Monday, November 29, 2021

अध्याय – 8 : ऋग्वैदिक काल की सभ्यता

वैदिक काल, उस काल को कहते हैं जिसमें आर्यों ने वैदिक ग्रन्थों की रचना की। ये ग्रन्थ एक दूसरे से सम्बद्ध हैं और इनका क्रमिक विकास हुआ है। सबसे पहले ऋग्वेद तथा उसके बाद अन्य वेदों की रचना की गई। वेदों की रचना के बाद उनकी व्याख्या करने के लिए ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना की गई। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों की संख्या जब इतनी अधिक हो गई और उनका स्वरूप जब इतना विशाल हो गया कि उन्हें कंठस्थ करना कठिन हो गया तो उन्हें संक्षिप्त स्वरूप देने के लिए सूत्रों की रचना की गई। इस सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की रचना में सहस्रों वर्ष लगे। विद्वानों की मान्यता है कि वैदिक साहित्य की रचना 2,500 से 600 ई.पू. के बीच हुई। इसलिये इस काल को वैदिक काल कहा जाता है तथा इस काल में आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है।

वैदिक सभ्यता का काल विभाजन

वैदिक काल को दो भागों में विभक्त किया गया है-

(1) ऋग्वैदिक सभ्यता (2,500 ई.पू. से 1000 ई.पू.): चारों वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। इसलिये ऋग्वेद की सभ्यता सर्वाधिक पुरानी है। ऋग्वेद काल में आर्य लोग सप्त-सिन्धु क्षेत्र में निवास करते थे। इस काल की सभ्यता को ऋग्वैदिक सभ्यता कहते हैं।

(2) उत्तर वैदिक सभ्यता (1000 ई.पू. से 600 ई.पू.): उत्तर-वैदिक काल में आर्य लोग सरस्वती तथा गंगा नदियों के मध्य की भूमि में पहुँच गये थे और उन्होंने वहाँ पर अपने राज्य स्थापित कर लिये थे। इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र था। उत्तर-वैदिक काल के आर्यों की सभ्यता का यहीं विकास हुआ। यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की रचना इसी क्षेत्र में हुई। उत्तर-वैदिक काल में ऋग्वैदिक सभ्यता का क्रमशः विकास होता गया और इसमें अनेक परिवर्तन होते चले गये।

ऋग्वैदिक सभ्यता

ऋग्वैदिक सभ्यता का उद्भव सप्त सिंधु क्षेत्र तथा सरस्वती नदी के निकट हुआ था। ऋग्वेद में सप्त-सैन्धव तथा सरस्वती का अनेक मंत्रों में गुण-गान किया गया है। यद्यपि अब सरस्वती नदी विद्यमान नहीं है, और उसे प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर अद्दश्य रूप से प्रस्थापित कर दिया गया है, परन्तु उन दिनों वह सतजल तथा कुरुक्षेत्र के मध्य बहती थी।

ऋग्वैदिक काल की राजनीतिक दशा

यद्यपि ऋग्वेद एक धार्मिक ग्रन्थ है तथा उसमें प्रधानतः स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है तथापि कुछ मंत्रों से तत्कालीन राजनीतिक दशा पर भी प्रकाश पड़ता है। इस काल की राजनीतिक दशा निम्नांकित थी-

(1) राजनीतिक विभाजन: ऋग्वैदिक काल की राजनीतिक व्यवस्था का मूलाधार कुटुम्ब था जो पैतृक होता था। कुटुम्ब को आधुनिक इतिहासकारों ने कबीला कहकर पुकारा है। कुटुम्ब का प्रधान, पिता अथवा अन्य कोई बड़ा-बूढ़ा पुरुष होता था जो कुटुम्ब के अन्य सदस्यों पर नियन्त्रण रखता था। कई कुटुम्बों को मिला कर एक ग्राम बनता था। ग्राम का प्रधान ‘ग्रामणी’ कहलाता था। कई ग्रामों को मिला कर ‘विस’ बनता था। विस का प्रधान ‘विसपति’ कहलाता था। कई विसों को मिला कर ‘जन’ बनता था। जन का रक्षक ‘गोप’ अथवा ‘राजन्य’ कहलाता था।

(2) राजनीतिक संगठन: ऋग्वैदिक काल का राजनीतिक संगठन राजतंत्रात्मक था। ऋग्वेद में अनेक राजन्यों का उल्लेख मिलता है। राजन्य का पद आनुवंशिक था और वह उसे उत्तराधिकार के नियम से प्राप्त होता था। अर्थात् राजन्य के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था। राजन्य का पद यद्यपि वंशानुगत होता था, तथापि हमें समिति अथवा सभा द्वारा किए जाने वाले चुनावों के बारे में भी सूचना मिलती है। राज्य में राजन्य का स्थान सर्वोच्च था। वह सुन्दर वस्त्र धारण करता था और भव्य राज-भवन में निवास करता था जिसमें राज्य के बड़े-बड़े पदाधिकारी, पण्डित, गायक तथा नौकर-चाकर उपस्थित रहते थे। चूँकि उन दिनों गमनागमन के साधनों का अभाव था इसलिये राज्य बहुत छोटे हुआ करते थे।

(3) राजन्य के कर्त्तव्य: राजन्य को कबीले का संरक्षक (गोप्ता जनस्य) कहा गया है। वह गोधन की रक्षा करता था, युद्ध का नेतृत्व करता था और कबीले की ओर से देवताओं की आराधना करता था। प्रजा की रक्षा करना, शत्रुओं से युद्ध करना, राज्य में शान्ति स्थापित करना और शान्ति के समय यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना, राजन्य के मुख्य कर्त्तव्य होते थे। राजन्य अपनी प्रजा की न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखता था। वरन् वह उसकी आध्यात्मिक उन्नति का भी ध्यान रखता था। राजन्य अपनी प्रजा के आचरण की देखभाल के लिए गुप्तचर रखता था जो प्रजा के आचरण के सम्बन्ध में राज्य की सूचना देते थे। राजन्य, आचरण-भ्रष्ट प्रजा को दण्डित करता था।

(4) राज्य के प्रमुख पदाधिकारी: राजन्य की सहायता के लिए बहुत से पदाधिकारी हाते थे जिनमें पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी प्रधान थे।

पुरोहित: समस्त पदाधिकारियों में पुरोहित का स्थान सबसे ऊँचा था। उसका पद प्रायः वंशानुगत होता था परन्तु कभी-कभी वह किसी अन्य कुटुम्ब से भी चुन लिया जाता था। पुरोहित को बहुत से कर्त्तव्य करने होते थे। वह राजन्य का धर्मगुरु तथा परामर्शदाता होता था। इसलिये राज्य में उसका बड़ा प्रभाव रहता था। वह रण-क्षेत्र में भी राजन्य के साथ जाता था और अपनी प्रार्थनाओं तथा मन्त्रों द्वारा राजन्य की विजय का प्रयत्न करता था। ऋग्वैदिक काल में वसिष्ठ और विश्वामित्र नामक दो प्रमुख पुरोहित हुए। उन्होंने राजाओं का पथ-प्रदर्शन किया, उनका गुणगान किया और बदले में गायों और दासियों के रूप में भरपूर दक्षिणाएं प्राप्त कीं।

सेनानी: राज्य का दूसरा प्रमुख अधिकारी सेनानी होता था। वह भाला, कुल्हाड़ी, कृपाण आदि का उपयोग करना जानता था। वह सेना का संचालन करता था। उसकी नियुक्ति सम्भवतः राजन्य स्वयं करता था। जिन युद्धों में राजन्य की उपस्थिति आवश्यक नहीं समझी जाती थी, उनमें सेनानी ही सेना का प्रधान होता था जो रण-क्षेत्र में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था।

ग्रामणी: ग्रामणी तीसरा प्रधान पदाधिकारी होता था। वह गाँव के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी होता था। आरम्भ में ग्रामणी योद्धाओं के एक छोटे समूह का नेता होता था परन्तु जब गांव स्थायी रूप से बस गए तो ग्रामणी गांव का मुखिया हो गया और कालांतर में उसका पद व्राजपति के समकक्ष हो गया।

कुलप: परिवार अथवा कुल का मुखिया कुलप कहलाता था।

व्राजपति: गोचर-भूमि के अधिकारी को व्राजपति कहा गया है। वह युद्ध में कुलपों और ग्रामणियांे का नेतृत्व करता था।

(5) युद्ध-विधि: भारत में ऋग्वैदिक आर्यों की सफलता के दो प्रमुख कारण थे- घोड़ों से चलने वाले रथ और लोहे से बनने वाले हथियार। युद्ध में समस्त लोगों को भाग लेना पड़ता था। साधारण लोग पैदल युद्ध करते थे परन्तु राजन्य तथा क्षत्रिय लोग रथों पर चढ़कर युद्ध करते थे। युद्ध में आत्म-रक्षा के लिए कवच आदि का प्रयोग किया जाता था। आक्रमण करने का प्रधान शस्त्र धनुष-बाण था परन्तु आवश्यकतानुसार भालों, फरसों तथा तलवारों का भी प्रयोग किया जाता था। ध्वजा, पताका, दुन्दुभि आदि का भी प्रयोग किया जाता था। युद्ध प्रायः नदियों के तट पर हुआ करते थे।

(6) समिति तथा सभा: यद्यपि राजन्य राज्य का प्रधान होता था परन्तु वह स्वेच्छाचारी तथा निंरकुश नहीं होता था। उसे परामर्श देने के लिए कुछ संस्थायें विद्यमान थीं। ऋग्वेद में सभा, समिति, विदथ और गण-जैसी अनेक कबीलाई परिषदों के उल्लेख मिलते हैं। इन परिषदों में जनता के हितों, सैनिक अभियानों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में विचार-विमर्श होता था। ऋग्वैदिक काल में स्त्रियाँ भी सभा और विदथ में भाग लेती थीं। राजतंत्र की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व की परिषदें सम्भवतः सभा और समिति थीं। सम्भवतः समिति में सारी प्रजा, सदस्य होती थी परन्तु सभा में केवल उच्च-वंश के वयोवृद्धों को सदस्यता मिलती थी। ये दोनों परिषदें इतने महत्त्व की थीं कि राजन्य भी इनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न करता था।

(7) न्याय व्यवस्था: राजन्य अपने सहायकों की सहायता से विवादों एवं झगड़ों का निर्णय करता था। न्यायिक कार्य में उसे पुरोहित से बड़ी सहायता मिलती थी। जिन अपराधों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, वे चोरी, डकैती, सेंध लगाना आदि हैं। पशुओं की बड़ी चोरी हुआ करती थी। अपराधियों को उस व्यक्ति की इच्छानुसार दण्ड मिलता था जिसे क्षति पहुँचती थी। जल तथा अग्नि-परीक्षा का भी इस युग में प्रचार था।

(8) गुप्तचर: उस काल में चोरियां भी होती थीं, विशेषतः गायों की। आपराधिक गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर रखे जाते थे। कर वसूल करने वाले किसी अधिकारी के बारे में हमें जानकारी नहीं मिलती। सम्भवतः ये कर राजाओं को भेंट के रूप में, स्वेच्छा से दिए जाते थे। इस भेंट को बलि कहते थे,

(9) अन्य पदाधिकारी: राजन्य कोई नियमित सेना नहीं खड़ी करता था किंतु युद्ध के अवसर पर जो सेना एकत्र की जाती थी उसमें व्रात, गण, ग्राम और शर्ध नामक विभिन्न सैनिक समूह सम्मिलित होते थे। कुल मिलाकर यह एक कौटुम्बिक अथवा कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना का प्राधान्य था। नागरिक व्यवस्था अथवा प्रादेशिक व्यवस्था का अस्तित्त्व नहीं था। लोग अपने स्थान बदलते हुए निरन्तर फैलते जा रहे थे।

सामाजिक दशा

ऋग्वेद के अध्ययन से तत्कालीन समाज का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है। सामाजिक संरचना का आधार सगोत्रता थी। अनेक ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से प्रकट होता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कुल अथवा गोत्र से होती थी। लोग जन (कबीले) के हित को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है परन्तु जनपद शब्द का एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ। लोग, जन के सदस्य थे, क्योंकि अभी राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। ऋग्वेद में कुटुम्ब अथवा कबीले के अर्थ में जिस दूसरे महत्त्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है विश्। इस शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी इकाइयों में बांटा गया था। जब ये ग्राम एक-दूसरे से लड़ते थे तो संग्राम हो जाता था। बहुसंख्यक वैश्य वर्ण का उद्भव विश् से ही हुआ।

(1) पारिवारिक जीवन: ऋग्वेद में परिवार के लिये कुल शब्द का प्रयोग हुआ है किंतु इस शब्द का प्रयोग भी बहुत कम हुआ है। कुल में न केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि का समावेश होता था अपितु कई अन्य लोग भी होते थे। अनुमान होता है कि पूर्व वैदिक काल में परिवार के लिए गृह शब्द का प्रयोग होता था। प्राचीनतम हिन्द-यूरोपीय भाषाओं में इसी शब्द का उपयोग भंाजे, भतीजे, पोते आदि के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ यह है कि पृथक् कुटुम्बों (अर्थात् कबीलों) की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था, और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था। रोमन समाज की तरह यह एक पितृतंत्रात्मक परिवार था, जिसमें पिता मुखिया था। एक परिवार की अनेक पीढ़ियां एक घर में रहती थीं। इस काल के सामाजिक संगठन का मूलाधार भी कुटुम्ब ही था। पिता ही कुटुम्ब का प्रधान होता था। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों पर दया तथा सहानुभूति रखता था परन्तु अयोग्य सन्तान के साथ कठोर व्यवहार करता था। कुटुम्ब में पिता को बहुत अधिकार प्राप्त थे। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता का बहुत बड़ा हाथ रहता था। विवाह के उपरान्त भी पुत्र को अपनी पत्नी के साथ अपने पिता के घर में रहना होता था। वधू को अपने श्वसुर गृह के अनुशासन में रहना होता था। इस प्रकार इस काल में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। अतिथि सत्कार पर बल दिया जाता था और इसकी गणना पाँच महायज्ञों में होती थी। भगवानपुुरा में तेरह कमरों वाला एक कच्चा भवन मिला है। इससे यह प्रमाणित हो सकता है कि इस भवन में या तो बड़ा परिवार रहता था या कबीले अथवा कुटुम्ब का मुखिया रहता था।

(2) सन्तान की स्थिति: विवाह का प्रधान लक्ष्य सन्तान उत्पन्न करना होता था। ऋग्वैदिक आर्य युद्धों में लड़ने के लिए अनेक बहादुर पुत्रों की प्राप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करते थे। पुत्र उत्पन्न होने पर बड़ा उत्सव मानाया जाता था। लोग कन्या की आकांक्षा नहीं करते थे परन्तु उत्पन्न हो जाने पर उसके साथ सहानुभूति रखते थे और उसकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करते थे। विश्ववारा, घोषा, अपाला आदि स्त्रियों को इतनी उच्च-कोटि की शिक्षा दी गई थी कि वे वेद-मन्त्रों की भी रचना कर सकती थीं। ऋग्वेद में संतान और गोधन की प्राप्ति के लिए बार-बार इच्छा व्यक्त की गई है, किन्तु किसी भी सूक्त में पुत्री की प्राप्ति के लिए इच्छा व्यक्त नही की गई है।

(3) विवाह की व्यवस्था: ऋग्वैदिक काल में विवाह संस्था की स्थापना हो चुकी थी। जन-साधारण में बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु राजवंशों में बहु-विवाह की प्रथा थी। यद्यपि भाई-बहिन तथा पिता-पुत्री में विवाह वर्जित था तथापि आदिम प्रथाओं के प्रतीक बचे हुए थे। यम की जुड़वां बहन यमी ने यम के सम्मुख प्रेम का प्रस्ताव रखा था किंतु यम ने इसका विरोध किया था। बहुपतित्त्व के बारे में भी कुछ सूचना मिलती है। मरूतों ने रोदसी को मिलकर भोगा, और अश्विनी भाई सूर्य-पुत्री सूर्या के साथ रहते थे परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलते हैं। सम्भवतः ये मातृतंत्रात्मक अवस्था के अवशेष थे। पुत्र को, माता का नाम दिए जाने के भी कुछ उदारहण मिलते है, जैसे, मामतेय। यद्यपि विवाह पर पिता का नियंत्रण रहता था परन्तु वर-कन्या को भी काफी स्वतन्त्रता रहती थी। कुछ लोग दहेज देकर और कुछ लोग दहेज लेकर कन्यादान करते थे। दहेज वही लोग देते थे जिनकी कन्या में कुछ त्रुटि होती थी। इसी प्रकार धन देकर वही लोग विवाह करते थे जिनके पुत्र में कोई त्रुटि होती थी। विवाह एक पवित्र बन्धन समझा जाता था और एक बार इस बन्धन में बंध जाने पर, आजीवन बन्धन नहीं टूट सकता था। विधवा विवाह का ऋग्वेद में कहीं संकेत नहीं मिलता। दस्युओं के साथ विवाह का निषेध था। ऋग्वेद में नियोग प्रथा और विधवा-विवाह के अस्तित्त्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। बाल-विवाह के अस्तित्त्व का कोई उदाहरण नहीं मिलता। अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक काल में 16-17 वर्ष की आयु में विवाह होते थे।

(4) स्त्रियों की दशा: इस युग में स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। स्त्रियाँ गृहस्वामिनी समझी जाती थीं और वे समस्त धार्मिक कार्यों में अपने पति के साथ भाग लेती थीं। पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ समस्त उत्सवों में भाग ले सकती थीं। स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती थीं, उन्हें अपने पुरुष-सम्बन्धियों के सरंक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। विवाह के पूर्व कन्याओं को अपने पिता के संरक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। पिता के न रहने पर वह अपने भाई के संरक्षण में रहती थी। विवाह हो जाने पर वह पति के और विधवा हो जाने पर पुत्र के संरक्षण में रहती थी। इस प्रकार स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष का संरक्षण प्राप्त था। स्त्रियां सभा-समिति में भाग लेती थीं। वे पुत्रियों के साथ यज्ञों में भी सम्मिलित होती थीं। सूक्तों की रचना करने वाली पांच स्त्रियों के बारे में जानकारी मिलती है, किन्तु बाद के ग्रंथों में ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। स्पष्ट है कि सूक्तों की रचना मौखिक रूप में होती थी। उस काल की कोई लिखित सामग्री नहीं मिलती।

(5) वेश-भूषा: ऋग्वैदिक आर्य सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करते थे। ये लोग प्रायः तीन वस्त्र पहिनते थे। एक नीचे का वस्त्र था जिसे नीवि कहते थे। इनका दूसरा वस्त्र काम और तीसरा वस्त्र अधिवास कहलाता था। ये लोग रंग-बिरंगे ऊनी तथा सूती वस्त्र पहिनते थे। कुछ वस्त्रों पर सोने का भी काम किया जाता था जिन्हें वे उत्सव के अवसर पर पहिनते थे। स्त्री एवं पुरुष लम्बे बाल रखते थे जिनमें वे तेल डालते थे और कंघी करते थे। स्त्रियाँ चोटी बांधती थीं और पुरुष अपने बाल कुण्डल के आकार के रखते थे। यद्यपि दाढ़ी रखने की प्रथा थी परन्तु कुछ लोग दाढ़ी मुंडवा भी लेते थे। ऋग्वैदिक आर्य, आभूषणों का भी प्रयोग करते थे जो प्रायः सोने के बने होते थे। भुजबन्ध, कान की बाली, कंगन, नूपुर आदि का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे।

(6) खाद्य-पदार्थ: चावल, जौ, घी, दूध तथा मांस, ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन था। अनाज को भूनकर अथवा पीसकर, घी-दूध के साथ खाया जाता था। ये लोग फल तथा तरकारी का अधिक प्रयोग करते थे। पशुओं की बलि दी जाती थी जिनका मांस खाया जाता था।

(7) पेय-पदार्थ: ऋग्वैदिक आर्य दो प्रकार के पेय पदार्थों का प्रयोग करते थे। एक को सोम कहते थे और दूसरे को सुरा। सोम एक वृक्ष के रस से बनाया जाता था जिसमें मादकता नहीं होती थी। यज्ञ के अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। सुरा में मादकता होती थी और यह अन्न से बनाई जाती थी। सुरापान घृणित समझा जाता था। आर्य ग्रंथों में सुरापान को अपराध बताया गया है। ब्राह्मण इसे घोर घृणा की दृष्टि से देखते थे।

(8) मनोरंजन: रथ-संचालन, जुआ खेलना, नाच-गाना, बाजे बजाना, पशु-पक्षियों का शिकार करना, ऋग्वैदिक आर्यों के आमोद-प्रमोद के प्रधान साधन थे।

(9) शिक्षा: इस काल में शिक्षा मौखिक होती थी इसलिये स्मरण-शक्ति का बड़ा महत्त्व था। गुरु, शिष्यों को वेद-मन्त्रों की शिक्षा देते थे। विद्यार्थी उन्हें कण्ठाग्र करने का प्रयत्न करते थे। शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ाना तथा आचरण को शुद्ध बनाना होता था।

(10) औषधि: ऋग्वैदिक आर्य, स्वास्थ्य के प्रति सचेत थे। अश्विन औषधि-शास्त्र के देवता माने जाते थे और उनकी पूजा की जाती थी। औषधियाँ जड़ी-बूटियों की होती थीं। चिकित्सा करना एक प्रकार का व्यवसाय बन गया था।

(11) आश्रम-व्यवस्था: इस काल में आश्रम-व्यवस्था स्थापित होनी आरंभ हो चुकी थी किंतु उसका स्वरूप स्पष्टतः निर्धारित नहीं हुआ था। आश्रम व्यवस्था की प्रारंभिक अवधारणा में तीन ही आश्रम थे- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम। आश्रम व्यवस्था ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के लिये ही थी।

(12) गृह की व्यवस्था: ऋग्वैदिक आर्यों के मकान बांस के बने होते थे। इनको बनाने में लकड़ी तथा सरपत का भी प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक घर में अग्निशाला का प्रबन्ध रहता था जिसमें सदैव अग्नि जलती रहती थी। प्रत्येक घर में एक बैठक और स्त्रियों के लिए अलग कमरा होता था।

(13) शव विसर्जन: इस काल में आर्य, मृतक शरीर को या तो जलाते थे या गाड़ते थे परन्तु विधवाओं को जलाया नहीं जाता था वरन् उन्हें गाड़ा जाता था।

सामाजिक वर्गीकरण

(1) आर्य-अनार्य का विभेद: ऋग्वेद में लगभग 1500-1000 ई.पू. के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग के बारे में जानकारी मिलती है। रंग के लिए वर्ण शब्द का उपयोग हुआ है। अनुमान होता है कि आर्य गौर वर्ण के थे जबकि भारत के मूल निवासी काले वर्ण के थे। रंग-भेद ने सामाजिक वर्गीकरण में आंशिक योग दिया होगा किंतु सामाजिक विभेद का सबसे बड़ा कारण, आर्याें की स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त करना था। आर्यों ने काले वर्ण के स्थानीय निवासियों को अनार्य कहा।

(2) आर्यों में विभेद: आर्य कबीलों के मुखिया और पुरोहित लूट का अधिकांश धन परस्पर बांट लेते थे। युद्ध की लूट के असमान वितरण के कारण सामाजिक असमानताएं पैदा हुईं। परिणामतः सामान्य जनों की अपेक्षा मुखिया और पुरोहित अधिक ऊंचे उठे। सामान्य जन बचा-खुचा धन प्राप्त करते थे। इसलिये कबीले में सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुईं। धीरे-धीरे कबीलाई समाज तीन समूहों में बंट गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन।

(3) व्यवसाय आधारित विभेद: आर्य अपने कार्यानुसार चार वर्णों में विभक्त हो गये। पढ़ने तथा यज्ञ का कार्य करने वाले ब्राह्मण, युद्ध तथा शासन करने वाले क्षत्रिय अथवा राजन्य, कृषि तथा व्यापार करने वाले वैश्य और सेवा का कार्य करने वाले शूद्र कहलाये। पुरुष सूक्त में लिखा है कि ब्राह्मण आदि-पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसकी जंघा से तथा शूद्र उसके चरणों से निकले हैं। इस प्रकार चार वर्णों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है परन्तु यह व्यवस्था व्यवसाय पर आधारित थी और इसमें जटिलता नहीं थी। अन्तर्जातीय विवाह तथा सहभोज का प्रचलन था, छुआछूत का भेदभाव नहीं था। ऋग्वेदिक काल में व्यवसाय पर आधारित विभाजन प्रारंभ हो चुका था परन्तु यह विभाजन अभी सुस्पष्ट नहीं था। ऋग्वेद में एक परिवार के सदस्य का कथन है- ‘मैं कवि हूूँ, मेरा पिता वैद्य है, और मेरी माँ पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते हैं…।’

(4) दास व्यवस्था: ऋग्वेद के चौथे एवं दसवें मंडल में पहली बार शूद्रों का उल्लेख मिलता है। आर्याें ने दासों और दस्युओं को जीतकर अधीन बनाया तथा उन्हें शूद्र कहा। ऋग्वेद में पुरोहितों को दास सौंपने के उल्लेख बार-बार मिलते हैं। घर का काम करने वाली मुख्यतः दासियां थीं। घरेलू दासों के तो उल्लेख मिलते हैं किंतु श्रमिकों के नहीं। अतः अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक काल के दासों को कृषि अथवा अन्य उत्पादन कार्याें में नहीं लगाया जाता था।

आर्थिक-दशा

ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन सरल था, उसमें जटिलता उत्पन्न नहीं हुई थी। प्रारंभिक ऋग्वैदिक आर्यों की अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः पशुचारी थी, अन्न-उत्पादक नहीं थी, इसलिए लोगों से नियमित करों की उगाही बहुत कम होती थी। भूमि अथवा अनाज के दान के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता। समाज में कबीलाई बंधन शक्तिशाली थे। करों की उगाही अथवा भू-संपत्ति के आधार पर सामाजिक वर्ग अभी अस्तित्त्व में नहीं आए थे। इस काल की आर्थिक दशा इस प्रकार से थी-

(1) गाँवों की व्यवस्था: ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में रहते थे। ऋग्वेद में नगरों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। गाँव पास-पास होते थे। वन्य पशुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षा के लिए मिट्टी के घरों वाली बस्तियों की झाड़ियों अथवा अन्य कांटों आदि से किलेबंदी की जाती थी। अधिकांश घर बांस तथा लकड़ी के बने होते थे।

(2) कृषि: ऋग्वैदिक आर्यों का प्रधान व्यवसाय कृषि था। परिवार का अलग खेत होता था परन्तु चरागाह सबका एक होता था। खेती हल से की जाती थी। ऋग्वेद के आरंभिक भाग में फाल के उल्लेख मिलते हैं। उनके फाल सम्भवतः लकड़ी के बने होते थे। ऋग्वैदिक लोग बुवाई, कटाई और मंडाई से परिचित थे। उन्हें विभिन्न ऋतुओं की भी अच्छी जानकारी थी। ये लोग प्रधानतः गेहूँ तथा जौ की खेती करते थे। इस काल के आर्य, फल तथा तरकारी भी पैदा करते थे।

(3) पशु-पालन: ऋग्वैदिक आर्यों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशु-पालन था। पशुओं में गाय का सर्वाधिक महत्त्व था, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयोगी होती थी। गाय को अध्न्या कहा गया है अर्थात् जो मारी न जाय। ऋग्वेद में गाय के बारे में आए बहुत सारे उल्लेखों से यही सिद्ध होता है कि आर्य पशुपालक थे। अधिकांश लड़ाइयां उन्होंने गायों के लिए लड़ी थीं। ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का उपयोग हुआ हैं। जिसका अर्थ ‘गायों की खोज’ होता है। गाय को सबसे बड़ी सम्पत्ति समझा जाता था। बैलों से हल जोतने तथा गाड़ी खींचने के काम लिया जाता था। घोड़ों का प्रयोग रथों में किया जाता था। आर्यों द्वारा पाले जाने वाले अन्य पशु, भेड़, बकरी तथा कुत्ते थे। कुत्ते घरों तथा बस्तियों की रखवाली करते थे।

(4) पशुओं का शिकार: ऋग्वैदिक आर्य मांस खाते थे। इसलिये वन्य पशुओं का शिकार भी उनकी जीविका का साधन था। ये लोग धनुष-बाण तथा लोहे के भालों द्वारा सूअर, हरिण तथा भैंसों का शिकार करते थे और पक्षियों को जाल में फंसा कर पकड़ते थे। शेरों को चारों ओर से घेर कर मारा जाता था।

(5) मृद्भाण्ड: हरियाणा के भगवानपुरा से और पंजाब के तीन स्थलों से चित्रित धूसर मृदभांड और बाद के काल के हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। भगवानपुरा में मिली वस्तुओं का तिथि निर्धारण 1600 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक किया गया है। लगभग यही काल ऋग्वेद का भी है। इन चारों स्थानों का भौगोलिक क्षेत्र वही है जो ऋग्वेद में दर्शाया गया है। यद्यपि इन चारों स्थलों पर चित्रित धूसर पात्र मिले हैं फिर भी न तो लौह सामग्री और न ही अनाज यहाँ मिले हैं। अतः हम चित्रित धूसर मृद्भांड की एक लौह पूर्व अवस्था के बारे में सोच सकते हैं जो ऋग्वैदिक अवस्था के समकालिक हैं।

(6) दस्तकारी के कार्य: ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पकारों के उल्लेख मिलते हैं। इनसे पता चलता है कि आर्य लोग इन शिल्पों से भली-भांति परिचित थे। तांबे अथवा कांसे के लिए प्रयुक्त अयस शब्द से ज्ञात होता है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी। जब वे उप-महाखंड के पश्चिमी भाग में बसे हुए थे तब वे सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की खानों से तांबा प्राप्त करते होंगे। ऋग्वैदिक काल के बढ़ई रथ तथा गाड़ियाँ बनाते थे। ये लोग लकड़ी के प्याले भी बनाते थे और उन पर बहुत अच्छी नक्काशी करते थे। लोहार, लोहे, ताम्बे तथा पीतल के विभिन्न प्रकार के बर्तन, अन्य-शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। सुनार, सोने-चांदी के आभूषण बनाते थे। चर्मकार लोग चमड़े की वस्तुएँ बनाते थे। सीना-पिरोना, चटाइयां बुनना, ऊनी तथा सूती कपड़े बनाना आदि भी जीविका के साधन थे। कुम्हार चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

(7) व्यापार: ऋग्वैदिक आर्यों की जीविका का एक साधन व्यापार भी था। ये लोग विदेशी तथा आन्तरिक दोनों प्रकार का व्यापार करते थे। प्रारम्भ में व्यापार वस्तु-विनिमय द्वारा होता था। बाद में गाय द्वारा मूल्य आंका जाने लगा और अन्त में सोने-चांदी से बनी मुद्राओं का प्रयोग होने लगा। इस काल में निष्क नामक मुद्रा का व्यवहार होने लगा। कपड़े, चमड़े तथा चद्दरें व्यापार की मुख्य वस्तुएँ होती थीं। माल ले जाने के लिए गाड़ियों तथा रथों का प्रयोग किया जाता था। नदियों को पार करने के लिए नावों का प्रयोग होता था।

(8) ऋण की प्रथा: ऋग्वैदिक काल में ब्याज पर ऋण देने की प्रथा थी। वैश्य, साहूकार तथा महाजन यह कार्य करते थे और यह उनकी जीविका का प्रमुख साधन होता था। ऋण चुकाना एक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था और न चुकाने पर उसे निश्चित समय तक महाजन की सेवा करनी पड़ती थी।

विभिन्न कलाओं का विकास

बौद्धिक परिपक्वता विकसित हो जाने से ऋग्वैदिक काल के लोगों की विभिन्न प्रकार की रचनात्मक कलाओं में रुचि थी।

(1) काव्य कला: ऋग्वैदिक आर्य, काव्य-कला में बड़े कुशल थे। ऋग्वेद पद्य शैली में लिखा गया है। ऋग्वेद का अधिंकाश काव्य धार्मिक गीति-काव्य है। इस काल की कविता में स्वाभाविकता तथा सौन्दर्य है। उषा की प्रशंसा में ऋषियों ने बड़ी भावुकता प्रकट की है।

(2) लेखन कला: यह निश्चित रूप में नहीं कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक आर्य लेखन-कला से परिचित थे अथवा नहीं परन्तु कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे इस कला को जानते थे।

(3) अन्य कलाएँ: ऋग्वैदिक आर्य अन्य कई कलाओं में प्रवीण थे। गृह निर्माण-कला में वे इतने निपुण थे कि सहस्र-स्तम्भ तथा सहस्र-द्वार के मकान तक बनाते थे। ऋग्वैदिक आर्य कताई, बुनाई, रगांई, धातु-कला, संगीत कला, नृत्य कला एवं गायन कला में भी निपुण थे।

धार्मिक जीवन

ऋग्वैदिक आर्यों का जीवन वास्तव में धर्ममय था। जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं था जिस पर धर्म की गहरी छाप न हो। इस काल का धर्म बड़ी उच्च-दशा में था। इस काल में प्राकृतिक शक्तियों एवं उनके नियामक देवताओं की पूजा होती थी।

(1) ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास: ऋग्वैदिक आर्यों का ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास था जो इस जगत् का निर्माण तथा पालन करने वाला है। अनेक देवतओं में विश्वास करते हुए भी ऋग्वैदिक आर्यों के धर्म का मूलाधार एकेश्वरवाद ही था और उनका एक ही ईश्वर था जिसे वे प्रजापति कहते थे जो सर्वव्यापी था।

(2) प्राकृतिक शक्तियों की उपासना: प्राकृतिक घटनायें यथा- वर्षारंभ, सूर्य एवं चंद्र का उदय, नदियांे तथा पर्वतों आदि का अस्तित्त्व, आर्यों के लिए पहेली-जैसे थे। इसलिए उन्होंने इन प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। उनमें मानव अथवा पशु गुणों का आरोपण करके उन्हें जीवित शक्तियाँ माना। ऋग्वेद में ऐसी अनेक दैवी शक्तियों का समावेश है जिनकी स्तुति में विभिन्न ऋषि-कुलों ने सूक्तों की रचना की। इस प्रकार ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आरंभ हुई। ऋग्वैदिक आर्यों का विश्वास था कि सूर्य, चन्द्र, वायु, मेघ आदि में ईश्वर निवास करता है। इसलिये वे इन सबकी उपासना करते थे।

(3) देवताओं का वर्गीकरण: ऋग्वेद में 33 देवताओं की प्रार्थना की गई है। इन देवताओं को तीन भागों में बांटा गया है- (1) आकाश के देवता, (2) मध्य-स्थान के देवता तथा (3) पृथ्वी के देवता। प्रत्येक वर्ग में 11 देवता हैं, जिनमें से एक सर्वप्रधान है। आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता सूर्य, मध्य-स्थान के वायु अथवा इन्द्र और पृथ्वी के प्रधान देवता अग्नि हैं।      ऋग्वेद का सबसे प्रमुख देवता इन्द्र है। इन्द्र आर्यों का युद्ध नेता था जिसने असुरों के विरुद्ध युद्धों में आर्याें का नेतृत्व किया और उन्हें विजय दिलाई। उसे वर्षा का देवता भी माना गया है। ऋग्वेद में इंद्र की स्तुति में 250 सूक्त हैं। दूसरा महत्त्वपूर्ण देवता अग्नि है, जिसकी स्तुति में 200 सूक्त मिलते हैं। आदिम लोगों के जीवन में अग्नि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि खाना पकाने तथा जंगलों को जलाकर साफ करने में इसका उपयोग होता था। वैदिक काल में अग्नि ने देवताओं और मानवों के बीच एक प्रकार से मध्यस्थ की भूमिका निभाई। समझा जाता था कि अग्नि को दी जाने वाली आहुति धुंआ बनकर आकाश में जाती है, और इस प्रकार अंत में देवताओं के पास पहुंच जाती है। तीसरा प्रमुख देवता वरुण था, जो जलनिधि का प्रतिनिधित्व करता था। वरुण को प्राकृतिक घटनाक्रम का संयोजक समझा जाता था। माना जाता था कि विश्व में सब कुछ वरुण की इच्छा से होता है। वरुण पहले सुर था किंतु बाद में असुरों का मित्र हो गया था। जब वरुण को वृत्रासुर ने बंदी बना लिया तब इंद्र ने वृत्रासुर को मारकर वरुण को मुक्त करवाया तथा तथा उसे पुनः देवत्व प्रदान किया। सोम वनस्पति का देवता था। सोम नाम का एक मादक पेय भी था। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में वनस्पति से इस पेय के तैयार करने की विधि का वर्णन मिलता है परन्तु इस वनस्पति की सही पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। देवताआंे के अनुरोध पर सोम चंद्रमा में समा गया जहाँ से वह जल एवं वनस्पतियों को प्राप्त हुआ। तूफान का प्रतिनिधित्व करने वाले मरुद्गण नामक अनेक देवताओं की जानकारी मिलती है।

(4) देवताओं की विशेषताएँ: ऋग्वैदिक काल के देवताओं में कुछ निश्चित विशेषताएँ पाई जाती हैं- (1) समस्त देवता दयावान तथा शुभचिन्तक हैं। कोई भी देवता दुष्ट स्वभाव का नहीं है। (2) समस्त देवता अलग-अलग स्वभाव के हैं और इनके कार्य भी विभिन्न प्रकार के हैं। (3) समस्त देवता जन्म लेते हैं परन्तु फिर अमर हो जाते हैं। (4) समस्त देवता वायु में भ्रमण करते हैं जिनके रथों में घोड़े अथवा अन्य पशु अथवा पक्षी जुते रहते हैं। (5) इन्हें मानव-स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है तथा इन्हें मनुष्य के खाद्य-पदार्थ, यथा दूध, अन्न, मांस आदि की बलि दी जाती है।

(5) देवियों की तुलना में देवताओं को प्रमुखता: आर्यों ने उषा काल का प्रतिनिधित्व करने वाली उषस् और अदिति जैसी देवियों की भी पूजा की किंतु ऋग्वैदिक काल में इन देवियों को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया। पितृत्ंात्रात्मक समाज के वातावरण में देवियों की अपेक्षा इन्द्र एवं वरुण आदि देवताओं को अधिक महत्त्व मिलना स्वाभाविक था।

(6) धार्मिक कृत्य: देवताओं की आराधना मुख्यतः स्तुतिपाठ और यज्ञाहुति से की जाती थी। ऋग्वैदिक काल में स्तुति पाठ का बड़ा महत्त्व था। स्तुति पाठ अकेले और सामूहिक रूप में होते थे। आर्यों का विश्वास था कि प्रार्थना ईश्वर तक पहुंचती है और ईश्वर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होता है। गायत्री मन्त्र का बड़ा महत्त्व था और इसका पाठ दिन में तीन बार अर्थात् प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सन्ध्या समय किया जाता था। आरम्भ में प्रत्येक कबीले अथवा कुल का अपना एक विशिष्ट देवता होता था। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण कबीले के सदस्य इस स्तुतिगान में भाग लेते थे। यज्ञाहुतियों के बारे में भी यही होता था। सम्पूर्ण जन अथवा कबीले द्वारा दी जाने वाली यज्ञबलि को ग्रहण करने के लिए अग्नि और इंद्र का आह्नान किया जाता था। देवताओं को वनस्पति, जौ आदि की आहुति दी जाती थी परन्तु ऋग्वैदिक काल में यज्ञाहुति के अवसर पर कोई अनुष्ठान अथवा मंत्रपाठ नहीं होता था। उस समय शब्द की चमत्कारिक शक्ति को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता था जितना कि उत्तर वैदिक काल में दिया जाने लगा था। ऋग्वैदिक काल में आर्य, आध्यात्मिक उन्नति अथवा मोक्ष के लिए देवताओं की आराधना नहीं करते थे। वे इन देवताओं से मुख्यतः संतति, पशु, अन्न, धन, स्वास्थ्य आदि मांगते थे।

(7) पितरों की पूजा: ऋग्वैदिक आर्यों में पितरों की पूजा प्रचलित थी। उनका मानना था कि पितरों की कृपा प्राप्त करने से कष्ट क्षीण होते हैं।

(8) सदाचार पर बल: ऋग्वैदिक आर्यों में सदाचार पर बहुत बल दिया जाता था। चोरी, डकैती, मिथ्या भाषण, निरपराधों एवं निःशक्तों की हत्या, पराये धन का हरण आदि कार्य निकृष्ट माने जाते थे।

(9) दान: ऋग्वैदिक आर्यों में दान देने की परम्परा थी। आर्य अपने पुरोहितों को गाय, रथ, घोड़े, दास-दासियां दान करते थे। पुरोहितों को दान देने के जितने भी उल्लेख मिलते हैं उनमें गायों और स्त्री दासों के रूप में दान देना बताया गया है, भूखंड के रूप में कभी नहीं।

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