AKBAR) के सुपुर्द कर दिया।

 दुर्ग से निकाली गई दोनों प्रतिमाएं बूंदी में स्थापित की गईं जिनमें से एक प्रतिमा बारां के कल्याणराय मंदिर में भेज दी गई। दुर्ग से निकाली गई दो तोपों में से एक का नाम धूलधाणी था और दूसरी का कड़क बीजली।

रणथंभौर दुर्ग पर मुसलमानों के अधिकार

मथुरालाल शर्मा ने लिखा है- ‘इससे पहले मुहम्मद गौरी, इल्तुतमिश और अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग के स्वामियों को मारकर दुर्ग पर अधिकार किया था, किंतु ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी विदेशी आक्रांता ने रणथंभौर के स्वामी के जीवित रहते ही दुर्ग पर अधिकार किया था।’

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शेख सलीम चिश्ती ने कहा दूसरी बेगमें ले आओ, क्या फर्क पड़ता है (92)

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शेख सलीम चिश्ती - bharatkaitihas.com
शेख सलीम चिश्ती

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतख़ब-उत-तवारीख़ (Muntakhab-ut-Tawarikh) में बादशाह अकबर तथा शेख सलीम चिश्ती की निकटता का विस्तार से उल्लेख किया है। इस लेख में बदायूंनी  द्वारा किए गए उल्लेखों के आधार पर अकबर तथा शेख सलीम चिश्ती के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।

रणथंभौर विजय के बाद अकबर (AKBAR) ने राव सुर्जन (RAO SURJAN) को गोंड राज्य पर आक्रमण करने का आदेश दिया और स्वयं अजमेर चला गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि शहंशाह जब तक अजमेर में ठहरा, वह प्रतिदिन दरगाह में जाया करता था।

आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद

फिर अपनी राजधानी की ओर रवाना हुआ। मार्ग में जब अकबर आमेर में उतरा तो कच्छवाहा राजा भगवानदास ने उसका स्वागत किया और अकबर को एक भोज दिया तथा उसे अच्छी-अच्छी भेंटें अर्पित कीं।

राजा भारमल ने बादशाह के लिए आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है। अकबर को प्रसन्न करने के लिए भारमल ने यद्यपि इस मस्जिद को मुगल शैली में बनाने का प्रयास किया किंतु आम्बेर में मुगलिया शैली के जानकार शिल्पी नहीं थे।

इस कारण इस मस्जिद पर हिन्दू स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मस्जिद को बाहर से लाल रंग से पोतकर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने का आभास दिया गया है क्योंकि अकबर (AKBAR) ने लगभग सभी भवन लाल रंग के पत्थर से बनवाए थे।

इस मस्जिद के प्रवेश द्वार को फारसी शैली के ईवान की तरह बनाने का प्रयास किया गया किंतु उसके ऊपर पत्थर की नक्काशी मुगलिया नक्काशी की जगह हिन्दू अलंकरण की तरह दिखाई देती है।

आम्बेर दुर्ग परिसर में आज भी अच्छी स्थिति में खड़ी इस मस्जिद के मुख्य द्वार के दोनों तरफ तीन-तीन मेहराब बनाए गए हैं तथा मुख्य द्वार के दोनों तरफ एक-एक गुम्बद बनाया गया है।

ये गुम्बद भी फारसी एवं मुगलिया शैली के गुम्बदों के स्थान पर मंदिर के गर्भगृहों के ऊपर बनने वाले शिखरनुमा निर्माण अधिक जान पड़ते हैं जो कि बंद कमल पुष्प की तरह दिखाई देते हैं।

इस भवन के सामने एक-एक पतली मीनार बनाई गई है जो मुगल शैली से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती। बादशाह ने इसी मस्जिद में नमाज पढ़ी। वह अपने जीवन काल में दो-तीन बार आम्बेर आया।

कुछ दिन आमेर में रुकने के बाद बादशाह आगरा के लिए चल दिया। मार्ग में उसे दरबार खाँ की मृत्यु की खबर मिली जिससे बादशाह को बड़ा दुःख हुआ।

कुत्ते की कब्र के नीचे

दरबार खाँ की वसीयत के अनुसार उसे उसके स्वामिभक्त कुत्ते की कब्र के नीचे की ओर दफनाया गया जहाँ दरबार खाँ ने अपने लिए पहले से ही एक गुंबद बनवा लिया था।

राव सुरजन द्वारा हिन्दू राजाओं का दमन

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11 मई 1569 को अकबर आगरा पहुंच गया और बंगाली महल में गया जिसका निर्माण हाल ही में हुआ था। उधर राव सुरजन ने गोंड के राजा (GOMD RAJA) पर आक्रमण किया। गोंडों के राजा ने कुछ समय तक तो प्रतिरोध किया किंतु बाद में उसने आत्समर्पण कर दिया। राव सुरजन ने गोंडों की राजधानी बारीगढ़ में बादशाह अकबर (AKBAR) का अधिकार स्थापित करके वहाँ पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में सूरजपोल (SURAJPOL) नामक दरवाजा बनवाया। गोंड का राजा राव सुरजन की बात मानकर अकबर के दरबार में चलने को राजी हो गया। राव सुरजन उसे दिल्ली ले गया तथा उसे बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया। अकबर राव सुरजन के इस कार्य से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने सुरजन को पांच हजार सवारों का मनसब दिया। इस प्रकार राव सुरजन ने अकबर के समक्ष गोंड राज्य जीतने का जो भरोसा दिया था, उसे पूरा किया। वंश भास्कर के अनुसार राव सुर्जन बादशाह से अनुमति लेकर बूंदी गया और उसने बूंदी के निकटवर्ती 26 परगने बूंदी राज्य में मिलाए। बादशाह ने राव सुरजन को बनारस के पास भी 26 परगने प्रदान किए। अकबर ने राव सुर्जन को बनारस (BANARAS) और चुनार (CHUNAR) का हाकिम नियत कर दिया।

कालिंजर का पतन

कालिंजर (KALIANJAR) हिन्दुओं के प्रसिद्ध दुर्गों में से था। यह वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित है। अगस्त 1569 में अकबर  ने मजनू खाँ काकशाह को इस दुर्ग पर आक्रमण करने भेजा।

कालिंजर के दुर्गपति रामचन्द्र ने शत्रु का सामना किया परन्तु जब उसे चित्तौड़ तथा रणथम्भौर के पतन की जानकारी मिली तब उसका साहस भंग हो गया और उसने समर्पण कर दिया। अकबर (AKBAR) ने रामचन्द्र से कालिंजर का दुर्ग लेकर उसे इलाहाबाद के निकट एक जागीर दे दी। मजनू खाँ काकशाह को कालिंजर का दुर्गपति नियुक्त किया गया।

इस समय तक बादशाह के कई पुत्र उत्पन्न हो चुके थे किंतु वे सब शैशव अवस्था में ही मर जाते थे। इसलिए अकबर शेखुल इस्लाम अर्थात् सूफी दरवेश शेख सलीम चिश्ती से मिलने सीकरी गया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि अकबर बादशाह अपनी एक गर्भवती बेगम को सलीम चिश्ती के मकान में छोड़ आया ताकि उसे दरवेश का आर्शीवाद प्राप्त हो सके।

मुल्ला लिखता है कि अकबर ने सीकरी की पहाड़ी पर शेख के निवास के पास एक भव्य मस्जिद का निर्माण करवाया तथा एक नए दुर्ग की आधारशिला रखी।

अबुल फजल लिखता है कि अकबर बादशाह ने सीकरी में पत्थर की एक ऊंची व काफी बड़ी मस्जिद बनवाई, इतनी बड़ी कि उसे पहाड़ का एक हिस्सा कहा जा सकता है। यह इतनी दुर्लभ थी कि संसार में शायद ही कहीं दिखाई दे।

लगभग पांच साल में यह मस्जिद बनकर तैयार हुई। अकबर ने इस स्थान को फतहपुर नाम दिया। अकबर ने उसमें गुसलखाने एवं दरवाजे आदि भी बनवाए। बादशाह अकबर के अमीरों ने भी इस मस्जिद में मीनारें, बरामदे एवं भव्य महल बनवाए। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने इस मस्जिद के बनवाए जाने पर कविता लिखी, जो इस प्रकार है-

यह किला इस्लाम का गुम्बद है

अल्लाह इसके बनवाने वाले को कीर्ति दे।

गेब्रियल ने तारीख इस प्रकार दी

ऐसा जमीन पर नहीं देखा गया।

जन्नती काबा जन्नत से उतरकर आ गया।

अकबर के दरबारी अशरफ खाँ ने इस मस्जिद की तारीफ करते हुए लिखा- ‘यह मक्का मस्जिद के बाद दूसरी है।’

मुल्ला बदायूंनी ने अकबर (AKBAR) तथा शेख सलीम चिश्ती की निकटता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- ‘शेख ने शहंशाह को अपने घर में बने हुए सभी कमरों में जाने की अनुमति दे दी। इस कारण अकबर किसी भी कमरे में कभी भी चला जाता था।’

इस पर शेख के बच्चे और भतीजे नाराज होकर शेख से शिकायत करते कि बादशाह के बार-बार हमारे कमरों में आने के कारण हमरी बेगमें हमसे परायी होती जा रही हैं।

इस पर शेख उत्तर देता कि संसार में औरतों की कमी नहीं है, मैंने तुम लोगों को अमीर बनाया है, दूसरी बेगमें ले आओ, क्या फर्क पड़ता है?’

शेख के घर की इस स्थिति पर चुटकी लेते हुए मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि या तो महावत से दोस्ती मत करो, या फिर मकान हाथी के अनुकूल बनाओ!

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा – सौ टका टंच सोने जैसा था मोहिनी का रूप (93)

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सैयद मूसा और मोहिनी - bharatkaitihas.com
सैयद मूसा और मोहिनी

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा मुगलों के इतिहास में कोई स्थान नहीं रखती किंतु इस कथा से इतना तो ज्ञात होता ही है कि अकबर के समय में भी मुसलमान शोहदे हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उन्हें घर से भगा ले जाते थे।

बादशाह अकबर (AKBAR) ने फतेहपुर सीकरी की पहाड़ी पर एक विशाल मस्जिद तथा किले का निर्माण करवाया। बादशाह द्वारा आगरा को छोड़कर सीकरी पर ध्यान केन्द्रित करने का कारण संभवतः यह था कि सीकरी के सूफी दरवेश शेखुल इस्लाम अर्थात् सलीम चिश्ती से अकबर के सम्बन्ध काफी प्रगाढ़ हो गए थे।

इस कारण बादशाह आगरा छोड़कर फतेहपुर सीकरी में रहने लगा। जिस समय अकबर रणथंभौर के अभियान पर जा रहा था, उस समय आगरा के लाल किले में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसका उस काल की राजनीति में अधिक महत्व नहीं है किंतु यह घटना सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में आगरा में लाल किले के भीतर के सामाजिक जन-जीवन पर किंचित् प्रकाश डालती है। संभवतः इसीलिए मुल्ला कादिर ने इस घटना का प्रमुखता से वर्णन किया है।

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि कालपी का शासक सैयद मूसा शहंशाह अकबर (AKBAR) को सलाम करने के लिए आया। वह एक हिन्दू सुनार की पत्नी मोहिनी पर मोहित हो गया। उसका रूप भी सौ टका टंच सोने जैसा था। उसके शुद्ध दृष्टि-जाल ने सैयद को एक प्रेमी की तरह आकृष्ट किया और दोनों ओर से प्रेम बंधन मजबूती के साथ पैदा हो गया।

सैयद मूसा और मोहिनी के चर्चे

कुछ ही दिनों में सैयद मूसा और मोहिनी का यह प्रसंग इतना चर्चित हो गया कि आगरा  की गली-गली में उनकी बात होने लगी। जब रणथंभौर का अभियान शुरु हुआ तो सैयद मूसा पीछे रुक गया। अर्थात् वह बादशाह के साथ रणथंभौर अभियान पर नहीं गया। उसने आगरा के किले के अंदर अपनी प्रेमिका के घर के आसपास जमना किनारे एक मकान किराए पर ले लिया।

यह मकान मीर सैयद जलाल मुवक्किल के घर के पास था। सैयद और मोहिनी का मसला पागलपन के स्तर तक पहुंच गया। सैयद मूसा और मोहिनी की दूरी दो साल चार महीने तक रही, फिर भी वे एक-दूसरे को देखकर संतोष कर लेते। एक-दो बार जब सैयद अपने विश्वसनीय साथियों के साथ प्रेमिका के घर के बाहर गया तो या तो चौकीदारों के हाथों पड़ गया या उसकी जाति के सुनारों के हाथों आ गया।

मोहिनी के परिवार वालों ने सैयद की पिटाई कर दी और मोहिनी को घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी। इस कारण दो साल और चार महीने तक वे दूर से ही एक दूसरे को देखकर संतोष कर लेते।

मोहिनी का सयैद को निमंत्रण

एक रात उस मोहक महिला ने सैयद को रात के समय मकान की छत पर आने के लिए संकेत किया। इस पर सैयद ने रात के समय एक मजबूत कमंद मोहिनी के घर की छत पर फेंकी और नट की तरह उस पर चढ़ गया। इस प्रकार पूरी रात उन्होंने पवित्र प्यार में बिताई। सैयद मूसा के भाई सैयद शाही को जब इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने एक कविता लिखी जो इस प्रकार थी-

हृदय में इच्छाओं का कितना भी उबाल आ रहा हो

शालीनता ने सावधान किया, संयमित रहो।

आंखों के आगे जीवन जल का अथाह सागर है

किंतु आपके पीने के लिए एक बूंद भी नहीं।

उनके हृदय दावानल में सीमांत तक जले

किंतु उनके होठ उच्च आदर्श पालन में सिले रहे।

पूर्णतः एकांत का एक स्थान, और दो प्रेमी प्रेमरत

उनके हृदय एकाकार शरीर फिर भी विलग।

यह कविता बहुत लम्बी है, इसका अंत इन शब्दों से हुआ है-

सैंकड़ों प्रेम स्पर्शों एवं फुसलावों के साथ अंततः

उन्होंने हजारों रहस्यों के द्वार खोले

और जब देखा कि प्रभात निकट है

उन्होंने एक दूसरे से अलविदा कहा।

मोहिनी का गृहत्याग

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि विदाई के समय में कुछ ऐसा हुआ कि प्रेमिका ने नींद के आगोश से उठते हुए अपने घर-मकान को अलविदा कह दिया, और लोकलाज छोड़ अपने प्रेमी सैयद के साथ चल पड़ी जैसे चांदनी चांद के साथ और आदमी की छाया आदमी के साथ। सैयद मूसा और मोहिनी की यह कथा आगरा से फतहपुर तक फैल गई और लोग इसे चटखारे लेकर सुनाने लगे।

 मोहिनी ने सैयद से कहा कि मैं जीवन भर तुम्हारे साथ प्रेम-बंधन में रहना चाहती हूँ। हमारे बारे में किसी को पता नहीं चलेगा यदि हम थोड़ी सावधानी रखते हुए छत से नीचे उतर जाएं और सुबह होने से पहले दूर निकल जाएं।

इस पर सैयद उस मोहिनी को अपने साथ लेकर सुनार के घर से निकल गया और अपने घर न जाकर अपने एक मित्र के घर में छिप गया। तीन दिनों तक सैयद मूसा और मोहिनी उस घर में छिपे रहे। अंत में सुनार के घर वालों ने उस स्त्री को ढूंढ लिया।

मोहिनी की गृहवापसी

मुल्ला लिखता है कि सैयद मूसा के घर को महिला के सम्बन्धियों ने अंगूठी की तरह घेर लिया और मूसा पर कई आरोप लगाए। पहले तो उस महिला ने अपने परिवार के साथ वापस लौटने से इन्कार कर दिया किंतु महिला के पिता ने कहा कि यदि तू वापस घर नहीं चलेगी तो हम सैयद की शिकायत हाकिम से करेंगे। हाकिम सैयद को फांसी पर चढ़ा देगा। इस पर महिला को सैयद के जीवन की चिंता हुई और वह अपने पिता के साथ उसके घर चली गई।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि उस महिला ने अपने घर वालों को सुनाने के लिए एक कहानी बनाई कि मैं उस रात को जब गहरी नींद में थी, तब एक रूपवान पुरुष ने जिसको सपने में भी किसी ने न देखा होगा, मुझे हाथ पकड़कर ले गया और मैं सपनों के संसार से कल्पना लोक में चली गई और मेरी नींद जाग में बदल गई। तब मैंने उसके सिर पर एक रत्नजड़ित मुकुट देखा। उसके सीने पर दो प्रकाश-पंख थे।

उसने मुझ पर मंत्रों का उच्चारण किया जैसे कोई तांत्रिक करता है। उसने मुझे अपनी सुंदरता से मोहित कर दिया और मुझे अपने पंखों में समेट लिया। इसके बाद वह मुझे किसी ऐसे नगर में ले गया जैसा नगर परियों की कहानियों में होता है।

उसने मुझे एक ऊंची मीनार में रख दिया जिसमें हर प्रकार की अजीब और अजनबी चीजें रखी हुई थीं। हर कोने में परीजादों की टुकड़ियां तैयार थीं।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बेवकूफ हिंदुओं ने इस खूबसूरत धोखे पर विश्वास कर लिया। अच्छा होता कि यदि वे इस मसले को छिपाकर रखते किंतु उन्होंने उस खूबसूरत मोहिनी को लोहे की जंजीरों से बांध दिया और ऊपर के कमरे में ताला-चाबी में बंद कर दिया।

इस कारण इस बात की खबर लाल किले में रहने वाले प्रत्येक आदमी को हो गई। लोग चटखारे लेकर यह बात एक-दूसरे को बताने लगे।

मोहिनी का सैयद मूसा को संदेश

एक दिन किसी तरह उस मोहिनी ने सैयद के पास अपनी एक दूती के माध्यम से संदेश भिजवाया कि मैं हजारों परेशानियों और प्रताड़नाओं के बीच बहाने बना-बनाकर और स्पष्टीकरण दे-देकर अपने निंदकों से बच रही हूँ।

जब सैयद को मोहिनी से मिलने की आशा नहीं रही तो वह शहंशाह अकबर (AKBAR) से मिलने के लिए रणथंभौर के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगा।

मोहिनी का फिर से गृहत्याग

जब मोहिनी को यह ज्ञात हुआ तो उसने फिर से अपनी दूती को सैयद के पास भेजकर कहलवाया कि तुम शाम के समय भिखारी के भेस में मेरे घर भीख मांगने के लिए आना। उस समय मैं तुम्हें भीख देने के लिए बाहर आउंगी और तुम्हारे साथ निकल जाउंगी।

सैयद ने मोहिनी को ले भागने की तैयारी की और शाम के समय भिखारी का भेस धरकर मोहिनी को भगा लाया। तीन दिनों तक शहर में छिपे रहने के बाद सैयद मूसा और मोहिनी फतहपुर और बिवाना की तरफ रवाना हो गए।

शिवकानपुर के काजी की बदमाशी

सैयद मूसा और मोहिनी जब मार्ग में थे, तब उस औरत के रिश्तेदारों ने उन दोनों को घेर लिया। मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि पहलवान जमाल का दस्ता जो उस समय पुलिस काजी था, आ गया। सैयद ने तलवार लेकर सिपाहियों का सामना किया किंतु घायल होने पर बंदी बना लिया गया।

औरत उसके घर वालों को सौंप दी गई किंतु सैयद को कालपी के निकट शिवकानपुर की जेल में बंद कर दिया गया। वहाँ का काजी पहलवान जमाल, सैयद मूसा का मित्र था।, पहलवान जमाल ने सैयद से कहा कि तू चिंता मत कर मैं स्वयं उस औरत को आगरा से लेकर आता हूँ।

पहलवान जमाल एक घोड़े पर चढ़कर आगरा गया और मौका पाकर उस औरत को घोड़े पर बैठाकर ले आया। जब पहलवान मोहिनी को घोड़े पर चढ़ा रहा था तो मोहिनी के घर वालों ने उसे देख लिया।

वे भी पहलवान के घोड़े के पीछे भागे। अंत में पहलवान का घोड़ा एक नहर के किनारे कीचड़ में जाकर अटक गया। उसकी पीठ पर मोहिनी और पहलवान जमाल काजी का बोझ था।

इसलिए वह कीचड़ में से पैर नहीं निकाल पाया। इस पर मोहिनी जानबूझ कर घोड़े से नीचे गिर पड़ी और पहलवान से बोली कि मेरा जो होगा, सो होगा, तू भाग कर अपनी जान बचा। मेरे प्रेमी से कहना कि मैंने लाख चाहा किंतु भाग्य ने नहीं चाहा इसलिए मैं तुझे नहीं पा सकी।

सैयद मूसा और मोहिनी की मृत्यु

पहलवान भाग गया और मोहिनी फिर से अपने पिता के घर आ गई। जब सैयद ने यह समाचार सुना तो दुःख के कारण उसके प्राण-पंखेरू उड़ गए। सैयद मूसा और मोहिनी की यह करुण गाथा अंततः कब्रगाह तक जा पहुँची।

उसकी लाश कब्रगाह में दफना दी गई। उधर मोहिनी फिर से जंजीरों में बांध दी गई। वह अपनी दूती की सहायता से जंजीरें खोलकर पागलों की तरह घर से निकल भागी और सैयद की कब्र पर जा पहुंची। वह कब्र पर सिर पटक-पटक कर रोने लगी। मोहिनी के घर वालों ने उसे ऐसी हालत में देखा तो वे मोहिनी को अपने साथ लिए बिना चुपचाप अपने घर लौट गए।

अल्लाह मुझे प्रेम के दर्द में रहने देगा

अंत में मोहिनी का क्या हुआ, इस पर मुल्ला बदायूंनी ने कुछ नहीं लिखा है किंतु इस लम्बे प्रकरण का अंत इन शब्दों के साथ किया है- ‘मुझे अल्लाह से आशा है, वह मुझे प्रेम के दर्द में रहने देगा और इसी दर्द में मरने देगा।’

आज भी मर रही हैं मोहिनियाँ

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा आज भी भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक घटित होती हुई देखी जा सकती है। आज भी सैंकड़ों मोहिनियां प्रतिवर्ष सैयद मूसाओं के प्रेम में पागल होकर अपना और अपने परिवार वालों का जीवन बरबाद करती हैं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे हिन्दू राजा (94)

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अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे हिन्दू राजा

 आम्बेर के राजा भारमल ने ई.1562 में अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। ई.1563 में मेड़ता राज्य तथा ई.1564 में जोधपुर राज्य ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली! ई.1568 में चित्तौड़ का तथा ई.1569 में रणथंभौर का दुर्ग बादशाह अकबर (AKBAR) के अधीन हो गए।

इन दोनों किलों के पतन के बाद ई.1569 के अंतिम महीनों में कालिंजर के राजा रामचंद्र ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार करते हुए  अपने दुर्ग की चाबियां अकबर को भिजवा दीं। इस आलेख में हम ई.1570 में बीकानेर एवं जैसलमेर रियासतों द्वारा अकबर  की अधीनता स्वीकार किए जाने की चर्चा करेंगे।

अकबर (AKBAR) की ढेर सारी बेगमों ने कई लड़कों को जन्म दिया था किंतु वे सब शैशव काल में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। इस पर अकबर अपनी बेगम मरियम उज्जमानी अर्थात् हीराकंवर के गर्भवती होने पर उसे फतहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती के घर में छोड़ आया ताकि बेगम को सूफी दरवेश का आशीर्वाद मिल सके और अकबर को कोई पुत्र प्राप्त हो सके।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि ऐसा समझा गया कि शेख सलीम चिश्ती की कृपा से ई.1569 में बेगम मरियम उज्जमानी की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ इसलिए शहजादे का नाम सलीम रखा गया। सलीम के जन्म के कुछ समय बाद ही अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दर्शन करने के लिए पैदल ही अजमेर के लिए रवाना हो गया।

बादशाह अकबर की इस यात्रा का विवरण हम पूर्व की कड़ियों में कर चुके हैं। जिस समय मरियम उज्मानी गर्भवती थी, उस समय अकबर की एक और बेगम गर्भवती थी किंतु उसे शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद के लिए सीकरी नहीं भेजा गया था। सलीम के जन्म के कुछ दिनों बाद इस बेगम की कोख से एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम खानम रखा गया।

जब अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा के बाद वापस लौटा, तब शुक्ल पक्ष चल रहा था और आकाश साफ होने से रात्रि में चंद्रमा बड़ी तेजी से चमकता था।

इसलिए अकबर (AKBAR) ने चंद्रमा के प्रकाश में शिकार खेलने की योजना बनाई। वह रात होते ही जंगलों में चला जाता और जंगलों में निर्भय होकर आराम करते हुए हिरणों को मार डालता। इस शिकार में अकबर (AKBAR) का बड़ा मनोरंजन हुआ जिसके बारे में उसके दरबारी लेखक ने विस्तार से लिखा है।

ई.1570 में शहजादे मुराद का जन्म हुआ। इस पर अकबर (AKBAR) पुनः अजमेर की यात्रा पर गया। इसी वर्ष उसने अजमेर के मैदानी दुर्ग का जीर्णोद्धार करने के आदेश दिए। यह एक प्राचीन हिन्दू किला था किंतु इस जीर्णोद्धार के बाद इसे अकबर का किला कहा जाने लगा।

इसी यात्रा के बाद अकबर नागौर गया था। नागौर के सूबेदार ने अकबर के स्वागत में एक शानदार भोज का आयोजन किया जिसमें मुगल अधिकारियों के साथ-साथ बहुत से हिन्दू राजाओं एवं जागीरदारों को भी बुलाया गया ताकि वे अकबर की अधीनता स्वीकार कर सकें।

अकबर की नागौर यात्रा का उल्लेख कुछ पिछले आलेखों में भी हुआ है। बीकानेर तथा जैसलमेर के राजाओं ने नागौर में ही अकबर की अधीनता स्वीकार करके मुगलों से अधीनस्थ मित्रता स्थापित कर ली।

जोधपुर का अपदस्थ राव चंद्रसेन भी अकबर से मिलने के लिए नागौर आया। वह छः साल से जोधपुर से बाहर भाद्राजून की पहाड़ियों में रहकर अकबर की सेनाओं से संघर्ष कर रहा था।

अकबर बादशाह ने राव चंद्रसेन से कहा कि वह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ले किंतु राव चंद्रसेन ने बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया तथा फिर से भाद्राजून की पहाड़ियों में चला गया।

राजपूताना राज्यों में अब केवल सिसोदिये ही अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए हुए थे जिनमें मेवाड़ और उसके अधीनस्थ राज्य डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ सम्मिलित थे। इन सभी राज्यों के राजा चित्तौड़ के सिसोदिया कुल से निकले थे तथा मेवाड़ राज्य के अधीन थे। ये अकबर की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि कजली के राजा का दूत अकबर के दरबार में आया। यह राज्य मलाबार के समीप स्थित था। वहाँ का राजा अपने देश और धन के लिए प्रसिद्ध था।

उसे जोगियों से बड़ा लाभ पहुंचा था इसलिए वह उनका सम्मान करता था और उनके जैसे ही कपड़े पहनता था। अबुल फजल लिखता है कि कजली का राजा बहुत अरसे से बादशाह की सेवा में भेंट भेजने का विचार कर रहा था परंतु दूरी के कारण और अन्य भौगोलिक कठिनाइयों के कारण वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा था।

कजली के राज-सेवकों में से कोई व्यक्ति इतनी दूर आने को तैयार नहीं था। कजली के राजा के एक मंत्री के पुत्र ने यह काम करना स्वीकार किया।

कजली के राजा ने मंत्री के पुत्र को बादशाह अकबर के लिए बहुमूल्य उपहार दिए तथा उससे कहा कि मेरे पास एक चमत्कारी चाकू है जो कजली देश के प्राचीन वैद्य ने बनाया है। प्रत्यक्ष रूप में इस चाकू में कोई गुण नहीं है परंतु इसको जिसे भी छुआ जाए उसकी सूजन दूर हो जाती है। तुम इस चाकू को ले जाओ और अकबर (AKBAR) को भेंट करना।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि कजली का राजदूत अकबर (AKBAR) की राजधानी आ गया परंतु बहुत अर्से तक वह बादशाह के दरबार में उपस्थित नहीं हो सका। फिर उसका परिचय राजा बीरबल से हुआ।

बीरबल ने कजली के राजदूत का परिचय बादशाह से करवाया। कजली के राजदूत ने वह चाकू बादशाह को भेंट किया तथा उसे चाकू के रहस्य के बारे में बताया। इस पर अकबर ने राजदूत पर कृपा करके उसे पुरस्कार दिया। इसके बाद कजली का राजदूत अकबर (AKBAR) से अनुमति लेकर अपने देश को लौट गया।

अबुल फजल लिखता है कि यह चाकू अब तक शाही-कोष में रखा हुआ है। मैंने स्वयं बादशाह से सुना है कि इससे 200 से अधिक रोगियों को लाभ हो चुका है।

हालांकि बदायूंनी ने इस घटना का उल्लेख नहीं किया है किंतु इस घटना से यह स्पष्ट हो जाता है कि अकबर के उत्तर भारत विजय अभियानों की चर्चा अब दक्षिण भारत में मलाबार प्रांत तक होने लगी थी और उस क्षेत्र के राजा भी अकबर (AKBAR) अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर पहुंचने से पहले अकबर ने तेरह जंगली गधे मार डाले (95)

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शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर अकबर

शेख फरीद शकरगंज के पूर्वज समरकंद से काबुल आकर रहने लगे थे और बाद में भारत के पंजाब प्रांत में आकर बस गए थे। शेख फरीद शकरगंज का एक पूर्वज फरुख शाह काबुली था जो शाह काबूल कहलाता था। काबुल से आने के कारण यह परिवार भारत में काबूल एवं काबूली कहलाने लगा था।

 ई.1570 में अकबर (AKBAR) अजमेर होता हुआ नागौर गया जहाँ कई हिन्दू राजाओं एवं जागीरदारों ने बादशाह से भेंट करके उसकी अधीनस्थ-मित्रता स्वीकार की थी तथा कुछ हिन्दू राजाओं ने अपनी पुत्रियों के विवाह अकबर से करने स्वीकार किए थे।

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जब बादशाह अकबर नागौर से आगरा के लिए रवाना होने लगा तो उसकी इच्छा हुई कि वह पंजाब के पट्टन नगर में जाकर शेख फरीद शकरगंज की दरगाह की यात्रा करे। इसलिए बादशाह पंजाब की तरफ रवाना हो गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि शेख शकरगंज इन्द्रिय-पालना करने के बहुत विरुद्ध था और आत्मा की शुद्धि के लिए इंद्रिय-संयम पर जोर देता था। चंगेज खाँ के शासन काल में शेख फरीद शकरगंज का एक पूर्वज काजी सईद के नाम से जाना जाता था। वह अफगानिस्तान के कसूर नामक कस्बे में रहता था। बाद में ये लोग काबुल आकर रहने लगे थे जिसके कारण काबूल एवं काबूली कहलाने लगे थे। शेख फरीद शकरगंज का एक पूर्वज फरुख शाह काबुली था जो शाह काबूल कहलाता था। अबुल फजल ने लिखा है कि शेख फरीद शकरगंज दिल्ली के सुल्तान बलबन का समकालीन था और वह उसी समय काबुल से भारत आकर रहने लगा था। उसने पंजाब के मुलतान नगर में रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। दिल्ली का सुल्तान बलबन उसका बड़ा सम्मान करता था। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का उत्तराधिकारी ख्वाजा कुतुबुद्दीन कूसी एक चमत्कारी दरवेश था। उसने शेख फरीद शकरगंज को अपनी सेवा में रख लिया।

अबुल फजल ने लिखता है कि ख्वाजा कुतुबुद्दीन कूसी (Khwaja Qutbuddin Kusi) की कृपा से शेख फरीद शकरगंज को भी करामाती व्यक्तित्व प्राप्त हो गया और उसमें बड़ी-बड़ी करामातें दिखाने की क्षमता आ गई।

अकबर (AKBAR) के पिता हुमायूँ (HUMAYUN) ने जब चुनार की तरफ अभियान किया था तब हुमायूँ ने शेख फरीद शकरगंज के वंशज शेख खलील को अपना एक गुप्त-संदेश देकर शेरशाह सूरी के पास भेजा था। उसके साथ बहुत सारे मुगल अधिकारी भी भेजे गए थे।

शेख खलील ने उन मुगल अधिकारियों के समक्ष शेरशाह सूरी से औपचारिक बातचीत की तथा जब मुगल अधिकारी शेरशाह के दरबार से चले गए तब शेख खलील ने शेरशाह सूरी को हुमायूँ का गुप्त-संदेश दिया- ‘यदि शेरशाह सूरी अपनी सेना हटा ले तो हुमायूँ (HUMAYUN) शेरशाह सूरी के पीछे केवल दिखावा करने के लिए आएगा और शेरशाह के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करेगा।’

शेरशाह ने शेख खलील से कहा- ‘समस्त अफगान अमीर आपके पूर्वज शेख फरीद शकरगंज में विश्वास रखते आए हैं। उसी सम्बन्ध से मैं आपसे पूछता हूँ कि मुझे हुमायूँ से लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए?’

इस पर शेख खलील ने कहा- ‘हालांकि मैं बादशाह हुमायूँ का दूत हूँ किंतु तुमने मुझे अपना जानकर मुझसे यह सवाल पूछा है तो मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम्हें हुमायूँ से युद्ध करना चाहिए क्योंकि इस समय हुमायूँ की सेना बिखरी हुई है तथा उसके पास घोड़ों और पशुओं का अभाव है। तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। क्योंकि ऐसा स्वर्णिम अवसर तुम्हें जीवन में फिर कभी नहीं मिलेगा।’

इस प्रकार शेख खलील ने अकबर (AKBAR) के पिता हुमायूँ (HUMAYUN) के साथ गद्दारी करके शेरशाह सूरी को हुमायूँ से लड़ने के लिए उकसाया था। फिर भी अकबर का शेख फरीद शकरगंज में विश्वास कम नहीं हुआ था और वह शकरगंज की दरगाह पर हाजिरी देने जा रहा था।

जब बादशाह अकबर नागौर से पंजाब की तरफ जा रहा था तब उसे एक रेगिस्तानी वन में जंगली गधे दिखाई दिए। बादशाह ने उनका शिकार करने का विचार किया और वह तीन-चार शिकारियों को अपने साथ लेकर गधों के पीछे चल दिया।

घोड़ों को देखकर गधे बिदक कर भाग खड़े होते थे, इसलिए घोड़ों की पीठ पर बैठे रहकर गधों का शिकार करना संभव नहीं था। अतः अकबर ने अपने घोड़े से उतरकर पैदल ही गधों का पीछा करना आरम्भ किया। अंततः एक गधा उसकी बंदूक की गोली की पहुंच में आ गया और अकबर (AKBAR) ने एक गोली से एक गधा मार डाला।

इस सफलता से अकबर (AKBAR) इतना उत्साहित हुआ कि वह पागलों की तरह तपती हुई रेत में गधों के पीछे तेजी से भागने लगा और उसने एक-एक करके तेरह गधों को बंदूक से मार डाला। इस भाग-दौड़ में अकबर (AKBAR) अपने लश्कर से काफी दूर निकल गया।

उसके संगी-साथी बिछड़ गए और उसने धूप में तपते हुए रेगिस्तान में स्वयं को अकेला पाया। शहंशाह अकबर को जोर से प्यास लग रही थी किंतु दूर-दूर तक पानी उपलब्ध नहीं था। जब वह एक भी कदम चलने की स्थिति में नहीं रहा तो बेदम होकर एक पेड़ के नीचे पड़ गया। काफी देर बार बादशाह के अनुचर उसे ढूंढते हुए आए और उन्होंने अकबर को पानी पिलाया।

अकबर शिकार खेलने के पीछे बचपन से ही दीवाना था और उम्र बढ़ने के साथ उसकी यह दीवानगी बढ़ती जा रही थी। उसने भारत के मैदानों में शेर-चीतों, बाघ-बघेरों, हाथी-हथिनियों, गैण्डों और हिरणों के शिकार तो सैंकड़ों बार किए थे किंतु जंगली गधों का शिकार करने का यह उसका पहला अनुभव था। हालांकि यह अनुभव उसके लिए काफी पीड़ादायक रहा था।

वहाँ से अकबर पंजाब गया और शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर उपस्थित हुआ। शहंशाह (AKBAR) वहाँ पर कई दिन तक रुका। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह ने वहाँ के लोगों को बड़े विचित्र तरीके से मछली पकड़ते हुए देखा।

वहाँ के लोग अपने मुँह और हाथों से मछलियां पकड़ते थे और फिर लोहे के चिमटों से काटकर उनको पानी के बाहर लाते थे। अकबर को ऐसी चीजें देखने में बड़ा आनंद आता था, इसलिए वह घण्टों नदी के किनारे खड़ा रहकर लोगों को मछलियां पकड़ते हुए देखता।

अबुल फजल लिखता है कि कुछ दिनों तक दरगाह पर शारीरिक एवं अध्यात्मिक लाभ करने के बाद 16 अप्रेल 1571 को अकबर (AKBAR) आगरा के लिए रवाना हो गया। मार्ग में उसने चीतों का शिकार किया।

 एक दिन छः चीते पकड़े गए। उनमें से एक का नाम मदनकली रखा गया और उसे शाही-चीतों का मुखिया बना दिया गया। इस समय तक अकबर (AKBAR) को शासन करते हुए सोलह साल हो चुके थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर की रंगीन मिजाजी – मंत्रियों के घर रात गुजारता था अकबर (96)

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अकबर की रंगीन मिजाजी - मंत्रियों के घर रात गुजारता था अकबर (96)

मुगलों का इतिहास मुगल शहजादों की रंगीन मिजाजी के किस्सों से भरा पड़ा है किंतु अकबर की रंगीन मिजाजी उन सभी शहजादों से बढ़कर थी जिन्हें मुगलों के तख्त पर बैठने का अवसर मिला था।

मिर्जा कोका की मेहमान-नवाजी

ईस्वी 1570 में बादशाह अकबर (AKBAR) द्वारा शेख फरीद शकरगंज की दरगाह के दर्शन करने के लिए पंजाब के पाकपट्टन शहर की यात्रा की गई। पाकपट्टन से बादशाह आगरा के लिए रवाना हुआ।

मार्ग में वह पंजाब के दीपालपुर सूबे में रुका जहाँ का हाकिम अजीम मिर्जा कोका था। उसने बादशाह को अपने घर बुलाकर उसकी शानदार दावत की। बादशाह ने दो तीन रात अजीम मिर्जा के घर में गुजारने के बाद लाहौर का रुख किया।

हुसैन कुली खाँ की मेहमान-नवाजी

लाहौर के हाकिम हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) ने भी बादशाह को अपने घर पर दावत का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया। अकबर (AKBAR) हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) के घर में भी दो-तीन दिन रुका और उसके बाद हिसार की तरफ रवाना हो गया।

शेख सलीम चिश्ती का मेहमान

यहाँ से अकबर आगरा जाने की बजाय फिर से अजमेर के लिए रवाना हो गया। अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर कुछ दिन रुकने के बाद बादशाह अजमेर से सीकरी चला गया जहाँ वह शेख सलीम चिश्ती के मकान में ठहरा।

संसार में ऐसा उदाहरण शायद ही देखने को मिले कि किसी दरवेश के घर में कोई शहंशाह मेहमान बनकर ठहरे! कुछ समय पहले ही आगरा के लाल किले में अकबर ने नए महल बनवाए थे किंतु अब उसने आगरा के लाल किले के स्थान पर शेख सलीम के मकान को अपना निवास बना लिया। इस कारण शेख सलीम के बेटे और बहुएं भी तंग होकर शेख सलीम से अकबर (AKBAR) की शिकायतें करते थे।

सीकरी में शाही महलों का निर्माण

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि चूंकि शहंशाह के बेटों का जन्म सीकरी में हुआ था इसलिए शहंशाह को सीकरी में रहना अधिक पसंद था। अबुल फजल लिखता है कि बादशाह की इच्छा हुई कि इस स्थान का वैभव बढ़ाया जाए।

इसलिए उसने आदेश दिए कि सीकरी में शाही उपयोग के लिए भवनों का निर्माण किया जाए। शाही भवनों के साथ-साथ अनेक छोटे-बड़े सरकारी अधिकारियों ने भी सीकरी में मकान बनवा लिए। सीकरी के वैभव को बढ़ता हुआ देखकर व्यापारियों एवं धनी-मानी जनता ने भी सीकरी में अच्छे मकान बनवा लिए।

अबुल फजल लिखता है कि इस शहर के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी खड़ी कर दी गई। थोड़े समय में एक बड़े नगर का निर्माण हो गया और उसमें सुंदर महल बन गए। खानकाह, स्कूल और स्नानागार जैसी लोकोपयोगी संस्थाओं का भी निर्माण हो गया।

एक बड़ा बाजार बनाया गया जिसके निकट बाग लगाए गए। यह नगर ऐसा बन गया कि संसार इससे ईर्ष्या करने लगा। बादशाह ने इसका नाम फतहाबाद रखा था परंतु लोगों में यह फतेहपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अकबर के मंत्री मुजफ्फर खाँ ने आगरा में अपने लिए एक सुंदर मकान बनवाया। उसकी इच्छा थी कि बादशाह स्वयं आकर उसके मकान को देखे। इसलिए मुजफ्फर खाँ की प्रार्थना पर बादशाह उसका मकान देखने आगरा गया।

मंत्रियों के घर दावत

अकबर (AKBAR) ने वैसे भी कुछ सालों से यह मुहिम चला रखी थी कि वह अपने मंत्रियों के घर जाकर दावत खाता था और एक-दो रात उसके घर में बिताता था। कई लोग बादशाह के इस काम को शंका की दृष्टि से भी देखते थे।

अकबर की रंगीन मिजाजी

इस समय तक अकबर अपने अधिकांश शत्रुओं से निबट चुका था। इसलिए अपने समय का अधिकांश भाग शराब पीने, शिकार खेलने और सुंदर स्त्रियों के बीच बिताने लगा। यहीं से अकबर की रंगीन मिजाजी परवान चढ़ने लगी।

अकबर के बागी मंत्रियों और सेनापतियों में से अधिकतर या तो ठिकाने लग चुके थे या सुधर कर बादशाह की शरण में आ चुके थे। फिर भी कोई न कोई व्यक्ति उद्दण्डता करके अकबर (AKBAR) के आमोद-प्रमोद में खलल डाल ही देता था।

एक दिन लश्कर खाँ नामक एक दरबारी शराब के नशे में धुत्त होकर अकबर (AKBAR) के सामने आ गया और दरबार में ही उत्पात मचाने लगा। इस पर बादशाह ने लश्कर खाँ को घोड़े की पूंछ से बांधकर शहर भर में घुमवाया और उसे जेल में डाल दिया।

चौपड़ खेलने का शौक

हरम की औरतों के बीच समय गुजारने के दौरान अकबर को चौपड़ खेलने का शौक लग गया और वह कई-कई घण्टे हरम की औरतों के साथ चौपड़ खेलने लगा। चौपड़ ने अकबर की रंगीन मिजाजी को और भी अधिक गहरा कर दिया। 

एक दिन जफर खाँ नामक एक दरबारी अकबर (AKBAR) के साथ चौपड़ खेलते हुए हार गया। उसने दुबारा खेलने की प्रार्थना की तो बादशाह ने दुबारा खेल शुरु कर दिया। इस बार भी जफर खाँ हार गया। उसने तिबारा खेलने का अनुरोध किया। अकबर (AKBAR) ने उसके साथ तिबारा चौपड़ खेली और इस बार भी जफर खाँ हार गया। जब ऐसा कई बार हुआ तो जफर खाँ का मिजाज बिगड़ गया। वह भूल गया कि बादशाह के समक्ष जिद्द करना ठीक नहीं है और बेअदबी तो बिल्कुल भी नहीं।

हार की खीझ के कारण उसके मुँह से बादशाह की शान के खिलाफ कुछ शब्द निकल गए। बादशाह समझ गया कि अकबर की रंगीन मिजाजी ने ही जफर खाँ को बेअदबी करने का साहस दिया है। बादशाह ने उसी समय खेल बंद कर दिया तथा उसे तुरंत एक सेना लेकर किसी अभियान के लिए रवाना कर दिया।

बगावत के समाचार

इन्हीं दिनों अकबर को समाचार मिले कि गुजरात में मिर्जा लोग भयानक उत्पात कर रहे हैं। इस पर अकबर ने गुजरात जाने का निश्चय किया। अकबर को यह भी समाचार मिल रहे थे कि काबुल का शासक मिर्जा हकीम एक बार फिर से बगावत करने की तैयारी कर रहा है।

नगरकोट की घेराबंदी

इससे बादशाह चिंतित हुआ और उसने पंजाब के शासक खानेजहाँ हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) को आदेश दिया कि वह एक सेना लेकर नगरकोट को घेर ले।

ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह था कि यदि काबुल का शासक हकीम खाँ अकबर के गुजरात अभियान में व्यस्त होने की सूचना पाकर बगावत करने का प्रयास करे तो नगरकोट की सेना को तत्काल काबुल के लिए रवाना किया जा सके। बादशाह अकबर ने मिर्जा यूसुफ खाँ फतू तथा राजा बीरबल के साथ भी एक बड़ी सेना नगरकोट के लिए रवाना कर दी।

गुजरात के लिए कूच

अकबर ने आगरा और फतहपुर सीकरी में भी सुरक्षा के प्रबंध किए और स्वयं गुजरात कूच की तैयारी करने लगा। हर बार की तरह उसने बड़े अभियान पर जाने से पहले अजमेर की यात्रा करना उचित समझा। सेना का अधिकांश हिस्सा गुजरात के लिए रवाना कर दिया गया और बादशाह स्वयं अजमेर के लिए चल पड़ा।

गर्भवती बेगम

अकबर की रंगीन मिजाजी का आलम यह था कि उसका हरम हर समय उसके साथ चलता था जिसमें हजारों बांदियां, बेगमें रक्कासाएं और शहजादियां होती थीं। मार्ग में अकबर ने अपने हरम को आगे भिजवा दिया तथा स्वयं शिकार खेलने के लिए जंगलों में रुक गया। बेगमों को आगे भेजने का कारण यह था कि एक बेगम गर्भवती थी और उसके प्रसव का समय निकट आ गया था। जब अकबर (AKBAR) के सेवक अकबर के हरम लेकर अजमेर पहुंचे तो गर्भवती बेगम की स्थिति काफी नाजुक हो गई।

वह यात्रा का कष्ट सहन करने की स्थिति में नहीं रही। किसी तरह अजमेर पहुंचकर बेगम के प्रसव के लिए एक मकान की व्यवस्था की गई। यह मकान ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के एक खादिम का था। उस मकान को खाली करवाकर बेगम को वहाँ रखा गया और उसका प्रसव कराया गया।

दानियाल का जन्म

9 सितम्बर 1572 को बेगम ने एक लड़के को जन्म दिया। तत्काल ऊंट-सवारों को यह सूचना देकर बादशाह के शिविर की तरफ दौड़ाया गया। उस समय बादशाह का शिविर नागौर सरकार के फलौदी परगने में था।

बादशाह ने अपने तीसरे पुत्र का नाम दानियाल रखा और आदेश दिया कि जब यह लड़का एक महीने का हो जाए तो उसे पालने के लिए आम्बेर के राजा भारमल के पास भेज दिया जाए। वस्तुतः अकबर का आशय भारमल की पुत्री हीराकंवर (मरियम उज्मानी) से रहा होगा जो अकबर (AKBAR) की बेगम थी और इन दिनों आम्बेर में निवास कर रही थी।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

माचातोड़ सैनिक अकबर की सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे (97)

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माचातोड़ सैनिक अकबर की सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे !

मुगल इतिहास में माचातोड़ सैनिक दो बार सामने आते हैं। ये वे हिन्दू सैनिक होते थे जो अपने देश पर शत्रु की सेना का आक्रमड़ होने पर माचा अर्थात् चारपाई पर लेट जाते थे और जब शत्रु सेना आती थी तो उसका खूब सर्वनाश करके वीर गति को प्राप्त करते थे। अकबर की सेना को सिरोही में और औरंगजेब की सेना को उदयपुर में माचातोड़ सैनिक देखने को मिले थे। निश्चित रूप से गुगलों को माचातोड़ सैनिकों का सामना अन्य स्थानों पर भी करना पड़ा होगा किंतु इतिहास में उल्लेख केवल दो ही स्थानों पर मिलता है।

जब ईस्वी 1570 में बादशाह अकबर (AKBAR) को गुजरात में मिर्जा लोगों द्वारा उत्पात मचाए जाने की सूचना मिली तो बादशाह एक सेना लेकर गुजरात के लिए निकल पड़ा। मार्ग में बादशाह ने अपने हरम को अजमेर भिजवा दिया तथा स्वयं शिकार खेलने के लिए जंगलों में रुक गया।

चीतों से शिकार

उन दिनों मरुस्थलीय जंगलों में एशियाई चीतों की बड़ी संख्या निवास करती थी। राजा एवं बादशाह उनका शिकार किया करते थे। साथ ही उन्हें पकड़ कर पालतू बना लिया जाता था ताकि उन्हें शिकार के आयोजनों में साथ ले जाया जा सके।

अकबर ने इस यात्रा में चीतों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार करने का आयोजन किया। यह एक खतरनाक प्रकार का शिकार था। इसके अंतर्गत, सधे हुए पालतू चीतों को जंगली पशुओं के पीछे छोड़ा जाता था।

आज्ञाकारी चीते अपने स्वामी के आदेश पर जंगली पशु का पीछा करते और उसे पकड़कर अपने मुँह से उसकी गर्दन दबोच लेते। जब जंगली पशु की सांस थम जाती तब ये चीते जंगली पशु को घसीटकर अपने मालिक के पास ले आते।

एक दिन बादशाह ने अपने एक सधे हुए चीते के साथ एक हिरण का पीछा किया। हिरण भागने में बहुत तेज था और वह लगभग डेढ़ मील तक भागता चला गया। चीता भी उसके पीछे लगा रहा और घोड़े पर सवार अकबर (AKBAR) तथा उसके सेवक चीते के पीछे लगे रहे।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक स्थान पर लगभग 25 गज चौड़ा नाला आ गया। हिरण ने नाले की परवाह नहीं की तथा लम्बी-लम्बी छलांगें मारते हुए नाले के दूसरी तरफ चला गया। चीते ने भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। वह भी नाले के दूसरी तरफ चला गया और उसने हिरण को पकड़ लिया।

बादशाह चीते के इस साहस से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने चीते का पद बढ़ाकर उसको चीता-ए-खास नियुक्त कर दिया तथा आदेश दिया कि उस चीते के सम्मान में उसके सामने ढोल बजाया जाये।

शाहबाज खाँ का अपमान

अकबर (AKBAR) की सेवा में शाहबाज खाँ नामक एक अमीर रहा करता था। वह अफगानिस्तान से आया हुआ तुजक अमीर था जिन्हें आजकल ताजिक कहा जाता है। उसका काम शाही सवारी की व्यवस्था करने का था। बादशाहकी सेवा में बाबा खान काकशाल नामक अमीर भी रहा करता था। उसे अपने तुर्क होने पर बड़ा घमण्ड था।

इसलिए वह ताजिकों को अपने सामने कुछ भी नहीं गिनता था। एक दिन बाबा खान काकशाल ने शाहबाज खाँ तुजुक का बड़ा अपमान किया। शाहबाज खाँ ने बादशाह से बाबा खान की शिकायत की। इस पर बादशाह अकबर ने बाबा खान को बंदी बनाने तथा उसे कठोर सजा देने के आदेश दिए ताकि भविष्य में किसी भी अमीर को शहंशाह के सेवकों का अपमान करने की हिम्मत न हो सके।

अकबर के सेनापति

12 अगस्त 1572 को शहंशाह अकबर ने खान अकेला (Khan Akela) को गुजरात की ओर रवाना किया। उसके साथ अशरफ खाँ, शाहकुली खाँ, मेहरम शाहबुदाग खाँ, सईद महमूद खाँ कुलीच खाँ, सादिक खाँ, शाह फखरुद्दीन, हैदर मोहम्मद खान, अख्तर बेगी, सईद अहमद खान, क़त्लक कदम खाँ, खान किला का दामाद मुहम्मद कुली खान, मेहर अली खान सिल्दूज, सईद अब्दुल्लाह खान, अमीरजादा अली खाँ और बहादुर खाँ भेजे गए।

1 सितंबर 1572 को बादशाह ने भी अजमेर से प्रयाण किया। वह मार्ग में शिकार करना चाहता था और यह देखना चाहता था कि जो सेनानायक आगे भेजे गए हैं, वे कैसा काम करते हैं! वह यह भी चाहता था कि यथासंभव शीघ्र अति शीघ्र गुजरात प्रांत शाही सेवकों के हाथों में आ जाए।

खान कसाँ की छाती में जमधारा

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि जब शहंशाह अकबर मेड़ता के पास पहुंचा तब यह खबर आई कि सिरोही राज्य में एक राजपूत ने खान कसाँ को जमधारा मारा जो कि एक हथियार है और भारत में बहुत प्रचलित है।

वह जमधारा खान कसाँ की छाती में घुसा और कंधे के पुट्ठे से बाहर निकल गया। घाव गहरा था किंतु मारक नहीं था। मुगल सेना ने उस राजपूत को वहीं पर घेरकर मार डाला। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने यह घटना भाद्राजून की बताई है जो कि सिरोही राज्य में न होकर उसके निकटवर्ती जालौर राज्य में था।

इस सूचना से अकबर समझ गया कि सिरोही के राजपूत, शाही सेना का विरोध करेंगे और उसे अपने राज्य से होकर नहीं जाने देंगे। इस कारण वह संभल कर चलने लगा।

माचातोड़ सैनिक

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब शहंशाह की सेना सिरोही राज्य में पहुंची तो लगभग डेढ़ सौ राजपूतों की एक टुकड़ी ने अपने पैतृक रीति-रिवाज के अनुसार कुछ ने मंदिर में और कुछ ने सिरोही राजा के महल में मरने-मारने का प्रण किया। ये माचातोड़ सैनिक थे जो शरीर में प्राण रहने तक अपने शत्रु का नाश करते रहते थे!

वे लड़े तथा मुगल सैनिकों द्वारा काट दिए गए। इस लड़ाई में दिल्ली के प्रशासक मरहूम तातार खाँ का बेटा दोस्त मोहम्मद शहीद हो गया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने बहुत संक्षेप में इस घटना का उल्लेख किया है। अबुल फजल ने लिखा है कि बहुत से लोग मंदिर में छिप गए।

वस्तुतः उस काल में हिन्दुओं में यह प्रथा थी कि जब उनके राज्य से मुसलमानों की बड़ी सेनाएं गुजरती थीं, जिनका वे सामना नहीं कर सकते थे तो वे अपने मंदिरों से देव-प्रतिमाओं को निकाल कर छिपा देते थे और प्रजा के साथ पूरा नगर खाली करके जंगलों में अथवा ऐसे स्थानों में चले जाते थे जहाँ से वे शत्रु सेना को नुक्सान पहुंचा सकें।

नगर खाली करते समय हिन्दू राजाओं द्वारा प्रतीकात्मक रूप से कुछ बलिष्ठ सैनिकों को मंदिरों एवं राजमहलों के बाहर सुला दिया जाता था। ये सैनिक अपने देवता एवं राजा के स्थान की रक्षा करने के लिए शत्रु से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए वहाँ छोड़े जाते थे।

ये हिन्दू सैनिक खूब खाते-पीते और दिन भर चारपाई पर पड़े रहकर शत्रु के आने की प्रतीक्षा करते। इसलिए उन्हें माचातोड़ अर्थात् चारपाई तोड़ने वाला कहा जाता था।

माचातोड़ सैनिक अपने शत्रु से एक साथ नहीं लड़ते थे। अपितु जब शत्रु सेना मंदिर अथवा राजमहल में प्रवेश करने का प्रयास करती तो माचातोड़ सैनिकों में से कोई एक सैनिक उठता और दोनों हाथों से तलवार चलाता हुआ शत्रुओं को गाजर-मूली की तरह काटता था।

इसी क्रम में वह अपने देवता एवं राजा के निमित्त अपने प्राणों को पुष्प की तरह अर्पित करता था। वस्तुतः सिरोही में अकबर (AKBAR) का सामना इन्हीं माचातोड़ सैनिकों से हुआ था। उसी समय अकबर को सूचना मिली कि राणा कीका, मुगल चौकियों पर हमला करके उन्हें फिर से अपने अधीन कर रहा है।

महाराणा प्रताप के धावे

अकबर कालीन मुस्लिम लेखकों की पुस्तकों में उदयपुर के महाराणा प्रतापसिंह को राणा कीका लिखा गया है। क्योंकि प्रताप के बचपन का नाम कीका था। मेवाड़ क्षेत्र के भील भी प्रताप को कीका के नाम से ही पुकारते थे। मेवाड़ी भाषा में कीका का अर्थ होता है- बच्चा!

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1568 में अकबर ने महाराणा उदयसिंह से चित्तौड़ छीन लिया था और चित्तौड़ के आसपास के काफी बड़े क्षेत्र में मुगल चौकियां स्थापित कर दी थीं जिन्हें उन दिनों थाना कहा जाता था।

28 फरवरी 1572 को महाराणा उदयसिंह का निधन हो चुका था और उसका बड़ा पुत्र प्रतापसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठ चुका था। राणा प्रताप ने गद्दी पर बैठते ही मेवाड़ क्षेत्र की मुगल चौकियों को उजाड़कर उन्हें फिर से मेवाड़ राज्य में मिलाना आरम्भ कर दिया था।

मेवाड़ से आई इस सूचना से अकबर (AKBAR) चिंतित हुआ। उसने बीकानेर के राजकुमार रायसिंह को जो इन दिनों जोधपुर का भी प्रशासक था, महाराणा प्रताप के पीछे भेजा। 

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शेर खाँ फुलादी बादशाह से डर कर भाग गया! (98)

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शेर खाँ फुलादी - bharatkaitihas.com
मुगल पेंटिंग

शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) अकबर (AKBAR) से डर कर भाग गया! अकबर के कर्मचारी मीर खाँ ने गुजराती शहजादे मुजफ्फर खाँ को पकड़ लिया जो कि एक खेत में छिपा हुआ था। बादशाह ने मुजफ्फर खाँ को करम अली के सुपुर्द कर दिया।

शेर खाँ फुलादी के बेटों का ईडर की तरफ पलायन

जब ईस्वी 1570 में बादशाह गुजरात में उत्पात मचा रहे मिर्जा लोगों के विरुद्ध कार्यवाही करने जा रहा था तब मार्ग में उसे सूचना मिली कि अहमदाबाद पर घेरा डालकर बैठे हुए अफगान नेता शेर खाँ फुलादी के बेटे अपने परिवारों को लेकर ईडर की तरफ गए हैं।

अकबर (AKBAR) ने तातार खाँ की अध्यक्षता में एक सेना उनकी तरफ भेजी जिसे सिरोही के सैनिकों ने मार डाला। मुल्ला कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने आम्बेर के राजा भगवानदास के बेटे मानसिंह को एक प्रशिक्षित फौज के साथ ईडर की तरफ भेजा ताकि वह शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के बेटों का पीछा कर सके जो बादशाह के डर से अपने परिवारों को अहमदाबाद से ईडर ले जा रहे थे।

 इस प्रकार अकबर अपने शत्रुओं के विरुद्ध कार्यवाही करता हुआ और अहमदाबाद की तरफ बढ़ता रहा।

रायसिंह राठौड़ द्वारा महाराणा प्रताप की खोज

बीकानेर के राजकुमार रायसिंह राठौड़ को AKBAR ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध भेजा था। वह अपनी सेना लेकर मेवाड़ की पहाड़ियों में घुसा तथा कुंभलगढ़ होता हुआ गोगूंदा की तरफ गया किंतु महाराणा प्रताप के सैनिकों को नहीं ढूंढ सका। इस प्रकार वह मेवाड़ के पहाड़ों में भटकता रहा।

मानसिंह कछवाहा की कार्यवाही

उधर मानसिंह कछवाहा ने बड़ी तेजी से अफगान सेनापति शेर खाँ फुलादी के पुत्रों का पीछा किया। उसने अफगानों की सेना को तितर-बितर करके अफगानों का बहुत सा सामान लूट लिया और फिर से अकबर (AKBAR) की सेना से आ मिला।

अब्दुल रहीम को पट्टन की सूबेदारी

अब शहंशाह और आगे बढ़ा तथा पट्टन तक पहुंच गया। पट्टन गुजरात का एक अत्यंत प्राचीन शहर था जिसका पूरा नाम महमूद गजनवी के आक्रमण के समय अन्हिलपट्टन हुआ करता था किंतु अकबर के समय में घिसकर पट्टन रह गया था।

पाठकों को स्मरण होगा कि यह वही स्थान था जहाँ अफगानियों ने अकबर के संरक्षक बैराम खाँ की हत्या की थी। उस समय बैराम खाँ के पुत्र रहीम खाँ की आयु 5 वर्ष थी। अब वह 16 वर्ष का हो चुका था। अकबर (AKBAR) ने उसे मिर्जा खाँ की उपाधि दी थी। उस काल की पुस्तकों में रहीम का नाम मिर्जा खाँ ही मिलता है।

बैराम खाँ की मृत्यु के बाद से ही अब्दुल रहीम तथा उसकी माँ खानजादा बेगम बादशाह अकबर के हरम में रहते थे। बादशाह ने पट्टन पहुंचने पर बैराम खाँ को याद किया तथा उसके पुत्र अब्दुल रहीम अर्थात् मिर्जा खाँ को अपने पास बुलाया। अकबर ने अब्दुल रहीम को पट्टन का सूबेदार बना दिया तथा सैयद अहमद खाँ को रहीम की सहायता के लिए नियुक्त कर दिया।

शेर खाँ फुलादी का अहमदाबाद से पलायन

इस समय शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) अहमदाबाद का घेरा डाले हुए था। वह एक अफगान योद्धा था और गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती का अमीर था। उसी की तरफ से शेर खाँ ने अहमदाबाद घेर रखा था जो कि विगत काफी समय से अकबर (AKBAR) के अधीन था।

जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि बादशाह पट्टन तक आ पहुंचा तो शेर खाँ फुलादी अपने सैनिकों के साथ अहमदाबाद का घेरा छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

गुजराती शहजादे की गिरफ्तारी

गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती का वजीर इतिमाद खाँ अब भी अहमदाबाद के मोर्चे पर डटा हुआ था। इतिमाद खाँ ने गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती के पुत्र मुजफ्फर को बंदी बना रखा था ताकि गुजरात का सुल्तान इतिमाद खाँ की मुट्ठी में रह सके।

जब शहजादे मुजफ्फर खाँ ने सुना कि शहंशाह अकबर पट्टन तक आ पहुंचा है तो वह भी अवसर पाकर वजीर इतिमाद खाँ की कैद से भाग निकला। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह के कर्मचारी मीर खाँ ने मुजफ्फर खाँ को पकड़ लिया जो कि एक खेत में छिपा हुआ था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि शहंशाह ने गुजरात के शहजादे मुजफ्फर खाँ को शाह मंसूर नामक अपने एक अमीर के संरक्षण में दे दिया तथा मुजफ्फर खाँ के गुजारे के लिए तीस रुपया मासिक की पेंशन बांध दी।

अहमदाबाद नगर की चाबियाँ

जबकि अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह ने मुजफ्फर खाँ को बंदी बनाकर कर्मअली के सुपुर्द कर दिया। उधर अहमदाबाद पर घेरा डालकर बैठे गुजराती वजीर इतिमाद खाँ को बादशाह का भय सताने लगा और वह बहुत सारे गुजराती अमीरों को अपने साथ लेकर बादशाह को सलाम करने के लिए उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। इन अमीरों ने अहमदाबाद नगर की चाबियाँ अकबर (AKBAR) को सौंप दीं।

हब्शियों को मुगलों की गुलामी

कुछ अबीसीनियन अर्थात हब्शी सैनिक भी अहमदाबाद के मोर्चे से भागकर अकबर की शरण में आए। इनमें कुछ अमीर भी थे। बादशाह ने गुजराती वजीर इतिमाद खाँ से कहा कि वह इन हब्शियों की जमानत दे किंतु गुजराती अमीरों ने उनकी जमानत देने से मना कर दिया।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि उन सब हब्शियों को पकड़कर मुगल सेनापतियों के पहरे में रख दिया। जबकि अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह ने आदेश दिए कि उन्हें गुलाम बना लिया जाए तथा वे मुगलों की सेवा चाकरी के काम में लगाए जाएं।

अकबर का हरम

जब अकबर अपनी राजधानी फतहपुर सीकरी से बाहर जाता था तो उसके हरम की हजारों लौण्डियाएँ, मुगल बेगमें तथा शहजादियाँ भी मुगल सेना के पहरे में बादशाह के पीछे-पीछे चलती थीं। यहाँ अकबर ने अपना हरम अपने विश्वासपात्र सैयद महमूद बारहा तथा शेख महमूद बुखारी के संरक्षण में छोड़ा और स्वयं तेजी से पट्टन से निकल गया।

साबरमती एवं साम्बे

से रवाना होकर अहमदाबाद के निकट साबरमती के तट पर जा पहुंचा। अकबर के तम्बू साबरमती के तट पर लगाए गए। कुछ दिनों तक साबरमती के तट पर मनोविनोद करने के बाद अकबर साम्बे की ओर रवाना हुआ। इसी बीच सैयद महमूद बारहा तथा शेख महमूद बुखारी बादशाह के हरम को लेकर साबरमती पहुंच गए।

गुजरात के शहरों की घेराबंदी

अहमदाबाद भले ही बादशाह के हाथ में आ गया था किंतु भुज, बड़ौदा एवं सूरत आदि शहरों को इस समय भी गुजरात के अफगान अमीरों तथा इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) और मुहम्मद हुसैन मिर्जा की सेनाओं ने घेर रखा था।

मुल्ला बदायूंनी ने अपनी पुस्तक में भुज को भोज लिखा है। इसलिए प्रतीत होता है कि भुज का वास्तविक नाम भोज रहा होगा। सातवीं-आठवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजाओं में यह नाम खूब प्रचलन में था।

अतः भोज किसी हिन्दू राजा ने बसाया होगा। कच्छ के रण में स्थित होने के कारण आजकल इस स्थान को भुज कच्छ कहा जाता है।

अबीसीनियन अमीर फरार

गुजरात के अमीरों में इख्तियार उल मुल्क नामक एक अबीसीनियन अमीर भी था। वह अवसर पाकर अहमदाबाद से भागकर अहमदनगर चला गया। अकबर को आशंका हुई कि गुजरात के सुल्तान का वजीर इतिमाद खाँ भी भाग सकता है।

इसलिए अकबर (AKBAR) ने उसे शहबाज खाँ कंबो के संरक्षण में दे दिया अर्थात् इतिमाद खाँ पर शहबाज कंबो का पहरा लगा दिया। शेर खाँ फुलादी अब भी मुगल सेना की पकड़ से दूर था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा  को मारने के लिए रात में नदी में उतर गया अकबर! (99)

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इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की सेना लम्बे कांटेदार पेड़ों के पीछे से अचानक प्रकट हुई और उसने राजा भगवानदास पर हमला किया। यहाँ की धरती बहुत ऊबड़-खाबड़ थी। राजा भगवान दास घायल हो गया और उसे पीछे हटना पड़ा।

जब ईस्वी 1570 में अकबर (AKBAR) ने गुजरात के लिए अभियान किया तो अहमदाबाद को घेर कर बैठे अफगान अमीर एक-एक करके बादशाह की शरण में आने लगे किंतु बादशाह ने उनका विश्वास नहीं किया और उन्हें अपने अमीरों के संरक्षण में रख दिया।

रुस्तम खाँ रूमी की हत्या

बादशाह को सूचना मिली कि सुल्तान मिर्जा के पुत्र इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) ने भोज के किले में अकबर (AKBAR) के सेनापति रुस्तम खाँ रूमी को मार डाला है और इब्राहीम हुसैन मिर्जा बादशाह के शिविर से आठ कोस की दूरी से होकर निकलने वाला है।

इस पर शहंशाह ने अपने हरम तथा शहजादे सलीम को बहुत से अमीरों के संरक्षण में अपने शिविर में छोड़ा तथा स्वयं एक बड़ी सेना लेकर इब्राहीम हुसैन मिर्जा को नष्ट करने के लिए रवाना हुआ।

मिर्जा लोग अकबर के ही खानदान के शहजादे थे किंतु वे शहंशाह को हटाकर स्वयं बादशाह बनना चाहते थे। इनमें से कई मिर्जाओं को बाबर (BABUR)  की बेटियां, पोतियां, दोहितियां भी ब्याही गई थीं। इसलिए मुगल बादशाह प्रायः इनके प्राण नहीं लेते थे। उसी का लाभ उठाकर मिर्जा लोग बार-बार बगवात किया करते थे।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा पर दो तरफा घेरा

शहंशाह अकबर ने मानसिंह कच्छावा को अपने आगे-आगे चलने को कहा। ये लोग रात में महिंद्री नदी के किनारे पहुंचे। शहंशाह के पास इतना समय नहीं था कि वह रात बीत जाने तक नदी के इस पार रुके, क्योंकि उसे सूचना मिल चकी थी कि इब्राहीम हुसैन का शिविर नदी के दूसरी तरफ सरनाल कस्बे में लगा हुआ है।

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यदि अकबर (AKBAR) नदी के इस तरफ ही रात भर रुक जाता तो अवश्य ही मिर्जा को पता लग जाता और वह भाग खड़ा होता। अतः रात में ही नदी पार करने का निश्चय किया गया। नावों का प्रबंध नहीं हो सकता था। इसलिए अकबर ने चालीस घुड़सवारों के घेरे में घोड़े पर ही नदी पार करने का निश्चय किया। अकबर (AKBAR) ने आदेश दिए कि इब्राहीम हुसैन को दो तरफ से घेरा जाए। इसलिए कुंअर मानसिंह महिंद्री नदी के छिछले भाग से होकर इब्राहीम हुसैन मिर्जा की सेना के दूसरी तरफ पहुंच गया। शहंशाह अकबर ने एक सेना कुछ दिन पहले ही सूरत की तरफ रवाना की थी। अकबर के भाग्य से वह सेना भी उसी क्षेत्र में आ पहुंची थी। अतः शहंशाह के आदेश से वह सेना भी रात में ही अकबर से आ मिली। इब्राहीम हुसैन मिर्जा के पास लगभग एक हजार घुड़सवार थे। जबकि बादशाह के पास चालीस और मानसिंह के पास लगभग 100 घुड़सवार थे। अतः सूरत जा रही मुगल सेना के आ मिलने से अकबर को बहुत सहायता मिल गई।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा की फुर्ती

जब इब्राहीम हुसैन को सूचना मिली कि बादशाह ने बहुत थोड़े से सैनिकों के साथ नदी पार कर ली है तथा वह सरनाल गांव पर हमला करने की तैयारी कर रहा है तो इब्राहीम हुसैन (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) ने भी फुर्ती दिखाई और वह गांव से बाहर निकलकर एक मैदान में आ गया और मोर्चाबंदी करके बैठ गया।

उसे ज्ञात नहीं था कि सूरत जाने वाली मुगल सेना भी अकबर की सहायता के लिए आ गई है और कुंवर मानसिंह नदी के दूसरी तरफ से इब्राहीम हुसैन मिर्जा की तरफ बढ़ रहा है।

तीन ओर से मुगल सेना के आ जाने से इब्राहीम हुसैन बुरी तरह घिर गया। उसने इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी। फिर भी हौंसला खोए बिना उसने युद्ध आरम्भ कर दिया।

हालांकि मुल्ला बदायूंनी ने नहीं लिखा है फिर भी अनुमान लगाया जा सकता है कि इन सब कार्यवाहियों में रात बीत चुकी होगी और धरती पर भगवान सूर्य नारायण का प्रकाश फैल चुका होगा। सबसे पहले बाबा खाँ काकशाल अपने तीरंदाजों के साथ इब्राहीम हुसैन मिर्जा की तरफ बढ़ा।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा का आक्रमण

इब्राहीम हुसैन मिर्जा ने बाबा खाँ काकशाल और उसकी तीरंदाजी टुकड़ी पर धावा बोला और उसे काफी पीछे धकेल दिया। इस धावे में दोनों ओर के कई सैनिक मारे गए। अब कुंअर मानसिंह कच्छावा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की तरफ बढ़ा। इस झड़प में राजा भगवान दास कच्छावा का एक अन्य पुत्र कुंअर भुवनपति मारा गया।

अब तो इब्राहीम हुसैन का हौंसला बढ़ गया और उसने अपने सैनिकों को आगे बढ़कर शाही सैनिकों पर हमला करने का आदेश दिया। उसने अपने सैनिकों को तीन दलों में बांट दिया। एक दल को राजा भगवान दास कच्छवाहा पर आक्रमण करने के आदेश दिए तथा दूसरे दो दलों को दो तरफ से अकबर (AKBAR) को घेरेने के लिए भेजा।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि जब इब्राहीम हुसैन मिर्जा की सेना शाही सेना की तरफ आई तो सबसे पहले राजा भगवान दास कच्छवाहा ने उसका मार्ग रोका। इब्राहीम हुसैन मिर्जा की सेना लम्बे कांटेदार पेड़ों के पीछे से अचानक प्रकट हुई और उसने राजा भगवानदास पर हमला किया। यहाँ की धरती बहुत ऊबड़-खाबड़ थी। राजा भगवान दास घायल हो गया और उसे पीछे हटना पड़ा।

अकबर पर संकट

दो तरफ से इब्राहीम हुसैन मिर्जा के सैनिकों को आया देखकर अकबर के सैनिकों ने AKBAR को अपने घेरे में ले लिया और वे इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के सैनिकों से लड़ने लगे। इस समय बादशाह के सैनिकों की संख्या अधिक थी, अन्यथा कभी भी कुछ भी हो सकता था।

कुछ देर तक चली भीषण लड़ाई के बाद अकबर की सेना ने मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के सैनिकों को काट कर फैंक दिया। बादशाह इस तरह किसी अन्य लड़ाई में लड़ा हो, इसका उल्लेख नहीं मिलता।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा की पराजय

इब्राहीम हुसैन मिर्जा किसी तरह जान बचाकर भाग निकला। इस समय तक फिर से रात हो चुकी थी। इसलिए उस समय अकबर (AKBAR) की सेना उसका पीछा नहीं कर सकी। सुबह होने पर शाह कुली खाँ मरहम तथा सादिक मुहम्मद खाँ और कुछ अन्य अमीरों को इब्राहीम हुसैन मिर्जा के पीछे भेजा गया।

इस समय तक फिर से रात हो चुकी थी। इसलिए इब्राहीम हुसैन रात का लाभ उठाकर सिरोही की तरफ भागा। सिरोही से वह नागौर गया और वहाँ से दिल्ली होता हुआ संभल की ओर भाग गया जो मिर्जाओं की जागीर थी।

शाहकुली खाँ महरम द्वारा मिर्जा के खेमे की लूट

फिर भी शाहकुली खाँ महरम तथा अन्य अमीरों ने इब्राहीम हुसैन (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) का बहुत सा सामान लूट लिया तथा उसे लेकर अकबर (AKBAR) के पास लौट आए।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने शाहकुली खाँ के लिए महरम शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ होता है, वह आदमी जिसे शाही हरम में प्रवेश करने का अधिकार हो क्योंकि इस व्यक्ति का विवाह हरम की किसी भी औरत से नहीं हो सकता था।

कहा नहीं जा सकता कि वे कौनसी औरतें थीं जिनसे महरम का विवाह नहीं हो सकता था क्योंकि मुगलों में तो ममेरी, चचेरी, फुफेरी एवं मौसेरी बहिनों से भी विवाह होते थे। फिर भी यह तय है कि उस काल में कुछ लोगों को महरम कहा जाता था और उनका बहुत आदर होता था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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