Saturday, June 22, 2024
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अध्याय – 6 – सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज (ताम्रकांस्य कालीन सभ्यता एवं संस्कृति) (ब)

सैन्धव धर्म

सिंधु सभ्यता के निवासी भलीभांति शिक्षित थे और उन्होंने लिपि,  लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं के साथ-साथ धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का विकास कर लिया था। उनकी कलाप्रियता, धार्मिक विश्वासों एवं रीति-रिवाजों का परिचय सिंधु सभ्यता की मुद्राओं पर बनी आकृतियों, बर्तनों पर की गई चित्रकारियों, शवाधानों में मिली वस्तुओं आदि से मिलता है।

सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है। इस कारण उनकी भाषा और उसमें व्यक्त विचारों का ज्ञान नहीं हो सका है। फिर भी विविध स्थलों की खुदाई से प्राप्त मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है कि सैन्धव संस्कृति के विकास के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएँ विद्यमान थीं। वे आधुनिक भारतीयों की तरह जल, अग्नि, सूर्य, वायु, धरती आदि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-साथ वृक्षों एवं पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।

विश्वरूप स्रष्टिकर्ता अथवा परमपुरुष की उपासना

सिन्धुवासियों द्वारा मन्दिरों में पूजा-उपासना करने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है किन्तु सिन्धु सभ्यता की खुदाई में मिली कुछ मुद्राएं, लिंग, योनियां एवं मातृदेवियों की मूर्तियाँ सिधु सभ्यता के धार्मिक विश्वासों का परिचय देती हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता के निवासी प्रजनन शक्तियों की परिचायक शक्तियों की पूजा देवी-देवता के रूप में करते रहे होंगे।

खुदाई में मिली एक मुद्रा पर तीन मुख वाला उर्ध्वलिंग व्यक्ति योग मुद्रा में बैठा हुआ है। इस व्यक्ति के सिर पर दो सींग बने हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट धारण किया हुआ है। इस योगी के गले में तिकोनी माला है और हाथों में ऊपर तक मणियों की लड़ियाँ हैं। योगी के निकट हाथी, चीता, गैण्डा और भैंसा बने हुए हैं और उसके आसन के नीचे हरिणों का एक जोड़ा है।

मुद्रा के उपरी हिस्से पर छः शब्द अंकित हैं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। बहुत से विद्वानों का मत है कि मुद्रा पर अंकित चित्र भगवान शिव का है क्योंकि शिव को योगीश्वर, त्रिशूलधारी, पशुपति, त्रयम्बक तथा त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। इस योगी के साथ शिव के विशिष्ट वाहन नन्दी का कोई अंकन नहीं किया गया है जिससे प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा भगवान शिव की नहीं है अपितु ‘विश्वरूप त्वष्टा’ की है जिसकी चर्चा ऋग्वेद में हुई है।

वहाँ इसे विश्वकर्मा प्रजापति का रूप एवं पुत्र बताया गया है। यह सृष्टि में स्रष्टा के अवतार का प्रतीक है। इनके तीन सिर, मन, प्राण और वाक् को प्रकट करते हैं जिनसे विश्व की सृष्टि होती है। योगी का ऊर्ध्वलिंग स्रष्टा की प्रजनन शक्ति का परिचायक है। इसके आसन के नीचे बने हुए दो हरिण, प्रजापति और उषा के, हरिण और हरिणी के रूप में सम्भोग करने के सूचक हैं, जिसकी चर्चा मैत्रायणि संहिता और ऐतरेय ब्राह्मण में आई है। इसके दोनों और दिखाए गए पशुओं के चित्र ऋग्वेद में वर्णित त्वष्टा के पशुपति रूप को प्रकट करते हैं।

सिन्धु घाटी की खुदाई में मिली एक अन्य मुद्रा पर एक अन्य योगी का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक नाग तथा सामने दो नाग बैठे हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि नागों से घिरा हुआ योगी का यह चित्र भी भगवान शिव का है, क्योंकि वे अपने गले में नाग धारण करते हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक धनुर्धारी शिकारी का चित्र पाया गया है। विद्वानों की मान्यता है कि यह चित्र किरात वेशधारी भगवान शिव का है। इन समस्त साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस देवता की आकृति के पीछे ‘विश्वरूप स्रष्टिकर्ता’ अथवा ‘परम पुरुष’ की परिकल्पना है।

परमनारी की पूजा

सिन्धु नगरों की खुदाई में मिट्टी की बनी हुई बहुत सी नारी मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान होता है कि सिन्धु संस्कृति में परमनारी की पूजा अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती होगी। विद्वानों का मत है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। अतः सिंधुवासी पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे। इस देवी की पूजा समस्त कृषि प्रधान समाजों में प्रचलित थी। वे लोग देवी के समक्ष पशु-पक्षी अथवा नरबलि देते थे और उसके बदले में वह उन्हें धनधान्य देती थी। कालान्तर में मातृदेवी की उपासना से ही शक्ति-पूजा की परम्परा का विकास हुआ होगा।

मातृदेवी की मूतियाँ प्रायः नग्न रूप में मिली हैं। मूर्ति की कमर में पटका और मेखला तथा गले में हार प्रदर्शित किया गया है। सिर पर कुल्हाड़ी से मिलती-जुलती आकृति की कोई वस्तु भी दिखाई पड़ती है। कुछ मूर्तियों में देवी को जननी के रूप में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में देवी द्वारा शिशु को स्तनपान करते हुए प्रदर्शित किया गया है। एक मूर्ति में एक ऐसी स्त्री बनी हुई है जिसके गर्भ से एक वृक्ष निकलता हुआ प्रदर्शित किया गया है।

सम्भवतः यह वानस्पतिक जगत की देवी का प्रतीक हो। एक अन्य मूर्ति के शीश पर एक पक्षी पंख फैलाए बैठा है। संभवतः यह पक्षी जगत की देवी की प्रतीक हो। इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिन्धुवासी मातृदेवी को समस्त लोक की जननी एवं पालनकर्ता मानते थे। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान मिले हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धुवासी इन प्यालों में तेल अथवा धूप जलाकर मातृदेवी अथवा पृथ्वी माता की प्रतीक किसी देवी की पूजा करते थे।

प्रजनन शक्ति की पूजा

परमपुरुष और परमनारी के साथ-साथ सिन्धुवासी प्रजनन शक्ति की, लिंग एवं योनि के प्रतीकांे के रूप में भी पूजा करते थे। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में बहुत से लिंग मिले हैं। ये सामान्य पत्थर, लाल पत्थर अथवा नीले पत्थर के बने हैं। ये लिंग कुछ इंच से लेकर चार फुट की ऊँचाई तक के हैं। विद्वानों का मत है कि सिंधुवासी छोटे आकार के लिंगों की पूजा अपने घरों में करते थे और बड़े आकार के लिंग विशेष स्थानों अथवा चबूतरों पर प्रतिष्ठित करके पूजे जाते थे।

आधुनिक हिन्दू-धर्म में लिंग पूजा संभवतः सिन्धुवासियों की ही देन है। अर्नेस्ट मैके का मत है कि लिंग की आकृति के जो पत्थर मिले हैं उन्हें पूजा का प्रतीक नहीं समझना चाहिए। उनसे सम्भवतः कूटने-पीसने का काम लिया जाता रहा होगा जैसाकि आज भी मूसल, लोढ़े अथवा बट्टे से लिया जाता है।

खुदाई में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने बहुत से छल्ले मिले हैं जिनका आकार आधा इंच से लेकर चार इंच तक है। बहुत से विद्वानों ने इन छल्लों को योनियों का प्रतीक मानकार यह मत व्यक्त किया है कि सिन्धुवासी योनि की पूजा भी करते थे। आर्य लोग योनि पूजक नहीं थे। अतः आज भारत में लिंग-योनि पूजा की जो परम्परा देखने को मिलती है, वह निस्सन्देह अनार्यों की देन है। छल्लों के बारे में मैके का मत है कि अधिकांश छल्ले स्तम्भों के आधार थे न कि योनियों के प्रतीक।

वृक्ष-पूजा

सिंधु स्थलों की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं पर वृक्षों के चित्र मिले हैं जिनके आधार पर विद्वानों का मत है कि सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर पीपल की नौ पत्तियाँ अंकित हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है। मार्शल का मत है कि मुद्रा में अंकित टहनियाँ पीपल की हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि वृक्ष-पूजा के दो रूप प्रचलित थे-

(1.) वृक्ष को उसके प्राकृतिक रूप में पूजना, जैसे कि तुलसी पूजन।

(2.) वृक्ष को किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजना, जैसे पीपल की पूजा।

ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धुवासी पीपल को बड़ा पवित्र मानते थे। उनकी बहुत सी मुद्राओं पर पीपल के विविध अंकन मिलते हैं। कहीं उसे वेदिका से उगता हुआ दिखाया गया है तो कहीं इसके भीतर देवता को अंकित किया गया है। कहीं इसकी पांच पत्तों की टहनी और कहीं ग्यारह पत्तों की शाखा चित्रित की गई है। एक जगह इसकी पांच टहनियों पर सात पत्ते उपर की ओर, दो नीचे की ओर और एक बराबर में दिखाया गया है। कपड़ों और बर्तनों पर भी पीपल की टहनी और पत्तों के अनेक डिजाइन मिले हैं।

वेदों में पीपल का पेड़ विश्व-सृष्टि के प्रतीक के रूप में अंकित है। तैतिरीय ब्राह्मण में ब्रह्म को वृक्ष कहा गया है। भारत में पीपल को ब्रह्म का रूप समझ कर पूजा जाता है। सिन्धु सभ्यता के नगरों तथा ग्रामों के चौराहों और रास्तों पर बड़े-बड़े पीपल के पेड़ रहे होंगे, जिनकी जड़ों को स्त्री-पुरुष पूजते और जल से सींचते होंगे, जैसा कि आज भी होता है।

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि सिन्धुवासियों में पीपल के साथ-साथ तुलसी, नीम, खजूर, बबूल आदि वृक्षों की पूजा भी प्रचलित रही होगी। भारत में वृक्ष-पूजा की परम्परा बहुत पुरानी है। बौद्ध मतानुयायी भी पीपल की पूजा करते थे।

पशु-पूजा

वृक्ष-पूजा के साथ-साथ सिन्धुवासी पशु-पूजा में भी विश्वास रखते थे। कुछ मुद्राओं पर बैल के चित्र मिले हैं। खिलौनों के रूप में भी बैल मिले हैं। मोहेनजोदड़ो के एक ताम्रपत्र पर कूबड़दार बैल अंकित किया गया है। इसलिए विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव सभ्यता में बैल का बड़ा महत्त्व रहा होगा। शहरों की सड़कों पर बड़े-बड़े बैल विचरते होंगे और लोग श्रद्धा से उन्हें भोजन आदि देते होंगे। विद्वानों का अनुमान है कि बैल की पूजा शक्ति के प्रतीक के रूप में की जाती होगी। वैदिक साहित्य में भी बैल को देवत्व का प्रतीक और बड़ा पवित्र समझा गया है।

बैल की भांति भैंस और भैंसा की भी पूजा की जाती थी, क्योंकि अनेक मुद्राओं पर इनके चित्र मिले हैं। गाय की पूजा भी अवश्य होती थी। एक मुद्रा पर गाय की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। नाग-पूजा काफी प्रचलित थी। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखाया गया है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, गैंडा, हिरण, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पक्षियों के चित्र भी मिले हैं। सम्भव है कि ये पशु-पक्षी हिन्दू-धर्म की भांति सैन्धव धर्म में भी विभिन्न देवी-देवताओं के वाहन रहे हों।

सैन्धव प्रदेश की कुछ मुद्राओं पर मनुष्य को चीते से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस चित्र में वृक्ष पर चढ़ा हुआ आदमी चीते को भगा रहा है तथा भागता हुआ चीता पीछे की ओर मुँह करके देख रहा है। इन मुद्राओं से अनुमान होता है कि उस काल में चीते बड़ी संख्या में पाए जाते थे और मानवों का उनसे निरंतर संघर्ष चल रहा था।

सैन्धववासी, पशुओं की आकृति विचित्र ढंग से बनाते थे। कुछ पशु आधे मनुष्य और आधे पशु हैं। आधा भेड़, आधा बकरा, आधा हाथी और आधा बैल या इसी प्रकार के अन्य मिश्रण से पशुओं की आकृति बनाते थे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इनमें दैवीय अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।

अग्नि-पूजा

सैन्धव लोग अग्नि-पूजा भी करते थे। कालीबंगा के मकानों में कोयले, राख तथा जली हुई लकड़ियों से भरे हुए गड्ढे मिले हैं। एक चबूतरे पर कुआँ खुदा हुआ है तथा अग्नि स्थान पर पक्की ईंटों से निर्मित एक आयताकार गड्ढा मिला है जिसमें पशुओं की हड्डियां पाई गईं। दूसरे चबूतरे पर आयताकार सात अग्नि-वेदिकाएं एक कतार में थीं। यह कोई यज्ञभूमि प्रतीत होती है, जहाँ सामूहिक रूप से बैठकर यज्ञ करते थे। कुएं, हड्डियों भरे हुए गड्ढे तथा यज्ञवेदियों के पास-पास मिलने से अनुमान किया जाता है कि सैन्धव लोग नहाकर पवित्र होने के बाद यज्ञ करते थे तथा इस अवसर पर पशु-बलि दिया करते थे। कुछ मूर्तियों एवं मुद्राओं के हिस्से धुएं से काले पड़े हुए हैं। अनुमान है कि सैंधव-वासी पूजा में धूप-दीप का भी प्रयोग करते थे।

जल-पूजा

मोहेनजोदड़ो के दुर्ग की खुदाई में एक बहुत बड़ा जलाशय मिला है। ईंटों के स्थापत्य का यह एक सुंदर नमूना है। यह 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। यह पक्की ईटों का बना हुआ है और इसकी दीवारें मजबूत हैं। जलाशय के चारों और एक बारामदा है जिसकी चौड़ाई 5 मीटर है। जल-कुण्ड के दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ स्नानागार बने हुए हैं। इन स्नानागारों के ऊपर कमरे बने हुए थे जिनमें सम्भवतः पुजारी रहते थे।

जलाशय के निकट एक कुआं भी मिला है जिसके पानी से जलाशय को भरा जाता होगा। जलाशय को भरने तथा खाली करने के लिए नल बने होते थे। जलाशय के दोनों सिरों पर स्नानागार की सतह तक सीढ़ियां बनी हुई हैं। अनुमान है कि इस विशाल स्नानागार का उपयोग आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था तथा धार्मिक प्रथाओं में शारीरिक शुद्धि अथवा स्नान-ध्यान पर विशेष ध्यान दिया जाता होगा। आज भी भारत के धार्मिक कृत्यों में ऐसे स्नान का बड़ा महत्त्व है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधुवासी जल को भी देवता मानकर उसकी पूजा करते थे।

धार्मिक चिह्न

खुदाई में प्राप्त अनेक अवशेषों पर सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक के चिह्न मिलते हैं। विद्वानों का मत है कि इन चिह्नों का भी कुछ धार्मिक महत्त्व रहा होगा। सम्भव है कि यह चिह्न किसी देवी-देवता के प्रतीक रहे हों अथवा किसी धार्मिक भावना के प्रतीक के रूप में इनकी पूजा की जाती हो। यह भी संभव है कि इन चिह्नों के माध्यम से रोग, बुरी नजर, प्रेतात्माओं आदि को दूर भगाया जाता हो। कुछ मुद्राओं पर बने चित्रों में नर-नारियों को सींग धारण किए हुए दिखाया गया है।

संभवतः शीश पर सींग धारण करने का भी कुछ धार्मिक महत्त्व था। इसी प्रकार स्तम्भ, स्वास्तिका और धूप-दीप आदि के प्रदर्शन का भी धार्मिक महत्त्व रहा होगा। हिन्दू-धर्म में आज भी स्वास्तिक, शंख, मछली आदि चिह्नों को पवित्र माना जाता है। माण्डने बनाने की प्रथा भी इन्हीं चिह्नों के अंकन की परम्परा का विकास हो सकता है।

मूर्ति-पूजा

मुद्राओं पर अंकित देवी-देवताओं के चित्रों तथा धार्मिक चिह्नों के अंकन से निश्चित हो जाता है कि सैन्धव लोग ईश्वर की सगुण-साकार उपासना करते थे और उनमें मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किंतु वे लोग इन मूर्तियों की स्थापना एवं धार्मिक चिह्नों के अंकन के लिए मंदिर नहीं बनाते थे क्योंकि सैंधव स्थलों की खुदाई में अभी तक मंदिर जैसी कोई रचना नहीं मिली है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मोहेनजोदड़ो में जिस स्थान पर कुषाणकालीन बौद्ध-स्तूप खड़ा है, उसके नीच सैन्धव वासियों का मन्दिर दबा हुआ हो सकता है।

धार्मिक अनुष्ठानों में नृत्य एवं संगीत का महत्त्व

सर जॉन मार्शल ने मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी आकृतियों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि ये नारी मूर्तियाँ मन्दिरों की उपासिकाएँ रही होंगी। खुदाई में प्राप्त निर्वस्त्र नृत्यांगना को विद्वानों ने देवदासी या उपासिका मानकर देवदासी प्रथा प्रचलित होने की कल्पना भी की है। संगीत एवं नृत्य के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने की परिपाटी भी रही होगी।

पशु-बलि

सैन्ध्व लोग, अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि भी देते होंगे। कालीबंगा में एक चबूतरे पर सात यज्ञकुण्डों की कतार वाले चबूतरे के निकट स्थित दूसरे चबूतरे पर खुदे कुएं के पास के गड्ढे में पशुओं की हड्डियां मिली हैं जिनसे प्रतीत होता है कि यज्ञों के समय पशु-बलि दी जाती होगी। यह भी संभव है कि बलि देने से पशुओं को भी जल से स्नान कराया जाता हो।

योग साधना

सैन्धव स्थलों से प्राप्त बहुत सी मुद्राओं पर योगियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। उनकी योगसन मुद्राओं के आधार पर कह कहा जा सकता है कि सैन्धव सभ्यता में योग साधना का बड़ा महत्त्व था।

परलोक में विश्वास

सैन्धव लोग मानव जीवन की यात्रा केवल इसी लोक तक सीमित नहीं समझते थे इसलिए वे शव को या तो विधि-विधान पूर्वक शवाधानों में गाढ़ते थे। या उसे जलाकर उसकी भस्मी कलश में रख दी जाती थी। शव को गाढ़ते समय या उसकी भस्मी के कलश के साथ पशु-पक्षी, मछली, मनके, कड़े, बर्तन आदि चीजें रखते थे। संभवतः उनका विश्वास था कि मनुष्य को दूसरे लोक में पहुँचकर ये वस्तुएं प्राप्त होंगी।

एक मृद्भाण्ड पर बकरा, गाय या बैल एवं कुत्ता अंकित है। इस अंकन का आशय पशु-बलि से हो सकता है। कुछ मुद्राएँ गण्डे एवं ताबीज की तरह बनाई गई हैं जो संभवतः गले में पहनी जाती होंगी या भुजाओं एवं कमर पर बांधी जाती होंगी। इन ताबीजों से अनुमान होता है कि सैन्धव-वासी जादू व टोने-टोकटे में भी विश्वास करते थे।

आधुनिक हिन्दू-धर्म के साथ तुलना

सिन्धु वासियों के धर्म तथा आधुनिक हिन्दू-धर्म में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं हैं। इस आधार पर स्टुअर्ट, पिगट तथा जॉन मार्शल आदि पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म का स्रोत सिन्धु घाटी रहा होगा।

जॉन मार्शल ने लिखा है- ‘सिन्धु घाटी के धर्म में बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनसे मिलती जुलती बातें हमें अन्य देशों में भी मिल सकती हैं और यह बात समस्त प्रागैतिहासिक धर्मों के विषय में ठीक सिद्ध होगी किंतु उनका धर्म इतनी विशेषता के साथ भारतीय है कि आधुनिक युग में प्रचलित हिन्दू-धर्म से बड़ी कठिनाई से ही उसका भेद किया जा सकता है।’

प्राचीन सिन्धुवासियों तथा आधुनिक हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों में समानता एवं असमानताएं इस प्रकार से हैं-

क्र.सं.सिन्धु-वासियों की धार्मिक आस्थाएंहिन्दुओं की धार्मिक आस्थाएं
1.सिन्धु-वासियों ने परम-पुरुष तथा परम-नारी को सजृन-शक्ति के प्रतीक रूप में माना।हिन्दू लोग शिव एवं पार्वती की पूजा करते हैं।
2.सैन्धव मुद्राओं पर योगीश्वर की प्रतिमाएं मिली हैं जिनके पास पशु बैठे हुए हैं।हिन्दूओं के शिव भी योगीश्वर हैं और पशुपतिनाथ के रूप में विख्यात है।
3.सैन्धव मुद्राओं पर योगीश्वर के पास नाग बैठे हैं।हिन्दुओं के शिव के गले में भी नाग हैं।
4.सैन्धवों की मुद्राओं के योगी त्रिनेत्रधारी हैं।हिन्दुओं के शिव भी त्रिनेत्रधारी हैं। 
5.सिन्धुवासियों के परमपुरुष के पास विभिन्न पशु बैठे हैं किंतु साण्ड नहीं है।हिन्दुओं के शिव बैल की सवारी करते हैं।
6.सिन्धुवासियों के परमपुरुष के सिर पर दो सींग हैं और उनके बीच में पंखेदार आकृति का तिकोना मुकुट है।हिन्दुओं के शिव के सिर पर चंद्रमा है तथा उनके पास त्रिशूल रहता है।
7.सिन्धुवासी लिंग एवं योनि की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में भी लिंग पूजा का महत्त्व है तथा लिंग के आधार में योनि बनाई जाती है।
8.सिन्धुवासी बहुदेववादी होते हुए भी एक ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते थे।हिन्दू भी बहुदेववादी होते हुए एक ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं।
9.सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। पीपल का विशेष महत्त्व था।हिन्दू-धर्म में भी तुलसी, पीपल, बड़, आंवला, शीशम आदि वृक्षों का धार्मिक महत्त्व है।
10.सिन्धुवासियों में पवित्र-स्नान और जल-पूजा का धार्मिक महत्त्व था।आधुनिक हिन्दू-धर्म में भी विशेष अवसरों पर नदी स्नान अथवाघरों में स्नान का विशेष महत्त्व है।
11.सिन्धुवासी सींग, स्तम्भ और स्वास्तिक आदि धार्मिक चिह्नों की पूजा करते थे। हिन्दू-धर्म में स्वास्तिक, शंख, कौड़ी एवं मछली आदि चिह्न पवित्र और शुभ माने जाते हैं।
12.सिन्धुवासी अनेक पशु-पक्षियों की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में पशु-पक्षियों को देवताओं का वाहन मानकर धार्मिक महत्त्व दिया जाता है। हाथी इन्द्र का, बाघ दुर्गा का, मेंढा ब्रह्मा का, मकर गंगा का, भैंसा यम का, बैल शंकर का, उल्लू लक्ष्मी का वाहन है।
13.सिन्धुवासी मातृ-देवी की पूजा करते थे।हिन्दू-धर्म में पृथ्वी को पूजनीय माना जाता है।
14.सिन्धुवासी देवप्रतिमाओं की पूजा करते थे और देवप्रतिमाओं के समक्ष धूप-दीप जलाते थे।यह प्रथा हिन्दू-धर्म में भी प्रचलित है।
15.सिन्धु प्रदेश में देवताओं की सेवा के लिए उपासिकाएं एवं देवदासियाँ होती थीं।हिन्दू-धर्म में भी यह परम्परा दीर्घकाल तक प्रचलित रही।
16.सिन्धुवासी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि देते थे।हिन्दू-धर्म के शाक्त-सम्प्रदाय में  देवी को सन्तुष्ट करने के लिए पशु-बलि दी जाती थी।
17.सिन्धुवासियों के धार्मिक जीवन में योग साधना का विशेष महत्त्व था।हिन्दू-धर्म में भी योग साधना प्रमुख रूप से प्रचिलित है।
18.सिन्धुवासी यज्ञ-हवन जैसे अनुष्ठान करते थे।हिन्दू-धर्म में भी यज्ञ-हवन प्रचलित हैं।
19.सिन्धुवासी देवी-देवताओं की प्रतिमा के लिए मंदिर नहीं बनाते थे।हिन्दू-धर्म में मंदिर बनाने का प्रचलन है।
20.सिन्धुवासी देव-पूजन में नृत्य एवं संगीत को महत्त्व देते थे।हिन्दू-धर्म में भी ईश्वर की भक्ति करते समय कीर्तन एवं नृत्य आदि का महत्त्व है।

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