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सरकारी कर्मचारियों की समस्या

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भारत के विभाजन से न केवल भारत सरकार के सम्मुख अपित देशी रियासतों की सरकारों के सम्मुख सरकारी कर्मचारियों की समस्या उत्पन्न हो गई।

देश के विभाजन के समय सांप्रदायिक समस्या उठ खड़ी होने से जोधपुर रेलवे के कुछ कर्मचारियों को अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान से निकल पाना कठिन हो गया। ऐसे 600 हिन्दू कर्मचारी जो सिंध प्रांत में नियुक्त थे, पाकिस्तान से निकलने में आई कठिनाई के कारण कुछ दिनों तक अपने काम पर नहीं आ सके। जब वे भारत लौटे तो रेलवे ने उन्हें काम पर नहीं लिया गया तथा 3 माह तक निलम्बित रखने के पश्चात सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया।

इस पर जोधपुर के रेलवे स्टाफ ने 28 नवम्बर 1947 को प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भिजवाया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह ज्ञापन रेलवे मंत्रालय को भिजवा दिया। रेल मंत्रालय ने रियासती विभाग को सूचित किया कि वह इस प्रकरण में कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। रियासती मंत्रालय ने रेलवे मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश दे रखे थे कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर एवं उदयपुर राज्यों से रेलवे मंत्रालय द्वारा सीधा पत्राचार नहीं किया जाना चाहिये।

इसी प्रकार जोधपुर कर्मचारी संघ ने रियासती विभाग के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत कर मांग की कि इस कर्मचारी संघ को सरकार द्वारा मान्यता दी जानी चाहिये। कर्मचारियों के वेतन एवं भत्ते वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ाये जाने चाहिये। महंगाई भत्ता बढ़ाया जाना चाहिये। श्रमिकों के लिए पुस्तकालय एवं क्लब की सुविधा होनी चाहिये। श्रमिकों एवं उनके परिवारों के लिए निःशुल्क चिकित्सालय होना चाहिये। रियासती विभाग द्वारा इस प्रकरण को राजपूताना के रीजनल कमिश्नर को आबू भिजवा दिया गया।

चूंकि रेलवे अपने स्तर पर जोधपुर राज्य की सरकार से कोई बात नहीं कर सकती थी, इसलिए सरकारी कर्मचारियों की समस्या बढ़ गई।

जोधपुर रेलवे की सम्पत्ति की निकासी

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स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सिंध क्षेत्र ब्रिटिश-भारत की बम्बई प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था। ई.1900 में जोधपुर रेलवे ने 133.40 मील लम्बी रेल लाइन बालोतरा से पश्चिमी सीमा में ब्रिटिश राज्य की सीमा में बनायी थी। भारत सरकार ने 1 जनवरी 1929 को मीरपुर खास से जुडे़ खण्डों को सिंध लाइट रेल्वे कम्पनी लिमिटेड से खरीद कर जोधपुर रेलवे को प्रबंधन हेतु सौंप दिया। ई.1939 में जोधपुर रेलवे द्वारा खाडरू से नवाबशाह तक 30.72 मील लम्बा रेलमार्ग बिछाया गया। इसे 29 नवम्बर 1939 को आरंभ किया गया। 31 दिसम्बर 1942 को पुनः भारत सरकार ने सिंध लाइट रेलवे से मीरपुर खास से खाडरू तक का 49.50 मील लम्बा रेलमार्ग भी खरीद कर जोधपुर रेलवे को सौंप दिया जिससे जोधपुर रेलवे के ब्रिटिश खण्ड की लम्बाई 318.74 मील हो गयी। इस पथ पर रेल संचालन जोधपुर रेलवे द्वारा किया जाता था तथा सारा रॉलिंग स्टॉक जोधपुर रेलवे का था।

जब सिंध क्षेत्र के पाकिस्तान में जाने के संकेत मिलने लगे तो उस समय जोधपुर रेलवे के मुख्य अभियंता सी. एल. कुमार ने सिंध क्षेत्र में स्थित रेलवे स्टेशनों एवं वहाँ कार्यरत निर्माण निरीक्षक एवं रेलपथ निरीक्षक कार्यालयों के भण्डारगृहों में पड़ी रेल-सम्पत्ति को जोधपुर में लाने का कार्य अत्यंत दक्षता एवं बुद्धिमत्ता से किया। यदि समय रहते यह कदम नहीं उठाया गया होता तो लाखों रुपये की रेल-सामग्री पाकिस्तान में रह गयी होती।

जोधपुर रेलवे के रॉलिंग स्टॉक के हस्तांतरण की तिथि 31.7.1947 निश्चित की गयी थी किंतु पाकिस्तान सरकार ने इस तिथि से कुछ दिन पूर्व ही 6 इंजन, 75 कोच, 4 ऑफीसर्स कैरिज तथा 300 से अधिक वैगन बलपूर्वक रोक लिए। इसका मूल्य 17 लाख रुपये आंका गया। इससे जोधपुर एवं पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेल सेवा ठप्प हो गयी।

जोधपुर सरकार ने पाकिस्तान सरकार से मांग की कि वह रोके गये रॉलिंग स्टॉक तथा पाकिस्तान में निकलने वाले जोधपुर राज्य के 50 लाख रुपये के राजस्व का भुगतान करे तथा अपना प्रतिनिधि जोधपुर भेजकर मामले का निस्तारण करे किंतु पाकिस्तान सरकार ने जोधपुर सरकार की कोई बात नहीं सुनी। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री जयनारायण व्यास ने पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त श्री प्रकाश से बात की। अंत में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से पाकिस्तान सरकार ने 50 लाख रुपये जोधपुर सरकार को देने तय किए।

इस प्रकार जोधपुर राज्य सरकारी कर्मचारियों की समस्या सुलझाने में विफल रहा। भारत सरकार के सहयोग से ही सरकारी कर्मचारी अपने हितों की रक्षा कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बीकानेर रियासत का भारत में विलय

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बीकानेर रियासत राज्य भारत के थार रेगिस्तान में स्थित एक पुरानी रियासत थी जो ई.1465 के आसपास अस्तित्व में आई थी। इसके शासक जोधपुर राज्य के राठौड़ वंश में से ही निकले थे। भारत की आजादी के समय सादुलसिंह बीकानेर का राजा था। संविधान सभा में प्रतिनिधि भेजने से लेकर भारत संघ में विलय की घोषणा के मामले में बीकानेर देश के समस्त देशी राज्यों में अग्रणी रहा किंतु महाराजा स्वतंत्र भारत में अपने अधिकारों को लेकर अत्यंत सतर्क था।

15 जुलाई 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने भारत के प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र लिखा जिसमें 110 पैरागा्रफ थे। महाराजा ने लिखा कि प्रजा परिषद वाले, राज्य में इस प्रकार का प्रचार कर रहे हैं कि निकट भविष्य में समस्त भारत में गांधी-राज हो जायेगा और भारतीय राज्य भी उन में मिला लिए जायेंगे। तिरंगा ही एकमात्र झण्डा होगा। ज

बकि वास्तविकता तो यह है कि न तो गांधीजी के ऐसे विचार हैं और न ही भारतीय राज्य भारत में अपने अस्तित्व को सम्मिलित करने जा रहे हैं। इस पत्र से यह आभास होता है कि बीकानेर नरेश भले ही जोर-शोर से भारत संघ में मिलने की घोषणा कर रहे था किंतु वह यह आश्वासन भी चाहता था कि स्वतंत्र भारत में उसकी रियासत पूरी तरह स्वतंत्र बनी रहेगी।

फिरोजपुर वाटर हैड वर्क्स का मामला

ब्रिटिश सरकार की घोषणा के अनुसार भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित किए जाने वाले क्षेत्रों का निर्णय हिन्दू अथवा मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर होना था। इस आधार पर पाकिस्तान ने पंजाब के फिरोजपुर स्थित ‘वाटर हैड वर्क्स’ पर भी अपना दावा जताया।

इस नहर से बीकानेर रियासत की एक हजार वर्ग मील से अधिक भूमि सिंचित होती थी। महाराजा सादूलसिंह ने बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्निकर, जस्टिस टेकचंद बक्षी और मुख्य अभियंता कंवरसेन को बीकानेर राज्य का पक्ष रखने के लिए नियुक्त किया।

पन्निकर ने रियासती विभाग के मंत्री तथा विभाजन हेतु गठित उच्चस्तरीय परिषद के सदस्य सरदार पटेल पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वे सुनिश्चत कर लें कि फिरोजपुर हैड वर्क्स पूर्णतः भारत सरकार द्वारा नियंत्रित रहेगा। महाराजा ने माउंटबेटन तथा पटेल को संदेश भिजवाया कि यदि फिरोजपुर हैड वर्क्स और गंगनहर का एक भाग पाकिस्तान में जाता है तो हमारे लिए पाकिस्तान में सम्मिलित होने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा।

अंग्रेजों ने उनकी समस्या को समझा तथा उन्हें आश्वासन दिया कि फिरोजपुर हैडवर्क्स भारत में ही रहेगा। 17 अगस्त 1947 को जब रेडक्लिफ रिपोर्ट प्रकाशित हुई तब उसमें फिरोजपुर हैड वर्क्स को भारत में बने रहने का निर्णय हुआ।

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6 अगस्त 1947 को महाराजा सादूलसिंह ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। यथास्थिति समझौता पत्र पर राज्य के प्रधानमंत्री के. एम. पन्न्किर द्वारा हस्ताक्षर किए गये। रियासती विभाग ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि वायसराय और सरदार पटेल ने महाराजा द्वारा निर्वहन की गयी भूमिका के प्रति आभार व्यक्त किया है। संक्षिप्त अवधि में ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करके महाराजा ने भारत तथा राज्यों के समान हित के लिए त्याग किया है।

वायसराय तथा सरदार पटेल ने आशा व्यक्त की है कि इस विलय पत्र के माध्यम से प्रस्तुत उदाहरण से, आने वाले समय में भारत तथा राज्यों के मध्य सहयोग का एक नया युग आरंभ होगा जो संपूर्ण देश को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से मजबूत बनायेगा। इस प्रविष्ठ संलेख के द्वारा महाराजा ने रक्षा, संचार और विदेश मामलों पर अपनी सारी सत्ता केंद्र सरकार को सौंप दी और शेष विषयों में महाराजा ने अपने आप को स्वतंत्र मान लिया। अधिकांश रियासतों ने भवितव्य के आगे सिर झुका कर प्रविष्ठ संलेख पर दस्तखत कर दिए। इनमें सबसे पहला बीकानेर का महाराजा था, जो वायसराय का पुराना दोस्त था। बड़े नाटकीय अंदाज में उसने हस्ताक्षर किए।

15 अगस्त 1947 को महाराजा ने एक भाषण में कहा-

‘ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के साथ भारतीय रियासतों को यह छूट थी कि वे अलग रहें और नये राष्ट्र के साथ सम्बन्धित होने से मना कर दें। कानूनी दृष्टि से आज हम समस्त स्वतंत्र हो सकते हैं क्योंकि हमने ब्रिटिश साम्राज्य को आधिपत्य का जो अधिकार सौंपा था, वह भारतीय स्वतंत्रता कानून के अंतर्गत हमें वापिस मिल गया।

हम अलग रह सकते थे और भारतीय राष्ट्र में विलय नहीं करते। एक क्षण के विचार से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि इसका परिणाम कितना विनाशकारी होता। शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात आ गयी थी कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जायेगा।

इसके परिणाम का पूर्व ज्ञान रखते हुए मैंने बिना हिचकिचाहट के भारत के उन तत्वों के साथ सहयोग करने का निश्चय किया जो एक मजबूत केन्द्रीय सरकार की स्थापना के लिए कार्य कर रहे थे।’

सरदार पटेल ने देशी राज्यों के भारत में विलय के पश्चात महाराजा सादूलसिंह का धन्यवाद करते हुए उन्हें लिखा कि-

‘राजाओं को गलत राह पर ले जाने के लिए जान-बूझकर जो संदेह और भ्रम उत्पन्न किए गये उन्हें मिटाने में महाराजा ने जो कष्ट किया, उससे मैं भलीभांति परिचित हूँ। महाराजा का नेतृत्व निश्चय ही समयानुकूल और प्रभावशाली रहा है।’

स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ माह बाद जनवरी 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन बीकानेर राज्य के दौरे पर आये। उन्होंने अपने भाषण में सादूलसिंह की प्रशंसा करते हुए कहा-

‘महाराजा प्रथम शासक थे जिन्होंने भारत का नया संविधान बनाने में मदद देने के लिए संविधान निर्मात्री सभा में प्रतिनिधि भेजकर यह अनुभव कर लिया कि भविष्य में राजा लोगों को क्या करना है। महाराजा पहले शासक थे जिन्होंने रियासतों के अपने पास के संघ में सम्मिलित होने के मेरे प्रस्तावों का समर्थन किया।’

2 सितम्बर 1954 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने बीकानेर में महाराजा सादूलसिंह की मूर्ति का अनावरण करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा की-

‘जब एक ओर भारत के बंटवारे की विपत्ति आ रही थी और दूसरी ओर भारतवर्ष के टुकड़े किए जाने के लिए द्वार खोला जा रहा था, उन्होंने जवांमर्दी, देशप्रेम तथा दूरदर्शिता से अपने आप को खड़ा करके उस दरवाजे का मुँह बंद कर दिया।’

बीकानेर रियासत में पाकिस्तान से शरणार्थियों का आगमन

नव-निर्मित पाकिस्तान के साथ बीकानेर रियासत की लगभग 320 किलोमीटर लम्बी सीमा थी। बीकानेर द्वारा भारत संघ में सम्मिलित होने का निर्णय लेने पर इस सीमा को पार करके लाखों लोग पाकिस्तान से भारत आये तथा भारत से पाकिस्तान गये। लगभग 7-8 लाख लोग भारत से निकाल कर सुरक्षित रूप से पाकिस्तान पहुंचाये गये। बीकानेर राज्य की सीमा पर बहावलपुर राज्य था जिसमें 1.90 लाख हिन्दू तथा 50 हजार सिक्ख रहते थे।

बहावलपुर राज्य के हासिलपुर में 350 सिक्ख एवं हिन्दू मार डाले गये। इससे बहावलपुर राज्य के अन्य कस्बों एवं गाँवों में भगदड़ मच गयी। 15 अगस्त 1947 के बाद बीकानेर रियासत में लगभग 75 हजार शरणार्थी आये जिनके लिए शरणार्थी शिविरों की स्थापना की गयी। बहुत से लोगों को बीकानेर से 40 किलोमीटर दूर कोलायत भेजा गया। इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से राज्य की व्यवस्थायें गड़बड़ा गयीं। राज्य की ओर से शरणार्थियों के ठहरने व भोजन-पानी की व्यवस्था की गयी।

कोलायत तथा सुजानगढ़ आदि कस्बों में शरणार्थियों को ठहराया गया। गंगानगर क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में शरणार्थी आये। इन शरणार्थियों पर पाकिस्तान में बहुत अत्याचार हुए थे इसलिए वे मुसलमानों से बदला लेने पर उतारू थे। उन्हें शांत रखने तथा मुसलमानों पर आक्रमण न करने देने के लिए राज्य की ओर से सेना लगायी गयी। सेना ने बहुत से मुसलमानों को बहावलपुर राज्य में सुरक्षित पहुंचाया।

जब चूरू के महाजनों ने अपने मुसलमान नौकरों को नौकरी से निकाल दिया तो वे मुसलमान, महाराजा सादूलसिंह के पास बीकानेर आ गये। महाराजा ने विशेष रेलगाड़ी से नौकरों को वापस चूरू भिजवाया तथा महाजनों को कहकर उन्हें वापस नौकरी में रखवाया। जो लोग बीकानेर रियासत छोड़कर पाकिस्तान चले गये थे उन्हें महाराजा ने फिर से बीकानेर राज्य में आकर बसने का न्यौता दिया तथा जो हिंदू शरणार्थी पाकिस्तान से बीकानेर राज्य में आ गये थे उन्हें ब्रिटिश-भारत में भेजने के लिए महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया।

पाकिस्तान से आये 50,746 शरणार्थियों को बीकानेर राज्य द्वारा 2,58,516 बीघा जमीन आवंटित की गयी। बहुत से सिक्ख पाकिस्तान के रहीमयार खान नामक जिले में घेर कर रोक लिए गये। बीकानेर रियासत के अधिकारियों ने बहावलपुर के राज्याधिकारियों से बात करके इन शरणार्थियों को निकलवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जूनागढ़ नवाब बेगमों की बजाय कुत्ते लेकर पाकिस्तान भाग गया

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गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित जूनागढ़ रियासत की स्थापना ई.1735 में शेरखान बाबी नामक मुगल सिपाही ने की थी। इसका क्षेत्रफल 3,337 वर्ग मील तथा जनसंख्या 6,70,719 थी। रियासत की 80 से 90 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू थी किंतु शासक मुस्लिम था। अंतिम जूनागढ़ नवाब सर मुहम्मद महाबत खान रसूलखानजी (तृतीय) 11 वर्ष की आयु में शासक बना था।

जूनागढ़ नवाब महाबत खान ने मेयो कॉलेज अजमेर में पढ़ाई की थी। उसे तरह-तरह के कुत्ते पालने तथा शेरों का शिकार करने का शौक था। उसके पास सैंकड़ों कुत्ते थे। एक बार उसने एक कुत्ते का एक कुतिया से विवाह करवाया जिस पर उसने बहुत धन व्यय किया तथा पूरे राज्य में तीन दिन का अवकाश घोषित किया। ई.1947 में मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता सर शाह नवाज भुट्टो को कराची से बुलाकर जूनागढ़ राज्य का दीवान बनाया गया।

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शाह नवाज भुट्टो ने जूनागढ़ नवाब को डराया कि यदि जूनागढ़ भारत में मिला तो सरकार, उसके कुत्तों को मार डालेगी तथा शेरों का राष्ट्रीयकरण कर देगी। जबकि पाकिस्तान में वह अपने कुत्तों को सुरक्षित रख सकेगा तथा निर्बाध रूप से शेरों का शिकार कर सकेगा। यह बात नवाब के मस्तिष्क में बैठ गई। जूनागढ़ रियासत चारों ओर से हिन्दू रियासतों से घिरी हुई थी किंतु रियासत की दक्षिण एवं दक्षिण-पश्चिम सीमा अरब सागर से मिलती थी। जूनागढ़ नवाब ने सोचा कि वह आसानी से पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकता है।

वास्तविकता यह थी कि जूनागढ़ रियासत तथा पाकिस्तान की सीमा के बीच 240 मील की दूरी में समुद्र स्थित था। फिर भी सनकी नवाब भारत में मिलने की बजाय पाकिस्तान में मिलने के लिये तैयार हो गया। वह यह भी भूल गया कि राज्य की 80 प्रतिशत जनता हिन्दू है तथा उसकी रियासत चारों ओर हिन्दू रियासतों से घिरी हुई है जो कि भारत में मिल चुकी हैं।  जब वायसराय की 25 जुलाई 1947 की दिल्ली बैठक के बाद भारत सरकार ने नवाब को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन भिजवाया तो नवाब ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा 15 अगस्त 1947 को समाचार पत्रों में एक घोषणा पत्र प्रकाशित करवाया-

‘पिछले कुछ सप्ताहों से जूनागढ़ की सरकार के समक्ष यह सवाल रहा है कि वह हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करे। इस मसले के समस्त पक्षों पर सरकार को अच्छी तरह गौर करना है। यह ऐसा रास्ता अख्तयार करना चाहती है जिससे अंततः जूनागढ़ के लोगों की तरक्की और भलाई स्थायी तौर पर हो सके तथा राज्य की एकता कायम रहे और साथ ही साथ उसकी आजादी और ज्यादा से ज्यादा बातों पर इसके अधिकार बने रहें। गहरे सोच विचार और सभी पहलुओं पर जांच परख के बाद सरकार ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है और अब उसे जाहिर कर रही है। राज्य का विश्वास है कि वफादार रियाया, जिसके दिल में राज्य की भलाई और तरक्की है, इस फैसले का स्वागत करेगी।’

जूनागढ़ नवाब की यह घोषणा न केवल भारत के एकीकरण के लिए काम कर रहे सरदार पटेल को, अपितु रियासती जनता को भी सीधी चुनौती थी।

जूनागढ़ नवाब द्वारा पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करने से जूनागढ़ की जनता में बेचैनी फैल गई तथा जनता ने नवाब की कार्यवाही का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्र अस्थायी सरकार स्थापित कर ली। भारत सरकार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली को तार भेजकर कहलवाया कि वह जूनागढ़ के सम्मिलन को अस्वीकृत कर दे।

लॉर्ड माउण्टबेटन ने इस तार को चीफ ऑफ द गवर्नर जनरल्स स्टाफ लॉर्ड इस्मे के हाथों कराची भिजवाया। लियाकत अली ने भारत सरकार की इस मांग को यह कहकर मानने से अस्वीकार कर दिया कि जो टेलिग्राम लॉर्ड इस्मे के साथ भेजा गया है, उस पर सम्बन्धित मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था।

13 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ नवाब का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा। पाकिस्तान से एक छोटी टुकड़ी समुद्र के रास्ते जूनागढ़ को रवाना कर दी गई। पाकिस्तान की यह कार्यवाही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य, हुए उस समझौते का उल्लंघन थी जिसमें दोनों पक्षों ने यह मान लिया था कि भारत की सीमाओं से घिरी हुई रियासतों को भारत में ही मिलना होगा।

जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलने की घोषणा को पाकिस्तान द्वारा स्वीकार कर लिये जाने के बाद, नवाब मुहम्मद महाबत खानजी के सैनिकों ने, जूनागढ़ राज्य की हिन्दू जनता का उत्पीड़न करना आरम्भ कर दिया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू, जूनागढ़ छोड़कर भाग जायें। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था।

नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया। उन रियासतों ने भारत सरकार से सहायता मांगी। माउण्टबेटन ने सुझाव दिया कि इस मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल को यह सुझाव पसंद नहीं आया। वे जूनागढ़ को कड़ा सबक सिखाकर हैदराबाद और काश्मीर को भी चुनौती देना चाहते थे।

24 सितम्बर 1947 को भारत सरकार ने काठियावाड़ डिफेंस फोर्स से जूनागढ़ के विरुद्ध कार्यवाही करने को कहा। इस सेना ने जूनागढ़ को चारों तरफ से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया।

24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया। वह अपनी चार बेगमों एवं सैंकड़ों कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम तथा बहुत से कुत्ते जूनागढ़ में ही छूट गये। नवाब अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गये। 9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया।

20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया तथा 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को पाकिस्तान में जूनागढ़ नवाब नवाब मुहम्मद महाबत खानजी की मृत्यु हुई। जूनागढ़ का दीवान शाह नवाज भुट्टो भी पाकिस्तान चला गया जहाँ उसे कराची में बहुत बड़ी जमीन दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैदराबाद निजाम को विश्वास था कि अंग्रेज हैदराबाद को अलग देश बना देंगे!

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15 अगस्त 1947 तक भारत में न मिलने वाली दूसरी रियासत हैदराबाद थी। हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में मुगल सूबेदार चिनकुलीजखाँ ने की थी। उसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई.1798 में हैदराबाद निजाम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि (सबसीडरी एलायंस) की।

हैदराबाद निजाम को अंग्रेज सरकार द्वारा 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,14,190 वर्ग किलोमीटर था। यह भारत का सबसे बड़ा तथा सबसे समृद्ध देशी राज्य था। क्षेत्रफल में वह फ्रांस जितना बड़ा था। हैदराबाद राज्य की जनसंख्या लगभग 1,63,40,000 थी। वर्तमान में स्थित महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश प्रांतों के भू-भाग, हैदाराबाद राज्य में स्थित थे। जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु राज्य की 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। ]

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हैदराबाद राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी। निजाम को भारत का सबसे अमीर शासक माना जाता था। निजाम प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था।

निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे। राज्य की समस्त नौकरियां मुसलमानों के लिये आरक्षित थीं। ई.1947 में हैदाराबाद में एक विधान सभा बनाई गई जिसमें 48 पद मुसलमानों के लिये तथा 38 पद हिन्दुओं के लिये रखे गये ताकि कोई कानून ऐसा न बन सके जो मुसलमान रियाया के अधिकारों के विरुद्ध हो। इस विधानसभा को इतने अधिकार दिये गये कि यदि निजाम स्वयं भी चाहे तो मुसलमान रियाया के अधिकारों में कटौती न कर सके। निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति, ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था। इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था।

निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा।

जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। निजाम, लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा।

हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि- ‘हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।’

9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने मन की अकुलाहट को खुलकर व्यक्त किया-

‘पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां क्लॉज जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया।

यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करता है बल्कि यह आभास भी देता है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा।

जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही। इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है।

मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया।

आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले। मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये।

लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है। मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।’

इस पर वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैदराबाद रियासत को सरदार पटेल ने भारत में मिला लिया !

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ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद रियासत के लिये एक ही रास्ता बचा था कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाये किंतु हैदराबाद के अधिकारियों एवं कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर चल रहे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के अधिकारियों ने नवाब को सलाह दी कि वह वायसराय की सलाह को न माने। 7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने सरदार पटेल के निर्देश पर हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया।

हैदराबाद निजाम ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने के लिये रियासती पुलिस के साथ-साथ कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक हो गया। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।

वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में निजाम ने भारत के साथ ‘स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट’ पर दस्तख्त कर दिये जिसके अनुसार भारत और हैदराबाद के बीच पोस्ट ऑफिस, टेलिग्राफ, रेल, सड़क यातायात एवं व्यापार आदि सुचारू रूप से जारी रहें परन्तु निजाम, भारत संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा।

निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकरों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ताकि वे रियासत छोड़कर भाग जायें। रजाकारों की हिंसक वारदातों से रियासत में शान्ति एवं व्यवस्था बिगड़ गई।

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हैदराबाद रियासत से होकर गुजरने वाले रेलमार्गों तथा सड़कों को क्षतिग्रस्त किया जाने लगा तथा रेलों एवं बसों से यात्रा करने वाले हिन्दुओं को लूटा जाने लगा। इससे स्थिति बहुत खराब हो गई।

मुस्लिम रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भारत सरकार को धमकी दी कि वे सम्पूर्ण भारत को जीतकर दिल्ली के लाल किले पर निजाम का आसफजाही झण्डा फहरायेंगे। इसके बाद हैदराबाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्याएं की जाने लगीं तथा उनकी सम्पत्ति को लूटा अथवा नष्ट किया जाने लगा।

माउण्टबेटन, सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने निजाम को समझाने का प्रयास किया परन्तु अब स्थिति निजाम के नियन्त्रण में भी नहीं रही थी। रजाकार और कट्टर मुल्ला-मौलवी, मुसलमान जनता को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे थे। सरदार पटेल और वी. पी. मेनन तब तक चुप रहे जब तक कि माउण्टबेटन इंग्लैण्ड नहीं लौट गये।

जून 1948 में माउण्टबेटन के इंग्लैण्ड लौट जाने के दो माह बाद, सितम्बर 1948 में निजाम ने घोषणा की कि वह माउण्टबेटन योजना को स्वीकार करने के लिये तैयार है। इस पर 13 सितम्बर 1948 को पटेल ने उत्तर दिया- ‘अब बहुत देरी हो चुकी। माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है।’

उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे। इसलिये उन्होंने उसी दिन भारतीय सेना को हैदराबाद को भारत में एकीकृत करने के आदेश दिये। इस कार्यवाही को ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया। मेजर जनरल जोयन्तोनाथ चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना हैदराबाद में प्रवेश कर गई। पांच दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने मुस्लिम रजाकारों के प्रतिरोध को कुचल डाला। हजारों रजाकार मारे गये। पूरे हैदराबाद में रजाकरों के शव पड़े हुए दिखाई देने लगे।

17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद के सेनापति जनरल ई.आई. एड्रूस ने सिकंदराबाद में जनरल चौधरी के समक्ष समर्पण कर दिया। इस प्रकार केवल 5 दिन की सशस्त्र-कार्यवाही में हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था। 18 सितम्बर को मेजर जनरल चौधरी ने हैदराबाद रियासत के सैनिक गवर्नर का पद संभाल लिया। हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया।

विवश होकर निजाम को नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी। सरदार पटेल ने उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया। उसे रियासत का मानद मुखिया बना रहने दिया गया। बाद में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो हैदराबाद रियासत को तोड़कर उसके क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र प्रांतों में मिला दिये गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भोपाल नवाब के सपने

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Bhopal Nawab Family

सरदार पटेल ने धराशाई किए भोपाल नवाब के सपने

हमीदुल्ला खाँ अर्थात् भोपाल नवाब के सपने मुहम्मद अली जिन्ना से किसी भी तरह कम नहीं थे। जिन्ना पाकिस्तान बनाना चाहता था तो हमीदुल्ला खाँ अपनी रियासत भोपाल को पाकिस्तन में मिलाना चाहता था। सरदार पटेल ने धराशाई किए भोपाल नवाब के सपने!

भोपाल रियासत की स्थापना औरंगजेब की सेना के एक अफगान अधिकारी दोस्त मोहम्मद खान ने ई.1723 में की थी। भारत की स्वतंत्रता के समय भोपाल का नवाब हमीदुल्लाह खाँ था जो कि ई.1926 में भोपाल रियासत का नवाब बना था। वह ई.1931 तथा ई.1944 में दो बार नरेन्द्र मण्डल का चांसलर चुना गया था। भारत की आजादी के समय भी वह नरेन्द्र मण्डल का चांसलर था। वह किसी भी हालत में भारत में नहीं मिलना चाहता था।

भोपाल नवाब ने जिन्ना के साथ मिलकर देश की अधिकांश रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित होने अथवा स्वतंत्र रहने की घोषणा करने के लिये उकसाया। इससे नाराज होकर अधिकांश राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल का बहिष्कार कर दिया। इससे भोपाल नवाब को नरेन्द्र मण्डल से त्यागपत्र देना पड़ा और नरेन्द्र मण्डल भंग हो गया। मुहम्मद अली जिन्ना ने हमीदुल्लाह खाँ को पाकिस्तान में आने तथा जनरल सेक्रेटरी का पद स्वीकार करने का निमंत्रण दिया।

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भोपाल नवाब के सपने पूरे करने के लिए 13 अगस्त 1947 को हमीदुल्लाह खाँ ने अपनी पुत्री आबिदा को भोपाल रियासत का शासक बनने के लिये कहा ताकि स्वयं पाकिस्तान जा सके। आबिदा ने अपने पिता की इच्छा मानने से मना कर दिया। मार्च 1948 में हमीदुल्लाह खाँ ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का मंत्रिमण्डल नियुक्त किया जिसके प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय थे। सरदार पटेल तथा वी. पी. मेनन, हमीदुल्लाह खाँ पर लगातार दबाव बना रहे थे कि वह भारत में सम्मिलित होने की घोषणा करे।

प्रधानमंत्री चतुर नारायण मालवीय भी भोपाल रियासत को भारत में मिला देने के पक्ष में था। भोपाल की जनता प्रजामण्डल आंदोलन चला रही थी। वह भी रियासत को भारत में मिलाना चाहती थी। अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर चला गया ताकि भारत में विलय के प्रश्न को कुछ दिनों के लिए टाला जा सके और इस समस्या का नया समाधान ढूंढा जा सके। दिसम्बर 1948 में भोपाल में विलीनीकरण को लेकर जबर्दस्त प्रदर्शन हुआ।

भोपाल की सरकार द्वारा ठाकुर लालसिंह, शंकर दयाल शर्मा, भैंरो प्रसाद तथा उद्धवदास आदि नेता बंदी बना लिये गये। 23 जनवरी 1949 को वी. पी. मेनन भोपाल आये तथा उन्होंने रियासती अधिकारियों से कहा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमण्डल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। पं. चतुर नारायण मालवीय 21 दिन के उपवास पर बैठ गये।

पटेल के निर्देश पर वी. पी. मेनन भोपाल में लाल कोठी में ठहरे हुए थे तथा रियासत की स्थिति पर दृष्टि रख रहे थे। अंत में 30 अप्रेल 1949 को नवाब ने भोपाल रियासत के विलीनीकरण पर हस्ताक्षर कर दिये। सरदार पटेल ने नवाब को पत्र लिखकर उसे धिक्कारा कि मेरे लिये यह एक बड़ी निराशाजनक और दुःख की बात थी कि आपके विवादित हुनर तथा क्षमताओं को आपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया जब देश को उसकी जरूरत थी।

1 जून 1949 को भोपाल रियासत भारत का हिस्सा बन गई। केन्द्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर एन. बी. बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया। भारत सरकार द्वारा नवाब को 11 लाख वार्षिक का प्रिवीपर्स दिया गया। इस प्रकार भोपाल नवाब के सपने हमेशा-हमेशा के लिए अधूरे रह गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत भूमि पर कुदृष्टि – भारतीय हिस्से हथियाने के दुष्प्रयास

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जब पाकिस्तान भारतीय रियासतों को अपनी ओर नहीं मिला सका तो मुहम्मद अली जिन्ना ने भारत भूमि पर कुदृष्टि डाली तथा भारतीय हिस्से हथियाने के दुष्प्रयास आरम्भ किए।

पाकिस्तान ने अपनी सीमा पर स्थित उन भारतीय हिस्सों को हड़पने के प्रयास किए जहाँ थोड़ी-बहुत मुस्लिम जनंसख्या रहती थी ताकि उसे स्थानीय मुसलमानों का सहयोग प्राप्त हो सके। भारतीय सेना की सजगता के कारण ऐसे किसी भी दुष्प्रयास में पाकिस्तान को सफलता नहीं मिली।

जैसलमेर पर आक्रमण

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भारत भूमि पर कुदृष्टि का पहला प्रकरण जैसलमेर में घटित हुआ। भारत में सम्मिलित राजपूताना रियासतों में से जोधपुर, बीकानेर तथा जैसलमेर रियासतों की सीमायें पाकिस्तान के साथ लगती थीं। इस सीमा से भविष्य में किसी भी समय आक्रमण होने का खतरा बना हुआ था। जैसलमेर रियासत में कुछ संख्या में मुसलमान जातियां रहती थीं जो गा-बजाकर अपना पेट भरती थीं। इन लोगों का जिन्ना के षड़यंत्रों से कोई लेना-देना नहीं था फिर भी जिन्ना सोचता था कि इस्लाम के नाम पर ये लोग पाकिस्तानी फौज की सहायता करेंगे तथा पाकिस्तानी सेना जैसलमेर के इन हिस्सों पर अधिकार कर लेगी।

भारत की आजादी के कुछ दिन बाद ही जैसलमेर रियासत में पाकिस्तानी फौजें घुस आईं। जैसलमेर महाराजा ने अपने मित्र राजाओं को तार के माध्यम से इसकी सूचना दी। पाकिस्तान के इस आक्रमण का सामना करने में जैसलमेर रियासत की सरकार सक्षम नहीं थी। देश आजाद हुआ ही था अतः आपात् स्थिति में भारतीय सेनाओं का सीमा पर तत्काल पहुंच पाना संभव नहीं था। ऐसी विपन्न स्थिति में जोधपुर रियासत की ऊंट सेना ने पाकिस्तानी सेना का सामना किया तथा उसे भारत भूमि से बाहर निकाल दिया।

लक्षद्वीप हथियाने का असफल प्रयास

लक्षद्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से दूर तथा अरब सागर में स्थित है। भारत की आजादी के समय ये द्वीप ब्रिटिश क्राउन की सत्ता का हिस्सा थे तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के अधीन थे। 15 अगस्त 1947 अधिनियम के अनुसार प्रांतीय विभाजन के आधार पर इन्हें भारत में मिलना था किंतु इन द्वीपों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या निवास करती थी।

इस कारण यह भय उत्पन्न हो गया कि इन द्वीपों पर पाकिस्तान अपना अधिकार जतायेगा अथवा अधिकार जमाने की चेष्टा करेगा। सरदार पटेल की दृष्टि से भारत का सुदूरस्थ भाग भी बचा हुआ नहीं था। इसलिये उन्होंने समय रहते ही रॉयल इण्डियन नेवी की एक टुकड़ी लक्षद्वीप भेजने का निर्णय लिया। इस टुकड़ी ने द्वीप पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करके वहाँ भारतीय झण्डा फहरा दिया।

सरदार पटेल जानते थे कि पाकिस्तान की भारत भूमि पर कुदृष्टि लगी हुई है इसलिए यह सुनिश्चित किया गया कि पाकिस्तान इन द्वीपों पर अधिकार करने की कुचेष्टा न कर सके।

सरदार पटेल का अनुमान सही था। रॉयल इण्डियन नेवी की टुकड़ियों द्वारा लक्षद्वीप पर अधिकार कर लिये जाने के कुछ घण्टों बाद ही रॉयल पाकिस्तान नेवी के जहाज लक्षद्वीप के चारों ओर दिखाई देने लगे किंतु जब उन्होंने देखा कि द्वीप पर पहले से ही तिरंगा फहरा रहा है तो वे बिना कोई कार्यवाही किये, कराची लौट गये। यदि पटेल में इतनी दूरदृष्टि नहीं होती तो भारत का नक्शा निःसंदेह आज के नक्शे जैसा नहीं होता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

काश्मीर पर कबाइली आक्रमण

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काश्मीर पर कबाइली आक्रमण करवाकर पाकिस्तान ने न केवल महाराजा हरिसिंह की पीठ में छुरा भौंका अपितु भारत के साथ भी विश्वासघात किया। जिन्ना ने कहा था कि मुसलमान अपने देश पाकिस्तान में शांति के साथ रहेंगे किंतु जिन्ना के मुसलमान एक भी दिन शांति से नहीं बैठे!

काश्मीर देश का एक मात्र राज्य था जिसका राजा हिन्दू था किंतु राज्य की बहुसंख्य जनता मुस्लिम थी। रेडक्लिफ ने भारत का जो भौगोलिक विभाजन किया था, उसमें काश्मीर को यह सुविधा थी कि वह भारत या पाकिस्तान किसी भी देश में मिले, या फिर पूर्णतः अलग रहे। भारत की आजादी के बाद काश्मीर नरेश हरिसिंह ने भारत एवं पाकिस्तान से अलग रहने का निर्णय लिया। जिन्ना काश्मीर पर अपना नैसर्गिक अधिकार समझता था। इसके तीन प्रमुख कारण थे-

(1) पाकिस्तान तथा काश्मीर की सीमाएं एक दूसरे से मिलती थीं।

(2) काश्मीर में हिन्दुओं की बजाय मुस्लिम जनसंख्या अधिक थी।

(3) काश्मीर से कुछ नदियां निकलती थीं जो कुछ दूरी तक भारत में बहने के बाद पाकिस्तान में प्रवेश करती थीं और वे पाकिस्तान के लिए जीवन-रेखा सिद्ध होने वाली थीं।

जब काश्मीर पाकिस्तान में नहीं मिला और काश्मीर के राजा ने भारत एवं पाकिस्तान दोनों से अलग रहने का निर्णय लिया तो 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर कबाइली आक्रमण आक्रमण करवा दिया। पाकिस्तान की वर्दीधारी सेना भी इन पख्तून कबाइलियों के साथ भेजी गई। यह सेना बारामूला में आकर लूटपाट करने लगी। महाराजा हरिसिंह ने भारत सरकार से सहायता मांगी।

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सरदार पटेल ने काश्मीर को बचाने की इच्छा व्यक्त की किंतु नेहरू और माउण्टबेटन ने उनका यह कहकर विरोध किया कि जब तक काश्मीर का राजा भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त न करे तब तक भारतीय सेना काश्मीर में न भेजी जाए। इस पर पटेल ने श्रीनगर तथा बारामूला दर्रे को बचाने के लिए रक्षामंत्री बलदेवसिंह को विश्वास में लेकर भारतीय सुरक्षा दलों को काश्मीर की सीमा पर भारतीय क्षेत्रों में इस प्रकार नियोजित किया जिससे उन्हें तत्काल युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सके। उन्होंने श्रीनगर से पठानकोट तक सड़क बनाने का भी कार्य करवाया। जब पाकिस्तान की सेनाएं श्रीनगर से केवल 35 किलोमीटर दूर रह गईं तो हरिसिंह ने भारत में विलय के कागज पर हस्ताक्षर किए।

 अब नेहरू और माउण्टबेटन काश्मीर में भारतीय सेना को भेजने के लिए विवश थे किंतु माउण्टबेटन मानते थे कि थे मुस्लिम-बहुल राज्य होने तथा पाकिस्तान से सीमाएं लगने से काश्मीर को पाकिस्तान में मिलना चाहिए। जबकि सरदार पटेल मानते थे कि सदियों से हिन्दू राजा का राज्य होने के कारण काश्मीर को भारत में मिलना चाहिए। माउण्टबेटन ने नेहरू को सलाह दी कि वे इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाएं।

सरदार पटेल ने इस प्रस्ताव का विरोध किया परन्तु पण्डित नेहरू, माउण्टबेटन की बातों में आ गए। माउण्टबेटन और नेहरू तो जूनागढ़ के मामले को भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाना चाहते थे किंतु वहाँ भी सरदार वल्लभभाई पटेल और सरदार बलदेवसिंह ने सैनिक कार्यवाही करके जूनागढ़ को बचा लिया था। इसी प्रकार का निर्णय काश्मीर के मामले में भी लिया गया।

उपप्रधान मंत्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रक्षामंत्री सरदार बलदेवसिंह से बात करके पंजाब के गुरदासपुर के रास्ते भारतीय थलसेना को काश्मीर में घुसा दिया और भारतीय वायुसेना के विमान श्रीनगर में उतार दिए। दूसरी ओर माउण्टबेटन की सलाह पर पं. नेहरू इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। 1 जनवरी 1948 को भारत ने सुरक्षा परिषद् में शिकायत की कि भारत के एक अंग काश्मीर पर सशस्त्र कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया है और पाकिस्तान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, दोनों तरीकों से उन्हें सहायता दे रहा है।

इस आक्रमण से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलाने तथा कबाइलियों को सैनिक सहायता न देने को कहा जाये और पाकिस्तान की इस कार्यवाही को भारत पर आक्रमण माना जाये।

15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान ने भारत के आरोपों को अस्वीकार कर दिया और भारत पर बदनीयती का आरोप लगाते हुए कहा कि जम्मू-काश्मीर का भारत में विलय असंवैधानिक है और इसे मान्य नहीं किया जा सकता। सुरक्षा परिषद् ने इस समस्या के समाधान के लिए पांच राष्ट्रों की एक समिति गठित की और इस समिति को मौके पर स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने को कहा।

संयुक्त राष्ट्र समिति ने काश्मीर आकर मौके का निरीक्षण किया और 13 अगस्त 1948 को दोनों पक्षों से युद्ध बन्द करने और समझौता करने हेतु कई सुझाव दिये, जिन पर दोनों पक्षों के बीच लम्बी वार्त्ता हुई। अंत में 1 जनवरी 1949 को दोनों पक्ष युद्ध-विराम के लिए सहमत हो गये।

यह भी तय किया गया कि अन्तिम फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जायेगा। इसके लिए एक अमरीकी नागरिक चेस्टर निमित्ज को प्रशासक नियुक्त किया गया परन्तु पाकिस्तान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और जनमत-संग्रह नहीं हो पाया।

निमित्ज ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। नेहरू एवं माउण्टबेटन ने काश्मीर की समस्या को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाकर बुरी तरह उलझा दिया। इसके लिये सरदार पटेल जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गये। नेहरू की ही गलत नीतियों के कारण ई.1962 में चीन ने भी काश्मीर का बड़ा भू-भाग दबा लिया जो अब भी उसके कब्जे में हैं। ई.1965 में पाकिस्तान और भारत के बीच काश्मीर को लेकर एक बार पुनः युद्ध हुआ तथा पाकिस्तान ने काश्मीर का बहुत बड़ा भू-भाग दबा लिया जो आज भी पाकिस्तान के कब्जे में है।

जब काश्मीर में पाकिस्तान द्वारा आरोपित युद्ध चल रहा था तो भारत सरकार ने पाकिस्तान को बंटवारे में तय हुई सम्पत्तियों का हस्तांतरण रोक दिया। ब्रिटिश-भारत की सम्पत्तियों का 17.5 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को दिया जाना था। नकदी की देखरेख रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के पास थी और उसने कई महीनों के लिए 75 करोड़ रुपए की रकम का हस्तांतरण रोक दिया। गांधीजी के दबाव पर नेहरू सरकार को 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देने पड़े।

काश्मीर पर कबाइली आक्रमण करवाकर पाकिस्तान को वे नदियाँ तो नहीं मिलीं जिन्हें वह संगीनों के बल पर हथियाना चाहता था किंतु काश्मीर में छिड़ी जंग के चलते पाकिस्तान के हिस्से आने वाला 1,65,000 टन हथियार, गोला-बारूद और अन्य रक्षा सामग्री भारत में ही फंस गई। 31 मार्च 1948 तक भारत ने इसमें से केवल 4,730 टन ही जारी किया और फिर 18,000 टन 10 सितम्बर 1948 तक दिया। पाकिस्तान का दावा था कि इस तारीख तक भारत के पास पाकिस्तान के हिस्से की 1,42,000 टन युद्ध-सामग्री बकाया थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बीकानेर महाराजा सादूलसिंह पर पाकिस्तानी मकड़जाल

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भारत की आजादी के समय बीकानेर रियासत भारत के उन राज्यों में सम्मिलित थी जिन्होंने भारत में सम्मिलित होने के लिए सबसे पहले अपनी सहमति दी थी। जब पाकिस्तान बन गया तो मुहम्मद अली जिन्ना ने बीकानेर महाराजा सादूलसिंह पर नए सिरे से पाकिस्तानी मकड़जाल फैंका! दुर्भाग्य से बीकानेर महाराजा सादूलसिंह इस मकड़जाल में फंस गया।

बीकानेर के अधिकारियों तथा बहावलपुर राज्य के प्रधानमंत्री नवाब मुश्ताक अहमद गुरमानी के मध्य भारत सरकार के सैन्य अधिकारी मेजर शॉर्ट की अध्यक्षता में बीकानेर में एक बैठक रखी गयी। 7 नवम्बर 1947 को मेजर शार्ट की मध्यस्थता में दोनों रियासतों के मध्य शरणार्थियों एवं सीमा सम्बन्धी विवादों पर चर्चा हुई तथा एक समझौता भी हुआ। इसके बाद उसी दिन शाम की ट्रेन से मेजर शॉर्ट दिल्ली चला गया और गुरमानी को भी सरकारी रिकॉर्ड में बहावलपुर जाना अंकित कर दिया गया जबकि महाराजा ने गुरमानी को गुप्त मंत्रणा के लिए लालगढ़ में ही रोक लिया।

तीन दिन तक गुरमानी लालगढ़ में रहा। इस दौरान राजमहल का सारा स्टाफ मुसलमानों का रहा। अपवाद स्वरूप कुछ ही हिन्दू कर्मचारियों को महल में प्रवेश दिया गया। इनमें से राज्य के जनसम्पर्क अधिकारी बृजराज कुमार भटनागर भी थे। उन्हें इसलिए प्रवेश दिया गया कि वे महाराजा के अत्यंत विश्वस्त थे तथा उर्दू के जानकार थे। 10 नवम्बर तक गुरमानी और सादूलसिंह के बीच गुप्त मंत्रणा चलती रही।

इस दौरान सादूलसिंह का झुकाव पाकिस्तान की ओर हो गया। यह निर्णय लिया गया कि प्रायोगिक तौर पर छः माह के लिए बीकानेर और बहावलपुर राज्यों के मध्य एक व्यापारिक समझौता हो। समझौता लिखित में हुआ तथा दोनों ओर से हस्ताक्षर करके एक दूसरे को सौंप दिया गया।

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बृजराज कुमार भटनागर ने यह बात बीकानेर में हिन्दुस्तान टाइम्स के संवाददाता दाऊलाल आचार्य को बता दी। यह समाचार 17 नवम्बर 1947 को हिन्दुस्तान टाइम्स के दिल्ली संस्करण में तथा 18 नवम्बर को डाक संस्करण में प्रकाशित हुआ जिससे दिल्ली और बीकानेर में हड़कम्प मच गया। बीकानेर प्रजा परिषद के नेताओं ने इस संधि का विरोध करने का निर्णय लिया और दिल्ली जाकर भारत सरकार को ज्ञापन देने की घोषणा की।

यह रक्षा से सम्बद्ध मामला था तथा संघ सरकार के अधीन आता था इसलिए पटेल ने तुरंत एक सैन्य सम्पर्क अधिकारी को बीकानेर तथा बहावलपुर की सीमा पर नियुक्त किया और बीकानेर महाराजा को लिखा कि वे इस अधिकारी के साथ पूरा सहयोग करें। बीकानेर के गृह मंत्रालय द्वारा समाचार पत्र के संवाददाता को समाचार का स्रोत बताने के लिए कहा गया। उन्हीं दिनों बीकानेर सचिवालय की ओर से रायसिंहनगर के नाजिम को एक तार भेजा गया। इस तार में रायसिंहनगर के नाजिम को सूचित किया गया था कि बहावलपुर रियासत से हमारा व्यापार यथावत चल रहा है। रायसिंहनगर में रेवेन्यू विभाग के भूतपूर्व पेशकार मेघराज पारीक ने वह तार नाजिम के कार्यालय से चुरा लिया और दाऊलाल आचार्य को सौंप दिया। इस तार के प्रकाश में आने के बाद बीकानेर राज्य का गृह विभाग शांत होकर बैठ गया।

बीकानेर महाराजा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचारों का विरोध करते हुए भारत सरकार को लिखा कि- ‘बीकानेर प्रजा परिषद और बीकानेर राज्य के सम्बन्ध ठीक नहीं हैं, इसलिए प्रजा परिषद के एक कार्यकर्ता ने जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स का संवाददाता भी है, इस खबर को प्रकाशित करवाया है ताकि बीकानेर राज्य पर दबाव बनाकर उसे उपनिवेश सरकार द्वारा अधिग्रहीत कर लिया जाये। क्या प्रजा परिषद बीकानेर राज्य को जूनागढ़ तथा हैदराबाद के समकक्ष रखना चाहती है?’

बीकानेर महाराजा सादूलसिंह ने सरदार पटेल से अनुरोध किया कि वह इस सम्बन्ध में दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही में सहायता करें तथा एक आधिकारिक बयान जारी करके इस आरोप को निरस्त करें। इस पर रियासती विभाग ने एक वक्तव्य जारी किया कि कुछ समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार प्रकाशित किए गये हैं कि बीकानेर, पाकिस्तान एवं बहावलपुर के मध्य एक व्यापारिक संधि हुई है।

यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यह समचार पूर्णतः आधारहीन है। ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है। बहावलपुर के मुख्यमंत्री सीमा के दोनों तरफ रह रहे शरणार्थियों में भय फैलने से रोकने के लिए किए जा रहे प्रयासों के लिए मैत्री यात्रा पर आये थे।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि बीकानेर महाराजा सादूलसिंह ने अंतरिम सरकार बनाकर आंशिक मात्रा में सत्ता जनता को सौंपी अवश्य पर रियासत को अलग इकाई रखने हेतु जो पापड़ बेले गये और दुराभिसंधियां की, उनकी सूचना दाऊलाल आचार्य एवं मूलचंद पारीक ने यथासमय उच्चस्थ विभागों को पहुंचायीं, वह तो देशभक्ति की अनोखी मिसाल है। उसी के कारण बीकानेर रियासत भारत में रह पायी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान से आगे

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इस्लाम के नाम पर, जेहाद के नाम पर, काफिरों के साथ न रह पाने के नाम पर, चाकू-छुरों और हथियारों के जोर पर पाकिस्तान तो बन गया किंतु पाकिस्तान से आगे क्या? पाकिस्तान से आगे था केवल पाकिस्तान में रह गए हिन्दुओं का रक्तपात, पाकिस्तानी सिक्खों से हिसां, गरीबी, लूटपाट, आटे की कमी, नागरिक अधिकारों का हनन आदि-आदि, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं!

लाखों लोगों के प्राणों की आहुति लेकर तथा लाखों लोगों को जीते-जी नर्क में धकेलकर पाकिस्तान तो बन गया किंतु पाकिस्तान की आगे की यात्रा आसान नहीं थी। अब तक पाकिस्तान निर्माण के लिए मुस्लिम लीग के नेताओं द्वारा अविभाजित भारत की मुस्लिम जनता को इस नाम पर जोड़े रखा गया था कि मुसलमानों का एक अलग देश होना चाहिए जहाँ भारत के समस्त मुसलमान आराम से रह सकें किंतु अब मुस्लिम लीग के नेताओं को अलग मुस्लिम देश मिल गया था और वे भारत से जा चुके थे।

भारत के अधिकांश धनी एवं शिक्षित मुसलमान अपनी इच्छा से भारत में रहे थे किंतु वे करोड़ों निर्धन एवं अशिक्षित मुसलमान जो पाकिस्तान जाना चाहते थे किंतु अपने काम-धंधों, खेतों-खलिहानों, ढोर-डंगरों और घर-नोहरों को छोड़कर जा नहीं पाए थे, उन्हें यह समझने में बहुत समय लगा कि उन्हें पाकिस्तान न तो कभी मिलना था और न मिल सकता है। निर्धन एवं अशिक्षित मुसलमानों के मन में यह भ्रम उत्पन्न किया गया था कि वे जहाँ बैठे हैं, उन्हें उनका पाकिस्तान वहीं मिल जाएगा। उन्हें यह भी कभी समझ में नहीं आया कि ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता था, न वे ये समझ पाए कि उन्हें मुस्लिम लीगी नेताओं द्वारा छला गया है।

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दूसरी ओर पाकिस्तान नामक नए मुल्क के मुसलमानों को जोड़े रखने के लिए मुस्लिम लीगी नेताओं को जो नया आधार चाहिए था, मुस्लिम लीगी नेता उससे वंचित थे। उनकी गोद में न केवल पाकिस्तान आ गिरा था अपितु कभी खत्म न होने वाली समस्याओं का एक नासूर भी उन्हें प्राप्त हो गया था। पूर्वी-पाकिस्तान और पश्चिमी-पाकिस्तान के बीच 1600 किलोमीटर की हवाई दूरी थी। एक ऐसी सरकार का ढांचा तैयार करना जो पंजाबी दबदबे वाले पश्चिमी-पाकिस्तान और बंगाली बोलने वाले पूर्वी-पाकिस्तान को एक साथ चला सके, मुश्किम काम था।

नवनिर्मित पाकिस्तान में उत्पन्न होने वाले कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण कारखाने भारत में रह गए थे। पाकिस्तान के हिस्से में विश्व के 75 प्रतिशत जूट उत्पादक क्षेत्र आए थे किंतु जूट का सामान तैयार करने वाली एक भी मिल पाकिस्तान को नहीं मिली, सारी मिलें भारत में रह गई थीं। अविभाजित भारत से पाकिस्तान को कपास के लगभग एक-तिहाई खेत मिल गए थे किंतु सूती मिलों का केवल तीसवां हिस्सा ही मिला था।

गैर मुस्लिम उद्यमी जिनका आजादी से पहले पाकिस्तान वाले क्षेत्र के व्यापार पर दबदबा था, अपने व्यापार बंद करके अपनी पूंजी के साथ भारत चले गए थे। जबकि भारत से बहुत कम मुस्लिम पूंजीपति पाकिस्तान आए थे। पूंजी के पलायन से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का दम घुटने लगा जिसे पाकिस्तान के नेताओं ने पाकिस्तान का आर्थिक तौर पर गला घोंटने की हिन्दू चाल समझा।

भारत में रह गए मुसलमानों के प्रश्न पर
जिन्ना द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का त्याग

पाकिस्तान निर्माण के बाद भी 3.54 करोड़ मुसलमान भारत में रह गए। अर्थात् अविभाजित भारत की कुल मुस्लिम जनसंख्या का लगभग एक तिहाई भाग। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष खलीकउज्जमां ने लिखा है कि कराची के लिए रवाना होने से कुछ दिन पहले 1 अगस्त 1947 को मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने निवास 10 औरंगजेब रोड दिल्ली में संविधान सभा के मुस्लिम सदस्यों को विदाई पार्टी के लिए आमंत्रित किया।

इस अवसर पर मि. रिजवानउल्लाह ने जिन्ना से भारत में रह जाने वाले मुसलमानों के भविष्य एवं भारत में उनकी संवैधानिक स्थिति को लेकर प्रश्न पूछे। इन प्रश्नों को सुनकर जिन्ना विचलित हो गया, उसके पास इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं था।

भावी पाकिस्तान का गवर्नर जनरल एवं पाकिस्तान की संविधान सभा का अध्यक्ष घोषित किए जाने के बाद 11 अगस्त 1947 को जिन्ना द्वारा संविधान सभा में दिए गए भाषण में उसने द्विराष्ट्र के सिद्धांत को त्याग दिया।

जिन्ना ने आश्चर्यजनक रूप से एकाएक सेक्यूलर घोषणा की- ‘आप देखेंगे कि वक्त के साथ देश के नागरिक की हैसियत से हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा, मुसलमान मुसलमान नहीं रहेगा, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, क्योंकि ये हर व्यक्ति का व्यक्तिगत ईमान है, बल्कि सियासी हैसियत से।’

जिन्ना की धर्म-निरपेक्षता के बदलते हुए रंगों का विश्लेषण करते हुए तारेक फतेह ने लिखा है-

‘भविष्य का पाकिस्तानी समान अधिकार, विशेषाधिकार और जिम्मेदारियों के साथ रंग, जाति, सम्प्रदाय या समुदाय से अलग केवल एक नागरिक होगा। राज्य के काम में धर्म की कोई भूमिका नहीं होगी। ये केवल किसी की व्यक्तिगत आस्था तक सीमित होगा।

….. चंद महीनों में उन्होंने (जिन्ना ने) अपना रास्ता बदल लिया और एक मध्ययुगीन अमीर की तरह बोलना शुरू कर दिया। इसमें उन्होंने अपने देश से इस्लाम की रक्षा के लिए गोलबंद होने की अपील की और इसके साथ ही अपने ही वादों की मौत का रास्ता साफ कर दिया।

…… पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना सिर्फ एक साल रहे लेकिन इतने ही समय में उन्होंने एक सर्वोच्च प्रशासक के मानक तय कर दिए। लोकतांत्रिक नेताओं की बजाय मुगल शासकों की कार्य-प्रणाली अपनाकर।

……. क्या इस्लामिक राज्य का यही मॉडल था जिसका इंतजार 20वीं सदी के मुसलमान कर रहे थे? यह मनमाने तरीके से खलीफाओं के शासन जैसा था, जो गवर्नर जनरल के नाम से चलता था। इसमें विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं थी, साथ ही धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत को भी पूरी तरह छोड़ दिया गया था। जबकि कुछ ही महीने पहले इसके प्रति कटिबद्धता जताई गई थी।’

दो भाइयों का सहमति से हुआ बंटवारा था यह!

भारत-पाकिस्तान के विभाजन ने 5 से 10 लाख लोगों के प्राण ले लिए, 1.40 करोड़ लोग बे-घर हुए तथा एक करोड़ स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए किंतु भारत और पाकिस्तान दोनों ही तरफ के कुछ लोगों ने प्रेम और सहिष्णुता के नाम पर ढोंग और पाखण्ड की चादर को ओढ़े रखा। वे इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते थे कि यह दो जातियों के बीच चरम पर पहुंच चुकी नस्ली-घृणा का परिणाम था।

गांधीजी के पौत्र राजमोहन गांधी ने लिखा है- ‘बापू (गांधीजी) दोनों देशों के बीच अच्छे सम्बन्धों के लिए कम उत्साहित नहीं थे, वे मानते थे कि नया देश दो भाइयों के बीच सहमति से हुए बंटवारे से पैदा हुआ था।’

गांधीजी से उलट कुछ लोग बड़ी चतुराई से सच्चाई को स्वीकार भी करते हैं। अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने लिखा है- ‘ज्यादातर पाकिस्तानी और भारतीय एक-दूसरे को दुश्मन के तौर पर ही देखते हैं न कि हालात के चलते जुदा हुए दो भाइयों के तौर पर।

…… दोनों देशों के बीच तनाव के बीज काफी शुरुआत में पड़ गए थे। जिन्ना का मेल-मिलाप वाला रुख न तो मुस्लिम लीग में नजर आता था और न ही पाकिस्तान की सिविल और मिलिट्रि ब्यूरोक्रेसी में कहीं दिखाई पड़ता था। इन लोगों को विभाजन के दौरान पैदा हुई नफरत की भावना को बरकरार रखते हुए इस नए मुल्क को अपने अधिकार में रखना ज्यादा आसान लगता था।

भारत के नेताओं, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की नए पाकिस्तान के प्रति बेरुखी के चलते खासतौर पर दोनों देशों के बीच संपत्तियों के बंटवारे के मामले में अनुदार होने से भी सम्बन्धों की सहजता कायम होना और कठिन हो गया।’

गांधीजी की नकली और बनवाटी बातें पाकिस्तान का भविष्य नहीं सुधार सकती थीं। नेहरू और पटेल ने पाकिस्तान का भविष्य देख लिया था। फिर भी कांग्रेस पाकिस्तान से अपनी ओर से प्रेम का प्रदर्शन करती रही किंतु पाकिस्तान कभी सुधर नहीं सका। इस कारण न पाकिस्तान में कुछ बचा न पाकिस्तान से आगे कुछ बचा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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