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शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

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शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य मुगल शासन काल की स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। कुछ इतिहासकारों ने शाहजहाँ को निर्माताओं का शहजादा कहा है।

स्थापत्य कला का स्वर्णयुग

इतिहासकारों की दृष्टि में शाहजहाँ का शासन-काल स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। शाहजहाँ ने अनेक इमारतें बनवाईं। वह स्वयं स्थापत्य कला का ज्ञाता था। शाहजहाँ युगीन भवन कला अकबर एवं जहाँगीर के काल की भवन कला से आगे का विकास है।

इस समय तक भारत के सुदूर क्षेत्र भी मुगलों के अधीन आ चुके थे और उन क्षेत्रों की स्थापत्य कला भी मुगलों द्वारा अपने भवनों में शामिल की गई। शाहजहाँ ने इतनी अधिक इमारतें बनवाईं कि उसे ‘निर्माताओं का शहजादा’ कहा जाता है।

अकबर ने अपने समय के सबसे सुंदर महल बनाए थे। जहाँगीर के काल में मुगल स्थापत्य में ‘यूरोपीय मोटिफ’ शामिल किए गए। शाहजहाँ कालीन स्थापत्य में तकनीकी रूप से आमूलचूल परिवर्तन हो गया तथा निर्माण कला के साधनों और सिद्धान्तों में अनेक परिवर्तन हुए। उसके काल में पत्थर काटने में निपुण कारीगरों का स्थान संगमरमर काटने और पॉलिश करने में निपुण कारीगरों ने ले लिया।

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य में आयताकार भवनों का स्थान चौकोर लहरदार सजावटपूर्ण महलों ने ले लिया। सबसे अधिक मौलिक परिवर्तन मेहराब की बनावट में हुआ। इनमें सजावट, पच्चीकारी और नजाकतपूर्ण सौन्दर्य आ गया। आगरा, लाहौर, दिल्ली आदि नगरों में पुराने महलों का नव-निर्माण हुआ और नवीन भवन बने।

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों की राय है कि इन कृतियों के कलाकार विदेशी थे और शाहजहाँ ने अकबर कालीन हिन्दू प्रभाव वाली स्थापत्य शैली को त्यागकर पुनः शुद्ध ईरानी शैली को अपनाने का प्रयास किया था।

कतिपय अन्य विद्वान शाहजहाँ कालीन स्थापत्य को भारतीय शैली से ही उत्पन्न बताते हैं। डॉ. बनारसी प्रसाद के अनुसार यह शैली दो संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम थी। वस्तुतः इस काल में भी बहुत से प्राचीन हिन्दू भवनों को मुगल स्थापत्य में ढाला गया।

इस काल में नक्काशी युक्त या पर्णिल मेहराब (फोलिएटेड आर्च) बनने लगे। गुम्बद ने भी फारसी आकार ले लिया। भवनों के आकार, शैली और सजावट की दृष्टि से इस काल में बने भवन सम्पूर्ण मुगल काल में बने भवनों से अधिक महत्वपूर्ण थे। शाहजहाँ के काल में बने भवनों की कुछ विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

(1.) इस काल में मेहराब ने नया आकार ग्रहण कर लिया जिसमें घुमावदार फूल-पत्ती का प्रयोग और संगमरमर का तोरण-पथ (छतयुक्त मेहराबों की शृंखला) प्रमुख था। इस काल में नक्काशीयुक्त एवं दांतेदार मेहराब भी बने।

(2.) शाहजहाँ के काल में बने भवनों में अलंकरण की प्रचुरता है। इनमें मूल्यवान् रत्नों और पत्थरों का प्रचुर उपयोग हुआ है।

(3.) गुम्बद कंदीय आकृति (बल्ब शेप) में बनने लगे और दोहरे गुम्बद का प्रचलन आम हो गया। इस काल के गुम्बद ऊँचे उठे हुए हैं।

(3.) अलंकरण और पच्चीकारी के लिए रंगीन टाइलों का प्रयोग तथा पच्चीकारी के रूप में पैट्रा ड्यूरा तकनीक का प्रचुर रूप से प्रयोग हुआ।

(4.) भवनों के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर की जगह सफेद संगमरमर को प्रमुखता दी गई। हालांकि लाल बलुआ पत्थर का उपयोग भी जारी रहा।

(5.) इस काल के भवनों में बंगला शैली के कंगूरे भी देखे जाते हैं।

(6.) शाहजहाँ कालीन भवनों में कुछ बड़े परिवर्तन भी दिखाई देते हैं। इस काल में आयताकार महलों के स्थान पर वृत्ताकार महल भी बने।

(7.) आगरा की मोती मस्जिद तथा दिल्ली की जामा मस्जिद में शाहजहाँ ने स्थापत्य सम्बन्धी कुछ ऐसे प्रयोग किए जिनसे मस्जिद में आने वाले नमाजियों को प्रसन्नता का अनुभव हो। इन मस्जिदों के विभिन्न निर्माणों में संतुलन स्थापित किया गया तथा उन्हें विस्तृत आकार में बनाया गया।

शाहजहाँ कालीन आगरा के भवन

शाहजहाँ ने आगरा के दुर्ग में पहले से ही बने हुए बलुआ पत्थर के बहुत से भवनों को संगमरमर से सजाया। इस दुर्ग में शाहजहाँ की बनवाई इमारतों में दीवाने-आम, दीवाने-खास, मुसम्मन-बुर्ज, शीश महल, खास महल, नगीना मस्जिद तथा मोती मस्जिद मुख्य हैं। खास महल और आठकोर मीनार के मध्य में झरोखा दर्शन है।

यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है। इसकी छतें चमकदार हैं। यहाँ से शाहजहाँ जनता को दर्शन देता था। शाहजहाँ ने इन भवनों के साथ ताजमहल की तरफ उन्मुख आलिन्द (छज्जे) वाला एक बड़ा अष्टभुजाकार बुर्ज़ बनवाया था जिसे मुसम्मन बुर्ज तथा शाह बुर्ज कहते थे।

यह सफेद संगमरमर से निर्मित चार मंजिला भवन है। इसकी चौथी मंजिल में सुन्दर नक्काशी है। इसके बीच में एक हौज बना हुआ है जिसका रूप गुलाब के फूल जैसा है। उसके सामने एक झरना भी बना हुआ है।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा ने ई.1648 में आगरा के किले के उत्तर-पश्चिम में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। इसकी मेहराबें सामने की ओर चौड़ा स्थान छोड़कर बनाई गई हैं जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। मस्जिद की छत के प्रत्येक कोने पर एक-एक अष्टकोणीय गुम्बददार छतरी है। इसके ऊपरी भाग पर तीन बड़े गुम्बद तथा चार सुंदर मीनारें स्थित हैं।

वी. पी. सक्सेना ने लिखा है- ‘यह साहसी विधवा की एक सुंदर कृति है।’ आगरा स्थित चीनी का रौजा में शाहजहाँ के मंत्री अल्लामा अफज़ल खान मुल्ला की कब्र है। मकबरे का मुख्य द्वार मक्का की ओर रखा गया है। इस मकबरे के बाहरी भाग पर चमकदार टायल्स लगाई गई हैं जिन्हें ‘कशीकारी’ एवं ‘चीनी कला’ भी कहा जाता है।

इसके गुम्बद मुगल शैली के अन्य गुम्बदों की तरह आनुपातिक नहीं हैं। नीची गुम्बदों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह ईरानी शैली का मकबरा है। गुंबद की भीतरी छत पर तस्वीरों और इस्लामिक लिखावट के चिह्न देखे जा सकते हैं। गुंबद के ऊपर कुरान की कुछ आयतें खुदी हुई हैं।

शाहजहाँ कालीन दिल्ली के भवन

ई.1638 में शाहजहाँ ने यमुना नदी के दाएं तट पर एक सुनिश्चित योजना के अनुसार शाहजहाँनाबाद बसाना आरम्भ किया। इसके मुख्य दरवाजों से दो बड़े आम रास्ते निकलते थे जो नगर की दीवारों में बने दरवाजों तक जाते हैं और इस प्रकार जो कोण बनता है उसी में जामा मस्जिद बनाई गई है। शाहजहाँनाबाद उत्तर से दक्षिण की ओर समानांतर चतुर्भुज के आकार का बना हुआ है।

आगरा के किले की तरह यह भी एक परकोट से घिरा हुआ है। शाहजहाँ ने ई.1638 में लाल किले का निर्माण आरम्भ करवाया। यह ई.1647 में बनकर तैयार हुआ। दिल्ली के लाल किले को प्रारम्भ में किला-ए-मुल्ला कहा जाता था। यह आगरा के लाल किले की तुलना में बहुत छोटा है। किले की दीवारें ऊँची तथा कँगूरेदार हैं। इसकी पश्चिमी दीवार में मुख्य दरवाजा बनाया गया।

दिल्ली के दुर्ग के भीतर की इमारतों की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘दिल्ली दुर्ग के भीतर की इमारतें अत्यधिक अलंकृत थीं और चीन की कला के लिए स्पर्धा की चीज बन गई थीं।’

दिल्ली के लाल किले के मध्य विशाल दीवाने आम बना हुआ है। इसका आकार चतुर्भुजी है। इसके बाहरी भाग में 9 मेहराबें दोहरे खम्बों पर आधारित हैं। तीनों ओर का मार्ग स्तम्भों पर आधारित दाँतेदार डाटों से बना हुआ है। इन स्तम्भों की कुल संख्या 40 है। इस भवन में पीछे की दीवार में एक मेहराबदार ताख है। इस ताख में शाहजहाँ का प्रसिद्ध तख्ते ताउस रखा रहता था। इस ताख की दीवार में अत्यन्त सुन्दर शिल्पकारी की गई थी तथा पत्थरों को खोदकर उनमें रत्नों की जड़ाई की गई थी।

लाल किले की इमारतों में दीवान-ए-खास सर्वाधिक अलंकृत भवन है। इसके बाहरी भाग में पाँच मेहराबदार रास्ते हैं। इसका फर्श सफेद संगमरमर का है। इनकी मेहराबें दाँतेदार हैं। छतें बहुत ही सुन्दर हैं। इन छतों में स्वर्ण तथा जवाहरातों की सजावट की गई है। इस छत को टिकाये रखने के लिये स्तम्भों का प्रयोग नहीं किया गया है।

यह छत 12 कोनों के सेतुबन्ध से सधी हुई है। प्रत्येक भाग में सुन्दर जड़ाई तथा रंग का काम हुआ है। दीवारों तथा मेहराबों पर फूलों की सुन्दर आकृतियाँ बनी हुई हैं। इसके मेहराब स्वर्ण तथा रंग से सजे हुए हैं और पंक्तियों से भरे हुए से लगते हैं।

रंगमहल तथा दीवाने खास में जड़ाई, नक्काशी, पच्चीकारी तथा सजावट का काम बहुत उत्तम है। इन दोनों की बनावट एक जैसी है। दिल्ली के लाल किले में स्थित रंगमहल एक महत्त्वपूर्ण इमारत है। यह शाहजहाँ का हरम था। इसके मध्य में एक बड़ा कक्ष है तथा चारों कोनों में छोटे-छोटे कक्ष बने हुए हैं। यह अलंकृत सेतबन्धों द्वारा 15 भागों में विभाजित है तथा रंग एवं चमक में अद्वितीय है।

शाहजहाँ की बनवाई हुई दिल्ली की इमारतों में जामा-मस्जिद सबसे विशाल है। इसका निर्माण ई.1650 में आरम्भ करवाया गया और ई.1656 में पूरा हुआ। यह भारत की सबसे विशाल मस्जिद है। यह लाल पत्थर से निर्मित शाही ढंग की इमारत है। इसके तीनों विशाल दरवाजों पर बुर्ज बने हुए हैं। पूर्व का द्वार शाही परिवार के उपयोग के लिये था। उत्तर और दक्षिण के द्वारों से जन-साधारण प्रवेश करता था।

मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिये विशाल स्थान उपलब्ध है। इसके सामने के सहन में वजू करने का कुण्ड है। नमाज स्थल के बीच के बाहरी दरवाजे के दोनों ओर पाँच-पाँच दाँतेदार मेहराबों के रास्ते हैं। इसके दोनों कोनों पर चार मंजिला लम्बी-लम्बी मीनारें हैं।

इसका मुख्य कक्ष बहुत सुंदर है। इसमें ग्यारह मेहराब हैं जिसमें बीच वाला मेहराब अन्य से कुछ बड़ा है। इसके ऊपर बने तीन विशाल गुंबदों को सफेद और काले संगमरमर से सजाया गया है जो निजामुद्दीन दरगाह की याद दिलाते हैं।

शाहजहाँ ने दिल्ली में चांदनी चौक का निर्माण करवाया। इसकी योजना शहजादी जहाँआरा ने तैयार की। इसमें मूल रूप से एक दूसरे को काटने वाली सीधी नहरें बनाई गई थीं जिनमें चंद्रमा की चांदनी झिलमिलाया करती थी। इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा।

शाहजहाँ कालीन अन्य इमारतें

शाहजहाँ ने आगरा, दिल्ली और लाहौर के अतिरिक्त काबुल, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद और काशमीर आदि नगरों में भी लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर की अनेक इमारतें बनवाईं। शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह ने कश्मीर में मौलवी अखूंद मस्जिद और परी महल बनवाए तथा आगरा एवं दिल्ली में पुस्तकालयों का निर्माण करके ईरान आदि देशों से महत्वपूर्ण पुस्तकें मंगवाकर उनके अनुवाद एवं प्रतिलिपियां तैयार करवाईं।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा में भी वास्तुकला सहित विभिन्न प्रकार की कलाओं के प्रति प्रेम था। शाहजहाँ के काल में मुगल शहजादों एवं शहजादियों ने जो भवन बनवाए, वैसे उत्कृष्ट भवन फिर कभी मुगलों द्वारा नहीं बनाए जा सके। सिंध प्रांत के थट्टा नगर में शाहजहाँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे शाहजहाँ मस्जिद कहा जाता है।

नूरजहाँ के बड़े भाई आसफ खाँ ने ई.1633 में श्रीनगर की डल झील के पूर्वी तट पर निशात बाग बनवाया। यह कश्मीर घाटी का सबसे बड़ा उद्यान है। इसे सीढ़ीदार शैली में बनाया गया है जिसे अंग्रेजी में ‘टैरेस गार्डन’ कहते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

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ताजमहल का स्थापत्य

मुख्य भवन के बाहर बने इवान, ऊपरी हिस्से में बने गुम्बद तथा इसके चारों ओर बनी मीनारों के आधार पर ताजमहल का स्थापत्य निश्चित रूप से एक मुगल स्थापत्य होने की गवाही देता है किंतु इस भवन का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य की विशेषताओं से युक्त है।

आगरा का ताजमहल, शाहजहाँ द्वारा बनवाई गई सर्वाधिक शानदार इमारत है। यह शाहजहाँ की प्रिय बेगम अर्जुमंद बानो का मकबरा है। इस भवन के निर्माण में बहुत बड़ी मात्रा में महंगे रत्न लगाए गए। इस मकबरे को मुगल स्थापत्य का अंतिम पड़ाव माना जा सकता है। यह श्वेत संगमरमर से निर्मित सुंदर भवन है जिसकी गणना विश्व के सुंदरतम भवनों में होती है। 

ताजमहल तीन ओर से एक चारदीवारी से घिरा हुआ है जो लाल बलुआ पत्थर से बनी है। इन दीवारों के भीतर, बागों से लगे हुए, स्तंभ सहित तोरण वाले गलियारे हैं। यह हिंदू मन्दिरों की शैली है। दीवार में बीच-बीच में गुम्बद वाली गुमटियाँ भी हैं। परिसर के चारों कोनों पर चार चौड़े-चौड़े मेहराबदार मण्डप हैं। चाहरदीवारी के भीतर एक वर्गाकार बाग है जिसके उत्तरी सिरे पर ऊँची कुर्सी पर सफेद संगमरमरी मकबरा स्थित है जिसे ताजमहल कहते हैं।

तीन ओर की चाहर-दीवारी में से एक दीवार में मुख्य दरवाज़ा बना हुआ है जिसका निर्माण भव्य स्मारक की तरह किया गया है। यह संगमरमर एवं लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इसका मेहराब ताजमहल के मेहराब की नकल है। इसके पिश्ताक एवं मेहराबों पर सुलेखन से अलंकरण किया गया है।

ताजमहल का स्थापत्य बास रिलीफए पैट्रा ड्यूरा की पच्चीकारी एवं पुष्प आदि आकृतियों से सजाया गया है। मेहराबी छत एवं दीवारों पर यहाँ की अन्य इमारतों के समान ज्यामितीय अंकन किए गए हैं। मकबरे के मुख्य भवन के बाहर संगममर से निर्मित एक भव्य ‘ईवान’ अर्थात् ‘विशाल मेहराब रूपी द्वार’ है।

मुख्य मकबरे के भवन के ऊपरी भाग में एक प्याजनुमा दोहरा गुम्बद (बल्बस डबल डोम) बना हुआ है। यह उच्च कोटि के सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इस इमारत का सर्वाधिक शानदार भाग है। इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर अर्थात् 35 मीटर है और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है। गुम्बद का शिखर एक उलटे रखे हुए कमल से अलंकृत है।

यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर जोड़ता है। मुख्य गुम्बद के शिखर पर एक कलश रखा हुआ है। यह शिखर-कलश सत्रहवीं एवं अठराहवीं सदी तक सोने का बना हुआ था। उन्नीसवीं सदी में स्वर्णकलश के स्थान पर कांसे का कलश रख दिया गया। यह शिखर-कलश हिन्दू वास्तुकला का अंग है तथा हिन्दू मन्दिरों के शिखरों पर अनिवार्यतः पाया जाता है। इस कलश पर द्वितीया का चंद्रमा बना हुआ है, जिसकी नोक स्वर्ग की ओर संकेत करती है।

गुम्बद के चारों ओर लगी चार छोटी गुम्बदाकार छतरियों से गुम्बद को और भव्यता प्राप्त होती है। छतरियों के गुम्बद, मुख्य गुम्बद के आकार की प्रतिलिपियाँ ही हैं, केवल आकार का अंतर है। इनके स्तम्भाकार आधार, छत पर आंतरिक प्रकाश की व्यवस्था हेतु खुले हैं। संगमरमर के ऊँचे सुसज्जित गुलदस्ते, गुम्बद की ऊँचाई को और अधिक बल देते हैं।

मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दृश्य को एक चौखटे में बांधती हुई प्रतीत होती हैं। ये मीनारें 40-40 मीटर ऊँची हैं तथा बनावट में तिमंजिली हैं। मीनारों के कारण मकबरे का वास्तु-कलात्मक प्रभाव चारों ओर विस्तारित हो गया है। इन मीनारों को देखकर भ्रम होता है कि ये मस्जिद में अजान देने के लिए बनाई गई हैं। प्रत्येक मीनार दो-दो छज्जों द्वारा तीन समान भागों में बंटी है।

मीनार के ऊपर अंतिम छज्जा है, जिस पर मुख्य इमारत के समान ही छतरी बनी हैं। इन पर वही कमलाकार आकृति एवं किरीट कलश भी हैं। चारों मीनारें बाहर की ओर हलकी सी झुकी हुई हैं ताकि यदि कभी ये गिरें तो बाहर की ओर गिरें एवं मुख्य इमारत को कोई क्षति न पहुँचे।

ताजमहल का स्थापत्य पूर्ववर्ती मुगल संरचनाओं से कुछ अलग है। ताजमहल की मेहराबों की बनावट में, पूर्ववर्ती भवनों की तुलना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। ताजमहल की लगभग समस्त मेहराबें पत्तियोंदार या नोंकदार हैं। मकबरे का मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है। इसका मुख्य-कक्ष अष्टकोणीय एवं घनाकार बना हुआ है जिसकी प्रत्येक भुजा 55 मीटर है।

यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतः सममितीय है, जो कि इस इमारत को अष्टकोणीय बनाती है परन्तु कोने की चारों भुजाएं शेष चार भुजाओं से काफी छोटी होने के कारण, इसे वर्गाकार रचना कहना ही उचित होगा। इस कक्ष के प्रत्येक फलक में एक प्रवेश-द्वार है। इनमें से केवल दक्षिण बाग की ओर का प्रवेशद्वार ही प्रयोग होता है।

आंतरिक दीवारें लगभग 25 मीटर ऊँची हैं एवं एक आभासी आंतरिक गुम्बद से ढंकी हैं जिस पर सूर्य का चिह्न अंकित है। इस कक्ष में कुल आठ पिश्ताक बने हैं। बाहरी ओर प्रत्येक निचले पिश्ताक पर एक दूसरा पिश्ताक लगभग दीवार के मध्य तक जाता है।

चार केन्द्रीय ऊपरी मेहराब छज्जा बनाते हैं एवं हरेक छज्जे की बाहरी खिड़की एक संगमरमर की जाली से ढंकी है। छज्जों की खिड़कियों के अलावा, छत पर बनीं छतरियों से ढंके खुले छिद्रों से भी प्रकाश आता है।

मुख्य कक्ष को बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की ‘लैपिडरी-आर्ट’ से सजाया गया है। साथ ही कक्ष की प्रत्येक दीवार ‘डैडो बास रिलीफ’ एवं ‘कैलिग्राफी’ से भी अलंकृत की गई है जो कि इमारत के बाहरी नमूनों को बारीकी से दिखाती है। आठ संगमरमर के फलकों से बनी जालियों का अष्टकोण, कब्रों को घेरे हुए है।

हरेक फलक की जाली पच्चीकारी के महीन कार्य से गठित है। शेष सतह पर बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की अति महीन जड़ाऊ पच्चीकारी की गई है, जो कि पुष्प, लता एवं फलों से सज्जित है। जैसे ही सतह का क्षेत्रफल बदलता है, बडे़ पिश्ताक का क्षेत्र छोटे से अधिक होता है और उसका अलंकरण भी इसी अनुपात में बदलता है। अलंकरण घटक रोगन या गचकारी से अथवा नक्काशी एवं रत्न जड़ कर निर्मित हैं।

मेहराब के दोनों ओर के स्पैन्ड्रल में अमूर्त प्रारूप प्रयुक्त किए गए हैं, विशेषकर आधार, मीनारें, द्वार, मस्जिद, और मकबरे की सतह पर। बलुआ-पत्थर की इमारत के गुम्बदों एवं तहखानों में पत्थर की नक्काशी से, विस्तृत ज्यामितीय नमूने बनाकर अमूर्त प्रारूप उकेरे गए हैं। यहाँ ‘हैरिंगबोन’ शैली में पत्थर जड़ कर संयुक्त हुए घटकों के बीच का स्थान भरा गया है।

लाल बलुआ-पत्थर इमारत में श्वेत, एवं श्वेत संगमरमर में काले या गहरे, जडा़ऊ कार्य किए हुए हैं। संगमरमर इमारत के गारे-चूने से बने भागों को रंगीन या गहरा रंग किया गया है।

इनकी डिजाइनों में अत्यधिक जटिल ज्यामितीय प्रतिरूप बनाए गए हैं। फर्श एवं गलियारे में विरोधी रंग की टाइलों या गुटकों को ‘टैसेलेशन’ नमूने में प्रयोग किया गया है। मकबरे की निचली दीवारों पर पादप रूपांकन मिलते हैं।

ये श्वेत संगमरमर के नमूने हैं जिनमें सजीव ‘बास रिलीफ’ शैली में पुष्पों एवं बेल-बूटों का सजीव अलंकरण किया गया है। संगमरमर को खूब चिकना करके और चमकाकर महीनतम ब्यौरे को भी निखारा गया है। ‘डैडो’ साँचे एवं मेहराबों के ‘स्पैन्ड्रल’ पर भी पीट्रा ड्यूरा के उच्चस्तरीय रूपांकन हैं।

इन्हें ज्यामितीय बेलों, पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित किया गया है। इनमें पीले एवं काले संगमरमर, जैस्पर तथा हरे पत्थर जडे़ गए हैं जिन्हें दीवार की सतह से मिलाने के लिए घिसाई की गई है।

ताजमहल की अत्यन्त सुन्दर खुदाई और जड़ाई भारतीय शिल्पकारों की स्थापत्य दक्षता का प्रमाण है। इस काल में पत्थर के शिल्पकार के छैनी-हथौड़े का स्थान, संगमरमर में पैट्रा ड्यूरा करने वाले कारीगरों एवं संगमरमर पर पाॅलिश करने वाल कारीगरों के बारीक औजारों ने ले लिया था।

मुख्य भवन में शाहजहाँ एवं मुमताज महल की नकली कब्रें स्थित हैं जो धरती से 22 फुट ऊँचाई पर बनाई गई हैं। बादशाह एवं बेगम की असली कब्रें इस कक्ष के ठीक नीचे बनी हुई हैं। इनके मुख मक्का की ओर हैं। मुमताज महल की कब्र आंतरिक कक्ष के मध्य में स्थित है। आधार एवं ऊपर का शृंगारदान रूप, दोनों ही बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों से जड़े हैं।

इस पर मुमताज की प्रशंसा में सुलेख लिखा गया है। इसके ढक्कन पर एक उठा हुआ आयताकार लोज़ैन्ज बना है, जो कि एक लेखन पट्ट का आभास देता है। शाहजहाँ की कब्र मुमताज की कब्र के दक्षिण ओर है। यह पूरे क्षेत्र में, एकमात्र दृश्य असम्मितीय घटक है। यह कब्र मुमताज की कब्र से बड़ी है, परंतु वही घटक एक वृहत्तर आधार दर्शाती है, जिस पर बना कुछ बड़ा शृंगारदान, लैपिडरी एवं सुलेखन से सुसज्जित है।

ताजमहल की दीवारों पर किए गए अलंकरण में सुलेखन, निराकार आकृतियां, ज्यामितीय आकृतियां तथा पादप रूपांकन प्रयुक्त किए गए हैं। ताजमहल में किया गया सुलेखन फ्लोरिड थुलुठ लिपि का है। ये सुलेख फारसी लिपिक अमानत खाँ द्वारा लिखे गए हैं। सुलेखन के लिए जैस्पर को श्वेत संगमरमर के फलकों में जड़ा गया है। संगमरमर के सेनोटैफ पर किया गया कार्य अत्यंत नाजु़क, कोमल एवं महीन है। ऊँचाई का ध्यान रखा गया है।

ऊँचे फलकों पर उसी अनुपात में बडा़ लेखन किया गया है ताकि नीचे से पढ़ने पर टेढा़पन ना प्रतीत हो। पूरे क्षेत्र में कु़रान की आयतें लिखी गई हैं। इन आयतों का चुनाव अमानत खाँ ने किया था। ताजमहल भवन के दोनों ओर लाल बलुआ पत्थर की दो इमारतें बनी हुई हैं। ये इमारतें मुख्य मकबरे की ओर मुंह किए हुए हैं।

सफेद संगमरमर के मकबरे के विपरीत प्रभाव को दर्शाने के लिए इन इमारतों में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है। इनकी पीठ क्रमशः पूर्वी एवं पश्चिमी दीवारों से जुड़ी हुई हैं एवं दोनों इमातरें एक दूसरे की प्रतिबिम्ब जान पड़ती हैं। पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है एवं पूर्वी इमारत को ‘जवाब’ कहते हैं जिसका प्राथमिक उद्देश्य सम्पूर्ण दृश्य में वास्तु-संतुलन स्थापित करना है।

यह आगन्तुक कक्ष की तरह प्रयुक्त होती थी। मस्जिद में एक मेहराब कम है तथा उसमें मक्का की ओर आला बना है। ‘जवाब’ के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं जबकि ‘मस्जिद’ के फर्श में नमाज़ पढ़ने हेतु 569 बिछौनों (जा-नमाज़) के काले संगमरमर के प्रतिरूप बने हैं। मस्जिद का मूल रूप दिल्ली की जामा मस्जिद के समान है। एक बड़े दालान या कक्ष पर तीन गुम्बद बने हैं।

ताजमहल के चारों ओर चारबाग बना हुआ है। इस बाग में ऊँचा उठा हुआ पथ है जो इस चार बाग को 16 निम्न स्तर पर बनी क्यारियों में बांटता है। बाग के मध्य में एक उच्चतल पर बने तालाब में ताजमहल का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। यह मकबरे एवं मुख्य द्वार के बीच में बना हुआ है। बाग में वृक्षों की कतारें लगी हुई हैं एवं मुख्य द्वार से लेकर मकबरे तक फव्वारे लगाए गए हैं।

इस उच्च तल के तालाब को ‘अल हौद अल कवथार’ कहते हैं, जो कि मुहम्मद द्वारा प्रत्याशित अपारता के तालाब को दर्शाता है। चारबाग के बगीचे फारसी बागों से प्रेरित हैं। यह जन्नत की चार नदियों एवं पैराडाइज़ या फिरदौस के बागों की ओर संकेत करते हैं। यह शब्द फारसी शब्द पारिदाइजा़ से बना शब्द है, जिसका अर्थ है- ‘दीवारों से रक्षित बाग’।

फारसी रहस्यवाद में मुगल कालीन इस्लामी पाठ्य में फिरदौस को एक आदर्श बाग बताया गया है। इसमें कि एक केन्द्रीय पर्वत या स्रोत या फव्वारे से चार नदियाँ चारों दिशाओं, उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम की ओर बहतीं हैं, जो बाग को चार भागों में बांटतीं हैं।

चारबाग शैली के मुगल उद्यानों के केन्द्र में मुख्य भवन स्थित होता है किंतु ताजमहल इस उद्यान के अंत में स्थित है। यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित माहताब बाग या चांदनी बाग की खोज से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि यमुना नदी भी इस बाग के प्रारूप का हिस्सा थी और उसे भी स्वर्ग की नदियों में से एक गिना जाना चाहिए था।

बाग के प्रारूप एवं उसके वास्तु-लक्षण जैसे कि फव्वारे, ईंटें, संगमरमर के पैदल पथ एवं काश्मीर के शालीमार बाग की तरह बनी ज्यामितीय ईंट-जड़ित क्यारियों से अनुमान होता है कि शालीमार बाग तथा ताजमहल के बाग का वास्तुकार संभवतः एक ही था अर्थात् अली मर्दान ने इन दोनों बागों की योजना बनाई थी। बाग के आरम्भिक विवरणों में इसके पेड़-पौधों में, गुलाब, कुमुद या नरगिस एवं फलों-वृक्षों की अधिकता का उल्लेख है।

ई.1908 में लॉर्ड कर्जन ने चारबाग को इंगलैण्ड की गार्डन शैली में ढाल दिया। बैंगलोर के सैयद महमूद के पास उपलब्ध ग्रंथ दीवान-ए महन्दीस से पता चलता है कि ताजमहल का वास्तुकार उस्ताद अहदम लाहौरी था जिसे शाहजहाँ ने नादिर-उल-अस्र की उपाधि दी थी। ताजमहल का प्रधान मिस्त्री फारस का उस्ताद ईसा एफेंदी था। 

मुगल स्थापत्य की सर्वश्रेष्ठ इमारत

आगरा का ताजमहल शाजहाँ काल तथा सम्पूर्ण मुगल काल का सर्वोत्कृष्ट  स्थापत्य है। इसे विश्व के सात आश्चर्यों में भी गिना जाता है। ताजमहल की प्रशंसा करते हुए एल्फिन्स्टन ने लिखा है- ‘सामग्री की सम्पन्नता, चित्र के वैचित्र्य तथा प्रभाव में इसकी समता करने वाला यूरोप अथवा एशिया में दूसरा मकबरा नहीं है।’

प्रसिद्ध इतिहासकार हेवेल ने लिखा है- ‘यह भारतीय स्त्री जाति का देवतुल्य स्मारक है। सुन्दर बाग और अनेक फव्वारों के मध्य स्थित ताजमहल एक काव्यमय रोमाण्टिक सौन्दर्य का सृजन करता है। वस्तुतः ताजमहल दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक और कला-पे्रमियों का मक्का बन गया है।’

डॉ. बनारसी ने लिखा है- ‘चाहे ऐतिहासिक साहित्य का पूर्ण पु´ज नष्ट हो जाये और केवल यह भवन ही शाहजहाँ के शासनकाल की कहानी कहने को बाकी रह जाये तो इसमें संदेह नहीं, तब भी शाहजहाँ का शासनकाल सबसे अधिक शानदार कहा जायेगा।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

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औरंगजेब कालीन स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य सर्वथा गौरवहीन है। इसका मुख्य कारण यह है कि वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसे यह पसंद नहीं था कि ऐसा कोई भवन बने जो इस्लाम की सादगी के सिद्धांत के विरुद्ध हो।

औरंगजेब के पिता शाहजहाँ तथा औरंगजेब के तीनों भाई चित्रकला, संगीतकला तथा स्थापत्य में रुचि रखते थे। औरंगजेब की दृष्टि में ये सब इस्लाम विरोधी कार्य थे। 

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

औरंगजेब के शासनकाल में महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर के निकट औरंगजेब की मरहूम बेगम रबिया-उद्-दौरानी उर्फ दिलरास बानो बेगम का मकबरा बनवाया गया। इसे ‘बीबी का मकबरा’ तथा दक्कन का ताज’ भी कहा जाता है। इसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया किंतु मीनारों में संतुलन न हो पाने के कारण पूरे भवन का सामन्जस्य बिखर गया।

यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों तथा अन्य सजावटों में कोई विशेषता नहीं है। मक़बरे का गुम्बद संगमरमर के पत्थर से बना है तथा शेष निर्माण पर सफेद प्लास्टर किया गया है। औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले में एक मस्जिद बनवाई, जो उसकी सादगी का परिचय देती है। इसे मोती मस्जिद भी कहा जाता है। यह मस्जिद उच्च कोटि के संगमरमर से निर्मित की गई है।

औरंगजेब ने लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है। इसमें गोलाकार बंगाली छत और फूले हुए गुम्बद बनाए गए हैं। मस्जिद का मुख्य भवन एवं मीनारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं जबकि भवन के ऊपर के गुम्बद तथा मीनारों के ऊपर के बुर्ज सफेद संगमरमर से बनाए गए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में यह तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है।

यह लाल पत्थर से बनी मण्डलीय मस्जिदों में अंतिम है। इसके बाद मुगलों ने ऐसी मस्जिद फिर कभी नहीं बनाई। औरंजेब द्वारा निर्मित लाहौर की बादशाही मस्जिद, शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में बनवाई गई जामा मस्जिद की अनुकृति पर बनी है किंतु यह दिल्ली की जामा मस्जिद की तुलना में बहुत बड़ी है।

औरंगजेब की दूसरे नम्बर की पुत्री जीनत-उन्निसा ने ई.1707 में दिल्ली के शाहजहाँनाबाद में खैराती दरवाजा के पास जीनत-अल-मस्जिद बनवाई। शाहजहाँ द्वारा निर्मित जामा मस्जिद से साम्य होने से इसे दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद भी कहा जाता है। शाहजहाँ की पुत्री रौशनआरा का निधन ई.1671 में हुआ। उसका मकबरा दिल्ली में बनाया गया।

इस मकबरे के चारों ओर बड़ा उद्यान था जिसका कुछ हिस्सा अब भी बचा हुआ है। लाहौर दुर्ग के आलमगीरी दरवाजे का निर्माण औरंगजेब के काल में ई.1673 करवाया गया। औरंगजेब के धाय-भाई मुजफ्फर हुसैन ने चण्डीगढ़ से 22 किलोमीटर दूर पिंजोर गार्डन बनवाया। यह बाग श्रीनगर के शालीमार बाग की शैली पर बना हुआ है तथा सात सीढ़ीदार क्यारियों (टैरेस-बैड) में लगा हुआ है।

बाग का मुख्य द्वार बाग के सबसे ऊँचे टैरेस में खुलता है। यहाँ पर एक महल बना हुआ है जिसका निर्माण राजस्थानी-मुगल शैली में हुआ है। इसे शीशमहल कहा जाता है। इससे लगता हुआ हवामहल है। दूसरी टैरेस पर रंगमहल है जिसमें मेहराबदार दरवाजे हैं।

औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी। इस काल में केन्द्रीय सत्ता के कमजोर हो जाने के कारण स्थापत्य शैली भी स्थानीय सत्ता की भांति आंचलिक प्रभाव ग्रहण करने लगी क्योंकि भवनों का निर्माण कार्य मुगल शहजादों के हाथों से निकलकर अवध के नवाब तथा अन्य आंचलिक प्रमुखों के हाथों में चला गया था।

कुछ भवन खानदेश और दक्षिण के अन्य भागों में भी बने किंतु वे शाहजहाँ कालीन स्थापत्य का स्तर प्राप्त करने में असफल रहे। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’

ई.1753-54 में दिल्ली में वजीर सफदर जंग का मकबरा बना। इस मकबरे का ऊध्र्व अनुपात (वर्टिकल प्रपोरशन) आवश्यकता से कहीं अधिक है फिर भी इसे मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है। मकबरे में सफदरजंग और उसकी बेगम की कब्र बनी हुई है। केन्द्रीय भवन में सफ़ेद संगमरमर से निर्मित एक बड़ा गुम्बद है। शेष भवन लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है।

इसका स्थापत्य हुमायूँ के मकबरे की डिजाइन पर आधारित है। मोती महल, जंगली महल और बादशाह पसंद नाम से पैवेलियन भी बने हुए हैं। चारों ओर पानी की चार नहरें हैं, जो चार इमारतों तक जाती हैं। मुख्य भवन से जुड़ी हुई चार अष्टकोणीय मीनारें हैं।

 दक्षिणी दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित ज़फ़र महल मुगल काल का अंतिम ऐतिहासिक भवन है। इसके भीतरी ढांचे का निर्माण मुगल बादशाह अकबर (द्वितीय) ने तथा बाहरी भाग और दरवाजे का निर्माण बहादुरशाह (द्वितीय) ने करवाया। संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से बनी इस तीन मंजिला इमारत का प्रवेशद्वार 50 फुट ऊँचा और 15 मीटर चैड़ा है।

इस द्वार का निर्माण बहादुर शाह ज़फ़र ने करवाया था। प्रवेश द्वार पर घुमावदार बंगाली गुंबजों और छोटे झरोखों का निर्माण किया गया है। जफर महल के मुख्य दरवाजे की मेहराब के ऊपरी भाग में दोनों तरफ पत्थर के दो कमल लगाए गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

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ब्रिटिश कालीन स्थापत्य - विक्टोरिया मेमोरियल हॉल

ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत में अनेक विशाल भवन बनाए जिनमें भारतीय एवं मुस्लिम स्थापत्य शैलियों के साथ यूरोपीय स्थापत्य शैलियों का भी समावेश किया। इसे ब्रिटिश कालीन स्थापत्य कह सकते हैं।

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में अंग्रेज, पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आदि यूरोपीय जातियों ने भारत में प्रवेश किया। उन्होंने यूरोपियन शैली के कुछ चर्च, फोर्ट एवं चैपल बनवाए।

सत्रहवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

ई.1639 में सेण्ट जॉर्ज फोर्ट मद्रास का निर्माण प्रारम्भ हुआ। ई.1696 में कलकत्ता में फोर्ट विलियम का निर्माण हुआ। इसी दुर्ग में चर्च भी स्थापित किया गया था।

अठारहवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

कैप्टन जॉन ब्रोहिअर की डिजायन पर ई.1757 से 1773 तक फोर्ट विलियम का पुनर्निर्माण किया गया। ई.1787 में कलकत्ता में सेण्ट जॉन चर्च बना। इस चर्च का नक्शा लेफ्टिनेण्ट एजीजी ने तैयार किया था। पर्सी ब्राउन के अनुसार यह नक्शा बालबुक के सेण्ट स्टीफेंस चर्च के नक्शे के आधार पर बनाया गया था।

उन्नीसवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी की ब्रिटिश-भारतीय स्थापत्य कला पर यूरोप की गोथिक शैली का प्रभाव है। यरोपीय शैली के आधार पर ई.1802 में कलकत्ता का गवर्नमेण्ट हाउस बनाया गया। चार्ल्स वायट ने इस भवन का नक्शा बनाया था जो कि डर्बीशायर के केडिल्सटन हॉल के नक्शे पर आधारित था। अंग्रेजों ने कलकत्ता सहित भारत के अन्य नगरों में भवन बनवाए। इनमें से बहुत से भवन भारतीय स्थापत्य कला पर आधारित थे।

ब्रिटिश शासन काल में कुछ भारतीय पूंजीपतियों ने बड़े-बड़े भवनों का निर्माण करवाया जिन पर यूरोपीय स्थापत्य कला का प्रभाव है। इन भवनों के सामने यूरोपीय पद्धति के लॉन एवं ऑर्चर्ड्स होते थे। परन्तु इन भवनों में गैलरी एवं खम्भे भारतीय स्थापत्य कला के आधार पर बनते थे।

इस प्रकार की अर्द्ध-यूरोपीय स्थापत्य कला अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी। भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कला का समन्वय करने में मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर एफ. एस. ग्राउज ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। सर स्विनटन जैकब ने बीकानेर और जयपुर रियासतों की स्थापत्य कला का अध्ययन करके भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कलाओं का श्रेष्ठ समन्वयन किया। आर. एल. चिशहोम तथा एच. इर्विन ने मद्रास में ऐसे भवन बनवाए जिनमें भारतीय और यूरोपीय स्थापत्य कला का मिश्रण किया गया था।

पंजाब में सरदार रामसिंह ने स्थापत्य कला का एक नया नमूना प्रस्तुत किया। लाहौर का सीनेट हॉल इसी आधार पर बनाया गया। संयुक्त प्रदेश (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में एफ. सी. ओर्टेल ने और बंगाल में ई. बी. हैवेल ने भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कला का समन्वय प्रस्तुत करने वाले भवन बनवाए। बम्बई में जी. विटेट ने गेट वे ऑफ इण्डिया और प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम का निर्माण करवाया।

चर्चगेट रेलवे स्टेशन भवन

ई.1876 में अंग्रेजों ने बम्बई में चर्चगेट रेलवे स्टेशन भवन बनवाया। ई.1928 में इस रेल्वे स्टेशन भवन का पुनर्निर्माण किया गया। पहले इस स्थान पर सेंट जॉर्ज फोर्ट की तरफ जाने वाली सड़क पर चर्चगेट नामक एक द्वार बना हुआ था जो सेंट थॉमस कैथेड्रल चर्च की ओर जाता था। बम्बई नगर का आकार बढ़ाने के लिए ई.1860 में इस गेट को ध्वस्त कर दिया गया था। उसी गेट की स्मृति में इस स्टेशन का नाम चर्चगेट रखा गया।

इस भवन की स्थापत्य शैली को स्विस शैलेट शैली कहा जाता है। यह शैली मूलतः स्विट्जरलैण्ड और मध्य यूरोप की अल्पाइन पहाड़ियों में स्थित गांवों में बने शैलेटों पर आधारित है।

बीसवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

बीसवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने भारत में राजकीय भवनों के निर्माण के लिए जे. रेन्सम की अध्यक्षता में पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट स्थापित किया। इस विभाग ने कलकत्ता एवं दिल्ली सहित भारत के अनेक नगरों में बड़े एवं प्रसिद्ध भवन बनाए।

विक्टोरिया मेमोरियल हॉल

अंग्रेज सरकार ने ई.1906 में कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल हॉल बनवाना आरम्भ किया जो ई.1921 में पूरा हुआ। इस भवन का डिजायन विलियम इमर्सन ने तैयार किया था। विक्टोरिया मेमोरियल हॉल में मकराना का सफेद संगमरमर लगाया गया। यह भवन यूरोपीय पुनरुद्धार कला का श्रेष्ठ उदाहरण है।

नई दिल्ली के भवन

जब ई.1911 में अंग्रेज अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले आए, तब उन्होंने दिल्ली में नए भवन बनवाने आरम्भ किए। ई.1930 में सर एडविन ल्यूटेन्स तथा सर एडवर्ड बेकर ने नई दिल्ली का नक्शा तैयार किया। इस काल में नई दिल्ली में निर्मित समस्त भवन यूरोपीय और भारतीय स्थापत्य कला की मिश्रित शैली पर बने थे। ये विशाल भवन चौड़ी सड़कों के दोनों ओर बने हैं तथा अत्यंत सादगी पूर्ण हैं। इन भवनों के बाहरी हिस्सों में खम्भे, आर्च एवं लॉन आदि बनाकर उन्हें प्रभावशाली बनाया गया है।

ई.1911 से 1947 तक की अवधि में अंग्रेजों ने नई दिल्ली में राजकीय कार्यालयों के भवनों के साथ-साथ अनेक गिरजाघर और ईसाई कब्रिस्तान बनवाए जिनमें यूरोपीय स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस काल में दिल्ली में बनवाए गए भवनों में वायसराय भवन, इण्डिया गेट तथा संसद भवन सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश कालीन स्थापत्य हैं।

वायसराय भवन

भारत में कार्यरत अंग्रेज सरकार ने ने ई.1912 में नई दिल्ली में वायसराय भवन का निर्माण आरम्भ किया जिसे अब राष्ट्रपति भवन कहते हैं। वायसराय भवन में चार मंजिलें हैं जिनमें कुल 340 कमरे हैं। इस भवन का कारपेट एरिया दो लाख वर्ग फुट (19,000 वर्ग मीटर) है।

वायसरराय भवन के निर्माण में 70 करोड़ ईटें और दस लाख घन फुट (85,000 क्यूबिक मीटर) पत्थर लगा। इसके अतिरिक्त स्टील और लकड़ी का उपयोग भी बहुतायत से किया गया। वायसराय भवन की निर्माण सामग्री तैयार करने के लिए लुटियंस ने भारतीय कारीगरों का उपयोग किया तथा उनके लिए दिल्ली और लाहौर में कार्यशालाएँ स्थापित कीं।

वायसराय भवन का डिजाइन यूरोप के एडवर्डियन बारोक काल का है, उस काल में शासन की भव्यता प्रदर्शित करने के लिए भारी शास्त्रीय रूपांकनों का प्रयोग किया जाता था। लुटियंस के आरम्भिक डिजाइन पूर्णतः यूरोपियन क्लासिकल स्टाइल के थे। बाद में लुटियंस ने इस भवन के बाहरी डिजाइन में इंडो-सारसेनिक रूपांकनों (इण्डो-मुस्लिम शैली) को शामिल किया तथा इसमें विभिन्न भारतीय तत्वों को जोड़ा गया।

इनमें भवन के शीर्ष पर कई गोलाकार पत्थर के बेसिन शामिल थे। पारंपरिक भारतीय छज्जा भी सम्मिलित किया गया। यह एक पतला, फैला हुआ एलीमेंट था जो भवन से 8 फुट आगे तक बढ़ा हुआ था और गहरी छाया बनाता था। छज्जे के उपयोग से खिड़कियों पर गिरने वाली धूप एवं बरसात की सीधी बौछारों को रोकने में सहायता मिली। छत पर कई चुटरी थीं जो गुंबद से ढकी हुई नहीं थी। लुटियंस ने भारतीय डिजाइन तत्वों का पूरे भवन में संयम और प्रभावी ढंग से उपयोग किया।

स्तंभ के शीर्ष पर एक विशिष्ट रूप से अनोखा मुकुट है जिसमें कांस्य कमल के फूल से एक कांच का सितारा निकलता है। वायसराय भवन में राजस्थानी शैली की लाल बलुआ पत्थर की जालियां भी प्रयुक्त की गईं। महल के सामने पूर्व की ओर असमान रूप से फैले हुए 12 विशाल स्तंभ हैं। लुटियंस ने इस भवन में एक नॉन्स ऑर्डर भी लगाया जिसमें अशोक का लेख अंकित है। चार लटकन वाली भारतीय घंटियों के साथ अकेंथस के पत्तों का मिश्रण है। घंटियाँ भारतीय हिंदू और बौद्ध मंदिरों की शैली के समान हैं, यह अंकन कर्नाटक के मूदाबिद्री जैन मंदिर से प्रेरित है।

स्तंभ के शीर्ष पर प्रत्येक कोने पर एक घंटी है। ये शांत घंटियाँ इस बात की प्रतीक हैं कि भारत में ब्रिटिश राजवंश का अंत कभी नहीं होगा। वायसराय भवन से पहले के ब्रिटिश भवनों में इंडो-सरसेनिक रिवाइवल वास्तुकला का उपयोग किया गया था जिनमें मुगल वास्तुकला के तत्वों को अनिवार्य रूप से पश्चिमी ढांचे पर ग्राफ्ट किया गया था।

लुटियंस ने बहुत इस भवन के स्थापत्य में मौर्य कालीन बौद्ध कला से भी प्रेरणा ली। इसे देहली ऑर्डर और मुख्य गुंबद में देखा जा सकता है जहाँ नीचे के ड्रम की सजावट सांची बौद्ध स्तूप के चारों ओर की रेलिंग की याद दिलाती है। इसमें मुगल और यूरोपीय औपनिवेशिक स्थापत्य तत्वों की उपस्थिति है। यह संरचना अन्य समकालीन ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रतीकों से पूरी तरह अलग है।

लुटियंस ने वायसराय भवन में कई छोटे-छोटे अभिनव प्रयोग भी किए, जैसे कि उद्यान की दीवारों में एक क्षेत्र और स्टेटरूम में दो वेंटिलेटर खिड़कियाँ जो उनके चश्मे जैसी दिखती थीं। वाइसरीगल लॉज का अधिकांश भाग ई.1929 तक पूरा हो गया था। नई दिल्ली के अन्य भवनों के साथ ई.1931 में इस भवन का आधिकारिक उद्घाटन किया गया। ई.1932-33 में वायसराय भवन के बॉलरूम में महत्वपूर्ण सजावट जोड़ी गई जिसे इतालवी चित्रकार टॉमासो कर्नलो ने बनाया।

जयपुर स्तंभ में हाथियों की मूर्तियाँ और नागों की फव्वारा मूर्तियाँ भी लगाई गईं। साथ ही जयपुर स्तंभ के आधार के चारों ओर उभरी हुई आकृतियाँ भी थीं जिन्हें ब्रिटिश मूर्तिकार चार्ल्स सार्जेण्ट जैगर ने बनाया था।
भवन का लेआउट प्लान एक विशाल वर्गाकार भवन के चारों ओर डिजाइन किया गया है जिसके भीतर कई आँगन और खुले भीतरी क्षेत्र हैं। योजना में दो विंग बनाने का प्रस्ताव था; एक वायसराय के परिवार और उसके स्टाफ के लिए तथा दूसरा अतिथियों के लिए।

वायसराय भवन का रेजीडेंस विंग एक अलग चार मंजिला भवन है, जिसके भीतर इसका दरबार क्षेत्र भी है। यह विंग इतना बड़ा है कि भारत की आजादी के बाद प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने छोटे अतिथि विंग में ही अपना निवास बनाया। बाद में भारत के समस्त राष्ट्रपतियों ने भी इसी विंग में अपना आवास बनाया। वायसराय के लिए बनी रेजीडेंस विंग का उपयोग अब राजकीय स्वागत समारोहों और राष्ट्राध्यक्षों के आगमन के समय गेस्ट विंग के रूप में किया जाता है।

वायसराय भवन में बने गणतंत्र मंडप का वास्तविक नाम दरबार हॉल था। यह मुख्य भवन के दोहरे गुंबद के ठीक नीचे स्थित है। आजादी से पहले इसे सिंहासन कक्ष के रूप में जाना जाता था। इसमें वायसराय और उसकी पत्नी के लिए दो अलग-अलग सिंहासन थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रपति की एक ऊंची कुर्सी, 33 मीटर की ऊंचाई से लटके बेल्जियम के कांच के झूमर के नीचे रखी जाती है।

हॉल का फर्श चॉकलेटी रंग के इटैलियन संगमरमर से बना है। गणतंत्र मंडप के स्तंभ दिल्ली ऑर्डर में बने हैं जिनमें खड़ी रेखाओं को घंटी की आकृति से जोड़ा गया है। स्तंभ की खड़ी रेखाओं का उपयोग कमरे के चारों ओर बनी फ्रिज में भी किया गया है जो कि स्तंभों के पारंपरिक ग्रीक ऑर्डर में नहीं किया जाता। स्तंभ पीले जैसलमेरी संगमरमर से बने हैं, जिनके बीच में एक मोटी रेखा चलती है। गणतंत्र मंडप में 500 मनुष्य बैठ सकते हैं। इसी भवन में जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

वायसराय भवन में बने अशोक मंडप का वास्तविक नाम अशोक हॉल है। 32 मीटर गुणा 20 मीटर का एक आयताकार कमरा है। इसे लकड़ी के फर्श वाले नृत्य कक्ष के रूप में बनाया गया था। इसकी छत पर फारसी चित्रकला शैली का चित्रण है। यह चित्र मूलतः मेहर अली द्वारा कजर युग में बनाई गई एक ऑयल पेंटिंग की अनुकृति है। इसमें राजा फतह-अली शाह कजर के नेतृत्व में एक शाही शिकार अभियान को दर्शाया गया है। दीवारों पर इतालवी कलाकार टॉमासो कोलोनेलो द्वारा परिकल्पित भित्तिचित्र हैं जो फारसी लघुचित्र शैलियों से प्रेरित हैं।

वायसराय भवन के बीच में स्थित गुंबद में भारतीय और ब्रिटिश शैलियों का मिश्रण किया गया है। इनके बीच में एक ऊँचा ताँबे का मुख वाला गुंबद है जिसके कई हिस्सों में एक बहुत ऊँचे ढोल के ऊपर एक आकृति बनी हुई है जो भवन के बाकी हिस्सों से अलग दिखाई देती है। यह गुंबद वायसराय भवन के चारों कोनों के विकर्णों के ठीक बीच में है। यह भवन की ऊँचाई से दोगुने से भी अधिक ऊँचा है और शास्त्रीय और स्थानीय शैलियों का मिश्रण है। लुटियंस ने गुंबद को डिजाइन करते समय रोम के पैंथियन को एक मॉडल के रूप में लिया था, हालाँकि गुंबद के बाहरी हिस्से को भी आंशिक रूप से प्रारंभिक बौद्ध स्तूपों के अनुरूप बनाया गया।

मुगल गार्डन

मुगल गार्डन को अब अमृत उद्यान कहा जाता है। यह उद्यान राष्ट्रपति भवन के पीछे स्थित है। इस उद्यान में मुगल और अंग्रेजी भूनिर्माण शैलियों का मिश्रण किया गया है और इसमें फूलों एवं वृक्षों की एक विशाल विविधता है। समकोण पर एक-दूसरे को काटती हुई दो मुख्य धाराएँ इस उद्यान को वर्गों के एक जाल में विभाजित करती हैं इनके संगम पर कमलकार छः फव्वारे हैं जिनकी ऊँचाई 12 फुट है।

पक्षियों को दाना खिलाने के लिए पक्षी-मेजें भी रखी गई हैं। मुख्य उद्यान के दोनों ओर ऊँचे स्तर पर, उद्यान की दो अनुदैर्ध्य पट्टियाँ हैं, जो उत्तरी और दक्षिणी सीमाएँ बनाती हैं। यहाँ उगाए गए पौधे मुख्य उद्यान के समान ही हैं। दोनों पट्टियों के मध्य में एक फव्वारा है, जो अंदर की ओर गिरता है और एक कुआँ बनाता है। पश्चिमी सिरे पर दो गजेबो और पूर्वी सिरे पर दो अलंकृत संतरी चौकियाँ हैं।

मुगल गार्डन के पश्चिम में पर्दा उद्यान है जो केंद्रीय फुटपाथ के दोनों ओर फैला हुआ है। यह फुटपाथ गोलाकार उद्यान की ओर जाता है। लगभग 12 फुट ऊँची दीवारों से घिरा यह उद्यान मुख्यतः गुलाबों का उद्यान है। इसमें 16 वर्गाकार क्यारियाँ हैं जो कम ऊँचाई वाली बाड़ों से घिरी हैं। केंद्रीय फुटपाथ के ऊपर बीच में लाल बलुआ पत्थर का एक परगोला है जो विभिन्न प्रकार की लताओं से घिरा हुआ है।

इण्डिया गेट

1920 के दशक तक दिल्ली में केवल एक ही रेलवे स्टेशन था जिसे अब पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन कहते हैं। इस स्टेशन तक जाने वाली आगरा-दिल्ली रेलवे लाइन लुटियन्स दिल्ली और किंग्सवे अर्थात् राजाओं के गुजरने का रास्ता (आजादी के बाद राजपथ तथा अब कर्त्तव्य पथ) से होकर जाती थी। ई.1924 में अंग्रेज सरकार ने इस स्थान पर इण्डिया गेट बनाने का निश्चय किया। इसलिए यहाँ से निकलने वाली रेलवे लाइन को यमुना नदी के पास स्थानान्तरित किया गया।

ई.1931 में अंग्रेज सरकार ने किंग्सवे पर इण्डिया गेट का निर्माण करवाया। यह मूलतः युद्ध-स्मारक था जो प्रथम विश्वयुद्ध एवं अफगान युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए 90 हजार भारतीय सैनिकों को समर्पित किया गया था। इसकी ऊँचाई 43 मीटर है। इसका डिजाइन सर बालेन शाह ने तैयार किया था। यह स्मारक पेरिस के आर्क डे ट्रॉयम्फ़ से प्रेरित है। इसे सन् 1931 में बनाया गया था। यूनाइटेड किंगडम के कुछ सैनिकों और अधिकारियों सहित कुल 13,300 सैनिकों के नाम इण्डिया गेट पर उत्कीर्ण हैं। यह स्मारक लाल और पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित है।

जब इण्डिया गेट बनकर तैयार हुआ था तब इसके सामने इंग्लैण्ड के राजा जार्ज पंचम की एक मूर्ति लगी हुई थी। उस मूर्ति को ब्रिटिश राज के समय की अन्य मूर्तियों के साथ कोरोनेशन पार्क में स्थापित कर दिया गया। अब जार्ज पंचम की मूर्ति की जगह प्रतीक के रूप में केवल एक छतरी रह गयी है। 625 मीटर के व्यास में स्थित इण्डिया गेट का षट्भुजीय क्षेत्र 306,000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में फैला है।

मंदिरों का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर-वास्तु भी नवीन स्वरूप के साथ विकसित हुआ। दिल्ली का लक्ष्मीनारायण मंदिर, बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय के भवन, वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी का भारत माता मंदिर बीसवीं शती के मंदिर-वास्तु की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

कुशीनगर में बने निर्वाण बिहार, बुद्ध मंदिर और सरकारी विश्रामगृह में बौद्ध कला को पुनर्जीवन मिला है। दिल्ली में लक्ष्मीनारायण मंदिर के साथ भी एक बुद्ध मंदिर है। इस काल में राजाओं के महलों और विद्यालय भवनों ने भी वास्तु-कला को नवीन स्वरूप प्रदान किया तथा हिन्दू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम एवं ईसाई स्थापत्य पद्धतियों के मेल से भारतीय स्थापत्य कला पूर्ण रूप से नवीन स्वरूप में ढल गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें : मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

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दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य से तात्पर्य दक्षिण भारत के मंदिर स्थापत्य एवं शैलियों से है जो प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल एवं आधुनिक काल में विकसित हुई हैं।

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य अपने आप में कितना अद्भुत है, इसका अनुमान प्रो. हीरेन के इस कथन से हो जाता है कि महाबलिपुरम् के कोरोमण्डल तट पर स्थित सात मंदिर या प्राचीन स्मारक ऐसी असाधारण रचनाएं हैं जिनके लिए यह सरलता से कहा जा सकता है कि वे मानव दक्षता और प्रवीणता के स्तर में बहुत विशिष्ट स्थान रखते हैं।

सामान्यतः नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित भूभाग को दक्षिण भारत कहा जाता है किंतु दक्षिण भारत को भी भौगोलिक आधार पर दो भागों में रखा जाता है- दक्षिणा-पथ और सुदूर दक्षिण। नर्बदा और कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्रों को दक्षिणा-पथ कहा जाता है और कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों के दक्षिण के समस्त प्रायद्वीप को सुदूर दक्षिण कहा जाता है।

गुप्तकाल तक दक्षिण भारत में अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ किन्तु दक्षिण में मन्दिर-कला का वास्तविक विकास गुप्त-साम्राज्य के पतन के बाद अर्थात् छठी शताब्दी ईस्वी से आरम्भ हुआ। गुप्तों के पतन के बाद दक्षिणा-पथ में चालुक्यों और राष्ट्रकूटों की शक्ति का उदय हुआ।

इसी प्रकार सुदूर-दक्षिण में पल्लव, चोल, पाण्ड्य और चेर शक्तिशाली राज्य स्थापित हुए। इन राज्यों में मन्दिर-स्थापत्य की अच्छी प्रगति हुई जो कि मध्य-काल तक निरन्तर चलती रही।

दक्षिण भारत की मंदिर वास्तुकला उत्तर भारत की वास्तुकला से शैलीगत भिन्नताएं लिए हुए है। उत्तर भारत की मंदिर शैली को आर्य मंदिर शैली एवं नागर शैली कहा जाता था तथा दक्षिण भारत की मंदिर शैली द्रविड़़ मन्दिर शैली कहलाती थी। दोनों शैलियों के मिश्रण से निर्मित मन्दिर-शैली को बेसर शैली कहते थे।

यद्यपि इन शैलियों का उदय क्षेत्रीयता के आधार पर हुआ था किंतु इनकी सीमाएं अनुल्लंघनीय नहीं थीं। द्रविड़़ शैली के मन्दिर उत्तर भारत में भी मिले हैं और नागर शैली के मन्दिर दक्षिण भारत में। उदाहणार्थ, वृन्दावन का विशाल वैष्णव मन्दिर द्रविड़ शैली का है। इसी प्रकार बेसर शैली भी अपनी सीमाएं भेदकर दक्षिण भारत में चली गई।

बेसर शैली के मन्दिर चालुक्य नरेशों ने कन्नड़ प्रदेश में और होयसल राजाओं ने मैसूर में बनवाए। इनके स्थापत्य में ब्राह्मण, बौद्ध या जैन-धर्म का भेद नहीं रखा गया है। मंदिरों का विधान धर्म विशेष से पूरी तरह सम्बन्धित नहीं है।

कुछ वास्तुविदों ने बेसर शैली को पश्चात्वर्ती चालुक्य शैली कहा है परन्तु यथार्थतः यह आरम्भिक चालुक्य मन्दिरों की ही शैली है। होयसल मन्दिरों की भी यही शैली है। इन कारणों से इसे मात्र चालुक्य शैली कहना उचित नहीं होगा। वस्तुतः इस दिशा में होयसलों ने अधिक प्रयास किया। बेसर शैली के सुन्दरतम उदाहरण मैसूर राज्य में हलेबिद और वेलूर में हैं।

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य – द्रविड़ शैली

द्रविड़ शैली के मन्दिरों का निर्माण ऊँची जगति पर किया गया है तथा गर्भगृह और मण्डप साथ-साथ बनाए गए हैं। दक्षिण के अधिकांश मन्दिर शैव हैं, इसलिए मुख्य मण्डप के सामने नन्दी मण्डप को स्थान दिया गया है जिसमें गर्भगृह की ओर मुख किए हुए नन्दी की बैठी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

तल-विन्यास की दृष्टि से द्रविड़ शैली के मन्दिर गर्भगृह, मण्डप और नन्दी मण्डप एक प्राकार से आवेष्ठित होते हैं जिसमें बने प्रवेश द्वार को गोपुर कहते हैं। इस प्रकार द्रविड़़ शैली के प्रारम्भिक मन्दिरों में पांच अंग मिलते हैं- (1.) गर्भगृह (2.) मण्डप (3.) ननदी मण्डप (4.) प्राकार (5.) गोपुर।

बाद में बने द्रविड़ मंदिरों की शैली में अनेक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। बाद के मन्दिर बहुत बड़े क्षेत्र में बनाए जाने लगे। इन मंदिरों में चारों दिशाओं के मध्य में एक-एक द्वार बनाया जाता था। सबसे बाहर के प्राकार के प्रवेशद्वार (गोपुर) भव्य और ऊँचे होते थे।

इनकी तुलना में मूल विमान बहुत छोटा प्रतीत होता था। इन मन्दिरों के चारों ओर विशाल प्रांगण में अनेक प्रकार के भवन, पाठशालाएं और बाजार भी होते थे। कुछ विद्वानों के अनुसार द्रविड़़ शैली के इन विशाल मन्दिरों को ‘मन्दिर-नगर’ कहना अधिक उचित होगा।

द्रविड़ शैली के मन्दिर गर्भगृह पर निर्मित विशाल पिरामिडनुमा शिखर के कारण दूर से ही पहचाने जाते हैं। द्रविड़़ शैली के मन्दिर में पाश्र्व से देखने में, ऊँचाई की दृष्टि से, पांच भाग दिखाई देते हैं। सबसे नीचे का भाग एक ऊँचा अधिष्ठान (प्लेटफॉर्म या जगती) है जिस पर गर्भगृह और मण्डप बनाए गए हैं। अधिष्ठान के ऊपर वर्गाकार गर्भगृह की दीवारें उठाई गई हैं।

दीवारों वाला लम्बवत् भाग जंघ कहलाता है जो तलवत् तीन भागों में विभक्त होता है, दीवार या जंघ के इन तीनों भागों में गवाक्ष बनाकर देव-प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। गर्भगृह की दीवारों के ऊपर पिरामिडाकार शिखर का उठान प्रारम्भ होता है। यह शिखर क्रमशः ऊपर उठते हुए तथा निरंतर संकरा होते हुए अनेक तलों के योग से अपना स्वरूप प्राप्त करता है।

पिरामिडाकार शैली में प्रत्येक तल सिमटते हुए अन्त में आधार तल का एक तिहाई रह जाता है। जाति-विमान के प्रत्येक तल को चारों ओर से लघु विमानों की पंक्ति से इस प्रकार अलंकृत किया जाता है कि कोनों पर कूट (वर्गाकार लघु विमान) और उसके बाद शाला (आयताकार पृष्ठ लघु विमान) और कूटों के रूप में क्रम से लगाए जाते हैं।

प्रत्येक तल पर इन लघु विमानों की पंक्ति एक मेखला के रूप में दिखाई देती है। शिखर के शीर्ष भाग पर, ग्रीवा के ऊपर, षड्कार विशाल पत्थर होता है जिसे ‘द्राविड़ी’ या ‘स्तूपी’ कहा जाता है। स्तूपी के ऊपर कलश स्थापित होता है। इस प्रकार गर्भगृह के ऊपर निर्मित शिखर दूर से ही दिखाई दे जाता है।

गर्भगृह के आगे स्तम्भों पर आधारित खुला या बन्द मण्डप बनाया जाता है जिसकी छत सपाट होती है। मुख्य मण्डप के आगे बना हुआ नन्दी मण्डप भी स्तम्भों पर आधारित सपाट छत से युक्त खुला मण्डप होता है। इस प्रकार द्रविड़ शैली के मन्दिर में नीचे से ऊपर की ओर जाति विमान के पांच भाग होते हैं- (1.) कलश, (2.) स्तूपी (3.) शिखर (अनेक तलों से युक्त) (4.) जंघा और (5.) अधिष्ठिान।

पश्चवर्ती-काल में गोपुरम् को विशेष महत्त्व दिया जाने लगा। यह मंदिर के आंगन का मुख्य द्वार होता है तथा प्रायः इतना ऊंचा होता है कि वह प्रधान मन्दिर के शिखर को छिपा देता है। आयताकार भूमि पर बना गोपुरम् ऊपर की ओर पतला होता हुआ अनेक मंजिलों में निर्मित ऐसी वास्तु-रचना है जिसके शिखर का मस्तक हाथी की पीठ के समान होता है।

इस पर तीन से ग्यारह तक कलश बैठाये जाते हैं। इसके नीचे के भाग में प्रवेश के लिए स्थान बना होता है। गोपुरम् का सौन्दर्य इसके तलों पर बनी असंख्य मूर्तियों के कारण प्रकट होता है। मदुरै के मीनाक्षी मन्दिर का गोपुरम् विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

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पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

गुप्तकाल एवं उससे पूर्ववर्ती काल में तमिल क्षेत्र को द्रविड़ प्रदेश कहा जाता था। उस काल की मंदिर कला में काष्ठ एवं कंदराओं का अधिक प्रयोग होता था। इसलिए प्रारम्भिक पल्लव शिल्पकारों ने पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला में उन्हीं प्रणालियों का उपयोग किया।

गुप्तकाल के पराभव के बाद जब छठी शताब्दी ईस्वी में सिंहविष्णु ने कांची एवं महाबलिपुरम् के आस-पास के प्रदेश पर अधिकार करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, तब पल्लव शिल्पकारों ने वास्तुकला में नए प्रयोग किए और मंदिर वास्तुकला को काष्ठकला और कन्दराकला के प्रभाव से मुक्त करने में विपुल सहयोग दिया। इसलिए यह कहना उचित होगा कि मंदिरों की द्रविड़ शैली का जन्म पल्लव शासकों के काल में महाबलिपुरम् और निकटवर्ती प्रदेश में हुआ।

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला को चार प्रमुख शैलियों में रखा जा सकता है- (1.) महेन्द्रवर्मन शैली, (2.) मामल्ल शैली (3.) राजसिंह शैली और (4.) नन्दिवर्मन शैली।

(1.) महेन्द्रवर्मन शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला की महेन्द्रवर्मन शैली का विकास ई.610 से 640 के मध्य हुआ। इस शैली के मंदिरों को मण्डप कहा जाता है। ये मण्डप साधारण स्तम्भ युक्त बरामदे हैं जिनकी पिछली दीवार में एक या अधिक कक्ष बनाये गये हैं। ये कक्ष कठोर पाषाण को काटकर गुहा मंदिर के रूप में बनाये गये हैं।

मण्डप के बाहरी द्वार पर दोनों ओर द्वारपालों की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। मण्डप के स्तम्भ सामान्यतः चैकोर हैं। महेन्द्र शैली के मण्डपों में मण्डगपट्टु का त्रिमूर्ति मण्डप, पल्लवरम् का पंचपाण्डव मण्डप, महेन्द्रवाड़ी का महेन्द्र विष्णुगृह मण्डप, मामण्डूर का विष्णु मण्डप विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

(2.) मामल्ल शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला की मामल्ल शैली का विकास ई.640 से 674 तक की अवधि में राजा नरसिंहवर्मन (प्रथम) के शासन काल में हुआ। नरसिंहवर्मन ने महामल्ल की उपाधि धारण की थी इसलिये इस शैली को महामल्ल अथवा मामल्ल शैली कहा जाता है। इसी राजा ने मामल्लपुरम् की स्थापना की जो बाद में महाबलीपुरम् कहलाया। इस शैली में दो प्रकार के मंदिरों का निर्माण हुआ है- (1.) मण्डप शैली के मंदिर तथा (2.) रथ शैली के मंदिर।

मण्डप शैली

मण्डप शैली के मंदिर महेन्द्रवर्मन शैली के जैसे ही हैं किंतु मामल्ल शैली में उनका विकसित रूप दिखाई देता है। महेन्द्रवर्मन शैली की अपेक्षा मामल्ल शैली के मण्डप अधिक अलंकृत हैं। इनके स्तम्भ सिंहों के शीर्ष पर स्थित हैं तथा स्तम्भों के शीर्ष मंगलघट आकार के हैं। आदिवराह मण्डप, महिषमर्दिनी मण्डप, पंचपाण्डव मण्डप तथा रामानुज मण्डप विशेष उल्लेखनीय हैं।

रथ शैली

रथ शैली के मंदिर विशाल चट्टानों को काटकर, काष्ठ-रथों की आकृतियों में बनाये गये हैं। इनकी वास्तुकला मण्डप शैली जैसी है। इन रथों का विकास बौद्ध विहार तथा चैत्यगृहों से हुआ है। प्रमुख रथ मंदिरों में द्रोपदी रथ, अर्जुन रथ, नकुल-सहदेव रथ, भीम रथ, धर्मराज रथ, गणेश रथ, पिडारि रथ आदि हैं। ये सब शैव मंदिर हैं। द्रोपदी रथ सबसे छोटा है।

धर्मराज रथ सबसे भव्य एवं प्रसिद्ध है। इसका शिखर पिरामिड के आकार का है। यह मंदिर दो भागों में है। नीचे का खण्ड वर्गाकार है तथा इससे लगा हुआ संयुक्त बरामदा है। यह रथ मंदिर आयताकार तथा शिखर ढोलकाकार है। मामल्ल शैली के रथ मंदिर मूर्तिकला के लिये भी प्रसिद्ध हैं। इन रथों पर दुर्गा, इन्द्र, शिव, गंगा, पार्वती, हरिहर, ब्रह्मा, स्कन्द आदि देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। नरसिंहवर्मन (प्रथम) के साथ ही इस शैली का भी अंत हो गया।

(3.) राजसिंह शैली

नरसिंहवर्मन (द्वितीय) ने राजसिंह की उपाधि धारण की थी। इसलिये उसके नाम परपल्लव मन्दिर स्थापत्य कला की इस शैली को राजसिंह शैली कहा जाता है। महाबलीपुरम् में समुद्रतट पर स्थित तटीय मंदिर और कांची में स्थित कैलाशनाथ मंदिर तथा बैकुण्ठ पेरुमाल मंदिर इस शैली के प्रमुख मंदिर हैं। इनमें महाबलीपुरम् का तटीय शिव मंदिर पल्लव स्थापत्य एवं शिल्प का अद्भुत स्मारक है।

यह मंदिर एक विशाल प्रांगण में बनाया गया है जिसका गर्भगृह समुद्र की ओर है तथा प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर। इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ तथा सीढ़ीदार शिखर है। शीर्ष पर स्तूपिका निर्मित है। इसकी दीवारों पर गणेश तथा स्कंद आदि देवताओं और गज एवं शार्दुल आदि बलशाली पशुओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।

कांची के कैलाशनाथ मंदिर में राजसिंह शैली का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। इसका निर्माण नरसिंहवर्मन (द्वितीय) के शासन काल में आरंभ हुआ तथा उसके उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन (द्वितीय) के शासनकाल में पूर्ण हुआ। द्रविड़ शैली की समस्त विशेषतायें इस मंदिर में दिखाई देती हैं। मंदिर में शिव क्रीड़ाओं को अनेक मूर्तियों के माध्यम से अंकित किया गया है।

इस मंदिर के निर्माण के कुछ समय बाद ही बैकुण्ठ पेरुमल का मंदिर बना। इसमें प्रदक्षिणा-पथ युक्त गर्भगृह है तथा सोपान युक्त मण्डप है। मंदिर का विमान वर्गाकार तथा चार मंजिला है जिसकी ऊँचाई लगभग 60 फुट है। प्रथम मंजिल में भगवान विष्ण के विभिन्न अवतारों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर की भीतरी दीवारों पर राज्याभिषेक, उत्तराधिकार चयन, अश्वमेध, युद्ध एवं नगरीय जीवन के दृश्य अंकित किये गये हैं। यह मंदिर पल्लव वास्तुकला का पूर्ण विकसित स्वरूप प्रस्तुत करता है।

(4.) नन्दिवर्मन शैली

इस शैली के मंदिरों में वास्तुकला का कोई नवीन तत्व दिखाई नहीं देता किंतु आकार-प्रकार में ये निरंतर छोटे होते हुए दिखाई देते हैं। इस शैली के मंदिर, पूर्वकाल के पल्लव मंदिरों की प्रतिकृति मात्र हैं। ये मंदिर नंदिवर्मन तथा उसके उत्तराधिकारियों के शासन में बने थे। इस शैली के मंदिरों में स्तम्भ शीर्षों में कुछ विकास दिखाई देता है।

इस शैली के मंदिरों में कांची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मंदिर तथा गुड़ीमल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर उल्लेखनीय हैं। इनमें सजीवता का अभाव है जिससे अनुमान होता है कि इन मंदिरों के निर्माता किसी संकट में थे। दसवीं शताब्दी के अंत तक इन मंदिरों का निर्माण बंद हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

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राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला - कैलाश मंदिर एलोरा

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला दक्षिण भारत की प्रमुख मंदिर स्थापत्य शैलियों में से है। राष्ट्रकूट राजा उत्तर भारत में आने से पहले दक्षिण भारत में शासन करते थे।

एलौरा का कैलाश नाथ मन्दिर

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण एलौरा का कैलाश नाथ मन्दिर है। यह स्थान आन्ध्रप्रदेश के औरंगाबाद नगर से 15 मील की दूरी पर है।

कैलाश नाथ मन्दिर को राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम (ई.758-773) ने बनवाया था। इसमें गुहा-मन्दिर कला की एक अन्य शैली दिखाई देती है। गुहामंदिर के निर्माण में परम्परागत रूप से पर्वत के निचले भाग से खुदाई की जाती थी और उसे खोखला करते हुए ऊपर तक जाते थे परन्तु कैलाशनाथ मन्दिर को बनाने के लिए शिल्पकारों ने एक लम्बी पहाड़ी को शीर्ष से तराशना प्रारम्भ करके समूची पहाड़ी को ऊपर से नीचे तक तराश कर मन्दिर के समस्त अंग- छत, द्वार, झरोखे, खिड़कियां, स्तम्भ, तोरण, मण्डप, शिखर, गर्भगृह, चारों ओर के बरामदे आदि बनाए।

कैलाश नाथ मन्दिर का विमान समानान्तर चतुर्भज आकार में है। यह 150 फुट लम्बा और 100 फुट चैड़ा है। यह विमान 25 फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। मन्दिर के ऊपर के शिखर की ऊंचाई 95 फुट है। मन्दिर में एक गर्भगृह है जिसके आगे स्तम्भ युक्त मण्डप है, जो 70 फुट लम्बा और 60 फुट चौड़ा है।

इस प्रमुख इमारत के बाद एक नन्दी-मण्डप है जिसके दोनों ओर 51-51 फुट ऊंचे दो ध्वज स्तम्भ हैं। इन पर त्रिशूल स्थापित हैं। मुख्य मन्दिर के चारों ओर बरामदे हैं जिनके चारों ओर स्तम्भ पंक्तियां एवं कक्ष बनाए गए हैं। यह मन्दिर दो-मंजिला है तथा बिना किसी जोड़ के केवल एक चट्टान को तराश कर बनाया गया है।

मन्दिर के स्तम्भों पर प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं, द्वारों पर मनोहर लताएं एवं पुष्प मन्जरियां बनाई गई हैं और शिखर पर शिव-पार्वती विवाह, इन्द्र-इंद्राणी की मूर्तियाँ और रावण द्वारा कैलाश-उत्तोलन आदि पौराणिक कथाओं के दृश्यों का अंकन किया गया है। तोरण के दोनों ओर एक-एक हाथी है।

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला – ऐलिफेण्टा की गुफाएं

बम्बई से लगभग 6 मील दूर धारापुरी नामक टापू में दो पहाड़ियों के ऊपरी भाग को काटकर मन्दिर एवं मूर्तियों का निर्माण किया गया है। इन्हें ऐलिफेण्टा की गुफाएं कहते हैं। ये भी राष्ट्रकूट काल में निर्मित मानी जाती हैं।

मूल रूप से इस स्थान को श्रीपुरी नाम दिया गया था जिसका अर्थ होता है लक्ष्मी की नगरी। जब पुर्तगालियों ने इस क्षेत्र पर अधिकार किया, तब यहां पर हाथी की विशाल मूर्ति का निर्माण किया गया। इस कारण इसे एलीफेण्टा कहने लगे।
एलोरा का कैलाश मंदिर और एलीफेंटा की गुफाओं के मंदिरों का स्थापत्य एक जैसा है। एलीफेंटा गुफाओं के प्रवेश द्वार पर द्वारपालों की विशाल प्रतिमाएं हैं।

गर्भगृह की दीवारों पर जटिल मूर्तिकला उकेरी गई है जिनमें नटराज, गंगाधर, अर्धनारीश्वर, सोमस्कंद और प्रसिद्ध त्रिमूर्ति की मूर्तियाँ शामिल हैं। छह मीटर ऊँची मूर्ति भगवान शिव के तीन रूपों- सर्जक, पालक और संहारक का प्रतिनिधित्व करती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

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चोल मन्दिर स्थापत्य कला

द्रविड़ मंदिर शैली का चरमात्कर्ष चोल मन्दिर स्थापत्य कला में हुआ। चोलों ने पल्लवों और पाण्ड्यों का स्थान लिया था। इसलिए चोलों ने पल्लवों और पाण्ड्यों की स्थापत्य कला को ही आगे बढ़ाया।

चोल मन्दिर स्थापत्य कला का कालखण्ड

चोल मन्दिरों का निर्माण ई.850 से 1200 तक निरन्तर होता रहा। इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है-

(1.) प्रारम्भिक मन्दिर- जिनकी रचना ई.850 से 985 के बीच हुई,

(2.) उत्तरवर्ती मन्दिर – जिनकी रचना ई.985 से 1200 के बीच हुई।

उत्तरवर्ती चोल काल (ई.1070-1250) में भी मन्दिरों का निर्माण उसी गति से होता रहा। इन मन्दिरों में दो प्रमुख हैं-

(1.) तंजौर जिले में स्थित कंपहेश्वर (त्रिभुवनाविरेश्वर) का मन्दिर और

(2.) तंजौर जिले में ही दारासुरम का एरावतेश्वर मन्दिर।

चोल मन्दिर स्थापत्य कला के प्रमुख उदाहरण

प्रारम्भिक चोल मन्दिरों में (1.) विजयालय (2.) भुवनकोणम् (3.) मुकुंदेश्वर (4. कदम्बर (5.) बाला सुब्रह्मण्य (6.) नत्तमलई (7.) कलियपट्टी (8.) त्रिचण्डीश्वर (9.) सुन्दरेश्वर (10.) नागेश्वर (11.) कोरंगनाथ और (12.) अगस्तेश्वर मन्दिर अधिक प्रसिद्ध हैं।

साढ़े तीन सौ साल के चोलों के दीर्घकालीन शासन में समूचा तमिल प्रदेश छोटे-बड़े मन्दिरों से भर गया। चोलों के शासन काल में प्रारम्भ में पत्थरों के भवन एवं बाद में ईंटों के भवन बने। इनमें सबसे पहला चिगलपट्ट जिले का तरूक्कलुक्कुनरम है। इसकी वास्तुकला परवर्ती-पल्लव या पूर्ववर्ती-चोल शैली से मिलती है।

इसके खम्भों के निचले अर्ध-भाग में पैर मोड़कर बैठे सिंह की आकृतियां हैं और खम्भों के शीर्ष पर मोटे शीर्ष-फलक हैं। चोल युग के प्रारम्भ में अपेक्षाकृत लघु मन्दिर बने थे। उनकी बनावट कांची के मुक्तेश्वर एवं बाहुर मन्दिरों के समान है। इसके बाद परांतक (प्रथम) से लेकर राजराजा (प्रथम) के शासन काल तक चोल मन्दिरों का भव्य स्वरूप सामने आया।

इन मंदिरों की प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें मुख्य मंदिर शेष उपमन्दिरों पर आच्छादित सा प्रतीत होता है। इन मंदिरों में गर्भगृह के सामने का ‘अन्तराल’ मुख्य मन्दिर का ही समन्वित अंग है। ‘अन्तराल’ अपने वास्तविक अर्थों में गर्भगृह और सामने के महामण्डप के बीच आने-जाने का मार्ग है। इन मन्दिरों में ‘विमान’ गर्भगृह के ऊपर उठता गया है।

‘उपपीठ’ में कुमुदय का प्रारम्भ अष्ट-भुजा से होता है। बाद में यही ऊपर जाकर गोलाकार हो जाता है। मंदिरों के स्तम्भों में दण्ड और शीर्ष  के बीच ‘पद्मबन्ध’ है। शीर्ष में नीचे की ओर ‘कलश’ है। स्तम्भों के ‘शीर्ष-फलकों’ का विस्तार होता है जिन पर छत टिकती है।

एक वर्गाकार मोटा पत्थर जिसके साथ नीचे की ओर पंखुड़ी की बनावट भी रहती है, स्तम्भ की मुख्य विशेषता हो जाती है। चोल शासक आदित्य (प्रथम) ने कई शैव मन्दिर बनवाए जिनमें सुन्दरेश्वर मन्दिर, कुम्भकोणम का नागेश्वर तथा परान्तक (प्रथम) द्वारा निर्मित निवास नल्लूर का कोरंगनाथ मन्दिर बहुत प्रसिद्ध हुए।

कोरंगनाथ का मन्दिर

परान्तक (प्रथम) के समय का सबसे प्राचीन मन्दिर त्रिचनापल्ली जिले के श्रीनिवासनल्लूर में है। इसे कोरंगनाथ का मन्दिर कहते हैं। इस मन्दिर की लम्बाई 50 फुट है। इसमें 25 फुट गुणा 25 फुट का गर्भगृह और 25 फुट गुणा 25 फुट का मण्डप है। गर्भगृह के ऊपर 20 फुट ऊंचा शिखर है। विमान पर ऊभरी हुई मूर्तियों का प्रचुर अलंकरण है।

इन मूर्तियों में सबसे प्रसिद्ध मूर्ति काली की है। इसके एक ओर सरस्वती एवं दूसरी ओर लक्ष्मी की मूर्ति है। काली के नीचे एक असुर की मूर्ति उत्कीर्ण है। पल्लव कला में सिंह-मुखों के स्थान पर कुछ विचित्र पशुओं के मुख उत्कीर्ण किए गए हैं।

चोल मन्दिरों के दूसरे वर्ग में तीन मन्दिर विशेष उल्लेखनीय है- तंजौर का राजराजेश्वर, गंगईकोण्ड चोलपुरम् का वृहदीश्वर तथा दारासुरम का एरावतेश्वर। ये तीनों मन्दिर द्रविड़ शैली और चोल कला के श्रेष्ठतम उदाहरण हैं।

बृहदीश्वर मन्दिर

चोल शासक राजराज महान् ने तंजौर में बृहदीश्वर नाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था जो बाद में ‘राजराजेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दक्षिण के मन्दिरों में यह सबसे बड़ा तथा ऊंचा है। यह मन्दिर अपने गर्भगृह, मुख्य मण्डप, अर्ध मण्डप और नन्दी मण्डप के साथ 500 फुट लम्बे और 250 फुट चैड़े प्रांगण में स्थित है। सम्पूर्ण मन्दिर एक प्राकार के भीतर बना हुआ है।

इसका ‘गोपुरम्’ पूर्व दिशा में है। ‘मदिल’ से सटी स्तम्भों की पंक्तियां हैं। मंदिर परिसर में 35 उपमन्दिर स्थित हैं। इसका जाति-विमान 190 फुट ऊंचा है और इसका शिखर जंघा के ऊपर बने तेरह तलों में निर्मित है। क्षैतिज रूप में शिखर के प्रत्येक तल पर कूट, शाला और पंजर प्रकृति के लघु शिखरों का हार बना हुआ है। अन्तिम तल के हार पर चार नन्दी भी बने हुए हैं।

 विमान की ग्रीवा अष्टकोणीय है और उस पर विशाल एकाश्म किंतु अष्टकोणीय स्तूपी प्रतिष्ठित है। शिखर का शीर्ष भाग गोले के समान है। इसके चारों ओर चार पंखदार ताक बनाए गए हैं। मन्दिर का जाति विमान आकाश को छूता हुआ प्रतीत होता है। कला की दृष्टि से यह मन्दिर उच्च कोटि का है। द्रविड़़ कला शैली के मन्दिरों में सम्भवतः यह सर्वश्रेष्ठ है।

गंगैकेाण्ड-चोलपुर मन्दिर

राजराज महान् के पुत्र राजेन्द्र चोल ने अपनी नवनिर्मित राजधानी गंगैकोण्ड चोलपुर में एक बृहदीश्वर मन्दिर का निर्माण कराया। यह मंदिर 25 वर्षों में बनकर तैयार हुआ। देखने में यह तंजौर के बृहदीश्वर मन्दिर के सदृश्य है। इसलिए पर्सी ग्राउन ने इसे ‘तंजोर की संगिनी’ की संज्ञा दी है।

दोनों में अन्तर केवल अधिक विस्तार, अलंकरण और ब्यौरे का है। मन्दिर आयताकार है, जिसकी भुजाएं 340 फुट गुणा 100 फुट हैं। इसका शिखर 150 फुट ऊंचा है। मन्दिर को मुख्य रूप से पांचा भागों में बांटा जा सकता है- (1.) गर्भगृह, (2.) अन्तराल (3.) मण्डप (4.) अर्धमण्डप और

(5.) बहिर्भाग। इसका मण्डप 175 फुट लम्बा और 95 फुट चैड़ा है। मण्डप के  उत्तर और दक्षिणी सिरों पर दो भव्य द्वार हैं जिनके दोनों ओर ‘द्वारपालों’ की प्रभावशाली मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह के सम्मुख विशाल मण्डप बना हुआ है जो 240 स्तम्भों पर खड़ा है। यह कक्ष एक चपटी छत से ढका है जिसकी धरती से ऊंचाई 18 फुट है। मन्दिर का विमान 160 फुट ऊंचा है।

इसका आधार 100 फुट गुणा 100 फुट है जो बीच में बनी एक भारी कार्निस के द्वारा दो भागों में विभक्त है। गर्भगृह की दीवारों की ऊंचाई 35 फुट है। इसमें दो मंजिल हैं। विमान का आकार पिरामिडनुमा है। इसमें आठ मंजिलें (तल) हैं। ऊपर की प्रत्येक मंजिल नीचे की मंजिल से छोटी है। तंजौर के मंदिर में मध्य भाग की रेखा सीधी है परन्तु गंगैकोण्ड चोलपुर के मन्दिर के मध्य भाग की रेखा वक्र है।

परिणास्वरूप यह मन्दिर देखने में अधिक सुन्दर लगता है परन्तु इसकी मजबूती कम हो गई है। तंजौर के मन्दिर में शक्ति सन्तुलन और गाम्भीर्य अधिक है। इस मन्दिर में सौन्दर्य और विलास अधिक है।

दारासुरम का मन्दिर

दारासुरम का मन्दिर चोल-पाण्ड्यकालीन है। इस समय तक चोल मन्दिर संरचना विशाल आकार के प्रतीक प्रतिबद्ध न होकर नए तत्त्वों का अन्वेषण करती प्रतीत होती है। इसलिए दारासुरम का मन्दिर न तो अधिक विशाल है और न प्राकार से घिरा हुआ है। इस मन्दिर की कल्पना एक ऐसे रथ के रूप में की गई है जिसे हाथी खींच रहे हैं। इसका जाति-विमान पंचतल है और ऊपरी तल पत्थर के स्थान पर ईंटों से निर्मित है।

चोल मूर्तिकला

चोल शिल्पी अपने समय के उत्कृष्टतम वास्तुकार एवं मूर्तिकार थे। उनकी शैली में सरलता और भव्यता का अपूर्व समन्वय था। उनके द्वारा निर्मित कांस्य मूर्तियाँ अद्वितीय हैं। चोल शिल्पियों ने विशाल मूर्तियों को बनाने के लिए धातु गलाने की उच्च-कोटि की तकनीक विकसित की।

पल्लव और चोल मन्दिर स्थापत्य कला में अंतर

मन्दिर वास्तु के संयोजन की दृष्टि से पल्लव और चोल मन्दिर स्थापत्य कला में कोई विशेष भेद नहीं है परन्तु स्थानीय शैलीगत विशेषताओं के कारण चोल मन्दिर स्थापत्य कला का विशिष्टि महत्त्व है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

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चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- एहोल, वातापी (बादामी) और पट्टडकल। एहोल में लगभग 70 मन्दिर मिले हैं जिनके कारण इस नगर को ‘मन्दिरों का नगर’ कहते हैं। समस्त मन्दिर गर्भगृह और मण्डपों से युक्त हैं परन्तु छतों की बनावट अलग-अलग है।

कुछ मन्दिरों की छतें चपटी हैं तो कुछ की ढलवां। ढलवां छतों पर शिखर भी हैं। स्थापत्य की दृष्टि से ये मंदिर अधिक परिपूर्ण नहीं हैं। चैलुक्यों के प्रारम्भिक मन्दिरों में लालाखां का मन्दिर और दुर्गा मन्दिर विशेष उल्लेखनीय हैं।

वातापी (बादामी) में चालुक्य वास्तुकला का निखरा हुआ रूप देखने को मिलता है। यहाँ पहाड़ को काटकर चार मण्डप बनाए गए हैं जो स्तम्भ युक्त हॉल के समान है। इनमें एक मण्डप जैनियों का है और शेष तीन मण्डप हिन्दू-धर्म के हैं। इनके तीन मुख्य भाग हैं- गर्भगृह, मण्डप और अर्धमण्डप।

पट्टडकल के मन्दिर स्थापत्य की दृष्टि से अधिक सुन्दर हैं। पट्टडकल में आर्य शैली के चार मन्दिर और द्रविड़ शैली के छः मन्दिर बने हुए हैं। आर्य शैली का सर्वाधिक सुन्दर ‘पापनाथ का मन्दिर’ है। द्रविड़ शैली का सर्वाधिक आकर्षक मन्दिर ‘विरूपाक्ष का मन्दिर’ है।

पापनाथ का मन्दिर 90 फुट लम्बा है। मन्दिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य का अन्तराल भी एक मण्डप जैसा प्रतीत होता है। गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है, जो ऊपर की तरफ संकरा होता चला गया है। मन्दिर की बनावट काफी सुन्दर है। विरूपाक्ष मन्दिर चालुक्य मंदिर शैली का अच्छा उदाहरण है। यह 120 फुट लम्बा है। मन्दिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य का अन्तराल काफी छोटा है। मन्दिर के विभिन्न भागों को मूर्तियों से सजाया गया है। हैवेल ने इस मन्दिर के स्थापत्य की प्रशंसा की है।

चालुक्य राजा पुलकेशिन (प्रथम) ने अपनी राजधानी बादामी को अनेक नवीन भवनों एवं मन्दिरों से सजाया। उसके भाई मंगलेश ने कुछ गुहा-मन्दिरों का निर्माण करवाया। विजयादित्य के शासन काल में कला को खूब प्रोत्साहन मिला। उसने पट्टडकल में भगवान शिव का एक सुन्दर मन्दिर बनवाया। कल्याणी के जयसिंह (द्वितीय) ने अपनी राजधानी कल्याणी को सुन्दर भवनों एवं मन्दिरों से सजाया।

सोमेश्वर (प्रथम) ने भी कल्याणी में अनेक निर्माण करवाए। विक्रमादित्य (षष्ठम्) ने ‘विक्रमपुर’ नामक नवीन नगर की स्थापना की और एक विशाल एवं भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया। इस प्रकार चालुक्य राजाओं ने स्थापत्य कला को निरन्तर प्रोत्साहन दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

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दक्षिण भारत की मूर्तिकला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला न केवल दक्षिण के मंदिर स्थापत्य एवं वास्तु आदि का परिचय देती हैं अपितु विभिन्न कालों में दक्षिण भारत की संस्कृति में आ रहे परिवर्तनों की भी सूचना देती है।

दक्षिण भारत के मन्दिरों में मन्दिर की बाहरी दीवारों पर इतनी अधिक मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं कि मन्दिर की वास्तुगत विशिष्टताएं मूर्तियों की चकाचैंध में छिप सी जाती है।  पल्लव मूर्तिकला की जानकारी हमें पहाड़ों की चट्टानों पर उत्कीर्ण मूर्तियों के माध्यम से मिलती है। मामल्ल शैली के मण्डपों में पहाड़ों की चट्टानों पर गंगावरण, शेषशायी विष्णु, महिषासुर वध, वराह-अवतार और गोवर्धन धारण के सुंदर दृश्य उत्कीर्ण किए गए हैं।

इन दृश्यों में नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। मामल्ल शैली के ‘सप्तपेगोडा’ पर देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों और नर-नारियों की बड़ी सुन्दर मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं। रथ मन्दिरों के समान ये मूर्तियाँ भी अद्भुत हैं। गंगा को पृथ्वी पर अवतरित करने वाले भगीरथ की मूर्ति 98 फुट लम्बी और 43 फुट चैड़ी चट्टान को काटकर बनायी गई है। ये मन्दिर और मूर्तियाँ पल्लव शैली की अमर पताकाएं प्रतीत होती हैं।

राष्ट्रकूट मूर्तिकला का परिचय एलौरा के कैलाशनाथ मन्दिर, बौद्ध विहारों एवं जैन मन्दिरों से मिलता है। कैलाशनाथ मन्दिर में उत्कीर्ण इन्द्र-इंद्राणी की मूर्तियाँ तथा रावण द्वारा कैलाश-उत्तोलन का अंकन बहुत ओजस्वी एवं भावपूर्ण है। इस दृश्य में रावण कैलाश को उठा रहा है और भयभीत पार्वती शिव के विशाल भुजदण्ड का सहारा ले रही हैं, पार्वती की सखियां भाग रही हैं; भगवान शिव अचल खड़े हैं और अपने चरणों से कैलाश पर्वत को दबाकर उसे स्थिर कर रहे हैं।

तोरण के दोनों ओर बनाए गए हाथी भी मूर्तिकला की अमूल्य निधियां हैं। इन मूर्तियों की विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। एलिफेण्टा गुफा मन्दिरों में विद्यमान प्रतिमाओं में महेश्वर की त्रिमूर्ति, शिव-ताण्डव और शिव-पार्वती विवाह की मूर्तियाँ अत्यंत भव्य और कलात्मक हैं। इनमें भगवान शिव की तीन मुखों वाली त्रिमूर्ति प्रतिमा सबर्वाधिक प्रसिद्ध है। भगवान के तीनों मुखों पर दिव्य शान्ति का भाव है।

बाशम ने लिखा है- ‘भारतीय देव-प्रतिमाओं में यह त्रिमूर्ति अपनी अनेक विशेषताओं के लिए अद्वितीय कही जाएगी।’ शिव-ताण्डव मूर्ति में पावर्ती का अनुराग भाव अत्यंत सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया गया है।

चोल मन्दिरों में भी मूर्तिकला की अद्भुद छटा दिखाई देती है। मूर्तियों का प्रयोग दीवारों, स्तम्भों, भवनों की कुर्सियों, छतों और अन्य स्थानों को सजाने के लिए हुआ है। चोल मूर्तिकारों ने गर्भगृह की बाहरी दीवारों, मण्डपों, स्तम्भों और गोपुरों पर अत्यधिक संख्या में मूर्तियों को उत्कीर्ण किया है किंतु मूर्तिकला और स्थापत्य में अपूर्व सन्तुलन दिखाई देता है।

चोल मन्दिरों में की यह विशेषता सभी चोल मंदिरों में दिखाई देती है, चाहे वह तंजौर का बृहदीश्वर मन्दिर हो, गंगैकोण्ड-चोलपुरम का राजराजेश्वर मन्दिर हो अथवा दारासुरम का एरातेश्वर मन्दिर। चोल युगीन मूर्तिकला शैव-मत से प्रभावित है।

इनमें शिव, पार्वती और शिव के अनेक रूपों की अभिव्यक्ति हुई है। इन रूपों में विष्णु अनुग्रह, भिक्षाटन, वीरभद्र, दक्षिणा, कंकाल, आलिंगन चन्द्रशेखर, वृषवाहन, त्रिपुरान्तक, कल्याण सुन्दर, कालारि, अर्जुन-अनुग्रह, अर्द्धनारीश्वर, लिंगोद्भव, भैरव, मदनान्तक, रावणानुग्रह और चण्डेशानुग्रह विशेष उल्लेखनीय हैं। चोल-मन्दिर शिव रूपों की लम्बी शृंखला प्रस्तुत करते हैं। शैव-प्रतिमाओं का वर्चस्व होने पर भी वैष्णव धर्म के देवी-देवताओं का भी अंकन प्रचुरता से हुआ है।

चोल मंदिरों में मन्दिर-निर्माता शासकों की प्रतिमाएं भी बनाई गई हैं। तंजौर के बृहदीश्वर मन्दिर में राजाराज महान् और उसकी रानी लोक महादेवी की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। मंदिर की मूर्तिकला में द्वारपालों, ऋषियों, नर्तकों और वादक समूहों को भी स्थान दिया गया है। मंदिरों के द्वारपाल त्रिशूल धारण किए हुए हैं और उनके नेत्र बाहर की ओर निकले हुए हैं।

चोल मन्दिरों की मूर्तियों से उस काल की नृत्य परम्परा की भी जानकारी मिलती है। इन मन्दिरों में भरतनाट्यम् की 108 भंगमिाओं का जीवन्त चित्रण हुआ है। बृहदीश्वर मन्दिर की भित्तियों पर स्वयं शिव के माध्यम से इन नृत्य भंगिमाओं का अंकन किया गया है, जबकि अन्य स्थानों पर नर्तकों को यह नृत्य करते हुए दर्शाया गया है। चिदम्बरम् के गोपुर पर मूर्तियों के साथ उनका परिचय भी लिखा गया है।

प्रारम्भिक चोल-मूर्तियों पर पल्लव-कला का प्रभाव है। दसवीं शताब्दी तक बनी चोल-प्रतिमाएं पल्लव-प्रतिमाओं के समान लम्बी देह-यष्टि और कोमल प्रभाव से युक्त हैं। शरीर की रेखाएं स्वाभाविक एवं गतिशील है और वस्त्र शरीर का आवश्यक अंग जान पड़ते हैं परन्तु इसके बाद के काल की मूर्तियों में चोल-कला पल्लव-कला के प्रभाव से मुक्त हो जाती है।

अब मूर्तियों की देह-यष्टि भारी और मांसल हो जाती है तथा उनकी लम्बाई कम हो जाती है। वस्त्र शरीर से चिपके हुए, आकुचंन-मुक्त और भारहीन प्रतीत होते हैं। आभूषण भी शरीर के सौन्दर्य प्रदर्शन में सहायक हुए हैं तथा बोझिल न होकर हल्के हैं। इन मूर्तियों के मुकुट अत्यधिक अलंकृत और भारी प्रतीत होते हैं। मूर्तियों की गोलाकार मुखकृति, भारी कन्धे, पृथुल होठ और अलंकृत कमरबंध से युक्त पुरुष आकृति विशिष्ट प्रभाव डालती हैं।

लम्बी काया में नारी-मूर्ति के नाभि प्रदेश पर उत्कीर्ण त्रिवली शरीर के लालित्य और गति को स्पष्ट करती है। ये प्रतिमाएं ग्रेनाइट पत्थर से बनी हैं। चोल मूर्तियों में नटराज की प्रधानता है। नागेश्वर के नटराज समस्त नटराजों में सबसे बड़े और सबसे सुन्दर हैं। चोल कलाकारों ने नटराज की अभिव्यक्ति में विशेष दक्षता प्राप्त की।

यद्यपि चोल मूर्तियाँ बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक बनती रहीं किंतु बाद की मूर्तियों में पहले जैसा सौष्ठव दिखाई नहीं देता है। इनसे स्पष्ट होता है कि देश की राजनीतिक परिस्थितियां अपना संतुलन खोती जा रही थीं जिसका प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र एवं कलाओं पर भी पड़ रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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