Wednesday, May 22, 2024
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अध्याय – 39 – दक्षिण भारत का मन्दिर स्थापत्य (ब)

पल्लव मन्दिर

गुप्तकाल एवं उससे पूर्ववर्ती काल में तमिल क्षेत्र को द्रविड़ प्रदेश कहा जाता था। उस काल की मंदिर कला में काष्ठ एवं कंदराओं का अधिक प्रयोग होता था। इसलिए प्रारम्भिक पल्लव शिल्पकारों ने मंदिर निर्माण में उन्हीं प्रणालियों का उपयोग किया।

गुप्तकाल के पराभव के बाद जब छठी शताब्दी ईस्वी में सिंहविष्णु ने कांची एवं महाबलिपुरम् के आस-पास के प्रदेश पर अधिकार करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, तब पल्लव शिल्पकारों ने वास्तुकला में नए प्रयोग किए और मंदिर वास्तुकला को काष्ठकला और कन्दराकला के प्रभाव से मुक्त करने में विपुल सहयोग दिया। इसलिए यह कहना उचित होगा कि मंदिरों की द्रविड़ शैली का जन्म पल्लव शासकों के काल में महाबलिपुरम् और निकटवर्ती प्रदेश में हुआ।

पल्लवकालीन मंदिर वास्तुकला को चार प्रमुख शैलियों में रखा जा सकता है- (1.) महेन्द्रवर्मन शैली, (2.) मामल्ल शैली (3.) राजसिंह शैली और (4.) नन्दिवर्मन शैली।

(1.) महेन्द्रवर्मन शैली

इस शैली का विकास ई.610 से 640 के मध्य हुआ। इस शैली के मंदिरों को मण्डप कहा जाता है। ये मण्डप साधारण स्तम्भ युक्त बरामदे हैं जिनकी पिछली दीवार में एक या अधिक कक्ष बनाये गये हैं। ये कक्ष कठोर पाषाण को काटकर गुहा मंदिर के रूप में बनाये गये हैं।

मण्डप के बाहरी द्वार पर दोनों ओर द्वारपालों की मूर्तियाँ लगाई गई हैं। मण्डप के स्तम्भ सामान्यतः चैकोर हैं। महेन्द्र शैली के मण्डपों में मण्डगपट्टु का त्रिमूर्ति मण्डप, पल्लवरम् का पंचपाण्डव मण्डप, महेन्द्रवाड़ी का महेन्द्र विष्णुगृह मण्डप, मामण्डूर का विष्णु मण्डप विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

(2.) मामल्ल शैली

इस शैली का विकास ई.640 से 674 तक की अवधि में राजा नरसिंहवर्मन (प्रथम) के शासन काल में हुआ। नरसिंहवर्मन ने महामल्ल की उपाधि धारण की थी इसलिये इस शैली को महामल्ल अथवा मामल्ल शैली कहा जाता है। इसी राजा ने मामल्लपुरम् की स्थापना की जो बाद में महाबलीपुरम् कहलाया। इस शैली में दो प्रकार के मंदिरों का निर्माण हुआ है- (1.) मण्डप शैली के मंदिर तथा (2.) रथ शैली के मंदिर।

मण्डप शैली: मण्डप शैली के मंदिर महेन्द्रवर्मन शैली के जैसे ही हैं किंतु मामल्ल शैली में उनका विकसित रूप दिखाई देता है। महेन्द्रवर्मन शैली की अपेक्षा मामल्ल शैली के मण्डप अधिक अलंकृत हैं। इनके स्तम्भ सिंहों के शीर्ष पर स्थित हैं तथा स्तम्भों के शीर्ष मंगलघट आकार के हैं। आदिवराह मण्डप, महिषमर्दिनी मण्डप, पंचपाण्डव मण्डप तथा रामानुज मण्डप विशेष उल्लेखनीय हैं।

रथ शैली: रथ शैली के मंदिर विशाल चट्टानों को काटकर, काष्ठ-रथों की आकृतियों में बनाये गये हैं। इनकी वास्तुकला मण्डप शैली जैसी है। इन रथों का विकास बौद्ध विहार तथा चैत्यगृहों से हुआ है। प्रमुख रथ मंदिरों में द्रोपदी रथ, अर्जुन रथ, नकुल-सहदेव रथ, भीम रथ, धर्मराज रथ, गणेश रथ, पिडारि रथ आदि हैं। ये सब शैव मंदिर हैं। द्रोपदी रथ सबसे छोटा है।

धर्मराज रथ सबसे भव्य एवं प्रसिद्ध है। इसका शिखर पिरामिड के आकार का है। यह मंदिर दो भागों में है। नीचे का खण्ड वर्गाकार है तथा इससे लगा हुआ संयुक्त बरामदा है। यह रथ मंदिर आयताकार तथा शिखर ढोलकाकार है। मामल्ल शैली के रथ मंदिर मूर्तिकला के लिये भी प्रसिद्ध हैं। इन रथों पर दुर्गा, इन्द्र, शिव, गंगा, पार्वती, हरिहर, ब्रह्मा, स्कन्द आदि देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। नरसिंहवर्मन (प्रथम) के साथ ही इस शैली का भी अंत हो गया।

(3.) राजसिंह शैली

नरसिंहवर्मन (द्वितीय) ने राजसिंह की उपाधि धारण की थी। इसलिये उसके नाम पर इस शैली को राजसिंह शैली कहा जाता है। महाबलीपुरम् में समुद्रतट पर स्थित तटीय मंदिर और कांची में स्थित कैलाशनाथ मंदिर तथा बैकुण्ठ पेरुमाल मंदिर इस शैली के प्रमुख मंदिर हैं। इनमें महाबलीपुरम् का तटीय शिव मंदिर पल्लव स्थापत्य एवं शिल्प का अद्भुत स्मारक है।

यह मंदिर एक विशाल प्रांगण में बनाया गया है जिसका गर्भगृह समुद्र की ओर है तथा प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर। इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ तथा सीढ़ीदार शिखर है। शीर्ष पर स्तूपिका निर्मित है। इसकी दीवारों पर गणेश तथा स्कंद आदि देवताओं और गज एवं शार्दुल आदि बलशाली पशुओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।

कांची के कैलाशनाथ मंदिर में राजसिंह शैली का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। इसका निर्माण नरसिंहवर्मन (द्वितीय) के शासन काल में आरंभ हुआ तथा उसके उत्तराधिकारी महेन्द्रवर्मन (द्वितीय) के शासनकाल में पूर्ण हुआ। द्रविड़ शैली की समस्त विशेषतायें इस मंदिर में दिखाई देती हैं। मंदिर में शिव क्रीड़ाओं को अनेक मूर्तियों के माध्यम से अंकित किया गया है।

इस मंदिर के निर्माण के कुछ समय बाद ही बैकुण्ठ पेरुमल का मंदिर बना। इसमें प्रदक्षिणा-पथ युक्त गर्भगृह है तथा सोपान युक्त मण्डप है। मंदिर का विमान वर्गाकार तथा चार मंजिला है जिसकी ऊँचाई लगभग 60 फुट है। प्रथम मंजिल में भगवान विष्ण के विभिन्न अवतारों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर की भीतरी दीवारों पर राज्याभिषेक, उत्तराधिकार चयन, अश्वमेध, युद्ध एवं नगरीय जीवन के दृश्य अंकित किये गये हैं। यह मंदिर पल्लव वास्तुकला का पूर्ण विकसित स्वरूप प्रस्तुत करता है।

(4.) नन्दिवर्मन शैली

इस शैली के मंदिरों में वास्तुकला का कोई नवीन तत्व दिखाई नहीं देता किंतु आकार-प्रकार में ये निरंतर छोटे होते हुए दिखाई देते हैं। इस शैली के मंदिर, पूर्वकाल के पल्लव मंदिरों की प्रतिकृति मात्र हैं। ये मंदिर नंदिवर्मन तथा उसके उत्तराधिकारियों के शासन में बने थे। इस शैली के मंदिरों में स्तम्भ शीर्षों में कुछ विकास दिखाई देता है।

इस शैली के मंदिरों में कांची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मंदिर तथा गुड़ीमल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर उल्लेखनीय हैं। इनमें सजीवता का अभाव है जिससे अनुमान होता है कि इन मंदिरों के निर्माता किसी संकट में थे। दसवीं शताब्दी के अंत तक इन मंदिरों का निर्माण बंद हो गया।

राष्ट्रकूट मन्दिर

राष्ट्रकूट काल में सर्वाधिक प्रसिद्ध एलौरा के कैलाश नाथ मन्दिर का निर्माण हुआ। यह स्थान आन्ध्रप्रदेश के औरंगाबाद नगर से 15 मील की दूरी पर है। इसे राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम (ई.758-773) ने बनवाया था। इसमें गुहा-मन्दिर कला की एक अन्य शैली दिखाई देती है।

गुहामंदिर के निर्माण में परम्परागत रूप से पर्वत के निचले भाग से खुदाई की जाती थी और उसे खोखला करते हुए ऊपर तक जाते थे परन्तु कैलाशनाथ मन्दिर को बनाने के लिए शिल्पकारों ने एक लम्बी पहाड़ी को शीर्ष से तराशना प्रारम्भ करके समूची पहाड़ी को ऊपर से नीचे तक तराश कर मन्दिर के समस्त अंग- छत, द्वार, झरोखे, खिड़कियां, स्तम्भ, तोरण, मण्डप, शिखर, गर्भगृह, चारों ओर के बरामदे आदि बनाए।

इस मन्दिर का विमान समानान्तर चतुर्भज आकार में है। यह 150 फुट लम्बा और 100 फुट चैड़ा है। यह विमान 25 फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। मन्दिर के ऊपर के शिखर की ऊंचाई 95 फुट है। मन्दिर में एक गर्भगृह है जिसके आगे स्तम्भ युक्त मण्डप है, जो 70 फुट लम्बा और 60 फुट चैड़ा है।

इस प्रमुख इमारत के बाद एक नन्दी-मण्डप है जिसके दोनों ओर 51-51 फुट ऊंचे दो ध्वज स्तम्भ हैं। इन पर त्रिशूल स्थापित हैं। मुख्य मन्दिर के चारों ओर बरामदे हैं जिनके चारों ओर स्तम्भ पंक्तियां एवं कक्ष बनाए गए हैं। यह मन्दिर दो-मंजिला है तथा बिना किसी जोड़ के केवल एक चट्टान को तराश कर बनाया गया है।

मन्दिर के स्तम्भों पर प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं, द्वारों पर मनोहर लताएं एवं पुष्प मन्जरियां बनाई गई हैं और शिखर पर शिव-पार्वती विवाह, इन्द्र-इंद्राणी की मूर्तियाँ और रावण द्वारा कैलाश-उत्तोलन आदि पौराणिक कथाओं के दृश्यों का अंकन किया गया है। तोरण के दोनों ओर एक-एक हाथी है।

बम्बई से लगभग 6 मील दूर धारापुरी नामक टापू में दो पहाड़ियों के ऊपरी भाग को काटकर मन्दिर एवं मूर्तियों का निर्माण किया गया है। इन्हें ऐलिफेण्टा की गुफाएं कहते हैं। ये भी राष्ट्रकूट काल में निर्मित मानी जाती हैं।

चोल मंदिर स्थापत्य कला

द्रविड़ मंदिर शैली का चरमात्कर्ष चोलों द्वारा निर्मित मन्दिरों में हुआ। चोलों ने पल्लवों और पाण्ड्यों का स्थान लिया था। इसलिए चोलों ने पल्लवों और पाण्ड्यों की स्थापत्य कला को ही आगे बढ़ाया। चोल शिल्पी अपने समय के उत्कृष्टतम वास्तुकार एवं मूर्तिकार थे। उनकी शैली में सरलता और भव्यता का अपूर्व समन्वय था। उनके द्वारा निर्मित कांस्य मूर्तियाँ अद्वितीय हैं।

उन्होंने विशाल मूर्तियों को बनाने के लिए धातु गलाने की उच्च-कोटि की तकनीक विकसित की। चोल मन्दिरों का निर्माण ई.850 से 1200 तक निरन्तर होता रहा। इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है- (1.) प्रारम्भिक मन्दिर- जिनकी रचना ई.850 से 985 के बीच हुई, (2.) उत्तरवर्ती मन्दिर – जिनकी रचना ई.985 से 1200 के बीच हुई।

मन्दिर वास्तु के संयोजन की दृष्टि से पल्लव और चोल मन्दिरों में कोई विशेष भेद नहीं है परन्तु स्थानीय शैलीगत विशेषताओं के कारण चोल मन्दिरों का विशिष्टि महत्त्व है। प्रारम्भिक चोल मन्दिरों में (1.) विजयालय (2.) भुवनकोणम् (3.) मुकुंदेश्वर (4. कदम्बर (5.) बाला सुब्रह्मण्य (6.) नत्तमलई (7.) कलियपट्टी (8.) त्रिचण्डीश्वर (9.) सुन्दरेश्वर (10.) नागेश्वर (11.) कोरंगनाथ और (12.) अगस्तेश्वर मन्दिर अधिक प्रसिद्ध हैं।

साढ़े तीन सौ साल के चोलों के दीर्घकालीन शासन में समूचा तमिल प्रदेश छोटे-बड़े मन्दिरों से भर गया। चोलों के शासन काल में प्रारम्भ में पत्थरों के भवन एवं बाद में ईंटों के भवन बने। इनमें सबसे पहला चिगलपट्ट जिले का तरूक्कलुक्कुनरम है। इसकी वास्तुकला परवर्ती-पल्लव या पूर्ववर्ती-चोल शैली से मिलती है।

इसके खम्भों के निचले अर्ध-भाग में पैर मोड़कर बैठे सिंह की आकृतियां हैं और खम्भों के शीर्ष पर मोटे शीर्ष-फलक हैं। चोल युग के प्रारम्भ में अपेक्षाकृत लघु मन्दिर बने थे। उनकी बनावट कांची के मुक्तेश्वर एवं बाहुर मन्दिरों के समान है। इसके बाद परांतक (प्रथम) से लेकर राजराजा (प्रथम) के शासन काल तक चोल मन्दिरों का भव्य स्वरूप सामने आया।

इन मंदिरों की प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें मुख्य मंदिर शेष उपमन्दिरों पर आच्छादित सा प्रतीत होता है। इन मंदिरों में गर्भगृह के सामने का ‘अन्तराल’ मुख्य मन्दिर का ही समन्वित अंग है। ‘अन्तराल’ अपने वास्तविक अर्थों में गर्भगृह और सामने के महामण्डप के बीच आने-जाने का मार्ग है। इन मन्दिरों में ‘विमान’ गर्भगृह के ऊपर उठता गया है।

‘उपपीठ’ में कुमुदय का प्रारम्भ अष्ट-भुजा से होता है। बाद में यही ऊपर जाकर गोलाकार हो जाता है। मंदिरों के स्तम्भों में दण्ड और शीर्ष  के बीच ‘पद्मबन्ध’ है। शीर्ष में नीचे की ओर ‘कलश’ है। स्तम्भों के ‘शीर्ष-फलकों’ का विस्तार होता है जिन पर छत टिकती है।

एक वर्गाकार मोटा पत्थर जिसके साथ नीचे की ओर पंखुड़ी की बनावट भी रहती है, स्तम्भ की मुख्य विशेषता हो जाती है। चोल शासक आदित्य (प्रथम) ने कई शैव मन्दिर बनवाए जिनमें सुन्दरेश्वर मन्दिर, कुम्भकोणम का नागेश्वर तथा परान्तक (प्रथम) द्वारा निर्मित निवास नल्लूर का कोरंगनाथ मन्दिर बहुत प्रसिद्ध हुए।

केारंगनाथ का मन्दिर: परान्तक (प्रथम) के समय का सबसे प्राचीन मन्दिर त्रिचनापल्ली जिले के श्रीनिवासनल्लूर में है। इसे कोरंगनाथ का मन्दिर कहते हैं। इस मन्दिर की लम्बाई 50 फुट है। इसमें 25 फुट गुणा 25 फुट का गर्भगृह और 25 फुट गुणा 25 फुट का मण्डप है। गर्भगृह के ऊपर 20 फुट ऊंचा शिखर है। विमान पर ऊभरी हुई मूर्तियों का प्रचुर अलंकरण है।

इन मूर्तियों में सबसे प्रसिद्ध मूर्ति काली की है। इसके एक ओर सरस्वती एवं दूसरी ओर लक्ष्मी की मूर्ति है। काली के नीचे एक असुर की मूर्ति उत्कीर्ण है। पल्लव कला में सिंह-मुखों के स्थान पर कुछ विचित्र पशुओं के मुख उत्कीर्ण किए गए हैं।

चोल मन्दिरों के दूसरे वर्ग में तीन मन्दिर विशेष उल्लेखनीय है- तंजौर का राजराजेश्वर, गंगईकोण्ड चोलपुरम् का वृहदीश्वर तथा दारासुरम का एरावतेश्वर। ये तीनों मन्दिर द्रविड़ शैली और चोल कला के श्रेष्ठतम उदाहरण हैं।

बृहदीश्वर मन्दिर: चोल शासक राजराज महान् ने तंजौर में बृहदीश्वर नाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था जो बाद में ‘राजराजेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दक्षिण के मन्दिरों में यह सबसे बड़ा तथा ऊंचा है। यह मन्दिर अपने गर्भगृह, मुख्य मण्डप, अर्ध मण्डप और नन्दी मण्डप के साथ 500 फुट लम्बे और 250 फुट चैड़े प्रांगण में स्थित है। सम्पूर्ण मन्दिर एक प्राकार के भीतर बना हुआ है।

इसका ‘गोपुरम्’ पूर्व दिशा में है। ‘मदिल’ से सटी स्तम्भों की पंक्तियां हैं। मंदिर परिसर में 35 उपमन्दिर स्थित हैं। इसका जाति-विमान 190 फुट ऊंचा है और इसका शिखर जंघा के ऊपर बने तेरह तलों में निर्मित है। क्षैतिज रूप में शिखर के प्रत्येक तल पर कूट, शाला और पंजर प्रकृति के लघु शिखरों का हार बना हुआ है। अन्तिम तल के हार पर चार नन्दी भी बने हुए हैं।

 विमान की ग्रीवा अष्टकोणीय है और उस पर विशाल एकाश्म किंतु अष्टकोणीय स्तूपी प्रतिष्ठित है। शिखर का शीर्ष भाग गोले के समान है। इसके चारों ओर चार पंखदार ताक बनाए गए हैं। मन्दिर का जाति विमान आकाश को छूता हुआ प्रतीत होता है। कला की दृष्टि से यह मन्दिर उच्च कोटि का है। द्रविड़़ कला शैली के मन्दिरों में सम्भवतः यह सर्वश्रेष्ठ है।

गंगैकेाण्ड-चोलपुर मन्दिर: राजराज महान् के पुत्र राजेन्द्र चोल ने अपनी नवनिर्मित राजधानी गंगैकोण्ड चोलपुर में एक बृहदीश्वर मन्दिर का निर्माण कराया। यह मंदिर 25 वर्षों में बनकर तैयार हुआ। देखने में यह तंजौर के बृहदीश्वर मन्दिर के सदृश्य है। इसलिए पर्सी ग्राउन ने इसे ‘तंजोर की संगिनी’ की संज्ञा दी है।

दोनों में अन्तर केवल अधिक विस्तार, अलंकरण और ब्यौरे का है। मन्दिर आयताकार है, जिसकी भुजाएं 340 फुट गुणा 100 फुट हैं। इसका शिखर 150 फुट ऊंचा है। मन्दिर को मुख्य रूप से पांचा भागों में बांटा जा सकता है- (1.) गर्भगृह, (2.) अन्तराल (3.) मण्डप (4.) अर्धमण्डप और

(5.) बहिर्भाग। इसका मण्डप 175 फुट लम्बा और 95 फुट चैड़ा है। मण्डप के  उत्तर और दक्षिणी सिरों पर दो भव्य द्वार हैं जिनके दोनों ओर ‘द्वारपालों’ की प्रभावशाली मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह के सम्मुख विशाल मण्डप बना हुआ है जो 240 स्तम्भों पर खड़ा है। यह कक्ष एक चपटी छत से ढका है जिसकी धरती से ऊंचाई 18 फुट है। मन्दिर का विमान 160 फुट ऊंचा है।

इसका आधार 100 फुट गुणा 100 फुट है जो बीच में बनी एक भारी कार्निस के द्वारा दो भागों में विभक्त है। गर्भगृह की दीवारों की ऊंचाई 35 फुट है। इसमें दो मंजिल हैं। विमान का आकार पिरामिडनुमा है। इसमें आठ मंजिलें (तल) हैं। ऊपर की प्रत्येक मंजिल नीचे की मंजिल से छोटी है। तंजौर के मंदिर में मध्य भाग की रेखा सीधी है परन्तु गंगैकोण्ड चोलपुर के मन्दिर के मध्य भाग की रेखा वक्र है।

परिणास्वरूप यह मन्दिर देखने में अधिक सुन्दर लगता है परन्तु इसकी मजबूती कम हो गई है। तंजौर के मन्दिर में शक्ति सन्तुलन और गाम्भीर्य अधिक है। इस मन्दिर में सौन्दर्य और विलास अधिक है।

परवर्ती चोल काल (ई.1070-1250) में भी मन्दिरों का निर्माण उसी गति से होता रहा। इन मन्दिरों में दो प्रमुख हैं- (1.) तंजौर जिले में स्थित कंपहेश्वर (त्रिभुवनाविरेश्वर) का मन्दिर और (2.) तंजौर जिले में ही दारासुरम का एरावतेश्वर मन्दिर।

दारासुरम का मन्दिर चोल-पाण्ड्यकालीन है। इस समय तक चोल मन्दिर संरचना विशाल आकार के प्रतीक प्रतिबद्ध न होकर नए तत्त्वों का अन्वेषण करती प्रतीत होती है। इसलिए दारासुरम का मन्दिर न तो अधिक विशाल है और न प्राकार से घिरा हुआ है। इस मन्दिर की कल्पना एक ऐसे रथ के रूप में की गई है जिसे हाथी खींच रहे हैं। इसका जाति-विमान पंचतल है और ऊपरी तल पत्थर के स्थान पर ईंटों से निर्मित है।

चालुक्य मंदिर स्थापत्य कला

चालुक्यों के शासन काल में कला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- एहोल, वातापी (बादामी) और पट्टडकल। एहोल में लगभग 70 मन्दिर मिले हैं जिनके कारण इस नगर को ‘मन्दिरों का नगर’ कहते हैं। समस्त मन्दिर गर्भगृह और मण्डपों से युक्त हैं परन्तु छतों की बनावट अलग-अलग है।

कुछ मन्दिरों की छतें चपटी हैं तो कुछ की ढलवां। ढलवां छतों पर शिखर भी हैं। स्थापत्य की दृष्टि से ये मंदिर अधिक परिपूर्ण नहीं हैं। चैलुक्यों के प्रारम्भिक मन्दिरों में लालाखां का मन्दिर और दुर्गा मन्दिर विशेष उल्लेखनीय हैं।

वातापी (बादामी) में चालुक्य वास्तुकला का निखरा हुआ रूप देखने को मिलता है। यहाँ पहाड़ को काटकर चार मण्डप बनाए गए हैं जो स्तम्भ युक्त हॉल के समान है। इनमें एक मण्डप जैनियों का है और शेष तीन मण्डप हिन्दू-धर्म के हैं। इनके तीन मुख्य भाग हैं- गर्भगृह, मण्डप और अर्धमण्डप।

पट्टडकल के मन्दिर स्थापत्य की दृष्टि से अधिक सुन्दर हैं। पट्टडकल में आर्य शैली के चार मन्दिर और द्रविड़ शैली के छः मन्दिर बने हुए हैं। आर्य शैली का सर्वाधिक सुन्दर ‘पापनाथ का मन्दिर’ है। द्रविड़ शैली का सर्वाधिक आकर्षक मन्दिर ‘विरूपाक्ष का मन्दिर’ है।

पापनाथ का मन्दिर 90 फुट लम्बा है। मन्दिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य का अन्तराल भी एक मण्डप जैसा प्रतीत होता है। गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है, जो ऊपर की तरफ संकरा होता चला गया है। मन्दिर की बनावट काफी सुन्दर है। विरूपाक्ष मन्दिर चालुक्य मंदिर शैली का अच्छा उदाहरण है। यह 120 फुट लम्बा है। मन्दिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य का अन्तराल काफी छोटा है। मन्दिर के विभिन्न भागों को मूर्तियों से सजाया गया है। हैवेल ने इस मन्दिर के स्थापत्य की प्रशंसा की है।

चालुक्य राजा पुलकेशिन (प्रथम) ने अपनी राजधानी बादामी को अनेक नवीन भवनों एवं मन्दिरों से सजाया। उसके भाई मंगलेश ने कुछ गुहा-मन्दिरों का निर्माण करवाया। विजयादित्य के शासन काल में कला को खूब प्रोत्साहन मिला। उसने पट्टडकल में भगवान शिव का एक सुन्दर मन्दिर बनवाया। कल्याणी के जयसिंह (द्वितीय) ने अपनी राजधानी कल्याणी को सुन्दर भवनों एवं मन्दिरों से सजाया।

सोमेश्वर (प्रथम) ने भी कल्याणी में अनेक निर्माण करवाए। विक्रमादित्य (षष्ठम्) ने ‘विक्रमपुर’ नामक नवीन नगर की स्थापना की और एक विशाल एवं भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया। इस प्रकार चालुक्य राजाओं ने स्थापत्य कला को निरन्तर प्रोत्साहन दिया।

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