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जीनत महल

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जीनत महल

बहादुरशाह जफर की ढेर सारी बेगमें थीं जिनमें जीनत महल और ताज महल बेहद खूबसूरत थीं। बादशाह ने अपना मन बहलाने के लिए बेगमों के अतिरिक्त कुछ लौण्डियाएं भी रखी हुई थीं जिनके लिए उसने अपने हरम में चांदी के पांच पलंग बिछवा रखे थे।

हॉडसन ने दिल्ली के खूनी दरवाजे के निकट बादशाह बहादुरशाह जफर के दो पुत्रों एवं एक पौत्र को नंगा करके गोली मार दी तथा उनके शव कोतवाली के सामने फिंकवा दिए। सभी अंग्रेज सिपाही चाहते थे कि वे बादशाह तथा शहजादे को अपनी आंखों से देखें जिनके खिलाफ उन्हें चार महीने की लम्बी और रक्तरंजित लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इसलिए सभी अंग्रेज सिपाहियों को कतार में लगकर उन शवों को देखने की इच्छा पूरी करनी पड़ी।

कम्पनी सरकार के अंग्रेज सैन्य अधिकारी फ्रेड मेसी ने लिखा है- ‘मैंने उन शवों को नंगा और अकड़ा पड़े हुए देखा। उन्हें देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई क्योंकि मुझे उनके अपराधों के बारे में कोई संदेह नहीं था। मुझे विश्वास है कि बादशाह उनके हाथों में केवल एक कठपुतली की हैसियत रखता था।’

बादशाह के पहरे पर नियुक्त चार्ल्स ग्रिफ्थ नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने इन शहजादों की हत्या करने के लिए विलियम होडसन की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि हॉडसन ने संसार को उन बदमाशों से मुक्त कर दिया। दिल्ली की पूरी सेना इस काम में होडसन के साथ है।

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इस सम्बन्ध में इंग्लैण्ड के भावुक लोगों की अपेक्षा भारत के अंग्रेज ही उचित निर्णय कर सकते हैं। मैंने उन शवों को उसी दोपहर में देखा था। मैने और जिन लोगों ने भी उनके निर्जीव शवों को देखा, किसी के हृदय में भी उन बदमाशों के लिए किंचित् भी दया या खेद नहीं था। उन्हें अपने अपराधों का सर्वथा उचित दण्ड मिला था। तीन दिन तक वे शव वहाँ पड़े रहे और फिर उन्हें बड़ी बेइज्जती के साथ गुमनाम कब्रों में दफना दिया गया।

शहजादों के शवों को देखने के बाद बहुत से उत्सुक अंग्रेज सिपाहियों की टोलियां लाल किले में पहुंचने लगीं जो कम्पनी सरकार के बंदी बादशाह को अपनी आखों से देखना चाहते थे। बादशाह बड़ी दयनीय अवस्था में अपनी बेगम के महल में बैठा था- पिंजरे में बंद किसी जानवर की तरह।

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एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा है- ‘पाठकों के मन में बादशाह की यह छवि पिंजरे में बंद जानवर की तरह इसलिए भी लगती थी क्योंकि उसी सहन में जीनत महल का एक पालतू शेर भी बंधा हुआ था।’ जिस जेलर ने बादशाह तथा जीनत महल को बंदी बना रखा था, उसने 24 सितम्बर 1857 को उच्च अधिकारियों को एक पत्र लिखा कि इस शेर को यहाँ से हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि उसे भोजन देने वाला कोई नहीं है। या फिर उसे किसी हिंदुस्तानी को बेचकर धन कमाना चाहिए। यदि दोनों में से कोई काम संभव नहीं हो तो इस शेर को गोली मार देनी चाहिए।

ह्यू चिचेस्टर नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने अपने पिता के नाम दिल्ली से लंदन भेजे गए एक पत्र में लिखा- ‘मैंने उसे सूअर बादशाह को देखा, वह बहुत बूढ़ा है और ऐसे दिखता है जैसे कोई नौकर हो। पहले हमें मस्जिद के अंदर जाने या बादशाह से मिलने के लिए जूते उतारने पड़ते थे किंतु अब हमने यह सब छोड़ दिया है।’ कुछ और अधिकारियों ने अपने घरवालों को लिखा कि- ‘उन्होंने बादशाह से बुरी तरह बेइज्जती के साथ व्यवहार किया और उसे खड़े होकर सलाम करने के लिए विवश किया।’

एक अंग्रेज ने शेखी बघारी कि- ‘मैंने बादशाह की दाढ़ी नौंच ली।’

इन पत्रों से पता चलता है कि बादशाह के विरुद्ध अंग्रेज सिपाहियों की घृणा का पार नहीं था।

22 सितम्बर 1857 की रात को दिल्ली के नए कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स तथा उसकी पत्नी मैटिल्डा ने बादशाह से भेंट की। उस समय चार्ल्स ग्रिफ्थ बादशाह के पहरे पर था, उसने लिखा है-

‘बादशाह बरामदे में एक मामूली देसी चारपाई पर बिछे एक गद्दे पर पालथी मारे बैठा था। वह अजीम मुगल नस्ल का अंतिम प्रतिनिधि था। देखने में उसमें कोई विशेष बात नहीं थी। उसकी लम्बी सफेद दाढ़ी उसकी कमर की पेटी तक लटकती थी। वह सफेद रंग के कपड़े और सफेद रंग की एक तिकोनी टोपी पहने हुए था।

उसके पीछे दो खिदमतागर खड़े थे जो मोरछल हिला रहे थे जो कि बादशाहत की निशानी थी। यह उस व्यक्ति के लिए एक दयनीय नाटक था। जिसे हर शाही अधिकार से वंचित कर दिया गया था और जो अपने शत्रुओं के हाथों बंदी बनाया जा चुका था। उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। वह दिन-रात खामोशी से धरती की तरफ आंख गढ़ाए बैठा रहता था।’

मैटिल्डा साण्डर्स ने लिखा है- ‘जब चार्ल्स तथा मैटिल्डा ने बादशाह को बताया कि उसके दो पुत्रों एवं एक पोते को गोली मार दी गई है तो बादशाह ने इस समाचार पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी किंतु जब पर्दे के पीछे खड़ी जीनत महल ने यह समाचार सुना तो वह बड़ी प्रसन्न हुई और उसने कहा कि बादशाह के बड़े बेटे की मौत की मुझे बेहद खुशी है क्योंकि अब मेरे बेटे जवांबख्त के तख्त पर बैठने का रास्ता साफ हो गया है।

कुछ लोग इसे ईमानदारी भी कह सकते हैं किंतु ख्वाबों में रहने वाली उस बेचारी औरत को यह ज्ञान नहीं था कि उसके पुत्र को इस संसार में कोई तख्त नहीं मिलेगा, जैसा कि उसे शीघ्र ही पता लगने वाला था।’

बादशाह तथा जीनत महल से मिलने के बाद मैटिल्डा साण्डर्स ताज बेगम से मिलने गई जो अपनी पुरानी विरोधी जीनत महल से दूर एक कमरे में रखी गई थी। मैटिल्डा ने अपनी डायरी में लिखा है- ‘हम लोग एक और बेगम से मिलने गए जो अपने जमाने में बहुत खूबसूरत मानी जाती थीं। हमने उनको अत्यंत शोकग्रस्त अवस्था में पाया। उनके कंधे और सिर काली मलमल के दुपट्टे से ढके हुए थे। उनकी माँ और भाई दोनों गदर के दौरान फैले हैजे से मर गए थे।’

लॉर्ड एल्फिंस्टन और जॉन लॉरेन्स ने लिखा है- ‘दिल्ली का घेरा उठा लिए जाने के बाद हमारी सेनाओं ने क्रूरता का जो प्रदर्शन किया और अत्याचार किए, उन्हें देखकर वास्तव में दिल दहलने लगता है। शत्रु-मित्र में कोई भेद नहीं करते हुए प्रचण्ड प्रतिशोध की अग्नि दहका दी गई। लूटमार करने में हमारी सेनाओं ने नादिरशाह को भी पीछे छोड़ दिया। जनरल आउटरम तो सम्पूर्ण दिल्ली को ही जलाने को कह रहा था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली में कत्लेआम

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दिल्ली में कत्लेआम

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गोरे सिपाहियों ने दिल्ली में जो कत्लेआम मचाया, उसे देखकर तैमूर लंग की वीभत्स यादें फिर से जीवित हो उठीं।

जिस दिन हॉडसन ने बहादुरशाह जफर के तीन शहजादों को गोली मारी, उसी दिन अर्थात् 21 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर फिर से कम्पनी सरकार का अधिकार हो जाने की घोषणा की। उसके दो दिन बाद अर्थात् 23 सितम्बर को ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन मर गया।

दिल्ली पर अधिकार करने में कम्पनी सरकार के 3 हजार 817 सैनिक मृत्यु को प्राप्त हुए जिनमें से 1 हजार 677 भारतीय सिपाही एवं 1 हजार 360 अंग्रेज सिपाही सम्मिलित थे। इस दौरान कम्पनी सरकार के लगभग पांच हजार सैनिक घायल हुए।

यह कहना असंभव है कि इस क्रांति में दिल्ली नगर में कितने क्रांतिकारी सैनिक शहीद हुए किंतु इतिहासकारों का अनुमान है कि इस दौरान कम से कम 5 हजार क्रांतिकारी सैनिकों ने अपने देश को अंग्रेजों से मुक्त करवाने की लालसा में अपने प्राण न्यौछावर किए। घायलों और गायब हो गए सैनिकों का कोई अनुमान या आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस दौरान दिल्ली के कितने नागरिकों को अपने जीवन गंवाने पड़े, उनका कोई हिसाब नहीं है किंतु यह तय है कि दिल्ली के हजारों नागरिकों को कम्पनी सरकार के सैनिकों ने, सैंकड़ों नागरिकों को क्रांतिकारी सैनिकों ने तथा सैंकड़ों नागरिकों को गुण्डों एवं उपद्रवियों ने मार डाला। सैंकड़ों निरीह नागरिक दोनों तरफ के सिपाहियों की बीच हुई गोलीबारी एवं तोप के गोालों से मारे गए।

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1857 की क्रांति के समय दिल्ली की जनसंख्या 1 लाख 52 हजार थी। अँग्रेज सेनाओं ने पांच दिन के संघर्ष के बाद दिल्ली पर अधिकार करके हजारों सैनिकों, जन-साधारण एवं निर्दोष व्यक्तियों का कत्लेआम किया। यह ठीक वैसा ही था जैसा किसी समय तैमूर लंग अथवा नादिरशाह ने किया था।

इस कत्लेआम की तुलना सितम्बर 1398 में तैमूर लंग द्वारा, ईस्वी 1739 में नादिरशाह द्वारा तथा ई.1761 में अहमदशाह अब्दाली द्वारा दिल्ली में करवाये गये कत्ले आमों से की जा सकती है। ई.1857 में तीन दिन तक चले कत्लेआम में दिल्ली के हजारों लोगों को मारा गया। जफरनामा लिखता है कि लोगों के सिर काट कर उनके ऊँचे ढेर लगा दिये गये और उनके धड़ हिंसक पशु-पक्षियों के लिये छोड़ दिये गये…….।

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यद्यपि क्रांतिकारी सैनिकों ने भी अँग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की हत्याएँ की थीं किन्तु उन्होंने ये हत्याएँ विप्लव के समय में की थीं जबकि अँग्रेजों ने दिल्ली के निर्दोष नागरिकों का रक्तपात, विद्रोह की समाप्ति के बाद आरम्भ किया था। भारतीय सैनिकों ने उन अँग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की हत्याएं कीं जो भारतीयों पर अमानवीय ढंग से शासन तथा अत्याचार कर रहे थे किंतु अँग्रेजों ने केवल विद्रोही सैनिकों का ही नहीं अपितु निर्दोष नागरिकों का भी हजारों की संख्या में कत्ल किया। इन नागरिकों का विप्लव से दूर-दूर तक सम्बन्ध नहीं था। दिल्ली की लूट और विनाश के सम्बन्ध में टाइम्स पत्र के एक संवाददाता ने लिखा है- ‘शाहजहाँ के शहर में नादिरशाह के कत्लेआम के बाद ऐसा दृश्य नहीं देखा गया था।’

इस समय अंग्रेज लगभग पूरे भारत में कत्लेआम कर रहे थे। जॉन निकल्सन तथा हर्बर्ट एड्वर्ड्स की तरह जनरल नील तथा जनरल हैवलॉक ने इलाहाबाद और बनारस के क्षेत्र में गांव-के-गांव जला दिये और खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद कर दीं। बिना मुकदमा चलाये, हजारों लोगों को मृत्यु दण्ड दिया गया।

इतिहासकार जॉन ने लिखा है- ‘तीन माह तक आठ गाड़ियां सुबह से शाम तक शवों को चौराहों एवं बाजारों से हटाकर ले जाने में व्यस्त रहीं। किसी भी व्यक्ति को भागकर नहीं जाने दिया गया, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उन्हें विद्रोही दिखाई दे रहा था।

सम्भवतः वे भारतीयों को बता देना चाहते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करना सरल नहीं है। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि ये अत्याचार उन अँग्रेजों द्वारा किये गये जो अपने आपको सभ्य, प्रगतिशील और शिक्षित कहते थे और जो भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये आये थे।’

जहाँ अंग्रेज अधिकारी क्रूरता का प्रदर्शन कर रहे थे वहीं गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग उदारता का प्रदर्शन कर रहा था। अनेक अँग्रेज अधिकारियों ने लॉर्ड केनिंग की उदार नीति की बड़ी आलोचना की तथा क्रान्ति का दमन करने में पाशविक वृत्ति का परिचय देते रहे किन्तु केनिंग ने स्पष्ट घोषणा की कि-

‘जो विद्रोही सिपाही हथियार डाल देगा, उसके साथ न्याय होगा तथा हिंसा करने वालों को छोड़कर समस्त लोगों को क्षमा कर दिया जायेगा।’

इस घोषणा का व्यापक प्रभाव पड़ा। बहुत से लोगों ने हथियार डाल दिये। केनिंग की इस उदार नीति से क्रांति बहुत कम समय में समाप्त हो गई। पी. ई. राबर्ट्स ने लिखा है-

‘उसकी नम्रता न केवल नैतिक रूप से विस्मयकारी थी, वरन् राजनीतिक रूप से औचित्यपूर्ण थी।’

हालांकि लॉर्ड केनिंग की घोषणा केवल घोषणा ही बन कर रह गई। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा किसी को क्षमा नहीं किया गया। जितने अधिक भारतीयों को मारा जा सकता था, मारा गया। ताकि आने वाले दिनों में भारतवासी कोई क्रांति न कर सकें। वे अपने खेतों में चुपचाप कपास, गन्ना और नील पैदा करके इंग्लैण्ड की मिलों को पहुंचाते रहें।

दिल्ली नगर में हर ओर फांसी के तख्ते लगाए जाने लगे। दिल्ली में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जहाँ फांसी का तख्ता न लगा हो! सबसे बड़ा फंदा चांदनी चौक के बीचों-बीच था, एक बेढंगा सा लकड़ी का ढांचा जो पूरी सड़क पर अकेली चीज थी, जो नई थी और साबुत खड़ी थी!

कुछ दिन बाद 23 वर्षीय लेफ्टिीनेंट ओमैनी चांदनी चौक पर घूमने गया। उसने लौटकर अपनी डायरी में लिखा-

’19 आदमी कोतवाली के सामने एक फांसी के तख्ते पर लटके हुए थे और 9 दूसरे पर। चांदनी चौक फांसी का तमाशा देखने वाले अंग्रेजों एवं यूरोपियनों की भीड़ से भरा हुआ था जैसे फ्रांस की क्रांति के युग में पेरिस का मुख्य चौक भरा रहता था।’

स्वयं लॉर्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया को एक पत्र में लिखा-

‘बहुत से अंग्रेजों के दिलों में हिंदुस्तानियों के विरुद्ध हिंसापूर्ण घृणा भरी हुई है। उन पर एक जुनूनी बदले की भावना सवार है। यह देखकर मुझे अपनी अंग्रेज जाति पर शर्म आती है। दस लोगों में से एक भी यह नहीं सोचता कि चालीस या पचास हजार विद्रोहियों और अन्य भारतीयों को फांसी या बंदूक से मार देना गलत है।’

दिल्ली में हर बंदी को फांसी पर नहीं चढ़ाया गया, बहुतों को गोली मार दी गई। हर मुकदमे में मौत ही एकमात्र सजा थी। बादशाह बहादुरशाह जफर को गिरफ्तार किए जाने के साथ ही 1857 की क्रांति समाप्त हो गई तथा लाल किला पूरी तरह अंग्रजों के अधीन हो गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लालकिले की गंदी कोठरियाँ

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लाल किले की गंदी कोठरियाँ

लालकिले की गंदी कोठरियाँ दिल्ली में स्थित एक रहस्यमयी दुनिया थी। दिल्ली वालों को इनके बारे में कुछ कहानियां ज्ञात थीं किंतु उनकी सच्चाई के बारे में कोई नहीं जानता था। जब लाल किले की एक बड़ी सी दीवार को तोड़कर सलातीनों को मुक्त करवाया गया तो लालकिले की गंदी कोठरियाँ जनता के सामने प्रकट हो गईं।

अंग्रेज अधिकारी बहादुर शाह जफर को हुमायूँ के मकबरे के तहखाने से पकड़ने में सफल हो गए। वे बूढ़े बादशाह को फिर से लाल किले में ले आए जहाँ लाल किले की गंदी कोठरियाँ उसकी प्रतीक्षा कर रही थीं। अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को गंदी कोठरी में ठूंस दिया!

जब 20 सितम्बर 1857 की रात्रि में विलियम हॉडसन बूढ़े बादशाह और उसकी औरतों को पकड़कर लाल किले में लाया था, तब उन सबको किले में स्थित जीनत महल की हवेली में रखा गया था। इस बात पर बहुत से अंग्रेजों ने आपत्ति की कि कम्पनी के अपराधी को इस तरह ऐशो-आराम में रखा जा रहा है!

इस पर दिल्ली के कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स ने लाल किले में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों से कहा कि वे बादशाह के लिए किले के भीतर ही कोई कोठरी ढूंढें। बादशाह के साथ शाही हरम से जुड़ी हुई कुल 82 औरतों, 47 बच्चों एवं 2 ख्वाजासरों को भी रखा जाना था।

बादशाह तथा उसके खानदान को जीनत की हवेली से निकालकर उन कोठरियों में भेज दिया गया जहाँ बगावत होने से पहले सलातीन रहा करते थे। पाठकों की सुविधा के लिए बता देना उचित होगा कि बाबर से लेकर बहादुरशाह जफर के तमाम पूर्वजों एवं उनके भाइयों की औलादों को सलातीन कहा जाता था। शीघ्र ही इन कोठरियों में हैजा फैल गया जिससे कुई बेगमें और अन्य व्यक्ति मर गए।

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उच्च अंग्रेज अधिकारी तथा उनकी औरतें बादशाह तथा उसकी बेगमों से मिलने के लिए इन कोठरियों में आते थे। मिसेज कूपलैण्ड नामक एक अंग्रेज स्त्री ने लिखा है-

‘हम एक छोटे, गंदे और नीचे कमरे में दाखिल हुए। वहाँ एक नीची चारपाई पर एक दुबला सा बूढ़ा आदमी गंदे से सफेद कपड़े पहने और एक मैली रजाई ओढ़कर झुका हुआ बैठा था। हमारे आते ही उसने हुक्का अलग रख दिया और वह शख्स जिसके सामने जूते पहनकर खड़े होना एवं उसके सामने बैठ जाना भी बेअदबी समझी जाती थी, अब हमें बड़ी बेचारगी से सलाम करने लगा और कहने लगा कि उसे हमसे मिलकर बड़ा कूशी हुआ।’

एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने लिखा है- ‘बादशाह एक छोटे से कमरे में बंद हैं जहां सिर्फ एक चारपाई पड़ी है। उन्हें खाने के लिए दिन में सिर्फ दो आने मिलते हैं। सारे अफसर और सिपाही उनसे बहुत बेइज्जती का सुलूक करते हैं। उनकी बेगमात एवं शहजादियां उनके साथ कैद हैं।

वे बेचारी बदकिस्मत औरतें जिनका कोई अपराध नहीं है, वे भी उन अंग्रेज अधिकारियों एवं सिपाहियों की गंदी आंखों का निशाना बनती हैं जो जब चाहते उनके कमरे में चले जाते हैं। सबसे निचले वर्ग की औरत के लिए यह बहुत शर्म की बात है।

जब भी कोई पुरुष इन शाही बेगमों एवं शहजादियों के कमरों में आता है तो ये दीवार की तरफ मुंह फेर लेती हैं। बादशाह को देखने आने वाले अंग्रेजों में से बहुतों को इस तरह औरतों का पर्दा तोड़कर बादशाह के परिवार को अपमानित करने में बहुत मजा आता है।’

मिसेज कूपलैण्ड ने लिखा है- ‘शाही परिवार के रस्मो-रिवाज का लिहाज करना बेवकूफी है क्योंकि उन्होंने यूरोपियन लोगों की बेइज्जती करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।’

एक बार जॉन लॉरेंस ने चार्ल्स साण्डर्स से कहा- ‘वह बादशाह तथा उसके परिवार पर ज्यादा मेहरबानी न दिखाए। बादशाह या उसके खानदान का कोई भी व्यक्ति अच्छे व्यवहार का हकदार नहीं है। आजकल जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए बादशाह के साथ रियायत या नरमी बरतना बहुत बड़ी गलती होगी।’

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कुछ दिनों बाद लेफ्टिनेंट ओमेनी को यह दायित्व मिला कि वह मिर्जा जवांबख्त से पूछे कि बगावत की शुरुआत कैसे हुई थी। चूंकि जवांबख्त ने इस गदर में हिस्सा नहीं लिया था इसलिए अंग्रेजों को आशा थी कि जवांबख्त उन्हें बहुत सी ऐसी बातें बता देगा जो अंग्रेजों को अब तक पता नहीं हैं। जबकि वास्तविकता यह थी कि जवांबख्त की माँ बेगम जीनत महल ने जवांबख्त को क्रांतिकारियों से इतनी दूर रखा था कि जवांबख्त को कुछ भी पता नहीं था। इस कारण वह अंग्रेजों को कुछ भी नहीं बता पाया। इस पर अंग्रेजों ने समझा कि जवांबख्त जानबूझ कर जानकारी नहीं दे रहा है। इसलिए ओमेनी ने चतुराई से काम लेने का निर्णय लिया।

उसने शहजादे जवांबख्त को हाथी पर बैठाकर चांदनी चौक की सैर करवाई तथा उसे आश्वासन दिया कि यदि उसने बगावत करने वालों के बारे में गुप्त जानकारियां दीं तो उसका जीवन इसी प्रकार आराम से कटेगा किंतु जवांबख्त के पास कोई जानकारी थी ही नहीं। इसलिए उसे फिर से उन्हीं गंदी कोठरियों में ठूंस दिया गया। लालकिले की गंदी कोठरियाँ ही अब उनके नसीब में लिखी थीं।

जब जवांबख्त को हाथी पर बिठाए जाने का समाचार लाहौर क्रॉनिकल में प्रकाशित हुआ तो इंग्लैण्ड में लेफ्टिनेंट ओमेनी के विरुद्ध खूब जहर उगला गया कि एक अंग्रेज अधिकारी भारत के बागियों को हाथी पर बैठाकर चांदनी चौक की सैर करवा रहा है। वह जहरीले सांप के अण्डों तथा बच्चों की सेवा कर रहा है।

लाहौर क्रॉनिकल में भारतीय मुसलमानों के विरुद्ध काफी जहर उगला गया तथा इस बात की वकालात की गई कि जामा मस्जिद सहित समस्त को या तो चर्च में बदल दिया जाए या उन्हें ढहा दिया जाए।

मिसेज कूपलैंण्ड ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘मैं समझती हूँ कि यह इंग्लैण्ड का अपमान है कि अंग्रेजों के खून से भीगी हुई दिल्ली की सड़कें और दीवारें आज भी मौजूद हैं!’

जब इंग्लैण्ड में भारत में नियुक्त अंग्रेजों की आलोचनाएं होने लगीं तो एल्सबरी का भूतपूर्व सांसद हेनरी लेयर्ड बहादुरशाह जफर से मिलने दिल्ली आया। उसने लिखा है-

‘बहुत से लोगों का कहना है कि दिल्ली के बादशाह को अपराधों की पूरी सजा नहीं मिली है। मैंने दिल्ली के बादशाह को अपनी आंखों से देखा। उनके साथ जो बर्ताव किया गया है, वह इंग्लैण्ड जैसे महान राष्ट्र के लिए शोभा नहीं देता है। मैंने उस दयनीय वृद्ध मनुष्य को देखा, एक कमरे में नहीं अपितु अपने महल की की एक गंदी कोठरी में। वह एक खुरदरी खाट पर फटी हुई रजाई ओढ़े हुए पड़ा था।

उसने मुझे अपनी बाहें दिखाईं जिन पर बीमारी के कारण घाव हो गए थे तथा जिन पर मक्खियां बैठती थीं। उनके शरीर में पानी की आंशिक कमी है। उन्होंने मुझसे अत्यंत दयनीय होकर कहा कि मुझे खाने को भी पूरा नहीं मिलता। क्या यही तरीका है जो ईसाई होने के नाते हमें एक बादशाह से बरतना चाहिए? मैंने उनके हरम की औरतों को देखा जो अपने बच्चों के साथ एक कौने में दुबकी हुई थीं। मुझे बताया गया कि उन्हें रोटी खाने के लिए प्रतिदिन 16 शिलिंग मिलते हैं। क्या यह सजा काफी नहीं है, उस शख्स के लिए जिसने एक दिन तख्त पर बैठकर हुकूमत की थी?’

विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है कि लालकिले की गंदी कोठरियाँ भले ही कितनी ही गंदी क्यों न हों, शाही खानदान के हालात चाहे जितने भी खराब हों किंतु वह दिल्ली के आम नागरिकों से अच्छे थे जो इधर-उधर गांवों में या मकबरों और खण्डहरों में शरण लिए हुए थे और जंगली फलों को खाकर या गांवों में भीख मांगकर पेट भरने का असफल प्रयास कर रहे थे। ऐसे अनगिनत लोग पेट की भूख से मर गए। इतिहास की पुस्तकों में इनका उल्लेख तक नहीं हुआ।

कुछ अंग्रेजों ने अभियान चलाया कि बहादुरशाह को फांसी पर चढ़ाया जाए तथा पूरी दिल्ली को नष्ट कर दिया जाए। मेजर जनरल आटरम तो स्वयं भी चाहता था कि दिल्ली को जला दिया जाए किंतु उसका वश नहीं चल रहा था। अंग्रेजों ने मेजर जे. एफ. हैरियट को एडवोकेट जनरल नियुक्त किया ताकि वह बहादुरशाह पर मुकदमा चलाने की कार्यवाही आरम्भ कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली को दण्ड

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दिल्ली को दण्ड

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में दिल्ली के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुली बगावत की थी किंतु अब अंग्रेज दिल्ली में वापस लौट आए थे और अब बारी थी दिल्ली को दण्ड देने की।

दिल्ली को दण्ड देना आसान नहीं था क्योंकि दिल्ली के अधिकांश लोग या तो मार दिए गए या भाग गए थे। इसलिए अंग्रेजों ने एक उपाय सोचा। उन्होंने दिल्ली के खाली पड़े घरों को लूटने का काम आरम्भ किया। इस प्रकार अब उन लोगों के घर लूटे जाने थे जिन्होंने कुछ दिन पहले अंग्रेजों के घर लूटे थे या दिल्ली के सेठ साहूकारों की हवेलियों को लूटकर अपने घरों में हीरे-मोती, माणक और पुखराज छिपा लिए थे।

वे गुण्डे भी अब तक मारे जा चुके थे या दिल्ली से भाग गए थे किंतु उनके द्वारा छिपाया गया लूट का अधिकांश माल अब भी घरों के तहखानों, दीवारों, आलों, छतों एवं दुछत्तियों में छिपा हुआ था। बहुत से हीरे और आभूषण घरों के आंगन अथवा आसपास की भूमि को खोदकर उनमें छिपा दिए गए थे।

 कम्पनी सरकार ने इस माल का पता लगाने के लिए वसूली एजेंटों की नियुक्तियां कीं तथा उन्हें दिल्ली के घरों में से माल वसूल करने के लिए सिपाहियों के दस्ते दिए गए। इन एजेंटों एवं उनके सिपाहियों ने दिल्ली का एक भी घर ऐसा नहीं छोड़ा जिसकी दीवारें तोड़कर माल नहीं ढूंढा हो या धरती खोदकर सोने-चांदी के आभूषण और बर्तन नहीं निकाले हों!

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

कम्पनी सरकार के जो सिपाही कल तक बंदूकें, तोपें और गोलियां चला रहे थे, अब वे छैनी, हथौड़ी, फावड़े और गैंती चला रहे थे। बहुत से घरों के तहखानों में बूढ़े, असहाय और बीमार लोग छिपे हुए मिले, उन्हें सड़कों पर घसीट कर मारा गया ताकि वे दीवारों एवं धरती में छिपाए गए माल की जानकारी दे दें।

जिन दिनों दिल्ली को दण्ड की कार्यवाही चल रही थी, उन्हीं दिनों वसूली एजेंट म्यूटर की पत्नी ने अपनी डायरी में लिखा-

‘मेरे पति सुबह नाश्ता करने के बाद निकल जाते थे। उनके साथ कुलियों का एक दल लोहे की सलाखें, हथौड़े, और नापने के फीते लेकर चलता था। यदि किसी घर के बारे में पता चलता कि वहाँ खजाना हो सकता है, तो उसे पूरा एक दिन दिया आता और काम की शुरुआत सूक्ष्मता से घर का अध्ययन करने से होती। ऊपर की छतों और नीचे के कमरों को नापने से छिपी हुई जगह का पता चल जाता।

फिर दीवारें तोड़ी जातीं और यदि कोई चोर कमरा या ताक बना हुआ होता तो उसको ढूंढा जाता और उसमें से माल निकाल लिया जाता। ….. एक बार वे तेरह छकड़े भरकर सामान लाए जिनमें दूसरी चीजों के साथ-साथ अस्सी हजार रुपए भी थे अर्थात् आठ हजार ब्रिटिश पाउंड। एक बार और उन्हें चांदी के बर्तन, सोने के जेवर और एक हजार रुपयों का थैला मिला।’

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चार्ल्स गिफ्थ ने लिखा है- ‘कुछ ही दिनों में माल एजेंटों के कमरे हर तरह के खजाने से भर गए। जेवरात, हीरे, याकूत, जर्मरूद, मुर्गी के अण्डों के आकार के मोती, छोटे मोतियों की मालाएं, सोने के आभाूषण एवं बर्तन, बेहतरीन कारीगरी वाली सोने की जंजीरें, सोने के ठोस कड़े एवं चूड़ियां, कई-कई बार लुटती हुई अंततः अंग्रेजों के हाथों में चली आई थीं।’

ई.1857 की क्रांति के बाद जब कम्पनी सरकार की सेनाओं ने दिल्ली के क्रांतिकारी सैनिकों, शहजादों, सलातीनों तथा आम जनता को मार दिया तो कुछ ऐसे लोगों की बारी आई जिन्होंने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों का साथ दिया था। आखिर वे थे तो भारतीय ही और उनकी चमड़ी का रंग भी अंग्रेजों की चमड़ी के रंग से अलग था! बहुत से जासूसों एवं सहायकों के पास अंग्रेज अधिकारियों के हाथों से लिखे हुए प्रमाण थे कि उन्होंने संकट काल में अंग्रेजों की सहायता की थी किंतु मेजर जनरल विल्सन ने आदेश जारी किया कि किसी भी सुरक्षा पत्र को तब तक स्वीकार न किया जाए जब तक कि उस पर मेरे हस्ताक्षर नहीं हों। चार्ल्स ग्रिफ्थ ने लिखा है- ‘शासन के शत्रु और मित्र सभी को बराबर रूप से यह संकट झेलना पड़ा।’

मुंशी जीवन लाल विलियम हॉडसन के तीन प्रमुख जासूसों में से एक था, उसे बागियों ने कई बार मारने की चेष्टा की थी किंतु वह अभी तक जीवित बचा हुआ था। एक दिन उसे हॉडसन्स हॉर्स के सिक्ख सिपाहियों ने पकड़ लिया और उसे खूब अच्छी तरह से मारपीट कर उससे वह सारा माल निकलवा लिया जो उसने धरती में गाढ़ दिया था।

इलाही बख्श जिसने विलियम हॉडसन का विश्वास जीतने के लिए अपनी बेटी के पुत्र अबू बकर तक से गद्दारी करके उसे मौत के मुंह में धकेल दिया था, उसे भी अंग्रेजी सिपाहियों ने पकड़ लिया और खूब पीटा। उसके घर का सारा माल वसूली एजेंट और उसके सिपाही लूटकर ले आए। अंग्रेजों ने इलाही बख्श को ‘दिल्ली का गद्दार’ कहकर उसकी भर्त्सना की।

दिल्ली में गदर आरम्भ होने से बहुत पहले ही दिल्ली के कुछ प्रमुख लोग ईसाई बन गए थे जिनमें डॉ.चमन लाल, ताराचंद तथा रामचंद्र प्रमुख थे। डॉ. चमनलाल तो 11 मई को दिल्ली में गदर आरम्भ होने वाले दिन ही मेरठ से आए सिपाहियों द्वारा मार दिया गया था, ताराचंद का क्या हुआ, कुछ ज्ञात नहीं होता किंतु रामचंद्र अभी तक जीवित था। वह अपने घर के तहखाने में छिपा हुआ मिल गया।

वह अंग्रेजों का विश्वस्त व्यक्ति था इसलिए उसे बड़े अंग्रेज अधिकारियों ने पहचान लिया तथा रामचंद्र को वसूली एजेंट नियुक्त करके उसके घर के आगे कुछ अंग्रेज सिपाही तैनात कर दिए ताकि कोई भी व्यक्ति रामचंद्र को तंग न करे किंतु जब रात हुई तो वही अंग्रेज सिपाही रामचंद्र को पीटने लगे और उसका माल लूट कर ले गए। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा दिल्ली को भलीभांति दण्ड दिया जा रहा था।

रामचंद्र का मुख्य कार्य अंग्रेज अधिकारियों के साथ रहकर मस्जिदों, मकबरों एवं मकानों से मिलने वाले उन दस्तावेजों को पढ़ना था जो उर्दू लिपि में लिखे हुए होते थे। चूंकि रामचंद्र ईसाई था और उसे उर्दू पढ़नी आती थी इसलिए इस कार्य के लिए उससे अधिक उपयुक्त एवं विश्वसनीय व्यक्ति और कोई हो ही नहीं सकता था। यदि वे यह काम किसी हिन्दू या मुसलमान से करवाते तो उसके द्वारा झूठ बोले जाने की पूरी आशंका थी!

रामचंद्र ने अपने संस्मरणों ने लिखा है- ‘एक दिन मैं एडवर्ड कैम्पबैल के घर से अपने घर वापस आ रहा था। उसी समय एडवर्ड औमेनी अपने घोड़े पर बैठकर निकला। औमेनी ने मुझे देखते ही मुझ पर ताबड़तोड़ डण्डे बरसाए। इस पर मैंने कहा कि मैं ईसाई हूँ, तो भी उसने मुझे पीटना जारी रखा।

….. यदि मैं अंग्रेजों के हाथों मारा भी जाता तो मुझे कोई दुख नहीं होता क्योंकि स्वयं ईसा मसीह से लेकर ईसाई धर्म के हजारों संतों को पहले भी जान से मारा जा चुका था। यदि मैं भी मारा जाता तो ईसाई धर्म की बेहतर सेवा करने का अवसर प्राप्त करता।’

लोअर कोर्ट का मजिस्ट्रेट थियो मेटकाफ जो बागियों के हाथों में पड़कर मरते-मरते बचा था, उसके मन में दिल्ली के मुसलमानों की प्रति इतनी घृणा थी और उसने अपना बदला लेने के लिए दिल्ली में इतनी हिंसा की थी कि अंग्रेज स्वयं भी उसे सिरफिरा एवं विवेकहीन मानने लगे थे।

एक बार थियो मेटकाफ के बहनाई एडवर्ड कैम्पबैल को एक लुटेरे के घर से एक नक्कासीदार कुर्सी मिली जो थियो मेटकाफ के घर से लूटी गई थी। थियो मेटकाफ ने उस कुर्सी पर अपना दावा जताया किंतु कैम्पबलैल ने उसे कम्पनी सरकार के मालखाने में जमा करवा दिया तथा उसने थियो मेटकाफ की सूचित किया कि उसे वह कुर्सी कम्पनी सरकार से खरीदनी पड़ेगी।

हालांकि थियो मेटकाफ चाहता था कि उसे दिल्ली से लूटे जा रहे माल में से हिस्सा मिलना चाहिए क्योंकि उसने बागियों को कुचलने के लिए उस सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व किया था जिसने जामा मस्जिद पर चढ़ाई की थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा गालिब

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मिर्जा गालिब- bharatkaitihas.com
मिर्जा गालिब

जिन दिनों अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति हुई, उन दिना मिर्जा गालिब दिल्ली में रहते थे। उन्होंने न तो क्रांति में भाग लिया और न अंग्रेजों का साथ दिया। वे इस क्रांति से पूर्णतः निरपेक्ष रहे।

मिर्जा गालिब तथा जौक बहादुरशाह जफर के कविताई के गुरु थे। 11 मई 1857 को दिल्ली में विप्लव आरम्भ होने से लेकर 21 सितम्बर 1857 को विप्लव समाप्त होने तक गालिब ने दिल्ली नहीं छोड़ी। क्रांति समाप्त हो जाने के बाद गालिब ने लिखा है-

‘दिल्ली में न अब कोई सौदागर है न खरीदार! न कोई दुकानदार जिससे आटा खरीद सकें। धोबी, नाई और सफाई वाले सब दिल्ली से गायब हो गए थे। हमने अपने मौहल्ले की गली को पत्थरों के एक ऊंचे से ढेर से बंद कर लिया है। गली के सारे लोग पत्थरों के ढेर की आड़ में खड़े होकर पहरा देते हैं।

हमने पानी के उपयोग में बड़ी किफायत की किंतु अब घड़ों और कटोरों में पानी ख्त्म हो गया। हमें लगा कि हम भूखे और प्यासे ही मर जाएंगे। फिर एक दिन बादल आए और दिल्ली में तेज बारिश हुई। हमने अपनी चादरें तान दीं तथा उनके नीचे घड़े और बर्तन रख कर पानी भर लिया। हम प्यासे मरने से बच गए।’

गालिब के भाई को कम्पनी सरकार के सिपाहियों ने गोली मार दी किंतु शव के अंतिम स्नान के लिए न तो पानी बचा था और न शव को कब्र तक पहुंचाने के लिए आदमी बचे थे। 5 अक्टूबर 1857 को अंग्रेज सिपाही गालिब के मौहल्ले में घुस गए।

उन्होंने सबको बांध लिया ताकि उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें भी मौत की सजा दी जा सके। जब कुछ सिपाही मिर्जा गालिब को पकड़ने लगे तो उन्होंने लंदन की ब्रिटिश सरकार के भारत सचिव का अंग्रेजी में लिखा एक पत्र दिखाया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इस पर अंग्रेज सिपाही मिर्जा गालिब को पकड़कर कर्नल बर्न के पास ले गए। गालिब ने कर्नल के सामने जाने से पहले नए कपड़े पहने तथा सिर पर एक नई तुर्की टोपी लगाई और वही पत्र लेकर बर्न के समक्ष उपस्थित हुए। कर्नल ने पूछा- ‘मुसलमान हो!’

गालिब ने कहा- ‘आधा!’

कर्नल ने पूछा- ‘आधा कैसे!’

इस पर गालिब ने कहा- ‘शराब पीता हूँ लेकिर सूअर नहीं खाता।’

इस पर कर्नल हंस पड़ा। गालिब ने अपनी जेब से कागज निकालकर कर्नन बर्न को दिखाया। कर्नल ने पूछा- ‘यह क्या है?’

इस पर गालिब ने कहा- ‘मैंने मलिका विक्टोरिया की शान में एक कविता लिखकर इंग्लैण्ड भेजी थी उसके जवाब में यह खत भारत के मिनिस्टर ने मुझे भेजा था।’

इस पर कर्नल बर्न ने गालिब से पूछा- ‘यदि तुम हमारे इतने शुभचिंतक हो तो जब अंग्रेज रिज पर शरण लिए हुए थे तब तुम रिज पर क्यों नही आए?’

इस पर गालिब ने जवाब दिया- ‘मैं बहुत बूढ़ा हूँ, इस कारण नहीं आ सका किंतु आपकी फतह की दुआएं करता रहा।’

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गालिब के जवाब सुनकर कर्नल बर्न ने उन्हें जीवित छोड़ दिया किंतु गालिब जैसे भाग्यवान बहुत कम ही थे जो अंग्रेजों के हाथों में पड़कर भी जीवित बचे। गालिब का अनुमान था कि अब दिल्ली में केवल एक हजार मुसलमान थे जो धरती में खड्डे खोदकर अथवा मिट्टी की झौंपड़ियों में छिपे हुए थे। गालिब अपने मुहल्ले में जीवित बचने वालों में से अकेले थे और अब उनकी कविताएं सुनने वाला कोई नहीं था।

कुछ बड़े सेठ-साहूकारों, अमीर बनियों, दुकानदारों एवं सौदागरों ने दिल्ली के परकोटे से बाहर झौंपड़ियां एवं कच्ची दीवारें खड़ी कर लीं और उनमें रहने लगे। इस पर नवम्बर महीने में अंग्रेजों ने आदेश जारी किया कि इन झौंपड़ियों को तत्काल तोड़ दिया जाए। इस पर इन परिवारों को ये झौंपड़ियां खाली करके निकटवर्ती जंगलों में चले जाना पड़ा। बहुत सी निर्दोष और धनी परिवरों की स्त्रियां छोटे-छोटे बच्चों के साथ दिल्ली के बाहर जंगलों में छिपी हुई थीं। उनके पास खाने-पीने को कुछ नहीं था, उनके बच्चे तिल-तिल कर मर रहे थे। गालिब ने लिखा है कि बदले की आग में जल रहे इन अंग्रेजों ने इंसानियत बिल्कुल खो दी है।

एक दिन दिल्ली गजट का सब-एडीटर वैगनट्राइवर दिल्ली शहर से बाहर निकला। वह यह देखकर दंग रह गया कि दिल्ली के चारों ओर इंसान मरे पड़े थे। कुत्तों एवं जंगली जानवरों ने बहुत से इंसानों और जानवरों के शव चीर-फाड़ कर खोल दिए थे। उनकी हड्डियां चारों ओर बिखरी पड़ी थीं।

 बहुत से ऊंट, बैल तथा घोड़ों के शव धूप में सूख गए थे और उनके चमड़े उनके कंकालों से चिपक गए थे। पूरे वातावरण में मांस सड़ने की दुर्गंध फैली हुई थी।

हजारों पेड़ दिल्ली शहर से चलाई गई तोपों के गोलों से टूट गए थे, बहुत से पेड़ अधजले पड़े थे। दूर-दूर तक इन शवों के फैले हुए होने से आसपास के लोगों में महामारी फैल गई और वे बिना दवा और बिना भोजन के मरने लगे। इस पर अंग्रेजों ने आदेश जारी किया कि केवल हिन्दू परिवार लौट कर अपने घरों में आ सकते हैं। कोई भी मुसलमान बिना विशिष्ट अनुमतिपत्र लिए परकोटे के भीतर नहीं आ सकता था। उनके घरों पर निशान लगा दिए गए थे और उन्हें अपने वफादारी के सबूत देने होते थे।

कुछ मुसलमान अब भी दिल्ली के मकबरों और उनके आसपास शरण लिए हुए थे। उनमें से कुछ लोग पेड़ों पर चढ़कर दूर तक देखते रहते। यदि काई खाकी वर्दी वाला सिपाही उनकी तरफ आता हुआ दिखाई देता तो बाकी के लोग भी मकबरों से निकलकर उन पेड़ों पर चढ़ जाते।

फिर भी कुछ लोग तो नित्य ही पकड़े जा रहे थे। जो लोग किसी भी तरह से लाल किले से सम्बन्धित पाए जाते थे, उन्हें थोड़ी देर के मुकदमे का सामना करना होता था और उन्हें शीघ्र ही फांसी या गोली दे दी जाती थी।

दिल्ली से बाहर निजामुद्दीन दरगाह के आसपास कई हजार मुसलमान परिवार शरण लिए हुए थे किंतु जब उनमें महामारी फैल गई तो उनमें बहुतों को बिना गोली और बिना फांसी ही मौत आ गई!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सलातीनों की हत्या

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सलातीनों की हत्या

जब अंग्रेजों ने फिर से दिल्ली पर अधिकार किया तो वे मुगल शहजादों पर कहर बन कर टूटे। अंग्रेजों ने बहुत से शहजादों की हत्या कर दी। इसके बाद अंग्रेजों का ध्यान सलातीनों की तरफ गया तथा उन्होंने सलातीनों की हत्या करने का निर्णय लिया। अंग्रेज अधिकारियों ने शहजादों एवं सलातीनों को ढूंढ-ढूंढकर मारा!

जब दिल्ली शहर की तलाशी का काम पूरा हो गया तो दिल्ली से बाहर निकलकर शहजादों एवं सलातीनों को ढूंढा जाने लगा। अक्टूबर और नवम्बर में शहजादों और सलातीनों की तलाश तेज कर दी गई। सबसे पहले जफर के दो छोटे बेटों अठारह साल के मिर्जा बख्तावर शाह और सत्रह साल के मिर्जा मियादूं को पकड़ा गया। इन दोनों ने मेरठ के दस्ते और एलेक्जेंडर पलटन का नेतृत्व किया था। उन पर जे. एफ. हैरियेट ने मुकदमा चलाया और उनको सजा-ए-मौत दी गई।

ओमैनी ने 12 अक्टूबर को अपनी डायरी में लिखा कि जब वाटरफील्ड नामक सैनिक ने उन दोनों शहजादों को बताया कि कल तुम्हें मौत की सजा दी जाएगी तो उन दोनों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा। अगले दिन उन्हें एक बैलगाड़ी में बाहर मैदान में एक तोपचियों के दस्ते के पीछे ले जाया गया।

जब वे किले के सामने रेत के मैदान में सजा ए मौत की जगह पहुंचे तो सिपाहियों ने कतार बांध ली। उन दोनों को गाड़ी से निकाला गया और उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई और बारह राइफल वाले सिपाहियों को आदेश मिला के वे बारह हाथ के फासले पर खड़े हो जाएं।

लेकिन फायरिंग दल के गोरखा सिपाहियों ने जानबूझकर राइफल नीची करके गोली चलाई ताकि मौत आहिस्ता-आहिस्ता और तकलीफ देह हो, जब दोनों शहजादे गोली लगने से तड़पने लगे तो सिपाहियों के इंचार्ज ऑफीसर से शहजादों की तकलीफ देखी नहीं गई और उसने अपनी पिस्तौल से उन दोनों शहजादों को गोली मारकर खत्म कर दिया।

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बहादुरशाह जफर के अधिकतर बेटों और पोतों के साथ देर-सवेर यही होना था। मेजर विलियम आयरलैण्ड का कहना था कि शहजादों के पास भागने के काफी अवसर थे किंतु वे दिल्ली के आसपास के इलाकों में ही घूमते हुए पकड़े गए। कुल मिलाकर शाही परिवार के उन्तीस बेटे पकड़े गए और मार डाले गए। शाही परिवार के इतने सदस्यों का सफाया हो गया कि मिर्जा गालिब ने लाल किले का नाम किला ए मुबारक के स्थान पर किला ए नामुबारक रख दिया।

जफर के केवल दो बेटे भागने में सफल रहे। जिस समय मिर्जा बख्तावर शाह और मिर्जा मियादूं पकड़े गए थे उसके कुछ समय बाद ही मिर्जा अब्दुल्लाह और मिर्जा क्वैश को भी बंदी बना लिया गया। ये दोनों शहजादे यह सोचकर हुमायूँ के मकबरे में जाकर छिप गए थे कि यहाँ की तलाशी दो बार ली जा चुकी है और अब अंग्रेज सिपाही यहाँ नहीं आएंगे किंतु एक दिन विलियम हॉडसन, हॉडसन्स हॉर्स के सिक्ख सिपाहियों को लेकर शाही परिवार के सदस्यों एवं बागियों की खोज करता हुआ फिर से वहाँ आ पहुंचा और उसने इन दोनों शहजादों को पहचान लिया।

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उर्दू के लेखक अर्श तैमूरी ने ‘दिल्ली की जबानी बयान की रवायत’ में इन शहजादों की गिरफ्तारी का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘एक सिक्ख रिसालदार को उन नौजवान लड़कों पर तरस आ गया और उसने अंग्रेज अधिकारी की दृष्टि बचाकर उन दोनों शहजादों को भगा दिया। मिर्जा क्वैश निजामुद्दीन में अपने बहनोई के पास गया और उसे बताया कि वह हॉडसन की कैद से भाग कर आया है। इस पर उसके बहनोई ने कहा कि आप यहाँ से तुरंत भाग जाओ।’

विलियम हॉडसन ने लिखा है कि शहजादे मिर्जा क्वैश ने अपना सिर मुंडवा लिया और अपने शाही कपड़े उतार कर एक लुंगी बांध ली। वह एक फकीर का भेस बनाकर किसी तरह उदयपुर पहुंच गया। वहाँ उसे महाराणा के महल का एक मुसलमान कर्मचारी मिला जो पहले दिल्ली के लाल किले में ख्वाजासरा का काम कर चुका था। इसके बाद मिर्जा क्वैश जीवन भर इसी भेस में उदयपुर में रहा। उस ख्वाजासरा ने उदयपुर के शासक से यह कहकर मिर्जा क्वैश की तन्ख्वाह बंधवा दी कि यह फकीर यहीं रह जाएगा तथा आपकी जानो-माल के लिए दुआ करेगा।

महाराणा ने उस कर्मचारी की बात मान ली और उसकी दो रुपए प्रतिदिन की तन्खवाह बांध दी। हॉडसन ने मिर्जा क्वैश की खोज में विज्ञापन छपवाए जिससे कुछ लोगों को उस फकीर पर संदेह हो गया और उसकी जानकारी हॉडसन तक पहुंच गई किंतु जब हॉडसन के सिपाही मिर्जा क्वैश की खोज में उदयपुर आए तो क्वैश कुछ समय के लिए वहाँ से गायब हो गया।

शहजादा मिर्जा अब्दुल्लाह टोंक रियासत में भाग गया। वहाँ अंग्रेजों के विश्वस्त मुस्लिम नवाब का शासन था फिर भी मिर्जा अब्दुल्लाह भेस बदलकर अपनी पहचान छिपाने में सफल रहा। शहजादों के पकड़े जाने पर उन्हें दी जाने वाली सजा निश्चित नहीं थी। प्रत्येक शहजादे अथवा शाही परवार के सदस्य पर अगल-अलग मुकदमा चलता था और उन्हें अलग-अलग सजा सुनाई जाती थी। जिनके बारे में किंचित् भी संदेह होता था कि ये क्रांति से सम्बद्ध रहे थे, उन्हें तुरंत मौत की सजा दे दी जाती थी। उनमें से बहुतों का इस क्रांति से कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी उनका इतना दोष अवश्य था कि वे बाबर के खानदान में पैदा हुए थे!

अब तक बाबर तथा उसके बेटे-पोते ही भारत के लोगों पर अत्याचार करते आए थे किंतु यह पहली बार था जब बाबर के खून को बाबर की ही राजधानी में जी भर कर दण्डित किया जा रहा था। कुछ शहजादों को फांसी दी गई और कुछ को अंडमान द्वीप की जेल में काला पानी भुगतने के लिए भेज दिया गया। कुछ को हिन्दुस्तान में ही देश-निकाला दे दिया गया। अर्थात् वे भारत में कहीं भी रह सकते थे किंतु अपने जीवन में फिर कभी दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकते थे। किसी भी शहजादे या सलातीन को दिल्ली में रहने की अनुमति नहीं दी गई चाहे उसने अपने निर्दोष होने के कितने ही प्रमाण क्यों न प्रस्तुत किए हों! बड़ी संख्या में सलातीनों की हत्या की गई।

हालांकि अंग्रेजों के गुप्तचर विभाग के अधिकारियों का मानना था कि कम से कम पांच सलातीन भेस बदल कर कुछ दिन बाद ही दिल्ली में लौट आए और दिल्ली की जनता के बीच छिपकर रहने लगे। उन्हें पहचाना नहीं जा सका। इस कारण इन सलातीनों की हत्या नहीं की जा सकी!

शाही परिवार के उन सदस्यों को जिनका कि कोई दोष नहीं था, आगरा, कानपुर और इलाहाबाद की जेलों में भेज दिया गया। बहुत से शहजादों को बर्मा के मौलामेन नामक शहर की जेलों में भेज दिया गया। इनमें एक शहजादा या सलातीन तो निरा बालक ही था और एक शहजादा या सलातीन नितांत बूढ़ा था।

एक सलातीन विकलांग भी था किंतु इनमें से किसी पर दया नहीं की गई। शाही परिवार के बहुत से सदस्य आराम की जिंदगी जीने के अभ्यस्त थे। इसलिए उनमें से बहुत से सदस्य साल दो साल में ही जेलों में मर गए। पंद्रह शहजादे तो केवल 18 महीनों की अवधि में ही मर चुके थे।

वर्ष 1859 में दिल्ली के तत्कालीन कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स ने इन शहजादों एवं सलातीनों के बारे में एक जांच रिपोर्ट तैयार की जिसमें उसने लिखा कि अधिकांश शहजादों और सलातीनों का कोई दोष नहीं था किंतु बहुत से अंग्रेजों का मानना था कि उन्हें इसलिए कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी कि वे तैमूरी खानदान के थे।

साण्डर्स की जांच रिपोर्ट में यह भी पता चला कि जिन शहजादों या सलातीनों को कोर्ट ने बर्मा भेजने के आदेश दिए थे, उन्हें कुछ जालिम अंग्रेज अधिकारियों ने अण्डमान भेज दिया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रानी विक्टोरिया की प्रजा

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रानी विक्टोरिया की प्रजा

शहजादों और सलातीनों के बाद बहादुरशाह जफर के दरबार के समस्त रईसों और उमरावों पर मुकदमे चलाकर उन्हें भी फांसी पर चढ़ा दिया गया। सबसे अंत में बहादुरशाह जफर के स्वयं के मुकदमे की बारी आई। बहादुरशाह जफर ने कहा कि मैं रानी विक्टोरिया की प्रजा नहीं हूँ!

बादशाह पर मुकदमा चलाने से पहले लाहौर से अनुवादकों का एक दल दिल्ली बुलवाया गया जिसने बहादुरशाह जफर के महल एवं कार्यालय से मिले उन कागजों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया जो उर्दू एवं फारसी भाषाओं एवं अरबी लिपि में लिखे हुए थे। अंग्रेज अधिकारियों को इन कागजों से गुप्त पत्राचार मिलने की आशा थी।

बादशाह पर बगावत, कत्ल और गद्दारी के आरोप लगाए गए। बादशाह तथा उसके पक्षधरों का कहना था कि कम्पनी सरकार बादशाह पर मुकदमा नहीं चला सकती क्योंकि बादशाह रानी विक्टोरिया की प्रजा नहीं है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की का कहना था कि चूंकि बादशाह कम्पनी सरकार से पेंशन प्राप्त करता है, इसलिए कम्पनी सरकार को बादशाह पर मुकदमा चलाने का पूरा अधिकार है।

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इस पर बादशाह एवं उसके पक्ष के लोगों का तर्क था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी को यह स्मरण रखना चाहिए कि भारत में कम्पनी की कानूनी हैसियत क्या है? उसे ई.1599 में रानी विक्टोरिया ने भारत में व्यापार करने की अनुमति दी थी न कि भारत पर शासन करने की! ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भी रानी के इसी आदेश पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई थी। ब्रिटेन की संसद ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत पर शासन करने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिए कम्पनी सरकार भारत के बादशाह के विरुद्ध मुकदमा कैसे चला सकती है?

बहादुरशाह एवं उसके पक्ष के लोगों का यह भी तर्क था कि मुगल बादशाह शाह आलम (द्वितीय) ने ई.1765 के बक्सर युद्ध के बाद हुई इलाहाबाद की संधि के अंतर्गत कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अर्थात् राजस्व वसूलने का अधिकार दिया था। इसके बदले में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शाहआलम को वार्षिक पेंशन दी थी। मुगल बादशाह ने पूरी मुगल सल्तनत पर कम्पनी को हुकूमत करने की अनुमति कभी नहीं दी!

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ई.1803 में जब अंग्रेजों ने मराठों को भगाकर दिल्ली पर अधिकार किया था तब कम्पनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने बादशाह को पत्र लिखकर सूचित किया था कि शहंशाह को उनकी गरिमा के अनुकूल ही लाल किले में फिर से पदस्थापित कर दिया गया है ताकि वे शांति के साथ रह सकें। ईस्वी 1832 तक कम्पनी सरकार द्वारा जारी सिक्कों तथा बादशाह को लिखे गए पत्रों पर और कम्पनी सरकार की मोहर में ‘फिदवी शाहआलम’ लिखा जाता था जिसका अर्थ होता है- ‘शाहआलम का वफादार गुलाम’।

ई.1832 में जब चार्ल्स मेटकाफ दिल्ली का रेजीडेण्ट बना तब उसने अचानक इन शब्दों को काम में लेना बंद कर दिया था किंतु इससे कम्पनी सरकार एवं बादशाह के बीच की वैधानिक स्थिति में कोई अंतर नहीं आया था। बादशाह अब भी स्वतंत्र रूप से अपने क्षेत्रों का स्वामी था और कम्पनी बहादुर उसकी वफादार गुलाम की हैसियत रखती थी। बादशाह के अधीनस्थ क्षेत्रों से कर वसूल कर कम्पनी सरकार द्वारा एक निश्चित राशि पेंशन के रूप में बादशाह को दी जाती थी। इस कारण बादशाह का यह सोचना कि वह कभी भी रानी विक्टोरिया की प्रजा नहीं था, सही ही था और इस कारण बादशाह बहादुरश शाह जफर पर गद्दारी या बगावत का आरोप नहीं लागया जा सकता था!

गद्दारी यदि की थी, तो कम्पनी सरकार ने की थी, बगावत यदि की थी तो कम्पनी सरकार ने की थी। अंग्रेजों ने अपने मालिक से बगावत की थी जो पिछले सौ साल से बादशाह की ताबेदारी करने की कसमें खा रहे थी। बादशाह ने तो गद्दार कम्पनी सरकार के विरुद्ध एक युद्ध लड़ा था जिसमें दुर्भाग्य से वह हार गया था। इस दृष्टि से कम्पनी सरकार के न्यायालय में बादशाह पर एक पराजित शत्रु के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता था।

इस मुकदमे में यदि एक पक्ष भारतीय जनता की ओर से भी रखा जाता तो वह अवश्य ही यह बात कह सकती थी कि गद्दारी दोनों तरफ से बराबर हुई थी। यह देश तो भारत की जनता का था! जिस प्रकार बाबर और उसके बेटों ने तलवारों के जोर पर भारत की जनता पर दो सौ साल से नाजायज शासन किया था, उसी प्रकार गोरी चमड़ी वाले भी तलवार के जोर पर ही तो भारत की जनता पर नाजायज शासन कर रहे थे!

न तो बाबर और मुगल इस देश के वैधानिक स्वामी थे और न कम्पनी सरकार। देश की वास्तविक शासक तो वह जनता थी जिसका रक्त सैंकड़ों साल से बाहर से आए आक्रांताओं द्वारा चूसा जा रहा था। चाहे वे तुर्क रहे हों, या मुगल या फिर गौरांग स्वामी!

एक तत्कालीन अंग्रेज पत्रकार हॉवर्ड रसेल ने बादशाह पर मुकदमा आरम्भ होने से पहले लाल किले की गंदी कोठरियों में पहुंचकर बादशाह से भेंट की। रसेल को इंग्लैण्ड में युद्ध पत्रकारिता का पिता कहा जाता है। उसने लिखा है- ‘यदि बादशाह पर लंदन के किसी सिविल कोर्ट में अभियोग चलाया जाता तो वह कोर्ट न केवल बादशाह को समस्त आरोपों से मुक्त कर देता अपितु भारत के अंग्रेज अधिकारियों द्वारा बहादुरशाह जफर तथा भारतीयों पर किए गए अमानुषिक अत्याचारों के लिए कठोर दण्ड देता।’

चूंकि अंग्रेजों ने बादशाह को युद्धबंदी बनाया था इसलिए बहादुरशाह जफर पर सिविल कोर्ट के स्थान पर मिलिट्री कोर्ट में अभियोग चलाया गया। 27 जनवरी 1858 को यह अभियोग आरम्भ हुआ जबकि अब तक भारत के अन्य हिस्सों में क्रांति थमी नहीं थी। नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे और जगदीशपुर के जागीरदार कुंवरसिंह आदि क्रांतिनायक इस समय भी पूरी ऊर्जा से लड़ रहे थे। अभी तो भारतीय क्रांतिकारी सिपाहियों द्वारा विलियम हॉडसन के अत्याचारों का बदला लिया जाना शेष था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बादशाह का कोर्ट मार्शल

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बादशाह का कोर्ट मार्शल

अठ्ठारह सौ सत्तावन के विद्रोह में बागियों का नेतृत्व करने के लिए अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर पर मुकदमा चलाने का निश्चय किया किंतु चूंकि बादशाह रानी विक्टोरिया की प्रजा नहीं था, इसलिए अंग्रेजी मिलिट्री की अदालत में बादशाह का कोर्ट मार्शल किया गया।

27 जनवरी 1858 को लाल किले के दीवाने खास में बादशाह का कोर्ट मार्शल आरम्भ हुआ। शहजादा जवांबख्त और एक नौकर बादशाह को एक पालकी में बैठाकर दीवाने खास में लाए। इसी दीवाने खास में जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के युग में कम्पनी सरकार के अधिकारी कांपती हुई टांगों से आकर खड़े होते थे और आज कम्पनी सरकार के अधिकारी उन्हीं के वारिस को पकड़कर एक ऐसे अपराध के आरोप में मुकदमा चला रहे थे, जो बहादुरशाह जफर ने किया ही नहीं था।

सर्दियों के कारण बहादुरशाह जफर बहुत बीमार और कमजोर दिखाई दे रहा था, वह थोड़ी-थोड़ी देर में खांसता और पीतल के कटोरे में उल्टियां करने लगता। जब शहजादा जवांबख्त और नौकर बादशाह को पालकी से निकाल कर खड़ा करने लगे तो बादशाह की टांगों में इतना दम नहीं था कि वह खड़ा हो सके। इसलिए लेफ्टिनेंट एडवर्ड ओमैनी ने भी बादशाह को सहारा दिया।

बादशाह को कुछ तकियों के सहारे उस स्थान पर बैठा दिया गया जहाँ किसी बंदी को खड़े रहना होता था। शहजादा जवांबख्त बादशाह के पीछे खड़ा हुआ ताकि वह बादशाह को संभाल सके और उसे बता सके कि कौन व्यक्ति बादशाह से क्या कह रहा है! डकैत की तरह दिखने वाला एक मजबूत अंग्रेज सिपाही एक राइफल लेकर खड़ा हुआ ताकि कम्पनी सरकार का बंदी कहीं भाग न जाए!

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कम्पनी सरकार से बगावत करके बादशाह अब मुजरिम हो गया था, यह जताने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह को न तो मोरछल की अनुमति दी और न हुक्के की। कनिष्ठ स्तर के पांच सैनिक अधिकारियों को इस मुकदमे का जज नियुक्त किया गया। केवल कोर्ट मार्शल का अध्यक्ष ब्रिगेडियर शॉवर ही इस बात को जानता था कि किसी भी मुकदमे को कैसे चलाया जाता है! शेष चारों सदस्य नितांत नौसीखिए थे।

दिल्ली का नवनियुक्त कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स, उसकी पत्नी मैटिल्डा साण्डर्स, एडवर्ट वाईबर्ट, दिल्ली गजट का सब-एडीटर जॉर्ज वैगनट्राइबर तथा हैरियट टाइटलर दर्शक दीर्घा में बैठे। कोर्ट मार्शल का अध्यक्ष ब्रिगेडियर शॉवर मुकदमा आरम्भ होने के निर्धारित समय से काफी विलम्ब से आया और उसने सूचित किया कि उसे आगरा जाकर कमाण्ड संभालने का आदेश मिला है, इसलिए कर्नल डॉज कोर्ट मार्शल के अध्यक्ष होंगे। इस तरह के विचित्र वातावरण में बादशाह का कोर्ट मार्शल आरम्भ हुआ।

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जब कर्नल डॉज ने बादशाह से पूछा कि क्या वे अपना अपराध स्वीकार करते हैं तो बादशाह को कुछ समझ में ही नहीं आया कि किसी अपराध की बात की जा रही है। बहादुरशाह जफर की ओर से गुलाम अब्बास नामक एक वकील नियुक्त किया गया था। उसने बादशाह को समझाया कि वह ‘हाँ’ न करे। इस पर बादशाह ने इन्कार में मना कर दिया। इसके बाद बादशाह को एक के बाद एक करके ढेरों कागज दिखाए गए और बादशाह से पूछा गया कि क्या ये उसके दस्तखत हैं? इस पर बादशाह ने मना कर दिया। इसके बाद वे कागज बादशाह को पढ़कर सुनाए जाने लगे। बादशाह उनमें से कुछ कागजों को सुनता और बीच-बीच में ऊंघने लगता। बादशाह को कई गवाहों के बयान सुनाए गए।

बादशाह ने उन सारे गवाहों को झूठा बताया और तकिए पर सिर टिकाकर आराम से बैठ गया। कागजों को दिखाए जाने और पढ़कर सुनाए जाने की लम्बी प्रक्रिया कई दिनों तक चलती रही। शहजादा जवांबख्त भी इन कागजों को सुनने में कोई रुचि नहीं दिखाता था, इसलिए वह प्रायः बादशाह के साथ खड़े नौकर से हंसी-मजाक करने लगता। इस पर एक दिन लेफ्टिनेंट ओमेनी ने जवांबख्त के कोर्ट में आने पर पाबंदी लगा दी।

ओमनी के अनुसार शहजादा जवांबख्त बहुत ही अशिष्ट, अभद्र और असभ्य था। यहाँ बादशाह का कोर्ट मार्शल चल रहा था न कि शाही हरम में होने वाला मुजरा!

जब बहुत दिनों बाद बादशाह का कोर्ट मार्शल पूरा हुआ तो बादशाह ने कोर्ट मार्शल के समक्ष अपनी ओर से उर्दू में एक लिखित शपथपत्र प्रस्तुत किया-

‘मेरा बगावत से कोई सम्बन्ध नहीं था। इस पूरी अवधि में मेरी स्थिति विद्रोही सिपाहियों के हाथों विवश बंदी जैसी थी। मैंने उनसे कई बार प्रार्थना की कि वे यहाँ से चले जाएं किंतु वे नहीं माने। मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने मिस्टर फ्रेजर या किसी भी यूरोपियन की हत्या करने के आदेश कभी नहीं दिए।

जो आदेश मेरे हस्ताक्षरों और मेरी मुहर के साथ दिखाए जा रहे हैं, वे विद्रोही सैनिकों ने लिखे थे और उन पर बलपूर्वक मुझसे हस्ताक्षर करवाए थे और बलपूर्वक मुझसे खाली लिफाफों पर मुहर लगवाई थी। मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं होता था कि उन लिफाफों में क्या होता था और वे किसे भेजे जा रहे थे।

जब मैं उनकी बात मानने से मना करता तो वे कहते कि वे आपको तख्त से उतारकर मिर्जा मुगल को बादशाह बना देंगे। मैं उनके कब्जे में था और वे जो चाहते थे, मुझसे करवाते थे। यदि मैं उनका कहना नहीं मानता तो वे मुझे तुरंत ही मार डालते। उन्होंने न तो कभी मुझे सलाम किया, न ही कभी मुझे इज्जत दी।

वे दीवाने खास और तस्बीह खाने में जूते पहनकर घुस आते थे। उन सिपाहियों पर भरोसा कैसे कर सकता था जिन्होंने अपने मालिकों को ही मार डाला था। उन बागी सिपाहियों ने जिस प्रकार अपने अंग्रेज मालिकों को मारा, उसी प्रकार मुझे भी कैद कर लिया।

मैं अपनी जिंदगी से इतना तंग आ गया कि मैंने बादशाह का लिबास छोड़कर सूफियों का जोगिया लिबास पहन लिया। मेरे पास न तो काई फौज थी और न कोई खजाना, मैं अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत कैसे कर सकता था। केवल अल्लाह ही मेरा गवाह है और वह जानता है कि जो मैंने लिखा है, केवल वही सच है।’

जे. एफ. हैरियट का कहना था कि- ‘बहादुरशाह जफर निर्दोष नहीं है अपितु कुस्तुंतुनिया से लेकर मक्का, ईरान और लाल किले की दीवारों तक फैले हुए अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी षड़यंत्र का सरगना है तथा वह इस गदर की तैयारी पिछले साढ़े तीन साल से कर रहा था।’

लेफ्टिनेंट ओमेनी सहित लगभग सभी अंग्रेज अधिकारी जानते थे कि हैरियट जो कुछ भी कह रहा है, वह केवल बकवास है। सारे अंग्रेज जानते थे कि बगवात शुरु होने में बहादुरशाह का कोई हाथ नहीं था। वे यह भी जानते थे कि बहादुरशाह ने दिल्ली के अंग्रेजों की जान बचाने की कोशिश की थी और कानपुर के बीबीघर में हुए अंग्रेजों के नरसंहार की खुलकर निंदा की थी। फिर भी वे सब चाहते थे कि बादशाह को फांसी हो!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह का निष्कासन

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बहादुरशाह का निष्कासन

बादशाह का कोर्ट मार्शल चलता रहा। बहादुरशाह ने शुरु-शुरु में तो इसमें कुछ रुचि दिखाई किंतु बाद में ऊबने लगा। संभवतः उसे समझ में आ गया था कि कोर्ट मार्शल का निर्णय पहले ही हो चुका है। यह तो केवल खाना-पूर्ति हो रही है। अंततः मिलिट्री कोर्ट ने घोषित किया कि बहादुरशाह का निष्कासन करके उसे भारत से बर्मा भेज दिया जाए।

27 जनवरी 1858 को आरम्भ हुई बहादुरशाह जफर के मुकदमे की कार्यवाही दो माह तक चलती रही। इस पूरे दौरान तेज सर्दियां पड़ रही थीं जिनके कारण बादशाह जोर-जोर से खांसने एवं कराहने लगता था। जब बादशाह की तबियत बिगड़ जाती तो उस दिन की कार्यवाही बंद करके अगले दिन पर टाल दी जाती।

9 मार्च 1858 को कोर्ट मार्शल अंतिम बार बैठा। उसी दिन शाम को तीन बजे कोर्ट ने अपना निर्णय दे दिया। पांचों सैनिक न्यायाधीशों ने एक स्वर से बहादुरशाह जफर को अपराधी ठहराया। कोर्ट मार्शल के अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे अपराध की सजा मौत होती है किंतु चूंकि विलियम हडसन ने बादशाह को गारण्टी दी थी कि उसे मारा नहीं जाएगा, इसलिए उसे पूरी जिंदगी भारत से बाहर अण्डमान निकोबार या किसी अन्य स्थान पर भेज दिया जाए जिसका निर्णय स्वयं गवर्नर जनरल करेंगे।

इसके अगले दिन अर्थात् 10 मार्च 1858 को अत्याचारी विलियम हडसन लखनऊ में क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा मारा गया। कहा नहीं जा सकता कि विलियम हॉडसन तक इस निर्णय की जानकारी पहुंच पाई थी अथवा नहीं!

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बहादुरशाह जफर के अभियोग का निर्णय सुनाने के बाद सात महीने तक कम्पनी सरकार यह सोचती रही कि बादशाह को भारत की मुख्य भूमि से दूर कहाँ भेजा जाए! गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग बादशाह को अण्डमान भेजकर बदनामी मोल नहीं लेना चाहता था। अंततः सितम्बर 1858 में बर्मा की राजधानी रंगून को बहादुरशाह जफर के निर्वासन के लिए चुना गया। इस प्रकार बहादुरशाह का निष्कासन होना निश्चित हो गया।

चूंकि भारत के पूर्वी हिस्सों में क्रांति की आंच अभी पूरी तरह ठण्डी नहीं हुई थी, इसलिए अंग्रेजों को भय था कि कहीं क्रांतिकारी बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों की जेल से छुड़ाने का प्रयास न करें। इसलिए अनुभवी लेफ्टिनेंट एडवर्ड ओमेनी को यह दायित्व सौंपा गया कि वह स्वयं बादशाह को दिल्ली से लेकर जाए और अपने हाथों से उसे रंगून की जेल में बंद करके आए।

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बादशाह को दिल्ली से निकालने की योजना को पूरी तरह गुप्त रखा गया। बहुत कम अंग्रेज अधिकारियों को बताया गया कि कम्पनी के गवर्नर जनरल ने लाल किले के बादशाह को रंगून भेजने का निर्णय किया है। 7 अक्टूबर 1858 की प्रातः तीन बजे लेफ्टिनेंट ओमेनी ने लाल किले की गंदी कोठरियों में जाकर बहादुरशाह जफर को जगाया और उससे कहा कि वह तैयार होकर बाहर खड़ी बैलगाड़ी में बैठ जाए। लेफ्टिनेंट ओमेनी अपने साथ और भी बहुत सारी बैलगाड़ियां और पालकियां लाया था। उसके पास पूरी सूची थी कि कौन-कौन व्यक्ति इन बैलगाड़ियों और पालकियों में बैठेगा।

बादशाह के साथ अब भी उसके दो जीवित शहजादे रहते थे। इनमें से पंद्रहवें नम्बर का शहजादा जवां बख्त बेगम जीनत महल का बेटा था जिसे जीनत महल ने भारत का बादशाह बनाने के सपने देखे थे। सोलहवें नम्बर का शहजादा मिर्जा शाह अब्बास भी इस समय बादशाह के पास था। वह जफर की एक रखैल मुबारकुन्निसा की अवैध संतान था। इस समय वह 13 साल का था। 

इन दोनों शहजादों को भी अनिवार्य रूप से अपने पिता के साथ निर्वासन में जाने का आदेश हुआ। बादशाह की दो बेगमें भी उसके साथ बैलगाड़ियों में बैठाई गईं। कुछ नौकर, रखैलें और ख्वाजासरा भी शाही परिवार के साथ बैलगाड़ियों में बैठाए गए। जब जफर के परिवार के कुछ अन्य लोगों को ज्ञात हुआ कि शाही परिवार को दिल्ली से बाहर ले जाया जा रहा है तो वे स्वयं अपनी इच्छा से बादशाह के साथ चलने को तैयार हो गए। इस प्रकार शाही काफिले में कुल 31 व्यक्ति हो गए। इन सभी को एक घण्टे के अंदर तैयार करके गाड़ियों में बैठा दिया गया।

शाही काफिले को नौवीं लांसर्स ने घेर लिया। इस सैनिक टुकड़ी में एक घुड़सवार तोपखाना, दो पालकियां और तीन पालकी गाड़ियों का दस्ता था। यह पूरा प्रबंध पूरी तरह से गुप्त रूप से किया गया था। यहाँ तक कि स्वयं बहादुरशाह को भी नहीं बताया गया कि रात के अंधेरे में उन्हें दिल्ली से कहाँ ले जाया जा रहा है!

दिल्ली के कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स की पत्नी ने अपनी सास को लिखे एक पत्र में लिखा- ‘उन्हें जितनी शीघ्रता से रवाना किया जाना संभव था, उतनी शीघ्रता से दिल्ली से रवाना कर दिया गया। स्वयं चार्ल्स साण्डर्स ने इस शाही यात्रा के लिए बैलगाड़ियों, ढंकी हुई पालकियों और मार्ग में लगाए जाने वाले तम्बुओं का गुप्त प्रबंध किया था।’

कमिश्नर स्वयं भी प्रातः तीन बजे उठकर ओमेनी के साथ लाल किले में पहुंच गया था। उसने न केवल यह सुनिश्चत किया कि प्रातः चार बजे तक शाही काफिला लाल किले से रवाना हो जाए अपितु वह स्वयं घोड़े पर बैठकर इस काफिले के साथ यमुनाजी पर नावों को जोड़कर बनाए गए पुल तक गया ताकि वह यह भी सुनिश्चित कर सके कि दिल्ली का कोई व्यक्ति इस शाही काफिले को दिल्ली से जाते हुए तो नहीं देख रहा है!

इस प्रकार 332 साल बाद बाबर के बेटों की भारत से अंतिम विदाई हो गई। बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब ने भारत के लगभग समस्त राजाओं के महलों को लूटकर विपुल सोना, चांदी, हीरे, जवाहर यहाँ तक कि संसार का सबसे बड़ा हीरा भी आगरा और दिल्ली के लाल किलों में जमा कर लिया था किंतु आज वे दोनों ही लाल किले खाली पड़े थे। न उनमें सोना-चांदी बचा था और न उनमें रहने के लिए बाबर का कोई बेटा!

जहाँ तक भारतवासियों का प्रश्न था, उन्हें इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि बहादुरशाह का निष्कासन हो या उसके साथ कुछ और हो!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जॉन लॉरेंस

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जॉन लॉरेंस

जॉन लॉरेंस एक ब्रिटिश अधिकारी था जो अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय पंजाब प्रांत में चीफ कमिश्नर के पद पर नियुक्त था एवं दिल्ली का प्रशासक नियुक्त किया गया था। उसकी कृपा से ही दिल्ली नष्ट होने से बच पाई। ब्रिटेन के लॉर्ड्स चाहते थे कि दिल्ली को भारत के नक्शे से मिटा दिया जाए!

बादशाह लाल किला छोड़कर चला गया था किंतु लोअर कोर्ट का पूर्व मजिस्ट्रेट थियो मेटकाफ जो अब दिल्ली का सहायक कमिश्नर था, अब भी दिल्ली में था और वह दिल्ली के मकानों और दिल्ली के लोगों पर कहर ढा रहा था। बदले की आग में झुलसा हुआ वह प्रौढ़ अंग्रेज वास्तव में मानसिक रोगी हो गया था। वह दिल्ली के प्रत्येक मकान को तोड़ देना चाहता था और प्रत्येक नागरिक को फांसी के फंदे पर लटका देना चाहता था। रक्त, मृत्यु, अग्नि और विध्वंस ही उनके जीवन की एकमात्र साधना बनकर रह गए थे।

दिल्ली को हारी हुई बगावत का केन्द्र होने की सजा दी जा रही थी। लॉर्ड पामर्सटन तथा कुछ अन्य लॉर्ड्स ने कम्पनी सरकार से मांग की कि दिल्ली को हिंदुस्तान के नक्शे से मिटा दिया जाए। लॉर्ड पामर्सटन ने कम्पनी को भेजे अपने पत्र में लिखा कि हर वह सभ्य इमारत जिसका इस्लामी परम्परा से किंचित् भी सम्बन्ध हो, उसे बिना प्राचीनता या कलात्मकता का सम्मान किए धरती पर ढहा दिया जाना चाहिए।

जब बादशाह बहादुरशाह जफर दिल्ली से रंगून भेज दिया गया तब दिल्ली का प्रशासन पंजाब सरकार के अधीन कर दिया गया। पंजाब का चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस अपनी नौकरी के आरम्भिक दिनों में दिल्ली के सहायक कमिश्नर थियो मेटकाफ के बाप सर थॉमस मेटकाफ के अधीन काम कर चुका था जो कि ईस्वी 1835 तक दिल्ली का कमिश्नर रहा था।

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इसलिए जॉन लॉरेंस थियोफिलस मेटकाफ से स्नेह करता था किंतु वह समझ रहा था कि जब तक मेटकाफ दिल्ली में रहेगा, तब तक दिल्ली की स्थिति को सामान्य नहीं किया जा सकता। इसलिए जॉन लारेंस ने भारत के गर्वनर जनरल लॉर्ड केनिंग को चिट्ठी लिखी कि थियो मैटकाफ को तुरंत दिल्ली से हटाया जाए। उस पर दिल्ली में बड़े पैमाने पर कत्लेआम करने का आरोप है। जॉन लॉरेंस ने लॉर्ड केनिंग को यह भी लिखा कि दिल्ली के अंग्रेज इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं मानो वे हिंदुस्तानियों को जड़ से उखाड़ फैंकने की लड़ाई कर रहे हों।

इस पर कम्पनी सरकार ने थियो मेटकाफ को दिल्ली से हटाकर फतेहपुर का डिप्टी कलक्टर बना दिया। थियो मेटकाफ ने नाराज होकर लम्बी छुट्टी ले ली और वह इंग्लैण्ड चला गया जहाँ से वह कभी लौटकर नहीं आया। इस प्रकार दिल्ली को तीसरे मेटकाफ से छुटकारा मिल गया।

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पंजाब के चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस ने लिखा है- ‘दिल्ली का शासन मेरे हाथ में आते ही मैंने सिविल ऑफीसर्स को आदेश देकर दिल्ली में कत्लेआम रोक दिया और सैंकड़ों निर्दोष लोगों को फांसी पर चढ़ने से बचा लिया। मैटकाफ का दिल्ली में इतना शक्तिशाली हो जाना बहुत ही दुर्भाग्य की बात है। जो भी हो, अब वह इंग्लैण्ड चला गया है।’

जॉन लॉरेंस ने लॉर्ड केनिंग से मांग की कि जिन विद्रोही सिपाहियों ने किसी की भी हत्या नहीं की है तथा भंग कर दी गई टुकड़ियों के जिन सैनिकों ने किसी बगावत में हिस्सा नहीं लिया है, उन्हें क्षमा करके फिर से कम्पनी सरकार की सेवा में ले लिया जाए ताकि वे फिर से जीवन की मुख्य धारा में लौट सकें। ब्रिटिश सांसद डिजराइली ने इंगलैण्ड की संसद में इस मांग का जर्बदस्त समर्थन किया। उसका कहना था कि इससे भारतीयों के दिलों में अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव कम होगा तथा भारत शांत हो जाएगा। दिल्ली एवं कलकत्ता से लेकर लंदन तक में बैठे अधिकांश अंग्रेज इस योजना के पक्षधर नहीं थे। भारत एवं इंग्लैण्ड के अंग्रेजों के कुछ बड़े समूहों ने मांग की कि जामा मस्जिद सहित दिल्ली के समस्त भवनों को नष्ट कर दिया जाए किंतु जॉन लॉरेंस ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया।

जब गवर्नर जनरल केनिंग ने दिल्ली नगर का पूरा परकोटा तथा दोनों पक्षों द्वारा बनाई गई समस्त मोर्चाबंदियों को नष्ट करने के आदेश दिए तो जॉन लॉरेंस ने केनिंग को लिखा कि इस आदेश की पालना नहीं की जा सकती क्योंकि सरकार के पास इतना बारूद नहीं है।

दिसम्बर 1859 में लॉर्ड केनिंग इस बात पर सहमत हो गया कि केवल उन दीवारों को तोड़ा जाए जो लाल किले एवं दिल्ली नगर को आसानी से सुरक्षित बनाती हैं। चांदनी चौक के पूर्वी आधे हिस्से को दरीबा तक तोड़ने की येाजना भी रोक दी गई। फिर भी लाल किले के चारों ओर के बहुत से भवन पूरी तरह धरती पर गिरा दिए गए।

उर्दू के विख्यात कवि मिर्जा गालिब ने लिखा है- ‘मैं तांगे पर सवार होकर जामा मस्जिद से होता हुआ राजघाट दरवाजे तक गया। यह पूरा क्षेत्र एक रेगिस्तान जैसा दिखाई देने लगा है। लोहे की सड़क से कलकत्ता दरवाजे और काबुली दरवाजे तक मैदान साफ हो गया है। पंजाबी कटरा, धोबीवाड़ा, रामजी गंज, सआदत खाँ का कटरा, मुबारक बेगम की हवेली, साहब राम की हवेली और बाग, रामजी दास गोदाम वाले का मकान, इनमें से किसी का कुछ पता नहीं चलता। पूरा शहर रेगिस्तान बन गया है।

……ऐसा लगता है जैसे दिल्ली को ढहाया जा रहा है। दिल्ली के वे मौहल्ले जो 1857 की क्रांति से पहले स्वयं अपने आप में एक नगर जैसे दिखाई देते थे, वे अब अपनी जगह पर नहीं हैं। खास बाजार, उर्दू बाजार, खानम का बाजार पूरी तरह धूल में मिला दिए गए हैं। न कोई मकान मालिक और न कोई दुकानदार बता सकता है कि उनका घर या दुकान किस स्थान पर थे!’

पंजाब का कमिश्नर जॉन लॉरेंस चाहता था कि कलकत्ता और लंदन में बैठे अंग्रेज राजनीतिज्ञ, सिविल सर्विस के अधिकारी एवं सैनिक अधिकारी इस बात को समझें कि भारत की राजनीति में दिल्ली का स्थान कितना महत्वपूर्ण है। इसलिए दिल्ली को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए अपितु उसका नवनिर्माण करके इसे अंग्रेज शक्ति का महत्वपूर्ण स्थल बनाया जाना चाहिए। मद्रास, मुम्बई, कलकत्ता और लाहौर में से कोई भी नगर भारत में इतनी महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं ऐतिहासिक स्थिति नहीं रखता जो स्थिति दिल्ली की रही है।

कलकत्ता और लंदन के अंग्रेज चिल्लाते रहे किंतु जॉन लॉरेंस ने उनकी परवाह नहीं की। उसने दिल्ली को साफ करवाया। मलबे के ढेर उठवाकर बाहर फिंकवाए। मलबे में दबी पड़ी लाशों की अंत्येष्टियां करवाईं। उसने नागरिकों का आह्वान किया कि वे अपने घरों, दुकानों एवं बाजारों को फिर से बना लें। इस प्रकार जॉन लॉरेंस ने दिल्ली को पूर्णतः नष्ट होने से बचा लिया।

 नवम्बर 1858 में भारत से कम्पनी सरकार का शासन समाप्त कर दिया गया और ब्रिटिश क्राउन ने स्वयं भारत का शासन ग्रहण कर लिया। इसी के साथ लाल किला पूरी तरह नेपथ्य में चला गया। भारत पर रानी का शासन होते ही जॉन लॉरेंस ने 1857 की क्रांति के लगभग 24 हजार सैनिकों को फिर से सेवा में ले लिया किंतु अब वे कम्पनी सरकार के सिपाही नहीं थे, अब वे विश्व की सबसे बड़ी हुकूमत की सेना के सिपाही थे जिसे रॉयल आर्मी कहा जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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