Sunday, June 16, 2024
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125. कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे, सिवाए इसके कि मुर्दों को ज़िंदा करें और दोबारा क़त्ल करें!

ईस्वी 1739 में फारस के शाह नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। वह हिंदुकुश पर्वत को पार करके खैबर दर्रे के रास्ते भारत में प्रविष्ट हुआ। जब बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला को बताया गया कि नादिर शाह की फौजें हिन्दुकुश पर्वत को पार करके भारत में घुस आई हैं तो मुहम्मदशाह ने जवाब दिया-

‘हनूज़ दिल्ली दूर अस्त!’

अर्थात्- अभी दिल्ली बहुत दूर है। अभी से चिंता करने की क्या आवश्यकता है!

नादिरशाह ने सबसे पहले पेशावर के सूबेदार पर आक्रमण किया। पेशवार का सूबेदार आसानी से परास्त हो गया। इसके बाद नादिरशाह पंजाब की तरफ बढ़ा। इस समय चिनकुलीच खाँ हैदराबाद में बैठा था और अवध का नवाब सआदत खाँ बादशाह से नाराज चल रहा था। जब सआदत खाँ को नादिरशाह के भारत आक्रमण की जानकारी हुई तो उसने अपने संदेशवाहक नादिरशाह के पास भिजवाए तथा उससे कहलवाया कि यदि नादिरशाह दिल्ली पर आक्रमण करेगा तो सआदत खाँ नादिरशाह को पांच करोड़ रुपए देगा।

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यह वही सआदत खाँ था जिसने बादशाह मुहम्मदशाह को झूठी खबर भेजी थी कि उसने मराठों को नर्बदा के उस पार खदेड़ दिया है और उसका झूठ पकड़े जाने पर बादशाह मुहम्मदशाह ने उसे बहुत अपमानित किया था। अब सआदत खाँ अपने उस अपमान का बदला नादिरशाह के माध्यम से लेना चाहता था।

कांधार तथा लाहौर को जीतने के बाद नादिरशाह ईस्वी 1739 की गर्मियों में करनाल तक आ पहुंचा। करनाल में बादशाह मुहम्मदशाह के सेनापति मीरबख्शी खाने दौरां ने नादिरशाह का मार्ग रोका।

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मुगल सैनिक लश्कर अत्यंत विशाल था जिसका बड़ा हिस्सा बावर्चियों, गवैयों, रक्कासाओं, कुलियों, नाइयों, धोबियों, श्रमिकों, खजांचियों और विभिन्न प्रकार के कर्मचारियों से बना था किंतु लड़ाका फौज भी एक लाख से अधिक थी। उसके मुक़ाबले ईरानी फौज में केवल 55 हज़ार सैनिक थे। यदि कोई कुशल सेनापति मुगलों की सेना का नेतृत्व करता तो नादिरशाह की सारी हेकड़ी निकल जाती किंतु जिस बादशाह को औरतों के कपड़े पहनने और अपने ही नंगे चित्र बनाने से फुर्सत न हो, उस बादशाह की सेना का नेतृत्व करने के लिए कोई योग्य सेनापति कहाँ से आता!

यही कारण था कि एक लाख सैनिकों वाली सेना करनाल के मैदान में तीन घंटे से अधिक नहीं टिक सकी। मुगलों का प्रधान सेनापति मीर बख्शी खाने दौरां, अनेक प्रमुख अमीर तथा बारह हजार मुगल सैनिक युद्ध क्षेत्र में ही मारे गए। नादिरशाह की सेना ने युद्ध के मैदान से भागते हुए मुगल सैनिकों का बेरहमी से कत्ल किया। मुगल सेना के बावर्चियों, गवैयों, रक्कासाओं, कुलियों, नाइयों, धोबियों, श्रमिकों, खजांचियों को भी मार दिया गया!

विजेता नादिरशाह करनाल से दिल्ली के लिए चल पड़ा। कुछ दिन बाद नादिरशाह ने दिल्ली में प्रवेश किया। लाल किला प्रतिरोध करने की क्षमता खो चुका था। इसलिए मुहम्मदशाह ने नादिरशाह का लाल किले के दरवाजे पर खड़े होकर स्वागत किया तथा उसे दीवाने खास में ले जाकर अतिथि की तरह रखा।

अगले दिन इद-उल-जुहा थी। मुहम्मदशाह ने नादिरशाह के समक्ष उपस्थित होकर उसे ईद की मुबारकबाद दी। इस अवसर पर बड़ा भारी जश्न किया गया। नादिरशाह ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित कर दिया। दिल्ली की मस्जिदों में नादिर शाह के नाम का खुत्बा पढ़ा गया और टकसालों में उसके नाम के सिक्के ढाले जाने लगे।

मुहम्मदशाह को आशा थी कि नादिरशाह कुछ धन लेकर वापस ईरान लौट जाएगा। इसलिए उसने नादिरशाह के साथ बहुत सम्मानपूर्ण व्यवहार किया। दोनों बादशाह शाम के समय लाल किले की बारादरियों में एक साथ बैठकर महफिल सजाते। शराब के दौर चलते, शायर लोग बढ़-चढ़ कर शायरी सुनाते, रक्कासाएं नृत्य करतीं और शाम ढलते-ढलते ईरानी अमीर लाल किले की वेश्याओं को लेकर पड़ जाते।

लाल किले को देखकर ऐसा लगता ही नहीं था कि यह वही किला है जिसके बारह हजार सैनिक अपने प्रधान सेनापति सहित कुछ दिन पहले ही कत्ल किए गए हैं। हजारों सैनिकों के परिवार अपने पुत्रों की मौत पर मातम मना रहे थे और लाल किला अपनी रंगीनियों में डूबा हुआ था।

कुछ दिन तक इसी तरह चलता रहा किंतु एक दिन अचानक सब-कुछ बदल गया। किसी ने दिल्ली में अफ़वाह फैला दी कि एक तवायफ़ ने नादिरशाह का क़त्ल कर दिया है। इस अफवाह के फैलते ही दिल्ली के लोग अपने घरों से निकल आए और उन्होंने दिल्ली की गलियों में तैनात ईरानी सैनिकों का क़त्ल करना आरम्भ कर दिया। जब यह सूचना नादिरशाह को दी गई तो उसने दिल्ली को दण्डित करने का निर्णय लिया।

आधुनिक काल के एक पाकिस्तानी व्यंग्य लेखक ‘शफ़ीक-उर-रहमान’ ने अपनी पुस्तक ‘तुजुक-ए-नादरी’ में लिखा है- ‘सूरज की किरणें अभी-अभी पूर्वी आसमान में फूटी ही थीं कि नादिरशाह दुर्रानी अपने घोड़े पर सवार लाल किले से निकल आया। उसका बदन ज़र्रा-बक़्तर से ढका हुआ, सर पर लोहे का कवच और कमर पर तलवार बंधी हुई थी। उसके सैनिक कमांडर और जनरल उनके साथ थे। उसका रुख आधा मील दूर चांदनी चौक में मौजूद रोशनउद्दौला मस्जिद की ओर था। मस्जिद के बुलंद सहन में खड़े हो कर नादिरशाह ने तलवार म्यान से बाहर निकाली। यह नादिरशाह के सिपाहियों के लिए कत्ल-ए-आम आरम्भ करने का संकेत था। प्रातः नौ बजे क़त्ल-ए-आम आरम्भ हुआ। कज़लबाश सिपाहियों ने घर-घर जाकर जो मिला उसे मारना आरम्भ कर दिया। दिल्ली की गलियों में इतना खून बहा कि खून नालियों के ऊपर से बहने लगा। लाहौरी दरवाज़ा, फ़ैज़ बाज़ार, काबुली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, हौज़ क़ाज़ी और जौहरी बाज़ार के घने इलाक़े लाशों से पट गए।’

हज़ारों औरतों का बलात्कार किया गया, सैकड़ों औरतों ने कुओं में कूद कर अपनी जान दे दी। कई लोगों ने ख़ुद अपने घरों की स्त्रियों और बच्चियों को मार दिया ताकि वे ईरानी सिपाहियों के हाथों में न पड़ जाएं। तत्कालीन ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार कुछ ही घण्टों में तीस हज़ार नागरिकों को तलवार के घाट उतार दिया गया। अंततः बादशाह मुहम्मदशाह ने अपने प्रधानमंत्री को नादिर शाह के पास भेजा।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नंगे पांव और नंगे सिर नादिरशाह के सामने पेश हुआ और उसने नादिरशाह के समक्ष यह शेर पढ़ा-

‘दीगर नमाज़दा कसी ता बा तेग़ नाज़ कशी।

मगर कह ज़िंदा कनी मुर्दा रा व बाज़ क़शी’

अर्थात्- और कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे। सिवाए इसके कि मुर्दों को ज़िंदा करें और दोबारा क़त्ल करें।

नादिरशाह को मुहम्मदशाह के प्रधानमंत्री पर दया आ गई। उसने अपनी तलवार दोबारा म्यान में डाल ली। इसके बाद कत्लेआम रुक गया। नादिरशाह के सिपाहियों ने दिल्ली के लाल किले में रहने वाली बेगमों, शहजादियों और बड़े-बड़े अमीरों की स्त्रियों का शील हरण किया। अंत में मुहम्मदशाह ने नादिरशाह को 70 करोड़ रुपये नगद देकर उसके सैनिकों द्वारा किया जा रहा विनाश रुकवाया।

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