विश्व इतिहास पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता की तीन पुस्तकें हैं। पहली पुस्तक इण्डोनेशिया पर है। लेखक द्वारा इस पुस्तक का लेखन करने से पहले स्वयं इण्डोनेशिया का भ्रमण करके वहाँ के भूगोल, संस्कृति एवं जीवनमूल्यों को समझने का प्रयास किया गया तथा इण्डोनेशिया के लोगों से बात करके वहाँ के इतिहास की जानकारी प्राप्त की गई।
विश्व इतिहास पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता की दूसरी पुस्तक इटली पर है। इस पुस्तक का लेखन करने से पहले भी लेखक द्वारा स्वयं इटली की राजधानी रोम, वियेना, फ्लोरेंस, पीसा, बोरोबुदुर आदि शहरों का भ्रमण किया गया तथा वहाँ के इतिहास, संस्कृति एवं जीवनमूल्यों की जानकारी प्राप्त की गई।
विश्व इतिहास पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता की तीसरी पुस्तक पाकिस्तान पर है। इस पुस्तक का लेखन करने से पहले लेखक द्वारा भारत के राष्ट्रीय आर्काइव्ज में उपलब्ध विशद सामग्री का अध्ययन किया गया तथा ब्रिटिश लेखकों एवं भारतीय लेखकों द्वारा भारत के विभाजन पर लिखी गई पुस्तकों का अध्ययन किया गया।
इन देशों की यात्रा किए बिना, केवल संदर्भ सामग्री के आधार पर इन देशों का वास्तविक इतिहास लिखा जाना संभव नहीं है। किसी भी देश का इतिहास केवल घटनाओं की सिलसिला नहीं होता अपितु उसके साथ उस देश के लोगों की सोच, जीवन शैली, संस्कृति, जीवन मूल्य, उस देश का भूगोल, वहाँ का पुरातत्व आदि बातें भी जुड़ी रहती हैं, इन्हें तभी समझा जा सकता है, जब लेखक ने स्वयं उन देशों की यात्रा की हो और उन्हें अपनी आंखों से देखा हो! इस दृष्टि से ये पुस्तकें अद्भुत सामग्री उपलब्ध करवाती हैं।
इस प्रकार उपरोक्त तीनों पुस्तकें विश्व इतिहास की दृष्टि से अनूठी एवं अमूल्य हैं। भारतीय पाठकों के लिए ये पुस्तकें अद्यतन नवीन जानकारी प्रस्तुत करती हैं। इन पुस्तकों को अमेजन डॉट इन से क्रय किया जा सकता है।
इस पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता की मुद्रित पुस्तकें संक्षिप्त विवरण सहित उपलब्ध, सूची रूप में उपलब्ध करवाई जा रही हैं।ये पुस्तकें अमेजन डॉट इन से अथवा शुभदा प्रकाशन से सम्पर्क करके क्रय की जा सकती हैं।
विश्व इतिहास
1. हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया, हार्ड बाउण्ड, पृष्ठ-176, मूल्य 350 रुपए। (ऑफसेट प्रिंटिंग, डिमाई साइज)
2. पोप के देश में ग्यारह दिन, हार्ड बाउण्ड, पृष्ठ 340- मूल्य 650 रुपए। (डिजिटल प्रिंटिंग, रॉयल साइज)
3. कैसे बना था पाकिस्तान, हार्ड बाउण्ड, पृष्ठ 372, मूल्य 750 रुपए। (डिजिटल प्रिंटिंग, रॉयल साइज)
1. सपनों का राजकुमार एवं अन्य नाटक, हार्ड बाउण्ड, पृष्ठ-144, मूल्य 95 रुपए।
हिन्दी गजल संग्रह
1. अभी तो चलो यहाँ से, पेपरबैक, पृष्ठ-64, मूल्य 40 रुपए।
सम्पादित पुस्तकें
1. राजस्थान शताब्दी ग्रंथ- राजस्थान लेखक परिचय कोश, राजस्थान के 700 लेखकों का सचित्र जीवन परिचय, हार्ड बाउण्ड, वर्ष 2002, पृष्ठ-280, मूल्य 400 रुपए।
2. कर्मयोगी राजस्थानी, विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट कार्य करने वाले 101 राजस्थानियों के जीवन परिचय पर आधारित पुस्तक, हार्ड बाउण्ड, पृष्ठ-312, मूल्य 600 रुपए।
पुस्तकें क्रय करने के नियम
डाक से पुस्तकें मंगवाने के लिए शुभदा प्रकाशन 63, सरदार क्लब योजना, वायुसेना क्षेत्र जोधपुर, पिन 342 011, राजस्थान पर सम्पर्क करें। सैलफोन 9414076061 अथवा ई-मेल mlguptapro@gmail.comपर भी सम्पर्क कर सकते हैं।
पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का मुख्य आधार वेदों में वर्णित देवता विष्णु एवं उनके दस अवतार हैं। नारद पुराण में कहा गया है कि इस जगत में विष्णु सर्वत्र व्याप्त हैं, इस जगत् का कारण विष्णु हैं।…… विष्णु के समान कोई अन्य देव नहीं है।
जब जैन-धर्म तथा बौद्ध-धर्म ह्रास के मार्ग पर बढ़ रहे थे तब दूसरी ओर वैदिक-धर्म अपने पुनरुत्थान में लगा था। ब्राह्मण-चिंतकों ने खर्चीले वैदिक-यज्ञों, जटिल-कर्मकाण्डों तथा लम्बे-अनुष्ठानों और उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान से उकताई हुई प्रजा के लिए भक्ति पर अवलम्बित नवीन धर्म की खोज की जिसमें वेद-वर्णित देवताओं को बलि देने की बजाए उनकी पूजा एवं भक्ति पर जोर दिया गया।
वेद-वर्णित सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान एवं भक्तवत्सल परमात्मा को देवताओं का भी स्वामी माना गया जो सम्पूर्ण सृष्टि का सर्जक, पालक एवं संहारक था। वह देवताओं का भी स्वामी था। उसकी भक्ति को धर्म एवं मोक्ष का साधन घोषित किया गया। रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्यों में इस नए धर्म का न केवल बीज-वपन हो चुका था अपितु वे भलीभांति पल्लवित भी हो चुका था।
यही नवीन धर्म पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के रूप में विशाल वटवृक्ष बन गया। रामायण के मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा महाभारत के योगेश्वर कृष्ण को पौराणिक धर्म में वेद-वर्णित विष्णु के अवतार घोषित किया गया।
पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का विकास
पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का मुख्य आधार वेद-वर्णित देवता विष्णु एवं उनके दस अवतार- मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बलराम एवं कल्कि हैं। पहले तीन अवतार अर्थात् मत्स्य, कूर्म और वराह सतयुग में, नृसिंह, वामन, परशुराम और राम त्रेतायुग में तथा कृष्ण और बलराम द्वापरयुग में अवतरित हुए। कलियुग के लिए भविष्य में होने वाला कल्कि अवतार कल्पित किया गया।
विष्णु एवं उनके अवतारों के साथ-साथ शिव, सूर्य, दुर्गा, गणेश एवं कर्तिकेय भी भक्तों पर प्रसन्न होने वाले, उनके कष्ट हरने वाले, संकट के समय उनकी रक्षा करने वाले देवता घोषित किए गए। इन देवी-देवताओं के प्राकट्य, उनके विविध स्वरूपों, उनमें निहित शक्तियों एवं गुणों तथा उनकी लीलाओं पर आधारित कथाओं की रचना की गई। इन कथाओं को विभिन्न पुराणों में लिखा गया। इसलिए इसे ‘पौराणिक धर्म’ कहा गया।
‘पुराण’ अपने पूर्ववर्ती वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों आदि से बिल्कुल अलग तथा पूरी तरह नवीन ग्रंथ थे किंतु इनके रचयिताओं ने इन्हें ‘पुराण’ कहकर पुकारा जिसका अर्थ होता है- ‘पुराना।’ इन नवीन ग्रंथों को पुराना कहकर पुकारे जाने का कारण यह था कि इन ग्रंथों के रचनाकार जनसामान्य को यह संदेश नहीं देना चाहते थे कि उन्होंने किसी नवीन धर्म का प्रतिपादन अथवा निर्माण किया है, अपितु इन ग्रंथों के माध्यम से वे जनसामान्य को यह संदेश देना चाहते थे कि इन ग्रंथों में उन्हीं वेदविहित ईश्वर तथा देवी-देवताओं के स्वरूपों, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन किया गया है जिनकी पूजा आर्यजन अनादि काल से करते चले आए हैं।
भगवान के ‘सर्वशक्तिशाली’, ‘भक्त-वत्सल’, ‘संकट मोचक’ एवं ‘मोक्षदायक’ स्वरूप ने जनसामान्य को तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया। भगवान की कृपा में विश्वास रखने के कारण इस धर्म को ‘भागवत् धर्म’ कहा गया। चूंकि विष्णु इस धर्म के मुख्य उपास्य थे इसलिए इसे वैष्णव धर्म भी कहा गया। इस धर्म में विष्णु को सर्वशक्ति सम्पन्न तथा सर्वश्रेष्ठ देवता से भी आगे बढ़कर सर्वव्यापी भगवान माना गया।
इस कारण उन्हें ‘वासुदेव’ कहा गया जिसका अर्थ है ‘जो सब जगह व्याप्त’ है तथा ‘जिसमें सारे पदार्थ निवास करते हैं’। वह ‘ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य तथा तेज’ नामक छः उत्तम गुणों से युक्त तथा हेय गुणों से रहित है।
इस धर्म को ‘सात्वत धर्म’, ‘पांचरात्र धर्म’ तथा ‘नारायणीय धर्म’ भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि भागवत् धर्म, सात्वत धर्म, पांचरात्र धर्म तथा नारायणी धर्म उत्तर-पश्चिम भारत में अलग-अलग एवं स्वतंत्र रूप से प्रकट हुए थे। उनके देवी-देवता लगभग एक जैसे थे तथा भक्ति एवं ईश्वरीय कृपा ही इन धर्मों के मुख्य आधार थे, इसलिए ये सब धर्म अपने-अपने देवी-देवताओं, धार्मिक मान्यताओं एवं उपासना विधियों को साथ लेकर वैष्णव धर्म में समाहित हो गए जो अपने पूर्ववर्ती धर्मों अर्थात् भागवत् धर्म, सात्वत धर्म, पांचरात्र धर्म तथा नारायणी धर्म से अधिक पुष्ट था।
इस प्रकार वैष्णव धर्म का उदय किसी एक व्यक्ति द्वारा रची जाने वाली अथवा किसी एक निश्चित समय में घटित होने वाली घटना नहीं थी अपितु इसका विकास दीर्घकाल में तथा बहुत से लोगों द्वारा अलग-अलग किए गए प्रयासों का परिणाम था।
वैदिक धर्म तथा पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) में अंतर
वैदिक धर्म तथा पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) में मूल अंतर यह था कि वैदिक धर्म का ऋषि यज्ञ, हवन, अनुष्ठान, कर्मकाण्ड तथा बलि के माध्यम से विभिन्न देवताओं की कृपा प्राप्त करता था जो कि विविध प्राकृतिक शक्तियों की प्रतीक थीं। जबकि वैष्णव धर्म का उपासक अपने उपास्य देव में विश्वास, भक्ति, प्रणाम, निवेदन, समर्पण आदि के माध्यम से उपास्य देव की कृपा प्राप्त करता था जो कि किसी अथवा किन्हीं प्राकृतिक शक्तियों का प्रतीक नहीं था अपितु सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, भक्तवत्सल एवं संकट मोचन परमात्मा था और समस्त सृष्टि एवं समस्त देवताओं का स्वामी था।
पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का इतिहास
पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का इतिहास जानने के लिए साहित्य, शिलालेख, मुद्राएं, प्रतिमाएं, मंदिरों के ध्वंसावशेष आदि विविध सामग्री का उपयोग किया जाता है। संस्कृत साहित्य के अंतर्गत लिखित विविध उपनिषद्, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत्, विविध पुराण वैष्णव धर्म के इतिहास को जानने के मूल साधन हैं। इन ग्रंथों में लेखकों द्वारा कुछ अतिरिक्त बातें लिख दिए जाने एवं कुछ मूलभूत बातें छोड़ दिए जाने का अंदेशा रहता है इसलिए शिलालेखों एवं मुद्राओं को अधिक प्रामाणिक माना जाता है।
भागवत् धर्म अथवा वैष्णव धर्म का सर्वप्रथम उल्लेख ई.पू. पांचवी शती में पाणिनी द्वारा लिखित अष्टाध्यायी (4/3/98) में उपलब्ध होता है। इससे अनुमान किया जाता है कि ई.पू. छठी शताब्दी में अस्तित्त्व में आए जैन धर्म, बौद्ध धर्म एवं उपनिषदों के बाद के किसी काल में वैष्णव धर्म का उदय हुआ। अतः इसे जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया में उत्पन्न हुआ धर्म माना जाता है।
चौथी शताब्दी ईस्वी में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज ने मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में रहा। उसने लिखा है कि ‘सौरसेनाई’ नामक भारतीय जाति ‘हेरेक्लीज’ का विशेष रूप से पूजन करती थी। विद्वानों ने हेरेक्लीज को वासुदेव कृष्ण माना है।
ई.पू.113 का भिलसा अभिलेख कहता है कि ‘भागवत् हेलिओडोरस ने देवाधिदेव वासुदेव की प्रतिष्ठा में गरुड़-स्तम्भ का निर्माण करवाया।’
यह हेलियोडोरस तक्षशिला निवासी ‘दिय’ का पुत्र था तथा इण्डो-बैक्ट्रियन यवन राजा एण्टिालकिडस का राजदूत बनकर मालवा नरेश भागभद्र के दरबार में रहता था। इससे स्पष्ट है कि ई.पू. द्वितीय शती में भागवत् धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था। यह धर्म भारत के पश्चिमोत्तर भाग में फैला हुआ था जिसमें तब का गांधार तथा आज का पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान तक का क्षेत्र सम्मिलित था।
उस काल में अनेक इण्डो-यूनानी शासकों ने भागवत् धर्म को स्वीकार कर लिया था। चित्तौड़गढ़ के निकट घोसुण्डी में प्राप्त ई.पू.200 के शिलालेख में संकर्षण एवं वासुदेव के उपासना मण्डल के चारों ओर पूजा-शिला प्राकार का निर्माण किए जाने का उल्लेख है।
ई.पू. पहली शती के नानाघाट के गुहा अभिलेख के प्रारम्भिक मंगलाचरण में अन्य देवों के नाम के साथ-साथ संकर्षण (अर्थात् बलराम) तथा वासुदेव (अर्थात् कृष्ण) के नाम भी प्राप्त होते हैं। मथुरा में जब शक क्षत्रपों का शासन था तब इस मण्डल में वैष्णव धर्म का उत्थान हुआ।
ई.पू.80 से ई.पू.57 की अवधि में मथुरा के महाक्षत्रप शोडाश के काल का एक शिलालेख मिला है जिसमें लिखा है कि ‘वसु’ नामक व्यक्ति ने महास्थान (जन्मस्थान) में भगवान् वासुदेव का एक चतुःशाला मंदिर, तोरण तथा वेदिका (चौकी) का निर्माण करवाया। मथुरा में कृष्णमंदिर के निर्माण का यह पहला उल्लेख है। ईसा पूर्व प्रथम शती के उपरोक्त उल्लेख के लगभग 400 साल बाद तक ब्राह्मण धर्म के किसी भी सम्प्रदाय का अभिलेख अथवा शिल्प सम्बन्धी प्रमाण नहीं मिला है। ये प्रमाण पुनः ईसा की चौथी शती के प्रथम भाग में गुप्त शासकों के काल में मिलते हैं।
पौराणिक धर्म का सर्वाधिक उन्नयन गुप्त शासकों के काल में हुआ। गुप्तवंशीय राजा स्वयं को ‘परमभागवत्’ कहते थे। गुप्तकालीन अभिलेखों, मूर्तियों एवं ताम्रपत्रों आदि में पौराणिक धर्म के उन्नयन तथा विकास का सांगोपांग विवरण मिलता है। पौराणिक धर्म का प्रारम्भिक इतिहास अत्यंत अस्पष्ट है जिसमें एक ओर सात्वत, भागवत्, पांचरात्र, नारायणीय, पौराणिक आदि विभिन्न मतों के संयोजन की तथा दूसरी ओर नारायण, वासुदेव, विष्णु तथा कृष्ण नामों के एकीकरण की दीर्घकालीन एवं जटिल प्रक्रिया है।
वैष्णव धर्म के विकास की जटिल प्रक्रिया को महाभारत के विभिन्न स्थलों पर अनुभव किया जा सकता है। महाभारत के शांति पर्व के नारायणीय खण्ड (अध्याय 334-351) में वासुदेव कृष्ण की नारायण विष्णु से अभेद स्थापना की गई है। वैष्णव धर्म के प्रमुख ग्रंथ श्रीमद्भगवगीता, श्रीहरिवंश पुराण, विष्णु सहस्रनाम तथा अध्यात्म रामायण महाभारत के ही अंश हैं।
To purchase this book please click on Image.
उत्तर भारत के शूरसेन मण्डल में ‘सात्वत’ नामक क्षत्रिय जाति निवास करती थी। भागवत् पुराण में परमब्रह्म को भगवत् अथवा वासुदेव कहने वाले तथा वासुदेव की पूजा की विशिष्ट पद्धति रखने वाले सात्वतों का वर्णन है। इसमें वासुदेव को ‘सात्वतर्षभ’ कहा गया है। जिस वृष्णि वंश में वासुदेव (कृष्ण), संकर्षण (बलराम), अनिरुद्ध (कृष्ण के पुत्र) आदि ने जन्म लिया था, उस वृष्णि जाति का ही दूसरा नाम सात्वत था। कुछ विद्वान ‘सात्वत’ को वृष्णि का पर्यावाची न मानकर ‘वृष्णि’ का एक गोत्र मानते हैं जिसमें कृष्ण आदि का जन्म हुआ। इस प्रकार एक ही धार्मिक पद्धति ‘सात्वत’ तथा ‘भागवत्’ दोनों नामों से प्रसिद्ध हुई। पुराणों तथा महाकाव्यों में कृष्ण के लोकोत्तर कार्यों का वर्णन है। यादव वंश का यह असाधारण मेधा सम्पन्न वीर पुरुष शीघ्र ही अपने जन में पूज्य पुरुष के रूप में स्थापित हुआ तथा उनके धर्म का उपास्य देव बना। यही भागवत अथवा सात्वत धर्म कहलाया। महाभारत के शांति पर्व में भागवत धर्म को सात्वत विधि कहा गया है और उसी सात्वत विधि को पांचरात्र नाम भी दिया गया है। वैष्णव तंत्रों में अन्यतम पद्मतंत्र में भागवत् धर्म के लिए सात्वत, एकान्तिक तथा पंचरात्र पर्याय नाम दिए गए हैं।
उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि यादव वंश की सात्वत जाति ने एक ऐसे धार्मिक सम्प्रदाय को विकसित किया जिसने बौद्ध एवं जैन धर्म के विपरीत, परमेश्वर के विचार को मान्यता दी तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए उस परमेश्वर की भक्ति का मार्ग बताया। सात्वतों के इस धर्म में परम पुरुष के रूप में वासुदेव की पूजा की जाती थी। मेगस्थिनीज ने सात्वतों तथा उनके द्वारा की जाने वाली वासुदेव कृष्ण की पूजा का स्पष्ट संकेत किया है।
महाभारत में सात्वत धर्म के पर्याय के रूप में पांचरात्र मत का नाम दिया गया है। महाभारत के शांति पर्व के नारायणीय खण्ड में सर्वप्रथम पांचरात्र का उल्लेख हुआ है। नारायण के उपासक को पांचरात्र तथा स्वयं नारायण को पांचरात्रिक कहा गया है। महाभारत के अनुसार यह मत महोपनिषद् है जिसमें चारों वेदों तथा सांख्य का समावेश है। शतपथ ब्राह्मण में पांच रात्रियों तक चलने वाले एक ‘पांचरात्र सत्र’ का वर्णन है।
पुरुष नारायण ने यह पांचरात्र सत्र किया था जिससे उन्हें समस्त प्राणियों पर आधिपत्य प्राप्त हो गया। अतः इस सत्र के आधार पर इस मत का नाम पांचरात्र पड़ा। नारद संहिता में इस मत में विवेच्य विषयों की संख्या पांच होने से यह पांचरात्र कहलाया। रात्र का अर्थ ज्ञान होता है तथा इस धर्म में परमतत्त्व (परमात्मा), मुक्ति (मोक्ष), भुक्ति (भोग अथवा आहार), योग (प्राणायाम एवं ध्यान आदि) तथा विषय (संसार) नामक पांच प्रकार के ज्ञान का निरूपण किया गया है।
ईश्वर संहिता के अनुसार शांडिल्य, औपगायन, मौंजायन, कौशिक तथा भारद्वाज नामक पांच ऋषियों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने पांचों को पांच दिन एवं रातों तक इस धर्म की शिक्षा दी थी इसलिए इसका नाम पांचरात्र हुआ। शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर अपनी टीका में भागवत् सम्प्रदाय का उल्लेख करते हुए पांच पूजा-विधियां बताई हैं जिनके कारण इस धर्म का नाम पांचरात्र पड़ा-
(1.) अभिगमन्: मन वचन एवं शरीर को भगवान पर केन्द्रित करके मंदिर में जाना।
(2.) उपादान: पूजा सामग्री एकत्रित करना।
(3.) इज्या: पूजा करना।
(4.) स्वाध्याय: मंत्र का जाप करना।
(5.) योग: समाधि लगाना।
पद्मतंत्र के अनुसार इस मत के सम्मुख पांच मत- योग, सांख्य, बौद्ध, जैन तथा पाशुपत रात्रि के सदृश मलिन हो जाते हैं, अतः यह पांचरात्र है। अहिर्बुध्न्य संहिता के अनुसार उपास्य देव के पांच रूपों- पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामिन् तथा अर्चा को स्वीकार करने के कारण इस मत का नाम पांचरात्र हुआ। अहिर्बुध्न्य संहिता पांचरात्र मत की प्रारम्भिक संहिताओं में से एक है।
उपरोक्त वर्णित सात्वत, भागवत् तथा पांचरात्र धर्मों का वैष्णव धर्म में एकीकरण कब हुआ, यह कहना कठिन है किंतु निश्चित रूप से यह एक लम्बी प्रक्रिया थी। इन सभी मतों के उपास्यदेव वासुदेव ही थे। उन वासुदेव कृष्ण का संश्लेषण विष्णु एवं नारायण से होने की प्रक्रिया भी उतनी ही लम्बी रही होगी। विष्णु, नारायण, वासुदेव, कृष्ण आदि विभिन्न नामों में सर्वाधिक प्राचीन नाम विष्णु ही है। इस नाम का उल्लेख ऋग्वेद में भी कई बार हुआ है। इस प्रकार वैष्णव धर्म में विष्णु की जो महत्ता स्थापित की गई है उसका बीज आर्यों के सर्वप्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में उपलब्ध है।
वैष्णव धर्म के इतिहास का काल विभाजन
पौराणिक धर्म के इतिहास को काल विभाजन की दृष्टि से दो मुख्य युगों में बाँटा जा सकता है-
(1) पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) का उद्भव काल
ई.पू. 600 से ई.300 तक लगभग 900 वर्षों का काल भक्ति प्रधान सम्प्रदायों के बीजारोपण, अंकुरण और पल्लवित होने का युग था किन्तु इस सम्पूर्ण समय में बौद्ध धर्म तथा जैन-धर्म की प्रबलता के कारण पौराणिक धर्म का पूर्ण विकास नहीं हो पाया। इस काल के 1500 से भी अधिक अभिलेख मिले हैं जिनमें से 50 से भी कम अभिलेख शैव, वैष्णव अथवा हिन्दू-धर्म के अन्य सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखते हैं शेष समस्त बौद्ध और जैन धर्मों का उल्लेख करते हैं।
स्पष्ट है कि ई.पू. 600 से ई.पू. 300 तक पौराणिक धर्म का विशेष उत्कर्ष नहीं हुआ। नन्द राजाओं (ई.पू.345-321) तथा चन्द्रगुप्त मौर्य (ई.पू.321-296) के संरक्षण में जैन-धर्म का प्रसार हुआ। सम्राट अशोक (ई.पू.268-ई.पू.232) ने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्रदान किया।
मौर्य शासकों का विनाश करके पुष्यमित्र आदि राजाओं ने अश्वमेध आदि यज्ञों को पुनर्जीवित किया किंतु ई.पू. 200 से ई.100 तक पश्मिोत्तर भारत पर शासन करने वाले मिनेण्डर आदि यवन राजाओं और कनिष्क आदि कुषाण राजाओं ने पुनः बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया। इस कारण इस काल में पौराणिक धर्म सात्वत धर्म, भागवत धर्म, नारायणी धर्म, पांचरात्र धर्म आदि प्रारम्भिक स्वरूपों में विद्यमान रहा तथा उनका संशलिष्ट स्वरूप ‘वैष्णवधर्म’ के रूप में इसके बाद ही सामने आया।
तीसरी शताब्दी ईस्वी में कुषाणों का उच्छेदन करने वाले भारशिव-नाग राजाओं ने हिन्दू-धर्म को राजधर्म बनाया। उसने दस अश्वमेध यज्ञ किए। भारशिव-नागों से तथा उनके बाद के गुप्त राजाओं का संरक्षण पाकर पौराणिक हिन्दू-धर्म का उत्कर्ष होने लगा और बौद्ध धर्म में क्षीणता आ गई।
(2) वैष्णव धर्म का उत्कर्ष काल
ई.300 से ई.1200 तक लगभग 900 वर्षों का काल पौराणिक धर्म का उत्कर्ष काल माना गया है। इस काल का प्रारम्भ मगध में गुप्त सामाज्य की नींव पड़ने से होता है जो ई.495 तक अस्त्तिव में रहता है। राजनीतिक स्तर पर गुप्त वंश ही सच्चे अर्थों में पौराणिक धर्म का उन्नायक था। गुप्त शासकों के संरक्षण में वैष्णव धर्म की स्थापना राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से हुई किंतु बौद्ध धर्म अपना अस्त्तिव बनाए रहा।
चौथी शताब्दी ईस्वी से भारत में बौद्ध तथा जैन धर्मों की तुलना में पौराणिक हिन्दू-धर्म को प्रधानता मिलने लगी। पांचवी शताब्दी ईस्वी के अंत में विदेशी हूण शक्ति ने गुप्त साम्राजय का विनाश किया किंतु हूण बौद्धों के परम-शत्रु सिद्ध हुए। उनके क्रूर प्रहारों से बौद्ध धर्म इतिहास के अस्ताचल में खिसक गया और पौराणिक धर्म को भलीभांति फलने-फूलने का अवसर प्राप्त हुआ।
सातवीं शताब्दी ईस्वी में थाणेश्वर में पुष्भूति वंश का उदय हुआ जिसका सर्वाधिक शक्तिशाली राजा हर्षवर्द्धन, सभी धर्मों को आदर देने वाला था किंतु उसने बौद्ध धर्म की पुनर्स्थापना के विशेष प्रयास किए।
हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तरी भारत में राजपूत वंशों का उदय हुआ जिनका राज्य निरंतर होने वाले युद्धों पर टिका था। इसलिए राजपूत राजाओं ने बौद्ध एवं जैन-धर्म की बजाए पौराणिक धर्म को अपनाया जिसमें सर्वशक्तिमान, भक्तवत्सल एवं शत्रुविनाशक विष्णु, शिव एवं दुर्गा तथा उनके विविध अवतारों की पूजा होती थी।
राजपूत राज्य 12वीं शताब्दी के अंत तक अपना स्वतंत्र अस्त्तिव बनाए रहे किंतु जब दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना हुई तो पौराणिक धर्म की प्रगति अवरुद्ध हो गई। दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों ने हजारों मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ डाला, हिन्दू ग्रंथों को नष्ट कर दिया और लाखों हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसमलमान बनाया। फिर भी पौराणिक धर्म, बौद्ध धर्म की तरह नष्ट नहीं हुआ।
वह भक्तवत्सल भगवान की शरण में जीवन जीने की शक्ति प्राप्त करता रहा। पौराणिक धर्म आज भी पूरे उत्साह के साथ जीवित है और भारत की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या इस धर्म का पालन करती है। 12 वीं शताब्दी के अन्त तक पौराणिक धर्म के दोनों प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो गए। बौद्ध धर्म का तो भारत में नामलेवा तक नहीं बचा और जैन-धर्म का प्रभाव नगण्य रह गया।
पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व भगवान विष्णु की भक्ति पर केन्द्रित हैं। विष्णु तथा उनके अवतारों की उपासना, प्रार्थना, भक्ति तथा उनकी कृपा का अवलम्बन ही इस धर्म का मूल तत्व है।
पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व
विष्णु
पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व भगवान विष्णु ही हैं। पुराणों का वैचारिक आधार विष्णु की भक्ति एवं उपासना पर अवलम्बित है। विष्णु को हरि, वासुदेव, नारायण, दामोदर आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। उसी को ईश्वर एवं परम-पिता-परमात्मा आदि रूपों में जाना जाता है। वह ‘अच्युत’ है अर्थात् उसका कभी पतन नहीं होता। वेदों और उपनिषदों में विष्णु की उपासना का उल्लेख कई स्थलों पर हुआ है। ऋग्वेद में विष्णु को सूर्य का रूप माना गया है तथा ‘निरुक्त’ में बताया गया है कि सूर्य का नाम ही विष्णु है।
To Purchase This Book, Please Click On Image.
ऋग्वेद में वर्णित ‘त्रिविक्रम की कथा’ में विष्णु को समस्त विश्व की रक्षा करने वाला माना गया है। विष्णु के इन तीन विस्तीर्ण पदन्यासों ने समस्त लोकों को माप लिया। इनमें से दो चरण ही मनुष्य देख या प्राप्त कर पाते हैं किंतु तृतीय चरण पक्षियों की उड़ान से भी परे है। उसका कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। विष्णु इन्द्र के सखा हैं तथा उसकी सहायता करते हैं। ऋग्वेद में विष्णु का जगत् के नियामक के रूप में वर्णन है। विष्णु के परमपद में मधु का उत्स है जहाँ देवताओं के इच्छुक मनुष्य आनंद करते हैं। ऋग्वेद में विष्णु को इतना महत्व दिए जाने के उपरांत भी वहाँ विष्णु मध्यम श्रेणी के देवता हैं तथा इन्द्र से निम्न हैं। ब्राह्मण ग्रंथों के रचना काल में विष्णु की स्थिति ऋग्वेद काल की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। विष्णु इस युग में भी यज्ञ से ही सम्बद्ध हैं, भक्ति से नहीं। वरुण के साथ मिलकर विष्णु यज्ञ की रक्षा किया करते हैं किंतु ब्राह्मण युग में विष्णु के तृतीय चरण अथवा परम पद के प्रति सम्मान भावना ने विष्णु के महत्वोत्कर्ष में सर्वाधिक योगदान दिया। ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु का उल्लेख सर्वोच्च देवता के रूप में प्राप्त होता है।
शतपथ ब्राह्मण में एक कथा प्राप्त होती है जिसमें देवताओं ने तेज, ऐश्वर्य एवं अन्न प्राप्ति के लिए किए गए यज्ञ में यह प्रस्ताव किया कि देवों में जो अपने कर्म से यज्ञ के अंत को सर्वप्रथम प्राप्त कर ले, वह सर्वोच्च पद प्राप्त करे। विष्णु ने यज्ञ का अंत सर्वप्रथम प्राप्त कर लिया। अतः विष्णु को देवों में श्रेष्ठ माना गया। शतपथ ब्राह्मण से ही वामन विष्णु की कथा भी प्राप्त होती है जिसमें विष्णु को अद्भुत शक्तियों से सम्पन्न कर दिया गया है।
आरण्यक तथा उपनिषद् काल में विष्णु का महत्व ब्राह्मण ग्रंथों के रचना काल की अपेक्षा बढ़ गया। ‘तैत्तिरीय आरण्यक’ में यज्ञान्त प्राप्त करने के कारण श्रेष्ठता प्राप्त विष्णु की कथा शतपथ ब्राह्मण की ही भांति प्राप्त होती है। ‘मैत्री उपनिषद’ में अन्न को जगत के धारक विष्णु का स्वरूप कहा गया है।
कठोपनिषद में स्पष्ट उल्लिखित है कि विवेकयुक्त बुद्धि सारथि से युक्त तथा मन पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति संसार मार्ग से पार होकर विष्णु के परमपद को प्राप्त होता है। महाकाव्यों एवं पुराणों के समय तक आते-आते विष्णु परमात्मा के पद पर प्रतिष्ठित हो गए। महाकाव्य काल में इन्द्र केवल देवराज रह गए जिनका सिंहासन विष्णु की कृपा से ही सुरक्षित रहता था।
वेद में विष्णु का सूर्य से जो सम्बन्ध था वह परवर्ती युग में भी बना रहा। विभिन्न पुराणों में आदित्यों के नाम की अलग-अलग सूचियां मिलती हैं किंतु विष्णु नाम सब सूचियों में है। वैष्णव चक्र भी विष्णु का सूर्य से ही सम्बन्ध सूचित करता है। ऐसे परम पद प्राप्त विष्णु से वासुदेव का तादात्म्य हुआ।
महाभारत वासुदेव कृष्ण तथा विष्णु के एकत्व का प्रतिपादन करता है। भीष्म पर्व के 65 एवं 66 वें अध्याय में परमात्मा को नारायण एवं विष्या तथा वासुदेव कहा गया है। शांति पर्व के 43वें अध्याय में युधिष्ठिर कृष्ण की स्तुति करते हुए उन्हें विष्णु कहते हैं। भगवद्गीता में कृष्ण अपना विराट रूप दिखाते हैं। आश्वमेधिक पर्व के 53 से 55 वें अध्याय में उत्तंक ऋषि की प्रार्थना पर कृष्ण उन्हें अध्यात्म ज्ञान की शिक्षा देते हुए पुनः अपने विराट् स्वरूप का दर्शन करवाते हैं किंतु यहाँ उन्हें विष्णु रूप कहा गया है।
नारायण
पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व भगवान विष्णु का विस्तार नारायण के रूप में हुआ है। पौराणिक धर्म में नारायण-विष्णु तथा उनके विशिष्ट अवतारों की उपासना एवं भक्ति प्रमुख है। महाकाव्य एवं पुराण गंथों में नारायण तथा विष्णु में कोई भेद नहीं है किंतु पुराण-धर्म के आदि स्वरूप में विष्णु की अपेक्षा नारायण की प्रमुखता थी। महाभारत में भी उपास्य देव को प्रायः नारायण नाम से पुकारा गया है।
विष्णु नाम अपेक्षाकृत बहुत कम है। विष्णु एवं नारायण के तादात्म्य का प्रारम्भिक संकेत बोधायन धर्मसूत्र से प्राप्त होता है। मनुस्मृति के अनुसार ‘नाराः’ का अर्थ है जल और परमात्मा का प्रथम निवास जल है। इस कारण ‘परमात्मा’ नारायण कहे जाते हैं। नारायण नाम का सर्वप्रथम उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में हुआ है।
इसके अनुसार नारायण ने क्रमशः प्रातः मध्याह्न तथा सायंकाल के समय आहुतियों के द्वारा वसुओं, रुद्रों तथा आदित्यों को यज्ञस्थल से हटा दिया। प्रजापति ने उनसे पुनः यज्ञ करने को कहा। इस प्रकार नारायण ने यज्ञ के द्वारा समस्त लोकों, समस्त देवों, समस्त वेदों तथा सभी प्राणों में स्वयं को प्रतिष्ठित किया और उन सभी को स्वयं में प्रतिष्ठित कर लिया।
शतपथ ब्राह्मण के ही द्वितीय उल्लेख के अनुसार पुरुष नारायण के द्वारा पांचरात्र सत्र किया गया जिस सत्र के कर लेने से पुरुष नारायण को समस्त भूतों पर सर्वश्रेष्ठता प्राप्त हो गई और वह समस्त भूत बन गया। तैत्तिरीय आरण्यक में नारायण का वर्णन परमात्मा के उन समस्त विशेषणों के द्वारा किया गया जो सामान्यतः उपनिषदों में मिलते हैं। महाभारत में अनेक कथाओं में नारायण का वर्णन है तथा उनका तादात्म्य वासुदेव के साथ किया गया है।
नारायणीय के प्रथम अध्याय में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं- ‘भगवान् नारायण सम्पूर्ण जगत् के आत्मा, चतुर्मूर्ति और सनातन देव हैं। वे ही धर्म के पुत्र रूप में प्रगट हुए थे। स्वायंभू मन्वन्तर के सत्य युग में उनके चार स्वयंभू अवतार हुए थे जिनके नाम हैं- ‘नर, नारायण, हरि एवं कृष्ण। इनमें से अविनाशी नर और नारायण ने बदरिकाश्रम में घोर तपस्या की।’ पुराणों में सृष्टि रचना के प्रसंग में नारायण का वर्णन परमेश्वर के रूप में हुआ है।
वासुदेव
पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व भगवान विष्णु ही वासुदेव हैं। पुराण-धर्म में वासुदेव नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। सात्वत गोत्रीय ‘कृष्ण’ वसुदेव के पुत्र होने के कारण वासुदेव कृष्ण कहलाए। ईस्वी सन् से पूर्व की अनेक रचनाओं- घट जातक, महाभाष्य तथा कतिपय शिलालेखों में इन्हीं वासुदेव कृष्ण का परम देव के रूप में वर्णन किया गया है जो संकर्षण बलराम के भाई थे किंतु अनेक इतिहास लेखकों ने वसुदेव के पुत्र वासुदेव (कृष्ण) से पूर्ववर्ती एक और वासुदेव की सत्ता स्वीकार की है।
वासुदेव कृष्ण से पूर्व एक और दिव्य वासुदेव अवश्य हुए हैं। यह नाम किसी देवता का भी हो सकता है। विष्णु-पुराण ने देवता वासुदेव तथा देवकी पुत्र वासुदेव कृष्ण को भिन्न-भिन्न प्रतिपादित किया है कि भगवान् वासुदेव का एक अंश दो भागों में विभक्त होकर कृष्ण और बलराम में स्थापित हुआ। महाभारत के वनपर्व में पौण्ड्रक शाल्व नरेश की कथा है जो स्वयं को वास्तविक वासुदेव घोषित करता है।
इस शाल्व राजा को कृष्ण ने युद्ध में मार डाला था। यह कथा स्पष्ट संकेत करती है कि कृष्ण से पूर्व भी वासुदेव की पूजा प्रचलित थी किंतु बाद में ये दोनों वासुदेव एक हो गए।
कृष्ण
वसुदेव-देवकी के पुत्र कृष्ण का व्यक्तित्व ऐतिहासिक है किंतु कृष्ण के समय का सही-सही निर्धारण कर पाना कठिन है। कृष्ण के जीवनचरित को जानने के लिए छान्दोग्य उपनिषद्, पतंजलि का महाभाष्य, बौद्ध एवं जैन आख्यान, महाभारत तथा विभिन्न पुराणों का सहारा लिया जाता है। ये सभी स्रोत अलग-अलग समय के हैं तथा इनमें शताब्दियों का अंतराल मौजूद है।
इसलिए इनमें दिए गए कृष्ण सम्बन्धी वृत्तांतों में पर्याप्त अंतर है। ऋग्वेद के एक उल्लेख के अनुसार इन्द्र ने अंशुमती नदी के तट पर कृष्ण नामक एक अनार्य प्रमुख का संहार किया था। पुरात्तवविदों के अनुसार यह अंशुमती कोई और नदी नहीं अपितु यमुना ही है।
छांदोग्य उपनिषद में कृष्ण को देवकी का पुत्र बताया गया है जिसने घोर अंगरिस से शिक्षा ग्रहण की थी। दूसरे स्रोतों से अनुमान होता है कि गीता का उपदेश इसी कृष्ण ने किया था। पतंजलि के महाभाष्य में कृष्ण देवता के रूप में उल्लिखित हैं।
बौद्ध ग्रंथ ‘घट-जातक’ से वासुदेव-कृष्ण के जन्म की कथा उपलब्ध होती है। उसके अनुसार वासुदेव-कृष्ण तथा उसके भाई बलदेव, ‘कंसभगिनी देवगब्भा’ तथा उसके पति ‘उपसागर’ के पुत्र थे। उन्हें पालन-पोषण के लिए ‘अंधकवेण्हु’ नामक पुरुष और ‘नंदगोपा’ नामक उसकी पत्नी को सौंप दिया गया था जो कि देवगब्भा की दासी थी।
जैनियों के ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ में वासुदेव को ‘केशव’ कहा गया है। जैनों के बाइसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि अथवा नेमिनाथ के समकालीन रूप में उनके तिरेसठ शलाका पुरुषों में केशव (वासुदेव) भी वर्णित हैं। केशव के माता-पिता वसुदेव एवं देवकी थे। वर्तमान काल में कृष्ण का प्रचलित चरित महाभारत, हरिवंश, श्रीमद्भागवत् तथा अन्य पुराणों के आधार पर विकसित एक मिश्रित रूप है।
भिन्न-भिन्न पुराणों में भिन्न-भिन्न युगों में कृष्ण के साथ गोपिकाओं, राधा, असुर संहार आदि की कथाएं जुड़ती चली गईं। विष्णु-नारायण-वासुदेव के साथ कृष्ण की एकरूपता सिद्ध होने में स्वभावतः ही उन देवों के गुणों तथा विशेषताओं को आरोपित कर दिया गया। वेद में विष्णु के साथ गायों का सम्बन्ध था।
विष्णु के परम पद में ‘भूरिशृंगा गावः’ स्थिति थी। कृष्ण के साथ भी गायों का घनिष्ट सम्बन्ध पौराणिक परम्परा में स्थापित हुआ। कृष्ण का परम लोक ‘गोलोक’ कहलाता है। बोधायन धर्मसूत्र में आए हुए गोविन्द तथा दामोदर नाम कृष्ण के साथ जुड़कर भिन्न अर्थ प्रकट करने लगे।
भक्ति
पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व भगवान विष्णु की भक्ति पर आधारित हैं। यद्यपि ‘भक्ति’ एक ऐसा तत्त्व है जिसने पुराणों को वेदों से अलग किया तथापि भक्ति का बीजारोपण वेदों में ही होता हुआ दिखाई देता है। वैदिक विष्णु का सम्बन्ध सर्वत्र ‘यज्ञ’ से है किंतु पौराणिक विष्णु का सम्बन्ध ‘भक्ति’ से है। वैदिक युग में राजा बसु द्वारा यज्ञों में पशुबलि का विरोध करने तथा ‘हरि’ की उपासना पर बल देने से भक्ति-प्रधान धर्म का बीजारोपण हो गया। उपनिषदों में भी भक्ति करने तथा ईश्वर के शरणागत होने के भाव का उल्लेख मिलता है।
उपनिषदों में कहा गया है- ‘आत्मा (यहाँ इसका आशय परमात्मा से है) की उपलब्धि किसी बलहीन को नहीं होती और न वह उपनिषदों से, अध्ययन से अथवा यज्ञ से ही सम्भव है। वह जिस किसी को वरण कर लेती है, वही उसे पाने में समर्थ होता है। अतः आत्मा द्वारा वरण किए जाने के पूर्व उसे प्रार्थना या सेवा से प्रसन्न कर लेना आवश्यक है।’
इस प्रकार अनेक विद्वानों ने वेदों, सूक्तों एवं उपनिषदों में भी भक्ति तत्त्व को खोजने के प्रयास किए हैं किंतु भगवद्गीता ही वह ग्रंथ है जिसमें भक्ति की पूर्ण व्याख्या उपलब्ध है जिसके अनुसार परमेश्वर के प्रति शुद्ध अनुराग तथा श्रद्धा ही भक्ति ईश्वर विराट् तथा इन्द्रियातीत हैं किंतु एक लौकिक विग्रह धारी परमात्मा भी है जिसके प्रति भक्त ऐसी अंतरंगता अनुभव करता है जैसा मित्र के प्रति मित्र अथवा पिता के प्रति पुत्र।
इस प्रकार एकमात्र ‘हरि’ में एकाग्र भाव से ‘भक्ति’ करने वाली साधना का ‘एकांतिक धर्म’ के रूप में उदय हुआ। इसकी पूजन विधि ‘सस्वत विधि’ कहलाती थी जिसके प्रधान अंग- भक्ति, आत्मसमर्पण तथा अहिंसा थे। वासुदेव कृष्ण ने भक्ति-मार्ग का प्रचार किया। इस कारण आगे चलकर इसका नाम भी ‘वासुदेव धर्म’ पड़ गया तथा हरि का स्थान स्वयं वासुदेव कृष्ण ने ग्रहण कर लिया। विक्रम संवत् के पूर्व तीसरी शताब्दी तक इसकी विधि ‘पांचरात्र विधि’ में परिणित हो गयी और इसका नाम ‘भागवत धर्म’ के रूप में परिवर्तित हो गया।
भागवत सम्प्रदाय ने यज्ञों और तप की निरर्थकता, यज्ञों में पशुबलि की निन्दा तथा भक्ति तत्त्व की प्रधानता द्वारा वैदिक विश्वासों और परम्पराओं के विरुद्ध क्रान्ति की किंतु ईश्वर की सत्ता को मानने के कारण यह क्रान्ति बौद्ध और जैनों की क्रान्ति की भाँति उग्र तथा नास्तिक नहीं थी।
अहिंसा
वैष्णव धर्म में भक्ति के साथ अहिंसा पर विशेष बल दिया गया जिसका अर्थ होता है- मन, वचन एवं कर्म से किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाना। भगवद्गीता में अहिंसा का उल्लेख तीन बार हुआ है। एक स्थल पर अहिंसा का उल्लेख ‘ज्ञान’ के अंतर्गत तथा दूसरे स्थल पर ‘मुक्ति दिलाने वाली दैवी सम्पदा’ के रूप में हुआ है तथा तीसरे स्थल पर ‘शरीर सम्बन्धी तप’ में शौच, आर्जव, ब्रह्मचर्य आदि के साथ हुआ है।
महाभारत के नारायणीय खण्ड में अहिंसा पर विशेष बल दिया गया है। विष्णु-भक्त राजा वसु उपरिचर का आख्यान इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसके द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ में पशुबलि नहीं दी गई अपितु आरण्यकों के पदों के अनुसार जौ से आहुतियाँ दी गईं।
इसी नारायणीय खण्ड में भगवान् ने वैष्णव धर्म के सिद्धांत बताते हुए ब्रह्मादिक देवों को उसी देश में रहने का उपदेश दिया जिसमें वेद, यज्ञ, तप, सत्य आदि अहिंसा से संयुक्त होकर प्रचलित हों। विष्णु-पुराण तथा विष्णु धर्मोत्तर पुराण में अहिंसा का महत्त्व प्रतिपादित करने वाले अनेक कथाएं हैं। इस प्रकार पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व में अहिंसा को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
अवतारवाद
अवतारवाद की परिकल्पना एवं दशावतार पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व हैं। यह सिद्धांत भागवत् वासुदेव नारायण के साथ वासुदेव कृष्ण का तादात्म्य कर दिए जाने से प्रचारित हुआ। जब भी कोई देवता अवतार ग्रहण करता है तो उसका कोई न कोई विशिट प्रयोजन होता है। महाभारत के नारायणीय खण्ड में नारायण या विष्णु के अवतारों की दो सूचियां उपलब्ध होती हैं।
पहली सूची में चार अवतारों का एवं दूसरी सूची में छः अवतारों का उल्लेख है। अनेक पुराणों में भी विष्णु के अवतारों को गिनाया गया है जिनमें यह संख्या चार से लेकर चौबीस तक प्राप्त होती है किंतु सामान्यतः इनकी संख्या दस है। इन अवतारों के नामों में भी भिन्नता है किंतु वासुदेव कृष्ण का नाम सर्वत्र ग्रहण किया गया है।
वाल्मीकि रामायण के मध्यवर्ती पांच काण्डों में ईक्ष्वाकुवंशीय ‘राम’ एक महापुरुष हैं किंतु प्रथम एवं अंतिम काण्ड में ‘राम’, विष्णु के अवतार हैं। राम अपने मानव रूप से उठकर नारायण विष्णु के अवतार किस समय माने जाने लगे, उस काल का निर्धारण नहीं किया जा सकता किंतु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में राम के विष्णु अवतार होने का विश्वास विद्यमान था। रामोपासना और कृष्णोपासना, दोनों को वैष्णव धर्म में समान रूप से स्वीकार कर लिया गया।
पुराणों की मूल सामग्री
पुराणों में वेदों के ज्ञान की भक्तिपरक व्याख्या की गई है। इनमें प्राचीन क्षत्रिय राजाओं की वंशावलियां भी दी गई हैं। अश्वमेघ तथा राजसूय आदि यज्ञों में जो आख्यान सुनाये जाते थे, उनमें से अधिकांश आख्यानों ने विकसित एवं परिमार्जित होकर पुराणों का रूप ग्रहण किया। इसीलिए यह उक्ति कही जाती है- ‘यज्ञ से पुराण का जन्म हुआ।’
प्रारम्भ में पुराणों के पाँच विषय थे-
(1.) सर्ग- सृष्टि की कथा,
(2.) प्रतिसर्ग- प्रलय के बाद सृष्टि का पुनर्भाव,
(3.) वंश- देवताओं, राक्षसों, ऋषियों और राजाओं की वंशावलियां,
(4.) मन्वन्तर- युग चक्रों का आवर्तन
(5.) वंशानुचरित- राजाओं एवं राजवंशों के वृत्तान्त।
प्रथम शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में विभिन्न रूपों में प्रचलित भागवत् धर्मों ने पुराणों को अपने प्रचार का माध्यम बनाया। अतः अधिकतर पुराणों और उप-पुराणों का विस्तार इन धर्मों के आधार पर हुआ। महाभारत-युद्ध के बाद महर्षि वेदव्यास ने प्राचीन वंश-वृत्तों का संग्रह करके अनेक पुराणों की रचना की।
इनमें समय-समय पर नई घटनाएँ जुड़ती गईं। गुप्तकाल में धर्म और संस्कृति के विभिन्न सूत्रों को संकलित करने का प्रयास हुआ जिसने उस काल के साहित्य की काया ही पलट दी और पुराणों को नया रूप दिया गया। फलस्वरूप पुराणों में भागवत धर्म के साथ-साथ बौद्ध एवं जैन-धर्म की प्रमुख बातों का समन्वय कर दिया गया। इस प्रकार पुराणों में वैदिक ज्ञान और लौकिक-साहित्य का समन्वय हो गया।
पुराण साहित्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
(1.) अठारह महापुराण
वायु पुराण, ब्रह्माण्ड, मार्कण्डेय, विष्णु, मत्स्य, भागवत, कूर्म, वामन, लिंग, वाराह, पद्म, नारद, अग्नि, गरुड़, ब्रह्म, स्कन्द, ब्रह्मवैवर्त और भविष्य महापुराण है।
(2.) अठारह उप-पुराण
उप-पुराणों की सूचियां अलग-अलग मिलती हैं। बृहद्धर्म पुराण के अनुसार इनकी सूची इस प्रकार है- आदि, आदित्य, बृहन्नारदीय, नन्दीश्वर, बृहन्नन्दीश्वर, साम्ब, क्रियायोगसार, कालिका, धर्म, विष्णुधर्मोत्तर, शिवधर्म, विष्णु धर्म, वामन, वारुण, नारसिंह, भार्गव और बृहद्धर्म।
महापुराणों में वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु-पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण सबसे पुराने हैं और इनमें उस काल तक की ऐतिहासिक जानकारी है जब गुप्त सम्राटों का राज्य मगध से लेकर अयोध्या और प्रयाग तक विस्तृत था। आरम्भ में ‘वायु पुराण’ और ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ एक थे और मूल वायु पुराण की रचना ई.200 के लगभग हुई किन्तु ई.400 के लगभग ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ इससे अलग हो गया। ‘वायु पुराण’ पाशुपत धर्म का ग्रन्थ रह गया और ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ वैष्णव धर्म का ग्रंथ हो गया। इन दोनों पुराणों में बाद में तांत्रिक और शाक्त सामग्री भी जोड़ दी गई।
‘मार्कण्डेय पुराण’ ई.300 के लगभग की रचना है, इसमें देवी महात्म्य बाद में सम्मिलित किया गया। ‘कूर्म पुराण’ और ‘वामन पुराण’ ई.500-600 के लगभग पांचरात्र पुराण थे, किंतु ई.800-900 के आसपास इन्हें शैव रूप दिया गया। ‘अग्नि पुराण’ और ‘गरुड़ पुराण’ ई.900-1000 के लगभग लिखे गए हैं तथा विश्वकोश प्रकार के ग्रन्थ हैं। ‘भविष्य पुराण’ बहुत पुराना है, किंतु इसमें अधिक स्वतन्त्रता से वृद्धि की गई और अब इसमें ब्रिटिश शासन तक का उल्लेख मिलता है।
कई उप-पुराण भी बहुत पुराने हैं। ‘विष्णु धर्म पुराण’ तीसरी शताब्दी ईस्वी का और ‘शिव पुराण’ ई.200 से 500 के बीच का है किन्तु अधिकतर उप-पुराण ई.650 से 800 की अवधि में लिखे गए थे। उप-पुराणों में ‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ को ज्ञान और विद्या का विश्वकोश कहा जा सकता है।
पौराणिक धर्म को व्यावहारिक एवं लोकप्रिय बनाने के लिए विभिन्न मत-मतांतरों के तत्वों का पौराणिक धर्म में समन्वय किया गया। समन्वयन की प्रवृत्ति के कारण ही पौराणिक धर्म बौद्ध धर्म का सामना करके करोड़ों हिन्दुओं को हिन्दू धर्म के भीतर बनाए रखने में सफल रहा।
पौराणिक धर्म (वैष्णव धर्म) को लोकप्रिय बनाने के प्रयास
जनसामान्य को जैन-धर्म और बौद्ध धर्म के प्रभाव से निकालकर पुनः वैदिक धर्म की ओर लाना अत्यन्त चुनौतीपूर्ण कार्य था। ब्राह्मणों ने इस चुनौती को स्वीकार किया तथा वैदिक धर्म एवं दर्शन सम्बन्धी सिद्धान्तों और मन्तव्यों को शृंखलाबद्ध एवं तर्क-संगत रूप देकर महाकाव्यों, स्मृतियों तथा पुराणों की रचना की और वैदिक धर्म के नवीन एवं पूर्णतः परिवर्तित रूप अर्थात् पौराणिक धर्म को लोकप्रिय बनाने के अनेक उपाय किए। इससे पौराणिक धर्म में समन्वय की प्रवृत्ति विकसित हुई।इनमें से कुछ उपाय निम्नलिखित हैं-
(1.) वैदिक धर्म का नवीन रूप
ई.पू.400 से ई.पू.200 तक अर्थात् सम्पूर्ण मौर्यकाल में वैदिक धर्म को प्राचीन यज्ञ-प्रधान धर्म के स्थान पर नया भक्ति-प्रधान पौराणिक रूप दिया गया।
(2.) दर्शनों का निर्माण
वेदों में भारतीय दर्शनों के मूल विचार मौजूद थे। ब्राह्मण ग्रंथों एवं उपनिषदों में उन्हीं विचारों का विकास हुआ था। पौराणिक काल में उन्ही विचारों को नए सिरे से शास्त्रीय रूप दिया गया। कपिल तथा कणाद आदि ऋषियों को भारतीय दर्शन का प्रणेता समझा जाता है किन्तु उन्होंने पुराने विचारों को नए सिरे से शृंखलाबद्ध एवं सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।
(3.) लोक-प्रचलित देवताओं को मान्यता
आर्यों में देवताओं की पूजा होती थी जबकि अनार्यों में यक्षों, भूत-प्रेतों, जड़ पदार्थों तथा सर्प आदि जंतुओं की पूजाएँ प्रचलित थीं। बौद्धों ने यक्षों को बुद्ध का उपासक बनाकर उनकी पूजा प्रारम्भ की। हिन्दुओं ने भी उनका अनुकरण किया तथा लोक प्रचलित देवताओं को यथापूर्ण रखते हुए उन्होंने उस पर वैदिक धर्म की हल्की सी छाप लगाकर उन्हें ग्रहण कर लिया।
मथुरा में वासुदेव (श्रीकृष्ण) की पूजा प्रचलित थी, उन्हें वैदिक देवता विष्णु से मिलाकर वेदानुयायियों के लिए भी पूज्य बना दिया। ऋग्वेद में वर्णित रुद्र को भी नया रूप देकर समस्त जीवों का मंगल करने वाले शिव के रूप में पूजा जाने लगा। वैदिक धर्म के पुनरुत्थान की लहर ने उस समय पूजनीय प्रत्येक जड़ और मनुष्य देवता में किसी न किसी वैदिक देवता का साम्य बिठा दिया।
वनचरों के भयंकर देवी-देवता काली और रुद्र के रूप बन गए। भारत भर में पूजित विभिन्न प्रकार के देवी-देवता शिव, विष्णु, सूर्य, स्कन्द आदि विभिन्न शक्तियों के सूचक बन गए। जहाँ किसी पुराने पुरखे की पूजा होती थी, उसे भी किसी न किसी देवता का अवतार मान लिया गया। प्रत्येक पूज्य पदार्थ को किसी न किसी देव-शक्ति का प्रतीक बना दिया गया।
(4.) लोकप्रिय धर्मग्रन्थों का प्रणयन
To purchase this book please click on Image.
बौद्धों की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण जातक कथाएँ और अवदान साहित्य था। इनमें बुद्ध के पूर्वजन्मों तथा बोधिसत्वों की रोचक कथाएँ होती थीं जिनमें उनके दया, दान, आत्मत्याग आदि गुणों पर सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला गया था। महात्मा बुद्ध सुन्दर कथाओं और दृष्टांतों द्वारा धर्म के गूढ़ मर्म को जनता तक पहुँचाते थे। उनके शिष्यों ने इस कला को, जातक तथा अवदान साहित्य में पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया। प्राचीन वैदिक साहित्य में लोकप्रिय त्तव अत्यल्प था। बौद्धों के प्रभाव से ब्राह्मणों ने प्राचीन वीर पुरुषों के शूरतापूर्ण कार्यों पर आधारित ऐतिहासिक गाथाओं को धर्मप्रचार की गाथाओं में बदल दिया। रामायण और महाभारत के नवीन संस्करण तैयार किए गए। महाभारत का प्रधान उद्देश्य आख्यानों द्वारा नए धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करना था। अतः श्रीकृष्ण को देवता और विष्णु का अवतार माना गया। विष्णु और शिव की महिमा के गीत गाए गए और भगवद्गीता द्वारा भागवत् धर्म का प्रचार किया गया। महाभारत में 400 ई.पू. से 200 ई. तक की लगभग समस्त धार्मिक और दार्शनिक विचारधाराओं का समावेश है। इसी प्रकार रामायण की मूल कथा में राम एक आदर्श वीर पुरुष थे। रामायण के दूसरे से छठे काण्ड तक राम इसी रूप में चित्रित हैं किन्तु पुराण काल में उसमें पहला और सातवाँ काण्ड जुड़ा और राम भी विष्णु के अवतार बन गए।
इन दोनों महाकाव्यों ने भक्ति-प्रधान वैष्णव और शैव-धर्मों को नवीन रूप देने एवं लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वर्तमान पौराणिक हिन्दू-धर्म की आधारशिला रामायण और महाभारत ने रखी और पुराणों ने उसे नया रूप दिया। इसी युग में अधिकांश पुराणों की रचना हुई।
(5.) ब्राह्मणों के वर्चस्व से बाहर
पुराणों का पठन-पाठन याज्ञिक ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था। जब अश्वमेध यज्ञ से आख्यान बाहर निकल गए तो पुराणों से ब्राह्मणों का सम्बन्ध टूट गया और इनके वाचन का कार्य सूतों, चारणों तथा कथावाचकों के पास चला गया। उत्तरवैदिक काल में वेद और उपनिषदों के पठन-श्रवण का अधिकार केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को था किन्तु रामायण, महाभारत और पुराण सुनने का अधिकार स्त्रियों और शूद्रों को भी था।
(6.) पौराणिक हिन्दू-धर्म को राज्याश्रय
शुंग एवं गुप्त शासक भागवत धर्म के उपासक और पोषक थे। उनके शक्तिशाली संरक्षण में वैष्णव धर्म का विशेष उत्कर्ष हुआ। गुप्तों के बाद प्रतिहार, चन्देल, मौखरी, कलचुरी, वलभी और कामरूप के राजा वैष्णव या शैव थे। पालवंशी राजा अवश्य बौद्ध अनुयाई थे किन्तु सेनवंशी राजा वैष्णव ओर शैव थे। दक्षिण में शुरुआती चालुक्य राजा जैन-धर्म के पोषक थे किन्तु बाद में वे हिन्दू-धर्म के उपासक बन गए। थे।
राष्ट्रकूटों में कुछ शासक जैन-धर्म के उपासक थे किन्तु अधिकांश राजा हिन्दू मतावलम्बी थे। पल्लवों और होयसलों के आरम्भिक राजा जैन-धर्म के समर्थक थे किन्तु बाद के पल्लव राजा शैव थे और बाद के होयसल राजा वैष्णव। इससे स्पष्ट है कि पुराण धर्म के उत्कर्ष काल में बौद्ध धर्म और जैन-धर्म को पर्याप्त राज्याश्रय प्राप्त नहीं हुआ और यही उनके ह्रास का एक मुख्य कारण भी था।
पुराणों का सांस्कृतिक महत्त्व
पुराण ही पौराणिक हिन्दू-धर्म की आत्मा हैं। पुराणों ने ही हिन्दू-धर्म को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। पुराणों में जिस धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का परिपाक हुआ उसकी तुलना विश्व के किसी अन्य धर्म से नहीं की जा सकती। गुप्तकाल से लेकर वर्तमान काल तक भारत के साहित्य, शिल्प, स्थापत्य, अध्यात्म, संगीत, नृत्य, गायन, जीवन शैली, वेशभूषा, खानपान आदि जीवन के समस्त अंगों पर उसकी गहरी छाप है।
वर्णाश्रम धर्म और भागवत धर्म का समन्वय
पौराणिक धर्म में समन्वय का कार्य वर्णाश्रम धर्म एवं भागवत धर्म से आरम्भ किया गया। उत्तरवैदिक-काल के धर्म को वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है क्योंकि उसमें मनुष्य के लिए चतुर्वर्ण अधारित कर्म एवं चर्तुआश्रम आधारित जीवन जीने का अनुशासन स्थिर किया गया था। पुराणों ने वर्णाश्रम धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया और शैव तथा वैष्णव धर्मों को इसके साँचे में ढाल दिया।
विष्णु-पुराण में राजा सगर के यह पूछने पर कि विष्णु की पूजा कैसे करनी चाहिए, और्व ने उत्तर दिया- ‘वही व्यक्ति परमेश्वर की पूजा कर सकता है जो अपने वर्ण और आश्रम सम्बन्धी कर्त्तव्य को पूरा करता हो।’
कूर्म पुराण में देवी कहती है- ‘मोक्ष की प्राप्ति के लिए आत्मज्ञान के साथ-साथ वेदविहित एवं स्मृतिसम्मत वर्णाश्रम धर्म का पालन करो।’
वायु पुराण कहता है– ‘जब यज्ञों में कमी हो जाती है तो भगवान विष्णु बारम्बार धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं।’
इस पुराण में शिव को वर्णों और आश्रमों के पृथक् कर्मों का प्रवर्तक बताया है। पुराणों में वर्णाश्रम धर्म की पुष्टि के लिए अनेक कथाएँ सृजित की गई है।
विष्णु-पुराण, वायु पुराण और भागवत पुराण में राजा वेन की कथा आती है जिसमें लिखा है– ‘वर्णाश्रम धर्म की अवहेलना के अपराध में ऋषियों ने उसे यमलोक पहुँचा दिया।’
विष्णु-पुराण में यम अपने दूतों को निर्देशित करते हैं कि-‘वे विष्णु के उपासकों के हाथ न लगाएँ, क्योंकि वे वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करते हैं। ‘ समस्त पंचरात्र संहिताओं में वर्णाश्रम धर्म को स्वीकार किया गया है। इस प्रकार पुराणों के माध्यम से वैष्णव और शैव धर्म प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के पोषक बन गए।
पुराणों मे वैदिक विचारों का नया रूप
पुराणों में वैदिक विचारों, देवताओं और विश्वासों को नवीन आख्यानों का सम्बल दिया गया। पुराणों के चिन्तन-मनन का तात्त्विक आधार वैदिक चिंतन ही है। वेद के अव्यय, अक्षर और क्षर पुरुष, पुराणों में ब्रह्म, विष्णु और शिव हो गए।
वेद की ‘त्रिधाम विद्या’ या ‘सप्तधाम विद्या’ पुराणों में ‘विष्णु की वामनावतार’ कथा बन गई। वेद की ‘दक्ष-अदिति-विद्या’ पुराणों में ‘दक्ष-यज्ञ-विध्वंस’ की कथा बन गई। वेद की ‘अग्नि-चयन-विद्या’, मत्स्य पुराण की ‘कुमार-जन्म-वृत्तान्त’ बन गई। वेद की ‘चित्र-शिशु-विद्या’ जिसे शतपथ ब्राह्मण में ‘अग्नि-रूप-विद्या’ कहा गया है, मार्कण्डेय पुराण के रौद्र सर्ग की ‘अष्टमूर्ति विद्या’ के साथ जोड़ दी गई।
इसी प्रकार वेदों की सोम विद्या, विराजधेनु विद्या, देवासुर विद्या, भृग्वंगिरोमय-अग्निसोम विद्या, पितृ-विद्या, सावित्री विद्या और पशु विद्या क्रमशः समुद्रमंथन, पृथुपृथिविदोहन, इन्द्रवृत्रोपाख्यान, सुकन्याच्यवन विवाह, श्राद्धकल्प, सावित्री सत्यवान कथा और पाशुपतशास्त्र के पौराणिक आख्यानों में परिवर्तित हो गयी है। अतः कहा जा सकता है कि वेदों और पुराणों में कोई मौलिक एवं तात्त्विक अंतर नहीं है।
महायान धर्म के महाकरुणा तत्त्व का समन्वय
जिस प्रकार पुराणों ने वैदिक धर्म को भागवत धर्म के साथ समन्वित किया, उसी प्रकार बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय के महाकरुणा और लोकमंगल के आदर्श को भी अपनाया। मार्कण्डेय पुराण में विदेह के राजा विपश्चित की कथा में शान्तिवेद ने बोधिचर्यावतार से मिलते-जुलते विचार प्रकट किए हैं। इस राजा को अच्छे कर्मों के कारण स्वर्ग प्राप्त हुआ किंतु किसी लघु त्रुटि के कारण कुछ क्षणों के लिए नर्क का दण्ड भी मिला।
जब वह नर्क में पहुँचा और उसने वहाँ के लोगों की करुण चीत्कार सुनी तो उसका हृदय पिघल गया और उसने संकल्प किया कि स्वर्ग के सुखों का भोग करने की अपेक्षा वह नर्क में रहकर दुःखी लोगों की सेवा करेगा। इन्द्र और यम के समझाने पर भी वह अपने सकंल्प पर दृढ़ रहा। अन्त में विवश होकर यम को नर्क के सारे निवासियों का उद्धार करना पड़ा। उसके बाद ही राजा ने स्वर्ग जाना स्वीकार किया।
मार्कण्डेय पुराण में राजा हरिश्चन्द्र की कथा में लिखा है कि जब देवदूत उसे शुभ कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग ले जाने लगे तो उसने उत्तर दिया कि राजा जो कुछ करता है, प्रजा के सहयोग से करता है, अतः उसके कर्मों का फल भी समस्त प्रजा में बँटना चाहिए। प्रजा के एक दिन का सुख, राजा के अपने अनन्त सुखों से बेहतर है। इन विचारों और भावों में बोधिसत्व का महाकरुणा तत्त्व निहित है।
विभिन्न प्रवृत्तियों का समन्वय
पुराणों में कर्म और मोक्ष, प्रवृत्ति और निवृत्ति का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। पद्म पुराण, अग्नि पुराण, कूर्म पुराण और गरुड़ परुाण में कहा गया है कि संसार में आकर कर्म करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। विद्याध्ययन समाप्त कर विवाह करना, गृहस्थ जीवन बिताना, लोकसंग्रह के काम करना प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य है। प्रव्रज्या और गृहत्याग लोक-विरुद्ध होने के कारण निन्दनीय हैं।
मनुष्य में कर्म करने और उसके द्वारा सुख प्राप्त करने की जो असीम शक्ति है, उसका विकास लौकिक जीवन द्वारा ही सम्भव है किन्तु लोक-जीवन बिताते हुए उसे ‘साधारण धर्म’ और ‘स्वधर्म’ का सामंजस्य करना चाहिए। ‘साधारण धर्म’ सार्वजनिक और सार्वभौम है। इनमें अहिंसा, क्षमा, शम, दम (इन्द्रिय निग्रह), दया, दान, शौच, सत्य, तप, ज्ञान आदि सम्मिलित हैं।
पद्म पुराण के अनुसार अहिंसा सर्वोपरि है, इसमें समस्त धर्मों का सार है। इसी पुराण के अनुसार अहिंसा के साथ सत्य जुड़ा हुआ है। सत्य वह है जिससे प्राणिमात्र का भला होता है। इसलिए मनुष्य को अप्रिय सत्य नहीं कहना चाहिए। नृसिंह पुराण में कहा गया है कि मन को काम और क्रोध से मुक्त रखना अनिवार्य है।
इसके लिए इष्टदेव की भक्ति अपेक्षित है। देवताओं में भेद करना या किसी देवता की निन्दा करना बहुत बड़ा अपराध है, क्योंकि समस्त देवता मूलतः एक ही हैं। इस ‘साधारण धर्म’ की परिधि में व्यक्ति को ‘स्वधर्म’ का पालन करना चाहिए, जिसका सम्बन्ध उसकी जाति, वर्ण, आश्रम और स्वभाव से है। इसके अनुसार व्रत, दान और प्रायश्चित का विधान है।
संसार की सबसे बड़ी शांतिपूर्ण धार्मिक क्रांति
पौराणिक धर्म में समन्वय की विशिष्टता ने इसे संसार की सबसे बड़ी शांतिपूर्ण धार्मिक क्रांति के रूप में प्रस्फुटित होने का अवसर दिया। यद्यपि पुराणों में भारत को कर्मभूमि और पुण्यभूमि कहा गया है तथापि पुराणों की दृष्टि विश्व के समस्त प्राणियों पर थी। इस कारण पुराणों में निहित ‘धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का आदर्श’ भारत से बाहर भी फैल गया। दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों में पौराणिक संस्कृति का प्रसार हुआ जो आज भी विद्यमान है।
पौराणिक संस्कृति का यह प्रसार किसी तलवार के जोर पर नहीं हुआ अपितु यह विशुद्ध सांस्कृतिक प्रक्रिया थी जिसे विभिन्न द्वीपों की प्रजा ने सहर्ष एवं स्वेच्छा से अंगीकार कर लिया। इस प्रकार की शांति-पूर्ण एवं दिग्दिगन्तर व्यापी धार्मिक क्रांति सम्पूर्ण धरती पर पौराणिक धर्म के अतिरिक्त और किसी धर्म ने घटित नहीं की। पौराणिक धर्म में समन्वय की प्रवृत्ति ने ही इसे संसार का सबसे महान् धर्म बनाया।
शैव धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से है। इस धर्म को मानने वाले लोगों के आराध्य देव भगवान शिव हैं जिनका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। शैव मत के कई शाखाएं हैं जिन्हें पंथ कहा जाता है।
ऋग्वेद में रुद्र नामक देवता का उल्लेख है, यजुर्वेद के 16वें अध्याय में भवागन रुद्र की व्यापक स्तुति गाई गई है। अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति और भूपति कहा गया है। शैवमत का उद्गम ऋग्वेद में वर्णित रुद्र की आराधना से माना जाता है। आगे चलकर यही रुद्र, ‘शिव’ कहलाए।
भगवान शिव तथा उनके अवतारों को आराध्य देव मानने वालों को ‘शैव’ तथा उनके मत को ‘शैव सम्प्रदाय’ कहा गया। बारह रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए।
To purchase this book please click on Image.
शिवलिंग उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य, हड़प्पा सभ्यता (ई.पू.3350-ई.पू.1750) की खुदाई में प्राप्त हुआ है जबकि लिखित रूप में लिंगपूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्य पुराण (उत्तर-वैदिक-काल) में मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी लिंग पूजा का उल्लेख है। कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिंव और नंदी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है। हिन्दुओं के चार मुख्य संप्रदाय हैं- वैदिक, वैष्णव, शैव और स्मार्त । शैव संप्रदाय के अंतर्गत शाक्त, नाथ और संत संप्रदाय आते हैं। दसनामी और गोरखपंथी संप्रदाय भी शैव धर्म के नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित हैं। शैव संप्रदाय एकेश्वरवादी है। इसके संन्यासी जटा रखते हैं तथा सिर भी मुंवडाते हैं किंतु शिखा नहीं रखते। इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं। इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं। शैव साधु निर्वस्त्र भी रहते हैं तथा भगवा वस्त्र भी धारण करते हैं। ये हाथ में कमंडल एवं चिमटा रखते हैं तथा गोल घेरे में अग्नि जलाकर धूनी रमाते हैं। शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा, ओघड़, योगी तथा सिद्ध कहा जाता है। शैव संप्रदाय में साधुओं द्वारा समाधि लेने की परंपरा थी। शैव मंदिरों को शिवालय कहते हैं जहाँ शिवलिंग एवं नंदी स्थापित होता है। शैव मावलम्बी आड़ा तिलक लगाते हैं तथा चंद्र तिथियों पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।
शिव पुराण में शिव के दशावतारों का उल्लेख है। ये सभी अवतार तंत्रशास्त्र से सम्बन्धित हैं- (1.) महाकाल, (2.) तारा, (3.) भुवनेश, (4.) षोडश, (5.) भैरव, (6.) छिन्नमस्तक गिरिजा, (7.) धूम्रवान, (8.) बगलामुखी, (9.) मातंग तथा (10.) कमल।
अन्य स्रोतों से शिव के अन्य ग्यारह अवतारों के नाम भी मिलते हैं- (1.) कपाली, (2.) पिंगल, (3.) भीम, (4.) विरुपाक्ष, (5.) विलोहित, (6.) शास्ता, (7.) अजपाद, (8.) आपिर्बुध्य, (9.) शम्भ, (10.) चण्ड, (11.) भव।
प्रमुख शैव ग्रंथ इस प्रकार हैं- श्वेताश्वतरो उपनिषद, शिव पुराण, आगम ग्रंथ तथा तिरुमुराई। प्रमुख शैव तीर्थ इस प्रकार हैं- (1.) काशी विश्वनाथ बनारस, (2.) केदारनाथ धाम, (3.) सोमनाथ, (3.) रामेश्वरम, (4.) चिदम्बरम, (5.) अमरनाथ, (6.) कैलाश मानसरोवर। द्वादश ज्योतिर्लिंग भी प्रमुख शिव तीर्थ हैं।
शैव धर्मके विभिन्न सम्प्रदाय
शैव सम्प्रदाय प्रारम्भ में वैदिक धर्म की शाखा के रूप में विकसित हुआ किंतु आगे चलकर उसमें दो प्रमुख धाराएं दिखाई देती हैं- वैदिक शैव तथा तांत्रिक शैव। महाभारत में माहेश्वरों अर्थात् शैव मतावलम्बियों के चार सम्प्रदाय बताए गए हैं- (1.) शैव (2.) पाशुपत (3.) कालदमन तथा (4.) कापालिक।
वामन पुराण में भी शैव संप्रदायों की संख्या चार बताई गई है- (1.) लिंगायत, (2) पाशुपत, (3.) कालमुख, (4.) काल्पलिक। वाचस्पति मिश्र ने भी चार माहेश्वर सम्प्रदायों के नाम दिए हैं। आगम प्रामाण्य, शिव पुराण तथा आगम पुराण में विभिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों के भेद बताए गए हैं। समय के साथ, शैव सम्प्रदाय में शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय भी स्थापित हो गए।
लिंगायत सम्प्रदाय (वीर शैव धर्म)
वेदों पर आधारित शैव धर्म को उत्तर भारत में ‘शिवागम’ तथा दक्षिण भारत में ‘लिंगायत’ कहा गया। सामूहिक रूप से इसे ‘वीर शैव मत’ कहा गया। तमिल में इसे ‘शिवाद्वैत’ कहा गया। इस संप्रदाय के लोग शिव लिंग की उपासना करते थे। बसव पुराण में लिंगायत समुदाय के प्रवर्तक उल्लभ प्रभु और उनके शिष्य बासव को बताया गया है।
ईसा से लगभग 1700 वर्ष पहले वीर शैव मत के अनुयाई अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पंजाब तथा हरियाणा आदि विशाल क्षेत्र में निवास करते थे। बाद में यह मत दक्षिण भारत में जोर पकड़ गया और कर्नाटक प्रदेश इस धर्म का प्रमुख क्षेत्र बन गया।
महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में वीर शैव उपासक अधिकतम हैं। यह एकेश्वरवादी धर्म है। वीर शैव की सभ्यता को ‘द्राविड़ सभ्यता’ भी कहते हैं। पारमेश्वर तंत्र में वीर शैव दर्शन को बाकी वैदिक मतों से जोड़ा गया है। पाणिनि के सूत्रानुसार वीर शैव का अर्थ, ‘ज्ञान में रमने’ वाला है। लिंगायत समुदाय को दक्षिण भारत में जंगम भी कहा जाता था।
शक्ति विशिष्टाद्वैत
वीर शैव दर्शन में ‘शक्ति’ की प्राधानता होने की कारण, इसे ‘शक्ति विशिष्टाद्वैत’ भी कहा गया है। ‘शक्ति’ को ही सत्व, रजस तथा तम नामक त्रिगुण माया कहा गया है। इस तरह शक्ति के दो रूप हैं, एक है- ‘सद-चित-आनंद रूप’ तथा दूसरा है- गुण-त्रय से मिला हुआ ‘मायारूप।’ इन दोनों स्वरूपों के मिलन को वीर शैव दर्शन में ‘पराशक्ति’ कहा गया है।
शक्ति की विशिष्ट रूप से उपासना करने के भी कई पंथ हैं, जिनमें से शक्ति विशिष्टाद्वैत प्रमुख है। इसके अनुसार त्रिगुणात्मक माया तथा विशिष्टाद्वैत के अंशी-भाव, दोनों मिल कर शक्ति विशिष्टाद्वैत कहलाते हैं-
वीर शैवं वैष्णवं च शाक्तं सौरम विनायकं।
कापालिकमिति विज्नेयम दर्शानानि षडेवहि।।
पाशुपत सम्प्रदाय (लकुलीश सम्प्रदाय)
पाशुपत संप्रदाय शैवों का सबसे प्राचीन संप्रदाय है, इसके संस्थापक लकुलीश थे, जिन्हें भगवान शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है। पाशुपत संप्रदाय के अनुयाइयों को पंचार्थिक कहा गया, इस मत का सैद्धांतिक ग्रंथ ‘पाशुपत सूत्र’ है। पाशुपत सम्प्रदाय को लकुलीश सम्प्रदाय या ‘नकुलीश सम्प्रदाय’ भी कहा जाता है। ‘लकुलीश’ का उत्पत्ति स्थल गुजरात का ‘कायावरोहण’ क्षेत्र था।
यह सम्प्रदाय छठी से नवीं शताब्दी के बीच मैसूर और राजस्थान में भी फैल गया। वैदिक लकुलीश लिंग, रुद्राक्ष और भस्म धारण करते थे जबकि तांत्रिक लकुलीश अथवा पाशुपत, लिंगतप्त चिह्न और शूल धारण करते थे तथा मिश्र पाशुपत समान भावों से पंचदेवों की उपासना करते थे। छठी से 10 शताब्दी ईस्वी में लकुलीश के पाशुपत मत और कापालिक संप्रदायों का उल्लेख मिलता है।
गुजरात में लकुलीश मत का बहुत पहले ही प्रादुर्भाव हो चुका था। पर पंडितों का मत है कि उसके तत्वज्ञान का विकास विक्रम की सातवीं-आठवीं शताब्दी में हुआ होगा। कालांतर में यह मत दक्षिण और मध्य भारत में फैल गया। शिव के अवतारों की सूची, जो वायुपुराण से लेकर लिंगपुराण और कूर्मपुराण में उद्धृत है, लकुलीश का उल्लेख करती है।
लकुलीश की मूर्ति का भी उल्लेख किया गया है, जो गुजरात के ‘झरपतन’ नामक स्थान में है। लकुलीश की यह मूर्ति सातवीं शताब्दी ईस्वी की है। लिंगपुराण में लकुलीश के मुख्य चार शिष्यों के नाम ‘कुशिक’, ‘गर्ग’, ‘मित्र’ और ‘कौरुष्य’ मिलते हैं। इस संप्रदाय का वृत्तांत शिलालेखों तथा विष्णु-पुराण एवं लिंगपुराण आदि में मिलता है।
कालमुख संप्रदाय
कालमुख संप्रदाय के अनुयाइयों को शिव पुराण में ‘महाव्रतधर’ कहा गया है। इस संप्रदाय के लोग नर-कपाल में ही भोजन, जल और सुरापान करते थे और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।
कापालिक मत
कापालिक संप्रदाय के इष्ट देव ‘भैरव’ थे, इस संप्रदाय का प्रमुख केंद्र श्रीशैल नामक स्थान था। कापालिक संप्रदाय को ‘महाव्रत सम्प्रदाय’ भी कहा जाता है। यामुन मुनि के शिष्य श्रीहर्ष (ई.1088) ने नैषध में ‘समसिद्धान्त’ नाम से जिस मत का उल्लेख किया है, वह कापालिक सम्प्रदाय ही है। कपालिक नाम के उदय का कारण नर कपाल धारण करना माना जाता है।
वस्तुतः यह भी बहिरंग सिद्धांत है। इसका अन्तरंग रहस्य ‘प्रबोध-चन्द्रोदय’ की ‘प्रकाश’ नामक टीका में प्रकट किया गया है। इसके अनुसार इस सम्प्रदाय के साधक कपालस्थ अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र उपलक्षित नर-कपालस्थ अमृत-पान करते थे। इस कारण ये कापालिक कहलाए। बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के सम्प्रदाय विद्यमान थे।
सरबरतन्त्र में आदिनाथ, अनादि, काल, अमिताभ, कराल, विकराल आदि 12 कापालिक गुरुओं और उनके नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चन्द्र, चर्पट आदि 12 शिष्यों के नाम एवं वर्णन मिलते हैं। इन शैव साधुओं को तन्त्रिक शैव मत का प्रवर्तक माना जाता है। कुछ पुराणों में कापालिक मत के प्रवर्तक धनद या कुबेर का उल्लेख है।
नाथ सिद्ध कालमुख एवं अघोरी मत अत्यंत प्राचीन काल से शैव धर्म की विभिन्न शाखाओं के रूप में विद्यमान हैं। यद्यपि ये समस्त शाखाएं भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करती हैं तथापि इन समस्त शाखाओं के साधकों का एक ही उद्देश्य है- शिवत्व को प्राप्त करना।
शैव धर्म का नाथ संप्रदाय
‘नाथ’ शब्द का प्रचलन हिन्दू, बौद्ध और जैन संतों के बीच विद्यमान है। ‘नाथ’ शब्द का अर्थ होता है स्वामी। भगवान शंकर को भोलेनाथ और आदिनाथ भी कहा जाता है। भगवान शंकर के बाद इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम भगवान दत्तात्रेय का है।
भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। अमरनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि सुप्रसिद्ध शिव मंदिर नाथों के प्रमुख मंदिर हैं। नाथ गुरुओं एवं शिष्यों को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रूप में जाना जाता है। इन्हें परिव्राजक भी कहते हैं। परिव्राजक का अर्थ होता है घुमक्कड़।
नाथ परम्परा
नाथ साधु, विश्व भर में भ्रमण करते हैं तथा आयु के अंतिम चरण में किसी स्थान पर रुक कर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय क्षेत्र में चले जाते हैं। हाथ में चिमटा तथा कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध तथा मस्तक पर जटाएं धारण करने वाले एवं धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को अवधूत एवं सिद्ध कहा जाता है। कुछ योगी अपने गले में एक सींग की नादी तथा काली ऊन का जनेऊ रखते हैं जिन्हें सींगी तथा सेली कहते हैं।
नाथ पंथ के साधक सात्विक भाव से शिव भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग ‘अलख’ (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर ‘आदेश’ या ‘आदीश’ शब्द से अभिवादन करते हैं। ‘अलख’ और ‘आदेश’ शब्द का अर्थ ‘प्रणव’ या ‘परम पुरुष’ होता है। नाथ सम्प्रदाय में नागा (दिगम्बर) तथा भभूतिधारी साधु भी होते हैं। इन्हें उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का माना जाता है। नाथ साधु ‘हठयोग’ पर विशेष बल देते हैं।
भगवान दत्तात्रेय
भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, उनकी गणना प्रमुख अघोरी के रूप में तथा प्रमुख नाथ के रूप में भी होती है जबकि वैष्णव मतावलम्बी उन्हें भगवान शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा का सम्मिलित अवतार मानकर पूजते हैं। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। उन्होंने वैष्णव और शैव परंपरा में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। दत्तात्रेय को महाराष्ट्र में नाथ परंपरा का विकास करने का श्रेय जाता है। दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है।
मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरखनाथ
प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मत्स्येन्द्र नाथ (मच्छेन्द्र नाथ) और उनके शिष्य गोरखनाथ ने नवीन व्यवस्थाएं प्रदान कीं। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव को समाप्त किया तथा योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया।
चौरासी सिद्ध
आठवीं सदी में बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय की वज्रयान शाखा में सिद्ध परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ। प्रमुख सिद्धों की संख्या चौरासी मानी गई है। चौरासी सिद्धों को बंगाल, नेपाल, असम, तिब्बत और बर्मा में विशेष रूप से पूजा जाता है।
प्रारम्भिक नाथ
चौरासी सिद्धों की परम्परा में नाथ पंथ का उदय हुआ। प्रारम्भिक दस नाथ इस प्रकार से हैं- आदि नाथ, आनंदी नाथ, कराला नाथ, विकराला नाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूत नाथ, वीर नाथ और श्रीकांथ नाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्य नाथ, चर्पट नाथ, अवध नाथ, वैराग्य नाथ, कांताधारी नाथ, जालंधर नाथ और मलयार्जुन नाथ।
नव नाथ
नाथ पंथ में नौ नाथ बड़े प्रसिद्ध हुए। इन्हें नवनाथ भी कहा जाता है। महार्णव तंत्र में कहा गया है कि नवनाथ ही नाथ संप्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं। नवनाथों की सूची अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलती है- (1.) मच्छेंद्रनाथ (2.) गोरखनाथ (3.) जालंधरनाथ (4.) नागेश नाथ (5.) भारती नाथ (6.) चर्पटी नाथ (7.) कनीफ नाथ (8.) गेहनी नाथ (9.) रेवन नाथ।
इनके अतिरिक्त मीना नाथ, खपर नाथ, सत नाथ, बालक नाथ, गोलक नाथ, बिरुपक्ष नाथ, भर्तृहरि नाथ, अईनाथ, खेरची नाथ तथा रामचंद्र नाथ भी प्रमुख नाथ हुए। अन्य उल्लेखनीय नाथों में ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ बाबा शिलनाथ, दादा धूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और र्साईं नाथ आदि के नाम लिए जाते हैं।
नाथ सम्प्रदाय की प्रमुख शाखाएं
नाथ सम्प्रदाय की अनेक शाखाएं हैं जिनमें से 12 शाखाएं प्रमुख मानी जाती हैं- (1.) भुज के कंठरनाथ, (2.) पागलनाथ, (3.) रावल, (4.) पंख या पंक, (5.) वन, (6.) गोपाल या राम, (7.) चांदनाथ कपिलानी, (8.) हेठनाथ, (9.) आई पंथ, (10). वेराग पंथ, (11.) जैपुर के पावनाथ और (12.) घजनाथ।
दक्षिण भारत में शैवधर्म
दक्षिण भारत में नाथ सिद्ध कालमुख सम्प्रदायों के स्थान पर कुछ बदले हुए नामों से शैव सम्प्रदाय अस्तित्व में हैं।
दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल राजाओं के शासन काल में लोकप्रिय रहा। पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार नायनार संतों ने किया। नायनार संतों की संख्या 63 बताई गई है जिनमें उप्पार, तिरूज्ञान, संबंदर और सुंदर मूर्ति के नाम उल्लेखनीय हैं। ऐलोरा के कैलाश मदिंर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया। चोल शालक राजराज (प्रथम) ने तंजौर में राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया।
तमिल शैव
तमिल देश में छठी से नवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य, प्रमुख शैव भक्तों का जन्म हुआ जो अपने काल के प्रसिद्ध कवि भी थे। सन्त तिरुमूलर शिवभक्त होने के साथ-साथ, प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ ‘तिरुमन्त्रम्’ के रचयिता थे। इस प्रकार तमिल शैव मत, दक्षिण भारतीय अनेकान्त यथार्थवादी समूह था। इसके अनुसार विश्व वास्तविक है तथा आत्माएं अनेक हैं। तमिल शैव आंदोलन, आदि शैव संतों की काव्य रचनाओं तथा नयनारों की उत्तम भक्ति पूर्ण कविताओं के मिश्रण से विकसित हुआ।
इस पंथ के मान्य ग्रंथों के चार वर्गों में 2 वेद, 28 आगम, 12 तिमुरई तथा 14 शैव सिद्धान्त शास्त्र सम्मिलित हैं। यद्यपि शैव धर्म में वेदों का स्थान उच्च है तथापि ‘एक्यं शिव’ द्वारा अपने भक्तों के लिए वर्णित गोपनीय आगमों को अधिक महत्त्व दिया गया है। 13वीं तथा 14वीं सदी के आरम्भ में तमिल शैव मत में 6 आचार्य हुए जिनमें से अधिकांश अब्राह्मण तथा निम्न जाति में उत्पन्न हुए थे।
इन आचार्यों द्वारा तमिल शैव सिद्धान्त शास्त्र रचे गए। तमिल शैव ग्रंथों तथा कविताओं में तीन महान शैव आचार्यों- अप्पर तिरुज्ञान, सम्बन्ध एवं सुन्दरमूर्ति की रचनाएँ शामिल हैं। अघोर शिवाचार्य जी को इस मत का प्रमुख संस्थापक माना जाता है।
आंध्र के कालमुख शैव
आन्ध्र प्रदेश में काकतीयों की प्राचीन राजधानी वारांगल के दक्षिण-पूर्व में स्थित वारंगल दुर्ग कभी दो दीवारों से घिरा हुआ था जिनमें से भीतरी दीवार के पत्थर के द्वार (संचार) और बाहरी दीवार के अवशेष आज भी मौजूद हैं। ई.1162 में निर्मित 1000 स्तम्भों वाला शिव मन्दिर नगर के भीतर ही स्थित है। इस काल में कालमुख या अरध्य शैव के कवियों ने तेलुगु भाषा की अभूतपूर्व उन्नति की।
वारंगल के संस्कृत कवियों में सर्वशास्त्र विशारद के लेखक वीर-भल्लात-देशिक और नल-कीर्ति-कौमुदी के रचयिता अगस्त्य के नाम उल्लेखनीय हैं। मान्यता है कि अलंकार शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रताप-रुद्र-भूषण के लेखक विद्यानाथ यही अगस्त्य थे। गणपति का हस्ति सेनापति जयप, नृत्य-रत्नावली का रचयिता था। संस्कृत कवि शाकल्य मल्ल भी इसी का समकालीन था।
तेलुगु कवियों में रंगनाथ रामायणुम का लेखक पलकुरिकी सोमनाथ मुख्य है। इसी समय भास्कर रामायणुम भी लिखी गई। आज के प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में बालाजी अथवा वेंकटेश्वर की जो प्रतिमा है, वह मूलतः वीरभद्र स्वामी की प्रतिमा है। मान्यता है कि राजा कृष्ण देवराय के काल में रामानुज आचार्य ने इस मंदिर का वैष्णवीकरण किया और वीरभद्र की प्रतिमा को बालाजी नाम दिया। तब से यह प्रतिमा विष्णु विग्रह के रूप में पूजी जाती है।
काश्मीरी शैव सम्प्रदाय
वसुगुप्त को काश्मीर शैव दर्शन की परम्परा का प्रणेता माना जाता है। उसने 9वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में काश्मीरी शैव सम्प्रदाय का गठन किया। वसुगुप्त के कल्लट और सोमानन्द नामक दो प्रसिद्ध शिष्य थे। इनका दार्शनिक मत ‘ईश्वराद्वयवाद’ था। सोमानन्द ने ‘प्रत्यभिज्ञा मत’ का प्रतिपादन किया। प्रतिभिज्ञा शब्द का तात्पर्य है कि साधक अपनी पूर्वज्ञात वस्तु को पुनः जान ले।
इस अवस्था में साधक को अनिवर्चनीय आनन्दानुभूति होती है। वे अद्वैतभाव में द्वैतभाव और निर्गुण में भी सगुण की कल्पना कर लेते थे। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए कोरे ज्ञान और निरी भक्ति को असमर्थ बतलाया। दोनों के समन्वय से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
यद्यपि शुद्ध भक्ति, बिना द्वैतभाव के संभव नहीं है और द्वैतभाव अज्ञान मूलक है किन्तु ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब द्वैत मूलक भाव की कल्पना कर ली जाती है तब उससे किसी प्रकार की हानि की संभावना नहीं रहती। इस प्रकार इस सम्प्रदाय में कतिपय ऐसे भी साधक थे जो योग-क्रिया द्वारा रहस्य का वास्तविक पता पाना चाहते थे, उनकी धारणा थी कि योग-क्रिया से हम माया के आवरण को समाप्त कर सकते हैं और इस दशा में ही मोक्ष की सिद्धि सम्भव है।
अघोरी सम्प्रदाय
अघोर शब्द दो शब्दों- ‘अ’ और ‘घोर’ से मिल कर बना है जिसका अर्थ है- ‘जो घोर न हो’ अर्थात् सहज और सरल हो। चूंकि इनके लिए सब-कुछ सहज और सरल है तथा घोर तथा अशुभ कुछ भी नहीं है, इसलिए ये शमशान में शवों को खाने से लेकर कै तथा विष्ठा खाने तक को भी सहज, सरल, शुभ तथा अघोर कर्म समझते हैं। इसलिए ये अघोरी कहलाते हैं।
अघोर पंथ के उत्पत्ति काल के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता किंतु इन्हें कपालिक संप्रदाय के समकक्ष प्राचीन माना जाता है। यह सम्प्रदाय, शैव धर्म की स्वतंत्र शाखा के रूप में विकसित हुआ। अघोरी साधु, समाज से निर्लिप्त रहते हैं तथा अपने विचित्र व्यवहार, एकांत-प्रियता और रहस्यमय क्रियाओं के लिए जाने जाते हैं।
अघोर पन्थ की भी कई शाखाएं हैं किंतु मोटे तौर पर इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, शैवमार्गी तथा वाममार्गी। शैवमार्गी अघोरी मानव मल का भक्षण नहीं करते जबकि वाममार्गी अघोरी मानव मल का भक्षण करते हैं। इन्हें काक अघोरी भी कहा जाता है।
अवधूत भगवान दत्तात्रेय को अघोर शास्त्र का गुरु माना जाता है। अघोर संप्रदाय की मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश ने स्थूल रूप में दत्तात्रेय अवतार लिया। अघोर संप्रदाय के साधु भगवान शिव के भक्त होते हैं। इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन सहित सृष्टि के समस्त रूपों में विद्यमान हैं। शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन आदि समस्त स्थितियों के वास्तविक स्वरूप को जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।
अघोर मत के अनुसार प्रत्येक मानव जन्म से अघोर अर्थात सहज होता है। बालक ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, वह अंतर करना सीख जाता है और उसमें असहजताएं तथा बुराइयां घर कर लेती हैं जिनके कारण वह अपनी मूल प्रकृति अर्थात् अघोर रूप को भूल जाता है। अघोर साधना के द्वारा मनुष्य पुनः अपने सहज और मूल रूप में आ सकता है। इस मूल रूप का ज्ञान होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
अघोर संप्रदाय के साधक प्रत्येक वस्तु के प्रति समदृष्टि विकसित के लिए नरमुंडों की माला पहनते हैं और नरमुंडों को पात्र के तौर पर प्रयुक्त करते हैं। वे चिता की भस्म का शरीर पर लेपन करते हैं और चिता की अग्नि पर भोजन तैयार करते हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं। इसलिए अघोर साधनाएं मुख्यतः श्मशान घाटों और निर्जन स्थानों पर की जाती हैं। शव साधना अघोर पंथ की एक विशेष क्रिया है जिसके द्वारा स्वयं के अस्तित्व को जीवन के विभिन्न चरणों में अनुभव किया जाता है।
वाराणसी या काशी को भारत के सर्व-प्रमुख अघोर स्थल के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव की नगरी होने से काशी में शैव अघोरियों का वास बड़ी संख्या में रहता है। काशी में स्थित बाबा कीनाराम का स्थल, अघोरियों का महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र का गिरनार पर्वत भी अघोरियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय की तपस्या स्थली के रूप में मान्यता है।
भारत में सर्वाधिक अघोरी असम के कामाख्या मंदिर में रहते हैं। मान्यता है कि जब माता सती भस्म हुई थीं तो उनकी योनि इसी स्थान पर गिरी थी। पश्चिमी बंगाल के तारापीठ, नासिक के अर्ध ज्योतिर्लिंग और उज्जैन के महाकाल के निकट भी अघोरी देखे जाते हैं। मान्यता है कि इन स्थानों पर अघोरियों को सिद्धियां शीघ्रता से प्राप्त होती हैं।
अघोर संप्रदाय के साधक मृतक के मांस के भक्षण के लिए भी जाने जाते हैं। मृतक का मांस जन साधारण में अस्पृश्य होता है किंतु अघोर इसे प्राकृतिक पदार्थ के रूप में देखते हैं और इसे उदरस्थ कर प्राकृतिक चक्र को संतुलित करते हैं। मृतक के मांस भक्षण के पीछे उनकी समदर्शी दृष्टि विकसित करने का सिद्धांत काम करता है।
कुछ प्रमाणों के अनुसार अघोर साधक मृत मांस से शुद्ध शाकाहारी मिठाइयां बनाने की क्षमता भी रखते हैं। लोक मानस में अघोर संप्रदाय के बारे में अनेक भ्रांतियाँ और रहस्य कथाएं प्रचलित हैं। अघोर विज्ञान में इन सब भ्रांतियों को निरस्त करके अघोर क्रियाओं और विश्वासों को विशुद्ध विज्ञान के रूप में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि शैव धर्म के नाथ सिद्ध कालमुख एवं अघोरी सम्प्रदाय पूरे भारत में अलग-अलग नामों से फैले हुए हैं। हजारों साल पुरानी शैव परम्परा आज भी भारत में प्रमुखता से स्थान बनाए हुए है।
वैष्णव धर्म (पौराणिक धर्म) एवं शैव धर्म की तरह शाक्त धर्मभी भारत में अत्यंत प्राचीन काल से विद्यमान है। यह भी पूरे भारत में फैला हुआ है। हालांकि आजकल शाक्त सम्प्रदाय को तांत्रिक धर्म मान लिया जाता है किंतु प्राचीन काल में इसका स्वरूप पूर्णतः तांत्रिक नहीं था।
सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। अतः शाक्त सम्प्रदाय, भारत के प्राचीनतम सम्प्रदायों में से है तथा हिन्दू-धर्म के तीन प्रमुख सम्प्रदायों- वैष्णव, शैव एवं शाक्त में से एक है। शाक्त सम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। गुप्तकाल में शाक्त मत का नवीन रूप दिखाई देता है।
इस काल में वैष्णव एवं शैव मतों के समन्वय से नाथ सम्प्रदाय तथा नवीन शाक्त सम्प्रदाय की उत्पत्ति हुई। इसीलिए नाथों और शाक्तों में से कुछ शाखाएं वैष्णव धर्म का तथा कुछ शाखाएं तांत्रिक मत का पालन करती हैं। शाक्त धर्म, शक्ति की साधना का विज्ञान है। इसके मतावलंबी शाक्त धर्म को प्राचीन वैदिक धर्म के बराबर ही पुराना मानते हैं। शाक्त धर्म का विकास वैदिक धर्म के साथ-साथ या सनातन धर्म में इसे समावेशित करने की आवश्यकता के साथ हुआ। यह हिन्दू-धर्म में पूजा का एक प्रमुख स्वरूप है।
To purchase this book please click on Image.
गुप्त काल में शाक्त सम्प्रदाय, उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया आदि द्वीपों में लोकप्रिय था। भारत में काश्मीर, दक्षिण भारत, असम और बंगाल में शाक्त धर्म का अधिक प्रचलन हुआ। वैष्णव मत पर शाक्त मत का प्रभाव हो जाने से ब्रज क्षेत्र में भी शक्ति की पूजा होने लगी। ब्रज क्षेत्र में महामाया, महाविद्या, करौली, सांचोली आदि विख्यात शक्ति पीठ स्थित हैं। मथुरा के राजा कंस ने यशोदा से उत्पन्न जिस कन्या का वध किया था, उसे भगवान श्रीकृष्ण की प्राण रक्षिका देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी शक्ति की यह मान्यता ब्रज से लेकर सौराष्ट्र तक विस्तृत है। द्वारका में भगवान द्वारकानाथ के शिखर पर चर्चित सिंदूरी आकर्षक देवी प्रतिमा को श्रीकृष्ण की भगिनी माना जाता है जो शिखर पर विराजमान रहकर सदा श्रीकृष्ण की रक्षा करती हैं। ब्रज क्षेत्र आज से 100 वर्ष पूर्व तक तांत्रिकों का प्रमुख गढ़ था। यहाँ के तांत्रिक भारत भर में प्रसिद्ध रहे हैं। कामवन भी राजा कामसेन के समय तंत्र विद्या का मुख्य केंद्र था, उसके दरबार में अनेक तांत्रिक रहते थे। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद सम्पूर्ण भारत भूमि में शाक्त धर्म के प्रति आकर्षण कम हुआ। सम्पूर्ण भारत वर्ष, अर्थात् हिन्दूकुश पर्वत से लेकर दक्षिण एशियाई द्वीपों में देवी के विभिन्न स्वरूपों के मंदिर एवं शक्ति पीठ प्राप्त होते हैं। शाक्त सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ ‘श्री दुर्गा भागवत पुराण’ है।
‘दुर्गा सप्तशती’ भी इसी पुराण का अंश है। इस ग्रंथ में 108 देवी पीठों का वर्णन किया गया है। इनमें से 51-52 शक्ति पीठों का विशेष महत्व है। माँ दुर्गा के प्राचीन मंदिरों की संख्या भी हजारों में है। देवी उपनिषद के नाम से एक उपनिषद भी लिखा गया।
विश्व के प्रायः समस्त धर्मों में यह मान्यता है कि ईश्वर, पुरुष जैसा हो सकता है किंतु शाक्त धर्म विश्व का एकमात्र धर्म है जो ‘मातृ-तत्व’ को सृष्टि की रचयिता मानता है। शाक्त सम्प्रदाय में देवी को ही सर्वशक्तिमान माना जाता है तथा उसी की आराधना होती है। इस मत के अनुसार विभिन्न देवियां, एक ही सर्वशक्तिमान देवी के विभिन्न रूप हैं। शाक्त मत के अन्तर्गत भी कई परम्पराएँ मिलतीं हैं जिनमें लक्ष्मी से लेकर रौद्ररूपा काली तक उपस्थित हैं। कुछ शाक्त सम्प्रदाय अपनी देवी का सम्बन्ध शिव या विष्णु से मानते हैं।
भगवान शिव की पत्नी, माँ पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। यही सती, दुर्गा और भगवती है। उसी की विशेष आराधना के लिए वर्ष में दो बार नवरात्रि उत्सव का आयोजन किया जाता है। वर्ष का पहला नवरात्रि चैत्र माह में आता है इसे ‘चैत्रीय नवरात्रि’ कहते हैं। दूसरी नवरात्रि आश्विन माह में आती है जिसे ‘शारदीय नवरात्रि’ कहते हैं।
शारदीय नवरात्रि के नौ दिन उत्सव की तरह मनाए जाते हैं, जिसे दुर्गोत्सव कहा जाता है। चैत्रीय नवरात्रि शैव तात्रिकों के लिए होती है जिसके अंतर्गत तांत्रिक अनुष्ठान और कठिन साधनाएँ की जाती हैं। शारदीय नवरात्रि सात्विक साधकों के लिए होती है जो माँ की भक्ति तथा अनुकम्पा प्राप्ति हेतु मनाई जाती है।
शक्ति के तांत्रिक अनुयाइयों को ही मुख्यतः शाक्त कहा जाता है। शाक्त न केवल शक्ति की पूजा करते हैं, बल्कि उसके शक्ति-आविर्भाव को मानव शरीर एवं जीवित ब्रह्माण्ड की शक्ति या ऊर्जा में संवर्धित, नियंत्रित एवं रूपान्तरित करने हेतु कठिन साधना करते हैं। मान्यता है कि शक्ति, ‘कुंडलिनी’ रूप में मानव शरीर के गुदा आधार पर स्थित होती है।
‘जटिल-ध्यान’ एवं ‘यौन-यौगिक-अनुष्ठानों’ के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति जागृत की जा सकती है। इस अवस्था में कुंडलिनी, सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना से ऊपर की ओर उठती है तथा मार्ग में कई चक्रों को भेदती हुई सिर के शीर्ष में अन्तिम चक्र में प्रवेश करती है और वहाँ यह अपने पति-प्रियतम शिव के साथ हर्षोन्मादित होकर मिलती है।
भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव ‘हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि’ के रूप में ‘मनो-दैहिक’ रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट ही परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।
एक ओर भारत भूमि पर उत्तर से दक्षिण तक वैष्णव धर्म तथा शैव धर्म फल-फूल रहा था तो दूसरी ओर शाक्त धर्म नामक वाममार्गी मत भी विभिन्न दार्शनिक व्याख्याओं के साथ रूप ले रहा था। वामर्माग में पंचमकारों- मद्य, मीन, मांस, मैथुन तथा मुद्रा के माध्यम से साधक की उन्नति का मार्ग ढूंढा गया तथा तंत्र-मंत्र और यंत्र के बल पर सिद्धियों की कामना की गई।
इस मत में भैरवी साधना जैसी अनेक साधना पद्धितियों का निर्माण किया गया जिनमें साधक को भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना अनिवार्य था। इस तंत्र साधना की कुछ मर्यादाएं निश्चित की गईं जिनकी पालना प्रत्येक साधक को करनी पड़ती थी। इस मत के अनुसार भैरवी ‘शक्ति’ का ही एक रूप होती है तथा तंत्र की सम्पूर्ण भावभूमि ‘शक्ति’ पर आधारित है।
इस साधना के माध्यम से साधक को इस तथ्य का साक्षात् कराया जाता था कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का माध्यम नहीं, वरन् शक्ति का उद्गम भी होती है। शक्ति प्राप्ति की यह क्रिया केवल सदगुरु ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं एवं संवेदनाओं का ज्ञान होता है। इसी कारण तंत्र के क्षेत्र में स्त्री समागम के साथ-साथ गुरु के मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता पड़ती थी।
शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था। मद्य और माँस के साथ-साथ मीन (मछली), मुद्रा (विशेष क्रियाएँ), मैथुन (स्त्री संसर्ग) आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।
जन-साधारण इन सिद्ध-तान्त्रिकों से डरने लगा। साधारण-तान्त्रिक एवं सिद्ध-तान्त्रिक, दोनों ही अपनी-अपनी साधनाओं के द्वारा ब्रह्म को पाने का प्रयास करते थे। पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था।
कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोल कर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था। इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का उचित प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती थी। वाम साधना में एक और मत सामने आया जिसमें भैरवी-साधना या भैरवी-चक्र को प्राथमिकता दी गई। इस मत के साधक वैसे तो पाँचों मकारों को मानते थे, किन्तु उनका मुख्य ध्येय काम के द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति करना था।
संगम युग में समाज अत्यंत उन्नत दशा में था। संगम युगीन समाज की जानकारी संगम साहित्य से होती है। संगम युग के लोग विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियाँ करते थे।
तोल्कापिपयम के वर्णन से पता चलता है कि संगम समाज का आरंभिक दौर भूमि के पंचविध वर्गीकरण- पहाड़ी, पशुचारी, कृषीय, मरुस्थल और तटीय पर आधारित था। इन वर्गीकृत भूमियों पर विभिन्न किस्म के लोग रहते थे और सबने अपने अलग-अलग परिवेश में विशेष प्रकार के तौर-तरीके और जीवन-शैलियाँ विकसित कीं। पारिस्थितिकीय विविधताओं ने उनके विभिन्न व्यवसायों- आखेट, कृषि, पशुचारण, लूट-पाट, माही गिरी, गोताखोरी, नौचालन, इत्यादि का स्वरूप निर्धारित किया।
आद्य मानव समूह
मानवशास्त्री अध्ययनों से पता चलता है कि संगम युग में समाज का आद्य सामाजिक घटक नेग्रोआयड और आस्ट्रेलायड समूहों का था जिनका मिश्रण आद्य भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आए एक अन्य प्रजातीय कुल से हुआ था। आरंभिक दौर में इन समाजों की जनसंख्या कम थी और सामाजिक वर्गों का निर्माण नहीं हुआ था। इस कारण प्रत्येक क्षेत्र के लोगों में एकता थी। वे अपने शासकों के पास स्वतंत्रता पूर्वक आ-जा सकते थे। उस समय का तमिल समाज व्यावसायिक वर्गीकरण से परिचित था जिसमें सैनिकों, आखेटकों, गड़ेरियों, हलवाहों, मछुआरों, इत्यादि व्यवसायों का अस्तित्व प्रमुखता से था।
सामाजिक वर्गीकरण
के उत्तरार्द्ध में अनेक कबीलों और सरदारों का अस्तित्व मिलता है। चार वैदिक वर्ण स्पष्टतः बाद की अवधि के थे। अप्रवासी ब्राह्मणों द्वारा ईसा की पहली सदी के लगभग वर्ण-व्यवस्था लाई गई, किन्तु इसमें उत्तर भारत की तरह क्षत्रिय शामिल नहीं थे। सिर्पफ ब्राह्मण ही द्विज थे जो यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे। संगम साहित्य में दासों का उल्लेख भी मिलता है और उन्हें ‘आदिमाई’ कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- वह व्यक्ति जो दूसरों के चरणों पर आश्रित होता है।
संगम कालीन समाज में स्त्री की दशा
कालित्तोगाई आदि संगम-काव्यों से ज्ञात होता है कि संगम युग में समाज तमिल नारियों को पुरुषों की भांति स्वतंत्रता प्रदान करता था।। वे स्वतंत्रता पूर्वक घरों से बाहर जाती थीं। समुद्रतट और नदी-किनारे खेल सकती थीं और मंदिरों के उत्सव में शामिल होती थीं। फिर भी नारी को पुरुषों के संरक्षण में रहना होता था। ‘कुरुंतोगाई’ से पता चलता है कि पत्नी को पति के गुणों के मूल्यांकन के आधार पर नहीं, अपितु इसलिए प्यार करना चाहिए क्योंकि वह उसका पति है।
दूसरे शब्दों में, पत्नी के लिए पति का आकलन करना संभव नहीं था। यद्यपि ऐसे प्रसंग भी मिलते हैं जहाँ नारियाँ शिक्षित थीं और काव्य-रचना भी करती थीं किन्तु साधारणतः नारियों की स्थिति ऐसी नहीं थी। उन्हें संपत्ति का अधिकार नहीं था, किन्तु उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाता था। वे विधवा का जीवन बिताती थीं अथवा सती हो जाती थीं और इसे दैवी-विधान माना जाता था। विवाह एक संस्कार था, संविदा नहीं। ‘तोलकापिपयम’ में आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा की गई है जिनमें ब्रह्म विवाह का आम प्रचलन था। प्रणय-निवेदन और बिना विवाह के साथ में रहने का भी उल्लेख है जो बाद में पारंपरिक विवाह के रूप ले लेता था।
संगम युग में समाज वेश्यावृत्ति के दोष से मुक्त नहीं था। वेश्यावृत्ति एक स्वीकृत संस्था थी। किन्तु गणिकाएँ शांत पारिवारिक जीवन में बाधक मानी जाती थीं। इसके बावजूद, काव्यों में जिस रूप में इनका चित्रण हुआ है और वे जैसी सामाजिक हैसियत रखती थीं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संगम युग की गणिकाएं हेय-दृष्टि से नहीं देखी जाती थीं। यद्यपि कुरुतोगाई आदि ग्रंथों में ऐसी गणिकाओं की चर्चा हुई है जो पत्नियों और उनके रिश्तेदारों को चुनौती देती हैं, पुरुषों को लुभाती हैं तथापि गणिकाएँ अपने साथियों को मुख्यतः नृत्य-गायन आदि से ही प्रसन्न करती थीं।
वस्त्राभूषण एवं अलंकार
To purchase this book please click on Image.
धनी लोग बारीक मलमल और रेशम से बने वस्त्र पहनते थे। कुलीनों और राजाओं को छोड़कर शेष लोग कपड़े के दो टुकड़ों- एक कमर के नीचे और दूसरा पगड़ी के रूप में शिरोवस्त्र से ही संतुष्ट रहते थे। स्त्रियाँ कपड़ों का उपयोग कमर से नीचे के भाग को ढंकने के लिए ही करती थीं। कबीले तो उतना भी नहीं कर सकते थे। कबीलाई स्त्रियाँ शरीर को ढंकने के लिए पत्तों और छालों का उपयोग करती थीं। संगम युग के स्त्री-पुरुष तेल, सुगंधित द्रव्य, रंगीन पाउडर और प्रलेप के शौकीन थे तथा अपनी छातियों पर चंदन का गहरा लेप लगाते थे। सिलप्पादिकरम के अनुसार सित्रयां अपने शरीर पर तस्वीरें बनवाती थीं और पलकों पर श्याम-रंजक लगाती थीं। स्त्री और पुरुष दोनों गर्दन के घेरे में, बाहों और पैरों में आभूषण धारण करते थे। कुलीन स्त्रियां भारी बाजूबंद और पाजेब पहनती थीं, जबकि सामान्य गृहस्थ-स्त्रियाँ सामान्य प्रकार के जेवर धारण करती थीं। धनी वर्ग के स्त्री-पुरुष स्वर्ण और कीमती रत्नों से शृंगार करते थे, निर्धन स्त्रियां शंख एवं कौड़ी से बने कंगनों और रंगीन मनकों से बने कंठहार पहनती थीं। ‘शिलप्पादिकरम’ एक ऐसे आनुष्ठानिक गर्मस्नान का उल्लेख करता है जिसका जल पाँच प्रकार के बीजों, दस प्रकार के स्ंतभों और बत्तीस प्रकार के सुगंधित पौधों से गरम किया जाता था। बालों को ‘अखिल के धुएं’ से सुखाया जाता था और सजने-संवरने के लिए बालों को पाँच हिस्सों में बांटा जाता था।
पुरुष भी लंबे बाल रखते थे और उनके गुच्छे को गांठ बनाकर बांधते थे। इन गांठों को कभी-कभार मनकों की माला से घेरा जाता था। कुरुंतोगाई के अनुसार तमिल लोग फूलों के शौकीन थे। स्त्रियां जूड़े में कुमुदिनी के फूल लगाती थीं।
आवास
संगम काल के लोग कई प्रकार के घर बनाते थे। सामान्य लोगों के घर कच्ची मिट्टी की ईटों एवं गारे से बनाये जाते थे। धनी लोगों के घर ‘सुडुमान’ अर्थात् पकाई गई मिट्टी की ईंटों से बने होते थे। निर्धन लोेग ऐसी छाजन वाले घरों में रहते थे जो घास अथवा नारियल या पंखिया खजूर अथवा ताड़ से छाई जाती थी।
साहित्यिक रचनाएँ धनी लोगों के कई मंजिलों वाले घरों का उल्लेख करती हैं जिनके प्रवेश-द्वार पर लोहे के फाटक होते थे और उन फाटकों को जंग से बचाने के लिए उन पर रंग किया जाता था। ‘सिलप्पादिकरम’ के अनुसार ये घर सुंदर कलात्मक दीपकों से प्रकाशित किए जाते थे। ऐसे दीपक ग्रीस और रोम से आते थे। इनमें मछली से निकाला गया तेल डाला जाता था।
भोजन और पेय
संगम काल के तमिल लोग प्रायः सामिष भोजन करते थे किंतु ब्राह्मण एवं संन्यासी निरामिष आहार ही ग्रहण करते थे। भोजन में चावल, दूध, मक्खन, घी और शहद प्रधान थे। मांस और मद्य का खुलकर उपयोग होता था। दही लोकप्रिय भोज्य था। कुरुंतोगाई दही, गुड़, मुरमुरा, दूध और घी से बने अनेक प्रकार के मिष्ठानों की चर्चा करता है। संगम ग्रंथों में कढ़ी और चावल का भी उल्लेख हुआ है।
उच्च वर्ग के लोग उत्तम कोटि के चावल, मन पसंद मांस, आयातित मद्य इत्यादि ग्रहण करते थे। ब्राह्मण मद्य और मांस से परहेज करते थे। नगरीय क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं द्वारा निर्धनों को निःशुल्क भोजन का वितरण किया जाता था।
धनी गृहस्थों द्वारा दावतों का आयोजन भी किया जाता था। अतिथियों को भोजन करवाना सामान्य प्रथा थी और बिना अतिथि को खिलाए भोजन अधूरा माना जाता था। कवि और विद्वान सम्मानित अतिथि माने जाते थे और घी में पकाया गया चावल उन्हें प्रेम और आदर से खिलाया जाता था।
मनोरंजन
लोग अनेक प्रकार के खेलों और उत्सवों में भाग लेते थे। इनमें नृत्य, संगीत के आयोजन, धार्मिक उत्सव, बैलों की लड़ाई, मुर्गेबाजी, आखेट, पासा, कुश्ती, मुक्केबाजी, कलाबाजी, इत्यादि शामिल थे। औरतें धार्मिक उत्सवों, पासे और वारिप्पांथु या कपड़े की गेंद से खेलती थीं।
लड़कियां प्रायः ताड़ या खजूर की पंखियों के रेशे से बने हिंडोले में झूलती थीं। नरिन्नाई अलंकृत गुड़ियों से खेले जाने वाले खेल की चर्चा करता है। कुरुंतोगाई के अनुसार बच्चे खिलौना-गाड़ी से खेलकर और समुद्र-तट पर बालू के घर बनाकर अपना मनोरंजन करते थे।
नृत्य और संगीत मनोविनोद के लोकप्रिय साधन थे। संगम काव्य अनेक प्रकार के नृत्यों की चर्चा करता है। सिलप्पादिकरम सात समूहों में बंटे ग्यारह प्रकार के नृत्यों का उल्लेख करता है। यह संगीत की बारीकियों का भी विवरण देता है। मृदंग, बांसुरी और याल जैसे अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र पुहार और मदुराई की दुकानों में बेचे जाने का भी उल्लेख है। प्रदर्शन की कलाओं में नाटक भी शामिल था।
नाटकों का स्वरूप अधिकांशतः धार्मिक होता था, प्रायः महान व्यक्तियों अथवा महत्त्वपूर्ण घटनाओं के स्मरणोत्सव के रूप में भी नाटक खेले जाते थे। मागध और बंदी अपने वाद्य-यंत्रों के साथ जगह-जगह घूमकर किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति अथवा घटना की महिमा गाया करते थे और संगम युग में यह कार्य काफी लोकप्रिय था।
आरंभ में चारण (पोरुनार) युद्ध में संलग्न सैनिकों में वीरत्व जगाने और युद्ध में विजय मिलने पर उनकी विजय-गाथा गाते थे। वे युद्धरत योद्धाओं के संदेश उनके घरों तक पहुंचाते थे। समाज में उनका बहुत आदर था और राजा भी उन्हें सम्मानित करते थे। पोरुनार के साथ-साथ पनार भी जनसामान्य का मनोरंजन करते थे।
संगम कालीन समाज के धार्मिक विश्वास
साहित्यिक स्रोत संगम युग में धार्मिक कृत्यों का विशद उल्लेख करते हैं। संगम कालीन तमिल समाज में ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म प्रचलित थे। बौद्ध धर्म और जैन धर्म ईसा की प्रथम शताब्दी में तमिल प्रदेश में आए। इस अवधि में शैव और वैष्णव जैसे ब्राह्मण-पंथ भी प्रचलित थे। संगम कृतियों में वैदिक लोगों के आगमन और तमिलों के धर्म के साथ उनके धर्म के पारस्परिक प्रभाव की चर्चा अनेक स्थलों पर हुई है।
सिलप्पादिकरम त्रिगुण पवित्र-अगिन, द्विज प्रकृति, छः कर्त्तव्य तथा अन्य ब्राह्मणवादी विचारों और अवधारणाओं की चर्चा करता है। तोल्कापिपयम में भी ब्राह्मण-विहित छः कर्त्तव्यों का उल्लेख है। ब्राह्मणवादी अनुष्ठान एवं संस्कार पूरी तरह प्रचलन में थे। अनेक संगम काव्यों में यज्ञीय भवनों वाले पांड्य नृपों की चर्चा हुई है।
तोल्कापिपयम में चार देवताओं की चर्चा हुई है- मुरुगन, तिरुमल, वेंदन (इंद्र) और वरुण। इन्द्र की पूजा वर्षा के देवता के रूप में होती थी और उसके सम्मान में वार्षिकोत्सव मनाया जाता था। पत्तिनप्पालाई में शिव के पुत्र मुरुगन की पूजा का उल्लेख है। लक्ष्मी (समृद्धि की देवी), वनों के संरक्षक के रूप में मायन (पश्चवर्ती विष्णु), बलदेव, कामन (प्रणय-देव), चन्द्रदेव, समुद्रदेव तथा अन्य देवताओं की भी पूजा होती थी।
संगम युग के लोग भूत-प्रेत में भी विश्वास करते थे। सिल्पादिकरन में भूत की चर्चा मिलती है। अनेक लोग पेड़ों, युद्ध क्षेत्रों और श्मशानों में निवास करने वाले ऐसी दुष्टात्माओं में विश्वास करते थे जो रक्तपान करते हैं और रक्त सने हाथों से बाल संवारते हैं। उसी ग्रंथ में छोटे देवताओं, जैसे- मदुरा और पुहार आदि अभिभावक देवताओं का उल्लेख हुआ है।
वे ग्राम-देवताओं को तुष्ट करने के लिए यज्ञ करते थे। वृक्षों, झरनों और पर्वत-शिखरों पर निवास करने वाले देवताओं में विश्वास और उनकी पूजा-अर्चना की परंपरा से स्पष्टतः जीववाद के प्रचलन का पता चलता है। मृतवीरों, सतियों और अन्य शहीदों को भी देवत्व प्रदान किया जाता था।
संगम युग में ईसा की प्रथम शताब्दी में बौद्ध और जैन धर्मों के प्रवेश से तमिलों के दार्शनिक विचार बहुत हद तक प्रभावित हुए। इन विचारधाराओं ने ज्ञान को पदार्थ पर प्राथमिकता दी। बौद्धों और जैनों ने लोगों का आह्वान किया कि वे पदार्थ से परे जगत के बारे में सोचें। अनेक विद्वानों का मत है कि उस काल के दो प्रसिद्ध महाकाव्यों, सिलप्पादिकरम और मनिमेकलाई में से प्रथम जैन ग्रंथ था और दूसरा बौद्ध ग्रंथ।
शैववाद और वैष्णववाद भी महत्त्वपूर्ण धार्मिक मत थे। मनिमेकलाई में शैववाद का उल्लेख हुआ है। अन्य ग्रंथों में शिव को उनके सहज गुणों के साथ उल्लिखित किया गया है, जैसे- प्राचीन प्रथम ईश्वर, सुंदर नीले कंठ वाले भगवान और वटवृक्ष के नीचे स्थित भगवान। इससे प्रतीत होता है कि आरंभिक काल में शैववाद और वैष्णववाद दोनों तमिल प्रदेश में र्सिफ सिद्धांत में प्रचलित थे, नाम से नहीं। यद्यपि तोल्कापिपयम मुरुगदेव (शिव का पुत्र) और मायन (विष्णु का आरंभिक नाम) की चर्चा तो करता है, किन्तु शैववाद और वैष्णववाद का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता। संभवतः इन दो पंथों का दो भिन्न संप्रदायों में संक्रमण संगम युग में हो रहा था।
संगम युग के लोग स्वप्नों और मानव-जीवन पर ग्रहों के प्रभाव में भी विश्वास करते थे। कुछ लक्षण तो आमतौर पर अनिष्टकर माने जाते थे। कौओं का कांव-कांव किसी अतिथि के आगमन का सूचक था। कुरुंतोगाई के अनुसार कौआ एक शुभ अग्रदूत था और उसे चावल एवं घी खिलाया जाता था।
मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा संगम कालीन सभ्यता का परिष्कृत पक्ष था। अनेक संगम ग्रंथों में शिव, मुरुगन, बलदेव, विष्णु, कामन और चन्द्रदेव के मंदिरों की चर्चा हुई है। मनिमेकलाई एक विशाल ईंट चक्रवाह कोट्टम का उल्लेख करता है। अनेक वृक्षों के नीचे देवताओं के चबूतरे बनाए जाते थे। पूजन-विधि में नृत्य, पुष्पार्पण, तंडुल आदि सम्मिलित थे। सिल्प्पादिकरम में देवताओं की प्रस्तर-प्रतिमाओं का उल्लेख है। यह ईसा पूर्व तीसरी सदी के लिंगम के रूप में टी. ए. गोपीनाथ राव द्वारा की गई पुरातात्तिवक खोज से भी प्रमाणित होता है।
संगम युग के तमिल जन्म और मृत्यु के अवसरों पर आनुष्ठानिक अस्वच्छता में भी विश्वास करते थे। मृतकों को दफनाया अथवा जलाया जाता था अथवा खुले में गृद्धों या शृगालों के भोजन के लिए छोड़ दिया जाता था। मनिमेकलाई में शमशानों का उल्लेख हुआ है जहाँ अनेक प्रकार के भूत-प्रेत रहते थे।
संगम साहित्य से तात्पर्य पांड्य-शासकों द्वारा संरक्षित विद्वत्-परिषद् के साहित्यकारों द्वारा तीन अलग-अलग सम्मेलनों में तमिल भाषा में रचे गए साहित्य से है। इतिहासविद् संगम साहित्य की तुलना ग्रीस और रोम के गौरव-ग्रंथों तथा यूरोपीय पुनर्जागरण काल के साहित्य से करते हैं।
कुछ विद्वान संगम युग को तमिलों का स्वर्ण-युग मानते हैं। निश्चय ही तमिलों के इतिहास में संगम युग अनूठा है। दक्षिण भारत के अनेक स्थलों से प्राप्त पुरातात्त्विक स्रोत संगम युग के लोगों के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों पर प्रकाश डालते हैं किंतु इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी उस युग के बहुमूल्य संगम-साहित्य से प्राप्त होती है।
संगम साहित्य का रचनाकाल
संगम साहित्य के रचना-काल के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार संगम साहित्य ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर दूसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य तक लिखा गया। एम. अरोकिया स्वामी के अनुसार संगम साहित्य में सम्मिलित ग्रंथ ‘तोलक्कापियम’ के लेखक ‘तोल्कापिप्यर’ ईसा पूर्व चौथी अथवा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में हुए। अतः संगम साहित्य की रचना इसी काल में आरम्भ हुई होगी।
संगम साहित्य की रचना के आधार पर के. ए. एन. शास्त्री संगम युग की अवधि ई.100 से ई.250 तक मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार इस साहित्य का संकलन ई.300 से ई.600 के काल में हुआ किंतु यह निर्विवाद है कि इस साहित्य का अंतिम संकलन ई.600 अथवा उसके आसपास हुआ। इस साहित्य का सृजन एवं संग्रहण पांड्य शासकों द्वारा मदुरै में आयोजित तीन ‘सम्मेलनों’ के दौरान हुआ जिन्हें ‘संगम’ कहा जाता है।
संगम साहित्य की रचना
अलग-अलग पांड्य शासकों द्वारा अलग-अलग काल में बुलाए गए तीन साहित्य-सम्मेलनों में भाग लेने के लिए दक्षिण भारत के अनेक ख्यातिनाम लेखक, कवि एवं चारण दूर-दूर से मदुरै आए। इन सम्मेलनों को ‘संगम’ और इन सम्मेलनों में रचित साहित्य को ‘संगम साहित्य’ कहा गया। संगम साहित्य अनेक वीरों और वीरांगनाओं की प्रशंसा में रचित उच्चकोटि की अनेक छोटी-बड़ी कविताओं का संग्रह है। ये कविताएँ धर्मसम्बन्धी नहीं हैं।
साहित्य का विशाल भण्डार
संगम साहित्य अपने मूल रूप में साहित्य का विशाल भण्डार रहा होगा। जो संगम-साहित्य आज उपलब्ध है वह उसका एक हिस्सा भर ही है। संगम साहित्य निम्नलिखित संकलनों में उपलब्ध है- नरिनई, कुरुन्दोहई, ऐन्गुरुनुरु, पत्तुप्पत्त, पदिटुप्पतु, परिपाड़ल, कलित्तोहई, अहनानुरु और पुरनानुरू। संपूर्ण संगम साहित्य में 473 कवियों की 2,289 रचनाएं हैं। इन कवियों में से 102 अनाम कवि हैं तथा शेष तमिल के विख्यात साहित्यकार हैं।
संगम साहित्य में 30,000 पंक्तियों की कविताएं हैं। इन्हें आठ संग्रहों में संकलित किया गया, जिन्हें ‘एट्टूतोकोई’ कहा गया। इनके दो मुख्य समूह हैं- पाटिनेनकिल कनाकू (18 निचले संग्रह) और पत्त ूपत्तू (10 गीत)। पहले समूह को दूसरे से अधिक पुराना और अधिक ऐतिहासिक माना जाता है। संगम साहित्य का सबसे प्राचीनतम ग्रंथ ‘तोलक्कापियम’ है। यह तमिल-व्याकरण और काव्य का ग्रंथ है।
तीन संगमों की परंपरा
पांड्य शासकों द्वारा कुल तीन संगम आयोजित किए गए थे किंतु पहले दो संगमों के बारे में कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है और उनमें जिस साहित्य का सृजन हुआ उसका भी कुछ पता नहीं। तीसरे संगम के बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है। यह संगम पांड्यों की राजधानी मदुरा में हुआ। इस सम्मलेन में तमिल कवियों ने पर्याप्त संख्या में हिस्सा लिया होगा।
इरैयानार अहप्पोरुल के अनुसार ये संगम 9,990 वर्ष तक चलते रहे तथा इनमें 8,598 विद्वान सम्मिलित थे। अधिकांश विद्वान् संगमों की इस अवधि को सही नहीं मानते। उनके विचारानुसार इतनी लम्बी अवधि संभवतः संगम साहित्य को प्राचीनता की गरिमा और महत्ता प्रदान करने के लिए ही बताई गई होगी।
संत अगस्व्यार संगम परम्परा के प्रवर्तक थे। अहप्पोरुल की टीका से तीनों संगमों की अनुक्रमिक व्यवस्था और उनके अंतरालों के बीच के जल-प्लावनों की भी जानकारी मिलती है। ये संगम अथवा विद्वत्परिषदें 197 पांडय राजाओं द्वारा संरक्षित थीं। परंपरागत मतानुसार तीन अनुक्रमिक संगमों में प्रथम दो प्रागैतिहासिक काल के हैं। सभी तीनों संगम पांडयों की राजधानी में आयोजित किए गए।
चूंकि राजधानी समय-समय पर बदलती रहती थी अतः प्रथम संगम का मुख्यालय पुराना मदुरै था और दूसरा संगम कपाटपुरम् में आयोजित किया गया। अनुक्रमिक जल-प्लावनों में ये दोनों केन्द्र समुद्र द्वारा नष्ट कर दिए गए। तीसरा संगम आधुनिक मदुरै में आयोजित हुआ था। तृतीय संगम की तिथि अन्य संगमों की तिथियों की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक प्रतीत होती है। यह तिथि ईसा की प्रथम दो शताब्दी और संभवतः ईस्वी सन् के प्रारंभ के तत्काल पूर्व की सदी मानी जाती है।
तोल्कापिप्यर का काल द्वितीय संगम युग में माना जाता है। तीसरा संगम युग भारत-रोम के तत्कालीन शाही रोम के साथ व्यापार के काल से मेल खाता है। यह काल-निधार्रण उस समय के ग्रीक लेखकों के विवरण में उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित है। भूमध्य सागरीय प्रदेशों और तमिल क्षेत्र के बीच समुद्रपारीय व्यापारिक गतिविधियों के अनेक उल्लेख मिलते हैं। यह संगम साहित्य से भी प्रमाणित होता है।
संगमों की तुलना आधुनिक युग के यूरोप में फ्रेंच अकादमी से की जा सकती है जिसका लक्ष्य भाषा की शुद्धता और साहित्यिक स्तर को बनाए रखना था। आरंभ में संगम में नामांकन सहयोजन से होता था, किंतु आगे चलकर यह भगवान शिव, जो इस महान संस्था के स्थायी अध्यक्ष थे, की चमत्कारी युक्ति से होने लगा।
संगम साहित्य की भाषा
दक्षिण भारत की सर्वाधिक प्राचीन भाषा संभवतः तमिल थी। बाद में स्थानीय बोलियों के मिश्रण से तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भाषाएँ भी अस्तित्व में आईं। वैदिक संस्कृति से सम्पर्क के बाद दक्षिण की भाषाओं में संस्कृत भाषा के अनेक शब्द अपनाए गए और ई.पू. तीसरी शताब्दी में 44 वर्णों पर आधारित एक लिपि का विकास किया गया।
संगम साहित्य इसी लिपि में लिखा गया। पुरातत्वविदों को 75 से भी अधिक ब्राह्मी लिपि (जो बायीं ओर से दायीं ओर लिखी जाती है) में लिखे अभिलेख मदुरा और उसके आस-पास की गुफाओं में प्राप्त हुए हैं। इनमें तमिल के साथ-साथ प्राकृत भाषा के भी कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया है। सुदूर दक्षिण के जन जीवन पर पहले-पहल संगम साहित्य से ही स्पष्ट प्रकाश पड़ता है।
संगम साहित्य के प्रमुख महाकाव्य
संगम साहित्य में तिरूवल्लूवर जैसे तमिल संतों की कृति ‘कुराल’ उल्लेखनीय है जिसका बाद में अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। ‘कुराल’ को तीन भागों में बांटा गया है। पहला भाग महाकाव्य, दूसरा भाग राजनीति और शासन तथा तीसरा भाग प्रेम विषयक है। ‘शिलाप्पदीकारम’ तथा ‘मणिमेकलई’ नामक दो महाकाव्य भी हैं। जिनकी रचना लगभग छठी शताब्दी ईस्वी में की गई। पहला महाकाव्य तमिल साहित्य का सर्वाेत्तम रत्न माना जाता है। यह एक प्रेमगाथा पर आधारित है।
दूसरा महाकाव्य मदुरै के अनाज व्यापारी ने लिखा। दोनों महाकाव्यों में दूसरी से छठी शताबदी ईस्वी तक के तमिल समाज का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वर्णन हुआ है। ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगो के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य ही एकमात्र प्रमुख स्रोत है। इस साहित्य में व्यापार और वाणिज्य के बारे में प्राप्त तथ्यों की पुष्टि उसकी विदेशी विवरणों तथा पुरातात्विक प्रमाणों से भी होती है।
संगम साहित्य-निकाय
आधुनिक विद्वान ‘संगम साहित्य पद का प्रयोग केवल उन्हीं रचनाओं के लिए करते हैं जो छंदबद्ध हैं, गद्य का जन्म बहुत बाद में हुआ। ‘एत्तुतोगाई’ (अष्टसंग्रह), ‘पत्तुपात्रु’ (दस गीत) और ‘पतिने किल्कनक्कु’ (अष्टादश लघु कृतियाँ), आदि काव्य इसी क्रम में ई.150-250 की अवधि में रचे गए हैं। पंचमहाकाव्य- जीवकचिंतामणि, सिलप्पादिकरम, मनिमे कलाई, वलयपाथी और कुंडल केशी बहुत बाद में रचे गए।
इनमें से अंतिम दो महाकाव्य अब उपलब्ध नहीं हैं। शेष तीन महाकाव्यों में सिलप्पादि करम तथा मनिमे कलाई जुड़वाँ महाकाव्य कहे जाते हैं, क्योंकि वे एकल परिवार- कोवलान (पुहार का धनी सौदागर), कन्नगी (कोवलान की साध्वी पत्नी), माधवी (नर्तकी) जिसके साथ कोवलान विवाहित बनकर रहता था, और इस विवाह से उत्पन्न संतान, मनिमेकलाई की कहानी को ही आगे बढ़ाते हैं।
सिलप्पदिकरम का लेखक ईलांगो आदिगल था जिसे महाकाव्य में तत्कालीन चेर राजा सेंगुत्तुवन का भाई कहा गया है। मनिमेकलाई की रचना सथनार ने मुख्य रूप से तमिलों के बीच बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए की थी। ये काव्य-रचनाएँ तमिलों की सामाजिक, आर्थिक और आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन करती हैं और इनके प्रतिपाद्य विषय के केंद्र मदुरै, पुहार (पूंपुहारकावेरी), पटिटनम, वंजि (करुर) और कांची आदि नगर हैं।
उपर्युक्त तीन समूहों के काव्य ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों के भीतर लिखे माने जा सकते हैं किन्तु वर्तमान समय में वे जिस क्रम में संगृहीत और व्यवस्थित हैं वह बहुत बाद का प्रतीत होता है। काव्य की लंबाई उसे बड़े वर्गों में विभाजित करने का मुख्य आधार थी। ‘अष्टसंग्रह’ की कविताएँ तीन से तैंतीस पंक्तियों की हैं, जबकि ‘दशगीत’ की सबसे छोटी कविता 103 पंक्तियों तथा सबसे लंबी कविता 782 पंक्तियों की है। अधिकांश कविताओं के अंत में टिप्पणी भी दी गई है जिनमें कवियों के नाम और उस कविता-रचना की परिस्थितियों का भी उल्लेख है।
‘अष्टादश लघुकृतियों’ में नैतिक और उपदेशात्मक साहित्य है। संगम साहित्य के उपदेशात्मक साहित्य में विश्व-प्रसिद्ध ‘तिरुक्कुरल’ का छंदबद्ध साहित्य भी सम्मिलित है जिसके प्रत्येक छंद में दो से तीन पंक्तियाँ हैं।
वर्तमान में संगम साहित्य में 3 पंक्तियों से लेकर 800 पंक्तियों तक की विभिन्न लंबाई वाले काव्य हैं। इनमें से कुछ रचनाएँ एक ही कवि की मानी गई हैं, जबकि नालादियार जैसी कुछ अन्य रचनाएँ अनेक कवियों द्वारा लिखित मानी जाती हैं। वर्तमान में उपलब्ध संगम काव्य 30,000 से अधिक पंक्तियों में है। ये कुल 473 कवियों द्वारा लिखी गई हैं जिनमें लगभग 50 महिला कवि भी हैं। 102 कविताएँ अज्ञात कवियों की हैं।
इन रचनाओं से प्रकट होता है कि उस समय की संस्कृति बहुत उन्नत थी तथा संगम युग आते-आते तमिल भाषा अत्यंत प्रौढ़ हो चुकी थी। संगम साहित्य की भाषा अवश्य ही अत्यंत प्राचीन है किंतु आधुनिक तमिल भाषियों को उसे समझने में अधिक कठिनाई नहीं होती। विद्वानों ने संगम काव्य को विषय-वस्तु के आधार पर अनेक श्रेणियों में बांटा है किंतु आकार के आधार पर उन्हें दो श्रेणियों में विभक्त किया जाता है- (1.) लघु संबोध-गीति और (2.) लंबी कविताएँ।
इतिहासकारों के लिए छोटी कविताएँ, लंबे गीतिकाव्य से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
संबोध-गीति वचनिकाओं में संगृहीत हैं। ये वचनिकाएँ हैं- अहनानुरु, पुरानानुरु, कुरुंतोगाई, नार्रिनाई, कालितोगाई, परिपादाल, ऐंगुरुनुरु और पतिरुर्पत्तु। इनका संकलन ‘एत्तुतोगाई’ कहलाता है। दस लंबे गीति-काव्य अथवा विवरणात्मक काव्य, जिसे ‘पत्तु पत्तु’ कहते हैं, नौवां समूह माना जाता है। इस संकलन में निम्नलिखित काव्य शामिल हैं-
रुमुरुगारुर्प्पादाई, सिरुपानारुर्प्पादाई, पोरुनारुर्पादाई, पेरुंबनारुर्पादाई, नेदुनालवादाई, कुरिंजिप्पात्रु, मदुराईक्कांजी, पत्तिनाप्पालाई, मुमुल्लाइप्पत्तु और मलाईपादुकादम। इनमें तिरुमुरुगारुर्पादाई भगवान मुरुगन पर भक्ति-काव्य है। सिरु पनारुर्प्पादाई नलिलयाक्कोडन की उदार प्रकृति का वर्णन करता है जिसने चोल राज्य के एक हिस्से पर शासन किया। पेरुं बाना रुज्पदाई तोंदा ईमान इलांतिरैयान और उसकी राजधानी कांचीपुरम का वर्णन करता है।
पोरुनारुर्प्पादाई और पत्तिनाप्पालाई महान चोल राजा कारिकाल का स्तुतिगान करता है। नेदुनालवादाई और मदुराई कांजी के महान पांड्य राजा लालैया लांग नत्रु नेडुन जेलियान का वर्णन करता है। कुरिजिप्पत्रु पहाड़ी और पर्वतीय जीवन का चित्रण करता है, और मलाई पादुकादम नायक नान्नान के साथ-साथ युद्ध में राजा की विजय का उत्सव मनाने और सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए गीत-संगीत की रचना करता है। ये सारी कृतियाँ संगम युग में कवियों की महत्ता को भी दर्शाती हैं।
संगम साहित्य का महत्त्व
संगम साहित्य प्राचीन तमिल समाज की सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक जानकारियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। संगम साहित्य ने अपनी पश्चवर्ती साहित्यिक परम्पराओं को अत्यंत प्रभावित किया। दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास के लेखन के लिये संगम साहित्य की उपयोगिता अंदिग्ध है। इस साहित्य में उस समय के चोल, चेर और पाण्ड्य नामक तीन राजवंशों का उल्लेख हुआ है।
संगम साहित्य ही एकमात्र ऐसा साहित्यिक स्रोत है जो सुदूर दक्षिण के जनजीवन पर सर्वप्रथम विस्तृत और स्पष्ट प्रकाश डालता है। संगम साहित्य से दक्षिण भारत के राजनीतिक इतिहास की तिथियां नहीं मिलतीं किंतु संगम साहित्य वहाँ के सामजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन के सम्बन्ध में प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करता है। इसी साहित्य से पता चलता है कि दक्षिण के तीन प्रमुख राज्य- पांड्य, चोल और चेर परस्पर संघर्षरत रहे। संगम साहित्य से दक्षिण और उत्तर भारत की संस्कृतियों के सफल समन्वय का स्पष्ट चित्र प्राप्त होता है।
यह साहित्य बताता है कि दक्षिण के तीनों राज्यों ने प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाते हुए किस प्रकार विदेशी व्यापार का प्रसार किया। उनके व्यापारिक सम्बन्ध कैसे थे, इस बारे में भी हमें यथेष्ट जानकारी देता है। संगम कविताएँ तमिल भाषा की पहली सशक्त रचनाएँ मानी जाती हैं। इन कविताओं में संस्कृत भाषा के अनेक शब्दों के तमिल भाषा में आत्मसात करने के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं।
यह साहित्य इस बात का ज्वलंत प्रमाण देता है कि दक्षिण की द्रविड़ और उत्तर की आर्य संस्कृति ने परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान किया और देश की एक समन्वित संस्कृति प्रदान की जिसे सामान्यतः हिन्दू संस्कृति भी कहा जाता है।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...