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कोहिनूर हीरा

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कोहिनूर हीरा

कोहिनूर हीरा संसार का सबसे बड़ा, सबसे दुर्लभ एवं रहस्यमय हीरा है जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले ही भारतीय राजाओं के खजाने में रहा करता था।

ई.1739 में ईरान के शाह नादिरशाह ने दिल्ली के लाल किले में स्थित मुगल शहजादे के खजाने को पूरी तरह से लूट कर ऊंटों, घोड़ों, गधों एवं खच्चरों पर लदवा लिया ताकि उसे ईरान ले जाया जा सके किंतु बादशाह मुहम्मदशाह ने कोहिनूर हीरा अपनी पगड़ी में छिपा लिया था।

कहा जाता है कि मुहम्मदशाह की चहेती वेश्या नूरबाई ने नादिरशाह से निकट सम्बन्ध बना लिए थे। उसने नादिरशाह से कहा- ‘तूने दिल्ली से अब तक जो लूटा है, वह उस दौलत के सामने कुछ भी नहीं है जो दौलत मुहम्मदशाह की पगड़ी में छिपी हुई है।’

यह सुनते ही नादिरशाह के कान खड़े हो गए। उसने मुहम्मदशाह से कोहिनूर हीरे को छीनने का षड़यंत्र रचना शुरु कर दिया। आगे बढ़ने से पहले पाठकों को कोहिनूर हीरे के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी देना उचित होगा।

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कोहिनूर हीरा संसार के दुर्लभ हीरों में से एक है। यह मानव जाति के पास कब से है, इसका वास्तविक इतिहास ज्ञात नहीं है क्योंकि इसका नाम और स्वामित्व बदलता रहा है।

कुछ लोगों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण पर जिस स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगा था और जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने जामवंत की पु़त्री से प्राप्त करके पुनः यादवों को सौंपा था, वह मणि ही आगे चलकर कोहिनूर हीरा कहलाई। कहा नहीं जा सकता कि इस मान्यता में कितनी सच्चाई है!

कुछ स्रोतों के अनुसार यह हीरा ईसा के जन्म से लगभग 3200 साल पहले एक नदी की तली में प्राप्त हुआ था। अन्य स्रोतों के अनुसार यह हीरा दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश नामक प्रांत में स्थित गोलकुण्डा की कोल्लार खान से प्राप्त हुआ था। ईस्वी 1730 तक गोलकुण्डा विश्व का एकमात्र ज्ञात हीरा उत्पादक क्षेत्र था। उसके बाद ब्राजील में हीरों की खोज हुई थी।

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ईस्वी 1323 तक यह हीरा हिन्दू राजाओं के पास था। ई. 1323 में दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पु़त्र उलूघ खान को वारांगल के काकतीय राजा प्रतापरुद्र पर आक्रमण करने के लिए भेजा था। इस युद्ध में रुद्रप्रताप हार गया। उलूघ खाँ ने वारंगल के राजमहल से अपार धन लूटा जिसे घोड़ों एवं ऊंटों पर लादकर दिल्ली ले जाया गया। इस खजाने में कोहिनूर हीरा भी सम्मिलित था। बाद के किसी काल में यह हीरा ग्वालियर के तोमरों के पास पहुंच गया। ई.1526 में जब बाबर के पुत्र हुमायूँ ने आगरा के लाल किले पर अधिकार किया तब ग्वालियर का तोमर राजा विक्रमाजीत तथा उसका परिवार आगरा के लाल किले में बंद थे।

दिल्ली सल्तनत के अंतिम शासक सिकंदर लोदी ने ग्वालियर के इस तोमर राजा को परास्त करके पूरे परिवार सहित आगरा के लाल किले में बंद कर दिया था। हुमायूँ ने राजा विक्रमाजीत से एक समझौता किया जिसके तहत विक्रमाजीत एवं उसके परिवार को मुक्त कर दिया गया। राजा विक्रमाजीत का परिवार अपना खजाना लेकर आगरा से चित्तौड़ के लिए रवाना हुआ।

मार्ग में हूमायूं के सैनिकों ने उस परिवार के सामान की तलाशी ली जिसमें कोहिनूर हीरा भी था। मुगल सेनापति ने यह हीरा हुमायूँ को भेंट कर दिया। हुमायूँ ने यह हीरा बाबर को भेंट किया। बाबर ने यह हीरा पुनः हुमायूँ को दे दिया।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में इस हीरे का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘ई.1294 में कोहिनूर हीरा मालवा के किसी अनाम राजा के पास था जिसे बाद में अल्लाउद्दीन खिलजी ने छीन लिया था।’

चूंकि उस काल में मालवा प्रांत के नरवर राज्य में प्रबल कच्छवाहों का शासन था इसलिए संभव है कि बाबर ने जिसे अनाम राजा लिखा है, वह नरवर का कोई कच्छवाहा राजा रहा होगा। बाद में यह ग्वालियर के तोमरों के पास चला गया होगा। बाबर ने इस हीरे का मूल्य संसार के समस्त मनुष्यों के दो दिन के भोजन के मूल्य के बराबर आंका था।

इतिहास में यह मान्यता रही है कि कोहिनूर हीरा जिस किसी के पास रहा, उसे दुर्भाग्य ने घेर लिया। जब यह तोमर राजा विक्रमादित्य अथवा विक्रमाजीत के पास था तब विक्रमादित्य का पूरा परिवार जेल में बंद हो गया। ई.1526 में जब यह हीरा हूमायूं के पास आ गया तो हुमायूँ गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और बाबर ने ऊपर वाले से प्रार्थना की कि हुमायूँ की जगह बाबर को मौत आ जाए।

कहते हैं कि इस प्रार्थना के बाद ई.1530 में बाबर तो बीमार होकर मर गया ओर हुमायूँ ठीक हो गया किंतु हुमायूँ का दुर्भाग्य अब भी उसके साथ था इसलिए कुछ ही समय पश्चात् ई.1540 में उसका राज्य नष्ट हो गया और वह भारत छोड़कर ईरान भाग गया।

अब यह हीरा शेरशाह सूरी के पास चला गया। वह भी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सका और ईस्वी 1545 में अपनी ही सेना के तोप के गोले के फट जाने से मर गया। अब यह हीरा शेरशाह सूरी के पुत्र जलाल खाँ के पास आ गया।

इसके बाद ई.1555 तक की 10 साल की अवधि में इब्राहिम शाह सूरी, इस्लामशाह सूरी, फीरोजशाह सूरी, मुहम्मद आदिल, सिकंदर शाह तथा आदिलशाह सूरी नामक छः बादशाह हुए जो थोड़े-थोड़े समय में मार दिए गए। जब ई.1555 में हुमायूँ फिर से भारत के लाल किलों एवं कोहिनूर हीरे का स्वामी हुआ तो वह कुछ माह शासन करके ई.1556 में सीढ़ियों से फिसल कर मर गया।

हुमायूँ के बाद अकबर और जहांगीर ने यह रत्न कभी अपने पास नहीं रखा। उन्होंने दीर्घकाल तक शासन किया। जब शाहजहाँ ने तख्ते ताउस बनवाया और उसमें कोहिनूर को लगवाया तब वह अपने पुत्र औरंगज़ेब द्वारा बंदी बना लिया गया और उसका शेष जीवन बंदी की तरह व्यतीत हुआ। औरंगजेब ने इस हीरे को अपने पास नहीं रखा और यह आगरा के लाल किले में बंद खजाने का हिस्सा बना रहा। उसने भी दीर्घकाल तक शासन किया।

ई.1707 में औरंगजेब मर गया, तब से लेकर ई.1739 में नादिरशाह का लाल किले पर आक्रमण होने तक 32 साल की संक्षिप्त अवधि में बहादुरशाह, जहांदारशाह, फर्रूखशीयर, रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला तथा मुहम्मदशाह रंगीला नामक छः बादशाह हो चुके थे। इनमें से मुहम्मदशाह के अतिरिक्त कोई भी शासक पांच साल शासन नहीं कर सका था।

उसी कोहिनूर को मुहम्मदशाह रंगीला ने अपनी पगड़ी में छिपा लिया था किंतु वेश्या नूरबाई ने नादिरशाह को कोहिनूर का पता बता दिया। नादिरशाह ने मुहम्मदशाह से हीरा छीनने के लिए एक षड़यंत्र रचा। उसने दिल्ली से रवाना होने से पहले लाल किले में एक दरबार किया तथा उसमें मुहम्मदशाह को अपना भाई तथा भारत का फिर से बादशाह घोषित किया।

इस अवसर पर नादिरशाह ने मुहम्मदशाह से कहा कि हमारे ईरान में यह परम्परा है कि खुशी के अवसर पर भाई आपस में अपनी पगड़ी बदलते हैं। इतना कहकर नादिरशाह ने मुहम्मदशाह की पगड़ी उतारकर अपने सिर पर रख ली और अपनी पगड़ी उतारकर मुहम्मदशाह को पहना दी। इस प्रकार कोहिनूर भी नादिरशाह के पास पहुंच गया और मुहम्मदशाह कुछ नहीं कर सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नादिरशाह का कत्ल

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नादिरशाह का कत्ल

नादिरशाह लाल किले से कोहिनूर हीरे के साथ-साथ मुगलों का दुर्भाग्य भी बांध कर ले गया ! इसी दुर्भाग्य के चलते शीघ्र ही खोरासान में नादिरशाह का कत्ल हो गया!

कोहिनूर हीरे के स्वामियों के बारे में कहा जाता था कि जिस किसी के पास भी यह हीरा होता था, वह परम दुर्भाग्य को प्राप्त हो जाता था। अब हीरा नादिरशाह के पास था और वह दोनों हाथों से बटोरी गई भारत की अपार दौलत लेकर तुरंत ईरान लौट जाना चाहता था।

नादिरशाह ने न केवल लाल किले की सारी दौलत लूट ली थी अपितु उसने मुहम्मदशाह रंगीला से काश्मीर से लेकर सिन्ध तक का विशाल क्षेत्र छीन लिया और मुहम्मदशाह की शहजादी जहान अफरूज बानो बेगम का अपने पुत्र से जबर्दस्ती विवाह कर दिया। नादिरशाह ने विभिन्न प्रकार का काम करने वाले दस हजार भारतीय कारीगरों एवं गुलामों को भी अपने साथ ले जाने के लिए रस्सियों से बंधवा लिया।

इस प्रकार नादिरशाह ने बादशाह मुहम्मदशाह से उसकी चल एवं अचल सम्पत्ति, उसकी शहजादी एवं भूमि, उसका तख्ते-ताउस एवं पगड़ी, उसके कारीगर एवं गुलाम, दासियां एवं वेश्याएं, गायिकाएं एवं नृत्यांगनाएं सभी कुछ छीन लिए।

जिन मुगलों ने विगत दो सौ साल में भारतीयों को कंगाल बना दिया था, उन्हीं मुगलों को नादिरशाह ने लंगोटी लगाकर छोड़ दिया था। नादिरशाह का बाप अफगानिस्तान में भेड़ें चराया करता था किंतु नादिरशाह संसार के सबसे बड़े खजाने का मालिक बन गया था। यह सारी सम्पत्ति 700 हाथियों, 4000 ऊँटों एवं 12 हजार घोड़ों पर लाद दी गई। मई 1739 में नादिरशाह ने दिल्ली छोड़ दी।

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जब वह ईरान लौटा तो उसने ईरान के समस्त नागरिकों का तीन साल का कर माफ कर दिया तथा कर वसूली के कर्मचारियों को घर बैठे वेतन देने की घोषणा कर दी किंतु कुछ ही समय बाद नादिरशाह ने तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य पर हमला किया जिसके लिए उसे फिर से धन की आवश्यकता होने लगी तो उसने ईरान की जनता पर बेतहाशा कर लगा दिए। इससे ईरान में नादिरशाह के विरुद्ध विद्रोह उठ खड़े हुए।

ई.1747 में नादिरशाह ने तुर्किस्तान में रहने वाले कुर्द लोगों पर भयानक अत्याचार किए तथा उनके कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाईं ताकि वह जन्नत में निवास कर रही तैमूर लंगड़े की रूह को प्रसन्न कर सके। इससे नाराज होकर ईरान के बहुत से सेनापतियों ने नादिरशाह का कत्ल करने की योजना बनाई।

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जून 1747 में नादिरशाह ने खोरासान पर आक्रमण किया। वहाँ वह इंसानी जिस्मों से खूनी खेल खेलने लगा। नादिरशाह के बहुत से सैन्य अधिकारी दूसरे देशों की मुसलमान प्रजा के साथ इतनी क्रूरता किए जाने को उचित नहीं समझते थे। पिएरे लुई बेजिन नामक एक लेखक ने लिखा है- ’20 जून 1747 को पंद्रह सेनापतियों ने नंगे खंजर हाथों में लेकर एक साथ नादिरशाह के तम्बू में प्रवेश किया।’ उनमें से प्रत्येक सेनापति नादिरशाह का कत्ल स्वयं करना चाहता था। इसलिए उन्होंने बेखबर सो रहे नादिरशाह के शरीर में ताबड़तोड़ खंजर भौंकने का निश्चय किया। जब ये मुस्लिम अमीर अपने स्वामी नादिरशाह के तम्बू में घुसे तो नादिरशाह जाग गया और क्रोध से चिल्लाया- ‘कौन है यहाँ, मेरी तलवार लाओ।’

उसकी गर्जना सुनकर हत्यारे सैनिकों का खून भय से जम गया। इनमें से कुछ हत्यारे तो भय से कांपते हुए तम्बू से बाहर निकल गए किंतु दो सेनापतियों ने हिम्मत करके नादिरशाह पर वार किए। मुहम्मदकुली खाँ नामक एक अमीर ने अपनी तलवार का भरपूर वार नादिरशाह पर कर दिया।

नादिरशाह घायल होकर धरती पर गिर पड़ा। इसके बाद दूसरे अमीरों की हिम्मत जाग गई और दो अमीरों ने भी अपनी तलवारें घुमाकर धरती पर पड़े नादिरशाह पर दे मारीं। तम्बू से बाहर गए हुए अमीर भी लौट आए। उन्होंने भी तड़ातड़ वार करने आरम्भ कर दिए। नादिरशाह अपने ही खून में लथपथ हो गया।

नादिरशाह ने अब भी प्रतिरोध करने के लिए खड़े होने का प्रयास किया तथा चिल्लाकर बोला- ‘तुम लोग मुझे क्यों मारना चाहते हो? तुम लोग मुझे जीवित छोड़ दो और मेरे पास जो भी है, उसे तुम ले लो।’

नादिरशाह की कमजोर और भय से कांपती हुई आवाज सुनकर हत्यारे अमीरों को जोश चढ़ गया। उनका भय बिल्कुल जाता रहा और सलह खाँ नामक एक सेनापति ने अपनी तलवार से नादिरशाह का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया।  

इस प्रकार नादिरशाह का कत्ल हो गया तथा धरती के सबसे धनी सुल्तान की धरती से विदाई हो गई। कोहिनूर अब भी उसकी पगड़ी में लगा था जो हत्यारे अमीरों की ठोकरों में पड़ी हुई थी। कौन जाने यह कोहिनूर हीरे का बदला था या भारत की उस निरीह जनता की आहों ने असर दिखाया था जिनके शताब्दियों के खून-पसीने की कमाई को नादिरशाह 700 हाथियों, 4000 ऊँटों एवं 12 हजार घोड़ों पर लादकर ईरान ले आया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कोहिनूर हीरे की यात्रा

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कोहिनूर हीरे की यात्रा

कोहिनूर हीरे की यात्रा के बारे में कुछ जानकारी हमने पिछली कड़ी में दी थी। कोहिनूर हीरे की यात्रा भगवान श्रीकृष्ण से भी पहले आरम्भ होती है। जिस समय मुसलमानों का भारत में प्रवेश हुआ, उस समय यह हीरा हिन्दू राजाओं के पास रहता था किंतु मुसलमानों ने इसे बलपूर्वक हिन्दुओं से छीन लिया।

तुर्क सुल्तानों से कोहिनूर हीरा मुगलों के पास आया और उनसे नादिरशाह छीनकर ईरान ले गया। कोहिनूर हीरे की यात्रा ईरान पहुंचकर थमी नहीं। ईरान से यह हीरा अफगानिस्तान और पंजाब होते हुए लंदन पहुंच गया! भारत में कोहिनूर हीरा जिस किसी के पास रहा उसे संकटों का सामना करना पड़ा।

दक्षिण भारत के गोलकुण्डा क्षेत्र से निकला कोहिनूर हीरा जिसके भी पास रहा उसे दुर्भाग्य के हवाले करता रहा। 20 जून 1747 को खून में लथपथ नादिरशाह की पगड़ी में लगा हुआ कोहिनूर अब पुनः नए मालिक की प्रतीक्षा में था। नादिरशाह के हत्यारों में नादिरशाह का भतीजा अली कुली भी शामिल था।

वह आदिल शाह के नाम से ईरान के तख्त पर बैठकर कोहिनूर का स्वामी बन गया किंतु केवल एक वर्ष बाद ही आदिलशाह के भाई इब्राहीम खाँ एवं नादिरशाह के पोते शाहरुख ने आदिलशाह को मार डाला और पूरी ईरानी सल्तनत टुकड़ों में बिखरकर चूर-चूर हो गई। कोहिनूर हीरे की यात्रा जारी रही।

अफगानिस्तान के सूबेदार अहमदशाह अब्दाली ने अपने क्षेत्रों को स्वतंत्र कर लिया तथा कोहिनूर हीरा भी उसके हाथों में पहुंच गया। ई.1748 में अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर अभियान किया किंतु उसका इतिहास आगे बताएंगे। इस आलेख को हम कोहिनूर हीरे तक सीमित रखेंगे। अहमदशाह अब्दाली के पास यह हीरा ई.1772 में उसकी मृत्यु होने तक रहा।

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अहमदशाह अब्दाली जीवन भर मध्य एशिया तथा भारत में विभिन्न युद्धों में उलझा रहा किंतु उसने लम्बी जिंदगी पाई तथा कोहिनूर हीरा उसके एवं उसके पुत्रों के पास ई.1830 तक रहा। ई.1830 में अहमदशाह अब्दाली का वंशज शाहशुजा दुर्रानी अफगानिस्तान से जान बचाकर भागा। उसने पंजाब के शासक महाराजा रणजीतसिंह को कोहिनूर हीरा भेंट किया तथा उनसे शरण मांगी। इस प्रकार कोहिनूर हीरे की यात्रा उसे एक बार फिर से भारत ले आई।

जब ई.1839 में महाराजा रणजीतसिंह की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा कि यह हीरा उड़ीसा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर को भेंट कर दिया जाए किंतु उनके उत्तराधिकारियों ने महाराजा की इस इच्छा का सम्मान नहीं किया तथा हीरा सिक्खों के पास ही रहा।

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29 मार्च 1849 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पंजाब पर अधिकार कर लिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने सिक्खों पर दबाव बनाकर उन्हें एक संधि करने पर विवश किया जिसके अनुसार यह हीरा अंग्रेजों को सौंप दिया गया। लॉर्ड डलहौजी ने यह हीरा हाथ में आते ही इंग्लैण्ड की यात्रा की तथा यह हीरा स्वयं ले जाकर महारानी विक्टोरिया को भेंट किया। इस प्रकार कोहिनूर हीरे की यात्रा ने उसे लंदन पहुंचा दिया। इंग्लैण्ड के लोगों ने लॉर्ड डलहौजी की इस कार्यवाही को खुली डकैती बताया तथा इस बात पर आपत्ति की कि लूट का माल महारानी को भेंट किया जाए।

लॉर्ड डलहौजी ने इस पंजाब के राजा दिलीपसिंह की तरफ से महारानी को दी गई भेंट बताया किंतु इस पर अंग्रेज आलोचकों ने कहा कि यदि यह महाराजा दिलीपसिंह की तरफ से भेंट थी तो स्वयं महाराजा के हाथों से महारानी को दी जानी चाहिए थी। इस पर लॉर्ड डलहौजी ने ई.1851 में महाराजा दिलीपसिंह की इंगलैण्ड यात्रा का प्रबंध किया। उस समय महाराजा दिलीपसिंह की आयु केवल 13 वर्ष थी।

महाराजा दिलीपसिंह ने स्वयं महारानी के महल में उपस्थित होकर यह हीरा अपने हाथों से महारानी को भेंट किया। जब यह हीरा इंग्लैण्ड की महारानी को भेंट किया गया था तब इसका वजन 186.6 कैरेट था किंतु ई.1852 में इसे पुनः तराशा गया और इसका वजन 105.6 कैरेट रह गया। इस कार्य पर इंग्लैण्ड की सरकार ने आठ हजार पाण्ड खर्च किए। अब इस हीरे को इंग्लैण्ड की महारानी के मुकुट में जड़ा गया। इसके चारों ओर दो हजार छोटे-छोटे हीरे लगाए गए।

इस प्रकार कोहिनूर भारत से इंगलैण्ड चला गया। इतिहास गवाह है कि इस घटना के केवल 6 साल बाद ही भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध भारी विप्लव हुआ जिसमें अंग्रेजों की सत्ता भारत से नष्ट होते-होते बची। इसके बाद से ही अंग्रेजी साम्राज्य सिकुड़ने लगा।

भले ही कोहिनूर हीरा इंग्लैण्ड की महारानी के मुकुट की शोभा बढ़ा रहा था किंतु इंग्लैण्ड के बड़े राजनीतिज्ञों का मानना था कि इंग्लैण्ड की महारानी के मुकुट में जड़ा हुआ सबसे कीमती हीरा स्वयं भारत है। इसकी कीमत क्या है, इसका पता हमें तब लगेगा जब भारत रूपी हीरा इंग्लैण्ड की रानी के राजमुकुट में नहीं रहेगा।

जब कोहिनूर हीरा इंगलैण्ड पहुंचा तब महारानी विक्टोरिया का राज्य इतना बड़ा था कि उसमें कहीं न कहीं सूरज उगा रहता था। इसलिए यह कहावत चल पड़ी थी कि अंग्रेजों के राज्य में सूरज नहीं डूबता! किंतु कोहिनूर की स्वामिनी बन जाने के बाद महारानी विक्टोरिया की सत्ता सिमटने लगी और ई.1947 के अंत तक दुनिया के अधिकांश देश इंग्लैण्ड के हाथों से निकल गए।

कोहिनूर तो आज भी इंग्लैण्ड के संग्रहालय में मौजूद है किंतु इंग्लैण्ड की रानी के मुकुट में जड़ा हुआ सबसे कीमती हीरा भारत अब उसके पास नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नादिरशाह की फूफियाँ

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नादिरशाह की फूफियाँ

नादिरशाह ने दावा किया कि लाल किले में नादिरशाह की फूफियाँ रहती हैं, नादिरशाह उन्हीं से मिलने आया है। उसने भारत पर हमला नहीं किया है।

नादिरशाह ने हिंदुस्तान पर हमला क्यों किया, इस विषय पर पाकिस्तानी व्यंग्य लेखक शफ़ीक़ुर्रहमान ने अपनी पुस्तक ‘तुज़के नादरी’ में कई कारण बताए हैं जिनमें से कई कारण बड़े हास्यास्पद हैं।

शफ़ीक़ुर्रहमान ने लिखा है कि नादिरशाह कहता था कि हिंदुस्तान के गवैये ‘नादिर दिन्ना, नादिर दिन्ना’ तथा ‘नादरना धीम-धीम’ कहकर नादिरशाह का मज़ाक उड़ाते हैं, इसलिए नादिरशाह उन्हें दण्डित करने आया है। नादिरशाह के इस वक्तव्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत में उसका वास्ता सैनिक दस्तों से नहीं अपितु गवैयों की टोलियों से हुआ था।

शफ़ीक़ुर्रहमान ने लिखा है कि नादिरशाह कहता था कि हम हिन्दुस्तान पर हमला करने नहीं आए बल्कि लाल किले में नादिरशाह की फूफियाँ रहती हैं, हम अपनी फूफी जान से मुलाक़ात करने आए हैं। भले ही यह मजाक की बात हो किंतु इस बात में उस ऐतिहासिक तथ्य के दर्शन किए जा सकते हैं कि भारत के मुगल बादशाह एवं शहजादे; ईरानी राजकुमारियों से विवाह करने के बहुत शौकीन थे। इस कारण ईरान के बहुत से शाहों की बुआएं भारत में ब्याही जाती रही थीं।

इसलिए नादिरशाह यदि यह कहता कि लाल किले में नादिरशाह की फूफियाँ रहती हैं, वह अपनी फूफियों से मिलने भारत आया है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होती। पर्याप्त संभव है कि दिल्ली के लाल किले में उस समय कुछ बेगमें मौजूद हों जो नादिरशाह की फूफियाँ लगती हों!

नादिरशाह के सैनिकों ने लाल किले में रह रही बेगमों से बलात्कार किए थे तथा उन्हें नंगी करके दौड़ाया था। अतः यह आश्चर्य करने वाली बात है कि नादिरशाह को इस बात में कोई आपत्ति नहीं थी कि सिपाही नादिरशाह की फूफियों से बलात्कार करें या उन्हें नंगी करके लाल किले में दौड़ाएं!

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नादिरशाह ने लाल किले में बैठकर भले ही तरह-तरह से हिंदुस्तान का मजाक उड़ाया हो किंतु वास्तविकता यह है कि वह भारत आने से पहले अच्छी तरह जानता था कि उस काल का भारत सैनिक-शक्ति की दृष्टि से अत्यंत कमजोर था जबकि धन और सम्पत्ति से परिपूर्ण था। इन दानों ही कारणों से भारत को लूटने के लिए सैनिक अभियान करना नादिरशाह जैसे लुटेरे के लिए लाभकारी कार्य था।

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यह एक हैरानी की ही बात है कि पिछले दो सौ साल से चल रही मुगल सल्तनत की इतनी गिरावट के बावजूद काबुल से लेकर बंगाल तक के विशाल भू-प्रदेश में मुग़ल शहंशाह का सिक्का चलता था और उसकी राजधानी दिल्ली उस समय दुनिया का सबसे बड़ा शहर था जिसकी बीस लाख की जनसंख्या लंदन और पेरिस की संयुक्त जनसंख्या से अधिक थी। दिल्ली को दुनिया का सबसे अमीर और सबसे रंगीन शहर माना जाता था। छप्पन दिन तक दिल्ली में रहने के बाद नादिरशाह ईरान लौट गया। कुछ किताबों में लिखा है कि नादिरशाह के हमले के बाद मुहम्मदशाह अधिकतर सफ़ेद वस्त्र ही पहनने लगा था। नादिरशाह ने लगभग दो माह तक दिल्ली में लूट-खसोट तथा कत्ले-आम मचाया था किंतु इस दौरान न तो सवाई जयसिंह, न कोई अन्य राजपूत राजा और न महावीर मराठे; कोई भी मुगलों की सहायता के लिये आगे नहीं आया।

यहाँ तक कि उसका सबसे विश्वस्त वजीर चिनकुलीच खाँ निजामुलमुल्क भी हैदराबाद में बैठा रहा। अवध के नवाब सआदत खाँ ने तो नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए न केवल निमंत्रण ही दिया था अपितु इस आक्रमण के लिए उसे पुरस्कार देने का वचन भी दिया था।

सआदत खाँ ने नादिरशाह को प्रलोभन दिया था कि यदि वह दिल्ली पर आक्रमण करेगा तो उसे 20 करोड़ रुपये सआदत खाँ की तरफ से दिये जायेंगे। जब नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो सआदत खाँ 20 करोड़ रुपयों का प्रबन्ध नहीं कर सका और उसने नादिरशाह के भय से आत्महत्या कर ली।

नादिरशाह के दिल्ली से वापस चले जाने के आठ दिन बाद मुहम्मदशाह ने एक दरबार आयोजित किया, उसने फिर से अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा अपने नाम के नए सिक्के जारी करवाए ताकि दिल्ली की जनता यह न समझे कि मुहम्मदशाह अब बादशाह नहीं है या उसके पास अब सोना-चांदी नहीं बचा है किंतु यह सब केवल दिखावा था, बुझते हुए मुगलिया दीपक की अंतिम भभक थी।

सुहानी चांदनी रात बीत चुकी थी और अब लाल किले की दीवारों से उठती हुई आहें तथा सिसकियां ही शेष रह गई थीं। शहजादियों एवं दासियों के बदन से उठने वाले सुगंधों के बादल उड़ चुके थे और बुझते हुए चूल्हों से उठने वाले धुएं की काली लकीरें आसमान में मण्डराती थीं।

ईरानी सैनिकों का मौत और हैवानियत का वहशियाना नाच देख चुकने के बाद भी लाल किले की दलबन्दी समाप्त नहीं हुई। नादिरशाह के लौट जाने के बाद ईस्वी 1740 में ईरानियों और तूरानियों के विरोध में एक तीसरा गुट खड़ा हो गया जिसमें मुहम्मद अमीर खाँ, मुहम्मद इसहाक खाँ और असदयार खाँ आदि प्रमुख थे। इस गुट के सदस्यों ने वजीर और उसके दल को समाप्त करने का प्रयास किया किन्तु भेद खुल जाने पर अमीर खाँ को नीचा देखना पड़ा।

ईस्वी 1745 अमीर खाँ की मृत्यु हो गयी और लाल किले में नादिरशाह की फूफियाँ उसी तरह लुटती रहीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मदशाह रंगीला की मौत

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मुहम्मदशाह रंगीला की मौत

इतिहासकारों ने लिखा है कि मुहम्मदशाह रंगीला की मौत अधिक शराब पीने से हुई थी किंतु वास्तव में उसकी मौत उसके प्यारे दोस्त चिनकुलीच खाँ की मौत के गम में हुई थी। बादशाह का प्यारा दोस्त चिनकुलीच खाँ सतलज के किनारे हुए एक युद्ध में मारा गया !

नादिरशाह के ईरान लौट जाने के बाद लाल किले में जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। एक-दो वर्ष में ही वे भूलने लगे कि नादिरशाह नाम का कोई आक्रांता लाल किले में आया था। इस कारण लाल किले के भीतर रह रहे लोगों के स्वभाव एवं आदतों में कोई अंतर नहीं आया। यद्यपि बादशाह अब भी भोग-विलास में डूबा हुआ था किंतु उसके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आए थे।

मुहम्मदशाह रंगीला किशोर अवस्था से ही शराब पीने का आदी था किंतु नादिरशाह के लौट जाने के बाद वह बेतहाशा शराब पीने लगा। कुछ स्रोतों के अनुसार वह अफ़ीम भी खाने लगा जिससे कारण उसका शरीर उसकी सल्तनत की ही तरह अंदर से खोखला हो गया। अब वह पहले की तरह औरतों के कपड़े नहीं पहनता था, केवल सफेद रंग के मर्दाना कपड़ों में दिखाई देता था।

मुगल दरबार अब भी गुटों में बंटा हुआ था। फिर भी विशाल भारत के किसानों द्वारा उगाई जा रही फसलों से मिलने वाले लगान से लाल किले का व्यय मजे से चलता रहा। बादशाहत बनी रही और सेनाओं को वेतन भी दिया जाता रहा।

हालांकि अब बादशाह की अपनी सेना बहुत छोटी रह गई थी किंतु बंगाल, अवध और हैदराबाद के सूबेदारों के पास अपनी-अपनी विशाल सेनाएं थीं। इन सूबों के सूबेदार वास्तव में तो स्वतंत्र थे किंतु अब भी मुगल बादशाह के अधीन होने का दिखावा करते थे।

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अचानक ईस्वी 1748 में लाहौर से चिंताजनक समाचार मिलने लगे जिनके कारण इन सूबेदारों को एक बार फिर से मुगल बादशाह की छतरी के नीचे एकत्रित होने पर विवश होना पड़ा।

हुआ यह कि ईस्वी 1748 में लाहौर का सूबेदार जकियार खाँ बहादुर मर गया और उसके दो पुत्रों यहिया खाँ बहादुर एवं मियां शाह नवाज खाँ में सूबेदार के पद के लिए युद्ध हुआ। जकियार खाँ का बड़ा पुत्र चिनकुलीच खाँ का जंवाई था। इसलिए उसका पलड़ा भारी था किंतु छोटे पुत्र मियां शाह नवाज खाँ ने अपनी सहायता के लिए अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह दुर्रानी को आमिंत्रत किया।

अहमदशाह दुर्रानी अपनी सेनाएं लेकर लाहौर आ गया। भारत के इतिहास में उसे अहमदशाह अब्दाली भी कहा जाता है। किसी समय वह नादिरशाह का सेनापति हुआ करता था तथा ईरान के अधीन अफगानिस्तानी क्षेत्र का सूबेदार था किंतु जब नादिरशाह मर गया तो अहमदशाह अब्दाली ने ईरानी सल्तनत के अफगानिस्तान की तरफ वाले हिस्से पर अधिकार जमा लिया था। वह भारत पर आक्रमण करने का अवसर ढूंढ ही रहा था कि उसे लाहौर के मृृत सूबेदार के पुत्रों के झगड़े में कूदने का अवसर मिल गया।

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जब अहमदशाह अब्दाली ने सिंधु नदी पार करके पंजाब की तरफ बढ़ना आरम्भ किया तो मुहम्मदशाह रंगीला ने अपने पुराने वजीर चिनकुलीच खाँ को अहमदशाह अब्दाली से लड़ने के लिए आमंत्रित किया। चिनकुलीच खाँ के लिए इस युद्ध में आना वैसे भी आवश्यक था क्योंकि वह इस युद्ध में अपने जवाईं यहिया खाँ बहादुर की सहायता करना चाहता था। इसलिए चिनकुलीच खाँ विशाल सेना लेकर हैदराबाद से पंजाब आ पहुंचा।

इसी प्रकार अवध का नवाब सफदरजंग भी अपनी विशाल सेना लेकर मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की सहायता के लिए पहुंचा। क्योंकि उसे भय था कि यदि अहमदशाह अब्दाली दिल्ली तक पहुंचने में सफल हो गया तो वह सफदरजंग से बीस करोड़ रुपए की मांग करेगा। ये बीस करोड़ रुपए वही थे जो ईस्वी 1739 में सफदरजंग के पिता सआदत खाँ ने नादिरशाह को देने का वचन दिया था किंतु रुपयों का प्रबंध नहीं होने के कारण उसने आत्महत्या कर ली थी। मुहम्मदशाह रंगीला ने अपने पुत्र अहमदशाह के नेतृत्व में शाही सेना भी पंजाब की ओर रवाना कर दी।

इस प्रकार चिनकुलीच खाँ, सफदरजंग एवं शहजादे अहमदशाह के सैनिकों की संख्या 75 हजार हो गई। पंजाब में मनिपुर नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भारी युद्ध हुआ जिसमें मुगल सेना ने भारी क्षति उठाकर भी विजय प्राप्त कर ली। चिनकुलीच खाँ इस युद्ध में मारा गया तथा अहमदशाह अब्दाली वापस ईरान भाग गया। चिनकुलीच खाँ के दूसरे पुत्र मुइन-उल-मुल्क को लाहौर का सूबेदार नियुक्त कर दिया गया।

जब मुहम्मदशाह रंगीला को मनिपुर युद्ध के समचार मिले तो उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि बादशाह का सबसे विश्वसनीय और सबसे प्यारा दोस्त चिनकुलीच खाँ अब इस दुनिया में नहीं है। बादशाह को रह-रहकर उस चिनकुलीच खाँ की याद आती थी जिसने नीचे गिरती हुई मुगल सल्तनत को संभालने का भरसक प्रयास किया था किंतु स्वयं मुहम्मदशाह रंगीला ने उसे तरह-तरह से अपमानित करके मुगल दरबार से दूर चले जाने को विवश कर दिया था।

बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला अपने अंतिम दिनों में चिनकुलीच खाँ को याद करके जोर-जोर से रोया करता था। उसे चिनकुलीच खाँ की मृत्यु का ऐसा दुख पहुंचा कि वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। एक दिन उसे दुःख और क्रोध का भयानक दौरा पड़ा जिसके कारण उसने अत्यधिक शराब पी ली।

बादशाह को उसी शाम हयात बख्श बाग़ ले जाया गया जहाँ वह सारी रात बेहोश रहा और अगले दिन अर्थात् 26 अप्रेल 1748 को चल बसा। उस सयम वह केवल 46 वर्ष का था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मदशाह रंगीला की मौत अत्यधिक शराब पीने से हुई। उसे दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार में अमीर ख़ुसरो के बराबर में दफ़नाया गया।

नसीरुद्दीन मुहम्मद शाह रंगीला की मौत के साथ ही मुगलों के इतिहास में एक लम्बा युग बीत गया। मुहम्मद शाह ने ईस्वी 1719 से 1748 तक शासन किया। अकबर एवं औरंगजेब के बाद मुहम्मदशाह भारत के मुगलों में सर्वाधिक दीर्घ अवधि तक शासन कर सका था। अकबर तथा औरंगजेब ने 49-49 वर्ष और मुहम्मदशाह रंगीला ने 29 वर्ष शासन किया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बादशाह अहमदशाह बहादुर

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बादशाह अहमदशाह बहादुर

अहमदशाह बहादुर दिवंगत बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला का बेटा था। मुगलों का तख्त उसके हाथ कैसे आया, इसे इतिहास की एक गुत्थी ही समझना चाहिए किंतु निश्चित रूप से इसमें लाल किले की बेगमों की बहुत बड़ी भूमिका थी। बेगम ऊधम बाई का बेटा मुगलों के तख्त पर बैठ गया!

बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की कई बेगमें, रखैलें और दासियां थीं जिनमें से चार ब्याहता बेगमों के नाम मिलते हैं। मरहूम बादशाह फर्रूखसियर की बेटी मलिका उज्मानी मुहम्मदशाह रंगीला की मुख्य बेगम थी जो मुगल सल्तनत में अच्छा-खासा प्रभाव रखती थी किंतु जब मुहम्मदशाह रंगीला की मृत्यु हुई तो उस की चहेती बेगम ऊधमबाई ने मुगल दरबार पर कब्जा करके अपने पुत्र अहमदशाह बहादुर को बादशाह बना दिया तथा स्वयं ही कुदसिया बेगम के नाम से शासन करने लगी।


ऊधम बाई को यह सफलता क्यों मिली, यह जानने के लिए हमें ऊधम बाई की निजी जिंदगी में झांकना होगा। ऊधम बाई एक हिन्दू नृत्यांगना थी। जब मुहम्मदशाह बादशाह नहीं बना था, तब से वह मुहम्मदशाह रंगीला के सम्पर्क में थी। जब मुहम्मदशाह रंगीला बादशाह हुआ तो उसने ऊधम बाई से विवाह करके उसे कुदसिया बेगम की उपाधि दी थी। यहाँ से ऊधम बाई की इच्छाओं ने नई अंगड़ाइयाँ लेनी आरम्भ कीं।

ऊधम बाई ने बादहशाह से विवाह होते ही मुगल दरबार में अपना प्रभाव बढ़ाना आरम्भ कर दिया तथा वह मुगलिया राजनीति में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगी। मुहम्मदशाह रंगीला ने ऊधम बाई को सल्तनत में ऊंचा मनसब प्रदान किया। ताकि ऊधम बाई एक मनसबदार की हैसियत से मुगल दरबार में बे-रोक-टोक आ-जा सके।

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मनसबदार के पद पर नियुक्त हो जाने से ऊधम बाई को मुगल अमीरों से सीधा सम्पर्क रखने तथा उनके बीच होने वाले षड़यंत्रों में भाग लेने का अवसर मिल गया। इस कारण बहुत से अमीरों पर ऊधम बाई का प्रभाव जम गया। तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार मुगलिया हरम के दरोगा नवाब जाविद खाँ से भी ऊधम बाई के प्रेम सम्बन्ध थे।

यूं तो जाविद खाँ एक ख्वाजासरा अर्थात् नपुंसक था किंतु ऊधम बाई से उसके प्रेम सम्बनध स्थापित हो गए। इस प्रेम सम्बन्धों का लाभ दोनों को हुआ। जाविद खाँ की सहायता से ऊधम बाई ने मुगलिया हरम पर अपना सिक्का जमा रखा था और ऊधम बाई की सहायता से जाविद खाँ मुगलिया दरबार में ऊंची सीढ़ियां चढ़ गया था।

जब ईस्वी 1748 में बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की मृत्यु हुई तो ऊधम बाई ने कुछ मुगल अमीरों की सहायता से मुगल दरबार पर कब्जा जमा लिया और अपने बेटे अहमदशाह बहादुर को बादशाह बनाने में सफल हो गई जबकि मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला के और भी बेटे जीवित थे। वे सब हाथ मलते ही रह गए।

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अहमदशाह को बादशाह की गद्दी पर बैठाने में मरहूम बादशाह की मुख्य बेगम मलिका उज्मानी का भी हाथ था क्योंकि इस समय तक उसके अपने पेट से जन्मे बेटे की मृत्यु हो गई थी। अहमदशाह बहादुर को मुगलों के इतिहास में मिर्जा अहमदशाह तथा मुजाहिद-उद्दीन अहमदशाह गाजी के नाम से भी जाना जाता है। जिस समय अहमदशाह बहादुर मुगलों के तख्त पर बैठा उस समय उसकी आयु केवल बीस साल थी किंतु उसकी कई बेगमें थीं जिनसे उसे ढेरों बच्चे प्राप्त हुए थे। जिस समय वह तख्त पर बैठा उसके 9 बच्चे जीवित थे। वह भारत का तेरहवां मुगल बादशाह हुआ।

अहमदशाह बहादुर अपनी माँ के षड़यंत्र के सफल हो जाने के कारण बादशाह तो बन गया किंतु उसे शासन करने का कोई अनुभव नहीं था। पिता मुहम्मदशाह रंगीला द्वारा पुत्र अहमदशाह के व्यक्तित्व को बचपन से ही दबाया गया था। इसका कारण यह था कि मुहम्मदशाह रंगीला कम उम्र से ही वेश्याओं और हिंजड़ों के चक्कर में पड़कर तथा शराब एवं अफीम का आदी होकर अपनी शारीरिक शक्तियां एवं स्वाथ्य गंवा चुका था।

मुहम्मदशाह नहीं चाहता था कि उसका पुत्र अहमदशाह भी इन सब बुराइयों के चक्कर में पड़े। इसलिए वह शहजादे पर कड़ी दृष्टि रखता था, उसे बहुत कम लोगों से मिलने दिया जाता था, यहाँ तक कि मुगल शहजादों को जो दैनिक व्यय शाही खजाने से मिलता था, वह भी उसे बहुत कम दिया जाता था ताकि शहजादा हिंजड़ों और वेश्याओं से दूर रह सके किंतु अहमदशाह बहादुर वेश्याओं के चक्कर में बहुत कम उम्र में पड़ गया था।

पिता द्वारा लगाए गए इस नियंत्रण का प्रभाव यह हुआ कि अहमदशाह का व्यक्तित्व कुण्ठित हो गया और उसमें आत्मविश्वास की कमी हो गई। अहमदशाह बीस वर्ष की आयु हो जाने तक केवल एक बार ही युद्ध लड़ने गया था जिसमें चिनकुलीच खाँ तथा सफदरजंग जैसे अनुभवी सेनापति उसके साथ थे। शहजादे को किसी भी प्रांत में जाकर सूबेदारी करने का अवसर भी नहीं मिला था।

इस कारण यह अनुभवहीन युवक जब बादशाह बना तो उसे शासन के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। इसलिए वह अपनी माँ के संरक्षण में शासन करने लगा जिसे लम्बे समय तक मुगलिया राजनीति का अनुभव था। इस कारण शासन की वास्तविक शक्ति ऊधम बाई और उसके हिंजड़े प्रेमी जाविद खाँ के हाथों में रही।

बादशाह ने जाविद खाँ को पांच हजार सवारों का मनसबदार बनाया तथा उसे नवाब बहादुर की उपाधि दी। जबकि बादशाह ने अपनी माता ऊधम बाई अर्थात् कुदसिया बेगम को पचास हजार सवारों का मनसबदार बनाया। पुराने बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने अवध के मरहूम धोखेबाज सूबेदार सआदत खाँ के दामाद सफदरजंग को अपना वजीर बनाया था। नए बादशाह अहमदशाह ने भी सफदरजंग को उसके पद पर बने रहने दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाही हरम के हिंजड़े

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शाही हरम के हिंजड़े

शाही हरम के हिंजड़े न केवल हरम पर शासन करते थे अपितु परोक्ष रूप से लाल किले की समूची सत्ता अर्थात् सम्पूर्ण मुगलिया सल्तनत पर शासन करते थे। इन्हें ख्वाजासरा कहा जाता था।

जाविद खाँ मुगलिया हरम का मुख्य ख्वाजासरा था। वह शाही हरम के हिंजड़ों का दारोगा होने के साथ-साथ मुगलिया दरबार का मनसबदार भी था तथा उसके अधीन एक सेना रहा करती थी। इस प्रकार शाही हरम के हिंजड़े वजीर एवं सेनापति भी बनते थे।

मध्य एशिया के मुस्लिम शासक हब्शी, मंगोल, तुर्की एवं तातार औरतों को शाही हरम में रक्षक-सैनिक के रूप में नियुक्त करते थे जो शारीरिक रूप से बलिष्ठ तथा तलवार चलाने की कला में निपुण होती थीं। जब मुगल भारत में आए तो वे इस परम्परा को अपने साथ लेकर आए। मारवाड़ में इन स्त्री सैनिकों को ‘उड़दा-बेगणिया’ कहा जाता था, यह शब्द ‘पर्दा-बेगम’ से अपभ्रंश होकर बना था। जब शाही बेगमें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाया करती थीं तो ये पर्दा-बेगमें नंगी तलवारें लेकर उन्हें चारों ओर से घेरे रहती थीं।

शाही हरम के हिंजड़े अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में थे। मध्य एशिया के शाही महलों में पर्दा-बेगमों के साथ-साथ हिंजड़ों को भी नियुक्त किया जाता था। इतिहास में इसके साक्ष्य भी मिलते हैं। तुर्की की प्राचीन राजधानी इस्ताम्बूल के संग्रहालय में 8वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का चूना पत्थर का एक पैनल मिला है जिस पर एक शाही हरम के हिंजड़े की प्रतिमा उत्कीर्ण है। यह हिंजड़ा असीरिया के शाही महल में नियुक्त था। यह पैनल निर्मूद नामक स्थान से मिला था जो अब ईराक देश में स्थित है।

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भारत के मुगल शासक अपने शाही हरम में हब्शी, मंगोल, तुर्की एवं तातारी औरतों के साथ-साथ ख्वाजासरों को भी नियुक्त करते थे। ख्वाजासरा उस पुरुष को कहते थे जिसके यौन अंग काट दिए जाते थे अथवा जो नैसर्गिक रूप से नपुंसक उत्पन्न होते थे। मुगलों के शाही हरम में इन लोगों का बड़ा समूह नियुक्त रहता था जो नंगी तलवारें एवं भाले लेकर चौबीसों घण्टे हरम का पहरा देता था। इन लोगों का दारोगा भी एक ख्वाजासरा होता था।

शाही हरम के हिंजड़े मुगल दरबार में मनसबदार भी नियुक्त किए जाते थे तथा उनके अधीन एक अच्छी-खासी सेना भी होती थी जो आवश्यकता होने पर मुगलिया हरम की रक्षा के लिए शत्रुओं एवं आक्रांताओं से युद्ध करती थी।

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जब बादशाह शाही हरम में होता था तब बादशाह के अंगरक्षक का काम भीशाही हरम के हिंजड़े करते थे।अकबर ने अपने उद्दण्ड धायभाई अधम खाँ का वध इन्हीं ख्वाजासरों से करवाया था।

ख्वाजासरों की नियुक्ति यह सोचकर की जाती थी कि ये किसी स्त्री से यौन सम्बन्ध बनाने में सक्षम नहीं होते किंतु मानव देह की जैविकीय संरचना की दृष्टि से ये पुरुष ही थे तथा यौन अंगों को काट दिए जाने के बाद भी उनके भीतर की यौन इच्छाएं जीवित रहती थीं। अतः इनमें से बहुत से ख्वाजासरा शाही हरम की औरतों के साथ प्रेम सम्बन्ध बना लेते थे।

चूंकि अकबर के समय से मुगल शहजादियों के विवाह करने पर रोक लगा दी गई थी तब से मुगल शहजादियों में इन ख्वाजासरों के प्रति आकर्षण बढ़ गया था, क्योंकि किसी भी हालत में बादशाह, शहजादों एवं शाही हकीम को छोड़कर कोई भी पर-पुरुष शाही हरम में प्रवेश नहीं कर सकता था।

शहजादों एवं शहजादियों की शिक्षा के लिए भी महिला शिक्षक एवं ख्वाजासरा नियुक्त किए जाते थे। विषय विशेष के अध्ययन के लिए शिक्षक के मामले में अपवाद भी देखने को मिलता था तथा शहजादियों को उस विषय की शिक्षा देने के लिए वृद्ध एवं विख्यात व्यक्ति शिक्षक के रूप में नियुक्त किए जाते थे।

मुगलों के इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जब किसी ख्वाजासरा ने शाही हरम की औरतों से सम्बन्ध बनाए। मुहम्मद शाह रंगीला की बेगम ऊधम बाई शाही हरम के दारोगा जाविद खाँ से प्रेम करती थी जो ख्वाजासरा होने के साथ-साथ मुगल दरबार में मनसबदार भी था। उसके नियंत्रण में एक बड़ी सेना रहती थी और जाविद खाँ इस सेना के साथ युद्ध के मैदानों में जाकर लड़ाइयां भी लड़ता  था।

कुछ समृद्ध ‘ख्वाजासरा’ इतने अमीर हो जाते थे कि वे अपने घरों में महिलाओं को रखते थे। इन महिलाओं और ख्वाजसारों के बीच प्रेम सम्बन्ध एवं शारीरिक सम्बन्ध होते थे। शाही हरम की महिलाओं को ख्वाजासरों से कुछ ढंकने-छिपाने की जरूरत नहीं थी। इस कारण शाही हरम में नियुक्त ख्वाजासरा हरम की महिलाओं से ‘सेक्शुअल फेवर’ लेने की स्थिति में थे और बदले में वे महिलाएं भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ख्वाजासरा से निकटता प्राप्त कर सकती थीं।

इस कारण हरम की महिला तथा ख्वाजासरा के बीच सम्बन्ध विकसित हो जाते थे। इस तरह के सम्बन्धों के कारण ही बहुत से रईस, ख्वाजसारों को अपने घरों में काम नहीं देते थे।

औरंगजेब कालीन इटेलियन पर्यटक मनूची ने लिखा है- ‘कुछ ख्वाजासरा मुगल शहजादियों को बेहद पसंद थे। शहजादियां उनके साथ उदार थीं और वे ख्वाजासरों से ‘उन चीजों’ का आनंद लेने का अनुरोध कर सकती थीं जिनको लिखने में शर्म आती है ….. ख्वाजासरा शाही महिलाओं के लिए बहुत अनुकूल थे और उनकी जीभ और हाथ महिलाओं की जांच में एक साथ काम करते थे।’

इस टिप्पणी को शारीरिक सम्बन्धों की प्रकृति पर एक सूक्ष्म टिप्पणी के रूप में देखा जा सकता है। मनूची ने ख्वाजासरों का यह वर्णन दिल्ली के बाजारों और वेश्याओं के अड्डों में होने वाली बातों के आधार पर किया है।

अधिकांश ख्वाजासरा बड़े धार्मिक स्वभाव के थे तथा उन्हें बादशाह की ओर से धार्मिक कार्य दिए जाते थे। अकबर कालीन मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि अकबर ने ख्वाजा दौलत नजीर को इबादतों के लिए नियुक्त किया गया। वह एक ख्वाजासरा था। उस काल के ख्वाजासरों ने मस्जिदों और दरगाहों का निर्माण करवाया। आगरा में एक ख्वाजासरा द्वारा निर्मित एक मस्जिद आज भी मौजूद है।

मुगल कालीन भारतीय समाज में ख्वाजासरों की इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति का कारण क्या था! जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो इसके पीछे कई कारण दिखाई देते हैं। उस काल में बहुत से माता-पिता निर्धनता के कारण अपने पुत्रों को गुलाम के रूप में बेच देते थे। गुलामों के सौदागर इन लड़कों के यौन अंग काटकर उन्हें ख्वाजासरा बनाते थे जिन्हें शाही हरम में ऊंचे दामों पर खरीद लिया जाता था।

बहुत से अमीर लोग अपनी काम-पिपासा बुझाने के लिए इन ख्वाजासरों को अपने घरों में रखते थे। जब तक इन ख्वाजासरों की आयु कम होती थी, वे अमीरों के बिस्तरों की शोभा बढ़ाते थे और जब उनकी आयु अधिक हो जाती थी तो उन्हें अन्य कार्यों पर लगा दिया जाता था। शाही हरम के हिंजड़े भी बूढ़े हो जाने के बाद उपेक्षित जीवन जीते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल हरम में समलैंगिकता

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मुगल हरम में समलैंगिकता

मुगल कालीन शाही हरम पर नियंत्रण रखने वाले ख्वाजासरों को उनके बाल्यकाल में शाही एवं अमीर पुरुषों के साथ यौन सम्बन्ध बनाने के लिए विवश किया जाता था जब वे वयस्क हो जाते थे तो उनमें से बहुत से ख्वाजासरों के शाही हरम की औरतों के साथ प्रेम सम्बन्ध बन जाते थे। इस कारण मुगल हरम में समलैंगिकता की प्रवृत्ति प्रचलित हो गई थी।

कहा नहीं जा सकता कि मनुष्यों में समलैंगिकता की प्रवृत्ति कितनी पुरानी है किंतु विश्व भर के देशों से प्राप्त प्राचीन शिलालेखों, गुहाचित्रों, मूर्तियों एवं पुस्तकों आदि से समलैंगिक सम्बन्धों के पुराने साक्ष्य मिलते हैं।

मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता से मिले प्रस्तर-अंकनों में समलैंगिक स्त्री-पुरुषों का अंकन मिलता है। प्राचीन यूनान में समलैंगिकता को कला, बौद्धिकता और नैतिक गुणों की तरह देखा जाता था। प्राचीन यूनान के देवताओं, होरेस और सेठ को भी ‘गे’ कहा जाता था। प्राचीन रोमन सभ्यता में भी इसे बुरा नहीं माना जाता था।

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भारत में तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के लेखक ‘महर्षि वात्सायन’ ने अपने ग्रंथ ‘कामसूत्र’ में समलैंगिकता का उल्लेख करते हुए इसे स्वास्थ्य के लिए बुरा बताया है किंतु इससे स्पष्ट हो जाता है कि उस काल के भारत में समलैंगिकता की प्रवृत्ति मौजूद थी यद्यपि उसे नैतिक एवं भौतिक दृष्टि से बुरा माना जाता था।

इजराइल से जुड़े मरुस्थल से ग्यारह हजार वर्ष पुराना एक स्टोन आर्टवर्क मिला है जिसमें दो पुरुषों को शारीरिक सम्बन्ध बनाते हुए दर्शाया गया है। 

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पहली सदी ईसा पूर्व के एक सिल्वर कप के ऊपर दो पुरुषों को सम्बन्ध बनाते हुए दिखाया गया है। एक अन्य कप पर 18वीं सदी की दो महिलाओं को सम्बन्ध बनाते हुए दिखाया गया है। इन्हें यूरोप की मशहूर कुआंरी हस्तियां कहा जाता है। आठवीं शताब्दी ईस्वी के तुर्की शासक मेहमद को ‘हेट्रोसेक्शुअल’ कहा जाता है। वह सुंदर एवं युवा पुरुषों की इच्छा रखता था। इस काल की फारसी कविताएं समलैंगिक सम्बन्धों के संदर्भों से भरी पड़ी हैं। हाफिज और सादी जैसे फारसी साहित्य के रचियता मध्ययुग में मदरसों के पाठ्यक्रम का मुख्य अंग थे।

इटली के पुनर्जागरण काल से जुड़े कई विचारक, दार्शनिक, लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता स्वयं को ‘गे’ कहते थे। वे अपने समलैंगिक सम्बन्धों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते थे। पुनर्जागरण काल का प्रसिद्ध शिल्पकार माइकल एंजेलो भी स्वयं को ‘गे’ कहता था। उसकी रचनाओं में अधिकतर ‘गे’ और ‘लेस्बियन’ सम्बन्ध दर्शाए गए हैं।

जीवों में समलैंगिकता की प्रवृत्ति पर जर्मनी के लेखक एडवर्ड कारपेंटर और फ्रांसीसी विद्वान रेफोल्विक ने महत्वपूर्ण शोधग्रंथ लिखे हैं। एक पुरुष द्वारा दूसरे पुरुष के साथ अथवा एक स्त्री का दूसरी स्त्री के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाले व्यक्ति होमोसेक्शुअल कहलाते हैं जबकि कुछ स्त्री-पुरुष विपरीत लिंगी और समलिंगी दोनों में दिलचस्पी रखते हैं, इन्हें बायोसेक्शुअल कहा जाता है।

बारहवीं शताब्दी ईस्वी में जब तुर्कों ने भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की, तभी से भारत के शाही महलों में समलैंगिकता के उदाहरण प्राप्त होने लगते हैं। तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी का एक गुलाम मलिक काफूर के नाम से जाना जाता है। वह एक सुंदर लड़का था, उसे सुल्तान के एक सेनापति द्वारा सुल्तान को भेंट किया गया था।

कुछ इतिहासकारों ने मलिक काफूर को हिंजड़ा बताया है जबकि इब्नबतूता ने लिखा है कि मलिक काफूर गुजरात के खंभात में रहने वाले धनी हिंजड़े ख्वाजा का हिन्दू गुलाम था जिसे इस्लाम में परिवर्तित करके अल्लाऊद्दीन खिलजी को प्रस्तुत किया गया था। इब्नबतूता के अनुसार इस गुलाम को 1000 दीनार में खरीदा गया था। आचार्य चतुरसेन ने लिखा है कि मलिक काफूर सुल्तान अल्लाऊद्दीन खिलजी की पुरुष-रखैल था जिसे खिलजी ने यौन सम्बन्ध बनाने के लिए खरीदा था।

जब मुगल भारत में आए तो मुगल हरम में भी समलैंगिकता की प्रवृत्ति थी। बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि वह एक लड़के से प्रेम करता था। जब उसे इस लड़के को छोड़ना पड़ा तो बाबर को बड़ी मानसिक पीड़ा हुई। अकबर कालीन भक्त कवि सैयद इब्राहिम भी अपने यौवन के प्रारम्भिक काल में एक लड़के पर आसक्त थे किंतु बाद में विरक्त होकर रसखान के नाम से भक्ति-रचनाएं लिखने लगे।

जब अकबर ने मुगल शहजादियों के विवाह करने पर रोक लगा दी तब मुगल शहजादियों में समलैंगिकता की प्रवृत्ति बढ़ी।

शाहजहाँकालीन कुछ लेखों और दस्तावेजों से न केवल दो पुरुषों के बीच अपितु महिलाओं के बीच भी प्रेम और यौन संबंधों की पुष्टि हुई है। कुछ तत्कालीन स्रोतों के अनुसार जहानआरा अपनी एक दासी से प्रेम करती थी। एक बार जब वह दासी नृत्य कर रही थी तब उसके कपड़ों में आग लग गई।

जहानआरा ने अपनी प्रिय दासी को आग की लपटों से बचाने के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दिए जिसके कारण जहानआरा बुरी तरह जल गई और मरते-मरते बची। बहुत से लोग जहानआरा बेगम पर उसके पिता शाहजहाँ के साथ अनैतिक सम्बन्ध होने का आरोप लगाते हैं।

औरंगजेब ने मुगल हरम में पनप रही अनैतिक सम्बन्धों की प्रवृत्ति को पहचाना तथा इसे दूर करने के लिए मुगल शहजादियों को विवाह करने की अनुमति प्रदान कर दी तथा मुगल हरम में पल रहे शहजादों एवं शहजादियों के आपस में विवाह करवा दिए।

अंग्रेजी वेब पोर्टल ‘डेली ओ’ पर उपलब्ध ‘लुबना इरफान’ के लेख के अनुसार दाराशिकोह के साथी सरमद नामक एक दरवेश को दाराशिकोह के साथ मृत्युदण्ड दिया गया था। सरमद एक यहूदी रब्बी युवक था जो काशन से भारत आकर दाराशिकोह की नौकरी करने लगा था।

मुल्लाओं ने सरमद पर कई आरोप लगाए जिनके अनुसार सरमद ने हजरत मुहम्मद को नकारने के लिए आधा कलमा- ‘ला इलाहा’ पढ़ा था जिसका अर्थ होता है कि कोई अल्लाह नहीं है। कुछ मौलवियों ने सरमद पर आरोप लगाया कि वह थट्टा नामक एक हिंदू युवक के प्रेम में दीवाना होकर नंगे दरवेश के रूप में रहता है।

जब औरंगजेब द्वारा गठित मौलवियों की एक समिति द्वारा इन आरोपों पर विचार किया गया तो यह पाया गया कि सार्वजनिक रूप से नंगे रहने अथवा एक पुरुष के दूसरे पुरुष से प्रेम करने के लिए उसे प्राणदण्ड नहीं दिया जा सकता किंतु हजरत मुहम्मद अथवा अल्लाह के विरुद्ध बोलने के लिए उसे प्राणदण्ड दिया जाना चाहिए।

मुगल हरम में समलैंगिकता की तरह ही ईरान के तत्कालीन सफाविद राजवंश में भी समलैंकिगकता की प्रवृत्ति विद्यमान थी। अनेक पुराने लेखों और दस्तावेजों में ईरान के शासक शाहअब्बास (ई.1588-1629) को आकर्षक खिदमतगारों के शौकीन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ख्वाजासरा जाविद खाँ

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ख्वाजासरा जाविद खाँ

ख्वाजासरा जाविद खाँ शाही महल के हिंजड़ों का मुखिया था। उसे लेकर बादशाह अहमदशाह बहादुर एवं वजीर सफदरजंग में ठन गई! इस विवाद के कारण अवध सूबा मुगल सल्तनत से स्वतंत्र हो गया।

बादशाह अहमदशाह बहादुर ने अवध के नवाब सफदरजंग को सल्तनत के मुख्य वजीर के पद पर बने रहने दिया था तथा चिनकुलीच खाँ के पुत्र मुइन-उल-मुल्क को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया था।

बादशाह ने अपनी माता ऊधम बाई उर्फ कुदसिया बेगम को पचास हजार सवारों का मनसबदार नियुक्त किया था तथा ऊधमबाई के कहने पर शाही हरम के दरोगा जाविद खाँ को नवाब बहादुर की उपाधि देकर पांच हजार सवार का मनसबदार बना दिया था।

अकबर से लेकर औरंगजेब तक के शासनकाल में पांच हजार सवार का मनसब बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं एवं उनके पुत्रों को दिया जाता था किंतु अब मुगल सल्तन वही मनसब ख्वाजासरों को बांट रही थी।

हिंजड़ों के मुखिया ख्वाजासरा जाविद खाँ पर बादशाह की इनायतों का कोई अंत नहीं था, उसे बादशाह का मीर बख्शी भी बना दिया गया। इस काल में मीर बख्शी के पास दो बड़े अधिकार होते थे, पहले अधिकार के तहत मीर बख्शी यह तय करता था कि बादशाह से कौन मिलेगा और कौन नहीं।

दूसरे अधिकार के तहत मीर बख्शी सल्तनत के समस्त खजाने का प्रभारी होता था। जाविद खाँ शाही हरम के ख्वाजासरों अर्थात् हिंजड़ों का मुख्यिा होने के साथ-साथ बादशाह की माता ऊधम बाई का प्रेमी भी था।

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एक ख्वाजासरा को मीर बख्शी जैसा बड़ा पद एवं सम्मान दिए जाने पर वजीर सफदरजंग नाराज हो गया। उसने बादशाह की माता कुदसिया बेगम पर आरोप लगाया कि वह शासन में पक्षपात कर रही है तथा अपने चहेते लोगों को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा दे रही है। इस पर जाविद खाँ ने कुदसिया बेगम का बचाव करते हुए वजीर को दबाने का प्रयास किया।

वजीर सफदरजंग ने जाविद खाँ पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इस पर कुछ तूरानी अमीर कुदसिया बेगम और जाविद खाँ के पक्ष में आ गए और उन्होंने वजीर सफदरजंग का विरोध करना आरम्भ कर दिया। वजीर सफदरजंग ने विरोध करने वाले तूरानी अमीरों को दण्डित करना आरम्भ किया। इस प्रकार नए बादशाह के तख्त पर बैठते ही मुगल दरबार में अमीरों के नए गुट बन गए और वे आपस में लड़ने लगे।

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जब दोनों पक्षों में झगड़ा बढ़ गया तो ऊधम बाई ने हिंजड़ों के प्रमुख ख्वाजासरा जाविद खाँ का बचाव करते हुए जाविद खाँ को अधिकार दिए कि वह सेना लेकर उन अमीरों और वजीरों का दमन करे जो कुदसिया बेगम तथा जाविद खाँ का विरोध कर रहे हैं। ई.1749 में ख्वाजासरा जाविद खाँ ने वजीर सफदरजंग की हत्या करने का षड़यंत्र रचा किंतु सफदरजंग इस षड़यंत्र में बच गया।  ईस्वी 1750 में शाही सेना का एक सेनापति सलाबत खाँ 18 हजार सैनिकों का मुखिया था। उसे मारवाड़ में राठौड़ों का दमन करने के लिए भेजा गया था किंतु उसे सैनिकों को वेतन देने के लिए शाही खजाने से भुगतान नहीं दिया गया।

जब काफी दिनों तक सलाबत खाँ की सेना को वेतन नहीं मिला तो सलाबत खाँ ने बादशाह के दरबार में अपील की। मुगल सेनापतियों की सेनाओं को समय पर वेतन मिले इसकी जिम्मेदारी मीर बख्शी होने के कारण जाविद खाँ की थी किंतु एक ओर तो उसने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया तथा दूसरी ओर उसने सलाबत खाँ की अपील को अपनी व्यक्तिगत शिकायत समझा और वह सलाबत खाँ से नाराज हो गया।

जाविद खाँ ने सलाबत खाँ को दिल्ली बुलाकर गिरफ्तार कर लिया। इस पर सलाबत खाँ ने अपनी सारी निजी सम्पत्ति बेच दी तथा उससे प्राप्त धन से अपनी सेना का बकाया वेतन चुका दिया और सेना भंग कर दी।

इसके बाद सलाबत खाँ ने फकीर की तरह जीवन जीने का निर्णय लिया ताकि उसे शाही हरम में हिंजड़ों के हाथों अपमानित न होना पड़े। इस घटना का दूसरी मुगल सेनाओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा और उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा।

वजीर सफदरजंग ने मीर बख्शी जाविद खाँ के विरुद्ध हो-हल्ला मचाया किंतु बादशाह ने वजीर की कोई बात नहीं सुनी। इसलिए वजीर मन ही मन बादशाह से नाराज हो गया। उन्हीं दिनों वजीर सफदरजंग ने उन अफगान अमीरों की पेंशनें बंद कर दीं जो कई वर्षों से मुगल खजाने से बिना कोई काम किए पेंशनें प्राप्त कर रहे थे।

ये लोग मीरबख्शी के पक्ष के थे। मीर बख्शी के उकसावे पर अफगान अमीरों के गुट के नेता अहमद खाँ बंगश ने अवध पर आक्रमण कर दिया। वजीर सफदरजंग अपने सूबे को बचाने के लिए सेना लेकर गया किंतु सफदरजंग युद्ध के मैदान में बुरी तरह घायल हो गया। उसकी गर्दन में बड़ा घाव हो गया था किंतु उसके प्राण बच गए।

इस पर कुदसिया बेगम ने रोहिलखण्ड के अमीरों को सफदरजंग के विरुद्ध उकसाया। जब रोहिलखण्ड के अमीरों ने अवध पर आक्रमण किया तो सफदरजंग ने जाटों एवं मराठों से भाड़े पर सैनिक सहायता प्राप्त की तथा रोहिलखण्ड में कुदसिया बेगम के पक्ष की सेना को परास्त कर दिया।

बादशाह अहमदशाह बहादुर ने वजीर सफदरजंग से अपील की कि वह तुरंत युद्ध बंद कर दे। बादशाह के आदेश से सफदरजंग ने युद्ध तो रोक दिया किंतु उसने अपनी सेना के तुर्की सरदार मुहम्मद अली जेरची को आदेश दिया कि वह इस सारे फसाद की जड़ जाविद खाँ को मार डाले। अगस्त 1752 में मुहम्मद अली जेरची ने जाविद खाँ को मार डाला।

इसके बाद सफदरगंज मुगल दरबार में पुनः शक्तिशाली बन गया। इस पर ऊधम बाई ने सफदरजंग का विरोध करने के लिए इन्तजामुद्दौला, इमादुलमुल्क, संसामुद्दौला और अकवित खाँ के सहयोग से एक नया दल बना लिया। इमादुलमुल्क इस गुट का नेता था।

कुदसिया बेगम ने जाविद खाँ के स्थान पर इंतजामुद्दौला को मीर बख्शी नियुक्त करवा दिया किंतु कुछ दिन बाद ही इंतजामुद्दौला की मृत्यु हो गई तो हैदराबाद के मरहूम शासक चिनकुलीच खाँ के पौत्र फीरोजजंग (तृतीय) को मीरबख्शी नियुक्त किया गया।

बादशाह ने उसे इमादुलमुल्क तथा अमीर-उल-उमरा की उपाधियाँ प्रदान कीं। इतिहास की तत्कालीन पुस्तकों में उसे इमादुलमुल्क के नाम से भी जाना जाता है। उसका मुख्य कार्य वजीर सफदरजंग के प्रभाव को समाप्त करके उस पर नियंत्रण स्थापित करना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इमादुलमुल्क

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इमादुलमुल्क - bharatkaitihas.com
इमादुलमुल्क

इमादुलमुल्क ने बादशाह अहमदशाह बहादुर और उसकी माँ कुदसिया बेगम को अंधा करके जेल में डाल दिया! मुगल बादशाहों को जूतियों से पीटने एवं जान से मारने का सिलसिला तो पहले से ही जारी था, अब उनकी आंखें फोड़ने का सिलसिला भी चल पड़ा।

जब मरहूम चिनकुलीच खाँ का पौत्र गाजीउद्दीन फीरोजजंग (तृतीय) अर्थात् इमादुलमुल्क मीर बख्शी बन गया तो उसने वजीर सफदरजंग के विरुद्ध नए सिरे से षड़यंत्र रचने आरम्भ किए तथा उसने हाफिज रहमत खाँ बड़ेच नामक एक अमीर की सेवाएं प्राप्त कीं।

इन दोनों ने कुदसिया बेगम तथा बादशाह अहमदशाह बहादुर का समर्थन भी प्राप्त कर लिया। जब इमादुलमुल्क के समर्थकों की संख्या काफी बढ़ गई तो इन लोगों ने एक विशाल सेना लेकर अवध के विरुद्ध अभियान करके सफदरजंग के बहुत से इलाके छीन लिए तथा उसे वजीर के पद से हटा दिया।

इस पर भरतपुर के राजा सूरजमल ने बादशाह अहमदशाह बहादुर से बात करके वजीर सफदरजंग के समस्त पुराने क्षेत्र उसे वापस लौटवा दिए तथा उसे अवध चले जाने की अनुमति प्रदान करवाई।

मीर बख्शी इमादुलमुल्क को बादशाह की यह उदारता पसंद नहीं आई और उसने बादशाह के निर्णयों की आलोचना की। इस पर बादशाह एवं इमादुलमुल्क के सम्बन्ध खराब हो गए। इमादुलमुल्क ने शाही खजाने से डेढ़ लाख दम्म एकत्रित कर लिए तथा बादशाह को लौटाने से मना कर दिया।

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यह राशि शाही सेना एवं शाही अधिकारियों में वेतन के रूप में वितरित की जानी थी। बादशाह के लिए अपने मीर बख्शी पर नियंत्रण कर पाना संभव नहीं था इसलिए बादशाह ने अवध के नवाब सफदरजंग को फिर से प्रधानमंत्री बना दिया।

इस प्रकार सफदरजंग पुनः दिल्ली लौट आया। कुछ पुस्तकों में लिखा है कि सफदरजंग ने बादशाह को 70 लाख रुपया देकर वजीर का पद पुनः प्राप्त कर लिया। सफदरजंग ने इमादुलमुल्क को शाही दरबार से हटाने के प्रयास आरम्भ कर दिए। इस पर इमादुलमुल्क विद्रोह पर उतर आया।

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इस कार्य को सफलता पूर्वक सम्पादित करने के लिए इमादुलमुल्क ने मराठों के नेता पेशवा नाना साहिब (प्रथम) के चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ से सहायता मांगी। सदाशिव राव भाऊ, मल्हार राव होलकर तथा रघुनाथ राव अपनी विशाल सेना लेकर इमादुलमुल्क की सहायता के लिए आ गए। बादशाह अहमदशाह एवं वजीर सफदरजंग भी विशाल सेना लेकर उनका मार्ग रोकने के लिए आगे बढ़े। दिल्ली के निकट सिकंदराबाद नामक स्थान पर दोनों पक्षों में युद्ध लड़ा गया।

वजीन सफदरजंग ने हाथियों पर छोटी तोपें लदवाईं तथा ऊंटों पर बंदूकची सवार नियुक्त करवाए ताकि वे युद्ध के मैदान में तेज गति से दौड़ लगा कर शत्रु पक्ष का सफाया कर सकें किंतु मराठों की युद्ध कला के सामने बादशाह अहमदशाह बहादुर तथा वजीर सफदरजंग की सेनाएं पराजित हो गईं। युद्ध में अपने पक्ष की पराजय होते हुए देखकर बादशाह युद्ध के मैदान से भाग छूटा। उसके हरम की आठ हजार औरतें सिकंदराबाद में ही छूट गईं। जब अहमदशाह बहादुर की माता कुदसिया बेगम को अपने बेटे के दिल्ली भाग जाने का समाचार मिला तो वह भी सिकंदराबाद का शिविर छोड़कर दिल्ली की ओर रवाना हो गई।

वजीर सफदरजंग को चाहिए था कि वह बादशाह तथा उसके परिवार की रक्षा के लिए उनके साथ दिल्ली तक जाता किंतु सफदरजंग अपने सूबे अवध को चला गया।

मराठों ने तेजी से कार्यवाही करते हुए बादशाह के हरम को अपने कब्जे में ले लिया जिसमें आठ हजार औरतें थीं। इन सब औरतों को बंदी बना लिया गया। शाही हरम की बेगमों एवं शहजादियों को भी पकड़ लिया गया और बुरी तरह अपमानित किया गया। इस युद्ध के बाद मुगल बादशाह ने मराठों के विरुद्ध कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा।

जब मीर बख्शी इमादुलमुल्क को ज्ञात हुआ कि बादशाह अहमदशाह बहादुर, वजीर सफदरजंग तथा राजमाता कुदसिया बेगम युद्ध के मैदान से भाग गए हैं तो इमादुलमुल्क भी दिल्ली के लिए रवाना हो गया।

ई.1754 में इमादुलमुल्क ने लाल किले में प्रवेश करके लाल किले पर अधिकार कर लिया तथा अकिबत खाँ को बादशाह अहमदशाह को गिरफ्तार करने के लिए भेजा। अकिबत खाँ ने बादशाह तथा उसकी माता को बंदी बना लिया। इमादुलमुल्क ने उन दोनों की आंखें फुड़वा दीं तथा उन्हें जेल में डाल दिया। माँ-बेटों ने अपना शेष जीवन इसी प्रकार व्यतीत किया। जनवरी 1775 में अहमदशाह बहादुर की मृत्यु हो गई। काल के प्रवाह ने ऊधम बाई को भी नहीं छोड़ा और वह भी एक दिन इस असार संसार से चल बसी।

जब वजीर सफदरजंग को बादशाह तथा उसकी माता को बंदी बनाए जाने तथा आंखें फोड़े जाने के समाचार मिले तो वह बीमार पड़ गया और उसी दुःख में मृत्यु को प्राप्त हुआ। दिल्ली का लाल किला अपने एक और बादशाह की ऐसी दुर्दशा होते हुए देखकर दुःख और वितृष्णा से सिहर उठा।

ई.1754 में बादशाह अहमदशाह बहादुर को अंधा करके जेल में डाले जाने की घटना ने दिल्ली के लाल किले को एक बार फिर से उन्हीं खौफनाक दिनों की याद दिला दी जब ई.1713 में फर्रूखसियर ने बादशाह जहांदारशाह को तख्त से उतारकर किले की काल कोठरियों में बंद करके उसकी हत्या करवा दी थी।

यही इतिहास तब भी दोहराया गया था जब ई.1719 में सैयद बंधुओं के आदेश से फर्रूखसियर को तख्ते-ताउस से उतार कर जूतियों से पीटते हुए घसीटा गया था और अंधा करके कोठरी में डाल दिया गया था।

उसी वर्ष सैयद बंधुओं ने बादशाह रफीउद्दरजात को और उसके कुछ माह बाद बादशाह रफउद्दाौला को रहस्यमय तरीकों से काल के गाल में पहुंचा दिया था। मुगलिया राजनीति की चौसर पर बादशाह और शहजादे एक-एक करके मारे जा रहे थे किंतु लाल किला अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाने के अतिरिक्त और कुछ करने की स्थिति में नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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