Friday, June 14, 2024
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अध्याय -16 – बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव (द)

बौद्ध संगीतियाँ एवं बौद्ध धर्म का विभाजन

बौद्ध धर्म के विकास में बौद्ध संगीतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा। चूंकि इन सभाओं में मूलतः बुद्ध के वचनों को उनके शिष्यों द्वारा सर्वजनहिताय दोहराया या गाया गया था इसलिए इन्हें संगीति कहा गया। बौद्ध धर्म के लम्बे इतिहास में चार संगीतियों का विशेष महत्त्व है।

प्रथम बौद्ध संगीति

पहली बौद्ध संगीति महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद ई.पू.483 में राजगृह के समीप सत्तपन्नी गुफाओं में हुई। इसमें पांच सौ भिक्षुओं ने भाग लिया तथा इसकी अध्यक्षता महाकश्यप ने की। इस सभा में बुद्ध के धर्म और विनय सम्बन्धी यत्र-तत्र बिखरे हुए उपदेशों का संकलन किया गया। बुद्ध के धर्म सम्बन्धी उपदेशों का कथन आनंद ने किया तथा उपालि ने विनय सम्बन्धी उपदेश दोहराए। इनका संकलन क्रमशः सुत्तपिटक एवं विनय-पिटक नामक ग्रंथों में किया गया।

इस संगीति के लगभग 400 साल बाद अर्थात् ई.पू.90 में इन ग्रंथों को लंका देश में पालि भाषा में लिपिबद्ध किया गया। सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेशों का वार्तालाप के रूप में संकलन है। इसी पिटक में जातक कथाएं भी हैं जिनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों का वृत्तान्त दिया गया है। इस ग्रंथ से तत्कालीन भारतीय समाज की दशा पर भी प्रकाश पड़ता है। जातक कथाओं से भारतीय धर्म की अवतारवाद की धारणा पर प्रकाश पड़ता है।

विनय-पिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम तथा बौद्धसंघ के नियमों का संकलन है। प्रथम बौद्ध संगीति में संघ के नियमों की व्यावहारिकता को लेकर कुछ मतभेद उत्पन्न हुए जिनके कारण बौद्ध संघ दो भागों में बंट गया। जो भिक्षु परम्परागत कठोर नियमों के अनुयाई थे, वे ‘स्थविर’ कहलाए परन्तु जो भिक्षु संघ में नवीन नियम लागू करने के पक्ष में थे, वे ‘महासांघिक’ कहलाए।

द्वितीय बौद्ध संगीति

जब बौद्ध धर्म का प्रचार विभिन्न जनपदों में हो गया और भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी तो संघ के अनुशासन के नियमों में परिवर्तनों की मांग होने लगी। वैशाली तथा पाटलिपुत्र के बौद्ध-भिक्षु अनुशासन सम्बन्धी दस नियमों के बन्धन में शिथिलता की मांग करने लगे जबकि कौशाम्बी, अवन्ती आदि के बौद्ध-भिक्षु समस्त नियमों के कड़ाई से पालन के पक्षधर थे। इन मतभेदों को दूर करने के लिए बुद्ध के निधन के सौ वर्ष बाद अर्थात् ई.पू.383 में वैशाली में स्थविर यश नामक बौद्ध आचार्य द्वारा बौद्ध धर्म की दूसरी संगीति बुलाई गई।

इस संगीति के आयोजन का उद्देश्य भिक्षुओं के मतभेदों पर विचार करके बौद्ध धर्म के सत्य सिद्धांतों का प्रतिपादन करना था किंतु उनके मतभेद और तीव्र हो गए। इस सभा में स्थविरों और महासांघिकों ने अलग-अलग महासमिति करके अपने-अपने ढंग से बौद्ध धर्मशास्त्रों का सम्पादन किया। आगे चलकर बौद्धधर्म 18 निकायों (सम्पद्रायों) में बंट गया। थेरवादी अर्थात् स्थविरों से 11 निकाय तथा महासांघिकों से 7 निकाय निकले।

तृतीय बौद्ध संगीति

तीसरी संगीति, द्वितीय बौद्ध संगीति के लगभग 136 वर्षों बाद, ई.पू.247 में मगध सम्राट अशोक के समय में पाटलिपुत्र में हुई। इसकी अध्यक्षता बौद्ध-भिक्षु मोग्गलीपुत्र तीसा (तिष्य) ने की तथा इसमें 1000 बौद्ध-भिक्षुओं ने भाग लिया। यह संगीति लगभग 9 माह तक चली। यद्यपि अशोक ने बौद्ध धर्म के समस्त सम्प्रदायों की एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया किंतु इस संगीति में स्थ्विरवादियों की प्रधानता रही।

इस संगीति में ‘अभिधम्मपिटक’ नामक तीसरे पिटक की रचना की गई जिसमें प्रथम दो पिटकों के सिद्धांतों और बौद्ध धर्म का दार्शनकि विवेचन तथा अध्यात्म चिंतन था। तिष्य रचित ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ इसी संगीति में प्रमाण रूप में स्वीकृत हुआ।

अशोक द्वारा बुलाई गई इस संगीति के महत्व को प्रतिपादित करते हुए इतिहासकार हण्टर ने लिखा है- ‘इस संगीति के माध्यम से लगभग आधी मानव जाति के लिए साहित्य और धर्म का सृजन किया गया और शेष आधी मानव-जाति के विश्वासों को प्रभावित किया गया।’

चतुर्थ बौद्ध संगीति

चौथी संगीति कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल में काश्मीर में हुई। यह ज्येष्ठ वसुमित्र और महान् बौद्ध दार्शनिक एवं कवि अश्वघोष के सभापतित्त्व में सम्पन्न हुई। इसमें भारत भर के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों एवं भिुक्षुओं के साथ-साथ अन्य देशों के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों एवं भिक्षुओं को भी आमंत्रित किया गया किंतु इसमें उत्तरी भारत के हीनयान सम्प्रदाय के बौद्धों का बाहुल्य रहा तथा हीनयानियों के ‘सर्वास्तिवाद’ नामक सम्प्रदाय के आचार्य एवं भिक्षु सर्वाधिक संख्या में उपस्थित रहे। इस संगीति में तीनों पिटकों के तीन विशाल भाष्यों (टीकाओं) की रचना हुई जो ‘विभाषाशास्त्र’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

बौद्ध धर्म का मुख्य साहित्य

बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व, समस्त भारतीय साहित्य संस्कृत भाषा में था। जब तक भारत की जनभाषा संस्कृत थी तब तक यह साहित्य सम्पूर्ण समाज को स्वीकार्य था किंतु महात्मा बुद्ध के समय तक संस्कृत भारत की जनभाषा नहीं रह गई थी। वह केवल ग्रंथ-भाषा एवं अभिजात्य वर्ग की भाषा बनकर रह गई थी।

इसलिए बुद्ध ने अपने उपदेश जनभाषा पालि में दिए। यही कारण था कि प्रारंभ में बौद्ध ग्रंथों की रचना केवल पालि भाषा में हुई। इस भाषा का समस्त प्रारम्भिक साहित्य बौद्ध धर्म के अभ्युदय का ही परिणाम है। बौद्ध धर्म के तीन मूल ग्रंथ सामूहिक रूप से ‘त्रिपिटक’ कहलाते हैं।

इनके नाम- (1.) सुत्तपिटक (2.) विनय-पिटक तथा (3.) अभिधम्मपिटक हैं। पिटकों की टीकाएं ‘विभाषाशास्त्र’ कहलाती हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों में- (1.) अंगुतर निकाय (2.) खुदक निकाय तथा (3.) कथावत्थु प्रमुख हैं।

बौद्ध ग्रंथों में बौद्ध धर्म के विभिन्न अंगों, निर्वाण प्राप्ति के साधन, पुनर्जन्म, आत्मज्ञान, आत्मचिन्तन, विश्व की उत्पत्ति, जाति-व्यवस्था की कृत्रितमा आदि विषयों का विवेचन किया गया है। सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेश सूत्रों के रूप में दिए गए हैं। विनय-पिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम हैं। अभिधम्मपिटक में गौतम बुद्ध के उपदेशों की विवेचना है। यह सात अध्यायों में विभक्त है।

इन त्रिपिटकों की अनेक टीकाएँ तथा व्याख्याएँ रची गईं जिनमें बौद्ध धर्म के नैतिकता सम्बन्धी नियमों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गई है। धम्मद नामक ग्रन्थ को बौद्ध धर्म की गीता कहा जा सकता है। इस ग्रंथ में 424 गाथाएँ हैं जिनमें बौद्ध धर्म का सार प्रस्तुत किया गया है। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्म की 574 कथाएं हैं। बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक रचनाएँ लिखीं जो भारतीय साहित्य कोष का अक्षय भण्डार हैं।

महाकवि अश्वघोष ने ‘बुद्धचरितम्’ की रचना की जिसमें गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र की बहुत अच्छी जानकारी दी गई है। ‘महावंश’ अथवा ‘दीपवंश महाकाव्य’ लंका देश का पालि महाकाव्य है। इस ग्रंथ से लंका के इतिहास, धर्म एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है। ‘मिलिंद पन्हो’ नामक बौद्ध ग्रन्थ में बैक्ट्रियन और भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग पर शासन करने वाले हिंद-यूनानी शासक मैनेन्डर और प्रसिद्ध बौद्ध-भिक्षु नागसेन के संवाद का वर्णन किया गया है।

इसमें ईसा की पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारतीय जीवन की झलक देखने को मिलती है। ‘दिव्यावदान’ नामक ग्रंथ में सम्राट अशोक, उसके पुत्र कुणाल तथा अनेक तत्कालीन राजाओं की जानकारी मिलती है। प्रकार यह पुस्तक मौर्यकालीन इतिहास को जानने का अच्छा स्रोत है। ‘मंजूश्रीमलकल्प’ में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त सम्राटों का विवरण लिखा गया है।

साथ ही कुछ अन्य प्राचीन राजवंशों का संक्षिप्त वर्णन प्राप्त होता है। ‘अंगुत्तर निकाय’ में सोलह प्राचीन महाजनपदों का वर्णन मिलता है। ‘ललित विस्तार’ और ‘वैपुल्य सूत्र’ से भी बौद्ध धर्म के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं।

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता एवं द्रुत प्रसार के कारण

बौद्ध धर्म का आविर्भाव नेपाल की तराई में हुआ था किन्तु महात्मा बुद्ध और उनके अनुयाइयों के प्रयासों से बौद्ध धर्म बहुत कम समय में भारत के विभिन्न हिस्सों में फैल गया और तिब्बत, चीन, बर्मा, अफगानिस्तान एवं लंका आदि देशों तक चला गया। बौद्ध धर्म की व्यापक लोकप्रियता के अनेक कारण थे। इनमें से कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

(1.) बुद्ध के व्यक्तित्त्व की महानता: बौद्ध धर्म की लोकप्रियता तथा उसके दु्रत प्रसार का सबसे बड़ा कारण महात्मा बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्त्व था। राजा का पुत्र होते हुए भी उन्होंने समस्त सुख-सुविधाओं को त्यागकर कठोर तपस्या की थी इसलिए जनसामान्य उनके सम्मुख श्रद्धा एवं सम्मान से झुक जाता था। बुद्ध के मधुर व्यवहार के कारण उनके विरोधी भी उनके सम्मुख नतमस्तक हो जाते थे। बुद्ध ने कभी किसी धर्म का अनादर नहीं किया अपितु तर्क के आधार पर प्रतिपक्षी धर्म की भ्रमपूर्ण बातों का खण्डन किया। 

(2.) बुद्ध के सिद्धान्तों की सरलता: महात्मा बुद्ध ने मानव जीवन के कमजोर पक्ष को ध्यान में रखते हुए, भिक्षुओं के लिए अपेक्षाकृत कठोर एवं गृहस्थों के लिए अपेक्षाकृत सरल सिद्धांत स्थिर किए। ये नियम ऐसे थे जिन्हें भिक्षु एवं गृहस्थ दोनों ही, बिना किसी कठिनाई के अपना सकते थे। बुद्ध ने अपने दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन करने की बजाए आचरण की  शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने जनता को आत्मा-परमात्मा, मोक्ष जैसे गंभीर विषयों पर नहीं उलझाया और न ही जनता को महंगे यज्ञों, कर्मकाण्डों एवं पशु-बलियों की उलझनों में फंसाया।

(3.) बौद्ध संघ की भूमिका: महात्मा बुद्ध ने जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित बौद्ध संघ का गठन किया जिनमें भिक्षु अपने मन के विचार खुलकर कह सकते थे तथा आचार्य लोग उनकी शंकाओं का समाधान कर सकते थे। बौद्ध संघ के ये भिक्षु वर्षा काल के चार मास तक एक स्थान पर ठहरकर ज्ञान लाभ एवं स्वाध्याय करते थे ताकि शेष आठ माह तक देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करके बुद्ध के उपदेशों को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचा सकें।

जब ये भिक्षु जनसमुदाय के बीच विचरण करते थे तो उनके सदाचरण, सादगी, त्याग एवं उपदेशों का जनसामान्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता था और वे इस नवीन धर्म को आसानी से स्वीकार कर लेते थे।

(4.) देश-काल की अनुकूलता: बौद्ध धर्म का उदय उस समय में हुआ था, जब भारत की जनता वैदिक धर्म के महंगे यज्ञों, अनुष्ठानों एवं कर्मकाण्डों में फंसी हुई थी और वेदांत दर्शन के रहस्यवाद तथा पुजारी-पुरोहितों के कठोर व्यवहार से क्षुब्ध थी। वर्ण व्यवस्था ने समाज में ऊंच-नीच का वातावरण बना रखा था। ऐसे समय में गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म के महंगे अनुष्ठानों का खण्डन करके अहिंसा एवं नैतिकता पर आधारित धर्म का रास्ता दिखाया तथा धर्म के द्वार सभी वर्णों के लिए बराबरी के आधार पर खोल दिए।

जनसामान्य इस सस्ते, सरल एवं सहज सुलभ धर्म को अपनाने के लिए तैयार हो गया। यदि बुद्ध वैदिक युग में हुए होते तो उनके विचारों को शायद ही लोकप्रियता मिलती क्योंकि वैदिक युग में सामाजिक भेदभाव नहीं था तथा धर्म के द्वार समस्त मनुष्यों के लिए बराबरी के स्तर पर खुले हुए थे और उस काल में वैदिक धर्म महंगे यज्ञों, पशुबलियों एवं जटिल अनुष्ठानों से मुक्त था।

(5.) जन-भाषा का प्रयोग: महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों का प्रचार उस युग की जन-भाषा ‘पालि’ में किया था। अतः जनसाधारण उनकी बात को आसानी से समझ लेता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनके उपदेशों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। बौद्ध धर्म का प्रारम्भिक साहित्य भी जन-भाषा में ही लिखा गया था। इस कारण महात्मा बुद्ध के उपदेश शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए और उनके अनुयाइयों की संख्या बढ़ती गई।

(6.) समानता की भावना: महात्मा बुद्ध ने वर्ण भेद से ऊपर उठकर समाज के निम्नतम व्यक्ति को भी समान रूप से संघ में रहने, भिक्षु बनने एवं बुद्धत्व प्राप्त करने का अधिकारी माना। यह बौद्ध धर्म की सफलता का एक मुख्य कारण था। क्योंकि वैदिक व्यवस्था में शूद्र वर्ण के लोगों के लिए मोक्ष की आशा नहीं थी तथा स्त्रियां भी समाज में बराबरी का अधिकार खोती जा रही थीं।

निर्धन लोगों के पास याज्ञिक-अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने के लिए धन उपलब्ध नहीं था। एक तरह से वैदिक धर्म को ब्राह्मणों ने अपनी कारा में बंदी बना लिया था। जब बुद्ध ने धर्म पर से वर्ण, लिंग एवं वित्त का भेद हटा दिया तो लाखों लोग बुद्ध के अनुयाई बन गए। समाज में उपेक्षित चल रहे लोगों को नए धर्म के माध्यम से लोक एवं परलोक दोनों के सुधरने की आशा जाग्रत हो गई थी।

(7.) समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों का संरक्षण: गौतम बुद्ध के राज्यवंश से सम्बन्धित होने के कारण तत्कालीन शाक्य, लिच्छवी, मल्ल, कोलीय, मोरीय आदि गणराज्यों के प्रभावशाली एवं सम्पन्न लोगों ने बौद्ध धर्म के प्रसार में अत्यधिक रुचि ली। अनेक राजाओं, विद्वानों तथा धनपतियों ने बुद्ध के उपदेशों को सहज भाव से अपना लिया तथा बौद्ध धर्म के प्रसार में तन, मन और धन से सहयोग दिया। समाज के प्रभावशाली वर्ग का अनुकरण करके जनसाधारण भी इस धर्म में विश्वास रखने को तैयार हो गया।

बुद्ध की मृत्यु के सैंकड़ों साल बाद सम्राट अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन ने इस धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से सम्राट अशोक द्वारा दिया गया योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

(8.) प्रतिस्पर्द्धी धर्मों का अभाव: बौद्ध धर्म के शीघ्र और व्यापक प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उस युग में उसका विरोध करने वाली लोकप्रिय धार्मिक विचारधाराओं अर्थात् धार्मिक सम्प्रदायों का अभाव होना भी था। वैदिक धर्म में प्रचार की प्रवृत्ति नहीं थी और उस युग में जनसाधारण को वैदिक धर्म से अरुचि होने लगी थी।

जैन मत अधिक व्यापक नहीं हो पाया था और उसके सिद्धान्तों में शारीरिक क्लेश की प्रधानता के कारण भी वह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया। इस कारण बौद्ध भिुक्षओं एवं प्रचारकों को बिना विरोध के अपने धर्म का प्रचार करने में सफलता मिल गई।

(9.) अन्य कारण: बौद्ध धर्म की उदारता एवं समय के साथ होने वाली परिवर्तनशीलता ने भी इस धर्म के प्रसार में योगदान दिया। बौद्ध धर्म की रही-सही कठोरताओं को त्याग कर महान् उदारवादी ‘महायान’ सम्प्रदाय का जन्म हुआ जिसने बौद्ध धर्म को अत्यधिक लोकप्रिय बनने का मार्ग प्रशस्त किया। तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और साहित्य की शिक्षा दी जाने लगी।

इससे बौद्ध धर्म को नैतिक आधार प्राप्त हो गया और बौद्ध धर्म को जानने वाले लोग संस्कृत के पण्डितों के समान ही विद्वान समझे जाने लगे। विदेशी आक्रांताओं एवं चीनी यात्रियों ने बौद्ध धर्म के अध्ययन एवं प्रसार में अत्यधिक रुचि ली इस कारण बौद्ध धर्म, भारत भूमि तक सीमित न रहकर विश्व स्तरीय धर्म-बन गया।

बौद्ध धर्म को राज्याश्रय

महात्मा बुद्ध के जीवन काल में कोसल नरेश प्रसेनजित, मगध सम्राट बिम्बिसार और अजातशत्रु, वैशाली की सुप्रसिद्ध गणिका आम्रपाली, राजगृह के नगरश्रेष्ठि अनाथपिण्डक, बुद्ध के पिता शुद्धोधन और पुत्र राहुल ने बुद्ध का शिष्यत्व ग्रहण किया तथा उनके बताए धर्म को स्वीकार कर लिया। इससे बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्राप्त होने लगा।

मौर्य सम्राट अशोक (ई.पू.268- ई.पू.232) ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध-संगीति बुलवाई। इस संगीति में बौद्ध-धर्म ग्रन्थों में संशोधन किया गया। बौद्ध-संघ में जो दोष आ गए थे उनको दूर करने का प्रयत्न किया गया। इन संशोधनों तथा सुधारों से बौद्ध-धर्म में जो शिथिलता आ रही थी वह दूर हो गई। अशोक ने देश के विभिन्न भागों में अनेक मठों का निर्माण करवाया और उनकी सहायता की। इन मठों में बहुत बड़ी संख्या में भिक्षु-भिक्षुणी तथा धर्मोपदेशक निवास करते थे जो सदैव धर्म के चिन्तन तथा प्रचार में संलग्न रहा करते थे। ऐसी सुव्यवस्था में धर्म के प्रचार का क्रम तेजी से चलता रहा।

बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने धर्म-विभाग की स्थापना की। इसके प्रधान पदाधिकारी ‘धर्म-महामात्र’ कहलाते थे। इन धर्म-महामात्रों को यह आदेश दिया गया कि वे प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का अधिक से अधिक प्रयत्न करें। धर्म-महामात्र घूम-घूम कर धर्म का प्रचार करते थे। अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए धम्म के सिद्धान्तों तथा आदर्शों को पर्वतों की चट्टानों, पत्थरों के स्तम्भों तथा पर्वतों की गुफाओं में लिखवाकर उन्हें सबके लिए तथा सदैव के लिए सुलभ बना दिया। ये अभिलेख जन-साधारण की भाषा में लिखवाए गए ताकि समस्त प्रजा उन्हें समझ सके और उनका पालन कर सके।

अशोक द्वारा किये गए प्रयत्नों के फलस्वरूप उसके शासनकाल में बौद्ध-धर्म को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो गया। भण्डारकर ने इस तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘इस काल में बौद्ध-धर्म को इतना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया कि अन्य समस्त धर्म पृष्ठभूमि में चले गए….. परन्तु इसका सर्वाधिक श्रेय तीसरी शताब्दी ई.पू. के बौद्ध सम्राट, चक्रवर्ती धर्मराज को मिलना चाहिए।’

ई.पू.150-ई.पू.90 में काबुल से मथुरा तक मिनैण्डर(मिलिंद) का शासन था। उसने स्यालकोट, पंजाब तथा अन्य सीमांत प्रदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। कहा जाता है कि उसकी राजधारी शाकल में केवल बौद्ध-भिक्षु तथा विद्वानों का निवास ही संभव था। पाली ग्रंथ ‘मिलिंद पन्ह’ (मिलिंद प्रश्न) के अनुसार उसने नागसेन नामक बौद्ध आचार्य से दीक्षा लेकर धर्म और दर्शन पर बहुत से प्रश्न किए।

मिलिंद के सिक्के बौद्ध धर्म में उसकी आस्था को प्रकट करते हैं। उसके अनेक सिक्कों पर धर्मचक्र बना हुआ है तथा उनकी पदवी धार्मिक अंकित है। जब मिलिंद की मृत्यु हुई तब अनेक नगरों ने उसकी अस्थियों (फूलों) को लेना चाहा, जैसा बुद्ध की मृत्यु पर हुआ था। स्यामी अनुश्रुति के अनुसार मिलिंद ने ‘अर्हत्’ पद पाया।

कुषाण सम्राट कनिष्क (ई.127-150), बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयाई था। उसे बौद्ध ग्रंथों में दूसरा अशोक कहकर सम्मानित किया गया है। उसने चौथी बौद्ध संगीति बुलाई तथा मध्य-एशिया, तिब्बत, चीन एवं जापान में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया। कनिष्क ने पुरुषपुर तथा अनेक स्थानों पर स्तूप एवं विहार आदि बनवाए जिनकी चीनी चात्रियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। सर्वप्रथम कनिष्क के सिक्कों पर ही बुद्ध की प्रतिमा अंकित हुई थी। इसके बाद महायान सम्प्रदाय में बौद्धों की मूर्तियाँ बननी आरम्भ हुईं और उनकी पूजा शुरु हुई।

कनिष्क ने यूनानी-बौद्ध कला का प्रतिनिधित्व करने वाली गांधार कला तथा हिन्दू कला का प्रतिनिधित्व वाली मथुरा कला को बराबर प्रश्रय दिया। कनिष्क ने बौद्ध तथा फारसी दोनों धर्मों की विशेषताओं का अपना लिया था किन्तु उसका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर अधिक था। कुषाण साम्राज्य की विभिन्न पुस्तकों में वर्णित बौद्ध शिक्षाओं एवं प्रार्थना शैली के माध्यम से कनिष्क के बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव का पता चलता है।

बौद्ध स्थापत्य को कनिष्क का सबसे बड़ा योगदान पुष्पपुर (पेशावर) का बौद्ध स्तूप था। इस स्तूप का व्यास 286 फुट था। चीनी-यात्री ह्वेनत्सांग के अनुसार इस स्तूप की ऊंचाई 600 से 700 फुट थी तथा यह बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ था। प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु अश्वघोष कनिष्क का धार्मिक परामर्शदाता था।

कनिष्क काल की बौद्ध मुद्राएं अन्य मुद्राओं की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत हैं। कुछ मुद्राओं में कनिष्क को आगे तथा बुद्ध को यूनानी शैली में पीछे खड़े हुए दिखाया गया है। कुछ मुद्राओं में शाक्यमुनि बुद्ध एवं मैत्रेय को भी दिखाया गया है। कनिष्क के सभी सिक्कों की तरह इनके आकार एवं रूपांकन मोटे-मोटे, खुरदरे तथा अनुपात बिगड़े हुए थे। बुद्ध का अंकन यूनानी शैली में किया गया है। बुद्ध की आकृति थोड़ी बिगड़ी हुई है। उनके कान बड़े आकार के हैं तथा दोनों पैर कनिष्क की भांति फैले हुए हैं।

कनिष्क के बौद्ध सिक्के तीन प्रकार के हैं। कनिष्क के सिक्कों वाली बुद्ध की आकृति अनेक कांस्य प्रतिमाओं में देखने को मिलती है। तीसरी-चौथी शताब्दी की ये प्रतिमाएं गांधार शैली की हैं। इस प्रतिमा में बुद्ध ने यूनानी शैली में अपने वस्त्र का बायां कोना हाथ में पकड़ा हुआ है तथा दायां हाथ अभय मुद्रा में उठा रखा है।

कुषाण काल के बुद्ध अंकन वाले मात्र छः स्वर्ण सिक्के मिले हैं, इनमें से एक सिक्का, प्राचीन आभूषण में जड़ा हुआ था, जिसमें कनिष्क एवं बुद्ध अंकित हैं तथा हृदयाकार माणियों के गोले से सुसज्जित हैं। कनिष्क के ऐसे सभी सिक्के स्वर्ण में ढले हुए हैं एवं दो भिन्न मूल्यवर्गों में मिले हैं। एक स्वर्णमुद्रा लगभग 8 ग्राम की है। मोटे तौर पर यह रोमन ऑरस से मेल खाता है। एक स्वर्णमुद्रा 2 ग्राम की है जो लगभग एक ओबोल के बराबर है।

इन सिक्कों में बुद्ध को भिक्षुकों जैसे चोगे अन्तर्वसक, उत्तरसंग पहने हुए तथा ओवरकोट जैसी सन्घाटी पहने हुए दिखाया गया है। उनके अत्यधिक बड़े एवं लम्बे कान बुद्ध के किसी गुण या किसी शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। उनके शिखास्थान पर केशों का जूड़ा बना हुआ है। ऐसा जूड़ा गांधार शैली के बहुत से शिल्पों में देखने को मिलता है।

इस प्रकार कह सकते हैं कि, बुद्ध के सिक्कों में उनका रूप उच्च रूप से प्रतीकात्मक बनाया गया है, जो कि पहले की गांधार शिल्पाकृतियों से अलग है। गांधार शिल्प के बुद्ध अपेक्षाकृत अधिक प्राकृतिक दिखाई देते थे। कई मुद्राओं में बुद्ध की मूंछें भी दिखाई गई हैं। इनके दाएं हाथ की हथेली पर चक्र का चिह्न है एवं भवों के बीच उर्ण (तिलक) है।

बुद्ध द्वारा धारण किया गया चोगा, गांधार शैली से अधिक मेल खाता है, बजाए मथुरा शैली से। कनिष्क कालीन मूर्तियों, शिलालेखों, स्तूपों एवं सिक्कों से सिद्ध होता है कि कनिष्क बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा संरक्षक था।

गुप्त सम्राट यद्यपि भागवत् धर्म के महान् संरक्षक थे किंतु उन्होंने भी बौद्ध धर्म को अपने राज्य में पूरी स्वतंत्रता प्रदान की। गुप्त काल में बुद्ध की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनीं तथा बोधिसत्व की पूजा का विशेष प्रचार हुआ। गुप्त सम्राट पुरुगुप्त ने भागवत् धर्म को त्यागकर बौद्ध-धर्म ग्रहण किया इस प्रकार बौद्ध धर्म को पुनः राज्याश्रय प्राप्त हो गया।

सातवीं शताब्दी में उत्तरी भारत के बहुत बड़े भूभाग के राजा हर्षवर्धन ने बौद्ध धर्म को विशेष प्रोत्साहन दिया। प्रौढ़ावस्था में उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उसने चीनी बौद्ध-भिक्षु ह्वेनत्सांग के प्रवचनों के आयोजन के लिए ई.643 में कन्नौज में बहुत बड़ा धर्म सम्मेलन किया जिसमें मनुष्य की ऊँचाई की स्वर्ण से निर्मित बुद्ध प्रतिमा स्थापित की गई।

हर्ष द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु धर्म सभायें आयोजित करना, स्तूप व विहारों का निर्माण करना तथा नालंदा विश्वविद्यालय को दान देना, काश्मीर नरेश से महात्मा बुद्ध के दांत प्राप्त करना आदि तथ्य हर्ष के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की ओर संकेत करते हैं।

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