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अमरकोट के राणा ने हुमायूँ को नया जीवन प्रदान किया (64)

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अमरकोट - www.bharatkaitihas.com
अमरकोट के राणा ने हुमायूँ को नया जीवन प्रदान किया

22 अगस्त 1542 को हुमायूँ अत्यंत दयनीय दशा में अमरकोट पहुँचा। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि हुमायूँ अपने सात साथियों के साथ अमरकोट पहुंच पाया किंतु यह बात सही नहीं है, इस समय भी हुमायूँ के पास कुछ सौ सिपाही अवश्य ही रहे होंगे क्योंकि आगे के वर्णनों में उनके उल्लेख एवं नाम मिलते हैं।

अमरकोट के राणा वीरसाल ने हुमायूँ का स्वागत किया और उसे हर प्रकार से सहायता देने का वचन दिया। फरिश्ता ने लिखा है- ‘ऐसी विपत्तियों को जो कभी सुनी भी नहीं गई, झेलता हुआ बादशाह अंत में उमरकोट पहुंचा। उस समय उसके साथ केवल थोड़े से सहायक बचे थे। अमरकोट के राणा को दुर्भाग्यग्रस्त बादशाह पर दया आई और उसने उसकी विपत्तियों को कम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।’ 

इस प्रकार बाबर के चारों बेटे अपने पिता के राज्य से दूर हो गए। जिस राज्य को जीतने में बाबर एवं हुमायूँ ने अत्यधिक पसीना बहाया था। बाबर के चारों बेटों में यदि एकता होती और वे थोड़ी सी हिम्मत से काम लेकर नए सैनिकों की भरती करते तो वे शेर खाँ को बिहार तक ही सीमित कर सकते थे किंतु न तो बाबर के बेटों में एकता थी और न उनके पास सैनिकों की भरती करने लायक कोष बचा था।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बाबर ने दिल्ली एवं आगरा से प्राप्त बहुत सारा धन समरकंद, बुखारा एवं फरगना में अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों को उपहारों के रूप में भिजवा दिया था जिससे राजकोष में अधिक धन नहीं बचा था। हुमायूँ भी राजकोष में धन की वृद्धि नहीं कर सका था इसलिए अब उसके पास धन की कमी हो गई थी। हुमायूँ को चम्पानेर से जो धन मिला था, वह धन उसने आमोद-प्रमोद में लुटा दिया।

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संकट की इस घड़ी में हुमायूँ को शेर खाँ से लड़ने के लिये सेना के लिए रसद एवं आयुध की आवश्यकता थी किंतु उसे कहीं से धन मिलने की संभावना नहीं थी। अतः न तो सेना की भर्ती की जा सकती थी, न रसद जुटाई जा सकती थी और न आयुध खरीदे जा सकते थे। इतिहास की पुस्तकों में इस समय बाबर के उन दो तोपचियों उस्ताद अली कुली तथा मुस्तफा रूमी का उल्लेख नहीं मिलता है। मुस्तफा रूमी खाँ का अंतिम उल्लेख चुनार दुर्ग के घेरे में मिलता है। अतः कहा नहीं जा सकता कि इस समय उस्ताद अली कुली तथा मुस्तफा रूमी इस समय जीवित भी थे या नहीं! गुलबदन बेगम ने लिखा है कि अमरकोट के राणा वीरसाल के पिता को थट्टा के शासक मिर्जा शाह हुसैन ने मार डाला था, इसलिए अमरकोट का राणा शाह हुसैन से बदला लेना चाहता था। एक दिन हुमायूँ अमरकोट की सेना के पांच हजार सैनिकों को लेकर थट्टा पर आक्रमण करने गया ताकि थट्टा के विश्वासघाती शासक मिर्जा शाह हुसैन को दण्डित किया जा सके।

जब हुमायूँ अमरकोट तथा थट्टा के बीच स्थित एक तालाब पर रुका हुआ था, वहीं पर तार्दी बेग खाँ ने हुमायूँ को सूचना दी कि हमीदा बानू ने एक पुत्र को जन्म दिया है। हुमायूँ को पुत्र प्राप्ति की बड़ी प्रसन्नता हुई परन्तु उस समय हुमायूँ के पास अपने साथियों को देने के लिए कुछ नहीं था।

इसलिए हुमायूँ ने एक कस्तूरी तोड़कर अपने मित्रों में बांटी और अल्लाह से प्रार्थना की कि कस्तूरी की सुगन्ध की तरह उसके पुत्र का यश भी चारों दिशाओं में फैल जाये। हुमायूँ ने अपने इस पुत्र का नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखा।

जब सिंध के हिन्दू राजाओं ने सुना कि अमरकोट का राणा बादशाह हुमायूँ को लेकर थट्टा के मिर्जा को मारने के लिए आया है तो आसपास के सोढ़ा, सूदमः और समीचा सरदार अपनी-अपनी सेनाएं लेकर हुमायूँ की सहायता के लिए आ गए। इससे हुमायूँ के पास दस हजार की सेना हो गई। जब हुमायूँ इस सेना के साथ ‘जून’ नामक स्थान पर पहुंचा तो जून का अमीर जून छोड़कर भाग गया। वह थट्टा के मिर्जा शाह हुसैन का अधीनस्थ अमीर था। यहाँ से ठट्टा 75 मील दूर रह गया था।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हुमायूँ छः माह तक जून में रहा। उसने अपने हरम को भी अमरकोट से जून बुला लिया। उस समय अकबर छः माह का हो चुका था जबकि राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि वह केवल 34 दिन का हुआ था।

हुमायूँ ने शेख अली बेग को मुजफ्फर बेग तुर्कमान के साथ ‘जाज्का’ नामक बड़े परगने पर अधिकार करने भेजा जो कि ठट्ठा के शासक मिर्जा शाह हुसैन के अधीन था। मिर्जा शाह हुसैन ने हुमायूँ की सेना को परास्त कर दिया। शेख अली बेग मारा गया और मुजफ्फर बेग तुर्कमान भाग कर हुमायूँ के पास आ गया।

कुछ दिन बाद हुमायूँ के अमीर खालिद बेग और एक अन्य अमीर शाहिम खाँ जलावर के भाई लौश बेग के बीच झगड़ा हो गया। बादशाह ने लौश बेग का पक्ष लिया जिसके कारण खालिद बेग बादशाह हुमायूँ से नाराज होकर मिर्जा शाह हुसैन के पास चला गया। कुछ दिन बाद लौश बेग भी हुमायूँ को छोड़कर भाग गया। कुछ दिन बाद समाचार मिले कि लौश बेग को नींद में, उसके ही एक गुलाम ने छुरे से मार डाला।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अमरकोट का राणा वीरसाल हुमायूँ को छोड़ गया (65)

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अमरकोट का राणा वीरसाल - www.bharatkaitihas.com
अमरकोट का राणा वीरसाल हुमायूँ को छोड़ गया

जब हुमायूँ ने तार्दीबेग से कुछ नहीं कहा तो अमरकोट का राणा वीरसाल हुमायूँ से नाराज होकर रात में ही अपने सैनिकों सहित अमरकोट के लिए रवाना हो गया। सोढ़ा, सूदमः और समीचा सरदार भी अपनी-अपनी सेनाएं लेकर चले गए।

हुमायूँ अमरकोट के राणा की सेना लेकर ठट्ठा के शासक मिर्जा शाह हुसैन पर चढ़ाई करने गया तथा मार्ग में जून नामक स्थान पर ठहरा। यहाँ से हुमायूँ ने ठट्ठा के अधीन क्षेत्रों पर अभियान किए किंतु हुमायूँ को सफलता नहीं मिली।

इस बीच हुमायूँ की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही थी। गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘हुमायूँ ने तार्दीबेग से सिक्का उधार मांगा। तार्दीबेग के पास बहुत सुवर्ण था। उसने दस में से दो के हिसाब से अस्सी हजार अशर्फी हुमायूँ को उधार दी। हुमायूँ ने इस पूरी राशि को अपनी सेना में बांट दिया। हुमायूँ की तरफ से राणा वीरसाल और उसके पुत्रों को कमरबंद और सरोपा दिया गया। बहुत से सिपाहियों ने नए घोड़े खरीद लिए।’

हुमायूँ की खराब होती जा रही आर्थिक स्थिति के कारण उसके मंत्रियों, सेनापतियों एवं अमीरों में अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही थी। वे बात-बार पर झगड़ते थे और परस्पर मन-मुटाव के कारण हुमायूँ का साथ छोड़-छोड़कर थट्टा के शासक की शरण में पहुंचते जा रहे थे।

एक रात को राणा वीरसाल तथा हुमायूँ के सेनापति तर्दीबेग में कहा-सुनी हो गई। तार्दीबेग ने राणा वीरसाल का जमकर अपमान किया। यह एक अनपेक्षित स्थिति थी किंतु दुर्दैववश हुमायूँ इस स्थिति में ऐसा फंसा कि उसके जीवन में मुसीबतों का नया बवण्डर खड़ा हो गया।

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अमरकोट का राणा वीरसाल हुमायूँ का सच्चा हितैषी था। उसने हुमायूँ पर बहुत अहसान किए थे और जब भारत की धरती पर हुमायूँ को कोई पैर टिकाने की भी जगह नहीं देता था, तब राणा वीरसाल ने हुमायूँ को न केवल शरण दी थी अपितु बड़े प्रेम से उसके हरम की औरतों को अपने महलों में रखा था। इसलिए भाविक ही था कि राणा वीरसाल यह अपेक्षा करता कि हुमायूँ अपने मंत्री तार्दीबेग को दण्डित करे। इसमें कोई दो राय नहीं कि तार्दीबेग झगड़ालू तथा अनुशासनहीन व्यक्ति था और वह हुमायूँ को जोधपुर राज्य से निकलते समय हमीदा बानू के लिए घोड़ा देने के लिए भी मना कर चुका था किंतु हुमायूँ तार्दीबेग से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था। इसके कई कारण थे। तार्दीबेग हुमायूँ का पुराना साथी था, इसलिए हुमायूँ नहीं चाहता था कि उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही की जाए। इस समय हुमायूँ के साथियों की संख्या छीजती जा रही थी, इस कारण भी हुमायूँ नहीं चाहता था कि मंत्रियों, बेगों एवं अमीरों को नाराज किया जाए। हुमायूँ के चुप रहने का एक बड़ा कारण यह भी था कि कुछ दिन पहले ही हुमायूँ ने तार्दीबेग से बहुत बड़ी रकम उधार ली थी ताकि हुमायूँ अपने सैनिकों एवं अन्य कर्मचारियों का वेतन चुका सके।

इन सब कारणों से हुमायूँ तार्दीबेग से कुछ नहीं कह सका तथा उसने राणा वीरसाल से अनुरोध किया कि वह इस झगड़े को यहीं समाप्त कर दे। जब हुमायूँ ने तार्दीबेग से कुछ नहीं कहा तो राणा वीरसाल हुमायूँ से नाराज होकर रात में ही अपने सैनिकों सहित अमरकोट के लिए रवाना हो गया। सोढ़ा, सूदमः और समीचा सरदार भी अपनी-अपनी सेनाएं लेकर चले गए।

जून में केवल हुमायूँ ही अपने हरम, अपने सैनिकों तथा असैनिक कर्मचारियों सहित रह गया। हिंदू राजाओं के जाते ही हुमायूँ के दुर्दिनों का नया अध्याय आरम्भ हो गया। हुमायूँ की खस्ता हालत देखकर और भी सैनिक हुमायूँ को छोड़कर शाह हुसैन की सेवा में चले गए। एक दिन मिर्जा तार्दी मुहम्मद खाँ और मुनइम खाँ के बीच कहा-सुनी हो गई जिससे मुनइम खाँ भी भाग गया। अब हुमायूँ के पास बहुत कम अमीर बच गए थे।

हिन्दू राजाओं एवं सरदारों के चले जाने के कारण अब हुमायूँ थट्टा के शासक के विरुद्ध कुछ भी करने की स्थिति में नहीं रह गया था। शाह मिर्जा हुसैन को हुमायूँ की इस दयनीय स्थिति के बारे में सब समाचार मिल रहे थे और वह किसी भी दिन आकर हुमायूँ को पकड़ सकता था।

अब हुमायूँ किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पहुंच गया था और उसे अपना वर्तमान एवं भविष्य दोनों ही अंधकारमय दिखाई दे रहे थे। उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। अब शाह हुसैन अपनी नावें लेकर जून के काफी निकट आ गया था जिसके कारण दोनों पक्षों में संघर्ष की तीव्रता भी बढ़ गई थी।

एक दिन हुमायूँ का पुराना साथी मुल्ला ताजुद्दीन, शाह हुसैन की सेना से लड़ता हुआ मारा गया। इससे हुमायूँ को बड़ा झटका लगा। हुुमायूँ मुल्ला की बहुत इज्जत करता था और उसे विद्या का मोती कहता था। सौभाग्य से उसी दिन हुमायूँ को समाचार मिला कि गुजरात से बैराम खाँ बादशाह की सेवा में आ रहा है और जाज्का तक पहुंच गया है। हुमायूँ ने खंदग ऐशक आगा को बैराम खाँ को लिवा लाने के लिए भेजा।

जब थट्टा के शासक शाह हुसैन को ज्ञात हुआ कि बैराम खाँ आ रहा है तो शाह हुसैन ने बैराम खाँ को पकड़ने के लिए अपनी सेना भेजी। बैराम खाँ के पास भी एक सेना थी। इस कारण दोनों पक्षों में युद्ध हुआ और दोनों ही तरफ के बहुत से मनुष्य मारे गए। हुमायूँ का अमीर खंदग ऐशक आगा भी इस युद्ध में मारा गया। बैराम खाँ अपने सैनिकों सहित हुमायूँ की सेवा में उपस्थित हुआ। हुमायूँ ने बैराम खाँ का बड़ा स्वागत किया।

पाठकों को स्मरण होगा कि हम बैराम खाँ तथा उसके पूर्वजों का इतिहास पूर्व में विस्तार से बता चुके हैं। वह बाबर के साथ खुरासान से हिंदुस्तान आया था। जब हुमायूँ ने गुजरात विजय की थी तब बैराम खाँ ने भारी वीरता का प्रदर्शन करके मुगलों के बीच कुछ प्रसिद्धि प्राप्त की थी किंतु शीघ्र ही वह समय आने वाला था जब बैराम खाँ न केवल मुगलिया राजनीति में अपितु भारत की राजनीति में भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने वाला था।

बैराम खाँ के आने से हुमायूँ को बहुत बड़ा सहारा मिल गया था किंतु अब भी उसकी स्थिति ऐसी नहीं हुई थी कि वह शाह हुसैन मिर्जा से मोर्चा ले सके अथवा हिंदुस्तान में कुछ दिन और ठहर सके।

हुमायूँ के तीनों भाई उसे छोड़कर अफगानिस्तान जा चके थे। शेर खाँ सूरी उसका राज्य छीन चुका था और अब सिंध एवं अमरकोट क्षेत्र के हिंदू राजाओं तथा सरदारों के नाराज होकर चले जाने के बाद हिंदुस्तान में हुमायूँ का कोई सहारा नहीं बचा था। अमरकोट का राणा वीरसाल भारत में उसका अंतिम मित्र था, वह भी हुमायूं को अलविदा कह चुका था। हिंदुस्तान में राज्य जमाने की तो कौन कहे हुमायूँ का सिंध के रेगिस्तान में टिके रहना भी कठिन हो गया। उसके लिए हिंदुस्तान में एक-एक दिन भारी हो रहा था। उसने भारत से भागने का निश्चय कर लिया!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की दूत खानजादः बेगम (66)

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हुमायूँ की दूत खानजादः बेगम

खानजादः बेगम हुमायूँ की बुआ थी किंतु हुमायूँ के अनुरोध पर कामरान को समझाने के लिए हुमायूँ की दूत बनकर सिंध से कांधार के लिए रवाना हो गई। वहाँ पहुंचकर हुमायूँ की दूत ने कामरान को भी कांधार बुलवा लिया। मिर्जा कामरान एक बड़ी सेना लेकर कांधार पहुंचा।

पिछले छः महीनों से हुमायूँ सिंध क्षेत्र में प्रवास कर रहा था किंतु सिंध एवं अमरकोट क्षेत्र के हिन्दू राजाओं के रुष्ट होकर चले जाने के बाद हुमायूँ के लिए हिंदुस्तान में रहना भारी हो गया। इस समय हुमायूँ किं कर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में था कि उसे क्या करना चाहिए!

सौभाग्य से बाबर के समय का एक सेनापति बैराम बेग खाँ गुजरात से हुमायूँ की सेवा में ‘जून’ आ गया। वह हुमायूँ को संकट में जानकर स्वयं ही आ पहुंचा था। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि इसी समय कराचः खाँ के प्रार्थना पत्र हुमायूँ के पास आए। कराचः खाँ हुमायूँ के द्वारा कांधार में नियुक्त किया गया था।

गुलबदन बेगम के अनुसार कराचः खाँ ने हुमायूँ को लिखा कि- ‘आप लम्बे समय से सिंध में ही ठहरे हुए हैं और अब तक कांधार नहीं आए हैं जबकि मिर्जा हिंदाल कांधार आ गए हैं। मैंने कांधार मिर्जा हिंदाल को भेंट कर दिया था किंतु मुझे ज्ञात हुआ है कि मिर्जा शाह हुसैन आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहा है, अतः मेरी प्रार्थना है कि आप कांधार चले आएं, यहाँ रास्ता साफ है।’

उधर जब मिर्जा कामरान को ज्ञात हुआ कि कराचः खाँ ने कांधार पर मिर्जा हिंदाल का कब्जा कर दिया है तो मिर्जा कामरान बहुत कुपित हुआ। इस समय मिर्जा कामरान काबुल में तथा मिर्जा अस्करी गजनी में था। कामरान ने मिर्जा अस्करी को लिखा कि कराचः खाँ ने कांधार पर मिर्जा हिंदाल का कब्जा करा दिया है किंतु मिर्जा हिंदाल से कांधार वापस लेना आवश्यक है।

इधर हुमायूँ ने कांधार पर मिर्जा हिंदाल के अधिकार को अपने लिए शुभ समाचार समझा। हुमायूँ को विश्वास था कि यदि हुमायूँ कांधार जाएगा तो मिर्जा हिंदाल हुमायूँ के साथ अच्छा व्यवहार करेगा। फिर भी कोई निर्णय लेने से पहले हुमायूँ ने अपनी बुआ खानजादः बेगम को अपनी संदेशवाहक बनाकर अपने भाइयों के पास भेजने का निर्णय लिया।

हुमायूँ ने खानजादः बेगम से कहा- ‘आप कांधार जाएं तथा मिर्जा कामरान, मिर्जा अस्करी और मिर्जा हिंदाल को समझाएं कि उज्बेग और तुर्कमान जैसे शत्रु तुम्हारी सीमा पर ही बसते हैं, इसलिए तुम्हारे और हमारे बीच मित्रता रहे तो ठीक है। हमने मिर्जा कामरान को जो कुछ लिखा है, यदि कामरान उसे मान ले तो हम भी वैसा ही करेंगे जैसा वे चाहते हैं।’

हुमायूँ के अनुरोध पर खानजादः बेगम सिंध से कांधार के लिए रवाना हो गई। वहाँ पहुंचकर उसने कामरान को भी कांधार बुलवा लिया। मिर्जा कामरान एक बड़ी सेना लेकर कांधार पहुंचा। कामरान ने मिर्जा हिंदाल से कहा कि तुम कांधार में हुमायूँ के नाम का खुतबा पढ़वाने के स्थान पर मेरे नाम का खुतबा पढ़वाओ।

मिर्जा हिंदाल ने कामरान के प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा-‘बादशाह बाबर ने अपने जीवनकाल में ही हुमायूँ को बादशाहत दे दी थी और उन्हें अपना वली-ए-अहद बनाया था। हम लोगों ने भी बादशाह बाबर के निर्णय को मान लिया था, इसलिए अब खुतबा बदलवाने से क्या अर्थ है? खुतबा नहीं बदला जाएगा!’

इस पर मिर्जा कामारान ने मिर्जा हिंदाल की माता दिलदार बेगम को पत्र लिखा- ‘हम आपको याद करके काबुल से कांधार आए हैं। आपको हिंदुस्तान से कांधार आए हुए इतने दिन हो गए किंतु आपने हमें याद तक नहीं किया। जैसे आप मिर्जा हिंदाल की माता हैं, वैसे ही हमारी भी माता हैं।’

इस पत्र के मिलने पर मिर्जा हिंदाल की माता दिलदार बेगम, मिर्जा कामरान से मिलने के लिए उसके डेरे में आई। कामरान ने कहा- ‘अब आप मेरे पास ही रहिए, मैं आपको नहीं छोड़ूंगा। आप बताइए कि खुतबा किसके नाम का पढ़ा जाना चाहिए?’

दिलदार बेगम ने कहा- ‘खानजादः बेगम तुम्हारी पूज्य हैं और हम-तुम सबसे बड़ी हैं। इसलिए खुतबा किसके नाम का पढ़ा जाए यह बात तुम उन्हीं से पूछो।’

कामरान द्वारा यही प्रश्न बाबर की एक और बेगम आकः बेगम से भी पूछा गया। आकः बेगम ने इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया, यह तो ज्ञात नहीं है किंतु आगे की घटनाओं के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि आकः बेगम ने कामरान के पक्ष में निर्णय नहीं दिया गया।

खानजादः बेगम ने कामरान से कहा- ‘यदि तुम हमसे पूछते हो तो हमारा मत यह है कि जिस प्रकार बादशाह बाबर ने निश्चित किया है, हुमायूँ को बादशाही दी है और अब तक तुम लोगों ने भी जिसके नाम का खुतबा पढ़ा है, उसी को अब भी बड़ा समझकर आज्ञा मानते रहो।’

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अपनी विमाताओं एवं बुआ का जवाब सुनकर कामरान नाराज हो गया और उसने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि वह कांधार नगर को घेर ले। बाबर के दुर्भाग्यशाली बेटों ने अपने ही परिवार के लोगों को दुश्मनों की तरह घेर लिया। ऐसे परिवार को वैसे भी दुश्मनों की आवश्यकता नहीं थी, बाबर के बेटे ही एक दूसरे से दुश्मनी निकालने के लिए पर्याप्त थे। हुमायूँ की दूत बन कर आई खानजादः बेगम की स्थिति विचित्र हो गई। कहाँ तो वह बादशाह की दूत बनकर आई थी और कहाँ वह स्वयं ही कांधार के घेरे में बंदी बन गई थी! चार महीने तक कामरान कांधार को घेरकर पड़ा रहा और घर की बड़ी-बूढ़ी औरतों से आग्रह करता रहा कि वे मिर्जा हिंदाल को मिर्जा कामरान के नाम का खुतबा पढ़ने का आदेश दें। चार महीने के घेरे में कांधार के लोगों की हालत खराब होने लगी। इस पर घर की औरतों ने निर्णय लिया कि अभी बादशाह हुमायूँ कांधार में नहीं है, इसलिए कामरान के नाम का खुतबा पढ़ा जाए और जब बादशाह हुमायूँ आएं तब उनके नाम का खुतबा पढ़ा जाए। घर की बड़ी-बूढ़ी औरतों की सहमति मिलते ही कामरान ने कांधार से घेरा हटा लिया।

हुमायूँ की दूत बन कर आई खानजादः बेगम को भी मुक्ति मिली। बन कर आई खानजादः बेगम को भी मुक्ति मिली। उसने पहली बार अनुभव किया कि राज्य के लिए उज्बेक और मुगल दोनों एक जैसे हैं, इनके लिए रिश्तों का कोई मतलब नहीं है। उज्बेक शहजादे शैबानी खाँ और मुगल शहजादे कामरान में कोई अंतर नहीं है।

कामरान ने कांधार का शासन मिर्जा हिंदाल की जगह अपने विश्वस्त भाई मिर्जा अस्करी को सौंप दिया। कामरान ने मिर्जा हिंदाल को भरोसा दिलाया कि वह हिंदाल को गजनी का शासक बना देगा। इसलिए मिर्जा हिंदाल ने बिना किसी विरोध के कांधार खाली कर दिया और कामरान के साथ काबुल चला गया। काबुल पहुंचकर कामरान ने एक बार फिर से रंग बदला और हिंदाल को गजनी न देकर लमगानात और उसके निकटवर्ती दर्रों का गवर्नर नियुक्त कर दिया।

इससे मिर्जा हिंदाल नाराज होकर बदख्शां चला गया और बदख्शां की राजधानी खोस्त में रहने लगा। मिर्जा कामरान ने मिर्जा हिंदाल की माता दिलदार बेगम से कहा कि आप मिर्जा हिंदाल को मनाकर लाएं। जब दिलदार बेगम अपने पुत्र हिंदाल के पास बदख्शां पहुंची तो मिर्जा हिंदाल ने उत्तर दिया कि मैंने अब स्वयं को राजकाज एवं युद्धों से अलग कर लिया है। अब मैं शांति के साथ खोस्त में एकांतवास करना चाहता हूँ।

इस पर दिलदार बेगम ने मिर्जा हिंदाल से कहा कि यदि फकीरी और एकांतवास की इच्छा है तो काबुल भी अच्छी जगह है, वहीं पर चलकर स्त्री एवं पुत्र आदि के साथ रहो। इस पर भी मिर्जा हिंदाल काबुल चलने के लिए तैयार नहीं हआ तो दिलदार बेगम ने हिंदाल को कड़ी फटकार लगाई और उसे अपने साथ जबर्दस्ती काबुल ले आई। हिंदाल ने काबुल में पहुंचकर फकीरों जैसा वेश बना लिया और एकांतवास करने लगा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहहुसैन का षड़यंत्र (67)

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शाहहुसैन का षड़यंत्र

शाहहुसैन का षड़यंत्र इतना घिनौना था कि उसने न केवल हुमायूँ को बर्बाद कर दिया अपितु मानवता को भी शर्मसार किया। कोई शायद ही इस बात पर विश्वास कर सकता है कि इंसान अपने बादशाह के साथ ऐसा घृणित व्यवहार भी कर सकता है!

कामरान ने मिर्जा हिंदाल को लमगानात और उसके निकटवर्ती दर्रों का गवर्नर नियुक्त किया तो मिर्जा हिंदाल नाराज होकर बदख्शां चला गया तथा वहाँ एकांतवास करने लगा। हिंदाल की माता उसे बदख्शां से काबुल ले आई। उधर हुमायूँ सिंध के ‘जून’ नामक स्थान पर अपनी बुआ खानजादः बेगम के लौटकर आने की प्रतीक्षा करता रहा। हुमायूँ का आर्थिक संकट गहराता जा रहा था और उसके पास सैनिकों की संख्या भी बहुत कम रह गई थी। इसलिए हुमायूँ स्वयं ही कांधार की तरफ जाने का विचार करने लगा।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि ठट्ठा के शासक मिर्जा शाहहुसैन ने हुमायूँ के पास अपने दूत भेजकर उससे कहलवाया कि अब आपके लिए उचित है कि आप सिंध छोड़कर कांधार चले जाएं। हुमायूँ को लगा कि मेरी स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि अब तो दुश्मनों को भी मुझ पर दया आ गई।

पाठकों को स्मरण होगा कि सेहवन के किलेदार मीर अलैकः ने हुमायूँ की नावों को सामान सहित पकड़ लिया था और हुमायूँ को सलाह दी थी कि पुराने नमक का विचार करके मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप सेहवन से चले जाएं। इस पर हुमायूँ ने सेहवन के किलेदार की सलाह मानकर सेहवन का क्षेत्र छोड़ दिया था। अब ठीक यही सलाह ठट्ठा का शासक भी दे रहा था।

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हुमायूँ ने मिर्जा शाहहुसैन की यह सलाह स्वीकार कर ली तथा मिर्जा शाहहुसैन को सूचित किया कि मेरे कंप (शिविर) में घोड़े एवं ऊंट बहुत कम बचे हैं, यदि तुम हमें कुछ घोड़े एवं ऊंट दे दो तो हम कांधार चले जावें। मिर्जा शाहहुसैन ने हुमायूँ की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली तथा उससे कहलवाया कि जब आप नदी पार करेंगे, तब एक हजार ऊंट जो उस पार हैं, हम आपके पास पास भेज देंगे। इस पर हुमायूँ अपने स्त्री, पुत्र, सैनिक एवं कर्मचारियों के साथ नावों में सवार हुआ और तीन दिन तक नदी में चलता रहा। ठट्ठा राज्य की सीमा के पार ‘नवासी’ नामक एक गांव था जहाँ हुमायूँ तथा उसके साथियों ने नावों से उतर कर स्थल मार्ग से यात्रा करने का विचार किया। हुमायूँ ने अपने मुख्य ऊंटवान सुल्तान कुली को मिर्जा शाह हुसैन के अधिकारियों के पास भेजा ताकि वह शाह द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे ऊंटों को ले आए। सुल्तान कुली हुमायूँ के आदेशानुसार मिर्जाशाह के अधिकारियों से एक हजार ऊंट ले आया। हुमायूँ ने सभी ऊंट अपने उन सैनिकों को दे दिए जिनके पास सवारी करने के लिए घोड़ा या ऊंट नहीं बचा था।

शेष बचे हुए ऊंट सामान ढोने के लिए नियत किए गए। गुलबदन बेगम ने मिर्जा शाहहुसैन द्वारा उपलब्ध कराए गए ऊंटों का बड़ा रोचक वर्णन किया है जिससे ज्ञात होता है कि मिर्जा ने हुमायूँ को ऊंट उपलब्ध करवाकर उसके प्रति उदारता का परिचय नहीं दिया था अपितु यह भी मिर्जा शाहहुसैन का षड़यंत्र था जिसने हुमायूँ को बरबादी के अंतिम छोर पर पहुंचा दिया।

ये ऊंट सीधे जंगलों से पकड़ कर लाए गए थे और इन पर कभी भी किसी मनुष्य ने सवारी नहीं की थी। इसलिए जब इन ऊंटों पर सैनिक और अन्य मनुष्य सवार हुए तो ऊंट उन्हें धरती पर पटक कर जंगल की तरफ भाग गए। जिन ऊंटों पर बोझा लादा गया, वे या तो बोझा गिराकर जंगलों में भाग गए या फिर पीठ पर बोझा लिए हुए ही उछलते-कूदते हुए जंगलों की तरफ भाग गए।

बहुत से ऊंट घोड़ों की टापों से बिदक जाते थे और उछलने लगते थे। इस कारण बहुत से सैनिक घायल हो गए और ऊंटों की पीठ पर लदा हुआ सामान ऊंटों की ही लातों द्वारा कुचल कर नष्ट कर दिया गया। इस प्रकार हुमायूँ का बहुत सा रसद और आवश्यकता का अन्य सामान नष्ट हो गया। तब कहीं जाकर हुमायूँ को शाहहुसैन का षड़यंत्र समझ में आया कि दुश्मन ने हुमायूँ पर दया नहीं की थी, अपितु बर्बादी का जाल रचा था। दो सौ से अधिक ऊंट हुमायूँ को बरबाद करके जंगलों में भाग गए।

इस प्रकार हर ओर से मायूस होकर हुमायूँ ने भारत की भूमि छोड़ दी और उसने जीवन में एक बार फिर कांधार की तरफ कूच करने का निर्णय किया।

जब हुमायूँ का काफिला ‘सीबी’ के निकट पहुंचा तो वहाँ मिर्जा शाह हुसैन का मुख्य ऊंटवान महमूद स्वयं मौजूद था। उसने सीबी के किले को भीतर से बंद कर लिया और हुमायूँ के लिए नया जाल बुनने लगा। हुमायूँ ने सीबी से छः कोस की दूरी पर अपना डेरा लगाया।

यह स्थान वर्तमान समय में पाकिस्तान के बलोचिस्तान नामक प्रांत में स्थित है तथा दुनिया की सबसे गर्म पहाड़ियों के लिए जाना जाता है। इन पहाड़ियों का तापमान गर्मियों में 52 डिग्री सैल्सियस तक पहुंच जाता है किंतु इस समय सर्दियां थीं इसलिए हुमायूँ को मौसम की तरफ से कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई।

हुमायूँ ने अपने कुछ गुप्तचर हुमायूँ के प्रति कामरान की मनोदशा जानने के लिए मीर अलादोस्त नामक अपने एक परिचित के पास भेजे जो कांधार में रहता था। इन गुप्तचरों के लौट कर आने तक हुमायूँ ने इसी स्थान पर टिके रहने का निश्चय किया। मिर्जा शाह हुसैन के मुख्य ऊंटवान महमूद ने हुमायूँ के गुप्तचरों को पकड़ लिया किंतु हुमायूँ को यह बात ज्ञात नहीं हो सकी। वह उन गुप्तचरों की प्रतीक्षा में सीबी के निकट ही रुका रहा। किसी तरह से ये गुप्तचर स्वयं को मुक्त करवाकर मीर अलादोस्त तक पहुंचे।

मीर अलादोस्त ने उन गुप्तचरों के साथ तीन हजार अनार तथा कुछ मेवा हुमायूँ के लिए भिजवाई और उसे सलाह दी- ‘इस समय मिर्जा अस्करी कांधार में है। यदि वह हुमायूँ को आमंत्रित करे तभी हुमायूँ कांधार की तरफ जाए अन्यथा कांधार और काबुल से दूर ही रहे। बादशाह को समझना चाहिए कि उनके पास सेना नहीं है अतः बादशाह स्वयं ही सोच लें कि कामरान उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा!’

इस विचित्र संदेश को सुनकर बादशाह हुमायूँ गहरी चिंता में डूब गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पिशाचों के देश में पहुंच गया हुमायूँ (68)

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पिशाचों के देश में पहुंच गया हुमायूँ

जब हुमायूँ का काफिला उस गांव के पास पहुंचा तो वहाँ पर बहुत ही कम घर दिखाई दिए जिनमें कुछ जंगली बिलूची पहाड़ के नीचे बैठे हुए थे। उनकी बोली पिशाचों जैसी थी। हुमायूँ पिशाचों के देश में पहुंच गया !

सिंध के अंतिम छोर पर स्थित सीबी के निकट पहुंचकर हुमायूँ ने कामरान की मनोदशा जानने के लिए अपने कुछ गुप्तचर मीर अलादोस्त के पास भिजवाए। मीर अलादोस्त ने कहलवाया कि यदि कामरान हुमायूँ को आमंत्रित करे तभी हुमायूँ कांधार की तरफ जाए अन्यथा कांधार और काबुल से दूर ही रहे। बादशाह को समझना चाहिए कि उनके पास सेना नहीं है, अतः कामरान उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा! इस विचित्र संदेश को सुनकर हुमायूँ चिंता में डूब गया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि बादशाह आश्चर्य और विचार में पड़ गए कि क्या करें और कहाँ जाएं!

तर्दी मुहम्मद खाँ एवं बैराम खाँ ने सम्मति दी कि- ‘उत्तर और शाल मस्तान को छोड़कर जो कि कांधार की सीमा पर स्थित है, कहीं और जाने का विचार करना संभव नहीं है। शाल मस्तान में बहुत सारे अफगान रहते हैं, जिन्हें अपनी ओर मिलाया जा सकता है। वहाँ चलने से एक लाभ यह भी है कि जो सैनिक, अमीर और बेग; मिर्जा अस्करी को छोड़कर आएंगे, वे भी हमारी ओर हो जाएंगे।’

इस पर हुमायूँ ने शाल मस्तान के लिए कूच किया। जब शाल मस्तान के निकट पहुंचे तब दोपहर की नमाज के समय एक उजबेग जवान टट्टू पर बैठकर वहाँ आया। उसने चिल्ला कर कहा- ‘बादशाह तुरंत घोड़े पर सवार हों, मैं रास्ते में सारी बात कहूंगा क्योंकि इस समय बात करने का समय नहीं है।’

उसका संदेश सुनते ही हुमायूँ एक घोड़े पर सवार होकर उस सैनिक के साथ चल दिया। ख्वाजा मुअज्जम तथा बैराम खाँ आदि कुछ अमीर एवं बेग भी हुमायूँ के साथ चले। जब दो तीर  रास्ता निकल गया तब उस सैनिक ने बताया कि मैं इसलिए आपको कंप से बाहर निकालकर लाया क्योंकि मिर्जा अस्करी दो हजार सैनिकों को लेकर आपके कैंप के बिल्कुल निकट आ गया था। उसका इरादा आपको गिरफ्तार करने का है।

उस सैनिक की बात सुनकर सबको बादशाह के परिवार का ध्यान आया जो पीछे कंप में ही छूट गया था। इस पर हुमायूँ ने ख्वाजा मुअज्जम तथा बैराम खाँ को वापस कंप में भेजा ताकि वे हमीदा बानू बेगम को ले आएं। ये लोग उल्टे पैरों हुमायूँ के शिविर में गए। तब तक अस्करी की सेना काफी निकट पहुंच चुकी थी। इसलिए ख्वाजा मुअज्जम तथा बैराम खाँ ने बेगम को आनन-फानन में घोड़े पर सवार कराया और उसे लेकर शाही शिविर से निकल गए।

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उन्हें इतना भी समय नहीं मिला कि एक साल के शिशु अकबर को भी साथ ले लें। जैसे ही बेगम कंप से निकलकर गई वैसे ही मिर्जा अस्कारी अपने दो हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ हुमायूँ के शिविर में घुस गया। हुमायूँ के शिविर में उपस्थित अधिकांश लोगों को अब तक ज्ञात नहीं हुआ था कि क्या हो रहा है! इसलिए अस्करी के घुड़सवारों को शाही डेरे में घुसते हुए देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग जोर-जोर से चिल्लाने लगे। चारों ओर भगदड़ मच गई किंतु अस्करी के सिपाहियों ने किसी को भी शिविर से बाहर नहीं निकलने दिया। मिर्जा अस्करी ने शाही तम्बू में घुसकर पूछा कि बादशाह कहाँ है। बादशाह के तम्बू में उपस्थित लोगों ने कहा कि बादशाह सलामत तो बहुत समय हुआ शिकार खेलने गए हैं। अस्करी समझ गया कि बादशाह बच निकला। अस्करी ने कंप में स्थित शिशु अकबर को पकड़ लिया। शाही डेरे में इस समय शाही परिवार के कई सदस्य थे। अस्करी ने उनसे कहा कि आप सब मेरे साथ कांधार चलें किंतु वे अस्करी के साथ नहीं जाना चाहते थे। इस पर अस्करी उन्हें जबर्दस्ती अपने साथ कांधार ले गया। अस्करी ने एक साल के बालक अकबर को अपनी बेगम सुल्तानम को सौंप दिया।

गुलबदन बेगम ने सोलह अमीरों एवं बेगों के नाम लिखे हैं जो इस समय हुमायूँ के साथ बच गए थे। हमीदा बानू बेगम के हवाले से गुलबदन बेगम ने तीस मनुष्यों के साथ होने की बात लिखी है। गुलबदन ने लिखा है कि बादशाह के साथ इस समय केवल दो ही स्त्रियां चल सकी थीं जिनमें से एक तो हुमायूँ की बेगम हमीदा बेगम थी और दूसरी हसन अली एशक आगा की पत्नी थी।

गुलबदन ने लिखा है कि बादशाह हुमायूँ पहाड़ की ओर चार कोस तक चलते चले गए। जिस समय हमीदा बानू बेगम और हसन अली एशक आगा की पत्नी हुमायूँ के काफिले के पास पहुंचीं तो हुमायूँ ने अपनी गति बढ़ा दी। हुमायूँ के पास खाने के लिए कुछ नहीं था। इस इलाके में बरसात होकर चुकी थी और भारी बर्फबारी हो रही थी।

फिर भी इस कड़कड़ाती हुई ठण्ड में भूखे-प्यासे मुगल अपने ही खानदान के शहजादे अस्करी के डर से रात भर चलते रहे। जब ऐसा लगने लगा कि लोग ठण्ड और भूख से मर जाएंगे, तब एक स्थान पर रुककर आग जलाई गई तथा एक घोड़े को मारकर लोहे की टोपी में उसका मांस उबालकर खाया गया।

हुमायूँ ने मांस का एक टुकड़ा खुद ही आग पर भूना और उससे पेट भरा जिससे शरीर को ठण्ड से कुछ आराम मिला। दिन निकलने पर उन्हें एक विशाल पहाड़ दिखाई दिया जिसके उस पार बलूच लोगों का गांव होने का अनुमान था। उस गांव तक पहुंचने के लिए हुमायूँ के काफिले को दो दिन का समय लग गया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब हुमायूँ का काफिला उस गांव के पास पहुंचा तो वहाँ पर बहुत ही कम घर दिखाई दिए जिनमें कुछ जंगली बिलूची पहाड़ के नीचे बैठे हुए थे। उनकी बोली पिशाचों जैसी थी। हुमायूँ के साथियों ने पिशाचों के देश में डेरा डाल दिया। इस पर बहुत से बिलूच एकत्रित होकर उनके निकट आ गए और अपनी भाषा में बात करने लगे। उनके शब्द तो मुगलों के समझ में नहीं आ रहे थे किंतु उन्हें सुनकर भय अवश्य लगता था।

हुमायूँ के सौभाग्य से हसन अली एशक आगा की पत्नी बलूच थी और वह बलूचों के इस कबीले की भाषा को समझ पा रही थी। उसने हुमायूँ को बताया कि ये लोग आपस में बात कर रहे हैं कि यदि हम बादशाह हुमायूँ को पकड़कर मिर्जा अस्करी को सौंप दें तो वह हमें बहुत सारा ईनाम देगा। हुमायूँ समझ गया कि अस्करी के सिपाही इस क्षेत्र में घूम रहे हैं। उन्होंने ही यह बात इन्हें बताई है।

हुमायूँ समझ गया कि वह न तो हिंदुस्तान में सुरक्षित रह पाया था, न सिंध और थट्टा के रेगिस्तान में छिप पाया था और न पिशाचों के देश में उसे पैर टिकाने की जगह मिलने वाली थी। इंसान का दुर्भाग्य उसे जो दिखा दे, वह कम है।

हुमायूँ ने अपने साथियों से कहा कि रात होने से पहले ही हमें यहाँ से निकल चलना चाहिए। रात में ये लोग हमें नुक्सान पहुंचाएंगे। जब हुमायूँ और उसके साथी वहाँ से चलने लगे तो पिशाच जैसे लोगों ने यह कहकर उन्हें रोक लिया कि उनका सरदार आने वाला है, उससे पहले तुम लोग यहाँ से नहीं जा सकते!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ईरान की बेगम ने हमीदा बानू बेगम का शानदार स्वागत किया (69)

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ईरान की बेगम ने हमीदा बानू बेगम का शानदार स्वागत किया

एक दिन शाहजादा सुल्तानम ने हमीदा बानू बेगम का आतिथ्य किया। शाह ने अपनी बहिन से कहा कि हिंदुस्तान की मलिका के सम्मान में राजधानी से बाहर उत्सव रखना। ईरान की बेगम ने हमीदा बानू बेगम का शानदार स्वागत किया।

हुमायूँ अपनी पत्नी हमीदा बानू बेगम तथा तीस लोगों के साथ एक ऐसे बलूच कबीले में पहुंच गया जिसके लोग पिशाचों जैसी भाषा बोलते थे। हसन अली एशक आगा की बलूच पत्नी ने हुमायूँ को बताया कि ये लोग हमें पकड़कर मिर्जा अस्करी को सौंपने की बात कर रहे हैं।

जब हुमायूँ और उसके साथी वहाँ से चलने लगे तो बलूचों ने शाही काफिले को यह कहकर रोक लिया कि उनका सरदार आने वाला है, उससे पहले तुम लोग यहाँ से नहीं जा सकते। हुमायूँ और उसके साथियों ने विचार किया कि इस समय लड़ने में नुक्सान है। इसलिए रात होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए और रात के अंधेरे में चुपचाप निकलना चाहिए किंतु आधी रात से पहले ही उस कबीले का सरदार आ गया।

बलूच सरदार ने हुमायूँ के समक्ष उपस्थित होकर कहा कि मेरा विचार आपको पकड़कर मिर्जा अस्करी एवं कामरान को सौंपने का था किंतु अब मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं इसलिए मेरे मन के भाव बदल गए हैं। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं तथा मेरे छः पुत्र जीवित हैं, तब तक हम आपके एक-एक बाल पर निछावर हैं। भले ही मिर्जा अस्करी और कामरान मेरी खाल ही क्यों न खिंचवा लें।

बलूच सरदार की बात सुनकर हुमायूँ ने अपने कपड़ों से निकालकर एक मोती तथा एक लाल बलूच सरदार को दिए ओर अगले दिन बाबा हाजी दुर्ग की ओर चल दिया। वह बलूच सरदार भी अपने लड़ाकों के साथ लेकर हुमायूँ को वहाँ तक पहुंचाने गया। दो दिन तक चलते रहने के बाद हुमायूँ तथा उसके साथी गर्मसीर प्रांत में स्थित नदी के तट पर पहुंचे।

जब गर्मसीर क्षेत्र में रहने वाले सैयदों को ज्ञात हुआ कि बादशाह हुमायूँ अपनी बेगम सहित आया है तो बहुत से सैयदों ने एकत्रित होकर हुमायूँ का स्वागत किया। अगले दिन प्रातः काल में ख्वाजा अलाउद्दीन महमूद नामक एक अमीर मिर्जा अस्करी के यहाँ से भागकर हुमायूँ की शरण में आया और उसने बहुत से खच्चर, घोड़े, शामियाने आदि बादशाह हुमायूँ को भेंट किए। दूसरे दिन हाजी मुहम्मद खाँ कोकी अपने तीस-चालीस घुड़सवारों सहित आया और उसने भी हुमायूँ को बहुत से खच्चर तथा रसद सामग्री भेंट की।

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यहाँ से हुमायूँ ने खुरासान जाने का निश्चय किया। उस काल में खुरासान अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित सीस्तान तथा फारस राज्यों के बीच स्थित था। फारस को आजकल ईरान कहते हैं तथा वर्तमान समय में खुरासान तथा सीस्तान दोनों ही ईरान में हैं। हुमायूँ का विचार खुरासान पहुंचकर फारस के शासक से सम्पर्क करने का था। पाठकों को स्मरण होगा कि जब ई.1501 में उज्बेगों के नेता शैबानी खाँ ने बाबर को समरकंद से बाहर निकाल दिया था तब फारस के सफवी शासक शाह इस्माइल ने इस शर्त पर बाबर की सहायता की थी कि यदि बाबर शिया हो जाए तो उसे समरकंद विजय के लिए फारस की सेना उपलब्ध कराई जा सकती है। इस समय उसी इस्माइल का पुत्र तहमास्प फारस का शाह था। हुमायूँ को आशा थी कि फारस का शाह एक बार पुनः उसी शर्त पर हुमायूँ को अपनी सेना दे सकता है। इस समय ई.1543 का दिसम्बर महीना लग चुका था। हुमायूँ ने मार्ग में ही एक पत्र फारस के शाह तहमास्प को भिजवाकर अपने फारस आने की सूचना भिजवाई। इस पर तहमास्प ने अपने सूबेदारों को आदेश भिजवाया कि हूमायू का फारस राज्य में हर स्थान पर स्वागत किया जाए।

फलतः जब हुमायूँ सीस्तान पहुँचा तब वहाँ के गवर्नर ने हुमायूँ का बड़ा स्वागत किया। हुमायूँ सीस्तान से हिरात (हेासत) तथा नशसीमा होता हुआ फारस पहुँचा। पहाड़ियों एवं रेगिस्तानी क्षेत्र में कठिन सर्दियां झेलता हुआ हुमायूँ का काफिला कई महीनों की यात्रा के बाद जुलाई 1544 में खुरासान के निकट हलमंद नदी के तट पर पहुंचा। जब फारस के शाह के पास यह समाचार पहुंचा कि हुमायूँ का काफिला हलमंद नदी के तट पर डेरा डाले हुए है तो फारस के शाह ने अपने मंत्रियों, अमीरों एवं भाइयों को हुमायूँ का स्वागत करने भेजा।

ये लोग बड़े आदर से हुमायूँ तथा उसके साथियों को राजधानी कजवीन की ओर ले गए। जब यह काफिला राजधानी के निकट पहुंचा तो फारस के शाह तहमास्प ने अपने पिता इस्माइल तथा हुमायूँ के पिता बाबर के बीच रही मित्रता का स्मरण करके अपनी राजधानी कजवीन से थोड़ा आगे आकर हुमायूँ का स्वागत किया और उसे अपने महलों में लिवा लाया।

आजकल कजवीन को तेहरान कहा जाता है। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि फारस के महलों में हुमायूँ और तहमास्प के बीच ऐसी दोस्ती हो गई मानो एक बादाम के भीतर दो बीज हों। जितने दिनों तक हुमायूँ वहाँ रहा, उतने दिनों तक या तो तहमास्प हुमायूँ से मिलने के लिए उसके निवास पर आया, या फिर हुमायूँ तहमास्प से मिलने उसके महल में गया।

तहमास्प कई बार हुमायूँ को अपने साथ शिकार खेलने ले गया। इस दौरान हमीदा बानू बेगम कभी पालकी में बैठकर तो कभी ऊंट पर सवार होकर शिकार देखने जाती थी। इस दौरान ईरान के शाह की बहिन शाहजादा सुलतानम भी घोड़े पर सवार होकर फारस के शाह के पीछे खड़ी रहती थी।

हुमायूँ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि शाह के पीछे एक स्त्री घोड़े पर सवार रहती थी जिसकी बाग एक सफेद दाढ़ी वाले मनुष्य के हाथ में रहती थी। वह शाह की बहिन शाहजादा सुल्तानानम थी। हुमायूँ तथा गुलबदन ने शाह की बहिन का नाम ईरानी परम्परा के अनुसार शाहजादा सुल्तानम लिखा है जबकि मुगल परम्परा के अनुसार यह शाहजादी सुल्तानम होना चाहिए था।

एक दिन शाहजादा सुल्तानम ने हमीदा बानू बेगम का आतिथ्य किया। शाह ने अपनी बहिन से कहा कि हिंदुस्तान की मलिका के सम्मान में राजधानी से बाहर उत्सव रखना। सुल्तानम के आदेश से नगर से दो कोस की दूरी पर एक अच्छे मैदान में खेमा, तंबू, बारगाह, छत्र, मेहराब आदि खड़े किए गए तथा शाह के हरम की औरतें सजधज कर उस खेमे में उपस्थित हुईं।

गुलबदन ने लिखा है कि ये सब शाह की आपसवाली, बुआएं, बहिनें, हरमवालियां और खानों तथा सरदारों की स्त्रियां थीं जिनकी संख्या एक हजार के आसपास थी और वे सब बहुत सज-धज कर आई थीं।

फारस की शाही औरतों ने हमीदा बानू का भव्य स्वागत-सत्कार किया। दिन भर उत्सव चलता रहा तथा शाम होने पर खानों एवं सरदारों की स्त्रियों ने स्वयं खड़े होकर हमीदा बानू बेगम एवं शाह की औरतों, बहिनों एवं बुआओं को भोजन करवाया। इस दौरान ईरान का शाह तहमास्प भी हुमायूँ को अपने साथ लेकर इस उत्सव में भोजन करने आया।

इस दौरान तहमास्प की बुआ ने हमीदा बानू से पूछा- ‘हिंदुस्तान के खेमे और तम्बू सुंदर हैं या फारस के?’

इस पर हमीदा बानू ने कहा- ‘जो वस्तु फारस में दो दांग में मिलती है, वह हिंदुस्तान में चार दांग में मिलती है और वहाँ के खेमे तथा तम्बू सहित प्रत्येक वस्तु सुंदर है।’

संभवतः शाह की बुआ को हमीदा का यह उत्तर अच्छा नहीं लगा किंतु ईरान की बेगम शाहजादा सुल्तानाम ने हमीदा की बात का समर्थन किया। देर रात में यह उत्सव समाप्त हुआ।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रौशन कोका ने बादशाह के हीरे चुरा लिए (70)

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रौशन कोका ने बादशाह के हीरे चुरा लिए

एक दिन हमीदा बानो सिर धोने गई तो उस थैली को रूमाल में लपेटकर बादशाह के पलंग के सिराहने रख गई। रौशन कोका ने रूमाल में लिपटी हुई थैली को देख लिया और उसे खोलकर उसमें से पांच लाल चुराकर ख्वाजा गाजी को सौंप दिए।

हुमायूँ अपनी बेगम हमीदा बानो एवं 20-22 अमीरों के साथ हिन्दुस्तान, बलोचिस्तान, अफगानिस्तान, सीस्तान तथा खुरासान को पार करके अनेक तकलीफें झेलता हुआ फारस पहुंचा जहाँ फारस के शाह तहमास्प ने हुमायूँ का जोरदार स्वागत किया तथा फारस के शाह की बेगम ने हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो के सम्मान में शाही भोज का आयोजन किया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि रौशन कोका बादशाह हुमायूँ का स्वामिभक्त एवं पुराना सेवक था किंतु उसने संकट में बादशाह के साथ बड़ी गद्दारी की। हुमायूँ के कपड़ों में हर समय एक थैली छिपी हुई रहती है जिसमें हीरे भरे हुए रहते हैं। इस बात को केवल दो ही व्यक्ति जानते थे एक तो हुमायूँ स्वयं और दूसरी हमीदा बानो। यदि बादशाह कहीं जाता था तो हीरों से भरी हुई यह थैली हमीदा बानो बेगम को देकर जाता था।

एक दिन हमीदा बानो सिर धोने गई तो उस थैली को रूमाल में लपेटकर बादशाह के पलंग के सिराहने रख गई। रौशन कोका ने रूमाल में लिपटी हुई थैली को देख लिया और उसे खोलकर उसमें से पांच लाल चुराकर ख्वाजा गाजी को सौंप दिए। रौशन कोका ने कहा कि तुम ये लाल छिपाकर रख दो, समय मिलने पर हम इन्हें कहीं बेच देंगे।

उसी बीच में बादशाह आ गया और उसने वह थैली अपने पास रख ली। जब हमीदा बानू बेगम सिर धोकर आई तो बादशाह ने वह थैली बेगम को दे दी। बेगम ने थैली हाथ में लेते ही जान लिया कि थैली हल्की है और उसने यह बात उसी समय बादशाह को बता दी। बादशाह ने चकित होकर कहा कि इस बात का क्या अर्थ है क्योंकि इस थैली के बारे में मेरे और आपके सिवाय कोई नहीं जानता! लाल कौन चुराकर ले गया? उस काल में लाल का आशय एक कीमती हीरे से होता था।

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हमीदा बानो ने अपने भाई ख्वाजा मुअज्जम से कहा कि ऐसी घटना हो गई है। यदि तुम अपने भाई होने के कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए उन हीरों के बारे में इस प्रकार पता लगा सको कि इस बात को कोई जान न पाए तो मेरी लाज बचेगी अन्यथा मैं जब तक जीवित रहूंगी, बादशाह के सामने लज्जित रहूंगी। इस पर ख्वाजा मुअज्जम ने कहा कि मेरा बादशाह से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है फिर भी मैं एक मरियल टट्टू पर चलता हूँ और मेरी सामर्थ्य एक नया टट्टू खरीदने की नहीं है किंतु रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी ने अपने लिए अच्छी किस्म के नए घोड़े खरीदे हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने घोड़े के मालिक को कीमत नहीं चुकाई है, फिर भी उनके पास घोड़ों की कीमत चुकाने का कोई न कोई प्रबंध अवश्य है। हमीदा बानू ने ख्वाजा मुअज्जम से कहा कि तुम इस बात की जांच करके सच्चाई का पता लगाओ। ख्वाजा ने हमीदा से कहा कि माह चीचम तुम यह बात किसी से मत कहना, मैं इस सच्चाई का पता लगा कर रहूंगा। संभवतः माह चीचम तुर्की, अरबी या फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ आदरणीय अथवा प्यारी बहन जैसा कुछ होता होगा!

ख्वाजा मुअज्जम घोड़े के उस व्यापारी के पास गया जिन्होंने रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी को घोड़े बेचे थे। ख्वाजा मुअज्जम ने उससे पूछा कि तुम्हें इन घोड़ों का कितना दाम मिला है? इस पर व्यापारी ने कहा कि अभी दाम नहीं मिला है किंतु उन दोनों ने मुझे वचन दिया है कि वे इन घोड़ों के बदले में मुझे लाल लाकर देंगे।

इसके बाद ख्वाजा मुअज्जम ख्वाजा गाजी के डेरे पर गया और उसके सेवक से कहा कि तुम्हारे मालिक के कपड़े या गठरी कहाँ हैं? सेवक ने कहा कि मेरे मालिक के पास गठरी आदि नहीं है, केवल एक लम्बी टोपी है जिसे वह सोते समय कभी सिर के नीचे तो कभी बगल में रखते हैं। ख्वाजा मुअज्जम सारी बात समझ गया और उसने बादशाह हुमायूँ के पास जाकर उसे यह सारी बात बता दी।

ख्वाजा मुअज्जम ने बादशाह से कहा कि मैं आपके सामने ख्वाजा गाजी से हंसी ठिठोली करूंगा किंतु आप मुझे कुछ मत कहना। हुमायूँ ने यह बात मान ली। अगले दिन जब ख्वाजा गाजी हुमायूँ के समक्ष दीवानखाने में आकर बैठा तो ख्वाजा मुअज्जम ख्वाजा गाजी के साथ हंसी-ठिठोली करने लगा और ताने कसने लगा।

ख्वाजा गाजी कुछ देर तक तो ख्वाजा मुअज्जम की हरकतों को सहन करता रहा किंतु अंत में तंग आकर हुमायूँ के समक्ष विनय प्रदर्शित करते हुए बोला कि यह आयु में मुझसे बहुत छोटा है किंतु यह आपके सामने ही मुझसे हंसी-ठिठोली कर रहा है और ऐसी छिछोरी बातें कर रहा है!

इस पर हुमायूँ ने कहा कि यह आयु में छोटा है इसलिए इसे अक्ल नहीं है कि बड़ों के साथ किस अदब से पेश आना चाहिए। आप बिल्कुल भी चिंता नहीं करें।

इसी बीच ख्वाजा मुअज्जम ने ख्वाजा गाजी की टोपी पर हाथ मारा। इससे टोपी गिर गई और ख्वाजा मुअज्जम ने लपक कर उठा ली। टोपी के गिरते ही ख्वाजा गाजी परेशान हो गया किंतु ख्वाजा मुअज्जम ने टोपी में हाथ डालकर उसमें से लाल निकाल लिए। ख्वाजा मुअज्जम ने वे लाल बादशाह को दे दिए।

जब ख्वाजा ने देखा कि उसकी चोरी पकड़ी गई तो उसने उसी समय दीवानखाना छोड़ दिया और रौशन कोका को अपने साथ लेकर फारस के शाह तहमास्प के पास चला गया। उन दोनों ने तहमास्प से हुमायूँ की बहुत बुराई की तथा अनेक गोपनीय बातें बताकर शाह का विश्वास जीत लिया।

उन्होंने शाह को बताया कि हुमायूँ के पास खूब सारे लाल, मानिक और मोती हैं, वह निर्धन नहीं है। इस पर तहमास्प का मन हुमायूँ की तरफ से फिर गया और उसके व्यवहार में परिवर्तन आ गया। कुछ ही दिनों में हुमायूँ भी इस बात को ताड़ गया।

इस पर हुमायूँ ने अपनी हीरों की थैली तहमास्प के पास भेज दी और उससे कहलवाया कि मेरे पास इनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि आप इनके लिए मन मैला करते हैं तो ये आप रख लें। हुमायूँ की यह बात सुनकर तहमास्प को बड़ी ग्लानि हुई और उसने हुमायूँ से कहा कि मेरे मन में रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी ने दुश्मनी भरी बातें भर दी थीं। उन्होंने हमको आपसे पराया कर दिया।

शाह ने रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी के लाल छीनकर उन्हें जेल में बंद कर दिया तथा दोनों बादशाहों में फिर से दोस्ती हो गई। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि इसके बाद जितने भी दिन हुमायूँ शाह के महल में रहा, शाह उसके लिए प्रतिदिन कीमती उपहार भेजता रहा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फारस की शहजादी ने हुमायूँ के प्राणों की रक्षा की (71)

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फारस की शहजादी ने हुमायूँ के प्राणों की रक्षा की

ईरान का शाह तहमास्प हुमायूँ से खुश नहीं रहता था। तहमास्प का एक भाई भी हुमायूँ से दुश्मनी रखने लगा। ऐसी स्थिति में फारस की शहजादी ने हुमायूँ के प्राणों की रक्षा की।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि तहमास्प का एक भाई हुमायूँ से वैमनस्य रखने लगा। उसने कुछ लोगों के साथ मिलकर हुमायूँ के विरुद्ध तहमास्प के कान भरने आरम्भ किये इससे तहमास्प हुमायूँ से अप्रसन्न हो गया। यहाँ तक कि हुमायूँ की जान खतरे में पड़ गई। इस स्थिति में फारस की शहजादी सुल्तानम ने हूमायू की बड़ी सहायता की।

फारस की शहजादी तहमास्प की वही बहिन थी जो शिकार के समय तहमास्प के पीछे खड़ी रहा करती थी और जिसके घोड़े की बाग एक सफेद दाढ़ी वाला मनुष्य लिए रहता था। पाठकों को स्मरण होगा कि सुल्तानाम ने शाही भोज के अवसर पर हमीदा बानू बेगम द्वारा की गई हिंदुस्तान की प्रशंसा का भी समर्थन किया था।

हुमायूँ द्वारा हीरों की थैली तहमास्प के पास भिजवाए जाने और उसके बाद तहमास्प का मन साफ होने की बात से लगता है कि तहमास्प को हुमायूँ के पास अत्यधिक धन होने की जानकारी मिलने पर तहमास्प ने हुमायूँ के प्राण लेने की साजिश रची हो तथा फारस की शहजादी तहमास्प की बहिन ने दोनों के बीच मध्यस्थता करके हुमायूँ की जान बचाई हो!

कुछ इतिहासकारों के अनुसार फारस में हुमायूँ अधिक प्रसन्न नहीं रहता था। वह सुन्नी मुसलमान था परन्तु फारस का शाह शिया था। इसलिये एक शिया की शरण में रहना हुमायूँ के लिए पीड़ाजनक था। हुमायूँ को पारसीकों जैसे कपड़े पहनने पड़ते थे तथा उन्हीं की तरह व्यवहार करना पड़ता था।

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इन इतिहासकारों के अनुसार तहमास्प की बहिन ने तहमास्प को हुमायूँ की सहायता करने के लिये तैयार किया ताकि हुमायूँ फिर से अपने खोये हुए राज्य को प्राप्त कर सके। ईरान के शाह ने हुमायूँ को ईरान के शाहजादे मुराद की अध्यक्षता में 14 हजार अश्वारोही दिये ताकि हुमायूँ कन्दहार  पर आक्रमण कर सके। इस सहायता के बदले में हुमायूँ से यह वचन लिया गया कि वह शाह की बहिन की पुत्री से विवाह करेगा और जब फारस की सेना कन्दहार, काबुल तथा गजनी जीत कर हूमायू को सौंप देगी, तब हुमायूँ कन्दहार का दुर्ग फारस के शाह को प्रदान करेगा तथा काबुल एवं गजनी हुमायूँ के पास रहेंगे। इन इतिहासकारों के अनुसार इसके अतिरिक्त अन्य कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक अथवा राजनीतिक शर्त नहीं रखी गई किंतु इन इतिहासकारों का यह कहना गलत है। गुलबदन बेगम ने इन तथ्यों का उल्लेख नहीं किया है किंतु इतिहास की अन्य पुस्तकों के अनुसार ईरान के शाह ने भारत-विजय की योजना बनाई तथा अपनी बहिन सुल्तानम की पुत्री का विवाह इस शर्त पर हुमायूँ के साथ कर दिया कि हुमायूँ शिया-मत ग्रहण कर ले। इसके बाद शाह ने हुमायूँ को अपनी सेना देकर हिंदुस्तान-विजय के लिए रवाना किया।

गुलबदन बेगम की तरह अबुल फजल ने भी हुमायूँ के शिया बनने के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा है कितु कट्टर सुन्नी लेखक मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने लिखा है कि दोनों बादशाहों में मेल हो जाने के उपरांत शाह ने हुमायूँ से शिया मत स्वीकार करने को कहा और हुमायूँ ने इस दिशा में कदम उठाया। उसने फारस में शिया धर्म से सम्बन्धित स्थानों तथा हसरत अली के मजार की यात्रा की।

गुलबबदन बेगम ने लिखा है कि अंत में शाह ने अपने पुत्र मुराद को खानों, सुल्तानों और सरदारों के साथ हुमायूँ की इच्छानुसार खेमे, तंबू, छत्र, मेहराब, शामियाने, रेशमी गलीचे, कलाबत्तू की दरियां तथा हर प्रकार का सामान, तोषकखाना, कोष, हर प्रकार के कारखाने, बावरची खाना और रिकाब-खाना बनाकर बादशाह हुमायूँ को दिए और एक शुभ समय में हुमायूँ को कांधार के लिए विदा किया। उस समय हुमायूँ ने ईरान के शाह से कहा कि वह ख्वाजा गाजी तथा रौशन कोका को क्षमा करके उन्हें मुक्त कर दे ताकि मैं उन्हें अपने साथ कांधार ले जा सकूं।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार हुमायूँ की रुचि भारत लौटने की बजाय फारस में ही मौज-मस्ती करने में थी। इसलिए जब फारस के शाह ने हुमायूँ को कजवीन के पास ही मौज-मस्ती में डूबा हुआ देखा तो एक दिन शाह ने हुमायूँ को फटकार लगाई तथा उसे जबर्दस्ती हिंदुस्तान के लिए रवाना किया। फारस के शाह का पुत्र मुराद चौदह हजार सैनिकों के साथ इस अभियान के लिए भेजा गया।

गुलबदन बेगम ने जिन वस्तुओं को शाह द्वारा हुमायूँ के साथ भेजे जाने की बात लिखी है, वास्तव में वह सब सामग्री तथा सेना शाह ने अपने पुत्र मुराद को दी थीं न कि हुमायूँ को। हुमायूँ को तो इस सेना के साथ भेजा गया था। ईरान का शाह तो स्वयं ही अफगानिस्तान एवं भारत पर अधिकार करने का स्वप्न देख रहा था।

ई.1545 में हुमायूँ फारस की सेना को साथ लेकर कांधार के निकट पहुंच गया। जब मिर्जा अस्करी ने सुना कि हुमायूँ खुरासान से लौटकर आ रहा है तब उसने हुमायूँ के पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को मिर्जा कामरान के पास काबुल भेज दिया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कामरान के आदेश से ऐसा किया गया।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब हुमायूँ शाल मस्तान से बलूचिस्तान की ओर भागा था। तब उसका 15 महीने का शिशु अकबर पीछे ही छूट गया था और उसे मिर्जा अस्करी अपने साथ कांधार ले गया था। जब अस्करी ने अकबर को कांधार से काबुल भेजा तब अकबर ढाई साल का हो चुका था। मिर्जा कामरान ने अकबर को अपनी बुआ खानजादः बेगम को सौंप दिया।

फारस की तरफ से अफगानिस्तान में प्रवेश करने पर सबसे पहले बुस्त किला आता है जिस पर इस समय कामरान का अधिकार था। हुमायूँ ने बुस्त किले पर अधिकार कर लिया। इसके बाद हुमायूँ ने कांधार घेर लिया।

गुलबदन ने लिखा है कि जब मिर्जा कामरान को ज्ञात हुआ कि बादशाह लौट आया है तो कामरान ने खानजादः बेगम के समक्ष विनम्रता का प्रदर्शन करके तथा कुछ रो-पीटकर कहा कि आप हुमायूँ के पास कांधार जाएं तथा हम लोगों में संधि करवा दें।

इस पर खानजादः बेगम ने शिशु अकबर; मिर्जा कामरान तथा उसकी स्त्री खानम को सौंप दिया तथा स्वयं काबुल से कांधार जाने की तैयारी करने लगी। इससे पहले कि खानजादः बेगम काबुल से रवाना हो पाती, बैराम खाँ कांधार से काबुल आ पहुंचा। उसे हुमायूँ ने अपना दूत बनाकर कामरान के पास भेजा था तथा कामरान के नाम यह आदेश भिजवाया था कि वह काबुल खाली करके हुमायूँ की शरण में आ जाए किंतु कामरान ने बैराम खाँ की बात मानने से मना कर दिया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांधार दुर्ग के धन को लेकर मारकाट मच गई (72)

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कांधार दुर्ग के धन को लेकर मारकाट मच गई

हुमायूँ ने फारस के शाह की सेना लेकर कांधार दुर्ग पर आक्रमण किया तथा 40 दिन की घेरेबंदी के बाद कांधार पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने बैराम खाँ को काबुल भेजकर कामरान से कहलवाया कि वह काबुल खाली करके हुमायूँ की शरण में आ जाए किंतु कामरान ने काबुल खाली करने से मना कर दिया।

इस पर बैराम खाँ पुनः कांधार के लिए रवाना हो गया। खानजादः बेगम भी बैराम खाँ के साथ ही कांधार के लिए रवाना हुई। जिस समय ये लोग कांधार पहुंचे, उस समय हुमायूँ ने कांधार दुर्ग पर घेरा डाल रखा था। चालीस दिन की घेराबंदी के बाद मिर्जा अस्करी ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली तथा बादशाह हुमायूँ की सेवा में उपस्थित होना स्वीकार कर लिया। कुछ लेखकों के अनुसार मिर्जा अस्करी ने कांधार से खजाना लेकर भागने का प्रयास किया किंतु हुमायूँ के पाँच सौ सैनिकों ने मिर्जा अस्करी को भागने से रोका।

4 दिसम्बर 1545 को हुमायूँ ने कांधार पर अधिकार कर लिया तथा कांधार दुर्ग फारस के शाह तहमास्प के पुत्र मुराद को सौंप दिया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि कुछ दिन बाद ही शाह का पुत्र बीमार होकर मर गया तथा हुमायूँ ने कांधार का शासन बैराम खाँ को सौंप दिया।

वस्तुतः गुलबदन बेगम ने यहाँ झूठ बोला है कि तहमास्प के पुत्र के बीमारी से मर जाने के कारण हुमायूँ ने कांधार दुर्ग पर अधिकार कर लिया। वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग थी। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि ईरानी सैनिकों ने कांधार दुर्ग पर अधिकार करके वहाँ जो भी खजाना मिला, उसे तहमास्प के पास फारस भेज दिया। हुमायूँ को यह अच्छा नहीं लगा। कुछ ही समय बाद हुमायूँ ने अचानक ही ईरान की सेना पर आक्रमण करके उससे कांधार छीन लिया। ईरान की सेना अपमानित होकर वापस ईरान लौट गई।

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तत्कालीन इतिहासकारों ने इस विषय पर अधिक नहीं लिखा है किंतु घटनाओं के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जब ईरान के शहजादे ने कांधार के दुर्ग में रखा धन ईरान भेज दिया तो हुमायूँ यह सहन नहीं कर सका। यह धन वास्तव में बाबर ने अपने हाथों से कांधार के दुर्ग में रखवाया था। इस धन पर ईरान का कोई अधिकार नहीं बनता था। इस धन के वास्तविक हकदार बाबर के बेटे थे। इसलिए हुमायूँ ने ईरान की सेना पर हमला कर दिया। इस समय तक अफगानिस्तान के हजारों युवक अपने पुराने बादशाह हुमायूँ के झण्डे के नीचे आकर एकत्रित हो गए थे और मिर्जा कामरान की सेनाएं भी अस्करी तथा कामरान का पक्ष छोड़कर हुमायूँ की तरफ आ गई थीं। यही कारण था कि हुमायूँ ने ईरान के 14 हजार सैनिकों पर हमला करने का साहस किया तथा उनसे कांधार छीन लिया। यह कहना मुश्किल है कि ईरान का शहजादा कैसे मारा गया किंतु अनुमान लगाया जा सकता है कि वह हुमायूँ से हुए युद्ध में मारा गया। इस सम्बन्ध में भी कोई तथ्य प्राप्त नहीं होता कि कांधार के किले का धन वास्तव में ईरान पहुंच गया अथवा हुमायूँ ने किले के साथ-साथ ईरान की सेना से वह धन भी छीन लिया!

कुछ इतिहासकारों ने कन्दहार प्रकरण में हुमायूँ द्वारा शाह से विश्वासघात किए जाने का आरोप लगाया है परन्तु यह आरोप उचित नहीं हैं। हुमायूँ ने ईरान के शाह को इस शर्त पर कन्दहार देने का वचन दिया था कि शाह हुमायूँ को काबुल, गजनी तथा बदख्शाँ जीतने में सहायता करेगा। इसलिये जब तक इन तीनों स्थानों पर हुमायूँ का अधिकार नहीं हो जाता, तब तक फारस के शाह द्वारा हुमायूँ से कांधार दुर्ग माँगना उचित नहीं था।

सुन्नी लेखकों के अनुसार फारस के शासक शिया थे जबकि कन्दहार की जनता सुन्नी थी। इस कारण फारस के शिया मुसलमान कन्दहार के सुन्नी मुसलमानों पर अत्याचार कर सकते थे। इसलिए कन्दहार की जनता उन्हें घोर घृणा की दृष्टि से देखती थी। ऐसी स्थिति में कन्दहार फारस वालों को सौंपना उचित नहीं था।

इतना ही नहीं, जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान की विजय में संलग्न था, तब तक के लिए फारस के शाह द्वारा हुमायूँ के परिवार को दुर्ग में रहने की अनुमति नहीं दी गई। इससे हुमायूँ को बड़ी पीड़ा हुई। हुमायूँ को एक सुरक्षित आधार की आवश्यकता थी जहाँ से वह अपने युद्धों का संचालन कर सकता। उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति कन्दहार ही कर सकता था। अतः हुमायूँ का फारस के शाह को कन्दहार नहीं देना ही उचित था।

इस समय हुमायूँ के पास पर्याप्त सेना एवं धन हो गया था जिसके बल पर वह एक ओर तो ईरान के शासक को नाराज कर सकता था और दूसरी ओर काबुल के शासक कामरान से पंजा लड़ा सकता था। जब कामरान ने सुना कि हुमायूँ ने कांधार दुर्ग पर अधिकार कर लिया है तो कामरान शिकार खेलने के लिए चला गया ताकि अपने अमीरों के समक्ष यह जता सके कि उसे हुमायूँ की कोई परवाह नहीं है!

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मिर्जा हिंदाल ने एकांतवास ले लिया था किंतु जब उसने सुना कि बादशाह हुमायूँ खुरासान से लौट आया है तथा उसने कांधार दुर्ग पर अधिकार कर लिया है तब मिर्जा हिंदाल ने मिर्जा यादगार नासिर को बुलवाकर कहा कि मिर्जा कामरान ने खानजादः बेगम को मिर्जा हुमायूँ के पास संधि के लिए भेजा था किंतु बादशाह ने उस संधि को नहीं माना है।

बादशाह ने बैराम खाँ को अपना दूत बनाकर भेजा था किंतु कामरान ने उसकी बात को नहीं माना है। अब बादशाह कांधार बैराम खाँ को सौंपकर स्वयं काबुल आ रहे हैं। इसलिए उचित होगा कि हम एक दूसरे के प्रति विश्वसनीयता रखने की प्रतिज्ञा करके बादशाह हुमायूँ के पास पहुंचने का प्रयत्न करें।

मिर्जा यादगार ने मिर्जा हिंदाल की बात मान ली तथा दोनों ने एक दूसरे के प्रति विश्वसनीय रहने की प्रतिज्ञा की। मिर्जा हिंदाल ने मिर्जा यादगार नासिर से कहा कि तुम यहाँ से भागने का प्रयास करो। जब तुम यहाँ से भाग जाआगे तब मिर्जा कामरान मुझसे कहेगा कि मिर्जा यादगार भाग गया है, जाकर उसे समझाओ और वापस लिवा कर लाओ। हमारे पहुंचने तक तुम धीरे-धीरे चलना और जब हम आ जाएंगे, तब हम दोनों फुर्ती से चलकर बादशाह की सेवा में पहुंच जाएंगे।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि यह सम्मति निश्चित होने पर मिर्जा यादगीर नासिर भाग गया। जब यह बात मिर्जा कामरान को ज्ञात हुई तो वह शिकार खेलना छोड़कर काबुल आया तथा उसने मिर्जा हिंदाल को बुलाकर कहा कि तुम मिर्जा यादगार नासिर को वापस लिवा लाओ।

मिर्जा हिंदाल तो यही चाहता था। वह उसी समय एक तेज घोड़े पर सवार हुआ और दो-तीन दिन में मिर्जा यादगार के पास जा पहुंचा। यहाँ से वे दोनों मिर्जा हुमायूँ की तरफ चले गए।

जब तैमूरी खानदान के ये दोनों शहजादे बादशाह हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत हुए तो हुमायूँ ने उन दोनों को क्षमा कर दिया और अपनी सेवा में रख लिया। उन दोनों ने बादशाह को सलाह दी कि हमें तकिया हिमार के रास्ते काबुल के लिए प्रस्थान करना चाहिए। हालांकि हुमायूँ काबुल जा रहा था जहाँ हमीदा बानो बेगम का पुत्र अकबर भी था किंतु हुमायूँ ने किसी अनहोनी की आशंका से हमीदा बानो को अपने साथ नहीं लिया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि अक्टूबर 1545 में हुमायूँ अपनी सेना के साथ तकिया हिमार पहुंच गया जिसका हिंदी में अर्थ होता है गदहे का दर्रा। गुलबदन द्वारा दी गई यह तिथि सही नहीं हैं। अवश्य ही यह घटना दिसम्बर 1545 के बाद की है। अबुल फजल ने यह घटना गुलबदन द्वारा वर्णित तिथि से एक साल बाद की बताई है।

खानजादः बेगम भी हुमायूँ के साथ थी किंतु मार्ग में कबलचाक नामक स्थान पर खानजादः बेगम को बुखार आ गया जिसके कारण हुमायूँ को कबलचाक में ही रुक जाना पड़ा। हुमायूँ ने हकीमों से अपनी बुआ का खूब उपचार करवाया किंतु चौथे दिन खानजादः बेगम की मृत्यु हो गई। यह बाबर के दुर्भाग्यशाली बेटों के लिए किसी कहर टूटने से कम नहीं था!

बाबर के बेटों को इस समय खानजादः बेगम की सर्वाधिक आवश्यकता थी। मुगलिया इतिहास के रंगमंच पर केवल वही ऐसी पात्र थी जो बाबर के बेटों को भविष्य में होने वाली बरबादी से बचा सकती थी किंतु कुदरत ने बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान के दृश्य इतनी गहरी स्याही से लिख रखे थे कि उन्हें मंचित करने के लिए कुदरत ने खानजादः बेगम को ही रंगमंच से उठा लिया।

बाबर के बेटों की बरबादी हर हाल में होनी ही थी जिसे कोई नहीं रोक सकता था, यहाँ तक कि स्वयं हुमायूँ भी नहीं, जिसके पास कांधार दुर्ग ही नहीं, सत्ता और शक्ति बड़े जोर-शोर से स्वयं ही लौट आई थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खानजादः बेगम मुगलिया राजनीति की आधार थी (73)

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खानजादः बेगम मुगलिया राजनीति की आधार थी

दिसम्बर 1545 में जब हुमायूँ ने कांधार पर अधिकार कर लिया तो वह कांधार बैराम खां के संरक्षण में देकर अपनी बुआ खानजादः बेगम के साथ काबुल के लिए रवाना हुआ ताकि मिर्जा कामरान से निबटा जा सके किंतु कबलचाक नामक स्थान पर अचानक ही खानजादः बेगम का निधन हो गया।

हुमायूँ के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हमें खानजादः बेगम के इतिहास पर एक दृष्टि डालनी चाहिए। जब तक वह जीवित रही, मुगलिया राजनीति के प्रमुख आधार स्तम्भ के रूप में भूमिका निभाती रही। खानजादः का जन्म ई.1478 में फरगना के तुर्को-मंगोल शासक उमर शेख मिर्जा की बड़ी पुत्री के रूप में हुआ था। बाबर और खानजादः दोनों की माँ एक ही थी जो कुतलुग निगार खानम के नाम से जानी जाती थी और उमर शेख की पहली तथा प्रधान बेगम थी।

खानजादः बाबर से पांच साल बड़ी थी। बाल्यकाल से ही खानजादः तथा बाबर के बीच प्रगाढ़ प्रेम था। चूंकि खानजादः की माता कुतलुग निगार खानम मंगोल साम्राज्य के शासक यूनुस खाँ की पुत्री थी जो मध्य-एशिया में महान् मंगोल के नाम से जाना जाता था। इसलिए कुतलुग निगार खानम मध्य-एशिया की राजनीति को अच्छी तरह से समझती थी और यही समझदारी खानजादः बेगम तथा बाबर को भी प्राप्त हुई थी। इस कारण बाबर मध्य-एशिया के राजनीतिक विषयों पर अपनी बड़ी बहिन खानजादः बेगम से विचार-विमर्श किया करता था।

खानजादः बेगम ने मध्य-एशिया में स्थित अपने पिता के छोटे से राज्य से लेकर अपने भाई एवं भतीजों को भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल क्षेत्रों पर शासन करते हुए अपनी आंखों से देखा था। बादशाह बनने के बाद बाबर ने खानजादः बेगम को पादशाह बेगम की उपाधि दी थी।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में खानजादः बेगम का उल्लेख बहुत प्रेम एवं आदर के साथ अनेक प्रसंगों में किया है। गुलबदन बेगम ने भी अपनी पुस्तक हुमायूंनामा में खानजादः बेगम का उल्लेख कई बार किया है। गुलबदन उसे आकः जानम कहा करती थी।

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जब बाबर समरकंद का शासक था, तब ई.1500 में बाबर पर उज्बेगों ने आक्रमण करने आरम्भ किए। ई.1501 में यह संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। उज्बेग नेता शैबानी खाँ ने पूरे छः माह तक समरकंद पर घेरा डाले रखा। बाबर को आशा थी कि उसका चाचा सुल्तान हुसैन मिर्जा बायकरा बाबर की सहायता करेगा जो कि ग्रेटर खुरासान का शासक था किंतु बाबर के चाचा ने बाबर की कोई सहायता नहीं की। इस बीच बाबर की लगभग सारी सेना नष्ट हो गई तथा शैबानी खाँ किसी भी समय समरकंद में घुसकर बाबर तथा उसके पूरे परिवार को बंदी बना सकता था। कुछ लेखकों के अनुसार शैबानी खाँ ने बाबर को बंदी बना लिया तथा उसके समक्ष यह शर्त रखी कि यदि बाबर अपनी बड़ी बहिन खानजादः शैबानी खाँ को सौंप दे तो शैबानी खाँ बाबर को समरकंद से जीवित ही निकलने दे सकता है। पराजित बाबर ने अपनी बड़ी बहिन का विवाह शैबानी खाँ से कर दिया तथा स्वयं बिना कोई हथियार, बिना कोई सम्पत्ति, बिना कोई घोड़ा लिए समरकंद से बाहर आ गया। शैबानी खाँ ने बाबर के परिवार को भी जीवित ही समरकंद से बाहर जाने की अनुमति दे दी।

इसके बाद बाबर बदख्शां, काबुल, कांधार, गजनी, दिल्ली तथा आगरा पर विजय प्राप्त करता हुआ अफगानिस्तान और हिंदुस्तान का बादशाह बना था। अबुल फजल तथा हेनरी बेवरीज ने इस विवाह को शैबानी खाँ तथा खानजादः बेगम के प्रेम-प्रसंग का परिणाम बताया है जो कि पूरी तरह मनगढ़ंत लगता है।

ई.1500 में बाबर की मौसी मिहिर निगार खानम को शैबानी खाँ ने पकड़ लिया तथा उससे बलपूर्वक विवाह कर लिया था। जब ई.1501 में शैबानी खाँ ने मिहिर निगार खानम की बहिन की पुत्री खानजादः बेगम से विवाह करने का निर्णय लिया तो शैबानी खाँ ने खानजादः की मौसी मिहिर निगार खानम को तलाक दे दिया। क्योंकि मौसी और भांजी के एक ही पुरुष से विवाह को तब के मध्य-एशिया में इस्लाम के नियमों के विरुद्ध माना जाता था।

खानजादः बेगम तथा शैबानी खाँ के दाम्पत्य से एक पुत्र भी हुआ था किंतु वह शैशव अवस्था में ही मर गया था। जब एक बार बाबर ने ईरान के शाह की सहायता से समरकंद पर पुनः अधिकार कर लिया तो खानजादः बेगम ने यह कहकर बाबर का पक्ष लिया कि समरकंद पर पहला अधिकार तो बाबर का ही है। इस बात से नाराज होकर शैबानी खाँ ने खानजादः बेगम को तलाक दे दिया और उसे दण्डित करने के लिए उसका विवाह सैयद हादा से करवा दिया जो एक नीचे ओहदे का कर्मचारी था।

ई.1511 में जब ईरान के शाह ईस्माल तथा शैबानी खाँ के बीच मर्व का युद्ध हुआ तो खानजादः का पूर्व पति शैबानी खाँ तथा वर्तमान पति सैयद हादा दोनों ही उस युद्ध में मारे गए। ईरान के शाह ईस्माइल ने शैबानी खाँ के हरम की औरतों को पकड़ लिया। पकड़ी गई औरतों में खानजादः बेगम भी सम्मिलित थी। शाह इस्माइल ने खानजादः को अपने सिपाहियों के संरक्षण में अपने मित्र बाबर के पास भेज दिया। उस समय बाबर कुंदूज में निवास कर रहा था।

इस प्रकार ई.1511 में खानजादः बेगम का उज्बेगों से पीछा छूट गया और वह फिर से तुर्को-मंगोल परिवार में अर्थात् बाबर के पास आ गई। उस समय खानजादः 33 साल की हो चुकी थी। शाह इस्लाइल की इस उदारता के लिए बाबर ने अपने अमीर, शाह के दरबार में भेजकर शाह का धन्यवाद किया तथा उसे उपहार भी भिजवाए।

बाबर ने अपनी बहिन खानजादः बेगम का तीसरा विवाह मुहम्मद महदी ख्वाजा से किया जो बाबर के सबसे विश्वस्त अमीरों में से माना जाता था और जिसने पानीपत तथा खानवा के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जो बाद में भारत छोड़कर पुनः अफगानिस्तान चला गया था।

जिस समय खानजादः का महदी ख्वाजा से विवाह हुआ, उस समय महदी ख्वाजा की एक बहिन केवल दो वर्ष की थी। उसका नाम सुल्तानम बेगम था। खानजादः बेगम ने अपनी इस ननद का पालन-पोषण किया तथा जब वह बड़ी हो गई तो ई.1537 में उसका विवाह बाबर के पुत्र मिर्जा हिंदाल से करवा दिया।

इस प्रकार मिर्जा हिंदाल खानजादः का भतीजा और नंदोई दोनों था। इस विवाह के अवसर पर खानजादः बेगम ने इतने बड़े शाहीभोज का आयोजन किया जो बरसों तक मुगल राज्य में चर्चा का विषय बना रहा। बाबर के किसी अन्य बेटे के विवाह का आयोजन इतना भव्य और विशाल नहीं हुआ था।

गुलबदन बेगम के अनुसार खानजादः बेगम ने बाबर के बेटों के परस्पर विवादों में अनेक अवसरों पर हस्तक्षेप किया था और उनमें समझौता करवाया था किंतु अब वह मुगलिया राजनीति के रंगमंच से प्रस्थान कर चुकी थी और बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान का सबसे क्रूर अध्याय आरम्भ होने वाला था!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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