Wednesday, February 21, 2024
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निजाम को विश्वास था कि अंग्रेज हैदराबाद को अलग देश बना देंगे!

15 अगस्त 1947 तक भारत में न मिलने वाली दूसरी रियासत हैदराबाद थी। हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में मुगल सूबेदार चिनकुलीजखाँ ने की थी। उसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई.1798 में हैदराबाद रियासत ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि (सबसीडरी एलायंस) की।

हैदराबाद निजाम को अंग्रेज सरकार द्वारा 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,14,190 वर्ग किलोमीटर था। यह भारत का सबसे बड़ा तथा सबसे समृद्ध देशी राज्य था। क्षेत्रफल में वह फ्रांस जितना बड़ा था। हैदराबाद राज्य की जनसंख्या लगभग 1,63,40,000 थी। वर्तमान में स्थित महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश प्रांतों के भू-भाग, हैदाराबाद राज्य में स्थित थे। जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु राज्य की 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। ]

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हैदराबाद राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी। निजाम को भारत का सबसे अमीर शासक माना जाता था। निजाम प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था।

निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे। राज्य की समस्त नौकरियां मुसलमानों के लिये आरक्षित थीं। ई.1947 में हैदाराबाद में एक विधान सभा बनाई गई जिसमें 48 पद मुसलमानों के लिये तथा 38 पद हिन्दुओं के लिये रखे गये ताकि कोई कानून ऐसा न बन सके जो मुसलमान रियाया के अधिकारों के विरुद्ध हो। इस विधानसभा को इतने अधिकार दिये गये कि यदि निजाम स्वयं भी चाहे तो मुसलमान रियाया के अधिकारों में कटौती न कर सके।

निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति, ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था। इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था। निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा।

जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। निजाम, लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा।

हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि- ‘हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।’

9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने मन की अकुलाहट को खुलकर व्यक्त किया-

‘पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां क्लॉज जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया। यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करता है बल्कि यह आभास भी देता है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा। जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही। इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है।

मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया। आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले। मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये। लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है। मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।’

इस पर वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा।

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