Tuesday, October 26, 2021

अध्याय – 6 – सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज (ताम्रकांस्य कालीन सभ्यता एवं संस्कृति) (स)

सैन्धव समाज

सैन्धव सभ्यता की खुदाई में मिली वस्तुओं से सैन्धव समाज की विस्तृत जानकारी मिलती है। आवासों की बनावट एवं नगर योजना के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में लोगों का सामाजिक स्तर एक जैसा नहीं था। समाज कई वर्गों में विभाजित था। पुजारी, पदाधिकारी, ज्यातिषि, वैद्य, आदि लोगों को उच्च वर्ग का समझा जाता होगा। कृषक, बढ़ई, कुम्हार, मछुआरे, मल्लाह, गाड़ीवान, चरवाहे आदि कर्मकार निम्न वर्ग के रहे होंगे। नगर में ऊँचे स्थान पर बने दुर्ग इस बात का प्रमाण हैं कि सैन्धव समाज में कोई न कोई राजनैतिक व्यवस्था विद्यमान थी।

भवन निर्माण

सैन्धव स्थलों की खुदाई से प्राप्त भवन अवशेषों से सिंधु सभ्यता की भवन निर्माण कला की जानकारी मिलती है। सड़कों के दोनों किनारों पर मकान होते थे जो पक्की ईटों के बने होते थे। हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग होना एक अदभुत बात है, क्योंकि मिस्र के समकालीन भवनों में मुख्यतः धूप में सुखाई गई ईटों का उपयोग होता था। समकालीन मैसोपोटामिया में भी सीमित मात्रा में पकाई हुई ईटों का उपयोग होता था किन्तु हड़प्पा संस्कृति के नगरों में पकाई हुई ईटों का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर हुआ है।

अधिकांश भवन दो मंजिलों के होते थे परन्तु दीवारों की मोटाई से पता लगता है कि दो से भी अधिक मंजिलों के मकान बनते थे। सिंधु सभ्यता के आवासीय भवनों के द्वार एवं खिड़कियाँ मुख्य मार्ग पर नहीं खुलते थे, अपितु गलियों और सहायक सड़कों की ओर खुलते थे। खुदाई में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग के निवासियों के आवासीय भवनों के भग्नावशेष मिले हैं।

साधारण वर्ग के लोगों के भवन छोटे होते थे जिनकी सामान्यतः लम्बाई 30 फुट और चौड़ाई 27 फुट होती थी। इस भवन में चार से पांच कक्ष होते थे। उच्च वर्ग के लोगों के घर बड़े होते थे जिनका आकार छोटे घरों की तुलना में दुगुना या उससे अधिक होता था और उनमें कक्षों की संख्या भी अधिक होती थी। कुछ विशाल भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं। एक भवन 242 फुट लम्बा और 115 फुट चौड़ा था। दीवारों में छेद बनाकर उनमें शहतीरें लगाई जाती थीं और फिर बल्लियाँ डालकर मजबूत चटाई बिछा देते थे। उस पर मिट्टी एवं गोबर से फर्श को पक्का बनाया जाता था।

बड़े भवनों के दरवाजे बड़े तथा चौडे़ होते थे। कुछ मकानों के दरवाजे तो इतने चौड़े थे कि उनमें रथ तथा बैलगाड़ियाँ भी आ-जा सकती थीं। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियाँ भी लगी होती थीं। हड्डियों तथा शंख की बनी कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कमरों में खूंटियाँ भी लगी होती थीं। भवन में खिड़कियों तथा दरवाजों का पूरा प्रबन्ध रहता था जिससे हवा तथा प्रकाश की कमी न हो।

दीवारों के निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। ईंटों का नाप आधुनिक ईंटों से काफी मिलता-जुलता है। ईंटों को आग में पकाया जाता था। दीवारों में ईंटों को जोड़ने के लिए मिट्टी का गारा काम लाया जाता था। धनिक या उच्च वर्ग के लोग मिट्टी के गारे में चूना भी मिलाते थे। मकानों का निर्माण नींव डालकर किया जाता था। दो मंजिले मकानों की नींव अधिक गहरी होती थी और ऐसे मकानों की पहली मंजिल की दीवारें भी अधिक चौड़ी बनाई जाती थीं।

डॉ. मैके के अनुसार दीवारों पर प्लास्टर भी किया जाता था। निचली मंजिल से ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए लकड़ी और पत्थर से सीढियां बनाई जाती थीं, जो प्रायः बहुत उँची व तंग होती थीं। अधिकांश मकानों के दरवाजे तीन या चार फुट चौड़े होते थे। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियां भी बनाई जाती थीं। घरों के मध्य में प्रायः आँगन रखा जाता था। आँगन के एक कोने में रसोईघर होता था।

घर के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट स्नानागार तथा शौचालय बनाए जाते थे। ऐसा संभवतः जल निकासी की सुविधा के लिए किया जाता होगा। स्नानागार तथा शौचालय के फर्श पक्की ईंटों के होते थे। आँगन में पक्की ईंटों से चुना हुआ एक कुआँ होता था। कुछ कुंओं के भीतर सीढ़ियों के चिह्न भी मिले हैं।

सैन्धव स्थलों से कुछ विशेष भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा एवं मोहेनजोदड़ो दोनों ही स्थानों से एक-एक दुर्ग अथवा गढ़ी के अवशेष मिले हैं जो नगर से अलग टीले पर बनाया गया था। हड़प्पा दुर्ग की लम्बाई 460 गज, चौड़ाई 215 गज और ऊंचाई लगभग 45-50 फुट है। गढ़ी की बाहरी दीवार में कई बुर्ज और द्वार बने हुए हैं। गढ़ी के समीप अनेक भवन स्थित थे जिनमें भण्डागार विशेष उल्लेखनीय है। छ-छः कमरों की दो पंक्तियों में बने बड़े-बड़े भवन भी मिले हैं।

दोनों पंक्तियों के मघ्य काफी चौड़ा मार्ग है। ये भवन अन्न संग्रहण के काम में आते होंगे। इन भण्डागारों का मुख्य द्वार नदी की ओर था। सम्भवतः नदी मार्ग से ही इन भण्डागारों में अन्न सामग्री आती-जाती थी। इन भण्डागारों से थोडी दूर पर 18 बड़े-बड़े गोलाकार चबूतरे मिले हैं। चबूतरों के बीच में छेद होता था। अनुमान है कि ये चबूतरे अन्न पीसने के काम में आते होंगे। इन चबूतरों के उत्तर में सात-सात मकानों की दो पंक्तियाँ मिली है, जिनके समीप सोलह भट्टियाँ हैं। अनुमान है कि ये श्रमिकों के आवास रहे होंगे।

इस गढ़ी के भीतर सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है एक विशाल स्नानागार। इस स्नानागार के मध्य में प्रधान स्नान-कुण्ड, पूर्व-पश्चिम तथा दक्षिण में बरामदे और उनके पीछे लघु कक्ष स्थित हैं। प्रधान स्नान कुण्ड के उत्तर की ओर मार्ग के लिए जगह छोड़़कर आठ लघु स्नानगृह बने हुए हैं, जिनमें पानी आने की व्यवस्था है तथा ऊपर की ओर जाने की सीढ़ियाँ हैं। स्नानागार का फर्श पक्की ईटों का बनाया गया है और सीलन से बचाने के लिए राल का लेप किया गया है।

स्नान कुण्ड की सफाई करने तथा गन्दा पानी बाहर निकालने के लिए इसके दक्षिणी भाग में एक नाली बनी हुई है। यह स्नानागार धार्मिक अवसरों पर पुजारियों अथवा शासकीय व्यक्तियों के विशेष स्नान के उपयोग में आता होगा। स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि आधुनिक हिन्दू-धर्म की भाँति सैन्धवासियों के धर्म में भी पवित्र स्नान का विशेष महत्त्व रहा होगा।

इस प्रकार भवन निर्माण के आधार पर कहा जा सकता है कि सैन्धव समाज में उच्च वर्ग एवं साधारण वर्ग जैसा विभाजन मौजूद था।

सैन्धव परिवार

सैन्धव सभ्यता से प्राप्त भवनों और उनमें स्थित पृथक-पृथक कक्षों की योजना से लगता है कि सिन्धु सभ्यता में परिवार ही समाज की मूल ईकाई थी। कक्षों की संख्या, आंगन में कुओं की उपस्थिति, प्रवेश द्वार के निकट शौचालय एवं स्नानागार की उपस्थिति से अनुमान लगाया जा सकता है कि सैन्धव समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित रही होगी और माता-पिता, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री आदि एक साथ रहते होंगे।

खुदाई में प्राप्त नारी मूर्तियों की बहुलता और मातृदेवी की लोकप्रियता के आधार पर विद्वानों का मानना है कि सैन्धव समाज मातृ-प्रधान था, अर्थात् परिवार में माता का स्थान सर्वोपरि होता था। द्रविड़ समाज भी मातृ-प्रधान था।

सैन्धव समाज में नारी का स्थान

विद्वानों का अनुमान है कि सैन्धव समाज में नारी का स्थान सम्मानजनक था। वह परिवार की मुखिया एवं पोषिका समझी जाती थी। उसका मुख्य काम बच्चों का लालन-पालन एवं घर पर रहकर सूत कातना था। मुद्राओं पर अंकित विभिन्न नारी-चित्रों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि सैन्धव स्त्रियों में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था और वे धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों में पुरुषों के साथ समान रूप से सम्मिलित होती थीं।

रहन-सहन

सैन्धव स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में अस्त्र-शस्त्रों की अल्पता इस बात की सूचक है कि सैन्धव लोग शान्ति-प्रिय थे और समृद्ध जीवन बिताने की कामना करते थे। खुदाई से प्राप्त घड़े, कलश, थालियाँ, कटोरे, तश्तरियाँ, गिलास, चम्मच आदि बर्तन उनकी सम्पन्नता के द्योतक हैं। विभिन्न मुद्राओं पर अंकित पलंग, कुर्सियाँ, तिपाइयाँ आदि भी उनकी सम्पन्नता का उद्घोष करते हैं।

वेश-भूषा

खुदाई में प्राप्त अधिकांश नारी-मूर्तियाँ नग्न हैं परन्तु सैन्धव लोग वस्त्रों का प्रयोग करते थे। सिन्धु-घाटी के लोग ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। उनके वस्त्र साधारण हुआ करते थे। खुदाई में एक पुरुष की मूर्ति मिली है जिसमें वह एक शॉल ओढ़े हुए है। शॉल बाएँ कन्धे के ऊपर से दाहिनी कांख के नीचे जाता है। विद्वानों का अनुमान है कि इनके दो मुख्य वस्त्र रहे होंगे। एक शरीर के नीचे के भाग को ढँकने के लिए और दूसरा ऊपर के भाग के लिए।

हड़प्पा की खुदाई में मिली सामग्री से अनुमान होता है कि स्त्रियाँ सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनती थीं जो सिर के पीछे की ओर पंखे की तरह उठा रहता था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों तथा पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं होता था। कुछ स्त्रियां पगड़ी भी पहनती थीं। कुछ स्त्री मूर्तियों को नुकील टोपी पहने हुए दिखाया गया है।

केश-विन्यास

खुदाई में प्राप्त शीशा और कंघी तथा कुछ मुद्राओं पर मिले अंकन से ज्ञात होता है कि सैन्धव स्त्री-पुरुष केश-सज्जा किया करते थे। मूर्तियों से पता चलता है कि पुरुष दाढ़ी और मूँछ दोनों रखते थे एवं वे अपने केशों को संवारकर पीछे की ओर बाँध लेते थे। खुदाई में हजामत बनाने का उस्तरा भी मिला है।

कुछ मुद्राओं और मूर्तियों से पता चलता है कि कुछ लोग दाढ़ी रखते थे परन्तु मूँछे मुंडवा लेते थे। सैन्धव स्त्रियाँ, आज की हिन्दू स्त्रियों की भाँति बीच से माँग निकालकर चोटी करती थीं। कुछ स्त्रियाँ अपनी चोटी को सिर के पीछे लपेट लेती थीं। कुछ स्त्रियाँ बालों को जूड़ा बनाकर पीछे फीते से बाँध लेती थीं।

शृंगार एवं आभूषण

सैंधव स्त्रियाँ आज की हिन्दू स्त्रियों की भांति काजल, सुरमा, सिन्दूर, बालों की पिन, इत्र तथा पाउडर का प्रयोग करती थीं। मैके के अनुसार, वे लिपिस्टिक का प्रयोग भी करती थीं। खुदाई में कण्ठहार, कर्णफूल, हंसली, बाजूबन्द, कडे़ छल्ले, अंगूठियाँ, पायजेब तथा नाक में पहनने के आभूषण मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही आभूषणों का चाव था। ये आभूषण विभिन्न धातुओं के बने होते थे और उन पर पच्चीकारी का काम किया जाता था। धनी लोग सोने-चाँदी मणि-माणिक्य के आभूषण पहनते थे तथा निर्धन स्त्री-पुरुष तांबा, हड्डी एवं मिट्टी से बने आभूषण पहनते थे।

खान-पान

सैन्धव स्थलों की खुदाई में गेहूँ, जौ, चावल, खजूर आदि के बीज, अधजली हड्डियाँ तथा फलों के छिलके मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि  सैन्धवासियों के खान-पान का स्तर उच्च था। मुद्राओं पर अंकित चित्रों से उनके माँसाहारी होने के प्रमाण भी मिलते हैं। वे मछली, गाय, सूअर, भेड़ तथा मुर्गे का मांस खाते थे। गाय, भैंस तथा बकरी के दूध का उपयोग किया जाता था। यह कहना कठिन है कि वे लोग दूध से घी निकालना जानते थे अथवा नहीं।

मदिरा-पान

जनार्दनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय उदयपुर के पुरातत्त्व संग्रहालय में एक जार प्रदर्शित किया गया है जिसे ‘वाइन टारपीडो’ कहते हैं। यह मिट्टी से बना हुआ है जिसे आग में पकाया गया है तथा उस पर विशेष प्रकार की पॉलिश है। यह बेलनाकार आकृति में है, इसका मुंह संकरा, मध्य भाग चौड़ा तथा नीचे का भाग पुनः कम चौड़ा है। इसकी ऊँचाई लगभग 26 इंच है। यह जार पश्चिम एशिया से लेकर सिंधुघाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त होता है। उदयुपर संग्रहालय का जार गुजरात के एक सैन्धव सभ्यता स्थल से मिला है।

इस जार के भारत में मिलने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि उस काल में भारत एवं यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध थे। यह भी संभव है कि इन जारों में मदिरा भरकर यूनान अथवा रोम से पश्चिम एशिया तक लाई जाती हो एवं वहाँ के व्यापारी इन्हें सैन्धव सभ्यता के बंदारगाहों तक पहुँचाते हों।

आमोद-प्रमोद

सैन्धववासियों में कई प्रकार के आमोद-प्रमोद प्रचलित थे। मछली पकड़ना और शिकार करना मनोरंजन के प्रिय साधन थे। एक मुद्रा पर कुछ लोगों को तीर-कमान से एक बारहसिंगे का शिकार करते हुए दिखाया गया है। एक अन्य मुद्रा पर एक पुरुष को दो शेरों से लड़ते हुए दिखाया गया है। बर्तनों एवं मुद्राओं पर बने चित्रों से ज्ञात होता है कि वे लोग मुर्गे, तीतर और बटेर लड़ाते थे। खेलकूद और व्यायाम में भी उनकी रुचि थी। एक मुद्रा पर एक व्यक्ति को व्यायाम करते हुए दिखाया गया है।

 वे लोग घरों में भी कई प्रकार के खेल खेला करते थे। अनेक स्थलों से पत्थर, मिट्टी और हाथी दाँत से बने हुए सुन्दर चौकोर पासे मिले हैं। इन पर आधुनिक पासों की तरह अलग-अलग संख्या के बिन्दू बने हैं। इनसे प्रतीत होता है कि सैन्धववासी शतरंज अथवा चौपड़ जैसे घरेलू खेल अथवा जुआ खेला करते थे। नृत्य और संगीत सिन्धुवासियों के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन था। धातु की बनी हुई नर्तकी की एक सुन्दर मूर्ति मिली है।

कुछ मुद्राओं पर तबले, ढोल तुरही, वीणा आदि वाद्ययंत्र उत्कीर्ण हैं। नृत्य के समय इन वाद्यों का प्रयोग किया जाता होगा। सैन्धव स्थलों की ख्ुादाई में बच्चों के खिलौने बड़ी संख्या में मिले है। इनमें झुनझुने, सीटियाँ, बैलगाड़ियाँ, नर-नारियों की आकृतियों एवं पशु-पक्षियों की आकृतियों वाले खिलौने प्रमुख हैं। कुछ पशु आकृति वाले खिलौनों की गर्दन एवं सिर हिलते हैं। कुछ खिलौनों में हाथ-पैरों को अलग से धागे की सहायता से जोड़ा गया है जिसे खींचने पर खिलौने के हाथ-पैर हिलते हैं।

यातायात के साधन

सिन्धु-घाटी के लोग कच्ची सड़कें बनाते थे। बैलगाड़ी मुख्य सवारी होती थी। हड़प्पा में ताम्बे का एक वाहन मिला है जो इक्के के आकार का है। नौकाएं भी यातायात एवं परिवहन का साधन थीं।

मृतक-संस्कार

सैन्धव स्थलों से मिले शवाधानों, अस्थि कलशों एवं राख के घड़ों आदि के आधार विश्वास किया जाता है कि सैन्धववासी तीन प्रकार से शवों का अन्तिम संस्कार करते थे-

(1.) पूर्ण समाधिकरण- अर्थात् पूरे शव को गाड़ दिया जाता था।

(2.) आंशिक समाधिकरण- अर्थात् शव को पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे भाग को गाड़ा जाता था।

(3.) अग्नि संस्कार- अर्थात् शव को जलाया जाता था और कभी-कभी उसकी भस्म गाड़ दी जाती थी। हांडियों और कलशों में इस प्रकार की भस्म तथा जली हुई अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं।

हड़प्पा तथा कालीबंगा से कुछ शवाधान (कब्र) मिले हैं, जिनमें रखे शव का सिर उत्तर दिशा की ओर है। ऐसा किसी धार्मिक विश्वास के आधार पर ही किया गया होगा। शवाधानों में रखे शवों के साथ विविध आभूषण, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ भी मिली हैं, जिनसे अनुमान किया जाता है कि सैन्धववासी सम्भवतः परलोक के जीवन की कल्पना करते थे। मोहनजोदड़ो की खुदाई में कोई शवाधान प्राप्त नहीं हुआ है। अतः इस नगर के लोग शवों को या तो अग्नि में जलाते होंगे अथवा नदी में बहाते होंगे।

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