Monday, May 20, 2024
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ब्रिटिश न्यायालय में हिन्दी-उर्दू की लड़ाई

डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास (11)

सोहन प्रसाद मुदर्रिस की पुस्तक का पहला विज्ञापन ‘भारत जीवन’ नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र में फरवरी 1885 में छपा। इस विज्ञापन के छपने पर कुछ हिन्दू पाठकों ने इसे मंगवाया तथा उसकी प्रशंसा में सोहन प्रसाद को बधाइयाँ भेजीं। शीघ्र ही इस पुस्तक की चर्चा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में होने लगी जिसके कारण पुस्तक को लोकप्रिय होने में समय नहीं लगा। हिन्दू पाठक चटखारे ले-ले कर इसे पढ़ने लगे। जब मुसलमानों ने इस पुस्तक को पढ़ा तो वे सन्न रह गए।

कुछ ही महीनों बाद जून 1885 में इस पुस्तक के विरुद्ध गोरखपुर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वाद स्थापित कर दिया गया। इस प्रकार हिन्दी-उर्दू की लड़ाई नाटक की इजलास से निकलकर वास्तविक न्यायालय में पहुंच गई।

गोरखपुर के मुसलमानों की ओर से मुहम्मद खाँ मुस्तगीस ने कोर्ट में नालिश दायर की। उसने अपने इस्तगासे में इस पुस्तक के लेखक पर ताजीरात ए हिन्द की दफा 504, 293, 298 और 500 के तहत आरोप लगाते हुए कहा कि जो गर्ज और मकसद इस किताब का जाहिर किया गया है, उससे साफ है कि इस किताब में किसी मज़हबी बहस को ताल्लुक नहीं होना चाहिए, लेकिन मुल्जिम ने विला जरूरत महज बदनीयती और द्वेषभाव से मुसलमानों के धर्म का अपमान करने और उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने के इरादे से इस्लाम और उसके धार्मिक महापुरुषों के खिलाफ कई निरादर भरे वाक्य लिखे हैं।

इससे स्पष्ट है कि मुसलमानों को हिन्दी-उर्दू के विवाद पर कोई आपत्ति नहीं थी अपितु अदालत में दावर नालिश में मुख्य शिकायत हजरत उमर के चरित्र पर की गयी टीका-टिप्पणी को लेकर की गई थी।

दरख्वास्त में सबसे कड़ा एतराज इस बात पर किया गया कि लेखक ने मुसलमानों के पैगम्बर के जानिशान दोयम हजरत उमर फरूकर अल्लाह वाला ऊनहू की शान मुबारक में नाशा इस्तह और बेहूदह अल्फाज कहे हैं और मुलजिम ने हजरत खालीफह सानी रजी अल्लाह ….. ऊनहू की निस्बत खुल्लमखुल्ला बेशर्म जनाकार वगैरह ऐसे-ऐसे अल्फाज कहे हैं…. किताब मजकूरह फाहिश है और तौहीन से भरी हुई है। लिहाजा मुलजिम को सजा फरमाई जावे व जुमिलह किताबें जब्त होकर तलफ कराई जावें। 

न्यायालय में स्थापित किए गए वाद की सुनवाई की पहली तिथि 21 अगस्त 1885 निश्चित की गई। सोहन प्रसाद मदर्रिस न्यायालय में प्रस्तुत हुए किंतु उनके नाम की पुकार नहीं पड़ी तथा सुनवाई अगले दिन के लिए टाल दी गयी। 22 अगस्त 1885 को लगभग दो सौ मुसलमान कचहरी के हाते में जमा हो गये। उन्होंने अपने वकील के माध्यम से मजिस्ट्रेट से मुकदमे का निर्णय शीघ्र करने की प्रार्थना की। 

इस बीच हाटा के एक मुसलमान मुदर्रिस मन्सब अली ने चार आदमियों के साथ मिलकर सोहन प्रसाद के मदरसे में घुसकर उसके कमरे का ताला तोड़ दिया और वहाँ रखी पुस्तकों की समस्त प्रतियाँ उठाकर ले गया। नगर से लौटने पर सोहन प्रसाद को इसकी जानकारी हुई। उसने मुदर्रिस मंसब अली के विरुद्ध गोरखपुर मजिस्ट्रेट के पास लिखित शिकायत की जिसमें कुल 323 रुपए की पुस्तकें चोरी चले जाने की बात कही गयी।

मजिस्ट्रेट ने सोहन प्रसाद द्वारा की गई शिकायत की जांच करने के लिए, उसका प्रार्थनापत्र हाटा के तहसीलदार के पास भेज दिया। इस जांच से सिद्ध हुआ कि मुद्दई ताला तोड़कर पुस्तकें ले गया था। पुलिस ने मन्सब अली को गिरफ्तार करके गोरखपुर के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया। मन्सब अली ने मजिस्ट्रेट से कहा कि उसे डिप्टी इन्सपेक्टर ऑफ स्कूल्स ने रजिस्टर लाने का हुक्म दिया था। इस कारण उसने ताला तोड़कर रजिस्टर निकाला किंतु किताबें उसने नहीं लीं।

सोहन प्रसाद ने इलाहाबाद के काशी प्रसाद को अपना वकील बनाया जो एक प्रतिष्ठित आर्यसमाजी थे और प्रयाग हिन्दू समाज के सेक्रेटरी थे। उन्हें इलाहाबाद से बार-बार गोरखपुर जाने में कठिनाई होती थी इसलिए कुछ समय बाद उनके स्थान पर गोरखपुर के ही गोरख प्रसाद नामक प्रतिष्ठित हिन्दू वकील को नियुक्त किया गया।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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