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सुन उर्दू बदमास

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सुन उर्दू बदमास

डिगरी हिन्दी की करों मैं अपने इजलास, डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास । तुम हिन्दी गुन आगरी काम तुम्हारे स्वच्छ, तेरो गुन क्या जानहिं उर्दू और मलेच्छ।

हिन्दी आन्दोलन के दौरान हिन्दी-उर्दू विवाद की कटुता अपने चरम पर पहुंच गई। उन दिनों सोहन प्रसाद नामक एक शिक्षक ने ‘हिन्दी उर्दू की लड़ाई’ शीर्षक से एक ‘पद्य नाटक’ लिखा जिसमें हिन्दी-उर्दू विवाद को उसकी सम्पूर्ण कटुता के साथ प्रदर्शित किया गया। इस नाटक की भाषा अवधी एवं भोजपुरी प्रभाव-युक्त हिन्दी है। यह नाटक ‘भारत जीवन प्रेस’ से फरवरी 1884 में छपा था।

सोहन प्रसाद ब्रिटिश भारत के अंतर्गत गोरखपुर डिवीजन के हाटा नामक कस्बे के स्कूल पड़री में मुदर्रिस (शिक्षक) के पद पर नियुक्त थे। हिन्दी आन्दोलन के दौरान वे सोहन प्रसाद मुदर्रिस के नाम से प्रसिद्ध हुए। उस काल को हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग के नाम से जाना गया है। यह वह काल था जब खड़ी बोली हिन्दी राजकीय कार्यालयों में प्रतिष्ठा पाने के लिए जी-जान से संघर्ष कर रही थी तथा उसका मानक स्वरूप तैयार करने के लिए प्रयास चल रहे थे।

सोहन प्रसाद मुदर्रिस हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए उत्तेजक कविताएं लिखा करते थे। उनके द्वारा लिखे गए इस पद्यनाटक के मुखपृष्ठ पर सोहन प्रसाद ने लिखा- ‘हिन्दी के अतिरिक्त संसार में गुणखानि दूसरी विद्या दृष्टि में नहीं आती, तिस्में उर्दू तो औगुण की खान ही जान पड़ती है।’

नाटककार द्वारा हिन्दी भाषा के गुणों और उर्दू भाषा के औगुणों (अवगुणों) को प्रकट करने के लिए एक उत्तेजक रूपक खड़ा किया गया जिसमें हिन्दी देवी और उर्दू वेश्या के परस्पर संवादों की रचना की गई। यह नाटक सामान्य वार्तालाप से आरम्भ होकर गाली-गलौज और मारपीट से होते हुए न्यायालय तक पहुँचता है।

नाटक के आरम्भ में उर्दू वेश्या हिन्दी देवी से पूछती है- ‘आजकल हिन्दू लोग मुझसे नाराज क्यों हो रहे हैं?’

इस पर हिन्दी देवी कहती है- ‘तुम्हारे रोम-रोम में अवगुण भरे हुए हैं, इसीलिए आर्यजन तुमसे रुष्ट हैं। उन्हें तुमसे बहुत हानि हुई है।’

इस पर उर्दू वेश्या पलटकर कहती है- ‘ऊँची नौकरियाँ पाने के लिए हिन्दू और मुसलमान, दोनों बड़े प्रेम से मुझको पढ़ते हैं-

पढ़ब जो उर्दू प्रेम से होइब तहसिलदार

ऐसे हिन्दू लोग कहि आवहिं हमरे द्वार।

….खूब कमाई करत हैं, उर्दू पढ़ि-पढ़ि लोग।

हिन्दी देवी तथा उर्दू वेश्या की यह बहस शीघ्र ही गाली-गलौज में बदल जाती है और विवाद भाषा के बजाय हिन्दू-मुसलमान का हो जाता है। हिन्दी देवी कहती है-

रे उर्दू हत्यारिनी नीची जाति कुजाति

क्या बकबक करति है माँ से तैं दिन राति। (83)

दफ्तर तोरे हाथ में ताते भयउ उदंड

नीच जाति जब बढ़त है उनको होत घमंड। (84)

हिन्दू रोजी कारने तोहि पढ़ें तजि मोहि

नाहिं तो पूछे आर्य कब आछत हमारे तोहि। (85)

फिरि मत ऐसे बोलिहों नहिं करिहों दुई टूक

आर्य राज है आज नहिं देतीं मुँह पर थूक। (86)

इस वाद-विवाद की एक विशेषता यह है कि उर्दू लिपि के दोषों को स्वयं उर्दू के मुँह से ऐसे कहलवाया गया है मानो उर्दू अपनी प्रशंसा कर रही हो। अरबी लिपि में लिखा कुछ, पढ़ा कुछ जाता है और एक ही शब्द कुछ हेर-फेर के साथ विभिन्न अर्थ देता है, इसे उर्दू अपनी प्रशंसा के रूप में प्रस्तुत करती है।

इसके उत्तर में हिन्दी कहती है-

एक छाड़ि दूसर करै सो वेश्या कर काम।

पतिव्रता गुन यह नहीं सुन तू वेश्या वाम (20)

हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर लोगों का मानना है कि इस नाटक का प्रमुख उद्देश्य हिन्दी-उर्दू विवाद को दर्शाना नहीं है अपितु हिन्दू-मुस्लिम मेलजोल की निन्दा करना है। उनका आरोप है कि 19वीं सदी के भारतीय नवजागरण की शुद्धतावादी फंडामेंटलिस्ट प्रवृत्तियों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच अलगाव को बढ़ाने का काम किया।

हिन्दी नवजागरण के लेखकों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के तत्वों पर न सिर्फ सबसे कम बल दिया, अपितु जब भी अवसर मिला, इस एकता और समानता के तत्वों की निन्दा ही की। सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने भी हिन्दू-मुस्लिम अलगाव को आदर्श मानते हुए तथा हिन्दू-मुसलमानों के बीच मेलजोल को भटकाव बताते हुए, एक-दूसरे से अलग-थलग रहने-चलने का आदर्श प्रस्तुत किया।

हिन्दी देवी को नीचा दिखाने के लिए उर्दू कहती है कि तुम्हारे हिन्दू लोग न सिर्फ अपनी भाषा को छोड़कर उर्दू पढ़ते हैं, अपितु अपने धर्म की बातों को भी छोड़कर मुसलमानों के संस्कार अपनाते हैं-

बिसमिल्ला अल्ला पढ़ैं कर्म धर्म सब त्यागि

मोरे मत में होइ रहे आपन मत परित्यागि। (159)

जितने हिन्दू हिन्द में सब कोउ सीखे सलाम

तोर रीति से प्रीति नहिं छोड़े दण्ड प्रणाम। (152 )

पैगम्बर अरू पीर को सुमिरैं ध्यान लगाय

सदा ताजिया धरत हैं हारेचाक बनाय। (160)

हिन्दू रोजा रहत हैं दिन भर करहिं उपास

अल्ला पीर मनावहीं मोहि तुम्हारी आस। (170)

देखत हैं जब नैन सो कहीं कब्र तुरकान

तुरन्त दंडवत करत है मोर करो कल्यान। (171)

घर-घर से सब जात है बहराइच   स्थान

काशी मथुरा अवधपुर कौन जात तुर्कान। (172)

उर्दू द्वारा कही गई इस बात को अपने लिए लज्जा और हीनता की बात मानते हुए हिन्दी पलट कर कहती है-

मूरख हिन्दू पूजहिं पीर ताजिया कब्र

जो निज मजहब जानिहीं तिन्हें लगत बड़ जब्र। (153)

अपने मत जो जानहिं कहें बहुत पछताय

झंडा गाजी ताजिया फाड़िके देहूं जलाय। (154)

सज्जन जन नहिं भूलिकै करैं तुर्क को साथ

घृणा बिलोकत करत है दूर रहे सौ हाथ। (155)

आर्ज मता में है लिखा तुर्क संग बड़ पाप

परछाहीं मत कांड़हूँ पीछे दस पग नाप। (156)

इसके बाद हिन्दी भी उर्दू को लज्जित करने के लिए उन बातों का वर्णन करती है जिन्हें मुसलमानों ने हिन्दुओं के प्रभाव से अंगीकार कर लिया था। मुसलमानों को अपना मत छोड़ देने के लिए धिक्कारते हुए हिन्दी कहती है-

तुरुक नारि सिर सिन्दूर देहिं संवारि संवारि

कह हदीस में है लिखा उत्तर देह बिचारि। (161)

रचै ताजिया तुर्क सब रंग बिरंग बनाय

कह हदीस में है लिखा हमसे देह बताय। (163)

बाजा ब्याह में बजत है गावहिं तिरिया गीत

करैं तुर्क यह रस्म क्यों अपने मत विपरीत। (165)

जब हिन्दी देवी और उर्दू वेश्या एक दूसरे की आलोचना करती हैं तो हिन्दी देवी इस्लाम के मजहबी नेताओं की भी निन्दा करने लग जाती है-

उमर खलीफा अस पुरुष तुरुकन के सिरताज

चौदह भुअन में खोज अस मिलइ न कोउ बेलाज। (158)

परतिय गामी अधम जद तनिक न करहिं विचार

हिन्दू भूप न सपन में परतिय रूप निहार। (159)

परतिय महल में छीनि के डारि लेहिं बदमास

कहँ हदीस में है लिखा हमसे करो प्रकाश। (160)

इस प्रकार इस नाटक में हजरत उमर खलीफा को हदीस के खिलाफ चलने वाला, परस्त्रीगामी, दुनिया का सबसे बेशर्म, अधम और बदमाश कहा गया तथा हिन्दू राजाओं को जीवन में तो दूर, स्वप्न में भी परस्त्री का विचार नहीं लाने वाला बताया गया।

इस नाटक की रोचकता तब बहुत बढ़ जाती है जब सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने न सिर्फ हिन्दी के मुँह से उमर के विरुद्ध यह टिप्पणी करवायी अपितु उर्दू से इसकी स्वीकरोक्ति भी करवाई कि जो तुर्क परस्त्री गमन करते हैं, वे महाअधम हैं-

परतिय गामी तुर्क जो तिन्हें मूर्ख तुम जान

उमर आदि सब तुर्क को महाअधम करि मान। (167)

अंत में दोनों एक-दूसरे से हाथापाई करते हुए, एक-दूसरे का झोंटा नौंचने की धमकी देते हुए अपने झगड़े का निर्णय कराने के लिए अंग्रेज जज के समक्ष पहुंचती हैं। दोनों भाषाएं जज के समक्ष अपने-अपने गुण एवं अपनी प्रतिद्वंद्वी भाषा के अवगुणों का वर्णन करते हुए एक-दूसरे पर आरोप लगाती हैं। इस बार फिर से उर्दू अपने दोषों को अपने गुण बताती है तथा हिन्दी पर आरोप लगाती है कि हिन्दी में ऐसे गुण नहीं हैं। नाटक के अंतिम भाग में अंग्रेज न्यायाधीश अपना निर्णय हिन्दी देवी के पक्ष में सुनाता है-

डिगरी हिन्दी की करों मैं अपने इजलास

डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास । (831)

तुम हिन्दी गुन आगरी काम तुम्हारे स्वच्छ

तेरो गुन क्या जानहिं उर्दू और मलेच्छ । (334)

अंग्रेज जज का यह निर्णय सुनकर हिन्दू प्रसन्न होते हैं तथा तुर्क रोने लगते हैं। हिन्दी अंग्रेज न्यायाधीश को प्रणाम करती है तथा आर्यजनों को अपने साथ लेकर बड़े गर्व के साथ घर लौटती है।

अंत में नाटककर्त्ता हिन्दुओं से एकजुट और एकमत रहने का आह्वान करता है और कहता है कि इस ग्रन्थ को पढ़कर दुष्ट लोग मुझे गालियाँ देंगे, किंतु जो समझदार हिन्दू और समझदार मुसलमान हैं, वे मन लगाकर इसे पढ़ेंगे। अर्थात् सोहन प्रसाद मुदर्रिस यह दावा करते हैं कि इस नाटक से न केवल हिन्दुओं को अपितु मुसलमानों को भी तसल्ली मिलेगी।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

न्यायालय में हिन्दी-उर्दू मुकदमा

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न्यायालय में हिन्दी-उर्दू मुकदमा

ब्रिटिश न्यायालय में हिन्दी-उर्दू मुकदमा हिन्दी-उर्दू मुकदमा दशकों तक चला किंतु उसका कभी कोई अंत नहीं आया। अंग्रेजी न्यायालय वैसे भी न्याय नहीं देते थे, मुकदमे को लम्बे से लम्बा खींचते थे। इस कारण समाज में बेचैनी बढ़ती थी और अपराधियों के हौंसले बुलंद होते थे।

सोहन प्रसाद मुदर्रिस की पुस्तक का पहला विज्ञापन ‘भारत जीवन’ नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र में फरवरी 1885 में छपा। इस विज्ञापन के छपने पर कुछ हिन्दू पाठकों ने इसे मंगवाया तथा उसकी प्रशंसा में सोहन प्रसाद को बधाइयाँ भेजीं। शीघ्र ही इस पुस्तक की चर्चा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में होने लगी जिसके कारण पुस्तक को लोकप्रिय होने में समय नहीं लगा। हिन्दू पाठक चटखारे ले-ले कर इसे पढ़ने लगे। जब मुसलमानों ने इस पुस्तक को पढ़ा तो वे सन्न रह गए।

कुछ ही महीनों बाद जून 1885 में इस पुस्तक के विरुद्ध गोरखपुर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वाद स्थापित कर दिया गया। इस प्रकार हिन्दी-उर्दू की लड़ाई नाटक की इजलास से निकलकर वास्तविक न्यायालय में पहुंच गई। न्यायालय में हिन्दी-उर्दू मुकदमा एक बार घुसा तो जल्दी से बाहर नहीं निकल सका।

गोरखपुर के मुसलमानों की ओर से मुहम्मद खाँ मुस्तगीस ने कोर्ट में नालिश दायर की। उसने अपने इस्तगासे में इस पुस्तक के लेखक पर ताजीरात ए हिन्द की दफा 504, 293, 298 और 500 के तहत आरोप लगाते हुए कहा कि जो गर्ज और मकसद इस किताब का जाहिर किया गया है, उससे साफ है कि इस किताब में किसी मज़हबी बहस को ताल्लुक नहीं होना चाहिए, लेकिन मुल्जिम ने विला जरूरत महज बदनीयती और द्वेषभाव से मुसलमानों के धर्म का अपमान करने और उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने के इरादे से इस्लाम और उसके धार्मिक महापुरुषों के खिलाफ कई निरादर भरे वाक्य लिखे हैं।

इससे स्पष्ट है कि मुसलमानों को हिन्दी-उर्दू विवाद पर कोई आपत्ति नहीं थी अपितु अदालत में दावर नालिश में मुख्य शिकायत हजरत उमर के चरित्र पर की गयी टीका-टिप्पणी को लेकर की गई थी।

दरख्वास्त में सबसे कड़ा एतराज इस बात पर किया गया कि लेखक ने मुसलमानों के पैगम्बर के जानिशान दोयम हजरत उमर फरूकर अल्लाह वाला ऊनहू की शान मुबारक में नाशा इस्तह और बेहूदह अल्फाज कहे हैं और मुलजिम ने हजरत खालीफह सानी रजी अल्लाह ….. ऊनहू की निस्बत खुल्लमखुल्ला बेशर्म जनाकार वगैरह ऐसे-ऐसे अल्फाज कहे हैं…. किताब मजकूरह फाहिश है और तौहीन से भरी हुई है। लिहाजा मुलजिम को सजा फरमाई जावे व जुमिलह किताबें जब्त होकर तलफ कराई जावें। 

न्यायालय में स्थापित किए गए वाद की सुनवाई की पहली तिथि 21 अगस्त 1885 निश्चित की गई। सोहन प्रसाद मदर्रिस न्यायालय में प्रस्तुत हुए किंतु उनके नाम की पुकार नहीं पड़ी तथा सुनवाई अगले दिन के लिए टाल दी गयी। 22 अगस्त 1885 को लगभग दो सौ मुसलमान कचहरी के हाते में जमा हो गये। उन्होंने अपने वकील के माध्यम से मजिस्ट्रेट से मुकदमे का निर्णय शीघ्र करने की प्रार्थना की। 

इस बीच हाटा के एक मुसलमान मुदर्रिस मन्सब अली ने चार आदमियों के साथ मिलकर सोहन प्रसाद के मदरसे में घुसकर उसके कमरे का ताला तोड़ दिया और वहाँ रखी पुस्तकों की समस्त प्रतियाँ उठाकर ले गया। नगर से लौटने पर सोहन प्रसाद को इसकी जानकारी हुई। उसने मुदर्रिस मंसब अली के विरुद्ध गोरखपुर मजिस्ट्रेट के पास लिखित शिकायत की जिसमें कुल 323 रुपए की पुस्तकें चोरी चले जाने की बात कही गयी।

मजिस्ट्रेट ने सोहन प्रसाद द्वारा की गई शिकायत की जांच करने के लिए, उसका प्रार्थनापत्र हाटा के तहसीलदार के पास भेज दिया। इस जांच से सिद्ध हुआ कि मुद्दई ताला तोड़कर पुस्तकें ले गया था। पुलिस ने मन्सब अली को गिरफ्तार करके गोरखपुर के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया। मन्सब अली ने मजिस्ट्रेट से कहा कि उसे डिप्टी इन्सपेक्टर ऑफ स्कूल्स ने रजिस्टर लाने का हुक्म दिया था। इस कारण उसने ताला तोड़कर रजिस्टर निकाला किंतु किताबें उसने नहीं लीं।

सोहन प्रसाद ने इलाहाबाद के काशी प्रसाद को अपना वकील बनाया जो एक प्रतिष्ठित आर्यसमाजी थे और प्रयाग हिन्दू समाज के सेक्रेटरी थे। उन्हें इलाहाबाद से बार-बार गोरखपुर जाने में कठिनाई होती थी इसलिए कुछ समय बाद उनके स्थान पर गोरखपुर के ही गोरख प्रसाद नामक प्रतिष्ठित हिन्दू वकील को नियुक्त किया गया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोहन प्रसाद मुदर्रिस के समर्थन में आंदोलन

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सोहन प्रसाद मुदर्रिस

सोहन प्रसाद मुदर्रिस का यह कथन निश्चय ही देश में हिन्दू-मुसलमान दंगों को भड़काने के लिए उकसाने वाली कार्यवाही माना जा सकता था किंतु अंग्रेज अधिकारियों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

सोहन प्रसाद मुदर्रिस पर किए गए अभियोग से जुड़ा हुआ सबसे रोचक और महत्त्वपूर्ण भाग यह भी था कि सोहन प्रसाद की गुहार पर उसकी सहायता के लिए उस काल की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं ने एक आन्दोलन चलाया जिसमें सैकड़ों हिन्दी समर्थकों ने भाग लिया।

इस आंदोलन की तुलना मुरादाबाद के मुंशी इन्द्रमणी द्वारा इस्लाम के विरुद्ध लिखी गई किताबों पर मुकदमे के दौरान उभरे हिन्दू-समर्थन से की जाती है जिसमें दयानन्द सरस्वती के नेतृत्व में आर्यसमाजियों ने पूरे देश में इन्द्रमणी के लिए आर्थिक सहायता का अभियान छेड़ा था। इस मुकदमे के परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक तनाव अपने चरम पर पहुँच गया था।

हिन्दी आन्दोलन के भीतर मौजूद मुस्लिम-विरोध का जैसा उग्र रूप सोहन प्रसाद की पुस्तक में प्रकट हुआ था, उससे कहीं अधिक उग्र रूप सोहन प्रसाद की सहायता के लिए चले इस अभियान में प्रकट हुआ। इस अभियान में पश्चिमोत्तर प्रान्त में चल रहे नवजागरण आंदोलन का और विशेषकर हिन्दी आन्दोलन का साम्प्रदायिक चरित्र सबसे आक्रामक रूप में प्रकट हुआ।

सोहन प्रसाद के समर्थन में खड़े हुए आंदोलन का मुख्य मंच हिन्दी नवजागरण आंदोलन के प्रमुख गढ़ बनारस से प्रकाशित बाबू रामकृष्ण वर्मा का साप्ताहिक पत्र ‘भारत जीवन’ था। हिन्दी के लेखक, पत्रकार और अनुवादक रामकृष्ण वर्मा बनारस के प्रभावशाली व्यक्ति थे। वे भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र के अच्छे मित्रों में थे और ब्रिटिश अधिकारियों एवं देसी नरेशों के साथ मधुर सम्बन्ध रखते थे।

इस आंदोलन के खड़े होने का मुख्य कारण यह था कि सोहन प्रसाद के विरुद्ध जैसे ही नालिश दायर हुई, सोहन प्रसाद ने ‘भारत जीवन’ में एक लम्बा पत्र प्रकाशित करवाकर अपनी रक्षा और सहायता के लिए गुहार लगाई। इस पत्र में उन्होंने पुस्तक का परिचय देते हुए लिखा कि इस पुस्तक में हिन्दी और उर्दू की आपस में बातचीत के माध्यम से हिन्दू-मुसलमानों को यह शिक्षा दी गयी है कि अपने-अपने धर्मशास्त्रानुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए न कि हिन्दुओं को मुसलमानों के मजहब पर और मुसलमानों को हिन्दुओं के धर्म पर चलना चाहिए।  निश्चय ही झगड़े की जड़ यह बात नहीं थी, कुछ और थी क्योंकि हिन्दुओं के धर्म पर मुसलमान न चलें, इस पर भला मुसलमानों को क्या आपत्ति हो सकती थी?

हाँ, मुसलमानों के मजहब पर हिन्दू न चलें, इस बात पर कुछ मुल्ला-मौलवियों को आपत्ति अवश्य थी, आम मुसलमान को इस बात से फर्क नहीं पड़ता था।

भारत जीवन में प्रकाशित पत्र में सोहन प्रसाद ने लिखा- ‘यद्यपि इस पुस्तक में सिवाय बड़ाई मुसलमानों की निन्दा कहीं नहीं की गयी है, पर नहीं जान पड़ता कि मुसलमानों के समझ में क्यों ऐसा ध्यान बँध गया है कि हमारे ऊपर दावा कर बैठे हैं और कई एक दफा ताजीरात हिन्द के कायम कराये हैं!’

सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने हिन्दुओं को जवाबी हमले के लिए उकसाया- ‘हम अपने हिन्दू भाइयों से पूछते हैं कि मुसलमानों ने तुहफुलहिन्द इत्यादि सैकड़ों पुस्तकें हिन्दू धर्म के विरुद्ध बनाई हैं और ईसाइयों ने हजारों पुस्तकें जैसे राम परीक्षा, कृष्ण परीक्षा, शिव परीक्षा, गुरु परीक्षा, सतमत निरूपण इत्यादि छापे हैं, क्या इनमें हिन्दू मत की निन्दा नहीं की गई है? यदि है तो क्यों हमारे हिन्दू भाई मौन होकर बैठे हैं? ….. जब मुसलमान हमारी पुस्तक को जलाने का उद्योग कर रहे हैं, तो आप लोग मुसलमानों और ईसाइयों द्वारा लिखी गई वे पुस्तकें जिनमें हमारे धर्म की निन्दा भरी है, उन्हें जलाने को क्यों नहीं उद्यत होते?’

सोहन प्रसाद मुदर्रिस का यह कथन निश्चय ही देश में हिन्दू-मुसलमान दंगों को भड़काने के लिए उकसाने वाली कार्यवाही माना जा सकता था किंतु अंग्रेज अधिकारियों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

सोहन प्रसाद ने यह पत्र कई पत्र-पत्रिकाओं में छपने को भेजा। उन्होंने हिन्दुओं को धिक्कारते हुए, उन्हें लज्जा का अनुभव कराते हुए स्वयं को धर्मसेवक के रूप में प्रस्तुत किया- ‘अगर आप हिन्दुओं को हिन्दू धर्म के कार्य हेतु उठने-बैठने में क्लेश होने का भय है तो मत उठिए हमीं आपके दास इस धर्म-कर्म में धंसते हैं। हमें अपनी नागरी की दुर्दशा देख नींद नहीं आती। गोवध देख हमारा कलेजा फटा जाता है। हमें अपने हिन्दू भाइयों का क्रिश्चियन हो जाना देख चैन नहीं पड़ता, क्या करें?’

सोहन प्रसाद ने अभियोजन में होने वाले व्यय हेतु हिन्दी के पाठकों और समर्थकों से चंदा देने की अपील की। उन्होंने उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, अलवर, कश्मीर, कपूरथला तथा रीवां आदि देशी रियासतों के हिन्दू नरेशों से भी उनके गौरवमयी अतीत का स्मरण करवाते हुए सहायता माँगी- ‘यदि सर्वदा से राजा-महाराजा अपने भारतवासियों की सुध लेते आये हों तो अब भी लें।’

सोहन प्रसाद की इस पुकार पर सबसे पहली प्रतिक्रिया आर्य हितैषी नामक किसी सज्जन की ओर से आयी। उन्होंने लिखा-

‘यवन ईसाइयों के अत्याचार पर सोहन प्रसाद का पत्र देखकर अत्यन्त खेद हुआ। यह विषय आर्य सन्तानों के लिए हृदय विदारक है। दूसरे धर्र्मों वाले हिन्दू धर्म की चाहे जितनी निन्दा करें, उन्हें कोई सजा नहीं होती, पर जहाँ बिचारे हिन्दू कुछ बोले कि उन पर ताजीरात हिन्द दफा कायम कर दिये जाते हैं। इसमें हमारी न्यायशील ब्रिटिश गवर्नमेंट की कोई गलती नहीं है क्योंकि उसने तो इसके लिए वाजिब कानून बना रखे हैं, परन्तु धर्माध्यक्षों (जजों) के यथोचित व्यवहार नहीं करने से ऐसे-ऐसे दोष उपस्थित होते हैं। तिस्में भी अब न्यायालयों में मुसलमानों को बड़े-बड़े पद व प्रतिष्ठा मिलने लगे हैं। भला यह लोग कब अपने भाइयों का पक्षपात छोड़ आर्यों का यथार्थ न्याय करेंगे?’ 

सोहन प्रसाद के पत्र के उत्तर में पत्र लिखने वाले आर्य-हितैषी की विरोध-चेतना, विरोध-पद्धति और शब्दावली विशिष्ट हैं। उन्होंने सरकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में उर्दू भाषा के प्रचलन की समस्या को साम्प्रदायिक अत्याचार के रूप में देखा, उसे न्यायालयों में मुसमलानों की नियुक्ति से जोड़कर देखा, उसे एक हिन्दू पौराणिक उपमा के माध्यम से देश के समक्ष रखा और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए संस्कृतनिष्ठ हिन्दी पदावली में हिन्दू नरेशों को पुकारा-

‘हे आर्यकुल भूषण, हे आर्यधर्म प्रतिपालक, हे मातृभूमि के गौरव, हे भारत रक्षा के कारण….. पहले भी जब दुष्ट राक्षस आर्यों के धर्म-कर्म में बाधक होते थे तो आप ही लोगों के पूर्वपुरुषों से सहायता पाकर आर्यजन इस घोर विपत्तिजाल से परित्राण पाते थे….. उसी पवित्र कुलसम्भूत आप सभों के वर्तमान रहते यहाँ के गौ, ब्राह्मण तथा अन्यान्य प्रजागण पीड़ित होवें, आप इसकी शान्ति का तनिक उद्योग न करें?’

आर्य-हितैषी ने हिन्दू राजाओं को रानी विक्टोरिया के पास अपने दूत भेजने का निवेदन करते हुए लिखा- ‘तनिक उद्योग कीजिए, देखिए, अभी सब आर्य-शत्रु ढीले पड़ते हैं।’ इस तरह सोहन प्रसाद के पत्र के जवाब में लिखे गये पहले ही पत्र से यह विवाद एक धर्मयुद्ध का आभास देने लगा।

बहुत जल्दी सोहन प्रसाद का मुकदमा हिन्दू धर्म और इस्लाम के बीच एक शक्ति परीक्षण का मुद्दा बन गया। वह न केवल मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दुओं की एकता और प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया अपितु आर्यधर्म की वर्तमान दशा को जांचने की एक कसौटी भी बन गया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा

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सोहन प्रसाद मुदर्रित का मुकदमा

जब अंग्रेजी न्यायालय में सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा चला तो इस मुकदमे का खर्च जुटाने के लिए भारत की जनता से चंदा मांगा गया। भारत के समस्त राजाओं, सेठों एवं जनसामान्य से अपील की गई कि वे हिन्दी भाषा की रक्षा के लिए आगे आएं तथा मुक्त हृदय से चंदा उपलब्ध करवाएं ताकि इस मुकदमे को अंतिम क्षण तक लड़ा जा सके।

सोहनप्रसाद मुदर्रिस की पुकार हिन्दूधर्म की पुकार बन गयी। सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा हिन्दू जाति की अस्मिता का प्रश्न बन गया। मुकदमे में सहायता के लिए चन्दा भेजने और समर्थन में पत्र लिखने का तांता बंध गया। दाउदनगर से चन्दा देने वालों की एक पूरी सूची भेजने वाले ‘सत्यवक्ता’ ने अपने पत्र में खेद व्यक्त करते हुए लिखा कि उनके नगर के कई धनवानों ने बहुत थोड़ा चन्दा दिया, कइयों ने तो कुछ भी नहीं दिया, हाय! हाय! हमारे आर्यधर्म की ऐसी दशा?’ 

बनारस जिले के बड़गाँव के मास्टर मुंशी लक्ष्मणप्रसाद ने सोहन प्रसाद का हौसला बढ़ाते हुए लिखा- ‘भैया, मैं भी आपकी विपत्ति का साथी हूँ. यदि हम लोग आपकी सहायता नहीं करेंगे तो क्या मलेच्छ और ईसाई आपको उबारेंगे?’

कामठी (नागपुर) के डी. एम. वी. स्कूल के हैडमास्टर अम्बाप्रसाद पांडे ने सेठ-साहूकारों, वकीलों और अध्यापकों का आह्वान किया कि वे इस धर्मकार्य में आगे बढ़कर हिस्सा लें क्योंकि यदि सोहन प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तकें जला दी गयीं तो हिन्दू बंधुओं को महाशोक और लज्जा का कारण होगा। 

इस काल में गौरक्षा और रामनवमी के जुलूस के मार्ग को लेकर होने वाले विवादों की तरह हिन्दू प्रतिष्ठा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुके इस मुकदमे में सोहन प्रसाद के समर्थन में छपने वाले पत्रों में मुसलमानों को यवन, मलेच्छ, मियांभाई, मुसल्ले और मलेच्छ मंडली कहकर सम्बोधित किया जाता था और हिन्दुओं को आर्य। इन पत्रों में सोहन प्रसाद परम देशहितैषी बन गये और उनकी सहायता में आगे आने वाले लोग उदार चरित वाले महाशय कहलाने लगे।

दूर और पास, सभी स्थानों से चन्दा भेजा जाने लगा। चन्दा सीधे सोहन प्रसाद को भेजा जाता था या फिर ‘भारत जीवन’ के पते पर। भारत जीवन ने इसके लिए बनारस बैंक में एक अलग खाता खोल लिया। अब ऐसा लगने लगा कि पूरा देश सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा लड़ रहा था।

एक पत्र-लेखक ने लिखा कि चन्दे के जमा-खर्च का हिसाब भारत जीवन में होना मुनासिब है। उसने ध्यान दिलाया कि मुंशी इन्द्रमणी मुरादाबादी के केस में बहुत सा चन्दा ‘भारत जीवन’ से होकर मिला था। जब आर्यसमाज ने मुंशीजी से हिसाब माँगा तो उन्होंने नहीं दिया।  सोहन प्रसाद ने अपील निकाली कि चन्दा सीधे उनके वकील बाबू गोरखप्रसाद को भेजा जाये।

विभिन्न शहरों में स्थानीय संस्थाओं और नागरिकों ने अपनी बैठकों में सोहन प्रसाद के लिए चन्दा जमा करने के प्रस्ताव पारित किये। दाउदनगर सुजन समाज ने बाबू लालजी प्रसाद कोठीवाल के कहने पर प्रस्ताव पास किया कि जो मनुष्य अपने धर्म का पक्ष करके दुःख में पड़े, उसकी सहायता अवश्य कर्त्तव्य है। सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा हम सबका मुकदमा है।

आर्यसमाज के गढ़ अजमेर में कॉलेज के अध्यापकों और सरकारी पाठशाला के छात्रों की सभा हुई जिसमें परम देशहितैषी एक आर्य भाई पर अकारण विपत्ति आते देखकर द्रव्य इकट्ठा करने का उद्योग किया गया।  सबसे उत्तेजक पत्र पं. विजयानन्द का छपा। बनारस में सनातनी ब्राह्मणों के गढ़ भदैनी मुहल्ले के निवासी पं. विजयानन्द उस काल में गोरक्षा और हिन्दी आन्दोलन की सबसे अगली कतार में थे।

न्यायिक अभियोजन में सोहन प्रसाद के बचाव और समर्थन में उठे आन्दोलन को और तेज करने के लिए पं. विजयानन्द ने 14 सितम्बर 1885 के भारत जीवन में एक अपील छपवायी। ‘सात पाँच की लाठी, एक जने का बोझ’ शीर्षक से छपी इस अपील में उन्होंने लिखा-

‘हमारे निर्मम बैरी मुसलमान भाइयों ने गोरखपुर के मजिस्ट्रेट साहब की इजलास में हिन्दुओं पर चढ़ाई की है। इन मुसल्लों की चढ़ाई सोहन प्रसाद के नाम से हिन्दू जाति मात्र पर है न कि एक उन्हीं पर….। आप लोग जानते ही हैं कि इस भारत में मुसलमान भाई केवल तेरहवाँ हिस्सा हैं। यदि हिन्दू सभी एक मन और एक जन होकर लड़ाई को तैयार हों तो एक-एक मुसल्लों की छाती पर तेरह-तेरह हिन्दू भूत सवार हो जायेंगे….।’

पं. विजयानन्द का यह पत्र इस बात का प्रमाण है कि उस काल में भारत में मुसलमानों की जनसंख्या केवल साढ़े सात प्रतिशत थी। फिर भी उस काल के हिन्दू मुसलमानों के उभार से परेशान थे।

इस अपील में पं. विजयानन्द ने लिखा- ‘हिन्दुओं की संख्या ज्यादा होने पर भी मुसलमान निडर बने हुए हैं तो इसकी वजह उनको यह गुमान है कि उनमें एका बहुत है, इसलिए हिन्दू ज्यादा होकर भी क्या कर लेंगे? उनके इस भ्रम को दूर कर देना होगा। अब तो ईश्वर की कृपा से हम लोगों का तिरोहित जातीय बल दिन दूना, रात चौगुना बढ़ रहा है। अब इनके नाने-मामे का राज नहीं है कि हम लोग उचित कहते हुए भी हलाल किये जायेंगे। अब तो यह राज्य न्यायप्रिय गवर्नमेंट का है।’

विजयानन्द ने लोगों से चंदा देने की अपील करते हुए लिखा कि मुसलमान भाई आपस में चन्दा करके जहाँ तक धन बटोरेंगे, उतने ही में हम हिन्दू तेरह गुना बटोर सकते हैं…. हम लोग एक-एक कंकरी उठाकर फेंक दें तो उतने ही में एक-एक मलेच्छ की छाती में तेरह-तेरह छेद हो सकते हैं….. फिर ऐसे बल के रहते भी यदि हम लोग एकमत नहीं होते तो हिन्दू कहलाने को धिक्कार है।’

विजयानन्द ने हिन्दी की सभी पत्र-पत्रिकाओं के ग्राहकों को ‘हिन्दू’ मानते हुए उन्हें एक-एक या आधा-आधा आना चन्दा भारत जीवन कार्यालय में भेज देने को कहा ताकि बड़ी विपत्ति से जातीय गौरव की रक्षा हो सके। विजयानन्द की दृष्टि में मुकदमे की हार-जीत से भी बड़ा प्रश्न जातीय गौरव की रक्षा का था- ‘हमें इस समय मुकदमे की हार-जीत पर उतना खेद अथवा हर्ष नहीं है, जितना भावी दुःख का खेद है। बुड्ढे के मरने का भय नहीं, किन्तु यमदूतों के घर देख जाने का डर है।’

अंत में एक आना चन्दे को ‘जातीय प्रतिष्ठा की रक्षार्थ भिक्षा’ कहते हुए विजयानन्द ने हिन्दुओं को ललकारकर कहा- ‘देखें, आप लोगों में कहाँ तक हिन्दूपन की ममता है।’

इतनी ही प्रभावशाली एक दूसरी अपील चम्पारन में बगहा की विद्याधर्म्मवर्धिनी सभा के प्रधान मंत्री चन्द्रशेखर मिश्र ने निकाली- ‘सोहन प्रसाद का मुकदमा और आर्यों का कर्त्तव्य’। यह अपील ‘भारत जीवन’ में 14 सितम्बर 1885 को छपी।

विजयानन्द तथा चन्द्रशेखर मिश्र की अपीलों में अंतर यह था कि जहाँ पं. विजयानन्द ब्रिटिश गवर्नमेंट को ‘न्यायप्रिय’ मानकर सन्तुष्ट थे, वहीं चन्द्रशेखर मिश्र ने ब्रिटिश शासन की आलोचना भी की।

चन्द्रशेखर ने सबसे पहले सोहन प्रसाद पर हुए मुकदमे से आर्यों को पहुँचे कष्ट का उल्लेख किया। इसके बाद मुस्लिम देशों की एकता और उनकी तुलना में हिन्दुओं की निरीहता सम्बन्धी प्रचलित धारणा को दोहराया।

मुसलमानों का सामना करने के लिए उन्होंने सरकार से न्याय पाने के भरोसे रहने की बजाय, न्याय के लिए आन्दोलन खड़ा करने पर बल दिया। चन्द्रशेखर ने लिखा कि जो लोग यह आस लगाये बैठे हैं कि सरकार पूरा न्याय करेगी ही, हम लोगों के आन्दोलन की क्या आवश्यकता, उनकी यह आस निर्मूल है- ‘टेढ़ जानि सब बंदइ काहू, वक्र चन्द्रमा ग्रसै न राहू।’

उनके कहने का आशय यह था कि सरल व्यक्ति की कोई पूछ नहीं होती। सब लोग टेढ़े चंद्रमा की पूजा करते हैं। टेढ़े चंद्रमा को तो राहू भी नहीं ग्रसता। अतः हमें अपनी सरलता त्यागकर कठोरता धारण करनी होगी।

हिन्दुओं को क्यों राजनीतिक रूप से एकजुट हो जाना चाहिए, इसे समझाते हुए चन्द्रशेखर ने लिखा- ‘मुसलमान जाति जबर्दस्त और कट्टर है, उसकी सहायता में अरब, रूस, मिस्र, फारस और अफगानिस्तान आदि देशों तथा हिन्दुस्तान में भी हैदराबाद आदि के महाशय हैं, और इधर हिन्दू जाति के बाहर के तो किसी प्रकार के सहायक हैं ही नहीं। भारतवर्ष में दशांश में भी एकता नहीं है, अव्वल निरीह, दरिद्र अलग ही ठहरे।’

चन्द्रशेखर ने ब्रिटिश शासन को मुसलमानों का पक्षपाती ठहराते हुए, अंग्रेजी शासन में हिन्दुओं के साथ हुए धार्मिक अन्याय के कई उदाहरणों की याद दिलायी, जैसे भारत में क्रिस्तानों का बढ़ना, शिक्षा विभागों का धर्मनाशक प्रबन्ध, हाईकोर्ट में शालिग्राम की मूर्ति लाने की आलोचना करने पर सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी पर मुकदमा और मुंशी इन्द्रमणी की पुस्तकों के विरुद्ध अभियोग (मुकदमा)। अतएव यह कभी नहीं कह सकते कि सरकार से केवल न्याय ही मिल जायेगा, कुछ विशेष आन्दोलन की आवश्यकता नहीं।’

सोहन प्रसाद के अभियोग को आर्यों की धार्मिक निष्ठा जाँचने की कसौटी बनाते हुए चन्द्रशेखर ने हिन्दूओं का आह्वान किया- ‘यदि अपने पवित्र धर्म पर विश्वास हो, यदि असम्भव और अपवित्र अधर्मों से घृणा (नफरत) हो, हाँ, यदि स्वप्न में भी आर्य (हिन्दू) बनना चाहते हों, यदि किसी एक शिरा (रग) में एक बूँद भी आर्य (हिन्दू) रक्त प्रवाहित हो, तो आर्यों के लिए कोमल वाणी से हित कहने वाले (सोहन प्रसाद मुदर्रिस) की तन-मन-धन से सहायता करने में न चूकिये।’

नफरत, हिन्दू और रग जैसे शब्द जनसाधारण द्वारा बोलचाल में अधिक प्रयुक्त होने पर भी, चन्द्रशेखर मिश्र ने इन्हें उर्दू के शब्द होने के कारण उनके स्थान पर संस्कृत पर्याय दिए तथा उर्दू के शब्दों को कोष्ठक में लिखा। उन्होंने खेद प्रकट किया कि एक निरपराध को फँसाने के लिए मलेच्छ मंडली सक्रिय हो गयी है और हिन्दू अपनी जाति को अधःपतन, पददलित एवं दुर्दशाग्रस्त होते जाने से बचाने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहे। अपील का अन्त इस वाक्य से हुआ- ‘अपने धर्म, अपने मान की रक्षा हेतु धन दीजिए।’

विजयानन्द और चन्द्रशेखर मिश्र की अपीलों से सोहन प्रसाद के लिए चन्दा भेजने की गति कुछ तेज हुई। पश्चिमोत्तर प्रान्त के साथ-साथ बंगाल, पंजाब, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा आसाम तक से चन्दा भेजा गया। कुल 479 व्यक्तियों ने चन्दा भेजा। भारत जीवन के पते पर भेजी गयी चन्दे की राशि लगभग पाँच सौ रुपये की हुई। अर्थात् औसतन प्रतिव्यक्ति एक रुपए चार पैसे चंदा भेजा गया।

यह राशि वाद (मुकदमे) को लड़ने के लिए पर्याप्त थी। चन्दा भेजने वालों में कई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे, जैसे वृन्दावन के राधाचरण गोस्वामी, जबलपुर के ऑनरेरी मजिस्ट्रेट सेठ बागरमल रईस, बेतिया के महाराजाधिराज, रायपुर के महाराजा नरहरदेव बहादुर और महाराजा कालाकांकर। इटावा जिले में मलौसी की जमींदार ठकुरानी और एक विधवा ब्राह्मणी ने भी चन्दा भेजा।

जिन संस्थाओं ने प्रस्ताव पारित करके स्थानीय स्तर पर चन्दा जमा करके भेजा, उनमें दाउदनगर सुजन समाज, अजमेर गवर्नमेंट कॉलेज, फर्रुखाबाद आर्यसमाज, विद्याधर्मवर्धिनी सभा बगहा, विद्यावर्धिनी सभा बलुआ (गोरखपुर), आर्यसमाज कटनीमुखारा (जबलपुर), डिबेटिंग क्लब और एंग्लोवर्नाकुलर स्कूल कामठी (नागपुर) एवं देशहितैषी सभा, छपरा (बिहार) सम्मिलित थीं।

अनेक महत्त्वपूर्ण लोग ऐसे भी थे जिन्होंने ने चन्दा तो नहीं भेजा किंतु अपना समर्थन व्यक्त किया, जो कि सोहन प्रसाद मुदर्रिस के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण था। इनमें प्रयाग हिन्दू समाज के मन्त्री काशी प्रसाद, प्रयाग आर्यसमाज के मन्त्री पं. समर्थदान, बलिया आर्य देशोपकारिणी सभा के मन्त्री पं. इंदिरादत्त जू और खड़गविलास प्रेस (बांकीपुर) के मैनेजर बाबू साहिब प्रसाद सिंह सम्मिलित थे।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन

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सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन

जिस समय न्यायालय में सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा चल रहा था तो बहुत से बुद्धिजीवी, विद्वान एवं समाचार पत्र सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन करने लगे और बहुत से लोग सोहन प्रसाद के विरोध में उतर आए। ऐसा करने वालों में सत्यवक्ता और उचित वक्ता नामक समाचार पत्र प्रमुख थे।

‘भारत जीवन’ साप्ताहिक समाचार पत्र सोहन प्रसाद मुदर्रिस के लिए चलाए जा रहे आन्दोलन का नेतृत्व करता रहा। अन्य पत्र-पत्रिकओं ने भी इस आन्दोलन के समाचार प्रकाशित किए किंतु वे भारत जीवन की तरह मुखर नहीं हो सके। कलकत्ता का ‘उचित वक्ता’ अकेला ऐसा समाचार पत्र था जिसने सोहन प्रसाद मुदर्रिस के लिए चलाए जा रहे आन्दोलन से असहमति व्यक्त की और सोहन प्रसाद की पुस्तक को इस योग्य नहीं माना कि उसके लिए आन्दोलन चलाया जाये। वह सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन करने लगा।

अन्य पत्र-पत्रिकाओं की तरह उचित वक्ता ने भी आरम्भ में सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन किया था, परंतु बाद में उसने यह समर्थन वापस ले लिया। 14 नवम्बर 1885 के अंक में उचित वक्ता के सम्पादक ने लिखा- ‘इस विषय में हम लोगों ने इस पुस्तक के बिना देखे जोर दिया था, परन्तु अब इस पुस्तक के देखने से साफ यही मालूम होता है कि यह झगड़ा वास्तव में हिन्दी का नहीं है और न ऐसा ही है कि हिन्दी के सम्पादक इसकी सहायता करने में बाध्य ही हैं।’ यह बात उचित वक्ता ने तब लिखी जब न्यायालय में अभियोग समाप्त हो चुका था तथा आंदोलन पूरी तरह समाप्त हो चुका था।

‘उचित वक्ता’ के विपरीत रुख से इस आंदोलन ने एक बार पुनः चर्चा प्राप्त कर ली। ‘भारत जीवन’ द्वारा उचित वक्ता की कड़ी आलोचना की गयी तथा उचित वक्ता के विरुद्ध ‘सत्यवक्ता’ के नाम से एक उत्तेजक टिप्पणी लिखी गई। भारत जीवन के 28 नवम्बर 1885 के अंक में यह टिप्पणी छपी जिसमें सत्यवक्ता ने लिखा-

‘उचित वक्ता का सम्पादकीय समस्त आर्य समाज के चित्त में क्लेश और दुःख देने वाला है। ये महाशय (उचित वक्ता के सम्पादक) ऐसी आलोचना करते हैं कि मानो उस ग्रन्थ (सोहन प्रसाद मुदर्रिस के पद्यनाटक) में लिखे गए एक-एक वर्णों के आशय इनके रोम-रोम में चुभ गये हैं……इतने पत्र-सम्पादकों के रहते एक आप ही क्यों उबल पड़े? …… सोहन प्रसाद मुदर्रिस के पद्यनाटक में ऐसी कौन-सी बात आपने देखी जो आपको लाइबिल (अविश्वसनीय) लगी?’

भारत जीवन में छपी इस टिप्पणी से प्रकट होता है कि सत्यवक्ता (जो कि संभवतः भारत जीवन के सम्पादक ही थे) सोहन प्रसाद मुदर्रिस के द्वारा पद्यनाटक में इस्लाम के मजहबी नेताओं के विरुद्ध की गई टिप्पणियों को उचित ठहरा रहे थे। न्यायालय में स्थापित मुकदमे में मुख्य शिकायत हजरत उमर के चरित्र पर की गयी उस टीका-टिप्पणी को लेकर थी जिसमें कहा गया था-

    सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने अपनी रक्षार्थ मचायी गुहार में अपनी इन बातों पर कभी सफाई नहीं दी कि वे हिन्दी-उर्दू विवाद में खलीफा उमर को कैसे घसीट लाए? संभवतः इसी कारण कुछ आलोचकों का मानना था कि यह नाटक हिन्दी की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए नहीं लिखा गया था अपितु हिन्दू-मुस्लिम एकता को धक्का पहुंचाने के लिए लिखा गया था।

    ‘उचित वक्ता’ में छपी आलोचना का जवाब देते हुए ‘सत्य वक्ता’ ने भारत जीवन में लिखी अपनी टिप्पणी में लिखा कि सोहन प्रसाद द्वारा खलीफाओं पर की गई टिप्पणियों को इतनी गम्भीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। यदि छोटी-छोटी साधारण बातों पर आप ध्यान देंगे तब तो आपके समाचार पत्र के फाइल के फाइल लाइबल (अविश्वसनीय) हो सकते हैं?……

     इसलिए इस साधारण सी बात से आप सोहन प्रसाद मुदर्रिस को दोषी नहीं ठहरा सकते। रह गयी बात ताजिए वगैरह की, सो सोहन प्रसाद की आज्ञा नहीं है, किन्तु उर्दू बीबी ने अपने गुन घमंड से जब यह कहा कि देख, तेरे हिन्दू भी हमारे ताजिए कुरान वगैरह को मानते हैं और सर्बत रेवड़ी चढ़ाकर प्रसाद लेते हैं, तब हिन्दी देवी ने भला ही जवाब दिया कि जो हिन्दू अपने मत के अधूरे होते हैं, वे ही ताजिए में ‘हा हुसैन’ करके छाती कूटते हैं!’

    सत्यवक्ता ने स्वयं को और सोहन प्रसाद को हिन्दुओं को सही राह पर चलाने वाले धार्मिक नेता की भूमिका में रखते हुए उचित वक्ता के सम्पादक को कायर बताया- ‘क्या हिन्दू लोगों को कुराह जाते देख यदि हम उन्हें रोकें तो यही हमारा बड़ा अपराध है …. फिर आप अपने अनूठे विचार से भले ही दुम दबाकर भाग जाइए, पर व्यर्थ दूसरों के साहस को क्यों तोड़ते हैं?’

    सत्यवक्ता ने उचित वक्ता के सम्पादक को यह उपालम्भ भी दिया कि- ‘आप सोहन प्रसाद को निजी पत्र लिखकर अपनी राय बता सकते थे। आपने एक साहित्यिक पत्र में ऐसा जघन्य लेख लिखकर दूसरों का जी क्यों दुखाया? दबी जुबान से एक पल के लिए यह भी मान लिया कि इसमें सन्देह नहीं कि कहीं-कहीं इस पुस्तक में कड़े-कड़े शब्द हैं परंतु दूसरे ही पल इन्हें कानूनन आपत्तिजनक मानने से इनकार भी किया, जिन बातों से लाइबल होने की आशा है, वैसे ढूँढे न पाइएगा।’

    सत्यवक्ता ने उचित वक्ता के सम्पादक को सोहन प्रसाद मुदर्रिस की पुस्तक की आलोचना करने के अपराध के लिए हिन्दुओं से क्षमा माँगने के लिए कहा- ‘आपको उचित है कि इस लेख लिखने के अपराध की क्षमा आर्य मात्र से माँगें और अपनी भूल स्वीकार करें।’

    सत्यवक्ता का यह पत्र उन्नीसवीं सदी के भारत में उभरते हुए हिन्दू-असंतोष का परिचायक है। उस काल का हिन्दू अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को दिए जा रहे बढ़ावे के कारण असंतुष्ट था। इस कारण देश में चारों ओर फिर से अंग्रेजों एवं उनके साथ-साथ मुसलमानों के विरुद्ध 1857 जैसा ही घनघोर वातावरण बनने लगा था। इसी असंतोष की हवा निकालने के लिए ई.1885 में अंग्रेज अधिकारी ए. ओ. ह्यूम ने इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य अंग्रेज सरकार के तथा मुसलमानों के विरुद्ध बढ़ते हुए असंतोष को संतुलित करना था।

    सत्यवक्ता की टिप्पणी उस काल के उत्तर भारत के हिन्दुओं में पनप रहे मानसिक उद्वेलन को भलीभांति व्यक्त करती है जो हिन्दी भाषा की आड़ लेकर हिन्दुत्व का उभार चाहते थे और हिन्दुओं को मुसलमानों के मजहब से दूर रखना चाहते थे। उस काल के हिन्दुओं की भाषा मुसलमानों एवं न्यायालयों में बैठे भारतीय जजों के विरुद्ध तो काफी कड़ी थी किंतु अंग्रेजों एवं अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध वे प्रायः चाशनी भरे शब्दों का प्रयोग कर रहे थे।

    वे जानते थे कि विदेशी शासन का विरोध करने के बाद वे जेल जाने से नहीं बच सकते थे। कांग्रेस की स्थापना के समय के हिन्दू, मुसलमानों से तो सड़कों पर निबटना चाहते थे किंतु विदेशी सत्ता से उलझने की बजाय अनुनय-विनय का मार्ग अपनाए हुए थे।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप

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    सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप

    पूरा देश अंग्रेजी न्यायालय में चल रहे सोहन प्रसाद के मुकदमे को दम साध कर देख रहा था किंतु जब मुसलमानों ने मुकमा वापस ले लिया तो सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप हो गया।

    गोरखपुर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सोहन प्रसाद पर किया गया मुकदमा अधिक लम्बा नहीं खिंचा तथा नवम्बर में मुकदमे की वास्तविक सुनवाई आरम्भ होने से पहले ही गोरखपुर कचहरी के हाते में मुकदमे से जुड़े हिन्दू और मुसलमानों की एक बैठक हुई जिसमें कुछ शर्तों पर समझौता हो गया और मुसलमानों द्वारा न्यायालय से अभियोग वापस ले लिया गया। इस प्रकार सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप हो गया।

    30 नवम्बर 1885 को सोहन प्रसाद ने मुकदमे के अन्त के बारे में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं को जानकारी दी। 30 नवम्बर 1885 के भारत जीवन में छपे अपने पत्र में उन्होंने सूचित किया कि जब हमारा वकील अदालत में मुकदमा लड़ने की तैयारी करने लगा, तब यवन महाशयों के कमल मुख सूख गये और वे संधि करना चाहने लगे। जब हिन्दुओं ने उनसे कहा कि तुमने नालिश की थी, तुम्हीं वापस लो, तो मुसलमान बोले कि कुछ हम लोगों की भी खातिर होनी चाहिए, हमें और कुछ उज्र नहीं है, केवल यही प्रार्थना है कि उमर के निस्बत जो दोहे लिखे हैं, वह पांच-चार दोहे जब दूसरी बेर पुस्तक छपे, तो निकाल दिये जाएँ।

    इस पर कचहरी में हिन्दू और यवनों की एक बड़ी कमेटी हुई। मुसलमानों के गिड़गिड़ाने और हाथ-पैर पकड़ने से हिन्दू भाइयों ने स्वीकार कर लिया कि अच्छा, पाँच-चार दोहे निकल दिये जायेंगे। संधि का एक मजमून तैयार किया गया। जब मजमून मुझे दिखाया गया तो मैंने कहा कि यह कभी न होगा। यदि उमर भी कब्र से निकल आयें और उन दोहों को निकाल देने की प्रार्थना करें, तो भी हमें स्वीकार नहीं।

    सोहन प्रसाद ने इस सूचना में लिखा कि हिन्दुओं के समझाने पर कि ‘दस के बूझे कीजै काज, हारे जीते नहीं लाज’ मथुरा अखबार में भी सम्पादक के द्वारा ऐसी ही सलाह देने तथा चम्पारन हितकारी की भी यही राय होने के अलावा बहुत-से मित्रों ने लिखा और हिन्दूसमाज, आर्यसमाज ने भी ऐसा ही लिख भेजा, लिहाजा हमको स्वीकार करना पड़ा। इसके बाद संधिपत्र तैयार करके मजिस्ट्रेट साहब को दे दिया गया।

    सोहन प्रसाद के अनुसार मुसलमानों ने उनसे कहा कि 250 रुपए की पुस्तकें छपी होंगी। उनका मूल्य 300 रुपए हम देते हैं, आप पुस्तकें यहीं मँगा दो, हम उन दोहों को स्याही से काट देंगे। इस पर उन्हें जवाब मिला कि किताबें कहाँ-कहाँ गयीं, पाठक उन्हें लौटाना चाहेंगे या नहीं, यह सब मुझे क्या पता! बहरहाल, सुलहनामा दाखिल हो गया और सबने अपने-अपने घर की राह ली।

    सोहन प्रसाद का यह विवरण कुछ अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपे विवरण से मेल नहीं खाता। वर्नाकुलर प्रेस के सम्बन्ध में होने वाली नियमित रिपोर्टिंग में कहा गया कि कोर्ट के बाहर हुए समझौते में सोहन प्रसाद ने यह शर्त कबूल कर ली थी कि वह पहले संस्करण की बाकी बची समस्त प्रतियों को जला देगा और यदि पुस्तक का कोई अगला संस्करण छपता है तो उसमें से आपत्तिजनक दोहों को हटा देगा।

    इस समझौते के बाद यह मुकदमा कोर्ट से हटा लिया गया तथा सोहन प्रसाद मुदर्रिस गुमनामी के नेपथ्य में चले गए। सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप हो गया। और कुछ ही समय में लोग इस मुकदमे के बारे में भूल गए।

    यद्यपि सोहन प्रसाद मुदर्रिस के नाटक की भाषा तल्ख थी तथापि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह मुकदमा हिन्दी साहित्य की ऐतिहासिक धरोहर है तथा उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में उत्तर भारत के हिन्दुओं एवं मुसलमानों की उन मनोदशाओं को व्यक्त करता है जिनसे घबराकर अंग्रेज सरकार ने इण्डियन नेशनल कांग्रेस जैसी राष्ट्रव्यापी संस्था की स्थापना की।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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    हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा

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    हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा

    ब्रिटिश सरकार ने हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा देकर इस समस्या को सुलझाना चाहा किंतु समस्या और भी अधिक उलझ गई क्योंकि अंग्रेजों ने जिस हिन्दी को सरकारी न्यायालयों एवं कार्यालयों में मान्यता दी, वह फारसी लिपि में लिखी जाती थी।

    जब उत्तर भारत में हिन्दी-उर्दू विवाद को लेकर साम्प्रदायिक तनाव चरम पर पहुंचने लगा तो सरकार कुछ झुकी। अप्रैल 1900 में उत्तर-पश्चिमी प्रान्त की औपनिवेशिक सरकार ने नागरी और फारसी-अरबी दोनों लिपियों को समान दर्जा देने का आदेश जारी किया।

    इस आदेश का उर्दू समर्थकों ने काफी विरोध किया और हिन्दी समर्थकों ने समर्थन किया। हालाँकि आदेश में उससे भी अधिक प्रतीकात्मक संदेश यह था कि नागरी लिपि के उपयोग के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया था। इस कारण फारसी-अरबी ने उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में अपना प्रमुख स्थान बनाये रखा और अवध राज्य में स्वतंत्रता तक इसे मुख्य लेखन भाषा के रूप में जारी रखा।

    ई.1902 में अंग्रेज सरकार ने ‘नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस’ का नाम बदलकर ‘यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एण्ड अवध’ कर दिया। इसके बाद भी इस प्रांत में हिन्दी और उर्दू का भाषायी विवाद बढ़ता चला गया क्योंकि हिन्दी में फारसी-व्युत्पन्न शब्दों के तुल्य औपचारिक और शैक्षिक शब्दावली के चयन का आधार संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को बनाया गया। इससे हिन्दू-मुस्लिम मतभेद बढ़ने लगे।

    जब ब्रिटिश सरकार ने अपने कार्यालयों एवं न्यायालयों में फारसी-अरबी लिपि के साथ-साथ देवनागरी लिपि को भी मान्यता दे दी तो भी हिन्दी के प्रयोग की स्थिति में व्यावहारिक रूप से अधिक अंतर नहीं आया। इस कारण अगले तीन दशकों में उत्तर भारत में हिन्दी को उर्दू की तुलना में मजबूत बनाने के लिए कुछ और संस्थाओं का गठन हुआ। इनमें ई.1918 में गठित दक्षिण भारत प्रचार सभा और ई.1926 में गठित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति प्रमुख हैं।

    बालगंगाधर तिलक का हिन्दी को समर्थन

    मदनमोहन मालवीय की तरह बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रवादी आन्दोलन के आवश्यक अंग के रूप में देवनागरी लिपि का समर्थन किया। इस काल में कांग्रेसी नेतओं और विभिन्न संस्थाओं के स्वतन्त्रता आन्दोलनकारियों ने अंग्रेजों से मांग की कि वे सरकारी भाषा नीति में हिन्दी का प्रयोग वैकल्पिक भाषा के रूप में करने का प्रावधान करें। बहुत से स्वतन्त्रता सेनानियों का मानना था कि हिन्दी के आन्दोलन से स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किए जा रहे आंदोलन को बल मिलता है।

    इसलिए हिन्दुओं को सरकारी कार्यालयों में हिन्दी के प्रयोग की अनुमति प्राप्त करने के लिए आंदोलन चलाना चाहिए। हिन्दी आंदोलन के इस महत्व को पहचानकर उस काल की बहुत से धार्मिक नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, समाज सुधारकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने भी हिन्दी का समर्थन किया।

    मोहनदास कर्मचंद गांधी का ढुलमुल रवैया

    ई.1920 में बालगंगाधर तिलक की मृत्यु के बाद कांग्रेस का नेतृत्व मोहनदास कर्मचंद गांधी के हाथों में आ गया और वे कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेता बन गए। उन्होंने हिन्दी भाषा के मानकों का पुनः शुद्धीकरण करके पारम्परिक शब्द हिन्दुस्तानी के अन्दर उर्दू अथवा देवनागरी लिपि काम में लेने का सुझाव दिया। इसका कांग्रेस के कुछ सदस्यों तथा भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में सम्मिलित कुछ नेताओं ने भी समर्थन किया किंतु हिन्दू जनता गांधी के इस सुझाव के विरोध में उतर आई। इस कारण गांधी ने अपने विचार बदल लिए तथा भारत राष्ट्र के लिए मानक हिन्दी का समर्थन करने लगे जिसे देवनागरी लिपि में लिखा जाता था।

    हिन्दी और उर्दू दोनों में भाषायी और सांस्कृतिक दूरियाँ बढ़ रही थी। भाषायी आधार पर हिन्दी में संस्कृत से तथा उर्दू में फ़ारसी, अरबी और तुर्की से शब्द लिए जाते रहे। सांस्कृतिक रूप से उर्दू को मुस्लिमों की भाषा के रूप में तथा हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा के रूप में देखा जाने लगा।

    1920 के दशक में गांधीजी ने इस स्थिति पर दुःख व्यक्त किया और उन्होंने दोनों भाषाओं के पुनः विलय करके हिन्दुस्तानी को नागरी और फारसी दोनों लिपियों में लिखने का आह्वान किया। एक ओर तो गांधीजी हिन्दुस्तानी बैनर तले हिन्दी और उर्दू को लाने के अपने प्रयास में असफल रहे तथा दूसरी ओर अब हिन्दुओं ने हिंदुस्तानी अथवा किसी अन्य छद्म नाम से उर्दू के अस्तित्व में बनाए रहने को अस्वीकार कर दिया।

    उर्दू लेखकों की चालाकी

    इस काल में जिस प्रकार हिन्दी लेखक हिन्दी के लिए अभियान चला रहे थे, उसी प्रकार अनेक उर्दू लेखक भी उर्दू के पक्ष में आंदोलन तेज कर रहे थे। इन दोनों में अंतर केवल इतना था कि हिन्दी के पक्षधर हिन्दी एवं उर्दू को दो अलग-अलग भाषाएं बताते थे जबकि उर्दू के पक्षधर हिन्दी और उर्दू को एक ही भाषा बताकर उसकी आड़ में उर्दू भाषा को राजकीय भाषा बनाए रखना चाहते थे। इस काल में उर्दू के पक्षधर लोग हिन्दुओं का आह्वान कर रहे थे कि हमें इस व्यर्थ के प्रश्न पर लड़ना नहीं चाहिए। उन्हें गांधी की बात सुननी चाहिए।

    इस काल में मुसलमान हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा देने का समर्थन करके एक ओर तो हिन्दी के मौलिक स्वरूप को नष्ट करने की वकालात कर रहे थे तो दूसरी ओर अंग्रेजों की भी सहानुभूति प्राप्त कर रहे थे।

    उर्दू के विख्यात कहानीकार सादत हसन मण्टो ने हिन्दी और उर्दू नामक एक व्यंग्यात्मक लेख लिखकर इस विवाद की व्यर्थता को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने लिखा- ‘हिन्दी और उर्दू का झगड़ा एक ज़माने से जारी है।

    मौलवी अब्दुल-हक़ साहब, डाक्टर ताराचन्दजी और महात्मा गांधी इस झगड़े को समझते हैं लेकिन मेरी समझ से ये अभी तक बालातर है। कोशिश के बावजूद इसका मतलब मेरे ज़हन में नहीं आया। हिन्दी के हक़ में हिन्दू क्यों अपना वक्त ज़ाया करते हैं। मुसलमान, उर्दू के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क्यों बेक़रार हैं……? ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इन्सानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं।

    स्पष्ट है कि सादत हसन मण्टो बड़ी ही चालाकी से, भारत में जो भी भाषा चल रह है उसी को, अर्थात् उर्दू को प्रचलन में बनाए रखने की वकालात कर रहे थे।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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    स्वतंत्र भारत में हिन्दी एवं उर्दू

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    स्वतंत्र भारत में हिन्दी एवं उर्दू

    अंग्रेजों ने हिन्दी एवं उर्दू विवाद को अपने पूरे शासन काल के में बनाए रखा, उसी प्रकार स्वतंत्र भारत में हिन्दी एवं उर्दू विवाद पूरे जोर-शोर से बना रहा। भारत सरकार ने इसे हल करने का प्रयास किया तथा किसी सीमा तक इसमें सफलता भी प्राप्त की।

    भारत विभाजन

    ई.1947 में भारत को ब्रिटिश शासन के नियंत्रण मुक्ति मिली और भारत एवं पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र देश अस्तित्व में आए। स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास लिखने वालों में से बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि भारत के विभाजन में हिन्दी-उर्दू विवाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    भारत में हिन्दी

    स्वतंत्र भारत के हिन्दू हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करना चाहते थे किंतु भारत में भाषा का प्रश्न फिर से उलझ गया और जब ई.1950 में भारत का संविधान लागू किया गया तो हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित न करके राजभाषा घोषित किया गया। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूचि में हिन्दी के साथ-साथ 21 अन्य भाषाओं को भी राजभाषा घोषित किया गया।

    किसी भी राज्य की विधान सभा अपने प्रांत में इन 22 भाषाओं में किसी भी एक या अधिक भाषाओं को राजकीय कार्यालयों में कामकाज की भाषा अपना सकती है। भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोग इन्हीं 22 भाषाओं में से किसी एक को या उससे अधिक भाषाओं को जानते हैं। भारत में 121 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें 10 हजार अथवा उनसे अधिक लोगों का समुदाय बोलता है।

    वर्ष 2011 की जनगणना में भारत के 57 प्रतिशत लोगों ने अपनी मातृभाषा हिन्दी लिखवाई। जबकि यदि पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में रहने वाले जनजातीय कबीलों को छोड़ दिया जाए तो आज भारत में कदाचित ही कोई व्यक्ति होगा जिसे हिन्दी बोलनी नहीं आती होगी या उसे हिन्दी में कही गई बात समझने में कठिनाई होती होगी।

    मानक हिन्दी को बोलने एवं लिखने का ढंग एक ही है किंतु भारत के प्रत्येक प्रांत में हिन्दी को उच्चारित करने के ढंग अलग-अलग हैं। इसका प्रमुख कारण वहाँ बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषाओं का हिन्दी के उच्चारण पर होने वाला प्रभाव है।

    दक्षिण भारत के प्रांतों में राजनीतिक व्यक्तियों द्वारा हिन्दी का विरोध किया जाता है, उसका मुख्य कारण सांस्कृतिक नहीं है, राजनीतिक है। जब भी दक्षिण भारत का कोई व्यक्ति उत्तर भारत के प्रांतों में या केन्द्र सरकार के संस्थानों में काम करने आता है, तब वह बड़ी सरलता से हिन्दी का प्रयोग करता है।

    इस प्रकार हिन्दी आज सम्पूर्ण भारत की सम्पर्क भाषा है जबकि दूसरी ओर उर्दू भाषा भारत से शनैःशनैः समाप्त होती जा रही है। इतना अवश्य है कि हिन्दी भाषा में आज भी कुछ अरबी-फारसी शब्द अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं जिन्हें उर्दू की आखिरी निशानियां माना जा सकता है। कुछ साम्यवादी लेखक और कुछ उर्दू भाषा के लेखक अपनी राजनतिक रोटियां सेकने के लिए आज भी उर्दू की उतनी ही जोश से पैरवी करते हैं, जितनी कि उन्नीसवीं सदी के अंत तथा बीसवीं सदी के मध्य में की जाती थी।

    पाकिस्तान में उर्दू

    पाकिस्तान ने अपने अस्तित्व में आते ही अर्थात् ई.1947 में उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया किंतु सम्पूर्ण पाकिस्तान में उर्दू अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी। पाकिस्तान में सिंधी, पंजाबी, बलूच आदि भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या उर्दू बोलने वालों से अधिक थी फिर भी पश्चिमी पाकिस्तान के लोग चाहते थे कि पाकिस्तान में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को केवल उर्दू में ही बोलने-लिखने की अनुमति हो। जबकि पूर्वी पाकिस्तान के लोग चाहते थे कि हम पर उर्दू न थोपी जाए क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में अधिक संख्या बांग्ला बोलने वालों की थी।

    कुछ ही वर्षों में पाकिस्तान में उर्दू-बांग्ला का विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने बांग्ला भाषा के समर्थन में तथा उर्दू भाषा के विरोध में संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में पाकिस्तान की फौज ने लगभग 30 लाख बांग्लाभाषी लोगों की हत्या की।

    यह तो नहीं कहा जा सकता कि पूर्वी पाकिस्तान एवं पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के बीच केवल उर्दू एवं बांग्ला भाषा को लेकर संघर्ष हुआ, अन्य राजनीतिक कारण भी थे किंतु सबसे बड़ा मुद्दा भाषा का ही था। पाकिस्तान की पंजाबी लॉबी नहीं चाहती थी कि कोई गैर पंजाबी या कोई गैर उर्दूभाषी मुसलमान पाकिस्तान का राष्ट्रपति बने। इसी संघर्ष के चलते ई.1971 में पाकिस्तान का विभाजन हुआ और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश नामक दो देश अस्तित्व में आए।

    बांग्लादेश में भाषाई संघर्ष

    ई.1971 में बांग्लादेश ने अस्तित्व में आते ही बांग्ला को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया। अब बांग्लादेश के लोग समझते थे कि केवल उन्हीं लोगों को बांग्लादेश में रहने का अधिकार है जो बांग्ला भाषा बोलना जानते हैं।

    जबकि इस काल में बांग्लादेश में करोड़ों लोग ऐसे थे जो बांग्ला भाषा बोलना नहीं जानते थे। इनमें अधिकतर वे मुसलमान थे जो भारत विभाजन के कारण भारत से भागकर पूर्वी पाकिस्तान पहुंचे थे तथा उर्दूभाषी थे। जब बांग्लाभाषी मुसलमानों ने गैर-बांग्ला भाषी मुसलमानों को मारना आरम्भ किया तो उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी।

    जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो हिन्दू परिवार बांग्लादेश से भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तानके उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भागकर आए थे।

    इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई। बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। एक बार फिर से पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।

    विश्व भर में हिन्दी भाषा

    आज विश्व भर में हिन्दी बोलने वालों की संख्या दूसरे नम्बर पर है। संसार में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा चीनी है तथा उसके बाद हिन्दी भाषियों की संख्या है। संसार भहर में 80 करोड़ लोगों से अधिक जनसंख्या हिन्दी बोलती है। इसे संसार के 28 देशों में प्रमुखता के साथ बोला जाता है तथा साथ ही आज संसार में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहाँ हिन्दी भाषी लोग न रहते हों।

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    मदर इण्डिया और दुखी भारत

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    मदर इण्डिया और दुखी भारत

    मदर इण्डिया और दुखी भारत दो पुस्तकें हैं। मदर इण्डिया की लेखिका कैथरीन मेयो अमरीका की रहने वाली थीं। उन्होंने भारतवासियों को नीचा दिखाने के लिए यह पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक का जवाब देने के लिए लाला लाजपतराय ने दुखी भारत नामक पुस्तक लिखी।

    ई.1927 में मिस कैथरीन मेयो नामक एक अमरीकी महिला ने ‘मदर इण्डिया’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखकर हिन्दुओं को पराधीन, पतित, घृणित तथा हेय जाति बताया। उसने भारतीय समाज में शूद्रों और महिलाओं की स्थिति को संसार के समक्ष उजागर किया। उसने दावा किया कि उसने भारत में रहकर अपनी आंखों से देखा कि भारत के उच्च जातियों के लोग निम्न जाति के लोगों से तथा पुरुष वर्ग स्त्री जाति से कितना बुरा बर्ताव करता है तथा उनका शोषण करता है। इस कारण आम हिन्दुस्तानी का जीवन बहुत कष्टमय है। भारतीय महिलाओं की स्थिति पर कटाक्ष करते हुए उसने लिखा-

    ‘भारतीय स्त्रियां व्यायाम करना पसंद नहीं करती हैं और उसे दबाव में करती हैं। यदि वे चाहें, तो खुली हवा में भी नहीं जाएं। एक औसत छात्रा बहुत कमजोर होती है। उसे अच्छे भोजन, व्यायाम और इलाज के लिए व्यायाम की जरूरत है किंतु उसका सीना सिकुड़ा हुआ और पीठ प्रायः झुकी हुई होती है।’

    मिस कैथरीन मेयो की पुस्तक मदर इण्डिया सनातन हिन्दू धर्म तथा संस्कृति पर गंभीर हमला करती है। इस पुस्तक की आड़ में मिस कैथरीन ने लिखा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता भी उच्च वर्णों में जन्मे हैं, इसलिए वे सब भी निंदनीय हैं। यह पुस्तक पूरे यूरोप में बिकने लगी जिसके कारण हिन्दू जाति की बड़ी बदनामी हुई।

    मिस कैथरीन की पुस्तक मदर इण्डिया की प्रतिक्रिया में पंजाब में शिक्षा एवं समाज सुधार के क्षेत्र में कार्यरत प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने ‘दुखी भारत’ शीर्षक से एक मोटी पुस्तक लिखी जिसमें अमरीकियों एवं यूरोपियनों को घृणित एवं हेय बताया तथा उन्हीं पर हिन्दुओं की वर्तमान स्थिति का ठीकरा फोड़ा। लाला लाजपतराय ने मिस कैथरीन से पूछा कि अकारण ही हिंदुओं को अपमानित करने से अमरीकियों को क्या लाभ होने वाला है?

    लाला लाजपत राय ने अंग्रेजों को भारत का शोषण करने के लिए धिक्कारा तथा अमीरीकियों को अपने ही देश में रह रही हबशी जाति का शोषण करने के लिए धिक्कारते हुए लिखा कि अमरीका में जितनी जाति के लोग रहते हैं या सैर के लिए आते हैं, उन सबकी पाशविक वासनाओं को तृप्त करने के लिए हबशी महिलाएं विवश की जाती हैं। इस नाम मात्र की हबशी जाति की नसों में मनुष्य की प्रत्येक जाति या उपजाति का रक्त दौड़ रहा है। वह रक्त सम्मिश्रण समस्त जाति में ही नहीं, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भी पाया जाता है और इस प्रकार मिश्रित हुआ है कि वह पृथक् नहीं किया जा सकता।

    लाला लाजपत राय द्वारा लिखी गई पुस्तक की गूंज पूरी दुनिया में पहुंची तथा अमरीकियों एवं समस्त यूरोपियन जातियों सहित अंग्रेजों को भी इस बात का अहसास हो गया कि अब हिन्दू जाति चुप होकर बैठने वाली नहीं है। वह शीघ्र ही उठ खड़ी होगी और अंग्रेजों को कान से पकड़कर भारत से बाहर कर देगी।

    लाला लाजपत राय की यह पुस्तक ही उनके जीवन की अंतिम कृति सिद्ध हुई। इस पुस्तक के प्रकाशित होने के के अगले वर्ष ही ई.1928 में अंग्रेजों ने लाला लापजत राय को भारत की सड़कों पर उस समय लाठियों से पीट-पीटकर मार दिया जिस समय वे साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर की सड़कों पर एक जुलूस निकाल रहे थे। अंग्रेजों की ये लाठियां ही अंग्रेजी सरकार के कफन की कीलें सिद्ध हुईं और अगले 19 वर्षों में ही अंग्रेजी सरकार भी अपनी मौत मर गई।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    भगवा रंग के क्या अर्थ हैं?

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    भगवा रंग - www.bharatkaitihas.com
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनााि योगी

    हम एक दीप जलाएं तथा उसकी ज्योति को ध्यान से देखें, इस ज्योति में कई रंग दिखाई देते हैं। इन रंगों में नीले, श्वेत, पीले, लाल एवं भगवा रंग प्रमुख होते हैं। ज्योति के भीतर स्थित विभिन्न रंग वस्तुतः ज्योति की प्रचण्डता की विभिन्नता के कारण दिखाई देते हैं।

    ज्योति के जिस भाग में नीला रंग होता है, उसकी प्रचण्डता सर्वाधिक होती है। यही कारण है कि ऋषियों ने भगवान विष्णु का रंग नीला बताया है।

    दीपक की ज्योति में जो श्वेत रंग दिखाई देता है, इसकी प्रचण्डता नीले रंग की ज्वाला से कम होती है। भगवान शिव का रंग ‘कर्पूर गौरम्’ अर्थात् कर्पूर की तरह श्वेत है, माता पार्वती का नाम ‘गौरा’ है, अर्थात् वे भी श्वेत रंग की हैं। सीताजी भी गोरी हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि भगवान शिव, माता पार्वती एवं माता सीता भगवान विष्णु के अपेक्षाकृत शांत स्वरूप हैं।

    ज्योति में जो पीला रंग दिखाई देता है, वह प्रचण्डता की दृष्टि से तीसरे नम्बर पर आता है। लक्ष्मणजी का रंग पीला है। ज्योति में जो लाल रंग दिखाई देता है, वह प्रचण्डता की दृष्टि से चौथे नम्बर पर आता है, हनुमानजी का रंग लाल है।
    ज्योति में दिखाई देने वाला पांचवां रंग जो कि लाल और पीले के मिश्रण से बनता है, उसे हम भगवा रंग कहते हैं। यह रंग ही भगवान के सबसे शांत स्वरूप का दर्शन कराता है। इसी कारण हमने ‘भगवा’ रंग वाले ईश्वर को ‘भगवान’ कहा।

    नीले रंग वाले अत्यंत प्रचण्ड ज्योर्तिस्वरूप से ही भगवान के क्रमशः शांत होते हुए स्वरूपों का प्रादुर्भाव होता है। भगवान के विभिन्न स्वरूपों के रंग अलग-अलग इसलिए हैं, क्योंकि भिन्न प्रचण्डताओं वाले ज्योतिस्वरूप ईश्वरीय स्वरूप मिलकर इस सृष्टि को संभव बनाते हैं।

    जब ज्योतिर्मय भगवान की प्रचण्डता कम होती हुई भगवा होने लगती है, तब वह शक्ति संसार में अत्यल्प स्थूल रूप में (लगभग न के बराबर) दिखाई देने लगती है। इसे ही भग कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है- ‘आंख!’

    ‘भगवान’ शब्द की व्युत्पत्ति इसी ‘भग’ से हुई है। इसका आशय है कि भग वाले अर्थात् ‘आँख’ वाले को भगवान कहते हैं। अर्थात् ‘भगवान्’ ईश्वर का ऐसा स्वरूप है जो हमें देखता है।

    हम प्रायः भगवान शिव के चित्र में तीसरे नेत्र को भी देखते हैं। यह नेत्र दीपशिखा अथवा ज्योति के सदृश्य बनाया जाता है। अर्थात् भगवान की तीसरी आंख जो कि ज्योतिर्मय है, यह ज्योति ही संसार का निर्माण करती है, उसका पालन करती है और संहार करती है।

    जब ज्योति प्रचण्ड रूप धारण करती है तो उसे अग्नि कहा जाता है। ज्योति स्वरूप भगवान भी वस्तुतः प्रचण्ड अग्नि ही हैं। ‘राम’ शब्द का निर्माण भी ‘र’ तथा ‘ओम’ से मिलकर हुआ है जिसमें ‘र’ का अर्थ अग्नि है तथा ‘ओम’ का अर्थ ईश्वर है। इस प्रकार का अर्थ हुआ- वह ईश्वर जो अग्नि स्वरूप है।

    यह ईश्वर रूपी अग्नि ही समस्त जीवों में व्याप्त है। सकल निर्जीव पदार्थ भी इसी अग्नि से बने हैं। इसीलिए हिन्दू अग्नि को भगवान को भगवान के रूप में देखते और समझते हैं।

    हिन्दू साधु-संत अग्नि के रंग धारण करते हैं जिनमें लाल, पीले और भगवा रंग प्रमुख हैं। श्वेत और काले रंग भी इसी अग्नि में समाहित हैं। सज्जन प्रकृति के सांसारिक व्यक्ति श्वेत रंग धारण करते हैं जो वस्तुतः भव्यता का प्रतीक है। तामसिक प्रकृति के लोग काला रंग धारण करते हैं जो दूसरों पर अधिकार जमाने की प्रवृत्ति का प्रतीक है।

    साधु-संन्यासी एवं योगी प्रचण्ड अग्नि के स्थान पर परमात्मा के अत्यंत शांत स्वरूप अर्थात् ज्योति का रंग धारण करते हैं। यही भगवा रंग है। योगियों, तपस्वियों एवं उदासियों का रंग होने के कारण इस रंग को जोगिया रंग भी कहा जाता है। इसीलिए हिन्दू धर्म एवं हिन्दू जाति में भगवा रंग की अत्यंत प्रतिष्ठा है।

    भगवा रंग किसी भी दृष्टि से उग्र प्रवृत्ति का नहीं, अपितु शांत प्रवृत्ति का द्योतक है। यह आक्रामकता का नहीं, अभयदान का प्रतीक है। यह अधर्म से दूर रहने तथा धर्म की स्थापना के संकल्प का प्रतीक है। अतः जब भी हम भगवा रंग देखें, भगवान को नमन् करें। भगवा रंग ही इस सम्पूर्ण सृष्टि की अस्मिता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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