Saturday, May 25, 2024
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अध्याय – 18 – शैव एवं शाक्त धर्म (ब)

नाथ परम्परा

नाथ साधु, विश्व भर में भ्रमण करते हैं तथा आयु के अंतिम चरण में किसी स्थान पर रुक कर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय क्षेत्र में चले जाते हैं। हाथ में चिमटा तथा कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध तथा मस्तक पर जटाएं धारण करने वाले एवं धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को अवधूत एवं सिद्ध कहा जाता है। कुछ योगी अपने गले में एक सींग की नादी तथा काली ऊन का जनेऊ रखते हैं जिन्हें सींगी तथा सेली कहते हैं।

नाथ पंथ के साधक सात्विक भाव से शिव भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग ‘अलख’ (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर ‘आदेश’ या ‘आदीश’ शब्द से अभिवादन करते हैं। ‘अलख’ और ‘आदेश’ शब्द का अर्थ ‘प्रणव’ या ‘परम पुरुष’ होता है। नाथ सम्प्रदाय में नागा (दिगम्बर) तथा भभूतिधारी साधु भी होते हैं। इन्हें उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का माना जाता है। नाथ साधु ‘हठयोग’ पर विशेष बल देते हैं।

भगवान दत्तात्रेय

भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, उनकी गणना प्रमुख अघोरी के रूप में तथा प्रमुख नाथ के रूप में भी होती है जबकि वैष्णव मतावलम्बी उन्हें भगवान शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा का सम्मिलित अवतार मानकर पूजते हैं। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। उन्होंने वैष्णव और शैव परंपरा में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। दत्तात्रेय को महाराष्ट्र में नाथ परंपरा का विकास करने का श्रेय जाता है। दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है।

मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरखनाथ

प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मत्स्येन्द्र नाथ (मच्छेन्द्र नाथ) और उनके शिष्य गोरखनाथ ने नवीन व्यवस्थाएं प्रदान कीं। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव को समाप्त किया तथा योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया।

चौरासी सिद्ध

आठवीं सदी में बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय की वज्रयान शाखा में सिद्ध परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ। प्रमुख सिद्धों की संख्या चौरासी मानी गई है। चौरासी सिद्धों को बंगाल, नेपाल, असम, तिब्बत और बर्मा में विशेष रूप से पूजा जाता है।

प्रारम्भिक नाथ

चौरासी सिद्धों की परम्परा में नाथ पंथ का उदय हुआ। प्रारम्भिक दस नाथ इस प्रकार से हैं- आदि नाथ, आनंदी नाथ, कराला नाथ, विकराला नाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूत नाथ, वीर नाथ और श्रीकांथ नाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्य नाथ, चर्पट नाथ, अवध नाथ, वैराग्य नाथ, कांताधारी नाथ, जालंधर नाथ और मलयार्जुन नाथ।

नव नाथ

नाथ पंथ में नौ नाथ बड़े प्रसिद्ध हुए। इन्हें नवनाथ भी कहा जाता है। महार्णव तंत्र में कहा गया है कि नवनाथ ही नाथ संप्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं। नवनाथों की सूची अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलती है- (1.) मच्छेंद्रनाथ (2.) गोरखनाथ (3.) जालंधरनाथ (4.) नागेश नाथ (5.) भारती नाथ (6.) चर्पटी नाथ (7.) कनीफ नाथ (8.) गेहनी नाथ (9.) रेवन नाथ।

इनके अतिरिक्त मीना नाथ, खपर नाथ, सत नाथ, बालक नाथ, गोलक नाथ, बिरुपक्ष नाथ, भर्तृहरि नाथ, अईनाथ, खेरची नाथ तथा रामचंद्र नाथ भी प्रमुख नाथ हुए। अन्य उल्लेखनीय नाथों में ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ बाबा शिलनाथ, दादा धूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और र्साईं नाथ आदि के नाम लिए जाते हैं।

नाथ सम्प्रदाय की प्रमुख शाखाएं

नाथ सम्प्रदाय की अनेक शाखाएं हैं जिनमें से 12 शाखाएं प्रमुख मानी जाती हैं- (1.) भुज के कंठरनाथ, (2.) पागलनाथ, (3.) रावल, (4.) पंख या पंक, (5.) वन, (6.) गोपाल या राम, (7.) चांदनाथ कपिलानी, (8.) हेठनाथ, (9.) आई पंथ, (10). वेराग पंथ, (11.) जैपुर के पावनाथ और (12.) घजनाथ।

दक्षिण भारत में शैवधर्म

दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल राजाओं के शासन काल में लोकप्रिय रहा। पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार नायनार संतों ने किया। नायनार संतों की संख्या 63 बताई गई है जिनमें उप्पार, तिरूज्ञान, संबंदर और सुंदर मूर्ति के नाम उल्लेखनीय हैं। ऐलोरा के कैलाश मदिंर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया। चोल शालक राजराज (प्रथम) ने तंजौर में राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया।

तमिल शैव

तमिल देश में छठी से नवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य, प्रमुख शैव भक्तों का जन्म हुआ जो अपने काल के प्रसिद्ध कवि भी थे। सन्त तिरुमूलर शिवभक्त होने के साथ-साथ, प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ ‘तिरुमन्त्रम्’ के रचयिता थे। इस प्रकार तमिल शैव मत, दक्षिण भारतीय अनेकान्त यथार्थवादी समूह था। इसके अनुसार विश्व वास्तविक है तथा आत्माएं अनेक हैं।  तमिल शैव आंदोलन, आदि शैव संतों की काव्य रचनाओं तथा नयनारों की उत्तम भक्ति पूर्ण कविताओं के मिश्रण से विकसित हुआ।

इस पंथ के मान्य ग्रंथों के चार वर्गों में 2 वेद, 28 आगम, 12 तिमुरई तथा 14 शैव सिद्धान्त शास्त्र सम्मिलित हैं। यद्यपि शैव धर्म में वेदों का स्थान उच्च है तथापि ‘एक्यं शिव’ द्वारा अपने भक्तों के लिए वर्णित गोपनीय आगमों को अधिक महत्त्व दिया गया है। 13वीं तथा 14वीं सदी के आरम्भ में तमिल शैव मत में 6 आचार्य हुए जिनमें से अधिकांश अब्राह्मण तथा निम्न जाति में उत्पन्न हुए थे।

इन आचार्यों द्वारा तमिल शैव सिद्धान्त शास्त्र रचे गए। तमिल शैव ग्रंथों तथा कविताओं में तीन महान शैव आचार्यों- अप्पर तिरुज्ञान, सम्बन्ध एवं सुन्दरमूर्ति की रचनाएँ शामिल हैं। अघोर शिवाचार्य जी को इस मत का प्रमुख संस्थापक माना जाता है।

आंध्र के कालमुख शैव

आन्ध्र प्रदेश में काकतीयों की प्राचीन राजधानी वारांगल के दक्षिण-पूर्व में स्थित वारंगल दुर्ग कभी दो दीवारों से घिरा हुआ था जिनमें से भीतरी दीवार के पत्थर के द्वार (संचार) और बाहरी दीवार के अवशेष आज भी मौजूद हैं। ई.1162 में निर्मित 1000 स्तम्भों वाला शिव मन्दिर नगर के भीतर ही स्थित है। इस काल में कालमुख या अरध्य शैव के कवियों ने तेलुगु भाषा की अभूतपूर्व उन्नति की।

वारंगल के संस्कृत कवियों में सर्वशास्त्र विशारद के लेखक वीर-भल्लात-देशिक और नल-कीर्ति-कौमुदी के रचयिता अगस्त्य के नाम उल्लेखनीय हैं। मान्यता है कि अलंकार शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रताप-रुद्र-भूषण के लेखक विद्यानाथ यही अगस्त्य थे। गणपति का हस्ति सेनापति जयप, नृत्य-रत्नावली का रचयिता था। संस्कृत कवि शाकल्य मल्ल भी इसी का समकालीन था।

तेलुगु कवियों में रंगनाथ रामायणुम का लेखक पलकुरिकी सोमनाथ मुख्य है। इसी समय भास्कर रामायणुम भी लिखी गई। आज के प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में बालाजी अथवा वेंकटेश्वर की जो प्रतिमा है, वह मूलतः वीरभद्र स्वामी की प्रतिमा है। मान्यता है कि राजा कृष्ण देवराय के काल में रामानुज आचार्य ने इस मंदिर का वैष्णवीकरण किया और वीरभद्र की प्रतिमा को बालाजी नाम दिया। तब से यह प्रतिमा विष्णु विग्रह के रूप में पूजी जाती है।

काश्मीरी शैव सम्प्रदाय

वसुगुप्त को काश्मीर शैव दर्शन की परम्परा का प्रणेता माना जाता है। उसने 9वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में काश्मीरी शैव सम्प्रदाय का गठन किया। वसुगुप्त के कल्लट और सोमानन्द नामक दो प्रसिद्ध शिष्य थे। इनका दार्शनिक मत ‘ईश्वराद्वयवाद’ था। सोमानन्द ने ‘प्रत्यभिज्ञा मत’ का प्रतिपादन किया। प्रतिभिज्ञा शब्द का तात्पर्य है कि साधक अपनी पूर्वज्ञात वस्तु को पुनः जान ले।

इस अवस्था में साधक को अनिवर्चनीय आनन्दानुभूति होती है। वे अद्वैतभाव में द्वैतभाव और निर्गुण में भी सगुण की कल्पना कर लेते थे। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए कोरे ज्ञान और निरी भक्ति को असमर्थ बतलाया। दोनों के समन्वय से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।

यद्यपि शुद्ध भक्ति, बिना द्वैतभाव के संभव नहीं है और द्वैतभाव अज्ञान मूलक है किन्तु ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब द्वैत मूलक भाव की कल्पना कर ली जाती है तब उससे किसी प्रकार की हानि की संभावना नहीं रहती। इस प्रकार इस सम्प्रदाय में कतिपय ऐसे भी साधक थे जो योग-क्रिया द्वारा रहस्य का वास्तविक पता पाना चाहते थे, उनकी धारणा थी कि योग-क्रिया से हम माया के आवरण को समाप्त कर सकते हैं और इस दशा में ही मोक्ष की सिद्धि सम्भव है।

अघोरी सम्प्रदाय

अघोर शब्द दो शब्दों- ‘अ’ और ‘घोर’ से मिल कर बना है जिसका अर्थ है- ‘जो घोर न हो’ अर्थात् सहज और सरल हो। चूंकि इनके लिए सब-कुछ सहज और सरल है तथा घोर तथा अशुभ कुछ भी नहीं है, इसलिए ये शमशान में शवों को खाने से लेकर कै तथा विष्ठा खाने तक को भी सहज, सरल, शुभ तथा अघोर कर्म समझते हैं। इसलिए ये अघोरी कहलाते हैं।

अघोर पंथ के उत्पत्ति काल के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता किंतु इन्हें कपालिक संप्रदाय के समकक्ष प्राचीन माना जाता है। यह सम्प्रदाय, शैव धर्म की स्वतंत्र शाखा के रूप में विकसित हुआ। अघोरी साधु, समाज से निर्लिप्त रहते हैं तथा अपने विचित्र व्यवहार, एकांत-प्रियता और रहस्यमय क्रियाओं के लिए जाने जाते हैं।

अघोर पन्थ की भी कई शाखाएं हैं किंतु मोटे तौर पर इन्हें दो वर्गों  में रखा जा सकता है, शैवमार्गी तथा वाममार्गी। शैवमार्गी अघोरी मानव मल का भक्षण नहीं करते जबकि वाममार्गी अघोरी मानव मल का भक्षण करते हैं। इन्हें काक अघोरी भी कहा जाता है।

अवधूत भगवान दत्तात्रेय को अघोर शास्त्र का गुरु माना जाता है। अघोर संप्रदाय की मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश ने स्थूल रूप में दत्तात्रेय अवतार लिया। अघोर संप्रदाय के साधु भगवान शिव के भक्त होते हैं। इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन सहित सृष्टि के समस्त रूपों में विद्यमान हैं। शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन आदि समस्त स्थितियों के वास्तविक स्वरूप को जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।

अघोर मत के अनुसार प्रत्येक मानव जन्म से अघोर अर्थात सहज होता है। बालक ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, वह अंतर करना सीख जाता है और उसमें असहजताएं तथा बुराइयां घर कर लेती हैं जिनके कारण वह अपनी मूल प्रकृति अर्थात् अघोर रूप को भूल जाता है। अघोर साधना के द्वारा मनुष्य पुनः अपने सहज और मूल रूप में आ सकता है। इस मूल रूप का ज्ञान होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।

अघोर संप्रदाय के साधक प्रत्येक वस्तु के प्रति समदृष्टि विकसित के लिए नरमुंडों की माला पहनते हैं और नरमुंडों को पात्र के तौर पर प्रयुक्त करते हैं। वे चिता की भस्म का शरीर पर लेपन करते हैं और चिता की अग्नि पर भोजन तैयार करते हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं। इसलिए अघोर साधनाएं मुख्यतः श्मशान घाटों और निर्जन स्थानों पर की जाती हैं। शव साधना अघोर पंथ की एक विशेष क्रिया है जिसके द्वारा स्वयं के अस्तित्व को जीवन के विभिन्न चरणों में अनुभव किया जाता है।

वाराणसी या काशी को भारत के सर्व-प्रमुख अघोर स्थल के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव की नगरी होने से काशी में शैव अघोरियों का वास बड़ी संख्या में रहता है। काशी में स्थित बाबा कीनाराम का स्थल, अघोरियों का महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र का गिरनार पर्वत भी अघोरियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय की तपस्या स्थली के रूप में मान्यता है।

भारत में सर्वाधिक अघोरी असम के कामाख्या मंदिर में रहते हैं। मान्यता है कि जब माता सती भस्म हुई थीं तो उनकी योनि इसी स्थान पर गिरी थी। पश्चिमी बंगाल के तारापीठ, नासिक के अर्ध ज्योतिर्लिंग और उज्जैन के महाकाल के निकट भी अघोरी देखे जाते हैं। मान्यता है कि इन स्थानों पर अघोरियों को सिद्धियां शीघ्रता से प्राप्त होती हैं।

अघोर संप्रदाय के साधक मृतक के मांस के भक्षण के लिए भी जाने जाते हैं। मृतक का मांस जन साधारण में अस्पृश्य होता है किंतु अघोर इसे प्राकृतिक पदार्थ के रूप में देखते हैं और इसे उदरस्थ कर प्राकृतिक चक्र को संतुलित करते हैं। मृतक के मांस भक्षण के पीछे उनकी समदर्शी दृष्टि विकसित करने का सिद्धांत काम करता है।

कुछ प्रमाणों के अनुसार अघोर साधक मृत मांस से शुद्ध शाकाहारी मिठाइयां बनाने की क्षमता भी रखते हैं। लोक मानस में अघोर संप्रदाय के बारे में अनेक भ्रांतियाँ और रहस्य कथाएं प्रचलित हैं। अघोर विज्ञान में इन सब भ्रांतियों को निरस्त करके अघोर क्रियाओं और विश्वासों को विशुद्ध विज्ञान के रूप में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

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