Tuesday, June 18, 2024
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208. हॉडसन बादशाह को बंदी बनाकर लाल किले में ले आया!

20 सितम्बर 1857 की रात को बादशाह बहादुरशाह जफर की क्रांतिकारी सेना के प्रधान सेनापति बख्त खाँ ने हुमायूँ के मकबरे पर पहुंचकर एक बार पुनः बादशाह से अनुरोध किया कि बादशाह उसके साथ लखनऊ चलें किंतु बादशाह से गद्दारी करके हॉडसन के लिए काम कर रहे इलाही बख्श ने एक बार फिर बादशाह को यह कहकर बख्त खाँ के साथ जाने से रोक दिया कि अंग्रेज कभी भी बादशाह सलामत को कुछ नहीं कहेंगे, आप किसी भी हालत में दिल्ली मत छोड़िए।

बेगम जीनत महल भी नहीं चाहती थी कि बादशाह दिल्ली छोड़कर भागे क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि हॉडसन अपने वायदे पर स्थिर रहेगा और पहले से तय शर्तों के अनुसार बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल, शहजादे जवां बख्त तथ जीनत महल के पिता मिर्जा कुली खाँ को सुरक्षा देगा। जीनत महल को यह भी विश्वास था कि वह हॉडसन को प्रसन्न करके अपने बेटे जवां बख्त को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित करवा लेगी और उसके बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।

बादशाह तथा बेगम का यह रुख देखकर सेनापति बख्त खाँ निराश होकर चला गया किंतु इलाही बख्श सतर्क हो गया। उसे लगा कि बादशाह कभी भी अपना निश्चय बदल सकता है तथा दिल्ली से भाग सकता है। इसलिए उसी रात वह विलियम हॉडसन से मिला। संभवतः जीनत महल एवं अहसन उल्लाह खाँ भी चाहते थे कि अब हॉडसन हुमायूँ के मकबरे में आकर शाही परिवार को वहाँ से निकाल ले।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इलाही बख्श ने विलियम हॉडसन को बताया कि बादशाह के पास शाही आभूषण, कीमती हीरे एवं सम्पत्ति की एक सूची है। यदि हॉडसन ने आज ही रात बादशाह को नहीं पकड़ा तो बादशाह कहीं भी जा सकता है।

हॉडसन किसी भी कीमत पर बादशाह को हाथ से नहीं निकलने देना चाहता था। इसलिए वह तुरंत मेजर जनरल विल्सन के पास गया तथा उससे कहा कि जासूसों से मिली सूचना के अनुसार बादशाह और उसका परिवार हुमायूँ के मकबरे में छिपा हुआ है तथा वहाँ से कहीं भी भाग सकता है। इसलिए उचित यही होगा कि बादशाह तथा उसके परिवार को तुरंत बंदी बना लिया जाए।

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हॉडसन का यह प्रस्ताव सुनकर विल्सन भयभीत हो गया। उसने कहा कि ऐसा करने से अंग्रेजों की कठिनाइयां बढ़ जाएंगी किंतु हॉडसन तथा नेविल चैम्बरलेन अपनी बात पर अड़े रहे। इस पर विल्सन ने उनसे कहा कि वे स्वयं इस विषय को देखें तथा कम से कम सिपाही लेकर हुमायूँ के मकबरे पर जाएं ताकि किसी को यह संदेह नहीं हो कि अंग्रेज सिपाही बादशाह तथा उसके परिवार को पकड़ने जा रहे हैं।

विलियम हॉडसन ने विल्सन की अनुमति मिल जाने के बाद मिर्जा इलाही बख्श तथा मौलवी रजब अली को हॉडसन्स हॉर्स के एक दस्ते के साथ हुमायूँ के मकबरे के लिए रवाना कर दिया तथा कुछ समय बाद स्वयं भी लगभग पचास घुड़सवारों के एक दस्ते के साथ मकबरे के लिए चल पड़ा। अब सारी तैयारियां हो चुकी थीं और वह समय आ चुका था जब वह उस व्यक्ति को बंदी बना लिया जाए जिसके बारे में बहुत से अंग्रेजों का विश्वास था कि वह समस्त विद्रोह के केन्द्र में इस तरह था जैसे कि जाले के बीच मकड़ी!

अलग-अलग लेखकों ने इन घटनाओं का वर्णन थोड़े बहुत अंतर के साथ किया है। 1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर लिखने वाले वीर विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा है- ‘हॉडसन ने गद्दार इलाही बख्श की सूचना पर बहादुरशाह के तीन पुत्रों को हूमायूं के मकबरे से गिरफ्तार किया। वस्तुतः इलाही बख्श एक निकृष्टतम व्यक्ति था। इसी ने क्रांतिकारियों और राजमहल की प्रत्येक घटना से अंग्रेजों को सूचित किया था। उसके संकेत पर ही हॉडसन हुमायूँ के मकबरे में आ खड़ा हुआ।’

हुमायूँ के मकबरे पर चल रही गतिविधियों से जिहादियों की एक टोली को यह ज्ञात हो गया था कि बादशाह एवं उसका परिवार हुमायूँ के मकबरे में छिपा हुआ है। इसलिए कुछ जिहादी भी मकबरे के सामने आकर खड़े हो गए ताकि वे बादशाह की रक्षा कर सकें। जब इन जिहादियों ने मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श को हॉडसन्स हॉर्स के सिक्ख घुड़सवारों के साथ आते हुए देखा तो वे क्रोध से पागल हो गए।

जिहादियों को लगा कि रजब अली तथा इलाही बख्श ने बादशाह से गद्दारी की है तथा वे बादशाह को पकड़ने के लिए आए हैं। इसलिए जिहादियों ने मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श पर हमला कर दिया किंतु ये लोग किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहे।

यद्यपि पूरी दिल्ली सुनसान और वीरान दिखाई देती थी किंतु इस समय आश्चर्यजनक रूप से हुमायूँ के मकबरे में बड़ी संख्या में शहजादे, दरबारी एवं जिहादी मौजूद थे और वे अपने बादशाह के लिए जान देने पर आमदा थे।

हुमायूँ के मकबरे से जान बचाकर भागते हुए मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श को सामने से आता हुआ हॉडसन मिल गया। उसने अपने इन जासूसों को फटकारा और कहा कि वे रिसालदार मानसिंह के साथ वापस मकबरे के भीतर जाएं तथा बादशाह से कहें कि यदि वह मकबरे से बाहर आकर समर्पण कर देगा तो उसके प्राण नहीं लिए जाएंगे और यदि बादशाह बाहर नहीं आएगा तो अंग्रेजी सेना मकबरे में घुसकर बादशाह सहित सभी लोगों को गोली मार देगी।

हॉडसन यह देखकर हैरान था कि बादशाह की गिरफ्तारी के मामले में सब कुछ वैसा नहीं हो रहा था, जैसा हॉडसन ने सोचा था। मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श को मकबरे के भीतर गए हुए दो घण्टे हो गए तो हॉडसन को लगा कि मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श तथा रिसालदार मानसिंह का कत्ल कर दिया गया है। वह मकबरे के मुख्य दरवाजे पर डटा हुआ था और उसके घुड़सवारों ने मकबरे को चारों ओर से घेर रखा था। उसने थोड़ी प्रतीक्षा और की। अंत में रिसालदार मानसिंह मकबरे से बाहर आया और उसने हॉडसन को सूचित किया कि बादशाह सलामत बाहर आ रहे हैं।

थोड़ी ही देर में बादशाह की पालकी मकबरे से बाहर निकली। उसके पीछे बेगम जीनत महल, शहजादा जवां बख्त तथा जीनत का पिता मिर्जा कुली खाँ भय से कांपते हुए चल रहे थे। उनके पीछे बादशाह के दूसरे शहजादे और शाही परिवार के बहुत से लोग थे। उनके बाहर निकलते ही उन्हें चारों तरफ से जिहादियों ने घेर लिया।

हॉडसन ने जिहादियों से कहा कि वे दूर हट जाएं। इस पर बादशाह ने हॉडसन से पूछा कि क्या बादशाह की जान बख्श दी जाएगी? हॉडसन ने कहा कि यदि बागियों द्वारा बादशाह को छुड़ाने की कोशिश नहीं की गई तो उसकी जान अवश्य बख्श दी जाएगी! वीर सावरकर ने लिखा है- ‘प्राणरक्षा का आश्वासन पाकर बहादुरशाह ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।’

जब हॉडसन ने बादशाह बहादुरशाह जफर को आश्वासन दिया कि यदि बादशाह को छुड़ाने का प्रयास नहीं किया गया तो हॉडसन बादशाह के प्राण बख्श देगा तो बादशाह हॉडसन के साथ चलने को तैयार हो गया। उसकी पालकी को हॉडसन के सिक्ख घुड़सवारों ने घेर लिया। वहाँ उपस्थित जिहादी एवं शाही परिवार के लोग इन घुड़सवारों के पीछे चलने लगे। यहाँ से लाल किला लगभग 8 किलोमीटर दूर था।

जब बादशाह का काफिला दिल्ली शहर के परकोटे के पास पहुंचा तो जिहादी स्वतः ही गायब हो गए। केवल शाही परिवार के लोग पालकी के पीछे चलते रहे।

जब ये लोग लाहौरी दरवाजे के अंदर घुसने लगे तो दरवाजे पर नियुक्त दरबानों ने पूछा- ‘पालकी में किसे बिठाया हुआ है?’

हॉडसन ने जवाब दिया- ‘कोई नहीं, दिल्ली के बादशाह।’ इस पर दरबानों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

इसके बाद ये लोग चांदनी चौक से गुजरते हुए लाल किले में आ गए। बादशाह को जीनत बेगम के महल में बंदी बना लिया गया।

केंडल कॉगहिल नामक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा है- ‘मुझे हिंदुस्तान के बादशाह का कैदी की हैसियत से स्वागत करने की संतुष्टि मिली। मैंने फौरन उसे बंद करके उस पर दो संतरी लगा दिए। मैंने बादशाह को सूअर और बहुत से ऐसे मुनासिब नामों से पुकारा और उससे हमारे खानदानों के बारे में पूछा। अगर वह सिर उठाकर भी देखता तो मैं उसे गोली मार देता और मैंने पहरेदारों को आदेश दिया कि यदि वह वहशी जरा भी हिले तो उसे फौरन मार गिराया जाए।’

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