हनुमान बाहुक एक लघु काव्यग्रंथ है जिसमें केवल 44 पद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे गोस्वामी तुलसीदासजी की अत्यंत प्रौढ़ रचना माना है। अवधी एवं ब्रज शब्दावली में लिखी गई इस ग्रंथ की भाषा इतनी प्रांजल है कि इसकी तुलना किसी अन्य ग्रंथ से की जानी कठिन है। इस ग्रंथ में गेयता के विलक्षण गुण उपलब्ध हैं, अर्थात् इसे कई राग-रागिनियों में गाया जा सकता है।
मान्यता है कि रामचरित मानस का लेखन पूरा होने के बाद गोस्वामी तुलसीदास की बाहुओं में अपार पीड़ा हुई। जब विविध प्रकार के उपचारों से भी वह पीड़ा दूर नहीं हुई तो गोस्वामीजी ने हनुमानजी से प्रार्थना करने के निमित्त हनुमानबाहुक नामक ग्रंथ की रचना की। आज भी करोड़ों भारतीय अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए इस ग्रंथ का पाठ करते हैं।
भारतीय धर्मशास्त्रों में काल शब्द का प्रयोग कई अर्थों में होता है, यथा- समय, मृत्यु, ईश्वर, यमराज आदि। हनुमान बाहुक को पढ़ने से ऐसा लगता है कि गोस्वामीजी ने अपनी शरीरिक व्याधि के लिए अपने पूर्वजन्मों में किए गए किन्हीं कर्मों के पापों, दैवीय प्रकोपों, भूत-प्रेत बाधाओं, पितरों के दोषों तथा दुष्टग्रहों के प्रभावों के साथ-साथ काल की विकरालता को भी बड़ा कारण माना है। इस कारण हनुमानबाहुक में ‘काल’ शब्द का कई अर्थों में प्रयोग हुआ है।
गोस्वामीजी ने हनुमानजी से प्रार्थना करते हुए बार-बार लिखा है कि दैवीय कोप, कर्मफल, भाग्य, ग्रह, बुरे काल आदि शक्तिशाली शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना मेरे वश की बात नहीं है, इन्हें आप ही नियंत्रित कर सकते हैं क्योंकि आप काल के भी काल हैं।
इस ग्रंथ के अंतिम पद में गोस्वामीजी ने लिखा है कि काल का निर्माण विधाता ने नहीं अपितु रामजी ने किया है। यह जानकर मैं मौन धारण कर लेता हूँ। इस आलेख में हनुमान बाहुक में आए ‘काल’ शब्द के विविध संदर्भों की चर्चा करना है।
हनुमान बाहुक के पहले पद में गोस्वामीजी ने लिखा है- ‘भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु।’ यहाँ हनुमानजी को काल का भी काल बताया गया है, इसका आशय यह है कि हनुमानजी काल के स्वामी हैं अथवा काल से अधिक शक्तिशाली हैं। अथवा वे काल को भी मृत्यु देने वाले हैं।
हनुमान बाहुक के पद संख्या 7 में गोस्वामीजी ने लिखा है- ‘भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो।’ इस पद में काल का उल्लेख तीन रूपों में उपलब्ध ‘त्रिकाल’ के रूप में हुआ है। तथा कहा गया है कि भीष्म पितामह कहते हैं कि मेरे अनुमान से तीनों कालों में तथा तीनों लोकों में हनुमानजी जैसा महाबली और कोई नहीं है।
पद संख्या 10 में लिखा है- ‘दुर्जन को काल सो कराल पाल सज्जन को।’ यहाँ काल का आशय यमराज से है। अर्थात् हनुमानजी बुरे लोगों के लिए यमराज के समान तथा सज्जन लोगों के लिए पालनकर्ता अर्थात् पिता के समान हैं।
पद संख्या 9 एवं 21 में तुलसीदासजी ने लिखा है- ‘बड़ो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो ….. नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को।’
इन पदों में काल शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं करके ‘कलि’ शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘कलि’ भी काल की ही एक बड़ी इकाई है जिसमें धर्म का केवल एक ही चरण रहने के कारण इसे बुरे काल का पर्याय माना गया है। कलि रूपी ‘काल’ इतना विकराल है कि इसने संसार के प्रत्येक व्यक्ति को विकल कर रखा है। इस विकराल कलिकाल से पार पाने के लिए हनुमानजी का नाम कल्पवृक्ष के समान है।
पद संख्या 24 में गोस्वामीजी ने काल को मनुष्य के कर्मों, शक्तिशाली लोकपालों, सम्पूर्ण स्थावर पदार्थों एवं समस्त जीवों की श्रेणी में रखा है जो हनुमानजी के वशीभूत हैं-
पद संख्या 26 में गोस्वामीजी ने काल को मनुष्य के बुरे कर्मों, बुरे भाग्य, वात, पित्त एवं कफ नामक त्रिदोषों, दैवीय कोपों, पाप के प्रभावों तथा छल भरी छायाओं की तरह मनुष्य को कष्ट देने वाला लिखा है-
भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है बेदन विषम पाप-ताप छलछाँह की।
पद संख्या 30 में गोस्वामीजी ने लिखा है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कर्म तथा काल सहित, इस संसार रूपी जाल में कौन ऐसा है जो हनुमानजी का कहना नहीं मानता- ‘करतार भरतार हरतार कर्म काल को है जगजाल जो न मानत इताति है!’
अर्थात् यहाँ गोस्वामीजी ने ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं कर्म की भांति काल को भी संसार का नियंता बताया है। संसार के ये समस्त नियंता हनुमानजी का प्रभाव मानते हैं।
पद संख्या 37 में गोस्वामीजी ने लिखा है कि न जाने काल की भयानकता है, कि कर्मों की कठिनता है, पाप का प्रभाव है, कि स्वाभाविक वात (रोग) की उन्मत्तता है जिसके कारण रात-दिन बुरी तरह की पीड़ा हो रही है, यह सही नहीं जाती और इन सब कठिन शक्तियों ने मेरी उसी बाँह को पकड़ लिया है जिस बांह को कभी पवनकुमार ने पकड़ा था।
अर्थात् यहाँ भी काल को कठोर शक्ति के रूप में प्रदर्शित किया गया है और हनुमानजी से प्रार्थना की गई है कि वे इन प्रकोपों के दुस्साहस को तो देखें।
काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे। बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे।
पद संख्या 38 में गोस्वामीजी ने लिखा है कि पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बाहु की पीड़ा और मुख की पीड़ा से मेरा सारा शरीर पीड़ामय होकर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। देवता, प्रेत, पितर, कर्म, काल और दुष्टग्रह सब एक साथ ही दौड़कर मुझ पर तोपों की मार कर रहे हैं। अर्थात् यहाँ भी काल को दुष्टग्रहों आदि की तरह कष्टदायी शक्ति के रूप में दर्शाया गया है-
पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल सरीरपीर मई है। देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है।
पद संख्या 39 में तुलसीदासजी ने लिखा है- बाँह की पीड़ा रूपी नीच सुबाहु, देह की अशक्ति रूपी राक्षस मारीच, ताड़का रूपिणी मुख की पीड़ा एवं अन्यान्य बुरे रोग रूपी राक्षसों से मिले हुए हैं। मैं रामनाम का जप रूपी यज्ञ प्रेम के साथ करना चाहता हूँ, पर काल (यमराज) के दूतों के समान ये भूत क्या मेरे वश में हैं, कदापि नहीं-
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं। राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं।
पद संख्या 44 में गोस्वामीजी ने लिखा है कि विधाता ने संसार को हर्ष-विषाद, राग-द्वेष, एवं गुण-दोष युक्त बनाया है किंतु माया, जीव, काल, मनुष्य के कर्म तथा स्वभाव रामचंद्रजी ने बनाए हैं-
हरष बिषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरंचि सब देखियत दुनिये। माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये।
इस पद का आशय इस प्रकार निकाला जा सकता है कि माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव विधाता की बनाई सृष्टि के अधीन नहीं हैं, अपितु विधाता की बनाई हुई यह दुनिया रामजी द्वारा बनाए गए माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव से संचालित होती है।
विगत हजारों सालों में भारत-चीन सम्बन्ध बनते और बिगड़ते रहे हैं। दोनों देशों के शासक अपने-अपने राज्यों का विस्तार करने के लिए एक दूसरे के विरुद्ध सेनाएं भी भेजते रहे हैं तथा एक-दूसरे की संस्कृति को जानने का प्रयास भी करते रहे हैं।
19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने चीन के सम्बन्ध में चेतावनी देते हुए कहा था- ‘वहाँ एक दैत्य सो रहा है। उसको सोने दो क्योंकि जब वह उठेगा तो दुनिया को हिला देगा।’ विगत दो सौ सालों में चीन ने कोरिया, वियतनाम, मंगोलिया, तिब्बत, हांगकांग और मध्य एशिया के अनेक देशों को अपने जूतों तले रौंदा है। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है।
वर्ष 1949 में जब माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन में साम्यवादी सरकार बनी तो माओ ने यह कहकर पूरी दुनिया को धमकाया कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। उसने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी बनाई और नए सिरे से अपने पड़ौसी देशों की छाती पर चढ़ बैठा।
आज चीन अपने 14 पड़ोसी देशों के विशाल भूभागों पर स्वामित्व का दावा करता है। तिब्बत को चीन अपने दाहिने हाथ की हथेली बताता है तथा लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान, और अरुणाचल प्रदेश को इस हाथ की पांच अंगुलियां बताकर इन पर अपने अधिकार का दावा करता है। इस कारण भारत-चीन सम्बन्ध कभी सामान्य नहीं रह पाते!
यहाँ तक कि चीन अपनी सीमा से 8 हजार किलोमीटर दूर अमेरिका के हवाईद्वीप को भी अपना क्षेत्र बताता है। भारत सहित दुनिया के 23 देश चीन की कुटिल चालों से परेशान हैं।
चीनी विस्तारवादी नीति का प्रतिरोध करने के लिए विश्व की चार महाशक्तियों- अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत ने क्वार्ड का गठन किया किंतु इससे चीन की सेहत पर कोई असर शायद ही पड़ा हो। वह अपना खूनी पंजा पूरी दुनिया में बड़ी तेजी से पसार रहा है।
एशिया में रूस, चीन एवं भारत तीन बड़ी शक्तियां हैं। इनमें से रूस और चीन कम्युनिस्ट देश होने के कारण भाई-भाई हैं। भारत की वैश्विक नीतियां ऐसी हैं कि वह किसी का भाई नहीं है, न तो सगा और न सौतेला!
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आजादी के बाद से ही वैश्विक मंच पर भारत की नीति ‘सब काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाली रही है किंतु दुनिया उसे ‘ना काहू से दोस्ती, सब काहू से बैर’ वाली दृष्टि से देखती है। इस कारण भारत को वैश्विक मंचों पर संतुलन बनाए रखने में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है किंतु भारत का मजबूत लोकतंत्र भारत सरकार को वह शक्ति और गरिमा प्रदान करता है कि वैश्विक मंचों पर भारत संतुलन साध लेता है। फिर भी भारत की जनता को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि हमेशा ऐसे ही चलता रहेगा। भारत के वैश्विक समीकरण ताश के पत्तों की भांति कभी भी ढह सकते हैं। चीन ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए दिन-रात लगा हुआ है। सात एशियाई देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान भूटान, नेपाल, चीन, बर्मा तथा बांगलादेश की सीमाएं भारत से लगती हैं। श्रीलंका की थल सीमा भारत की थल सीमा से भले ही स्पर्श न करती हो किंतु समुद्री मार्ग से भारत और श्रीलंका के बीच केवल 54.8 किलोमीटर की दूरी है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया में जो स्थितियां बनीं, उनके चलते भारत तथा उसके आठ पड़ौसी देशों में से चीन को छोड़कर शेष आठ देशों में सरकारों का निर्माण प्रजातांत्रिक पद्धति से होता है। इन आठ प्रजातांत्रिक देशों में से भूटान, बांगलादेश तथा भारत को छोड़कर शेष सभी देशों में विगत दो वर्षों में चीनी चालबाजियों के चलते प्रजातांत्रिक सरकारों को बलपूर्वक शासन से हटाया गया है।
म्यानमार अथवा बर्मा में फरवरी 2021 में चीन के समर्थन से बर्मी सेना द्वारा विद्रोह करके ‘आन सान सू कुई’ की चुनी हुई सरकार से सत्ता छीनी गई। बर्मी सेना ने जनता की आवाज को बंदूकों के बल पर कुचला। बर्मा में अब चीन अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रहा है तथा चुनी हुई राष्ट्राध्यक्ष सू कुई आज भी जेल में हैं।
नेपाल में मई 2021 में शासक दल के नेताओं की बगावत के द्वारा प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार से सत्ता छीनी गई। इस बगावत का मुख्य कारण यह था कि केपी शर्मा ओली अपने देश को बड़ी तेजी से चीन की गोद में धकेल रहे थे और भारत से शत्रुता का वातावरण बनाते जा रहे थे।
केपी शर्मा की सरकार के मौन समर्थन से चीन की सेना ने नेपाली सीमा में कई गांव बसा लिए थे। जबकि दूसरी ओर नेपाली सेना भारतीय जनता को गोलियों से भूनने लगी थी। नेपाली जनता और नेपाल के राजनीतिक दलों के लिए यह स्थिति असह्य थी। इस कारण नेपाल के राजनेताओं ने केपी शर्मा ओली की सरकार को जबर्दस्ती हटा दिया।
अफगानिस्तान में अगस्त 2021 में राष्ट्रपति बाइडन के नेतृत्व में अमरीका के बेशर्म मौन पलायन एवं इमरान खान के नेतृत्व में पाकिस्तान के शैतानी मुखर समर्थन से तालिबानी आतंकवादियों द्वारा, राष्ट्रपति अशरफ गनी की चुनी हुई सरकार से बड़ी क्रूरता पूर्वक सत्ता छीनी गई। सत्ता छीनने वाले आतंकवादियों के पास अमरीकी और चीनी हथियार थे। आतंकवादियों ने जनता को कोड़ों, छुरों और बंदूकों से मौत के घाट उतारा। चुने हुए राष्ट्रपति अशरफ गनी आज भी अपने देश से बाहर शरण लिए हुए हैं।
पाकिस्तान में अप्रेल 2022 में प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों ने मौन सैनिक समर्थन से की गई प्रजातांत्रिक बगावत के माध्यम से इमरान खान की सरकार से सत्ता छीनी। प्रतिपक्षी सांसदों की बगावत का मुख्य कारण यह था कि इमरान खान पूरी तरह चीन की गोद में जाकर बैठ गए थे।
पाकिस्तान चीन के कर्जे में गले तक डूब गया था और कर्जा न उतार पाने के कारण अपने देश की धरती चीनी बौनों के हाथों खोता जा रहा था। अमरीका इस स्थिति को सहन नहीं कर पा रहा था। इसलिए अमरीका के अप्रत्यक्ष समर्थन से, चीन समर्थित इमरान सरकार का पतन हुआ।
श्रीलंका में जुलाई 2022 में निहत्थी जनता ने बगावत करके अपने ही द्वारा चुनी हुई सरकार के राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को भगा दिया। जनता ने राष्ट्रपति के महल पर कब्जा कर लिया तथा प्रधानमंत्री का निजी आवास जला दिया। श्रीलंका में बगावत के तीन बड़े कारण बताए जाते हैं।
इनमें से एक वर्ष 2019 में कोरोना के कारण व्यापारिक गतिविधियों का ठप्प पड़ जाना, दूसरा वर्ष 2019 में आतंकवादियों द्वारा ईस्टर के अवसर पर तीन चर्चों तथा तीन होटलों में बम विस्फोट करके विदेशी पर्यटकों को मार डालना तथा तीसरा श्रीलंका की सरकार द्वारा चीन से लिए गए कर्ज का ब्याज और किश्त न भर पाना है।
इस प्रकार भारत के इन पांच पड़ौसी देशों के पतन में चीन का ही प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से हाथ रहा है। हाल ही में जापान के पूर्व दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की हत्या के पीछे भी विदेशी एजेंसियों को वामपंथी चीनी हाथ होने का संदेह है। शिंजो की हत्या होने के बाद चीन द्वारा दी गई प्रतिक्रिया से भी ऐसी बदबू आती है।
दुनिया भर के अराजकतावादी, हुड़दंगबाज, मोदी विरोधी कबीला, विदेशों में जड़ें जमा चुके खालिस्तानी संगठन, टुकड़ा-टुकड़ा गैंग तथा कुछ प्रतिपक्षी राजनीतिक पार्टियों के नेता भारत के पड़ौसी देशों में घट रही इन घटनाओं में अपने लिए नई संभावनाएं देखते हैं। वे लोग यह सपना पाले हुए हैं कि किसी तरह एक दिन उनके अपने देश में भी सत्ता बदल जाए। हाल ही में हुआ ब्रिटिश प्रधानमंत्री का त्यागपत्र प्रतिपक्षियों के हौंसलों को बढ़ाने वाला है।
वैश्विक पटल पर घट रही इन घटनाओं को देखते हुए भारत की जनता, भारत की सरकार एवं देश के भीतर-बाहर काम कर रही गुप्तचर एजेंसियों को पर्याप्त सतर्क एवं सजग रहने की आवश्यकता है ताकि कोई देशी विदेशी ताकत भारत के लिए किसी तरह का आंतरिक अथवा बाहरी खतरा उत्पन्न न कर सके।
चीनियों की महत्वाकांक्षा एवं पाकिस्तानियों के आतंकवाद के चलते भारत-चीन सम्बन्ध कभी भी स्थिर नहीं रह सकते। इस कारण भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है।
क्या हिन्दू धर्म मरता हुआ धर्म है ? यदि यह सवाल पूछा जाए तो करोड़ों हिन्दुओं को ठेस पहुंचेगी तथा वे मरने-मारने पर उतारू हो जाएंगे। कुछ देर के लिए हिन्दुओं की भावनाएं एक तरफ रखकर यदि विगत चौदह सौ सालों के इतिहास को वर्तमान सच्चाई से जोड़कर देखा जाए तो इस प्रश्न के उत्तर बड़ी आसानी से प्राप्त हो जाएंगे कि क्या हिन्दू धर्म मरता हुआ धर्म है?
जीवन एक अनंत यात्रा है जो जन्म-जन्मांतर तक चलती है। हम इस यात्रा के अनंत यात्री हैं। जैसा कि प्रत्येक यात्रा में होता है, यात्री के पास कुछ आवश्यक सामान होता है। जीवनयात्रा में भी कुछ अलग प्रकार का आवश्यक सामान होता है। इस सामान को हमने चार गठरियों में बंध रखा है।
पहली गठरी में हमने धर्म को सहेज रखा है। यह गठरी जन्म-जन्मांतर तक हमारे साथ चलती है। प्रत्येक जन्म में यह ईशभक्तिएवं सद्कर्मों की मात्रा के अनुसार हलकी-भारी होती रहती है।
दूसरी गठरी में हमने अर्थ को बांध रखा है। यह गठरी प्रत्येक जन्म में नए सिरे से बांधनी पड़ती है और अंत में यहीं पर छूट जाती है। अस्थाई होने पर भी यह गठरी बड़ी चमत्कारी होती है। यदि इस गठरी का ढंग से उपयोग किया जाए तो शेष तीनों गठरियों का काम भी यही कर देती है।
तीसरी गठरी है काम (अर्थात् इच्छा) की। इस धरती पर सबसे बदनाम गठरी यही है किंतु हमारी जीवनयात्रा इस गठरी के बिना पूरी नहीं हो सकती। यह गठरी सबसे भारी होती है।
चौथी गठरी में हमने मोक्ष बांधा हुआ है। यह गठरी पूरी तरह खाली है। यह गठरी उसी दिन भरती है जब हम तीनों गठरियों में बंधे सामान को ढंग से खर्च कर देते हैं! सब लोग इसी गठरी की सुरक्षा करने की चिंता में लगे रहते हैं किंतु यदि पहली तीन गठरियों को ढंग से संभाल लिया जाए तो इस गठरी को संभालने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
जिस प्रकार यात्रियों का सामान चुराने के लिए चोर उनके पीछे लगे रहते हैं, उसी प्रकार जीवनयात्रा की इन चारों गठरियों को चुराने के लिए भी कुछ चोर हमारे पीछे लगे हुए हैं। हालांकि ये चारों गठरियां प्रत्येक व्यक्ति की निजी होती हैं, वे दूसरों के काम की नहीं होतीं। फिर भी कुछ लोग इन गठरियों को चुराकर नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। हमें यत्नपूर्वक इन गठरियों की रक्षा करनी चाहिए। इस आलेख में हम धर्म रूपी गठरी की चर्चा करेंगे।
धर्म के बारे में मेरी समझ हिन्दू धर्मशास्त्रों के माध्यम से है। इसलिए मैं अपनी बात हिन्दू धर्मग्रंथों के उद्धरणों से ही स्पष्ट कर सकता हूँ। यद्यपि धर्म की व्याख्या सैंकड़ों ग्रंथों में सैंकड़ों प्रकार से की गई है तथापि वर्तमान समय में रामायण और गीता, दो ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें हम आसानी से पढ़ और समझ सकते हैं। इन दोनों ग्रंथों में भी इस बात की ओर संकेत किया गया है कि धर्म रूपी गठरी को चुराकर नष्ट करने के लिए हर युग में षड़यंत्र चलते रहते हैं।
श्रीमद्भगवद् गीता कहती है- यदा-यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत….।
अर्थात्- हे अर्जुन जब-जब धर्म की हानि होती है……।
रामचरित मानस कहती है-
हरित भूमि तृन संकुल, समुझि परहि नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बिबाद तें, लुप्त होहिं सदग्रंथ ।।
अर्थात्- जिस प्रकार घास के उग आने से मार्ग छिप जाता है, उसी प्रकार पाखण्डी मत के प्रचार से अच्छे ग्रंथ लुप्त हो जाते हैं।
Antim Hindu Samrat Prithviraj Chouhan
समाज को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले साधु, धर्म रूपी गठरी की रक्षा करना चाहते हैं किंतु समाज को सन्मार्ग से विचलित करके कुमार्ग पर ले जाने वाले लोग, समाज की धर्म रूपी गठरी को चुराकर नष्ट करना चाहते हैं और उस गठरी में धर्म की जगह अधर्म बांध देना चाहते हैं। इसी को धर्म और अधर्म का युद्ध कहते हैं, इसी को पाप और पुण्य का युद्ध कहते हैं तथा इसी को देव और दानव का संघर्ष भी कहते हैं।
कुछ लोग काली माता को सिगरेट पीते हुए दिखाना चाहते हैं। कुछ लोग देवी दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी अवतार के सम्बन्ध अशोभनीय बातें कहते हैं। कुछ लोग माता पार्वती के बारे में इतनी हीन बात करते हैं कि उन्हें लिखा भी नहीं जा सकता। कुछ लोग शिवलिंग के बारे में अनर्गल प्रलाप करते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि सांप, बंदर, गाय और कुत्तों की पूजा करने वाले हिन्दुओं पर जब मुसीबत आती है तो क्या ये सांप, बंदर, गाय और कुत्ते हिन्दुओं को बचाने के लिए आते हैं! ऐसे और भी सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनके माध्यम से हिन्दुओं की धर्म रूपी गठरी पर प्रहार किए जाते हैं।
श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मुझे जिस भाव से भजता है, मैं भी उसको उसी भाव से भजता हूँ। अर्थात् जो मुझे जिस रूप में प्राप्त करना चाहता है, कर सकता है। जिसे शेरों वाली माता चाहिए, उसे शेरों वाली माता मिलेगी, जिसे सिगरेट वाली माता चाहिए, उसे सिगरेट वाली मिलेगी।
हिन्दू धर्म में तेतीस करोड़ देवी देवताओं की अवधारणा है, जिसे भगवान का जो रूप अच्छा लगे, वह उसकी पूजा कर ले। श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि किसी भी भगवान के निमित्त की गई पूजा, अंत में मेरे ही पास चली आती है।
अध्यात्मिक चिंतन की स्वतंत्रता उपलब्ध होने के कारण तथा धार्मिक कठोरताओं की बाध्यताएं नहीं होने के कारण, हिन्दू जाति हजारों सालों से धर्म के मामले में उदार, अहिंसक और सहिष्णु बनी हुई है। हिन्दू धर्म में प्रतिदिन किए जाने वाले धार्मिक कार्य भी निश्चित नहीं हैं। कोई वेद पढ़ता है, कोई पुराण पढ़ता है, कोई गीता पढ़ता है, कोई रामायण पढ़ता है, कोई सूर्य को जल चढ़ाता है, कोई शिव को जल चढ़ता है, कोई पीपल को जल चढ़ाता है, कोई गंगाजी नहाता है, कोई हवन करता है, कोई मूर्तिपूजा करता है, कोई दान देता है, कोई तीर्थसेवन करता है, कोई मंत्रजाप करता है, कोई माला फेरता है और कोई व्यक्ति इनमें से कुछ भी नहीं करके हिन्दू धर्म में बना रहता है तथा मोक्ष का अधिकारी होता है।
सबके अपने-अपने राम हैं, कोई स्त्री उन्हें कौशल्या बनकर खीर और हलुए का भोग चढ़ाती है तो कोई शबरी बनकर फल और फूल खिलाती है। कोई भक्त, हनुमानजी बनकर रामजी की सेवा करता है, तो कोई भक्त, विभीषणजी की तरह पाप का कुनबा छोड़कर रामजी के चरणों में आ बैठता है। कोई जटायु और कोठारी बंधुओं की तरह रामकाज के लिए लड़ते हुए देह छोड़ता है तो कोई दशरथजी की तरह रामजी के वियोग में प्राण त्यागता है। अपना-अपना देव और अपनी-अपनी आस्था। हजारों सालों से हिन्दू धर्म ऐसा ही है। करुणा और श्रद्धा से लदा हुआ! क्षमा और दया से भरा हुआ! उदार, अहिंसक और सहिष्णु!
इसी उदारता, अहिंसकता और सहिष्णुता का लाभ उठकार हिन्दू धर्म की गठरी में नित नए छेद करने के षड़ंत्र किए जाते हैं। अहिंसक, सहिष्णु और उदार होने के कारण हिन्दू इन छेदों को देख नहीं पाते जिसके कारण ये छेद इतने बड़े हो जाते हैं कि धर्म की वास्तविक हानि हो जाती है।
भारत में समय-समय पर किसी पाखण्डी साधु या फकीर को देवता और भगवान की तरह पूजने के लिए षड़यंत्र चलाए जाते हैं। हिन्दू चुप रहता है और षड़यंत्र को मूर्खता कहकर टाल देता है। परिणाम यह होता है कि कुछ ही सालों में हिन्दू मंदिरों में उस पाखण्डी साधु या फकीर की मूर्तियाँ भगवान बनकर पहुंच जाती हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत और उद्यापन किए जाने लगते हैं और कथाओं के पाठ होने लगते हैं। उस पाखण्डी साधु या फकीर की मूर्तियों के सामने हलुए के भोग लगाए जाने लगते हैं और भोले-भाले हिन्दू जिस तरह हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, इन पाखण्डी साधुओं और फकीरों के स्तुतिगायन करने वाली चालीसाएं भी पढ़ने लगते हैं।
रामचरित मानस का पाठ करने वाले एक हिन्दू बाबा तो आजकल भगवान के मंदिर छोड़कर फकीरों के स्थानों पर चादरें चढ़ाते हुए देखे जा रहे हैं। एक और भी कथावाचिका हैं वे भी भगवान के भजन गाते-गाते जाने किसके भजन गाने लगती हैं। ये सब भी गठरी में छेद करने के बड़े षड़यंत्र हैं।
ऐसे सैंकड़ों षड़यंत्र, कुचक्र और घात-प्रतिघात विगत सैंकड़ों सालों से किए जा रहे हैं जिनके माध्मम से हिन्दू जाति की धर्म रूपी गठरी में बड़े-बड़े छेद किए जा चुके हैं।
आजादी के बाद इन षड़यंत्रों में काफी तेजी आई है। इस तेजी के दो बड़े कारण हैं। पहला कारण है हिन्दुओं की उदरमना प्रवृत्ति तथा दूसरा कारण है संविधान में लोकतंत्र व्यवस्था के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मिले हुए अधिकार। बहुत बड़ी संख्या में षड़यंत्री लोग इन दोनों स्थितियों एवं सुविधाओं का दुरुपयोग कर रहे हैं।
अधिकतर भोले-भाले लोग नौकरी पाने, विवाह हो जाने, अपना अटका हुआ काम पूरा हो जाने, संतान प्राप्त करने, अपने घर में धन-सम्पत्ति आने, परीक्षा में उत्तीर्ण होने की लालसा में इन पाखण्डी साधुओं एवं फकीरों के फेर में पड़ते हैं। जबकि इनमें से अधिकतर काम तो प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ के अधीन होते हैं। किसी फकीर, औलिया, बाबा, ढोंगी साधु अथवा पाखण्डी की मूर्ति के आगे हलुआ चढ़ाने से, उसके नाम के व्रत करने से और चमत्कारों की किताबें बांटने से कुछ नहीं होता।
कुछ लोग कह सकते हैं कि हमारे जो काम हनुमानजी और दुर्गाजी की पूजा से नहीं हुए, वे फलाने फकीर या बाबा की मूर्ति या समाधि को हलुआ-माला चढ़ाने से हो गए। उन्हें मैं कहना चाहता हूँ कि संसार में ऐसा कोई आदमी नहीं है, जिसकी आधी से अधिक इच्छाएं प्रारब्ध और पुरुषार्थ से पूरी न होती हों! आप किसी देवता की पूजा न करें, तो भी आपकी इच्छाएं पूरी होंगी। श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैं सबका योगक्षेम वहन करता हूँ। रामचरित मानस में रामजी को ‘कारण रहित दयाल’ कहा गया है।
यदि हम भगवान में विश्वास करते हैं, चाहे हमारा भगवान कोई भी क्यों न हो, तो इतना तो मानते ही होंगे कि भगवान दीनदयाल हैं! ऐसी स्थिति में हम भगवान को याद करें, न करें, भगवान हमारे हैं और वे हमारा काम बिना किसी हलुआ-पूरी के भी करेंगे। यदि हम भगवान को हलुआ-पूरी चढ़ाते हैं तो यह हमारे मन के संतोष के लिए है, अपने हृदय को भगवान की सेवा करने के भाव से भरने के लिए है। भगवान को क्या अंतर पड़ता है। यदि कोई निर्धन भगवान को हलुआ-पूरी अर्पित नहीं कर पाता तो भी भगवान तो दीनदयाल ही हैं!
ईश्वर द्वारा योगक्षेम वहन करने वाली बात को एक पुरानी कहावत में बहुत ही अच्छी तरह से समझाया गया है- ‘जिसने चोंच दी है, वह चुग्गा भी देगा!’ अर्थात्! हमें चोंच देने वाले में भरोसा रखना है, किसी भी हालत में निराश नहीं होना है।
पुरुषार्थ से भी चुग्गा मिल जाता है और प्रारब्ध (भाग्य) से भी। पहले किया गया पुरुषार्थ आज का प्रारब्ध है। इस कारण पुरुषार्थ करना हमारे हाथ में है किंतु प्रारब्ध को सुधारना हमारे हाथ में नहीं है। जब पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनों निष्फल हो जाएं तो चोंच देने वाले की ओर देखा जाता है अर्थात् भगवान से प्रार्थना की जाती है। यह भी एक प्रकार का पुरुषार्थ है। भगवान से प्रार्थना करिए, इससे आत्मिक बल मिलेगा। चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ेगा और हमारे समस्त शुभकार्य स्वतः सम्पन्न हो जाएंगे।
जिस प्रकार हमारे माता-पिता ही हमारे माता-पिता हैं, उसी प्रकार हमारा धर्म ही हमारा धर्म है। जिस प्रकार माता के कुरुप होने पर माता नहीं बदली जाती, पिता के निर्धन होने पर पिता नहीं बदला जाता, उसी प्रकार यदि आपको लगता है कि आपके 33 करोड़ देवी-देवता कमजोर हैं, तो क्या आप दूसरों के देवी-देवता को पूजने लगेंगे! हालांकि यह केवल एक उदाहरण है, न तो हमारी माता कुरूप है, न पिता निर्धन है और न देवता कमजोर हैं।
श्रीमद्भगवद् गीता में इस स्थिति के लिए कहा गया है-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परध र्मो भयावहः
अर्थात्- अच्छी तरह आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से, गुणों की कमी वाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय प्रदान करने वाला है।
कुल मिलाकर कहने का आशय केवल इतना है कि कोई किसी की गठरी को देखकर मत ललचाओ। न अपनी गठरी में छेद होने दो न किसी की गठरी में छेद करने का प्रयास करो। सबको अपनी-अपनी जीवन यात्रा अपनी-अपनी गठरी के साथ ही करनी है। इसी में सबका कल्याण है। अन्यथा- नींद में माल गंवा बैठेगा, अपना आप लुटा बैठेगा। फिर पीछे कुछ नहीं बनेगा, लाख मचाए शोर। तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा।
एक पुरानी रोमन कहावत है कि सीजर की पत्नी को संदेहों से परे होना चाहिए। (Caesar’s wife must be above suspicion) इस कहावत का भारतीय परम्परागत शब्दावली में अनुवाद इस प्रकार किया जाता है कि सीजर की पत्नी को पवित्र होना ही नहीं चाहिए, पवित्र दिखना भी चाहिए!
1 जुलाई 2022 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जज द्वारा जो अनावश्यक टिप्पणियां की गईं, उनसे सीजर की पत्नी अनावश्यक रूप से संदेह के घेरे में आ गई। यहाँ सीजर की पत्नी से आशय उन टिप्पणियों से है जो एक जज द्वारा अनावश्यक रूप से की गईं। उन टिप्पणियों का उद्देश्य भले ही पवित्र रहा होगा किंतु उनका स्वरूप टिप्पणियों के उद्देश्य की पवित्रता के अनुरूप नहीं था। यही कारण है कि पूरा देश इन अनावश्यक टिप्पणियों को सुनकर स्तब्ध रह गया!
भारत में न्यायालय की सर्वोच्चता एवं उसके सम्मान को सर्वोपरि माना गया है। यह सर्वोच्चता और सम्मान न केवल संविधान द्वारा स्थापित किया गया है अपितु भारत की जनता द्वारा भी सहज प्रसन्नता से स्वीकार किया गया है। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता और सम्मान का हो तो प्रत्येक नागरिक कुछ भी प्रतिक्रिया देने से पहले संभल जाता है। फिर भी सर्वोच्चता और सम्मान के नाम पर यह देश गूंगा-बहरा तो नहीं बन सकता!
मामला केवल इतना था कि एक प्रार्थी द्वारा यह याचिका प्रस्तुत की गई थी कि उसके विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में जो पुलिस थानों में प्राथमिकियां लिखी गई हैं, उन सब मुकदमों को एक साथ जोड़कर दिल्ली स्थानांतरित कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के जज को इस याचिका पर निर्णय देना था।
कानूनी धाराओं के आलोक में सुप्रीम कोर्ट के ऑनरेबल जज महोदय चाहे जो फैसला देते, उस पर किसी की प्रतिक्रिया नहीं आती क्योंकि वह कोर्ट का निर्णय होता। भारत में या तो कोर्ट के फैसले का स्वागत किया जाता है या फिर अगले प्लेटफॉर्म पर अपील की जाती है। अभी भी जज ने चार लाइनों का एक फैसला दिया ही है कि आप हाईकोर्ट जाइए! इतना पर्याप्त था। ऐसा पहले भी सैंकड़ों बार हुआ है कि लोग त्वरित न्याय की आशा में अपने केस लेकर सीधे ही सुप्रीम कोर्ट में आ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट उनसे पूछ लेता है कि वे सीधे ही यहाँ क्यों आए हैं? प्रार्थी के जवाब से संतुष्ट होने पर सुप्रीम कोर्ट उन्हें सुन लेता है या संतुष्ट नहीं होने पर, उन्हें निचली अदालत में जाने का निर्देश देता है किंतु किसी जज द्वारा ऐसी टिप्पणी पहली बार की गई है कि आप घमण्डी हैं, इसलिए निचली अदालत में या हाईकोर्ट जाने की बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में चले आए हैं। ऑनरेबल जज ने इस टिप्पणी के साथ और भी जो टिप्पणियाँ कीं उनसे तो ऐसा लगता है कि जज ने बिना केस की सुनवाई किए, यह निर्णय दे दिया कि वादी के कारण ही देश में आग लगी हुई है।
जज की इस टिप्पणी के बाद जनता द्वारा यह प्रतिक्रिया देना कि आग तो पूरी दुनिया में लगी हुई है और यह आग आज से थोड़े ही लगी हुई है, यह तो सैंकड़ों साल से लगी हुई है, स्वाभाविक है।
जज महोदय ने याचिका की सुनवाई के दौरान जो और भी जो अनावश्यक टिप्पणियां दीं, उनसे पूरे देश के जनमानस में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। 1 जुलाई 2022 को सोशियल मीडिया प्लेटफार्मों पर जनता द्वारा क्या कुछ नहीं कहा गया है! ये प्रतिक्रियाएं जनसाधारण की मानसिक व्यथा को प्रकट करती हैं। इन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि जनता का मानना है कि जज ने इन टिप्पणियों के माध्यम से जनता के सम्मान को ठेस पहुंचाई।
जिस प्रकार कोर्ट के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, उसी प्रकार जनता के सम्मान को भी ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।
सीजर को यह जानना चाहिए कि सीजर भले ही कितना ही ताकतवर क्यों न हो और सीजर की पत्नी भले ही कितनी ही पवित्र क्यों न हो, उन्हें संदेह से ऊपर बने रहना होगा क्योंकि सीजर को शासन तो जनता पर ही करना है! जनता की आंखों में सीजर का सम्मान बना रहे, इसके लिए सीजर तथा उसकी पत्नी को स्वयं ही सतर्क रहना चाहिए।
महाराष्ट्र की राजनीति कोई बड़ी करवट लेने वाली है। कोई ऐसे ही एकनाथ शिंदेकी सरकार नहीं बना देता!
भारतीय राजनीति में द्वापर के योगिराज कृष्ण और कलियुग के आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य के नाम आदर से लिए जाते हैं। इन दोनों के काल में हजारों साल का अंतर है, इसके उपरांत भी दोनों की राजनीति में कुछ समानताएं जबर्दस्त थीं। दोनों की राजनीतिक चालों को समय से पहले कोई कभी नहीं समझ पता था, न शत्रुपक्ष और न मित्रपक्ष।
दोनों के ही चिंतन के कैनवास अत्यंत विस्तृत थे एवं दृष्टिकोण बहुआयामी। जब कृष्ण और चाणक्य के शत्रु और मित्र तत्कालीन परिस्थितियों के समाधान के लिए व्याकुल रहते थे, तब कृष्ण और चाणक्य अपनी दृष्टि भविष्य में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों पर केन्द्रित करते थे।
कृष्ण और चाणक्य दोनों ही इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की गई राजनीति के परिणाम भी तात्कालिक एवं अल्पजीवी होते हैं जबकि भविष्य के गर्भ में पल रही परिस्थितियों को समझकर बनाई गई योजनाओं के परिणाम भले ही कुछ विलम्ब से प्रकट हों किंतु उनकी आयु लम्बी होती है।
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार के गठन की घटना, कृष्ण और चाणक्य की गूढ़ राजनीति का स्मरण करवाती है। जिस समय देवेन्द्र फडणवीस मुम्बई में प्रेसवार्त्ता को सम्बोधित कर रहे थे, और इस प्रेसवार्त्ता का लगभग तीन चौथाई हिस्सा पूरा कर चुके थे, तब तक किसी को यह अनुमान नहीं था कि आज शाम को महाराष्ट्र में जो मुख्यमंत्री शपथ लेने वाला है, वह देवेन्द्र फडणवीस नहीं अपितु एकनाथ शिंदे है।
कोई सामान्य व्यक्ति भी आज यह अनुमान लगा सकता है कि भारत में मेंढकों की तरह पनप चुके जो राजनीतिक विश्लेषक, बुद्धिजीवी और पत्रकार टेलिविजन की बहसों में घण्टों तक गुर्राते और टर्राते हैं और स्वयं को राजनीति का पण्डित बताते हैं, उनकी बुद्धि कभी भी इस संभावना तक नहीं पहुंच सकी होगी कि भारतीय जनता पार्टी एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना देगी!
एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने एक बाण से कई लक्ष्य साधे गए हैं। सबसे पहला लक्ष्य तो यह साधा गया है कि शिंदे गुट की बगावत को सफलता के सर्वोंच्च सोपान पर स्थापित करके, निकट भविष्य में शिंदे गुट में होने वाली किसी अप्रत्याशित फूट की संभावनाएं शून्यप्रायः कर दी गई हैं।
दूसरा लक्ष्य यह साधा गया है कि एकनाथ शिंदे और उनके साथी विधायक अब उद्धव ठाकरे और उनके साथी विधायकों से आंखों में आंखें डालकर बराबरी के स्तर पर निबट सकते हैं। संजय राउत और उनके जैसे विध्वंसक शिवसैनिक यदि हिंसा के बल पर शिंदे गुट को सबक सिखाने के मंसूबे पाले हुए बैठे थे, तो उन मंसूबों पर भी पानी फेर दिय गया है।
लोकतंत्र में किसी भी दल की चुनी हुई सरकार को अपनी नीतियों को बनाने, उन्हें चलाने तथा उनके परिणामों को जनता तक पहुंचाने के लिए पांच साल का समय भी कम पड़ता है। महाराष्ट्र के अगले चुनावों में तो अब लगभग दो-ढाई साल ही बचे हैं। ऐसी स्थिति में यदि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती तो दो-ढाई साल की अवधि में उसे अपनी योजनाएं बनाकर उनका लाभ जनता तक पहुंचाने में सफलता नहीं मिलती। इससे जनता में असंतोष उत्पन्न होता जिसका लाभ अगले चुनावों में विपक्षी दलों को मिलता।
शिंदे सरकार का गठन करवाकर भारतीय जनता पार्टी ने जनता में यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भाजपा ने सत्ता के लालच में शिवसेना में फूट नहीं करवाई है। भाजपा तो महाराष्ट्र की जनता को शरद पंवार की एनसीपी तथा राहुल गांधी की कांग्रेस द्वारा शिवसेना के कंधों पर बैठकर किए जा रहे कुशासन से मुक्ति दिलवाने के लिए शिवसेना के ही उन विधायकों का साथ दे रही है, जिन्होंने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और जो हिन्दुत्व की राह पर चलना चाहते हैं।
इस सरकार के गठन के माध्यम से भाजपा का संदेश साफ है कि भाजपा सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं अपितु महाराष्ट्र की भ्रष्ट सरकार को उखाड़कर एक साफ-सुथरी और हिन्दुत्व की विचारधारा के लिए समर्पित सरकार देने के लिए शिंदे गुट का साथ दे रही है।
जिस प्रकार द्वापर के कृष्ण और कलियुग के चाणक्य की राजनीति निजी स्वार्थों से प्रेरित नहीं होती थी, उसी प्रकार नरेन्द्र मोदी और अमितशाह की नीतियों पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी महाराष्ट्र में सत्ता के मोह से दूर रहकर बहुत ही चौंकाने वाली और साफ-सुथरी राजनीति की है। निश्चित ही भाजपा द्वारा खेले गए इस राजनीतिक दांव के परिणाम बहुत दूरगामी और राष्ट्र के लिए हितकारी होंगे।
हिन्दुत्व में शांतिपाठ का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है। प्रत्येक हिन्दू दैनिक पूजा-पाठ के अंत में शांतिपाठ करता है। शांतिपाठ ही प्रत्येक यज्ञ अथवा पूजा की पूर्णाहुति है।
यह संसार हलचलों से भरा हुआ है। हर ओर संघर्ष है, भागमभाग है, शोर है और प्रतिस्पर्द्धा है। यह सारा संघर्ष, भागमभाग, शोर और प्रतिस्पर्द्धा इसलिए है, क्योंकि हर जीव प्रतिक्षण कुछ न कुछ प्राप्त करना चाहता है। प्रत्येक जीव किसी न किसी चीज केे लिए तरस रहा है।
जिस प्रकार मुनष्यों में संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा है, उसी प्रकार जीव-जंतुओं में भी संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा है। वनस्पतियों में भी संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा है। पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) में भी संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा है। वास्तविकता तो यह है कि समस्त निर्जीव समझी जाने वाली अर्थात् जड़ कही जाने वाली वस्तुओं में भी प्रतिस्पर्द्धा है। यह संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा ही सृष्टि को जीवन एवं गति देते हैं और यही संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा सृष्टि को विनाश की ओर ले जाते हैं।
इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि समस्त सजीव और निर्जीव वस्तुएं अणुओं से बनी हैं जिन्हें हम आंख से नहीं देख सकते। इन छोटे-छोटे अणुओं के भीतर अनवरत संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा चल रहे हैं। प्रत्येक अणु में एक या एक से अधिक परमाणु होते हैं। प्रत्येक परमाणु के केन्द्र में प्रोटोन और न्यूट्रॉन होते हैं और इनके चारों ओर इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते रहते हैं। इनमें से न्यूट्रॉन पर कोई आवेश नहीं होता, जबकि प्रोटोन पर धनात्मक एवं इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक आवेश होता है। परमाणु के भीतर स्थित प्रोटोन, न्यूट्रॉन और इलैक्ट्रॉन के आवेशों का अंतर ही उनके परस्पर आकर्षण, विकर्षण, संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा का कारण है।
प्रत्येक परमाणु के भीतर बैठा प्रोटॉन, अपने चारों ओर घूम रहे इलैक्ट्रॉनों को आकर्षित करके उन्हें न्यूट्रॉन के साथ बांधे रखने का प्रयास करता है जबकि उसी अणु के दूसरे परमाणु में बैठे प्रोटॉन, या किसी अन्य अणु के परमाणु में बैठे प्रोटॉन, इन इलैक्ट्रॉनों को अपनी तरफ खींचने के लिए दबाव बनाते हैं। अर्थात् प्रत्येक परमाणु अपने इलैक्ट्रॉन को छोड़ना नहीं चाहता किंतु दूसरे परमाणु के इलैक्टॉन को प्राप्त करना चाहता है। इस संघर्ष के कारण कुछ इलैक्ट्रोनों को विवश होकर अपना परमाणु छोड़ना पड़ता है और दूसरे परमाणु में कूदना पड़ता है। यहीं से भौतिक जगत में संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा का क्रम आरम्भ होता है।
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जिस प्रकार इलैक्ट्रॉन एक दूसरे को धक्का देते हैं, उसी प्रकार एक परमाणु दूसरे परमाणु को धक्का देकर उसका स्थान प्राप्त करना चाहता है जबकि पहला परमाणु अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहता है। यही स्थिति अणुओं की होती है। अणुओं एवं परमाणुओं के भीतर चलने वाले संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा से ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे जड़ अस्तित्वों की जड़ता टूटती है और वे कुछ नया रचने की स्थिति में आते हैं। सृजन की इस प्रक्रिया में पूरा संसार हलचल अर्थात् गति से भर जाता है। यह हलचल ही संसार की उन्नति का आधार है। इस उन्नति की चरम परिणति जड़ (निर्जीव) एवं चेतन (सजीव) समझे जाने वाले पदार्थों एवं अस्तित्वों के रूप में होती है। जब आंखों से दिखाई न देने वाले अणुओं और परमाणुओं के भीतर दिन-रात इतना भीषण संघर्ष चलता है और प्रतिस्पर्द्धा होती है, तब हम कल्पना कर सकते हैं कि सजीव अस्तित्वों में संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा कितने उच्च स्तर पर होते हैं! भोजन और आश्रय के लिए वनस्पतियों, कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों में दिन-रात संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा चलते रहते हैं। मनुष्यों में परस्पर संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा रोटी, कपड़ा और मकान प्राप्त करने के लिए होते हैं। ये संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा मनुष्यों में लालच, क्रोध और अहंकार जैसी नकारात्मक स्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
इस कारण पूरा संसार शोर तथा भागमभाग से भर जाता है जिसका अंतिम परिणाम सम्पूर्ण जगत् में अशांति के रूप में दिखाई देता है। इस कारण हिन्दुत्व में शांतिपाठ का महत्व है।
रोटी, कपड़ा और मकान प्राप्त करने के लिए होने वाला संघर्ष कोई पाप नहीं है, ये तो मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं हैं जिनके लिए मनुष्य को संघर्ष करना ही पड़ेगा किंतु जब संघर्ष रोटी, कपड़ा और मकान प्राप्त होने के बाद भी चलता रहता है और मनुष्य अपने लालच और अहंकार की पूर्ति के लिए संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा करने लगता है तो अशांति का स्तर कई गुना बढ़ जाता है।
सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त यह अशांति क्षण-प्रतिक्षण बढ़ती ही जाती है। संसार से प्रेम और श्रद्धा के भाव कम होने लगते हैं और युद्ध, घृणा एवं हिंसा का बोलबाला हो जाता है। ऐसी स्थिति में कोई भी निर्जीव या सजीव अस्तित्व संतुलित नहीं रह पाता। वह अपने स्थान से गिरने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे भूकम्प आने पर धरती के ऊपर कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रह पाती।
स्थिरता नष्ट होते ही प्रकृति के कण-कण से संतोष, आनंद और प्रेम के भाव समाप्त होने लगते हैं। जड़ एवं चेतन पदार्थ एक दूसरे को शत्रुभाव से देखने लगते हैं और वे एक-दूसरे को नष्ट करने पर तुल जाते हैं। प्रकृति के इसी असंतुलन को दूर करने के लिए वैदिक ऋषियों ने शांति की कामना की।
यद्यपि वेदों के प्रत्येक मंत्र में सर्वत्र सुख एवं शांति की ही कामना की गई है तथापि यजुर्वेद के शांतिमंत्र में शांति की कामना को अत्यंत प्रभावशाली एवं स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया गया है। इस मंत्र अथवा प्रार्थना का सार यह है कि सृष्टि का प्रत्येक कण शांत हो जाए। इसलिए वैदिक काल से ही हिंदुओं ने इस मंत्र को अपने दैनिक पूजापाठ में अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया। यह प्रार्थना इस प्रकार से है-
इस मंत्र का शाब्दिक अर्थ है- हे प्रभु सम्पूर्ण प्रकाशमान लोक (अर्थात् तीनों लोकों) में शान्ति हो। अंतरिक्ष शांत रहे, पृथ्वी शांत रहे, अग्नि और जल शांत रहें। औषधियाँ शांत रहें, वनस्पतियाँ शांत रहें, विश्व के समस्त देव शांत रहें, ब्रह्म शांत रहे, हर ओर शांति हो, हमारी वाणाी में शांति हो, कण-कण में शांति हो।
यदि हम प्रतिदिन शांति की कामना और प्रार्थना करेंगे तो हमारे चारों ओर सकरात्मक ऊर्जा का प्रवाह होगा तथा हमारे आसपास का सम्पूर्ण वातावरण हमारे अनुकूल बनेगा। हम व्यर्थ की बातों से उद्वेलित होकर दूसरे लोगों की गर्दन काटने के लिए नहीं दौड़ेंगे। हम बदला लेने की नहीं, क्षमा करने की संस्कृति की तरफ बढ़ेंगे। हम सड़कों पर उत्तेजना फैलाने वाले नारे नहीं लगाएंगे। हम दूसरों के घर, दुकानें, रेलें और बसें नहीं जलाएंगे। हम व्यर्थ के संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करके अपने जीवन को सुंदर बनाने की ओर बढ़ेंगे।
जीवन सुख, शांति, प्रेम और श्रद्धा के साथ जीने के लिए है, न कि दूसरों की गर्दन काटने के लिए! क्षण भर के लिए शांत होकर सोचिए कि जब कोई मनुष्य किसी भी पशु, पक्षी या मनुष्य की गर्दन काटता है या उसके प्रति मनसा, वाचा अथवा कर्मणा हिंसा करता है, तो इस सृष्टि में कितना तनाव उत्पन्न होता होगा! यह तनाव नकारात्मक ऊर्जा के रूप में संसार के प्रत्येक प्राणी तक पहुंचता है। छोटे-छोटे बच्चों एवं गर्भस्थ शिशुओं तक भी पहुंचता है और वे माँ के पेट में ही विकलांग, विक्षिप्त अथवा मानसिक रोगी बन जाते हैं। संसार को इस तनाव से बचाने के लिए शांति का यह मंत्र एक अचूक औषधि है।
कितने खेद और दुःख की बात है कि कुछ लोग मजहबी संकीर्णताओं के चलते दूसरे प्राणियों की गर्दनें काटते हैं और इस सृष्टि में दिन-रात तनाव एवं नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जब सृष्टि में शांतिपाठों की उपेक्षा होती है, तब प्रकृति कुपित होकर भूकम्प, ज्वालामुखी, महामारी, अकाल, भूख, बेरोजगारी, हिंसा, युद्ध आगजनी और अकाल मृत्यु जैसे घातक उपकरणों से मनुष्य जाति का उपचार करती है। इसलिए हमारा सर्वोच्च कर्त्तव्य हर समय शांति की कामना करना तथा शांति की स्थापना के लिए प्रयास करना ही है।
करोड़ों का रेडियो – एक बादशाह अपनी रियासत से रुखसत हो गया और किसी को कानोंकान खबर न हुई!
जब मैंने इस धरती पर आखें खोलीं और घर की चीजों को पहचानना आरम्भ किया तो मैंने पाया कि हमारे घर में कुछ वस्तुएं बहुत ही आकर्षक थीं और इतनी विशिष्ट थीं कि आसपास के घरों में दिखाई भी नहीं देती थीं। इन्हीं वस्तुओं में फिलिप्स का एक बड़ा सा रेडियो भी शामिल था। यह रेडियो मेरे पिताजी ने मेरे जन्म से दो साल पहले अर्थात् वर्ष 1960 में 550 रुपए में खरीदा था। उस समय पिताजी का वेतन लगभग 110 रुपए मासिक था और सोने का भाव लगभग 110 रुपए प्रति दस ग्राम था। उन दिनों घर में रेडियो सुनने के लिए भारत सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना होता था जिसकी फीस हर साल चुकानी होती थी।
मेरा जन्म 1962 की गर्मियों में हुआ। उस समय भारत अपनी आजादी की पंद्रहवीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था। भारतीय जनता के लिए यह काल अपनी आजादी को उत्सुकता भरी दृष्टि से देखने का और राजनेताओं के लिए यह काल देश की जनता को समृद्धि भरे भविष्य के सपने दिखाने का था। प्रजा और शासकों के आशावाद से उलट, कड़वी सच्चाई यह थी कि उन दिनों भारत में बहुत से लोगों को दो जून की रोटी नहीं मिलती थी और लाखों लोग सड़कों पर भूखे सोते थे। भारत सरकार जनता का पेट भरने के लिए अमरीका से पीएल 480 समझौते के तहत सस्ता गेहूं खरीदती थी।
भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीनी नेता चाऊ एन लाई के साथ मिलकर पंचशील का जो गुब्बारा फुलाया था, वह मेरे जन्म के समय, अर्थात् 1962 की गर्मियों में तेजी से पिचक रहा था और भारत के लोग जवाहरलाल नेहरू की वैदेशिक नीतियों की जमकर आलोचना करते थे। हालांकि हमारा रेडियो उन दिनों भी जवाहरलाल नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व के समाचार सुनाया करता था।
1962 की सर्दियों में भारत पर अचानक हुए चीनी आक्रमण ने नेहरूजी के आभामण्डल को पूरी तरह फीका कर दिया। नेहरूजी ने जिस खराब तरीके से उस युद्ध को लड़ा, उससे हर देशवासी स्तब्ध रह गया। भारतीय सेना द्वारा नेहरूजी से अनुरोध किया गया कि वे हवाई मोर्चा खोलें किंतु नेहरूजी ने हवाई मोर्चा नहीं खोला। बाद में नेहरूजी ने कहा भी- ‘इन अफीमचियों को उठाकर बाहर फैंक दो!’ किंतु तब तक बहुत विलम्ब हो चुका था।
यद्यपि भारतीय सेना के अतुल शौर्य के कारण उस युद्ध में चीन को काफी नुक्सान उठाना पड़ा किंतु भारत की सेनाओं को भी भारी क्षति पहुंची और अक्साईचिन का महत्वपूर्ण क्षेत्र चीन ने दबा लिया। देश का माथा शर्म से झुक गया। इस दौर में भारत के अधिकांश व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के सम्बन्ध में अपने विचारों को एक-दूसरे तक पहुंचाना चाहते थे और अपने विचारों पर एक-दूसरे की राय चाहते थे। इस कारण देश में वैचारिक मंथन की बाढ़ सी आई हुई थी। देश का लगभग हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस वैचारिक मंथन में खुलकर भाग लेता था।
इस वैचारिक द्वंद्व को खाद-पानी उन थोड़ी-बहुत सूचनाओं एवं समाचारों से मिलता था जो अखबार, रेडियो और पुस्तकों के माध्यम से जनता तक पहुंचते थे। यह अलग बात थी कि उन दिनों अखबार बहुत कम छपते थे, रेडियो बहुत कम घरों में थे और टेलिविजन की तो कल्पना भी नहीं थी। लोगों की आमदनी कम थी और देश की जनता दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रही थी। फिर भी रेडियो द्वारा किए जा रहे जवाहरलाल नेहरू के गुणगान बिना किसी हिचक के जारी थे।
रेडियो सरकारी नियंत्रण में था इसलिए प्रबुद्ध लोगों को सरकारी सूचनाएं देता था किंतु लोग सरकारी सूचनाओं के साथ-साथ वैचारिक-विश्लेषण एवं राजनीतिक टिप्पणियां भी चाहते थे। इसलिए कुछ लोग अखबार भी खरीदते थे। उस कठिन दौर में भी मेरे पिताजी अखबार खरीद कर पढ़ा करते थे। हमारे घर की अलमारियों में बहुत सी पुस्तकें रखी रहती थीं जिनमें आचार्य चतुरसेन और गुरुदत्त के विचारोत्तेजक उपन्यास प्रमुख थे।
भले ही रेडियो प्रबुद्ध वर्ग की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता था, फिर भी वह प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की दिनचर्या का अनिवार्य अंग बना हुआ था। यही कारण था कि हमारे घर का रेडियो भी घर के सदस्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए था। समाचारों के नियमित प्रसारण के समय उसकी आवाज सबसे ऊंची होती थी। समाचार प्रसारण के समय घर का कोई सदस्य कुछ भी बोलने का साहस करता था तो पिताजी की झिड़की खाकर तुरंत ही चुप हो जाता था।
1962 के चीनी आक्रमण के बाद डेढ़ साल से भी कम समय में अर्थात् 1964 की गर्मियों में नेहरूजी का निधन हो गया और लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री हुए। 1965 की सर्दियों में अचानक ही पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। पिटे हुए को कौन नहीं पीटना चाहता, कुछ इसी अंदाज में पाकिस्तान भारत की ठुकाई करना चाहता था!
भारत अब भी पीएल 480 में खरीदा गया खराब गेहूँ खा रहा था और अब भी भारत के पास उस खराब एवं सस्ते गेहूं को खरीदने जितने पैसे नहीं थे। इसलिए शास्त्रीजी ने जनता से अपील की कि जो लोग अण्डे खा सकते हैं, अण्डे खाएं और जो लोग सप्ताह में एक दिन उपवास कर सकते हैं, उपवास करें। देश की हालत इतनी खराब होने पर भी शास्त्रीजी ने भारत की सेनाओं से गरजकर कहा- ‘जवानो! बढ़े चलो।’
शास्त्रीजी, 1965 में नेहरूजी द्वारा की गई गलती को नहीं दोहरना चाहते थे। उन्होंने तुरंत हवाई मोर्चा खोल दिया और पाकिस्तान को जमकर ठोक-पीट दिया।
जब हमारा रेडियो प्रातः, मध्याह्न और संध्याकाल में भारतीय सेनाओं की जीत के समाचार सुनाता तो घर का प्रत्येक सदस्य खुश होता। इन दिनों रेडियो की प्रतिष्ठा में और अधिक वृद्धि हो गई थी।
शास्त्रीजी नहीं जानते थे कि यह युद्ध कितना लम्बा चलेगा। उन्होंने नेशरल वार फण्ड की स्थापना की तथा भारत की जनता, पूर्व रियासतों के शासकों एवं बड़े सेठों से अपील की कि भारतीय सेना के लिए धन दें।
रेडियो समाचार सुनाने के साथ-साथ देशभक्ति के गीत बजाता था और जनता से अपील करता था कि भारतीय सेनाओं का हाथ मजबूत करें। शास्त्रीजी की अपील का परिणाम था कि सन् बांसठ में चीन के हाथों चोट खाया हुआ भारत सन् पैंसठ में अपने घावों पर मरहम लगाने के लिए एकजुट हो गया।
माँ बताती थीं कि लोगों ने भारतीय सेनाओं के लिए खुले हाथों से सोना, चांदी, रुपए, कपड़े और बर्तन एकत्रित किए थे। हजारों औरतें घरों में बिस्किट, मठरियां और मिठाइयां बनाकर सेना को भिजवाती थी। मेरी माँ ने भी सैनिकों के लिए स्वेटर और ऊनी मोजे बुनकर भिजवाए थे।
कुछ औरतों ने तो अपने शरीर के सारे गहने सरकारी कारिंदों को यह कहकर दे दिए थे कि शास्त्रीजी सेनाओं के लिए हथियार खरीदें, देश का सिर झुकने न पाए। पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कुछ प्रदेशों की औरतें इस काम में सबसे आगे थीं। जनता द्वारा दिया गया बहुत सा सामान उन लोगों के लिए भी था जिन्हें रातों-रात सीमावर्ती गांवों से हटाकर सुरक्षित शिविरों में स्थानांतरित किया गया था।
शास्त्रीजी ने पूर्व रियासतों के राजाओं से भी अपील की थी कि वे देश की सेनाओं का हाथ मजबूत करें किंतु पूर्व भारतीय रियासतों के राजाओं ने इस अपील के प्रति अधिक उत्साह नहीं दिखाया। कहा जाता है कि इस पर लाल बहादुर शास्त्री हैदराबाद गए तथा उन्होंने हैदराबाद के निजाम से भारतीय सेनाओं के लिए सहयोग मांगा।
यह वही निजाम था जो 1947 में किसी भी कीमत पर भारत में नहीं मिलना चाहता था और जिसे बाद में सरदार पटेल ने पुलिस कार्यवाही करके भारत में सम्मिलित किया था। जब शास्त्रीजी हैदराबाद पहुंचे तो निजाम ने इसे अपने लिए स्वर्णिम अवसर समझा और 1947 में की गई अपनी छवि को सुधारते हुए उसने नेशनल वार फण्ड में 5000 किलो सोना प्रदान किया।
पूरे युद्ध के दौरान शास्त्रीजी हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। उन्हीं दिनों शास्त्रीजी द्वारा दिए गए नारे ‘जय जवान जय किसान’ ने देश के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्पर्श किया था।
दुर्भाग्य से रूस के दबाव में इस युद्ध को बीच में ही रोक दिया गया और कुछ ही दिनों बाद ताशकंद में शास्त्रीजी का रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया। भारत अपनी विजय का उत्सव न मना सका। रेडियो ने ही शास्त्रीजी की मृत्यु का दुःखद इतिहास पूरी दुनिया को दिया था। इन्हीं परिस्थितियों में नेहरूजी की पुत्री इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं।
देश में एक बार फिर वैचारिक द्वंद्व उठ खड़ा हुआ। हर कोई यह जानना और बताना चाहता था कि इस संसार में कौन सा देश भारत का दोस्त है और कौन सा दुश्मन! शास्त्रीजी को किसने और क्यों मारा है तथा इंदिरा गांधी को किसने और क्यों प्रधानमंत्री बनवाया है! इस विचित्र से परिदृश्य में रेडियो सरकारी सूचनाएं परोसकर किसी तरह अपना दायित्व निभा रहा था।
ये सब बातें मैंने अपने माता-पिता के मुँह से सुनी थीं, इनमें से ऐसा कुछ नहीं है जो मेरी स्वयं की स्मृति का हिस्सा हो!
आठ-नौ साल की उम्र के आसपास अर्थात् जिस समय मैंने कुछ सोचना-समझना आरम्भ किया, या यूं कहें कि जीवन के जिस हिस्से के कुछ प्राचीनतम दृश्य मुझे आज भी याद हैं, उन दिनों लोग सरकारी राशन की दुकान से लाल गेहूं, सूती कपड़ा, मिट्टी का तेल और चीनी खरीदने के लिए सरकारी राशन की दुकानों पर लाइनें लगाकर खड़े रहते थे। उन दिनों बहुत समय तक मिट्टी का तेल केवल राशन की दुकान पर ही मिलता था। इसलिए देश के हर मध्यमवर्गीय व्यक्ति को इन लाइनों में खड़ा होना ही था। इनमें से कुछ लाइनों का हिस्सा मैं भी, अपने कॉलेज के दिनों में रहा था। इन दिनों में रेडियो समाचार सुनने के लिए कम, गीत सुनने के लिए अधिक प्रयुक्त होने लगा था।
ई.1971 की सर्दियों में पश्चिमी पाकिस्तान की सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान की जनता को रौंदना आरम्भ किया। पूर्वी पाकिस्तान के लाखों लोग भाग-भाग कर भारत में घुसने लगे। इस खूनी-कलह का सार केवल इतना था कि बंगलाभाषी मुसलमानों पर पंजाबी बोलने वाले मुसलमानों ने अमानवीय जुल्म ढहाए थे।
अभी दुनिया ढाका से आने वाले इन समाचारों के निहित अर्थों को समझने का प्रयास कर ही रही थी कि इंदिरा गांधी ने बंगलादेश में मुक्तिवाहिनी उतारकर पूरी दुनिया को अचम्भित कर दिया। रेडियो इन समाचारों को विस्तार से सुनाता था और भारत की जनता हर समय रेडियो से कान लगाए रहती थी। जब तक अखबार छपकर आते थे, तब तक तो भारत की सेना और आगे बढ़ चुकी होती थी। इसलिए रेडियो अखबारों पर भारी पड़ रहा था और जनमानस पर हावी हो रहा था।
1971 की उन सर्दियों में भारत की सेनाओं ने पाकिस्तानी सेनाओं को जमकर ठोका-पीटा और नब्बे हजार पाकिस्तानी सैनिकों की कमर में रस्सियां बांधकर उन्हें घुटनों पर ला दिया। विश्व के मानचित्र पर बांगलादेश नामक नवीन देश का जन्म हुआ। मैं उस समय केवल साढ़े नौ साल का था, फिर भी मुझे धुंधला सा स्मरण है कि मैंने भारत की मुक्तिवाहिनी की विजय, पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण, शेख मुजीबुर्रहमान की सरकार का गठन आदि घटनाओं के समाचार बड़ी उत्सुकता से उसी रेडियो पर सुने थे जिसे मेरे पिता ने मेरे जन्म से भी दो साल पहले अपने साढ़े पांच माह के वेतन के बदले खरीदा था।
रेडियो पर आने वाले इन समाचारों का अर्थ मेरे लिए केवल इतना होता था कि भारत ने अपने दुश्मनों को हरा दिया है। वह दुश्मन कौन था और हमारे घर से कितनी दूर बैठा था, मैं नहीं जानता था! उस दौर में मेरी समझ का हाल यह था कि मेरा पूरा विश्वास था कि हमारे बड़े से रेडियो के भीतर छोटे-छोटे आदमी और औरत बैठे हैं जो सुबह, दोपहर और शाम को समाचार सुनाते हैं। रेडियो के भीतर बैठे वही लोग कभी-कभी गीत भी गाते हैं और ढोलक बजाते हैं। जब मैं, हमारे कस्बे तक चले आए बंगला शरणार्थियों को सिर पर पोटलियां धरकर चलते हुए देखता और हैण्डपम्पों पर भीड़ लगाए हुए देखता तो मुझे लगता था कि ये लोग हमारे रेडियो से ही निकलकर बाहर आए हैं।
1971 की गौरवशाली विजय के पश्चात् देश में एक बार फिर वैचारिक गदर मचा। यह वैचारिक गदर जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिखाई गई कायरता और उनकी बेटी इंदिरा गांधी द्वारा दिखाए गए साहस को लेकर मचा था। लोग कहना, सुनना और बताना चाहते थे कि पिता-पुत्री की नीतियों में इतना अंतर क्यों है!
भारत के इस अद्भुत पराक्रम के लिए कुछ लोगों ने इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार तक कहा। निश्चित रूप से साहसपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व एवं देश की सेनाओं द्वारा दिखाए गए इस पराक्रम से भारत की जनता का मनोबल ऊँचा हुआ था, जिसकी चर्चा हमारी कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षक, पड़ौस में रहने वाले बूढ़े-बुजुर्ग और घर के वरिष्ठ सदस्य किया करते थे।
इंदिरा गांधी द्वारा दिखाए गए इस पराक्रम के उपरांत भी, भारत के लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों के गीत ‘बाकी जो बचा था महंगाई मार गई’ उन दिनों की वास्तविकता का वर्णन बहुत सटीक रूप से करते थे।
मुझे आज भी याद है, यह गीत हमारे उस रेडियो पर दिन में कई बार बजा करता था। महंगाई और बेरोजगारी को लेकर देशभर में हर कहीं बहस होती थी। रेल के डिब्बों, बसों, पान की दुकानों तथा चाय की थड़ियों पर होने वाली ये चर्चाएं इतनी गर्म और जोरदार होती थी कि वर्तमान समय में टेलिविजन के पर्दे पर होने वाली बहसें उनके सामने फूहड़ता से भरा शोर मात्र लगती हैं। आकाशवाणी के साथ-साथ बीबीसी और रेडियो सीलोन भी उस युग में काफी लोकप्रिय थे।
वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा हारने के बाद, देश में अचानक आपातकाल लगा दिया। जिस दिन देश में आपातकाल की घोषणा हुई, उस दिन के कुछ दृश्य मुझे आज भी स्मरण हैं। मैंने इस आपातकाल की घोषणा अपने पिताजी के कमरे में रखे उसी रेडियो पर सुनी थी।
इस समय तक मेरी समझ का दायरा कुछ बढ़ चुका था और मैं समझ पा रहा था कि इस बार देश में ऐसा वैचारिक तूफान उठा है कि पूरा देश ही दो वैचारिक खेमों में बंट गया है। कुछ लोग इंदिरा गांधी को अब भी दुर्गा मानने पर अड़े थे तो कुछ लोग इंदिरा गांधी को तानाशाह बताकर उनकी घनघोर आलोचना किया करते थे।
1977 में इमरजेंसी के दौरान ही लोकसभा चुनाव हुए। मुझे आज भी याद है कि जब माँ और पिताजी वोट डालकर आए मैंने अपनी माँ से पूछा था कि आप कहाँ गई थीं! इस प्रश्न का जवाब मेरे पिताजी ने दिया था। उस जवाब का छोटा सा हिस्सा मुझे आज भी याद है- ‘तेरी माँ जॉर्ज फर्नाण्डीस को जेल से बाहर निकालने गई थी।’
20 मार्च 1977 को मतगणना आरम्भ हुई तो पूरा देश रेडियो से चिपक कर बैठ गया। मेरे पिताजी भी पूरी रात जागकर चुनाव परिणाम सुनते रहे। मैं भी पिताजी के साथ जागता रहा। 21 मार्च की प्रातः तीन-चार बजे के बीच में आखिर वह परिणाम आया जिसकी प्रतीक्षा में पूरा देश पूरी रात जागता रहा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं।
मुझे ऐसा याद पड़ता है कि भारत भर के रेडियो स्टेशनों द्वारा यह समाचार आकाशवाणी इलाहाबाद से रिले किया गया था। इस समाचार प्रसारण के कुछ ही देर बाद देश से आपतकाल समाप्त होने की घोषणा की गई। आकाशवाणी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की समाचार वाचिका ने इस समाचार को पढ़ने के बाद जो गीत प्रसारित किया था, उसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। वह गीत था- गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाए। युग-युग से इस देश की माटी तुझसे जीवन पाए।
मेरे पिताजी का मानना था कि उद्घोषिका ने वह गीत अनायास ही नहीं प्रसारित किया था, अपितु तानाशाही पर लोकशाही की विजय के उपलक्ष्य में सोच-समझ कर प्रसारित किया था।
उस समय सुबह के चार बजे नहीं थे, पौ फटने में कुछ देर थी किंतु लगता था जैसे पूरे देश में उजाला हो गया था। लोग इस समाचार को सुनकर कितने प्रसन्न थे, इस बात का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उस दिन छोटे-छोटे गांवों, कस्बों एवं नगरों में इंदिरा गांधी की पराजय का उत्सव मनाया गया। उस दिन गली मुहल्लों में कोई भी चुपचाप नहीं चल रहा था। लोग जोर-जोर से बोल रहे थे और उनकी बातें खत्म होने को नहीं आती थीं।
अगले दिन जनता पार्टी के नेताओं ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विजय उत्सव का आयोजन किया जिसमें मोरारजी भाई, जगजीवनराम, चौधरी चरणसिंह, अटलबिहारी वाजपेई तथा शाही इमाम आदि नेताओं ने लम्बे-लम्बे भाषण दिए थे। इन भाषणों का प्रसारण मैंने हमारे घर के रेडियो पर ही सुना था। जिस समय अटलजी का भाषण आरम्भ हुआ तो मैंने हैरत से देखा कि अटलजी द्वारा बोले जा रहे भाषण की बहुत सी पंक्तियाँ मेरे पिताजी पहले ही बोल देते थे, उन्हें पूरा अनुमान था कि अटलजी अगली पंक्ति में क्या बोलने वाले हैं!
मुझे आज भी याद है कि इसी कार्यक्रम में दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम ने देश के नए प्रधानमंत्री मोरारजी भाई को छड़ी दिखाते हुए कहा था कि यदि इस सरकार ने पुरानी सरकार वाली गलती दोहराई तो यह छड़ी उन्हें भी नहीं बक्शेगी। जब शाही इमाम द्वारा बोली गई यह पंक्ति रेडियो पर प्रसारित हुई तो बहुत से लोगों को शाही इमाम द्वारा छड़ी उठाकर प्रधानमंत्री की ओर संकेत करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। कुछ ऐसी ही राय मेरे पिताजी की भी थी।
बदले की आग में झुलसती, अपने-अपने अहंकारों के लिए लड़ती, भिन्न-भिन्न राजनीतिक विचारों वाले नेताओं द्वारा गठित मोरारजी भाई की यह सरकार बड़ी मुश्किल से ढाई साल चली और रेडियो पर नेताओं के बीच जूतियों में दाल बंटने के समाचार आने लगे। अंत में यह सरकार बिना किसी विशेष कारण के धड़ाम से गिर गई। इस बीच इंदिरा गांधी जेल गईं, बाहर आईं, चुनाव जीतीं और फिर से प्रधानमंत्री बन गईं। ये सारे समाचार मैंने अपने घर में रखे फिलिप्स के उसी रेडियो पर सुने थे।
मुझे याद है कि इस दौर में पूरे देश में रेडियो और अखबार पूरे जोश से सुने और पढ़े जा रहे थे। रेडियो पर समाचार सुनने वालों को, रेल्वे स्टेशन पर अखबार खरीदकर पढ़ने वालों को और बुकस्टाल पर खड़े होकर पुस्तकें टटोलने वालों को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता था। बहुत से लोग घरों में सुविधा न होने के कारण निकट के वाचनालयों एवं पुस्तकालयों में जाकर अखबार एवं पुस्तकें पढ़ा करते थे और उनमें लिखी बातों पर अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों से चर्चा किया करते थे।
रेडियो भी इन दिनों तेजी से फैल रहा था। पान की थड़ियों एवं बहुत से वाचनालयों में तो रेडियो बजता ही था, बहुत से नगरों में नगरपालिकाएं प्रमुख चौराहों पर भोंपू लगाकर आकाशवाणी के समाचार सुनवाया करती थीं जिन्हें सुनने के लिए सड़कों पर चलते हुए लोग, रुक जाया करते थे। बहुत से पनवाड़ियों की दुकानें तो इसलिए चल निकली थीं कि बहुत से बूढ़े-बुजुर्ग और नौजवान, नियमित रूप से पान खाने के बहाने उन दुकानों पर आते थे और देर तक खड़े रहकर रेडियो पर प्रसारित होने वाले समाचार सुनते थे।
पनवाड़ियों की देखादेखी बहुत से नाइयों ने भी अपनी दुकानों में रेडियो बजाने और अखबार मंगवाने का चलन आरम्भ कर दिया था ताकि रेडियो सुनने और अखबार पढ़ने के आकर्षण में आने वाले ग्राहकों से उनकी दुकानदारी चलती रहे। कुछ रेलवे स्टेशनों एवं बस-स्टैण्डों पर भी रेडिया के समाचार प्रसारित हुआ करते थे।
मुझे याद है कि मैंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत से भाषण, वक्तव्य और साक्षात्कार सड़कों के किनारे, अपनी साइकिल रोककर सुने थे। कई बार सड़क के शोर के कारण कोई पंक्ति सुनाई नहीं देती थी, तब तेजी से साइकिल चलाकर घर पहुंचता था ताकि उस समाचार को अगले बुलेटिन में ढंग से सुना जा सके। जब रेडियो का समाचार वाचक अपनी सधी हुई आवाज में उद्घोषणा करता- ‘ये आकाशवाणी है, अब आप इंदुवाही (या देवकीनंदन पाण्डे) से समाचार सुनिए’ तो ऐसा लगता था मानो पूरे देश में कर्फ्यू लग गया है।
23 मई 1980 को इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हुई। संजय गांधी स्वयं ही उस विमान को उड़ा रहे थे। मुझे याद है, उस दिन मैं अपने स्कूल में था। दोपहर का समय था, कक्षाएँ चल रही थीं, इस दौरान किसी ने किसी से शायद ही कोई बात की होगी। जैसे ही रेसिस हुआ और हम लोग क्लासेज से बाहर निकले, एक अजीब सी बेचैनी पूरे स्कूल में फैल गई।
सब लोग दौड़कर पास के बीएड कॉलेज में जाने लगे। पूछने पर ज्ञात हुआ कि बीएड कॉलेज में एक अखबार आया है जिसमें लिखा है कि संजय गांधी की मृत्यु हो गई। हमारी क्लास भी बीएड कॉलेज की तरफ भागी और तब तक वहाँ से नहीं हिली जब तक कि यह समाचार क्लास के लड़कों ने अपनी आंखों से पढ़ नहीं लिया। मैं तो वहीं से घर चला गया और रेडियो खोलकर बैठ गया। खबर सही थी और दिन भर रह-रह कर रेडियो से प्रसारित होती रही।
1984 की गर्मियों में मैंने ग्रेजुएशन कम्पलीट कर लिया और मैंने पोस्टग्रेजुएशन के लिए दाखिला ले लिया। इसके साथ ही मैं नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। सामान्यज्ञान के पेपर के लिए मैंने अपने घर में रखे रेडियो को अपना गुरु बनाया।
उस काल में कोचिंग सेंटर नहीं होते थे किंतु आकाशवाणी तथा बीबीसी से प्रसारित होने वाली बहुत सी रिपोर्टों में जो सूचनाएं, तार्किक विश्लेषण तथा सारगर्भित टिप्पणियां होती थीं, वैसी सामग्री तो आज कोचिंग सेंटरों में भी नहीं दी जाती। मैं मानता हूँ कि मेरी नौकरी लगने में फिलिप्स के उस रेडियो पर प्रसारित होने वाली रिपोर्टों का बहुत बड़ा हाथ था। इतना बड़ा कि मुझे एक भी दिन की बेरोजगारी नहीं झेलनी पड़ी।
3 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई, वह हृदयविदारक समाचार मैंने अपने घर के रेडियो पर ही सुना था। दुर्योगवश 4 अक्टूबर को मुझे बैंक अधिकारी की परीक्षा में बैठने के लिए गंगानगर जाना था। पूरे देश में सिक्खों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा था, इसलिए बहुत सी जगह दंगे फूट पड़े थे और परीक्षा का स्थगित हो जाना अवश्यम्भावी था। मैं पूरे दिन इस आशा में रेडियो से चिपका रहा कि यदि परीक्षा स्थगित होगी तो उसकी सूचना रेडियो पर अवश्य आएगी।
पूरे दिन हमारा रेडियो राजीव गांधी के विदेश से भारत लौटने, प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तथा बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलने के बारे में बताता रहा। फिर भी मैंने धैर्य नहीं खोया। शाम सात बजे के प्रादेशिक समाचार बुलेटिन में अगले दिन की बैंक परीक्षा के स्थगित होने की सूचना था। परीक्षा आयोजन की अगली तिथि की सूचना भी कुछ दिनों बाद मुझे घर में रखे फिलिप्स के उसी पुराने रेडियो से मिली थी।
वर्ष 1984 की सर्दियां खत्म होते-होते मेरी नौकरी गंगानगर में बैंक अधिकारी के पद पर लगी। संयोगवश वहाँ मेरा परिचय भारत की आजादी के समय हुए विभाजन के कारण पाकिस्तान से आए श्री सुदेश वर्मा और उनके परिवार से हुआ। गंगानगर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही गोल मार्केट में वर्मा परिवार की फिलिप्स रेडियो की एक बड़ी सी दुकान और वर्कशॉप हुआ करती थी। पूरा वर्मा परिवार अर्थात् स्वयं सुदेश वर्माजी, उनकी धर्मपत्नी कैलाशजी (अब दोनों ही स्वर्गस्थ) और उनके पुत्र नरेशजी उस दुकान और वर्कशॉप को चलाया करते थे। दुकान पर कई कर्मचारी थे जो फिलिप्स के रेडियो की मरम्मत करने में माहिर थे।
उन दिनों यह दुकान मेरे लिए आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र बन गई थी। इसका कारण यह था कि वर्माजी की वर्कशॉप में रिपेयरिंग के लिए आने वाले रेडियो सैट में कभी-कभी मुझे अपने पैतृक घर में रखे फिलिप्स के बड़े से रेडियो वाला मॉडल भी दिखाई दे जाता था। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो आजादी के बाद के भारत का इतिहास मेरी आंखों के सामने जीवंत हो गया है। रेडियो के उस मॉडल को देखने के लालच में, मैं सप्ताह में एक-दो चक्कर तो उस वर्कशॉप के लगा ही लेता था।
वर्ष 1986 में हमारे घर में टेलीविजन का पदार्पण हुआ। तब टेलीविजन के कार्यक्रम सुबह-शाम कुछ समय के लिए ही प्रसारित होते थे। इस कारण आगे के कुछ सालों बाद तक भी रेडियो अपनी जगह पर मोर्चा जमाए बैठा रहा किंतु जैसे-जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों के प्रसारण के घण्टे बढ़ते गए, रेडियो का बोलना कम होता गया।
फिर भी रेडियो का आकर्षण मेरे मन से गया नहीं। यहाँ तक कि साढ़े चार साल तक बैंक अधिकारी की नौकरी करने के बाद ई.1989 में मैंने बैंक छोड़कर रेडियो में प्रसारण अधिकारी की नौकरी कर ली। अब रेडियो सुनना ही मेरी नौकरी हो गई। इसलिए फिलिप्स का वह रेडियो एक बार फिर पूरे जोश से बजने लगा।
वर्ष 1992 में रंगीन टेलीविजन ने घर में सेंध लगाई। मैंने भी उसी साल आकाशवाणी की नौकरी छोड़ दी। संभवतः उसी समय से हमारे घर में रखा वह रेडियो नेपथ्य में जाने लगा। अब वह बहुत कम खोला जाता था। जिन न्यूज बुलेटिनों के बल पर रेडियो, घर में कर्फ्यू जैसा वातावरण बना देता था, अब न्यूज बुलेटिनों के लिए रेडियो को याद तक नहीं किया जाता था।
लगता था जैसे रेडियो भी अब विश्राम लेना चाहता था। पता नहीं कब वह रेडियो पूरी तरह चुप हो गया और कहा नहीं जा सकता कि वह कौनसी तिथि थी जब रेडियो पिताजी के कमरे से निकल कर कबाड़घर में पहुंच गया! यह सब इस तरह से हुआ जैसे कुछ हुआ ही नहीं था! यह संसार की सबसे बड़ी मौन क्रांति थी। एक बादशाह अपनी रियासत से रुखसत हो गया और किसी को कानोंकान खबर तक न हुई!
वर्ष 2004 में मेरे माता-पिता ने अपना आलीशान बड़ा सा घर बेचकर हम तीनों भाइयों के लिए तीन सुवधिाजनक घर खरीदने का निर्णय लिया। माँ ने तय किया कि घर का बहुत सा पुराना सामान जो भविष्य में काम आने वाला नहीं है, कबाड़ी को बेच दिया जाए। माँ ने ऐसा बहुत सा सामान निकलवाकर घर के लॉन में जमा करवाया। संयोगवश मेरी दृष्टि फिलिप्स के उस रेडियो पर पड़ी जो दूसरे कबाड़ के बीच मुंह छिपाए बैठा था। मुझे लगा जैसे रेडियो हमसे आंखें चुराने के लिए ही कबाड़ के बीच छिप सा गया था।
कबाड़ी ने उस रेडियो की कीमत प्लास्टिक के कबाड़ की दर से, साढ़े पांच रुपए लगाई। सोलह वर्षीय विजय भी वहीं पर बैठा था। उस साल उसने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
मैंने विजय को बताया- ‘जिस रेडियो की कीमत यह कबाड़ी साढ़े पांच रुपए लगा रहा है, उसे तुम्हारे बाबा ने मेरे जन्म से भी पहले, अपने साढ़े पांच महीने के वेतन से खरीदा था। यदि उन्होंने उस समय यह रेडियो न लेकर चांदी खरीदी होती तो उसकी कीमत आज 30 हजार रुपए होती, यदि सोना लिया होता तो उसकी कीमत 28 हजार रुपए होती और यदि कोई भूखण्ड लिया होता तो आज उसकी कीमत कम से कम साढ़े पांच करोड़ रुपए होती।‘ करोड़ों का रेडियो सुनकर विजय की हैरानी का पार न था।
मुझे पूछना नहीं चाहिए था किंतु फिर भी जाने क्यों मैंने विजय से पूछ लिया- ‘तुम्हारे बाबा ने यह रेडियो खरीद कर सही किया या गलत?’ मेरे इस प्रश्न का विजय ने कोई जवाब तो नहीं दिया किंतु उसके चेहरे पर असमंजस भरी गहरी मुस्कुराहट उभरी जिसने मुझे थोड़ी देर के लिए असहज कर दिया।
अंत में मैंने ही कुछ सोचकर उसे अपने प्रश्न का जवाब दिया- ‘यदि तुम्हारे बाबा ने यह रेडियो नहीं खरीदा होता तो हो सकता है कि आज इस कबाड़ी की जगह मैं बैठा हुआ होता।’ विजय के चेहरे की मुस्कुराहट गायब हो गई थी किंतु अब मैं असहज बिल्कुल नहीं था। इस प्रश्न का सबसे सही उत्तर घर में मेरे अतिरिक्त और कौन दे सकता था!
जब कबाड़ी ने फिलिप्स का वह बड़ा सा रेडियो अपनी बोरी में डाला तो कलेजे में एक टीस सी उठी थी। समय कितना निर्मम है, चाहे कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो, समय किसी को उसकी जगह पर नहीं बने रहने देता! कुछ साल हुए जब गंगानगर के सुदेश वर्माजी के परिवार ने फिलिप्स रेडियो की अपनी दुकान और वर्कशॉप भी कई साल पहले ही बंद कर दी थी। फिलिप्स कम्पनी ने भी कई साल पहले रेडियो बनाना बंद कर दिया था। अब तो फिलिप्स के वे बड़े से रेडियो बूढ़ी हो चुकी पीढ़ी की स्मृतियों में ही शेष बचे हैं।
कैम्पिस नामक एक चिंतक का कहना था कि अपना कोट बेच कर भी पुस्तकें खरीदिए ! कोट के अभाव में शरीर को ठण्ड के कारण कष्ट होगा किंतु पुस्तकों के अभाव में आत्मा भूखी मर जाएगी !
मैं बीसवीं सदी के उस दौर में पैदा हुआ जिसमें पुस्तक पढ़ने वाले व्यक्ति को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता था। उस दौर में बहुत से लोग पुस्तकें पढ़ा करते थे और उनमें लिखी बातों पर अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों से चर्चा किया करते थे। कुछ लोग नियमित रूप से पुस्तकालय जाया करते थे।
उस दौर में स्कूलों एवं कॉलेजों के अलावा भी बहुत से सरकारी कार्यालयों, धर्मशालाओं एवं क्लबों में छोटे-बड़े वाचनालय एवं पुस्तकालय हुआ करते थे। मौहल्लों में भी कुछ उत्साही समाजसेवी पुस्तकालय एवं वाचनालय चलाया करते थे। पुस्तकें कम थीं, साक्षरता की दर भी कम थी किंतु पुस्तकें पढ़ने वाले तथा पुस्तक पढ़ने की चाहत रखने वाले बहुत थे। अब रेडियो ने बड़ी तेजी से लोगों के घरों में घुसना आरम्भ कर दिया था।
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बहुत सी पढ़ी-लिखी गृहणियां भी दुपहरी के खाली समय में कोई पुस्तक पढ़ा करती थीं। मेरी माँ अपने गांव के स्कूल में केवल पांचवी कक्षा तक पढ़ी थीं किंतु वे अस्सी साल की आयु होने तक पुस्तकें पढ़ती रहीं। मेरी दादी, नानी और ताई तीनों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा था किंतु तीनों प्रतिदिन स्नान करके रामायण पढ़ा करती थीं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि विगत साठ सालों में पुस्तक आम आदमी की जिंदगी से बाहर हो गई है! अब लोग टेलिविजन देखते हैं, सोशियल मीडिया पर समय व्यतीत करते हैं, क्रिकेट का मैच देखते हैं, गृहणियां खाली समय में सास-बहू के सीरियल देखती हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय सूने पड़े हैं। क्लबों, धर्मशालाओं और मोहल्लों में अब पुस्तकालय नहीं होते। सारी जिंदगी जैसे सैलफोन और टेलिविजन में घुस गई है। मनुष्य के जीवन से पुस्तकों का दूर हो जाना किसी समाज के लिए घातक है। पुस्तकें मनुष्य के लिए कितनी आवश्यक हैं, इस बात का अनुमान स्वामी विवेकानंद के एक कथन से लगाया जा सकता है। वे कहा करते थे कि मैं नर्क में भी रहना पसंद करूंगा यदि वहाँ अच्छी पुस्तकें हों। एमर्सन नामक एक पाश्चात्य दार्शनिक कहा करते थे कि पुस्तकों का स्नेह ईश्वर के राज्य में पहुँचने का विमान है।
सुप्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो ने कहा है कि अच्छी पुस्तकों को घर में इकट्ठा करना मानो घर को भगवान का मंदिर बना लेना है। कार्लाईल ने तो यहाँ तक लिखा है कि जिन घरों में अच्छी किताबें नहीं वे घर जीवित शवों के रहने के कब्रिस्तान हैं। कैम्पिस नामक एक चिंतक का कहना था कि अपना कोट बेच कर भी पुस्तकें खरीदिए ! कोट के अभाव में शरीर को ठण्ड के कारण कष्ट होगा किंतु पुस्तकों के अभाव में आत्मा भूखी मर जाएगी!
वस्तुतः अच्छी पुस्तक किसी भी मनुष्य की ऐसी मित्र है जो प्रत्येक कदम पर मनुष्य का भला करती है तथा उसका मार्गदर्शन करती है। मैं कहता हूँ कि आप किसी भी बुरे समाज को कुछ अच्छी पुस्तकें दीजिए और बहुत कम अवधि में एक अच्छा समाज प्राप्त कर लीजिए।
भले ही आज भारतीय समाज में पुस्तकों के लिए पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा है, फिर भी बहुत से युवा हैं जो सोशियल मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लिए करते हैं। यह अंधेरे में उजाले की किरण है जो पुस्तक प्रेम को कभी मरने नहीं देगी हालांकि इस दुनिया में किसी भी अपना कोट बेच कर पुस्तकें खरीदते हुए नहीं देखा गया किंतु फिर भी कहावत तो अपनी जगह बनी रहेगी- कोट बेच कर भी पुस्तकें खरीदिए !
प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके एक से अधिक अर्थ होते हैं। ऐसे शब्दों को अनेकार्थक शब्द कहा जाता है। यदि अनेकार्थक शब्दों को समुचित संदर्भ में ग्रहण नहीं किया जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। तेतीस करोड़ देवता होने का मिथक भी ऐसा ही अनर्थ है।
यह श्लोक बृहदारण्यकोपनिषद के तृतीय अध्याय के नवम ब्राह्मण में आया है। इस श्लोक में शाकल्य नामक एक ब्राह्मण द्वारा ब्रह्म के विषय में महर्षि याज्ञवलक्य से पूछे गए कुछ प्रश्नों तथा महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा दिए गए उत्तरों का उल्लेख किया गया है।
शाकल्य पूछता है कि वेदों में देवताओं के अनेक दिव्य स्वरूपों एवं शक्तियों का वर्णन किया गया है। क्या वास्तव में इतने सारे देवता हैं?
इस पर याज्ञवलक्य ऋषि शाकल्य को 33 कोटि देवताओं के बारे में बताते हैं। पाठकों की सुविधा के लिए हमने बृहदारण्यकोपनिषद के इस वर्णन को संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है।
याज्ञवल्क्य : ये तो इनकी महिमाएं ही हैं। देवगण तो तैंतीस ही हैं।
शाकल्य : वे तेतीस देव कौन-कौन से हैं?
याज्ञवल्क्य : आठ वसु, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, ये इकत्तीस देवगण हैं। इंद्र और प्रजापति सहित कुल तेतीस देवता हैं।
शाकल्य : वसु कौन हैं?
याज्ञवल्क्य : इस सृष्टि में अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र नामक आठ वसु हैं।
टिप्पणी : ज्ञातव्य है कि इनमें से प्रथम चार (अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष) को पंचभूतों में भी सम्मिलित किया गया है, जल पांचवा पंचभूत है।
शाकल्य : रूद्र कौन हैं?
याज्ञवल्क्य : पुरुष में दस प्राण और ग्यारहवां मन रूद्र हैं। चूंकि मरणशील शरीर से उत्क्रमण करते समय ये मनुष्य तथा उसके सम्बन्धियों को रोदन करवाते (रुलाते) हैं, इसलिए इन्हें रूद्र कहते हैं।
टिप्पणी : ज्ञातव्य है कि उपनिषदों में मनुष्य शरीर में स्थित पांच ज्ञानेन्द्रियों (आंख, कान, नाक, त्वचा और जीभ) तथा पांच कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर, वाणी, मलद्वार तथा प्रजनन इन्द्रिय) को दस प्राण कहा जाता है। मन को ग्यारहवां प्राण माना जाता है।
शाकल्य : आदित्य कौन हैं?
याज्ञवल्क्य : संवत्सर के अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं, क्योंकि ये सबका आदान करते हुए चलते हैं।
टिप्पणी : जहाँ उपनिषदों में बारह मास को बारह आदित्य कहा गया है, वहीं पुराणों में अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है। जिनके नाम मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, विवस्वान्, भग-आदित्य, इन्द्र, विष्णु, पर्जन्य, पूषा तथा त्वष्टा हैं। इस प्रकार स्वयं भगवान विष्णु भी अदिति के पुत्र हैं।
वामन बारहवें ‘आदित्य’ माने जाते हैं। अदितेः अपत्यं पुमान् आदित्यः। अदिति को देवमाता तथा आदित्यों को देवता कहा जाता है। संस्कृत भाषा में अदिति का अर्थ होता है ‘असीम’ अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। पुराणों के अनुसार अन्तरिक्ष में द्वादश आदित्य भ्रमण करते हैं, वे अदिति के पुत्र हैं।
अदिति के पुण्यबल से ही उसके पुत्रों को देवत्व प्राप्त हुआ। यह आख्यान इस ओर संकेत करता है कि विश्व की समस्त नियामक एवं निर्माणकारी शक्तियाँ एक ही माता से उत्पन्न हुई हैं जिसे ‘अदिति’ कहा गया है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उपनिषदों में जिन तेतीस कोटि देवताओं का उल्लेख हुआ है, उनका आशय 33 प्रकार अथवा 33 श्रेणी के देवताओं से है। कोटि का अर्थ ‘करोड़’ ही नहीं होता, ‘प्रकार’ अथवा ‘श्रेणी’ भी होता है। जैसे कि ‘उच्चकोटि’ का अर्थ है ‘उच्चश्रेणी’। कुछ लोग भ्रमवश तेतीस कोटि देवता को तेतीस करोड़ देवता मान लेते हैं।
उपनिषद में आए ये तेतीस कोटि देवता अंतरिक्ष से लेकर हमारे शरीर के भीतर व्याप्त हैं। अर्थात् आठ वसु सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। ग्यारह रूद्र हमारे शरीर में स्थित हैं। बारह आदित्य सृष्टि को संचालित करने वाला समय है जो बारह महीनों के रूप में हमारे अनुभव में आता है। इंद्र और प्रजापति को मिलाकर कुल 33 कोटि देवता होते हैं। इस प्रकार तेतीस करोड़ देवता नहीं हैं, तेतीस कोटि देवता हैं।
मंत्र का गूढ़ार्थ
यदि इस मंत्र में छिपे गूढ़ आशय को और अधिक स्पष्ट करें तो हम पाते हैं कि महर्षि याज्ञवलक्य कहते हैं कि 8 वसुओं से सम्पन्न सृष्टि के भीतर रहने वाला 11 प्राणों (इंद्रियों) वाला शरीर 12 मास के समय चक्र से बंधा हुआ रहकर कर्म करता है और अपने कर्मों के अनुसार इंद्र एवं प्रजापति द्वारा प्रदत्त कर्मफल भोगता है।
अनारकली कौन थी, कहाँ से आई थी और किसकी पत्नी या प्रेमिका थी, मुगल लेखकों ने इस विषय को इतना उलझा दिया कि सच-झूठ का निर्णय करना कठिन हो जाता है। किंतु यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अनारकली पर अधिकार को लेकर लड़े थे अकबर और सलीम!
राजा मानसिंह कच्छवाहा तथा खानेआजम अजीज कोका ने अकबर के आदेश पर सलीम के पुत्र खुसरो को अकबर का उत्तराधिकारी घोषित करने की तैयारी की किंतु रामसिंह कच्छवाहा की सहायता से सलीम अकबर तक पहुंचने में सफल हो गया। अकबर ने अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रख दी।
सलीम ने अपने पिता का सबसे बड़ा एवं एकमात्र जीवित पुत्र होते हुए भी और अपने पिता द्वारा साहिबे आलम अर्थात् अपना उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के उपरांत भी अपने पिता का राज्य छीनने के लिए अपने पिता से बगावत क्यों की तथा उसकी यह बगावत इतनी लम्बी क्यों चली, इस विषय पर किंचित् विचार किया जाना चाहिए।
मुगलों के इतिहास में अकबर के तीन पुत्रों का उल्लेख मिलता है जिन्होंने युवावस्था प्राप्त की थी। इनमें से पहले का नाम सलीम, दूसरे का मुराद एवं तीसरे का दानियाल था। इनमें से सलीम सबसे बड़ा था जिसका जन्म ई.1569 में हुआ था। अकबर के दूसरे पुत्र मुराद का जन्म ई.1570 में तथा तीसरे पुत्र दानियाल का जन्म ई.1572 में हुआ था। अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र होने के कारण अकबर के तख्त पर पहला अधिकार सलीम का ही था। इसलिए सलीम को अपने दोनों छोटे भाइयों से भय नहीं होना चाहिए था।
अकबर के तीन पुत्रों में से केवल सलीम की माता ही किसी राजा की पुत्री थी। सलीम का जन्म आम्बेर की राजकुमारी हीराकंवर के पेट से हुआ था जिसे अकबर ने मरियम उज्जमानी की उपाधि दी थी। मुराद और दानियाल की माताएं मुगलों के महल में काम करने वाली दासियां थीं। इस कारण सलीम को बादशाह बनाने के लिए सलीम का ननिहाल पक्ष पूरी तरह मजबूत था जबकि मुराद और दानियाल के ननिहाल में ऐसा कोई नहीं था जो उन्हें बादशाह बनाने के लिए अकबर को प्रभावित कर सके।
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अकबर के तीनों पुत्र सलीम, मुराद एवं दानियाल पक्के शराबी एवं नशेड़ी थे। उनमें से किसी ने भी कोई भी बड़ा युद्ध नहीं जीता था, उनमें से किसी में भी ऐसी कोई विशेषता नहीं थी जिसके कारण वह अपने शेष दोनों भाइयों की तुलना में, अपने पिता का अधिक स्नेह अर्जित कर सके। इस दृष्टि से भी सलीम को अपने दोनों छोटे भाइयों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं थी।
सलीम और दानियाल दोनों का पालन पोषण सलीम की माता मरियम उज्जमानी अर्थात् आम्बेर की राजकुमारी हीराकंवर ने किया था। वह भी अपने औरस एवं बड़े पुत्र सलीम को छोड़कर सौतेले पुत्रों का पक्ष क्यों लेती! मुराद एवं दानियाल दोनों का निधन अकबर के जीवन काल में ही हो गया था, ऐसी स्थिति में भी सलीम को अपने पिता का राज्य प्राप्त करने के लिए बगावत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इतना सब कुछ होने पर भी सलीम ने अपने पिता के विरुद्ध लगभग पांच साल तक विद्रोह का झण्डा उठाए रखा तथा तीस हजार सैनिक जमा करके अपने पिता के खजानों को लूटता फिरा तो उसका कोई विशेष कारण होना चाहिए।
क्या यह विशेष कारण अनारकली नामक एक दासी थी जिसके पेट से दानियाल का जन्म हुआ था?
मुगलों के इतिहास में मुराद और दानियाल की माताओं के नाम बड़ी ही चालाकी से छिपाए गए हैं। केवल एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी पुस्तक में अनारकली के पुत्र का नाम दानियाल लिखा है। कुछ लोगों का मानना है कि अकबर और सलीम के बीच अनारकली को लेकर तनाव उत्पन्न हुआ था जिसका परिणाम सलीम की बगावत के रूप में सामने आया। कहा जाता है कि अकबर की दासी अनारकली बड़ी ही खूबसूरत थी। उसका वास्तविक नाम नादिरा बेगम था। उसे शर्फुन्निसा भी कहा जाता था। वह अकबर के शासनकाल में व्यापारियों के एक काफिले के साथ ईरान से लाहौर आई थी।
ब्रिटिश पर्यटक विलियम फिंच ई.1608 से 1611 तक लाहौर में रहा था। उसने लिखा है कि अनारकली अकबर की कई पत्नियों में से एक थी। अनारकली से अकबर को एक पुत्र भी हुआ जिसे दानियाल कहा जाता था। अकबर के पुत्र सलीम से अनारकली के सम्बन्धों की अफवाह के कारण अकबर ने अनारकली को लाहौर के दुर्ग में चिनवा दिया। लाहौर में पंजाब सिविल सेक्रेटरिएट के पास सफेद रंग के पत्थरों से बना एक भवन है जिसे अनारकली का मकबरा कहा जाता है। जहाँगीर ने अनारकली की स्मृति में यह मकबरा बनवाया। यह आज भी बहुत अच्छी दशा में है। भवन के ऊपर एक खूबसूरत गुम्बद बना हुआ है तथा चारों कोनों पर गुम्बदाकार गुमटियां हैं। मकबरे के चारों ओर खूबसूरत बाग है।
सैयद अब्दुल लतीफ ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली अकबर की बेगम थी किंतु जहाँगीर से इश्क के चलते उसकी जान गई। मकबरे में स्थित कब्र पर ई.1599 और 1615 की तिथियां हैं जो अनारकली की मृत्यु एवं मकबरा पूर्ण होने की सूचना देती हैं। ई.1599 ही वह वर्ष है जब जहांगीर ने अकबर से पहली बार विद्रोह किया। अर्थात् अनारकली की मृत्यु और जहांगीर की बगावत का वर्ष एक ही है। इससे ब्रिटिश पर्यटक विलियम फिंच तथा सैयद अब्दुल लतीफ द्वारा लिखी गई इन बातों को बल मिलता है कि अनारकली अकबर की बेगम थी किंतु जहाँगीर से इश्क के चलते उसकी जान गई।
ई.1605 में सलीम जहाँगीर के नाम से बादशाह बना। ई.1615 में वह लाहौर आया। उसने लाहौर में अनारकली का मकबरा बनवाया तथा उसकी कब्र पर लिखवाया कि- ‘अगर मैं अपनी महबूबा को एक बार भी पकड़ सकता तो कयामत तक अल्लाह का शुक्रिया करता।’
कन्हैया लाल नामक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली की मृत्यु बीमारी से हुई थी। बाद में अकबर ने उसका मकबरा बनवाया। सिख राजाओं ने उसे तुड़वा दिया और अंग्रेजों ने उस पर चर्च बनवा दिया। कन्हैयालाल का वर्णन सही प्रतीत नहीं होता जबकि सैयद अब्दुल लतीफ के विवरण अधिक सही जान पड़ते हैं क्योंकि मकबरे के शिलालेख, मकबरे के होने की सूचना देते हैं न कि चर्च की। आज भी वहाँ मेहराबों, गुम्बद एवं बुर्जों से युक्त एक आलीशान मकबरा बना हुआ है।
अकबर ई.1605 में मर गया था जबकि मकबरे पर शिलालेख की तिथि ई.1615 की है। अर्थात् यह मकबरा अकबर ने नहीं बनवाया था अपितु जहांगीर ने बनवाया था। विलियम फिंच तथा सैयद अब्दुल लतीफ द्वारा लिखे गए विवरणों और अनारकली के मकबरे पर लगे शिलालेख के भावुक शब्द यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त हैं कि अकबर की एक दासी जिसका नाम अनारकली था, वह अकबर के एक पुत्र की माता थी। जब सलीम जवान हुआ तो वह इसी दासी से प्रेम करने लगा जिसके कारण अकबर ने अनारकली की हत्या करवाई।
निश्चित रूप से अनारकली जहांगीर से उम्र में काफी बड़ी रही होगी! इस बात की काफी संभावना है कि अनारकली की हत्या से उन्मादी होकर ही जहांगीर ने अपने पिता अकबर को जहर देने एवं उसके विरुद्ध हथियार उठाने जैसे क्रूर निर्णय लिए होंगे न कि अकबर का राज्य पाने के लालच में।
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