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महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका

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जिस समय मुहम्मद अली जिन्ना और भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ हिन्दू राज्यों को पाकिस्तान में मिलाने का प्रयास कर रहे थे, उस समय जोधपुर नरेश हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट की। इस कारण महाराजा महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका विवादास्पद हो गई!

वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन ने भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ द्वारा भेजे गये तथ्यों को सही माना है। महाराजा शीर्षक से लिखी गई एक पुस्तक के लेखक ओंकारसिंह ने इस विवरण के आधार पर यह माना है कि जिन्ना और जोधपुर नरेश की भेंट के समय कर्नल केसरीसिंह महाराजा के साथ नहीं थे अन्यथा भोपाल नवाब ने उनका उल्लेख अवश्य किया होता।

ओंकारसिंह के अनुसार अवश्य ही केसरीसिंह ने यह मिथ्या भ्रम फैलाया था कि इस भेंट के दौरान केसरीसिंह भी उपस्थित थे और इसी भ्रम के कारण मानकेकर और पन्निकर आदि ने तथ्यों को विकृत कर दिया है। इन विकृत तथ्यों के कारण महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका और अधिक विवादास्पद दिखाई देती है।

16 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को अपना अंतिम प्रतिवेदन भेजा गया जिसके अनुच्छेद 41 में कहा गया-

‘8 अगस्त को मैंने महाराजा जोधपुर को बुलाया तो वे उसी रात्रि को विलम्ब से जोधपुर से दिल्ली पहुंचे और अगले दिन सेवेरे (9 अगस्त को) मुझसे मिले। महाराजा ने निःसंकोच स्वीकार किया कि वे जिन्ना से मिले थे और नवाब भोपाल का विवरण सही है। पटेल को जब जोधपुर महाराजा की चाल का पता चला तो वे महाराजा को मनाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हो गये। पटेल ने यह बात मान ली कि महाराजा जोधपुर राज्य में बिना किसी रुकावट के शस्त्रों का आयात कर सकेंगे। राज्य के अकालग्रस्त जिलों को पूरे खाद्यान्न की आपूर्ति की जायेगी और इस हेतु भारत के अन्य क्षेत्रों की अवहेलना की जायेगी। महाराजा द्वारा जोधपुर रेलवे की लाइन कच्छ राज्य के बंदरगाह तक मिलाने में कोई रुकावट नहीं की जायेगी। पटेल की इस स्वीकृति से महाराजा संतुष्ट हो गये और उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत के साथ रहेंगे।’

ओंकारसिंह का मानना है कि महाराजा हनवंतसिंह न तो पाकिस्तान में मिलना चाहते थे और न ही राजस्थान के सम्राट बनना चाहते थे अपितु वे तो अपने राज्य के लिए अधिकतम सुविधायें प्राप्त करने के लिए सरदार पटेल पर दबाव बनाना चाहते थे। यदि ओंकारसिंह का स्पष्टीकरण स्वीकार कर लिया जाए तब भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत सरकार को बताए बिना जिन्ना से से की गई भेंट के कारण महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका विवादास्पद हो गई।

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स्वतंत्रता सेनानी प्रवीण चंद्र छाबड़ा के अनुसार यदि सरदार पटेल ने जोधपुर महाराजा को गिरफ्तार करने की चेतावनी नहीं दी जोती तो इतिहास अन्य भी हो सकता था। गोकुल भाई भट्ट ने लिखा है- ‘तब जोधपुर का मामला बहुत पेचीदा हो रहा था, क्योंकि जोधपुर के महाराजा की पाकिस्तान के साथ सांठ-गांठ हो रही थी। उनसे पत्र-व्यवहार भी हुआ था। समझौते का मसौदा भी तैयार हो गया था। वहाँ से कुछ एक्ट्रैस (अभिनेत्रियां) भी भेजी गई थीं। इस तरह से बहुत कुछ हुआ था।’

सरदार पटेल ने जोधपुर महाराजा को दिल्ली बुलाया और कहा- ‘क्या पाकिस्तान के साथ जाना है आपको? तो वे घबरा गए, कुछ जवाब नहीं दे पाए और सरदार ने जरा कड़ाई से कहा कि देखिए! अगर आपको जाना है तो आपको भेज दूँ, रियासत नहीं जाएगी। इस प्रकार कुछ डांट-डपट भी की गई। राजमाता ने जब यह सुना कि हनुवंतसिंह को इस तरह सरदार ने कहा है तो उन्होंने मुझसे (गोकुल भाई भट्ट से) कहा कि व्यक्तिगत रूप से गोकुल भाई आप ही ध्यान रखिए कि कोई ऐसी बात न हो। अपने को तो देश के साथ, भारत के साथ रहना है और मेरे लड़के ने कुछ भी किया हो या नहीं किया हो, उसे भूल जाना चाहिए। सरदार साहब उसके ऊपर इतना कुछ न करें। रूआंसी माँ ने भट्टजी से अनुरोध किया कि मेरे सिर पर हाथ रखिए और इसमें मदद करें, ये सब बातें तो हैं। आखिर जोधपुर महाराजा ने मान लिया और भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।’

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जोधपुर नरेश अवश्य ही भोपाल नवाब और महाराजराणा धौलपुर की चाल में फँस कर उन संभावनाओं का पता लगाने के लिए जिन्ना तक पहुँच गये थे कि उनका अधिक लाभ किसमें है, भारत संघ में मिलने में, पाकिस्तान में मिलने में अथवा इन दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर अलग अस्तित्व बनाये रखने में?

गणेश प्रसाद बरनवाल ने लिखा है- ‘जोधपुर और त्रावणकोर के हिन्दू राजाओं ने कुछ अलगाववादी चालाकियां करनी चाहीं किंतु पटेल की सजगता ने उन्हें पानी-पानी कर दिया।’

सबसे पहले सुमनेश जोशी ने जोधपुर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘रियासती’ में जोधपुर नरेश के पाकिस्तान में मिलने के इरादे का भण्डाफोड़ किया। 20 अगस्त 1947 के अंक में ‘राजपूताने के जागीरदारों और नवाब भोपाल के मंसूबे पूरे नहीं हुए’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जोधपुर राज्य के संघ प्रवेश से जो प्रसन्नता यहाँ के राजनैतिक क्षेत्र में हुई है उसके पीछे आश्चर्य भी है कि नये महाराजा ने बावजूद अपने तिलकोत्सव के भाषण के, संघ प्रवेश में क्यों हिचकिचाहट दिखायी?

भोपाल नवाब ने हवाई जहाजों के जरिये 16 रियासतों के साथ सम्पर्क कायम करने का प्रयास किया। उन्होंने जोधपुर के मामले में इसलिए कामयाबी हासिल कर ली क्योंकि उनके चारों तरफ जागीरदार थे जो रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के पक्ष में थे। जैसा कि महाराजा साहब के ननिहाल ठिकाने के प्रेस से प्रकाशित क्षत्रिय वीर के एक लेख में इशारा था, पाकिस्तान जागीरी प्रथा के प्रति उदार है जबकि हिन्दुस्तान इस प्रथा को उठाना चाहता है।

अतः पैलेस के जागीरदार स्वभावतः हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को ज्यादा पंसद करते हैं। इससे जोधपुर रियासत की काफी बदनामी हुई है। हिन्दुस्तान यूनियन से दूर रहने का जो षड़यंत्र किया गया था उसमें यह भी प्रचारित किया गया था कि सर स्टैफर्ड क्रिप्स हिन्दुस्तान आयेंगे तथा उनसे बातचीत करके रियासतों का सम्बन्ध सीधा इंगलैण्ड से करवा दिया जायेगा। इस नाम पर बहुत लोग बेवकूफ बनने वाले थे।

अतः और लोगों को भी पाकिस्तान की तरफ से स्वतंत्र रहने का लोभ दिया गया। जोधपुर की अस्थायी हिच, इन समस्त बातों का सामूहिक परिणाम था। जाम साहब के पास भी भोपाल का संदेश गया था पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उदयपुर महाराजा के पास जोधपुर का संदेश गया जिसका महाराणा ने कड़ा उत्तर दिया। ऐसेम्बली लॉबी में भी जोधपुर का यूनियन में प्रवेश अत्यंत चर्चा का विषय है।

इतिहास में बहुत से तथ्य ऐसे होते हैं जिनके बारे में सही या गलत का निर्णय करना कठिन होता है। महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका के सम्बन्ध में ठीक ऐसा ही हुआ था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

थारपारकर

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जोधपुर राज्य के पश्चिमी भाग में थारपारकर नामक एक भौगोलिक एवं सास्कृतिक क्षेत्र था। इस क्षेत्र में आबादी कम थी तथा यह सोढ़ा राजपूतों द्वारा शासित क्षेत्र था। सोढ़ा राजपूत विख्यात परमारा राजपूतों की ही एक शाखा थे जो अपने किसी पूर्वज के नाम पर सोढ़ा कहलाने लगे थे। जब भारत को आजादी मिली तो रैडक्लिफ आयोग ने थारपारकर को पाकिस्तान में मिला दिया। इससे सोढ़ा राजपूतों में बड़ी बेचैनी फैली।

थारपारकर के इतिहास की चर्चा करने से पहले हमें दिल्ली में जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह, मुहम्मद अली जिन्ना एवं सरदार पटेल के बीच चल रही रस्साकशी पर चर्चा करनी होगी जिसके सम्बन्ध में हम विगत कुछ कड़ियों में चर्चा कर आए हैं।

रियासती विभाग के सचिव की कनपटी पर पिस्तौल

जब 9 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन महाराजा हनवंतसिंह को लेकर वायसराय के पास गये तथा वायसराय के कहने पर मेनन ने महाराजा को विशेष रियायतें देने की बात मान ली तब वायसराय ने मेनन से कहा कि वे महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लें और वायसराय हैदराबाद के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने अंदर चले गये।

वायसराय की अनुपस्थिति में महाराजा ने एक रिवॉल्वर निकाली और मेनन से कहा कि- ‘यदि तुमने जोधपुर की जनता को भूखों मारा तो मैं तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा परंतु महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। मेनन के अनुसार हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देने के बाद माउंटबेटन दूसरे कमरे से चले गये और महाराजा ने अपना रिवॉल्वर निकालकर मेनन की तरफ करके कहा- ‘मैं तुम्हारे संकेत पर नहीं नाचूंगा।’

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मेनन ने कहा कि- ‘यदि आप सोचते हैं कि मुझे मारकर या मारने की धमकी देकर प्रविष्ठ संलेख को समाप्त कर सकते हैं तो यह आपकी गंभीर भूल है। बच्चों जैसा नाटक बंद कर दें। इतने में ही माउंटबेटन लौट आये। मेनन ने उन्हें पूरी बात बतायी। माउंटबेटन ने इस गंभीर बात को हलका करने का प्रयत्न किया और हँसी-मजाक करने लगे। जब तक जोधपुर नरेश की मनोदशा सामान्य हो गयी। मैं उन्हें छोड़ने के लिए उनके निवास तक गया।’

ओंकारसिंह के अनुसार महाराजा के पास रिवॉल्वर नहीं, एक छोटा पैन-पिस्तौल था जिसे उन्होंने स्वयं ही बनाया था। इसी पैन-पिस्तौल से उन्होंने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किए थे। हस्ताक्षर करने के पश्चात् महाराजा ने मजाक में मेनन से कहा था कि मैंने जिस पैन से हस्ताक्षर किए हैं, उसी से तुम्हें भी मार सकता हूँ। मेनन भयभीत हो गये। इस पर महाराजा खूब हँसे। जब महाराजा ने पैन का एक हिस्सा खोलकर बताया कि वह पैन, पिस्तौल का भी काम कर सकता है तो मेनन भौंचक्के रह गये।

उसी समय लॉर्ड माउंटबेटन कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने सारे प्रकरण को परिहास के रूप में लिया। महाराजा हनवंतसिंह ने ये तथ्य नवम्बर 1947 में ओंकारसिंह को बताये थे। महाराजा ने यह पैन-पिस्तौल लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। माउंटबेटन उसे लंदन ले गये तथा लंदन के मैजिक सर्कल के संग्रहालय में रखने हेतु भेंट कर दिया। यह पैन-पिस्तौल आज भी लंदन में सुरक्षित है। अंत में महाराजा को विलय पत्र पर हस्ताक्षकर करने पड़े।

सोढ़ों का थारपारकर पाकिस्तान में चला गया

सिंध में सोढ़ा हिन्दू राजपूतों का सदियों पुराना ऊमरकोट नामक राज्य था। मुगलों के भारत आगमन से पूर्व से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता होने तक ऊमरकोट क्षेत्र जोधपुर राज्य का भाग था और एक संधि के अंतर्गत भारत की आजादी से लगभग एक शताब्दी पूर्व ब्रिटिश सरकार को दिया गया था। जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह इसे फिर से प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहे थे किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। जब भारत विभाजन योजना स्वीकार कर ली गयी तो सिंध के सोढ़ा राजपूतों के एक शिष्टमंडल ने जोधपुर आकर महाराजा हनवंतसिंह से प्रार्थना की कि सिंध प्रांत के थारपारकर जिले को भारत व जोधपुर राज्य में मिलाने का प्रयत्न करें।

हनवंतसिंह ने वायसराय को लिखा कि ऊमरकोट को फिर से जोधपुर राज्य को लौटाया जाये परंतु वायसराय ने यह कहकर इस विषय पर विचार करने से इन्कार कर दिया कि देश के विभाजन व स्वतंत्रता के दिन निकट हैं और सीमा के सारे विवाद रैडक्लिफ आयोग के विचाराधीन हैं अतः अब इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।

सोढ़ा राजपूतों ने इस विषय पर एक पत्र केंद्र सरकार को लिखा और उसकी प्रतिलिपियां नेहरू को भी दीं कि उनकी भाषा व संस्कृति मारवाड़ राज्य की भाषा और संस्कृति से काफी मिलती है। उनके अधिकांश विवाह सम्बन्ध भी जोधपुर राज्य में होते रहे हैं। अतः उनके क्षेत्र को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सोढ़ों की इस मांग का समर्थन अखिल भारतीय हिन्दू धर्मसंघ ने भी किया। धर्मसंघ की मांग थी कि हिन्दू बहुलता के आधार पर सिंध प्रांत के दो टुकड़े कर दिए जायें एवं नवाबशाह, हैदराबाद, थारपारकर तथा कराची जिले के एक भाग को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सिंध की प्रांतीय कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया।

सिंध प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष डा. चौइथराम गिडवाणी ने भारत सरकार से अपील की कि थारपारकर जिले में हिन्दुओं का स्पष्ट बहुमत है अतः उसे जोधपुर राज्य में मिलाना न्यायसंगत होगा। महाराजा हनवंतसिंह ने दिल्ली में अनेक नेताओं से बातचीत की किंतु इस विषय पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अतिरिक्त किसी अन्य नेता ने रुचि नहीं ली। मुखर्जी केंन्द्रीय मंत्रिमण्डल में अल्पमत में थे अतः उनके प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला और सोढ़ा हिन्दू जागीरदारों का सदियों पुराना थारपारकर राज्य सदैव के लिए पाकिस्तान में चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू शरणार्थियों की समस्या

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जोधपुर राज्य में पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या

पाकिस्तान से लगने वाली 325 किलोमीटर लम्बी सीमा पर शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। जोधपुर राज्य की सरकार ने हिन्दू शरणार्थियों की समस्या को बहुत ही सामान्य ढंग से सुलझाने का प्रयास किया। इसका सबसे बड़ा कारण महाराजा हनवंतसिंह का दिल्ली की राजनीति में व्यस्त होना था। जोधपुर राज्य के कर्मचारियों में घूसखोरी का बोलबाला था। इस कारण हन्दू शरणार्थियों की समस्या विकराल हो गई।

28 अगस्त 1947 को मारवाड़ जंक्शन में एस. के. मुखर्जी की अध्यक्षता में एक शरणार्थी शिविर खोला गया जिसमें 2 लाख शरणार्थियों के अस्थायी निवास, भोजन, आश्रय तथा चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिविर में कई महिलाओं ने बच्चों को भी जन्म दिया जिन्हें स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करवायी गयीं।

शिशुओं के लिए दूध की व्यवस्था की गयी। बहुत सी संस्थाओं तथा दानी लोगों ने इस शिविर को धन, दवायें, कपड़े तथा भोजन प्रदान किया। बहुत से लोगों ने शिविर में उपस्थित होकर निशुल्क सेवायें प्रदान कीं। महाराजा जोधपुर के अतिरिक्त बी. डी. एण्ड सी. आई. रेलवे, श्री उम्मेद मिल्स पाली तथा सोजत रोड प्रजा मण्डल ने भी शिविर को महत्त्वपूर्ण सहायता उपलब्ध करवायी।

सितम्बर 1947 में सिंध प्रांत के प्रधानमंत्री एम. ए. खुसरो ने अपने सलाहकार एवं सिंध के बड़े नेता मोहम्मद हसीम गजदर को इस आशय से जोधपुर भेजा कि वे जोधपुर के मुसलमानों को समझायें कि वे जोधपुर के सुशासित एवं शांतिपूर्ण राज्य को छोड़कर पाकिस्तान नहीं आयें। जोधपुर राज्य में आये हुए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या सुलझाने एवं शरणार्थियों को सुविधायें देने के लिए मारवाड़ शरणार्थी एक्ट 1948 बनाया गया।

इस एक्ट के तहत पंजीकृत शरणार्थियों को मारवाड़ राज्य में मारवाड़ियों के समान अधिकारों के आधार पर नौकरियां दी गयीं। जोधपुर राज्य में लगभग 46 हजार शरणार्थी पाकिस्तान से आये जिन्हें राज्य की ओर से मकान, भूखण्ड एवं कर्ज उपलब्ध करवाये गये। शरणार्थियों के लिए राज्य की ओर से विद्यालय तथा नारी-शालायें बनायी गयीं। सिंध से आने वाले अधिकांश शरणार्थी जोधपुर नगर में ही बस गये।

उमरकोट में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों ने महाराजा जोधपुर से प्रार्थना की कि महाराजा इस क्षेत्र के पुष्करणा परिवारों को पाकिस्तान से निकालने की व्यवस्था करें क्योंकि इस क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए केवल उँट ही एकमात्र सवारी है तथा बड़े आकार वाले गरीब पुष्करणा ब्राह्मण परिवारों के लिए उँट की पीठ पर इतना लम्बा मार्ग पार करके निकल पाना संभव नहीं है। इन परिवारों ने स्वयं को मूलतः जोधपुर राज्य के शिव एवं पोकरण क्षेत्र की प्रजा बताते हुए महाराजा से रोजगार, काश्त हेतु भूमि एवं आवास की भी मांग की।

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मीरपुरखास के डिप्टी कलक्टर कार्यालय के हैडक्लर्क शामदास ताराचंद ने महाराजा को पत्र लिखकर मांग की कि इस क्षेत्र में पुष्करणा ब्राह्मणों के परिवारों से कुल 50 व्यक्ति राजकीय सेवा में हैं उन्हें जोधपुर राज्य की सेवा में नौकरी दी जाये। इनमें से 1 डिप्टी सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ पुलिस, 1 मैडिकल ऑफीसर, 1 नायब तहसीलदार एवं सैकेण्ड क्लास मजिस्ट्रेट, 1 सबइंसपेक्टर ऑफ पुलिस, 5 अंग्रेजी के अध्यापक, 15 हिन्दी के अध्यापक, 10 महिला अध्यापक, 4 कम्पाउण्डर, 5 पुलिस हैडकांस्टेबल तथा 5 राजस्व विभाग के लिपिक हैं।

जोधपुर से हज यात्रा पर गये हुए कुछ मुस्लिम परिवारों ने 2 अक्टूबर 1947 को मक्का से महाराजा हनवंतसिंह को लिखा कि हम अपने परिवारों को खुदा के भरोसे पर जोधपुर में छोड़कर आये थे किंतु यहाँ हमें अपने बच्चों तथा परिवारों से लगातार सूचना मिल रही है कि जोधपुर राज्य में उनकी जान को खतरा है। यद्यपि हमें विश्वास है कि जोधपुर राज्य के हिन्दू, मुसलमानों से झगड़ा नहीं करेंगे किंतु जोधपुर राज्य में बाहर से आने वाले सिक्खों के दबाव में वे ऐसा कर सकते हैं। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उनके जीवन की रक्षा करें।

इस पत्र की प्रति राजमाता को भी भेजी गयी। पाकिस्तानी नेता एच. एस. सुहरावर्दी ने 18 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा को पत्र लिखकर जोधपुर राज्य में सांप्रदायिक स्थितियों पर कड़ी आपत्ति जताई। उसने लिखा कि मुझे शिकायत प्राप्त हुई है कि अहमदाबाद-कराची के बीच यात्रा करने वाले मुस्लिम यात्रियों को लूनी एवं हैदराबाद-सिंध के बीच स्थित बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर लूटा जा रहा है जो कि आपके क्षेत्राधिकार में है। राजस्थान की रियासतों में शरणार्थियों की समस्याओं पर विचार करने के लिए 6 नवम्बर 1947 को भारत सरकार के गृह-मंत्रालय ने अलवर, भरतपुर, बीकानेर, जयपुर तथा जोधपुर राज्य के राजाओं की एक बैठक बुलाई।

टाण्डो मुहम्मद खान से महाराज किशनचंद्र शर्मा ने 29 अक्टूबर 1947 को पत्र लिखकर जोधपुर महाराजा से मांग की कि सिंध-हैदराबाद जिले के टाण्डो डिवीजन में 5-6 गौशालायें हैं जिनमें 1000-1500 गायें हैं। चूंकि इस क्षेत्र के सम्पन्न परिवार मारवाड़ को पलायन कर गये हैं इसलिए इन गौशालाओं की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है तथा गायों की स्थिति करुणा जनक है। उनके लिए 20-25 गरीब ब्राह्मण परिवार ही शेष बचे हैं। अतः आप इम्पीरियल बैंक के माध्यम से गौशालाओं के लिए धन भिजवायें।

सिंध से आये कई पुष्करणा ब्राह्मणों ने जो कि ज्योतिष का काम करते थे, हनवंतसिंह को अलग-अलग पत्र लिखकर अनुरोध किया कि हमें राजज्योतिषी नियुक्त किया जाये। इन पत्रों में इच्छा व्यक्त की गयी कि महाराजा हमसे आशीर्वाद लेने के लिए हमें बुलाये। जोधपुर महाराजा की फाइल में एक गुमनाम पत्र लगा हुआ है। यह पत्र महाराजा के निजी सचिव के कार्यालय में 18 नवम्बर 1947 को प्राप्त हुआ था।

इस पत्र में किसी व्यक्ति ने महाराजा से शिकायत की है कि जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आ रहे हैं उन्हें रेलवे कर्मचारियों एवं कस्टम वालों द्वारा तंग किया जा रहा है और रिश्वत मांगी जा रही है। शरणार्थियों द्वारा लाये गये सामान की मात्रा अधिक बताकर उसका किराया मांगा जा रहा है तथा पैसा न होने पर सामान छीन लिया जाता है। उधर तो हिन्दुओं को पाकिस्तान ने लूट लिया और इधर हिन्दूओं को हिन्दू ही लूट रहे हैं।

महाराजा अपने गुप्तचरों के माध्यम से पता लगवायें तथा शरणार्थियों की रक्षा करें। शरणार्थियों के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो रहा। कल की ही बात है कि जो मुसलमान हज करके लौटे हैं उनके पास बहुत सामान था किंतु न तो कस्टम वालों ने चैक किया और न रेलवे वालों ने सामान तोल कर देखा। ऐसे ही एक टंकित गुमनाम पत्र में महाराजा को शिकायत की गयी है कि सिंध से आये शरणार्थियों को राशन एवं आवास के स्थान पर लातें और मुक्के मिल रहे हैं जबकि पाकिस्तान पहुंचने वाले शरणार्थियों को पाकिस्तान में पूरा राशन, रोजगार और सुविधायें मिल रही हैं।

जो हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भारत भाग आये हैं, पाकिस्तानी अधिकारी उन हिन्दुओं के घरों के ताले तोड़कर उन्हें उन मकानों में घुसा रहे हैं। इसके विपरीत जोधपुर राज्य के मकान मालिक हिन्दू शरणार्थियों से 10-15-20 गुना किराया मांग रहे हैं। 6 से 12 माह तक का किराया एक साथ लिया जा रहा है। शरणार्थियों को अपने आभूषण बेचने पड़ रहे हैं। शरणार्थियों के लिए अलग से कॉलोनी बनायी जाये।

इस प्रकार जोधपुर राज्य में पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या सुलझाने के लिए बहुत ही सामान्य प्रयास किए गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरकारी कर्मचारियों की समस्या

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भारत के विभाजन से न केवल भारत सरकार के सम्मुख अपित देशी रियासतों की सरकारों के सम्मुख सरकारी कर्मचारियों की समस्या उत्पन्न हो गई।

देश के विभाजन के समय सांप्रदायिक समस्या उठ खड़ी होने से जोधपुर रेलवे के कुछ कर्मचारियों को अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान से निकल पाना कठिन हो गया। ऐसे 600 हिन्दू कर्मचारी जो सिंध प्रांत में नियुक्त थे, पाकिस्तान से निकलने में आई कठिनाई के कारण कुछ दिनों तक अपने काम पर नहीं आ सके। जब वे भारत लौटे तो रेलवे ने उन्हें काम पर नहीं लिया गया तथा 3 माह तक निलम्बित रखने के पश्चात सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया।

इस पर जोधपुर के रेलवे स्टाफ ने 28 नवम्बर 1947 को प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भिजवाया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह ज्ञापन रेलवे मंत्रालय को भिजवा दिया। रेल मंत्रालय ने रियासती विभाग को सूचित किया कि वह इस प्रकरण में कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। रियासती मंत्रालय ने रेलवे मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश दे रखे थे कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर राज्यों से रेलवे मंत्रालय द्वारा सीधा पत्राचार नहीं किया जाना चाहिये।

इसी प्रकार जोधपुर कर्मचारी संघ ने रियासती विभाग के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत कर मांग की कि इस कर्मचारी संघ को सरकार द्वारा मान्यता दी जानी चाहिये। कर्मचारियों के वेतन एवं भत्ते वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ाये जाने चाहिये। महंगाई भत्ता बढ़ाया जाना चाहिये। श्रमिकों के लिए पुस्तकालय एवं क्लब की सुविधा होनी चाहिये। श्रमिकों एवं उनके परिवारों के लिए निःशुल्क चिकित्सालय होना चाहिये। रियासती विभाग द्वारा इस प्रकरण को राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को आबू भिजवा दिया गया।

चूंकि रेलवे अपने स्तर पर जोधपुर राज्य की सरकार से कोई बात नहीं कर सकती थी, इसलिए सरकारी कर्मचारियों की समस्या बढ़ गई।

जोधपुर रेलवे की सम्पत्ति की निकासी

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स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सिंध क्षेत्र ब्रिटिश-भारत की बम्बई प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था। ई.1900 में जोधपुर रेलवे ने 133.40 मील लम्बी रेल लाइन बालोतरा से पश्चिमी सीमा में ब्रिटिश राज्य की सीमा में बनायी थी। भारत सरकार ने 1 जनवरी 1929 को मीरपुर खास से जुडे़ खण्डों को सिंध लाइट रेल्वे कम्पनी लिमिटेड से खरीद कर जोधपुर रेलवे को प्रबंधन हेतु सौंप दिया। ई.1939 में जोधपुर रेलवे द्वारा खाडरू से नवाबशाह तक 30.72 मील लम्बा रेलमार्ग बिछाया गया। इसे 29 नवम्बर 1939 को आरंभ किया गया। 31 दिसम्बर 1942 को पुनः भारत सरकार ने सिंध लाइट रेलवे से मीरपुर खास से खाडरू तक का 49.50 मील लम्बा रेलमार्ग भी खरीद कर जोधपुर रेलवे को सौंप दिया जिससे जोधपुर रेलवे के ब्रिटिश खण्ड की लम्बाई 318.74 मील हो गयी। इस पथ पर रेल संचालन जोधपुर रेलवे द्वारा किया जाता था तथा सारा रॉलिंग स्टॉक जोधपुर रेलवे का था।

जब सिंध क्षेत्र के पाकिस्तान में जाने के संकेत मिलने लगे तो उस समय जोधपुर रेलवे के मुख्य अभियंता सी. एल. कुमार ने सिंध क्षेत्र में स्थित रेलवे स्टेशनों एवं वहाँ कार्यरत निर्माण निरीक्षक एवं रेलपथ निरीक्षक कार्यालयों के भण्डारगृहों में पड़ी रेल-सम्पत्ति को जोधपुर में लाने का कार्य अत्यंत दक्षता एवं बुद्धिमत्ता से किया। यदि समय रहते यह कदम नहीं उठाया गया होता तो लाखों रुपये की रेल-सामग्री पाकिस्तान में रह गयी होती।

जोधपुर रेलवे के रॉलिंग स्टॉक के हस्तांतरण की तिथि 31.7.1947 निश्चित की गयी थी किंतु पाकिस्तान सरकार ने इस तिथि से कुछ दिन पूर्व ही 6 इंजन, 75 कोच, 4 ऑफीसर्स कैरिज तथा 300 से अधिक वैगन बलपूर्वक रोक लिए। इसका मूल्य 17 लाख रुपये आंका गया। इससे जोधपुर एवं पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेल सेवा ठप्प हो गयी।

जोधपुर सरकार ने पाकिस्तान सरकार से मांग की कि वह रोके गये रॉलिंग स्टॉक तथा पाकिस्तान में निकलने वाले जोधपुर राज्य के 50 लाख रुपये के राजस्व का भुगतान करे तथा अपना प्रतिनिधि जोधपुर भेजकर मामले का निस्तारण करे किंतु पाकिस्तान सरकार ने जोधपुर सरकार की कोई बात नहीं सुनी। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास ने पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त श्री प्रकाश से बात की। अंत में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से पाकिस्तान सरकार ने 50 लाख रुपये जोधपुर सरकार को देने तय किए।

इस प्रकार जोधपुर राज्य सरकारी कर्मचारियों की समस्या सुलझाने में विफल रहा। भारत सरकार के सहयोग से ही सरकारी कर्मचारी अपने हितों की रक्षा कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बीकानेर रियासत का भारत में विलय

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बीकानेर रियासत का भारत में विलय - bharatkaitihas.com
बीकानेर रियासत का भारत में विलय

बीकानेर रियासत राज्य भारत के थार रेगिस्तान में स्थित एक पुरानी रियासत थी जो ई.1465 के आसपास अस्तित्व में आई थी। इसके शासक जोधपुर राज्य के राठौड़ वंश में से ही निकले थे। भारत की आजादी के समय सादुलसिंह बीकानेर का राजा था। संविधान सभा में प्रतिनिधि भेजने से लेकरभारत संघ में विलय की घोषणा के मामले में बीकानेर देश के समस्त देशी राज्यों में अग्रणी रहा किंतु महाराजा स्वतंत्र भारत में अपने अधिकारों को लेकर अत्यंत सतर्क था।

15 जुलाई 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा जिसमें 110 पैरागा्रफ थे। महाराजा ने लिखा कि प्रजा परिषद वाले, राज्य में इस प्रकार का प्रचार कर रहे हैं कि निकट भविष्य में समस्त भारत में गांधी-राज हो जायेगा और भारतीय राज्य भी उन में मिला लिए जायेंगे। तिरंगा ही एकमात्र झण्डा होगा।

जबकि वास्तविकता तो यह है कि न तो गांधीजी के ऐसे विचार हैं और न ही भारतीय राज्य भारत में अपने अस्तित्व को सम्मिलित करने जा रहे हैं। इस पत्र से यह आभास होता है कि बीकानेर नरेश भले ही जोर-शोर से भारत संघ में मिलने की घोषणा कर रहे था किंतु वह यह आश्वासन भी चाहता था कि स्वतंत्र भारत में उसकी रियासत पूरी तरह स्वतंत्र बनी रहेगी।

फिरोजपुर वाटर हैड वर्क्स का मामला

ब्रिटिश सरकार की घोषणा के अनुसार भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित किए जाने वाले क्षेत्रों का निर्णय हिन्दू अथवा मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर होना था। इस आधार पर पाकिस्तान ने पंजाब के फिरोजपुर स्थित ‘वाटर हैड वर्क्स’ पर भी अपना दावा जताया।

इस नहर से बीकानेर रियासत की एक हजार वर्ग मील से अधिक भूमि सिंचित होती थी। महाराजा सादूलसिंह ने बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्निकर, जस्टिस टेकचंद बक्षी और मुख्य अभियंता कंवरसेन को बीकानेर राज्य का पक्ष रखने के लिए नियुक्त किया।

पन्निकर ने रियासती विभाग के मंत्री तथा विभाजन हेतु गठित उच्चस्तरीय परिषद के सदस्य सरदार पटेल पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वे सुनिश्चत कर लें कि फिरोजपुर हैड वर्क्स पूर्णतः भारत सरकार द्वारा नियंत्रित रहेगा। महाराजा ने माउंटबेटन तथा पटेल को संदेश भिजवाया कि यदि फिरोजपुर हैड वर्क्स और गंगनहर का एक भाग पाकिस्तान में जाता है तो हमारे लिए पाकिस्तान में सम्मिलित होने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा।

अंग्रेजों ने उनकी समस्या को समझा तथा उन्हें आश्वासन दिया कि फिरोजपुर हैडवर्क्स भारत में ही रहेगा। 17 अगस्त 1947 को जब रेडक्लिफ रिपोर्ट प्रकाशित हुई तब उसमें फिरोजपुर हैड वर्क्स को भारत में बने रहने का निर्णय हुआ।

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6 अगस्त 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। यथास्थिति समझौता पत्र पर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्न्किर द्वारा हस्ताक्षर किए गये। रियासती विभाग ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वायसराय और सरदार पटेल ने महाराजा द्वारा निर्वहन की गयी भूमिका के प्रति आभार व्यक्त किया है। संक्षिप्त अवधि में ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करके महाराजा ने भारत तथा राज्यों के समान हित के लिए त्याग किया है। वायसराय तथा सरदार पटेल ने आशा व्यक्त की है कि इस विलय पत्र के माध्यम से प्रस्तुत उदाहरण से, आने वाले समय में भारत तथा राज्यों के मध्य सहयोग का एक नया युग आरंभ होगा जो संपूर्ण देश को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से मजबूत बनायेगा। इस प्रविष्ठ संलेख के द्वारा महाराजा ने रक्षा, संचार और विदेश मामलों पर अपनी सारी सत्ता केंद्र सरकार को सौंप दी और शेष विषयों में महाराजा ने अपने आप को स्वतंत्र मान लिया। अधिकांश रियासतों ने भवितव्य के आगे सिर झुका कर प्रविष्ठ संलेख पर दस्तखत कर दिए। इनमें सबसे पहला बीकानेर का महाराजा था, जो वायसराय का पुराना दोस्त था। बड़े नाटकीय अंदाज में उसने हस्ताक्षर किए।

15 अगस्त 1947 को महाराजा ने एक भाषण में कहा-

‘ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के साथ भारतीय रियासतों को यह छूट थी कि वे अलग रहें और नये राष्ट्र के साथ सम्बन्धित होने से मना कर दें। कानूनी दृष्टि से आज हम समस्त स्वतंत्र हो सकते हैं क्योंकि हमने ब्रिटिश साम्राज्य को आधिपत्य का जो अधिकार सौंपा था, वह भारतीय स्वतंत्रता कानून के अंतर्गत हमें वापिस मिल गया।

हम अलग रह सकते थे और भारतीय राष्ट्र में विलय नहीं करते। एक क्षण के विचार से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि इसका परिणाम कितना विनाशकारी होता। शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात आ गयी थी कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जायेगा।

इसके परिणाम का पूर्व ज्ञान रखते हुए मैंने बिना हिचकिचाहट के भारत के उन तत्वों के साथ सहयोग करने का निश्चय किया जो एक मजबूत केन्द्रीय सरकार की स्थापना के लिए कार्य कर रहे थे।’

सरदार पटेल ने देशी राज्यों के भारत में विलय के पश्चात महाराजा सादूलसिंह का धन्यवाद करते हुए उन्हें लिखा कि-

‘राजाओं को गलत राह पर ले जाने के लिए जान-बूझकर जो संदेह और भ्रम उत्पन्न किए गये उन्हें मिटाने में महाराजा ने जो कष्ट किया, उससे मैं भलीभांति परिचित हूँ। महाराजा का नेतृत्व निश्चय ही समयानुकूल और प्रभावशाली रहा है।’

स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ माह बाद जनवरी 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन बीकानेर राज्य के दौरे पर आये। उन्होंने अपने भाषण में सादूलसिंह की प्रशंसा करते हुए कहा-

‘महाराजा प्रथम शासक थे जिन्होंने भारत का नया संविधान बनाने में मदद देने के लिए संविधान निर्मात्री सभा में प्रतिनिधि भेजकर यह अनुभव कर लिया कि भविष्य में राजा लोगों को क्या करना है। महाराजा पहले शासक थे जिन्होंने रियासतों के अपने पास के संघ में सम्मिलित होने के मेरे प्रस्तावों का समर्थन किया।’

2 सितम्बर 1954 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने बीकानेर में महाराजा सादूलसिंह की मूर्ति का अनावरण करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा की-

‘जब एक ओर भारत के बंटवारे की विपत्ति आ रही थी और दूसरी ओर भारतवर्ष के टुकड़े किए जाने के लिए द्वार खोला जा रहा था, उन्होंने जवांमर्दी, देशप्रेम तथा दूरदर्शिता से अपने आप को खड़ा करके उस दरवाजे का मुँह बंद कर दिया।’

बीकानेर रियासत में पाकिस्तान से शरणार्थियों का आगमन

नव-निर्मित पाकिस्तान के साथ बीकानेर रियासत की लगभग 320 किलोमीटर लम्बी सीमा थी। बीकानेर द्वारा भारत संघ में सम्मिलित होने का निर्णय लेने पर इस सीमा को पार करके लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आये तथा भारत से पाकिस्तान गये। लगभग 7-8 लाख लोग भारत से निकाल कर सुरक्षित रूप से पाकिस्तान पहुंचाये गये। बीकानेर राज्य की सीमा पर बहावलपुर राज्य था जिसमें 1.90 लाख हिन्दू तथा 50 हजार सिक्ख रहते थे।

बहावलपुर राज्य के हासिलपुर में 350 सिक्ख एवं हिन्दू मार डाले गये। इससे बहावलपुर राज्य के अन्य कस्बों एवं गाँवों में भगदड़ मच गयी। 15 अगस्त 1947 के बाद बीकानेर रियासत में लगभग 75 हजार शरणार्थी आये जिनके लिए शरणार्थी शिविरों की स्थापना की गयी। बहुत से लोगों को बीकानेर से 40 किलोमीटर दूर कोलायत भेजा गया। इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से राज्य की व्यवस्थायें गड़बड़ा गयीं। राज्य की ओर से शरणार्थियों के ठहरने व भोजन-पानी की व्यवस्था की गयी।

कोलायत तथा सुजानगढ़ आदि कस्बों में शरणार्थियों को ठहराया गया। गंगानगर क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में शरणार्थी आये। इन शरणार्थियों पर पाकिस्तान में बहुत अत्याचार हुए थे इसलिए वे मुसलमानों से बदला लेने पर उतारू थे। उन्हें शांत रखने तथा मुसलमानों पर आक्रमण न करने देने के लिए राज्य की ओर से सेना लगायी गयी। सेना ने बहुत से मुसलमानों को बहावलपुर राज्य में सुरक्षित पहुंचाया।

जब चूरू के महाजनों ने अपने मुसलमान नौकरों को नौकरी से निकाल दिया तो वे मुसलमान, महाराजा सादूलसिंह के पास बीकानेर आ गये। महाराजा ने विशेष रेलगाड़ी से नौकरों को वापस चूरू भिजवाया तथा महाजनों को कहकर उन्हें वापस नौकरी में रखवाया। जो लोग बीकानेर रियासत छोड़कर पाकिस्तान चले गये थे उन्हें महाराजा ने फिर से बीकानेर राज्य में आकर बसने का न्यौता दिया तथा जो हिंदू शरणार्थी पाकिस्तान से बीकानेर राज्य में आ गये थे उन्हें ब्रिटिश-भारत में भेजने के लिए महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया।

पाकिस्तान से आये 50,746 शरणार्थियों को बीकानेर राज्य द्वारा 2,58,516 बीघा जमीन आवंटित की गयी। बहुत से सिक्ख पाकिस्तान के रहीमयार खान नामक जिले में घेर कर रोक लिए गये। बीकानेर रियासत के अधिकारियों ने बहावलपुर के राज्याधिकारियों से बात करके इन शरणार्थियों को निकलवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैसे बना था पाकिस्तान अब मोहनलाल गुप्ता डॉट कॉम से भी क्रय की जा सकती है।

जूनागढ़ नवाब बेगमों की बजाय कुत्ते लेकर पाकिस्तान भाग गया

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गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित जूनागढ़ रियासत की स्थापना ई.1735 में शेरखान बाबी नामक मुगल सिपाही ने की थी। इसका क्षेत्रफल 3,337 वर्ग मील तथा जनसंख्या 6,70,719 थी। रियासत की 80 से 90 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू थी किंतु शासक मुस्लिम था। अंतिम जूनागढ़ नवाब सर मुहम्मद महाबत खान रसूलखानजी (तृतीय) 11 वर्ष की आयु में शासक बना था।

जूनागढ़ नवाब महाबत खान ने मेयो कॉलेज अजमेर में पढ़ाई की थी। उसे तरह-तरह के कुत्ते पालने तथा शेरों का शिकार करने का शौक था। उसके पास सैंकड़ों कुत्ते थे। एक बार उसने एक कुत्ते का एक कुतिया से विवाह करवाया जिस पर उसने बहुत धन व्यय किया तथा पूरे राज्य में तीन दिन का अवकाश घोषित किया। ई.1947 में मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता सर शाह नवाज भुट्टो को कराची से बुलाकर जूनागढ़ राज्य का दीवान बनाया गया।

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शाह नवाज भुट्टो ने जूनागढ़ नवाब को डराया कि यदि जूनागढ़ भारत में मिला तो सरकार, उसके कुत्तों को मार डालेगी तथा शेरों का राष्ट्रीयकरण कर देगी। जबकि पाकिस्तान में वह अपने कुत्तों को सुरक्षित रख सकेगा तथा निर्बाध रूप से शेरों का शिकार कर सकेगा। यह बात नवाब के मस्तिष्क में बैठ गई। जूनागढ़ रियासत चारों ओर से हिन्दू रियासतों से घिरी हुई थी किंतु रियासत की दक्षिण एवं दक्षिण-पश्चिम सीमा अरब सागर से मिलती थी। जूनागढ़ नवाब ने सोचा कि वह आसानी से पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकता है।

वास्तविकता यह थी कि जूनागढ़ रियासत तथा पाकिस्तान की सीमा के बीच 240 मील की दूरी में समुद्र स्थित था। फिर भी सनकी नवाब भारत में मिलने की बजाय पाकिस्तान में मिलने के लिये तैयार हो गया। वह यह भी भूल गया कि राज्य की 80 प्रतिशत जनता हिन्दू है तथा उसकी रियासत चारों ओर हिन्दू रियासतों से घिरी हुई है जो कि भारत में मिल चुकी हैं।  जब वायसराय की 25 जुलाई 1947 की दिल्ली बैठक के बाद भारत सरकार ने नवाब को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन भिजवाया तो नवाब ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा 15 अगस्त 1947 को समाचार पत्रों में एक घोषणा पत्र प्रकाशित करवाया-

‘पिछले कुछ सप्ताहों से जूनागढ़ की सरकार के समक्ष यह सवाल रहा है कि वह हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करे। इस मसले के समस्त पक्षों पर सरकार को अच्छी तरह गौर करना है। यह ऐसा रास्ता अख्तयार करना चाहती है जिससे अंततः जूनागढ़ के लोगों की तरक्की और भलाई स्थायी तौर पर हो सके तथा राज्य की एकता कायम रहे और साथ ही साथ उसकी आजादी और ज्यादा से ज्यादा बातों पर इसके अधिकार बने रहें। गहरे सोच विचार और सभी पहलुओं पर जांच परख के बाद सरकार ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है और अब उसे जाहिर कर रही है। राज्य का विश्वास है कि वफादार रियाया, जिसके दिल में राज्य की भलाई और तरक्की है, इस फैसले का स्वागत करेगी।’

जूनागढ़ नवाब की यह घोषणा न केवल भारत के एकीकरण के लिए काम कर रहे सरदार पटेल को, अपितु रियासती जनता को भी सीधी चुनौती थी।

जूनागढ़ नवाब द्वारा पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करने से जूनागढ़ की जनता में बेचैनी फैल गई तथा जनता ने नवाब की कार्यवाही का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्र अस्थायी सरकार स्थापित कर ली। भारत सरकार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली को तार भेजकर कहलवाया कि वह जूनागढ़ के सम्मिलन को अस्वीकृत कर दे।

लॉर्ड माउण्टबेटन ने इस तार को चीफ ऑफ द गवर्नर जनरल्स स्टाफ लॉर्ड इस्मे के हाथों कराची भिजवाया। लियाकत अली ने भारत सरकार की इस मांग को यह कहकर मानने से अस्वीकार कर दिया कि जो टेलिग्राम लॉर्ड इस्मे के साथ भेजा गया है, उस पर सम्बन्धित मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था।

13 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ नवाब का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा। पाकिस्तान से एक छोटी टुकड़ी समुद्र के रास्ते जूनागढ़ को रवाना कर दी गई। पाकिस्तान की यह कार्यवाही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य, हुए उस समझौते का उल्लंघन थी जिसमें दोनों पक्षों ने यह मान लिया था कि भारत की सीमाओं से घिरी हुई रियासतों को भारत में ही मिलना होगा।

जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलने की घोषणा को पाकिस्तान द्वारा स्वीकार कर लिये जाने के बाद, नवाब मुहम्मद महाबत खानजी के सैनिकों ने, जूनागढ़ राज्य की हिन्दू जनता का उत्पीड़न करना आरम्भ कर दिया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू, जूनागढ़ छोड़कर भाग जायें। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था।

नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया। उन रियासतों ने भारत सरकार से सहायता मांगी। माउण्टबेटन ने सुझाव दिया कि इस मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल को यह सुझाव पसंद नहीं आया। वे जूनागढ़ को कड़ा सबक सिखाकर हैदराबाद और काश्मीर को भी चुनौती देना चाहते थे।

24 सितम्बर 1947 को भारत सरकार ने काठियावाड़ डिफेंस फोर्स से जूनागढ़ के विरुद्ध कार्यवाही करने को कहा। इस सेना ने जूनागढ़ को चारों तरफ से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया।

24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया। वह अपनी चार बेगमों एवं सैंकड़ों कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम तथा बहुत से कुत्ते जूनागढ़ में ही छूट गये। नवाब अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गये। 9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया।

20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया तथा 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को पाकिस्तान में जूनागढ़ नवाब नवाब मुहम्मद महाबत खानजी की मृत्यु हुई। जूनागढ़ का दीवान शाह नवाज भुट्टो भी पाकिस्तान चला गया जहाँ उसे कराची में बहुत बड़ी जमीन दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैदराबाद निजाम को विश्वास था कि अंग्रेज हैदराबाद को अलग देश बना देंगे!

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15 अगस्त 1947 तक भारत में न मिलने वाली दूसरी रियासत हैदराबाद थी। हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में मुगल सूबेदार चिनकुलीजखाँ ने की थी। उसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई.1798 में हैदराबाद निजाम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि (सबसीडरी एलायंस) की।

हैदराबाद निजाम को अंग्रेज सरकार द्वारा 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,14,190 वर्ग किलोमीटर था। यह भारत का सबसे बड़ा तथा सबसे समृद्ध देशी राज्य था। क्षेत्रफल में वह फ्रांस जितना बड़ा था। हैदराबाद राज्य की जनसंख्या लगभग 1,63,40,000 थी। वर्तमान में स्थित महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश प्रांतों के भू-भाग, हैदाराबाद राज्य में स्थित थे। जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु राज्य की 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। ]

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हैदराबाद राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी। निजाम को भारत का सबसे अमीर शासक माना जाता था। निजाम प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था।

निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे। राज्य की समस्त नौकरियां मुसलमानों के लिये आरक्षित थीं। ई.1947 में हैदाराबाद में एक विधान सभा बनाई गई जिसमें 48 पद मुसलमानों के लिये तथा 38 पद हिन्दुओं के लिये रखे गये ताकि कोई कानून ऐसा न बन सके जो मुसलमान रियाया के अधिकारों के विरुद्ध हो। इस विधानसभा को इतने अधिकार दिये गये कि यदि निजाम स्वयं भी चाहे तो मुसलमान रियाया के अधिकारों में कटौती न कर सके। निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति, ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था। इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था।

निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा।

जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। निजाम, लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा।

हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि- ‘हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।’

9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने मन की अकुलाहट को खुलकर व्यक्त किया-

‘पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां क्लॉज जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया।

यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करता है बल्कि यह आभास भी देता है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा।

जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही। इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है।

मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया।

आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले। मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये।

लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है। मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।’

इस पर वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैदराबाद रियासत को सरदार पटेल ने भारत में मिला लिया !

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ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद रियासत के लिये एक ही रास्ता बचा था कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाये किंतु हैदराबाद के अधिकारियों एवं कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर चल रहे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के अधिकारियों ने नवाब को सलाह दी कि वह वायसराय की सलाह को न माने। 7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने सरदार पटेल के निर्देश पर हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया।

हैदराबाद निजाम ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने के लिये रियासती पुलिस के साथ-साथ कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक हो गया। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।

वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में निजाम ने भारत के साथ ‘स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट’ पर दस्तख्त कर दिये जिसके अनुसार भारत और हैदराबाद के बीच पोस्ट ऑफिस, टेलिग्राफ, रेल, सड़क यातायात एवं व्यापार आदि सुचारू रूप से जारी रहें परन्तु निजाम, भारत संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा।

निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकरों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ताकि वे रियासत छोड़कर भाग जायें। रजाकारों की हिंसक वारदातों से रियासत में शान्ति एवं व्यवस्था बिगड़ गई।

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हैदराबाद रियासत से होकर गुजरने वाले रेलमार्गों तथा सड़कों को क्षतिग्रस्त किया जाने लगा तथा रेलों एवं बसों से यात्रा करने वाले हिन्दुओं को लूटा जाने लगा। इससे स्थिति बहुत खराब हो गई।

मुस्लिम रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भारत सरकार को धमकी दी कि वे सम्पूर्ण भारत को जीतकर दिल्ली के लाल किले पर निजाम का आसफजाही झण्डा फहरायेंगे। इसके बाद हैदराबाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्याएं की जाने लगीं तथा उनकी सम्पत्ति को लूटा अथवा नष्ट किया जाने लगा।

माउण्टबेटन, सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने निजाम को समझाने का प्रयास किया परन्तु अब स्थिति निजाम के नियन्त्रण में भी नहीं रही थी। रजाकार और कट्टर मुल्ला-मौलवी, मुसलमान जनता को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे थे। सरदार पटेल और वी. पी. मेनन तब तक चुप रहे जब तक कि माउण्टबेटन इंग्लैण्ड नहीं लौट गये।

जून 1948 में माउण्टबेटन के इंग्लैण्ड लौट जाने के दो माह बाद, सितम्बर 1948 में निजाम ने घोषणा की कि वह माउण्टबेटन योजना को स्वीकार करने के लिये तैयार है। इस पर 13 सितम्बर 1948 को पटेल ने उत्तर दिया- ‘अब बहुत देरी हो चुकी। माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है।’

उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे। इसलिये उन्होंने उसी दिन भारतीय सेना को हैदराबाद को भारत में एकीकृत करने के आदेश दिये। इस कार्यवाही को ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया। मेजर जनरल जोयन्तोनाथ चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना हैदराबाद में प्रवेश कर गई। पांच दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने मुस्लिम रजाकारों के प्रतिरोध को कुचल डाला। हजारों रजाकार मारे गये। पूरे हैदराबाद में रजाकरों के शव पड़े हुए दिखाई देने लगे।

17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद के सेनापति जनरल ई.आई. एड्रूस ने सिकंदराबाद में जनरल चौधरी के समक्ष समर्पण कर दिया। इस प्रकार केवल 5 दिन की सशस्त्र-कार्यवाही में हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था। 18 सितम्बर को मेजर जनरल चौधरी ने हैदराबाद रियासत के सैनिक गवर्नर का पद संभाल लिया। हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया।

विवश होकर निजाम को नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी। सरदार पटेल ने उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया। उसे रियासत का मानद मुखिया बना रहने दिया गया। बाद में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो हैदराबाद रियासत को तोड़कर उसके क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र प्रांतों में मिला दिये गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भोपाल नवाब के सपने

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Bhopal Nawab Family

सरदार पटेल ने धराशाई किए भोपाल नवाब के सपने

हमीदुल्ला खाँ अर्थात् भोपाल नवाब के सपने मुहम्मद अली जिन्ना से किसी भी तरह कम नहीं थे। जिन्ना पाकिस्तान बनाना चाहता था तो हमीदुल्ला खाँ अपनी रियासत भोपाल को पाकिस्तन में मिलाना चाहता था। सरदार पटेल ने धराशाई किए भोपाल नवाब के सपने!

भोपाल रियासत की स्थापना औरंगजेब की सेना के एक अफगान अधिकारी दोस्त मोहम्मद खान ने ई.1723 में की थी। भारत की स्वतंत्रता के समय भोपाल का नवाब हमीदुल्लाह खाँ था जो कि ई.1926 में भोपाल रियासत का नवाब बना था। वह ई.1931 तथा ई.1944 में दो बार नरेन्द्र मण्डल का चांसलर चुना गया था। भारत की आजादी के समय भी वह नरेन्द्र मण्डल का चांसलर था। वह किसी भी हालत में भारत में नहीं मिलना चाहता था।

भोपाल नवाब ने जिन्ना के साथ मिलकर देश की अधिकांश रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित होने अथवा स्वतंत्र रहने की घोषणा करने के लिये उकसाया। इससे नाराज होकर अधिकांश राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल का बहिष्कार कर दिया। इससे भोपाल नवाब को नरेन्द्र मण्डल से त्यागपत्र देना पड़ा और नरेन्द्र मण्डल भंग हो गया। मुहम्मद अली जिन्ना ने हमीदुल्लाह खाँ को पाकिस्तान में आने तथा जनरल सेक्रेटरी का पद स्वीकार करने का निमंत्रण दिया।

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भोपाल नवाब के सपने पूरे करने के लिए 13 अगस्त 1947 को हमीदुल्लाह खाँ ने अपनी पुत्री आबिदा को भोपाल रियासत का शासक बनने के लिये कहा ताकि स्वयं पाकिस्तान जा सके। आबिदा ने अपने पिता की इच्छा मानने से मना कर दिया। मार्च 1948 में हमीदुल्लाह खाँ ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का मंत्रिमण्डल नियुक्त किया जिसके प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय थे। सरदार पटेल तथा वी. पी. मेनन, हमीदुल्लाह खाँ पर लगातार दबाव बना रहे थे कि वह भारत में सम्मिलित होने की घोषणा करे।

प्रधानमंत्री चतुर नारायण मालवीय भी भोपाल रियासत को भारत में मिला देने के पक्ष में था। भोपाल की जनता प्रजामण्डल आंदोलन चला रही थी। वह भी रियासत को भारत में मिलाना चाहती थी। अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर चला गया ताकि भारत में विलय के प्रश्न को कुछ दिनों के लिए टाला जा सके और इस समस्या का नया समाधान ढूंढा जा सके। दिसम्बर 1948 में भोपाल में विलीनीकरण को लेकर जबर्दस्त प्रदर्शन हुआ।

भोपाल की सरकार द्वारा ठाकुर लालसिंह, शंकर दयाल शर्मा, भैंरो प्रसाद तथा उद्धवदास आदि नेता बंदी बना लिये गये। 23 जनवरी 1949 को वी. पी. मेनन भोपाल आये तथा उन्होंने रियासती अधिकारियों से कहा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमण्डल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। पं. चतुर नारायण मालवीय 21 दिन के उपवास पर बैठ गये।

पटेल के निर्देश पर वी. पी. मेनन भोपाल में लाल कोठी में ठहरे हुए थे तथा रियासत की स्थिति पर दृष्टि रख रहे थे। अंत में 30 अप्रेल 1949 को नवाब ने भोपाल रियासत के विलीनीकरण पर हस्ताक्षर कर दिये। सरदार पटेल ने नवाब को पत्र लिखकर उसे धिक्कारा कि मेरे लिये यह एक बड़ी निराशाजनक और दुःख की बात थी कि आपके विवादित हुनर तथा क्षमताओं को आपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया जब देश को उसकी जरूरत थी।

1 जून 1949 को भोपाल रियासत भारत का हिस्सा बन गई। केन्द्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर एन. बी. बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया। भारत सरकार द्वारा नवाब को 11 लाख वार्षिक का प्रिवीपर्स दिया गया। इस प्रकार भोपाल नवाब के सपने हमेशा-हमेशा के लिए अधूरे रह गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत भूमि पर कुदृष्टि – भारतीय हिस्से हथियाने के दुष्प्रयास

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जब पाकिस्तान भारतीय रियासतों को अपनी ओर नहीं मिला सका तो मुहम्मद अली जिन्ना ने भारत भूमि पर कुदृष्टि डाली तथा भारतीय हिस्से हथियाने के दुष्प्रयास आरम्भ किए।

पाकिस्तान ने अपनी सीमा पर स्थित उन भारतीय हिस्सों को हड़पने के प्रयास किए जहाँ थोड़ी-बहुत मुस्लिम जनंसख्या रहती थी ताकि उसे स्थानीय मुसलमानों का सहयोग प्राप्त हो सके। भारतीय सेना की सजगता के कारण ऐसे किसी भी दुष्प्रयास में पाकिस्तान को सफलता नहीं मिली।

जैसलमेर पर आक्रमण

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भारत भूमि पर कुदृष्टि का पहला प्रकरण जैसलमेर में घटित हुआ। भारत में सम्मिलित राजपूताना रियासतों में से जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर रियासतों की सीमायें पाकिस्तान के साथ लगती थीं। इस सीमा से भविष्य में किसी भी समय आक्रमण होने का खतरा बना हुआ था। जैसलमेर रियासत में कुछ संख्या में मुसलमान जातियां रहती थीं जो गा-बजाकर अपना पेट भरती थीं। इन लोगों का जिन्ना के षड़यंत्रों से कोई लेना-देना नहीं था फिर भी जिन्ना सोचता था कि इस्लाम के नाम पर ये लोग पाकिस्तानी फौज की सहायता करेंगे तथा पाकिस्तानी सेना जैसलमेर के इन हिस्सों पर अधिकार कर लेगी।

भारत की आजादी के कुछ दिन बाद ही जैसलमेर रियासत में पाकिस्तानी फौजें घुस आईं। जैसलमेर महाराजा ने अपने मित्र राजाओं को तार के माध्यम से इसकी सूचना दी। पाकिस्तान के इस आक्रमण का सामना करने में जैसलमेर रियासत की सरकार सक्षम नहीं थी। देश आजाद हुआ ही था अतः आपात् स्थिति में भारतीय सेनाओं का सीमा पर तत्काल पहुंच पाना संभव नहीं था। ऐसी विपन्न स्थिति में जोधपुर रियासत की ऊंट सेना ने पाकिस्तानी सेना का सामना किया तथा उसे भारत भूमि से बाहर निकाल दिया।

लक्षद्वीप हथियाने का असफल प्रयास

लक्षद्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से दूर तथा अरब सागर में स्थित है। भारत की आजादी के समय ये द्वीप ब्रिटिश क्राउन की सत्ता का हिस्सा थे तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के अधीन थे। 15 अगस्त 1947 अधिनियम के अनुसार प्रांतीय विभाजन के आधार पर इन्हें भारत में मिलना था किंतु इन द्वीपों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या निवास करती थी।

इस कारण यह भय उत्पन्न हो गया कि इन द्वीपों पर पाकिस्तान अपना अधिकार जतायेगा अथवा अधिकार जमाने की चेष्टा करेगा। सरदार पटेल की दृष्टि से भारत का सुदूरस्थ भाग भी बचा हुआ नहीं था। इसलिये उन्होंने समय रहते ही रॉयल इण्डियन नेवी की एक टुकड़ी लक्षद्वीप भेजने का निर्णय लिया। इस टुकड़ी ने द्वीप पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करके वहाँ भारतीय झण्डा फहरा दिया।

सरदार पटेल जानते थे कि पाकिस्तान की भारत भूमि पर कुदृष्टि लगी हुई है इसलिए यह सुनिश्चित किया गया कि पाकिस्तान इन द्वीपों पर अधिकार करने की कुचेष्टा न कर सके।

सरदार पटेल का अनुमान सही था। रॉयल इण्डियन नेवी की टुकड़ियों द्वारा लक्षद्वीप पर अधिकार कर लिये जाने के कुछ घण्टों बाद ही रॉयल पाकिस्तान नेवी के जहाज लक्षद्वीप के चारों ओर दिखाई देने लगे किंतु जब उन्होंने देखा कि द्वीप पर पहले से ही तिरंगा फहरा रहा है तो वे बिना कोई कार्यवाही किये, कराची लौट गये। यदि पटेल में इतनी दूरदृष्टि नहीं होती तो भारत का नक्शा निःसंदेह आज के नक्शे जैसा नहीं होता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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