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गौतम बुद्ध के विचार

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गौतम बुद्ध के विचार

गौतम बुद्ध के विचार ही बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का आधार हैं। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपने शिष्यों के समय तथा जनसाधारण में घूम-घूम कर जनसामान्य के समक्ष अपने विचार रखे। इन्हीं विचारों के आधार पर बौद्ध धर्म का ताना-बाना रचा गया।

वैदिक धर्म के सम्बन्ध में गौतम बुद्ध के विचार

वेदों की प्रामाणिकता का खण्डन

महात्मा बुद्ध श्रद्धा की बजाए तर्क पर बल देते थे। वेदों में कही गई बातों को वे अन्तिम सत्य के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि इस प्रकार के अन्धविश्वास से मानव बुद्धि कुण्ठित हो जाएगी। वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखने के कारण बौद्ध धर्म ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानता है। इस प्रकार गौतम बुद्ध के विचार वेदों के सम्बन्ध में नकारात्मक मत प्रस्तुत करते हैं।

महात्मा बुद्ध के इस प्रकार के विचारों के कारण कुछ लोगों ने उन्हें ‘नास्तिक’ कहा। बुद्ध का कहना था कि मनुष्य की बुद्धि परीक्षात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके अपने आप बात और चीज को परखना चाहिए। स्वयं अपने विषय में उन्होंने कहा- ‘जो लोग मुझे सर्वज्ञ मानते हैं, वे मेरी निन्दा करते है।’

आत्मा के सम्बन्ध में मौन

वेदों में ‘आत्मा’ के सम्बन्ध में गहन विचार किया गया है किंतु महात्मा बुद्ध जीवन भर इस विषय पर मौन रहे। उन्होंने न तो यह कहा कि आत्मा है और न यह कहा कि आत्मा नहीं है। उन्होंने आत्मा सम्बन्धी विषय पर विवाद करने से ही मना कर दिया। क्योंकि यदि वे यह कहते कि आत्मा है तो मनुष्य को स्वयं से आसक्ति हो जाती और उनकी दृष्टि में आसक्ति ही दुःख का मूल कारण थी। यदि वे यह कहते कि आत्मा नहीं है तो मनुष्य यह सोचकर दुःखी हो जाता कि मृत्यु के बाद मेरा कुछ भी शेष नहीं रहेगा। अतः उन्होंने इस विवाद में पड़ना उचित नहीं समझा। इस प्रकार आत्मा के सम्बन्ध में गौतम बुद्ध के विचार कुछ भी नहीं कहते। इस सम्बन्ध में वे बिल्कुल मौन हैं।

कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास

महात्मा बुद्ध कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। मनुष्य का यह लोक और परलोक उसके कर्म पर निर्भर हैं परन्तु बुद्ध के कर्म का अर्थ वैदिक कर्मकाण्ड से नहीं था। वे मनुष्यों की समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक चेष्टाओं को कर्म मानते थे।

हमारे ये कर्म ही सुख-दुःख के दाता हैं। उनका कहना था कि मनुष्य की जाति मत पूछिए। निम्न जाति का व्यक्ति भी अच्छे कर्मों से ज्ञानवान और पापरहित मुनि हो सकता है और आचरणहीन ब्राह्मण, शूद्र हो सकता है। अतः महात्मा बुद्ध ने अन्तःशुद्धि और सम्यक् कर्मों पर जोर देकर समाज में नैतिक आदर्शवाद स्थापित करने पर जोर दिया।

पुनर्जन्म में विश्वास

वेदों में मनुष्य के पुनर्जन्म में विश्वास किया गया है। बुद्ध कर्मवादी थे तथा उनकी मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार ही मनुष्य अच्छा या बुरा जन्म पाता है किंतु बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्त्व के विषय में कुछ नहीं कहा। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि फिर कर्मों का फल कौन भोगता है? पुनर्जन्म किसका होता है? महात्मा बुद्ध के अनुसार यह पुनर्जन्म आत्मा का नहीं अपितु अहंकार का होता है। जब मनुष्य की तृष्णाएँ एवं वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं तो वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार पुनर्जन्म के सम्बन्ध में गौतम बुद्ध के विचार उलझे हुए हैं।

कार्य-कारण सम्बन्ध में विश्वास

यद्यपि वैदिक धर्म यह मानता है कि सृष्टि का उद्भव केवल ईश्वर की इच्छा से हुआ है तथा उसका कोई कारण नहीं है और ईश्वर बिना किसी कारण के कृपा करते हैं तथापि वैदिक धर्म कर्म-फल सिद्धांत तथा पुनर्जन्म में विश्वास रखने के कारण कार्य-कारण सम्बन्ध में विशवास रखता है। महात्मा बुद्ध भी संसार की प्रत्येक वस्तु और घटना के पीछे किसी न किसी कारण का होना मानते थे।

उनका कहना था कि प्रत्येक घटना अथवा स्थिति के कारणों को समझकर ही उससे मुक्ति पाने का उपाय किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध का कहना था कि जन्म-मरण सकारण हैं। जन्म के कारण जरा एवं मरण है। कार्य-कारण की शृंखला से यह संसार चलता रहता है। संसार को चलाने के लिए किसी सत्ता अथवा ईश्वर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

गौतम बुद्ध की धार्मिक मान्यताएँ

निब्बान (निर्वाण) में विश्वास

वैदिक धर्म मोक्ष में विश्वास रखता है जिसका अर्थ है कि मनुष्य के अच्छे कर्मों तथा ईश्वरीय कृपा से मनुष्य की आत्मा जन्म-मरण के चक्र को काटकर पुनः ईश्वर में विलीन हो जाती है तथा उसे फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ता। बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य भी निर्वाण प्राप्त करना है किंतु यह वैदिक मोक्ष से थोड़ा भिन्न है। निर्वाण शब्द का अर्थ है ‘बुझना’

बुद्ध का कहना था कि मन में पैदा होने वाली तृष्णा या वासना की अग्नि को बुझा देने पर निर्वाण प्राप्त हो सकता है। यह निर्वाण इसी जन्म में तथा इसी लोक में प्राप्त किया जा सकता है। निर्वाण का अर्थ है- बार-बार होने वाले जन्म-मरण की स्थिति से मुक्ति पाना।

बुद्ध का कहना था- ‘हे भिक्षुओ! यह संसार अनादि है। तृष्णा से संचालित हुए प्राणी इसमें भटकते फिरते हैं। उनके आदि-अन्त का पता नहीं चलता। भव-चक्र में पड़ा हुआ प्राणी अनादि काल से बार-बार जन्म लेता और मरता आया है। इसने संसार में बार-बार जन्म लेकर प्रिय-वियोग और अप्रिय-संयोग के कारण रो-रोकर अपार आँसू बहाए हैं। दीर्घकाल तक तीव्र दुःख का अनुभव किया है। अब तो तुम समस्त संस्कारों से निर्वेद प्राप्त करो, वैराग्य प्राप्त करो, मुक्ति प्राप्त करो।’

आत्मावलम्बन में विश्वास

गौतम बुद्ध ने आत्मावलम्बन को बड़ा महत्त्व दिया है। बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तत्त्व करुणा है। करुणा के तीन भेद कहे गए हैं-

(1.) स्वार्थमूलक करुणा: माता-पिता की अपनी संतान के प्रति करुणा स्वार्थमूलक करुणा है।

(2.) सहेतुकी करुणा: किसी भी प्राणी को कष्ट में देखकर हृदय का द्रवित हो जाना सहेतुकी करुणा है।

(3.) अहेतुकी या महाकरुणा: इसमें न तो मनुष्य का स्वार्थ होता है और न वह पवित्रता का ही विचार करता है। वह समस्त प्राणियों पर समान रूप से अपनी करुणा बिखेरता है। महात्मा बुद्ध ने मनुष्य को स्वयं अपना भाग्यविधाता माना है। उनका मानना था कि मनुष्य अपने ही प्रयत्नों से दुःखों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। इसके लिए ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता नहीं है।

पाटिच्च समुप्पाद (प्रतीत्य समुत्पाद)

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बुद्ध के द्वितीय आर्य सत्य में द्वादश निदान का उल्लेख हुआ है। यह द्वादशनिदान का सिद्धांत ही प्रतीत्यसमुत्पाद कहलाता है। यह बुद्ध के उपदेशों का मुख्य सिद्धांत है। कर्म का सिद्धांत, क्षणिकवाद, नैरात्म्यवाद, संघातवाद और अर्थक्रियाकारित्व आदि शेष समस्त सिद्धांत प्रतीत्यसमुत्पाद पर आधारित हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ है- एक वस्तु के प्राप्त होने पर दूसरी वस्तु की उत्पत्ति अथवा एक कारण के आधार पर एक कार्य की उत्पत्ति। उसका सूत्र है– ‘यह होने पर यह होता है।’ दूसरे शब्दों में, इसे ‘कार्य-कारण नियम’ भी कह सकते हैं। किसी भी घटना के लिए कोई कारण अवश्य होता है। बिना कारण के कुछ भी नहीं घटित होता। इस सिद्धांत से इस सत्य की स्थापना हुई कि संसार में बारम्बार जन्म और उससे होने वाले दुःखों का सम्बन्ध किसी सृष्टिकर्ता से नहीं है, प्रत्युत उनके कुछ निश्चित कारण एवं प्रत्यय होते हैं। इस कारण बुद्ध को अनीश्वरवादी कहा जाता है। प्रतीत्यसमुत्पाद को महात्मा बुद्ध ने इतना अधिक महत्त्व दिया कि उन्होंने इसे ‘धम्म’ कहा है। प्रतीत्यसमुत्पाद सापेक्ष भी है और निरपेक्ष भी। सापेक्ष दृष्टि से वह संसार है और निरपेक्ष दृष्टि से निर्वाण। जो प्रतीत्यसमुत्पाद देखता है, वह धर्म देखता है और जो धर्म देखता है वह प्रतीत्यसमुत्पाद देखता है। उसको भूल जाना ही दुःख का कारण है। उसके ज्ञान से दुःखों का अंत हो जाता है।

क्षणिकवाद

प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धान्त से ही क्षणिकवाद अथवा परिवर्तनवाद का जन्म हुआ। बौद्ध दर्शन के अनुसार संसार और जीवन दोनों में से कोई नित्य नहीं है। उनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। दोनों परिवर्तनशील हैं, इसलिए नाशवान हैं। महात्मा बुद्ध का कहना था कि यह जगत परिवर्तनशील है। इसकी प्रत्येक वस्तु प्रति क्षण बदलती रहती है, यहाँ तक कि आत्मा व जगत भी निरन्तर बदलता रहता है परन्तु संसार का यह परिवर्तन साधारण मनुष्य को दिखाई नहीं पड़ता। ठीक वैसे ही जैसे नदी का प्रवाह प्रति क्षण बदलते रहने पर भी पूर्ववत् ही प्रतीत होता है।

गौतम बुद्ध के समाजिक विचार

महावीर स्वामी की भाँति महात्मा बुद्ध भी ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था के  विरोधी थे। वे जन्म के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा नहीं मानकर कर्म के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन करने के पक्षधर थे। वे दास-प्रथा के विरोधी थे। उनकी मान्यता थी कि बेकारी एक अभिशाप है और राज्य का कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी काम में लगाए रखे।

बुद्ध राजतन्त्र के पक्ष में थे तथा राजा को समस्त भूमि का स्वामी मानते थे। उनके अनुसार आदर्श राजा वह है जो शस्त्रबल तथा दण्ड के बिना केवल नीति और धर्म के माध्यम से अच्छा शासन चला सके। उन्होंने सामाजिक उन्नति के लिए कई बातों पर बल दिया था। वे हिंसा, निर्दयता, स्त्रियों पर अत्याचार, दुराचारण, चुगलखोरी, कटु भाषा तथा प्रलाप के विरुद्ध थे।

उनकी मान्यता थी कि प्रत्येक गृहस्थ को अपने माता-पिता, अचार्य, पत्नी, मित्र, सेवक और साधु-सन्यासियों की सेवा करनी चाहिए। बैर से बैर नहीं मिट सकता अतः प्र्रेम का सहारा लेना चाहिए। अक्रोध से क्रोध को जीतना चाहिए। दूसरे के दोषों को देखने की आदत नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को अपने मन, वचन एवं कर्म को संतुलित रखकर जीवनयापन करना चाहिए।

बौद्ध-भिक्षु और संघ

गौतम बुद्ध जानते थे कि सब मनुष्य एक जैसे कठोर नियमों का पालन नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने अपने अनुयाइयों को ‘भिक्षु’ तथा ‘उपासक’ नामक दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया। भिक्षु उन्हें कहते थे जो गृहस्थ जीवन छोड़कर बुद्ध के समस्त उपदेशों का पूर्ण पालन करते हुए बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में जीवन व्यतीत करते थे। बुद्ध ने स्त्रियों को भी भिक्षुणी बनने का अधिकार दिया। उन्हें भी पुरुष-भिक्षुओं की भाँति कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था। गृहस्थ स्त्री-पुरुषों को उपासक एवं उपासिका कहा जाता था। वे गृहस्थ जीवन में रहकर, बुद्ध द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते थे।

भिक्षु-वर्ग को संगठित एवं संयमी बनाए रखने के लिए बुद्ध ने बौद्ध-संघ की स्थापना की। संघ में भिक्षुओं को निर्धारित दिनचर्या और कार्यक्रम के अनुसार जीवन बिताना पड़ता था। संघ में जाति-पाँति का भेद नहीं था और न ही इसका कोई अधिपति होता था। संघ का मुख्य काम बौद्ध धर्म का प्रचार करना था। संघों में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए अलग-अलग मठ बने होते थे जहाँ वे त्यागमय एवं सादा जीवन बिताते थे। वर्ष के आठ माह तक भिक्षुगण घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे और चार माह मठ में रहते हुए आत्मचिन्तन एवं साधना करते थे। इनमें से बहुत से मठ शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए।

बौद्ध संघ गणतन्त्रात्मक प्रणाली के आधार पर  संगठित किया गया था। संघ सम्बन्धी कार्यों में प्रत्येक भिक्षु के अधिकार समान थे। संघ की बैठकों में उपस्थित रहना अनिवार्य था। अनुपस्थित व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से भी अपना मत प्रकट करवा सकता था। प्रत्येक सदस्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपना मत दे सकता था। बहुमत के द्वारा निर्णय लिए जाते थे। प्रत्येक प्रस्ताव को तीन बार प्रस्तुत और स्वीकृत किया जाता था। तभी वह ‘नियम’ बनता था।

संघ की सभाओं में सदस्यों के बैठने की व्यवस्था करने वाले को ‘आसन-प्रज्ञापक’ कहते थे। बैठक में प्रस्ताव रखने वाले को प्रस्ताव की सूचना पहले से देनी होती थी। इस कार्यवाही को ‘ज्ञाप्ति’ कहा जाता था। प्रस्ताव को ‘नति’ कहा जाता था। प्रस्ताव प्रस्तुत करने को ‘अनुस्सावन’ अथवा ‘कम्मवाचा’ कहा जाता था।

विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव पर मतदान होता था। कभी-कभी शलाकाओं द्वारा मतदान की व्यवस्था की जाती थी। संघीय-सभा करने के लिए 30 सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक थी। कोरम के अभाव में सभा की कार्यवाही अवैध समझी जाती थी। इस प्रकार, संघ गणतान्त्रिक पद्धति के अनुसार कार्य करता था।

बौद्ध धर्म की शाखाएं

गौतम के तीन शिष्यों- उपाली, आनंद तथा महाकश्यप ने बुद्ध के उपदेशों को याद रखा और अपने शिष्यों को बताया। ई.पू.247 में सम्राट अशोक के समय पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध सभा में गौतम बुद्ध के उपदेश एकत्रित किए गए। बुद्ध के शिष्यों ने उनके उपदेशों को तीन भागों में विभक्त किया जो कि ‘विनय पिटक’, ‘सुत्त पिटक’ और ‘अभिधम्म पिटक’ कहलाते हैं। ये ही बौद्ध साहित्य के मूल ग्रंथ हैं।

बुद्ध द्वारा स्थापित संघ के भिक्षु, अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उनके वचनों का भिन्न-भिन्न अर्थ लगाकर मतों का प्रतिपादन करने लगे। इससे बौद्ध संघ दो मतों में बंट गया- ‘महासांघिक’ तथा ‘स्थविरवादी’। महासांघिक मत क्रमशः अनेक वर्गों में विभाजित हो गया।

स्थविरवादी भी पहली शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में ‘महायान’ और ‘हीननयान’ नामक दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गए। महायान सम्प्रदाय में भी कुछ और शाखाएं विकसित हो गईं जिनमें ‘विज्ञानवाद’ अथवा ‘योगाचार’ और ‘माध्यमिक’ अथवा ‘शून्यवाद’ अधिक प्रसिद्ध हुए। इसी प्रकार हीनयान में उत्पन्न हुई शाखाओं में ‘वैभाषिक’ तथा ‘सौतांत्रिक’ प्रसिद्ध दार्शनिक सम्प्रदाय हुए।

वैदिक धर्म से उत्पन्न भागवत् धर्म का बौद्ध धर्म पर प्रभाव

बौद्ध धर्म एवं जैन-धर्म के आविर्भाव के बाद भारत की पश्चिमी सीमा से यवन, शक, कुषाण, पह्लव आदि जातियों के आक्रमण हुए। अहिंसा में विश्वास रखने वाले जैन एवं बौद्ध धर्म इन आक्रांताओं का सामना नहीं कर सकते थे। अतः देश को एक ऐसे धर्म की आवश्यकता थी जो हाथ में तलवार लेकर शत्रुओं का संहार कर सके।

समाज की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक बार पुनः वैदिक धर्म सामने आया और उसके भीतर ‘भागवत् धर्म’ का उदय हुआ जिसके परम उपास्य ‘वासुदेव’ हैं जिन्हें संकर्षण एवं विष्णु भी कहा गया है। इस धर्म को सात्वत धर्म, पांचरात्र धर्म तथा नारायणीय आदि नामों से भी जाना जाता है। भागवत् धर्म आगे चलकर वैष्णव धर्म के रूप में प्रकट हुआ।

वासुदेव धर्म अथवा वैष्ण्व धर्म का प्रथम उल्लेख ई.पू. पांचवीं शताब्दी में पाणिनी के ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ में हुआ है। ई.पू. चौथी शताब्दी में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सभा में ‘सौरसेनाई’ नामक भारतीय जाति का उल्लेख किया है जो ‘हेरेक्लीज’ की पूजा करती थी। इतिहासकारों ने हेरेक्लीज को वासुदेव कृष्ण माना है। ई.पू.113 के भिलसा अभिलेख में कहा गया है- ‘भागवत् हेलिओडोरेस ने देवाधिदेव वासुदेव की प्रतिष्ठा में गरुड़-स्तम्भ का निर्माण करवाया।’

यह हेलियोडोरस तक्षशिला का निवासी था तथा मालवा नरेश भागभद्र के दरबार में इंडो-बैक्ट्रियन यवन राजा एण्टियालकिडस का राजदूत था। स्पष्ट है कि ई.पू. द्वितीय शती तक भागवत् धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था।

पद्यतंत्र के अनुसार- ‘भागवत् धर्म के सम्मुख अन्य पांच मत- योग, सांख्य, बौद्ध, जैन तथा पाशुपत, रात्रि के समान मलिन हो जाते हैं, इसलिए इसे ‘पांचरात्र’ धर्म भी कहा जाता है।’ इस उक्ति से सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि भागवत् धर्म के उदय से जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म को बहुत बड़ा धक्का लगा।

भागवत् धर्म के आधार वासुदेव थे जिसका अर्थ होता है- ‘एक ऐसा सर्वव्यापक देवता जो सर्वत्र वास करता है।’ वासुदेव अथवा नारायण अथवा विष्णु का ‘चक्रधारी स्वरूप’ एवं उनके अवतार ‘राम’ तथा ‘कृष्ण’ के ‘शत्रुहन्ता’ स्वरूप उस काल के क्षत्रियों को अधिक अनुकूल जान पड़े जो हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण करके अपने शत्रुओं एवं दुष्टों का संहार करते हैं।

भागवत् धर्म ने न केवल अपना शत्रुहंता स्वरूप ही प्रकट किया अपितु वैदिक धर्म की जटिलताओं को दूर करके जनसामान्य को तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया। भागवत् धर्म ने जन-सामान्य के लिए वेदवर्णित कर्मकाण्डों एवं खर्चीले यज्ञों के स्थान पर सर्वशक्तिमान ‘भगवान’ की भक्ति पर जोर दिया।

भगवान के ‘संकट-मोचन’ एवं ‘भक्तवत्सल’ स्वरूप के कारण भागवत् धर्म को अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई। उस काल में एक ओर जैन-धर्म अपने तात्विक विवेचन की जटिलता के कारण एवं उच्च जातियों की बहुलता के कारण जनसामान्य से दूर हो रहा था तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म में गृहस्थों के लिए निर्वाण की व्यवस्था नहीं होने के कारण वह भी लोकप्रियता खोता जा रहा था।

इन कारणों से बौद्ध धर्म ने भी अपने भीतर कई तरह के परिवर्तनों की आवश्यकता अनुभव की। कुछ बौद्धों ने इन परिवर्तनों को मानने से इन्कार कर दिया। इस कारण ईसा की पहली शताब्दी के आसपास बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया। जो लोग पुराने नियमों पर चलते रहे उन्हें ‘हीनयान’ अर्थात् ‘छोटी गाड़ी’ वाले कहा गया। जिन लोगों ने नए नियमों एवं परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया, उन्हें ‘महायान’ अर्थात् ‘बड़ी गाड़ी वाला‘ कहा गया।

हीनयान सम्प्रदाय

हीनयान सम्प्रदाय बौद्ध धर्म के प्राचीन स्वरूप को मानता है। यह सम्प्रदाय महात्मा बुद्ध को ‘धर्म-प्रवर्तक’ तथा ‘निर्वाण प्राप्त व्यक्ति’ मानता है न कि ईश्वर का अवतार। हीनयान सम्प्रदाय कर्मवाद एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखता है तथा ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखकर स्वयं पर विश्वास रखता है। इस सम्प्रदाय का मानना है कि बुद्ध द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करने से निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है और निर्वाण प्राप्ति के लिए यही सही मार्ग है।

इस सम्प्रदाय का कथन है कि अपने लिए स्वयं प्रकाश बनो किंतु, स्वयं के प्रकाश को पहचान सकना प्रत्येक के वश में नहीं होता। शुभ और अशुभ दोनों तरह की वासनाएँ हेय हैं। ये लोग निवृत्ति पर अधिक बल देते हैं। इस सम्प्रदाय को इसलिए ‘हीन-सम्प्रदाय’ अर्थात् छोटी गाड़ी कहते थे क्योंकि इस सम्प्रदाय के कठोर सिद्धांतों पर चलकर बहुत कम व्यक्ति निर्वाण का प्राप्त कर सकते थे।

महायान सम्प्रदाय

महायान सम्प्रदाय की मान्यता है कि बुद्ध के पूर्व भी बौद्ध धर्म के अनेक प्रवर्तक हुए जिन्हें वे ‘बोधिसत्व’ कहते हैं। प्रत्येक ‘कुल पुत्र’ ‘बोधिचर्चा’ से अर्थात् करुणा, मुदिता, मैत्री और अपेक्षा के आचरण द्वारा या दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान और प्रज्ञा नामक छः पारमिताओं की साधना द्वारा बुद्धत्व के मार्ग पर चल सकता है किन्तु उसे बुद्ध बनने में रुचि नहीं है। वह अकेले बुद्धत्व को प्राप्त करना उचित नहीं समझता जबकि उसके अन्य साथी दुःख और कष्टों के बन्धन में जकड़े हुए हैं।

वह ऐसे लोगों की सेवा करने को बुद्धत्व से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उसके लिए प्राणी मात्र की भलाई और सेवा करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है और वह इसी को निर्वाण मानता है। ऐसे लोगों को महाज्ञानी ‘बोधिसत्व’ कहते हैं। ‘बोधिसत्वचर्या’ का एक अंग करुणा है और दूसरा प्रज्ञा। करुणा से लोक-सेवा और परोपकार की भावना विकसित होती है। प्रज्ञा से संसार का वास्तविक स्वरूप और आतंरिक मर्म से साक्षात्कार होता है।

भागवत् धर्म और विदेशी आक्रांताओं के संयुक्त प्रभाव से महायान सम्प्रदाय में बुद्ध की मूर्ति-पूजा का चलन हुआ। बुद्ध तो स्वयं को सर्वज्ञ कहलाने के भी विरुद्ध थे किन्तु उनके अनुयाई उन्हें ‘ईश्वर’ एवं ‘ईश्वर का अवतार’ मानने लगे। गान्धार और मथुरा में स्थानीय शैलियों में बुद्ध की प्रतिमाएं बड़ी संख्या में बनने लगीं और ‘बुद्ध’ तथा ‘बोधिसत्वों’ की पूजा होने लगी।

जिस प्रकार वैष्णव मत की मान्यता थी कि भक्ति के द्वारा ईश्वर तथा मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार, महायान मत की भी मान्यता थी कि ईश्वर के अवतार बुद्ध तथा बोधिसत्वों की भक्ति के द्वारा निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

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बौद्ध धर्म का प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार बड़ी तेजी से हुआ। इसके बहुत से कारण थे जिनमें बौद्ध संगीतियों का आयोजन, बौद्ध साहित्य में वृद्धि, राजाओं द्वारा दिया गया राज्याश्रय आदि करण प्रमुख थे।

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार

बौद्ध धर्म के विकास में बौद्ध संगीतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। चूंकि इन सभाओं में मूलतः बुद्ध के वचनों को उनके शिष्यों द्वारा सर्वजनहिताय दोहराया या गाया गया था इसलिए इन्हें संगीति कहा गया। बौद्ध धर्म के लम्बे इतिहास में चार संगीतियों का विशेष महत्त्व है।

बौद्ध संगीतियाँ

प्रथम बौद्ध संगीति

पहली बौद्ध संगीति महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद ई.पू.483 में राजगृह के समीप सत्तपन्नी गुफाओं में हुई। इसमें पांच सौ भिक्षुओं ने भाग लिया तथा इसकी अध्यक्षता महाकश्यप ने की। इस सभा में बुद्ध के धर्म और विनय सम्बन्धी यत्र-तत्र बिखरे हुए उपदेशों का संकलन किया गया। बुद्ध के धर्म सम्बन्धी उपदेशों का कथन आनंद ने किया तथा उपालि ने विनय सम्बन्धी उपदेश दोहराए। इनका संकलन क्रमशः सुत्तपिटक एवं विनय-पिटक नामक ग्रंथों में किया गया।

इस संगीति के लगभग 400 साल बाद अर्थात् ई.पू.90 में इन ग्रंथों को लंका देश में पालि भाषा में लिपिबद्ध किया गया। सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेशों का वार्तालाप के रूप में संकलन है। इसी पिटक में जातक कथाएं भी हैं जिनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों का वृत्तान्त दिया गया है। इस ग्रंथ से तत्कालीन भारतीय समाज की दशा पर भी प्रकाश पड़ता है। जातक कथाओं से भारतीय धर्म की अवतारवाद की धारणा पर प्रकाश पड़ता है।

विनय-पिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम तथा बौद्धसंघ के नियमों का संकलन है। प्रथम बौद्ध संगीति में संघ के नियमों की व्यावहारिकता को लेकर कुछ मतभेद उत्पन्न हुए जिनके कारण बौद्ध संघ दो भागों में बंट गया। जो भिक्षु परम्परागत कठोर नियमों के अनुयाई थे, वे ‘स्थविर’ कहलाए परन्तु जो भिक्षु संघ में नवीन नियम लागू करने के पक्ष में थे, वे ‘महासांघिक’ कहलाए।

द्वितीय बौद्ध संगीति

जब बौद्ध धर्म का प्रचार विभिन्न जनपदों में हो गया और भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी तो संघ के अनुशासन के नियमों में परिवर्तनों की मांग होने लगी। वैशाली तथा पाटलिपुत्र के बौद्ध-भिक्षु अनुशासन सम्बन्धी दस नियमों के बन्धन में शिथिलता की मांग करने लगे जबकि कौशाम्बी, अवन्ती आदि के बौद्ध-भिक्षु समस्त नियमों के कड़ाई से पालन के पक्षधर थे। इन मतभेदों को दूर करने के लिए बुद्ध के निधन के सौ वर्ष बाद अर्थात् ई.पू.383 में वैशाली में स्थविर यश नामक बौद्ध आचार्य द्वारा बौद्ध धर्म की दूसरी संगीति बुलाई गई।

इस संगीति के आयोजन का उद्देश्य भिक्षुओं के मतभेदों पर विचार करके बौद्ध धर्म के सत्य सिद्धांतों का प्रतिपादन करना था किंतु उनके मतभेद और तीव्र हो गए। इस सभा में स्थविरों और महासांघिकों ने अलग-अलग महासमिति करके अपने-अपने ढंग से बौद्ध धर्मशास्त्रों का सम्पादन किया। आगे चलकर बौद्धधर्म 18 निकायों (सम्पद्रायों) में बंट गया। थेरवादी अर्थात् स्थविरों से 11 निकाय तथा महासांघिकों से 7 निकाय निकले।

तृतीय बौद्ध संगीति

तीसरी संगीति, द्वितीय बौद्ध संगीति के लगभग 136 वर्षों बाद, ई.पू.247 में मगध सम्राट अशोक के समय में पाटलिपुत्र में हुई। इसकी अध्यक्षता बौद्ध-भिक्षु मोग्गलीपुत्र तीसा (तिष्य) ने की तथा इसमें 1000 बौद्ध-भिक्षुओं ने भाग लिया। यह संगीति लगभग 9 माह तक चली। यद्यपि अशोक ने बौद्ध धर्म के समस्त सम्प्रदायों की एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया किंतु इस संगीति में स्थ्विरवादियों की प्रधानता रही।

इस संगीति में ‘अभिधम्मपिटक’ नामक तीसरे पिटक की रचना की गई जिसमें प्रथम दो पिटकों के सिद्धांतों और बौद्ध धर्म का दार्शनकि विवेचन तथा अध्यात्म चिंतन था। तिष्य रचित ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ इसी संगीति में प्रमाण रूप में स्वीकृत हुआ।

अशोक द्वारा बुलाई गई इस संगीति के महत्व को प्रतिपादित करते हुए इतिहासकार हण्टर ने लिखा है- ‘इस संगीति के माध्यम से लगभग आधी मानव जाति के लिए साहित्य और धर्म का सृजन किया गया और शेष आधी मानव-जाति के विश्वासों को प्रभावित किया गया।’

चतुर्थ बौद्ध संगीति

चौथी संगीति कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल में काश्मीर में हुई। यह ज्येष्ठ वसुमित्र और महान् बौद्ध दार्शनिक एवं कवि अश्वघोष के सभापतित्त्व में सम्पन्न हुई। इसमें भारत भर के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों एवं भिुक्षुओं के साथ-साथ अन्य देशों के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों एवं भिक्षुओं को भी आमंत्रित किया गया किंतु इसमें उत्तरी भारत के हीनयान सम्प्रदाय के बौद्धों का बाहुल्य रहा तथा हीनयानियों के ‘सर्वास्तिवाद’ नामक सम्प्रदाय के आचार्य एवं भिक्षु सर्वाधिक संख्या में उपस्थित रहे। इस संगीति में तीनों पिटकों के तीन विशाल भाष्यों (टीकाओं) की रचना हुई जो ‘विभाषाशास्त्र’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं बौद्ध धर्म का साहित्य

बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व, समस्त भारतीय साहित्य संस्कृत भाषा में था। जब तक भारत की जनभाषा संस्कृत थी तब तक यह साहित्य सम्पूर्ण समाज को स्वीकार्य था किंतु महात्मा बुद्ध के समय तक संस्कृत भारत की जनभाषा नहीं रह गई थी। वह केवल ग्रंथ-भाषा एवं अभिजात्य वर्ग की भाषा बनकर रह गई थी।

इसलिए बुद्ध ने अपने उपदेश जनभाषा पालि में दिए। यही कारण था कि प्रारंभ में बौद्ध ग्रंथों की रचना केवल पालि भाषा में हुई। इस भाषा का समस्त प्रारम्भिक साहित्य बौद्ध धर्म के अभ्युदय का ही परिणाम है। बौद्ध धर्म के तीन मूल ग्रंथ सामूहिक रूप से ‘त्रिपिटक’ कहलाते हैं।

इनके नाम- (1.) सुत्तपिटक (2.) विनय-पिटक तथा (3.) अभिधम्मपिटक हैं। पिटकों की टीकाएं ‘विभाषाशास्त्र’ कहलाती हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों में- (1.) अंगुतर निकाय (2.) खुदक निकाय तथा (3.) कथावत्थु प्रमुख हैं।

बौद्ध ग्रंथों में बौद्ध धर्म के विभिन्न अंगों, निर्वाण प्राप्ति के साधन, पुनर्जन्म, आत्मज्ञान, आत्मचिन्तन, विश्व की उत्पत्ति, जाति-व्यवस्था की कृत्रितमा आदि विषयों का विवेचन किया गया है। सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेश सूत्रों के रूप में दिए गए हैं। विनय-पिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम हैं। अभिधम्मपिटक में गौतम बुद्ध के उपदेशों की विवेचना है। यह सात अध्यायों में विभक्त है।

इन त्रिपिटकों की अनेक टीकाएँ तथा व्याख्याएँ रची गईं जिनमें बौद्ध धर्म के नैतिकता सम्बन्धी नियमों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गई है। धम्मद नामक ग्रन्थ को बौद्ध धर्म की गीता कहा जा सकता है। इस ग्रंथ में 424 गाथाएँ हैं जिनमें बौद्ध धर्म का सार प्रस्तुत किया गया है। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्म की 574 कथाएं हैं। बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक रचनाएँ लिखीं जो भारतीय साहित्य कोष का अक्षय भण्डार हैं।

महाकवि अश्वघोष ने ‘बुद्धचरितम्’ की रचना की जिसमें गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र की बहुत अच्छी जानकारी दी गई है। ‘महावंश’ अथवा ‘दीपवंश महाकाव्य’ लंका देश का पालि महाकाव्य है। इस ग्रंथ से लंका के इतिहास, धर्म एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है। ‘मिलिंद पन्हो’ नामक बौद्ध ग्रन्थ में बैक्ट्रियन और भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग पर शासन करने वाले हिंद-यूनानी शासक मैनेन्डर और प्रसिद्ध बौद्ध-भिक्षु नागसेन के संवाद का वर्णन किया गया है।

इसमें ईसा की पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारतीय जीवन की झलक देखने को मिलती है। ‘दिव्यावदान’ नामक ग्रंथ में सम्राट अशोक, उसके पुत्र कुणाल तथा अनेक तत्कालीन राजाओं की जानकारी मिलती है। प्रकार यह पुस्तक मौर्यकालीन इतिहास को जानने का अच्छा स्रोत है। ‘मंजूश्रीमलकल्प’ में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त सम्राटों का विवरण लिखा गया है।

साथ ही कुछ अन्य प्राचीन राजवंशों का संक्षिप्त वर्णन प्राप्त होता है। ‘अंगुत्तर निकाय’ में सोलह प्राचीन महाजनपदों का वर्णन मिलता है। ‘ललित विस्तार’ और ‘वैपुल्य सूत्र’ से भी बौद्ध धर्म के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं।

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार के कारण

बौद्ध धर्म का आविर्भाव नेपाल की तराई में हुआ था किन्तु महात्मा बुद्ध और उनके अनुयाइयों के प्रयासों से बौद्ध धर्म बहुत कम समय में भारत के विभिन्न हिस्सों में फैल गया और तिब्बत, चीन, बर्मा, अफगानिस्तान एवं लंका आदि देशों तक चला गया। बौद्ध धर्म की व्यापक लोकप्रियता के अनेक कारण थे। इनमें से कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

(1.) बुद्ध के व्यक्तित्त्व की महानता: बौद्ध धर्म की लोकप्रियता तथा उसके दु्रत प्रसार का सबसे बड़ा कारण महात्मा बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्त्व था। राजा का पुत्र होते हुए भी उन्होंने समस्त सुख-सुविधाओं को त्यागकर कठोर तपस्या की थी इसलिए जनसामान्य उनके सम्मुख श्रद्धा एवं सम्मान से झुक जाता था। बुद्ध के मधुर व्यवहार के कारण उनके विरोधी भी उनके सम्मुख नतमस्तक हो जाते थे। बुद्ध ने कभी किसी धर्म का अनादर नहीं किया अपितु तर्क के आधार पर प्रतिपक्षी धर्म की भ्रमपूर्ण बातों का खण्डन किया। 

(2.) बुद्ध के सिद्धान्तों की सरलता: महात्मा बुद्ध ने मानव जीवन के कमजोर पक्ष को ध्यान में रखते हुए, भिक्षुओं के लिए अपेक्षाकृत कठोर एवं गृहस्थों के लिए अपेक्षाकृत सरल सिद्धांत स्थिर किए। ये नियम ऐसे थे जिन्हें भिक्षु एवं गृहस्थ दोनों ही, बिना किसी कठिनाई के अपना सकते थे। बुद्ध ने अपने दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन करने की बजाए आचरण की  शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने जनता को आत्मा-परमात्मा, मोक्ष जैसे गंभीर विषयों पर नहीं उलझाया और न ही जनता को महंगे यज्ञों, कर्मकाण्डों एवं पशु-बलियों की उलझनों में फंसाया।

(3.) बौद्ध संघ की भूमिका: महात्मा बुद्ध ने जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित बौद्ध संघ का गठन किया जिनमें भिक्षु अपने मन के विचार खुलकर कह सकते थे तथा आचार्य लोग उनकी शंकाओं का समाधान कर सकते थे। बौद्ध संघ के ये भिक्षु वर्षा काल के चार मास तक एक स्थान पर ठहरकर ज्ञान लाभ एवं स्वाध्याय करते थे ताकि शेष आठ माह तक देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करके बुद्ध के उपदेशों को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचा सकें।

जब ये भिक्षु जनसमुदाय के बीच विचरण करते थे तो उनके सदाचरण, सादगी, त्याग एवं उपदेशों का जनसामान्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता था और वे इस नवीन धर्म को आसानी से स्वीकार कर लेते थे।

(4.) देश-काल की अनुकूलता: बौद्ध धर्म का उदय उस समय में हुआ था, जब भारत की जनता वैदिक धर्म के महंगे यज्ञों, अनुष्ठानों एवं कर्मकाण्डों में फंसी हुई थी और वेदांत दर्शन के रहस्यवाद तथा पुजारी-पुरोहितों के कठोर व्यवहार से क्षुब्ध थी। वर्ण व्यवस्था ने समाज में ऊंच-नीच का वातावरण बना रखा था। ऐसे समय में गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म के महंगे अनुष्ठानों का खण्डन करके अहिंसा एवं नैतिकता पर आधारित धर्म का रास्ता दिखाया तथा धर्म के द्वार सभी वर्णों के लिए बराबरी के आधार पर खोल दिए।

जनसामान्य इस सस्ते, सरल एवं सहज सुलभ धर्म को अपनाने के लिए तैयार हो गया। यदि बुद्ध वैदिक युग में हुए होते तो उनके विचारों को शायद ही लोकप्रियता मिलती क्योंकि वैदिक युग में सामाजिक भेदभाव नहीं था तथा धर्म के द्वार समस्त मनुष्यों के लिए बराबरी के स्तर पर खुले हुए थे और उस काल में वैदिक धर्म महंगे यज्ञों, पशुबलियों एवं जटिल अनुष्ठानों से मुक्त था।

(5.) जन-भाषा का प्रयोग: महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों का प्रचार उस युग की जन-भाषा ‘पालि’ में किया था। अतः जनसाधारण उनकी बात को आसानी से समझ लेता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनके उपदेशों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। बौद्ध धर्म का प्रारम्भिक साहित्य भी जन-भाषा में ही लिखा गया था। इस कारण महात्मा बुद्ध के उपदेश शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए और उनके अनुयाइयों की संख्या बढ़ती गई।

(6.) समानता की भावना: महात्मा बुद्ध ने वर्ण भेद से ऊपर उठकर समाज के निम्नतम व्यक्ति को भी समान रूप से संघ में रहने, भिक्षु बनने एवं बुद्धत्व प्राप्त करने का अधिकारी माना। यह बौद्ध धर्म की सफलता का एक मुख्य कारण था। क्योंकि वैदिक व्यवस्था में शूद्र वर्ण के लोगों के लिए मोक्ष की आशा नहीं थी तथा स्त्रियां भी समाज में बराबरी का अधिकार खोती जा रही थीं।

निर्धन लोगों के पास याज्ञिक-अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने के लिए धन उपलब्ध नहीं था। एक तरह से वैदिक धर्म को ब्राह्मणों ने अपनी कारा में बंदी बना लिया था। जब बुद्ध ने धर्म पर से वर्ण, लिंग एवं वित्त का भेद हटा दिया तो लाखों लोग बुद्ध के अनुयाई बन गए। समाज में उपेक्षित चल रहे लोगों को नए धर्म के माध्यम से लोक एवं परलोक दोनों के सुधरने की आशा जाग्रत हो गई थी।

(7.) समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों का संरक्षण: गौतम बुद्ध के राज्यवंश से सम्बन्धित होने के कारण तत्कालीन शाक्य, लिच्छवी, मल्ल, कोलीय, मोरीय आदि गणराज्यों के प्रभावशाली एवं सम्पन्न लोगों ने बौद्ध धर्म के प्रसार में अत्यधिक रुचि ली। अनेक राजाओं, विद्वानों तथा धनपतियों ने बुद्ध के उपदेशों को सहज भाव से अपना लिया तथा बौद्ध धर्म के प्रसार में तन, मन और धन से सहयोग दिया। समाज के प्रभावशाली वर्ग का अनुकरण करके जनसाधारण भी इस धर्म में विश्वास रखने को तैयार हो गया।

बुद्ध की मृत्यु के सैंकड़ों साल बाद सम्राट अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन ने इस धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से सम्राट अशोक द्वारा दिया गया योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

(8.) प्रतिस्पर्द्धी धर्मों का अभाव: बौद्ध धर्म के शीघ्र और व्यापक प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उस युग में उसका विरोध करने वाली लोकप्रिय धार्मिक विचारधाराओं अर्थात् धार्मिक सम्प्रदायों का अभाव होना भी था। वैदिक धर्म में प्रचार की प्रवृत्ति नहीं थी और उस युग में जनसाधारण को वैदिक धर्म से अरुचि होने लगी थी।

जैन मत अधिक व्यापक नहीं हो पाया था और उसके सिद्धान्तों में शारीरिक क्लेश की प्रधानता के कारण भी वह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया। इस कारण बौद्ध भिुक्षओं एवं प्रचारकों को बिना विरोध के अपने धर्म का प्रचार करने में सफलता मिल गई।

(9.) अन्य कारण: बौद्ध धर्म की उदारता एवं समय के साथ होने वाली परिवर्तनशीलता ने भी इस धर्म के प्रसार में योगदान दिया। बौद्ध धर्म की रही-सही कठोरताओं को त्याग कर महान् उदारवादी ‘महायान’ सम्प्रदाय का जन्म हुआ जिसने बौद्ध धर्म को अत्यधिक लोकप्रिय बनने का मार्ग प्रशस्त किया। तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और साहित्य की शिक्षा दी जाने लगी।

इससे बौद्ध धर्म को नैतिक आधार प्राप्त हो गया और बौद्ध धर्म को जानने वाले लोग संस्कृत के पण्डितों के समान ही विद्वान समझे जाने लगे। विदेशी आक्रांताओं एवं चीनी यात्रियों ने बौद्ध धर्म के अध्ययन एवं प्रसार में अत्यधिक रुचि ली इस कारण बौद्ध धर्म, भारत भूमि तक सीमित न रहकर विश्व स्तरीय धर्म-बन गया।

बौद्ध धर्म को राज्याश्रय

महात्मा बुद्ध के जीवन काल में कोसल नरेश प्रसेनजित, मगध सम्राट बिम्बिसार और अजातशत्रु, वैशाली की सुप्रसिद्ध गणिका आम्रपाली, राजगृह के नगरश्रेष्ठि अनाथपिण्डक, बुद्ध के पिता शुद्धोधन और पुत्र राहुल ने बुद्ध का शिष्यत्व ग्रहण किया तथा उनके बताए धर्म को स्वीकार कर लिया। इससे बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्राप्त होने लगा।

मौर्य सम्राट अशोक (ई.पू.268- ई.पू.232) ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध-संगीति बुलवाई। इस संगीति में बौद्ध-धर्म ग्रन्थों में संशोधन किया गया। बौद्ध-संघ में जो दोष आ गए थे उनको दूर करने का प्रयत्न किया गया। इन संशोधनों तथा सुधारों से बौद्ध-धर्म में जो शिथिलता आ रही थी वह दूर हो गई। अशोक ने देश के विभिन्न भागों में अनेक मठों का निर्माण करवाया और उनकी सहायता की। इन मठों में बहुत बड़ी संख्या में भिक्षु-भिक्षुणी तथा धर्मोपदेशक निवास करते थे जो सदैव धर्म के चिन्तन तथा प्रचार में संलग्न रहा करते थे। ऐसी सुव्यवस्था में धर्म के प्रचार का क्रम तेजी से चलता रहा।

बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने धर्म-विभाग की स्थापना की। इसके प्रधान पदाधिकारी ‘धर्म-महामात्र’ कहलाते थे। इन धर्म-महामात्रों को यह आदेश दिया गया कि वे प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का अधिक से अधिक प्रयत्न करें। धर्म-महामात्र घूम-घूम कर धर्म का प्रचार करते थे। अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए धम्म के सिद्धान्तों तथा आदर्शों को पर्वतों की चट्टानों, पत्थरों के स्तम्भों तथा पर्वतों की गुफाओं में लिखवाकर उन्हें सबके लिए तथा सदैव के लिए सुलभ बना दिया। ये अभिलेख जन-साधारण की भाषा में लिखवाए गए ताकि समस्त प्रजा उन्हें समझ सके और उनका पालन कर सके।

अशोक द्वारा किये गए प्रयत्नों के फलस्वरूप उसके शासनकाल में बौद्ध-धर्म को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो गया। भण्डारकर ने इस तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘इस काल में बौद्ध-धर्म को इतना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया कि अन्य समस्त धर्म पृष्ठभूमि में चले गए….. परन्तु इसका सर्वाधिक श्रेय तीसरी शताब्दी ई.पू. के बौद्ध सम्राट, चक्रवर्ती धर्मराज को मिलना चाहिए।’

ई.पू.150-ई.पू.90 में काबुल से मथुरा तक मिनैण्डर(मिलिंद) का शासन था। उसने स्यालकोट, पंजाब तथा अन्य सीमांत प्रदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। कहा जाता है कि उसकी राजधारी शाकल में केवल बौद्ध-भिक्षु तथा विद्वानों का निवास ही संभव था। पाली ग्रंथ ‘मिलिंद पन्ह’ (मिलिंद प्रश्न) के अनुसार उसने नागसेन नामक बौद्ध आचार्य से दीक्षा लेकर धर्म और दर्शन पर बहुत से प्रश्न किए।

मिलिंद के सिक्के बौद्ध धर्म में उसकी आस्था को प्रकट करते हैं। उसके अनेक सिक्कों पर धर्मचक्र बना हुआ है तथा उनकी पदवी धार्मिक अंकित है। जब मिलिंद की मृत्यु हुई तब अनेक नगरों ने उसकी अस्थियों (फूलों) को लेना चाहा, जैसा बुद्ध की मृत्यु पर हुआ था। स्यामी अनुश्रुति के अनुसार मिलिंद ने ‘अर्हत्’ पद पाया।

कुषाण सम्राट कनिष्क (ई.127-150), बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयाई था। उसे बौद्ध ग्रंथों में दूसरा अशोक कहकर सम्मानित किया गया है। उसने चौथी बौद्ध संगीति बुलाई तथा मध्य-एशिया, तिब्बत, चीन एवं जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया। कनिष्क ने पुरुषपुर तथा अनेक स्थानों पर स्तूप एवं विहार आदि बनवाए जिनकी चीनी चात्रियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। सर्वप्रथम कनिष्क के सिक्कों पर ही बुद्ध की प्रतिमा अंकित हुई थी। इसके बाद महायान सम्प्रदाय में बौद्धों की मूर्तियाँ बननी आरम्भ हुईं और उनकी पूजा शुरु हुई।

कनिष्क ने यूनानी-बौद्ध कला का प्रतिनिधित्व करने वाली गांधार कला तथा हिन्दू कला का प्रतिनिधित्व वाली मथुरा कला को बराबर प्रश्रय दिया। कनिष्क ने बौद्ध तथा फारसी दोनों धर्मों की विशेषताओं का अपना लिया था किन्तु उसका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर अधिक था। कुषाण साम्राज्य की विभिन्न पुस्तकों में वर्णित बौद्ध शिक्षाओं एवं प्रार्थना शैली के माध्यम से कनिष्क के बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव का पता चलता है।

बौद्ध स्थापत्य को कनिष्क का सबसे बड़ा योगदान पुष्पपुर (पेशावर) का बौद्ध स्तूप था। इस स्तूप का व्यास 286 फुट था। चीनी-यात्री ह्वेनत्सांग के अनुसार इस स्तूप की ऊंचाई 600 से 700 फुट थी तथा यह बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ था। प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु अश्वघोष कनिष्क का धार्मिक परामर्शदाता था।

कनिष्क काल की बौद्ध मुद्राएं अन्य मुद्राओं की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत हैं। कुछ मुद्राओं में कनिष्क को आगे तथा बुद्ध को यूनानी शैली में पीछे खड़े हुए दिखाया गया है। कुछ मुद्राओं में शाक्यमुनि बुद्ध एवं मैत्रेय को भी दिखाया गया है। कनिष्क के सभी सिक्कों की तरह इनके आकार एवं रूपांकन मोटे-मोटे, खुरदरे तथा अनुपात बिगड़े हुए थे। बुद्ध का अंकन यूनानी शैली में किया गया है। बुद्ध की आकृति थोड़ी बिगड़ी हुई है। उनके कान बड़े आकार के हैं तथा दोनों पैर कनिष्क की भांति फैले हुए हैं।

कनिष्क के बौद्ध सिक्के तीन प्रकार के हैं। कनिष्क के सिक्कों वाली बुद्ध की आकृति अनेक कांस्य प्रतिमाओं में देखने को मिलती है। तीसरी-चौथी शताब्दी की ये प्रतिमाएं गांधार शैली की हैं। इस प्रतिमा में बुद्ध ने यूनानी शैली में अपने वस्त्र का बायां कोना हाथ में पकड़ा हुआ है तथा दायां हाथ अभय मुद्रा में उठा रखा है।

कुषाण काल के बुद्ध अंकन वाले मात्र छः स्वर्ण सिक्के मिले हैं, इनमें से एक सिक्का, प्राचीन आभूषण में जड़ा हुआ था, जिसमें कनिष्क एवं बुद्ध अंकित हैं तथा हृदयाकार माणियों के गोले से सुसज्जित हैं। कनिष्क के ऐसे सभी सिक्के स्वर्ण में ढले हुए हैं एवं दो भिन्न मूल्यवर्गों में मिले हैं। एक स्वर्णमुद्रा लगभग 8 ग्राम की है। मोटे तौर पर यह रोमन ऑरस से मेल खाता है। एक स्वर्णमुद्रा 2 ग्राम की है जो लगभग एक ओबोल के बराबर है।

इन सिक्कों में बुद्ध को भिक्षुकों जैसे चोगे अन्तर्वसक, उत्तरसंग पहने हुए तथा ओवरकोट जैसी सन्घाटी पहने हुए दिखाया गया है। उनके अत्यधिक बड़े एवं लम्बे कान बुद्ध के किसी गुण या किसी शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। उनके शिखास्थान पर केशों का जूड़ा बना हुआ है। ऐसा जूड़ा गांधार शैली के बहुत से शिल्पों में देखने को मिलता है।

इस प्रकार कह सकते हैं कि, बुद्ध के सिक्कों में उनका रूप उच्च रूप से प्रतीकात्मक बनाया गया है, जो कि पहले की गांधार शिल्पाकृतियों से अलग है। गांधार शिल्प के बुद्ध अपेक्षाकृत अधिक प्राकृतिक दिखाई देते थे। कई मुद्राओं में बुद्ध की मूंछें भी दिखाई गई हैं। इनके दाएं हाथ की हथेली पर चक्र का चिह्न है एवं भवों के बीच उर्ण (तिलक) है।

बुद्ध द्वारा धारण किया गया चोगा, गांधार शैली से अधिक मेल खाता है, बजाए मथुरा शैली से। कनिष्क कालीन मूर्तियों, शिलालेखों, स्तूपों एवं सिक्कों से सिद्ध होता है कि कनिष्क बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा संरक्षक था।

गुप्त सम्राट यद्यपि भागवत् धर्म के महान् संरक्षक थे किंतु उन्होंने भी बौद्ध धर्म को अपने राज्य में पूरी स्वतंत्रता प्रदान की। गुप्त काल में बुद्ध की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनीं तथा बोधिसत्व की पूजा का विशेष प्रचार हुआ। गुप्त सम्राट पुरुगुप्त ने भागवत् धर्म को त्यागकर बौद्ध-धर्म ग्रहण किया इस प्रकार बौद्ध धर्म को पुनः राज्याश्रय प्राप्त हो गया।

सातवीं शताब्दी में उत्तरी भारत के बहुत बड़े भूभाग के राजा हर्षवर्धन ने बौद्ध धर्म को विशेष प्रोत्साहन दिया। प्रौढ़ावस्था में उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उसने चीनी बौद्ध-भिक्षु ह्वेनत्सांग के प्रवचनों के आयोजन के लिए ई.643 में कन्नौज में बहुत बड़ा धर्म सम्मेलन किया जिसमें मनुष्य की ऊँचाई की स्वर्ण से निर्मित बुद्ध प्रतिमा स्थापित की गई।

हर्ष द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु धर्म सभायें आयोजित करना, स्तूप व विहारों का निर्माण करना तथा नालंदा विश्वविद्यालय को दान देना, काश्मीर नरेश से महात्मा बुद्ध के दांत प्राप्त करना आदि तथ्य हर्ष के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की ओर संकेत करते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

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बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार बड़ी तेजी से हुआ। इसका सबसे बड़ा कारण था इसकी सरलता एवं सहजता। कोई भी व्यक्ति बौद्ध धर्म को अपना सकता था। इस धर्म का पालन करने में किसी प्रकार का आर्थिक अथवा शारीरिक कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं थी।

बौद्ध धर्म लोक भाषा में अपनी बात कहता था और बौद्ध भिक्षु बड़ी सरलता से लोगों में घुल-मिल जाते थे। इसमें जाति-पांति का बंधन नहीं था, छुआछूत और ऊंच-नीच का प्रावधान नहीं था। इसलिए नेपाल की तराई और बिहार में जन्मा बौद्ध धर्म शीघ्र ही भारत के विभिन्न अंचलों में फैल गया। भारत के साथ-साथ बौद्ध धर्म का विदेशों में भी तेजी से प्रसार हुआ।

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक भिक्षुओं, राजाओं एवं कतिपय विदेशी यात्रियों के प्रयत्नों से बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, बर्मा, अफगानिस्तान, यूनान आदि देशों तथा दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीपों तथा फैल गया। भारत एवं चीन के मार्ग पर स्थित खोतान प्रदेश में बौद्ध धर्म का खूब प्रचार हुआ। बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रचार का कार्य मगध के मौर्य सम्राट अशोक के काल (ई.पू.268-ई.पू.232) में आरम्भ हुआ। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका, बर्मा, मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशियाई देशों में अपने प्रचारक भेजे। अशोक के शिलालेखों से पता चलता है कि बौद्ध प्रचारकों ने सीरिया, मेसोपोटामिया तथा यूनान में मेसीडोनिया, एरिच तथा कोरिन्थ आदि राज्यों में जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया। अशोक ने धम्म का दूर-दूर तक प्रचार करने के लिए धर्म विजय का आयोजन किया। उसने भारत के भिन्न-भिन्न भागों तथा विदेशों में अपने धर्म के प्रचार का प्रयत्न किया। उसने दूरस्थ विदेशी राज्यों के साथ मैत्री की और वहाँ पर मनुष्यों तथा पशुओं की चिकित्सा का प्रबंध किया। उसने इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने तथा हिंसा को रोकने के लिए उपदेशक भेजे। उसने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा को धर्म का प्रचार करने के लिए सिंहलद्वीप अर्थात् श्रीलंका भेजा।

अशोक के धर्म प्रचारक बड़े ही उत्साही तथा निर्भीक थे। उन्होंने मार्ग की कठिनाईयों की चिन्ता न कर श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत, जापान, कोरिया तथा पूर्वी द्वीप-समूहों में धर्म का प्रचार किया।

चीन में सम्राट मिंगती के समय बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रसार हुआ। इस काल में बड़ी संख्या में बौद्ध ग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद हुया। सर्वप्रथम कश्यप मातंग ने चीनी भाषा में बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया। कुछ चीनी यात्रियों ने भारत में आकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया तथा कुछ ग्रंथों को चीन ले जाकर उनका चीनी भाषा में अनुवाद किया। इन ग्रंथों के कारण बौद्ध धर्म का चीन तथा तिब्बत में प्रचार हो गया। 

प्रारम्भिक ईस्वी शताब्दियों में कुमार जीव, गुणवर्मन, बुद्धयश, पुण्यत्रात, गुणभद्र आदि अनेक आचार्य एवं भिक्षु चीन गए। महायान शाखा ने बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कुषाण सम्राट कनिष्क ने दूसरी शताब्दी ईस्वी में चौथी बौद्ध संगीति बुलाई तथा मध्य एशिया, तिब्बत, चीन और जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया।

चौथी-पांचवी शताब्दी ईस्वी में बौद्ध धर्म चीन से जापान जा पहुँचा। लगभग इसी काल में जावा, सुमात्रा एवं कम्बोडिया में भी बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। चीन से बौद्ध धर्म कोरिया, मंगोलिया, फारमोसा तथा जापान आदि द्वीपों में फैला। छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी में बर्बर हूणों के क्रूर हमलों तथा ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईस्वी में मुसलमानों द्वारा भारत में शासन स्थापित किए जाने के बाद बौद्ध धर्म अपनी जन्मभूमि भारत से लगभग विलुप्त हो गया किंतु विदेशों में यह धर्म आज भी पूरे उत्साह के साथ जीवित है।

वर्तमान समय में (वर्ष 2010 के आंकड़ों के अनुसार) ईसाई धर्म, इस्लाम एवं हिन्दू-धर्म के बाद बौद्ध धर्म विश्व का चौथा सबसे बड़ा धर्म है। विश्व के लगभग 52 करोड़ लोग अर्थात् विश्व की लगभग 7 प्रतिशत जनसंख्या बौद्ध धर्म की अनुयाई है। विश्व के अधिकांश देशों में बौद्ध अनुयायी रहते हैं। चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, तिब्बत, लाओस, हांगकांग, ताइवान, मकाउ, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरिया सहित कुल 18 देशों में बौद्ध धर्म ‘प्रमुख धर्म’ है। भारत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि देशों में भी लाखों बौद्ध अनुयायी रहते हैं।

बौद्ध धर्म का भारत से विलोपन

भारत में बौद्ध धर्म का जिस तेज गति से प्रसार हुआ, उसी तेज गति से वह भारत से विलुप्त भी हो गया। बारहवीं शताब्दी के बाद भारत में इसके अनुयाइयों की संख्या नाम मात्र की रह गई। भारत में बौद्ध धर्म की अवनति के कई कारण थे-

(1.) बौद्ध धर्म की कमजोरियाँ

बौद्ध धर्म के भीतर कुछ ऐसी कमजोरियां थीं जो उसे पतन के मार्ग पर जाने से नहीं रोक सकती थीं। बुद्ध ने लोगों को मोक्ष प्राप्ति का एक नवीन मार्ग बताया था परन्तु वे अपने शिष्यों के लिए पृथक सामाजिक व्यवस्था, सामान्य रीति-रिवाज एवं आचार-विचार नहीं बना पाए।

इसलिए बौद्ध गृहस्थ सामान्यतः वैदिक संस्कारों का पालन करते रहे। जन्म, विवाह तथा मृत्यु आदि अवसरों पर उन्हें हिन्दू रीति-रिवाजों का ही पालन करना पड़ता था। इस कारण बौद्ध धर्म के गृहस्थ अनुयाई, हिन्दू-धर्म से अधिक दूर नहीं जा पाए और समय आने पर उन्हें पुनः हिन्दू-धर्म अपनाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई।

(2.) बौद्ध धर्म में आडम्बरों का प्रचलन

वैदिक धर्म के जिन आडम्बरों और कर्मकाण्डों की जटिलताओं के विरोध में महात्मा बुद्ध ने नैतिक जीवन पर आधारित सीधा-सादा धर्म चलाया था, वह बुद्ध के निर्वाण के बाद स्वयं अनेक प्रकार के आडम्बरों और जटिलताओं से घिर गया। बौद्ध आचार्यों ने भिक्षुओं के नियमों को पहले से भी अधिक कठोर बना दिया जिससे उनमें इस धर्म के प्रति अरुचि उत्पन्न हो गई।

महात्मा बुद्ध को ईश्वर का अवतार मानकर उनकी मूर्तियाँ बनने लगीं तथा उन मूर्तियों की विविध पद्धतियों से पूजा होने लगी। बौद्ध तंत्र भी विकसित हो गया तथा बौद्ध धर्म के भीतर वाममार्गी सम्प्रदाय भी खड़ा हो गया। इससे बौद्ध धर्म अपना मूल स्वरूप खोकर हिन्दू-धर्म के अधिक निकट आ गया।

(3.)  बौद्ध-भिक्षुओं का नैतिक पतन

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का एक मुख्य कारण भिक्षुओं का त्यागमय जीवन और नैतिक आचरण था परन्तु मौर्यों के शासन काल में राज्य की ओर से बौद्ध-भिक्षुओं के लिए विशाल एवं भव्य मठ और विहार बनवाए गए और उनके व्यय के लिए राजकीय कोष से धन दिया गया। मठों के आरामदायक जीवन ने भिक्षुओं के त्यागमय जीवन को विलासी बना दिया। इससे उनमें अनुशासनहीनता आने लगी और कदाचार व्याप्त होने लगा। वज्रयान सम्प्रदाय के उदय के बाद बौद्ध मठ एवं विहार व्यभिचार के केन्द्र बन गए। जनसामान्य की दृष्टि में भिक्षु एवं मठ श्रद्धा के पात्र नहीं रहे।

(4.) बौद्ध धर्म में विभाजन

बुद्ध की मृत्यु के बाद से ही बौद्ध-भिक्षुओं में आन्तरिक मतभेद उत्पन हो गए और वे हीनयान, महायान, स्थविर और महासांघिक अदि अनेक सम्प्रदायों में बंट गए। अशोक ने बौद्ध धर्म की  एकता बनाए रखने का अथक प्रयास किया और उसे कुछ सफलता भी मिली परन्तु बाद में इन विभिन्न शाखाओं में जबरदस्त संघर्ष आरम्भ हो गया और वे एक-दूसरे की निन्दा और आलोचना करने लगे। उनके आपसी संघर्ष ने बौद्ध धर्म की लोकप्रियता को भारी क्षति पहुँचाई।

(5.) बौद्ध संघ में स्त्रियों का प्रवेश

बौद्ध धर्म की अवनति का एक मुख्य कारण संघ में स्त्रियों का प्रवेश था। भगवान बुद्ध ने मूल रूप में बौद्ध संघ में स्त्रियों को प्रवेश नहीं दिया था किंतु अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने से उन्होंने स्त्रियों को संघ में प्रवेश देना स्वीकार कर लिया। इस स्वीकृति के बाद बुद्ध ने आनन्द से कहा कि अब यह धर्म 500 वर्षों से अधिक नहीं टिकेगा। बुद्ध की भविष्यवाणी सच सिद्ध हुई।

भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के एक साथ रहने से बौद्ध विहारों एवं मठों में आत्म-संयम भंग हो गया और वहाँ व्यभिचार तथा विलासिता पनप गई। इससे उनकी प्रतिष्ठा गिर गई। वज्रयान सम्प्रदाय ने बौद्ध धर्म को वाम मार्ग की ओर धकेल कर बौद्ध धर्म को बड़ा धक्का पहुँचाया।

(6.) राज्याश्रय का अभाव

अशोक एवं उसके बाद के मौर्य शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान करके ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। देश भर में बौद्ध विहारों एवं मठों की स्थापना हुई जिन्हें राजकीय अनुदान दिया जाता था। इस कारण लाखों नवयुवक, सैनिक कर्म त्यागकर भिक्खु बन गए और बौद्ध विहारों एवं मठों में आराम का जीवन जीते हुए चैन की रोटी खाने लगे।

इस कारण मौर्य शासकों की सेनाएं कमजोर हो गईं एवं शत्रुओं ने स्थान-स्थान पर उन्हें परास्त कर दिया जिससे मौर्य साम्राज्य नष्ट हो गया। मौर्यों की ऐसी दुरावस्था देखकर भारत के अधिकांश राजाओं ने बौद्ध धर्म को संरक्षण देना बंद कर दिया। मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग, कण्व और सातवाहन नरेशों ने पुनः ब्राह्मण धर्म को संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया।

गुप्त शासकों ने भी वैदिक यज्ञों को पुनः प्रतिष्ठा प्रदान की तथा भागवत् धर्म को अपनाया। दक्षिण भारत में भी चालुक्य नरेशों ने हिन्दू-धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। अतः भारत की जनता पुनः हिन्दू-धर्म की ओर अग्रसर हुई।

(7.) बौद्ध धर्म की कट्टरता

बौद्ध धर्म आरम्भ से ही अन्य धर्मों के विरुद्ध असहिष्णुता का भाव रखता था। इस कारण दूसरे धर्म भी बौद्ध धर्म के विरुद्ध कट्टरता का भाव रखने लगे। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि प्रत्येक युग में जनसामान्य, विभिन्न धर्मों की अच्छी बातों को स्वीकार करके उन्हें आदर देता है किंतु बौद्ध संघ को यह स्वीकार्य नहीं था कि दूसरे धर्म की अच्छी बातों को आदर दिया जाए।

अशोक ने अपने बारहवें शिलालेख में सब धर्मों के सार की वृद्धि की कामना की है तथा परामर्श दिया है- ‘मनुष्य को दूसरे के भी धर्म को सुनना चाहिए। जो मनुष्य अपने धर्म को पूजता है और अन्य धर्मों की निन्दा करता है वह अपने धर्म को बड़ी क्षति पहुंचाता है। इसलिए लोगों में वाक्-संयम होना चाहिए अर्थात् संभल कर बोलना चाहिए।’

अशोक के इस कथन से अनुमान किया जा सकता है कि अशोक भी बौद्ध धर्म की असहिष्णुता से क्षुब्ध रहा होगा।

शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग (ई.पू.185-ई.पू.149) ने मौर्य-वंश का अंत करके शुंग-वंश की स्थापना की तथा बौद्ध-धर्म के स्थान पर भागवत् धर्म को संरक्षण दिया। ‘दिव्यावदान’ में पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का परम-शत्रु बताया गया है। जबकि उसने बौद्धों को कोई क्षति नहीं पहुँचाई। उसके शासन काल में साँची के स्तूप के कलात्मक द्वार तथा भरहुत स्तूप के अलंकृत भागों का निर्माण हुआ।

अपनी कट्टरता के चलते बौद्ध धर्म ने एक तरफ जैन-धर्म को अपना प्रतिद्वंद्वी बना लिया तो दूसरी तरफ भागवत् धर्म के विरुद्ध भी मोर्चा खोल लिया। इस प्रकार वह दोहरे संघर्ष में फंसकर अपनी लोकप्रियता गंवा बैठा।

(8.) भागवत् धर्म का उदय

मौर्य वंश के पतन के बाद वैदिक धर्म के विद्वानों ने अपने धर्म में निहित दोषों को दूर करके उसे सरल रूप में पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। शुंग, कण्व, भारशिव, नाग, गुप्त, वाकाटक और चालुक्य नरेशों ने वैदिक यज्ञों का आयोजन करके हिन्दू-धर्म की उन्नति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया।

इन शासकों ने शिव, विष्णु, कार्तिकेय आदि प्राचीन हिन्दू देवताओं की उपासना की और उनके भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया। बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव रखने वाला हर्षवर्धन भी ब्राह्मण धर्म के प्रति श्रद्धा रखता था। इससे हिन्दू-धर्म को राष्ट्रीय स्तर पर पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। गुप्तों ने संस्कृत भाषा को राजकीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया जिससे वैदिक साहित्य की खोई हुई प्रतिष्ठा भी पुनः स्थापित हो गई।

बुद्ध की मूर्तियों की तर्ज पर देश में विष्णु एवं उनके अवतारों की मूर्तियों का बहुत बड़ी संख्या में निर्माण हुआ तथा विष्णु एवं शिव के भव्य मंदिर बने जिनके कारण प्रजा तेजी से भागवत् धर्म की ओर आकर्षित हुई और बौद्ध धर्म अवनति को प्राप्त हो गया।

(9.) विदेशी आक्रमण

गुप्तों के बाद भारत पर हूणों के आक्रमण हुए। वे बौद्धों के शत्रु थे। हूणों के नेता मिहिरकुल ने हजारों की संख्या में बौद्ध मठों एवं विहारों को नष्ट किया तथा लाखों बौद्ध-भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। इससे पंजाब, राजस्थान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्तों में बौद्ध धर्म का प्रभाव क्षीण हो गया। इन प्रदेशों के बचे हुए बौद्ध-भिक्षु तिब्बत तथा चीन की तरफ भाग गए।

मध्ययुग के आरम्भ में मुस्लिम आक्रांताओं ने बंगाल और बिहार में बौद्धों का कत्लेआम किया। उनके मठों और विहारों को भूमिसात किया और नालन्दा विहार आदि शिक्षण संस्थाओं को जला दिया। इससे इन प्रदेशों के बौद्ध-भिक्षु नष्ट हो गए तथा बौद्ध गृहस्थों ने पुनः हिन्दू-धर्म अपना लिया।

(10.) राजपूत शासकों का उदय

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद देश में प्राचीन क्षत्रियों के स्थान पर राजपूत शासकों का उदय हुआ और उन्होंने पूरे देश में छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों की स्थापना की। राजपूत लोग अपनी शूर-वीरता के लिए प्रख्यात थे और युद्ध तथा सैनिक सेवा उनका मुख्य व्यवसाय था। ऐसे लोगों को अहिंसा से कोई लगाव नहीं था। उन्होंने हिन्दू-धर्म को प्रोत्साहन दिया। राज्याश्रय न मिलने से बौद्ध धर्म का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।

(11.)  शंकराचार्य के प्रयास

आठवीं और नौवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य तथा उनके शिष्य कुमारिल भट्ट ने, पतन की तरफ बढ़ रहे बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्ति की ओर धकेलने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने स्थान-स्थान पर बौद्ध विद्वानों को सार्वजनिक रूप से आयोजित शास्त्रार्थों में परास्त किया तथा जन-सामान्य के समक्ष हिन्दू-धर्म की श्रेष्ठता एवं अजेयता का प्रदर्शन किया।

शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में स्थित प्राचीन नगरों में अद्वैत परम्परा के मठों की स्थापना की। शंकराचार्य के प्रयत्नों से बौद्ध निस्तेज हो गए और सारे देश में हिन्दू-धर्म व्याप्त हो गया। शंकराचार्य ने भगवत्गीता की टीका लिखकर उसे हिन्दुओं का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ बना दिया जिने करोड़ों लोगों को पुनः हिन्दू-धर्म अपनाने की प्रेरणा दी।

(12.)  बौद्ध धर्म के भीतर वाममार्गी पन्थों का जन्म

बौद्ध धर्म का पतन होने पर छठी शताब्दी ईसवी में महायान सम्प्रदाय से वज्रयान और मन्त्रयान शाखाओं का जन्म हुआ। वज्रयानी, बुद्ध को वज्रगुरु तथा अलौकिक सिद्धि सम्पन्न देवता मानते थे। इन सिद्धियों को पाने के लिए अनेक गुह्य साधनाएँ की जाती थीं।

वाममार्गी बौद्धों के प्रभाव से शैव मत में पाशुपत, कापालिक (अघोरी), वैष्णव मत में गोपी-लीला, तन्त्र-सम्प्रदाय में आनन्द भैरवी की पूजा आदि पन्थ विकसित हुए। इन पन्थों का उद्देश्य मन्त्रों तथा अन्य साधनों द्वारा  विभिन्न प्रकार की ‘सिद्धियाँ’ प्राप्त करना था। जनसामान्य इन वाममार्गियों से भय खाता था तथा इनसे दूर रहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध धर्म की देन

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बौद्ध धर्म की देन

यद्यपि आज भारत भूमि में बौद्ध धर्म का प्रभाव नगण्य है तथापित भारतीय संस्कृति को बौद्ध धर्म की देन कम नहीं है। बौद्ध धर्म ने भारतीय जनता को सहज जीवन जीने एवं बाह्याडम्बरों से दूर रहने का मार्ग दिखाया।

भारतीय संस्कति को बौद्ध धर्म की देन

प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उदय किसी महान् सांस्कृतिक क्रान्ति से कम नहीं था। भारतीय धर्म, दर्शन, नीतिशास्त्र, राजनीति, साहित्य, कला, शासन-नीति, विदेश नीति आदि विभिन्न क्षेत्रों पर बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण योगदान इस प्रकार है-

(1.) धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में योगदान

बौद्ध धर्म सरल एवं आडम्बरहीन था। उसमें निरर्थक एवं खर्चीले विधि-विधानों, जटिल नियमों, दीर्घकालिक अनुष्ठानों तथा यज्ञ के लिए आवश्यक पुरोहितों के लिए कोई स्थान नहीं था। इस कारण जनसाधारण तेजी से बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुआ। बौद्ध धर्म की लोकप्रियता ने वैदिक धर्म के अस्तित्त्व के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया। इस कारण वैदिक धर्म ने भी अपने भीतर सुधार की प्रक्रिया आरम्भ की।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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यज्ञ, बलि, कर्मकाण्ड आदि आडम्बरों के स्थान पर हिन्दू-धर्म में मानवता, स्नेह, सौहार्द पर आधारित भागवत् धर्म का उदय हुआ। बौद्ध धर्म की महायान शाखा ने भारत में मूर्ति-पूजा को अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। भागवत् धर्म ने भी विष्णु-पूजा की प्रतिष्ठा के लिए मूर्ति निर्माण एवं मंदिरों का अवलम्बन लिया। बौद्धों की मठ प्रणाली ने भी हिन्दू-धर्म को प्रभावित किया। इससे पूर्व हिन्दू-धर्म में मठ प्रणाली नहीं थी। जगद्गुरु शंकराचार्य ने उतर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं में अपने मठों की स्थापना की। बौद्ध धर्म ने प्रचार-प्रसार की जो शैली अपनाई उसने भी हिन्दू-धर्म को प्रभावित किया। इससे पूर्व हिन्दू-धर्म प्रचार-प्रसार में विश्वास नहीं रखता था। बौद्ध धर्म ने अनात्मवाद, अनीश्वरवाद, कार्य-कारण सम्बन्ध, कर्मवाद एवं पुनर्जन्मवाद, आन्तरिक शुद्धि तथा निर्वाण के दार्शनिक विचारों से भारतीय चिन्तन प्रणाली को नवीनता प्रदान की। असंग, नागार्जुन, वसुबन्धु, धर्मकीर्ति आदि बौद्ध आचार्यों ने बौद्ध दर्शन को नई ऊँचाइयाँ दीं। बौद्धों का शून्यवाद तथा माध्यमिक दर्शन, भारत में ही नहीं अपितु वैश्विक दर्शन साहित्य में भी गौरवपूर्ण स्थान रखता है। बौद्धों का दार्शनिक साहित्य विचारोत्तेजक था। बौद्धों के दार्शनिक विचारों का खण्डन करने के लिए भागवत धर्म में अनेक दार्शनिक पैदा हुए जिनमें शंकराचार्य एवं कुमारिल भट्ट प्रमुख थे।

इन दोनों के योगदान से भारतीय दर्शन में नवीन चेतना जागृत हुई।

(2.) साहित्य के क्षेत्र में योगदान

बौद्ध धर्म ने भारतीय साहित्य को काफी प्रभावित किया। बौद्ध धर्म के विद्वानों द्वारा पालि और संस्कृत भाषा में बौद्ध दर्शन और धर्म ग्रंथों के रूप में प्रभूत साहित्य की रचना की गई। महात्मा बुद्ध के जीवन को आधार बनाकर संस्कृत एवं जन भाषाओं में विपुल साहित्य लिखा गया। काव्य एवं नीति सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ लिखे गए। इन सबने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया और संस्कृत तथा लोक भाषाओं के विकास में सहयोग दिया।

बौद्ध विद्वान दिग्नाग ने भारतीय तर्क शास्त्र का विकास किया। उन्होंने ‘न्याय प्रवेश’ और ‘आलम्बन परीक्षा’ नामक ग्रन्थ लिखे। न्याय वैशेषिक पर इसकी गहरी छाप पड़ी। बौद्ध महाकाव्य ‘बुद्ध चरित’ और नाटक ‘सारिपुत्र प्रकरण’ बौद्धों द्वारा ही लिखे गए। ‘मिलिन्दपन्हो’ तथा ‘महावस्तु’ नामक  ग्रन्थों में प्रचुर मात्रा में ऐतिहासिक सामग्री मिलती है। ‘मंजूश्री मूलकल्प’ तथा ‘दिव्यवदान’ नामक बौद्ध ग्रन्थों से भी भारत के प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

(3.) कला के क्षेत्र में योगदान

भारतीय शिल्प कला, मूर्ति कला एवं चित्रकला का जो निखरा हुआ स्वरूप दिखाई देता है, वह बौद्ध धर्म की ही देन है। गुहा मन्दिरों का निर्माण, मूर्ति कला की गान्धार एवं माथुरी शैली तथा चित्रकला की अजन्ता शैली बौद्ध धर्म के प्रभाव से ही विकसित हुईं। मौर्य सम्राट अशोक ने देश भर में 84 हजार स्तूपों का निर्माण करवाया जिनमें से कुछ स्तूप आज भी मौजूद हैं तथा भारतीय स्थापत्य कला की अनुपम धरोहर हैं।

साँची का स्तूप, बौद्ध स्थापत्य कला का श्रेष्ठ नमूना है। अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों में उच्चकोटि की शिल्प-कला मौजूद है। साँची, भरहुत और अमरावती में बौद्धों द्वारा उच्चकोटि की कलाकृतियों का निर्माण किया गया। महायान सम्प्रदाय के भिक्षुओं द्वारा गान्धार प्रदेश में महात्मा बुद्ध की प्रतिमाओं का बड़ी संख्या में निर्माण किया गया। इसलिए उस प्रदेश की कला को गान्धार शैली का नाम दिया गया।

गान्धार कला ने भारतीय मूर्तिकला को नवीन प्रेरणा दी जिसके फलस्वरूप मथुरा, नालन्दा और सारनाथ में मूर्ति कला की अलग-अलग शैलियाँ विकसित हुईं। अजन्ता की विश्वप्रसिद्ध गुफाओं में चित्रकला की विशिष्ट शैली विकसित हुई। इन चित्रों का मुख्य उद्देश्य महात्मा बुद्ध के जीवन प्रसंगों तथा बोधिसत्वों का जीवन्त चित्रण करना था। बादामी, बाध, सितनवासल तथा बराबर की गुफाओं की बौद्ध चित्रकला अद्वितीय है।

(4.) शासन नीति के क्षेत्र में बौद्ध धर्म की देन

बौद्ध धर्म ने भारत की शासन नीति को गहराई तक प्रभावित किया है। बौद्ध संघों की स्थापना जनतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर की गई थी जिसमें प्रत्येक भिक्षु को अपने विचार एवं शंका व्यक्त करने का अधिकार था। वहाँ अन्धश्रद्धा को बढ़ावा नहीं दिया गया था। स्वतंत्र भारत की शासन पद्धति में इन्हीं जनतान्त्रिक मूल्यों को ग्रहण किया गया है। शासन की प्रत्येक संस्था में सदस्यों को बराबरी के आधार पर अपने विचार रखने का अधिकार दिया गया है।

शासन में समानता, सहिष्णुता और भातृत्व की भावना साफ देखी जा सकती है। बौद्ध धर्म ने उपनिषदों के अहिंसा के विचार को प्रमुखता से अपनाया तथा अहिंसा परमोधर्मः का उद्घोष किया। कलिंग युद्ध के बुरे अनुभव के बाद अशोक ने भी अहिंसा के महत्व को समझा और जीवन भर अहिंसा की नीति का अवलम्बन किया। सेना और युद्ध राज्य की शक्ति के मूल-आधार होते हैं किंतु भारतीय शासकों तथा वर्तमान में भारत सरकार ने भी विश्व-शांति को प्रमुखता दी।

(5.) आचार-विचार के क्षेत्र में योगदान

बौद्ध धर्म ने दस शील को अपनाकर भारतीय जनता को जीवन में नैतिकता और सदाचार के पालन का मार्ग दिखाया और भारतीय आचार-विचार को उन्नत बनाने में सहयोग दिया। बौद्ध धर्म के कारण ही परम्परागत भारतीय समाज में जाति-पाँति के बन्धन शिथिल हुए और शासन व्यवस्था में प्रत्येक जाति के व्यक्ति को बराबर माना गया।

हेवेल ने लिखा है- ‘बौद्ध धर्म ने आर्यावर्त के जातीय बन्धनों को तोड़कर उसके आध्यात्मिक वातावरण में घुसे हुए अन्धविश्वासों को दूर कर सम्पूर्ण आर्य जाति को एकरूपता प्रदान करने में योग दिया और मौर्य वंश के विशाल साम्राज्य की नींव रखी। बौद्ध धर्म ने भारतीय लोगों के नैतिक पक्ष को उन्नत बनाने में अपूर्व योग दिया।’

(6.) अन्य क्षेत्रों में बौद्ध धर्म की देन

बौद्ध धर्म ने भारत के वैदेशिक सम्बन्धों का क्षेत्र व्यापक किया तथा संसार के अनेक देशों से अपने सम्बन्धों को मजबूत बनाया। जिन देशों में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, उन देशों के निवासी भारत को अपना पवित्र तीर्थस्थान मानने लगे और वे बौद्ध स्थलों के दर्शनों के लिए भारत आने लगे। इस कारण विश्व के अनेक देशों के साथ भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सम्बन्ध स्थापित हुए और उन देशों में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रसार हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

कुषाण वंश का इतिहास

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कुषाण वंश का इतिहास

भारत के विदेशी शासक यूनानी, शक, पह्लव के बारे में हमने पिछले अध्याय में विचार किया था। इस अध्याय में कुषाण वंश का इतिहास लिखा गया है।

कुषाण वंश का प्राचीन इतिहास चीनी ग्रंथों में मिलता है। ये लोग यू-ची अथवा यूह्ची जाति की एक शाखा से थे। यू-ची लोग प्रारम्भ में चीन के उत्तरी-पश्चिमी प्रदेश में कानसू नामक प्रान्त में निवास करते थे। लगभग 165 ई.पू. में हूँग-नू (हूण) नामक जाति ने उन्हें वहाँ से मार भगाया।

इससे यू-ची लोग नये प्रदेश की खोज में पश्चिम की ओर बढ़ते हुए सिरदरया के प्रदेश में जा पहुँचे। यहाँ पर उन दिनों शक निवास करते थे। इसलिये यूचियों की शकों से मुठभेड़ हुई जिसमें यू-ची विजयी रहे। शकों को विवश होकर वहाँ से भाग जाना पड़ा परन्तु यू-ची लोग इस नये प्रदेश में शान्ति से नहीं रह सके। उनके पुराने शत्रु वू-सुन ने हूँग-नू जाति की सहायता से लगभग 140 ई.पू. में यू-ची लोगों को वहाँ से मार भगाया।

यू-ची लोग फिर नये प्रदेश की खोज मे आगे बढ़े। उन्होंने आक्सस नदी को पार कर लिया और ताहिया प्रदेश में पहुंच गये। यहाँ के लोगों ने उनके प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया। यू-ची, ताहिया-विजय से ही संतुष्ट न हुए। उन्होंने बैक्ट्रिया तथा उनके पड़ौस के प्रदेशों पर भी अधिकार स्थापित कर लिया।

कुषाण वंश के शासक

कुजुल कदफिस

इस समय यू-ची, पाँच शाखाओं में विभक्त थे जिनके अलग-अलग नाम थे। इन्हीं में से एक का नाम कई-सांग अथवा कुषाण था। इसी से कुषाण वंश का आरम्भ होता है। इस शाखा का नेता कुजुल कदफिस बड़ा ही साहसी योद्धा था। उसने यूचियों की अन्य शाखाओं पर भी प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इस प्रकार वह यूचियों का एकछत्र सम्राट् बन गया। उसका वंश कुषाण वंश कहलाया।

बैक्ट्रिया तथा उसके निकटवर्ती प्रदेशों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त कुजुल ने अपनी विशाल सेना के साथ भारत की ओर प्रस्थान किया। उसने सबसे पहले काबुल-घाटी में प्रवेश किया और यूनानियों की रही-सही शक्ति को नष्ट कर उस पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने पूर्वी गान्धार प्रदेश पर अधिकार किया। लगभग अस्सी वर्ष की अवस्था में कुजुल का निधन हुआ।

विम कदफिस

कुजुल कदफिस के बाद उसका पुत्र विम कदफिस उसके साम्राज्य का स्वामी बना। विम कदफिस भी अपने पिता की भाँति वीर तथा साहसी था। उसके शासन-काल में कुषाणों की सत्ता भारत में बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगी। उसने थोड़े ही दिनों में पंजाब, सिन्ध, काश्मीर तथा उत्तर प्रदेश के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया। कुषाण लोग अपनी भारतीय विजय के साथ-साथ यहाँ की सभ्यता तथा संस्कृति से प्रभावित होते जा रहे थे। कुजुल कदफिस बौद्ध-धर्म का और उसका पुत्र विम कदफिस जैन-धर्म अनुयायी था।

कनिष्क (प्रथम)

विम कदफिस के बाद कनिष्क (प्रथम), कुषाण वंश का शासक हुआ। वह इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी तथा शक्तिशाली शासक था। कनिष्क कौन था? विम के साथ उसका क्या सम्बन्ध था। वह कब सिंहासन पर बैठा? ये प्रश्न अब तक विवादग्रस्त हैं परन्तु यह निश्चय है कि कनिष्क कुषाण वंश का ही शासक था और विम कदफिस के साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध था। कनिष्क 78 ई. में सिंहासन पर बैठा। उसका शासनकाल, विजय तथा शासन दोनों ही दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी उसका शासनकाल महत्त्वपूर्ण है। कनिष्क ने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को इस सीमा तक स्वीकार किया कि उसे भारतीय शासक कहना अनुचित न होगा।

कनिष्क की दिग्विजय

काश्मीर विजय: कनिष्क ने सिंहासन पर बैठते ही साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया। उसने सबसे पहले काश्मीर पर विजय प्राप्त की और उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। कश्मीरी लेखक कल्हण का कथन है कि कनिष्क ने काश्मीर में कई विहारों एवं नगरों का निर्माण करवाया।

साकेत तथा मगध विजय: चीनी तथा तिब्बती ग्रंथों से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने साकेत तथा मगध पर आक्रमण किया और उन पर विजय प्राप्त की।

बंगाल विजय: कनिष्क की मुद्राएँ बंगाल में भी प्राप्त हुई हैं। इससे इतिहासकारों का अनुमान है कि पूर्व दिशा में उसका साम्राज्य बंगाल तक फैला था।

सिंधु घाटी पर अधिकार: एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने सिन्धु नदी घाटी पर अधिकार स्थापित कर लिया था।

अफगानिस्तान पर विजय: जेंदा और तक्षशिला लेखों से ज्ञात होता है कि कनिष्क का अधिकार कम्बोज, गान्धार, काहिरा तथा काबुल पर था। कनिष्क का राज्य अफगानिस्तान की सीमा तक फैला था।

पार्थिया पर विजय : कनिष्क के पूर्वज कुजुल कदफिस ने पार्थयन राजा को पराजित किया था। उस पराज का बदला लेने के लिये पार्थिया के राजा ने कनिष्क पर आक्रमण किया। इस युद्ध में पार्थिया का राजा परास्त हुआ।

चीन पर विजय: कनिष्क ने चीन के राजा के साथ भी लोहा लिया। उन दिनों चीन में हो-ती नामक राजा शासन कर रहा था। कनिष्क ने अपने एक राजदूत के साथ हो-ती के पास यह प्रस्ताव भेजा कि वह अपनी कन्या का विवाह कनिष्क के साथ कर दे। हो-ती ने इस प्रस्ताव को अपमानजनक समझा और कनिष्क के राजदूत को बन्दी बना लिया।

इस पर कनिष्क ने चीन के राजा पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में कनिष्क को सफलता नहीं मिली। और वह परास्त होकर वापस लौट आया। कुछ समय पश्चात् हो-ती के मर जाने पर कनिष्क ने दूसरी बार चीन पर आक्रमण किया। इस बार उसे सफलता प्राप्त हुई।

वह दो चीनी राजकुमारों को बन्दी बना कर अपनी राजधानी में ले आया और उनके रहने के लिए समुचित व्यवस्था की। चीनी साक्ष्यों से पता लगता है कि कनिष्क ने काशगर, खेतान तथा यारकन्द पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार कनिष्क का साम्राज्य न केवल भारत के वरन् दक्षिण-पश्चिमी एशिया के भी बहुत बड़े भाग में फैला था।

कनिष्क का शासन प्रबन्ध

कनिष्क के शासन प्रबन्ध के विषय में अधिक ज्ञात नही है परन्तु जो थोड़े-बहुत साक्ष्य प्राप्त होते हैं उनसे ज्ञात होता है कि उसने पुष्पपुर अथवा पेशावर को अपनी राजधानी बनाया, जो उसके साम्राज्य के केन्द्र में स्थित था। यहीं से वह अपने सम्पूर्ण साम्राज्य पर शासन करता था।

चूंकि कनिष्क का साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और वह पूर्व तथा पश्चिम में दूर-दूर तक फैला था, इसलिये कनिष्क ने अपने साम्राज्य को कई प्रान्तों में विभक्त किया तथा उनमें प्रान्तपति नियुक्त किये जो छत्रप तथा महाक्षत्रप कहलाते थे। सारनाथ के अभिलेख से उसके क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों के नाम भी ज्ञात होते हैं। इसलिये यह निष्कर्ष निकाला गया है कि उसने शकों की क्षत्रपीय शासन-व्यवस्था का अनुसारण किया।

कनिष्क का धर्म

कनिष्क के धार्मिक विश्वासों का ज्ञान उसकी मुद्राओं से होता है। उसकी प्रथम कोटि की वे मुद्राएँ है जिन पर यूनानी देवता, सूर्य, तथा चन्द्रमा के चित्र मिलते हैं। उसकी दूसरी कोटि की वे मुद्राएँ है जिन पर ईरानी देवता अग्नि के चित्र मिलते हैं तथा उसकी तीसरी कोटि की वे मुद्राएँ है जिन पर बुद्ध के चित्र मिलते हैं।

इससे अनुमान होता है कि कनिष्क आरम्भ में यूनानी धर्म को मानता था, उसके बाद उसने ईरानी धर्म स्वीकार किया और अन्त में वह बौद्ध-धर्म का अनुयायी बन गया। उसकी मुद्राओं से ज्ञात होता है कि कनिष्क में उच्च कोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। वह समस्त धर्मों को आदर की दृष्टि से देखता था।

इसी से उसने अपनी मुद्राओं में यूनानी, ईरानी तथा भारतीय तीनों देवताओं को स्थान देकर उन्हे सम्मानित किया। कुछ विद्वानों की यह भी धारणा है कनिष्क की मुद्राओं पर अंकित देवताओं से ज्ञात होता है कि उसके साम्राज्य में कौन-कौन से धर्म प्रचलित थे। ये मुद्राएं कनिष्क के व्यक्तिगत धर्म की द्योतक नहीं हैं।

कनिष्क और बौद्ध धर्म: कनिष्क प्रारम्भ में चाहे जिस धर्म को मानता रहा हो परन्तु वह मगध विजय के उपरान्त निश्चित रूप से बौद्ध हो गया था। पाटलिपुत्र में कनिष्क की भेंट बौद्ध-आचार्य अश्वघोष से हुई। वह अश्वघोष की विद्वता तथा व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसे अपने साथ अपनी राजधानी पुष्पपुर अथवा पेशावर ले गया और उससे बौद्ध-धर्म की दीक्षा ग्रहण की। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक की भाँति कनिष्क भी बौद्ध-धर्म को स्वीकार करने से पूर्व, क्रूर तथा निर्दयी था परन्तु बौद्ध धर्म का आलिंगन कर लेने के उपरान्त वह भी अशोक की भांति उदार तथा दयालु हो गया था।

धार्मिक सहिष्णुता: अशोक की भांति कनिष्क में भी उच्च कोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। इन दोनों सम्राटों ने बौद्ध धर्म को आश्रय दिया परन्तु अन्य धर्मों के साथ उन्होंने किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया। अन्य धर्मों को भी आदर की दृष्टि से देखा और उनकी सहायता की। कनिष्क की मुद्राओं में बुद्ध के साथ-साथ भगवान शिव की मूर्तियाँ भी मिलती हैं। वह हवन भी किया करता था जिससे स्पष्ट है कि वह ब्राह्मण धर्म में भी विश्वास रखता था। अशोक की भाँति कनिष्क ने भी बौद्ध-धर्म को दूर-दूर प्रचारित किया।

अशोक तथा कनिष्क के धर्म में अंतर: अशोक तथा कनिष्क दोनों ही बौद्ध धर्म में विश्वास रखते थे किंतु उन दोनों के धार्मिक विश्वासों में बड़ा अन्तर था। अशोक ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लेने के उपरान्तयुद्ध करना बन्द कर दिया था परन्तु कनिष्क बौद्ध धर्म को स्वीकार करने के बाद भी युद्ध करता रहा। अशोक हीनयान का अनुयायी था और कनिष्क महायान सम्प्रदाय का अनुयायी था।

चतुर्थ बौद्ध संगीति: जिस प्रकार अशोक ने तीसरी बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र में बुलाई थी उसी प्रकार कनिष्क ने भी चतुर्थ बौद्ध-संगीति काश्मीर के कुण्डलवन में बुलाई। इस संगीति को बुलाने का ध्येय बौद्ध धर्म में उत्पन्न हुए मतभेदों को दूर करना और बौद्ध-ग्रन्थों का सकंलन कर उन पर प्रामाणिक टीका एवं भाष्य लिखवाना था।

इस संगीति में लगभग 500 भिक्षु तथा बौद्ध-आचार्य सम्मिलित हुए। यह सभा बौद्ध-आचार्य वसुचित्र के सभापतित्त्व में हुई। आचार्य अश्वघोष ने उप-सभापति का आसन ग्रहण किया। इस सभा की कार्यवाही संस्कृत भाषा में हुई थी जिससे स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा का सम्मान इस समय बढ़ रहा था।

इस सभा में बौद्ध-धर्म में उत्पन्न मतभेदों को दूर किया गया और त्रिपिटक-ग्रन्थों पर प्रामाणिक टीकाएँ लिखी गईं। कनिष्क ने इन टीकाओं को ताम्र-पत्रों पर लिखवाकर उन्हें पत्थर के सन्दूक में रखवाकर उन पर स्तूप बनवा दिया।

महायान को मान्यता: चतुर्थ बौद्ध संगीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसमें बौद्ध-धर्म के ‘महायान’ संप्रदाय को मान्यता प्रदान की गई। महायान सम्प्रदाय बौद्ध-धर्म का प्रगतिशील तथा सुधारवादी सम्प्रदाय था जो देश तथा काल के अनुसार बौद्ध-धर्म में परिवर्तन करने के पक्ष में था। अब बौद्ध-धर्म का प्रचार विदेशों में हो गया था। भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशियों ने बौद्ध-धर्म को स्वीकार कर लिया था। ऐसी स्थिति में बौद्ध धर्म में थोड़ा बहुत परिवर्तन आवश्यक हो गया था।

इसके अतिरिक्त भारत में भक्ति-मार्ग  का प्रचार हो रहा था। इससे बौद्ध-धर्म प्रभावित हुए बिना न रहा। इस समय ब्राह्मण-धर्म का प्रचार भी जोरों से चल रहा था। इसलिये उसकी अपेक्षा बौद्ध-धर्म को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए बौद्ध-धर्म में संशोधन की आवश्यकता थी। इन्हीं सब कारणों से बौद्धधर्म में ‘महायान’ पन्थ चलाया गया था। यह पन्थ भक्तिवादी, अवतारवादी तथा मूर्तिवादी बन गया।

महायान सम्प्रदाय वाले, बुद्ध को ईश्वर का अवतार मानने लगे और उनकी तथा बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनाकर उनकी उपासना करने लगे। यद्यपि महायान सम्प्रदाय का बीजारोपण कनिष्क के पहले ही चुका था परन्तु उसे मान्यता बौद्धों की चतुर्थ संगीति में दी गई और उसे कनिष्क ने राज-धर्म बना लिया। यह कनिष्क के शासन-काल की महत्त्वपूर्ण घटना थी।

कनिष्क कालीन साहित्य

कनिष्क के काल में बड़े-बड़े विद्वान् तथा साहित्यकार हुए जिनका कनिष्क से घनिष्ठ सम्पर्क था। बौद्ध-धर्म के आचार्य वसुमित्र, अश्वघोष तथा नागार्जुन इसी काल की महान् विभूतियाँ थीं। वसुमित्र बहुत बड़े धर्माचार्य तथा वक्ता थे। संगीति के आयोजन में भी उनकी बड़ी रुचि थी उनकी विद्वता के कारण ही उन्हें चतुर्थ बौद्ध-संगीति का अध्यक्ष बनाया गया था।

उन्होंने बौद्ध-ग्रन्थों पर प्रामाणिक टीकाएँ लिखीं। अश्वघोष इस काल की दूसरी महान् विभूति थे जिनकी गणना बौद्ध-धर्म के महान् आचार्यों में होती है। वे उच्च कोटि के कवि, दार्शनिक, उपदेशक तथा नाटककार थे। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ बुद्ध-चरित्र है जिसकी रचना संस्कृत में हुई। इस महाकाव्य में बुद्ध के चरित्र तथा उनकी शिक्षाओं का वर्णन किया गया है।

नागार्जुन महायान पन्थ का प्रकाण्ड पण्डित तथा प्रवर्तक था। वह विदर्भ का रहने वाला कुलीन ब्राह्मण था परन्तु कालान्तर में उसने बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया और महायान सम्प्रदाय का प्रचारक बन गया। बौद्ध-धर्म का उच्चकोटि का विद्वान् पार्श्व, कनिष्क का गुरु था। आयुर्वेद के आचार्य चरक कनिष्क के राजवैद्य थे। उनकी चरक-संहिता भारतीय आयुर्वेद का अमूल्य ग्रन्थ है।

कनिष्क कालीन कला

कनिष्क के काल में कला की उन्नति हुई। कुषाण वंश के काल में कला की जो उन्नति हुई, उस ओर संकेत करते हुए रॉलिसन ने लिखा है- ‘भारतीय संस्कृति के इतिहास में कुषाण काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युग है।’

नये नगरों की स्थापना: अशोक की भाँति कनिष्क भी बहुत बड़ा निर्माता था। उसने दो नगरों का निर्माण करवाया। एक नगर उसने तक्षशिला के समीप बनवाया जिसके खंडहर आज भी विद्यमान हैं। यह नगर ‘सिरपक’ नामक स्थान पर बसाया गया था। कनिष्क ने दूसरा नगर काश्मीर में बसाया था जिसका नाम कनिष्कपुर था।

विहारों की स्थापना: अपनी राजधानी पुष्पपुर में उसने 400 फुट ऊँचा लकड़ी का स्तम्भ तथा बौद्ध-विहार बनवाया। यहीं पर उसने एक पीतल की मंजूषा में बुद्ध के अवशेष रखवाकर एक स्तूप बनवाया। इस स्तूप का निर्माण कनिष्क ने एक यूनानी शिल्पकार से करवाया।

अपने साम्राज्य के अन्य भागों में भी कनिष्क ने बहुत से विहार तथा स्तूप बनवाये। चीनी यात्री फाह्यान ने गान्धार में कनिष्क द्वारा बनवाये गये विहारों तथा स्तूपों को देखा था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 170 विहारों तथा स्तूपों का वर्णन किया है।

मथुरा कला शैली: कनिष्क के काल में मूर्तिकला की बड़ी उन्नति हुई। मथुरा में इस काल की कई मूर्तियाँ मिली हैं। गुप्तकाल की श्रेष्ठ मूर्तिकला शैली को मथुरा शैली का ही विकसित रूप माना जाता है। मथुरा शैली की समस्त कृतियां सरलता से पहचानी जा सकती हैं क्योंकि इनके निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग किया जाता था जो मथुरा के निकट सीकरी नामक स्थान से प्राप्त होता था।

मथुरा शैली की मूर्तियां आकार में विशालाकाय हैं। इन मूर्तियों पर मूंछें नहीं हैं। बालों और मूछों से रहित मूर्तियों के निर्माण की परम्परा विशुद्ध रूप से भारतीय है। मथुरा की कुषाणकालीन मूर्तियों के दाहिने कंधे पर वस्त्र नहीं रहता। दाहिना हाथ अभय की मुद्रा में उठा हुआ होता है। मथुरा शैली की कुषाण कालीन मूर्तियों में बुद्ध सिंहासन पर बैठे हुए दिखाये गये हैं।

गांधार कला शैली: इस काल में गान्धार-कला की भी बड़ी उन्नति हुई। कनिष्क तथा उसके उत्तराधिकारियों ने जो बौद्ध-मूर्तियाँ बनवाईं, उनमें से अधिकांश मूर्तियां, गान्धार जिले में मिली हैं। इसी से इस कला का नाम गान्धार-कला रखा गया है। गान्धार-कला की बहुत सी प्रतिमाएँ मुद्राओं पर भी उत्कीर्ण मिलती हैं।

गान्धार-कला को इण्डो-हेलेनिक कला अथवा इण्डो-ग्रीक कला भी कहा जाता है, क्योंकि इस पर यूनानी कला की छाप है। बुद्ध की मूर्तियों में यवन देवताओं की आकृतियों का अनुसरण किया गया है। इस कला को ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इस शैली की मूर्तियों में बुद्ध कमलासन मुद्रा में मिलते हैं किंतु मुखमण्डल और वस्त्रों से बुद्ध, यूनानी राजाओं की तरह लगते हैं।

बुद्ध की ये मूर्तियां यूनानी देवता अपोलो की मूर्तियों से काफी साम्य रखती हैं। महाभिनिष्क्रण से पहले के काल को इंगित करती हुई बुद्ध की जो मूर्तियां बनाई गई हैं, उनमें बुद्ध को यूरोपियन वेश-भूषा तथा रत्नाभूषणों से युक्त दिखाया गया है।

कनिष्क कालीन व्यापार

कनिष्क का साम्राज्य न केवल भारत के बहुत बड़े भाग में अपितु भारत से बाहर उत्तर-पश्चिम एशिया के बहुत बड़े भाग में फैला हुआ था। इस कारण इस काल में भारत का ईरान, मध्य एशिया, चीन, तिब्बत आदि देशों के साथ घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित हो गया। चूँकि कनिष्क ने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को अपना लिया था और बौद्ध-धर्म का अनुयायी हो गया था, इसलिये इन देशों में उसने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार करने का प्रयत्न किया।

सांस्कृतिक सम्बन्ध के साथ-साथ इन देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध भी स्थापित हो गया और इन देशों के साथ स्थायी रूप से व्यापार होने लगा। मुद्राओं से ज्ञात होता है कि इस काल में भारत का रोम साम्राज्य के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध था। भारत से बड़ी मात्रा में वस्त्र, आभूषण तथा शृंगार की वस्तुएँ रोम भेजी जाती थीं और वहाँ से सोना भारत आता था।

कनिष्क की उपलब्धियाँ

कुषाण-वंश के शासकों में कनिष्क सर्वाधिक वीर, साहसी तथा कुशल सेनानायक था। उसने जितने विशाल साम्राज्य पर शासन किया उतने विशाल साम्राज्य पर शासन करने का अवसर किसी अन्य कुषाण शासक को प्राप्त नहीं हुआ। किसी अन्य कुषाणकालीन शासक में प्रशासकीय प्रतिभा भी उतनी नहीं थी जितनी कनिष्क में थी। सांस्कृतिक दृष्टि से भी किसी कुषाण शासक की तुलना कनिष्क से नहीं की जा सकती।

किसी भी अन्य कुषाण शासक में न तो कनिष्क जितनी धर्म परायणता थी और न उतनी सहृदयता तथाा सहिष्णुता थी। कनिष्क का धार्मिक दृष्टिकोण अशोक की भांति व्यापक था। साहित्य तथा कला में भी कनिष्क के समान किसी अन्य कुषाण शासक में रुचि नहीं थी।

कनिष्क की गणना न केवल कुषाण-वंश के वरन् भारत के महान सम्राटों में होनी चाहिये। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने उसमें चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अशोक के गुणों का समन्वय बताते हुए लिखा है- ‘निस्सन्देह भारत के कुषाण-सम्राटों में कनिष्क का व्यक्तित्त्व सबसे आकर्षक है। वह एक महान् विजेता और बौद्ध-धर्म का आश्रयदाता था। उसमें चन्द्रगुप्त मौर्य की सामरिक योग्यता और अशोक के धार्मिक उत्साह का समन्वय था।’

उसकी महत्वपूर्ण उपलब्ध्यिाँ निम्नलिखित प्रकार से हैं-

(1) महान् विजेता: कनिष्क की गणना महान् विजेताओं में होनी चाहिये। वह अत्यंत महत्त्वकांक्षी राजा था। सिंहासन पर बैठते ही उसने साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और जीवन-पर्यन्त साम्राज्य की वृद्धि करने में लगा रहा। यद्यपि उसने अहिंसात्मक बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया था परन्तु अपना विजय अभियान बन्द नहीं किया।

इससे भारत के एक बड़े भाग पर तथा भारत की सीमाओं के बाहर एशिया के बहुत बड़े भाग पर भी उसका शासन हो गया। कनिष्क के अतिरिक्त भारत के अन्य किसी सम्राट् को भारत के बाहर इतने बड़े भू-भाग पर शासन करने का श्रेय प्राप्त नहीं है। उनका साम्राज्य उत्तर में काश्मीर से दक्षिण में सौराष्ट्र तक और पूर्व में बंगाल से पश्चिम में पार्थिया तक विस्तृत था।

उसने काश्गर, यारकन्द तथा खोतन को अपने साम्राज्य में मिला लिया। स्मिथ ने उसकी इन विजयों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘कनिष्क को सर्वाधिक आकर्षक सैनिक सफलता उसकी काशगर, यारकन्द तथा खोतन पर विजय थी।’ चीन के शासन को नत-मस्तक कर उसने अपनी प्रतिष्ठा में वृद्धि की। इसलिये कनिष्क की गणना भारत के महान् शासकों में करना उचित ही है।

(2) कुशल शासक: प्रशासकीय दृष्टि से भी कनिष्क का स्थान बहुत ऊँचा है। अशोक की मृत्यु के उपरान्त उत्तरी भारत में जो कुव्यवस्था तथा अराजकता फैली हुई थी उसे दूर करने में वह सफल रहा। इतने विशाल साम्राज्य को सुरक्षित तथा सुसंगठित रखना इस बात का प्रमाण है कि वह शासन करने में अत्यन्त कुशल था।

वह अपने क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों पर नियन्त्रण करने में भी सफल रहा। वह अपने साम्राज्य को आन्तरिक उपद्रवों तथा विद्रोहों से मुक्त रख सका। उसकी मुद्राओं, स्तूपों तथा विहारों से ज्ञात होता है कि उसका साम्राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण था। उसकी प्रजा सुखी थी। उसके शासन काल में विदेशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो जाने से भारत के उद्योग-धन्धों तथा व्यापार में बड़ी उन्नति हुई। इसलिये एक शासक के रूप में भी कनिष्क को भारतीय इतिहास में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त होना चाहिये।

(3) महान् धर्म-तत्त्ववेत्ता: कनिष्क में उच्चकोटि की धर्म-पराणयता थी। उसने बौद्ध-धर्म की उसी प्रकार सेवा की जिस प्रकार अशोक ने की थी। अशोक की भांति उसने अनेक स्तूपों तथा विहारों का निर्माण करवाया और भिक्षुओं तथा आचार्यों की सहायता की।

उसने चतुर्थ बौद्ध-संगीति बुलाकर बौद्ध-धर्म में उत्पन्न मतभेदों को दूर किया और बौद्ध ग्रन्थों पर टीकाएँ तथा भाष्य लिखवाये। महायान सम्प्रदाय को मान्यता देकर, उसे राज धर्म बनाकर और विदेशों में उसका प्रचार करवा कर उसने महायान सम्प्रदाय की बड़ी सेवा की।

उसने महायान को विदेशों में अमर बना दिया। एन. एन. घोष ने लिखा है- ‘महायान सम्प्रदाय के आश्रयदाता तथा समर्थक के रूप में उसे उतना ही ऊँचा स्थान प्राप्त है जितना अशोक को हीनयान सम्प्रदाय के संरक्षक तथा समर्थक के रूप में प्राप्त था।’ कनिष्क के धार्मिक विचार संकीर्ण नहीं थे और वह कट्टरपन्थी नहीं था। उसमें उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। वह अशोक की भांति समस्त धर्मों को आदर की दृष्टि से देखता था।

उसकी मुद्राओं से स्पष्ट हो जाता है कि वह यूनानी, ईरानी तथा ब्राह्मण-धर्म का भी सम्मान करता था। आयंगर ने कनिष्क के सम्बन्ध में लिखा है- ‘वह पारसीक तथा यूनानी देवताओं को भी आदर की दृष्टि से देखता था। इन कथाओं को, कि वह बौद्ध-धर्म का भक्त था, बड़े ही सीमित अंश में स्वीकार करना चाहिए।’ इस प्रकार धार्मिक दृष्टिकोण से कनिष्क, अशोक का समकक्षी ठहरता है।

डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है- ‘कनिष्क की ख्याति उसकी विजयों पर उतनी आधारित नहीं जितनी शाक्यमुनि के धर्म को संरक्षण प्रदान करने के कारण है।’

(4) महान् निर्माता: यद्यपि कनिष्क का सम्पूर्ण जीवन युद्ध करने तथा अपने साम्राज्य को सुरक्षित तथा सुसंगठित रखने में व्यतीत हुआ था परन्तु उसने शान्ति कालीन कार्यों की ओर भी ध्यान दिया। काश्मीर का कनिष्कपुर नगर उसी ने बसाया। राजधानी पुष्पपुर के समीप उसने एक दूसरे नगर का निर्माण करवाया। राजधानी पुष्पपुर में तथा अपने राज्य के अन्य भागों में उसने कई स्तूपों तथा विहारों का निर्माण करवाया।

पुष्पपुर में उसने लकड़ी का जो स्तम्भ बनवाया था वह लगभग 400 फीट ऊँचा था। इसलिये एक निर्माता के रूप में भी कनिष्क को यश प्राप्त होना चाहिए। स्मिथ ने एक निर्माता के रूप में उसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘स्थापत्यकला को उसकी सहायक शिल्प के साथ कनिष्क का उदार संरक्षण प्राप्त था जो अशोक की भांति एक महान् निर्माता था।’

(5) साहित्य तथा कला का महान् प्रेमी: कनिष्क ने अपने युग के बड़े-बड़े विद्वानों, लेखकों तथा धर्माचार्यों को आश्रय प्रदान किया। अपने समय के विख्यात धर्माचार्य वसुमित्र तथा अश्वघोष को चतुर्थ बौद्ध-संगीति का अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष बनवा कर उन्हें सम्मानित किया।

कनिष्क ने बौद्ध-आचार्य पार्श्व की शिष्यता ग्रहण कर बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित किया। नागार्जुन जैसा महायान धर्म का आचार्य उसके सम्पर्क में था। यह श्रेय कनिष्क को ही प्राप्त है कि गान्धार-शैली की प्रतिष्ठा उसके शासन-काल में बढ़ी और अन्यत्र भी उसका अनुकरण होने लगा।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि विजेता, शासक, निर्माता, धर्मवेत्ता, साहित्य एवं कला-प्रेमी के रूप में भारतीय इतिहास में कनिष्क को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त होना चाहिए। इस सम्बन्ध में स्मिथ का यह कथन उल्लेखनीय है- ‘कुषाण सम्राटों मे केवल कनिष्क ही अपना नाम छोड़ गया है जो भारत की सीमाओं के सुदूर बाहर भी विश्रुत था और जिसकी समता के करने लिए लोग लालायित रहते आये हैं।’

कनिष्क की हत्या

कनिष्क के शासन काल की अलग-अलग अवधियां अनुमानित की गई हैं। कुछ इतिहासकारों ने आरा अभिलेख के आधार पर उसके शासनकाल की अवधि 45 वर्ष मानी है। अधिकांश विद्वान इस अवधि को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार कनिष्क ने केवल 23 वर्ष तक शासन किया।

दंत कथाओं से ज्ञात होता है कि कनिष्क की प्रजा उसकी सामरिक प्रवृत्ति तथा साम्राज्यवादी नीति से अप्रसन्न हो गयी और उसके सैनिकों ने षड्यंत्र रचकर उसकी हत्या कर दी। यदि उसके शासन की अवधि 45 वर्ष मानते हैं तो उसकी हत्या 123 ई. में हुई और यदि उसके शासन की अवधि 23 वर्ष मानते हैं तो कनिष्क की हत्या 101 ई. में होनी निश्चित होती है।

कनिष्क के उत्तराधिकारी

कनिष्क की मृत्यु के उपरान्त वसिष्क, हुविष्क तथा कनिष्क (द्वितीय) नाम के कुषाण राजा हुए। इन शासकों के सम्बन्ध में अधिक ज्ञात नहीं होता है।

कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव

कुषाण-वंश का अन्तिम शासक वासुदेव था। उसका राज्य केवल मथुरा तथा उसके निकटवर्ती प्रदेशों तक सीमित था। वह भगवान शिव का उपासक था। उसकी मुद्राओं पर नन्दी का चित्र अंकित है। वासुदेव के शासन-काल में कुषाण साम्र्राज्य छिन्न-भिन्न होकर समाप्त हो गया और उत्तरी भारत में कई राज-वंशों का उदय हुआ जिन्होंने कुषाण-साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर अपने राज्य स्थापित कर लिये। कुषाण साम्राज्य के पश्चिमोत्तर भाग पर शकों तथा पार्थियनों ने अधिकार जमा लिया।

कुषाण वंश का पतन

कुषाण-साम्राज्य के पतन का मूल कारण इसके अन्तिम सम्राटों की अयोग्यता थी परन्तु किस शक्ति ने कुषाणों का उन्मूलन किया, इस पर विद्वानों में मतभेद है। काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार कुषाण साम्राज्य के उन्मूलन का कार्य नागों और वाकाटकों द्वारा सम्पन्न किया गया था परन्तु डॉ. अल्तेकर के विचार में यह कार्य यौधेय, कुणिन्द, मालव, नाग और माघ जातियों के द्वारा सम्पन्न किया गया। वास्तव में वह युग विदेशी सत्ता के विरुद्ध एक प्रबल प्रतिरोध का युग था। अनेक तत्कालीन गणराज्यों ने यौधेय राज्य के नेतृत्व में कुषाण-साम्राज्य के उन्मूलन का प्रयत्न किया और वे उसमें सफल रहे।

कुषाण वंश के काल में कला एवं संस्कृति

कुषाण-काल में बड़े-बड़े विद्वान् तथा साहित्यकार हुए। वसुमित्र, अश्वघोष, चरक, पार्श्व तथा नागार्जुन इसी काल की विभूतियाँ है। वसुमित्र ने ‘महाविभाषा-शास्त्र’ की रचना की और चतुर्थ बौद्ध-संगीति का अध्यक्ष पद ग्रहण किया। बौद्ध-धर्म के महान् आचार्य, कवि, दार्शनिक, उपदेशक तथा नाटककार अश्वघोष ने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘बुद्ध चरित्र’ की रचना की।

आयुर्वेद के आचार्य चरक कनिष्क के राजवैद्य थे जिन्होने ‘चरक-संहिता’ की रचना की। बौद्ध-धर्म का उच्च कोटि का विद्धान पार्श्व, कनिष्क का गुरु था। नागार्जुन महान् आचार्य एवं दार्शनिक था। इन्हीं उद्भट विद्वानों की ओर संकेत करते हुए  डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है- ‘अश्वघोष, नार्गाजुन तथा अन्य लोगों की कृतियों से यह सिद्ध हो जाता है कि कुषाण-काल महती क्रियाशीलता का युग था। यह धार्मिक उत्तेजना तथा धर्म-प्रचार का भी युग था।’

रॉलिन्स ने लिखा है- ‘इस काल में नूतन साहित्यिक स्वरूप प्रकाश में आते है, नाटक तथा महाकाव्य सामने आते हैं और प्रतिष्ठित संस्कृत का विकास होता है।’

कुषाण वंश के बाद अन्धकार का युग

कुषाण वंश के पतन के बाद और गुप्त साम्राज्य के उदय के पूर्व के युग को भारतीय इतिहास में ‘अन्धकार का युग’ कहा गया है। डॉ. स्मिथ ने लिखा है- ‘कुषाण तथा आन्ध्र राजवंशों के विनाश और साम्राज्यवादी गुप्त साम्राज्य के उदय के मघ्य काल का समय, भारत के सम्पूर्ण इतिहास में सर्वाधिक अन्धकारमय है।’

स्मिथ का यह कथन सत्य नहीं माना जा सकता क्योंकि आधुनिक काल में मुद्राओं तथा अभिलेखों के आधार पर जो शोध का कार्य हुआ है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि कुषाण वंश के पतन के बाद भारत में अन्धकार का युग नहीं था। इस युग में भारत में अनेक राजतन्त्र तथा गणतन्त्र विद्यमान थे। इस समय सात राजतन्त्र तथा नौ गणतन्त्र विद्यमान थे।

राजतन्त्रों के नाम इस प्रकार हैं- नाग, अहिक्षत्र, अयोध्या, कौशाम्बी, वाकाटक, मौखरि और गुप्त। गणतन्त्रों के नाम इस प्रकार हैं- आर्जुनायन, मालव, यौधेय, शिवि, लिच्छवि, कुणिन्द, कुलूट, औदुम्बर और मद्र। राजतन्त्रों में नाग-राज्य सर्वाधिक शक्तिशाली था और गणराज्यों में यौधेय गणराज्य सर्वाधिक शक्तिशाली था। इन्ही राज्यों के ध्वंशावशेषों पर गुप्तों के विशाल साम्राज्य का निर्माण होना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – भारत में विदेशी शासक

1. भारत के विदेशी शासक – यूनानी, शक, पह्लव

2. कुषाण वंश का इतिहास

सिन्दूर का पौधा

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सिन्दूर का पौधा

सिन्दूर के पौधे का वानस्पतिक नाम बिक्सा ओरेलाना है। दुनिया भर के देशों में सिन्दूर का पौधा अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है जिनमें सिंदूरी, सिंदूर, लिपिस्टिक ट्री, लटकन, अन्नाटा, एकियोटे आदि नाम प्रमुख हैं। इस पौधे पर लगने वाले गहरे लाल रंग के बीजों को जब कुचला जाता हे तब वे सूर्योदय के समय का सिंदूरी-नारंगी रंग छोड़ते हैं।

सिन्दूर का पौधा विश्वभर में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है, जिनमें भारत, श्रीलंका, अफ्रीका, अमेरिकी उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों, मध्य और दक्षिण अमेरिका प्रमुख हैं। यह अच्छी जल निकासी वाली, हल्की क्षारीय मिट्टी और गर्म जलवायु में पनपता है।

दक्षिणी भारत की गर्म एवं नम जलवायु में सिंदूर का पौधा बड़ी आसानी से उगता है। वहाँ की मिट्टी एवं जलवायु दोनों ही इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। जब सिन्दूर का पौधा फलों से लद जाता है, उस समय बीज पकने के लिए शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में इसे आसानी से उगाया जा सकता है। पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि प्रांतों में सिंदूर का पौधा जंगली रूप में मिलता है। इन प्रांतों में भी इसकी खेती की जाती है।

यद्यपि सिंदूर की खेती पारंपरिक उद्यानिकी की श्रेणी में नहीं आती तथापि कीमत अच्छी मिलने के कारण किसान अपनी खाली पड़ी भूमि में बिक्सा ओरिलाना की खेती करते हैं। भारत के कुछ हिस्सों में एनाट्टो या सिंदूरी के व्यावसायिक बागान उगाए जा रहे हैं। इसके पौधे को बीज या तने की कलम द्वारा लगाया जा सकता है।

इसका पौधा झाड़ीदार होता है जो 8-10 फीट ऊंचा होता है। इसके फल बल्बनुमा गुच्छों में उगते हैं। सिंदूर पौधे से पहली फसल रोपण के दो साल बाद प्राप्त होती है, और पौधे अच्छे प्रबंधन के साथ 15-20 साल तक उपज देते हैं। बिक्सा के फलों के अंदर मौजूद छोटे-छोटे बीजों को पीसकर बिना किसी केमिकल के शुद्ध सिंदूर तैयार किया जाता है। यह हर्बल सिंदूर त्वचा पर किसी प्रकार का हानिकारक प्रभाव नहीं डालता।

सिंदूर के बीजों से मिलने वाले रंग का उपयोग प्राकृतिक खाद्य रंग एजेंट तथा सौंदर्य प्रसाथनों के रूप में किया जाता है। सिंदूर के पौधे के विभिन्न भागों का उपयोग बुखार, दस्त और त्वचा संबंधी रोगों की पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता रहा है। हिन्दू महिलाएं सिंदूर के बीजों से बने बारीक पाउडर को मांग भरने एवं बिन्दिया लगाने में करती हैं। इस प्रकार सिंदूर का पौधा सैंकड़ों सालों से भारतीय नारी के माथे एवं सिर की सजावट बना हुआ है।

हिन्दू धर्मावलम्बी सिंदूर पाउडर को चमेली के तेल में घोलकर उसका लेप बनाते हैं तथा हनुमानजी एवं भैंरूजी के शरीर पर लेपन करते हैं। माना जाता है कि इससे ये देवता प्रसन्न होते हैं। सिंदूरी रंग को सौभाग्य एवं बल प्रदान करने वाला रंग माना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

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जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

जैन-धर्म और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

जैन-धर्म और बौद्ध धर्म दोनों का प्रसार एक ही समय में, एक ही प्रकार से, एक जैसी परिस्थितयों में और एक जैसे उद्देश्यों को लेकर हुआ। इस कारण इतिहासकार बहुत समय तक महावीर स्वामी एवं महात्मा बुद्ध को एक ही व्यक्ति समझते रहे तथा इन दोनों धर्मों को एक ही धर्म के दो रूप मानते रहे किंतु इन दोनों धर्मों की तुलना करने से दोनों की समानताएं एवं असमानताएं स्पष्ट हो जाती हैं।

जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म में समानताएँ

(1.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों का उदय ‘ब्राह्मण धर्म’ के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। अतः दोनों ही धर्म ब्राह्मण धर्म के प्रमुख ग्रन्थ वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते और न ही उन्हें ज्ञान का अन्तिम सोपान मानते हैं। इस कारण दोनों की गणना नास्तिक धर्मों में की जाती है। 

(2.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म ब्राह्मण धर्म के यज्ञवाद, बहुदेववाद और जन्म पर आधारित जातिवाद का विरोध करते हैं और सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं में ब्राह्मणों के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करते।

(3.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्म ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानते।

(4.) दोनों ही धर्म ब्राह्मण धर्म के प्रवृत्ति-मार्ग का विरोध करते हैं और निवृत्ति-मार्ग में विश्वास रखते हैं। अर्थात् दोनों संसारिक सुखों से निवृत्ति पर जोर देते हैं परन्तु दोनों ही धर्म गृहस्थ-धर्म की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं।

(5.) दोनों धर्मों में सदाचार और अहिंसा का स्थान प्रमुख है।

(6.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म कर्म-फल सिद्धांत और पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। ब्राह्मण धर्म ‘यज्ञ’ एवं ‘कर्मकाण्ड’ को कर्म मानता है जबकि बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म इन्हें ‘कर्म’ नहीं मानते।

(7.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्मों का लक्ष्य ‘निर्वाण’ प्राप्त करना है। दोनों धर्मों का विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के निर्वाण प्राप्त करने का अधिकार है। 

(8.) बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्म जीवन को दुःखमय समझते हैं। उनमें ब्राह्मण धर्म की आशावादिता का अभाव है।

(9.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों में संघ व्यवस्था है। दोनों धर्मों में अनुयाइयों की दो-दो श्रेणियाँ है- 1. भिक्षु-भिक्षुणी, 2. उपासक-उपासिका। 

(10.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों के अपने-अपने त्रिरत्न हैं।

(11.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों में प्रारम्भ में भक्ति का कोई स्थान नहीं था परन्तु बाद में दोनों मे भी भक्तिवाद का उदय हुआ।

(12.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्म प्रारम्भ में व्यक्ति-पूजा तथा मूर्ति-पूजा के विरोधी थे परन्तु बाद में दोनों धर्मों ने इन्हें अपना लिया।  

(13.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों ने मानव-सेवा पर अधिक जोर दिया।

(14.) दोनों धर्मों ने संस्कृत की जगह लोकभाषाओं में उपदेश दिए एवं ग्रंथों की रचना की। जैन-धर्म ने प्राकृत भाषा को और बौद्ध धर्म ने पालि भाषा को अपनाया परन्तु बाद में दोनों धर्मों में संस्कृत में ग्रंथ लिखे जाने लगे।

(15.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों के संस्थापकों के जीवन में काफी समानताएं हैं। महावीर एवं बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय राजकुमार थे। दोनों ने विवाह करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और दोनों के सन्तान भी हुई। दोनों ने लगभग 30 वर्ष की आयु में पारिवारिक जीवन का त्याग करके सन्यास ग्रहण किया और सत्य-ज्ञान की प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की। दोनों ने ही ज्ञान प्राप्ति के बाद मृत्युपर्यन्त जनकल्याण हेतु धर्म प्रचार का कार्य किया।

जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म में असमानताएँ

बौद्ध एवं जैन धर्मों में बहुत सी असमानताएँ भी थीं, जो इस प्रकार हैं-

(1.) जैन-धर्म का मूल स्वरूप बौद्ध धर्म से कहीं अधिक प्राचीन है।

(2.) दोनों धर्मों का अन्तिम लक्ष्य ‘निर्वाण’ प्राप्त करना है परन्तु जैन-धर्म में ‘निर्वाण’ का अर्थ दुःखरहित हो जाना अर्थात् आत्मा का सदानन्द में मिल जाना है परन्तु बौद्ध धर्म में ‘निर्वाण’ का अर्थ व्यक्तित्त्व की पूर्ण समाप्ति से है। अर्थात् जब व्यक्ति समस्त प्रकार की वासना या आसक्ति से मुक्त हो जाता है तो उसे बुद्धत्व प्राप्त हो जाता है। जैन-धर्म के अनुसार ‘निर्वाण’ की प्राप्ति मृत्यु के पश्चात ही सम्भव है जबकि बौद्ध धर्म के अनुसार मनुष्य इसी जीवन में ‘निर्वाण’ प्राप्त कर सकता है।

(3.) दोनों धर्मों में निर्वाण प्राप्ति के साधनों में भिन्नता है। जैन-धर्म के अनुसार तपस्या, उपासना और काया क्लेश आदि से ‘निर्वाण’ प्राप्त हो सकता है किन्तु बौद्ध धर्म मध्यम मार्ग पर जोर देता है क्योंकि शारीरिक कष्ट और विलासमय जीवन दोनों ही अवांछनीय हैं।

(4.) जैन-धर्म त्रिरत्न के अनुसरण पर जोर देता है किंतु बौद्ध धर्म अष्टांगिक मार्ग पर जोर देता है।

(5.) बौद्ध एवं जैन दोनों धर्म अहिंसावादी है परन्तु व्यवहार रूप में बौद्ध धर्म की अपेक्षा जैन-धर्म अहिंसा पर अधिक जोर देता है।

(6.) जैन-धर्म आत्मा के अस्तित्त्व में विश्वास करता है परन्तु बौद्ध धर्म अनात्मवादी है।

(7.) सैद्धांतिक रूप से दोनों धर्म जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था के विरोधी तथा सामाजिक समानता के पक्षधर हैं परन्तु व्यावहारिक स्तर पर जैन-धर्म के अनुयाईयों ने निम्न जातियों को नहीं अपनाया जबकि बौद्ध संघ ने बिना किसी भेदभाव के समाज के प्रत्येक वर्ण एवं जाति को प्रवेश दिया।

(8.) जैन धर्म, अन्य धर्मों के प्रति अधिक सहिष्णु रहा। जबकि बौद्ध धर्म धार्मिक कट्टरता से ग्रस्त रहा। इस कारण अन्य धर्मों से उसका वैमनस्य रहा।

(9.) जैन-धर्म ने सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप में अपने विचारों का उल्लेख किया है किंतु बौद्ध धर्म इस विषय पर चुप है।

(10.) दोनों धर्मों में संघ व्यवस्था है परन्तु बौद्ध धर्म में संघ-जीवन पर अधिक जोर है जबकि जैन-धर्म की संघ व्यवस्था उतनी संगठित नहीं है।

(11.) बौद्ध धर्म का प्रसार जिस तेजी से आरम्भ हुआ था उसी गति से उसका पतन भी हो गया और भारत भूमि से उसका लोप हो गया परन्तु जैन-धर्म का प्रचार प्रसार धीमी गति से हुआ और उसका अस्तित्त्व भी भारत में बना रहा।

(12.) जैन अपने धर्म के सिद्ध-पुरुषों को तीर्थंकर कहते हैं जबकि बौद्ध अपने सिद्ध-पुरुषों को बोधिसत्व कहते हैं।

(13.) बौद्ध धर्म को अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन जैसे चक्रवर्ती सम्राटों का संरक्षण एवं प्रोत्साहन मिला किंतु जैन-धर्म को स्थानीय एवं छोटे राजाओं का संरक्षण मिला। इस कारण जैन-धर्म का प्रसार अपने देश में भी बहुत सीमित रहा जबकि बौद्ध धर्म भारत से बाहर भी फैल गया।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि दोनों धर्मों में पर्याप्त समानताएं होते हुए भी काफी असमानताएं हैं और दोनों धर्म स्पष्टतः अलग हैं। दोनों धर्मों में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या एवं द्वेष की भावना भी बनी रही। बौद्ध धर्म आरम्भ से ही अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु रहा इसलिए उसने राजकीय संरक्षण प्राप्त करके जैन-धर्म पर प्रहार किए। यही कारण था कि जिस हूण आक्रांता मिहिरकुल ने बौद्धों का बड़ी संख्या में संहार किया था, जैन आचार्य उद्योतन सूरि ने उसी मिहिरकुल को सम्पूर्ण धरती का स्वामी कहकर उसकी प्रशंसा की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

चौके चूल्हे वाली औरतें!

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चौके चूल्हे वाली औरतें

दुनिया तेज गति से दौड़ रही है, भारत की गति कुछ अधिक ही तेज है। भारत की इस तेज गति को चौके चूल्हे वाली औरतें ही संतुलन प्रदान कर सकती हैं।

भारत सरकार द्वारा टीवी चैनलों पर एक लम्बा फीचर विज्ञापन दिखाया जा रहा है जिसमें विगत 11 साल में देश में हुई आर्थिक उन्नति का विवरण दिया गया है। इस फीचर में एक पंक्ति का भाव इस प्रकार है कि हमने दुनिया को दिखा दिया है कि अब भारत ऐसा देश नहीं रहा जिसमें औरतों को चौके चूल्हे तक सीमित रखा जाता है।

चौके-चूल्हे से औरतों को हटा देना, सिक्के का एक पहलू है जो कि कहने-सुनने में बहुत अच्छा लगता है। सिक्के का दूसरा पहलू बहुत भयावह है जिस पर इस फीचर में चर्चा नहीं की गई है।

मेरी समझ में यह नहीं आया कि भारत दुनिया को यह क्यों दिखाना चाहता है कि अब हम औरतों को चौके-चूल्हे तक सीमित रखने वाले देश नहीं रहे।

क्या यह पंक्ति उन औरतों का अपमान नहीं है जो अपने घर में चौका-चूल्हा करके अपना घर-संसार सजाती हैं, घर के लोगों को पौष्टिक खाना देती हैं, अपने बच्चों को स्कूल से लाती-ले जाती हैं। उनके कपड़े धोती हैं, उन्हें होमवर्क करवाती हैं, उन्हें अच्छे संस्कार देती हैं। उन्हें पार्क में खिलाने ले जाती हैं, उन्हें जिन्दगी की धूप-छांव और गलियों के कुत्तों से बचाती हैं, उन्हें देश का जिम्मेदार नागरिक बनाने में अपना पूरा जीवन लगा देती हैं।

चौके चूल्हे वाली औरतें अपने घर के बूढ़े, बीमार, अशक्त सदस्यों की सेवा करती हैं। उन्हें नहलाती हैं, सहारा देती हैं, बीमार होने पर उन्हें हॉस्पीटल ले जाती हैं। ऐसी कौनसी जिम्मेदारी है जिसे ये चौके चूल्हे वाली औरतें नहीं निभातीं।

चौके चूल्हे वाली औरतें दोपहर के खाली समय में कढ़ाई, बुनाई, सिलाई करती हैं, खीचे-पापड़, चिप्स बनाती हैं। घर की साफ-सफाई पर अधिक समय व्यय करती हैं। फिर चौके चूल्हे वाली औरतों का यह अपमान क्यों?

निश्चित रूप से विगत 11 साल में भारत सरकार ने देश की तस्वीर बदली है। देश में रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं, लोगों में समृद्धि लाने में सफलता मिली है। स्त्री शिक्षा में वृद्धि हुई है। लोगों का स्वास्थ्य पहले से बेहतर हुआ है। औरतें घरों से बाहर निकलकर कमा रही हैं और देश की जीडीपी बढ़ा रही हैं। नए सड़क-पुल, बांध, वैज्ञानिक संस्थानों के कारण दुनिया भर में भारत का डंका बज रहा है। क्या इस डंके में चौके चौके चूल्हे वाली औरतें कोई योगदान नहीं देतीं?

चौके चूल्हे वाली औरतें परिवार को अद्भुत सुरक्षा और संरक्षण देती हैं, जिसके कारण परिवार के लोगों को किसी का थूका हुआ, पेशाब किया हुआ, पसीने से सना हुआ खाना नहीं खाना पड़ता। चौके-चूल्हे वाली इन औरतों के कारण परिवार में हर तरह की प्रसन्नता आती है।

क्या चौके चूल्हे वाली औरतें उन औरतों से पिछड़ी हुई हैं जो चौका-चूल्हा छोड़कर घर से बाहर कमाने निकलती हैं।

ऐसे बहुत से प्रकरण सीसीटीवी कैमरों में कैद हुए हैं जब बाजार से खाना लाने वाले लड़के रास्ते में टिफिन खोलकर उनमें थूकते हैं या खाने में से कुछ चुराकर खाते हैं।

भारत में ऐसे प्रकरण भी हुए हैं जब अपने बच्चों को घर पर छोड़कर ऑफिस जाने वाली महिलओं के बच्चों को उसकी आया ने नंगा करके चौराहे पर बैठा कर भीख मंगवाई। ऐसे प्रकरण भी सीसी टीवी कैमरों में कैद हुए हैं जब घर में खाना बनाने वाली औरतों को किसी बात पर डांट देने पर वे अपने पेशाब में आटा गूंध कर रोटियां बनाती हैं या सब्जी में अपना पेशाब डालकर घर वालों से डांट का बदला लेती हैं।

ऐसे प्रकरण भी हुए हैं जब अपने बच्चों को घर में आया के भरोसे छोड़कर जाने वाली औरतों ने सीसीटीवी कैमरों में देखा कि आया ने बच्चे को अफीम खिलाकर सुला दिया है और कॉलोनी की आयाएं घर में इकट्ठी होकर बच्चे के दूध और बिस्किट की पार्टी करती हैं।

ऐसे प्रकरण भी सीसीटीवी कैमरों में पकड़े गए हैं जब आयाओं द्वारा बच्चों को चुप करवाने के लिए उन्हें बेरहमी से मारा-पीटा जाता है और बच्चा डर-सहम कर सो जाता है।

चौके चूल्हे वाली औरतें ही अब घरों में तुलसी का पौधा लगाती हैं, सुबह शाम तुलसी के पास दिया रखकर उसे प्रणाम करती हैं। चौके चूल्हे वाली औरतें ही अपने घरों में भगवान की आरती करती हैं, अपने परिवार के सदस्यों की प्रसन्नता के लिए तरह-तरह के त्यौहार और पर्व मनाती हैं तथा त्यौहार पर विविध प्रकार के व्यंजन बनाती हैं।

नौकरी पर जाने वाली औरतों में अधिकांश के पास इतना सब करने के लिए समय नहीं होता। इस कारण अब भारतीय परिवारों में परम्परागत व्यंजन बनने बंद हो गए हैं। इस मामले में हालत इतनी ज्यादा खराब है कि अब किसी नई उम्र की लड़की को कढ़ी जैसी सामान्य चीज भी बनानी हो तो वे यूट्यब पर वीडियो देखकर बनाती हैं। 

मैं नौकरी करने वाली औरतों का दुश्मन नहीं हूँ। मुझे उनके साथ बहुत सहानुभूति है। निश्चित रूप से परिवार में आर्थिक समृद्धि लाने में  उनका बड़ा बड़ा योगदान है किंतु इस समृद्धि के लिए उन्हें बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। वे सुबह से शाम तक काम करती हैं।

ये पढ़ी-लिखी औरतें बसों में धक्के खाती हैं, बॉस की डांट सुनती हैं, ऑफिस से छुट्टी लेने के लिए हर समय तनाव में रहती हैं। ऑफिस जाने से पहले घर में खाना बनाती हैं, ऑफिस से लौटकर फिर खाना बनाती हैं या बाजार से बना-बनाया खाना मंगवाती हैं। किसी तरह से बच्चों को पीट-पाटकर उनका होमवर्क करवाती हैं और थकान से चूर-चूर होकर पलंग पर गिर जाती हैं। यह थकान ही अक्सर दाम्पत्य जीवन में तनाव उत्पन्न करने का कारण बनती है। आजकल बहुत सी लड़कियां वर्क फ्रॉम होम करती हैं। उन्हें 12-14 घण्टे प्रतिदिन काम करना पड़ता है।

आज बहुत सी औरतें हैं जो किसी अच्छी नौकरी पर लग जाती हैं तो फिर नौकरी करने के लिए परिवार नहीं बसातीं। विवाह नहीं करतीं, लिव इन रिलेशन में रहती हैं, बॉयफ्रैंड बनाती हैं। ऑफिस और बॉयफ्रैंड के चक्कर में अपने परिवार से पूरी तरह कटकर जीती हैं। बच्चे पैदा नहीं करतीं जिसके कारण देश की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है।

मैंने ऐसी लड़कियों को महानगरों में सड़कों के किनारे खड़े होकर पिज्जा-बर्गर, चाउमीन और समोसे खाते हुए देखा है। इन्हें पौष्टिक आहार के नाम पर कुछ नहीं मिलता। धीरे-धीरे मन और जीवन दोनों में पसर आए खालीपन को दूर करने के लिए इनमें से बहुत सी लड़कियां सिगरेट और शराब का सहारा लेती हैं।

युवावस्था में तो सब झेल लिया जाता है किंतु वृद्धावस्था में इनमें से अधिकांश औरतों को कोई सहारा देने वाला तक नहीं मिलता।

बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी। आज स्त्री और पुरुष दोनों कमाते हैं, उसके चलते चीजें कितनी महंगी हो गई हैं, पहले एक कमाता था, सात-आठ लोग खाते थे, आज पति-पत्नी दोनों कमाते हैं, मिलर अपनी छोटी सी गृहस्थी भी नहीं चला पाते हैं।

उनकी आय का लगभग सारा पैसा बच्चों की एज्यूकेशन, मेडिकल ट्रीटमेंट, डिलीवरी, मकान का किराया, कार का लोन, मकान का लोन चुकाने में खर्च होता है। क्या फायदा हुआ, दोनों के कमाने से। जो मकान आज से बीस-तीस साल पहले हजारों में आता था, अब करोड़ों में आता है।

क्या चौका-चूल्हा करना पिछड़ेपन की निशानी है। कोई तो इस काम को करेगा। चौका-चूल्हा के बिना परिवार के सदस्यों के मुंह में पौष्टिक भोजन का निवाला कैसे जाएगा!

यदि कोई औरत अपने घर में चौका-चूल्हा करे तो पिछड़े पन की निशानी और जब वही औरत किसी होटल में जाकर शेफ बने, किसी रेस्टोरेंट में टेबल-टेबल जाकर खाने को ऑर्डर ले या ग्राहकों के झूठे बर्तन उठाए, उन्हें शराब परोसे, तो वह एडवांसमेंट की निशानी है।

ऐसा एडवांसमेंट किस काम का? इससे तो घर में चौका चूल्हा करके अपने परिवार की सजाना-संवारना कई गुना अधिक अच्छा है। परिवार और देश की जीडीपी में चौके-चूल्हे वाली औरतों का योगदान किसी से कम नहीं होता, अधिक ही होता है।

देश की जीडीपी में ग्रोथ के साथ-साथ देश का डेमोग्राफिक बैलेंस भी जरूरी है। यदि डेमोग्राफी बदल गई तो हमारा देश ही नहीं रहेगा, फिर तो जीडीपी का भी क्या अर्थ रह जाएगा। इसलिए चौके चूल्हे वाली औरतें हर तरह से अभिनंदन के योग्य हैं, सम्मान और श्रद्धा की पात्र हैं। चौका-चूल्हा हमारे लिए गौरव का विषय है, न कि हीनता की निशानी या पिछड़ेपन की निशानी। इंदिरा गांधी और मार्गेट थैचर तक चौका-चूल्हा करती थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नए युग की चुड़ैलें!

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नए युग की चुड़ैलें

नए युग की चुड़ैलें पढ़ी-लिखी हैं, सुंदर हैं, पैसे वाली हैं, दुस्साहसी हैं। ऊँची सोसाइटी में रहती हैं तथा मोटा बैंक-बैलेंस रखती हैं।

15 जून 2025 को जोधपुर के न्यूज पेपर्स में एक समाचार छपा कि एक स्कूल संचालक ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। उसे किसी औरत ने हनी ट्रैप में फंसा लिया था। इस स्कूल संचालक ने अपने सूसाइड नोट में लिखा है कि अब वह थक गया है, और अधिक नहीं झेल सकता, इसलिए आत्महत्या कर रहा है। मेरा विचार है कि किसी पुरुष को हनीट्रैप में फंसाने वाली कोई औरत तो नहीं हो सकती, कोई चुड़ैल ही हो सकती है।

कमाल हो भई नए युग की चुड़ैलें आप भी! आपने किसी पुरुष को हनीट्रैप में फंसाया तो फंसाया, थोड़ा-बहुत पैसा छीन-झपट कर उसे जिंदा तो छोड़ देतीं किंतु आपने अपने शिकार को इतना निचोड़ा कि कि उस बेचारे मनुष्य को आत्महत्या ही करनी पड़ी।

चुड़ैलों के बारे में मुझे सबसे पहले शेक्सपीयर के नाटक मैकबेथ से पता लगा। तीन बहिनों के रूप में रहने वाली वे चुड़ैलें बड़ी अजीब सी हैं, बड़ी कुरूप, डरावनी, टोना टोटका करने वाली और कुछ-कुछ जादुई ताकतों वाली, वैसी चुड़ैलें शायद भारत में नहीं पाई जातीं।

मैंने बचपन में सुनी कहानियों से जाना है कि भारतीय चुड़ैलें बहुत सुंदर होती हैं। वे अक्सर किसी सुंदर, युवा और धनवान युवक को आकर्षित करती हैं, फिर उसे मारकर उसका खून पी जाती हैं। मैंने यह भी सुना है कि चुड़ैलें उलटे पैरों से चलती हैं।

हालांकि मुझे ठीक-ठीक तो आज भी नहीं पता कि चुड़ैल क्या होती है, कैसी होती है किंतु मेरा विश्वास है कि आजकल भारत के शहर-शहर में नए युग की चुड़ैलें घूम रही हैं। आजकल की ये चुड़ैलें भी बहुत सुंदर हैं, ये भी किसी धनवान पुरुष का शिकार करती हैं, महंगे कपड़े पहनती हैं, महंगे फोन रखती हैं, महंगा मेकअप करती हैं तथा उल्टें पैरों से चलती हैं। इनकी आवाज में जादू है, पलक झपकते ही आदमी को अपने वश में करती हैं।

आजकल इंदौर की उस चुड़ैल के किस्से तो रोज टेलिविजन पर देखने को मिल ही रहे हैं कि कैसे उसने अपने नए-नवेले पति से कहा कि तुम मुझे विधवा कर दो। अपने पति की हत्या करवाने के बाद सोनम नाम की यह चुड़ैल पूरे 17 दिन तक बुरका पहनकर हिन्दुस्तान के अलग-अलग शहरों में बेखौफ घूमती रही। टेलिविजन वाले बता रहे हैं कि उसे चुड़ैल ने अपने पति को मरवाने के लिए अपने बचपन के मित्रों को बीस लाख रुपए की सुपारी दी। बाप रे कितनी धनवान और कितनी हिम्मती हैं ये भारतीय चुड़ैलें!

कुछ दिन पहले ही एक ऐसी चुड़ैल का कारनामा सामने आया जिसने अपने पति के साथ हिल स्टेशन पर जाकर खूब डांस-वांस किए और फिर उसकी हत्या करके उसके शरीर को सीमेंट के ड्रम में ही जमा दिया ताकि उसके शव के सड़ने से बदबू नहीं निकले और पुलिस उसके शव को नहीं ढूंढ सके।

पतियों को मारने वाली नई युग की चुड़ैलें सामान्यतः अपने पतियों को अपने बॉयफ्रेण्डों से मरवाती हैं, वहीं कुछ चुड़ैलें तो अपने पति को मारने का परिश्रम भी नहीं करतीं। पतियों से ही कहती हैं कि चलो अब तुम खुद ही मर जाओ। मुझे क्यों तकलीफ देते हो!

जौनपुर की उन दो चुड़ैलों के नाम आप भूले नहीं होंगे। इन चुड़ैलों ने अतुल सुभाष नामक एक युवक से इतना पैसा खींचा कि उस बेचारे को आत्महत्या करके ही अपनी जान छुड़ानी पड़ी। अतुल सुभाष ने तो अपने सूसाइड नोट में अपनी सास और पत्नी के रूप में खून चूस रही इन चुड़ैलों के साथ-साथ एक महिला जज का नाम भी लिखा है कि वह भी इन चुड़ैलों के साथ मिल गई। ताकि अधिक से अधिक पैसा खींचा जा सके।

आगरा के 28 वर्षीय मानव शर्मा ने भी एक चुड़ैल से पीछा छुड़ाने के लिए आत्महत्या कर ली। वह चुड़ैल मानव शर्मा की पत्नी थी और दूसरे पुरुषों से सम्बन्ध रखती थी। मना करने पर अपने पति को झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देती थी। उससे पीछा छुड़ाने का मानव शर्मा के पास और कोई उपाय नहीं बचा था।

12 मार्च 2025 को गुड़गांव के सोहना के रहने वाले 45 वर्षीय भारत ने आत्महत्या कर ली। उसने अपने सूसाइड नोट में लिखा है कि उसकी पूर्व पत्नी उसे फोन करके सम्पत्ति मांगती है और मना करने पर आत्महत्या करने के लिए उकसाती है। पति ने सचमुच आत्महत्या कर ली।

कर्नाटक के पीटर का नाम भी सुर्खियों में आया था। उसने भी चुड़ैल के अत्याचारों से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या कर ली। उसने अपने सूसाइड नोट में अपने पिता को लिखा कि डैडी मुझे माफ कर दीजिए मेरी पत्नी पिंकी मुझे इतना टॉर्चर करती है कि अब मैं जी नहीं सकता।

गजरौला के दिवाकर शर्मा का नाम आपने शायद ही सुना हो जिसने 27 मार्च 2025 को भरी दोपहरी में अपने घर में फांसी लगा ली। दिवाकर शर्मा की पत्नी हिरदेश उर्फ अंजू शादी के कुछ दिन बाद ही लड़-झगड़ कर अपने पीहर चली गई। वह रोज अपने पति को फोन करके मरने के लिए उकसाती थी। वह अपने पति से कहती थी कि तेरे मरने के बाद ही मुझे शांति मिलेगी। यदि तू नहीं मरा तो मैं तेरा जीवन तहस-नहस कर दूंगी। झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी देती थी।

दिवाकर शर्मा ने मौत को गले लगाने से पहले अंजू से वीडियो कॉल पर बात की। वीडियो कॉल पर भी अंजू दिवाकर को मरने के लिए उकसाती रही। अपने जीवन से निराश दिवाकर ने खुदकुशी कर ली। अब अंजू अपने मृत पति दिवाकर के पिता के मकान पर कब्जा करना चाहती है। अंजू अपने पति दिवाकर शर्मा के अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं आई।

16 मई 2025 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर सदर कोतवाली क्षेत्र में एक सहायक अध्यापक कोविद कुमार ने अपनी पत्नी और सास की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले बनाए एक वीडियो में उसने बताया कि उसकी पत्नी लक्ष्मी कुशवाहा अपनी मां, बहन और भाई के साथ रहती है। पत्नी लक्ष्मी ने अपने पति कोविद कुमार के विरुद्ध दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा रखा है। हर महीने उसकी सैलरी का पूरा पैसा ले लेती है और अपने पति पर दबाव बनाती है कि तुम अभी मर जाओ ताकि तुम्हारी नौकरी हमें मिल जाए।

एक चुड़ैल तो ऐसी निकली जो अपने पति और बच्चों को छोड़कर अपने पाकिस्तानी मित्र के साथ घूमने-फिरने मौज मनाने के लिए भारत की सीमा पार करके पाकिस्तान पहुंच गई। अंजू नाम की यह चुड़ैल कुछ दिन पाकिस्तान में मौज-मस्ती करने के बाद फातिमा बनकर फिर से भारत लौट आई।

अरे भई तू कैसी चुड़ैल है, तू ने अपने देश, अपने धर्म, अपने पति को छोड़ा सो छोड़ा, तू तो अपने बच्चों से भी प्रेम नहीं कर पाई! बच्चों के लिए तो माताएं अपनी जान तक दे देती हैं।

कुछ दिन पहले मैंने यूट्यूब पर एक शॉर्ट देखा जिसमें एक चुड़ैल अपनी सगी बूढ़ी एवं विधवा माँ को धरती पर घसीट-घसीट कर पीटती हुई दिखाई दे रही थी क्योंकि बूढ़ी, अशक्त और विधवा माँ अपना घर उस चुड़ैल के नाम नहीं कर रही थी! पुलिस ने उस बुढ़िया को उस चुड़ैल के चंगुल से निकाला।

आज ही टेलिविजन पर एक समाचार देखने को मिला कि यूपी के हरदोई में एक पैट्रौल पम्प पर एक चुड़ैल ने जरा सी कहा-सुनी होने पर पैट्रौल पम्प के कर्मचारी की छाती पर पिस्तौल रख दी। क्या शानदार पर्सनल्टी, क्या गजब का आत्मविश्वास, क्या उसका महंगा पहनावा, कैसी उसकी गाड़ी!

महिला सशक्तीकरण के नाम पर भारतीय नारी को भारत की मूल संस्कृति के विरुद्ध भड़का कर ऐसी जीवन पद्धति की ओर धकेल दिया गया है जिसमें असंतोष और दुख के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला। मनुष्य को किसी के भड़कावे में नहीं आना चाहिए, अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए। जीवन का सुख किस बात में है, इस बात को समझना चाहिए।

आज बहुत सी पढ़ी-लिखी लड़कियां पैसे की हवस के कारण अपराध करके जेलों में बैठी हैं। नारी शक्ति के पुराधाओं ने उन्हें इस हालत में पहुंचा दिया। भारतीय समाज की दुर्गति करने वाले महिला सशक्तीकरण के अलम्बरदार अब कहां हैं। क्या वे इन लड़कियों को फिर से शांत और सुखी जीवन दे सकते हैं!

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते वाले देश में अचानक ही ये चुड़ैलें कहां से घुस आईं। मां के चरणों में सिर रखने वाली भारतीय संस्कृति अचानक ही चुड़ैलों के कहर से कैसे कांप उठी!

नए युग की चुड़ैलें कृपा करके शांत हो जाएं। भगवान के लिए शांत हो जाएं। मानवता के लिए शांत हो जाएं। अपनी जिंदगी में सुख-चैन बनाए रखने के लिए शांत हो जाएं।

भगवान ने तुम्हें बहुत सुंदर जीवन दिया है। तुम चुड़ैल नहीं हो। तुम हमारी मां, बहिन, बेटी, पत्नी, बुआ, चाची, दादी, नानी हो। तुमने अपनी कोख में हमें पाला है, हमारा बचपन तुम्हारी बांहों में झूला झूलकर बड़ा हुआ है। तुम्हारी लोरियां आज भी हमारे कानों में गूंजती हैं। आज तुम्हारे कारण पूरी नारी जाति अपमानित हो रही है।

आओ! फिर से भारतीय संस्कृति के सुनहरे पथ पर लौट आओ। हंसी-खुशी अपनी घर-गृहस्थी बसाओ। अपने पति की कमाई हुई रूखी-सूखी रोटियां अपने बच्चों और पति के साथ मिल-बांट कर खाओ।

पढ़ाई-लिखाई, रुपया पैसा, अच्छे कपड़े, अच्छा मेकअप, घूमना फिरना, बैंक बैलेंस, पद-प्रतिष्ठा जिंदगी में उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितनी की शांत नदी की तरह अपनी यात्रा पूरी करने वाली उजली-उजली सी जिंदगी।

जीवन रूपी बगिया न औरत के बिना महक सकती है और न पुरुष के बिना। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, एक दूसरे की ताकत हैं। एक-दूसरे का सुख हैं। जीवन की सुंदरता शांति धारण करने में है, किसी की भी शांति छीनने में नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पतियों को मारने वाली पढ़ी-लिखी औरतें!

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पतियों को मारने वाली पढ़ी-लिखी औरतें!

भारत सरकार के क्राइम डाटा एवं राज्य सरकारों की रिपोर्टों के अनुसार विगत पांच सालों में केवल बिहार, यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में 785 ऐसे केस पुलिस में रिपोर्ट हुए जिनमें पत्नियों ने ही अपने पति की हत्या की या करवाई। पतियों को मारने वाली इन औरतों में से अधिकांश औरतें पढ़ी-लिखी हैं और आर्थिक रूप से स्वावलम्बी हैं। इस आलेख में पतियों को मारने वाली पढ़ी-लिखी औरतों के मनोविज्ञान का विश्लेषण किया गया है।

कुछ समय पहले तक उन हिन्दू लड़कियों के शव मिलते थे जो लव जिहादियों के हत्थे चढ़कर सूटकेसों में पैक होती थीं किंतु आजकल देश में उन पतियों के शवों की बाढ़ आ गई है जिन्हें उनकी ही ब्याहता पत्नी ने मारा या मरवाया है।

भारत सरकार के क्राइम डाटा एवं राज्य सरकारों की रिपोर्टों के अनुसार विगत पांच सालों में केवल बिहार, यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में 785 ऐसे केस पुलिस में रिपोर्ट हुए जिनमें पत्नियों ने ही अपने पति की हत्या की या करवाई। पतियों को मारने वाली इन औरतों में से अधिकांश औरतें पढ़ी-लिखी हैं और आर्थिक रूप से स्वावलम्बी हैं।

पति या पत्नी के प्राण ले लेना तो भारत की संस्कृति नहीं है, न ही भारत की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जिसमें पति या पत्नी एक-दूसरे की हत्या करें। यह इन आंकड़ों की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि पति या पत्नी की हत्याओं का सिलसिला तब से अपने चरम पर पहुंचा है जब से भारत में महिलाओं का  सशक्तीकरण किया गया है।

भारत की आजादी के बाद नारी सशक्तिकरण और महिला मुक्ति के बड़े-बड़े आंदोलन चले। अमरीकी एनजीओज तथा यूएन प्रायोजित संस्थाओं द्वारा चलाए गए इन आंदोलनों के नेताओं द्वारा कहा गया कि जब तक भारतीय नारी शिक्षित नहीं होगी, तब तक भारतीय नारी पर अत्याचार होने बंद नहीं होंगे। जब नारियां शिक्षित होने लगीं, तब कहा गया कि जब तक नारी घर से बाहर निकलकर आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होगी, तब तक भारतीय नारी स्वयं पर होने वाले अत्याचारों का सामना नहीं कर सकेगी।

इन आंदोलनों का परिणाम यह हुआ कि भारतीय नारी शिक्षा और रोजगार पाने के लिए घरों से बाहर निकलीं और पुरुषों की ही तरह शिक्षा एवं नौकरियां पाकर आर्थिक रूप से सक्षम होने लगीं। उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिए जाने लगे। निश्चित रूप से नारी में कार्य करने की क्षमता और लगन, पुरुष से कई गुना अधिक है। इस कारण कुछ ही दशकों में इन शिक्षित भारतीय नारियों ने पुरुषों पर बढ़ बना ली और भारत के निजी क्षेत्र के रोजगारों में पूरी तरह से छा गईं।

शिक्षा और आर्थिक स्वावलम्बन के इस लक्ष्य को पाने के बाद नारी मुक्ति आंदोलन के लोगों ने भारत की शिक्षित एवं पैसे वाली भारतीय नारियों के समक्ष नया लक्ष्य रखा कि नारी का शरीर उसका अपना है, उस पर अन्य किसी का अधिकार नहीं है। नारी को पूरा अधिकार है कि वह अपनी मर्जी के पुरुष से प्रेम करे, उसके साथ लिव इन रिलेशन में रहे, अपनी मर्जी के कपड़े पहने। अपनी मर्जी से डाइवोर्स ले। बड़े शहरों एवं मध्यम कस्बों की बहुत सी पढ़ी-लिखी एवं पैसे वाली नारियों ने इन आवाजों को महामंत्र की तरह स्वीकार कर लिया और उसी रास्ते पर चल पड़ीं।

इस महामंत्र से ग्रस्त नारियों ने सड़कों पर निकलकर नारे लगाए- माई स्कर्ट इज लाउडर दैन योअर वॉइस। यह एक तरह से भारत की सामाजिक परम्परा को सीधी-सीधी चुनौती थी, या यूं कहें कि भारत के परम्परावादी समाज के विरुद्ध खुला विद्रोह था किंतु इन नारी मुक्ति आंदोलन वालों की प्रबलता देखकर भारतीय समाज इतना साहस नहीं जुटा पाया कि वह इस पढ़ी-लिखी, पैसे वाली और स्वतंत्र विचार रखने वाली नारी को विवेक के मार्ग पर चलने की सलाह दे सके ताकि परिवार नामक संस्था को बिखरने से रोका जा सके।

नारी सशक्तीकरण आंदोलनों में कही गई बातों के अनुसार तो इन शिक्षित, स्वावलम्बी और स्वतंत्र मस्तिष्क वाली नारियों को सुखी हो जाना चाहिए था किंतु हुआ ठीक उलटा। बहुत सी शिक्षित, स्वावलम्बी और स्वतंत्र मस्तिष्क वाली नारियां लव जिहाद में फंस गईं। त्रिकोणीय प्रेम सम्बन्धों की आग में घिर गईं। घर और ऑफिस की दोहरी जिम्मदारियों में धंस गईं। बहुत सी औरतें सिगरेट और शराब की आदी होकर स्वास्थ्य की गंभीर समस्याओं से ग्रस्त हो गईं।

जब मनुष्य की जेब में पैसा आता है तो स्वाभाविक है कि उसके मन में कुछ दृढ़ता एवं अहंकार भी जागृत हो जाता है। बहुत सी नारियां अहंकारग्रस्त होकर अपने परिवार, समाज और सहकर्मियों का प्रेम और सहानुभूति खो बैठीं। इन नारियों को सिखाया और समझाया गया कि तुम्हें प्रेम और सहानुभूति की नहीं अपितु अधिकारों की जरूरत है, रूपयों और पदों की जरूरत है। यही कारण था कि इन नारियों को प्रेम और सहानुभूति नहीं मिली, केवल अधिकार मिले, पद मिले, स्वतंत्र रहने के विचार मिले और लाखों रुपयों के पैकेज मिले।

पिछले कुछ दशकों से भारत में अपराध के बढ़ते हुए ग्राफ को देखकर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि जब से भारत की नारी शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वावलम्बी हुई है, भारतीय सामाजिक परम्पराओं के रेशमी और मुलायम बंधनों को तोड़कर स्वतंत्र विचारों की स्वामिनी हुई है तब से भारतीय नारी पर अत्याचारों की मात्रा कई गुना बढ़ गई है। शिक्षा और धन के बल पर स्वतंत्र और सबल हुई नारियों के कटे हुए शव सूटकेसों में मिलने लगे हैं।

आज नारियों के ऊपर पहले से भी अधिक जघन्य अपराध हो रहे हैं। आजादी से पहले के भारतीय समाज में नारी पर दहेज आदि को लेकर जितने अत्याचार होते थे, आज दहेज उत्पीड़न तो सुनने में नहीं मिलता किंतु नारियों की हत्याओं में कई गुना वृद्धि हो गई है। अशिक्षित, कम पढ़ी-लिखी नारी भले ही स्वयं पर होने वाले अत्याचारों का मुकाबला नहीं कर पाती थी किंतु वह स्वयं अपराधों में बहुत कम लिप्त होती थी।  शायद ही फूलनदेवी जैसी कोई पीड़ित औरत अपराध और हत्याओं का मार्ग चुनती थी।

आज तो भारतीय नारी त्रिकोणीय प्रेम सम्बन्धों में फंसकर स्वयं भी जघन्य अपराध करने लगी हैं। पिछले पांच साल में ही भारत में बहुत से पुरुषों को अपनी पत्नियों के अत्याचारों से दुखी होकर आत्महत्याएं करनी पड़ी हैं। बहुत से पतियों और प्रेमियों की लाशें सूटकेसों और सीमेंट के ड्रमों, कचरे के डिब्बों और जंगलों में मिली हैं। लवजिहाद में फंसी बहुत सी लड़कियों के शव उनके ही प्रेमियों ने सूटकेसों में बंद करके जंगलों में फैंके हैं या सुनसान जगहों पर छोड़े हैं।

नारियों द्वारा किए जा रहे एवं नारियों के प्रति बढ़ रहे अत्याचारों की आड़ में, मैं यह कतई नहीं कह रहा कि शिक्षा या आर्थिक स्वावलम्बन भारतीय नारियों को अपराध की ओर ले गया है या नारियों पर अत्याचार का कारण बना है। किंतु आदमी सोचने के लिए विवश तो होता ही है कि क्या अब वह समय वापिस आ गया है जब लड़कों को कम पढ़ी-लिखी लड़कियों को अपनी पत्नी के रूप में चुनना चाहिए!

देश में नारियों के प्रति बढ़ रहे अत्याचार के ग्राफ को देखते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि आज के स्कूलों, कॉलेजों एवं यूनिवर्सिटियों में जो शिक्षा दी जा रही है, उस शिक्षा में दोष है। चाहे नारी हो या पुरुष दोनों को ही आज व्यक्तिवादी शिक्षा दी जा रही है जिसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों ही अपने-अपने अहंकार एवं अहंकार जन्य कुण्ठाओं से ग्रस्त होकर एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हो गए हैं।

आज की शिक्षा ऐसी है कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, दोनों में ही एक दूसरे की सेवा करने की, एक दूसरे से प्रेम करने की, एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव रखने की, एक दूसरे को संरक्षण देने की भावना समाप्त को समाप्त करती है तथा एक ऐसे मानसिक अंधकार में धकेल देती है, जहाँ केवल और मैं और मैं का भाव छाया रहता है। जहां दया, करुणा, क्षमा जैसे शब्द अत्याचारों के प्रतीक हैं तथा अधिकारों की प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।

आज की युवा पीढ़ी को घर से लेकर विद्यालय तक कोई यह शिक्षा नहीं देता कि स्त्री पुरुष एक दूसरे के शत्रु या प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, एक दूसरे के मित्र हैं, साथी हैं, अनंतकाल के सहचर हैं, एक दूसरे का जीवन सुखद एवं सरल बनाने के लिए हैं। केवल बराबरी ही स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों की एकमात्र धुरी नहीं हो सकती। बराबरी का दावा मनुष्य के जीवन से चैन छीनकर असंतोष भर देता है और एक दूसरे के प्रति समर्पण की भावना जीवन में सुगंध भर देती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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