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रामचरित मानस में ज्योतिष

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रामचरित मानस में ज्योतिष

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख गोस्वामी तुलसीदासजी के साहित्य की एक ऐसी अनूठी विशेषता है जिसका जोड़ कहीं अन्यत्र देखना कठिन है। सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत पर मुसलमानों का शासन था किंतु वह शताब्दी गोस्वामी तुलसीदास की थी। उस काल में भारत भर में तुलसीदास के समान लोकप्रिय एवं लोकहितकारी मनुष्य और कोई नहीं हुआ।

भारतीय जनमानस पर रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख गोस्वामी तुलसीदासजी प्रभाव शताब्दियों को लांघकर कालजयी बन गया है। यही कारण है कि आज भी गोस्वामी तुलसीदास द्वारा विरचित साहित्य राष्ट्र एवं लोक के लिए उतना ही प्रासंगिक एवं आवश्यक है जितना कि सोलहवीं शताब्दी के भारत के लिए था।

यद्यपि गोस्वामी तुलसीदास का सम्पूर्ण साहित्य धर्म, दर्शन एवं अध्यात्म को लक्ष्य बनाकर लिखा गया है तथापि उनका सर्वप्रधान लक्ष्य लोकमंगल है। किसी कालजयी साहित्य के जितने भी विराट् लक्ष्य हो सकते हैं, गोस्वामी तुलसीदास का साहित्य उन लक्ष्यों को एक साथ साधता है। इस लेख में हम गोस्वामीजी के महाकाव्य रामचरित मानस में लिखित ज्योतिषीय उल्लेखों पर चर्चा कर रहे हैं।

ज्योतिष भारतीय लोकजीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। प्रत्येक हिन्दू अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए कभी न कभी ज्योतिषशास्त्र की किसी न किसी शाखा का सहारा लेता ही है। लोकजीवन का अंग होने के कारण गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य में ज्योतिष को स्थान मिलना ही था।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखित ग्रंथों की वास्तविक सूची के बारे में यद्यपि अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है तथापि नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा 12 ग्रंथों को गोस्वामीजी द्वारा प्रणीत माना गया है-

1. रामचरित मानस,

2. रामलला नहछू,

3. वैराग्यसंदीपनी,

4. बरवै रामायण,

 5. पार्वती मंगल,

6. जानकी मंगल,

7. रामाज्ञा-प्रश्न,

8. दोहावली,

9. कवितावली,

10. गीतावली,

11. कृष्णगीतावली,

12. विनय पत्रिका।

यह ग्रंथ सूची पूरी नहीं है। हनुमान बाहुक तथा हनुमान चालीसा गोस्वामीजी द्वारा रचित दो ऐसे लघु ग्रंथ हैं जिन्हें ग्रंथों का रत्न कहा जा सकता है। करोड़ों भारतीय प्रतिदिन इन दोनों अथवा इनमें से किसी एक ग्रंथ का पाठ करते ही हैं, ठीक रामचरित मानस की तरह। कुछ और ग्रंथ भी गोस्वामीजी द्वारा रचित हो सकते हैं। इन समस्त ग्रन्थों में से ‘रामाज्ञा-प्रश्न’ को छोड़कर एक भी ज्योतिष-ग्रंथ नहीं है किंतु इन सभी ग्रंथों में प्रसंगवश ज्योतषीय उल्लेख मिलते हैं।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख

रामचरित मानस लोकजीवन का ग्रंथ है। इसमें दशरथ पुत्र राम को न केवल पूर्णब्रह्म परमात्मा के अवतार के रूप में, अपितु लोकजीवन के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भारत में इस ग्रंथ के समान कोई अन्य ग्रंथ लोकप्रियता का स्तर स्पर्श नहीं कर सका है। इस ग्रंथ में सैंकड़ों स्थलों पर ज्योतिष सम्बन्धी तथ्यों का उल्लेख हुआ है। इनमें नक्षत्र-दर्शन, ग्रह गोचर, स्वप्नफल, शुभ-दिन, जन्मकुण्डली मिलान, शकुन विचार, उल्कापात आदि विषयक तथ्य कहे गए हैं।

काल की प्रबलता का विचार

रामचरित मानस में काल की प्रबलता को स्वीकार किया गया है जो कि ज्योतिष शास्त्र की प्रमुख अवधारणा है। अयोध्याकाण्ड में राम-वनवास प्रसंग में जब रानी कैकेई रामजी को वनवास भेजने के लिए हठ पकड़ लेती है तब राजा दशरथ कहते हैं कि तेरा कोई दोष नहीं है, मेरा काल (मृत्यु) तेरे ऊपर आकर बैठ गया है, वही तुझसे इस प्रकार के वचन कहलवा रहा है-

मरम बचन सुनि राउ कह, कहु कछु दोष न तोर।

लागेउ तोहि पिसाच जिमि काल कहावत मोरि।।

काल के भी काल का विचार

लंकाकाण्ड में उल्लेख आया है कि विभीषणजी रावण को श्रीराम के ईश्वरत्व के बारे में बताते हुए कहते हैं कि राम मनुष्य या राजा मात्र नहीं हैं, वे सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी तथा कालों के काल हैं-

‘तात राम नहीं नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहु कर काला।’

जब हम ‘कालों के काल’ के आशय पर विचार करते हैं तो इसके कई अर्थ निकल सकते हैं, यथा-

1. राम ‘काल’ अर्थात् ‘समय’ के स्वामी हैं,

2. राम काल को भी मृत्यु देने वाले हैं,

3. राम ‘मृत्यु’ को भी ‘मृत्यु’ देने वाले हैं, आदि।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – काल गणना का विचार

भारत में किसी महत्वपूर्ण कार्य अथवा घटना के समय का अंकन करने के लिए संवत्, मास, तिथि, वार आदि का उल्लेख किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में, ज्योतिष परम्परा के अनुसार ग्रंथ आरम्भ करने की तिथि का इसी प्रकार उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि संवत 1631 के मधुमास (चैत्रमास) की नवमी तिथि, मंगलवार को यह चरित प्रकाशित हुआ-

संबत सोरह सै एकतीसा, करउँ कथा हरि पद धर सीसा।

नौमी भौम बार मधुमासा, अवधपुरी यह चरित प्रकासा।।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – संवत् सम्बन्धी अवधारणा

संवत् का अर्थ एक ‘वर्ष’ की अवधि से है। भारतीय ज्योतिष में एक कहावत प्रचलित है कि ‘यदि संवत्सर न होता तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, ऋतु और अयन, सभी व्याकुल रहते।’ रामचरित मानस में संवत् का उल्लेख अनेक दोहों एवं चौपाइयों में हुआ है। बालकाण्ड में उल्लेख है कि जब भी मकर संक्रांति आती है तो ऋषि-मुनि तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने के बाद अपने स्थानों के लिए प्रस्थान करते हैं। यह आनंद प्रति वर्ष होता है-

‘प्रति संबत अति होई अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनि बृंदा।’

बालकाण्ड में ही उल्लेख हुआ है कि सत्तासी हजार वर्ष तक समाधिस्थ रहने के बाद भगवान शिव ने अपनी समाधि छोड़ी-

‘बीते संबत सहस सतासी, तजी समाधि संभु अबिनासी।’

पार्वती द्वारा शिव को वर प्राप्त करने के लिए की गई तपस्या के संदर्भ में कहा गया है कि एक हजार साल तक पार्वती ने वनों में उगने वाले मूल एवं फल खाए और उसके बाद सौ साल केवल शाक खाकर व्यतीत किए-

‘संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।’

मनु और शतरूपा द्वारा भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए जो तपस्या की गई, उसके वर्णन में गोस्वामीजी ने लिखा है कि मनु और शतरूपा ने साठ हजार सालों तक केवल पानी ही आहार रूप में ग्रहण किया और उसके बाद सात हजार साल तक केवल हवा को ही प्राणों का आधार बनाया। एक हजार साल तक बिना हवा के, एक पैर पर खड़े रहे-

एहि बीते बरष षट सहस बारि आहार।

संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार।

बरस सहस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – कल्प सम्बन्धी अवधारणा

हजारों वर्षों की तपस्याओं के बारे में सुनकर बहुत से लोग इन कथनों पर अविश्वास करने लगते हैं। वस्तुतः भारतीय धर्मशास्त्रों में वर्णित इतिहास केवल वर्तमान सृष्टि का नहीं है, अपितु इन धर्मशास्त्रों में काल के गाल में समा चुकी बहुत सी सृष्टियों का वर्णन हुआ है जिनमें से कुछ इस धरती पर घटित हुई थीं तो कुछ सृष्टियाँ अलौकिक होने के कारण इस इस लोक में न होकर किसी अन्य लोक में घटित हुई थीं। इनमें से कुछ घटनाएँ मानवीय न होकर प्राकृतिक घटनाओं से सम्बन्ध रखती हैं।

इन घटनाओं के संदर्भ स्पष्ट नहीं होने से हमें हजारों सालों की तपस्याओं के बारे में जानकर विश्वास नहीं होता। ऐसी सृष्टियों में काल की गणना संवत् अर्थात् 365 दिन के कैलेण्डर में नहीं की जाती, अपितु युगों, चतुर्युगों, महायुगों एवं कल्पों में चलती है। ठीक उसी तरह जिस तरह खगोलीय पिण्डों की दूरी मीटर या किलोमीटर में न नापी जाकर, प्रकाशवर्ष में नापी जाती है। प्रकाश की किरण एक वर्ष में लगभग 95 खरब किलोमीटर चल सकती है, इस दूरी को एक प्रकाशवर्ष कहते हैं। जिस तरह प्रकाशवर्ष दूरी नापने की इकाई है, उसी प्रकार ‘कल्प’ काल की अवधि नापने की बड़ी इकाई है।

भारतीय धर्मशास्त्रों एवं ज्योतिषशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा के एक दिन को एक ‘कल्प’ कहते हैं। एक कल्प की अवधि मानवों के 432 करोड़ वर्ष के बराबर होती है। रामचरित मानस में भी काल की इस बड़ी इकाई अर्थात् ‘कल्प’ का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है। प्रत्येक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं अर्थात् एक कल्प में 14 सृष्टियां जन्म लेती हैं और 14 बार प्रलय होती है।

प्रत्येक नई सृष्टि, पहले वाली सृष्टि से बिल्कुल अलग होती है किंतु पुरानी सृष्टि का कोई मनुष्य नई सृष्टि के लिए नया मनु बनता है। प्रत्येक सृष्टि में भगवान के कई-कई अवतार होते हैं। रामचरित मानस में विभिन्न कल्पों में हुए अवतारों की चर्चा बहुत संक्षेप में हुई है। पूर्व के किसी कल्प में भगवान ने जलंधर नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार धारण किया-

एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।।

एक अन्य पूर्व कल्प का उल्लेख करते हुए गोस्वामीजी ने लिखा है कि एक बार नारद मुनि ने भगवान को श्राप दिया। इस कारण एक कल्प में भगवान को अलग से अवतार लेना पड़ा-

‘नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।’

वर्तमान कल्प में भगवान कौसल्या एवं दशरथ के पुत्र के रूप में अवतरित हुए।

एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा।।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – कल्पांत में भी न मरने वाले भक्त

हिन्दू धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि काल प्रत्येक जीव को मृत्यु देता है किंतु भगवान के कुछ भक्तों का नाश कभी नहीं होता। वे कल्पांत में भी नहीं मरते। रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में भगवान शिव ऐसे ही एक भक्त कागभुशुण्डि का उल्लेख करते हुए, पार्वती से कहते हैं-

‘तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।’

उत्तरकाण्ड में ही उल्लेख आया है कि जब भगवान राम ने अपनी बाल्यावस्था में कागभुशुण्डि को अपने मुख में ले लिया तो कागभुशुण्डि ने भगवान के उदर के भीतर करोड़ों ब्रह्माण्ड देखे जिनमें काकभुशुण्डि एक-एक सौ वर्ष तक रहे। इस प्रकार वे भगवान के उदर में सौ कल्पों तक घूमते फिरे-

एक एक ब्रह्माण्ड महुँ रहउँ बरष सत एक।

ऐहि बिधि देखत फिरऊँ मैं अण्ड कटाह अनेक।

भ्रमत मोहि ब्रह्माण्ड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।

इसी प्रकार रामचरित मानस में लोमश ऋषि का भी उल्लेख हुआ है जिनकी आयु इतनी अधिक है कि जब कल्पान्त में ब्रह्माजी का लय होता है, तब इनका केवल एक रोम (लोम) गिर जाता है।

ऐसे और भी उदाहरण हैं जिनमें काल की इतनी दीर्घ अवधि का उल्लेख हुआ है जो कि भारतीय ज्योतिष की अनूठी कालगणन विधि पर आधारित है।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – युगों की अवधारणा

भारतीय धर्मग्रंथों में चार युगों की अवधारणा है- कृतयुग (सतयुग), त्रेता, द्वापर, कलियुग। सतयुग में धर्म के चार चरण रहते हैं, त्रेता में धर्म के तीन चरण रहते हैं, द्वापर में धर्म के दो चरण रहते हैं तथा कलियुग में धर्म का एक ही चरण बचता है। इसी कारण कलियुग लंगड़ा है। रामचरित मानस में चतुर्युग की अवधारणा का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है-

ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेता भइ कृतजुग कै करनी।

एक बार त्रेता जुग माहीं, संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।

काल के शुभ-अशुभ होने का विचार

वैदिक ऋषियों ने यज्ञों के लिए शुभ समय का पता लगाने के लिए ही कालगणना आरम्भ की। रामचरित मानस में शुभ-अशुभ समय का उल्लेख बार-बार हुआ है जो कि ज्योतिषीय गणना से ही ज्ञात हो सकती है।

पर्वतराज हिमालय ने शिव-पार्वती विवाह के लिए ज्योतिष के अनुसार शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, शुभ घड़ी, शुभ लग्न और शुभ मुहूर्त निर्धारित करवाने के बाद लग्नपत्रिका लिखवाई-

सुदिनु सुनखतु सुधरी सोचाई। वेगि बेदविधि लगन धराई।।

सीता स्वयंवर में विश्वामित्र शुभ समय जानकर रामचंद्रजी को धनुषभंग करने के लिए उठने का आदेश देते हैं-

विश्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।।

उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।।

सीता-राम विवाह के लिए दशरथजी और जनकजी दोनों राजा अपने-अपने ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त निलवाते हैं। इस प्रसंग में गोस्वामीजी ने लिखा है कि ब्रह्माजी ने स्वयं हेमन्त ऋतु, अगहन मास, शुभ ग्रह, शुभ तिथि, शुभ योग, शुभ नक्षत्र और श्रेष्ठ वार शोधकर मुहूर्त निकाला-

ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।।

मंगल मूल लगन दिन आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।

महाराजा जनक के ज्योतिषों ने भी शुभ मुहूर्त की वही गणना कर रखी थी-

‘गुनी जनक के गनकन्ह जोई।’

रामचरित मानस में बेला का भी उल्लेख हुआ है। राजा जनक ने गोधूलि बेला में बारात का स्वागत किया। इसी प्रकार बरात की विदाई के अवसर पर राजा जनक ने सुलग्न अर्थात् शुभ मुहूर्त का विचार किया-

प्रेम बिबस परिवारु सब जानि सुलगन नरेस। कुंअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।

जब चारों राजकुमार अयोध्या लौट आते हैं और विवाहोत्सव पूर्ण हो जाता है तब शुभ मुहूर्त में उनकी कलाइयों के  कंकण खोले गए-

सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।।

अयोध्याकाण्ड में उल्लेख है कि जब महाराजा दशरथ ने गुरु वसिष्ठ से कहा कि मैं राम को युवराज बनाना चाहता हूँ। तो वसिष्ठ ने कहा कि आप राम को युवराज बनाने में विलम्ब न करें। जिस समय राम युवराज होंगे, वह दिन बहुत शुभ एवं मंगलकारी होगा।

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।

सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।

जब राजा जनक को यह समाचार मिला कि राजकुमार भरत अपने भाई श्रीराम को मनाने चित्रकूट गए हैं तो वे भी अपने मंत्रियों एवं परिवार को लेकर चित्रकूट के लिए रवाना हो गए। वे यात्रा आरम्भ करने के लिए ग्रह-नक्षत्र आदि पर विचार न करके दो घड़ी में मिलने वाले शुभ मुहूर्त में रवाना हो गए-

दुघरी साधि चले तत्काला। किए बिश्राम न मग महिपाला।।

इसी प्रकार जब भरतजी चित्रकूट से रामजी की पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटते हैं तो वे गणक (ज्योतिषों) को बुलाकर शुभ घड़ी में पादुकाओं को सिंहासन पर निर्विघ्न विराजमान करते हैं-

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।

सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।

जब भगवान राम अपने महल में चले गए, तो अयोध्या के नर-नारी सुखी हुए। गुरु वसिष्ठ ने ब्राह्मणों को बुलाकर कहा आज शुभ घड़ी, शुभ दिन तथा समस्त शुभ योग हैं।

शुक्लपक्ष एवं कृष्ण पक्ष की अवधारणा

प्रत्येक मास में दो पक्ष होते हैं- शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष। शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कलायें बढ़ती जाती हैं और कृष्णपक्ष में घटती जाती हैं। इसी तथ्य को कवि ने सुयश और अपयश के रूप में चित्रित किया है। गोस्वामीजी लिखते हैं कि शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में चंद्रमा का प्रकाश एक जैसा ही होता है किंतु चूंकि एक पक्ष में चंद्रमा घटता है इसलिए उसे काला (कृष्णपक्ष) नाम का अपयश मिला जबकि दूसरे पक्ष में चंद्रमा बढ़ता है, इसलिए उसे श्वेत (शुक्लपक्ष) नाम का यश मिला-

सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।

ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।

ग्रह एवं नक्षत्रादि योग

गोस्वामीजी ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों में ग्रह-नक्षत्रों का उल्लेख बार-बार किया है। रामचंद्र के जन्म-समय के ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के लिए तुलसीदासजी ने लिखा है सुखों के मूल ‘राम-जन्म’ पर समस्त नक्षत्रों के योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गए। चेतन और जड़ सभी प्रसन्न हो उठे। कहने का आशय यह कि लोक में कार्य-सिद्धि के लिए नक्षत्रों के योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि अनुकूल होने चाहिए, इसलिए रामचंद्रजी के जन्म के समय समस्त ग्रह-नक्षत्र स्वयं ही अनुकूल हो गए। 

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।

चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – नौ ग्रहों की शोभा

एक चौपाई में अंतरिक्ष में विराजमान ग्रहों की शोभा का वर्ण करते हुए गोस्वामीजी लिखते हैं- ऐसा लगता है मानो नौ ग्रहों ने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावती को आकर घेर लिया हो-

नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।।

नवग्रह वन्दना

एक दोहे में गोस्वामीजी ने ग्रहों को देवताओं, ब्राह्मणों एवं पण्डितों की श्रेणी में रखते हुए कहा है कि देवता, ब्राह्मण, पंडित और ग्रह के चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप सब प्रसन्न होकर मेरे समस्त मनोरथ पूरे करें-

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।

होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।

मघा नक्षत्र में वर्षा की अवधारणा

मघा नामक नक्षत्र के बादल मूसलाधार वर्षा के कारक होते हैं। ज्योतिष की इस धारणा को रामचरित मानस में भी व्यक्त किया गया गया है। जब कुंभकरण वध हो जाने के बाद मेघनाद रणभूमि में आता है तो वह अपने धनुष से बाणों की वृष्टि सी कर देता है। इसका वर्णन करते हुए गोस्वामीजी ने लिखा है-

‘मानहुं मघा मेघ झरि लाई।’

ग्रहों की संक्रांति की अवधारणा

रामचरित मानस में ग्रहों की संक्रांति के अध्यात्मिक महत्त्व की अवधारणा भी उपलब्ध है जिसकी गणना ज्योतिषशास्त्र में होती है। गोस्वामीजी ने मकर संक्रांति के अध्यात्मिक महत्त्व का उल्लेख करते हुए लिखा है कि माघ मास में जब सूर्य मकर राशि का संक्रमण करता है तब समस्त जन तीर्थपति प्रयागराज में आते हैं- ‘माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपतहिं आव सब कोई।’

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – बुरे ग्रहों की अवधारणा

ज्योतिष शास्त्र में राहु, केतू और शनि को पापग्रह माना गया है। गोस्वामीजी ने रामचरित मानस में बुरे मनुष्यों की तुलना राहु-केतु एवं शनि आदि पापग्रहों से की है। एक चौपाई में उन्होंने लिखा है कि विष्णु और शिव के यशस्वी पूर्णिमा रूपी चन्द्रमा के लिये, दुष्टजन राहु के समान हैं। वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिए सहस्रबाहु के समान बलवान हैं-

हरिहर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से।

जिस प्रकार केतु के उदय होने पर मनुष्य का बुरा होता है। उसी प्रकार कुछ लोग अपनी शक्ति बढ़ने पर दूसरों का अनिष्ट करते हैं-

उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।

आदमी को जब बुरे ग्रह घेर लेते हैं तो जीवन में उसका हर ओर से अनिष्ट होता है। भारतीय ज्योतिष की इस अवधारणा को गोस्वामीजी ने एक दोहे में इस प्रकार लिखा है कि जिसे बुरे ग्रह लगे हों, फिर जो वायुरोग से पीड़ित हो और उसी को फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलाई जाए, तो कहिए यह कैसा इलाज है-

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।

तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।

शनि की साढ़े साती

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब शनि किसी राशि में साढ़े सात साल रहता है तो उसे साढ़े साती कहते हैं तथा वह अवधि जातक के लिए कष्टकारक होती है। अयोध्याकाण्ड में मंथरा को अयोध्या की साढ़ेसाती कहा गया है जो रानी कैकेई को भड़काकर रामजी को वनवास दिलवाती है।

सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।

ज्योतिषी से परामर्श

भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व में ही पता लगाने के लिए भारत में ज्योतिषी से परामर्श करने की परम्परा रही है। इस परम्परा का उल्लेख रामचरित मानस में भी हुआ है- दासी मंथरा रानी कैकेई को भ्रमित करने के लिए कहती है कि मैंने ज्यातिषियों से गणित करवाई है और उन्होंने बताया है कि भरत राजा होंगे-

पूंछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खींची, भरत भुआल होहिं यह सांची।

राहु द्वारा सूर्य-चंद्र ग्रहण

परशुराम-लक्ष्मण संवाद में परशुराम अकारण श्रीराम पर क्रोध करते हैं तब श्रीराम विचार करते हैं कि कहीं-कहीं सीधापन भी दोष होता है। टेढ़े चन्द्र को राहु भी नहीं ग्रसता-

बक्र चन्द्रमहि ग्रसइ न राहू।

चन्द्र दर्शन विचार

ज्योतिष में मान्यता है कि चतुर्थी के चंद्रमा के दर्शन नहीं किए जाते। रामचरित मानस में भी यह अवधारणा व्यक्त हुई है। जब रावण सीताजी का हरण करके ले आता है तब विभीषणजी रावण को समझाते हुए कहते हैं-

सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं।।

शकुन विचार

रामचरित मानस में शकुन विचार के उद्धरण सैंकड़ों हैं। अच्छे और बुरे दोनों तरह के शकुन कहे गए हैं। जब राजा दशरथ के आदेश से रामचंद्र की बारात ने अयोध्या से जनकपुरी के लिए प्रस्थान किया, तब जो शुभ-शकुन हुए, उनका वर्णन गोस्वामीजी ने इस प्रकार किया है-

बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।

चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।

अर्थात्- बारात इतनी सुंदर बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता। सुंदर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बाईं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मंगलों की सूचना दे रहा हो।

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।

सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी।।

अर्थात्- दाहिनी ओर कौआ सुंदर खेत में शोभा पा रहा है। नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया। तीनों प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंधित) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है। श्रेष्ठ (सुहागिनी) स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिए आ रही हैं।

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।

मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।

अर्थात्- लोमड़ी बार-बार दिखाई दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं। हरिनों की टोली बाईं ओर से घूमकर दाहिनी ओर आई, मानो सभी मंगलों का समूह दिखाई दिया।

छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी।।

सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।

अर्थात्- सफेद सिर वाली चील विशेष रूप से क्षेम (कुशल) कह रही है। श्यामा बाईं ओर सुंदर पेड़ पर दिखाई पड़ी। दही, मछली और दो विद्वान-ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिए हुए सामने आए।

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।

जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।

अर्थात्- समस्त मंगलमय, कल्याणमय और मनोवांछित फल देने वाले शकुन मानो सच्चे होने के लिए एक साथ घटित हो गए।

दशा विचार

राम वनगमन के समय गोस्वामीजी ने देवताओं के अनुरोध पर सरस्वती के अयोध्या आगमन की तुलना, खराब दशा के आने से की है-

हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।

छींक विचार

जब निषादराज को ज्ञात हुआ कि भरतजी एक सेना लेकर चित्रकूट जा रहे हैं तो निषादराज ने समझा कि भरतजी रामजी पर आक्रमण करने जा रहे हैं। इसलिए वह युद्ध के निश्चय से उठा किंतु उसी समय छींक हो गई। इस पर एक वृद्धि व्यक्ति ने शकुन विचार कर कहा कि भरतजी से युद्ध नहीं होगा, मित्रता होगी क्योंकि छींक बाईं तरफ हुई है।

एतना कहत छींक भई बाएं। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।

बूढ एक कह सगुन बिचारी, भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।

रामचरित मानस में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख – स्वप्न विचार

रामचरित मानस में कुछ स्थलों पर स्वप्न-फल पर विचार किया गया है। जब भरतजी रामजी को मनाने के लिए अयोध्या से चित्रकूट जाते हैं, तब सीताजी एक स्वप्न देखती हैं कि भरतजी समाज सहित आए हैं, सभी लोगों के शरीर दुःख से तप्त हैं। सभी मलिन हैं और सबके मन दुःखी हैं। समस्त सासों के रूप बदले हुए हैं। सीताजी के इस स्वप्न को सुनकर रामचंद्रजी के नेत्रों में जल भर आया और वे चिंतामग्न हो गए। वे लक्ष्मण से कहते हैं कि यह स्वप्न अच्छा नहीं है, ऐसा लगता है जैसे कोई व्यक्ति हमें अपनी कठोर इच्छा सुनाना चाहता है-

उहाँ राम रजनी अवसेषा। जागे सीयं सपन अस देखा।

सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए।

सकल मलिन मन दीख दुखारी। देखीं सास आन अनुहारी।

सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।

लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।

इसी प्रकार जब रावण राक्षसियों को आज्ञा देता है कि वे सीताजी को भय दिखाएं। तब त्रिजटा नामक एक राक्षसी अपनी साथिनों को एक स्वप्न सुनाती है कि मैंने स्वप्न में देखा है कि एक वानर ने सारी लंका जला दी है। राक्षसों की सारी सेना मारी गई है। रावण नंगा होकर गधे पर बैठा है। उसके सिर कटे हुए हैं और उसकी बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। इस वेश में वह दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा है। विभीषणजी को लंका का राज मिल गया है। और नगर में रामजी की दुहाई फिर गई है। रामजी ने सीता को बुलावा भेजा है। मैं निश्चय के साथ कहती हूँ कि यह स्वप्न केवल चार दिन में ही सत्य हो जाएगा। इसलिए तुम सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। त्रिजटा के वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं-

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

यह सपना मैं कहउँ कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

इस प्रकार रामचरित मानस में सैंकड़ों स्थलों पर ज्योतिष सम्बन्धी अवधारणाओं के उल्लेख हुए हैं, जिनमें से कहाँ कुछ ही प्रसंगों की चर्चा की गई है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रामाज्ञा-प्रश्न में ज्योतिष की अनूठी पद्धति

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रामाज्ञा-प्रश्न में ज्योतिष

गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामाज्ञा-प्रश्न में ज्योतिष शास्त्र की अनूठी पद्धति का प्रयोग हुआ है। ‘रामाज्ञा-प्रश्न’ सर्गों एवं सप्तकों में विभक्त है तथा इसकी रचना दोहा-छन्द में हुई है। इस ग्रंथ की भाषा सहज अवधी है। यह रामकथा के विविध प्रसंगों की मिश्रित रचना है।

रामाज्ञा-प्रश्न के कुछ दोहे वाल्मीकि रामायण के श्लोकों से साम्य रखते हैं। मान्यता है कि अपने मित्र गंगाराम ज्योतिषी की सहायता करने के लिए गोस्वामीजी ने केवल छः घण्टे में ‘रामाज्ञा-प्रश्न’ की रचना की। इस ग्रन्थ में सात सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग में सात-सात सप्तक हैं। सभी सप्तकों में सात-सात दोहे हैं। इसके सातवें सर्ग के सातवें सप्तक में गोस्वामीजी ने शकुन-प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने की विधि बतलायी है।

रामाज्ञा-प्रश्न में ज्योतिष  जानने के सम्बन्ध में कहा गया है-

‘सुदिन साँझ पोथी नेवति, पूजि प्रभात सप्रेम।

सगुन बिचारब चारु मति, सादर सत्य सनेम।।

अर्थात्- किसी शुभ दिन सन्ध्या के समय श्रद्धापूर्वक पोथी को प्रणाम करके उसे सादर निमन्त्रित करें। फिर अगली प्रातः पोथी की विधिवत् पूजा करके भगवान् श्रीराम, सीतामाता, लक्ष्मणजी एवं हनुमानजी का स्मरण-ध्यान करें। इसके बाद प्रसन्न मन से शकुन-विचार करना चाहिये तथा शकुन-फल विचार की जो विधि गोस्वामीजी द्वारा बतायी गयी है, उसी विधि से फल की घोषणा करनी चाहिये।

प्रश्न पूछने से पहले एक कागज पर लाल स्याही से तीन वृत्त बनाए जाते हैं। तीनों वृत्तों के नीचे उनकी क्रम संख्या- एक, दो और तीन लिखते हैं। तीनों वृत्तों के केन्द्र में एक-एक छोटा वृत्त बनाया जाता है। फिर तीनों वृत्तों को छः खण्डों में विभक्त करके सब में एक से सात तक की संख्या लिखी जाती है। किसी वृत्त में कोई संख्या दुबारा नहीं होगी।

प्रथम वृत्त का अंक सर्ग का वाचक, दूसरे वृत्त का अंक उक्त सर्ग के सप्तक का वाचक तथा तीसरे वृत्त का अंक उस सप्तक की दोहा-संख्या का निर्धारक होता है। अब प्रश्नकर्ता अपने प्रश्न को मन-ही-मन स्मरण करते हुए तीनों वृत्तों में बारी-बारी से किसी अंक पर पेंसिल की नोक रखे। शकुन विचारने वाला व्यक्ति प्रश्नकर्ता द्वारा क्रम संख्या एक, दो एवं तीन के वृत्तों के उन अंकों को क्रम से नोट कर ले जिन पर प्रश्नकर्त्ता ने पेंसिल की नोंक रखी है।

इसके बाद प्रश्नकर्ता से अपना प्रश्न पूछने के लिए कहा जाए। पहले से ही नोट किए गए अंकों का उपयोग करते हुए सर्ग, सप्तक एवं दोहे को ज्ञात कर ले। इस प्रकार प्राप्त दोहे के सरलार्थ से प्रश्न के शुभ-अशुभ फल की घोषणा की जाती है। प्रश्न के स्वभाव के अनुकूल दोहा निकले, तब कार्य में सफलता तथा विपरीत अभिप्राय युक्त दोहा निकले तो कार्य की असफलता समझनी चाहिये। एक दिन में तीन से अधिक प्रश्न शकुन-विचार हेतु इस ग्रन्थ से नहीं करने चाहिये तथा एक प्रश्न केवल एक बार ही करना चाहिये, उसे दोहराना नहीं चाहिए।

प्रश्न करने के लिए विषयों के दिन भी निर्धारित किए हुए हैं-

(1) राजकाज, रत्नों, स्वर्णादि धातुओं एवं घोड़े आदि पशुओं से सम्बन्धित प्रश्न रविवार के दिन पूछने चाहिये।

राज काज मनि हेम हय राम रूप रबि बार।

कहब नीक जय लाभ सुभ सगुन समय अनुहार।।

(2) रसदार वस्तु, गाय, कृषि, यज्ञादि कर्म एवं किसी भी शुभ कार्य से सम्बन्धित शकुन का विचार सोमवार को करना चाहिये-

रस गोरस खेती सकल बिप्र काज सुभ साज।

राम अनुग्रह सोम दिन प्रमुदित प्रजा सुराज।।

(3) भूमि-लाभ, युद्ध-विजय इत्यादि प्रश्नों का शकुन-विचार मंगलवार को करना चाहिये-

मंगल मंगल भूमि हित, नृप हित जय संग्राम।

सगुन बिचारब समय सुभ करि गुरु चरन प्रणाम।

(4) वाणिज्य, विद्या, वस्त्र एवं गृह से सम्बन्धित प्रश्न का शकुन-विचार बुधवार को करना चाहिये-

बिपुल बनिज बिद्या बसन बुध बिसेषि गृह काजु।

सगुन सुमंगल कहब सुभ सुमिरि सीय रघुराजु।।

(5) यज्ञ, विवाहादि उत्सव, व्रत एवं राजतिलक सम्बन्धी शकुन-फल का विचार गुरुवार को करना चाहिये।

गुरु प्रसाद मंगल सकल, राम राज सब काज।

जज्ञ बिबाह उछाह ब्रत, सुभ तुलसी सब साज।।

(6) यन्त्र, मन्त्र, मणियों एवं औषधियों से सम्बन्धित शकुन का विचार शुक्रवार के दिन करना चाहिये-

सुक्र सुमंगल काज सब कहब सगुन सुभ देखि।

जंत्र मंत्र मनि ओषधी सहसा सिद्धि बिसेषि।।

(7) लोहे, हाथी, भैंस-जैसी काली वस्तुओं से सम्बद्ध प्रश्न का शकुन- विचार शनिवार के दिन ही करना चाहिये।

राम कृपा थिर काज सुभ, सनि बासर बिश्राम।

लोह महिष गज बनिज भल, सुख सुपास गृह ग्राम।।

इस प्रकार हम देखते हैं कि रामाज्ञा-प्रश्न में ज्योतिष सम्बन्धी शंका समाधान की अनूठी पद्धति को अपनाया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दोहावली में ज्योतिष शास्त्र के संदर्भ

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दोहावली में ज्योतिष

गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित दोहावली में ज्योतिष संदर्भों एवं तथ्यों का प्रचुरता से उल्लेख हुआ है। जीवन में पग-पग पर इन दोहों की सहायता ली जा सकती है। चाहे वह करणीय-अकरणीय का प्रश्न हो अथवा ज्योतिष का अथवा नैतिकता का, यहाँ तक कि दोहावली हमें यह भी बताती है कि व्यावहारिक क्या और ओर अव्यावहारिक क्या है!

व्यापार प्रारम्भ करने के लिये श्रेष्ठ नक्षत्रों का नाम गिनाते हुए गोस्वामीजी लिखते हैं- श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, अश्विनी, रेवती तथा अनुराधा में किया गया व्यापार एवं दिया गया धन, धनवर्द्धक होता है। किसी भी परिस्थिति में यह सम्पत्ति डूब नहीं सकती-

श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हय रेवती सखाउ।

देहि लेहि धन धरनि धरु गएहुँ न जाइहि काउ।।

एक अन्य दोहे में कहा गया है- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा, रोहिणी, कृत्तिका, मघा, आर्द्रा, भरणी, अश्लेषा और मूल नक्षत्रों में चोरी गया हुआ, छिना हुआ, उधार दिया हुआ, गाड़ा हुआ अर्थात् किसी प्रकार से हाथ से निकला हुआ धन कभी भी वापस नहीं आता-

ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ।

हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ।।

कौन-सी तिथि किस दिन पड़ने पर हानिकारक एवं कष्टदायी योग बनाती हैं, इससे सम्बन्धित एक दोहा, दोहावली में इस प्रकार कहा गया है- रविवार को द्वादशी, सोमवार को एकादशी, मंगलवार को दशमी, बुधवार को तृतीया, गुरुवार को षष्ठी, शुक्रवार को द्वितीया और शनिवार को सप्तमी तिथियाँ पड़ती हैं, तब ये कुयोग का सूचक और सर्वसामान्य के लिये हानिकारक योग बनाती हैं-

रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि प्रथमादिक बार।

तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार।।

पति-पत्नी की जन्मपत्रिका का विवाह-पूर्व मिलान करना क्यों आवश्यक है, इस पर दोहावली में एक दोहा इस प्रकार आया है-

जनमपत्रिका बरति के देखहु मनहिं बिचारि।

दारुन बैरी मीचु के बीच बिराजति नारि।।

इस दोहे का आशय यह है कि जन्मांगचक्र के बारह प्रकोष्ठों में से प्रत्येक प्रकोष्ठ, जातक के विशेष भाव दशा का सूचक होता है। लग्न अर्थात् प्रथम स्थान जातक की दैहिक स्थिति का परिचायक है। इसके छठे स्थान में ग्रहस्थिति एवं ग्रहदृष्टि से जातक के शत्रु तथा आठवें स्थान में ग्रहस्थिति एवं ग्रहदृष्टि से जातक की मृत्यु की गणना की जाती है। इन दोनों के मध्य सातवाँ स्थान पुरुष की कुण्डली में पत्नी का तथा नारी की कुण्डली में पति का होता है।

अर्थात् भयानक वैरी और मृत्यु के बीच पति या पत्नी का स्थान होता है। यानी पत्नी शत्रु और मृत्यु के मध्य बैठ मध्यस्थता करती है। अगर पत्नी सुलक्षणा एवं पतिव्रता है तो पति के शत्रु होते ही नहीं, अगर हुए भी तो वे ज्यादा कष्टदायक सिद्ध नहीं होंगे, उसका पति दीर्घायु होता है, उसकी मृत्यु स्वाभाविक कारणों से होती है। किंतु यदि पत्नी दुष्टा, कुलक्षणी और पतिवंचक हुई; तब पति के बड़े-बड़े भयकारी, कष्टदायक शत्रु हो जाते हैं तथा उसकी आयु छोटी हो जाती है; वह अल्पायु में ही अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

चन्द्रमा शुभ, शान्त एवं सौम्य ग्रह है। यह पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करके सब जीवों को दीर्घायु एवं आरोग्य देता है, पर कुसंगति में आकर यह भी जातक के लिये घातक बन जाता है। दोहावली के एक दोहे में कहा गया है कि मेष के प्रथम, वृष के पंचम, मिथुन के नौंवें, कर्क के दूसरे, सिंह के छठे, कन्या के दसवें, तुला के तीसरे, वृश्चिक के सातवें, धनु के चौथे, मकर के आठवें, कुम्भ के ग्यारहवें और मीन के बारहवें घर में चन्द्रमा पड़े तो वे ग्रह घातक बन जाते हैं-

ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु।

मेषादिक क्रम तें गनहि घात चंद्र जियँ जानु।।

यात्रा के समय किन-किन वस्तुओं का दर्शन शुभ और मांगलिक होता है, इस आशय के एक दोहे में कहा गया है कि यात्रा पर निकलते समय नेवला, मछली, दर्पण, सफेद मुँह वाली चील, चकवा पक्षी तथा नीलकण्ठ के दर्शन से यात्रा निर्विघ्न और सुखप्रद हो जाती है, उक्त छहों को किसी भी दिशा में देखने से यात्रा मनवांछित फलदायक हो जाती है-

नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चक चाष।

दस दिसि देखत सगुन सुभ पूजहिं मन अभिलाष।।

इस प्रकार दोहावली में ज्योतिष सम्बन्धी उल्लेख भरे पड़े हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा टोडरमल ने अकबर के अधिकारियों को जेलों में सड़ा दिया! (160)

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राजा टोडरमल
Raja Todarmal and Akbar

राजा टोडरमल अकबर के जीवन से जुड़ा हुआ एक ऐसा व्यक्ति है जिसकी मिसाल दुनिया में शायद ही कहीं मिल सके।

अकबर ई.1556 में बादशाह बना था और ई.1575 तक उसे शासन करते हुए लगभग 19 वर्ष हो गए थे। अब तक उसकी सल्तनत का पर्याप्त विस्तार हो चुका था और सल्तनत की आय के साथ-साथ सैनिक एवं प्रशासनिक व्यय में भी पर्याप्त वृद्धि हो चुकी थी।

इसलिए अकबर को आय के अतिरिक्त साधन विकसित करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। उसका ध्यान सल्तनत के भू-राजस्व की ओर गया जिसमें प्रतिवर्ष घटत-बढ़त हुआ करती थी।

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जब हुमायूँ ने अपने खोये हुए भारतीय साम्राज्य को फिर से प्राप्त किया था, तब उसने अपनी सल्तनत की भूमि को अपने अमीरों तथा सैनिक अफसरों में वेतन के रूप में बाँट दिया था।

अकबर ने भी हुमायूँ की इस व्यवस्था को लागू रखा था। इस कारण शेरशाह द्वारा स्थापित की हुई भूमि-व्यवस्था एवं कर-वसूली व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी। मुगल सल्तनत में राजकीय भूमि तथा जागीर भूमि को एक दूसरे से अलग नहीं किया गया था।

इससे बड़ी गड़बड़ी फैली हुई थी। सल्तनत के विभिन्न हिस्सों में कर-वसूली प्रत्येक वर्ष की पैदावार के आधार पर निर्धारित की जाती थी। इस कारण कर-वसूली में विलम्ब होता था और सल्तनत की वार्षिक आय में घटत-बढ़त हुआ करती थी।

अकाल, टिड्डी एवं सूखे आदि के कारण भी राजस्व आय में कमी होती थी। बैराम खाँ भी इस व्यवस्था में कोई सुधार नहीं कर सका था।

अब तक अकबर की सल्तनत काफी बड़ी हो गई थी तथा अकबर की सेनाएं देश में चारों तरफ युद्ध कर रही थीं जिन्हें वेतन देने के लिए बादशाह को धन की आवश्यकता थी। इसलिए राजस्व-संग्रहण में वृद्धि करना आवश्यक हो गया था। अकबर ने भूमि-कर वसूलने के लिए एक नई विधि जारी की।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बादशाह की तरफ से यह आदेश जारी हुआ कि प्रत्येक परगने का विगत दस वर्ष का विवरण तैयार किया जाए जिसमें लिखा जाए कि प्रत्येक फसल में पैदावार कैसी थी और अन्न का मूल्य क्या था। दस वर्ष का योग लगाकर उसका दशमांश एक वर्ष की आय मानी जाए तथा उस पर भूमिकर निर्धारित किया जाए। जब दस वर्ष पूरे हो जाएं तब फिर से यही गणना की जाए।

यह कार्य राजा टोडरमल एवं उसके सहायक ख्वाजा मनसूर को दिया गया। अकबर को आशा थी कि राजा टोडरमल इस कार्य को फुर्ती से निबटा लेगा किंतु उन्हीं दिनों सूचना मिली कि अकबर की सेना पूर्वी मोर्चों पर मार खा रही है तथा राय पुरुषोत्तमदास को मार दिया गया है।

इसलिए राजा टोडरमल को तत्काल बंगाल के लिए रवाना कर दिया गया और दस-वर्षीय भू-राजस्व-कर का निर्धारण ख्वाजा शाह मनसूर के निर्देशन में ही करवाया जा सका।

भारत के भू-राजस्व-कर प्रशासन में यह प्रयोग पहली बार किया गया था। बाद में जब अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित हुई तो उन्होंने भी दस वर्षीय रेवून्य सैटलमेंट की व्यवस्था को अपनाया।

दस वर्षीय राजस्व बंदोबस्त में भी काफी कमियां थीं किंतु यह वार्षिक कर-निर्धारण प्रणाली की अपेक्षा तेजी से काम करती थी और केन्द्रीय सरकार को यह ज्ञात होता था कि उसे इस वर्ष कितना कर मिलने वाला है।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने मुंतखब उत तवारीख में लिखा है कि ई.1575 में अकबर ने अपनी सल्तनत की समस्त भूमि को नापने के आदेश दिए। उस समय भूमि की नाप रस्सी से की जाती थी जिसके फैलने और सिकुड़ने की सम्भावना रहती थी।

अकबर ने रस्सी के स्थान पर बाँस के टुकड़ों का प्रयोग करवाया जो लोहे के छल्लों से जुड़े रहते थे और जिनके फैलने और सिकुड़ने की संभावना नहीं होती थी।

अकबर के आदेश से सिंचित एवं असिंचित, मैदानी एवं पहाड़ी, रेतीली एवं जंगली और कृषित भूमियों के साथ-साथ नदियों, कुओं एवं कुण्डों की भूमियों को भी नापा गया। वह इकाई जो एक करोड़ टंका के बराबर उत्पादन करती थी, उसे एक अधिकारी के अधीन रखा गया और इस अधिकारी को करोड़ी कहा गया। सम्पूर्ण मुगल सल्तनत में 182 करोड़ी नियुक्त किये गये।

करोड़ी को अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा निश्चित करने, लगान के विभिन्न साधनों का लेखा रखने, प्रत्येक कृषक से कितनी धन राशि मिलती है इसका हिसाब रखने और प्रत्येक प्रकार की फसल का लेखा रखने के निर्देश दिये गये।

प्रत्येक करोड़ी की सहायता के लिए एक अमीन, एक कारकूून और एक पोतदार अर्थात् कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया। करोड़ी के ऊपर परगने के अधिकारी थे और करोड़ी के नीचे गांव के कर्मचारी थे।

अमीन का अर्थ होता है अमानत अर्थात् धरोहर रखने वाला। यह विश्वसनीय कर्मचारी होता था तथा फसल पर लगान निश्चित करता था। करोड़ी लगान वसूल करके पोतदार के पास भेजता था। प्रत्येक परगने में एक कानूनगो होता था। ‘गो’ का अर्थ होता है ‘कहने वाला’।

कानूनगो भूमि सम्बन्धी कानूनों तथा नियमों को जानता था। वह भूमि तथा लगान के ब्यौरे का रजिस्टर रखता था। गाँवों में पटवारी तथा मुकद्दम होते थे। मुकद्दम, कदम शब्द से बना है जिसका अर्थ है आगे चलने वाला या मुखिया।

करोड़ी को अपने क्षेत्र से भू-राजस्व वसूलने की जिम्मेदारी के साथ-साथ यह निर्देश दिए कि वह अपने क्षेत्र में तीन साल की अवधि में समस्त अकृषि भूमि को कृषि भूमि में रूपांतरित करने का प्रयास करे ताकि शाही खजाने के लिए अधिकतम भू-राजस्व जुटाया जा सके।

ई.1580 तक केन्द्रीय सरकार के कार्यालय में समस्त आवश्यक सूचनाएँ एकत्रित कर ली गईं। सुधार का पहला काम यह किया गया कि सरकारों (जिलों) को मिला कर सूबे (प्रान्त) बनाये गये। कुल बारह सूबों का निर्माण किया गया। प्रत्येक सूबे में लगान के मामलों की देखभाल के लिये एक दीवान नियुक्त किया गया जो करोड़ियों द्वारा किए जा रहे कार्य का निरीक्षण करते थे।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि करोड़ियों से अपेक्षा की गई थी कि वे अपना काम ईमानदारी से करेंगे तथा खेतों की उपज बढ़ाकर शाही खजाने को मिलने वाले कर में वृद्धि करेंगे किंतु अधिकतर करोड़ी बेईमान, लालची, घूसखोर एवं लुटेरे निकले। उन्होंने किसानों की आय बढ़ाने के कोई उपाय नहीं किए, न ही अनुपजाऊ भूमि को उपजाऊ बनाने के प्रयास किए।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बहुत से करोड़ियों ने किसानों से इतना अधिक कर वसूल किया कि किसानों की पत्नियां एवं बच्चे बिक गए। बहुत से किसानों ने आत्महत्याएं कर लीं तथा बहुत से किसान अपने घरों एवं खेतों को छोड़कर बैठ गए। इससे सल्तनत की आय घट गई तथा खेत खाली पड़े रहने लगे।

इस प्रकार चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। जब राजा टोडरमल को इस बात की जानकारी हुई तो उसने बहुत से करोड़ियों को पकड़कर जेलों में बंद करवा दिया तथा उन्हें डण्डा-बेड़ी चढ़ाकर इतना मारा कि बहुतों के प्राण-पंखेरू उड़ गए।

मुल्ला बदायूंनी ने बड़े व्यंग्यपूर्ण ढंग से लिखा है-

‘टोडरमल ने बहुत से बेईमान अधिकारियों को तब तक जेल में रखा जब तक कि वे मर नहीं गए। इस कारण टोडरमल को जल्लादों एवं तलवारों से प्राण लेने वालों की जरूरत ही नहीं पड़ी ….. इन करोड़ियों की हालत जगन्नाथ मंदिर के उन हिंदुओं जैसी हो गई जो स्वयं को किसी मूर्ति के समर्पित कर देते हैं तथा साल भर अच्छा खाते-पीते हैं और साल के अंत में मंदिर में एकत्रित होकर रथ के नीचे आकर जान दे देते हैं। या मूर्ति को अपना शीष चढ़ा देते हैं।’

जब अकबर को अपने बेइमान कर्मचारियों के कारनामों की जानकारी हुई तो उसने अनेक करों को समाप्त कर दिया। अधिकांश लेखकों ने लिखा है कि अकबर ने हिन्दू प्रजा पर से जजिया, जकात तथा तीर्थयात्रा कर को समाप्त कर दिया। प्रजा से वृक्ष-कर, बाजार-कर, गृह-कर तथा ऐसे ही अनेक अन्य करों को भी समाप्त कर दिया। बादशाह ने कोतवालों तथा अमल-गुजारों को आदेश दिया कि वे नियमों का ठीक से पालन करायें और भ्रष्ट कर्मचारियों को कठोर दण्ड दें।

मोरलैण्ड ने लिखा है- ‘यदि उस समय के स्तर से मूल्यांकन किया जाय तो आर्थिक दृष्टिकोण से अकबर का शासन प्रशंसनीय था क्योंकि उसके कोष में सदैव वृद्धि होती गई और जब उसने पंचत्व प्र्राप्त किया तब वह संसार का सर्वाधिक समृद्ध शासक था।’ इस समृद्धि का समस्त श्रेय राजा टोडरमल को जाता है।

मौरलैण्ड की यह परिभाषा सही प्रतीत नहीं होती क्योंकि यदि अकबर संसार का सर्वाधिक समृद्ध शासक था तो इससे जनता की आर्थिक स्थिति बेहतर कैसे मानी जा सकती है। निश्चित ही उस काल में किसान निर्धन था और उस पर अत्याचार हो रहे थे।

बेईमान कर्मचारियों की फौज रातों-रात तैयार नहीं हुई थी अपितु सम्पूर्ण मुगलिया शासन में कर्मचारियों की बेईमानी अनवरत जारी रही थी। अकबर उनमें से बहुत कम बेईमानों को ही दण्डित कर सकता था। कर्मचारियों की बेईमानी एक शाश्वत समस्या है जिससे जनता का जीवन हर समय कष्टों से घिरा हुआ रहता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

मुगलिया राजनीति में बड़ी चालाकी से सुलहकुल का प्रवेश हुआ!

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Sulahkul politics of Akbar
Sulahkul politics of Akbar

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में मुगलिया तख्त पर बैठने वाला जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर भले ही अपने पिता हुमायूं के लम्बे राजनीतिक निर्वासनों के कारण विधिवत् पढ़-लिख नहीं सका किंतु वह मुगलिया राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन करने वाला सिद्ध हुआ।

अकबर का बचपन अपने चाचा कामरान, अस्करी और हिंदाल की मक्कारियों के बीच बीता था। उसने अपने चाचाओं, बुआओं, रिश्तेदारों और अपने ही कुल के शहजादों को बादशाह हुमायूं के खिलाफ भयानक षड़यंत्र रचते हुए देखा था।

अपने चाचाओं के बेरहम आचरणों को देखकर अकबर बहुत कम उम्र में ही यह समझने में सफल रहा था कि बादशाहत एवं सल्तनत के टिके रहने के लिए अपने ही कुल के शहजादों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता।

अकबर ने अपनी आंखों से देखा कि किस तरह उसका पिता हुमायूं जीवन भर अपने भाइयों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार करता रहा किंतु अंत में उसे अपने भाइयों कामरान, अस्करी और हिंदाल की आंखें फुड़वाकर उन्हें मक्का भिजवाना ही पड़ा।

अकबर जब मात्र साढ़े तेरह साल की उम्र में अपने संरक्षक बैराम खाँ द्वारा हुमायूं के तख्त पर बैठाया गया तब, पहले ही दिन से अकबर ने अपनी उम्र को पीछे छोड़कर समझदारी का दामन पकड़ा जिसे उसने जिंदगी भर नहीं छोड़ा।

इसी समझ के बल पर अकबर सोलहवीं शताब्दी की भारतीय राजनीति को बड़ी गहराई तक प्रभावित करने में सफल रहा। जिस समय पानीपत के मैदान में बैराम खाँ ने अकबर से कहा कि वह बेहोश पड़े विक्रमादित्य हेमचंद्र अर्थात् हेमू की गर्दन उड़ा दे तो अकबर ने निहत्थे एवं बेहोश शत्रु पर वार करने से मना कर दिया।

उस समय तक अकबर ढंग से मुगलों के तख्त पर बैठ भी नहीं पाया था तथा उसके कब्जे में भारत की इंच भर भी जमीन नहीं थी, किंतु अकबर की यह दृढ़ता देखकर उसका संरक्षक बैराम खाँ समझ गया कि अकबर को अपनी अंगुलियों पर नचाना संभव नहीं होगा। 

बैराम खां ने अकबर को उत्तरी भारत का बहुत बड़ा इलाका जीतकर दिया किंतु जैसे ही अकबर युवा हुआ, उसने बैराम खां को उसके पद से हटा दिया क्योंकि अकबर परम्परागत रूप से चले आ रहे, शासन के मध्य एशियाई मानदण्डों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह हिन्दुस्तान पर अपनी शर्तों पर शासन करना चाहता था।

अकबर ने अनुभव किया कि चंगेजी, मुगलाई, तुर्की, चगताई, ईरानी, तूरानी तथा उज्बेकी अमीरों एवं शहजादों के बल पर हिंदुस्तान के तख्त पर अधिक समय तक अधिकार नहीं रखा जा सकता है। वे स्वयं इतने महत्वाकांक्षी हैं कि हर समय बादशाह को उखाड़ फैंकना चाहते हैं और अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए अकबर ने भारत के स्थानीय लोगों को शासन में भागीदारी देने का निर्णय लिया ताकि मुगलिया सल्तनत को शासन का नवीन, भरोसेमंद एवं सुदृढ़ आधार प्राप्त हो सके।

बहुत कम आयु में ही अकबर समझ चुका था कि वह हिन्दू शासकों से लड़कर लम्बे समय तक अपनी सल्तनत में बना नहीं रह सकता। उसे किसी न किसी प्रकार से हिन्दू शासकों को अपने अधीन करने का मार्ग ढूंढना था।

अपने इसी विचार के कारण अकबर ने बड़ी ही चालाकी से मुगलिया राजनीति में सुलह-कुल की नीति का प्रर्वत्तन किया। इसकी शुरुआत आम्बेर राज्य से हुई। अकबर के सौभाग्य से आम्बेर के कच्छवाहा राजा भयानक पारिवारिक कलह में डूब गए और उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अकबर की ओर मैत्री का हाथ बढ़ाया। इतना ही नहीं, इस मैत्री को दृढ़ बनाने के लिए कच्छवाहों ने अपनी राजकुमारी हरखू बाई अथवा हीराकंवर का विवाह अकबर के साथ करना स्वीकार कर लिया।

इस विवाह के दूरगामी परिणाम हुए। अकबर को शक्तिशाली कच्छवाहों का साथ, विश्वास एवं समर्पण मिल गया और कच्छवाहों को अपने ही कुल के विद्रोही राजकुमारों पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता मिल गई।

कच्छवाहों एवं मुगलों की इस मैत्री के कारण अकबर का शासन भारत में हमेशा-हमेशा के लिए जम गया। अब उसे भारत की कोई शक्ति अचानक ही जड़ से उखाड़कर नहीं फैंक सकती थी जिस तरह अकबर के पिता हुमायूं को अफगानों ने उखाड़कर भारत की सीमाओं से बाहर धकेल दिया था।

जब भारत की अन्य स्थानीय शक्तियों ने देखा कि मुगलों से अपनी राजकुमारी के विवाह के बाद कच्छवाओं का राज्य मजबूती से जम गया है तो अन्य स्थानीय शासक भी अकबर से मैत्री करने एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आगे आए।

कच्छवाहों की राजकुमारी हरखूबाई की कोख से सलीम अर्थात् जहाँगीर का जन्म हुआ। जैसलमेर के शासक हरराज भाटी ने अपनी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गुसाईंन का विवाह अकबर के बेटे सलीम के साथ कर दिया। उसकी कोख से खुर्रम अर्थात् शाहजहाँ का जन्म हुआ।

अकबर के पुत्र सलीम का एक विवाह एक पहाड़ी राजा दरिया मल लिबास की पुत्री से करवाया गया। सलीम का एक विवाह जैसलमेर की राजकन्या से हुआ जो मुगल हरम में प्रवेश के बाद मल्लिका-ए-जहाँ कहलाई।

ई.1576 में अकबर ने डूंगरपुर के सीसोदिया राजा आसकरण की पुत्री से विवाह किया। ई.1584 में अकबर ने अपने पुत्र सलीम का विवाह आमेर नरेश भगवंतदास की पुत्री से एवं ई.1586 में बीकानेर नरेश रायसिंह की पुत्री से किया। जब ई.1605 में सलीम जहांगीर के नाम से बादशाह बन गया तब उसका एक विवाह मेड़ता के शासक केशवदास राठौड़ की पुत्री से एवं ई.1608 में आम्बेर नरेश जगतसिंह की पुत्री से सम्पन्न हुआ था। जहांगीर ने रामचंद्र बुंदेला की पुत्री से भी विवाह किया था।

ई.1624 में जहांगीर के पुत्र परवेज का विवाह आमेर के राजा जगतसिंह की पुत्री से हुआ था। अर्थात् आम्बेर के राजा जगतसिंह की एक पुत्री जहांगीर से तथा दूसरी पुत्री जहांगीर से ब्याही गई थी।

हिन्दू राजकुमारियों की कोख से उत्पन्न ये शहजादे आगे चलकर न केवल दिल्ली एवं आगरा में मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल रहे अपितु हिन्दुस्तान की अन्य जागीरों के शासक भी बन गए। इस कारण विदेशी आक्रांताओं के रूप में आए मुगलों एवं स्थानीय हिन्दू शक्तियों के बीच मजबूत गठजोेड़ स्थापित हो गया।

न केवल मुगलिया राजनीति में अपितु भारत की मध्यकालीन राजनीति में इतना बड़ा परिवर्तन अकबर से पहले कोई और करने में सफल नहीं हुआ था। इससे पहले भारतीय राजाओं ने मुसलमान शासकों की अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार नहीं की थी। अकबर की मैत्री से पहले, भारतीय राजा मुसलमानों से लगातार लड़ते रहे थे और अपनी खोई हुई राज्यसत्ता को प्राप्त करने का प्रयास करते रहे थे। अकबर से मित्रता होने के बाद इन प्रयासों को बंद होने पर अधिक देर नहीं लगी। मेवाड़ के महाराणाओं और दक्खिन के मराठों को इसका अपवाद माना जा सकता है।

अकबर ने सुलह-कुल की नीति के तहत भारतीय राजाओं को मित्रता के बहाने से अधीन बनाया। वही राजा अपनी रियासत पर शासन कर सकता था जो बादशाह की नौकरी स्वीकार करे। यदि कोई राजा अथवा राजकुमार ऐसा नहीं करता था तो उसका राज्य छीनकर उसके किसी भाई अथवा पुत्र को दे दिया जाता था।

जिस तरह अकबर ने अपने हरम में तुर्की, चगताई एवं मुगल औरतों के साथ-साथ भारत के स्थानीय हिन्दू सरदारों की पुत्रियों को जगह दी तथा स्थानीय हिन्दू सरदारों को अजमेर, गुजरात, पंजाब आदि बड़े-बड़े सूबों का सूबेदार बनाया, उसी प्रकार उसने अपने शासन में मुगल अमीरों के साथ-साथ अनेक ऐसे हिन्दू युवकों को अपना मंत्री बनाया जो किसी शासक परिवार से न होकर जन-सामान्य के बीच से आए थे।

अकबर के हिन्दू मंत्रियों में राय पुरुषोत्तम, राय जगन्नाथ, राजा बीरबल, राजा टोडरमल आदि प्रमुख थे। इनमें से कोई कायस्थ था जो कोई वैश्य, जबकि कुछ युवक ब्राह्मण परिवारों में उत्पन्न हुए थे। अकबर किसी भी व्यक्ति को उसकी योग्यता भांपकर मंत्री पद दे देता था और मुगल अधिकारियों के ऊपर स्थापित कर देता था।

किसी शासक परिवार से सम्बन्धित न होने के कारण इन हिन्दू युवकों की निष्ठा केवल अकबर के प्रति रहती थी। वे स्वयं तो कभी विद्रोह करते ही नहीं थे, साथ ही यदि कोई मुगल, तुर्क, चंगेजी  या चगताई अमीर बगावत करता था तो ये हिन्दू मंत्री बड़ी कठोरता से उनका दमन करते थे। इस उपाय से अकबर न केवल अपनी सल्तनत का तेजी से विस्तार कर पाया अपितु उसने दूर-दूर तक फैलते जा रही अपनी सल्तनत पर बड़ी कड़ाई से नियंत्रण स्थापित कर लिया। मुगलिया राजनीति में यह बहुत बड़ा बिंदु क्रांतिकारी मोड़ था।

अकबर की सुलहकुल की नीति उसके निजी जीवन में भी दिखाई देती थी। उसने अपने दिमाग के दरवाजे केवल इस्लाम तक सीमित नहीं कर लिए थे अपितु वह सभी धर्मों के मर्म तक पहुंचना चाहता था। यही कारण था कि उसके दरबार में जेजुइट पादरी से लेकर हिन्दू पण्डित, बौद्ध, जैन, पारसी तथा अन्य धर्मों के विद्वान भी उपस्थित रहते थे।

अकबर इन लोगों को धर्म के सिद्धांतों पर बहस करने के लिए कहता था। अकबर ने इन विद्वानों के बहस-मुसाहिबों को बड़े ध्यान से सुना और शीघ्र ही पता लगा लिया कि सभी धर्मों के मूल में कुछ निश्चित सिद्धांत ही काम कर रहे हैं और वे सिद्धांत मानवता की भलाई के सिद्धांत पर टिके हैं। मुल्ला-मौलवी, पण्डित और पादरी अपने-अपने धर्म को बड़ा बताकर जन-सामान्य को धर्म के मूल तक पहुंचने में बाधा पहुंचाते हैं।

इसलिए अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चलाने का प्रयास किया जिसमें सभी धर्मों के सिद्धांतों को स्थान दिया गया था। विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने के कारण उसके द्वारा चलाया गया धर्म लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका और अकबर के मरते ही स्वयं भी मिट गया।

यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि मुगलिया राजनीति में अकबर को मुल्ला-मौलवियों का जितना विरोध सहन करना पड़ा, अन्य धर्म के लोगों की ओर से नहीं।

मुगलिया राजनीति में समन्यवादी नीतियों का समावेश करके अकबर ने ई.1556 से ई.1605 तक भारत के विशाल भू-भाग पर सफलता पूर्वक शासन किया तथा अनके बगावतों का सामना करने पर भी उसके राज्य का कोई हिस्सा कभी भी पूरी तरह उसकी सल्तनत से बाहर नहीं निकल सका। इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अशोक महान् के साथ-साथ अकबर को भी भारत के दो महान् पुत्रों से एक बताया है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देहदान है महादान !

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देहदान है महादान, इसलिए उनका मरने के बाद भी हो रहा है सम्मान। वे मर कर भी कर रहे हैं मानवों की सेवा।

यह धरती विचित्रताओं और महानताओं से भरी पड़ी है। इस धरती पर एक से बढ़कर एक अनूठी वस्तुएं हैं, भावनाएं हैं, विचार हैं और अद्भुत कार्य हैं। आज ऐसे ही एक अनूठे विचार से आपका परिचय होगा। ऐसा अनूठा विचार जहाँ मानव बुद्धि शायद ही कभी पहुंचती है।

यह अनूठा विचार इस मंत्र में समाया है- देहदान है महादान। यह ऐसा मंत्र है जिसे विज्ञान और धर्म का मिलन स्थल कहा जा सकता है।

अखिल भारतीय आयुविर्ज्ञान संस्थान जोधपुर में 6 मई 2018 को देहदान है महादान सम्मान समारोह आयोजित किया गया। यह एक विचित्र समारोह था जिसमें वे लोग उपस्थित ही नहीं थे, जिनकी सेवाओं के सम्मान के लिए यह समारोह आयोजित किया गया था।

इस अनूठे आयोजन की संकल्पना तैयार की थी- प्रसिद्ध समाजसेवी मनोज मेहता ने। समारोह के मुख्य अतिथि थे- राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाशचन्द टाटिया और अध्यक्षता की- राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पी. के. लोहरा ने।

इस समारोह में उन व्यक्तियों के परिवारों को सम्मानित किया गया जिन व्यक्तियों ने मरने से पहले देहदान है महादान संकल्प व्यक्त किया था और अपने परिजनों से अनुरोध किया था कि उनकी देह, मृत्यु के बाद भी मानव जाति की सेवा करती रहे।

भारत में मृत मानव की देह की अंत्येष्टि करना अत्यंत आवश्यक एवं पुण्य का कार्य समझा जाता है। युगों-युगों से यह विश्वास भारत की धर्मप्राण जनता में प्रचलित है कि यदि देह का विधिवत् अग्नि संस्कार न हो तो मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलती है, उसकी आत्मा प्रेत बनकर भटकती रहती है।

भारतीय संस्कृति में मृतक की देह का अंतिम संस्कार करने का अधिकार उसके पुत्रों और पौत्रों को दिया गया है। यदि पुत्र और पौत्र न हों तो मृतक के रक्त सम्बन्धियों में कोई भी पुरुष इस कार्य को करता है।

जबकि रुग्ण मानव देह के उपचार एवं शल्य चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि डॉक्टर और वैज्ञानिक मानव देह को खोलकर उसका अध्ययन करें।

इस कार्य के लिए मृत व्यक्तियों की देह का उपयोग किया जाता है और काम करते हैं देहदान है महादान मंत्र में विश्वास रखने वाले।

जब मनुष्य ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की तरफ कदम बढ़ाए तो मृत व्यक्ति की देह को प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। इसलिए पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में पश्चिम के वैज्ञानिकों, दार्शनिकों तथा चित्रकारों ने रात के अंधेरों में कब्रिस्तानों में से शव निकाले और चोरी-छिपे उनका अध्ययन किया।

बहुत से वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को समाज ने तांत्रिक अथवा मैली क्रियाएं करने वाला घोषित किया और उन्हें जान से मार डाला।

देहदान है महादान मंत्र में विश्वास रखने वाले लोग मानते हैं कि मनुष्य की देह उसकी अपनी है किंतु वह निजी होने पर भी उसकी सम्पत्ति नहीं है।

मनुष्य की मृत देह जीवित न होते हुए भी निजता का अधिकार रखती है। मनुष्य की मृत देह अपवित्र मानी जाती है किंतु देहदान है महादान मंत्र का बल पाकर वह सम्मान पाने की अधिकारी हो जाती है।

वैधानिक रूप से मनुष्य की मृत देह अपने अंतिम संस्कार का अधिकार रखती है। संसार भर में यदि कोई व्यक्ति मनुष्य की देह के ये अधिकार छीनता है अथवा उनका हनन करता है, तो उसे बहुत बुरे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।

यही कारण है कि आज भी भारत जैसे परम्परागत समाज वाले देशों में ही नहीं अपितु आधुनिक समझे जाने वाले अमरीका और यूरोपीय देशों में मृत देह को प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है।

वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं एवं चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के लिए मनुष्य की मृत देह की आज भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में थी। ऐसा लगता है मानो धर्म, कानून और विज्ञान इस बिंदु पर आकर उलझ गए हों। इस उलझन को दूर करता है देहदान है महादान का महामंत्र।

जोधपुर स्थित डॉ. सम्पूर्णानंद आयुर्विज्ञान महाविद्यालय को मृत मानव देह की कमी सदा से रही है। इसलिए जो अध्ययन वास्तविक मानव देह पर किया जाना चाहिए उसके लिए अधिकतर प्लास्टिक डमी का उपयोग किया जाता रहा है किंतु इससे शल्य चिकित्सा की मांग पूरी नहीं होती।

जब वर्ष 2012 में जोधपुर में एम्स खुला तो मृत मानव देह की मांग और अधिक बढ़ गई। इस पर श्री मनोज मेहता ने जन सामान्य को देहदान है महादान का मंत्र दिया तथा उनसे देहदान के संकल्प पत्र भरवाए।

धार्मिक संस्कारों की बाधा को पार करके जब कुछ लोग पीड़ित मानवता की सेवा के उद्देश्य से अपनी मृत्यु के बाद अपनी देह का दान करने के लिए तैयार हुए तो उनके परिवार में विरोध हुआ।

धैर्य पूर्वक प्रयास करने से लोगों ने देहदान के प्रति रुचि दर्शाई। इस जनजागृति का ही परिणाम है कि जोधपुर स्थित एम्स में हर वर्ष मृत मानवों की देह प्राप्त की जा रही हैं।

इस अनूठे समारोह को सम्बोधित करते हुए राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाशचन्द टाटिया ने लोगों को विज्ञान और धर्म का बारीक अंतर समझाया। उन्होंने कहा कि विज्ञान उसे कहते हैं जिसमें सतत रूप से शोधकार्य तथा विकास होता है, इसलिए विज्ञान सदैव अपूर्ण रहता है जबकि धर्म उस विचार को कहते हैं जब वह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।

जिस दिन विज्ञान पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, वह भी धर्म बन जाएगा। उन्होंने कहा कि जब हम यह समझ लेते हैं कि देहदान है महादान, तब देहदान धर्म बन जाता है तथा यह विज्ञान के काम को आगे बढ़ाता है।

यदि किसी व्यक्ति को देहदान एवं अंगदान जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दों पर भ्रम या संदेह है तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसके भ्रम एवं संदेह को दूर करें। इन विषयों पर समाज में खुली बहस होनी चाहिए तथा इन विषयों पर भावनाओं में बहकर निर्णय लेने की बजाय सोच-समझ कर निर्णय लिया जाना चाहिए।

हमारे पुराणों में कुछ उदाहरण मिलते हैं जब अंगदान करके देवत्व प्राप्त किया गया। ऋषि दधीचि ने असुरों के नाश के लिए अपनी देह का दान किया, उनके द्वारा दिये गये देहदान है महादान के मंत्र के कारण वे आज भी समाज में पूजे जाते हैं।

राजा हरिश्चंद्र ने भी जीते-जी सर्वस्व दान करके सम्पूर्ण मानव समाज को दान करने की प्रेरणा दी। मृत्यु के बाद भी दान का महत्व समाप्त नहीं हो जाता। समाज में हो रहे गलत काम को रोकना पूरे समाज का धर्म है, किसी भी गलत बात के प्रति मूक दर्शक बने रहना मानव का कर्त्तव्य नहीं है।

उन्होंने सुश्रुत संहिता का उदाहरण देते हुए कहा कि यह विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत द्वारा हजारों साल पहले लिखा गया चिकित्सा शास्त्र है जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों के आज होने वाले बहुत से जटिल ऑपरेशन करने की विधि लिखी हुई है तथा उस समय शल्यचिकित्सा में काम आने वाले उपकरणों के चित्र भी दिए गए हैं।

यदि उस काल का मानव शरीर रचना विज्ञान के बारे में नहीं जानता तो इतने जटिल ऑपरेशनों के बारे में कैसे लिख सकता था।

इसलिए निश्चित है कि देहदान है महादान जैसे मंत्र और अंगदान जैसी परम्पराएं हमारी पुरातन संस्कृति का हिस्सा रहे हैं किंतु दुःख की बात है कि समाज के उच्च एवं शिक्षित वर्ग में भी आज ऐसी धारणाएं हैं कि देहदान करने वाले को मोक्ष प्राप्त नहीं होता।

जस्टिस टाटिया ने जोधपुर में मृतदेह के संस्कार के लिए विद्युत चालित शवदाह गृह आरम्भ करने तथा नेत्रदान एवं देहदान जैसे पुण्य कामों को आगे बढ़ाने के लिए समाज सेवी मनोज मेहता के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज अन्न, वस्त्र, धन, रक्त, शिक्षा दान करने वाले लोगों की कमी नहीं है किंतु मनोज मेहता की तरह समय का दान करने वाले लोग विरले ही हैं।

समय का दान किए बिना देहदान है महादान का संकल्प पूरा नहीं हो सकता। न ही समाज की सेवा हो सकती है। आज प्रत्येक समाज का व्यक्ति देहदान के लिए आगे आया है, यह इस मंत्र की सबसे बड़ी सफलता है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पी. के. लोहरा ने कहा कि देहदान की परम्परा को आगे बढ़ाए बिना समाज को अच्छे चिकित्सक नहीं मिल सकते।

शरीर को मृत्यु के बाद नष्ट होना ही होता है किंतु देहदान के माध्यम से मनुष्य अपनी मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा कर सकता है। उन्होंने मानव सेवा सम्मान समारोह का भव्य आयोजन करने के लिए समाजसेवी मनोज मेहता एवं एम्स के निदेशक डॉ. संजीव मिश्रा की प्रशंसा करते हुए आशा व्यक्त की कि उनके द्वारा देहदान है महादान मंत्र को आगे बढ़ाया जा रहा है।

निदेशक डॉ. संजीव मिश्रा ने समरोह में आए अतिथियों एवं देहदान करने वाले व्यक्तियों के परिवारों का स्वागत करते हुए कहा कि चिकित्सा शिक्षा के अध्ययन के उद्देश्य से मिली हुई देह का उपयोग केवल चिकित्सा शिक्षा में किया जाता है।

देह का किसी भी तरह अपमान नहीं होने दिया जाता और न उसके अंगों का दुरुपयोग होने दिया जाता है। अतः कोई भी परिवार या व्यक्ति निःसंकोच होकर देहदान के लिए आगे आ सकता है।

शरीर रचना विभाग के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत घटक ने कहा कि आज का दिन उन लोगों को स्मरण करने का दिन है जिन्होंने अपनी मृत्यु के बाद भी अपनी देह मानवता के कल्याण के लिए समर्पित की। उन्होंने देहदान की प्रक्रिया भी समझाई।

सम्मान समरोह के संयोजक एवं काउंसलर मनोज मेहता ने समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि पारिवारिक भावनाओं के कारण मनुष्य देहदान है महादान जैसे महामंत्र को भूल जाता है इस कारण अपनी देह को दान करने का निर्णय लेना अत्यंत कठिन होता है किंतु जो लोग मर कर भी पीड़ित मानवता की सेवा करना चाहते हैं, वे देहदान करने के कठिन निर्णय को बड़ी आसानी से ले लेते हैं।

यदि हम चाहते हैं कि हमारा अच्छा इलाज हो तो उसके लिए अच्छे डॉक्टरों की आवश्यकता होगी। हमें अच्छे डॉक्टर तभी मिलेंगे जब हम अस्पतालों एवं मेडिकल कॉलेजों में मृतक व्यक्तियों की देह उपलब्ध कराएंगे। उन्होंने जोधपुर के लोगों द्वारा बड़ी संख्या में देहदान हेतु भरे गए संकल्प पत्रों के लिए उनके परिवार वालों की प्रशंसा की।

 संसार में मनोज मेहता जैसे और भी बहुत से लोग हैं जो देहदान है महादान के पुण्य यज्ञ में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हम सौ साल जिएं पर कैसे !

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हम सौ साल जिएं यह वेदों का मूल मंत्र है। ऋग्वेद में एक ऋचा आती है जिसमें कहा गया है- जीवेम् शरदः शतम् पश्येम् शरदः शतम्, श्रुण्याम् शरदः शतम्, प्रब्रवाम् शरदः शतम्, स्यामदीनाः शरदः शतम्। अर्थात् मैं सौ शरद ऋतुओं तक जीवित रहूँ, देखूं, सुनूं, बोलूं और आत्मनिर्भर रहूं तथा सौ वर्ष के बाद भी ऐसा ही रहूं।

हम सौ साल जिएं, क्या यह संभव है? हाँ यह संभव है। रक्त, मांस और हड्डियों से बना हमारा शरीर, प्रकृति द्वारा लगभग 120 से 140 वर्ष तक जीवित रहने के लिए बनाया गया है। संसार में वैज्ञानिकों द्वारा किसी भी आदमी की अधिकतम आयु 122 वर्ष रिपोर्ट की गई है। इससे अधिक आयु के भी हजारों दावे किए जाते हैं किंतु उनकी सत्यता को सत्यापित नहीं किया जा सका है।

120 से 140 वर्ष तक जीवित रहने के लिए बनाया गया मानव शरीर 50 साल की आयु आते-आते उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हाइपर टेंशन आदि बीमारियों से ग्रस्त होकर जीर्ण-शीर्ण होने लगता है और 80 वर्ष की आयु आते-आते हम मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में हम सौ साल जिएं, आम आदमी के लिए इसकी कल्पना करना भी बहुत कठिन है।

भारत में मनुष्य की औसत आयु 68.3 वर्ष है तथा औसत आयु के मामले में भारत का दुनिया के देशों में 123वां स्थान है। एक ओर सिंगापुर, स्विट्जरलैण्ड, मकाओ सार तथा इटली जैसे देश हैं जहाँ मनुष्य की औसत आयु 83 साल है तथा दूसरी ओर लिसोथो में 44 वर्ष, स्वाजीलैण्ड में 49 वर्ष, नाइजीरिया में 52 वर्ष तथा जाम्बिया एवं माली में आम आदमी की औसत आयु 53 साल है।

विश्व के समस्त देशों में औरतों की औसत आयु, पुरुषों की अपेक्षा 3 से 6 साल अधिक है, किसी-किसी देश में तो यह अंतर 11 साल तक है। भारत में भी औरतों की औसत आयु पुरुषों की औसत आयु से 3 साल अधिक है। तो क्या औरतों में जिंदा रहने की क्षमता आदमी से ज्यादा होती है!

आम आदमी होकर भी हम सौ साल जिएं, यह कोई असंभव बात नहीं है। क्योंकि अब वैज्ञानिक शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बुढ़ापा एक बीमारी है न कि अनिवार्यता। यह बीमारी हमें अपने पुरखों से आनुवांशिक विरासत में मिलती है।

हम सौ साल जिएं, इसके लिए बुढ़ापा नामक रोग की रोकथाम की जानी आवश्यक है जो कि वर्तमान समय में अ सम्भव सी लगने वाली बात है। फिर भी बुढ़ापे को कुछ समय तक टाला जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों में इस रोग के कारणों और निराकरण के उपायों की शोध बड़े पैमाने पर की जा रही है और सफलता की सम्भावना भी बनी है क्योंकि इस व्याधि की शोध के लिए लम्बे समय की आवश्यकता है। अतः वैज्ञानिकों की भी कितनी ही पीढ़ियाँ लग सकती हैं।

अमेरिका वैज्ञानिक बेरौज ने समुद्री जन्तु रोटीफर को उसके सामान्य प्रवास के जल से 10 डिग्री सेन्टीग्रेड कम ताप वाले पानी में रखा तो उसकी आयु दुगुनी हो गई। सामान्यतः उसकी आयु 18 दिन से अधिक नहीं होती किंतु सामान्य से 10 डिग्री ठण्डे पानी में उसकी औसत आयु 36 दिन हो गई।

हिमालय के योगियों तथा संन्यासियों के लम्बे जीवन का रहस्य भी सीमित आहार एवं निम्न तापमान ही है। जब इसी प्रकार की परिस्थितियां अन्य जीव-जन्तुओं को भी दी गईं तो उनकी आयु भी लम्बी हो गई। जीव-जन्तु कभी भी मनुष्य की भाँति असंयमी जीवन नहीं जीते फिर भी तापमान की गिरावट से उनकी उम्र में वृद्धि होती है।

वैज्ञानिकों द्वारा की गई एक शोध में एक विचित्र निष्कर्ष सामने आया है। इस निष्कर्ष के अनुसार जो कोशिकाएँ शरीर की रक्षात्मक पंक्ति में कार्यरत रहती हैं उन्हीं की बगावत, का परिणाम बुढ़ापा है। क्योंकि रक्षात्मक कोशिकाएँ ही सामान्य कोशिकाओं को खाने लगती हैं। हम सौ साल जिएं इसके लिए रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत को रोकना आवश्यक है।

रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत से आदमी के बाल पकने लगते हैं, झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं, नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जाती है, अनेकों उदर विकार पनपते हैं और दन्त क्षय तथा श्रवण शक्ति कम हो जाती है। माँस पेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं। रक्त नलिकाएँ मोटी पड़ जाती हैं और यकृत एवं गुर्दे की कार्यशक्ति भी क्षीण होने लग जाती है।

रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत का स्पष्ट उदाहरण उन लोगों में देखा जा सकता है जो असंयमी हैं और नशा सेवन करते हैं अथवा आलसी और अकर्मण्य हैं। वे ही समय से पहले बूढ़े होते हैं और उन्हीं की इन्द्रियाँ युवावस्था में ही शिथिल पड़ जाती हैं।

भारतीय आयुर्वेद मानव जाति को विगत हजारों सलों से नियमित दिनचर्या जीने का संदेश दे रहा है ताकि हम सौ साल जिएं। आयुर्वेद के प्राचीन आचार्यों के अनुसार आहार-विहार के संयम के साथ ही नियमित भोजन में तुलसी, आँवला, विधारा, अश्वगंधा जैसी औषधियाँ एवं गाय का दूध सेवन करते रहने से रोगों के निकट आने का संकट लम्बे समय तक टाला जा सकता है।

वैदिक यज्ञ-हवन करने वाले ऋषि-मुनि भी हजारों वर्षों से मानव जाति को यह संदेश देते रहे हैं कि यज्ञ-हवन में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों के धुएं में वह अमोघ शक्ति है जिससे जीवनी शक्ति पुष्ट होती है अर्थात् रक्षक कोशिकाएँ बगावत नहीं करने पातीं।

मन्त्र विज्ञानियों का निष्कर्ष है कि मन्त्रों की ध्वनि से शरीर की विभिन्न ग्रन्थियों से ऐसा स्राव निकलता है जो कोशिकाओं के असमय क्षरण को रोक देता है और हम सौ साल जिएं, इसके लिए कोशिकाओं को पुष्ट बनाए रखता है।

अमेरिकी ‘आयु-शास्त्र-वैज्ञानिक’ डेंकला के अनुसार आयु नियन्त्रक केन्द्र, हमारे मस्तिष्क में विद्यमान हैं जो आयु बढ़ने के साथ-साथ अधिक सक्रिय होता है। इसकी सक्रियता सामान्य बनाए रहने के लिए आहार-विहार की नियमितता आवश्यक है।

माँस-मदिरा, अनियमित दिनचर्या, क्रोध, भय, चिन्ता आदि कारणों से यह केन्द्र अधिक सक्रिय होने लगता है। इस कारण ऐसे लोगों को असमय ही बुढ़ापा घेरने लगता है।

बुढ़ापे को लम्बे समय तक टालने और अनेक रोगों से छुटकारे के लिए नैसर्गिक जीवन पद्धति का अनुसरण किया जाना चाहिए, जिससे मस्तिष्क पर तनाव और शरीर पर दबाव न पड़े। तब शतायु हो सकने की और निरोग बने रहने की सम्भावना है।

हम सौ साल जिएं, इस उद्देश्य से सुश्रुत संहिता में मनुष्य के स्वास्थ्य की परिभाषा इस प्रकार दी गई है-

समदोषाः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।

प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते।।

जिस व्यक्ति के तीनों दोष अर्थात् वात, पित्त एवं कफ समान हों, जठराग्नि सम हो अर्थात् न अधिक तीव्र हो और न अति मन्द हो, शरीर को धारण करने वाली सात धातुएं  अर्थात् रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य उचित अनुपात में हों, मल-मूत्र की क्रियाएं  भली प्रकार होती हों और दसों इन्द्रियां  अर्थात् आंख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा और उपस्थ, मन और इन सबकी स्वामी आत्मा, भी प्रसन्न हो, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति ही हम सौ साल जिएं के वैदिक मंत्र को साकार कर सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लम्बे जीवन के लिए क्या हमने स्वयं को तैयार किया है!

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Lambe jivan ke liye

लम्बे जीवन के लिए क्या हमने स्वयं को तैयार किया है, यदि हमसे कोई यह प्रश्न पूछे तो हमारा उत्तर क्या होगा? हाँ, ना, या पता नहीं! यदि आप इस प्रश्न का समुचित उत्तर चाहते हैं तो इस आलेख को शुरु से अंत तक ध्यान से पढ़ें। हो सके तो दो-चार या अधिक बार पढ़ें तथा इसमें से महत्वपूर्ण बातों को बिंदुओं के रूप में नोट कर लें और उन्हें आजमाएं।

मानव शरीर 120 से 140 साल तक जीवित रहने के लिए बना है। हमारे शास्त्रों में इच्छामृत्यु से लेकर सैंकड़ों साल की आयु वाले योगियों एवं चिरंजीवी मनुष्यों के उदाहरण उपलब्ध हैं किंतु वैज्ञानिकों के पास अभी तक 122 साल की अधिकतम आयु वाले इंसान का ही प्रामाणिक रिकॉर्ड है।

लम्बे जीवन के फैक्टर्स

वातावरण में उपलब्ध ऑक्सीजन की मात्रा, धरती का तापक्रम, मनुष्य के लिए उपलब्ध भोजन की गुणवत्ता तथा परिश्रम करने के घण्टे, मनुष्य के मन में सुरक्षा का भाव आदि के आधार पर मनुष्यों की आयु का औसत बदल जाता है। यदि हम इन फैक्टर्स को अपने अनुकूल बना लेते हैं तो हम कह सकते है कि हमने लम्बे जीवन के लिए स्वयं को तैयार किया है!

वर्तमान समय में सिंगापुर, स्विट्जरलैण्ड, मकाओ तथा इटली आदि यूरापीय देशों में मनुष्य की औसत आयु 83 साल है जबकि लिसोथो, स्वाजीलैण्ड, नाइजीरिया, जाम्बिया एवं माली आदि गरीब अफ्रीकी एवं एशियाई देशों में मनुष्य की औसत आयु 44 से 53 साल के बीच है।

अतः अमीरी, शिक्षा और ठण्डी जलवायु को लम्बी आयु के लिए अनुकूल माना जा सकता है तथा गरीबी, अशिक्षा एवं गर्म जलवायु को छोटी आयु के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।

भारत एक गर्म जलवायु वाला विकासशील देश है तथा लोगों में शिक्षा का स्तर मध्यम है। वर्ष 1947 में भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली, उस समय भारत में मनुष्य की औसत आयु केवल 31 साल थी। वर्तमान समय में भारत में मनुष्य की औसत आयु 68.3 वर्ष है। यह ठण्डे एवं अमीर देशों से लगभग 15 साल कम तथा गर्म एवं निर्धन देशों से लगभग 15 साल अधिक है।

इन सब बातों को यदि तार्किक आधार पर समझा जाए तो कहा जा सकता है कि यदि भारत की शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, शिक्षा का स्तर और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हो, लोगों को रहने के लिए ठण्डा और शांत वातावरण मिले तथा काम के घण्टों में कमी आए तो एक आम भारतीय की आयु में कम से कम 15 साल तक की वृद्धि की जा सकती है।

शासन व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रसार आदि कार्य तो सरकार एवं समाज द्वारा सामूहिक रूप से ही किए जा सकते हैं किंतु कुछ उपाय करके हम स्वयं को लम्बे जीवन के लिए तैयार कर सकते हैं और अपनी औसत आयु में 15 साल अथवा उससे अधिक वर्ष जोड़ सकते हैं।

लम्बे जीवन के लिए बनाए जा सकने वाले मूल मंत्र इस तथ्य में निहित हैं कि शरीर को स्वस्थ्य एवं सक्रिय रखा जाए। स्वस्थ एवं दीर्घायु बनने के लिए जल, वायु, ध्वनि, निद्रा, व्यायाम और अन्न आदि का बेहतर प्रबन्धन करना आवश्यक होता है।

लम्बे जीवन के लिए शयन तथा शैय्या त्याग का समय निश्चित करें

मनुष्य को सामान्यतः रात्रि में 9 से 10 बजे के बीच सो जाना चाहिए तथा 7 से 8 घण्टे की नींद लेकर प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच उठ जाना चाहिए। यदि जल्दी सोना और जल्दी उठना संभव न हो तो भी 7 से 8 घण्टे की नींद अवश्य लेनी चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए जल सेवन का तरीका समझें

सुबह उठते ही कम से कम एक गिलास गर्म पानी पीना चाहिए। रात्रि में पानी कम और दिन में अधिक पीना चाहिए। मल-मूत्र त्यागने तथा स्नान से पहले पानी पीना चाहिए, मल-मूत्र त्यागने तथा स्नान के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन करने से तुरंत पहले या तुरंत बाद में पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन खाने एवं पानी पीने में कम से कम आधे से पौन घण्टे का अंतर होना चाहिए।

प्रतिदिन 2 से 3 लीटर अर्थात् 6 से 10 गिलास जल पीना चाहिए। एक बार में चौथाई से एक तिहाई लीटर अर्थात् आधे से एक गिलास पानी पीना चाहिए। सुरक्षित स्रोतों से प्राप्त एवं साफ जल ही पिया जाना चाहिए। जल हमेशा घूंट-घूंट करके तथा बैठकर पीना चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए स्वच्छ वायु सेवन करें

प्रातःकाल में कम से कम आधा घण्टा साफ वातावरण अर्थात् किसी पार्क, खेत, उद्यान, मैदान आदि में घूमने से शरीर को ऑक्सीजन की अच्छी मात्रा मिलती है। श्वांस पर नियंत्रण करने से शरीर की ऊर्जा के स्तर में वृद्धि होती है। लम्बे जीवन के लिए दिन में कुछ समय लम्बी-लम्बी सांस लेनी चाहिए। या कुछ मिनट के लिए प्राणायाम करना चाहिए।

दिन में जब भी समय मिले, तुलसी, पीपल, बड़, हरी घास एवं फूलदार वनस्पति के निकट रहना चाहिए। जहां वायु में धूल, धुआं, बदबू तथा गर्मी हो, वहाँ अधिक समय नहीं रहना चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए हल्का व्यायाम करें

खुले स्थान पर प्रतिदिन दस से पंद्रह मिनट तक अंग संचान अर्थात् हल्का व्यायाम, सूर्य नमस्कार, स्ट्रैचिंग, नाइट्रिक ऑक्साइड डम्पिंग आदि करनी चाहिए। इससे शरीर की मांसपेशियों में रक्त का संचालन बढ़ता है जिससे शरीर में ऑक्सीजन के स्तर में वृद्धि होती है।

लम्बे जीवन के लिए हल्की धूप का सेवन करें

सुबह सूर्य निकलने के साथ ही कम से कम 10-15 मिनट तक हल्की धूप का सेवन करने से शरीर को विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है। इससे बहुत से रोग नहीं होते तथा काम करते समय शरीर में थकावट नहीं आती। लम्बे जीवन के लिए इससे अच्छी बात शायद ही कुछ और हो सकती है।

लम्बे जीवन के लिए तेल मालिश करें

धूप सेवन के समय यदि शरीर पर तिल या सरसों के तेल की मालिश करें तो समय का अच्छा उपयोग होगा। इससे मांसपेशियों में रक्त का समुचित संचार होगा। त्वचा की चमक बनी रहेगी एवं उसमें लम्बे समय तक झुर्रियां नहीं पड़ेंगी।

लम्बे जीवन के लिए मेडीटेशन करें

लम्बे जीवन के लिए अपनी दिनचर्या में ईश्वर का ध्यान, पूजा, कीर्तन, किसी भी धार्मिक ग्रंथ का पाठ, मंदिर दर्शन, तीर्थ सेवन, यज्ञ, हवन जैसी गतिविधियों को सम्मिलित करें। इनसे मस्तिष्क एवं शरीर पर प्रतिदिन होने वाले रेडिएशन इफैक्ट्स कम होते हैं। चिंतन संतुलित होता है एवं मनुष्य को शांति का अनुभव होता है।

मनुष्य अपने मन में जितनी अधिक शांति और संतुष्टि का अनुभव करता है, उसकी आयु उतनी ही अधिक बढ़ती है तथा व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। ध्यान करने से रोग और शोक मिटते हैं। ध्यान से शरीर, मन और मस्तिष्क को शांति, स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव होता है। वैदिक यज्ञ-हवन में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों के धुएं से मनुष्य की जीवनी शक्ति पुष्ट होती है।

लम्बे जीवन के लिए ध्वनि प्रबंधन करें

मनुष्य की आयु पर ध्वनियों का बहुत प्रभाव पड़ता है। कर्णकटु, कर्कश, तेज आवाज, गाली-गलौच, चीख-पुकार, मशीनों की खड़खड़ जैसी ध्वनियां जीवनी शक्ति को कमजोर करती हैं तथा लम्बे जीवन के लिए घातक हैं। जबकि कर्णप्रिय, सुमधुर एवं धीमी आवाजें जीवनी शक्ति को पुष्ट करती हैं। अतः सितार वादन, बांसुरी वादन, शहनाई वादन, भजन, शबद-कीर्तन, रामधुन जैसी ध्वनियां सुनें। ये लम्बी आयु के लिए अमृत के समान हैं।

ईश्वर को समर्पित मन्त्र-ध्वनियों से शरीर की विभिन्न ग्रन्थियों से ऐसा स्राव निकलता है जो कोशिकाओं के असमय क्षरण को रोक देता है। स्वयं भी धीरे बोलने का अभ्यास करें। मीठी वाणी बोलें, अच्छे शब्दों का प्रयोग करें।

लम्बे जीवन के लिए मुस्कुराएं

मुस्कुराने से हमारी मांसपेशियों का तनाव दूर होता है। जब भी याद आ जाए, मुस्कुराएं। किसी के मिलते ही मुस्कुराकर अभिवादन करने की आदत डालें। बच्चों को देखकर मुस्कुराएं, बीमारों को देखकर मुस्कुराएं। बूढ़ों को देखकर मुस्कुराएं। मुस्कान का मधुर उजाला न केवल आपके जीवन में अपितु दूसरों के जीवन में भी आशा और सकारात्मकता का प्रसार करेगा।

लम्बे जीवन के लिए बच्चों के साथ समय बिताएं

बच्चों की आंखों एवं उनके कण्ठ से निकली ध्वनियों से ऐसी सकारात्मक तरंगें निकलती हैं जो वृद्धावस्था को रोक देती हैं। अतः प्रतिदिन कुछ समय बच्चों के बीच बिताना चाहिए। उनके साथ रहने से हमारे शरीर में ऐसे हार्मोन्स लम्बे समय तक बने रहेंगे जो मनुष्य की लम्बी आयु के लिए आवश्यक हैं।

विशिष्ट वनस्पतियों का सेवन

लम्बी आयु के लिए विशिष्ट वनस्पतियों का सेवन करना लाभकारी होता है। तुलसी के एक पत्ते का नियमित रूप से सेवन करें। पंचामृत बनाकर पीएं। सिर पर चंदन का टीका लगाएं। इनमें रेडिएशन इफैक्ट्स कम करने की शक्ति होती है। तुलसी का पत्ता चबाने से दांत खराब हो जाते हैं इसलिए इसे चाय या सब्जी आदि में डाल कर प्रयोग करें।  नीम एवं गिलोय रक्त शोधक एवं शक्ति वर्धक होते हैं। गर्मियों में नीम के नए पत्ता चबाएं। सर्दी अथवा गर्मी किसी भी मौसम में गिलोय का छोटा सा टुकड़ा तोड़कर खाएं। महिलाओं को शतावरी का नियमित सेवन करना चाहिए।

बच्चों को शंखपुष्पी का शरबत बना कर देना चाहिए। पुरुषों के लिए अश्वगंधा का सेवन शक्तिवर्द्धक होता है। दिन भर में थोड़ी मात्रा आँवला तथा विधारा की भी प्रयुक्त करनी चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए भोजन का प्रबन्धन

स्वस्थ मनुष्य को दिन में कम से कम दो बार नाश्ता और दो बार भोजन करना चाहिए। कभी भी एक साथ पेट भरके नहीं खाना चाहिए। लम्बी आयु के लिए अपने भोजन में सब तरह की खाद्य सामग्री शामिल करनी चाहिए। अर्थात् दाल, सब्जी, दही, विभिन्न प्रकार के अनाजों के आटे से बनी चपातियां, अंकुरित अनाज, चावल, सलाद, आदि। इनमें से कभी कुछ तथा कभी कुछ खाना चाहिए। एक साथ सभी चीजें खाने से बचना चाहिए।

घर में बना हुआ शुद्ध, स्वादिष्ट एवं सात्विक भोजन करना चाहिए। फास्ट फूड, जंक फूड, पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक, मांसाहार, अण्डा, मछली आदि के सेवन से बचना चाहिए। भोजन तैयार करने में नमक, मिर्च, तेल, खटाई का कम प्रयोग करना चाहिए।

जितनी भूख हो उससे थोड़ा कम भोजन करना चाहिए। अर्थात् भरपेट भोजन नहीं करना चाहिए। संभव हो तो सप्ताह में या पखवाड़े में एक दिन केवल एक समय भोजन करना चाहिए।

खुशबूदार मसाले

जीरा, सौंफ, धनिया, हल्दी, राई, हींग, दाना मेथी, पत्ता मेथी, धनिया पत्ता, करी पत्ता, पुदीना, कलौंजी, प्याज, लहसुन आदि खुशबूदार मसालों का नियमित रूप से प्रयोग करना चाहिए। ये भी लम्बी आयु के लिए अमृत के समान हैं।

फल एवं सलाद का नियमित सेवन

नियमित रूप से कच्ची सलाद तथा फलों का सेवन करना चाहिए। सलाद का सेवन करने से कब्ज नहीं होती तथा फलों का सेवन करने से उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह जैसे रोग नियंत्रण में रहते हैं। जीवन भर कम से कम एक फल का प्रतिदिन सेवन करने से कैंसर जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है। लम्बी आयु के लिए वयस्क मनुष्य को दिन में लगभग 150 ग्राम फल का प्रयोग करना चाहिए।

दूध-दही एवं घी शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक

आजकल डेयरी प्रोडक्ट्स के बारे में तरह-तरह की गलत धारणाएं फैलाई जा रही हैं। लम्बी आयु के लिए हमें अपने भोजन में समुचित मात्रा में दही एवं घी का समावेश अवश्य करना चाहिए। जब तक कोई विशिष्ट समस्या न हो, सुबह के नाश्ते में अथवा रात्रि में सोने से पहले हल्का गर्म दूध अवश्य पीना चाहिए। रात में सोने से पहले दूध पीने से पेट की अम्लीयता कम होती है, खाना जल्दी पचता है तथा नींद अच्छी आती है। दूध दही के सेवन से शरीर को विटामिन ए तथा कैल्शियम की पूर्ति होती है जबकि घी का नियमित प्रयोग करने से जोड़ों के दर्द नहीं होते और जोड़ों का प्रोपर लुब्रिकेशन होता है।

पनीर की जगह खाएं सूखे मेवे

भोजन में पनीर बहुत कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। यह मुश्किल से पचता है। इसकी जगह सूखे मेवों का सेवन करें। इनमें विशिष्ट प्रकार के ऑयल होते हैं जो हमारे शरीर की विभिन्न प्रकार की मांसपेशियों एवं मस्तिष्क को ऊर्जा देते हैं। एक दिन में एक मुट्ठी सूखे मेवे से अधिक न खाएं।

लम्बे जीवन के लिए अच्छा साहित्य पढ़ें

जीवन में प्रतिदिन कुछ अच्छा पढ़ें। अपनी रुचि का साहित्य पढ़ने से मस्तिष्क को स्फूर्ति मिलती है, साथ ही ज्ञान का भण्डार भी बढ़ता है। यह देखा गया है कि कविता और कहानी मनुष्य की लम्बी आयु के लिए अत्यंत प्रभावकारी हैं। सूर, तुलसी, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद आदि ने लम्बा जीवन जिया।

सोने से पहले धोएं हाथ-पैर

रात्रि में सोने से पहले हाथ-पैर मुंह धोने से शरीर को आराम मिलता है, नींद अच्छी आती है।

स्वयं से पूछें सवाल

प्रतिदिन सोने से पहले स्वयं से कुछ सवाल करें कि आज हमने लम्बी आयु के लिए क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया। अगले दिन से अच्छी बातों को करने और बुरी बातों को न करने का संकल्प दोहराएं और ईश्वर को प्रणाम करके सोएं तथा उन्हें एक अच्छे दिन के लिए धन्यवाद कहें। प्रातः आंख खुलने पर ईश्वर को प्रणाम करके बिस्तर छोड़ें तथा ईश्वर से मांगें कि हमारा तथा हमारे परिवार का जीवन लम्बा हो, अच्छा हो तथा सुखी हो।

इस प्रकार करें दिन का विभाजन

इस आलेख में बहुत सारी बातें कही गई हैं जिन्हें सुनने से ऐसा लगता है कि मनुष्य पूरे दिन यही सब करता रहेगा तो फिर काम कब करेगा! इस आलेख में बताई गई दिनचर्या का प्रबंधन करना बहुत आसान है। दिन में आठ घण्टे काम करें, आठ घण्टे निद्रा एवं विश्राम करें तथा आठ घण्टे अपने शरीर, मन एवं रिश्तों को स्वस्थ एवं दीर्घायु बनाने में लगाएं।

एक बार जब हम अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित कर लेते हैं तो प्राणायाम, व्यायाम, भ्रमण, धूप सेवन, तेल मालिश आदि कार्यों में एक घण्टे से अधिक समय नहीं लगता है।

लम्बी आयु के लिए इस आलेख को ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद। आप इसे यूट्यब चैनल ळसपउचे व Glimps of Indian History by Dr. Mohanlal Gupta पर भी देख सकते हैं। हम चाहते हैं कि संसार में प्रत्येक प्राणी, स्वस्थ, सुखी एवं प्रसन्न रहे। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोशियल मीडिया कमेण्ट्स से बदलता है हमारा भाग्य !

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इस बात को बहुत कम लोग अनुभव कर पाते होंगे कि सोशियल मीडिया कमेण्ट्स करने से हमारा भाग्य बदलता है।

बहुत से लोग सोशियल मीडिया राइट, कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर या यूट्यूबर पर कमेंट्स करते हैं। एक ही वीडियो को हजारों लोग लाइक करते हैं तो लगभग 10 प्रतिशत लोग डिस्लाइक करते हैं।

इसी प्रकार लगभग हर वीडियो पर लगभग 90 प्रतिशत लोग पॉजीटिव कमेंटस देते हैं और 10 प्रतिशत लोग नेगेटिव कमेंट्स लिखते हैं।

क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है ? हमारे द्वारा दिए गए पॉजिटिव और नेगेटिव कमेंट्स का हमारी अपनी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है ?

निश्चित रूप से हममें से बहुत से लोग इस बात को जानते हैं। फिर भी जो नहीं जानते हैं उनकी सुविधा के लिए तथा इस बात से जुड़े हुए विविध पक्षों पर विस्तार से चर्चा करने के लिए हमने यह आलेख तैयार किया है।

हमारा व्यक्तित्व हमारे भीतर बह रही पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी का मिला-जुला परिणाम है। हर व्यक्ति के भीतर दोनों प्रकार की एनर्जी होती है। ये दोनों प्रकार की एनर्जी हमारे व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित करती हैं।

प्रकृति ने दोनों प्रकार की एनर्जी हमारे भीतर संतुलित करके सजाई हैं किंतु हमने अपने दुर्भाग्य को बढ़ावा देने के लिए जानबूझ कर इनके संतुलन को बिगाड़ दिया है।

दोनों प्रकार की एनर्जी का संतुलन क्या है, इसे हम इस आलेख के अंतिम भाग में जानने का प्रयास करेंगे। आलेख के आरम्भिक भाग में हम भाग्य को बनाने वाली कुछ महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा कर रहे हैं।

आरम्भ से लेकर अंत तक हमारे भाग्य का निर्माण कौन करता है! निश्चित रूप से हमारा व्यक्तित्व। हमारा व्यक्तित्व ही हमसे कर्म करवाता है। उस कर्म से हमारा भाग्य बनता है। हमारा व्यक्तित्व ही दूसरों को प्रसन्न या नाराज करता है।

हमारे व्यक्तित्व के साथ-साथ दूसरे लोगों की प्रसन्नता और नाराजगी भी बहुत गहराई तक हमारे भाग्य को प्रभावित करती है। इसी को लोगों की दुआ लेना अथवा बद्दुआ लेना कहा जाता है।

हमारे भाग्य का निर्माण करने के लिए व्यक्तित्व को सुधारना आवश्यक है और व्यक्तित्व को सुधारने के लिए अपने भीतर की पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी को संतुलित करना आवश्यक है। भीतर की एनर्जी को संतुलित करने के लिए अपनी सोच को सुधारना आवश्यक है।

सोच को सुधारने के लिए अपने कर्म को सुधारना आवश्यक है और कर्म को सुधारने के लिए अपनी सोच को सुधारना आवश्यक है।

इस प्रकार ये सारी चीजें अर्थात् भाग्य, व्यक्तित्व, सोच, पॉजिटिव एनर्जी, नेगेटिव एनर्जी और हमारा कर्म ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक के सुधरने पर बाकी की चीजें अपने आप सुधरने लगती हैं तथा एक के बिगड़ने पर बाकी की चीजें स्वतः खराब होने लगती हैं।

जब हम किसी सोशियल प्लेटफॉर्म पर कमेंट करते हैं तो हम अकेले होते हैं। हम सोचते हैं कि हमें कौन देख रहा है। इसलिए सोशियल मीडिया राइटर, कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर या यूट्यूबर की तुलना में स्वयं को बड़ा दिखाने की नीयत से हम बिना सोचे-समझे कुछ भी कमेंट कर देते हैं।

जिस वीडियो को हजारों-लाखों लोगों ने लाइक किया है, उसके लिए अच्छी-अच्छी बातें लिखी हैं, उसे भी हम डिसलाइक करते हैं तथा उसके बारे में भद्दे कमेंट लिखते हैं ताकि यूट्यूबर या कंटेंट राइटर का मनोबल तोड़ा जा सके।

कुछ लोगों ने तो नेगेटिव कमेंट्स करने का अभियान सा चला रखा है और कुछ लोग गंदी-गंदी गालियां तक लिखते हैं, इनकी सोच यही होती है कि जिसे हम गालियां लिख रहे हैं, वह न तो हमें गालियां दे सकता है और हमारे घर आकर हमारा गला पकड़ सकता है।

निश्चित रूप से नकारात्मक टिप्पणी, गालियों और डिस्लाइक जैसी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव सोशियल मीडिया राइटर, कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर या यूट्यूबर पर बुरा होता है किंतु क्या हम जानते हैं कि उसका परिणाम और प्रभाव हमारे अपने लिए भी बुरा होता है ?

जब हम किसी के खिलाफ कोई नकारात्मक टिप्पणी करते हैं या गालियां लिखते हैं तो हमारे भीतर नकारात्मक एनर्जी का प्रवाह बहुत तेजी से होता है जिसके कारण हमारे भीतर वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाता है।

वात, पित्त और कफ का असंतुलन वस्तुतः हमारे भीतर की पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी के बीच हुए असंतुलन का परिणाम है। इनके बिगड़ने से न केवल हमारा शरीर बीमार पड़ता है अपितु हमारे व्यक्तित्व में सकारात्मक सोच की क्षमता भी कम होती चली जाती है और हम बुरी एनर्जी से घिर जाते हैं जिसका परिणाम बुरे व्यक्तित्व एवं बुरे भाग्य के रूप में हमारे सामने आता है।

जैसा हम सोचते हैं, वैसी ही हमारी शक्ल भी बन जाती है। हमारी आंखें देखकर ही सामने वाले को पता चल जाता है कि हम अच्छे और पॉजिटिव पर्सनैलिटी वाले आदमी हैं या बुरे और नेगेटिव पर्सनैलिटी वाले।

जब सामने वाला व्यक्ति हमें देखकर ही हमारे व्यक्तित्व से नाराज हो जाता है तो निश्चित रूप से हमारा भाग्य सुरक्षित कैसे रह सकता है!

अपने भीतर की पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी का संतुलन करने के लिए हमें थोड़ा अभ्यास करना होता है।

हम अपनी तरफ से सदैव दूसरों के प्रति नकारात्मक टिप्पणी न करें। यदि कोई हमें नकारात्मक बात कह रहा है तो भी उसे अपनी सहनशक्ति की सीमा तक क्षमा करें। दूसरों को सहने की अपनी शक्ति को बढ़ाएं।

भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की सौ गलतियां माफ करने की सीमा निर्धारित कीं। उसी प्रकार हम भी अपनी सहन सीमा को काफी आगे तक ले जाएं और यदि सामने वाला व्यक्ति तब भी असभ्य व्यवहार करे तो अपनी शक्ति के अनुरूप उसका उपचार भी करें। आपके अंतिम उपचार भी नकारात्मक नहीं हों तो अच्छा है।

अपने अच्छे व्यक्त्वि से ही सामने वाले को अपने अनुकूल करने का प्रयास करें।

जिस प्रकार अच्छे को अच्छा कहना आवश्यक है, उसी प्रकार बुरे को बुरा कहना भी आवश्यक है। ऐसा करने से हमारे भीतर की नेगेटिव एनर्जी का विस्तार नहीं होता अपितु विश्व भर में व्याप्त पॉजिटिव एनर्जी को ताकत मिलती है। इसी को दोनों प्रकार की एनर्जी का संतुलन कहते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्लॉगिंग का इतिहास करोड़ों की कमाई!

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ब्लॉगिंग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है फिर भी इसके बारे में जानना बहुत रोचक है। ब्लॉगिंग का इतिहास दर्शाता है करोड़ों की कमाई!सोशियल मीडिया की दुनिया में तीन शब्द बी-लॉग, वी-लॉग एवं मोटो-व्लॉग B-log, V-log and  Moto-Vlog बहुतायत से प्रयुक्त होते हैं।

ब्लॉग शब्द बाइट तथा लॉग से मिलकर बना हुआ है। जब हम किसी टैक्सट् को लिखकर इलेक्ट्रोनिक प्लेटफॉर्म पर डालते हैं तो उसकी लम्बाई को बाइट्स में नापा जाता है। इसे बी-लॉग अथवा ब्लॉग लिखना एवं ब्लॉगिंग करना भी कहा जाता है।

ब्लॉग में कोई भी व्यक्ति अपने विचारों, सूचनाओं एवं तथ्यों को जनसामान्य की जानकारी के लिए शब्दों में लिखता है।

यह एक तरह का लेख है जिसे इलेक्ट्रोनिक सोशियल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाता है। ब्लॉग को प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें टैक्स्ट के साथ-साथ डायग्राम, फोटो, इमेज, आर्ट-वर्क, ग्राफ एवं टेबल्स आदि का उपयोग किया जाता है।

वी-लॉग अथवा व्लॉग में विचारों, सूचनाओं एवं तथ्यों आदि को वीडियो के रूप में दिखाया जाता है। इस वीडियो में स्क्रीन पर टैक्स्ट, डायग्राम, फोटो, वीडियो क्लिप्स, आर्ट-वर्क, ग्राफ, टेबल्स तथा स्लाइड्स आदि दिखाए जाते हैं तथा बैकग्राउंड में कंटेट पढ़ा जाता है एवं संगीत बजाया जाता है। इसे वैब टेलिविजन भी कहा जाता है।

वी-लॉग में स्क्रीन पर टैक्स्ट, डायग्राम, फोटो, वीडियो क्लिप्स, आर्ट-वर्क, ग्राफ, टेबल्स तथा स्लाइड्स आदि दिखाए जाते हैं तथा बैकग्राउंड में कंटेट पढ़ा जाता है एवं म्यूजिक तथा साउण्ड इफैक्ट्स दिए जाते हैं।

वी-लॉग में स्क्रीन पर टैक्स्ट दिखाने के लिए सामान्यतः पॉवर पॉइंट स्लाइड्स का प्रयोग किया जाता है।

स्लाइड्स को आकर्षक बनाने के लिए एनीमेशन टूल्स का प्रयोग किया जाता है।

वीडियो ब्लॉगिंग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है फिर भी यह समय के साथ स्थिर कदमों से आगे बढ़ा है।आजकल मोटो-वीलॉग शूट का भी प्रचलन बढ़ रहा है। जब कोई व्यक्ति मोटर साइकिल पर बैठकर वीडियो शूट करता है तो उस वीडियो ब्लॉग को motovlog अर्थात् मोटरसाइकिल वीडियो ब्लॉग कहा जाता है।

दुनिया भर में बहुत सी वैबसाइट कम्पनियां, लेखकों एवं वीडियो-ब्लागर्स को अपने वीडियो चैनल बनाने से लेकर स्वयं की वीडियो ब्लॉगिंग साइट्स चलाने की सुविधा प्रदान करती हैं।

स्मार्ट फोन में डिजिटल कैमरा जुड़ जाने के बाद वीडियो-लॉगर्स को यह सुविधा भी मिलने लगी है कि वे अपने मोबाइल फोन से वीडियो को सीधे ही अपने चैनल या वीडियो एकाउंट पर अपलोड कर दें।

वीडियो-लॉग का सामान्यतः यूट्यब चैनल के माध्यम से प्रदर्शन किया जाता है। संसार भर में वी-लॉगिंग ने यूट्यूब चैनल के माध्यम से टेलिविजन की दुनिया को बहुत बड़ी चुनौती दी है।

छोटे-छोटे गांव, गली, शहर तथा मुहल्लों में रहने वाले वी-लॉगर्स ने बड़े-बड़े पत्रकारों और फिल्मकारों के छक्के छुड़ा दिए हैं।

वीडियो लोगिंग का इतिहास भी बहुत रोचक है। बी-लॉग, वी-लॉग एवं मोटो-व्लॉग लेखन का कार्य अपेक्षाकृत तेज गति से एवं स्थिरता के साथ बढ़ा। जब से ये प्रचलन में आए हैं। इनकी मांग अथवा प्रचलन कभी नहीं घटा।

न्यूयॉर्क के एक कलाकार सुलिवन ने 1980 के दशक में न्यूयॉर्क सिटी एवं साउथ कैरोलीना के आसपास के दृश्यों को अपने वीडियो कैमरे से शूट करके वी-लॉगिंग की तरफ लोगों का ध्यान खींचा।

जनवरी 2000 में वी-लॉगिंग में एक नया मोड़ तब आया जब एडम कोन्ट्रास नामक एक युवक ने लॉस एंजिलिस तक के लिए अपनी क्रॉस कंट्री के दृश्यों को एक ब्लॉग एण्ट्री के साथ पोस्ट किया। उसने यह वीडियो अपने मित्रों के लिए बनाई थी। यह संसार की सबसे लम्बी पोस्ट थी जो बाद में सर्वाधिक रनिंग वीडियो का रिकॉर्ड बनाने में सफल हुई।

नवम्बर 2000 में एड्रियन माइल्स ने एक वीडियो पोस्ट किया। इसमें एक स्थिर चित्र के ऊपर बार-बार बदलने वाला टैक्स्ट मैसेज था। उसने विश्व में पहली बार अपनी इस कला को वी-लॉगिंग का नाम दिया। वास्तव में यह वीडियो-ब्लॉग का लघु नाम था।

वर्ष 2002 में एक फिल्म निर्माता लुक बॉवमैन ने ट्रॉप्सिम्स डॉट ओआरजी के नाम से एक वीडियो डायरी आरम्भ की जिसमें उसने अपनी यात्राओं के वीडियो दिखाए। इसे संसार की पहली वी-लॉग और वीडियो लॉग साइट कहलाने का सौभाग्य मिला।

वर्ष 2004 में स्टीव गारफील्ड नामक एक युवक ने अपना स्वयं का वीडियो ब्लॉग लाँच किया तथा वर्ष 2004 को उसने ईयर ऑफ वीडियो ब्लॉग घोषित किया। इसके बाद का ब्लॉगिंग का इतिहास दर्शाता है करोड़ों की कमाई!

वर्ष 2005 में वी-लॉगिंग को पूरी दुनिया में लोकप्रियता प्राप्त होने लगी। उसी वर्ष याहू नामक वैबसाइट कम्पनी ने देखा कि उसके वीडियो ब्लॉगिंग समूह में अचानक ही सदस्यों की संख्या नाटकीय ढंग से बढ़ गई है। 

फरवरी 2005 में पहली बार वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब को लाँच किया गया जो आज संसार की सर्वाधिक लोकप्रिय वीडियो साइट है।

लाँच होने की केवल डेढ़ साल की अवधि में अर्थात् जुलाई 2006 में यूट्यूब संसार की पांचवी सर्वाधिक लोकप्रिय वैब डेस्टीनेशन बन गया। इस प्लेटफॉर्म पर प्रतिदिन 65 हजार नए वीडियो अपलोड किए जाने लगे एवं दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 100 मिलियन वीडियो देखे जाने लगे।

रूस के भूतपूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव्ज ने नवम्बर 2008 में लेटिन अमरीका की यात्रा की तथा इस यात्रा का एक वीडियो ब्लॉग पोस्ट किया।

चार्ल्स ट्रिप्सी नामक एक वीडियो-ब्लॉगर ने एक यूट्यूब चैनल बनाया जिसका नाम Internet Killed Television था। इस यूट्यूब चैनल का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। ट्रिप्सी प्रतिदिन कम से कम एक वीडियो-लॉग पोस्ट करता है तथा 3000 से अधिक वीडियो पोस्ट करके वह दुनिया में ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति बन गया।

वर्ष 2010 में यूट्यूब ने लॉस एंजिलिस में विडकॉन नाम से एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें दुनिया भर के वी-लॉगर्स ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन से यह स्पष्ट हो गया कि वी-लॉगिंग, टेलिविजन तथा सिनेमा साहित दुनिया भर के मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

यदि हम वीडियो ब्लॉगिंग का इतिहास देखें तो हमें जानकारी होगी कि किस प्रकार यूट्यूब से प्रेरित होकर इंस्टाग्राम तथा फेसबुक जैसी वैबसाइट्स को भी अपने उपयोगकर्ताओं को वीडियो अपलोड करने एवं लाइव ब्रॉडकास्टिंग करने की सुविधा देनी पड़ी। आज यूट्यूब इण्टरनेट की दुनिया में सर्वाधिक देखी जाने वाली तीन वैबसाइट्स में से एक है।

यूट्यूब चैनल अपने सदस्यों को उनके वीडियो चैनल पर विज्ञापन दिखाने की भी सुविधा देता है जिससे वी-ब्लॉगर्स को अच्छी-खासी आमदनी होती है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013 में एक वी-लॉगर ने 7,20,000 यूएस डॉलर अर्थात् भारतीय मुद्रा में कहें तो लगभग 5 करोड़ रुपए कमाए। तब से अब तक इस रिकॉर्ड को कई बार तोड़ा जा चुका है तथा दुनिया भर में लोग लाखों डॉलर प्रतिवर्ष की कमाई कर रहे हैं।

इन तथ्यों के आधार पर जाए कि ब्लॉगिंग का इतिहास दर्शाता है करोड़ों की कमाई तो इसमें कोई अतिश्याक्ति नहीं होगी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
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एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
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हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...