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गांधीजी का मंत्र

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सरदार पटेल ने गांधीजी का मंत्र अपनी जीवन में उतारा तथा उसे सार्वजनिक जीवन में सिद्ध करके दिखाया। यह मंत्र था सत्य पर अड़े रहना, जिसे गांधीजी सत्याग्रह कहते थे।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के पत्र को पढ़कर बम्बई का गवर्नर हिल गया। उसे सरदार पटेल की शक्ति का अनुमान हो गया। उसे यह भी समझ में आ गया कि आंदोलन को विफल करने के सारे सरकारी हथकण्डे क्यों व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं ! बारदोली सत्याग्रह ने जितना उग्र रूप धारण कर लिया था, वह गोरी सरकार के लिये शुभ लक्षण नहीं था।

यदि यह आंदोलन कुछ दिनों के लिये ही, पूरे भारत में फैल जाये तो गोरी सरकार को अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर इंग्लैण्ड को लौट जाना पड़े। इसलिये गवर्नर ने सरदार पटेल से समझौता करने का मन बनाया। गवर्नर ने सरदार पटेल को समझौता वार्त्ता करने के लिये आमंत्रित किया। सरदार यहाँ भी पूरी तैयारी करके गये। उन्हें गोरी सरकार के शक्तिशाली गवर्नर से अकेले ही पंजा लड़ाना था।

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यदि इसमें जरा भी चूक हो जाती तो न केवल अब तक किये गये समस्त काम पर पानी फिर जाता अपितु जीवन भर के लिये बदनामी का कलंक भी उनके माथे पर लग जाता। लोगों ने सरदार पटेल पर विश्वास करके अपना बहुत कुछ दांव पर लगा रखा था। इसलिये सरदार पटेल ने गांधीजी का मंत्र कसकर पकड़ लिया तथा समझौते की टेबल पर दो टूक शब्दों में गवर्नर से कहा कि किसानों का बढ़ा हुआ कर माफ किया जाये। गवर्नर ने कहा कि सरकार लगान वृद्धि की जांच कराने तथा जांच के बाद उचित लगान तय करने के लिये तैयार है।

जहाँ लगान माफ किया जाना आवश्यक है, सरकार लगान माफ करने को भी तैयार है लेकिन शर्त यह है कि आंदोलन वापस ले लिया जाये और किसान पहले की तरह लगान देना आरम्भ कर दें। सरदार पटेल इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे कि गवर्नर उनसे अपील करे कि आंदोलन बंद किया जाये। सरदार पटेल ने गवर्नर से कहा कि आंदोलन बंद किया जा सकता है किंतु शर्त यह है कि आंदोलन के दौरान बंदी बनाये गये लोगों को तत्काल बिना शर्त रिहा किया जाये।

जिन सरकारी कर्मचारियों ने आंदोलन के दौरान नौकरियां छोड़ दी हैं, उन्हें तुरंत नौकरी पर वापस लिया जाये। जिन किसानों की जमीनें और पशुधन जब्त किया गया है, उसे तुरंत किसानों को लौटाया जाये। गवर्नर ने सरदार पटेल की समस्त बातें स्वीकार कर लीं। सम्भवतः गवर्नर को ज्ञात हो गया था कि उसका सामना किस दृढ़-निश्चयी और जिद्दी नेता से हुआ है। सरदार पटेल की नजरों में गांधीजी का मंत्र सफल हो गया था।

वस्तुतः इतिहासकारों ने बारदोली आंदोलन की सफलता का श्रेय गांधीजी को देते हुए लिखा है कि यह सरदार ने गांधीजी का मंत्र सार्वजनिक जीवन में सिद्ध करके दिखाया किंतु वस्तुतः गांधीजी अपने जीवन में किसी भी सत्याग्रह आंदोलन में सफल नहीं हुए थे। यह सफलता को पटेल के आत्मविश्वास की थी।

निश्चय ही यह एक शानदार जीत थी। पूरे देश में सरदार वल्ल्भभाई पटेल की सफलता का डंका बज गया। वस्तुतः आगे चलकर गांधीजी और कांग्रेस ने जिस राष्ट्रव्यापी आंदोलन का संचालन किया, उसका प्रथम प्रयोग सरदार पटेल के द्वारा बारदोली की प्रयोगशाला में ही सफल करके देखा गया।

देश को समझ में आ गया कि जनता की एकता से बड़ी कोई चीज नहीं है और पटेल उस एकता को उत्पन्न करने वाले जादूगर हैं। बारदोली में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हें पहले बारदोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजनैतिक मंच से क्रांति नहीं होती

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प्रायः लोगों को यह भ्रम होता है कि किसी भी समाज में अथवा राष्ट्र में राजनीतिक मंच से क्रांति होनी संभव है किंतु वास्तविकता यह है कि राजनैतिक मंच से चिल्लाने से क्रांति नहीं होती!

बारदोली की सफलता के बाद सरदार पटेल एक चमत्कारिक पुरुष के रूप में देखे जाने लगे। उन्होंने वह कर दिखाया था जो उनसे पहले कोई नहीं कर पाया था। बम्बई की गोरी सरकार को हथियार डालते हुए पहली बार ही देखा गया था। इसलिये अब सरदार पटेल जहाँ भी जाते, उन्हें देखने के लिये लोगों की भीड़ लग जाती। अब वे राष्ट्र नायक थे। उन्हें देश में विभिन्न स्थानों पर भाषण देने, आंदोलनों का नेतृत्व करने, सभाओं और सम्मेलनों की अध्यक्षता करने के लिये बुलाया जाने लगा।

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मार्च 1929 में पांचवे काठियावाड़ राजनैतिक सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिये सरदार को बुलाया गया। उन्हीं दिनों महाराष्ट्र के कई हिस्सों में सरकार ने लगान में अनुचित वृद्धि की। काठियावाड़ के नेता चाहते थे कि सरदार न केवल सम्मेलन में आयें अपितु इस सम्मेलन में वे महाराष्ट्र में हुई कर वृद्धि के विरोध में एक आंदोलन की घोषणा करें और उस आंदोलन का नेतृत्व करना भी स्वीकार करें। सरदार को काठियावाड़ के नेताओं के बुरे हाल की जानकारी थी, इसलिये उन्होंने जाने से मना कर दिया। इस पर काठियावाड़ के नेता गांधीजी के पास गये और उनसे अनुरोध किया कि वे सरदार पटेल को आदेश दें ताकि सरदार, काठियावाड़ सम्मेलन की अध्यक्षता करें। गांधीजी ने सरदार के नाम आदेश भिजवा दिया।

इस प्रकार सरदार को काठियावाड़ सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिये जाना पड़ा। इस सम्मेलन में कई प्रस्ताव पारित किये गये तथा अंत में सरदार को अध्यक्षीय भाषण देने के लिये खड़ा किया गया। उनसे यह भी आग्रह किया गया कि वे महाराष्ट्र में कर वृद्धि के विरोध में किये जाने वाले आंदोलन का नेतृत्व करना स्वीकार करें। बारदोली आंदोलन की सफलता के बाद सरदार अत्यंत विनम्र हो गये थे किंतु स्पष्ट बोलने से परहेज भी नहीं करते थे।

इसलिये उन्होंने काठियावाड़ सम्मेलन में उपस्थित कांग्रेसियों को खरी-खरी सुनाते हुए कहा कि आपने प्रस्ताव तो बहुत पारित किये हैं किंतु वे व्यर्थ ही हैं, यदि उन पर अमल न हो। मैं देख रहा हूँ कि यहाँ नेता तो बहुत हैं किंतु संगठित एवं कर्मठ कार्यकर्ता नहीं हैं। कोई भी संघर्ष तब तक सफल नहीं होता जब तक उसके लिये बलिदान न दिया जाये। उन्होंने कहा कि मैं किसान का बेटा हूँ इसलिये मुझे मीठा बोलना नहीं आता किंतु यदि मैं अपनी बात से आपको सही रास्ता दिखाने का प्रयास करूं तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। मेरी स्पष्ट राय है कि किसी राजनैतिक मंच से चीखने-चिल्लाने से क्रांति नहीं होती।

वस्तुतः तब तक कांग्रेस की कार्यप्रणाली इसी प्रकार की ढुलमुल रवैये वाली थी जिसमें मंच से प्रस्ताव पारित किये जाते किंतु उन्हें कार्यान्वित करने के लिये कुछ नहीं किया जाता। सरदार के अतिरिक्तअन्य सभी नेताओं ने छोटे-मोटे आंदोलन किये थे जबकि गांधीजी ने कुछ बड़े किंतु असफल आंदोलन किये थे। इन असफलताओं का कारण यही था कि राजनैतिक मंच से क्रांति नहीं होती।

उनका अंत भी भयानक असफलताओं में हुआ था। इसलिये पटेल ने नेताओं को न केवल सच का दर्पण दिखाया अपितु कुछ दिनों तक महाराष्ट्र में घूमकर राष्ट्रीय जन-जागरण की अलख भी जगाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बालगंगाधर तिलक की अनुगूंज

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इस काल तक सरदार पटेल न केवल गुजरात कांग्रेस के अपितु अखिल भारतीय कांग्रेस के भी सर्वमान्य नेता बन गए थे। उन्होंने बोरसद, खेड़ा, अहमदाबाद एवं बारदोली में सफल आंदोलन चलाए थे। कांग्रेसी नेताओं को सरदार पटेल की वाणी में बालगंगाधर तिलक की अनुगूंज सुनाई देती थी।

अभी सरदार पटेल महाराष्ट्र में जन-जागरण के कार्य से निवृत्त हुए ही थे कि उन्हें चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने वेदारण्य में होने वाले तलिमनाडु राजनैतिक सम्मेलन की अध्यक्षता के लिये आमंत्रित किया। पटेल ने सदा की तरह अनिच्छा प्रकट कर दी। इस पर राजाजी ने गांधीजी से सम्पर्क किया। गांधीजी ने इस बार भी अपना आदेश दोहरा दिया और वल्लभभाई को तमिलनाडु जाना पड़ा।

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उन दिनों तमिलनाडु में ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों में वैमनस्य अपने चरम पर था। राजाजी ने पटेल से आग्रह किया कि वे इस दिशा में कुछ करें। पटेल ने इस सम्मेलन में भी लोगों से यह कहा कि केवल नारेबाजी करने और प्रस्ताव पारित करने से कुछ नहीं होता, ठोस रचनात्मक कार्य करें तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनायें। सम्मेलन के बाद पटेल ने तमिलनाडु के गांवों का व्यापक दौरा किया तथा ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मण समुदायों के लोगों से बात की। पटेल ने गैर-ब्राह्मण समुदायों के लोगों को समझाया कि क्या ब्राह्मणों ने आपका उतना बुरा कर दिया है, जितना अंग्रेजों ने किया है ? पांच हजार मील दूर से आकर वे आपके ऊपर शासन कर रहे हैं।

वे विजातीय हैं, फिर भी ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों ही समुदायों के लोग उनकी पूजा करते हैं! ब्राह्मण ऊँचे कैसे हैं ? सबसे ऊँचा तो वह है जो अन्न उपजाकर दूसरों को भोजन देता है। फिर आप ब्राह्मणों को ऊँचा और स्वयं को नीचा क्यों मानते हैं ? पटेल ने ब्राह्मणों को भी समझाया कि वे समस्त लोगों से बराबरी का व्यवहार करें। यही उचित है। यदि समाज एक नहीं हुआ तो हम विदेशी शासकों का राज समाप्त नहीं कर पायेंगे।

सरदार के शब्दों का जादू ऐसा था कि ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनोें ही समुदायों के लोगों पर उनकी बातों का गहरा असर पड़ा तथा उनके बीच के मनमुटाव में कमी आई।

अभी सरदार तमिलनाडु में ही थे कि गंगाधरराव देशपाण्डे ने उन्हें कर्नाटक में दो दिन का दौरा करने का निमंत्रण दिया। सरदार ने उस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। गंगाधरराव कर्नाटक में किसानों का एक संगठन बनाना चाहते थे। सरदार पटेल ने दो दिन में दस विशाल जनसभाओं को सम्बोधित किया तथा किसानों को निर्भय होने एवं संगठित होने के लिये प्रेरित किया।

उन्होंने किसानों को समझाया कि किसी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, न नौकरशाही से, न पुलिस से, न जेल से, न कुर्की से, न अत्याचार से। संगठित और निर्भय होकर इन समस्त समस्याओं का सामना किया जा सकता है। उन्होंने किसानों से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का भी आह्वान किया।

जब सरदार किसानों को सम्बोधित कर रहे थे तो गंगाधरराव को लगा जैसे बालगंगाधर तिलक बोल रहे हैं। उनकी वाणी में वही ओज, आंखों में वही आक्रोश दिखाई दिया। महादेव भाई ने भी सरदार के बारे में लिखा है कि उनकी वाणी में बाल गंगाधर की अनुगूंज सुनाई देती है। दोनों के हाव-भाव में भी समानता है। दोनों बाहर से जितने कठोर लगते हैं, अंदर से उतने ही कोमल हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बिहारी किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा

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जब से देश में तुर्कों का आगमन हुआ था, तब से पूरे देश के किसानों की हालत खराब होने लगी थी। मुगलों के काल में भी किसानों का बहुत शोषण हुआ। अंग्रेजों ने जमींदारी व्यवस्था को मजबूत करके किसानों के शोषण के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित कर दिया। बिहारी किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा!

कर्नाटक के दौरे के बाद सरदार पटेल ने बिहार में 15 दिन का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने सीतामढ़ी, मुंगेर, चम्पारण और गया में आयेजित जिला सम्मेलनों को सम्बोधित किया।

जब बिहार के लोगों को ज्ञात हुआ कि सरदार पटेल आये हैं तो दूर-दूर से लोग उन्हें सुनने के लिये आने लगे। बिहार के किसानों की दशा, गुजरात के किसानों से भी अधिक खराब थी। दोनों ही प्रांतों के किसानों को दिल्ली सल्तनत के काल में, मुगलों के काल में तथा परवर्ती शासकों के काल में बुरी तरह लूटा-खसोटा और बर्बाद किया गया था।

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बिहार के किसानों को बर्बाद करने में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी और अब ब्रिटिश ताज उनका शोषण कर रहा था। वल्लभभाई स्वयं एक किसान के पुत्र थे इसलिये किसानों की दुर्दशा को उनसे अधिक और कौन समझ सकता था। बिहारी किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा। उन्होंने बिहार के किसानों का आह्वान किया कि अपनी दुर्दशा को पहचानो और अपने अधिकारों के लिये संगठित होकर संघर्ष करो।

जमींदारों से मत डरो। किसान तो सबका अन्नदाता है, अतः वह सबसे श्रेष्ठ है, उन सबसे भी श्रेष्ठ है जो स्वयं को ऊँचे तबके का समझते हैं। सरदार के भाषणों से गरीब किसानों में नया जोश जगता था, वे अपनी मुक्ति के लिये छटपटा रहे थे किंतु वे नहीं जानते थे कि संगठित किस प्रकार हुआ जाता है और संघर्ष किस प्रकार किया जाता है। सरदार उन्हें दोनों ही तरीके समझा रहे थे। सरदार पटेल ने बिहार में एक नई बात देखी। उन्होंने देखा कि पर्दा प्रथा ने जिस बुरी तरह बिहार को जकड़ रखा है, उतनी बुरी तरह से देश के अन्य प्रांतों को नहीं। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संदेश दिया कि वे औरतों से पर्दा करवाना बंद करें। महिलाओं को चारदीवारी में कैद करके न रखें। ये हमारी माताएं, बहनें, बेटियां और पत्नी हैं। इनसे हर कार्य में सहयोग लें। सरदार ने बारदोली के आंदोलन में महिला स्वयं-सेवकों की टोलियों का गठन किया था जिन्होंने अद्भुत कार्य कर दिखाया था।

सरदार अब तक गुजराती बहिनों के उस योगदान को भूले नहीं थे। इसलिये वे बिहार के किसानों को बताते कि किस प्रकार बारदोली के आंदोलन में महिलाओं ने आगे बढ़कर सहयोग किया तथा किस प्रकार महिलाओं की दृढ़ता के कारण बारदोली के आंदोलनकारी अंत तक मोर्चे पर टिके रहे और सफलता लेकर ही माने।

बिहारी किसानों की दुर्दशा का कोई पार नहीं था किंतु उनके साथ बिहार के युवक भी बड़ी आशा भरी दृष्टि से सरदार पटेल की ओर देख रहे थे। सरदार ने नौजवानों को स्थान-स्थान पर सम्बोधित किया तथा उन्हें एक ही मंत्र दिया कि नारेबाजी बंद करके काम में जुट जाओ। जो काम करना चाहते हो, उसी को करने में अपनी पूरी ऊर्जा व्यय करो।

यदि राष्ट्र में क्रांति लानी है तो अपने जीवन में क्रांति लाओ। सरदार के पंद्रह दिन के दौरे ने बिहार जैसे पिछड़े राज्य में आशा की नई क्रांति उत्पन्न की और बिहार भी राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान देने के लिये तैयार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता

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सरदार पटेल और मोहनदास कर्मचंद गांधी दोनों गुजराती थे। इस समय तक गांधीजी को जितनी भी सफलता मिली थी, उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल का हाथ अधिक था। गांधीजी अपने दम पर अब तक कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सके थे। फिर भी गांधजी को पटेल की बजाय नेहरू अधिक पसंद थे। गांधीजी की इच्छा देखकर पटेल ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता करने से मना कर दिया!

कांग्रेस अब तक औपनिवेशिक राज्य को ही अपनी मुख्य मांग बताती आई थी औपनिवेशिक राज्य का अर्थ था अंग्रेजों की छत्रछाया में भारतीयों की ऐसी सरकार जिसमें कानून बनाने को सर्वोच्च अधिकार अंग्रेजों के पास रहें तथा भारतीय तत्व स्थानीय विषयों के सम्बन्ध में कानून बना सकें।

युवा नेताओं को औपनिवेशिक राज्य की मांग पसंद नहीं आती थी। वे पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित करना चाहते थे। युवा कांग्रेसियों को लगता था कि पूर्ण स्वराज्य हेतु संघर्ष करने के लिए सरदार पटेल ही सर्वाधिक उपयुक्त नेता हैं। इसलिए जब दिसम्बर 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन होना तय हुआ तो कांग्रेसियों ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए सरदार पटेल को अधिक उपयुक्त समझा।

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उस काल में ग्यारह ब्रिटिश प्रांत थे। इन सभी प्रांतों में प्रांतीय कांग्रेस का गठन हुआ था। समस्त प्रांतों से लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए सुझाव मांगे गए। दस प्रांतों से इस अधिवेशन के अध्यक्ष पद के लिये तीन नाम आये। पांच प्रांतों ने गांधीजी का, तीन प्रांतों ने सरदार पटेल का तथा दो प्रांतों ने जवाहरलाल नेहरू का नाम भेजा। गांधीजी चाहते थे कि जवाहरलाल को इस अधिवेशन की अध्यक्षता दी जाये, इसलिये उन्होंने स्वयं अध्यक्ष बनने से मना कर दिया। पटेल ने भी लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता करने से मना कर दिया।

जब लोगों ने पटेल से इसका कारण पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि मेरे सेनापति गांधीजी हैं, जहाँ वे रहेंगे, वहीं मैं रहूंगा। इस प्रकार जवाहरलाल को इस अधिवेशन की अध्यक्षता मिल गई।जवाहरलाल ने इस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हो गया। 31 दिसम्बर 1929 को जवाहरलाल ने रावी नदी के तट पर तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के संकल्प की घोषणा कर दी। यह एक नये संघर्ष का आरम्भ था। आगे का पथ कांटों से भरा था जिसमें मुसीबतों के अतिरिक्त और कुछ न था। देश के सामने आग का दरिया था जिसे डूबकर पार करना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सविनय अवज्ञा आंदोलन

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मोहनदास कर्मचंद गांधी का ई.1914 में भारतीय राजनीति में पदार्पण हुआ था। विगत 16 साल की दीर्घ अवधि में वे चम्पारन आंदोलन तथा सत्याग्रह आंदोलन चला चुके थे जिन्हें बिना किसी सफलता के बंद कर दिया गया था। ई.1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने की घोषणा की। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए सरदार पटेल ने जनता का आह्वान किया कि जब तोपों से गोले बरसते हैं, तभी इतिहास बनता है!

जब गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा की तो साबरमती से दाण्डी तक की पैदल यात्रा करके नमक कानून तोड़ने का कार्यक्रम बनाया। यह यात्रा 12 मार्च 1930 को आरम्भ होनी थी। गांधी ने इसे सफल बनाने की पूरी जिम्मेदारी सरदार पटेल पर डाल दी।

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सरदार अपना झोला उठाकर गुजरात के दौरे पर निकल गये और गांव-गांव जाकर उन्होंने गांधी की दाण्डी यात्रा की जानकारी दी तथा लोगों को सविनय अवज्ञा आंदोलन के महत्त्व के बारे में समझाया। उन्होंने अपने ओजस्वी वक्तव्यों से पूरे गुजरात में धूम मचा दी। वे लोगों को घरों से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने को कहते-

‘दुनिया आपसे सवाल करेगी कि आपने क्या किया ? मैं किसानों और दूसरों से पूछता हूँ कि आपकी ईश्वर में या स्वयं में आस्था है या नहीं ? क्या आप नहीं जानते कि जो जन्मा है, वह एक दिन अवश्य मरेगा। मौत से कोई नहीं बच सकता। इसलिए मरना है तो बहादुरों की मौत मरो। कायरों की नहीं। जब तोपों से गोले बरसते हैं, हवाई जहाजों से बम गिरते हैं, हजारों की संख्या में लोग मरते हैं, तभी इतिहास बनता है। वह दिन हमारे यहाँ कब आएगा ? वह दिन तभी आयेगा जब एक भी गुजराती, सरकार का साथ नहीं देगा। हम साबरमती के संत की बात को समझ लें तो यह सब आसान हो जायेगा। आवश्यकता इस बात की है कि आप अधिक से अधिक संख्या में गिरफ्तारियां दें।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी की दाण्डी यात्रा को सफल बनाने के लिये पटेल गांव-गांव घूमे

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गांधीजी की दाण्डी यात्रा को भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। इस यात्रा ने पूरे देश के लोगों का ध्यान कांग्रेस के कार्यक्रमों की तरफ खींचा। जब गांधीजी पैदल चले तो सैंकड़ों भावुक भारतीय भी इस आशा में उनके साथ हो लिए कि एक दिन यही व्यक्ति भारत को आजादी दिलवाएगा।

उधर गांधी, दाण्डी यात्रा की तैयारी कर रहे थे और इधर गांधीजी की दाण्डी यात्रा को सफल बनाने के लिये सरदार पटेल अपना झोला उठाये गांव-गांव जाकर भाषणों से आग बरसा रहे थे। सरदार ने लोगों को जानकारी दी कि सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान करबंदी, लगानबंदी, शराबबंदी, नमक सत्याग्रह, जंगल सत्याग्रह, गांजा, भांग और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना देने, सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और आदालतों का बहिष्कार करने एवं सरकारी कार्यक्रमों से असहयोग करने आदि कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।

पटेल के भाषणों से लोगों की समझ में आने लगा था कि सविनय अवज्ञा आंदोलन का क्या अर्थ है ! सरदार के इस अलख-जागरण से गोरी सरकार भयभीत हो गई। उसने सरदार के भाषणों पर रोक लगा दी किंतु सरदार ने अपना काम जारी रखा। दाण्डी यात्रा आरम्भ होने में अब केवल सात दिन बचे थे। 7 मार्च 1930 को बोरसद के निकट रास गांव में सरदार एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करने के लिये पहुंचे।

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जब वे सभा में जाने लगे तो मजिस्ट्रेट ने उन्हें रोककर भाषण न देने का आदेश दिया। सरदार ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस पर उन्हें तत्काल बंदी बनाकर बोरसद ले जाया गया जहाँ उन्हें तीन माह की कैद की सजा सुनाई गई। सरदार रास में एक शब्द भी भाषण नहीं दे पाये थे फिर भी उन्होंने इस सजा को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

एक दिन जिस युवक के नाम की पूरे लंदन में धूम मच गई थी आज उसी युवक को लंदन से आये गोरों ने उसके अपने देश में बंदी बना लिया था। जब यह समाचार देशवासियों को मिला तो देश में आक्रोश की ज्वाला फूट पड़ी। स्थान-स्थान पर धरने, प्रदर्शन, जनसभाएं होने लगीं। अहमदाबाद में विशाल जनसभा हुई। इस सभा में 75 हजार कण्ठ एक साथ यह शपथ लेने के लिये खुले कि जब तक देश स्वतंत्र नहीं होगा, वे सत्य तथा अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए, संघर्ष करते रहेंगे तथा अन्याय के समक्ष नहीं झुकेंगे। रास गांव से आये 500 लोग भी इस सभा में थे जहाँ सरदार अपना भाषण नहीं दे पाये थे। उन्होंने शपथ ली कि वे भी सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी निभायेंगे।

सरदार की लोकप्रियता अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। सैंकड़ों लोगों ने उनके मार्ग पर चलने के लिये सरकारी नौकरियां छोड़ दीं। ये त्यागपत्र इस बात की गवाही देते थे कि लोग अपने सरदार से कितना प्रेम करते थे। 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने 79 कार्यकर्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से समुद्र तट पर स्थित दाण्डी के लिये पैदल यात्रा आरम्भ की।

जिस समय गांधीजी की दाण्डी यात्रा आरम्भ हुई उस समय जेल में सरदार पटेल ने स्नान-ध्यान करके गीता का पाठ किया तथा भगवान से प्रार्थना की कि वे गांधी की यात्रा को सफल बनायें ताकि भारत की आजादी का मार्ग खुल सके। गांधी ने लगभग 200 मील की यात्रा 24 दिन में पूरी की।

5 अप्रैल 1930 को गांधीजी दाण्डी पहुंचे। 6 अप्रेल को आत्म-शुद्धि के उपरान्त गांधीजी ने समुद्र के जल से नमक बनाकर, नमक कानून भंग किया। गांधीजी की दाण्डी यात्रा को जो प्रसिद्धि मिली, उसके पीछे एक मात्र सरदार पटेल की ही तपस्या काम कर रही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत

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सरदार पटेल ने ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत करने के लिए खड़े होने से मना कर दिया!

सरदार पटेल किसी भी अंग्रेज का सम्मान नहीं करते थे। एक बार उन्होंने जेल में निरीक्षण करने आए ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत करने के लिए खड़े होने से मना कर दिया। इससे अंग्रेज बहुत कुपित हुए।

अंग्रेजों के शासन काल में ब्रिटिश अधिकारी स्वयं को भारत का स्वामी समझते थे और भारतवासियों को अपना गुलाम मानकर उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे। जब कोई अंग्रेज अधिकारी भारतीयों के समक्ष आता तो भारतीयों को विवश किया जाता कि वे अंग्रेज अधिकारी के स्वागत में उठकर खड़े हों, उसके सामने झुकें और यदि कोई भारतीय घोड़े पर सवार होकर जा रहा है तो वह अंग्रेज के स्वागत में घोड़े से उतर जाए।

सरदार पटेल को जेल में राजनीतिक कैदी की सुविधा नहीं दी गई अपितु सामान्य कैदियों के साथ रखा गया। उन्हें खाने के लिये ज्वार की रोटी, थोड़ी सी सब्जी या दाल दी जाती थी। सोने के लिये एक कम्बल दिया गया था। किसान के बेटे को इस प्रकार की जिंदगी में कोई कठिनाई नहीं हुई। वे जेल में गीता का पाठ करते और बंदियों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिये प्रेरित करते।

वल्लभभाई कभी भूलकर भी जेल कर्मियों पर क्रोध नहीं करते। यदि कोई कर्मचारी दुर्व्यवहार करता तो भी सरदार शांत रहते। वे कहते थे कि ये मेरे ही देशवासी हैं, यदि ये गोरे होते तो मैं इन्हें कुछ कहता। दुःख की बात है कि हमारे देशवासी, पेट भरने के लिये विदेशी गोरों की चाकरी करते हैं। यदि ये सरकार की नौकरी छोड़ दें तो सरकार एक दिन भी भारत में न टिक सके।

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एक बार कमिश्नर गेरेट जेल के दौरे पर आया। उसके सम्मान के लिये समस्त कैदियों को एक पंक्ति में खड़े होने के लिये कहा गया। सरदार ने ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत करने के लिए बनाई गई कैदियों की पंक्ति में खड़े होने से मना कर दिया और कहा कि ऐसा करना मेरे आत्म-सम्मान के विरुद्ध है। जेल का दौरा करने के बाद गेरेट ने सरदार से भेंट की। तब सरदार ने उससे कहा कि यदि आप यह सोचते हैं कि आपने नेताओं को जेल में बंद करके आंदोलन को दबा लिया है तो यह आपकी भूल है। करोड़ों भारतवासी आज भी अपनी आजादी के लिये संघर्षरत हैं।

यदि आप हमसे कोई बात करना चाहते हैं तो पहले समस्त नेताओं को जेल से रिहा कीजिये। गेरेट को सरदार की किसी बात का कोई जवाब नहीं सूझा, वह चुपचाप उठकर चला गया। गैरेट अच्छी तरह समझ गया था कि जिस बैरिस्टर ने ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत नहीं किया, वह बैरिस्टर सबके सामने उसकी कोई भी बेइज्जती कर सकता है।

सजा की अवधि पूरी होने पर 26 जून 1930 को सरदार को रिहा कर दिया गया। जब सरदार जेल से बाहर निकले तो उन्होंने पाया कि 6 मई को गांधीजी को बंदी बना लिया गया है और वे जेल जाने से पहले मोतीलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बना गये हैं। जब सरदार जेल से बाहर आये तो मोतीलाल ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 30 जून को मोतीलाल को भी बंदी बना लिया गया। इस कारण पार्टी की बागडोर पटेल के हाथों में आ गई।

जेल से बाहर आने पर पटेल को ज्ञात हुआ कि उनकी अनुपस्थिति में भी लोगों ने संघर्ष जारी रखा है। रास में, जहाँ पटेल की गिरफ्तारी हुई थी, सत्याग्रह अपने चरम पर था। लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाने का कार्यक्रम चला रखा था तथा सरकार को लगान नहीं दिया था।

गुजरात के गांव-गांव में नमक कानून का उल्लंघन किया जा रहा था। लोग विदेशी माल की होली जला रहे थे। महिलाएं बड़ी संख्या में एकत्रित होकर शराब की दुकानों पर धरने दे रही थीं। सरदार पटेल को इन सब बातों से बहुत संतोष हुआ। उनकी मेहनत रंग ला रही थी और लोगों में स्वतंत्रता के संस्कार जन्म ले रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिंह जेल में था और गीदड़ उसका घर खराब कर रहे थे

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सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान सरदार पटेल ने जनता में सरकार का विरोध करने का साहस संचारित किया जिसके कारण सरकार घबरा गई। सरकार ने सरदार पटेल को जेल में ठूंस दिया तथा सरदार की माता पर अत्याचार किया। यह वैसा ही था जैसे कि सिंह जेल में था और गीदड़ उसका घर खराब कर रहे थे!

अब सविनय अवज्ञा आंदोलन सरदार पटेल के हाथों में था इसलिये उसका तीव्र हो उठना स्वाभाविक था। सरदार पटेल की गर्जना से सरकार कांप उठी थी। यह कार्यक्रम इतनी तेजी पकड़ गया कि गोरी सरकार ने घबराकर कांग्रेेस कार्यसमिति की गतिविधियों पर रोक लगा दी और देश भर में उसके कार्यालयों को सील कर दिया।

इस पर सरदार पटेल ने सिंह-गर्जना की कि आज से देश का हर नागरिक हमारा कार्यकर्ता है तथा प्रत्येक घर हमारा कार्यालय है। यदि सरकार में ताकत है तो इस देश के सारे लोगों को बंदी बना ले और सारे घरों को सीज कर ले। इस सिंह-गर्जना से अंग्रेजों की आत्मा कांप उठी। उन्हें समझ में नहीं आया कि सरदार पटेल किस मिट्टी से बने हैं !

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कांग्रेस पर प्रतिबंध लगाने के बाद जब कार्यवाहियां और उग्र हो गईं तो सरकार ने सरदार को बंदी बनाने का निर्णय लिया।31 जुलाई 1930 को लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की 75वीं जयंती के उपलक्ष्य में सरदार पटेल ने बम्बई में एक विशाल जुलूस निकालने का निश्चय किया। सरकार ने जुलूस पर प्रतिबंध लगा दिया। लोग सरकारी आदेश के विरोध में सड़कों पर धरना देकर बैठ गये।

स्वयं सरदार पटेल उनका नेतृत्व कर रहे थे। लोग रात भर सड़कों पर बैठे रहे। पूरी रात बरसात हुई किंतु लोग डटे रहे। सरदार पटेल भी रात भर सड़क पर बैठे भीगते रहे। दिन निकलते ही सरकार ने सड़कों पर बैठे लोगों पर बेरहमी से लाठी चार्ज किया। औरतों और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। सरदार पटेल को भी लाठियों मारी गईं और उन्हें बंदी बना लिया गया। उन्हें फिर से तीन महीने की सजा सुनाई गई और यरवदा जेल भेज दिया गया।इधर सरदार जेल में थे और उधर पुलिस ने उनके परिवार को तंग करना आरम्भ किया। पुलिस ने सरदार के घर में घुसकर सरदार की 80 साल की वृद्धा माँ से दुर्व्यवहार किया।

विगत दो सौ वर्षों से अंग्रेज यह कहकर भारत पर शासन कर रहे थे कि वे असभ्य भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये आये हैं किंतु सरदार के निर्दोष परिवार और उनकी वृद्धा माता के साथ जिस तरह की असभ्यता बरती गई उसकी मिसाल इंसानियत के इतिहास में अन्यत्र मिलनी कठिन थी।

पुलिस उनकी रसोई में घुस गई और जिस हाण्डी में उन्होंने चावल बनाये थे, उस हाण्डी में कंकर-पत्थर डाल दिये। रसोई में रखा बहुत सा सामान घर से बाहर फैंक दिया। बाकी बचे हुए सामान में मिट्टी का तेल और धूल डाल दी गई।

यह खबर आनन-फानन में चारों ओर फैल गई। सिंह जेल में था और गीदड़ उसके घर को खराब कर रहे थे। हजारों लोग पुलिस वालों को मारने के लिये एकत्रित हो गये। किसी ने सरदार को जेल में सूचना पहुंचाई तो उन्होंने लोगों के नाम संदेश भिजवाया कि हिंसा न करें, शांति बनाये रखें। जनता ने सरदार का आदेश चुपचाप स्वीकार कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल की सिंह-गर्जना से गोरी सरकार कांप उठी

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सरदार पटेल कुशल वक्ता थे, अंग्रेजी कानून के ज्ञाता थे, उन्होंने लंदन में रहकर अंग्रेजी तौर-तरीके सीखे थे। निर्भय व्यक्तित्व के धनी थे और भारत माता को ब्रिटिश दासता से मुक्त करवाने के लिए जीवन समर्पित करते थे। इस कारण वे अपने भाषणों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आग उगलते थे। सरदार पटेल की सिंह-गर्जना से भयभीत गोरी सरकार ने उनके भाषणों पर कई बार प्रतिबंध लगाया।

सरदार पटेल को जेल भेज देने के बाद, गोरी सरकार ने बोरसद तथा बारदोली के समझौतों को तोड़ डाला तथा लोगों से बढ़ा हुआ कर वसूलना आरम्भ कर दिया। किसानों को विवश होकर पुराना आंदोलन फिर से आरम्भ करना पड़ा। जब पुलिस के अत्याचार बढ़े तो बहुत से किसान अपने परिवारों और मवेशियों को लेकर जंगलों में भाग गये। पुलिस वालों ने गांवों में रह गये बच्चों और स्त्रियों को निशाना बनाया।

वस्तुतः अंग्रेजों के समय से भारतीय पुलिस की जो छवि खराब हुई वह आजादी के बाद भी नहीं सुधर सकी। पुलिस ने अपने आप को कभी भी जनता का सेवक नहीं समझा। सरदार जेल से बाहर आये तो वे भी आंदोलन में कूद पड़े। उन्हें अपने साथ पाकर जनता का आत्मविश्वास लौट आया। इसी बीच एक अंग्रेज अधिकारी ने वक्तव्य दिया कि यदि समस्त किसानों ने कर नहीं दिया तो सरकार सबकी जमीनें छीन लेगी।

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इस पर सरदार ने जवाब दिया कि सरकार समस्त किसानों की जमीनें छीन लेगी तो राज किस पर करेगी ? सरदार ने किसानों का आह्वान किया कि जमीन जब्त होने से मत डरो। जब्त हुई जमीन फिर से लौट आयेगी। सरदार की सिंह-गर्जना से सरकार डर गई और उसने फिर से पटेल के भाषण देने पर प्रतिबंध लगा दिया।

ई.1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद भारत सरकार ने ग्यारह ब्रिटिश प्रांतों तथा 566 देशी रियासतों का एक संघ बनाने का मन बनाया। इस विषय पर भारत के राजनैतिक दलों, देशी रियासतों के शासकों एवं अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श करने के लिये 12 नवम्बर 1930 को लंदन में गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया। कांग्रेस ने इस सम्मेलन में सम्मिलित होने से मना कर दिया क्योंकि कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य घोषित कर चुकी थी तथा इस सम्मेलन में औपनिवेशिक राज्य के निर्माण पर विचार किया जाना था। कांग्रेस के भाग न लेने के कारण सम्मेलन का विफल हो जाना स्वाभाविक था किंतु प्रथम गोलमेज सम्मेलन में उपस्थित अन्य समस्त भारतीय पक्षों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा देशी राज्यों का एक संघ बने।

दिसम्बर 1930 में बम्बई में एक खादी भण्डार के उद्घाटन के अवसर पर सरदार ने सामान्य सा भाषण दिया किंतु उन्हें बंदी बना लिया गया क्योंकि सरकार ने उनके भाषण देने पर रोक लगा रखी थी। इस बार उन्हें 9 महीने की जेल हुई।

जब 1930 का प्रथम गोलमेज सम्मेलन विफल हो गया तो 1931 में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। सरकार जान गई थी कि जब तक कांग्रेस गोलमेज सम्मेलन में नहीं आयेगी, सम्मेलन सफल नहीं होगा। कांग्रेस के सभी बड़े नेता उस समय जेलों में थे इसलिये 25 जनवरी 1931 को विशेष आदेश जारी करके भारत सरकार ने कांग्रेस के 26 शीर्ष नेताओं को रिहा कर दिया ताकि कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिये मनाया जा सके। रिहा होने वाले नेताओं में सरदार पटेल भी थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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