Tuesday, May 24, 2022

174. अठारह सौ सत्तावन के लाल किले दो हजार भूखे-नंगे शहजादे बंद थे!

अठारह सौ सत्तावन के लाल किले में केवल बादशाह, उसकी बेगमें और उनके शहजादे ही नहीं रहते थे, अपितु लगभग दो हजार सलातीन भी लाल किले के स्थाई निवासी थे। सलातीनों में बाबर से लेकर बहारुदरशाह जफर के पूर्ववर्ती तमाम मुगलिया बादशाहों की औलादों की औलादें, पोतों के पोते, पड़पोतों के पड़पोते, पीढ़ी दर पीढ़ी बूढ़ी होती जा रही, जवान, किशोरी और शिशु शहजादियां सम्मिलित थीं। लाल किले में रह रहे सलतीनों की संख्या इस समय लगभग दो हजार थी। चूंकि ये सलातीन तैमूरी और चंगेजी शाही खानदान के शजादे थे इसलिए वे कोई काम नहीं करते थे। सेनाएं भंग हो चुकी थीं, अन्यथा यही शहजादे मुगल सेनाओं के बड़े-बड़े जनरल, सूबेदार और आला अफसर होते किंतु अब वे बादशाह से मिलने वाली पेंशन पर अपना गुजारा किया करते थे।

जब तक सल्तनत कायम थी तब तक सलातीनों की जिंदगी बेहतर थी किंतु जैसे ही ई.1739 में नादिरशाह लाल किले को लूटकर और शाही खजाने में झाड़ू लगाकर चला गया, तब से इन सलातीनों की हालत खराब होने लगी और वे गरीबी तथा अभाव में अपना जीवन बिताने लगे।

ई.1754 में जब मीरबख्शी गाजीउद्दीन इमादुलमुल्क ने बादशाह अहमदशाह बहादुर को अंधा करके जेल में डाला था और आलमगीर (द्वितीय) को बादशाह बनाया था, तब से बादशाह की आय निरंतर घटती जा रही थी और लाल किले में सलातीनों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी। इस कारण भी सलातीनों की जिंदगी नारकीय हो गई।

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चूंकि इन सलातीनों के परिवार कुछ नहीं करते थे इसलिए सलातीन और उनके परिवारों के सदस्य हर समय किसी न किसी बात पर आपस में झगड़ते रहते थे। अशिक्षा, गरीबी एवं बेरोजगारी के कारण सलातीनों के परिवार अशिक्षित, अर्द्धसभ्य एवं झगड़ालू बन चुके थे। इस कारण लाल किले का मुख्य हिंजड़ा महबूब अली, बेगम जीनत महल के कान भर कर उन्हें सजा दिलवाता रहता था।

अंग्रेजों के दिल्ली में आ जाने से दरियागंज तथा चांदनी चौक सहित शाहजहानाबाद का अधिकांश हिस्सा नई रौनकों से गुलजार हो उठा था किंतु सलातीनों के लिए वहाँ जाकर अपना भाग्य नए सिरे से तलाशना संभव नहीं था।

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अधिकतर सलातीन अपनी तंग कोठरियों में बंद रहते थे, उन्होंने शायद ही कभी बहादुरशाह जफर की रंगीन जिंदगी को अपनी आंखों से देखा था। क्योंकि किसी भी सलातीन को उस ऊंची दीवार को फांदकर लाल किले के उस हिस्से में आने की अनुमति नहीं थी जिस हिस्से में बादशाह का हरम था, रूप से दमदमाती जवान औरतें थीं, बांके शहजादे थे और स्वयं बहादुरशाह जफर का दरबार था।

एक अंग्रेज द्वारा लिखे गए विवरण के आधार पर विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘सलातीन के निवास में एक बहुत ऊंची दीवार है ताकि कोई उनको नहीं देख पाए। इसके अंदर उनके लिए छप्पर वाली अनेक झौंपड़ियां हैं। जहाँ यह बेचारे रहते हैं। जब दरवाजे खुले तो बहुत से अधनंगे, भूखे, मुसीबत जदा लोगों ने हमको घेर लिया। उनमें से कुछ तो अस्सी साल के थे और बिल्कुल प्राकृतिक अवस्था में थे, अर्थात् नंगे थे।’

बादशाह बहादुरशाह जफर के मन में तैमूरी और चंगेजी खानदान की इन उम्दा नस्लों के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी। बादशाह का विचार था कि लाल किले में हो रही अधिकतर चोरियों और झगड़ों के लिए केवल सलातीन जिम्मेदार हैं। एक बार एक चोर किले की दीवार पर देखा गया। जब बादशाह को यह बात बताई गई तो उसने कहा कि अवश्य ही वह कोई सलातीन होगा। वे एक दूसरे के यहाँ चोरी करते हैं और शराब पीकर झगड़ा करते हैं।

जब बादशाह को सूचना दी गई कि जूनियर सलातीनों में से एक मिर्जा महमूद सुल्तान पागल हो गया है और रात के समय किले में घूमता रहता है तो बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पैरों में जंजीरें डालकर कैद कर दिया जाए। जब कभी सलातीन बगावत कर देते तो बादशाह के सामने बहुत बड़ी कठिनाई उत्पन्न हो जाती। दो बार उन सबने मिलकर अंग्रेज रेजीडेंट को अर्जी भिजवाई कि उनके बुनियादी अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

ईस्वी 1847 में जब बहादुरशाह को गद्दी पर बैठे हुए 10 साल हो गए तब सलातीनों ने अंग्रेज रेजीडेंट मेटकाफ को प्रार्थनापत्र भिजवाया कि उन पर जुल्म किया जा रहा है।दिल्ली के बादशाह के व्यवहार और स्वभाव के कारण हमारी पस्थितियां अत्यंत निर्धन और अपमानयुक्त हो गई हैं। बादशाह के केवल गलत नौकरों की बात सुनते हैं तथा ख्वाजासरा महबूब अली हमें तरह-तरह अपमानित करता है।

इसके एक साल बाद फिर सलातीन ने एक और बगावत की। इस समय उत्तर-पश्चिम सूबों का अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर दिल्ली आया। उस वक्त एक चर्मी कागज उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया जिस पर डेढ़ सौ से अधिक सलातीन की मुहर लगी हुई थी। इसमें गवर्नर से प्रार्थना की गई थी कि वे सलातीन की रक्षा करें तथा बहादुरशाह जफर ने वली अहद को मैटकाफ से मिलने तथा सलातीन की मुसीबतों के बारे में बात करने से मना कर दिया है।

अंग्रेज इतिहासकार रसेल ने उस काल के लाल किले के भीतर रह रहे मुगलों की दयनीय अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘हमने उनकी दुर्दशा करके उन पर गरीबी और कर्ज लादकर उन्हें महल में बंद कर दिया और उन पर आरोप लगाया कि वे आलसी, नीच और इंद्रिय परायण हैं। हमने उनसे हर इज्जत और महत्वाकांक्षा छीन ली है।’

इस प्रकार जिस समय बादशाह ने मेरठ से आए क्रांतिकारियों के कहने से क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार किया, उस समय लाल किले तथा कम्पनी सरकार के बीच तनाव अपने चरम पर था।

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