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भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

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भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ प्रस्तर युग के बाद विकसित हुईं। ताम्राश्म संस्कृति उसे कहते हैं जिसमें ताम्रधातु एवं पाषाण के उपकरण साथ-साथ उपयोग में आते थे। ताम्राश्म संस्कृति को ताम्रपाषाणिक संस्कृति (Copper Stone Culture) भी कहते हैं। कहीं-कहीं पाषाण संस्कृति और ताम्राश्म संस्कृति एक साथ चलती रहीं।

धातु काल में प्रवेश

मानव सभ्यता ने पाषाण-काल से निकलकर धातु-काल में प्रवेश किया। कुछ विद्वानों का विचार है कि धातु-काल के लोग पाषाणकाल के लोगों से भिन्न थे और उत्तर-पश्चिम के मार्गों से भारत में आए थे। कतिपय अन्य विद्वानों का मत है कि धातु-काल के लोग नव-पाषाण-काल के लोगों की ही सन्तान थे।

इस मत के समर्थन में दो बातें कही जाती हैं। पहली बात यह है कि धातु-काल के प्रारम्भ में, पाषाण तथा धातुओं का प्रयोग साथ-साथ होता था और दूसरी यह है कि इस सन्धि-काल की वस्तुओं के आकार तथा बनावट में बड़ी समानता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि नवपाषाणकाल की सभ्यता धीरे-धीरे उन्नति करके धातु-काल की सभ्यता में बदल गयी।

धातु की खोज

अनुमान होता है कि मनुष्य द्वारा भोजन पकाने के लिए बनाए गए चूल्हों में लगे पत्थरों के गर्म होने से उनमें से धातु पिघलकर अलग हो गई होगी, जब यह घटना कई बार हुई होगी तो नव पाषाण कालीन मानव ने धातु की खोज का कार्य सम्पन्न कर लिया होगा। बहुत से विद्धानों का मानना है कि मानव ने सबसे पहले सोने की खोज की, उसके बाद ताम्बे की खोज हुई। चूँकि सोना अत्यंत अल्प मात्रा में मिलता था इसलिए औजार एवं हथियार बनाने में ताम्बे का उपयोग किया गया।

धातु-काल का अर्थ

धातु-काल से तात्पर्य उस कालावधि से है जब मनुष्य ने पत्थर के स्थान पर धातु का प्रयोग करना आरम्भ किया। सबसे पहले ताम्बे का, उसके बाद काँसे का और अन्त में लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ। चूँकि इन धातुओं का प्रयोग निरन्तर आधुनिक काल तक होता चला आ रहा है इसलिए नव-पाषाण-काल के पश्चात् से लेकर आज तक के काल को धातु-काल कहा जाता है। इस लम्बे काल में मानव-सभ्यता का विकास तेज गति से होता गया है। धातुकाल का मानव, विज्ञान के बल पर इतने आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है जो पाषाणकाल में सम्भव नहीं थे।

धातु-काल का विभाजन

धातु-काल को तीन भागों में बांटा जाता है- (1.) ताम्र-काल, (2.) कांस्य-काल तथा (3.) लौह-काल।

ताम्र-कांस्य सम्यता का विकास उत्तर भारत में ही हुआ। दक्षिण भारत में ताम्रकाल के बाद सीधे ही लोहे का प्रयोग आरम्भ हो गया।

ताम्र काल

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मानव द्वारा, धातुओं में सबसे पहले ताम्बे का प्रयोग आरम्भ हुआ। ताम्र-काल उस काल को कहते है जब मनुष्य ने अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ ताम्बे से बनाना आरम्भ किया। ताम्र-काल का आरम्भ नव-पाषाण काल के अंतिम चरण में हुआ। ताँबे की खोज का वास्तविक काल ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान है कि इसकी खोज ई.पू. 5,000 के आसपास हुई। मैलूकाइट नामक हरे अयस्क को कोयले के साथ ढेरी लगाकर, गर्म करने से ताँबा बहकर नीचे आ जाता था। इसका सबसे प्राचीन प्रमाण मिस्र में मिला है। मिस्र में ई.पू. 5,000 की कब्रों से तांबे के हथियार मिले है। साइप्रस में लगभग ई.पू. 3,000 में ताँबे का बहुत अधिक मात्रा में उत्पादन होता था। उन दिनों रोम देश के निवासी साइप्रस से ताँबा खरीदते थे। एशिया में ताम्र का प्रयोग प्रथम बार कब हुआ, यह ठीक से ज्ञात नहीं हैं। शू किंग की गाथाओं के अनुसार चीन देश में ई.पू. 2,500 के आसपास ताम्र के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (सैन्धव सभ्यता से गुप्तकाल) तक रहा। भारत में ताम्बे का सर्वप्रथम उपयोग सैंधव सभ्यता द्वारा अथवा उसके समकालीन किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा किया गया होगा जो आर्यों के आगमन से पहले उत्तरी भारत के मैदानों में मौजूद रही होगी।

 ताम्बे को प्रयोग में लाने के कई कारण थे। पत्थर को गलाया नहीं जा सकता परन्तु ताम्बे को गलाया जा सकता है। इसलिए ताम्बे को गलाकर उससे छोटी-बड़ी कई तरह की वस्तुएँ बनाई जा सकती थीं। पत्थर की अपेक्षा ताम्बे की बनी हुई वस्तुएँ अधिक सुन्दर, सुडौल, सुदृढ़़ तथा चिकनी होती थीं। ताम्बे में यह सुविधा भी थी कि उससे चद्दरें भी बनाई जा सकती थीं और उसके टुकड़़े भी किए जा सकते थे। टूट जाने पर ताम्बे को जोड़ा भी जा सकता था।

छोटा नागपुर के पठार से लेकर उत्तरी गंगा-द्रोणी तक फैले हुए विशाल क्षेत्र में ताम्र-वस्तुओं की चालीस से अधिक निधियाँ मिली हैं परन्तु इनमें से लगभग आधी निधियाँ केवल गंगा-यमुना के दोआब से प्राप्त हुई हैं। दूसरे क्षेत्रों से छुटपुट निधियाँ ही मिली हैं। इन निधियों में कुल्हाड़े, मत्स्य-भाले, खड्ग और परशु आकृति वाली वस्तुएं हैं। इन वस्तुओं का उपयोग न केवल मछली मारने, आखेट करने और लड़ाई करने अपितु दस्तकारी, कृषि आदि अनेक कामों के लिए भी होता था।

इन ताम्र-वस्तुओं के निर्माता कुशल शिल्पकार थे। ये वस्तुएं आखेटकों अथवा घुमन्तू लोगों द्वारा निर्मित नहीं हो सकतीं। ऊपरी गंगा की घाटी में कई स्थलों पर ये वस्तुएं गेरुए रंग के बर्तनों और कच्ची मिट्टी के ढांचों के साथ मिली हैं। इससे पता चलता है कि ताम्र-निधियों का उपयोग करने वाले लोग स्थायी बस्तियों में रहते थे। दोआब के काफी बड़े भाग में बसने वाले ये सबसे पुराने आदिम कृषक और कारीगर लोग थे। गेरुए रंग के बर्तनों वाले अधिकांश स्थल गंगा-यमुना दोआब के उत्तरी भाग से मिले हैं परन्तु ताम्र-निधियां प्रायः समस्त दोआब और इसके परे भी मिली हैं।

गेरुए रंग के मृदभाण्डों की इस संस्कृति का काल मोटे तौर पर ई.पू.2000 और ई.पू.1800 के बीच का है। ताम्र-वस्तुओं तथा गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले वाले लोगों की बस्तियां जब गायब हो गईं, तो लगभग ई.पू.1000 तक दोआब निर्जन ही रहा। इस बात का कुछ संकेत मिलता है कि काले और लाल बर्तनों को उपयोग में लाने वाले लोगों की छुटफुट बस्तियां थीं परन्तु अब तक उनके सांस्कृतिक अंतर के सम्बन्ध में सुस्पष्ट धारणा नहीं बन सकी है।

जो भी हो, दोआब के उत्तरी भाग तथा ऊपरी गंगा की घाटी में धातु युग का वास्तविक आरम्भ ताम्र वस्तुओं और गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले लोगों के साथ ही हुआ परन्तु किसी भी स्थल पर इनकी बस्ती लगभग सौ साल से अधिक समय तक टिकी नहीं रही। न ही ये बस्तियां बड़ी थीं और न काफी बडे़ क्षेत्र में फैली हुई थीं। इन बस्तियों का अंत क्यों और कैसे हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। हिन्दू-धर्म में तांबे के बर्तनों को पवित्र तथा धार्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जाता है तो इसका कारण सम्भवतः यह है कि तांबा मानव द्वारा खोजी गई प्रथम धातु थी।

ताम्राश्म संस्कृति की विशेषताएँ

ताम्राश्म संस्कृति के लोगों के बारे में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति के लोग पशुपालक थे, कृषि करते थे, साधारण किस्म के ताम्बे का प्रयोग करते थे और ग्रामीण परिवेश में रहते थे।

काल निर्धारण

कालक्रम के अनुसार ताम्र-पाषाण संस्कृति, सिंधु सभ्यता की कांस्य संस्कृति के बाद आती है। वैज्ञानिक विधि से निर्धारित की गई तिथियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण संस्कृति का प्रारंभ ई.पू.2150 के पश्चात् हुआ था। कुछ क्षेत्रों में इस संस्कृति का चरण ई.पू.1000 तक चला, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में ई.पू.800 तक अथवा उसके बाद ईस्वी 600 (गुप्तकाल) तक भी चलता रहा। जब तक लोहे के औजारों का प्रचलन नहीं हुआ, तब तक पुराने औजारों का उपयोग होता रहा परन्तु अनेक क्षेत्रों में काले-लाल मृदभाण्डों का उपयोग ईसा पूर्व दूसरी सदी तक होता रहा।

ताम्र एवं पाषाण का एक साथ उपयोग

इस काल के मानवों द्वारा ताम्र एवं पाषाण उपकरणों का उपयोग एक साथ किया जाता रहा इसलिए इस संस्कृति को ताम्र-पाषाण संस्कृति भी कहते हैं। इस अवस्था में तांबे का उत्पादन सीमित था। तांबे की भी अपनी सीमाएं थी। केवल तांबे से बनाया गया औजार नरम होता था। तांबे के साथ टिन मिलाकर एक अधिक मजबूत और उपयोगी कांसे की मिश्र धातु बनाने की कला लोगों को ज्ञात नहीं थी। कांसे के औजारों ने कीट, मिò और मेसोपोटामिया में प्राचीनतम सभ्यताओं के उदय में सहायता दी। सिन्धुवासी भी कांसे का प्रयोग करते थे परन्तु दो-आब क्षेत्र की ताम्र-पाषाणिक अवस्था में कांसे के औजारों का प्रायः अभाव ही है।

प्रस्तर फलकों का प्रयोग

ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के लोगों ने पत्थर के जिन छोटे औजारों और हथियारों का उपयोग किया उनमें प्रस्तर-फलकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था। यद्यपि कई स्थलों पर प्रस्तर-फलक उद्योग ने खूब उन्नति की तथापि पत्थर की कुल्हाड़ियों का भी उपयोग होता रहा। ऐसे स्थल पहाड़ियों से अधिक दूर नहीं होते थे, परन्तु ऐसे ही अनेक स्थल नदी मार्गों पर भी खोजे गए हैं। कुछ स्थलों से तांबे की कई वस्तुएं मिली हैं। आहड़ और गिलूँड ऐसे ही स्थल हैं जो राजस्थान की बनास घाटी के शुष्क क्षेत्र में स्थित हैं।

आहड़ से पत्थर की कोई कुल्हाड़ी या फलक नहीं मिला है। इसके विपरीत, यहाँ से तांबे की कई कुल्हाड़ियां और दूसरी वस्तुएं मिली हैं, क्योंकि तांबा स्थानीय रूप से उपलब्ध था। गिलूँड में प्रस्तर-फलक उद्योग मिलता है। महाराष्ट्र के जोर्वे तथा चंदोली से तांबे की सपाट तथा आयताकार कुल्हाड़ियां मिली हैं, चंदोली से तांबे की तक्षणियाँ (छेनियाँ) भी मिली हैं।

यातायात के साधनों में वृद्धि

पाषाण-काल के आरंभिक चरण में बोझा ढोने का काम मनुष्य स्वयं करता था परन्तु पशु-पालन आरंभ होने से बोझा ढोने का काम पशुओं द्वारा किया जाने लगा। बोझा ढोने के लिए सबसे पहले बैलों का प्रयोग किया गया परन्तु बाद में गधों, घोड़ों तथा ऊँटों का प्रयोग होने लगा। ताम्रकाल में यह कार्य पशुओं के साथ-साथ पशुओं द्वारा खींची जाने वाली पहियेदार गाड़ियों से भी किया जाने लगा। जल यात्राओं के लिए नावों का निर्माण भी आरम्भ हो गया।

कृषि में उन्नति

कृषि का काम मध्य-पाषाण-काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु अब कृषि बहुत बड़े परिमाण में की जाने लगी। पशुओं की संख्या में वृद्धि हो जाने के कारण अब उनके चारे तथा रखने की व्यवस्था करनी पड़ी। पशुओं के लिए मोटे अन्न की खेती की जाने लगी। अनुमान है कि इस काल का मानव कृषि कार्य में हल का उपयोग नहीं करता था। ये लोग नुकीले पत्थर के दूसरे सिरे में लकड़ी के डण्डे फंसा कर उससे धरती खोदते थे। इस संस्कृति की बस्तियों से हल नहीं मिला है।

ये लोग चावल, गेहूँ, बाजरा, मसूर, उड़द तथा मूँग जैसी कई दालें और मटर पैदा करते थे। महाराष्ट्र में नर्मदा तट पर स्थित नवदाटोली में इन समस्त अनाजों के अवशेष मिले हैं। सम्भवतः भारत के किसी भी अन्य स्थल के उत्खनन में इतने अधिक अनाज प्राप्त नहीं हुए हैं। नवदाटोली के लोग बेर और अलसी पैदा करते थे। दक्खन की काली मिट्टी में कपास की पैदावार होती थी। निचले दक्खन में रागी, बाजरा और इसी कोटि के दूसरे कई अनाजों की खेती होती थी।

पशु-पालन

विद्धानों का मत है कि ताम्र-पाषाणिक काल का मानव पशुओं को दूघ या घी प्राप्त करने के लिए नहीं पालता था अपितु मांस प्राप्ति, बोझा ढोने, कृषि करने तथा यातायात के लिए करता था। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी महाराष्ट्र में रहने वाले ताम्र-पाषाण काल के लोगों ने पशुओं को पालतू बनाया था और वे खेती भी करते थे। वे गाय, बकरी, सूअर और भैंस पालते थे और हिरन का आखेट करते थे। इस काल की बस्तियों से ऊंट के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं के कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं जो घोड़े या पालतू गधे या जंगली गधे के हो सकते हैं। ये लोग निश्चय ही गौ-मांस खाते थे, सूअर के मांस का बहुत उपयोग नहीं होता था।

मछली एवं चावल का भोजन

बिहार और पश्चिमी बंगाल से, जहाँ चावल की खेती होती थी, मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वी प्रदेशों में रहने वाले ताम्र-पाषाण के लोग मछली और चावल खाते थे। देश के इस भाग में आज भी मछली और चावल लोकप्रिय भोजन हैं।

हस्तकलाएं

इस काल का मानव तांबे की वस्तुएं और पत्थर के औजार बनाने में निपुण था। इस काल के छोटे आकार के बहुत सारे पत्थर के औजार मिले हैं, जिन्हें लघुपाषाण कहते हैं। वे कताई और बुनाई की कला भी जानते थे, क्योंकि मालवा से उस काल की तकली की चक्रियां मिली हैं। महाराष्ट्र से कपास, सन और रेशम के तन्तु मिले हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग कपड़ा भी तैयार करते थे।

विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों का उपयोग

ताम्र-पाषाण काल के लोग विभिन्न प्रकार के मृदभाण्डों का उपयोग करते थे। इनमें से एक प्रकार के बर्तन काले-लाल रंग के थे। अनुमान होता है कि इनका प्रचलन दूर-दूर तक था। इन बर्तनों को चाक पर बनाया जाता था। कभी-कभी इन पर सफेद रैखिक आकृतियां भी चित्रित की जाती थीं। यह तथ्य न केवल राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बस्तियों के सम्बन्ध में है अपितु बिहार और पश्चिमी बंगाल में खोजी गई बस्तियों के सम्बन्ध में भी है।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में रहने वाले इस काल के लोगों ने टोंटी वाले लोटे, धरनी-युक्त तश्तरियां और धरनी-युक्त कटोरे बनाए थे। यह सोचना गलत होगा कि जिन भी लोगों ने काले-लाल बर्तनों का उपयोग किया उनकी संस्कृति भी एक ही थी। उनके बर्तनों और औजारों की बनावट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। इस काल के लोगों ने लोटों तथा तश्तरियों का उपयोग तो किया किंतु थालियों का उपयोग नहीं किया।

कार्य-कुशलता में वृद्धि

धातु के काम में कुशलता की बड़ी आवश्यकता होती है। अतः अपने कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिए अब लोग पूरे समय अपने ही कार्य में लगे रहते थे। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के कार्यों में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगे। अब कार्य-विभाजन का सिद्धान्त बहुत आगे बढ़ गया और लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत से लोगों पर निर्भर रहने लगे। इस प्रकार मनुष्य स्वावलम्बी से परावलम्बी हो गया।

पक्के भवनों का निर्माण

इस काल से पहले के लोग आम तौर से पकी हुई ईटों से परिचित नहीं थे। धूप में सुखाई तथा आग में पकाई हुई ईटों के भवनों का निर्माण इसी काल में आरम्भ हुआ किंतु इनका उपयोग विरले ही होता था। इस काल में अधिकतर घर टट्टर को लीपकर बनाए जाते थे और इन पर संभवतः छप्पर भी डाले जाते थे। ये मकान बड़े सुविधाजनक होते थे और इनमें सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहती थी।

इन आवासों में मनुष्य, पशु तथा भण्डारण के लिए अलग-अलग प्रबन्ध रहता था। पश्चिमी महाराष्ट्र के इनामगांव स्थान पर आरंभिक ताम्र-पाषाण काल के चूल्हों सहित मिट्टी के बड़े भवन और गोलाकार गड्ढों वाले भवन खोजे गए हैं। बाद की अवस्था ( ई.पू.1300-1000) का पांच कमरों का एक कमरा गोलाकार है। इससे पता चलता है कि इस युग के परिवार बड़े होते थे।

नगरीय सभ्यता के जनक

ताम्र-पाषाणिक अर्थ-व्यवस्था वस्तुतः ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था थी। जैसे कि इनामगांव तथा पश्चिमी मध्य प्रदेश की एरण तथा कयथ बस्तियों की किलेबंदी करके इनके चहुंओर खाइयां खोदी गई थीं जिससे अनुमान होता है कि ताम्राश्म संस्कृति के मानव ने नगरीय सभ्यता को जन्म दिया था।

धार्मिक भावना का सुढ़ढ़ीकरण

इस युग में कृषि कार्य विस्तृत हो जाने के कारण मानव पर प्रकृति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता अधिक प्रभाव डालने लगी। इस कारण इस काल के मानव ने प्राकृतिक शक्तियों को देवी-देवता के रूप में पूजना आरम्भ किया। पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण आरम्भ हो गया। धार्मिक भावना के उदय के साथ-साथ इस युग के मानव में अन्धविश्वास भी उत्पन्न हो गया और वह जादू-टोना में विश्वास करने लगा।

 स्त्रियों की लघु मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण काल का मानव मातृदेवियों की उपासना करता था। कच्ची मिट्टी की नग्न लघु मूर्तियों की भी पूजा होती थी। इनामगांव से मातृदेवी की एक मूर्ति मिली है जो पश्चिमी एशिया से मिली मातृदेवी की मूर्ति जैसी है। मालवा और राजस्थान से प्राप्त वृषभ की रूढ़ शैली की मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि वृषभ की अनुष्ठानिक पूजा होती थी।

शवाधान

ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों के शव-संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस काल में महाराष्ट्र क्षेत्र में मृतक के शव को अपने भवन के फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण स्थिति में गाढ़ा जाता था। हड़प्पा के लोगों की तरह उनके पृथक समाधि क्षेत्र नहीं होते थे। कब्र में मिट्टी की हांडियाँ और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थीं, जो परलोक में मृतक के उपयोग के लिए होती थीं।

पश्चिमी महाराष्ट्र में चंदोली और नेवासा के शवाधानों में कुछ बच्चों को उनके गलों में तांबे की मणियों की मालाएं पहनाकर गाढ़ा गया था परन्तु दूसरे बच्चों के शवाधानों में केवल मिट्टी के बर्तन देखने को मिलते हैं। इनाम गांव के एक वयस्क व्यक्ति को मिट्टी और तांबे के बर्तनों के साथ गाढ़ा गया है।

ताम्राश्म संस्कृति की दुर्बलताएं

सामाजिक असमानताएं

ताम्र-पाषाण काल में सामाजिक असमानताएं आरंभ होने के प्रमाण मिलते हैं। कायथा के एक भवन से तांबे की 29 चूड़ियां और दो विशिष्ट कुल्हाड़ियां मिली हैं। उसी स्थान से मिट्टी के घड़ों में से सेलखड़ी और कार्नेलियन-जैसे कुछ मूल्यवान पत्थरों की मणियों की मालाएं मिली हैं। अनुमान है कि ये वस्तुएं समृद्ध लोगों की थीं।

कष्टमय जीवन

पश्चिमी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गाढ़े गए बच्चों के शवावशेषों से इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की दुर्बलता स्पष्ट हो जाती है। अन्न-उत्पादक अर्थव्यवस्था के उपरांत भी बच्चों की मृत्यु-दर बहुत ऊंची थी। इसके कारणों का पता लगाना कठिन है। कुपोषण अथवा महामारी के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मरे होंगे। उस काल के ताम्र-पाषाणिक समाज तथा अर्थव्यवस्था में दीर्घायु प्राप्ति को बढ़ावा मिलना सम्भव नहीं था।

हड़प्पा सभ्यता से तकनीकी आदान-प्रदान का अभाव

ताम्र-निधियों वाले ये लोग हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे, और ये लोग गेरुए रंग के बर्तनों वाले जिस प्रदेश में रहते थे वह भी हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से अधिक दूर नहीं था। इसलिए दोनों सभ्यताओं में सम्पर्क होना तथा तकनीकी कौशल का आदान प्रदान होना स्वाभाविक था किंतु ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों ने हड़प्पा सभ्यता के लोगों के ज्ञान का लाभ नहीं उठाया। इसलिए वे कांसे के बारे में नहीं जान सके।

भारत में ताम्र बस्तियों की खोज

भारत में ताम्र निर्मित सामग्री सबसे पहले गंगा-यमुना के दोआब में उपलब्ध हुई थी। गुनेरियां नामक स्थान से ताम्बे एवं कांसे की वस्तुओं का विशाल भण्डार मिला है। इस सामग्री में कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटारें, हार्पून एवं छल्ले प्रमुख हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इस क्षेत्र से प्राप्त कुल्हाड़ियों को पांच भागों में बांटा है। तलवारें प्रायः एक जैसी हैं। इन तलवारों के ब्लेड पत्ती के समान हैं एवं मुठिया तथा धार के साथ समूची तलवार एक ही सांचे में ढाली गई है। कटार का निर्माण भी इसी प्रकार से किया गया है। यह समग्र सामग्री सिंधु घाटी से प्राप्त सामग्री से भिन्न है।

प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियाँ

भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग ई.पू.2150 से ईस्वी 600 (वैदिक-काल से लेकर गुप्तकाल) तक रहा। दक्षिण भारत में नवपाषाणिक अवस्था एकाएक ताम्र-पाषाणिक अवस्था में बदल गई। इसलिए इन संस्कृतियों को नवपाषाणिक ताम्र-पाषाणिक नाम दिया गया है।

दूसरे भागों, विशेषतः पश्चिमी महाराष्ट्र और राजस्थान के लोग सम्भवतः उपनिवेशिक थे परन्तु तिथिक्रमानुसार, मालवा और मध्य भारत की कुछ बस्तियां, जैसे कि कायथा और एरण की बस्तियां, सबसे पुरानी थीं। पश्चिमी महाराष्ट्र में ताम्र-पाषाणिक बस्तियां कालांतर में स्थापित हुईं। पश्चिमी बंगाल में ताम्र-पाषाणिक बस्तियों की स्थापना सम्भवतः सबके अंत में हुई।

(1.) कायथा संस्कृति (ई.पू. 2150 से ई.पू.1400)

कायथा संस्कृति की बस्तियां मध्यप्रदेश में कालीसिंध नदी के किनारे स्थित हैं। कायथा टीले से 12 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव मिला है जिसमें ताम्रपाषाणिक संस्कृति से लेकर गुप्त राजवंश के काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ से मृदभाण्ड बनाने की तीन परम्पराएं मिली हैं। प्रथम पात्र परम्परा हल्के गुलाबी रंग की है जिस पर बैंगनी रंग की चित्रकारी मिलती है।

दूसरी पात्र परम्परा पाण्डुरंग की है। बर्तनों पर लाल रंग से चित्रण अभिप्राय संजोये गए हैं। तीसरी परम्परा अलंकृत लाल रंग की मृद्भाण्ड परम्परा है जिन पर कंघी की तरह के किसी उपकरण से आरेखण किया गया है।

(2.) आहड़ संस्कृति (ई.पू.1900 से ई.पू.1200)

यह बस्ती राजस्थान के उदयपुर नगर से 4 किलोमीटर दूर आहड़ नामक स्थान पर मिली है। आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती है। इस स्थान को अब धूलकोट कहते हैं। यहाँ पर कायथा की तुलना में ताम्र उपकरण अधिक मिले हैं। इस संस्कृति के लोग सुखाई गई कच्ची ईंटों की सहायता से भवन बनाते थे। मकानों में दो-तीन मुंह वाले चूल्हे भी मिले हैं।

यहाँ से बड़े-बड़े भाण्ड तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं। कपड़़ों पर छपाई के ठप्पे भी प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति में शवों को गाड़ते समय शव का मस्तक उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर रखे गए हैं। आहड़ संस्कृति को बनास संस्कृति भी कहते हैं क्योंकि इस सभ्यता का प्रसार सम्पूर्ण बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में पाया गया है।

(3.) गिलूण्ड संस्कृति (1700 ई.पू. से 1300 ई.पू.)

आहड़ के निकट गिलूण्ड से भी ताम्रपाषाणिक बस्ती मिली है। यहाँ से चूने के प्लास्टर एवं कच्ची दीवारों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। यहाँ से लाल एवं काले मृदभाण्डों की ही संस्कृति प्राप्त हुई है। यहाँ से 100 गुणा 80 फुट आकार के ईंटों से बने विशाल भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ऐसे भवन आहड़ में देखने को नहीं मिलते।

(4.) नवदाटोली संस्कृति (1500 ई.पू. से 1200 ई.पू.)

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में मिलने के कारण इसे मालवा संस्कृति भी कहा जाता है। यह नर्बदा नदी के बायें किनारे पर स्थित है। यहाँ से मिले मृदभाण्ड गुलाबी रंग के हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्रण किया गया है। यहाँ से ताम्र उपकरण बहुत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। यहाँ से स्वर्ण, ताम्र, मृदा, शंख एवं सेलखड़ी पत्थर से बने आभूषण प्राप्त हुए हैं। कुछ अग्निकुण्ड भी मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि इस संस्कृति में अग्नि पूजा भी होती थी।

(5.) जोरवे संस्कृति (1400 ई.पू. से 700 ई.पू.)

पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रवर नदी तट पर स्थित जोरवे नामक गांव से इस संस्कृति के अवशेष मिले हैं। बाद में नासिक, नेवासा, इनामगांव, दैमाबाद आदि स्थलों से भी इस संस्कृति के अवशेष मिले। इस संस्कृति में बस्तियां बसाने का काम योजनाबद्ध तरीके से होता था। जोर्वे संस्कृति का प्रत्येक गांव 35 से भी अधिक गोलाकार अथवा आयताकार भवनों की एक सुगठित बस्ती होती थी। घरों के बीच एक से दो मीटर चौड़ी गलियां छोड़़ी गई हैं। यहाँ से कुम्हार, सुनार, हाथीदांत के शिल्पकारों के औजार मिले हैं जो बस्ती की पश्चिमी सीमा पर रहते थे।

समृद्ध किसान गांव के बीच में रहते थे। दस्तकारों के मकानों का आकार, समृद्ध किसानों के घरों के आकार की तुलना में छोटा है। यहाँ से अल्प मात्रा में ताम्बे के उपकरण पाए गए हैं। मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं जिनमें मातृदेवी एवं वृषभ की मूर्तियाँ विशेष हैं। इस संस्कृति में खेती के लिए नहरों एवं बांधों का निर्माण किए जाने के प्रमाण मिले हैं। दैमाबाद से कांसे की वस्तुएं बड़ी संख्या में मिली हैं। दैमाबाद से ताम्बे से निर्मित- रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे तथा हाथी की मूर्तियाँ मिली हैं।

(6.) पूर्वी भारत की बस्तियां (2000 ई.पू.)

पूर्वी भारत से चावल पर आधारित एक विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम संस्कृति का पता चला है। यह 2000 ई.पू. के आसपास अस्तित्त्व में रही होगी। उड़ीसा तथा बंगाल प्रांत के वीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर, बांकुरा, पांडु राजार ढिबी, महिषदल आदि में इस संस्कृति की बस्तियां मिली हैं। यहाँ गारे और सरकण्डे से निर्मित घरों के साथ-साथ चावल तथा मूंग सहित तरह-तरह की फसलों का समृद्ध संग्रह देखने को मिलता है।

(7.) ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दो-आब की बस्तियां (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.)

इन क्षेत्रों से गेरुए रंग के मृदभाण्डों वाली बस्तियां मिली हैं। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के बसौली तथा बिजनौर जिले के राजपुर परसू से नई किस्म के बर्तन प्राप्त हुए हैं। ये दोनों ही स्थान ताम्र भण्डार क्षेत्र में स्थित हैं। इस संस्कृति में अतरंजीखेड़ा का प्रमुख स्थान है। यहाँ से धूसर भाण्ड वाली बस्तियां मिली हैं। सहारनपुर से लेकर इटावा तक इस संस्कृति के लगभग 110 स्थल मिले हैं जिन्हें गेरुए रंग के मृदभाण्डों की संस्कृति कहते हैं।

(8.) ऐतिहासिक कालों की बस्तियां

उत्तर भारत में ताम्र पाषाणिक संस्कृति, जनपद युग एवं मगधीय साम्राज्य (600 ई.पू. से 300 ई.पू.) तथा शुंग, कुषाण एवं गुप्त काल (300 ई.पू. से 600 ई.) तक अस्तित्त्व में रहीं जबकि पश्चिमी भारत में 3500 ई.पू. के आसपास ताम्रकांस्य संस्कृति जन्म ले चुकी थी।

(9.) सिंधु नदी घाटी क्षेत्र में ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियाँ

सिंधु नदी घाटी में भी ताम्बे एवं कांसे की अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं किंतु यहाँ पर तलवार एवं हार्पून का अभाव है। इस क्षेत्र से मिले इस काल के हथियार साधारण कोटि के हैं। यहाँ पर धातु के साथ-साथ पाषाण सामग्री का उपयोग भी चलता रहा।

कांस्य की खोज

पाषाण की तुलना में ताम्बा अधिक उपयोगी था किंतु मुलायम होने के कारण इससे कठोर कार्य नहीं लिया जा सकता था। इसलिए मनुष्य ताम्बे से अधिक कठोर धातु की खोज में जुटा तथा उसने कांसे को खोज निकाला। यह मिश्रित धातु थी जो ताम्बे में टिन के मिश्रण से तैयार की जाती थी। दो धातुओं के मिश्रण से तीसरी धातु बनाने की क्षमता अर्जित कर लेना, इस युग के मानव की बौद्धिक परिपक्वता का प्रमाण है।

ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ

आज से कुछ हजार वर्ष पहले, सिंध और बलोचिस्तान के जो प्रदेश आज की तरह रेगिस्तान नहीं थे। इन क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती थी तथा घने जंगलों से परिपूर्ण थे। जल और जंगल के कारण इन क्षेत्रों में मानव सभ्यता ने अच्छा विकास किया। ई.पू.4000 में भी इस क्षेत्र में ग्रामीण बस्तियां थीं।

इन बस्तियों में पाषाण युग के बाद ताम्र युग का विकास हुआ। इन बस्तियों के लोगों का पश्चिम एशिया में स्थित मानव बस्तियों से सम्पर्क होने का भी अनुमान है। क्योंकि सिंध एवं बलोचिस्तान जैसे उपकरण पश्चिम एशियाई बस्तियों में भी प्राप्त हुए हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इन बस्तियों को चार भागों में विभक्त किया है-

(1) क्वेटा संस्कृति

बोलन के दर्रे में प्राप्त अवशेषों के आधार पर),

(2) अमरी-नल संस्कृति

सिंध में अमरी नामक स्थान पर तथा बलोचिस्तान में नल नदी की घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर,

(3) कुल्ली संस्कृति

बलोचिस्तान में कोल्बा नामक स्थान से प्राप्त अवशेषों के आधार पर तथा

(4) झोब संस्कृति

उत्तरी बलोचिस्तान की झोब घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर।

राजस्थान की ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ

राजस्थान में भी पाषाण काल के अंतिम वर्षों में ताम्रकाल आरंभ हो गया था। राजस्थान के पुरातत्त्व विभाग ने भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के सहयोग से कालीबंगा, आहड़, बागौर, रंगमहल, बैराठ, गिलूण्ड, नोह आदि स्थानों पर उत्खनन किया। इन उत्खननों में हमें सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन एवं सिंधु सभ्यता के समकक्ष सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हएु हैं।

ताम्र-पाषाणिक एवं ताम्र-कांस्य संस्कृति में अंतर

ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव पकी हुई ईंटों से घर बनाना नहीं जानता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव पकी हुई ईटों से घर बनाता था। ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव ताम्र औजारों के साथ-साथ प्रस्तर निर्मित औजारों का प्रयोग करता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव ताम्र एवं कांस्य से बने औजारों का प्रयोग करता था।

ताम्र-पाषाणिक बस्तियां पूर्वी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत एवं महाराष्ट्र में नासिक तक प्राप्त हुई हैं जबकि ताम्र-कांस्य बस्तियां बिलोचिस्तान एवं सिंध क्षेत्र में अधिक प्राप्त हुई हैं। ताम्र-पाषाण-कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला अर्थात् कांसा बनाने की विधि से अपरिचित था जबकि ताम्र-कांस्य कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला से अच्छी तरह परिचित हो गया था।

यह एक आश्चर्य की ही बात है कि सिंधु सभ्यता जो कि ताम्र-पाषाण काल से भी पुरानी है, में कांसे का प्रयोग होता था। इससे अनुमान होता है कि ताम्र-पाषाणिक अवस्था में जी रहे लोगों का उन क्षेत्रों से सम्पर्क नहीं था जो उनके समकालीन होते हुए भी कांस्य का उपयोग कर रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

लौह युगीन संस्कृति

महापाषाण संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

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सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता भारत भूमि पर प्रकट होने वाली सर्वप्रथम सुविकसित सभ्यता मानी जाती है। इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है। यह तृतीय कांस्य-कालीन सभ्यता थी।

जिस समय सिंधु घाटी सभ्यता अस्तित्व में आई, लौह सभ्यताएं भविष्य के गर्भ में थीं, यहाँ तक कि इसके समानांतर रह रही प्राचीन बस्तियां अभी भी नव पाषाणकाल में जी रही थीं तथा उनमें ताम्बे की खोज होनी अभी बाकी थी।

निश्चित रूप से सिंधु घाटी सभ्यता, नवपाषाण कालीन बस्तियों से ही विकसित हुई थी किंतु सिंधु वासियों ने न केवल ताम्बे की अपितु उसके साथ-साथ टिन की खोज में भी सफलता अर्जित कर ली थी जिसके कारण वे मिश्रधातु ‘कांस्य’ अथवा ‘कांसे’ का निर्माण कर पाए थे तथा इस धातु के कारण वे सभ्यता, संस्कृति एवं विज्ञान के मामले में अपनी समकालीन संस्कृतियों से अचानक ही तेजी से आगे निकल गए थे।

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चूँकि इस सभ्यता के अधिकांश भग्नावशेष सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में उपलब्ध हुए हैं, इसलिए इसे सिन्धु-घाटी सभ्यता अथवा ‘सैन्धव सभ्यता’ कहा जाता है। हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो नामक नगरों के आस-पास इस सभ्यता के बड़े केन्द्र प्राप्त होने से इस संस्कृति को ‘हड़प्पा संस्कृति’ एवं मोहेनजोदड़ो संस्कृति के नाम से भी पुकारा जाता है। आसपास की भूमि से ऊपर उभरे हुए विशाल टीलों में दबी पड़ी इस सभ्यता के उत्खनन का कार्य ई.1920 में हड़प्पा में आरम्भ किया गया। हड़प्पा, अखण्ड भारत के पंजाब प्रांत के पश्चिमी हिस्से में स्थित ‘माण्टगोमरी’ जिले में स्थित था। लाहौर से लगभग 100 मील दक्षिण-पश्चिम में रावी नदी के तट पर हड़प्पा सभ्यता के टीले विद्यमान थे। इन टीलों का उत्खनन कार्य करवाने वालों में दयाराम साहनी तथा माधोस्वरूप वत्स अग्रणी थे। ई.1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व में सिन्ध प्राप्त के लरकाना जिले में खुदाई का काम हुआ, जिसके फलस्वरूप ‘मोहेनजोदड़ो’ नामक स्थान पर एक सैन्धव नगर के अवशेष उपलब्ध हुए। यद्यपि इन दोनों स्थानों के बीच लगभग 680 किलोमीटर की दूरी है तथापि दोनों स्थानों की खुदाई में प्राप्त अवशेषों में अद्भुत साम्यता थी।

दोनों केन्द्रों से प्राप्त सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर सर जॉन मार्शल ने सिद्ध किया कि ये अवशेष एक ही पूर्वेतिहासिक सभ्यता से सम्बद्ध हैं।

अर्नेस्ट मैके, एन. जी. मजूमदार, सर ऑरेल स्टीन, एच. हारग्रीव्ज, पिगट, मोरटीमर व्हीलर, रंगनाथराव, एच. डी. सांकलिया, बी. बी. लाल, बी. के. थापर आदि पुरातत्त्वेताओं ने खोज और खनन के कार्य को आगे बढ़ाया जिससे यह पता चला कि यह प्राचीन सभ्यता केवल सिन्धु घाटी तक ही सीमित नहीं थी। सिंधु की सहायक नदियों के किनारों से भी इस काल की सभ्यता के अवशेष बड़ी संख्या में प्राप्त हुए।

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार क्षेत्र

इस सभ्यता का विस्तार अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान के बलोचिस्तान, सिन्ध एवं पंजाब, भारत के गंगा घाटी, पश्चिमी राजस्थान एवं गुजरात तक था। पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे। अफगानिस्तान में क्वेटा, कीली, गुलमुहम्मद, मुण्डिगक नदी के किनारे-किनारे तथा डम्बसदात में भी सिन्धु सभ्यता के प्राचीनतम अवशेष मिले हैं। बलोचिस्तान के उत्तर-पूर्व में लोरलाय घाटी तथा जोब नदी की घाटी में भी इस सभ्यता के कई स्थल मिले हैं।

मान्यता है कि दक्षिणी बलोचिस्तान की ‘कुल्ली सभ्यता’ सिन्धु सभ्यता का ही प्रारम्भिक रूप रही होगी। उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा से मिले अवशेषों का निचला स्तर सिन्धु सभ्यता से भी पहले का है जबकि ऊपरी स्तर सिन्धु सभ्यता से सम्बन्धित है। पंजाब में रोपड़ तथा गुजरात में लोथल और रंगपुर नामक स्थानों से प्राप्त अवशेष भी सिन्धु सभ्यता के समकालीन प्रमाणित होते हैं।

इस प्रकार अखण्ड भारत में सैन्धव सभ्यता का विस्तार पश्चिम में अरब सागर के तट पर स्थित सुत्कांगाडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर एवं विलुप्त सरस्वती नदी के किनारे तथा उत्तर में शिमला की पहाड़ियों की तलहटी से लेकर दक्षिण में नर्बदा और ताप्ती नदियों के मध्य भगवार तक था।

रंगनाथराव ने इस सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम में लगभग 1600 किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण में लगभग 1100 किलोमीटर माना है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार का है और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यह क्षेत्र आज के पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, साथ ही प्राचीन मिस्र और मेसीपोटामिया से भी बड़ा था। ई.पू.3000 एवं ई.पू.2000 में संसार का कोई भी अन्य सांस्कृतिक क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से बड़ा नहीं था।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल

हड़प्पा संस्कृति के अब तक 1400 से अधिक स्थलों का पता लग चुका है। इनमें से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी घाटी क्षेत्र में थे। अब तक ज्ञात स्थलों में से केवल छः स्थलों को ही नगर माना जाता है। इन नगरों में दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नगर थे- पंजाब में हड़प्पा और सिन्ध में मोहेनजोदड़ो। सिन्धु नदी इन्हें एक दूसरे से जोड़ती थी। तीसरा नगर सिन्ध प्रांत में चहुन्दड़ो था जो मोहेनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। चौथा नगर गुजरात में खम्भात की खाड़ी के ऊपर लोथल नामक स्थान पर है।

पांचवा नगर उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा नामक स्थान पर तथा छठा नगर हरियाणा के हिसार जिले में बनवाली नामक स्थल पर है। बनवाली में भी कालीबंगा की तरह दो सांस्कृतिक अवस्थाओं- हड़प्पा पूर्व सभ्यता और हड़प्पा-कालीन सभ्यता के दर्शन होते हैं। बिना पकी ईटों के चबूतरों, सड़कों और मोरियों के अवशेष हड़प्पा-पूर्व युग के हैं। इन समस्त स्थलों पर उन्नत और समृद्ध हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते हैं। सुत्कांगाडोर और सुरकोटड़ा के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति के उन्नत रूप के दर्शन होते हैं जहाँ नगर दुर्ग स्थित हैं।

गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी एवं कच्छ क्षेत्र में धौलावीरा नामक स्थलों पर इस संस्कृति की उत्तरावस्था के दर्शन होते हैं। हरियाणा में राखीगढ़ी तथा कुणाल एवं उत्तर प्रदेश में हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर में भी इस संस्कृति के दर्शन होते हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता का काल

सिन्धु-घाटी की सभ्यता कितनी पुरानी है, इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं हो पाया है। बुलीहॉल, गार्डन चाइल्ड, बेक आदि विद्वान विश्व की नदी घाटी सभ्यताओं में सिन्धु सभ्यता को सबसे प्राचीन एवं प्रारम्भिक मानते हैं। कुछ विद्वानों ने इसे ईसा से 5,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 4,000 वर्ष पूर्व, कुछ ने 3,000 वर्ष पूर्व और कुछ ने केवल 2,500 वर्ष पूर्व की बताया है।

 डॉ. राधकुमुद मुकर्जी ने इसे विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता बताते हुए लिखा है– ‘सिन्धु-घाटी की सभ्यता का न तो मेसोपोटामिया की सभ्यता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है और न वह उसकी ऋणी है।’

जॉन मार्शल और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी का मत है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ई.पू.3250 से भी बहुत पहले हुआ होगा। प्रो. के. एन. शास्त्री और डॉ. राजबली पाण्डेय इसे ई.पू. 4000 साल पुरानी सभ्यता मानते हैं। अब यह धारणा दृढ़ होती जा रही है कि सिन्धु-सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। डी. पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर इसका समय 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. तक बताया है।

डॉ पाण्डेय का मत है कि- ‘सिंधु सभ्यता की खुदाई में जल के धरातल तक प्राचीन नगरों के खण्डहरों के एक के उपर एक, सात स्तर मिले हैं। यदि एक नगर के बसने, पनपने और उजड़ने के लिए 500 साल का समय दिया जाए तो सात नगरों के बसने, विकसित होने और उजड़ने में लगभग 3500 साल लगे होंगे। सबसे नीचे का स्तर भी सभ्य नगर का अवशेष है, जिसके पूर्व सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यदि भू-गर्भ का पानी बीच में बाधा न डालता तो सातवें स्तर के नीचे भी खण्डहरों के स्तर मिल सकते हैं। इस प्रकार सिन्धु सभ्यता कम से कम ईसा पूर्व चार हजार वर्ष की है।’

बलोचिस्तान एवं मकरान में मिली पुरातत्विक वस्तुओं के आधार पर भी यह माना जाता है कि सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ ईसा से 4000 साल पूर्व क्वेटा, अमरी, नाल, कुली, झोव आदि स्थानों पर छोटी बस्तियों के रूप में हो गया था। डॉ. राधाकृष्णन की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता ई.पू.3500 से ई.पू.2250 के मध्य अपने चरम पर थी। सर मोरटीमर व्हीलर इस सभ्यता को ई.पू.2500 से ई.पू.1500 के मध्य की मानते हैं। डॉ. फ्रेंकफर्ट ने इसका काल ई.पू.2800 का माना है।

डॉ. फबरी ने इसका समय ई.पू.2800-2500 माना है। नवीनतम खोजों के आधार पर डॉ. अर्नेस्ट मैके ने भी डॉ. फबरी के मत की पुष्टि की है। ‘कार्बन-14 परीक्षण प्रणाली’ के अनुसार सिन्धु सभ्यता का काल एक विवादास्पद प्रश्न है परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ई.पू.3000 में भारत-भूमि पर सिन्धु सभ्यता के रूप में स्वतंत्र एवं समृद्ध सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यह सभ्यता मेसोपोटामिया तथा सुमेरियाई सभ्यताओं से किसी भी प्रकार कम उन्नत नहीं थी।

डॉ. फ्रैंकफर्ट ने लिखा है- ‘यह बिना किसी सन्देह के निर्धारित हो चुका है कि भारत ने एक ऐसी संस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा की जिसने यूनानियों के पहले इस विश्व को सभ्य बनाया।’

सिंधु घाटी सभ्यता के तीन स्तर

हड़प्पा सभ्यता के तीन स्तर पाए गए हैं- (1.) प्रारंभिक काल (ई.पू.3500 से ई.पू.2800 ई.पू.), (2.) मध्य-काल या चरमोत्कर्ष काल ( ई.पू.2800 से ई.पू.2200) तथा (3.) अवनति काल ( ई.पू.2200 से ई.पू.1500)

कांस्य कालीन सभ्यता

सैन्धव सभ्यता प्रधानतः कांस्य कालीन सभ्यता थी तथा उस काल के तृतीय चरण की सभ्यता है। इसका गम्भीरता पूर्वक अध्ययन करने पर इसमें कांस्य-काल की चरमोन्नति दिखाई देती है। कांस्य कालीन सभ्यता कालक्रम के अनुसार ताम्र कालीन सभ्यता के बाद की तथा लौह कालीन सभ्यता के पूर्व की ठहरती है।

समकालीन सभ्यताओं से सम्पर्क

हड़प्पा सभ्यता का तत्कालीन अन्य सभ्यताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा। ये लोग पहिए वाली बैलगाड़ियों एवं जल-नौकाओं का उपयोग करते थे। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का भी उपयोग करते थे। इस कारण अन्य स्थानों के लिए इनका आवागमन एवं परिवहन पहले की सभ्यताओं की तुलना में अधिक सुगम था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती होंगी और उन देशों से हड़प्पावासियों के व्यापारिक सम्बन्ध रहे होंगे। सोना, चांदी, ताम्बा आदि धातुएं सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलती थीं। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते होंगे। हड़प्पावासी ताम्बा राजस्थान से, सीपी और शंख काठियावाड़ से तथा देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते होंगे।

अनुमान है कि हड़प्पा संस्कृति के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान की अन्य मानव बस्तियों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पावासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह्ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि सिन्धुघाटी के शहरों में बनी हुई वस्तुएं दजला और फरात के बाजारों में बिकती थीं….. अरब सागर के किनारों से लाई गई मछलियां मोहनजोदड़ो के भोजन में सम्मिलित थीं। 

सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता

यह प्रश्न आज भी नहीं सुलझ पाया है कि सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे! सिन्धु सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों की खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों की शारीरिक बनावट के विश्लेषण के आधार पर मानवशास्त्र वेत्ताओं ने सिन्धु सभ्यता का विकास करने वालों लोगों को चार नस्लों- (1.) आदिम आग्नेय, (2.) मंगोलियन, (3.) भूमध्यसागरीय तथा (4.) अल्पाइन से सम्बन्धित बताया है।

इनमें से भूमध्यसागरीय जाति के लोगों की खोपड़ियां सर्वाधिक संख्या में मिली हैं जबकि मंगोलियन तथा अल्पाइन नस्ल के लोगों की केवल एक-एक खोपड़ी मिली है। अतः जब तक सिन्धु सभ्यता के स्थलों से प्राप्त मोहरों पर अंकित लिपि को पढ़ नहीं लिया जाता तब तक यह कहना कठिन होगा कि इस सभ्यता के निर्माता किस जाति या नस्ल के थे? सैन्धव सभ्यता के निर्माताओं के सम्बन्ध में विद्वानों में विभिन्न मान्यताएँ प्रचलित हैं-

(1.) सैन्धव सभ्यता के निवासी मिश्रित नस्ल के थे

सिंधु सभ्यता से मिली चार नस्लों की खोपड़ियों के आधार पर कर्नल स्युअल और डॉ गुह्बा की मान्यता है कि सिन्धु सभ्यता का निर्माण किसी एक नस्ल अथवा जाति के लोगों ने नहीं किया। सिन्धु सभ्यता नागरिक सभ्यता थी। इसके मुख्य नगर व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख केन्द्र बने हुए थे। अतः आजीविका की तलाश में अनेक प्रजातियों के लोग यहाँ आकर बस गए थे।

(2.) सैन्धव सभ्यता के निवासी द्रविड़़ थे

सर जॉन मार्शल तथा प्रो. रामलखन बनर्जी आदि कुछ विद्वानों ने माना है कि चूँकि खुदाई में प्राप्त नर-कंकालों में भूमध्यसागरीय नस्ल की प्रधानता है, अतः इस सभ्यता के निर्माण का श्रेय द्रविड़़ों को दिया जाना चाहिए। द्रविड़ लोग भूमध्यसागरीय नस्ल की ही एक शाखा थे। कुछ विद्वान बलोचिस्तान आदि भागों में बोली जाने वाली ‘ब्राहुई’ भाषा तथा द्रविड़ों की भाषा में समानता के कारण भी द्रविड़ों को इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं। दक्षिण भारत के द्रविड़ों के मिट्टी तथा पत्थर के बर्तन और आभूषण सिन्धु-घाटी के लोगों के बर्तन तथा आभूषणों से मिलते-जुलते हैं।

(3.) सैन्धव सभ्यता के निवासी सुमेरियन थे

प्रोफेसर चाइल्ड ने सुमेरियन लोगों को इस सभ्यता का निर्माता माना है। डॉ. हाल ने भी उनके मत की पुष्टि की है। पिगट के अनुसार इस सभ्यता का मूल पूर्णतः भारतीय था परन्तु वे इस पर सुमेरियन प्रभाव को भी स्वीकार करते हैं।

(4.) सैन्धव सभ्यता के निवासी आर्य थे

लक्ष्मण स्वरूप, रामचंद्र, शंखरानन्द, दीक्षितार तथा डॉ. पुसालकर के अनुसार सैन्धव सभ्यता के निर्माता या तो आर्य थे अथवा आर्यों ने इस सभ्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। डॉ. पुसालकर के शब्दों में- ‘यह आर्य और अनार्य सभ्यताओं के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है। अधिक से अधिक हम यह कह सकते हैं कि सम्भवतः ऋग्वैदिक आर्य वहाँ की जनता का एक महत्त्वपूर्ण भाग थे और उन्होंने भी सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास में अपना योग दिया।’

(5.) सैन्धव निवासी असुर थे

एक विद्वान के विचार में सिन्धु-सभ्यता के निर्माता वही असुर थे जिसका वर्णन वेदों में मिलता है।

निष्कर्ष

सैन्धव सभ्यता की खुदाई में विभिन्न जातियों से सम्बद्ध मानवों की हड्डियाँ मिली हैं अतः यह मानना उचित होगा कि सिन्धु-घाटी के निर्माता मिश्रित जाति के थे तथापि सैन्धव समाज में द्रविड़ जाति की प्रधानता थी। सैन्धव सभ्यता के निर्माता जो भी रहे होंगे किंतु उनकी कुछ बातें उन्हें अपनी समकालीन मानव सभ्यताओं से बिल्कुल अलग करती हैं।

सैन्धव सभ्यता के लोग अपने भवनों का निर्माण पक्की ईंटों से करते थे जबकि सुमेरियन सभ्यता के लोग कच्ची ईंटों के मकान बनाते थे। सिंधु सभ्यता के स्थलों से न तो सुमेरियन शहरों की तरह मन्दिर मिले हैं और न मिस्र के नगरों जैसे महल या मकबरे। सिंधु सभ्यता में लिंगपूजा, योनिपूजा, पीपल पूजा, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों का महत्त्व, स्नान-ध्यान का महत्त्व और सफाई का महत्त्व आदि ऐसे प्रमाण मिले हैं जो अन्य समकालीन अथवा पूर्ववर्ती सभ्यताओं से प्राप्त नहीं हुए हैं।

सैन्धव सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरुष प्रतिमाओं के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, मृण्मूर्तियाँ आदि वस्तुएं सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता का धर्म

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सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का धर्म क्या था, किन सिद्धांतों पर टिका हुआ था, इसके सम्बन्ध में कोई लिखित जानकारी नहीं मिलती किंतु सिंधु सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरातत्व सामग्री के आधार पर यह अनुमान लागाने का प्रयास किया गया है कि सिंधु सभ्यता का धर्म कैसा था!

सिंधु सभ्यता के निवासी भलीभांति शिक्षित थे और उन्होंने लिपि, लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं के साथ-साथ धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का विकास कर लिया था। उनकी कलाप्रियता, धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का परिचय सिंधु सभ्यता की मुद्राओं पर बनी आकृतियों, बर्तनों पर की गई चित्रकारियों, शवाधानों में मिली वस्तुओं आदि से मिलता है।

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है। इस कारण उनकी भाषा और उसमें व्यक्त विचारों का ज्ञान नहीं हो सका है। फिर भी विविध स्थलों की खुदाई से प्राप्त मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है कि सैन्धव संस्कृति के विकास के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएँ विद्यमान थीं। वे आधुनिक भारतीयों की तरह जल, अग्नि, सूर्य, वायु, धरती आदि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-साथ वृक्षों एवं पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।

विश्वरूप स्रष्टिकर्ता अथवा परमपुरुष की उपासना

सिन्धुवासियों द्वारा मन्दिरों में पूजा-उपासना करने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है किन्तु सिन्धु सभ्यता की खुदाई में मिली कुछ मुद्राएं, लिंग, योनियां एवं मातृदेवियों की मूर्तियाँ सिधु सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का परिचय देती हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता के निवासी प्रजनन शक्तियों की परिचायक शक्तियों की पूजा देवी-देवता के रूप में करते रहे होंगे। यही सिंधु सभ्यता का धर्म था।

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खुदाई में मिली एक मुद्रा पर तीन मुख वाला उर्ध्वलिंग व्यक्ति योग मुद्रा में बैठा हुआ है। इस व्यक्ति के सिर पर दो सींग बने हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट धारण किया हुआ है। इस योगी के गले में तिकोनी माला है और हाथों में ऊपर तक मणियों की लड़ियाँ हैं। योगी के निकट हाथी, चीता, गैण्डा और भैंसा बने हुए हैं और उसके आसन के नीचे हरिणों का एक जोड़ा है। मुद्रा के उपरी हिस्से पर छः शब्द अंकित हैं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। बहुत से विद्वानों का मत है कि मुद्रा पर अंकित चित्र भगवान शिव का है क्योंकि शिव को योगीश्वर, त्रिशूलधारी, पशुपति, त्रयम्बक तथा त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। इस योगी के साथ शिव के विशिष्ट वाहन नन्दी का कोई अंकन नहीं किया गया है जिससे प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा भगवान शिव की नहीं है अपितु ‘विश्वरूप त्वष्टा’ की है जिसकी चर्चा ऋग्वेद में हुई है। वहाँ इसे विश्वकर्मा प्रजापति का रूप एवं पुत्र बताया गया है। यह सृष्टि में स्रष्टा के अवतार का प्रतीक है। इनके तीन सिर, मन, प्राण और वाक् को प्रकट करते हैं जिनसे विश्व की सृष्टि होती है। योगी का ऊर्ध्वलिंग स्रष्टा की प्रजनन शक्ति का परिचायक है। इसके आसन के नीचे बने हुए दो हरिण, प्रजापति और उषा के, हरिण और हरिणी के रूप में सम्भोग करने के सूचक हैं, जिसकी चर्चा मैत्रायणि संहिता और ऐतरेय ब्राह्मण में आई है। इसके दोनों और दिखाए गए पशुओं के चित्र ऋग्वेद में वर्णित त्वष्टा के पशुपति रूप को प्रकट करते हैं।

सिन्धु घाटी की खुदाई में मिली एक अन्य मुद्रा पर एक अन्य योगी का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक नाग तथा सामने दो नाग बैठे हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि नागों से घिरा हुआ योगी का यह चित्र भी भगवान शिव का है, क्योंकि वे अपने गले में नाग धारण करते हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक धनुर्धारी शिकारी का चित्र पाया गया है। विद्वानों की मान्यता है कि यह चित्र किरात वेशधारी भगवान शिव का है। इन समस्त साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस देवता की आकृति के पीछे ‘विश्वरूप स्रष्टिकर्ता’ अथवा ‘परम पुरुष’ की परिकल्पना है।

परमनारी की पूजा

सिन्धु नगरों की खुदाई में मिट्टी की बनी हुई बहुत सी नारी मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान होता है कि सिन्धु संस्कृति में परमनारी की पूजा अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती होगी। विद्वानों का मत है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। अतः सिंधुवासी पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे। इस देवी की पूजा समस्त कृषि प्रधान समाजों में प्रचलित थी। वे लोग देवी के समक्ष पशु-पक्षी अथवा नरबलि देते थे और उसके बदले में वह उन्हें धनधान्य देती थी। कालान्तर में मातृदेवी की उपासना से ही शक्ति-पूजा की परम्परा का विकास हुआ होगा।

मातृदेवी की मूतियाँ प्रायः नग्न रूप में मिली हैं। मूर्ति की कमर में पटका और मेखला तथा गले में हार प्रदर्शित किया गया है। सिर पर कुल्हाड़ी से मिलती-जुलती आकृति की कोई वस्तु भी दिखाई पड़ती है। कुछ मूर्तियों में देवी को जननी के रूप में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में देवी द्वारा शिशु को स्तनपान करते हुए प्रदर्शित किया गया है। एक मूर्ति में एक ऐसी स्त्री बनी हुई है जिसके गर्भ से एक वृक्ष निकलता हुआ प्रदर्शित किया गया है।

सम्भवतः यह वानस्पतिक जगत की देवी का प्रतीक हो। एक अन्य मूर्ति के शीश पर एक पक्षी पंख फैलाए बैठा है। संभवतः यह पक्षी जगत की देवी की प्रतीक हो। इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिन्धुवासी मातृदेवी को समस्त लोक की जननी एवं पालनकर्ता मानते थे। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान मिले हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धुवासी इन प्यालों में तेल अथवा धूप जलाकर मातृदेवी अथवा पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे।

प्रजनन शक्ति की पूजा

परमपुरुष और परमनारी के साथ-साथ सिन्धुवासी प्रजनन शक्ति की, लिंग एवं योनि के प्रतीकांे के रूप में भी पूजा करते थे। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में बहुत से लिंग मिले हैं। ये सामान्य पत्थर, लाल पत्थर अथवा नीले पत्थर के बने हैं। ये लिंग कुछ इंच से लेकर चार फुट की ऊँचाई तक के हैं। विद्वानों का मत है कि सिंधुवासी छोटे आकार के लिंगों की पूजा अपने घरों में करते थे और बड़े आकार के लिंग विशेष स्थानों अथवा चबूतरों पर प्रतिष्ठित करके पूजे जाते थे।

आधुनिक हिन्दू-धर्म में लिंग पूजा संभवतः सिन्धुवासियों की ही देन है। अर्नेस्ट मैके का मत है कि लिंग की आकृति के जो पत्थर मिले हैं उन्हें पूजा का प्रतीक नहीं समझना चाहिए। उनसे सम्भवतः कूटने-पीसने का काम लिया जाता रहा होगा जैसाकि आज भी मूसल, लोढ़े अथवा बट्टे से लिया जाता है।

खुदाई में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने बहुत से छल्ले मिले हैं जिनका आकार आधा इंच से लेकर चार इंच तक है। बहुत से विद्वानों ने इन छल्लों को योनियों का प्रतीक मानकार यह मत व्यक्त किया है कि सिन्धुवासी योनि की पूजा भी करते थे। आर्य लोग योनि पूजक नहीं थे। अतः आज भारत में लिंग-योनि पूजा की जो परम्परा देखने को मिलती है, वह निस्सन्देह अनार्यों की देन है। छल्लों के बारे में मैके का मत है कि अधिकांश छल्ले स्तम्भों के आधार थे न कि योनियों के प्रतीक।

वृक्ष-पूजा

सिंधु स्थलों की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं पर वृक्षों के चित्र मिले हैं जिनके आधार पर विद्वानों का मत है कि सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर पीपल की नौ पत्तियाँ अंकित हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है। मार्शल का मत है कि मुद्रा में अंकित टहनियाँ पीपल की हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि वृक्ष-पूजा के दो रूप प्रचलित थे-

(1.) वृक्ष को उसके प्राकृतिक रूप में पूजना, जैसे कि तुलसी पूजन।

(2.) वृक्ष को किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजना, जैसे पीपल की पूजा।

ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धुवासी पीपल को बड़ा पवित्र मानते थे। उनकी बहुत सी मुद्राओं पर पीपल के विविध अंकन मिलते हैं। कहीं उसे वेदिका से उगता हुआ दिखाया गया है तो कहीं इसके भीतर देवता को अंकित किया गया है। कहीं इसकी पांच पत्तों की टहनी और कहीं ग्यारह पत्तों की शाखा चित्रित की गई है। एक जगह इसकी पांच टहनियों पर सात पत्ते उपर की ओर, दो नीचे की ओर और एक बराबर में दिखाया गया है। कपड़ों और बर्तनों पर भी पीपल की टहनी और पत्तों के अनेक डिजाइन मिले हैं।

वेदों में पीपल का पेड़ विश्व-सृष्टि के प्रतीक के रूप में अंकित है। तैतिरीय ब्राह्मण में ब्रह्म को वृक्ष कहा गया है। भारत में पीपल को ब्रह्म का रूप समझ कर पूजा जाता है। सिन्धु सभ्यता के नगरों तथा ग्रामों के चौराहों और रास्तों पर बड़े-बड़े पीपल के पेड़ रहे होंगे, जिनकी जड़ों को स्त्री-पुरुष पूजते और जल से सींचते होंगे, जैसा कि आज भी होता है।

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि सिन्धुवासियों में पीपल के साथ-साथ तुलसी, नीम, खजूर, बबूल आदि वृक्षों की पूजा भी प्रचलित रही होगी। भारत में वृक्ष-पूजा की परम्परा बहुत पुरानी है। बौद्ध मतानुयायी भी पीपल की पूजा करते थे।

पशु-पूजा

वृक्ष-पूजा के साथ-साथ सिन्धुवासी पशु-पूजा में भी विश्वास रखते थे। कुछ मुद्राओं पर बैल के चित्र मिले हैं। खिलौनों के रूप में भी बैल मिले हैं। मोहेनजोदड़ो के एक ताम्रपत्र पर कूबड़दार बैल अंकित किया गया है। इसलिए विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव सभ्यता में बैल का बड़ा महत्त्व रहा होगा। शहरों की सड़कों पर बड़े-बड़े बैल विचरते होंगे और लोग श्रद्धा से उन्हें भोजन आदि देते होंगे। विद्वानों का अनुमान है कि बैल की पूजा शक्ति के प्रतीक के रूप में की जाती होगी। वैदिक साहित्य में भी बैल को देवत्व का प्रतीक और बड़ा पवित्र समझा गया है।

बैल की भांति भैंस और भैंसा की भी पूजा की जाती थी, क्योंकि अनेक मुद्राओं पर इनके चित्र मिले हैं। गाय की पूजा भी अवश्य होती थी। एक मुद्रा पर गाय की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। नाग-पूजा काफी प्रचलित थी। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखाया गया है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, गैंडा, हिरण, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पक्षियों के चित्र भी मिले हैं। सम्भव है कि ये पशु-पक्षी हिन्दू-धर्म की भांति सैन्धव धर्म में भी विभिन्न देवी-देवताओं के वाहन रहे हों।

सैन्धव प्रदेश की कुछ मुद्राओं पर मनुष्य को चीते से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस चित्र में वृक्ष पर चढ़ा हुआ आदमी चीते को भगा रहा है तथा भागता हुआ चीता पीछे की ओर मुँह करके देख रहा है। इन मुद्राओं से अनुमान होता है कि उस काल में चीते बड़ी संख्या में पाए जाते थे और मानवों का उनसे निरंतर संघर्ष चल रहा था।

सैन्धववासी, पशुओं की आकृति विचित्र ढंग से बनाते थे। कुछ पशु आधे मनुष्य और आधे पशु हैं। आधा भेड़, आधा बकरा, आधा हाथी और आधा बैल या इसी प्रकार के अन्य मिश्रण से पशुओं की आकृति बनाते थे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इनमें दैवीय अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।

अग्नि-पूजा

सैन्धव लोग अग्नि-पूजा भी करते थे। कालीबंगा के मकानों में कोयले, राख तथा जली हुई लकड़ियों से भरे हुए गड्ढे मिले हैं। एक चबूतरे पर कुआँ खुदा हुआ है तथा अग्नि स्थान पर पक्की ईंटों से निर्मित एक आयताकार गड्ढा मिला है जिसमें पशुओं की हड्डियां पाई गईं। दूसरे चबूतरे पर आयताकार सात अग्नि-वेदिकाएं एक कतार में थीं। यह कोई यज्ञभूमि प्रतीत होती है, जहाँ सामूहिक रूप से बैठकर यज्ञ करते थे। कुएं, हड्डियों भरे हुए गड्ढे तथा यज्ञवेदियों के पास-पास मिलने से अनुमान किया जाता है कि सैन्धव लोग नहाकर पवित्र होने के बाद यज्ञ करते थे तथा इस अवसर पर पशु-बलि दिया करते थे। कुछ मूर्तियों एवं मुद्राओं के हिस्से धुएं से काले पड़े हुए हैं। अनुमान है कि सैंधव-वासी पूजा में धूप-दीप का भी प्रयोग करते थे।

जल-पूजा

मोहेनजोदड़ो के दुर्ग की खुदाई में एक बहुत बड़ा जलाशय मिला है। ईंटों के स्थापत्य का यह एक सुंदर नमूना है। यह 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। यह पक्की ईटों का बना हुआ है और इसकी दीवारें मजबूत हैं। जलाशय के चारों और एक बारामदा है जिसकी चौड़ाई 5 मीटर है। जल-कुण्ड के दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ स्नानागार बने हुए हैं। इन स्नानागारों के ऊपर कमरे बने हुए थे जिनमें सम्भवतः पुजारी रहते थे।

जलाशय के निकट एक कुआं भी मिला है जिसके पानी से जलाशय को भरा जाता होगा। जलाशय को भरने तथा खाली करने के लिए नल बने होते थे। जलाशय के दोनों सिरों पर स्नानागार की सतह तक सीढ़ियां बनी हुई हैं। अनुमान है कि इस विशाल स्नानागार का उपयोग आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था तथा धार्मिक प्रथाओं में शारीरिक शुद्धि अथवा स्नान-ध्यान पर विशेष ध्यान दिया जाता होगा। आज भी भारत के धार्मिक कृत्यों में ऐसे स्नान का बड़ा महत्त्व है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधुवासी जल को भी देवता मानकर उसकी पूजा करते थे।

धार्मिक चिह्न

खुदाई में प्राप्त अनेक अवशेषों पर सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक के चिह्न मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि इन चिह्नों का भी कुछ धार्मिक महत्त्व रहा होगा। सम्भव है कि यह चिह्न किसी देवी-देवता के प्रतीक रहे हों अथवा किसी धार्मिक भावना के प्रतीक के रूप में इनकी पूजा की जाती हो। यह भी संभव है कि इन चिह्नों के माध्यम से रोग, बुरी नजर, प्रेतात्माओं आदि को दूर भगाया जाता हो। कुछ मुद्राओं पर बने चित्रों में नर-नारियों को सींग धारण किए हुए दिखाया गया है।

संभवतः शीश पर सींग धारण करने का भी कुछ धार्मिक महत्त्व था। इसी प्रकार स्तम्भ, स्वास्तिका और धूप-दीप आदि के प्रदर्शन का भी धार्मिक महत्त्व रहा होगा। हिन्दू-धर्म में आज भी स्वास्तिक, शंख, मछली आदि चिह्नों को पवित्र माना जाता है। माण्डने बनाने की प्रथा भी इन्हीं चिह्नों के अंकन की परम्परा का विकास हो सकता है।

मूर्ति-पूजा

मुद्राओं पर अंकित देवी-देवताओं के चित्रों तथा धार्मिक चिह्नों के अंकन से निश्चित हो जाता है कि सैन्धव लोग ईश्वर की सगुण-साकार उपासना करते थे और उनमें मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किंतु वे लोग इन मूर्तियों की स्थापना एवं धार्मिक चिह्नों के अंकन के लिए मंदिर नहीं बनाते थे क्योंकि सैंधव स्थलों की खुदाई में अभी तक मंदिर जैसी कोई रचना नहीं मिली है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मोहेनजोदड़ो में जिस स्थान पर कुषाणकालीन बौद्ध-स्तूप खड़ा है, उसके नीच सैन्धव वासियों का मन्दिर दबा हुआ हो सकता है।

धार्मिक अनुष्ठानों में नृत्य एवं संगीत का महत्त्व

सर जॉन मार्शल ने मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी आकृतियों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि ये नारी मूर्तियाँ मन्दिरों की उपासिकाएँ रही होंगी। खुदाई में प्राप्त निर्वस्त्र नृत्यांगना को विद्वानों ने देवदासी या उपासिका मानकर देवदासी प्रथा प्रचलित होने की कल्पना भी की है। संगीत एवं नृत्य के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने की परिपाटी भी रही होगी।

पशु-बलि

सैन्ध्व लोग, अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि भी देते होंगे। कालीबंगा में एक चबूतरे पर सात यज्ञकुण्डों की कतार वाले चबूतरे के निकट स्थित दूसरे चबूतरे पर खुदे कुएं के पास के गड्ढे में पशुओं की हड्डियां मिली हैं जिनसे प्रतीत होता है कि यज्ञों के समय पशु-बलि दी जाती होगी। यह भी संभव है कि बलि देने से पशुओं को भी जल से स्नान कराया जाता हो।

योग साधना

सैन्धव स्थलों से प्राप्त बहुत सी मुद्राओं पर योगियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। उनकी योगसन मुद्राओं के आधार पर कह कहा जा सकता है कि सैन्धव सभ्यता में योग साधना का बड़ा महत्त्व था।

परलोक में विश्वास

सैन्धव लोग मानव जीवन की यात्रा केवल इसी लोक तक सीमित नहीं समझते थे इसलिए वे शव को या तो विधि-विधान पूर्वक शवाधानों में गाढ़ते थे। या उसे जलाकर उसकी भस्मी कलश में रख दी जाती थी। शव को गाढ़ते समय या उसकी भस्मी के कलश के साथ पशु-पक्षी, मछली, मनके, कड़े, बर्तन आदि चीजें रखते थे। संभवतः उनका विश्वास था कि मनुष्य को दूसरे लोक में पहुँचकर ये वस्तुएं प्राप्त होंगी।

एक मृद्भाण्ड पर बकरा, गाय या बैल एवं कुत्ता अंकित है। इस अंकन का आशय पशु-बलि से हो सकता है। कुछ मुद्राएँ गण्डे एवं ताबीज की तरह बनाई गई हैं जो संभवतः गले में पहनी जाती होंगी या भुजाओं एवं कमर पर बांधी जाती होंगी। इन ताबीजों से अनुमान होता है कि सैन्धव-वासी जादू व टोने-टोकटे में भी विश्वास करते थे।

आधुनिक हिन्दू-धर्म के साथ तुलना

सिन्धु वासियों के धर्म तथा आधुनिक हिन्दू-धर्म में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं हैं। इस आधार पर स्टुअर्ट, पिगट तथा जॉन मार्शल आदि पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म का स्रोत सिन्धु घाटी रहा होगा।

जॉन मार्शल ने लिखा है- ‘सिन्धु घाटी के धर्म में बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनसे मिलती जुलती बातें हमें अन्य देशों में भी मिल सकती हैं और यह बात समस्त प्रागैतिहासिक धर्मों के विषय में ठीक सिद्ध होगी किंतु उनका धर्म इतनी विशेषता के साथ भारतीय है कि आधुनिक युग में प्रचलित हिन्दू-धर्म से बड़ी कठिनाई से ही उसका भेद किया जा सकता है।’

प्राचीन सिन्धुवासियों तथा आधुनिक हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों में समानता एवं असमानताएं इस प्रकार से हैं-

क्र.सं.सिन्धु-वासियों की धार्मिक आस्थाएंहिन्दुओं की धार्मिक आस्थाएं
1.सिन्धु-वासियों ने परम-पुरुष तथा परम-नारी को सजृन-शक्ति के प्रतीक रूप में माना।हिन्दू लोग शिव एवं पार्वती की पूजा करते हैं।
2.सैन्धव मुद्राओं पर योगीश्वर की प्रतिमाएं मिली हैं जिनके पास पशु बैठे हुए हैं।हिन्दूओं के शिव भी योगीश्वर हैं और पशुपतिनाथ के रूप में विख्यात है।
3.सैन्धव मुद्राओं पर योगीश्वर के पास नाग बैठे हैं।हिन्दुओं के शिव के गले में भी नाग हैं।
4.सैन्धवों की मुद्राओं के योगी त्रिनेत्रधारी हैं।हिन्दुओं के शिव भी त्रिनेत्रधारी हैं। 
5.सिन्धुवासियों के परमपुरुष के पास विभिन्न पशु बैठे हैं किंतु साण्ड नहीं है।हिन्दुओं के शिव बैल की सवारी करते हैं।
6.सिन्धुवासियों के परमपुरुष के सिर पर दो सींग हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट है।हिन्दुओं के शिव के सिर पर चंद्रमा है तथा उनके पास त्रिशूल रहता है।
7.सिन्धुवासी लिंग एवं योनि की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में भी लिंग पूजा का महत्त्व है तथा लिंग के आधार में योनि बनाई जाती है।
8.सिन्धुवासी बहुदेववादी होते हुए भी एक ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते थे।हिन्दू भी बहुदेववादी होते हुए एक ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं।
9.सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। पीपल का विशेष महत्त्व था।हिन्दू-धर्म में भी तुलसी, पीपल, बड़, आंवला, शीशम आदि वृक्षों का धार्मिक महत्त्व है।
10.सिन्धुवासियों में पवित्र-स्नान और जल-पूजा का धार्मिक महत्त्व था।आधुनिक हिन्दू-धर्म में भी विशेष अवसरों पर नदी स्नान अथवाघरों में स्नान का विशेष महत्त्व है।
11.सिन्धुवासी सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक आदि धार्मिक चिह्नों की पूजा करते थे। हिन्दू-धर्म में स्वास्तिक, शंख, कौड़ी एवं मछली आदि चिह्न पवित्र और शुभ माने जाते हैं।
12.सिन्धुवासी अनेक पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में पशु-पक्षियों को देवताओं का वाहन मानकर धार्मिक महत्त्व दिया जाता है। हाथी इन्द्र का, बाघ दुर्गा का, मेंढा ब्रह्मा का, मकर गंगा का, भैंसा यम का, बैल शंकर का, उल्लू लक्ष्मी का वाहन है।
13.सिन्धुवासी मातृ-देवी की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में पृथ्वी को पूजनीय माना जाता है।
14.सिन्धुवासी देवप्रतिमाओं की पूजा करते थे और देवप्रतिमाओं के समक्ष धूप-दीप जलाते थे।यह प्रथा हिन्दू-धर्म में भी प्रचलित है।
15.सिन्धु प्रदेश में देवताओं की सेवा के लिए उपासिकाएं एवं देवदासियाँ होती थीं।हिन्दू-धर्म में भी यह परम्परा दीर्घकाल तक प्रचलित रही।
16.सिन्धुवासी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि देते थे।हिन्दू-धर्म के शाक्त-सम्प्रदाय में  देवी को सन्तुष्ट करने के लिए पशु-बलि दी जाती थी।
17.सिन्धुवासियों के धार्मिक जीवन में योग साधना का विशेष महत्त्व था।हिन्दू-धर्म में भी योग साधना प्रमुख रूप से प्रचिलित है।
18.सिन्धुवासी यज्ञ-हवन जैसे अनुष्ठान करते थे।हिन्दू-धर्म में भी यज्ञ-हवन प्रचलित हैं।
19.सिन्धुवासी देवी-देवताओं की प्रतिमा के लिए मंदिर नहीं बनाते थे।हिन्दू-धर्म में मंदिर बनाने का प्रचलन है।
20.सिन्धुवासी देव-पूजन में नृत्य एवं संगीत को महत्त्व देते थे।हिन्दू-धर्म में भी ईश्वर की भक्ति करते समय कीर्तन एवं नृत्य आदि का महत्त्व है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता का समाज

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सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता का समाज प्राीचनतम भारत की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक तृतीय कांस्य कालीन सभ्यता का समाज था जिसका अर्थ है कि इस काल के मानव ने अपने से पूर्व की समस्त सभ्यताओं से काफी अधिक उन्नति कर ली थी।

सैन्धव सभ्यता की खुदाई में मिली वस्तुओं से अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु सभ्यता का समाज अत्यंत उन्नत अवस्था में था। सैन्धव सभ्यता के आवासों की बनावट एवं नगर योजना के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में लोगों का सामाजिक स्तर एक जैसा नहीं था। समाज कई वर्गों में विभाजित था। पुजारी, पदाधिकारी, ज्यातिषि, वैद्य, आदि लोगों को उच्च वर्ग का समझा जाता होगा। कृषक, बढ़ई, कुम्हार, मछुआरे, मल्लाह, गाड़ीवान, चरवाहे आदि कर्मकार निम्न वर्ग के रहे होंगे। नगर में ऊँचे स्थान पर बने दुर्ग इस बात का प्रमाण हैं कि सैन्धव समाज में कोई न कोई राजनैतिक व्यवस्था विद्यमान थी।

भवन निर्माण

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सैन्धव स्थलों की खुदाई से प्राप्त भवन अवशेषों से सिंधु सभ्यता की भवन निर्माण कला की जानकारी मिलती है। सड़कों के दोनों किनारों पर मकान होते थे जो पक्की ईटों के बने होते थे। हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग होना एक अदभुत बात है, क्योंकि मिस्र के समकालीन भवनों में मुख्यतः धूप में सुखाई गई ईटों का उपयोग होता था। समकालीन मैसोपोटामिया में भी सीमित मात्रा में पकाई हुई ईटों का उपयोग होता था किन्तु हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर हुआ है। अधिकांश भवन दो मंजिलों के होते थे परन्तु दीवारों की मोटाई से पता लगता है कि दो से भी अधिक मंजिलों के मकान बनते थे। सिंधु सभ्यता के आवासीय भवनों के द्वार एवं खिड़कियाँ मुख्य मार्ग पर नहीं खुलते थे, अपितु गलियों और सहायक सड़कों की ओर खुलते थे। खुदाई में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग के निवासियों के आवासीय भवनों के भग्नावशेष मिले हैं। साधारण वर्ग के लोगों के भवन छोटे होते थे जिनकी सामान्यतः लम्बाई 30 फुट और चौड़ाई 27 फुट होती थी। इस भवन में चार से पांच कक्ष होते थे। उच्च वर्ग के लोगों के घर बड़े होते थे जिनका आकार छोटे घरों की तुलना में दुगुना या उससे अधिक होता था और उनमें कक्षों की संख्या भी अधिक होती थी।

कुछ विशाल भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं। एक भवन 242 फुट लम्बा और 115 फुट चौड़ा था। दीवारों में छेद बनाकर उनमें शहतीरें लगाई जाती थीं और फिर बल्लियाँ डालकर मजबूत चटाई बिछा देते थे। उस पर मिट्टी एवं गोबर से फर्श को पक्का बनाया जाता था। बड़े भवनों के दरवाजे बड़े तथा चौडे़ होते थे।

कुछ मकानों के दरवाजे तो इतने चौड़े थे कि उनमें रथ तथा बैलगाड़ियाँ भी आ-जा सकती थीं। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियाँ भी लगी होती थीं। हड्डियों तथा शंख की बनी कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कमरों में खूंटियाँ भी लगी होती थीं। भवन में खिड़कियों तथा दरवाजों का पूरा प्रबन्ध रहता था जिससे हवा तथा प्रकाश की कमी न हो।

दीवारों के निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। ईंटों का नाप आधुनिक ईंटों से काफी मिलता-जुलता है। ईंटों को आग में पकाया जाता था। दीवारों में ईंटों को जोड़ने के लिए मिट्टी का गारा काम लाया जाता था। धनिक या उच्च वर्ग के लोग मिट्टी के गारे में चूना भी मिलाते थे। मकानों का निर्माण नींव डालकर किया जाता था। दो मंजिले मकानों की नींव अधिक गहरी होती थी और ऐसे मकानों की पहली मंजिल की दीवारें भी अधिक चौड़ी बनाई जाती थीं।

डॉ. मैके के अनुसार दीवारों पर प्लास्टर भी किया जाता था। निचली मंजिल से ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए लकड़ी और पत्थर से सीढियां बनाई जाती थीं, जो प्रायः बहुत उँची व तंग होती थीं। अधिकांश मकानों के दरवाजे तीन या चार फुट चौड़े होते थे। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियां भी बनाई जाती थीं। घरों के मध्य में प्रायः आँगन रखा जाता था। आँगन के एक कोने में रसोईघर होता था।

घर के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट स्नानागार तथा शौचालय बनाए जाते थे। ऐसा संभवतः जल निकासी की सुविधा के लिए किया जाता होगा। स्नानागार तथा शौचालय के फर्श पक्की ईंटों के होते थे। आँगन में पक्की ईंटों से चुना हुआ एक कुआँ होता था। कुछ कुंओं के भीतर सीढ़ियों के चिह्न भी मिले हैं।

सैन्धव स्थलों से कुछ विशेष भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा एवं मोहेनजोदड़ो दोनों ही स्थानों से एक-एक दुर्ग अथवा गढ़ी के अवशेष मिले हैं जो नगर से अलग टीले पर बनाया गया था। हड़प्पा दुर्ग की लम्बाई 460 गज, चौड़ाई 215 गज और ऊंचाई लगभग 45-50 फुट है। गढ़ी की बाहरी दीवार में कई बुर्ज और द्वार बने हुए हैं। गढ़ी के समीप अनेक भवन स्थित थे जिनमें भण्डागार विशेष उल्लेखनीय है। छ-छः कमरों की दो पंक्तियों में बने बड़े-बड़े भवन भी मिले हैं।

दोनों पंक्तियों के मघ्य काफी चौड़ा मार्ग है। ये भवन अन्न संग्रहण के काम में आते होंगे। इन भण्डागारों का मुख्य द्वार नदी की ओर था। सम्भवतः नदी मार्ग से ही इन भण्डागारों में अन्न सामग्री आती-जाती थी। इन भण्डागारों से थोडी दूर पर 18 बड़े-बड़े गोलाकार चबूतरे मिले हैं। चबूतरों के बीच में छेद होता था। अनुमान है कि ये चबूतरे अन्न पीसने के काम में आते होंगे। इन चबूतरों के उत्तर में सात-सात मकानों की दो पंक्तियाँ मिली है, जिनके समीप सोलह भट्टियाँ हैं। अनुमान है कि ये श्रमिकों के आवास रहे होंगे।

इस गढ़ी के भीतर सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है एक विशाल स्नानागार। इस स्नानागार के मध्य में प्रधान स्नान-कुण्ड, पूर्व-पश्चिम तथा दक्षिण में बरामदे और उनके पीछे लघु कक्ष स्थित हैं। प्रधान स्नान कुण्ड के उत्तर की ओर मार्ग के लिए जगह छोड़़कर आठ लघु स्नानगृह बने हुए हैं, जिनमें पानी आने की व्यवस्था है तथा ऊपर की ओर जाने की सीढ़ियाँ हैं। स्नानागार का फर्श पक्की ईटों का बनाया गया है और सीलन से बचाने के लिए राल का लेप किया गया है।

स्नान कुण्ड की सफाई करने तथा गन्दा पानी बाहर निकालने के लिए इसके दक्षिणी भाग में एक नाली बनी हुई है। यह स्नानागार धार्मिक अवसरों पर पुजारियों अथवा शासकीय व्यक्तियों के विशेष स्नान के उपयोग में आता होगा। स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म की भाँति सैन्धवासियों के धर्म में भी पवित्र स्नान का विशेष महत्त्व रहा होगा।

इस प्रकार भवन निर्माण के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग जैसा विभाजन मौजूद था।

सैन्धव परिवार

सभ्यता का समाज पारिवारिक व्यवस्था में विश्वास करता था। सैन्धव सभ्यता से प्राप्त भवनों और उनमें स्थित पृथक-पृथक कक्षों की योजना से लगता है कि सिन्धु सभ्यता में परिवार ही समाज की मूल ईकाई थी। कक्षों की संख्या, आंगन में कुओं की उपस्थिति, प्रवेश द्वार के निकट शौचालय एवं स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जा सकता है कि सैन्धव समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित रही होगी और माता-पिता, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री आदि एक साथ रहते होंगे।

खुदाई में प्राप्त नारी मूर्तियों की बहुलता और मातृदेवी की लोकप्रियता के आधार पर विद्वानों का मानना है कि सैन्धव समाज मातृ-प्रधान था, अर्थात् परिवार में माता का स्थान सर्वोपरि होता था। द्रविड़ समाज भी मातृ-प्रधान था।

सैन्धव समाज में नारी का स्थान

विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव समाज में नारी का स्थान सम्मानजनक था। वह परिवार की मुखिया एवं पोषिका समझी जाती थी। उसका मुख्य काम बच्चों का लालन-पालन एवं घर पर रहकर सूत कातना था। मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी-चित्रों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि सैन्धव स्त्रियों में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था और वे धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों में पुरुषों के साथ समान रूप से सम्मिलित होती थीं।

रहन-सहन

सैन्धव स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में अस्त्र-शस्त्रों की अल्पता इस बात की सूचक है कि सैन्धव लोग शान्ति-प्रिय थे और समृद्ध जीवन बिताने की कामना करते थे। खुदाई से प्राप्त घड़े, कलश, थालियाँ, कटोरे, तश्तरियाँ, गिलास, चम्मच आदि बर्तन उनकी सम्पन्नता के द्योतक हैं। विभिन्न मुद्राओं पर अंकित पलंग, कुर्सियाँ, तिपाइयाँ आदि भी उनकी सम्पन्नता का उद्घोष करते हैं।

वेश-भूषा

खुदाई में प्राप्त अधिकांश नारी-मूर्तियाँ नग्न हैं परन्तु सैन्धव लोग वस्त्रों का प्रयोग करते थे। सिन्धु-घाटी के लोग ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। उनके वस्त्र साधारण हुआ करते थे। खुदाई में एक पुरुष की मूर्ति मिली है जिसमें वह एक शॉल ओढ़े हुए है। शॉल बाएँ कन्धे के ऊपर से दाहिनी कांख के नीचे जाता है। विद्वानों का अनुमान है कि इनके दो मुख्य वस्त्र रहे होंगे। एक शरीर के नीचे के भाग को ढँकने के लिए और दूसरा ऊपर के भाग के लिए।

हड़प्पा की खुदाई में मिली सामग्री से अनुमान होता है कि स्त्रियाँ सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनती थीं जो सिर के पीछे की ओर पंखे की तरह उठा रहता था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों तथा पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं होता था। कुछ स्त्रियां पगड़ी भी पहनती थीं। कुछ स्त्री मूर्तियों को नुकील टोपी पहने हुए दिखाया गया है।

केश-विन्यास

खुदाई में प्राप्त शीशा और कंघी तथा कुछ मुद्राओं पर मिले अंकन से ज्ञात होता है कि सैन्धव स्त्री-पुरुष केश-सज्जा किया करते थे। मूर्तियों से पता चलता है कि पुरुष दाढ़ी और मूँछ दोनों रखते थे एवं वे अपने केशों को संवारकर पीछे की ओर बाँध लेते थे। खुदाई में हजामत बनाने का उस्तरा भी मिला है।

कुछ मुद्राओं और मूर्तियों से पता चलता है कि कुछ लोग दाढ़ी रखते थे परन्तु मूँछे मुंडवा लेते थे। सैन्धव स्त्रियाँ, आज की हिन्दू स्त्रियों की भाँति बीच से माँग निकालकर चोटी करती थीं। कुछ स्त्रियाँ अपनी चोटी को सिर के पीछे लपेट लेती थीं। कुछ स्त्रियाँ बालों को जूड़ा बनाकर पीछे फीते से बाँध लेती थीं।

शृंगार एवं आभूषण

सैंधव स्त्रियाँ आज की हिन्दू स्त्रियों की भांति काजल, सुरमा, सिन्दूर, बालों की पिन, इत्र तथा पाउडर का प्रयोग करती थीं। मैके के अनुसार, वे लिपिस्टिक का प्रयोग भी करती थीं। खुदाई में कण्ठहार, कर्णफूल, हंसली, बाजूबन्द, कडे़ छल्ले, अंगूठियाँ, पायजेब तथा नाक में पहनने के आभूषण मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही आभूषणों का चाव था। ये आभूषण विभिन्न धातुओं के बने होते थे और उन पर पच्चीकारी का काम किया जाता था। धनी लोग सोने-चाँदी मणि-माणिक्य के आभूषण पहनते थे तथा निर्धन स्त्री-पुरुष तांबा, हड्डी एवं मिट्टी से बने आभूषण पहनते थे।

सिंधु सभ्यता का समाज और खान-पान

सैन्धव स्थलों की खुदाई में गेहूँ, जौ, चावल, खजूर आदि के बीज, अधजली हड्डियाँ तथा फलों के छिलके मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि  सैन्धवासियों के खान-पान का स्तर उच्च था। मुद्राओं पर अंकित चित्रों से उनके माँसाहारी होने के प्रमाण भी मिलते हैं। वे मछली, गाय, सूअर, भेड़ तथा मुर्गे का मांस खाते थे। गाय, भैंस तथा बकरी के दूध का उपयोग किया जाता था। यह कहना कठिन है कि वे लोग दूध से घी निकालना जानते थे अथवा नहीं।

मदिरा-पान

जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्त्व संग्रहालय में एक जार प्रदर्शित किया गया है जिसे ‘वाइन टारपीडो’ कहते हैं। यह मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर विशेष प्रकार की पॉलिश है। यह बेलनाकार आकृति में है, इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त होता है। उदयुपर संग्रहालय का जार गुजरात के एक सैन्धव सभ्यता स्थल से मिला है।

इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इन जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें सैन्धव सभ्यता के बंदारगाहों तक पहुँचाते हों।

सिंधु सभ्यता का समाज और आमोद-प्रमोद

सैन्धववासियों में कई प्रकार के आमोद-प्रमोद प्रचलित थे। मछली पकड़ना और शिकार करना मनोरंजन के प्रिय साधन थे। एक मुद्रा पर कुछ लोगों को तीर-कमान से एक बारहसिंगे का शिकार करते हुए दिखाया गया है। एक अन्य मुद्रा पर एक पुरुष को दो शेरों से लड़ते हुए दिखाया गया है। बर्तनों एवं मुद्राओं पर बने चित्रों से ज्ञात होता है कि वे लोग मुर्गे, तीतर और बटेर लड़ाते थे। खेलकूद और व्यायाम में भी उनकी रुचि थी। एक मुद्रा पर एक व्यक्ति को व्यायाम करते हुए दिखाया गया है।

 वे लोग घरों में भी कई प्रकार के खेल खेला करते थे। अनेक स्थलों से पत्थर, मिट्टी और हाथी दाँत से बने हुए सुन्दर चौकोर पासे मिले हैं। इन पर आधुनिक पासों की तरह अलग-अलग संख्या के बिन्दू बने हैं। इनसे प्रतीत होता है कि सैन्धववासी शतरंज अथवा चौपड़ जैसे घरेलू खेल अथवा जुआ खेला करते थे। नृत्य और संगीत सिन्धुवासियों के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन था। धातु की बनी हुई नर्तकी की एक सुन्दर मूर्ति मिली है।

कुछ मुद्राओं पर तबले, ढोल तुरही, वीणा आदि वाद्ययंत्र उत्कीर्ण हैं। नृत्य के समय इन वाद्यों का प्रयोग किया जाता होगा। सैन्धव स्थलों की ख्ुादाई में बच्चों के खिलौने बड़ी संख्या में मिले है। इनमें झुनझुने, सीटियाँ, बैलगाड़ियाँ, नर-नारियों की आकृतियों एवं पशु-पक्षियों की आकृतियों वाले खिलौने प्रमुख हैं। कुछ पशु आकृति वाले खिलौनों की गर्दन एवं सिर हिलते हैं। कुछ खिलौनों में हाथ-पैरों को अलग से धागे की सहायता से जोड़ा गया है जिसे खींचने पर खिलौने के हाथ-पैर हिलते हैं।

यातायात के साधन

सिन्धु-घाटी के लोग कच्ची सड़कें बनाते थे। बैलगाड़ी मुख्य सवारी होती थी। हड़प्पा में ताम्बे का एक वाहन मिला है जो इक्के के आकार का है। नौकाएं भी यातायात एवं परिवहन का साधन थीं।

सिंधु सभ्यता का समाज और मृतक-संस्कार

सैन्धव स्थलों से मिले शवाधानों, अस्थि कलशों एवं राख के घड़ों आदि के आधार विश्वास किया जाता है कि सैन्धववासी तीन प्रकार से शवों का अन्तिम संस्कार करते थे-

(1.) पूर्ण समाधिकरण- अर्थात् पूरे शव को गाड़ दिया जाता था।

(2.) आंशिक समाधिकरण- अर्थात् शव को पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे भाग को गाड़ा जाता था।

(3.) अग्नि संस्कार- अर्थात् शव को जलाया जाता था और कभी-कभी उसकी भस्म गाड़ दी जाती थी। हांडियों और कलशों में इस प्रकार की भस्म तथा जली हुई अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं।

हड़प्पा तथा कालीबंगा से कुछ शवाधान (कब्र) मिले हैं, जिनमें रखे शव का सिर उत्तर दिशा की ओर है। ऐसा किसी धार्मिक विश्वास के आधार पर ही किया गया होगा। शवाधानों में रखे शवों के साथ विविध आभूषण, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ भी मिली हैं, जिनसे अनुमान किया जाता है कि सैन्धववासी सम्भवतः परलोक के जीवन की कल्पना करते थे। मोहनजोदड़ो की खुदाई में कोई शवाधान प्राप्त नहीं हुआ है। अतः इस नगर के लोग शवों को या तो अग्नि में जलाते होंगे अथवा नदी में बहाते होंगे।

इस प्रकार हम देखते है कि सिंधु सभ्यता का समाज अत्यत उन्नत समाज था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

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सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था बड़ी उन्नत अवस्था में थी। यह केवल कृषि एवं पशुपालन पर आधारित नहीं थी अपितु व्यापार, शिल्प एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों से सम्पन्न थी।

शिक्षा

सिंधु सभ्यता का समाज शिक्षित समाज था। सैन्धववासी लिखना-पढ़ना जानते थे अतः अनुमान है कि उन्होंने शिक्षा देने का एक निश्चित तरीका विकसित कर लिया होगा। खुदाई में लकड़ी की कुछ तख्तियाँ मिली हैं। इन तख्तियों पर लकड़ी की कलमों से लिखा जाता था।

खुदाई में बड़ी संख्या में प्राप्त खिलौने के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि बच्चों को प्रत्यक्ष ज्ञान उपलब्ध कराने में खिलौनों का प्रयोग किया जाता होगा। माप-तौल के निश्चित साधनों की उपस्थिति से अनुमान होता है कि बच्चों को अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी।

खुदाई में प्राप्त बाटों की दशमलव ईकाइयों के आधार पर यह अनुमान भी है कि सैन्धववासी दशमलव पद्धति से परिचित थे। भवन और नगर निगम की निश्चित योजना से स्पष्ट है कि विद्यार्थयों को ज्यामिति के उच्च सिद्धान्तों की शिक्षा दी जाती थी। विद्वानों का माना है कि सैन्धववासियों को ज्योतिष के सिद्धान्तों की भी जानकारी रही होगी।

घरों से गंदे पानी की निकासी की सुदृढ़ व्यवस्था से पता चलता है कि सैन्धववासी सार्वजिनक सफाई के प्रति सतर्क थे। वे रोगों से बचने का उपाय जानते थे और उन्हें चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान भी था। अतः बच्चों को अंकगणित, ज्यामिति, संगीत, नृत्य, चित्रकला, स्वच्छता एवं चिकित्सा आदि विषय पढ़ाए जाते होंगे।

लिपि

सैन्धव स्थलों से प्राप्त बर्तनों, मुद्राओं एवं ताम्रपत्रों पर अनेक प्रकार के लेख उत्कीर्ण हैं। ये लेख एक या दो पंक्तियों में हैं। इसलिए आधुनिक भाषा-विज्ञानी, इन लेखों को पढ़ने में सफल नहीं हो सके हैं। फिर भी सैन्धव लिपि में प्रयुक्त होने वाले कुछ संकेतों का पता लगा लिया गया है। हण्टर का मत है कि ये लेख चित्रलिपि में हैं। अतः सैन्धव-लिपि को चित्रात्मक लिपि मानना चाहिए। लिपि का प्रत्येक चित्र किसी विशेष शब्द अथवा वस्तु को प्रकट करता है।

विद्वानों ने अब तक 396 चिह्नों की सूची बनाई है। विद्वानों का माना है कि यह लिपि पहली पंक्ति में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी और दूसरी पंक्ति बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती थी। इस प्रकार की लिखावट को ‘बॉस्ट्रोफेडोन’ (Boustrofedon) कहते हैं। पहचाने गए संकेतकों के आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु लिपि, अपनी समकालीन सुमेरिया और मिस्र की लिपियों की तुलना में अधिक उन्नत और परिष्कृत थी।

सैन्धव कलाएँ

सैन्धव स्थलों से प्राप्त दैनिक उपयोग की सामग्री एवं भवनावशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि सैंधव संस्कृति में विभिन्न कलाओं का विकास हो चुका था तथा कलाओं की दृष्टि से यह एक उन्नत संस्कृति थी। सैन्धववासी न केवल सुंदर नगरों की रचना करने में सफल हुए थे अपितु भवन निर्माण पद्धति से भी उन लोगों की कलाप्रियता की जानकारी मिलती है। वे मिट्टी एवं कांसे के बर्तन और मिट्टी, कांसे और पत्थरों से अनेक प्रकार की मूर्तियाँ बनाने में निष्णात थे। हड़प्पा से प्राप्त एक नर्तकी त्रिभ्ंगी मुद्रा में नृत्य करने के लिए तत्पर दिखाई पड़ती है। यहाँ से प्राप्त दो पाषाण-प्रतिमाएं विशेष उल्लेखनीय हैं।

इनमें से एक लाल पत्थर की खण्डित मानव-मूर्ति है जिसका सिर टूटा हुआ है किंतु धड़ सुरक्षित अवस्था में है। दूसरी प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित एक नर्तक की है जिसने नृत्य-मुद्रा में अपना बायां पैर ऊपर उठा रखा है। एक अन्य खण्डित प्रतिमा किसी पुजारी या योगी की है जिसकी आँखें अधखुली हैं। पाषाण मूर्तियों में पशु-पक्षियों की अनेक मूर्तियाँ की मिली हैं। एक बैल मूर्ति उल्लेखनीय है जिसका मुख्य शरीर पत्थर से निर्मित है परन्तु सींग और कान किसी अन्य पदार्थ से बने हैं।

सैन्धव सभ्यता की मूर्तिकला के सम्बन्ध में जाँन मार्शल ने लिखा था- ‘सैन्धव धर्म और कला अद्भुत हैं और उन पर अपनी एक विशिष्ट छाप है। इस काल में हम अन्य देशों में कोई ऐसी वस्तु नहीं जानते जो शैली की दृष्टि से यहाँ बनी मूर्तियों से साम्य रखती हो …….. ये मूर्तियाँ इतनी सुन्दर हैं कि चौथी ईसा पूर्व कोई भी यूनानी कलाकार इनको अपनी कृति बताने में गौरव का अनुभव करेगा।’

सैन्धववासियों की चित्रकला की जानकारी मिट्टी के बर्तनों पर बने चित्रों से होती है। सैन्धववासी, रेखाओं और बिन्दुओं के माध्यम से बर्तनों पर हिरण, खरगोश, कौआ, बत्तख, गिलहरी, मोर, साँप, मछली आदि पशु-पक्षी और पीपल, नीम, खजूर आदि पेड़-पौधों के चित्र बनाते थे। अनेक बर्तनों पर मानव आकृतियाँ भी बनी हुई हैं। एक बर्तन पर मछुआरे का चित्र है जो बाँस पर जाल लटकाए जा रहा है और उसके पैरों के पास मछली और कछुए पड़े हैं। कुछ बर्तनों पर बने चित्र बड़े आकर्षक हैं और वास्तविक जान पड़ते हैं।

आर्थिक जीवन

सिन्धु घाटी में वर्तमान में लगभग 15 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। इसलिए यह प्रदेश अधिक उपजाऊ नहीं है किंतु सिंधु सभ्यता के उत्खनन स्थलों को देखने से अनुमान होता है कि उस काल में यह प्रदेश अधिक उपजाऊ था। ईसा-पूर्व चौथी सदी में सिकंदर का एक समकालीन इतिहासकार जानकारी देता है कि सिन्धु क्षेत्र उपजाऊ प्रदेश था।

इससे भी पहले के काल में सिन्धु प्रदेश में प्राकृतिक वनस्पति अधिक थी और इस कारण यहाँ वर्षा भी अधिक होती थी। इस कारण पूरे प्रदेश में घने जंगल थे जिनसे व्यापक स्तर पर जलाऊ लकड़ी प्राप्त की जाती थी। इस लकड़ी का उपयोग ईंटें पकाने, कृषि उपकरण बनाने, युद्ध के औजार बनाने तथा भवन बनाने में होता था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो जैसे विशाल तथा वैभवपूर्ण नगर जिस संस्कृति में विद्यमान थे वह निश्चय ही बड़ा सम्पन्न रहा होगा। चूँकि यह सभ्यता कृषि-प्रधान नहीं थी इसलिए यहाँ के निवासियों का आर्थिक जीवन प्रमुखतः व्यापार तथा उद्योग-धन्धों पर आधारित था। व्यापार तथा उद्योग उन्नत दशा में था। सिन्धु-वासियों का आर्थक जीवन औद्योगिक विशिष्टीकरण तथा स्थानीयकरण पर आधारित था। उनमें श्रम-विभाजन तथा संगठन की कल्पना की भी जा सकती है। एक प्रकार का व्यवसाय करने वाले लोग एक ही क्षेत्र में निवास करते थे। यदि इस सभ्यता को औद्योगिक सभ्यता कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

हड़प्पा सभ्यता में निम्नलिखित व्यवसाय तथा उद्योग प्रचलित थे-

(1.) कृषि

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सिन्धु सभ्यता के लोग सिंधु नदी में बाढ़ के उतर जाने पर नवंबर के महीने में बाढ़ के मैदानों में गेहूं और जौ बो देते थे और आगामी बाढ़ आने से पहले, अप्रेल के महिने में गेहूं और जौ की फसल काट लेते थे। इस क्षेत्र से कोई फावड़ा या फाल नहीं मिला है, परन्तु कालीबंगा में हड़प्पा-पूर्व अवस्था के जिन कूँडों की खोज हुई है, उनसे पता चलता है कि हड़प्पा-काल में राजस्थान के खेतों में हल जोते जाते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग सम्भवतः लकड़ी के हल का उपयोग करते थे। इस हल को आदमी खींचते थे या बैल, इस बात का पता नहीं चलता। फसल काटने के लिए पत्थर के हँसियों का उपयोग होता होगा। गबरबंदों अथवा नालों को बांधों से घेरकर जलाशय बनाने की बिलोचिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में प्रथा रही है, परन्तु अनुमान होता है कि सिन्धु सभ्यता में नहरों से सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी। हड़प्पा संस्कृति के गांव, जो प्रायः बाढ़ के मैदानों के समीप बसे होते थे, न केवल अपनी आवश्यकता के लिए अपितु नगरों में रहने वाले कारीगरों, व्यापारियों और दूसरे नागरिकों के लिए भी पर्याप्त अनाज पैदा करते थे। सिन्धु सभ्यता के किसान गेहूँ, जौ, राई, मटर, आदि पैदा करते थे। वे दो किस्मों का गेहूँ और जौ उगाते थे। बनवाली से बढ़िया किस्म का जौ मिला है। वे तिल और सरसों भी पैदा करते थे।

हड़प्पा-कालीन लोथल के लोग ई.पू.1800 में भी चावल का उपयोग करते थे। लोथल से चावल के अवशेष मिले हैं। मोहेनजोदड़ो, हड़प्पा और सम्भवतः कालीबंगा में भी विशाल धान्य कोठारों में अनाज जमा किया जाता था।

किसानों से सम्भवतः करों के रूप में यह अनाज प्राप्त किया जाता था और पारिश्रमिक के रूप में धान्य-कोठारों से श्रमिकों को वितरित होता था। यह बात हम मेसोपोटामिया के नगरों के सादृश्य के आधार पर कह सकते हैं जहाँ पारिश्रमिक का भुगतान जौ के रूप में होता था। सिन्धु सभ्यता के लोग कपास पैदा करने वाले सबसे पुराने लोगों में से थे। इसीलिए यूनानियों ने कपास को सिंडोन नाम दिया जिसकी व्युत्पत्ति सिन्ध शब्द से हुई है।

(2.) शिकार

सिन्धु-घाटी के लोग शाकाहारी तथा मांसाहारी थे। वे मांस, मछली तथा अंडे आदि का प्रयोग करते थे। मांस प्राप्त करने के लिए वे पशुओं का शिकार करते थे। पशुओं के बाल, खाल तथा हड्डी से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

(3.) पशुपालन

सिन्धु सभ्यता के लोग खेती करने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पशु पालते थे। खुदाई से प्राप्त मुहरों पर पशुओं के चित्र मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, कुत्ता और सूअर उनके पालतू पशु थे। सिन्धुवासियों को बड़े कूबड़ वाला सांड विशेष रूप से पसंद था। आरम्भ से ही कुत्ते दुलारे पशु थे। बिल्ल्यिों को भी पालतू बना लिया गया था। कुत्ता और बिल्ली, दोनों के पैरों के निशान मिले हैं। बैलों और गधों का उपयोग भारवहन के लिए होता था। आश्चर्य की बात है कि खुदाई में ऊँट की हड्डियाँ नहीं मिली हैं। घोड़े के अस्तित्त्व के बारे में भी केवल तीन प्रमाण मिले हैं।

मोहेनजोदड़ो की एक ऊपरी सतह से और लोथल से एक-एक संदिग्ध लघु मूण्मूर्ति मिली है जिसे घोड़े की मूर्ति कहा जा सकता है। घोड़े के अवशेष, जो ई.पू.2000 के आसपास के हैं, गुजरात के सुरकोटड़ा नामक स्थान से मिले हैं। अनुमान होता है कि हड़प्पा-काल में ऊँट तथा घोड़े का उपयोग आम तौर पर नहीं होता था। हड़प्पा संस्कृति के लोग हाथी तथा गेंडे से भली-भांति परिचित थे।

मेसोपोटामिया के समकालीन सुमेर सभ्यता के नगरों के लोग भी प्रायः सिन्धु प्रदेश जैसे ही अनाज पैदा करते थे और उनके पालतू पशु भी प्रायः वही थे जो हड़प्पा संस्कृति वालों के थे परन्तु गुजरात में बसे हुए हड़प्पा संस्कृति के लोग चावल पैदा करते थे और पालतू हाथी भी रखते थे। मेसोपोटामिया के नगरवासियों के लिए ये दोनों बातें सम्भव नहीं थी।

(4.) शिल्प तथा व्यवसाय

हड़प्पा संस्कृति कांस्य-युग की है। हड़प्पा सभ्यता का मानव कुशल शिल्पी तथा व्यवसायी था। वह पत्थर के अनेक प्रकार के औजारों का उपयोग करता था तथा कांस्य-निर्माण से भी भली-भांति परिचित थे। धातुकर्मी तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार करते थे। चूँकि हड़प्पावासियों के लिए ये दोनों धातुएं सुलभ नहीं थीं। इसलिए हड़प्पा में कांस्य-वस्तुओं का निर्माण बड़े पैमाने पर नहीं हुआ।

तांबा राजस्थान में खेतड़ी की खानों तथा बिलोचिस्तान से मंगाया जाता होगा। टिन बड़ी कठिनाई से सम्भवतः अफगानिस्तान से प्राप्त किया जाता था। टिन की कुछ पुरानी खदानें बिहार के हजारी बाग में मिली हैं। हड़प्पा संस्कृति के स्थलों से मिले कांसे के औजारों और हथियारों में टिन का अनुपात कम है। फिर भी इस सभ्यता से बहुत सारी कांस्य वस्तुएँ मिली हैं, जिनसे स्पष्ट है कि हड़प्पा समाज के कारीगरों में कसेरों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने मूर्तियाँ और बर्तन ही नहीं, विविध प्रकार की कुल्हाड़ियां, आरियां, छुरे और भाले आदि हथियार भी बनाए।

सैन्धव सभ्यता में कई शिल्पों का विकास हुआ। मोहेनजोदड़ो से बुने हुए सूती कपड़़े का एक टुकड़़ा मिला है और कई वस्तुओं पर कपड़़े के छापे देखने को मिले हैं। कताई के लिए तकलियों का उपयोग होता था। बुनकर सूती और ऊनी कपड़़ा बुनते थे। ईटों की विशाल ईमारतों से ज्ञात होता है कि राजगीरी एक महत्त्वपूर्ण कौशल था। इनसे राजगीरों के एक वर्ग के अस्तित्त्व की भी सूचना मिलती है। हड़प्पा संस्कृति के लोग नौकाएं बनाना जानते थे। मुहरें और मृण्मूर्तियाँ बनाना महत्त्वपूर्ण शिल्प-व्यवसाय थे।

सुनार, चांदी, सोना और कीमती पत्थरों के आभूषण बनाते थे। चांदी और सोना अफगानिस्तान से आता होगा और कीमती पत्थर दक्षिणी भारत से। हड़प्पा संस्कृति के कारीगर मणियों के निर्माण में भी निपुण थे। कुम्हार के चाक का खूब उपयोग होता था। उनके मिट्टी के बर्तनों की अपनी विशेषता थी। बर्तनों को चिकना और चमकीला बनाया जाता था। उन पर चित्रकारी की जाती थी। हाथी-दाँत की भी विभिन्न वस्तुएँ बनाई जाती थीं।

(5) व्यापार

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो की खुदाइयों में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जो सिन्धु घाटी में नहीं होती थीं। अतः यह अनुमान लगाया गया है कि ये वस्तुएँ बाहर से मंगाई जाती थीं और इन लोगों का विदेशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। सोना, चांदी, ताम्बा आदि सिन्धु-प्रदेश में नहीं मिलता था। इन धातुओं को ये लोग अफगानिस्तान तथा ईरान से प्राप्त करते थे। यहाँ के निवासी सम्भवतः ताम्बा राजपूताना से, सीपी, शंख आदि काठियावाड़ से और देवदारु की लकड़ी हिमालय पर्वत से प्राप्त करते थे।

हड़प्पा संस्कृति का मानव धातु की मुद्राओं का उपयोग नहीं करता था। सम्भव है कि व्यापार वस्तु-विनिमय से चलता हो। निर्मित वस्तुओं और सम्भवतः अनाज के बदले में वह पड़ोसी प्रदेशों से धातुएं प्राप्त करता था और उन्हें नौकाओं तथा बैलगाड़ियों से ढोकर लाता था। अरब सागर में तट के पास उनकी नौकाएं चलती थीं। वह पहिए का उपयोग जानता था। बैलगाड़ियों के पहिए ठोस होते थे। हड़प्पा संस्कृति के लोग आधुनिक इक्के जैसे वाहन का उपयोग करते थे।

इन लोगों के राजस्थान, अफगानिस्तान और ईरान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। हड़प्पा संस्कृति के लोगों के, दजला तथा फरात प्रदेश के नगरों के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। सिन्धु सभ्यता की कुछ मुहरें मेसोपोटामिया के नगरों से मिली हैं। अनुमान होता है कि मेसोपोटामिया के नगर-निवासियों द्वारा प्रयुक्त कुछ शृंगार साधनों को हड़प्पा वासियों ने अपनाया था। लगभग ई.पू.2350 से आगे के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मैलुह्ह के साथ व्यापारिक सम्बन्ध होने के उल्लेख मिलते हैं। यह सम्भवतः सिन्धु प्रदेश का प्राचीन नाम था।

(6) नाप तथा तौल

खुदाई में बड़ी संख्या में बाट मिले हैं। कुछ बाट इतने बड़े हैं कि वे रस्सी से उठाये जाते होंगे और कुछ इतने छोटे हैं कि उनका प्रयोग जौहरी करते होंगे। अधिकांश बाट घनाकार हैं। लम्बाई नापने के लिए फुट होता था। मोहेनजोदड़ो की खुदाई में सीपी का बना हुआ एक फुट के बराबर माप का टुकड़ा मिला है। कांसे की बनी एक शलाका पर छोटे-छोटे निशान अंकित हैं, यह फुट प्रतीत होता है। तौलने के लिए तराजू का प्रयोग होता था।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखते हैं कि सैन्धव सभ्यता और संस्कृति पर धर्म, कला एवं शिक्षा का विपुल प्रभाव था। जीवन का कोई अंग शायद ही इन पक्षों से अछूता था। सैन्धव सामाज में पुरोहित, शासक, व्यापारी, श्रमिक और कृषक रहते थे जो अलग-अलग कार्य करके सामाजिक विन्यास की रचना करते थे।

सैन्धव सभ्यता के लोग सुसभ्य और सांस्कृतिक थे। उनके रहन-सहन का ढंग आधुनिक हिन्दू समाज की तरह काफी उन्नत था तथा समकालीन संस्कृतियों से काफी आगे था। भारतीय आर्यों ने सैंधव संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। यही कारण है कि आज के हिन्दू-धर्म पर सैन्धव संस्कृति का व्यापक प्रभाव है। सैंधव वासियों का आर्थिक जीवन भी पर्याप्त विकसित था। ईसा से लगभग 1500 वर्ष पहले इस संस्कृति का विलोपन हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

लौह युगीन संस्कृति

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लौह युगीन संस्कृति

भारत में लौह युगीन संस्कृति काफी विलम्ब से आई। फिर भी ऋग्वैदिक प्रमाण सिद्ध करते हैं कि ऋग्वेद काल में भारत की सभ्यता लौह युग में प्रवेश कर चुकी थी।

ऋग्वेद में अयस नामक एक ही धातु का उल्लेख हुआ है। अथर्वेद में लाल-अयस तथा श्याम-अयस नामक दो धातुओं का उल्लेख है। वाजसनेयी संहिता में लौह तथा ताम्र शब्द प्राप्त होते हैं।

भारत में ताम्र-कांस्य काल के बाद लौह-काल आरम्भ हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार लौह-काल का आरम्भ उत्तर तथा दक्षिण में एक साथ नहीं हुआ। दक्षिण भारत में लोहे का प्रयोग उत्तर भारत की अपेक्षा काफी बाद में हुआ।

लोहे की खोज

विश्व में सर्वप्रथम ‘हित्ती’ नामक जाति ने लोहे का उपयोग करना आरम्भ किया जो एशिया माइनर में ई.पू.1800 से ई.पू.1200 के लगभग निवास करती थी। ई.पू.1200 के लगभग इस शक्तिशाली साम्राज्य का विघटन हुआ और उसके बाद ही भारत में लोहे का प्रयोग आरंभ हुआ। लोहे की खोज के साथ ही भारत में लौह युगीन संस्कृति आरम्भ हो गई।

भारत में लौह युगीन संस्कृति के जन्मदाता

माना जाता है कि भारत में लौह युगीन संस्कृति की शुरुआत करने वाले लोग पामीर पठार की ओर से आए थे और हिमालय से नीचे उतरकर दक्षिण-पश्चिम की ओर चलते-चलते महाराष्ट्र तक फैल गए। कुछ विद्वान इन्हीं को भारत में आने वाले प्रारम्भिक  आर्य मानते हैं। उनके आने से पहले भारत में जो जातियाँ निवास कर रही थीं वे सैन्धव, द्रविड़, कोल, ब्रेचीफेलस, मुण्डा आदि आदिवासी जातियाँ थी। लौह संस्कृति को जन्म देने वाले आर्य भारत में जहाँ-जहाँ गए, अपने साथ लौह का ज्ञान ले गए जिससे सम्पूर्ण भारत में लौह संस्कृति की बस्तियां बस गईं। कालान्तर में ये आर्य, मध्य प्रदेश के वनों को पार करके बंगाल की ओर भी फैल गए।

मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन

मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसकी सभ्यता एवं संस्कृति की उन्नति में अन्य किसी धातु से उतनी सहायता नहीं मिली जितनी लोहे से मिली है। लोहे के उपकरण कांस्य उपकरणों की अपेक्षा अधिक मजबूत सिद्ध हुए। लौह-काल में मनुष्य ने वैज्ञानिक विकास आरम्भ किया जिससे उसके जीवन में बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन होने लगे। प्रारंभिक लौह युगीन बस्तियों के अवशेष अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

लौह युग का काल निर्धारण

विद्वानों की धारणा है कि उत्तर भारत में इसका प्रारम्भ ईसा से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ होगा। ई.पू.800 में लोहे का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया जाने लगा। लौह उत्पादन की प्रक्रिया का ज्ञान भारत में बाहर से नहीं आया। कतिपय विद्वानों के अनुसार लौह उद्योग का प्रारम्भ, मालवा एवं बनास संस्कृतियों से हुआ। कर्नाटक के धारवार जिले से ई.पू.1000 के लोहे के अवशेष मिले हैं। लगभग इसी समय गांधार (अब पाकिस्तान में) क्षेत्र में लोहे का उपयोग होने लगा। मृतकों के साथ शवाधानों में गाढ़े गए लौह उपकरण भारी मात्रा में प्राप्त हुए हैं। ऐसे औजार बलोचिस्तान में मिले हैं।

लगभग इसी काल में पूर्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी लोहे का प्रयोग हुआ। खुदाई में तीर के नोंक, बरछे के फल आदि लौह-अस्त्र मिले हैं जिनका प्रयोग लगभग ई.पू.800 से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आमतौर पर होने लगा था। लोहे का उपयोग पहले, युद्ध में और बाद में कृषि में हुआ।

लोहे के साहित्यिक प्रमाण

भारत में लोहे की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए हमें साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों ही प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेद में अयस नामक धातु का उल्लेख हुआ है। कहा नहीं जा सकता कि अयस का आशय ताम्बे से है या लोहे से? अथर्ववेद में लौह आयस तथा श्याम-अयस नामक दो धातुओं का उल्लेख है। इनमें से लौह-अयस लोहा तथा श्याम-अयस ताम्बा अनुमानित होता है।

यूनानी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि भारतीयों को सिकंदर के भारत आने से पहले से ही लोहे का ज्ञान था। भारत के कारीगर लोहे के उपकरण बनाने में निष्णात थे। उत्तर-वैदिक-काल के ग्रंथों में हमें इस धातु के स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होते हैं। साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ई.पू. आठवीं शताब्दी में भारतीयों को लोहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।

लोहे के पुरातात्विक प्रमाण

लोहे की प्राचीनता के सम्बन्ध में साहित्यिक उल्लेखों की पुष्टि पुरातात्विक प्रमाणों से होती है। अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थलों के उत्खननों में लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस काल का मानव एक विशेष प्रकार के मृद्भाण्डों का प्रयोग करता था जिन्हें चित्रित धूसर भाण्ड कहा गया है।

इन स्थानों से लोहे के औजार तथा उपकरण यथा तीर, भाला, खुरपी, चाकू, कटार, बसुली आदि मिलते हैं। अतरंजीखेड़ा की खुदाई से धातु शोधन करने वाली भट्टियों के अवशेष मिले हैं। इस संस्कृति का काल ई.पू.1000 माना गया है। पूर्वी भारत में सोनपुर, चिरांद आदि स्थानों पर की गई खुदाई में लोहे की बर्छियां, छैनी तथा कीलें आदि मिली हैं जिनका समय ई.पू.800 से ई.पू.700 माना गया है।

लौह युगीन संस्कृति की प्रारंभिक बस्तियां

(1.) सिन्धु-गंगा विभाजक तथा ऊपरी गंगा घाटी क्षेत्र: चित्रित धूसर भाण्ड संस्कृति इस क्षेत्र की विशेषता है। अहिच्छत्र, आलमगीरपुर, अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, नोह, काम्पिल्य, जखेड़ा आदि से इस संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चित्रित धूसर भाण्ड एक महीन चूर्ण से बने हुए हैं। ये चाक निर्मित हैं। इनमें अधिकांश प्याले और तश्तरियां हैं। मृद्भाण्डों का पृष्ठ भाग चिकना है तथा रंग धूसर से लेकर राख के रंग के बीच का है। इनके बाहरी तथा भीतरी तल काले और गहरे चॉकलेटी रंग से रंगे गए हैं।

खेती के उपकरणों में जखेड़ा में लोहे की बनी कुदाली तथा हंसिया प्राप्त हुई हैं। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अन्य समस्त क्षेत्रों में लोहे की वस्तुएं मिली हैं। अतरंजीखेड़ा से लोहे की 135 वस्तुएं प्राप्त की गई हैं। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा में उगाई जाने वाली फसलों के प्रमाण मिले हैं। हस्तिनापुर में केवल चावल और अजरंजीखेड़ा में गेहूँ और जौ के अवशेष मिले हैं। हस्तिनापुर से प्राप्त पशुओं की हड्डियों में घोड़े की हड्डियां भी हैं।

(2.) मध्य भारत: मध्य भारत में नागदा तथा एरण इस सभ्यता के प्रमुख स्थल हैं। इस युग में इस क्षेत्र में काले भाण्ड प्रचलित थे। पुराने ताम्रपाषाण युगीन तत्त्व इस काल में भी प्रचलित रहे। इस स्तर से 112 प्रकार के सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुछ नए मृद्भाण्डों का भी इस युग में प्रचलन रहा। घर कच्ची ईंटों से बनते थे। ताम्बे का प्रयोग छोटी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित था। नागदा से प्राप्त लोहे की वस्तुओं में दुधारी, छुरी, कुल्हाड़ी का खोल, चम्मच, चौड़े फलक वाली कुल्हाड़ी, अंगूठी, कील, तीर का सिरा, भाले का सिरा, चाकू, दरांती इत्यादि सम्मिलित हैं। एरण में लौहयुक्त स्तर की रेडियो कार्बन तिथियां निर्धारित की गई हैं जो ई.पू.100 से ई.पू.800 के बीच की हैं।

(3.) मध्य निम्न गंगा क्षेत्र: इस क्षेत्र के प्रमुख स्थल पाण्डु राजार ढिबि, महिषदल, चिरण्ड, सोनपुर आदि हैं। यह अवस्था पिछली ताम्र-पाषाण-कालीन अवस्था के क्रम में आती है, जिसमें काले-लाल मृद्भाण्ड देखने को मिलते हैं। लोहे का प्रयोग नई उपलब्धि है। महिषदल में लौहयुक्त स्तर पर सूक्ष्म पाषाण उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। यहाँ से धातु-मल के रूप में लोहे की स्थानीय ढलाई का प्रमाण मिलता है। महिषदल में लोहे की तिथि ई.पू.750 लगभग की है।

(4.) दक्षिण भारत: दक्षिण भारत में प्रारंभिक कृषक समुदायों की बस्तियां ई.पू.3000 में दिखाई देती हैं। यहाँ मानव के आखेट संग्रहण अर्थव्यवस्था से, खाद्योत्पादक अर्थव्यवस्था की ओर क्रमबद्ध विकास के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। यहाँ से प्राप्त साक्ष्य संकेत देते हैं कि उस काल में गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा, पेनेरू तथा कावेरी नदियों के निकट मानव की बसावट हो चुकी थी। ये क्षेत्र शुष्क खेती तथा पशुचारण के लिए उपयुक्त थे।

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इस युग में पत्थरों की कुल्हाड़ियों को घिसकर तथा चमकाकर तैयार किया गया था। इस युग का उद्योग, पत्थरों की कुल्हाड़ियों का उद्योग कहा जा सकता है। इन बस्तियों के लोग ज्वार-बाजरा की खेती करते थे। इन बस्तियों में सभ्यता के तीन चरण मिले हैं- प्रथम चरण (ई.पू.2500 से ई.पू.1800) में पत्थर की कुल्हाड़ियां मिलती हैं। द्वितीय चरण (ई.पू.1800 से ई.पू.1500) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (ई.पू.1500 से ई.पू.1100) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है। दक्षिण भारत में नव-पाषाण-कालीन बस्तियां तथा ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्त्व बनाए रहीं। महाराष्ट्र में भी ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियां, लौह युग के आरंभ होने तक अपना अस्तित्त्व बनाए रहीं। ब्रह्मगिरि, पिक्लीहल, संगनाकल्लू, मास्की, हल्लूर, पोयमपल्ली आदि में भी ऐसी ही स्थिति थी। दक्षिणी भारत में लौह युग का प्राचीनतम चरण पिक्लीहल तथा हल्लूर की खुदाई एवं ब्रह्मगिरि के शवाधानों के आधार पर निश्चित किया गया है। इन शवाधानों के गड्ढों में पहली बार लोहे की वस्तुएं, काले एवं लाल मृद्भाण्ड तथा फीके रंग के भूरे तथा लाल भाण्ड प्राप्त हुए हैं।

ये मृदभाण्ड जोरवे के मृद्भाण्डों जैसे हैं। टेकवाड़ा (महाराष्ट्र) से भी ऐसे ही पाषाण प्राप्त हुए हैं। कुछ बस्तियों में पत्थरों की कुल्हाड़ियों एवं फलकों का प्रयोग, लौहकाल में भी होता रहा।

लौह युग का दक्षिण में प्रारंभ

कुछ विद्वानों की धारणा है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम प्रयोग दक्षिण भारत में हुआ किंतु यह धारणा सही प्रतीत नहीं होती। उत्तर भारत में मिली आर्य-बस्तियों के आधार पर कहा जा सकता है कि लोहे का प्रयोग दक्षिण की बजाय उत्तर भारत में पहले हुआ। विद्वानों की धारणा है कि लौह-काल के लोग पामीर पठार की ओर से आए थे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र तक फैल गए। कालान्तर में मध्यप्रदेश के वनों को पार कर ये लोेग बंगाल की ओर चले गए।

दक्षिण में ताम्रकांस्य काल पर भ्रांति

प्रारंभिक खोजों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि दक्षिण में लौह संस्कृति का प्रारम्भ, पाषाण काल के बाद ही हो गया। दक्षिण में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया। हमारी राय में यह कहना उचित नहीं है कि दक्षिण भारत में पाषाण काल के बाद सीधा ही लौह काल आ गया।

दक्षिण भारत की कृषक बस्तियों के दूसरे चरण (ई.पू.1800 से ई.पू.1500) में ताम्र एवं कांस्य औजारों की प्राप्ति होती है। तृतीय चरण (ई.पू.1500 से ई.पू.1100) में इनका बाहुल्य दिखाई देता है तथा इसके बाद के काल में लौह निर्मित औजारों की प्राप्ति होती है। अतः यह कैसे कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में ताम्र-कांस्य काल नहीं आया?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – लौह एवं महापाषाण संस्कृतियाँ

लौह युगीन संस्कृति

महापाषाण संस्कृति

यह भी देखें-

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

महापाषाण संस्कृति

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महापाषाण संस्कृति

महापाषाण संस्कृति का उदय ई.पू.1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्त्व में रही।

दक्षिण भारत के कई स्थानों से महापाषाणीय शवाधान (मेगालिथस्) प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति के लोग मृतकों को समाधियों में गाड़ते थे तथा उनकी सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े पाषाणों का प्रयोग करते थे। इस कारण इन्हें वृहत्पाषाण अथवा महापाषाण संस्कृति कहा गया है। इन शवाधानों की खुदाइयों में लोहे के औजार, हथियार तथा उपकरण प्रचुरता से मिलते हैं।

महापाषाण संस्कृति का काल निर्धारण

महापाषाण संस्कृति का उदय ई.पू.1000 के आसपास दक्षिण भारत में हुआ। यह संस्कृति दक्षिण भारत में कई शताब्दियों तक अस्तित्त्व में रही। माना जाता है कि दक्षिण भारत में लौह युग आरंभ होने के साथ ही महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण की परम्परा आरंभ हुई। ब्रह्मगिरि से प्राप्त महापाषाणीय शवाधानों का काल-निर्धारण ई.पू. तीसरी सदी से ई.पू. पहली सदी के बीच किया गया है। इस प्रकार इस संस्कृति का काल निर्धारण अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है।

महापाषाण संस्कृति के प्रमुख क्षेत्र

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इस तरह के शवाधान महाराष्ट्र में नागपुर के पास, कर्नाटक में मास्की, आंध्र प्रदेश में नागार्जुन कोंडा तथा तमिलनाडु में अदिचलाल्लूर तथा केरल में पाई गई है। महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के तरीकों ने बस्तियों की योजनाओं को भी प्रभावित किया किंतु खेती और पशुचारण के काम परम्परागत रूप से होते रहे। मद्रास के तिन्नेवेली जिले के आदिचल्लूर नामक स्थान से कुछ पात्र मिले हैं। इन पात्रों में हथियार, औजार, आभूषण और अन्य सामग्री रख दी जाती थी। इस प्रकार के पात्रों का उल्लेख तमिल साहित्य में भी मिलता है। ब्रह्मगिरि, कोयम्बटूर जिले के सुलर, पाण्डिचेरी के अरिकमेडु से भी महापाषाणीय शवाधान मिले हैं। उत्तर भारत: इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में भी देखने को मिलते हैं। उत्तरी गुजरात के दारापुट में एक महापाषाणिक रचना मिली है जो एक प्राचीन चैत्य भी हो सकती है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में कराची जिले के कलक्टर कैप्टेन प्रीडी ने कहा था कि सम्पूर्ण पर्वतीय जिले में बड़ी संख्या में प्रस्तर की कब्रें मौजूद हैं जो हमारी पश्चिमी सीमा तक बढ़ आई हैं। इन कब्रों में द्वार का अभाव है अन्यथा ये शेष बातों में दक्षिण भारत की कब्रों के समान ही हैं।

ई.1871 से 1873 की अवधि में कार्लाइल ने पूर्वी राजथान का दो बार भ्रमण किया। उन्होंने फतहपुर सीकरी के पास अनेक संगोरा शवाधानों की उपस्थिति का उल्लेख किया परन्तु वे महापाषाणिक शवाधान नहीं हैं। वे प्रस्तरों के आयताकार ढेर हैं जिनमें प्रस्तरों के ही छोटे शवाधान कक्ष बने हुए हैं। इन शवाधानों की छतें भी प्रस्तरों की हैं। इन संगोरों में अधिकतर राख एवं निस्तप्त हड्डियां भरी हुई हैं।

कार्लाइल ने देवसा में भी महापाषाण समूहों को देखा था। कश्मीर के बुर्झामा नामक स्थान पर भी महापाषाणिक पांच विशालाकाय पत्थर मिले हैं। इन्हें ई.पू.400 से ई.पू 300 के बीच रखा गया होगा।

महापाषाण शवाधानों का निर्माण

महापाषाणीय शवाधानों के निर्माण के कई तरीके देखने में आते हैं। कभी-कभी मृतकों की हड्डियां बड़े कलशों में जमा करके गड्ढे में गाड़ी जाती थीं। इस गड्ढे को ऊपर से पत्थरों अथवा केवल पत्थर से ढंक दिया जाता था। कभी-कभी दोनों ही तरीके अपनाए जाते थे। कलश तथा गड्ढों में कुछ वस्तुएं रखी जाती थीं। कुछ शवों को पकाई हुई मिट्टी की शव पेटिकाओं में भी रखा जाता था। कुछ मामलों में मृतक के शवाधान पत्थरों से बनाए गए हैं। ग्रेनाइट पत्थरों की पट्टिकाओं से बने ताबूतनुमा शवाधानों में भी शवों को दफनाया गया है। भारत में चार प्रकार के महापाषाण-युगीन शवाधानों के अवशेष मिले हैं-

(1.) संगौरा वृत्त

इस प्रकार के शवाधान अनेक गोलाकार पत्थरों को सम्मिलित कर बनाए गए हैं। इन संगौरा वृत्तों को देखकर लगता है कि उस समय शव को लोहे के औजारों, मृत्तिका पात्र या कलश और पालतू जानवरों की अस्थियों के साथ दफना दिया जाता था। उसके बाद समाधि के चारों ओर गोल पत्थरों को जड़ दिया जाता था। इस प्रकार के संगौरा वृत्त नयाकुण्ड बोरगांव (महाराष्ट्र) तथा चिंगलपेट (तमिलनाडु) में मिलते हैं।

(2.) ताबूत

यह भी अंत्येष्टि की एक विधि है। इसमें पहले शव को दफनाकर चारों ओर से छोटे-छोटे पत्थरों के खम्भों से घेर दिया जाता था। फिर इन खम्भों के ऊपर एक बड़ी पत्थर की सिल्ली रखकर समाधि पर छाया-छत्र जैसी आकृति बना दी जाती थी। इस प्रकार के शवाधान उत्तर प्रदेश के बांदा और मिर्जापुर जिलों में मिलते हैं।

(3.)  मैनहरि

इस प्रकार के शवाधानों में शव को गाड़कर उसके ऊपर एक बड़ा सा स्तम्भाकार स्मारक पत्थर लगा दिया जाता था जो उस स्थान पर समाधि होने का संकेत देता था। इन स्तम्भाकार पत्थरों की लम्बाई 1.5 मीटर से 5.5 मीटर तक पाई जाती है। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के मास्की और गुलबर्गा क्षेत्रों से मिली हैं।

(4.) महापाषाण तुम्ब

इस प्रकार के शवाधानों के निर्माण में सर्वप्रथम पत्थर की पट्टियों से घिरे हुए चबूतरे जैसे स्थान पर शव एक पत्थर की सिल्ली पर रखा जाता था। फिर शव के चारों कोनों पर स्थित खम्भों पर एक और पत्थर की पट्टी रखी जाती थी। उपरोक्त बनावट किसी मेज का आभास देती है। इसी कारण इस प्रकार की समाधियों को तुम्ब कहा जाता है जिसका अर्थ है- पत्थर की मेज। इस प्रकार की समाधियां कर्नाटक के ब्रह्मगिरि एवं तमिलनाडु के चिंगलपेट नामक स्थानों पर प्रायः देखी गई हैं।

(5.) अन्य समाधियां

उपरोक्त चार प्रकार की समाधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के शवाधान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाए गए हैं। डॉ. विमलचंद्र पाण्डेय ने आठ प्रकार के महापाषाणीय शवाधानों का वर्णन किया है- (1) सिस्ट समाधि, (2) पिट सर्किल, (3) कैर्न सर्किल, (4) डोल्पेन, (5) अम्ब्रेला स्टोन, (6) हुड स्टोन, (7) कन्दराएं और (8) मोहिर।

शवाधानों से प्राप्त सामग्री

इन शवाधानों से जो सामग्री मिली है उसका प्रयोग तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत तथा दक्षिण भारत में किया जाता था। कुछ विशेष प्रकार के बर्तन भी पाए गए हैं। इन शवाधानों से प्राप्त, ‘पायों वाले प्याले’ ठीक वैसे ही हैं जैसे कि उन दिनों की तथा उनसे भी पुरानी भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र तथा ईरान की कब्रों से मिले हैं। घोड़ों की हड्डियां और घोड़ों से सम्बन्धित सामग्री का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि घुड़सवारी वाले लोग इस क्षेत्र में पहुँच गए थे। घोड़ों को दफनाने के उदाहरण नागपुर के निकट जूनापानी से प्राप्त होते हैं। ये महापाषाणीय उदाहरण विशेष रूप से मृतकों के अंतिम संस्कार के तरीके तथा देशी एवं विदेशी परम्पराओं का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं।

महापाषाण संस्कृति की लौह सामग्री

महापाषाणीय युग के स्थलों, विदर्भ में नागपुर के निकट जूनापानी से लेकर दक्षिण में आदिचनल्लूर तक लगभग 1500 किलोमीटर क्षेत्र में लोहे की वस्तुएं समान रूप से पाई गई हैं। लोहे की विभिन्न प्रकार की वस्तुएं, जैसे चपटी लोहे की कुल्हाड़ियां, जिसमें पकड़ने के लिए लोहे का दस्ता होता था, फावड़े, बेल्चे, खुरपी, कुदालें, हंसिये, फरसे, फाल, सब्बल, बरछे, छुरे, छैनी, तिपाइयां, स्टैण्ड, तश्तरियां, लैम्प, कटारें, तलवारें, तीर के फल तथा बरछे के फल, त्रिशूल आदि प्राप्त हुए हैं।

इन औजारों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। जैसे- घोड़े के सामान जिनमें लगाम का लोहे का वह हिस्सा जो घोड़े के मुंह में होता है, फंदे के आकार वाली नाक तथा मुंह पर लगाने वाली छड़ें आदि। धातु की अन्य वस्तुओं में सबसे अधिक संख्या में पशुओं की गर्दन में बांधी जाने वाली ताम्र व कांस्य की घंटियां प्राप्त हुई हैं। इस संस्कृति के लोग काले व लाल रंग के बर्तनों का उपयोग करते थे।

दक्षिण भारत की महापाषाण सभ्यता से चित्रित धूसर भाण्ड परम्परा के साथ लोहे के जो उपकरण मिले हैं, उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि इस सभ्यता के मानव द्वारा लौह उपकरणों का उपयोग सीमित कार्य के लिए ही किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

महापाषाण संस्कृति

वैदिक सभ्यता

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वैदिक सभ्यता

वैदिक सभ्यता संसार की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह देखकर आश्चर्य होता कि आज से 10 हजार साल पहले के युग में भी मानव ने इतनी उत्कृष्ट सभ्यता का विकास किया।

वैदिक सभ्यता एवं साहित्य की सत्य के प्रति ललक को ऋग्वेद के नासदीय सूक्त की इस ऋचा से समझा जा सकता है- न मुझे दाहिने का ज्ञान है और न बाएं, न मैं पूर्व दिशा को जानता हूँ और न पश्चिम को। मेरी बुद्धि परिपक्व नहीं है, मैं हताश तथा व्याकुल हूँ। यदि आप मेरा पथ प्रदर्शन करें तो मुझे इस प्रसिद्ध अभय ज्योति का ज्ञान हो जाएगा।

प्राचीन आर्यों की बस्तियां यूरोप से लेकर मध्य एशिया एवं भारत में सप्त-सिंधु प्रदेश तथा सरस्वती के तट तक पाई गई हैं किंतु आर्यों की सभ्यता का इतिहास निश्चत रूप से इन बस्तियों से भी पुराना है। आर्यों का प्राचीनतम साहित्य ई.पू. 2500 से मिलना आरम्भ हो जाता है किंतु संभव है कि भारत में आर्य इस अवधि से भी पहले से रह रहे हों।

प्राचीन आर्य संस्कृति के बारे में जानने के दो तरह के स्रोत उपलब्ध हैं-

(1.) पुरातत्त्व सामग्री: मृदभाण्ड, मुद्राएं, अस्त्र-शस्त्र, भवनावशेष आदि।

(2.) वैदिक साहित्य: वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, सूत्र।

वैदिक-काल

वैदिक-काल, उस काल को कहते हैं जिसमें आर्यों ने वैदिक ग्रन्थों की रचना की। ये ग्रन्थ एक दूसरे से सम्बद्ध हैं और इनका क्रमिक विकास हुआ है। सबसे पहले ऋग्वेद तथा उसके बाद अन्य वेदों की रचना हुई। वेदों की रचना के बाद उनकी व्याख्या करने के लिए ब्राह्मण-ग्रन्थ रचे गए। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों की संख्या और उनका स्वरूप जब इतना विशाल हो गया कि उन्हें कंठस्थ करना कठिन हो गया तो उन्हें संक्षिप्त स्वरूप देने के लिए सूत्रों की रचना हुई।

इस सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की रचना में सहस्रों वर्ष लगे। विद्वानों की मान्यता है कि वैदिक साहित्य की रचना ई.पू.4,000 से ई.पू.600 के बीच हुई। इसलिए इस काल को वैदिक-काल कहा जाता है तथा इस काल की आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा जाता है।

वैदिक सभ्यता का काल विभाजन

वैदिक-काल को दो भागों में विभक्त किया गया है-

(1) ऋग्वैदिक-सभ्यता ( ई.पू.4,000 से ई.पू.1000 )

चारों वेदों में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। इसलिए ऋग्वेद काल की सभ्यता सर्वाधिक पुरानी है। ऋग्वेद के रचनाकाल के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। पी. वी. काणे आदि कुछ विद्वान इस ग्रंथ को ई.पू.4000 से ई.पू.2500 के बीच रचा गया मानते हैं तो मैक्समूलर आदि विद्वान इसका रचना काल ई.पू.2500 से ई.पू.1000 के बीच मानते हैं। ऋग्वेद काल में आर्य लोग सप्त-सिन्धु क्षेत्र (सिन्धु, सरस्वती, परुष्णी, वितस्ता, शतुद्रि, अस्किनी, विपाशा नदियों का क्षेत्र) में निवास करते थे। इस काल की सभ्यता को ऋग्वैदिक सभ्यता कहते हैं।

(2) उत्तर-वैदिक सभ्यता (ई.पू.1000 से ई.पू.600)

उत्तर-वैदिक काल में यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् रचे गए। इनमें से अथर्ववेद की रचना ई.पू.1000 के आसपास हुई जबकि ब्राह्मण-ग्रंथ एवं आरण्यक ई.पू.600 तक रचे जाते रहे। उपनिषदों की रचना ई.पू. से ई.पू. के बीच हुई। इस काल में आर्य सभ्यता सरस्वती, दृशद्वती तथा गंगा नदियों के मध्य की भूमि में पहुँच गई थी और आर्यों ने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र था। उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों की सभ्यता का यहीं विकास हुआ। यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की रचना इसी क्षेत्र में हुई। उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक सभ्यता का क्रमशः विकास होता गया और इसमें अनेक परिवर्तन होते चले गए।

(3) सूत्रकाल

वैदिक सभ्यता एवं साहित्य में तीसरा युग सूत्रकाल के नाम से अभिहित किया जा सकता है। उत्तर-वैदिक ग्रंथों की रचना सूत्र-ग्रंथों की रचना के आरम्भ होने के साथ समाप्त होती है। सूत्रों की रचना ई.पू.600 से ई.पू.200 तक हुई। इस अवधि को सूत्रकाल कहा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

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वेद

वेद संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। आश्चर्य होता कि आज से 10 हजार साल पहले के युग में भी मानव ने इतनी उत्कृष्ट भाषा का विकास किया, इतनी उत्कृष्ट संस्कृति को जन्म दिया एवं इतने उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया!

वैदिक ग्रन्थों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) वेद अथवा संहिता (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद),

(2.) ब्राह्मण-ग्रंथ (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद),

(3.) सूत्र (श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र)।

प्रथम दो अर्थात् संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों को श्रुति भी कहा गया है। श्रुति का अर्थ है जो सुना गया हो। प्राचीन आर्यों का विश्वास था कि संहिता और ब्राह्मण किसी मनुष्य की कृति नहीं थे। उनमें दिए गए उपदेशों को ऋषियों तथा मुनियों ने ब्रह्मा के मुख से सुना था। इसी से इन ग्रन्थों को श्रुति कहा जाता है।

इन ग्रन्थों में दिए गए उपदेश ब्रह्म-वाक्य हैं इसलिए वे सर्वथा सत्य हैं। उन पर संदेह नहीं किया जा सकता। संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में जो उपदेश दिए गए हैं वे बहुत लम्बे हैं। अतः आर्य-विद्वानों ने जन-साधारण के लिए उपदेशों को संक्षेप में छोटे-छोटे वाक्यों में लिख दिया। इन्हीं रचनाओं को ‘सूत्र’ कहते हैं। सूत्र का अर्थ है- ‘संक्षेप में कहना।’ इन ग्रन्थों में बड़ी-बड़ी बातें संक्षेप में लिखी गई हैं इसलिए इन्हें सूत्र कहा गया।

(1.) वेद अथवा संहिता

वेद संस्कृत की विद् धातु से निकला है जिसका अर्थ है- जानना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। वेद उन ग्रन्थों को कहते हैं जो ज्ञान की प्राप्ति के एकमात्र साधन समझे जाते थे। वेद-वाक्य ब्रह्म-वाक्य होने के कारण चिरन्तन सत्य थे और उनके अनुसार जीवन व्यतीत करने से इहलोक तथा परलोक दोनों ही सुधरता था। अर्थात् इस संसार में सुख की प्राप्ति होती थी और मृत्यु हो जाने पर मोक्ष मिलता था। वेदों का भारतीयों के जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। वेद भारतीय धर्म और संस्कृति का शाश्वत और अक्षय कोष हैं।

 वेदों को संस्कृत-साहित्य की जननी कहा जाता है। सिन्धु-घाटी की सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी तथा आर्य-सभ्यता का निर्माण वैदिक आर्यों द्वारा किया गया था। वेदों को हम भारतीय समाज का प्राण कह सकते हैं जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता था। वेदों के उपरान्त जितने साहित्य लिखे गए उन सब का आधार वेद ही है। वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। प्राचीन आर्यों द्वारा  केवल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद की रचना की गई। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘वेद-त्रयी’ अथवा ‘त्रयी’ कहा गया। अथर्ववेद बहुत बाद का है जो सबसे अन्त में लिखा गया।

प्रारम्भ में वेदों का पठन-पाठन मौखिक था। विभिन्न आश्रमों के ऋषि-मुनि अपने-अपने ढंग से इनका पाठ करते थे। इस कारण विभिन्न पाठ-परम्पराएँ चल पड़ीं। गुरु-शिष्य परम्परा एवं पिता-पुत्र परम्परा द्वारा ये मंत्र ऋषि कुलों में स्थिर रहते थे और श्रुति द्वारा शिष्य, गुरु से या पुत्र, पिता से जानता था। इस कारण  उन्हें श्रुति भी कहा जाता था।

 विविध ऋषिकुलों में जो विविध सूक्त, श्रुति द्वारा चले आते थे, धीरे-धीरे उन्हें संकलित किया जाने लगा। इस महत्त्वपूर्ण कार्य का प्रधान श्रेय महाभारत कलीन महर्षि वेदव्यास को है। उन्होंने वैदिक सूक्तों को एकत्रित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद को संहिता बद्ध किया। जब वेदों को लिखित रूप में संहिताबद्ध कर दिया गया तब इन्हें ‘संहिता’ कहा जाने लगा। संहिता का अर्थ होता है- संग्रह। चूँकि इन ग्रन्थों में मन्त्रों का संग्रह है, इसलिए इन्हें संहिता कहा गया।

(1.) ऋग्वेद

यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ऋक् तथा वेद। ऋक् का अर्थ होता है स्तुति-मन्त्र। स्तुति-मन्त्र को ऋचा भी कहते हैं। जिस वेद में स्तुति मन्त्रों अर्थात् ऋचाओं का संग्रह किया गया है उसे ऋग्वेद कहते हैं। सूर्य, वायु, अग्नि आदि ऋग्वेद के प्रधान देवता हैं। इसलिए ये ऋचाएँ इन्हीं देवताओं की स्तुति में लिखी गयीं। ऋचाओं का संग्रह किसी एक ऋषि ने नहीं किया। वरन् वे विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न समय में संकलित की गईं। ऋग्वेद दस मण्डलों अथवा भागों में विभक्त है।

प्रत्येक मण्डल कई अनुवाकों में विभक्त है। अनुवाक् का अर्थ होता है जो बाद में कहा गया है। चूँकि इनका स्थान मण्डल के बाद है, इसलिए इन्हें अनुवाक् कहा गया है। प्रत्येक अनुवाक् कई सूक्तों में विभक्त है। सूक्त का अर्थ होता है अच्छी उक्ति अर्थात् जो अच्छी प्रकार कहा गया हो। ऋग्वेद में 10 मण्डल हैं जिनमें 1028 सूक्त हैं। प्रत्येक सूक्त कई ऋचाओं अर्थात् स्तुति-मन्त्रों में विभक्त है, ऋचाओं की कुल संख्या 10,580 है।

प्रत्येक सूक्त के साथ किसी ऋषि और देवता का नाम भी मिलता है। वस्तुतः ऋषि ही उस सूक्त का रचयिता होता था। इस प्रकार के ऋषियों में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्धाज और वशिष्ठ के नाम उल्लेखनीय हैं। मंत्र रचयिता ऋषियों में कुछ स्त्रियों के नाम भी हैं जिनमें लोपामुद्रा, घोषा, शची, पौलोमी और काक्षवृति के नाम उल्लेखनीय हैं। पहले, नौवें तथा दसवें मण्डल के प्रत्येक सूक्त के रचनाकार अलग-अलग ऋषि हैं। सम्भवतः ये ऋषि वैदिक सूक्तों के मूल लेखकों के पुराण पुरुष हैं।

नौवें मण्डल के सूक्त केवल सोम से सम्बद्ध हैं। कहीं-कहीं मण्डल के स्थान पर अष्टक शब्द का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद के अधिकांश सूक्त देव-स्तुति और प्रार्थना रूप में हैं तथा यज्ञ और कर्मकाण्ड प्रधान हैं। यज्ञों में सुगन्धित सामग्री की आहुति देकर आर्य ऋषि, देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना करते थे।

ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी रचना सम्भवतः 4,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. तक के काल में हुई थी। यद्यपि ऋग्वेद स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है जिनका प्रधानतः धार्मिक तथा आध्यात्मिक महत्त्व है तथापि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्त्व है क्योंकि इस काल का इतिहास जानने के लिए यही ग्रन्थ एकमात्र साधन है। कुछ मन्त्रों से आर्यों के पारस्परिक तथा अनार्यों से किए गए युद्धों का पता लगता है। यह भारत ही नही, वरन् विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इसकी प्राचीनता के कारण ही भारत का मस्तक विश्व की समस्त संस्कृतियों में सबसे ऊँचा है। इसकी रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई।

मैक्समूलर ने लिखा है- ‘विश्व के इतिहास में वेद उस रिक्त स्थान की पूर्ति करता है जिसे किसी भी भाषा का कोई भी साहित्यिक ग्रन्थ नहीं भर सकता। यह हमें अतीत के उस काल में पहुँचा देता है जिसका कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता और उस पीढ़ी के लोगों के वास्तविक शब्दों से परिचित करा देता है जिसका हम इसके अभाव में केवल धुधंला ही मूल्यांकन कर सकते थे।’

(2.) यजुर्वेद

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यह दो शब्दों से मिलकर बना है- यजुः तथा वेद। यज् शब्द का अर्थ होता है यजन करना। यजुः उन मन्त्रों को कहते थे जिसके द्वारा यजन अथवा पूजन किया जाता था अर्थात् यज्ञ किए जाते थे। इसलिए यजुर्वेद उस वेद को कहते हैं जिसमें यज्ञों का विधान है। मूलतः यह कर्म-काण्ड प्रधान ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में बलि की प्रथा, उसकी महत्ता तथा विधियों का वर्णन है। यजुर्वेद में सूक्तों के साथ-साथ अनुष्ठान भी हैं जिन्हें सस्वर पाठ करते जाने का विधान है। ये अनुष्ठान अपने समय की उन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के परिचायक हैं जिनमें इनका उद्गम हुआ था। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है। पहला भाग शुक्ल यजुर्वेद कहलाता है जो स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है और दूसरा भाग कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है जिसमें पूर्व साहित्य का संकलन है। शुक्ल यजुर्वेद को ‘वाजसनेयी संहिता’ भी कहते है। पाठ भेद के कारण इसकी दो शाखाएँ है- ‘कृण्व’ और ‘माध्यन्दनीय’। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाओं का उल्लेख मिलता है- काठक संहिता, कपिष्ठक संहिता, मैत्रेयी संहिता और तैतिरीय संहिता। इन सब में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें चालीस अध्याय हैं जिनमें से प्रत्येक का सम्बन्ध किसी न किसी याज्ञिक अनुष्ठान से है। अन्तिम अध्याय ‘इशोपनिषद’ है जिसका सम्बन्ध याज्ञिक अनुष्ठान से न होकर अध्यात्म चिन्तन से है।

यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र में हुए थी। इस वेद की ऐतिहासिक उपयोगिता भी है। इसमें आर्यों के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन की झांकी मिलती है। इस वेद से ज्ञात होता है कि अब आर्य, सप्त-सिन्धु से कुरुक्षेत्र में चले आए थे तथा अब प्रकृति-पूजा की उपेक्षा होने लगी थी और वर्ण-व्यवस्था का प्रादुर्भाव हो गया था। इस प्रकार यजुर्वेद, ऋग्वैदिक-काल के बाद, आर्यों के जीवन में आए परिवर्तनों को भी प्रकट करता है।

(3.) सामवेद

साम के दो अर्थ होते हैं- शान्ति तथा गीत। यहाँ पर साम का अर्थ है गीत। इसलिए सामवेद का अर्थ हुआ वह वेद जिसके पद गेय हैं और जो संगीतमय हैं। सामवेद में केवल 66 मन्त्र नए हैं। शेष मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। सामवेद के मन्त्र गेय होने के कारण मन को शान्ति देते हैं। यज्ञादि अवसरों पर इन मन्त्रों का पाठ किया जाता है। पाठ-भेद के कारण इसकी तीन  शाखाएँ हैं- कौथुम शाखा, राणायीनय शाखा और जैमिनीय शाखा।

(4.) अथर्ववेद

‘अथ’ का अर्थ होता है मंगल अथवा कल्याण, अथर्व का अर्थ होता है अग्नि और अथर्वन् का अर्थ होता है पुजारी। इसलिए अथर्ववेद उस वेद को कहते है जिसमें पुजारी मन्त्रों तथा अग्नि की सहायता से भूत-पिशाचों से रक्षा कर मनुष्य का मंगल अथवा कल्याण करते हैं। इसकी रचना प्रथम तीन वेदों की रचना के बहुत बाद में हुई। अथर्ववेद की दो शाखाएँ मिलती हैं- शौनक और पिप्लाद। इसमें चालीस अध्याय हैं और इसका सम्बन्ध मुख्यतः आर्यों के घरेलू जीवन से है।

 अथर्ववेद में बहुत से प्रेतों तथा पिशाचों का उल्लेख है जिनसे बचने के लिए मन्त्र दिए गए हैं। विपत्तियों और व्याधियों के निवारण के लिए भी मंत्र-तंत्र दिए गए हैं। ये मन्त्र जादू-टोने की सहायता से मनुष्य की रक्षा करते हैं। इस ग्रन्थ में कुछ मन्त्र ऋग्वेद के हैं और कुछ सामवेद के। यह आर्यों के पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डालता है तथा इसमें आर्येतर लोगों के विश्वासों तथा प्रथाओं की भी जानकारी मिलती है।

(2.) ब्राह्मण ग्रंथ

ब्राह्मण, ‘ब्रह्म’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है वेद। इसलिए ब्राह्मण उन ग्रन्थों को कहते है जिनमें वैदिक मन्त्रों की व्याख्या की गई है। इनमें यज्ञों के स्वरूप तथा उनकी विधियों का वर्णन किया गया है। चूँकि यज्ञ करने तथा कराने का कार्य पुरोहित करते थे जो ब्राह्मण होते थे, इसलिए केवल ब्राह्मणों से संबंधित होने के कारण इन ग्रन्थों का नाम ब्राह्मण रखा गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना ‘ब्रह्मर्षि देश’ में हुई थी।

ब्राह्मण ग्रन्थों के दो भाग हैं- (1.) विधि और (2.) अर्थनाद अर्थात् आख्यानों, पुराणों और इतिहास द्वारा नियमों के अर्थ की व्याख्या।

प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण हैं। ऋग्वेद के कौषितकी या सांख्यायान और ऐतरेय ब्राह्मण हैं। कृष्ण यजुर्वेद का तैतिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण है। शतपथ ब्राह्मण एक विशाल ग्रन्थ है जिसमें एक सौ अध्याय हैं। इसके रचयिता याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। इस ग्रंथ में याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार से वर्णन है तथा विविध अनुष्ठानों के प्रयोजनों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

सामवेद के तीन ब्राह्मण हैं- ताण्ड्य ब्राह्मण, षडविश ब्राह्मण और जैमिनीय ब्राह्मण। सामवेद के छान्दोग्य के मंत्र ब्राह्मण एवं सामविधान ब्राह्मण हैं। अर्थवेद का गोपथ ब्राह्मण है।

यद्यपि ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना याज्ञिकों के पथ-प्रदर्शन के लिए की गई थी तथापि इनसे आर्यों के सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना प्रधानतः गद्य में की गई है परन्तु कहीं-कहीं पद्य भी विरल रूप से मिलते हैं। इनकी भाषा परिष्कृत तथा उच्च कोटि की है।

आरण्यक तथा उपनिषद् भी ब्राह्मण-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। ब्राह्मणों के परिशिष्ट ‘आरण्यक’ कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग ‘उपनिषद’ हैं।

आरण्यक

आरण्यक उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनकी-रचना ‘अरण्यों’ अर्थात् ‘जंगलों’ के शान्त वातावरण में हुई और जिनका अध्ययन-चिन्तन भी जंगलों में एकान्तवास में किया जाना चाहिए। ये ग्रन्थ वानप्रस्थाश्रमियों के लिए होते थे। वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने पर लोग जंगलों में चले जाते थे और वहीं पर चिन्तन तथा मनन किया करते थे। आत्मा क्या है, सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ, सृष्टि किन तत्त्वों से बनी है, सृष्टि का नियन्त्रक कौन है, परमसत्ता का स्वरूप कैसा है, इस प्रकार के गूढ़ विषयों का चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों में किया गया है। अध्यात्म-चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों की सबसे बड़ी विशेषता है।

उपनिषद्

यह तीन शब्दों से मिलकर बना है- उप+नि+षद्। उप का अर्थ होता है समीप, नि का अर्थ होता है नीचे और षद् का अर्थ होता है बैठना। इसलिए उपनिषद् उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनका अध्ययन गुरु के समीप नीचे बैठकर श्रद्धापूर्वक किया जाना चाहिए। उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भाग में आते हैं। ये ज्ञान प्रधान ग्रन्थ हैं। इनमें उच्च कोटि का दार्शनिक विवेचन मिलता है। उपनिषदों की तुलना में संसार में कोई अन्य श्रेष्ठ दार्शनिक ग्रन्थ नहीं है।

उपनिषदों से हमें ज्ञात होता है कि इस युग में वर्ण तथा वर्णाश्रम व्यवस्था दृढ़ रूप से स्थापित हो गए थे तथा मानव की सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत बड़ा परिवर्तन हो गया था।

उपलब्ध उपनिषद ग्रन्थों की संख्या लगभग दो सौ है किन्तु उनमें से केवल बारह का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके नाम हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषितकी और श्वेताश्वतर। अधिकांश उपनिषद ई.पू.1000 से ई.पू.300 के बीच की अवधि में रचे गए। विभिन्न काल-खण्डों में रचे जाने के कारण उपनिषदों की भाषा, कथन-शैली तथा वैचारिक पृष्ठभूमि में अंतर है।

उपनिषदों का प्रमुख विषय ‘दर्शन’ है। वेदों में ज्ञान-मार्ग सम्बन्धी जो बातें पाई जाती है, उन्हीं का विकास आगे चलकर उपनिषदों के रूप में हुआ। वस्तुतः उपनिषद्, वेद के उन स्थलों की व्याख्या है जिनमें यज्ञों से अलग हटकर ऋषियों ने जीवन के गहन तत्त्वों पर विचार किया गया है। दूसरे शब्दों में, उपनिषद आर्य मस्तिष्क के धर्म से दर्शन की ओर झुकाव का परिणाम हैं। इनकी प्रवृत्ति उपासना से ध्यान की ओर, यज्ञ से चिन्तन की ओर तथा बाह्य प्रकृति की आराधना से अन्तरात्मा की खोज की ओर है।

ये ब्रह्मज्ञान के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष तथा सृष्टि आदि के सम्बन्ध में उपनिषदों में व्यक्त विचार ही शंकर के दर्शन के मूल में है। उपनिषद ही वेदान्त के अन्य सम्प्रदायों- अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि को मूल सामग्री उपलब्ध करवाते हैं। गीता में भी उपनिषदों का सार है। बौद्ध और जैन मतों के अधिकांश सिद्धान्त भी इन्हीं पर आधारित हैं। वर्तमान समय में हिन्दू-धर्म के प्रमुख सिद्धान्त भी उपनिषदों से ही लिए गए हैं।

जर्मन विद्वान शोपेन हावर ने लिखा है- ‘सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को उँचा उठाने वाला कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है। इनसे मुझे जीवन में शान्ति मिली है। इन्हीं से मृत्यु के समय भी शान्ति मिलेगी।’

(3.) सूत्र

सूत्र का शाब्दिक अर्थ होता है धागा। इसलिए सूत्र उन ग्रन्थों को कहते हैं जो इस प्रकार लिखे जाते थे मानो कोई चीज धागे में पिरो दी गई हो। और उनमें एक क्रम स्थापित हो गया हो। जब वैदिक साहित्य का रूप अत्यन्त विशाल हो गया तो उसे कंठस्थ करना बहुत कठिन हो गया। इसलिए एक ऐसी रचना-शैली का विकास किया गया जिसमें वाक्य तो छोटे-छोटे हों परन्तु उनमें बड़े-बड़े भावों तथा विचारों का समावेश हो। इन्हीं रचनाओं को सूत्र कहा गया। महर्षि पाणिनि ने सूत्रों की तीन विशेषताएँ बताई हैं-

(1.) वे कम अक्षरों में लिखे जाते हैं,

(2.) वे असंदिग्ध होते हैं और

(3.) वे सारगर्भित होते हैं।

सूत्र साहित्य के तीन भाग हैं- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्रों में वैदिकयुगीन यज्ञों और उनके वर्गीकरण का समावेश है, गृह्य सूत्रों में गार्हस्थिक संस्कार, अनुष्ठान, आचार-विचार और कर्मकाण्ड का वर्णन है तथा धर्म सूत्रों में धार्मिक नियम, राजा-प्रजा के कर्त्तव्य और अधिकार, सामाजिक वर्ण प्रधान भेद, आश्रम आदि विभिन्न व्यवस्थाओं का उल्लेख है।

सूत्रों में कल्प-सूत्र सर्वाधिक महत्त्व का है। सूत्रों की रचना करने वालों में महर्षि पाणिनि प्रमुख हैं। इन ग्रन्थों की रचना 700 ई.पू. से 200 ई.पू. के बीच हुई। सूत्रों में आर्यों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का भी पर्याप्त परिचय मिलता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वेदांग

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प्राचीन ऋषि

वैदिक साहित्य के अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद, उपनिषद, आरण्यक एवं ब्राह्मण ग्रंथों पर हम पिछले अध्याय में चर्चा कर चुके हैं। इस अध्याय में वेदांग पर चर्चा की जा रही है।

विपुल वैदिक साहित्य अर्थात् वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक एवं उपनिषदों को पढ़ने एवं उनके गूढ़ अर्थ को समझने के लिए शिक्षा, छन्द, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और कल्प नामक छः विधाएं बनाई गईं जिन्हें वेदांग कहते हैं। पाणिनी के अनुसार, व्याकरण वेद का मुख है, ज्योतिष नेत्र, निरुक्त श्रोत्र, कल्प हाथ, शिक्षा नासिका और छन्द दोनों पैर हैं।

वेदांग

शिक्षा

इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। अर्थात् वे मंत्रों में प्रयुक्त स्वरों, व्यंजनों एवं विशिष्ट ध्वनियों का उच्चारण कैसे किया जा सकता है, इसका अध्ययन वेदांग की ‘शिक्षा’ नामक शाखा में करवाया जाता है।

कल्प

वेदों में यज्ञयाग आदि कर्मकांड के उपदेश आए हैं, किस यज्ञ में किन मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए, किसमें कौन सा अनुष्ठान किस रीति से करना चाहिए, इत्यादि कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि कल्पसूत्र ग्रंथों में है। इसलिए कर्मकांड की पद्धति जानने के लिए कल्पसूत्र ग्रंथों के अध्ययन की आवश्यकता होती है। यज्ञ यागादि का ज्ञान ‘श्रौतसूत्र’ से होता है और षोडश संस्कारों का ज्ञान ‘स्मार्तसूत्र’ से मिलता है।

वैदिक कर्मकांड में यज्ञों का बहुत विस्तार है। प्रत्येक यज्ञ की विधि श्रौतसूत्र से देखनी होती है। इसलिए अनेक श्रौतसूत्र उपलब्ध हैं। स्मार्तसूत्र सोलह संस्कारों का वर्णन करते हैं, इसलिए ये भी पर्याप्त विस्तृत हैं। श्रौतसूत्रों में यज्ञयाग के नियम हैं और स्मार्तसूत्रों में अर्थात् गृह्यसूत्रों में उपनयन, जातकर्म, विवाह, गर्भाधान, आदि षोडश संस्कारों का विधि विधान दिया गया है। कल्प की तीसरी शाखा ‘धर्मसूत्र’ कहलाती है।

व्याकरण

व्याकरण से प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। आचार्य वररुचि ने व्याकरण के पाँच प्रयोजन बताए हैं- (1) रक्षा (2) ऊह (3) आगम (4) लघु तथा (5) असंदेह।

(1) व्याकरण के अध्ययन का उद्देश्य वेदों की रक्षा करना है।

(2) ऊह का अर्थ है-कल्पना। वैदिक मन्त्रों में न तो लिंग है और न ही विभक्तियाँ। लिंगों और विभक्तियों का प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जो व्याकरण का ज्ञाता हो।

(3) आगम का अर्थ है- श्रुति। श्रुति कहती है कि ब्राह्मण का कर्त्तव्य है कि वह वेदों का अध्ययन करे।

(4) लघु का अर्थ है- शीघ्र उपाय। वेदों में अनेक ऐसे शब्द हैं जिनकी जानकारी एक जीवन में सम्भव नहीं है। व्याकरण वह साधन है जिससे समस्त शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है।

(5) असंदेह का अर्थ है- संदेह न होना। संदेहों को दूर करने वाला व्याकरण होता है, क्योंकि वह शब्दों का समुचित ज्ञान करवाता है।

निरुक्त

वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में हुआ है, निरूक्त में उनके उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख किया गया है। शब्द की उत्पत्ति तथा व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह निरुक्त बताता है। यास्काचार्य का निरुक्त प्रसिद्ध है। इसको शब्द-व्युत्पत्ति-शास्त्र भी कह सकते हैं। वेद का यथार्थ अर्थ समझने के लिए निरुक्त को जानने की अत्यंत आवश्यकता है।

ज्योतिष

वेदमंत्रों में नक्षत्रों का जो वर्णन हुआ है, उसे ठीक प्रकार से समझने के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान करवाया जाता है। इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से अर्थ वेदांग ज्योतिष से है। अंतरिक्ष में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि आदि ग्रह किस प्रकार गति करते हैं, सूर्य, चंद्र आदि के ग्रहण कब होंगे, अन्य तारकों की गति कैसी होती है आदि का ज्ञान ज्योतिष शास्त्र में करवाया जाता है।

इस प्रकार वेदांगों का ज्ञान वेद का उत्तम बोध होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

छन्द

वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, वृहती आदि छंदों का ज्ञान छंद-शास्त्र से होता है। इस शास्त्र में मुख्यतः यह बताया जाता है कि प्रत्येक छंद के पाद कितने होते हैं और ह्रस्व-दीर्घ आदि अक्षर प्रत्येक पाद में कैसे होने चाहिए। छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है-

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्

तस्मात्सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

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