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लाल कमल का फूल

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लाल कमल का फूल

हिन्दू संस्कृति में लाल कमल का फूल बहुत श्रद्धा से देखा जाता है। देवी लक्ष्मी कमल के आसान पर विराजमान हैं, भगवान विष्णु के हाथों में कमल का फूल है तथा ब्रह्माजी की पूजा कमल के फूलों से की जाती है। इस कारण 1857 की राष्ट्रव्यापी सशस्त्र क्रांति के समय लाल कमल का फूल क्रांति का संदेश फैलाने के लिए मुख्य प्रतीक के रूप में चुना गया।

लाल कमल का फूल तो सशस्त्र क्रांति की हुंकार का प्रतीक बना ही, इसके साथ रोटी भी रहस्यमय ढंग से हिन्दू सैनिकों के क्रोध की अभिव्यक्ति का प्रतीक बन गई जिसे अंग्रेजी सत्ता हिन्दुओं के मुंह से छीनकर इंग्लैण्ड ले जा रही थी।

18 अप्रेल 1857 को नाना साहब पेशवा जिन्हें पेशवा नाना साहब (द्वितीय) भी कहा जाता है, तीर्थयात्रा पूरी करके बिठूर लौट आया। इस बीच वह अवध की बेगम हजरत महल, मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर और बेगम जीनत महल आदि से मिलकर भारत-व्यापी सशस्त्र क्रांति की योजना के विचार को अंतिम रूप दे चुका था।

 इस प्रकार 1857 की क्रांति का वास्तविक जनक पेशवा नाना साहब (द्वितीय) को ही माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वही इस क्रांति का केन्द्रीय पात्र था। पेशवा ने क्रांति के भावी नेताओं से परामर्श करके दो मुख्य चिह्न निश्चित किए- एक था कमल का फूल और दूसरी थी- रोटी।

कमल का फूल उन पलटनों में घुमाया जाता था जो इस योजना में शामिल की जानी थीं। किसी एक पलटन का सिपाही फूल लेकर दूसरी पलटन में जाता था। उस पलटन में वह फूल समस्त भारतीय सिपाहियों के हाथों से होता हुआ अंत में जिसके हाथ में आता था, वह उसे अपने पास की दूसरी पलटन के भारतीय सिपाहियों तक पहुंचाता था। इसका गुप्त अर्थ यह था कि उस पलटन के सिपाही क्रांति में भाग लेने के लिए तैयार हैं।

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इसी तरह रोटी को एक गांव का चौकीदार दूसरे गांव के चौकीदार के पास ले जाता था। वह चौकीदार उस रोटी में से थोड़ी सी खुद खा लेता था और बाकी गांव के दूसरे लोगों को खिलाता था। वह गेहूं अथवा दूसरे आटे की रोटियां बनवा कर पास के गांव में पहुंचाता इसका मतलब यह होता था कि उस गांव की जनता निकट भविष्य में होने वाली राष्ट्रीय क्रांति के लिए तैयार है। कमल और रोटी के ये प्रतीक सारे भारत के गांवों में जितनी तेजी से पहुंचे उसे देखकर किसी को भी हैरानी हो सकती है!

कमल के फूल और रोटी के साथ पेशवा नाना साहब का एक संदेश भी पहुचाया जाता था। यह संदेश इस प्रकार था- ‘भाइयो! हम स्वयं विदेशी सरकार की तलवार अपने अंदर घुसा रहे हैं। यदि हम खड़े हो जाएं तो सफलता निश्चित है, कोलकाता से पेशावर तक का सारा मैदान हमारा होगा।’

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क्रांति के प्रचार के प्रतीक के रूप में रोटियों और लाल कमल के फूल का प्रयोग किया गया। क्रांति के प्रत्यक्षदर्शी अंग्रेज अधिकारी एवं लेखक सर जी. ओ. ट्रैवेलियन ने अपनी पुस्तक ‘कानपोर’ में लिखा है- ‘लाल कमल ने सचमुच सारी जनता को एक कर दिया है…….. बंगाल में जवान और किसान दोनों एक ही भाव, सब-कुछ लाल होने जा रहा है, की अभिव्यक्ति देते हुए पाये गये।’  

1857 की क्रांति के भुगतभोगी अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स थियोफिलस मेटकाफ ने अपनी पुस्तक ‘टू नेटिव नरेटिव्ज ऑफ द म्यूटिनी ऑफ डेल्ही’ में लिखा है- ‘बंगाल में ऐसी कोई छावनी या स्टेशन नहीं था जहाँ कमल का प्रसारण न हुआ हो…… षड्यंत्र के इस साधारण प्रतीक का प्रसारण अवध के विलीनीकरण के पश्चात् हुआ।’

उस काल के कलकत्ता तथा बैरकपुर सहित समस्त बंगाल में चल रही गतिविधियों से अनुमान होता है कि 1857 की क्रांति आरम्भ करने में पेशवा नाना साहब तथा उसके मंत्री अजीमुल्ला खाँ की जितनी बड़ी भूमिका थी, उतनी ही बड़ी भूमिका कलकत्ता में निर्वासन व्यतीत कर रहे अवध के नवाब वाजिद अली शाह तथा उसके वजीर अलीनकी खाँ की भी थी।

बंगाल आर्मी जो एशिया की सबसे बड़ी एवं आधुनिक फौज थी, उसके 1 लाख 39 हजार सिपाहियों में से 7 हजार 796 को छोड़कर बाकी सभी ने अपने ब्रिटिश स्वामियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था।  

कुछ भारतीय इतिहासकारों के अनुसार कमल का फूल और रोटी के प्रतीक चिह्न का प्रयोग होने की बात झूठी थी और यह अँग्रेज अधिकारियों द्वारा जानबूझ कर गढ़ी गई थी ताकि वे अपने द्वारा किये गये नर-संहार को यह कहकर उचित ठहरा सकें कि यह सरकार के विरुद्ध एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसे कुचला जाना आवश्यक था।

अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति आरम्भ होने के दिनों में लंदन से प्रकाशित होने वाली ‘टाइम्स’ मैगजीन का विशेष प्रतिनिधि सर विलियम हार्वर्ड रसल भारत में था। उसने लिखा-

‘यह कैसा युद्ध था जिसमें लोग अपने धर्म के नाम पर, अपनी कौम के नाम पर बदला लेने के लिए और अपनी आशाओं को पूरा करने के लिए उठे थे। उस युद्ध में समूचे राष्ट्र ने अपने ऊपर से विदेशियों के जुए को फेंक कर उसकी जगह देशी नरेशों की सत्ता और देशी धर्मों का अधिकार फिर से स्थापित करने का संकल्प लिया था’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंगल पाण्डे

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मंगल पाण्डे

मंगल पाण्डे ने अंग्रेज अधिकारी को गोली मारकर राष्ट्रव्यापी महाक्रांति का बिगुल बजा दिया!

26 फरवरी 1857 को कलकत्ता से 120 मील दूर स्थित बहरामपुर छावनी के सैनिकों को जैसे ही ज्ञात हुआ कि उन्हें गाय एवं सूअर की चर्बी से चिकने किए गए कारतूत दिए गए हैं तो भारतीय सिपाहियों ने चर्बी-युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। लॉर्ड केनिंग ने उस कम्पनी को भंग कर दिया। इससे अन्य सैनिक टुकड़ियों में असन्तोष फैल गया।

29 मार्च 1857 को कलकत्ता से 5 मील दूर स्थित बैरकपुर छावनी में 34वीं कम्पनी के सिपाही मंगल पाण्डे ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। उसने अपने साथियों को ललकारा- ‘तुम लोग धर्म के लिये संग्राम में उतर पड़ो।’ मंगल पाण्डे ने अपने अंग्रेज एडजुटेण्ट पर गोली चलाकर उसे मार डाला।

इस पर बर्मा से एक गोरी पलटन बैरकपुर बुलवाई गई जिसने मंगल पाण्डे को बन्दी बनाकर 8 अप्रेल 1857 को फांसी पर चढ़ा दिया। बैरकपुर में स्थित समस्त भारतीय सैनिकों के हथियार रखवा लिए गए तथा वायसराय के आदेश से पूरी कम्पनी को भंग कर दिया। भंग कम्पनी के सैनिकों ने अपने-अपने गांव पहुंचकर मंगल पाण्डे के बलिदान की गाथा लोगों को सुनाई। इससे भारत की विभिन्न छावनियों में स्थित सैनिकों में भी चर्बी-युक्त कारतूसों के विरुद्ध क्रांति करने की भावना जागृत हुई।

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डलहौजी द्वारा ई.1856 में अवध को अँग्रेजी राज्य में मिलाये जाने के कारण, अवध में अँग्रेजों के विरुद्ध भारी असन्तोष था। 2 मई 1857 को लखनऊ की अवध रेजीमेंट ने चरबी-युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। 3 मई 1857 को लखनऊ में सैनिक विद्रोह हुआ जिसे दबा दिया गया। 31 मई 1857 को एक बार पुनः विद्रोह फूट पड़ा। यह विद्रोह अवध राज्य के विभिन्न भागों में फैल गया।

अवध का नवाब वाजिद अलीशाह कलकत्ता में अँग्रेजों का बन्दी था, अतः विद्रोहियों ने उसके अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादर को नवाब घोषित करके शासन, बेगम हजरत महल को सौंप दिया। अवध के जमींदारों, किसानों और सैनिकों ने, बेगम हजरत महल की सहायता की। 20 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने अँग्रेजी सेना को परास्त कर दिया। ब्रिटिश सेना ने भागकर ब्रिटिश रेजीडेंसी में शरण ली।

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क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश रेजीडेंसी में आग लगा दी। इसके बाद अवध के अधिकांश ताल्लुकेदारों एवं जमींदारों ने अपनी जागीरों तथा जमींदारियों पर अधिकार कर लिया। लखनऊ में रह रहे अँग्रेजों की सहायता के लिए प्रधान सेनापति कॉलिन कैम्पबेल, आउट्रम तथा हेवलॉक अपनी-अपनी सेनाएं लेकर लखनऊ पहुंचे। नेपाल से गोरखा सेना बुलाई गई। 31 मार्च 1858 को अँग्रेजों ने लखनऊ पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके बाद भी ताल्लुकेदार छिपकर अँग्रेजों की हत्या करते रहे किन्तु मई 1858 में बरेली पर अँग्रेजों का अधिकार हो जाने पर अवध के क्रान्तिकारियों ने हथियार डाल दिये। इसके बाद अवध रेजीमंेट को भंग कर दिया गया।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतीय सैनिकों को दिए गए कारतूसों के चर्बी-युक्त होने की सूचना मेरठ छावनी में भी पहुँच गई। 24 अप्रैल 1857 को घुड़सवारों की एक सैनिक टुकड़ी ने इन कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। मेरठ छावनी का अधिकारी कारमाइकेल स्मिथ अत्यन्त घमण्डी था। उसने सैनिकों को 5 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। 9 मई 1857 को 85 सैनिकों को अपराधियों के कपड़े पहनाकर बेड़ियाँ लगा दी गईं।

कारमाइकेल ने भारतीय सैनिकों को चुनौती दी कि वे चाहें तो अपने साथियों के अपमान का बदला ले सकते हैं। 9 मई की शाम को जब कुछ सिपाही नगर में घूमने निकले तो राह चलती स्त्रियों ने उन पर ताने कसे। मुरादाबाद के तत्कालीन जज जे. सी. विल्सन ने लिखा है- ‘महिलाओं ने सिपाहियों से कहा, छिः! तुम्हारे भाई जेलखाने में हैं और तुम यहाँ बाजार में मक्खियां मार रहे हो। तुम्हारे जीने पर धिक्कार है।’

10 मई 1857 को सांय 5 बजे मेरठ की एक पैदल सैनिक टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह घुड़सवारों की टुकड़ी में भी फैल गया। कारमाइकेल जान बचाकर भाग गया। क्रांतिकारी सैनिक, जेल में घुसे और उन्होंने बन्दी सैनिकों की बेड़ियाँ काटकर उन्हें अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। इसके बाद अँग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार कर, वे दिल्ली की ओर चल पड़े। उस समय जनरल हेविट के पास 2,200 यूरोपीय सैनिक थे परंतु उसने इस प्रचण्ड विद्रोह को रोकने का साहस नहीं किया।

जहाँ भारतीय इतिहासकारों ने मंगल पाण्डे को अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का अग्रदूत बताया है, वहीं अंग्रेज इतिहासकारों ने मंगल पाण्डे की बगावत का इस क्रांति से कोई सम्बन्ध होना नहीं माना है। विलियम डैलरिंपल ने अपनी पुस्तक द लास्ट मुगल में लिखा है कि- ‘जब से विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक द इंडियन वॉर ऑफ इण्डिपेंडेंस 1857 प्रकाशित हुई, तब से बैरकपुर में मार्च की साजिश गदर का एक मुख्य हिस्सा बन गई जिसे बॉलीवुड की फिल्म मंगल पांडे ने और बढ़ावा दिया किंतु वास्तव में मंगल पाण्डे का इस गदर को कोई सम्बन्ध नहीं है जो दो महीने बाद मेरठ में आरम्भ हुआ था।’

वस्तुतः भारतीय इतिहासकारों एवं अंग्रेज इतिहासकारों के दृष्टिकोण में अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति को लेकर आरम्भ से ही विरोध रहा है। भारतीय इतिहासकार इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महान् आयोजन मानते हैं तो अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे असंतुष्ट भारतीय तत्वों की बगावत कहकर उसकी गरिमा को कम करने का प्रयास किया है।

फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति केवल किसी एक तत्व द्वारा आरम्भ की गई योजना के दायरों में सीमित नहीं थी, यह राष्ट्रव्यापी घटनाओं का एक असम्बद्ध किंतु दीर्घ सिलसिला थी।

इस क्रांति के बहुत से आयाम निःसंदेह बहुत महान् थे जिनमें 29 मार्च 1857 को आरम्भ हुई बैरकपुर की क्रांति, 10 मई 1857 को आरम्भ हुई मेरठ की क्रांति, 31 मई 1857 को आरम्भ हुई अवध की क्रांति, 8 जून 1857 को आरम्भ की गई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की गई क्रांति, मराठी ब्राह्मण तात्या टोपे द्वारा की गई क्रांति, पेशवा नाना साहब द्वारा बिठूर में की गई क्रांति, बिहार के जगदीशपुर के जागीरदार कुंवरसिंह की क्रांति, मध्य भारत के नीमच की क्रांति, राजपूताना के नसीराबाद, ऐरनपुरा, कोटा, देवली तथा आउवा की क्रांति, बिहार की दानापुर रेजिमेंट द्वारा की गई क्रांति, रामगढ़ की क्रांति तथा दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर हुई क्रांति की घटनाएं सम्मिलित थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

द लास्ट मुगल

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द लास्ट मुगल

बहादुरशाह जफर लाल किले में रहने वाला आखिरी मुगल था। इसलिए अंग्रेज उसे द लास्ट मुगल भी कहते थे। वह पूर्णतः ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार द्वारा दी जा रही पेंशन पर जीवित था। उसकी आय का कोई अन्य स्रोत नहीं था।

द लास्ट मुगल अर्थात् बहादुरशाह जफर पेंशन के पैसे पर अपने हरम की ढेर सारी शहजादियों, बेगमों, लौण्डियों एवं बांदियों को पालता था। शहजादे भी उसी पेंशन में से रोटी खाते थे। द लास्ट मुगल के पास अपना एक भी सिपाही नहीं था फिर भी उसने 1857 की सशस्त्र सैनिक क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार किया।

क्रांति के राष्ट्रव्यापी घटनाक्रम में आगे बढ़ने से पहले हमें लाल किले के भीतर के तत्कालीन परिदृश्य पर एक दृष्टि डालनी चाहिए। पाठकों को स्मरण होगा कि भारत में 19वें मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने चार विवाह किए थे जिनसे उसे 22 शहजादों की प्राप्ति हुई थी। इनमें से 6 शहजादे बहादुरशाह के जीवन-काल में ही मर गए थे।

अंग्रेज लेखक विलियम डैलरिम्पल ने अपनी पुस्तक द लास्ट मुगल में लिखा है कि बहादुरशाह जफर ने ई.1840 में 64 वर्ष की आयु में 19 वर्ष की जीनत महल से विवाह किया था। जीनत महल के पेट से एक शहजादे का जन्म हुआ था जिसका नाम जवांबख्श था।

जीनत से विवाह होने से पहले ताज बेगम, बादशाह की मुख्य बेगम हुआ करती थी। वह बहादुरशाह जफर के दरबार के एक संगीतकार की खूबसूरत बेटी थी। ईस्वी 1837 में जब बहादुरशाह जफर मुगलों के तख्त पर बैठा था, तब लाल किले में हुए समस्त समारोहों का प्रबंधन इसी हसीना ने अर्थात् ताजमहल ने किया था क्योंकि बहादुरशाह की दो बेगमें अशरफ महल तथा अख्तर महल इस समय तक पर्याप्त वृद्धा हो चुकी थीं।

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बहादुरशाह ताजमहल बेगम पर दिलो-जान से फिदा था किंतु एक बार बादशाह को संदेह हो गया कि बेगम ताजमहल, बादशाह के भतीजे मिर्जा कामरान से प्रेम करती है। इस पर बादशाह ने ताजमहल को जेल में बंद कर दिया। कुछ समय बाद परिवार के लोगों ने बीच-बचाव करके बेगम ताजमहल को कैद से मुक्त करवाया। ताजमहल जेल से तो बाहर आ गई किंतु वह जीवन भर बहादुरशाह और उसकी सबसे छोटी बेगम जीनत महल से रुष्ट रही।

हालांकि जीनत महल मुख्य बेगम बनी रही किंतु बहादुरशाह की चारों बेगमें अपने-अपने पुत्र को अगला बादशाह बनाना चाहती थीं। इसलिए लाल किले का वातावरण पूरी तरह विषाक्त हो गया था। जीनत महल का बेटा जवांबख्श बादशाह के 16 जीवित पुत्रों में से 15वें नम्बर का था किंतु जीनत महल चाहती थी कि हर हाल में जवांबख्श ही अगला बादशाह हो। इसके लिए वह कोई भी खतरनाक काम करने को तैयार थी।

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विलियम डैलरिंपल ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट मुगल’ में बहादुरशाह के कुछ शहजादों का उल्लेख किया है। उसके अनुसार सबसे पहले शहजादा मिर्जा दाराबख्त बहादुरशाह का उत्तराधिकारी घोषित हुआ जो कि बहादुरशाह जफर का सबसे बड़ा पुत्र था किंतु वह ई.1849 में बुखार आने से मर गया। इसके बाद मिर्जा फखरू को उत्तराधिकारी बनाया जाना था किंतु जीनत महल अपने आठ वर्षीय बेटे जवांबख्त को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित करने की जिद करने लगी तो बादशाह ने उत्तराधिकारी नियुक्त करने का प्रश्न टाल दिया।

ई.1856 में लॉर्ड डलाहौजी के स्थान पर लॉर्ड केनिंग कम्पनी सरकार का गवर्नर जनरल बनकर आया। केनिंग ने घोषणा की कि बहादुरशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी केवल शहजादे के रूप में जाना जायेगा। उसे बादशाह की उपाधि नहीं दी जायेगी। उसे लाल किला छोड़कर महरौली वाले महल में रहना होगा तथा उसे 15 हजार रुपये प्रतिमाह मामूली पेंशन दी जाएगी। बादशाह के सबसे बड़े जीवित पुत्र मिर्जा फखरू ने अंग्रेजों की इन समस्त शर्तों को स्वीकार कर लिया। कुछ स्थानों पर इस शहजादे का नाम मिर्जा कोयास लिखा हुआ मिलता है।

भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग तथा दिल्ली के रेजीडेंट थियोफिलस मेटकाफ द्वारा की जा रही इन कार्यवाहियों से लाल किले में अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष गहराने लगा। जब बहादुरशाह जफर को थियोफिलस मेटकाफ द्वारा मिर्जा फखरू को वली-ए-अहद बनाए जाने की सूचना मिली तो बादशाह ने अपरे दरबार में उपस्थित लोगों के सामने गुस्से का प्रदर्शन करते हुए कहा- ‘एक मरियल कुत्ते को गलती से भेड़िया समझा जा सकता है।’

बादशाह ने उसी समय मिर्जा फखरू का मकान, उसकी जमीन-जायदाद, ओहदा, उसके नौकर-चाकर सब छीन लिए और उन्हें मिर्जा फखरू के छोटे भाइयों में बांट दिया। बादशाह ने खुले आम यह घोषणा भी की कि जो कोई भी मिर्जा फखरू से मिलेगा, वह बादशाह का दुश्मन माना जाएगा।

बादशाह ने रेजीडेंट को भी एक पत्र लिखकर अपना रोष प्रकट किया- ‘ऐसा लगता है कि मेरे घराने का सिवाय नाम के कुछ और नहीं बचा है। बहुत खेद है कि ब्रिटिश शासन मेरी प्रसन्नताओं का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रख रहा है। इसलिए श्रेष्ठ यही होगा कि मैं ब्रिटिश शासन को और कष्ट न दूं तथा हज के लिए मक्का चला जाऊं और अपने जीवन के शेष दिन वहीं बिता दूं। मैंने यह दुनिया तो खो ही दी है, अब वो दुनिया भी क्यों खोऊं?’

ई.1856 में मिर्जा फखरू हैजे से मर गया। कहा जाता था कि उसे बेगम जीनत महल ने जहर दिलवा दिया था ताकि जवांबख्त को बादशाह का उत्तराधिकारी बनाने का रास्ता साफ हो सके।

बहादुरशाह का पुत्र मिर्जा मुगल वैसे तो पांचवे नम्बर का था किंतु जब मिर्जा फखरू की मृत्यु हुई तो जीवित शहजादों में मिर्जा मुगल ही सबसे बड़ा था। वह बेगम शरफुल महल का बेटा था जो एक सैदानी थी तथा जफर के हरम में काफी ऊंचे दर्जे पर थी। मिर्जा फखरू की मृत्यु के बाद बहादुरशाह ने मिर्जा मुगल को लाल किले का किलेदार बना दिया।

मिर्जा जफर का नौवां बेटा मिर्जा खिजर सुल्तान बहादुरशाह जफर की एक रखैल से उत्पन्न हुआ था इसलिए उसे बादशाह की नाजायज औलाद माना जाता था। वह बदचलन और आवारा किस्म का नौजवान था। वह अपने गुण्डों को भेजकर दिल्ली के किसी भी धनी-मानी व्यक्ति को उठवा लेता था तथा उससे फिरौती की राशि लेकर छोड़ देता था। ई.1857 की क्रांति के समय मिर्जा खिजर सुल्तान क्रांतिकारी सैनिकों से मिल गया किंतु बाद में दुश्मनों से रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। 

जीनत महल का बेटा जवांबख्त भी एक बिगड़ा हुआ स्वार्थी शहजादा था। उसके माता-पिता के अतिरिक्त संसार में और कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो जवांबख्त को पसंद करता हो। जब मेरठ के क्रांतिकारी दिल्ली आए तो जीनत महल ने जवांबख्त को क्रांतिकारियों से मेल-जोल करने से मना कर दिया। क्योंकि जीनत महल को आशा थी कि बगावत कुछ ही दिनों में थम जाएगी, तब जीनत महल अंग्रेजों से कहकर जवांबख्त को लाल किले का बादशाह बनवाने में कामयाब हो जाएगी।

इन दिनों लाल किले के शहजादों में मिर्जा अबू बकर भी खूब प्रसिद्ध था। वह बहादुरशाह जफर का पोता था और मरहूम शहजादे मिर्जा फखरू का बड़ा बेटा था। उसे शाही-खानदान में गुण्डे और बदमाश के रूप में जाना जाता था। बादशाह के सामने उन दिनों जो अर्जियां पेश की जाती थीं उनमें से ज्यादातर अर्जियां मिर्जा अबू बकर की बदमाशियों के बारे में होती थीं जिनमें वेश्यावृत्ति, बदमस्ती, नौकरों को कोड़े मारने, सिपाहियों पर हमला करने आदि शिकायतें होती थीं।

जब ईस्वी 1857 की क्रांति आरम्भ हुई तो मिर्जा अबू बकर ने कुछ क्रांतिकारी सिपाहियों को अपनी तरफ मिला लिया और उन्हें साथ लेकर गुड़गांव आदि क्षेत्रों में लूटपाट मचाने लगा। उसने मेरठ पर भी हमला किया किंतु वहाँ से हारकर भाग आया। अंत में गाजियाबाद के पास हिण्डन नदी के पुल पर अंग्रेजों ने उसे कड़ी शिकस्त दी।

इस समय लाल किले में बहादुरशाह जफर तथा उसकी बेगमों के साथ-साथ पूर्व बादशाहों की विधवा बेगमें, रखैलें, शहजादे एवं सलातीन भी रहते थे। बादशाह के लिए इन सबका पेट भर पाना अत्यंत कठिन था। इस कारण वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। इस समय लाल किला इतनी जबर्दस्त आंतरिक कलह में डूबा हुआ था कि वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर भी अंग्रजों का सामना करने की स्थिति में नहीं था। न ही वह क्रांतिकारियों का नेतृत्व करने की स्थिति में था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह जफर का हरम

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बहादुरशाह जफर का हरम

लाल किला गरीब था किंतु बहादुरशाह जफर का हरम आबाद था!

जब ईस्वी 1803 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार किया था तब लाल किला नितांत गरीब एवं असहाय था। बादशाह शाहआलम (द्वितीय) अंधा और बूढ़ा था किंतु जब ई.1806 में उसका पुत्र अकबरशाह (द्वितीय) बादशाह बना तो लाल किले की रंगीनियां लौट आईं।

पतन के गर्त में पोर-पोर डूब चुकी सल्तनत के मालिक होने के बावजूद बहादुरशाह जफर का हरम फिर से औरतों से भरने लगा था। बादशाह की अय्याशियां दिल्ली के नए मालिकों अर्थात् अंगेजों को भी प्रभावित करती थीं।

दिल्ली का पहला अंग्रेज रेजीडेंट डेविड ऑक्टरलोनी मुगल बादशाह की तरह जामा और पगड़ी पहनकर हाथी पर बैठकर दिल्ली की सड़कों पर निकला करता था। उसकी तेरह हिन्दुस्तानी बीवियां थीं। उसकी बेगमों में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख एवं ईसाई आदि सभी धर्मों की औरतें शामिल थीं।

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ऑक्टरलोनी की प्रमुख बेगम का नाम बीबी महरुतन मुबारकुन्न्सिा बेगम था। वह ऑक्टरलोनी की बेगमों में ससबे कम उम्र की थी तथा बूढ़े जनरल को अंगुलियों पर नचाया करती थी। जब तक ऑक्टरलोनी दिल्ली का रेजीडेंट रहा, दिल्ली की वास्तविक शासक यही महरुतन मुबारकुन्न्सिा बेगम रही।

वास्तव में वह पूना में नाचने वाली एक ब्राह्मण लड़की थी जो बाद में मुसलमान बना दी गई थी। डेविड ऑक्टरलोनी संध्या काल में हाथी पर बैठकर तथा अपनी तेरह बेगमों को अलग-अलग हाथी पर बैठा कर लाल किले की चार दीवारी के चारों ओर बनी सड़क पर हवाखोरी करने निकलता था।

भारत के कला संग्रहालयों में डेविड ऑक्टरलोनी के बहुत से चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें वह अपने दरबार में मसनद के सहारे अधलेटा होकर चांदी का हुक्का गुड़गुड़ाता हुआ दिखाई देता है। इस तरह और भी अंग्रेज अधिकारी थे जो उस जमाने में मुगल बादशाहों के हरम तथा उसकी संस्कृति की नकल करके स्वयं को कृतार्थ समझने लगे थे। दिल्ली का रेजेडेंट थियोफिलस मेटकाफ सुबह नाश्ता करने के बाद आधे घण्टे तक चांदी का हुक्का गुड़गुड़ाया करता था।

जब तक बहादुरशाह जफर बादशाह बना तब तक बादशाह को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से पन्द्रह लाख रुपया सालाना पेंशन मिलने लगी थी। बादशाह को लगभग अठारह लाख रुपए की वार्षिक आय अपनी निजी सम्पत्तियों के किराए से मिल जाती थी। बादशाह इस आय में से अपने हरम से लेकर, शहजादों एवं सलातीनों को उनके निजी खर्च के लिए हर महीने रुपए बंटवाता था। शाही परिवार के कुछ सदस्य लखनऊ में भी रहते थे, उन्हें भी बादशाह एक हजार रुपए प्रतिमाह भिजवाता था।

1850 के दशक में बादशाह बहादुरशाह जफर के शहजादों की आर्थिक स्थिति भले ही खराब हो किंतु बादशाह का अपना हरम पूरी तरह गुलजार था। उसकी चार विवाहिता बेगमों के साथ-साथ बहुत सी चहेती स्त्रियां भी रहती थीं जिन्हें इतिहासकारों ने बादशाह की रखैलें कहकर सम्बोधित किया है।

बादशाह का अधिकांश समय हरम में ही गुजरता था। विलियम डैलरिंपल ने लिखा है कि ई.1853 में कम से कम पांच ऐसी औरतें थीं जो बहादुरशाह की खिदमत अंजाम देती थीं। क्योंकि उसी साल जुलाई में जफर ने चांदी के पांच जोड़ी पलंग बनवाए थे। जफर के हरम में हर समय खूब रौनक रहती थी तथा उसके अस्सी साल के होने तक हरम इसी तरह गुलजार रहा।

विलियम के अनुसार जफर के 16 बेटियां और 31 बेटे थे। उसके अंतिम पुत्र अब्बास के जन्म के समय बादशाह पूरे सत्तर साल का था। जफर का हरम अनुशासन और सुरक्षा की कमी के कारण काफी बदनाम था। एक बार बादशाह की खास रखैल पिया बाई तानरस खान नामक एक दरबारी से गर्भवती हो गई। कई अन्य रखैलों पर भी कई बार खुले आम आपत्तिजनक आरोप लगे।

शहजादे जवांबख्त के विवाह से दो माह पहले एक सिपाही जो किले के यमुना के नीचे के किनारे खुलने वाले पानी दरवाजे के पहरे पर था, वह बादशाह के हरम की एक दासी से प्रेम करने लगा तथा उससे मिलने के लिए चोरी-छिपे बादशाह के महल में जाने लगा। यह दासी बहादुरशाह की भी रखैल थी।

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जब यह बात बादशाह तक पहुंची तो उसने सिपाही को पकड़वाकर उसमें कोड़े लगवाए तथा जंजीरों से बांधकर जेल में डलवा दिया। दासी को चक्की पीसने की सजा दी गई। लाल किले की 1 फरवरी 1852 की दैनिक डायरी में लिखा है कि- ‘बादशाह ने किले के प्रबंधक को बुलाकर उससे कहा कि बादशाह जनाने के प्रबंध से बेदह अप्रसन्न है। सारे चौकीदार और चोबदार हर समय गायब रहते हैं। इस कारण बाहर के लोग आसानी से जनाने में आ-जा सकते हैं।’

बादशाह की रखैल चांदबाई ने बादशाह को बताया कि ख्वाजासराओं द्वारा रोके जाने के बावजूद नबी बख्श जबरदस्ती सुल्तान बाई के घर में घुस गया। ऐसा लगता है कि उस समय जनानखाने में बिल्कुल अफरा-तफरी मच गई।

विलियम ने लिखा है- ‘बहादुरशाह में कई खूबियां हो सकती हैं किंतु हरम को काबू में रखना उसके वश में नहीं था।’

मुगलों का हरम धरती भर में सबसे अधिक चमक-दमक वाली एवं मजबूत संस्था हुआ करता था किंतु बादशाह की तमाम रंगीन तबियत के बावजूद उसका हरम गुजरे हुए जमाने का खण्डहर मात्र ही प्रतीत होता था। शहजादे भी हरम में ही रहते थे। उन्हें पढ़ाई-लिखाई सीखने, शिकार पर जाने, कबूतरवाजी या बेटेरबाजी करने की पूरी छूट थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भूखे-नंगे शहजादे

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भूखे-नंगे शहजादे

अठारह सौ सत्तावन के लाल किले दो हजार भूखे-नंगे शहजादे बंद थे! इन शहजादों को सलातीन कहा जाता था। इनकी जिंदगी दिल्ली के किसी मुसलमान मजदूर से भी बुरी थी।

अठारह सौ सत्तावन के लाल किले में केवल बादशाह, उसकी बेगमें और उनके शहजादे ही नहीं रहते थे, अपितु लगभग दो हजार सलातीन भी लाल किले के स्थाई निवासी थे। भूखे-नंगे शहजादे अर्थात् सलातीनों में बाबर से लेकर बहारुदरशाह जफर के पूर्ववर्ती तमाम मुगलिया बादशाहों की औलादों की औलादें, पोतों के पोते, पड़पोतों के पड़पोते, पीढ़ी दर पीढ़ी बूढ़ी होती जा रही, जवान, किशोरी और शिशु शहजादियां सम्मिलित थीं। लाल किले में रह रहे सलतीनों की संख्या इस समय लगभग दो हजार थी।

ये भूखे-नंगे शहजादे चूंकि तैमूरी और चंगेजी शाही खानदान के थे, इसलिए कोई काम नहीं करते थे। सेनाएं भंग हो चुकी थीं, अन्यथा यही शहजादे मुगल सेनाओं के बड़े-बड़े जनरल, सूबेदार और आला अफसर होते किंतु अब वे बादशाह से मिलने वाली पेंशन पर अपना गुजारा किया करते थे।

जब तक सल्तनत कायम थी तब तक सलातीनों की जिंदगी बेहतर थी किंतु जैसे ही ई.1739 में नादिरशाह लाल किले को लूटकर और शाही खजाने में झाड़ू लगाकर चला गया, तब से इन सलातीनों की हालत खराब होने लगी और वे गरीबी तथा अभाव में अपना जीवन बिताने लगे। ये भूखे-नंगे शहजादे मानवता के नाम पर काला दाग थे, उससे अधिक कुछ नहीं थे।

ई.1754 में जब मीरबख्शी गाजीउद्दीन इमादुलमुल्क ने बादशाह अहमदशाह बहादुर को अंधा करके जेल में डाला था और आलमगीर (द्वितीय) को बादशाह बनाया था, तब से बादशाह की आय निरंतर घटती जा रही थी और लाल किले में सलातीनों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी। इस कारण भी सलातीनों की जिंदगी नारकीय हो गई।

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चूंकि इन सलातीनों के परिवार कुछ नहीं करते थे इसलिए सलातीन और उनके परिवारों के सदस्य हर समय किसी न किसी बात पर आपस में झगड़ते रहते थे। अशिक्षा, गरीबी एवं बेरोजगारी के कारण सलातीनों के परिवार अशिक्षित, अर्द्धसभ्य एवं झगड़ालू बन चुके थे। इस कारण लाल किले का मुख्य हिंजड़ा महबूब अली, बेगम जीनत महल के कान भर कर उन्हें सजा दिलवाता रहता था।

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अंग्रेजों के दिल्ली में आ जाने से दरियागंज तथा चांदनी चौक सहित शाहजहानाबाद का अधिकांश हिस्सा नई रौनकों से गुलजार हो उठा था किंतु सलातीनों के लिए वहाँ जाकर अपना भाग्य नए सिरे से तलाशना संभव नहीं था। अधिकतर सलातीन अपनी तंग कोठरियों में बंद रहते थे, उन्होंने शायद ही कभी बहादुरशाह जफर की रंगीन जिंदगी को अपनी आंखों से देखा था। क्योंकि किसी भी सलातीन को उस ऊंची दीवार को फांदकर लाल किले के उस हिस्से में आने की अनुमति नहीं थी जिस हिस्से में बादशाह का हरम था, रूप से दमदमाती जवान औरतें थीं, बांके शहजादे थे और स्वयं बहादुरशाह जफर का दरबार था।

एक अंग्रेज द्वारा लिखे गए विवरण के आधार पर विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘सलातीन के निवास में एक बहुत ऊंची दीवार है ताकि कोई उनको नहीं देख पाए। इसके अंदर उनके लिए छप्पर वाली अनेक झौंपड़ियां हैं। जहाँ यह बेचारे रहते हैं। जब दरवाजे खुले तो बहुत से अधनंगे, भूखे, मुसीबत जदा लोगों ने हमको घेर लिया। उनमें से कुछ तो अस्सी साल के थे और बिल्कुल प्राकृतिक अवस्था में थे, अर्थात् नंगे थे।’

बादशाह बहादुरशाह जफर के मन में तैमूरी और चंगेजी खानदान की इन उम्दा नस्लों के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी। बादशाह का विचार था कि लाल किले में हो रही अधिकतर चोरियों और झगड़ों के लिए केवल सलातीन जिम्मेदार हैं।

एक बार एक चोर किले की दीवार पर देखा गया। जब बादशाह को यह बात बताई गई तो उसने कहा कि अवश्य ही वह कोई सलातीन होगा। वे एक-दूसरे के यहाँ चोरी करते हैं और शराब पीकर झगड़ा करते हैं।

जब बादशाह को सूचना दी गई कि जूनियर सलातीनों में से एक मिर्जा महमूद सुल्तान पागल हो गया है और रात के समय किले में घूमता रहता है तो बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पैरों में जंजीरें डालकर कैद कर दिया जाए। जब कभी सलातीन बगावत कर देते तो बादशाह के सामने बहुत बड़ी कठिनाई उत्पन्न हो जाती। दो बार उन सबने मिलकर अंग्रेज रेजीडेंट को अर्जी भिजवाई कि उनके बुनियादी अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

ईस्वी 1847 में जब बहादुरशाह को गद्दी पर बैठे हुए 10 साल हो गए तब सलातीनों ने अंग्रेज रेजीडेंट मेटकाफ को प्रार्थनापत्र भिजवाया कि उन पर जुल्म किया जा रहा है।दिल्ली के बादशाह के व्यवहार और स्वभाव के कारण हमारी पस्थितियां अत्यंत निर्धन और अपमानयुक्त हो गई हैं। बादशाह के केवल गलत नौकरों की बात सुनते हैं तथा ख्वाजासरा महबूब अली हमें तरह-तरह अपमानित करता है।

इसके एक साल बाद फिर सलातीन ने एक और बगावत की। इस समय उत्तर-पश्चिम सूबों का अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर दिल्ली आया। उस वक्त एक चर्मी कागज उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया जिस पर डेढ़ सौ से अधिक सलातीन की मुहर लगी हुई थी। इसमें गवर्नर से प्रार्थना की गई थी कि वे सलातीन की रक्षा करें तथा बहादुरशाह जफर ने वली अहद को मैटकाफ से मिलने तथा सलातीन की मुसीबतों के बारे में बात करने से मना कर दिया है।

अंग्रेज इतिहासकार रसेल ने उस काल के लाल किले के भीतर रह रहे मुगलों की दयनीय अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘हमने उनकी दुर्दशा करके उन पर गरीबी और कर्ज लादकर उन्हें महल में बंद कर दिया और उन पर आरोप लगाया कि वे आलसी, नीच और इंद्रिय परायण हैं। हमने उनसे हर इज्जत और महत्वाकांक्षा छीन ली है।’

इस प्रकार जिस समय बादशाह ने मेरठ से आए क्रांतिकारियों के कहने से क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार किया, उस समय लाल किले तथा कम्पनी सरकार के बीच तनाव अपने चरम पर था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सर चार्ल्स मेटकाफ

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सर चार्ल्स मेटकाफ

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में इंग्लैण्ड से बहुत से परिवार आकर भारत में बस गए थे। ये अंग्रेज कम्पनी में बड़े-बड़े पदों पर काम करते थे। सर चार्ल्स मेटकाफ का परिवार भी उनमें से एक था। मेटकाफ परिवार ने लाल किले को दयनीय बना दिया था!

अंग्रेजों ने ई.1803 में दिल्ली पर अधिकार किया था। तब से ही वे लाल किले की जड़ें खोदकर लाल किले को कमजोर करते आ रहे थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में भेजे जाने वाले अंग्रेज लड़के 18-20 साल से लेकर 20-25 साल की आयु के होते थे जो रातों-रात अमीर बन जाने के लालच में अपना देश छोड़कर सात समंदर पार करके भारत आया करते थे।

ये अंग्रेज लड़के कम्पनी सरकार में बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त किये जाते थे। इन्हें जीवन का कोई अनुभव नहीं होता था। इनमें से अधिकांश लड़के निहायत ही बदतमीज, बददिमाग और लालची होते थे। वे भारत की अपार सम्पदा, बड़े-बड़े महलों तथा हीरे-मोतियों के ही भूखे नहीं होते थे, अपितु भारतीय औरतों पर भी कुदृष्टि रखा करते थे।

भारत में नियुक्त होकर आए इन्हीं लड़कों में से एक था सर चार्ल्स मेटकाफ जो 19 वर्ष की आयु में ई.1804 में जनरल लेक का पॉलिटिकल असिस्टेंट नियुक्त हुआ था। यह वही जनरल लेक था जिसने ई.1803 में दिल्ली पर आक्रमण करके मराठों को परास्त किया था।

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ईस्वी 1811 से 1819 तथा 1826 से 1832 तक दिल्ली का रेजीडेंट रहा सर चार्ल्स मेटकाफ अत्यंत चालाक व्यक्ति था। उसने शालीमार बाग में अपने लिए एक शानदार बंगला बनवा रखा था और एक खूबसूरत सिक्ख लड़की से विवाह करके उस बंगले में रहा करता था। वह बादशाह के साथ तमीज से पेश आता था किंतु उसकी कोई बात नहीं मानता था तथा बादशाह की गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण रखता था। कुछ दिन बाद उसने अपनी हिन्दुस्तानी पत्नी को छोड़ दिया तथा अंग्रेजी मेम के साथ रहने लगा।

चार्ल्स मेटकाफ शुरु में तो लाल किले में बैठे मुगल बादशाह अकबर शाह को सम्मान देता था किंतु बाद में उसे नापसंद करने लगा था। एक स्थान पर चार्ल्स मेटकाफ ने लिखा है – ‘मैंने तैमूर घराने से अपनी पहले की वफादारी छोड़ दी है।’

ई.1813 में चार्ल्स मेटकाफ ने अपने छोटे भाई सर थॉमस मेटकाफ को भी इंग्लैण्ड से भारत बुला लिया तथा अपने कार्यालय में उच्च पद पर नियुक्त कर दिया।

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जब ई.1832 में चार्ल्स मेटकाफ दिल्ली छोड़कर कलकत्ता चला गया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कलकत्ता कौंसिल का सदस्य बन गया तो उसके स्थान पर हार्वे दिल्ली का रेजीडेंट बना। उस समय बादशाह द्वारा दिल्ली के रेजीडेंट को जो पत्र लिखा जाता था, उसमें रेजीडेंट को ‘फरजंदे अंजुमंद’ कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- ‘प्रिय पुत्र!’ नए रेजीडेंट को यह सम्बोधन पसंद नहीं था। वह तो स्वयं को बादशाह का मालिक समझता था। इसलिए हार्वे ने बादशाह को बात-बात पर अपमानित करना आरम्भ किया ताकि बादशाह स्वयं ही नाराज होकर रेजीडेंट को ‘फरजंदे अंजुमंद’ लिखना बंद कर दे।

अंग्रेज रेजीडेंट अब तक बादशाह को अपने पत्रों के आरम्भ में ‘योअर मेजस्टी’ कहकर सम्बोधित करते थे तथा पत्र के अंत में ‘योअर मेजस्टी’ज फेथफुल सर्वेंट’ लिखा करते थे किंतु अब वे अपने पत्रों के आरम्भ में बादशाह के लिए ‘डीयर’ शब्द का प्रयोग करने लगे। इस प्रकार रेजीडेंट हार्वे ने बादशाह को अच्छी तरह याद करवा दिया कि अब अकबरशाह हिंदुस्तान का बादशाह नहीं है, उसे तो बादशाह के नाम से केवल याद किया जाता है।

हालांकि गवर्नर जनरल द्वारा बादशाह को लिखे जाने वाले पत्रों में अब भी जो मुहर लगती थी, उसमें गवर्नर जनरल स्वयं को ‘फिदवी ए खास’ अर्थात् ‘मुख्य सेवक’ लिखता था।

रेजीडेंट हार्वे के बाद पूर्ववर्ती रेजीडेंट सर चार्ल्स मेटकाफ का भाई सर थॉमस मेटकाफ ईस्वी 1835 में दिल्ली का रेजीडेंट नियुक्त हुआ। वह 18 साल तक अर्थात् ई.1853 तक इस पद पर रहा। इस बीच ईस्वी 1837 में अकबरशाह की मृत्यु हो गई तो उसने अकबरशाह के पुत्र बहादुरशाह जफर की सहायता की ताकि बहादुरशाह बादशाह बन सके जबकि अकबरशाह अपने बड़े पुत्र जहांगीर को बादशाह बनाना चाहता था।

ईस्वी 1852 में मिजेली जॉन जेनिंग्स नामक एक ईसाई पादरी दिल्ली में नियुक्त होकर आया। उसने लाल किले में ही रहने का निश्चय किया ताकि वह लाल किले में रहने वाले शाही परिवार के साथ घुल-मिलकर उसे ईसाई बन सके। मिजेली जॉन जेनिंग्स ईसाई धर्म के प्रचार के लिए इतना उतावला था कि वह तुरंत ही समस्त भारतीयों को ईसाई बना देना चाहता था। यहाँ तक कि स्वयं अंग्रेज भी उसे पसंद नहीं करते थे और उसे धर्मांध कहते थे। जब उसने दिल्ली के दो विख्यात हिन्दुओं- चमनलाल और मास्टर ताराचंद को ईसाई बना लिया तो मिजेली जॉन जेनिंग्स पूरी दिल्ली में बदनाम हो गया।

ईस्वी 1853 में बहादुरशाह जफर की सबसे छोटी बेगम जीनत महल ने सर थॉमस मेटकाफ से सम्पर्क किया तथा उससे कहा कि वह जीनत के पुत्र जवांबख्श को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दे। शहजादा जवांबख्श बहादुरशाह के 16 बेटों में से 15वां था। इसलिए सर थॉमस मेटकाफ ने जीनत का प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा यहाँ तक कह दिया कि बहादुरशाह जफर अंतिम बादशाह है, उसके बाद कोई बादशाह नहीं होगा।

सर थॉमस मेटकाफ ने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध, बहादुरशाह के सबसे बड़े जीवित पुत्र मिर्जा फखरू को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों द्वारा मिर्जा फखरू से संधि की गई कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद दिल्ली का लाल किला खाली कर देगा, स्वयं को बादशाह नहीं कहेगा तथा एक लाख रुपये के स्थान पर 15 हजार रुपये मासिक पेंशन स्वीकार करेगा।

इस पर बेगम जीनत महल ने ई.1853 में रेजीडेंट थॉमस मेटकाफ को जहर दे दिया जिससे थॉमस मेटकाफ की मृत्यु हो गई। डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि सर थॉमस मेटकाफ की मृत्यु मैदे की खराबी से हुई थी किंतु उनका यह भी विचार था कि यह खराबी जहर के कारण हुई थी। इस घटना के बाद लाल किले तथा अंग्रेजों के बीच इतने दिन से सदाशयता का जो प्रदर्शन चल रहा था, वह भी जाता रहा।

इस घटना के तीन साल बाद ई.1856 में शहजादा मिर्जा फखरू भी हैजे से मर गया। उसके बारे में लाल किले में यह अफवाह उड़ी कि शहजादे को जहर दिया गया था।

जिस समय ई.1857 की बगावत हुई तब थॉमस मेटकाफ का बेटा सर थियोफिलस मेटकाफ दिल्ली में कम्पनी सरकार की अदालत में लोअर मजिस्ट्रेट था। उस समय वह अकेला अंग्रेज अधिकारी था जो क्रांतिकारी सैनिकों से बचकर दिल्ली छोड़कर भाग जाने में सफल हुआ था। पहाड़गंज पुलिस स्टेशन के थानेदार मुइनुद्दीन खाँ ने थियोफिलस मेटकाफ को दिल्ली से जीवित ही निकल भागने में सहायता की थी। यह थानेदार उर्दू के विख्यात शाइर मिर्जा गालिब का चचेरा भाई था।

कुछ माह बाद जब अंग्रेजों ने दुबारा दिल्ली पर हमला किया तब सर थियोफिलस मेटकाफ कम्पनी सरकार की दिल्ली फील्ड फोर्स में भरती हो गया तथा उसने लाल किले में बहुत रक्त-पात मचाया।

सर थॉमस मेटकाफ का एक जंवाई भी उन दिनों दिल्ली में तैनात था जिसका नाम सर एडवर्ड कैंपबैल था। वह दिल्ली में नियुक्त ब्रिटिश सेना का कमांडर इन चीफ था। जब उसकी रेजीमेंट ने विद्रोह किया तब वह भी दिल्ली से भाग खड़ा हुआ और बाद में दिल्ली फील्ड फोर्स में भरती होकर दिल्ली लौटा। उसने अंग्रेजों की सेना को दिल्ली में थामे रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली में खूनी क्रांति

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दिल्ली में खूनी क्रांति

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति की आग भले ही बंगाल, मेरठ और कानपुर में सुलगी हो किंतु इस आग ने दिल्ली में खूनी क्रांति का रूप ले लिया। क्रांतिकारियों के हौंसले देखकर बहादुरशाह जफर ने राष्ट्रव्यापी क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया!

11 मई 1857 को दिल्ली की सड़कों पर सवेरा अभी उतर ही रहा था, जीवन की हलचल अभी आरम्भ भी नहीं हुई थी कि तभी मेरठ से आए सिपाहियों का एक दस्ता चुपचाप यमुना पार करके दिल्ली शहर में पहुंचा। इन सैनिकों ने चुंगी के एक दफ्तर में आग लगा दी और फिर लाल किले की तरफ बढ़ गए।

सिपाहियों के शहर में प्रवेश करते ही दिल्ली जैसे नींद से जाग उठी। दिल्ली के बहुत से लोग भीड़ के रूप में इन सिपाहियों के पीछे हो लिए। भविष्य में होने वाली किसी बड़ी घटना के बारे में सोचकर सब रोमांचित थे। यह दिल्ली में खूनी क्रांति की शुरुआत थी।

राजघाट दरवाजा पार करके ये सिपाही लाल किले के भीतर पहुंचे। सिपाहियों का यह दस्ता बादशाह से अपील करने आया था कि बादशाह इन सिपाहियों का नेतृत्व स्वीकार करे तथा कम्पनी सरकार को भारत से बाहर निकालकर भारत का शासन ग्रहण करे।

बहादुरशाह जफर इस समय 69 वर्ष का हो चुका था तथा इस अवस्था में नहीं था कि वह किसी युद्ध या क्रांति में भाग ले फिर भी बहादुरशाह ने मेरठ से आए क्रांतिकारी सैनिकों से बात की। उसने क्रांतिकारी सैनिकों से स्पष्ट कहा- ‘मेरे पास इतना धन नहीं है कि मैं तुम्हें वेतन दे सकूं। न मेरे पास कोई सल्तनत है जिसकी अमलदारी में तुम्हें रख सकूं। ‘

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क्रांतिकारी सिपाहियों ने बादशाह से कहा- ‘हम अपना मजहब और विश्वास बचाने के लिए जमा हुए हैं। हमें बादशाह से वेतन नहीं चाहिए। हम आपके पाक कदमों पर अपनी जान कुर्बान करने आए हैं, आप तो केवल हमारे सिर पर हाथ रख दें।’

बादशाह ने उनकी यह बात मान ली। इस प्रकार 12 मई 1857 को मेरठ से आए क्रांतिकारियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफर ने क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। बादशाह की तरफ से एक ऐलान जारी किया गया कि- ‘यह एक मजहबी जंग है और मजहब के नाम पर लड़ी जा रही है। इसलिए तमाम शहरों और गांवों के हिन्दुओं और मुसलमानों का फर्ज है कि वे अपने-अपने मजहब और रस्मो-रिवाज पर कायम रहें और उनकी हिफाजत करें।’

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दिल्ली में खूनी क्रांति करने के इच्छुक क्रांतिकारी सैनिकों ने लाल किले में प्रवेश करके बादशाह को 21 तोपों की सलामी दी तथा उसे फिर से सम्पूर्ण भारत का बादशाह घोषित कर दिया। लाल किले पर एक बार फिर से मुगलों का झण्डा गर्व से फहराने लगा। क्रांतिकारी सैनिकों के अनुराध पर बादशाह ने दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों को लिखित आदेश भिजवाए कि वे दिल्ली में स्थित समस्त अंग्रेजी शस्त्रागार बादशाह को सौंप दें। दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह के ये आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर शस्त्रागारों में नियुक्त भारतीय सिपाहियों ने अंग्रेजों से बगावत करके उन्हें मारना आरम्भ कर दिया। अंग्रेज अधिकारी समझते थे कि यदि दिल्ली के शस्त्रागारों का गोला-बारूद क्रांतिकारी सैनिकों के हाथों में पहुंच गया तो अंग्रेजों के शासन को समाप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा। इसलिए दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने दिल्ली में स्थित समस्त शस्त्रागारों में स्वयं ही आग लगा दी। इन शस्त्रागारों में रखे बारूद में विस्फोट हो जाने से पूरी दिल्ली धमाकों से दहल गई। क्रांतिकारी सैनिकों ने कर्नल रिपले सहित अनेक अँग्रेज अधिकारियों को मार डाला तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

अंग्रेज अधिकारियों के शस्त्र छीनकर क्रांतिकारी सैनिकों में बांट दिए। भले ही क्रांतिकारी सैनिकों के हाथ शस्त्रागारों का गोला-बारूद नहीं लग सका फिर भी यह क्रांतिकारी सैनिकों की बहुत बड़ी विजय थी क्योंकि एक तरह से उन्होंने दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों को निहत्था कर दिया था।

क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली में स्थित उन समस्त अंग्रेज अधिकारियों को मार दिया जिन्होंने क्रांतिकारी सैनिकों का विरोध किया। 12 मई से 16 मई 1857 तक की अवधि में दिल्ली को पूरी तरह से अंग्रेजों से मुक्त करवा लिया गया। दिल्ली के समस्त सरकारी भवनों पर बादशाह का नीला झण्डा लहराने लगा।

बहादुरशाह ने दिल्ली में इस क्रांति का नेतृत्व नाम-मात्र के लिये किया। वास्तविक नेतृत्व उसके सेनापति बख्त खाँ ने किया जिसकी बाद में 13 मई 1859 को अँग्रेजों से युद्ध करते हुए मृत्यु हुई। मेरठ तथा दिल्ली के समाचार अन्य नगरों में भी पहुँचे जिससे उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में विद्रोह फैल गया।

पेशवा नाना साहब (द्वितीय) ने कानपुर पर अधिकार करके स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया। बुन्देलखण्ड में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने, मध्य भारत में तात्या टोपे नामक मराठा ब्राह्मण ने तथा बिहार में जगदीशपुर के जमींदार कुंवरसिंह ने क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। अवध, कानपुर, आगरा, अलीगढ़, बरेली, मथुरा आदि नगर विद्रोह के प्रमुख केन्द्र बन गये।

दिल्ली क्रांति का मुख्य केन्द्र थी। क्रांतिकारी सैनिक पूर देश से आ-आकर दिल्ली में जमा होने लगे। उनके रेले के रेले आते जाते थे और दिल्ली की रिज पर एकत्रित होते जाते थे। क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए चांदनी चौक पर एक सभा की तथा उसमें दिल्ली के लोगों से पूछा- ‘भाइयो! क्या तुम मजहब वालों के साथ हो?’

मजहब नामक मुद्रा हर युग में और धरती के हर कौने पर कभी न बंद होने वाली मुद्रा है, जिसे कभी भी चलाया जा सकता है। यहाँ भी बखूबी चल गई। दिल्ली में खूनी क्रांति के समय मजहब का सिक्का तेजी से चलने का एक कारण यह भी था कि अंग्रेजों ने कुछ ही समय पहले दिल्ली के समस्त मदरसों को बंद कर दिया था। इसलिए दिल्ली के मुसलमानों को लगता था कि अंग्रेज उनके मजहब को नष्ट करना चाहते हैं।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि यद्यपि क्रांतिकारी सैनिकों में अधिकतर हिन्दू थे तथापि दिल्ली में जेहाद का ऐलान जामा मस्जिद से किया गया। बहुत से बागी सिपाही जो कि हिन्दू थे, स्वयं को मुजाहिद, गाजी और जिहादी कहते थे। देश भर से आने वाले इन क्रांतिकारियों की संख्या बढ़ती ही चली गई जो बड़े गर्व से स्वयं को मुजाहिद, जिहादी और गाजी कहते थे। ये सब मरने-मारने की इच्छा से आए थे और दिल्ली में खूनी क्रांति के बल पर भारत से अंग्रेजों का राज्य मिटाना चाहते थे।

ग्वालियर से आए गाजियों अर्थात् क्रांतिकारी सैनिकों के एक दल ने खुदकुशी करने की इच्छा व्यक्त की। अर्थात् उन्होंने घोषणा की- ‘वे दिल्ली में भोजन नहीं करेंगे। वे यहाँ भोजन करने नहीं आए हैं अपितु काफिर अंग्रेजों को नष्ट करने के लिए आए हैं। इसलिए हम केवल लड़ेंगे और जंग खत्म होने तक लड़ते रहेंगे। वे जो मरने के इरादे से आते हैं, उन्हें खाने की कोई जरूरत नहीं है।’

दिल्ली से भागे अंग्रेज अधिकारियों ने दिल्ली की निकटवर्ती पहाड़ी पर शरण ले रखी थी। उन्हें लगता था कि जनरल व्हीलर कानपुर से अंग्रेज सेना लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़ा है किंतु उन्हें ज्ञात नहीं था कि पेशवा नाना साहब तथा अवध के सैनिकों ने व्हीलर से हथियार रखवा लिए हैं।

अंग्रेज अधिकारियों के बीच में यह अफवाह भी फैल गई थी कि ईरान से दो सेनाएं दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की सहायता के लिए आ रही हैं। इनमें से एक सेना खैबर दर्रे से तथा दूसरी सेना उत्तर-पूर्वी समुद्री मार्ग से चलकर बम्बई होते हुए दिल्ली पहुंचेगी किंतु ये केवल अफवाहें थीं, ऐसी कोई सेनाएं थी ही नहीं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कानपुर की क्रांति

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कानपुर की क्रांति

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में कानपुर की क्रांति महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस क्रांति का नायक नाना साहब पेशवा था। पेशवा की सेना ने गंगा नदी में घुसकर सैंकड़ों अंग्रेजों को मार डाला!

जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने नाना साहब को पेशवा मानने और पेंशन देने से मना कर दिया तथा नाना साहब पेशवा के मंत्री अजीमुल्ला खाँ को इंग्लैण्ड से निराश लौटा दिया तो नाना साहब ने उत्तर भारत के महत्वपूर्ण रजवाड़ों एवं सैनिक छावनियों में घूम-घूमकर भावी क्रांति की योजना का प्रचार किया। नाना साहब ने कानपुर के अंग्रेज कलक्टर को विश्वास में लेकर डेढ़ हजार सिपाहियों की एक निजी सेना खड़ी कर ली ताकि यदि कभी कोई बगावत हो तो नाना की सेना कानपुर की अंग्रेज सेना की सहायता कर सके।

हालांकि क्रांति की तिथि 31 मई 1857 निश्चित की गई थी किंतु क्रांति का सूत्रपात 29 मार्च 1857 को बैरकपुर के भारतीय सैनिकों द्वारा कर दिया गया। 3 मई 1857 को लखनऊ में भी विद्रोह हो गया। 10 मई 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हो गया। 5 जून 1857 को झांसी में विद्रोह हो गया। इस प्रकार यह क्रांति कई स्थानों पर फूट पड़ी।

5 जून 1857 को कम्पनी सरकार के कानपुर में स्थित भारतीय सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इस कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी तथा उनके परिवार कानपुर शहर के उत्तरी भाग में बनी खंदकों में छिप गए। इस प्रकार कानपुर की क्रांति आरम्भ हो गई।

विद्रोही सैनिक अपने हथियार लेकर कानपुर से दिल्ली के लिए रवाना हो गए। नाना साहब इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी सेना ने उसी समय बिठूर से कानपुर आकर नगर के उत्तरी भाग में स्थित अंग्रेजी शस्त्रागार में प्रवेश कर लिया।

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अंग्रेजी शस्त्रागार की सुरक्षा के लिए तैनात 53वीं रेजीमेंट ने सोचा कि नाना साहब के सिपाही कम्पनी के अधिकारियों द्वारा शस्त्रागार की रक्षा के लिए भेजे गए हैं। इसलिए उन्होंने नाना साहब की सेना को बिना किसी रुकावट के शस्त्रागार में प्रवेश करने दिया।

नाना साहब की सेना ने शस्त्रागार पर अधिकार करके घोषणा की कि वे भी कम्पनी सरकार के विरुद्ध लड़ रहे क्रांतिकारी सैनिकों के साथ हैं। इसके बाद नाना साहब के सैनिकों ने कानपुर में स्थित अंग्रेजी कोषागार पर अधिकार कर लिया और घोषणा की कि उसने पेशवा के अधीन मराठा संघ को पुनर्जीवित कर दिया है तथा उसका लक्ष्य बहादुरशाह (द्वितीय) को फिर से भारत का बादशाह बनाना है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि नाना साहब के नेतृत्व में हुई कानपुर की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को बड़े संकट में डाल दिया।

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जब कानपुर कानपुर की क्रांति के क्रांतिकारी सैनिक कल्यानपुर पहुंचे तो नाना साहब ने उनसे भेंट की। क्रांतिकारी सैनिक बहादुरशाह जफर से मिलने दिल्ली जा रहे थे। नाना साहब ने इन क्रांतिकारियों से कहा कि वापस कानपुर चलो ताकि हम मिलकर अंग्रेजों को परास्त कर सकें किंतु क्रांतिकारी सैनिकों ने नाना साहब की बात मानने से मना कर दिया। इस पर नाना साहब ने उन्हें भरोसा दिया कि यदि वे नाना साहब की सेना में शामिल होते हैं तो उन्हें दोगुना वेतन दिया जाएगा। इस पर क्रांतिकारी सैनिक नाना साहब की तरफ हो गए। 6 जून 1857 को नाना साहब की सेना ने क्रांतिकारी सैनिकों के साथ मिलकर कानपुर की अंग्रेजी सेना पर हमला बोला। अंग्रेजी सेना खंदकों से निकलकर निकटवर्ती दुर्ग में चली गई। उसके पास बहुत ही कम पानी और रसद सामग्री थी। जब कम्पनी सरकार के भारतीय सिपाही जो अब भी अंग्रेजों के साथ थे, भूख और प्यास से मरने लगे तो वे भाग-भाग कर नाना की तरफ आने लगे। 10 जून तक नाना साहब की सेना में 10 से 12 हजार सिपाही हो गए किंतु अंग्रेजी सेना के जनरल व्हीलर तथा कैप्टेन मूर आदि अधिकारियों ने हार नहीं मानी। वे विद्रोही सेनाओं का मुकाबला करते रहे।

23 जून 1857 को प्लासी के युद्ध की सौवीं सालगिरह थी। भारतीय सिपाहियों का विश्वास था कि जिस दिन कम्पनी सरकार को भारत में शासन करते हुए 100 साल हो जाएंगे, उसी दिन कम्पनी सरकार नष्ट हो जाएगी। इसलिए 23 जून को नाना साहब की सेनाओं ने अंग्रेजों पर भयानक आक्रमण किया। पेशवा के सैनिकों ने जनरल व्हीलर के पुत्र लेफ्टिनेंट गोर्डन को मार डाला। इससे जनरल व्हीलर का साहस चुक गया। नाना साहब के सैनिकों ने कुछ अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को पकड़ लिया।

24 जून 1857 को नाना साहब ने एक अंग्रेज महिला कैदी रोज ग्रीनवे को एक पत्र देकर जनरल व्हीलर के पास भेजा। इस पत्र में कहा गया था कि यदि अंग्रेज कानपुर खाली कर देते हैं तो उन्हें सतीचूरा घाट तक सुरक्षित रास्ता दे दिया जाएगा जहाँ से वे अपने परिवारों को साथ लेकर नावों की सहायता से इलाहाबाद जा सकते हैं।

जनरल व्हीलर को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ और उसने कानपुर खाली करने से मना कर दिया। 25 जून 1857 को नाना साहब ने दूसरा पत्र भिजवाया जिस पर नाना साहब ने स्वयं हस्ताक्षर किए। यह पत्र मिसेज जैकोबी नामक एक अंग्रेज महिला बंदी के हाथों भिजवाया गया। इसके बाद नाना साहब ने अंग्रेजों की खंदकों पर गोलाबारी करनी बंद कर दी।

26 जून को अंग्रेजी सैनिकों ने अपने मृत साथियों को दफनाया और 27 जून को वे सतीचूरा घाट की तरफ रवाना हो गए। नाना साहब ने बड़ी संख्या में पालकियां, बैलगाड़ियां और हाथी भिजवाए ताकि औरतों और बच्चों को पैदल न चलना पड़े। कम्पनी के अधिकारियों एवं सिपाहियों को अपने शस्त्र साथ में ले जाने की अनुमति दी गई। नाना साहब के सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को अपनी सुरक्षा में ले लिया ताकि उन पर कोई व्यक्ति हमला न करे।

प्रातः 8 बजे अंग्रेज परिवार सतीचूरा घाट पर पहुंचे। जब अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार हाथियों, बैलगाड़ियों एवं पालकियों से उतरकर नावों की तरफ जाने लगे तो आसपास के बहुत से गांवों के स्त्री-पुरुष और बच्चे उन्हें देखने के लिए जमा हो गए।

नाना साहब ने अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों के लिए 40 नावों का प्रबंध किया था। उस दिन गंगा नदी में बहुत कम पानी था जिसके कारण इन नावों का चलना कठिन हो गया। इससे अंग्रेजों के प्रस्थान में कुछ विलम्ब हो गया।

इसी बीच इलाहाबाद से छठी नेटिव इन्फैंट्री तथा बनारस से 37वीं इन्फैंट्री के सिपाही भी सती चौरा आ पहुंचे। इन्हें जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील कॉलम नामक ब्रिटिश अधिकारी लेकर आया था। नील कॉलम की दुष्टता के कारण वहाँ उपस्थित सिपाहियों में गोलीबारी आरम्भ हो गई। कहा नहीं जा सकता कि पहले गोलीबारी किसने आरम्भ की। भारतीय सिपाही गंगाजी में उतर पड़े तथा अंग्रेज अधिकारियों को नावों से खींच-खींचकर मारने लगे।

तात्या टोपे तथा अजीमुल्ला खाँ घटना-स्थल पर ही मौजूद थे जबकि नाना साहब यहाँ से दो किलोमीटर दूर डेरा डाले हुए था। कुछ स्रोतों को मानना है कि जब तात्या ने देखा कि अंग्रेजी सेना गोलीबारी कर रही है तो तात्या टोपे ने अपनी सेना के सिपाहियों को आदेश दिया के वे भी अंग्रेजों पर गोली चलाएं। इस गोलीबारी में 450 से अधिक अंग्रेज अधिकारी एवं सैनिक मारे गए।

जिस समय यह गोली काण्ड आरम्भ हुआ, उससे कुछ समय पूर्व ही जनरल व्हीलर की नाव गंगा नदी में कुछ दूर जा चुकी थी किंतु जब भारतीय सिपाहियों ने पीछे से आकर जनरल व्हीलर की नाव पर गोली-बारी की तो अंग्रेजों ने इस नाव पर सफेद झण्डा फहरा दिया। नाना के सिपाही इन अधिकारियों को पकड़कर नाना साहब के निवास स्थल अर्थात् सवादा महल में ले आए तथा उन्हें धरती पर बैठा दिया।

अंग्रेज औरतें नाव में डरी हुई बैठी थीं। जब कानपुर की क्रांति के सैनिकों ने अंग्रेज औरतों पर गोलीबारी की तो नाना साहब ने सिपाहियों को आदेश दिए कि वे औरतों और बच्चों को न मारें। नाना ने 120 अंग्रेज औरतों और बच्चों को नावों से उतरवाकर कानपुर में स्थित सवादा कोठी भिजवा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बीबीघर का हत्याकाण्ड

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बीबीघर का हत्याकाण्ड

बीबीघर का हत्याकाण्ड अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के दौरान हुई एक बड़ी ही शर्मनाक घटना है जिसने भारतीय क्रांति के सैनिकों को कलंकित किया तथा अंग्रेजों को भारतीय सैनिकों का शत्रु बना दिया।

नाना साहब पेशवा ने अंग्रेजों से कानपुर मुक्त करवाकर अंग्रेज अधिकारियों को छूट दी थी कि वे अपने परिवारों को लेकर इलाहाबाद चले जाएं। इसके लिए नाना साहब ने 40 नावों का प्रबंध किया था। जब अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार नावों में बैठ रहे थे, तभी नील कॉलम नामक ब्रिटिश अधिकारी इलाहाबाद से नई सेना लेकर आ गया और पेशवा तथा अंग्रेज सेना में गोलीबारी आरम्भ हो गई।

इसके बाद पेशवा की सेना ने लगभग 450 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला तथा कुछ अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवारों की औरतों एवं बच्चों को पकड़कर सवादा महल में ले आई। अंग्रेज अधिकारियों को सवादा हाउस के प्रांगण में धरती पर बैठा दिया गया।

जब भारतीय सिपाही अंग्रेज अधिकारियों को मारने के लिए उद्धत हुए तो अंग्रेज औरतें उनके साथ लिपट गईं तथा जिद करने लगीं कि हमें भी हमारे पति के साथ मारा जाए। भारतीय सिपाहियों ने इन अंग्रेज औरतों को खींच कर अलग कर दिया।

ब्रिटिश अधिकारी चैपलेन मॉनस्रिफ ने नाना साहब से याचना की कि उन्हें मरने से पहले प्रार्थना करने दी जाए। नाना ने उन्हें प्रार्थना करने की अनुमति दे दी। इन ब्रिटिश अधिकारियों को बंदूकों एवं तलवारों से मार दिया गया।

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उसी रात को समस्त अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को नाना साहब के बीबी घर में रहने के लिए भेज दिया गया तथा उन्हें नाना साहब की रखैल हुसैनी खाना के संरक्षण में रख दिया गया। हुसैनी खाना के अधीन नाना साहब के कुछ सैनिक भी नियुक्त किए गए।

रात्रि में व्हीलर्स की बोट से बचाए गए कुछ और अंग्रेज महिलाएं एवं बच्चे लाए गए। फतेहगढ़ से भी कुछ अंग्रेज महिलाएं एवं बच्चे पकड़ कर लाए गए। उन्हें भी कानपुर के बीबी घर में लाकर बंद कर दिया गया। नाना साहब इन अंग्रेज औरतों एवं बच्चों का उपयोग अंग्रेजों से संधि के समय अपनी शर्तें मनवाने में करना चाहता था।

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अंग्रेज महिलाओं के साथ अतिथियों की तरह व्यवहार किया गया उन्हें इलाहाबाद भेजने की तैयारी की जाने लगी। कुछ ही दिनों में जनरल हैवलॉक तथा नील इलहाबाद से अंग्रेजी सेनाओं के साथ आ धमके। मेजर रेनॉड एवं जेम्स नाइल भी अपनी सेनाएं लेकर आ गए। अंग्रेजी सेनाएं सती चौरा (अथवा सतीचूरा) घाट पर हुए गोलीकाण्ड का बदला लेने के लिए भारतीय सैनिकों एवं निरीह लोगों को मारने लगी। नाना साहब ने उन पर दबाव बनाना आरम्भ किया कि वे इलाहाबाद लौट जाएं किंतु अंग्रेजी सेनाएं कानपुर की तरफ बढ़ती रहीं। नाना साहब एवं अंग्रेज सेनाओं में कई स्थानों पर युद्ध हुआ जिनमें दोनों ओर के बहुत से सिपाही मारे गए।

हैवलॉक तथा नील की सेनाओं ने अपने मार्ग में पड़ने वाले गांवों पर भयानक अत्याचार करने आरम्भ कर दिए। 15 जुलाई को जनरल हैवलॉक की सेना ने नाना साहब के भाई बाला राव की सेना को परास्त कर दिया। 16 जुलाई को जनरल हैवलॉक की सेना कानपुर पहुंच गई। जब अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे जुल्मों की सूचना बीबी घर में पहुंची तो अंग्रेज महिलाओं की रक्षा कर रही हुसैनी खानम ने क्रोध में भरकर 15 जुलाई 1857 को देर शाम को बीबी घर की अंग्रेज महिलाओं को मरवा कर कुएं में फिंकवा दिया।

कहा जा सकता है कि बीबीघर का हत्याकाण्ड जनरल हैवलॉक किए जा रहे भारतीय सैनिकों के हत्याकाण्ड की बदले की कार्यवाही थी किंतु यह भारतीय परम्परा के अनुरूप नहीं थी। निर्दोष स्त्रियों की हत्या करना किसी भी दशा में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बीबीघर का हत्याकाण्ड अजीमुल्ला खाँ के कहने पर किया गया जबकि कुछ लोगों का मानना था कि इसके आदेश स्वयं नाना साहब ने दिए। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जब बीबी घर की भारतीय औरतों को ज्ञात हुआ कि अंग्रेज औरतों को मारा जाएगा तो भारतीय औरतों ने इस आदेश के विरुद्ध भूख हड़ताल कर दी।

जिन सिपाहियों को अंग्रेज औरतों एवं बच्चों को मारने के आदेश दिए गए उन्होंने भी आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर बेगम हुसैनी खानम ने अपने मित्र सरवर खान से कहकर कसाइयों को बुलाया। कसाइयों ने छुरे भौंककर अंग्रेज औरतों एवं बच्चों को मार डाला। जिस समय यह हत्याकाण्ड किया गया, उस समय नाना साहब बीबी घर में नहीं था।

कुछ अंग्रेज स्त्रियों एवं बच्चों ने स्वयं को शवों के नीचे छिपा लिया। जब अगली सुबह सफाई कर्मचारियों को बुलाकर अंग्रेज महिलाओं एवं बच्चों के शव कुओं में फिंकवाए गए तब तीन औरतें और तीन बच्चे जीवित निकले। इन्हें भी लाशों के साथ कुओं में फैंक दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।

सती चौरा की घटना के लिए अंग्रेजों ने नाना साहब को जिम्मेदार ठहराया तथा नाना पर आरोप लगाया कि उसने जानबूझ कर नावों को रेत में लगवाया ताकि अंग्रेजों को आसानी से घेरकर मारा जा सके। इसी प्रकार बीबीघर का हत्याकाण्ड के लिए भी नाना साहब को जिम्मेदार ठहराया गया। इस प्रकार पेशवा नाना साहब अंग्रेजी हुकूमत का सबसे बड़े खलनायक बन गया!

सती चौरा हत्याकाण्ड तथा बीबीघर का हत्याकाण्ड की गूंज इंग्लैण्ड में भी सुनाई दी। पूरा इंग्लैण्ड भारत के विरुद्ध क्रोध से उबलने लगा। वहाँ के अखबारों में भारतीय लोगों के विरुद्ध खूब जहर उगला गया। इंग्लैण्ड के शहरों में नुक्कड़ नाटक खेले जाने लगे जिनमें नाना साहब के पुतलों को चौराहों पर फांसी दी जाती थी।

इंग्लैण्ड के लोगों को शांत करने के लिए अंग्रेजी सेना ने कानपुर शहर में भयानक नरसंहार किया। सैंकड़ों भारतीय सिपाहियों को पकड़कर पेड़ों पर लटका दिया गया। बरगद के एक पेड़ पर 135 शव लटकाए गए।

जनरल नील ने कानपुर में जन-साधारण पर भयानक अत्याचार किए। उसने एक मुसलमान अधिकारी को बीबीघर में फर्श पर लगे खून को जीभ से साफ करने का आदेश दिया। उस अधिकारी द्वारा आदेश पालन किये जाने पर भी नील ने उसे मृत्यु-दण्ड दिया। जनरल नील ने मृत ब्राह्मणों को जमीन में दफनाया तथा मुसलमानों को चिता पर जलवाया।

19 जून को हैवलॉक ने बिठूर पर आक्रमण किया किंतु तब तक नाना साहब बिठूर से जा चुका था। ब्रिटिश सेनाओं ने बिठूर गांव के लोगों को बुरी तरह काटकर फैंक दिया। गांव के समस्त स्त्री, पुरुष, बच्चे, जवान एवं वृद्ध सभी की नृशंसता पूर्वक हत्या कर दी गई।

नाना साहब के महल पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। अंग्रेजों को यहाँ से बड़ी संख्या में गोला-बारूद, तोपें, हाथी, घोड़े एवं ऊँट प्राप्त हुए। अंग्रेजों ने इस महल में आग लगा दी। नाना साहब अंग्रेजों के हाथ नहीं आ सका। पेशवा के सेनापति तात्या टोपे का घर भी जला दिया गया।

अंग्रेज सिपाहियों द्वारा बिठुर में भयंकर लूटमार की गई तथा धन मिलने की आशा में महल की एक-एक ईंट उखाड़ दी गई। अँग्रेजों को बिठुर की लूट में इतना अधिक सोना-चाँदी प्राप्त हुआ कि वे पूरा उठाकर नहीं ला जा सके। जनवरी 1858 के बाद नाना के बारे में कोई पता नहीं चला। बाद में पता लगा कि वह नेपाल चला गया है किन्तु उसके बाद उसकी कोई निश्चित जानकारी नहीं मिल सकी।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि नाना साहब नेपाल चला गया जहाँ वह नेपाल के प्रधानमंत्री की सुरक्षा में रहा। लोगों का मानना है वह ईस्वी 1902 में नेपाल में नाना साहब की मृत्यु हुई परंतु कुछ लोग उसकी मृत्यु ईस्वी 1906 में सीहोर में होना मानते हैं।

पेशवा नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे ने नवम्बर 1857 में कानपुर पर फिर से अधिकार करने का प्रयास किया। जब नाना साहब के गायब हो जाने के बाद भी देश भर में क्रांति की आग नहीं थमी तो अंग्रेज समझ गए कि जब तक पेशवा को नहीं पकड़ लिया जाता, तब तक क्रांति को नहीं दबाया जा सकता। अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के लिए बड़े-बड़े इनाम घोषित किए किंतु नाना पकड़ में नहीं आया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बेगम हजरत महल

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बेगम हजरत महल

बेगम हजरत महल एक तवायफ थी जिसे वाजिद अली शाह ने अपनी परी बनाया और बाद में बेगम बना लिया। वह अपने बेटे को अवध का नवाब बनाना चाहती थी किंतु जब अंग्रेजों ने उसकी बात नहीं मानी तो वह हाथ में हथियार लेकर हाथी पर चढ़ गई और अंग्रेजों के मारने के लिए निकल पड़ी। बेगम हजरत महल ने हाथी पर बैठ कर अंग्रेजों को मारा!

बैरकपुर, कानपुर, कलकत्ता, मेरठ, बिठूर, झांसी तथा राजपूताने में हो रही हलचलों के समचार तेजी से पूरे देश में फैल रहे थे। लखनऊ की बेगम हजरत महल आरम्भ से ही पेशवा नाना साहब के सम्पर्क में थी। इसलिए उसने भी क्रांति की तैयारी की। इतिहासकारों का मानना है कि अवध में क्रांति की तैयारी अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक अच्छी थी।

बेगम हजरत महल का वास्तविक नाम हजमती महल था जिसे बचपन में मुहम्मदी ख़ानुम कहा जाता था। बेगम हज़रत महल का जन्म अवध रियासत के फ़ैज़ाबाद कस्बे में हुआ था। वह पेशे से तवायफ़ थी और अपने माता-पिता द्वारा बेचे जाने के बाद खवासीन के रूप में अवध के शाही हरम में ले ली गई थी।

तब उसे शाही आधिकारियों के पास बेचा गया था, बाद में वह परी के पद पर पदोन्नत हुई और उसे महक परी के नाम से जाना गया। अवध के नवाब की शाही रखैल के तौर पर स्वीकार किए जाने पर उसे बेगम का खि़ताब हासिल हुआ। उसके पुत्र बिरजिस क़द्र के जन्म के बाद उसे हज़रत महल का खिताब दिया गया था।

ईस्वी 1856 में जब अंग्रेज़ों ने अवध पर क़ब्ज़ा कर लिया और वाजिद अली शाह को निर्वासित करके कलकत्ता भेज दिया तब बेगम हजरत महल वाजिद अली शाह के साथ कलकत्ता नहीं गई। उसने अपने अवयस्क पुत्र बिरजिस कद्र को गद्दी पर बैठा दिया और स्वयं उसके रीजेंट के रूप में शासन करने लगी।

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बेगम हजरत महल ने अपना जीवन एक तवायफ अथवा नृत्यांगना के रूप में आरम्भ किया था किंतु राजनीति में वह नवाब वाजिद अली शाह से भी अधिक चतुर थी। नवाब तो अपनी रियासत खोकर कलकत्ता में निर्वासन भोग रहा था किंतु बेगम ने अवध रियासत को अपने पुत्र के हक में नष्ट होने से बचा लिया था।

बेगम हजरत महल अंग्रेजों से सम्बन्ध नहीं बिगाड़ना चाहती थी किंतु वह इस बात से नाराज थी कि अंग्रेज़ों ने लखनऊ और अवध के अधिकांश स्थानों पर अधिकार कर लिया था तथा वे रियासत को तेजी से हड़पते जा रहे थे। अपने बेटे बिरजिस क़द्र के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए बेगम हज़रत महल को कम्पनी सरकार के विरुद्ध बगावत करने पर विवश होना पड़ा।

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7 जून 1857 को राणा बेनीमाधव सिंह तथा आजमगढ़ के नाजिम राजा जयलाल सिंह की सहायता से बेगम हजरत महल ने अवध के शासन की बागडोर अपने हाथ में ली। 10 जून 1857 को अवध में आजादी का झंडा फहराने लगा। हज़रत महल ने अवध के जमींदारों, किसानों एवं जनसामान्य का आह्वान किया कि वे अवध को विदेशियों से मुक्त कराने में सहयोग दें।

बेगम हजरत महल ने आजमगढ़ के नाजिम राजा जयलाल सिंह को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। राजा जयलाल सिंह ने अवध के युवकों की एक सेना तैयार की तथा 24 जून 1857 को अंग्रेजी सेना की दो टुकड़ियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। राजा जयलाल सिंह ने 30 जून 1857 को लखनऊ से 6 मील दूर चिनहट नामक स्थान पर अंग्रेजों को भारी शिकस्त दी। बेगम हज़रत महल ने लखनऊ पर फिर से अधिकार कर लिया और अपने बेटे बिरजिस क़द्र को अवध का वली अर्थात् शासक घोषित कर दिया।

बेगम हज़रत महल की महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी नामक औरत के हाथों में था, जिसने फ़ौजी भेष में महिलाओं को तोप और बन्दूक चलाना सिखाया। उन दिनों लखनऊ की एक प्रसिद्ध तवायफ़ हैदरी बाई के यहाँ बहुत से अंग्रेज़ अधिकारी मुजरा देखने आया करते थे। वे क्रांतिकारियों के विरुद्ध़ की जाने वाली कार्यवाहियों पर भी चर्चा किया करते थे। हैदरीबाई ने इन सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुँचाया और बाद में वह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी।

आलमबाग़ की लड़ाई में बेगम ने हाथी पर सवार होकर सशस्त्र युद्ध में भाग लिया। लखनऊ में रहीमी के नेतृत्व में महिलाओं ने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। इस युद्ध में पराजित होकर बेगम अवध के देहातों में चली गई और वहाँ भी क्रांति की चिंगारी सुलगाने लगी। 4 जुलाई 1857 को एक भीषण विस्फोट में अवध के कमिशनर हेनरी लॉरेन्स की मृत्यु हो गई। यह अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा सदमा था।

25 सितंबर 1857 को अंग्रेजों सेना ने आलमबाग से हटकर रेजिडेंसी की तरफ बढ़ना चाहा किंतु क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना में कसकर मार लगाई। इस युद्ध में जनरल नील मारा गया। जनरल नील की मृत्यु भी अंग्रेजी सेना के लिए जबरदस्त सदमा था किंतु अंग्रेजी सेना रेजिडेंसी पहुंचने में सफल हो गई।  

अवध के क्रांतिकारियों ने फिर से रेजिडेंसी को घेर लिया। हैवलॉक और उसकी सेना रेजीडेंसी के अंदर कैद हो गई। हैवलॉक और आउटरम की सेनाओं की सहायता के लिए 27 अक्टूबर अट्ठारह सौ सत्तावन को कोलकाता से नया कमाण्डर इन चीफ सर कॉलिन कैम्पबेल विशाल सेना लेकर रवाना हुआ।

कॉलिन कैंपबेल 3 नवंबर 1857 को कानपुर पहुंचा। उसने देखा कि सम्पूर्ण अवध बागी बन गया है। भारी तैयारी जगह-जगह नजर आ रही थी और उनको स्थानीय लोगों का खुला समर्थन था। कैंपबेल तथा जनरल ग्रांट अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आलमबाग पहुंचे। अब कंपनी के पास विशाल सेना थी। 8 नवंबर 1857 को लखनऊ में क्रांतिकारियों की सेना में एक लाख लोग थे और अंग्रेजों के पास 1.20 लाख।

14 नवंबर 1857 को कैंपबेल अपनी विशाल सेना के साथ रेजीडेंसी की तरफ बढ़ने लगा। यह सेना पहले दिलखुश बाग पहुंची तथा उसने 16 नवम्बर 1857 को सिकंदर बाग पर चढ़ाई की। दोनों पक्षों के बीच दिलखुश बाग, आलमबाग और शाहनजफ में घमासान लड़ाई होती रही जो 9 दिन तक अर्थात 23 नवंबर तक जारी रही।

इसी बीच क्रांतिकारियों को सूचना मिली कि अंग्रेजों ने दिल्ली से फिर से अधिकार कर लिया है किंतु इस पर भी लखनऊ के क्रांतिकारी सैनिक मैदान में डटे रहे। शहर अभी तक क्रांतिकारियों के हाल में था। अंग्रेजों ने पुनः अपनी सेनाओं को रेजीडेंसी मोर्चे से हटाकर आलमबाग में जमा करना पड़ा। आउट्रम को वहाँ का सेनापति नियुक्त किया गया।

इसी बीच अंग्रेजों को सूचना मिली कि नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे ने कानपुर की अंग्रेजी सेना को फिर से हराकर कानपुर पर कब्जा कर लिया है। इस पर कैम्पबेल, आउट्रम को लखनऊ छोड़कर कानपुर चला गया।

जब दिल्ली, कानपुर और लखनऊ जैसे प्रमुख केंद्रों में क्रांतिकारी सेनाओं की पराजय हो गई तो भी अवध के कई क्षेत्रों में क्रांतिकारी युद्ध जारी रखे हुए थे। कुछ दिनों की लड़ाई के बाद ये क्रांतिकारी सैनिक भी परास्त होने लगे। अवध का क्रांतिकारी जागीरदार जयलाल सिंह अंग्रेजों से परास्त होकर बाराबंकी के जंगलों में चला गया तथा वहाँ से गुरिल्ला युद्ध करके अंग्रेजी सेना को नुकसान पहुंचाने लगा।

अवध के देहाती इलाकों में ग्रामीणों ने जंग जारी रखी। बाराबंकी में 1 साल 7 माह और 5 दिन जंग चली। इस दौरान अंग्रेज केवल 10 रुपए का ही राजस्व संग्रह कर पाये। अंग्रेजों ने राणा बेनीमाधव, नरपत सिंह, देवीबख्श और गुलाब सिंह को अपने साथ मिलाने के प्रयास किए किंतु वे नहीं माने और लड़ते रहे। उनके पास साधन कम थे किंतु हिम्मत अटूट थी!

अथक प्रयासों के बाद अंततः 14 मार्च 1858 को अंग्रेजों ने लखनऊ पर अधिकार कर लिया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह तिथि 31 मार्च 1858 थीं।

1 नवम्बर 1858 को लॉर्ड केनिंग ने इलाहाबाद में भव्य दरबार का आयोजन किया तथा उसमें इंग्लैंड की महारानी की घोषणा पढ़कर सुनायी जिसमें कहा गया था कि जो लोग हथियार डाल देंगे उनको क्षमा कर दिया जाएगा और उनकी जागीरें लौटा दी जाएंगी, किंतु अवध के बहुत से स्वाभिमानी राजाओं एवं जागीरदारों पर इस घोषणा का असर नहीं पड़ा। उन्होंने लगभग एक साल तक जंग जारी रखी। यमुना, गोमती, घाघरा तथा गंगा के तटीय इलाकों की बगावत को दबाने के लिए अंग्रेजों को नौसेना का उपयोग करना पड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

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रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...