मुहम्मद अली जिन्ना ने पंजाब और बंगाल में लगभग पांच लाख भारतीयों का रक्त बहाकर पाकिस्तान तो पा लिया किंतु न तो जिन्ना का पाकिस्तान किसी काम का नहीं था!
पाकिस्तान बनने के बाद मुहम्मद अली जिन्ना एकांतप्रिय और चिड़चिड़ा हो गया। राष्ट्र का बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा अधिकार उसने अपने हाथों में रखा हुआ था।
जिन्ना के सैन्य-सचिव कर्नल बर्नी ने अपनी डायरी में लिखा है- ‘जिन्ना की दशा उस बच्चे जैसी हो गई थी जिसे किसी चमत्कारवश चांद मिल गया हो और अब वह एक पल के लिए भी उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।
…… भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान सरकार को दी गई काम चलाऊ अग्रिम राशि शीघ्र ही समाप्त हो गई। इसलिए भारत से भाग-भाग कर पाकिस्तान आए कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर दी गई। जिन्ना को वह अपमान सहना पड़ा जो उस जैसे गर्वीले व्यक्ति के लिए शर्म से डूब मरने वाली बात थी।
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…… पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना की सरकार ने ब्रिटिश ओवरसीज एयर कार्पोरेशन से एक हवाई जहाज चार्टर किया जो शरणार्थियों के वहन में उपयोग हुआ था। सरकार ने उस कार्पोरेशन के भुगतान का एक चैक जारी किया जो बाउंस हो गया। क्योंकि खाते में उतनी रकम नहीं थी।’
1947 में नए प्रधानमंत्री और कैबीनेट की शपथ ग्रहण के एक सप्ताह बाद जब पाकिस्तान में लोग रमजान के बाद ईद-उल-फित्र की पहली छुट्टी मना रहे थे, तब जिन्ना ने उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत की जनमत से चुनी गई सरकार को अपदस्थ कर दिया। सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. खान के पास पर्याप्त बहुमत था किंतु जिन्ना ने वहाँ अपनी पार्टी की सरकार बनवा दी। जब जिन्ना द्वारा बनवाई गई सरकार प्रांतीय विधान सभा में विश्वास मत प्राप्त करने में असफल रही तो जिन्ना ने सभी बर्खास्त सदस्यों को गिरफ्तार करवा दिया और इस तरह से कृत्रिम बहुमत तैयार किया गया। ……. नौ माह बाद जिन्ना ने सिंध प्रांत की सरकार को अपदस्थ किया जो स्वयं उनके दल की थी। इसके बाद जिन्ना ने पंजाब सूबे की सरकार के राजमहल में तख्ता पलट करने का प्रयास किया।
जिन्ना द्वारा भारत को बदनाम करने के प्रयास
किसी समय हिन्दू-मुस्लिम एकता का दूत माने जाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने जीवन की अधिकतम ऊर्जा पाकिस्तान प्राप्त करने में लगाई। केवल एक वही था जिसकी वजह से पाकिस्तान का निर्माण होकर रहा किंतु जब पाकिस्तान का निर्माण हो गया तब जिन्ना ने भारत पर पाकिस्तान से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं रखने का आरोप लगाया। पाकिस्तान बनने के सात माह बाद उसने पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत पॉल एलिंग से कहा कि उसकी (जिन्ना की) इच्छा थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच वैसा ही सहयोग रहे जैसा अमरीका और कनाडा के बीच रहता है।
पॉल एलिंग ने वाशिंगटन भेजे गए अपने डिप्लोमेटिक टेलिग्राम में लिखा कि जिन्ना ने पाकिस्तान की भारत के साथ सैन्य स्तर पर ऐसी रक्षात्मक साझेदारी की चर्चा की जिसकी कोई तय सीमा नहीं थी। ये उसी तरह की साझेदारी होती जैसी कि अमेरिका ओर कनाडा के बीच है, जिसमें दो पड़ौसियों के बीच मोटे तौर पर बिना पहरे वाली सीमा होती, साझा सैन्यबल होता, मुक्त व्यापार होता और तमाम रास्तों के जरिए एक दूसरे के इलाके में दाखिल होने की आजादी होती।
पाकिस्तान से मुहम्मद अली जिन्ना का मोहभंग शीघ्र ही हो गया। उसके अनुयायी जिस तरह का पाकिस्तान बना रहे थे, जिन्ना ने उस तरह के पाकिस्तान की कल्पना नहीं की थी। इस कारण अब जिन्ना पाकिस्तान छोड़कर भारत लौटना चाहता था किंतु वापसी के सारे रास्ते वह स्वयं ही बंद करके गया था। जिन्ना के मुसलमानों ने हिन्दुओं और सिक्खों का जितना खून बहाया था उतना खून तो हूणों और मंगोलों भी हिन्दुओं और बौद्धों का नही बहाया था।
पाकिस्तान बन जाने के बाद भी जिन्ना के लोग भारत की छुंरी में पीठ भौंकने से नहीं चूक रहे थे। इस पर भी पाकिस्तान के लेखक सदैव भारत को हमलावर और स्वयं को पाकसाफ बताते रहे। संयुक्त राज्य अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने लिखा है-
‘ब्रिटिश-भारत से निकले इन दोनों स्वतंत्र उपनिवेशों के बीच दोस्ताना रिश्तों के अपने वादे की हिफाजत जिन्ना ने लगातार मरते दम तक की। उन्हें बंटवारे के दौरान होने वाली हिंसा का अंदाजा नहीं था जिसको ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और अकाली दल की बयानबाजियों ने भड़काया था।
…….. पाकिस्तान को धार्मिक राष्ट्र बनाने की बजाय धर्मनिरपेक्षता को इसके लिए उपयुक्त माना। …….. जिन्ना इस बात के लिए भी इच्छुक थे कि भारत और पाकिस्तान लगातार एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते न रहें।
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…… उन्होंने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल पद से रिटायर होने के बाद मुंबई के अपने पैतृक घर पर लौटने की इच्छा भी जताई थी।’ दिसम्बर 1947 में कराची में ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की बैठक हुई। 450 सदस्यों में से केवल 300 सदस्यों ने इस बैठक में भाग लिया। इस बैठक में एक सदस्य ने जानना चाहा कि क्या जिन्ना फिर से भारत के मुसलमानों का नेतृत्व अपने हाथों में लेना चाहेंगे? जिन्ना ने तुरन्त जवाब दिया- ‘यदि परिषद् ऐसा फैसला लेगी तो मैं भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व करने तथा उनकी कठिनाइयों को बांटने के लिए तुरन्त भारत लौट जाऊंगा।
…… हिन्दुस्तान में एक मुस्लिम लीग अवश्य होना चाहिए। यदि आप लीग को समाप्त करने का विचार कर रहे हैं तो आप ऐसा कर सकते हैं; परन्तु मुझे लगता है कि यह एक बड़ी भूल होगी। मैं जानता हूँ कि वहाँ (भारत में) कुछ प्रयास हो रहा है। मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा अन्य लोग भारत में मुसलमानों की पहचान समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा मत होने दीजिए। ऐसा मत कीजिए।’
जिन्ना के पाकिस्तान चले जाने के बाद भी भारत सरकार ने जिन्ना का बंबई के माउंट प्लीजेंट रोड पर स्थित बंगला अधिग्रहीत नहीं किया था। इसे लेकर संविधान सभा के भीतर एवं बाहर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से बड़े अटपटे प्रश्न पूछे जाते थे। अंततः नेहरू ने पाकिस्तान में हिंदुस्तान के पहले उच्चायुक्त श्रीप्रकाश से टेलिफोन पर कहा कि जिन्ना के बंगले को लेकर उनकी सरकार की स्थिति बहुत संकोच-जनक होती जा रही है।
इसलिए वे जिन्ना से मिलकर, इस बारे में उनकी ख्वाहिश का पता कर लें और यह भी जानकारी लें कि वे उस बंगले का कितना किराया चाहेंगे? श्रीप्रकाश ने जिन्ना से जब यह पूछा तो वह अवाक रह गए। फिर लगभग कातर स्वर में कहा- ‘श्रीप्रकाश, जवाहरलाल से कहो, वे मेरा दिल न तोड़ें, शायद तुम नहीं जानते हो कि बंबई को मैं कितना प्यार करता हूँ। अभी भी मेरी मंशा बंबई लौटकर उसी बंगले में रहने की है।’
श्रीप्रकाश जिन्ना के पास वकालात का प्रशिक्षण ले चुके थे और उसके स्नेहभाजन थे। जिन्ना के कहने पर ही नेहरू ने उन्हें पाकिस्तान में भारत का पहला उच्चायुक्त नियुक्त किया था। ….. जिन्ना के मन में कहीं गहरे विभाजन का अंतर्द्वन्द्व चल रहा था। चाहे-अनचाहे पाकिस्तान जो शकल अख्तियार करने लगा था, वह उनकी गंभीर चिंता का सबब बनता जा रहा था। पाकिस्तान से जिन्ना का मोहभंग हो चुका था।
जिन्ना के अंतिम दिनों के संस्मरण में ले. कर्नल डॉ. इलाहीबक्श ने लिखा है कि गहरी उदासी के आलम में जिन्ना ने उनसे कहा था, डॉक्टर पाकस्तिान मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल है।
दिसम्बर 1947 में कराची में हुई ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की बैठक में भारत एवं पाकिस्तान के लिए दो स्वतंत्र मुस्लिम लीग गठित करने का निर्णय लिया गया। ई.1934 से मुहम्मद अली जिन्ना ही ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का अध्यक्ष था किंतु अब जिन्ना ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग का अध्यक्ष रह गया। ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग के लिए दूसरे अध्यक्ष की तलाश की गई।
पाकिस्तान मुस्लिम लीग भी पाकिस्तान की राजनीति में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकी।
पाकिस्तान ने लिया गांधीजी का बलिदान
जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ, उस समय दोनों देशों के सैनिक, आर्थिक एवं वित्तीय संसाधनों का भी बंटवारा किया गया। अखण्ड भारत के जो प्रांत पाकिस्तान में मिलने वाले थे, उन प्रांतों पर भारत सरकार का 300 करोड़ रुपए का कर्ज था जो उन प्रांतों द्वारा भारत सरकार को लौटाया जाना था।
यह तय किया गया कि पाकिस्तान इस कर्ज को चार साल में चुकाएगा। विभाजन के समझौते के अनुसार भारत के प्रति पाकिस्तान की देनदारियां 300 करोड़ रुपए थीं। यह राशि 15 अगस्त 1952 के बाद 50 समान किश्तों में पाकिस्तान द्वारा भारत को चुकाई जानी थी।
पाकिस्तान इस ऋण-अदायगी के लिए प्रतिवर्ष अपने बजट में 7.5 करोड़ रुपये का प्रावधान करता था किंतु उसने यह राशि भारत को कभी नहीं चुकाई। दूसरी तरफ पाकिस्तान भारत से प्रतिरक्षा भण्डारों के बदले में 55 करोड़ रुपए मांगता था।
गोपाल गोडसे ने लिखा है कि भारत सरकार की तरफ से पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपए दिए जाने थे जिसमें से 20 करोड़ रुपए तुरंत ही पाकिस्तान को दे दिए गए। शेष 55 करोड़ रुपए तब दिए जाने थे जब कि पाकिस्तान में जा रहे प्रांत अपना कर्ज भारत सरकार को चुका देंगे। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा भारत सरकार से 55 करोड़ रुपए की मांग की। इस पर सरदार पटेल ने कहा कि पाकिस्तान को यह राशि काश्मीर समस्या का समाधान होने के बाद दी जाएगी।
पटेल का कहना था कि पाकिस्तान इस राशि का उपयोग भारत के विरुद्ध हथियार खरीदने में करेगा। नेहरू मंत्रिमण्डल ने पटेल के इस निर्णय पर स्वीकृति दे दी। जिन्ना ने इस राशि के लिए माउंटबेटन पर दबाव डाला। माउंटबेटन ने गांधीजी से कहा कि वे नेहरू और पटेल से बात करके पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाएं। पटेल ने गांधीजी को साफ इन्कार कर दिया तो गांधीजी 13 जनवरी 1948 को पटेल के विरुद्ध दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए। गांधीजी के उपवास का निर्णय पटेल को भाया नहीं और वे दिल्ली छोड़कर बम्बई चले गए।
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उपवास तोड़ने की जो शर्तें गांधीजी ने रखी थीं, उन्हें देश की जनता ने पसंद नहीं किया। पाकिस्तान को 55 करोड़ की रकम बिना शर्त, अविलम्ब दे दी जाए। उनके इस आग्रह ने असंख्य व्यक्तियों को आक्रोश से भर दिया। 12 जनवरी 1948 को पत्रकारों के बीच सरदार पटेल ने एक वक्तव्य दिया-
‘काश्मीर पर आक्रमण के प्रतिरोध की प्रक्रिया के रूप में इस संधि की कार्यवाही को अभी स्थगित करके हमने न्यायोचित कार्य किया है। हम इस संधि के प्रति निष्ठावान हैं, वचनबद्ध हैं, यह हमने पाकिस्तान शासन को एक बार नहीं, अनेक बार कहा है किंतु इस संधि में रुपया देने की निश्चित अवधि जैसा कोई बन्धन हमारे ऊपर नहीं है। पाकिस्तान ने अपनी सेना की सहायता से हमसे सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है और उसके और अधिक विस्तार की भयानक संभावना है। ऐसी अवस्था में संधि का दुरुपयोग संभव है। ऋण के उत्तरदायित्व को स्वीकार करना, और सम्पत्ति का बंटवारा करना जैसे संधि में समाविष्ट अनुबन्धों पर उसका विपरीत परिणाम होगा। उस दशा में पाकिस्तान किसी भी प्रकार से सन्धि की शेष राशि प्राप्त करने के लिए अपनी मांग न्याय-संगत रूप से प्रस्तुत नहीं कर सकेगा। ‘
गांधीजी के दबाव में नेहरू ने 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दे दिए। विचित्र स्थिति थी, जिस देश से हिन्दुओं की कटी हुई लाशों की ट्रेनें आ रही थीं और जो देश भारत के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा था, भारत उसी देश को 55 करोड़ रुपए दे रहा था जबकि अभी तक पाकिस्तान के प्रांतों का 300 करोड़ रुपए का कर्ज वापिस लौटना बाकी था। उन्हीं दिनों गांधीजी ने घोषणा की कि वे जिन्ना को मनाने के लिए एक डेलिगेशन के साथ भारत-पाकिस्तान की सीमा पार करके पाकिस्तान जाएंगे ताकि पाकिस्तान को पुनः भारत में मिलाया जा सके।
गांधीजी ने बम्बई के कपास व्यापारी जहांगीर पटेल को पाकिस्तान भेजा ताकि वह जिन्ना से मिलकर गांधीजी की पाकिस्तान यात्रा का प्रबंध कर सके। …… भारत से पैदल चलकर पाकिस्तान पहुंचना और वहाँ भी हर जगह पैदल ही घूमना, इस उपाय से गांधीजी निःसंदेह एक विलक्षण आध्यात्मिक आभा का प्रकाशन करते किंतु उस समय उनके पैरों में इतनी भी शक्ति नहीं थी कि उठकर बिड़ला हाउस के लॉन तक जा सकते।
उन्हीं दिनों एक और घटना हुई। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिन्दू शरणार्थी अपना सर्वस्व गांवाकर भारत आ रहे थे, उनमें से बहुत से हिन्दू दिल्ली भी आए और उन्होंने हिन्दू मंदिरों, गुरुद्वारों तथा स्कूलों में शरण ली। जब दिल्ली के समस्त सार्वजनिक स्थल शरणार्थियों से भर गए तो पाकिस्तान से आए कुछ हिन्दू शरणार्थी दिल्ली की एक मस्जिद में घुस गए। जब गांधीजी को यह ज्ञात हुआ तो वे मस्जिद के सामने धरने पर बैठ गए और शरणार्थियों से मस्जिद खाली करवाने के लिए सरकार पर दवाब बनाने लगे।
सरकार को हिन्दू शरणार्थियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करनी पड़ी। जिस समय हिन्दू शरणार्थियों को मस्जिद से उठाकर फैंका जा रहा था, उस समय दिल्ली में तेज बारिश हो रही थी जिसके कारण औरतें और बच्चे ठण्ड से ठिठुरने तथा रोने लगे। कहा जाता है कि महाराष्ट्र से दिल्ली आए नाथूराम गोडसे नामक एक युवा पत्रकार ने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा। हिन्दू बच्चों को अपने ही देश में पिटते, रोते और ठण्ड तथा भूख से कांपते देखकर गोडसे का मन रोने लगा। उसने गांधीजी का वध करने का प्रण लिया।
30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने अपना प्रण पूरा किया और दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधीजी को गोली मार दी। गोडसे ने अपने कृत्य को गांधी वध बताते हुए, इसका निर्णय इतिहास पर छोड़ दिया कि अगर भविष्य में तटस्थ इतिहास लिखा जाएगा तो वह अवश्य ही गोडसे के साथ न्याय करेगा।
जिस प्रकार गांधीजी भारत में अधिक दिन जीवित नहीं रह सके, जिस प्रकार मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सका, उसी प्रकार पाकिस्तान मुस्लिम लीग भी पाकिस्तान की राजनीति में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकी।
पाकिस्तान का जनक मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान को अपनी रचना समझता था तथा निरंकुश शासक की तरह व्यवहार करता था इसलिए पाकिस्तान बनने के कुछ ही समय बाद जिन्ना के साथियों ने जिन्ना की उपेक्षा करनी आरम्भ कर दी। इस कारण जिन्ना का पाकिस्तान से मोहभंग हो गया था। इस सम्बन्ध में कुछ चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं।
पाकिस्तानी पत्रकार जमर नियाजी ने अपनी पुस्तक ‘प्रेस इन चेन्स’ में लिखा है-
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‘अपने द्वारा निर्मित किए गए पाकिस्तान से जिन्ना का पूरी तरह से मोह भंग हो चुका था। लियाकत अली खाँ ने जिन्ना के निर्देशों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी थी। इस सब ने जिन्ना को बिना बात के लियाकत अली खाँ को झिड़कने के लिए उकसाया और उसने (जिन्ना ने) निराशा में यह भी कह दिया कि वह (जिन्ना) वापस जाकर नेहरू से कहना पसंद करेगा कि अतीत को भूलकर फिर से साथ हो जाएँ। जिन्ना का फिजीशियन जो इस घटना का साक्षी था, ने इस कथन को प्रमाणित किया है। यह बीमार जिन्ना के दुःखद अंत के कुछ दिन पहले की बात है।’
30 अक्टूबर 1947 को जिन्ना ने लाहौर में कहा- ‘कुछ लोग जरूर यह सोच सकते हैं कि 3 जून की योजना का अंगीकरण मुस्लिम लीग की एक भूल थी।’ जिन्ना ने भारत विभाजन के समय लाखों लोगों की मौत एवं विशाल सम्पत्ति की बर्बादी के लिए उकसाने वाली अव्यवस्था के लिए सेनाओं को दोषी ठहराया। अंत में मौतों का स्प्ष्टीकरण देते हुए जिन्ना ने कहा- ‘हमारा मजहब हमें सिखाता है कि हमें मौत के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। एक धार्मिक कारण के लिए शहीद की मौत से अधिक बेहतर उद्धार मुसलमानों के लिए कोई नहीं है।’
पाकिस्तान को नकार दिया जिन्ना की बेटी ने
मुहम्मद अली जिन्ना की पुत्री दीना वाडिया भारत-पाक विभाजन के बाद अपने पिता के साथ पाकिस्तान नहीं गई जो कि पाकिस्तान का गवर्नर जनरल था। उसने ई.1938 में एक भारतीय पारसी युवक नेविले वाडिया से विवाह कर लिया था। इसलिए वह अपने पति के साथ भारत में ही रही तथा अपनी मृत्यु होने तक साधारण नागरिक की हैसियत से भारत के बम्बई शहर में ही रहती रही। उसे अपने पिता के पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं था।
जिन्ना की बीमारी
जिन्ना को ई.1941 से फेंफड़ों का संक्रमण तथा खांसी रहती थी। वह सिगरेट बहुत पीता था। इस कारण उसे क्षय रोग हो गया था और उसका जीवन अधिक नहीं बचा था किंतु उसने अपनी बीमारी को इस तरह छिपाए रखा कि इस बात को उसके निजी चिकित्सक के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था। पाकिस्तान बनने के कुछ दिन बाद ही उसकी बीमारी बढ़ गई।
जिन्ना की मृत्यु
जब जिन्ना की तबियत अधिक खराब होने लगी तो 14 जुलाई 1948 को उसे स्वास्थ्य लाभ के लिए बलूचिस्तान में स्थित जियारत नामक स्थान पर ले जाया गया। वहाँ भी जब स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ तो उसे 13 अगस्त 1948 को क्वेटा ले जाया गया। 5 सितम्बर से उसकी हालत और अधिक बिगड़ने लगी तथा 11 सितम्बर को उसे गवर्नर जनरल के विशेष विमान से क्वेटा से कराची लाया गया। जहाँ से उसे एक एम्बुलेंस में लिटाकर उसके पैतृक निवास ले जाया गया। 11 सितम्बर 1948 को ही रात में जिन्ना का निधन हो गया। इस प्रकार पाकिस्तान बने अभी ठीक से तेरह महीने भी नहीं हुए थे कि 11 सितम्बर 1948 को जिन्ना का निधन हो गया। ऐसा लगता था कि इस धरती पर वह जैसे पाकिस्तान बनाने के लिए ही आया हो। काम खत्म, जिंदगी खत्म।
लियाकत अली द्वारा मुहम्मद अली की उपेक्षा
जिन्ना की बहिन फातिमा जिन्ना ने अपनी पुस्तक ‘माई ब्रदर’ में लिखा है- ‘जब बीमार जिन्ना कराची हवाई अड्डे पर पहुंचा तो उसका स्वागत करने के लिए कोई वहाँ कोई उपस्थित नहीं था। …… ऐसा लियाकत अली के निर्देश पर हुआ। जिन्ना सड़क पर दो घण्टे से अधिक असहाय अवस्था में पड़ा रहा क्योंकि रास्ते में एम्बुलेंस खराब हो गई थी।’
यह सब जिन्ना और लियाकत अली के बीच गहरी दरार के संकेत थे। पाकिस्तान में नियुक्त भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त श्रीप्रकाश ने लिखा है- ‘दरअसल जिन्ना की मौत तो क्वेटा में ही हो गई थी। जिन्ना के शव को कराची स्थित उसके पैतृक निवास पर पहुंचने के बाद भी आधी रात तक प्रधानमंत्री लियाकत अली सहित किसी को भी जिन्ना की मृत्यु के बारे में नहीं बताया गया।’
यदि जिन्ना दो वर्ष पहले मर जाता
बहुत से लेखकों ने यह मुद्दा उठाया है कियदि भारतीय नेताओं को यह बात पता चल गई होती तो वे भारत की आजादी की जल्दी मचाने की बजाय कुछ दिन शांति से बैठकर जिन्ना की मृत्यु की प्रतीक्षा करते और उसी के साथ भारत विभाजन का खतरा सदैव के लिए टल जाता। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर के साथ एक साक्षात्कार में स्वयं लॉर्ड माउण्टबेटन ने यह बात स्वीकार की।
माउण्टबेटन ने कहा- ‘अगर जिन्ना दो वर्ष पहले अपनी बीमारी से मर जाते तो हम भारत को एक रख सकते थे। वही थे जिन्होंने इसे (भारत की अखण्डता को) असम्भव बना दिया था। जब तक मैं जिन्ना से मिला नहीं, मैं सोच भी नहीं सकता था कि कितनी असम्भव स्थिति है।’
ऐसा नहीं था कि केवल जिन्ना का ही पाकिस्तान से मोहभंग हुआ था, पाकिस्तान से मोहभंग की स्थिति अन्य कई नेताओं की थी। उन सबके अलग-अलग कारण थे। कुछ मुसलमान नेताओं की सम्पत्तियां भारत में रह गई थीं, अब वे उन सम्पत्तियों को याद करके पछताते थे। कुछ मुसलमानों के रिश्तेदार एवं परिवार के सदस्य भारत में ही रह गए थे। इस कारण उनका भी पाकिस्तान से मोहभंग हो गया था।
मण्डल जैसे कुछ दलित नेता जो हिन्दुओं से दूर भागकर पाकिस्तान में आए थे, पाकिस्तान के मुसलमान उनके हाथ का पानी पीने को तैयार नहीं थे, इसलिए उनका भी पाकिस्तान से मोहभंग हो गया था।
पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना ने भारत में जिस हिंसक राजनीति का आविष्कार किया था, जिन्ना के उत्तराधिकारी उसी लकीर पर आगे बढ़े। इसमें आश्चर्य करने जैसा कुछ भी नहीं था। जिन्ना के उत्तराधिकारी वस्तुतः न केवल उसकी राजनीतिक विरासत के अधकारी थी अपितु उसके विचारों के भी उत्तराधिकारी थे।
पाकिस्तानी नेताओं का इस्लाम खतरे में !
पाकिस्तान के नेताओं के पास पाकिस्तान की जनता को एक रखने और मुस्लिम लीग के नियंत्रण में बनाए रखने के लिए किसी उत्तेजक एवं सनसनीखेज मुद्दे की आवश्यकता थी जो पाकिस्तान के मुसलमानों के लिए योजक सामग्री का काम कर सके। इसलिए पाकिस्तान के मुस्लिम लीगी नेता, पाकिस्तान की जनता को भारत का नाम लेकर डराने लगे।
भारत उनका पानी रोक रहा है, भारत उनका गोला-बारूद रोक रहा है, भारत उनका रुपया रोक रहा है, भारत ने उनका काश्मीर छीन लिया है, भारत ने हैदराबाद, भोपाल और जूनागढ़ पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया है, भारत किसी भी समय पाकिस्तान पर आक्रमण कर सकता है, जैसी बातें पाकिस्तानी नेताओं के भाषणों, प्रेस-सम्बोधनों एवं व्यक्तिगत वार्तालापों में छाई रहतीं।
इससे पाकिस्तान की जनता में भारत के प्रति एक विशेष प्रकार का फोबिया उत्पन्न हो गया। पाकिस्तानी नेताओं के भाषणों में यह बात अनिवार्य रूप से होती थी कि जब तक भारत का अस्तित्व है तब तक पाकिस्तान का इस्लाम खतरे में है। यह ठीक ऐसा ही था जैसे भारत में माताएं रोते हुए बच्चों को चुप करने के लिए किसी अनजाने भूत या बाबा का नाम लेकर डराती हैं। भय और आतंक का एक अनजाना साया पाकिस्तानियों के मानस-पटल पर छाता जा रहा था।
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आजादी के सात माह के भीतर ही बंगाली नेता हुसैन सुहरावर्दी ने पाकिस्तान की संसद को चेताया- ‘मुल्क एक खतरनाक रास्ते पर निकल चुका है। तुम लोग सिर्फ मुस्लिमों की भावनाओं को भड़काने और उनको एकजुट रखने के लिए पाकिस्तान के खतरे में होने का रोना रो रहे हो, ताकि तुम खुद सत्ता में बने रह सको। …… पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बन रहा है जिसकी बुनियाद सिर्फ जज्बात रहेंगे, इस्लाम के खतरे में होने के जज्बात या फिर पाकिस्तान के जज्बे के खतरे में होने के।’
सुहरावर्दी ने भांप लिया था कि मुस्लिम लीग के नेता पाकिस्तान को एक ऐसा राज्य बना रहे हैं जिसे सिर्फ हमले का भूत दिखाकर कब्जे में रखा जा सकेगा और जिसे एक-जुट रखने के लिए पाकिस्तान और भारत के बीच लगातार संघर्ष को भड़काए रखना होगा। ऐसा देश खतरों और शंकाओं से भरा होगा। पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ गुस्से की राष्ट्रीय अवधारणा को बढ़ावा देता है। जिन्ना के उत्तराधिकारी निरंकुशता एवं धर्मांधता के मामले में जिन्ना से भी आगे निकलने वाले थे। पाकिस्तानी लेखक एवं सुप्रसिद्ध पत्रकार तारेक फतेह ने लिखा है-
‘जिन्ना के निधन के बाद इस्लामवादी पूरे हमलावर मूड में आ गए। ऐसे लोग जिन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया था अब उसके अभिभावक बन गए। आधुनिक संविधान बनाने की सभी आशाएं बिखर गईं, जब पूरी दुनिया के इस्लामवादी पाकिस्तान में इकट्ठा होकर खिलाफत के तहत एक और मुल्क बनाने के सपने देखने लगे।
मिस्र के इस्लामपंथी सैद रामादान पाकिस्तान के इस्लामीकरण के लिए कराची आए और पौलेंड के धर्मांतरित मुसलमान मोहम्मद असद ने देश के वजूद से जुड़े प्रमुख सिद्धांतों को लिखने का काम हाथ में लिया।
….. पाकिस्तान की देशी भाषाओं को किनारे लगा दिया गया और एक प्रस्ताव तैयार किया गया जिसके मुताबिक अरबी को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा को बनाने की बात थी …… एक ऐसी भाषा जिसे पाकिस्तानी नहीं बोलते।’
1948 में जिन्ना की मृत्यु के बाद पाकिस्तान का अधिनायकवादी मॉडल लगातार मजबूत होता चला गया। मई 1949 में जब पूर्वी पाकिस्तान के तंगेल के उपचुनावों में मुस्लिम लीग का प्रत्याशी एक नई उभरती हुई पार्टी से हार गया तो प्रधानमंत्री लियाकत अली ने इस परिणाम को अस्वीकार करते हुए संविधान सभा के नवनिर्वाचित सदस्य को कई अन्य विपक्षी कार्यकर्ताओं के साथ जेल भेज दिया। इनमें प्रसिद्ध कम्यूनिस्ट नेता मोनी सिंह भी था जो 22 साल जेल में अथवा भूमिगत रहा। उसे दुबारा स्वतंत्रता तभी मिली जब 1971 में पाकिस्तान टूट गया।
पाकिस्तान के हुक्मरानों की कोशशि यही है कि किस तरह अवाम को भारत के खिलाफ भड़काया जाए। उनका ध्यान हुकूमत की अंधेरगर्दी से हटाकर भारत की तरफ उलझाया जाए। जब भी अपनी हुकूमत खतरे में पाते हैं, ‘काश्मीर पाकिस्तान का’ नारा लगाते हैं,। यही अयूब खाँ ने किया यही याह्या खाँ ने और शायद हर शासक ऐसा ही करता चला जाएगा……. नफरत को मरने नहीं दिया जाता, उसे और बढ़ाया जाता है।
‘हिन्दुस्तान का भेड़िया आया, भेड़िया आया’ की गुहारें मचाकर वहां का हर डिक्टेटर और हर मुल्ला जनता को बेवकूफ बनाता है और खुद मलाई-मक्खन उड़ाता है। यही कारण है कि वहाँ के शासक राष्ट्रनिर्माण की बातें कम और इस्लाम के पुनर्जागरण की बातें ज्यादा बोलते हैं। खुद इक्कीसवीं सदी में रहकर जनता को सोलहवीं सदी से आगे नहीं बढ़ने देना चाहते। ये वास्तव में जिन्ना के उत्तराधिकारी हैं।
भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध पाकिस्तान बनने से पहले ही खराब हो चुके थे। वे कभी सुधर ही नहीं सके। जवाहरलाल नेहरू को पाकिस्तान के कुछ नेताओं से बड़ा प्रेम था किंतु वे भी भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों को बनाकर नहीं रख सके। जवाहर लाल नेहरू सरकार के लिए सबसे पहला खतरा पाकिस्तान द्वारा करवाए गए कबाइली हमले के रूप में ही उत्पन्न हुआ था।
बंटवारे के लगभग एक दशक तक भारत और पाकिस्तान के बीच आना-जाना सरल था। ब्रिटिश काल में बनी रेल-लाइन के सहारे बड़ी संख्या में लोग इधर से उधर जाते थे।
ई.1951 में पाकिस्तान ने अपने लिए नया नागरिकता कानून तैयार किया, इसके बाद जून 1952 में पाकिस्तान से भारत में आने-जाने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य किया गया। यहाँ तक कि तब तक भी एक भारतीय-पाकिस्तानी पासपोर्ट दोनों देशों में आने-जाने के लिए वैध था तथा अंतर्राष्ट्रीय पासपोर्ट 1965 के बाद आवश्यक किया गया। इसके बाद ही वीजा लागू किया गया। यह घटना उस दौर में भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध के स्तर में और अधिक गिरावट की पुष्टि करती है।
विभाजन के बाद दोनों ही देशों में एक दूसरे के लेखकों की पुस्तकें बेची जाती थीं। दोनों देशों के उर्दू शायर बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे देश में जाकर अपनी शायरी पढ़ते थे। व्यापार भी बिना किसी रोक-टोक एवं बिना किसी बाधा के जारी था। दोनों तरफ के राजनेता एवं प्रशासनिक अधिकारी एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। अखबारों के सम्पादक एवं प्रोफेसर भी लगातार एक दूसरे से मिलते रहते थे किंतु धीरे-धीरे यह सब बंद होता चला गया और दोनों देश एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो गए।
बहुत से मुसलमान तो ऐसे भी थे जो रहते तो भारत में थे किंतु स्वयं को पाकिस्तान का नागरिक समझते रहे। बहुत से मुसलमान पाकिस्तान में जाने के बाद पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से भारत लौट आए। पाकिस्तान ने भारत की इस उदारता का लाभ उठाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। एक बार पाकिस्तान ने भारत के उत्तर प्रदेश के निवासी मुहम्मद इस्माइल को भारत में पाकिस्तान का हाईकमिश्नर घोषित कर दिया जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक था ही नहीं।
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जब समाचार पत्रों में यह मामला उछला, तब पाकिस्तान को अपना कदम वापिस लेना पड़ा। इस नियुक्ति के माध्यम से पाकिस्तान यह जताना चाहता था कि भारत में रह रहे सभी मुसलमान वास्तव में पाकिस्तानी ही हैं। पाकिस्तान चले गए बहुत से मुस्लिम नेता यह मानते रहे कि वे पाकिस्तान में रहते हुए भी भारत में स्थित अपनी सम्पत्तियों के मालिक बने रहेंगे। चौधरी खलीक उज्जमां पाकिस्तान बनने से पहले भारत की केन्द्रीय विधान सभा में विपक्ष का नेता हुआ करता था। वह ई.1947 में पाकिस्तान चला गया तथा कराची में रहने लगा। वह पाकिस्तान मुस्लिम लीग का अध्यक्ष बन गया, फिर भी भारत में अपनी सम्पत्ति की देखभाल करने आता रहा। यही वह व्यक्ति था जिसने ई.1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव रखा था। वह स्वयं को उत्तर प्रदेश का ही नागरिक मानता रहा।
जोगिंदर नाथ मण्डल जो मुस्लिम लीग की तरफ से जवाहरलाल नेहरू के अंतरिम मंत्रिमण्डल में मंत्री बना था, दलित कहे जाने वाले समुदाय का बंगाली राजनीतिज्ञ था। ई.1947 में वह अपने पुराने दोस्त मुहम्मद अली जिन्ना के निमंत्रण पर पाकिस्तान चला गया क्योंकि जिन्ना का मानना था कि भारत की राजनीति में ऊँची जाति के लोगों का वर्चस्व था। जिन्ना ने उसे पाकिस्तान का कानून मंत्री बनाया।
ई.1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दू-मुस्लिम दंगे और जिन्ना के निधन के बाद मंडल को अलग-थलग कर दिया गया तथा कैबीनेट के मंत्री की हैसियत से जो फाइलें मण्डल तक जानी चाहिए थीं, वे भी गोपनीय कहकर रोक दी गईं। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ ने जब इस्लाम को राज्य का आधिकारिक धर्म बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया तो मंडल ने महसूस किया कि अब पाकिस्तान में उसके दिन गिनती के ही बचे हैं।
अक्टूबर 1950 में अपने ऊपर हुए मौखिक और शारीरिक हमलों के बाद वह भारत में शरण लेने के लिए कलकत्ता भाग आया। पाकिस्तान सरकार को दिए गए अपने इस्तीफे में उसने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके भविष्य का ख्याल नहीं रखने के लिए जिन्ना के उत्तराधिकारियों की निंदा की।
भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध न कभी सुधरने थे और न कभी सुधरेंगे। वर्तमान समय में भारत.पाकिस्तान सम्बन्ध अपने सबसे निचले स्तर पर हैं।
जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो केवल जनसंख्या एवं भूमि का ही बंटवारा नहीं हुआ, नदियों का बंटवारा भी हुआ किंतु पाकिस्तान ने जिस तरह भूमि के बंटवारे को विवादास्पद बना दिया, उसी प्रकार नदी जल विभाजन को भी विवादास्पद बना दिया।
जबकि वास्तविकता यह थी कि जितनी जनसंख्या पाकिस्तान को मिली थी उसके अनुपात में पाकिस्तान को भूमि भी अधिक मिली थी और नदी जन विभाजन भी पिकस्तान के पक्ष में हुआ था। अविभाजित भारत में हुई 1941 की जनगणना रिपोर्ट में कहा गया था कि सिंधु नदी जल प्रणाली पर 4.60 करोड़ जनसंख्या निर्भर करती है।
रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हुए विभाजन के बाद इसमें से 2.50 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान में चली गई तथा 2.10 करोड़ जनसंख्या भारत में रह गई। …… इस विभाजन के बाद सतलज, रावी और व्यास नदियों से निकलने वाली नहरों के हैडवर्क्स तथा इन नदियों से निकलने वाली 25 में से 20 नहरें भारत में रहीं। एक नहर भारत और पाकिस्तान दोनों के क्षेत्रों में बहती है। भारत चाहता तो पाकिस्तान को जाने वाली समस्त नहरों का पानी रोक सकता था किंतु भारत ने ऐसा नहीं किया।
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20 दिसम्बर 1947 को पाकिस्तान एवं भारत के अभियंताओं के बीच नदी जल विभाजन के लिए इन नहरों के सम्बन्ध में एक यथास्थिति समझौता हुआ जिसकी अवधि 31 मार्च 1948 को समाप्त होनी थी। इसके बाद नया समझौता किया जाना था किंतु वह नहीं हुआ। जिस दिन समझौता समाप्त हुआ, भारत ने उसी दिन दो महत्वपूर्ण नहरों में पानी की आपूर्ति बंद कर दी और एक नया स्थाई समझौता किए जाने की मांग की। पानी की आपूर्ति पुनः एक माह बाद आरम्भ हुई जब दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति हुई कि पाकिस्तान को दूसरे विकल्प का समय दिए बिना पानी की आपूर्ति बंद नहीं की जाएगी।
भारत के नेता नदी जल विभाजन को एक तकनीकी समस्या मानते थे किंतु पाकिस्तान के नेताओं ने इसे पाकिस्तान की कृषि बर्बाद करने की भारतीय साजिश माना। भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार पुनः यथास्थिति बनाए रखने का अस्थाई समझौता हो गया किंतु स्थाई समझौता होना आवश्यक था। इसलिए विश्व बैंक के अध्यक्ष की मध्यस्थता स्वीकार की गई।
विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने इस समस्या के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया जिसमें भारत, पाकिस्तान एवं विश्वबैंक के अभियंता सम्मिलित किए गए। इस समिति ने 5 जून 1954 को भारत एवं पाकिस्तान को निम्नलिखित सुझाव दिए-
(1) सिंधु, झेलम और चिनाव के सारे जल का उपयोग पाकिस्तान को करने दिया जाए तथा झेलम नदी के उस जल को जो काश्मीर में उपयोग में लाया जाता है, उसे भारत को उपयोग में लेने दिया जाए।
(2) सतलज, रावी और व्यास का समस्त जल भारत को उपयोग में लेने दिया जाए। उसमें से कुछ जल भारत 5 वर्ष तक पाकिस्तान को दे।
(3) प्रत्येक देश अपनी भूमि में बांध इत्यादि बनाएगा परंतु योजक नहरों का खर्च भारत उस सीमा तक सहन करेगा, जहाँ तक उसका लाभ भारत को मिलेगा। यह खर्च 40 से 60 लाख के बीच आता है।
(4) विश्व-बैंक की समिति के अनुसार भारत को अपनी 2 लाख एकड़ भूमि के लिए सिंधु नदी जलक्षेत्र का 20 प्रतिशत जल मिलना था। पाकिस्तान को अपनी 4 लाख एकड़ भूमि के लिए 80 प्रतिशत जल मिलना था।
इस समिति की सिफारिशों को मानने से भारत को बहुत हानि होने वाली थी तथा पाकिस्तान को बहुत लाभ होने वाला था क्योंकि योजक नहरों का निर्माण भारत को करना था और उसे केवल 20 प्रतिशत जल मिलना था साथ ही भारत को चिनाव नदी के जल से सदा के लिए वंचित कर दिया गया था। इसके बावजूद भारत ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया जबकि पाकिस्तान ने बहुत सारी ना-नुकर एवं शर्तों के साथ 5 अगस्त 1954 को इन प्रस्तावों को स्वीकार किया।
विश्व-बैंक समिति द्वारा प्रस्तावित इस समझौते को स्वीकार करने के बाद पाकिस्तान ने भारत में सतलुज नदी पर बन रहे भाखड़ा बांध पर आपत्ति खड़ी कर दी एवं विश्व-बैंक से भारत द्वारा समझौते के उल्लंघन की शिकायत की। विश्व-बैंक ने इस शिकायत की जांच की तो पाया कि इस बांध की योजना ई.1920 में बनी थी तथा ई.1946 से इस बांध पर काम चल रहा था।
ई.1952 में गठित विश्व-बैंक समिति को भी इस बांध के बारे में बताया गया था तथा इसका निर्माण समझौते के अंतर्गत ही हो रहा है। ई.1957 में जब सुहरावर्दी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री था, उसने नहरों के जल-बंटवारे को लेकर एक बार फिर से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
1 जून 1957 को सुहरावर्दी ने एसोसिएटेड प्रेस को दिए गए साक्षात्कार में कहा-
‘हम पर भारत की पकड़ के दो शिकंजे नहरी जल एवं काश्मीर हैं। …… भारत ने बांध बना लिए हैं तथा सतलुज एवं दो अन्य नदियों जो पाकिस्तान के पश्चिमी भाग में सिंचाई हेतु जल की आपूर्ति करती हैं, को काट देने का भारत का इरादा है। ऐसा करने के लिए वे अगले वर्ष तैयार रहेंगे। काश्मीर से निकलने वाली तीन नदियों के जल को भी वे नियंत्रित कर सकते हैं।
भारत दावा करता है कि उसे राजस्थान के रेगिस्तान को सिंचित करने के लिए पानी चाहिए। वे पाकिस्तान से कहते हैं कि जल में आने वाली कमी की पूर्ति काश्मीर से निकलने वाली तीनों नदियों के पानी की आवक से कर लें। इसके लिए खर्चीले बांधों एवं नहरों की आवश्यकता होगी, परन्तु मैं नहीं सोचता कि इस योजना के लिए वे हमें कुछ भी चुकाने का सच्चा इरादा रखते हैं।’
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री सुहरावर्दी बड़ी बेशर्मी के साथ भारत से निकलने वाली नदियों के पानी को पाकिस्तान में काम लेने के लिए, न केवल भारत में बनने वाली योजक नहरों एवं बांधों के लिए पैसा मांग रहा था अपितु बड़ी बेशर्मी और ढिठाई के साथ उसे पाकिस्तान में बनने वाले बांधों एवं नहरों के लिए भी भारत से पैसा चाहिए था।
इस पर टिप्पणी करते हुए भारतीय सिंचाई मंत्री एस. के. पाटिल ने एक वक्तव्य दिया-
‘सुहरावर्दी ने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है कि वे नहरी जल-विवाद के बारे में सभी तथ्य एवं सत्य को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करेंगे।’
30 अक्टूबर 1958 को कराची में एक समाचारपत्र सम्मेलन में पाकिस्तान के नए सैनिक शासक जनरल अयूब खाँ ने काश्मीर एवं नहरी जल मसलों पर भारत के साथ युद्ध छेड़ने की धमकी दी। उसने यह भी कहा-
‘पाकिस्तान की जल समस्या के निपटारे के लिए बनी परियोजनाओं को पूरा होने के लिए 10 से 15 वर्ष लगेंगे। अतः इस अवधि में भारत को उसे जल देना चाहिए तथा इन योजनाओं का व्यय भी वहन करना चाहिए। पानी की जो मात्रा हमें अब तक मिलती रही है, वह मिलती रहनी चाहिए अन्यथा हमारी भूमि बंजर हो जाएगी। हमारे पास जो भी संभव है, उसके लिए अन्य रास्ता अपनाने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं रहेगा।’
बेशर्मी के मामले में पाकिस्तानी सैनिक शासक अयूब खाँ प्रधानमंत्री सुहरावर्दी से भी मीलों आगे निकल गया था। वह न केवल पाकिस्तान में बनने वाली नहरों एवं बांधों के लिए भारत से धनराशि मांग रहा था अपितु उसके लिए युद्ध छेड़ने की धमकी भी दे रहा था। यह तो पिण्डारियों की भाषा थी जिन्हें ई.1818 में अंग्रेजों ने कुचलकर पूरे भारत से मिटा दिया था। लगता था अब वही भाषा एक बार फिर से, पाकिस्तान में प्रकट हो रही थी।
भारत के अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बनाए गए दबाव के बाद 17 अप्रेल 1959 को वाशिंगटन में नहरी जल के सम्बन्ध में एक नए अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। 6 एवं 7 मई 1959 को भारतीय संसद में इस समझौते की जानकारी देते हुए भारत के सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्री एम. एम. इब्राहीम ने कहा कि दोनों देशों की सरकारों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया है तथा यह विश्वास दिलाया है कि इस समझौते से राजस्थान नहर का कार्य प्रभावित नहीं होगा।
19 सितम्बर 1960 को कराची में जनरल अयूब एवं भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मध्य सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-
1. भारत को तीन पूर्वी नदियों- सतलुज, रावी और व्यास के पानी का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार होगा।
2. पाकिस्तान को पश्चिम की तीन नदियों- झेलम, चिनाव एवं सिन्धु के पानी के पूर्ण प्रयोग का अधिकार होगा।
3. विश्व बैंक और 6 मित्र राष्ट्र अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और पश्चिमी जर्मनी, भारत एवं पाकिस्तान दोनों के योजक नहरों के निर्माण हेतु 1977 तक धन देंगे। तब तक के लिए भारत पाकिस्तान को यथावत् पानी देना जारी रखेगा।
4. भारत ने पाकिस्तान को नई नहरें एवं बांध निर्माण हेतु 100 करोड़ रुपया देना स्वीकार किया।
5. पाकिस्तान को जो पानी मिलेगा, उसकी अवधि पाकिस्तान की प्रार्थना पर बढ़ाई भी जा सकती है परन्तु उसी अनुपात में दी जाने वाली धनराशि की मात्रा में कमी हो सकती है।
भारत-विभाजन के साथ ही पाकिस्तान से चल रहे गम्भीर जल-विवाद के उपरांत भी भारत सरकार की ढिलाई के कारण पिछले बहत्तर सालों से भारत के हिस्से का पानी पाकिस्तान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में बहता रहा है जिसके कारण भारत के पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली आदि राज्यों की जनता प्रादेशिक नदी-जल समझौतों के अनुसार जल की मात्रा प्राप्त करने में असमर्थ है एवं दिल्ली सरकार पर दबाव बनाकर अधिक जल प्राप्त करने तथा दूसरे प्रांत को जल न देने के लिए संघर्षरत है।
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान की ओर से हुए उरीएवं पुलमावा आतंकवादी हमलों के बाद भारत की पुरानी नीति में बदलाव करते हुए भारत की जनता से वायदा किया है कि वे पाकिस्तान के साथ हुए नदी जल विभाजन समझौते के अनुसार पाकिस्तान को जल जाने देंगे। भारत की नदियों से पाकिस्तान को जा रहे अतिरिक्त जल में से भारतीयों के हिस्से के जल को पाकिस्तान की ओर बहने से रोकेंगे।
यदि ऐसा हुआ तो पंजाब, दिल्ली, हरियाणा एवं राजस्थान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में पर्याप्त जल बहने लगेगा तथा उत्तर-पश्चिमी भारत की जनता को सिंचाई एवं पेयजल के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सकेगा।
जब से पाकिस्तान अस्तित्व में आया है, वह भारत को अपना सबसे बड़ा शत्रु बताता है तथा भारत से दो बड़ी लड़ाइयां एवं कई बार छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ चुका है। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान की सेना ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा शत्रु है।
भारत विभाजन के समय पाकिस्तान को भारत के 17.5 प्रतिशत राजस्व स्रोत मिले जबकि सेना का 33 प्रतिशत हिस्सा मिला। अखण्ड भारत की थलसेना का 33 प्रतिशत, नौसेना का 40 प्रतिशत और हवाई सेवा का 20 प्रतिशत मिला। इस कारण ई.1948 में पाकिस्तान के पहले बजट में विशालाकाय सेना के रख-रखाव एवं वेतन-भत्तों के लिए 75 प्रतिशत हिस्सा समर्पित करना पड़ा।
……. इस विशाल सेना को नियंत्रण में रखने के लिए किसी बड़े खतरे का भय दिखाना और सेना को उस खतरे में उलझाये रखना आवश्यक था, अन्यथा यह सेना अपने ही देश के नेताओं और जनता पर कब्जा कर लेती।
जबकि दूसरी ओर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष इस बड़ी सेना के बल पर पाकिस्तान पर शासन करने का सपना देखने लगे। यही कारण था कि पाकिस्तानी सेना के पहले कमाण्डर इन चीफ अय्यूब खाँ ने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत की ब्राह्मणवादी राष्ट्रीयता और अहंकार के कारण पाकिस्तान के निर्माण की जरूरत पड़ी। इसलिए पाकिस्तान की रक्षा के लिए पाकिस्तान को एक बड़ी सेना की आवश्यकता है। इस प्रकार वह पाकिस्तान की गैर-आनुपातिक सेना को कम करने की बजाए, और अधिक बढ़ाने में जुट गया।
तख्ता पलट से बनती हैं पाकिस्तान में सरकारें
अंतराष्ट्रीय पत्रकारिता जगत में पाकिस्तान के लिए विख्यात है कि पाकिस्तान को अल्लाह, आर्मी और अमेरिका चलाते हैं। आर्मी के वर्चस्व के कारण पाकिस्तान में सरकारों के तख्ता-पलट का लम्बा इतिहास रहा है। ई.1951 में भारत का पूर्व नौकरशाह सर गुलाम मुहम्मद पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बना। उसके कार्यकाल में ई.1954 में पाकिस्तान में प्रांतीय विधान सभाओं के लिए चुनाव हुए जिनमें सत्तारूढ़ दल बुरी तरह हार गया।
इस कारण 25 दिसम्बर 1954 को गुलाम मुहम्मद ने संविधान सभा को भंग कर दिया। उसका तर्क था कि जब गवर्नर जनरल जिन्ना सूबे की विधानसभाओं को भंग कर सकते थे तो निश्चित रूप से उनके उत्तराधिकारी भी संघीय संरचनाओं को भंग कर सकते हैं। सत्ता के इस संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने मार्शल लॉ का स्वाद पहली बार तब चखा जब एक व्यापक नरसंहार के बाद देश के अहमदिया समुदाय के लोगों को खदेड़ने का अभियान शुरू हुआ।
23 मार्च 1956 से देश में नया संविधान लागू हुआ जिसके माध्यम से पाकिस्तान ने स्वयं को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अंतर्गत मिले डोमिनियन स्टेटस से मुक्त करके इस्लामिक रिपब्लिक स्टेट घोषित कर लिया। इस संविाधान में देश के लिए संसदीय प्रणाली स्वीकार की गई तथा प्रावधान किया गया कि ई.1959 के आरम्भ में पाकिस्तानी संसद के लिए पहले आम चुनाव करवाए जाएंगे। गवर्नर जनरल का पद समाप्त करके राष्ट्रपति का पद सृजित किया गया।
संसद के नेता को प्रधानमंत्री बनाना प्रस्तावित किया गया जिसे राष्ट्रपति के नीचे रहकर देश का शासन चलाना था। इससे पहले कि पाकिस्तान में आम चुनाव हों, सितम्बर 1958 में सरकार के तख्ता पलट का इतिहास तब एक बार पुनः दोहराया गया जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने पाकिस्तान के तत्कालीन संविधान को स्थगित करके प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को गद्दी से उतार दिया तथा देश में मिलिट्री शासन की घोषणा कर दी।
मिर्जा द्वारा नियुक्त मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर अय्यूब खान ने 13 दिन बाद अर्थात् 7 अक्टूबर 1958 को राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा का तख्ता पलट दिया और स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। जनरल अयूब खान ने पूरे 9 साल पाकिस्तान पर शासन किया।
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1 मार्च 1962 से देश में नए संविधान की घोषणा की गई तथा पाकिस्तान को रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान घोषित किया गया। देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली स्वीकार की गई तथा मतदान के लिए अप्रत्यक्ष प्रणाली का प्रावधान किया गया। नए संविधान के तहत 2 फरवरी 1965 को पाकिस्तान में राष्ट्रपति के चुनाव करवाए गए। इन चुनावों में हुई धांधली के बाद राष्ट्रपति अयूब खान को ही फिर से राष्ट्रपति घोषित किया गया। इस प्रकार देश का शासन हमेशा के लिए सेना की छत्रछाया में चला गया। आज भी पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ही देश पर शासन करती हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जज, सेना के हाथों की कठपुतली होते हैं।
ई.1969 में जनरल याह्या खाँ ने अयूब खाँ का तख्ता पलट दिया तथा स्वयं राष्ट्रपति बन गया। उसने ई.1970 में देश में पहले आम चुनाव करवाए किंतु चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार बनवाने में आनाकानी करता रहा। अंत में 7 दिसम्बर 1971 को नूरूल अमीन की सरकार बनी किंतु यह सरकार केवल 13 दिन ही शासन कर सकी।
ई.1973 में जुल्फिकार अली भुट्टो को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई। उसने यूएनओ में वक्तव्य दिया कि वे भारत से एक हजार साल तक लड़ने के लिए तैयार हैं। भुट्टो ने अपने विश्वस्त सैनिक अधिकारी जनरल जियाउल हक को पाकिस्तानी सेना का प्रमुख बनाया किंतु उसने भुट्टो के साथ गद्दारी करके 4 जुलाई 1977 को भुट्टो को उसकी पार्टी के सदस्यों सहित गिरफ्तार करके नेशनल एसेंबली भंग कर दी और स्वयं राष्ट्रपति बन गया।
यह पाकिस्तान के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाला मार्शल लॉ था। जियाउल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया। ई.1988 में जियाउल हक की एक विमान हादसे में मौत हो गई।
इसके बाद ई.1988 में मरहूम जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा स्थापित पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी दुबारा सत्ता में आई और जुल्फिकार अली भुट्टो की पुत्री बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी। दो साल बाद 1990 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ग़ुलाम इशाक ख़ान ने भुट्टो सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया।
उसके बाद 1 नवम्बर 1990 से 18 जुलाई 1993 तक नवाज शरीफ की सरकार अस्तित्व में रही। यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। ई.1993 से ई.1996 तक बेनजीर भुट्टो दूसरी बार देश की प्रधानमंत्री रही किंतु वह इस बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। ई.1997 के आम चुनावों में पुनः नवाज शरीफ की जीत हुई और 17 फरवरी 1997 से 12 अक्टूबर 1999 तक वह दूसरी बार प्रधानमंत्री के पद पर रहा।
नवाज शरीफ ने जनरल परवेज मुशर्रफ को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया। अक्टूबर 1999 में जब परवेज मुशर्रफ श्रीलंका यात्रा पर गया हुआ था, नवाज शरीफ ने उसे अपदस्थ करके जनरल अजीज को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ नियुक्त किया। नवाज शरीफ यह नहीं जानता था कि जनरल अजीज परवेज मुशर्रफ का विश्वस्त है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने श्रीलंका से लौटकर नवाज शरीफ और उसके मंत्रियों को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया और स्वयं राष्ट्रपति बन गया।
उसी वर्ष अर्थात् ई.1999 में भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो ने भी पाकिस्तान छोड़ दिया और संयुक्त अरब इमारात के नगर दुबई में जाकर रहने लगी। पाकिस्तान की सैनिक सरकार ने भुट्टो पर लगे भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों की जाँच की और बेनजीर भुट्टो को दोष मुक्त कर दिया । 18 अक्टूबर 2007 को बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान लौटी। उसी दिन कराची में एक रैली के दौरान बेनजीर भुट्टो पर दो आत्मघाती हमले हुए जिनमें 140 लोग मारे गए किंतु बेनज़ीर बच गई किंतु 27 दिसम्बर 2007 को एक चुनाव रैली में बेनजीर की हत्या कर दी गई।
ई.2000 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी घोषित किया। इस आधार पर परवेज मुशर्रफ नवाज शरीफ को भुट्टो की तरह फांसी पर चढ़ाना चाहता था किंतु सऊदी अरब और अमेरिका ने हस्तक्षेप करके नवाज शरीफ को फांसी पर चढ़ने से बचाया। इस पर मुशर्रफ ने शरीफ को पाकिस्तान से बाहर निकाल दिया। नवाज शरीफ लगभग सात साल तक जेद्दा में रहा।
10 सितम्बर 2007 को नवाज शरीफ पुनः पाकिस्तान लौटा किंतु उसे हवाई-अड्डे से ही तुरन्त जेद्दा वापस भेज दिया गया। वर्ष 2011 में नवाज शरीफ को पाकिस्तान आने की अनुमति मिली और 5 जून 2013 को वह तीसरी बार पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना। ई.2016 में पानमा पेपर लीक में नाम आने के बाद पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री के पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।
इस कारण 28 जुलाई 2017 को नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटाना पड़ा। तब से नवाज शरीफ पुनः जेल में दिन बिता रहा है। उस पर पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। 18 अगस्त 2018 को इमरान खाँ पाकिस्तान का बाईसवां प्रधानमंत्री बना। वह भी सेना के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं है।
राजनीतिक हत्याओं की स्थली पाकिस्तान
पाकिस्तान राजनीतिक हत्याओं एवं संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु की स्थली है। पाकिस्तान बनने के कुछ माह बाद प्रथम गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु उपेक्षा एवं टीबी से हुई। ई.1951 में पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ की हत्या हुई। उसके बाद याह्या खाँ, जुल्फिकार अली भुट्टो, जनरल मुहम्मद जियाउल हक तथा बेनजीर भुट्टो आदि पाकिस्तानी राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री आतंकवादी गतिविधियों, राजनीतिक हत्याओं एवं फांसी आदि के माध्यम से मारे गए।
पुस्तक लिखे जाते समय पूर्व-प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तथा सैनिक तानाशाह से राष्ट्रपति बना परवेज मुशर्रफ पाकिस्तानी जेलों में बंद हैं।
जिस समय पाकिस्तान का निर्माण हुआ, उस समय पंजाब के विभाजन से पश्चिमी पाकिस्तान अस्तित्व में आया तथा बंगाल के विभाजन से पूर्वी पाकिस्तान बना। पाकिस्तान बनने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान की तरह पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की हत्या का लम्बा सिलसिला चला।
ई.1947 में जिस समय उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से लेकर पंजाब एवं सिन्ध तक के भू-भाग में मारकाट मची, उस समय भारत की पूर्वी सीमा अर्थात् बंगाल अपेक्षाकृत शांत रहा था।
जहाँ विभाजन के समय पंजाब एवं सिंध में धर्म के आधार पर भगदड़ एवं मारकाट मची थी, वहीं बंगाल में मारकाट का आधार धर्म के साथ-साथ भाषाई भी था। इस कारण पूर्वी-पाकिस्तान में रह रहे बिहारी मुसलमानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी।
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जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो वे भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तान के उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भाग कर आए थे। इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई।
बहुत से इतिहासकार इस शांति का श्रेय गांधीजी को देते हैं किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बंगाल ई.1946 के उत्तरार्ध में सीधी कार्यवाही एवं उसके बाद हुए रक्तपात में खून की होली खेलकर निबटा ही था इसलिए बंगाल के हिन्दू और मुसलमान 1947 के विभाजन के समय एक-दूसरे के विरुद्ध हथियार उठाने की स्थिति में नहीं आ पाए थे और जिन्हें पश्चिमी बंगाल से पूर्वी-पाकिस्तान में जाना था या पूर्वी-पाकिस्तान से पश्चिमी बंगाल में आना था, सामान्यतः बिना रक्तपात करे हुए आ गए किंतु जैसे ही एक-दो वर्ष का समय व्यतीत हुआ, पूर्वी-पाकिस्तान में असंतोष एवं हिंसा की लहर फूट पड़ी।
बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। पूरा पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।
श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बांग्लादेश से भूमि की मांग
8 अप्रेल 1950 को शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। इसे दिल्ली समझौता भी कहते हैं। इस समझौते के अनुसार दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अल्पसंख्यकों की रक्षा करने एवं साम्प्रदायिक उपद्रवों को रोकने की जिम्मेदारी ली। दोनों ने ऐसा वातातरण तैयार करने की जिम्मेदारी भी ली जिससे अल्पसंख्यकों को अपना देश छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़े।
इसी के साथ उन्होंने विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की भी जिम्मेदारी ली। भारत के पुनर्वास मंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मांग की कि या तो बंगाल के विभाजन को अस्वीकार कर दिया जाए या पाकिस्तान से विस्थापितों को बसाने हेतु अतिरिक्त भूमि मांगी जाए।
भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पुनर्वास एवं आपूर्तिमंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रस्तावों को अव्यावहारिक बताया। इससे नाराज होकर 8 अप्रेल 1950 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा क्षितीश चन्द्र न्योगी ने नेहरू मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।
बांग्लादेश से शरणार्थियों के जत्थे
पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की हत्या एक बड़ी साजिश के तहत की जा रही थी इसलिए ई.1954 में पूर्वी-पाकिस्तान से पुनः बड़ी संख्या में हिन्दू विस्थापित होकर भारत आने लगे। वे आज तक भी आ रहे हैं। ई.1954 में औसतन प्रति माह 6,600 विस्थापित-हिन्दू भारत आए। ई.1955 में इस औसत में वृद्धि हुई तथा 13,500 विस्थापित प्रतिमाह भारत आने लगे।
अगले वर्ष इनका औसत बढ़कर 20,003 प्रतिमाह से ऊपर हो गया। पूर्वी-पाकिस्तान से जनवरी 1956 में 19,206 हिन्दू तथा फरवरी 1956 में 43,534 हिन्दू भारत आए। ई.1956 के अंत तक कुल मिलाकर 3.2 लाख हिन्दू भारत आए।
इस पर भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वक्तव्य दिया- ‘यह समस्या काश्मीर समस्या भी अधिक भयंकर एवं जटिल है।’
अप्रेल 1956 में भारत सरकार ने पूर्वी-पाकिस्तान से भारत आने के इच्छुक विस्थापितों के लिए पारगमन नियमों को कठोर बना दिया गया। इससे विस्थापितों के भारत आगमन की प्रक्रिया कुछ मंदी पड़ी किंतु वह लगातार जारी रही। भारत सरकार के पुनर्वास मंत्री एम. सी. खन्ना ने विस्थापितों के लगातार भारत आने के कारण बताते हुए कहा-
‘इन लोगों को घर त्यागने के लिए बाध्य किया जाता है एवं इन्हें दैनिक जीवन में असुरक्षा तथा भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए ये लोग भारत आते हैं। वर्ष 1957 में 10,920 तथा 1958 में 4,898 हिन्दू भारत आए।’
ई.1958 में अयूब खाँ द्वारा पाकिस्तान पर सैनिक शासन लादे जाने के बाद पूर्वी-बंगाल, पश्चिमी पाकिस्तान से आए सैनिकों की संगीनों के साए में जीने लगा।
बंगालियों की हत्या ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में उस समय से आरम्भ हुई जब इस्लाम का पहली बार बंगाल में प्रवेश हुआ। जब जिन्ना ने अपनी मांग मनवाने के लिए कलकत्ता में सीधी कार्यवाही दिवस मनाया, तब भी बंगालियों की हत्या बड़े स्तर पर की गई।
जब पाकिस्तान बन गया तब भी यह सिलसिला नहीं रुका। पूर्वी बंगाल में धर्म के नाम पर न केवल हिन्दुओं की हत्या हुई अपितु भाषा के नाम पर उन बिहारी मुसलमानों की भी हत्या हुई जो बंग्ला-भाषा बोलना नहीं जानते थे। पश्चिमी-पाकिस्तान की सेना ने तीस लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया
पाकिस्तान के निर्माण के साथ मुस्लिम लीग के नेतृत्व में जो सरकार अस्तित्व में आई उसमें पंजाबी तत्व का बाहुल्य था तथा सिंधी, पख्तूनी, बलोच एवं बंगाली तत्वों की उपेक्षा की गई थी। इस कारण पूरे देश में केन्द्र सरकार के विरुद्ध अंसतोष का वातावरण शुरू से ही बनने लगा।
चूंकि पुरानी राजधानी कराची और नई राजधानी इस्लमाबाद दोनों ही पश्चिमी-पाकिस्तान में बनीं तथा पूर्वी-पाकिस्तान इन राजधानियों से 1600 किलोमीटर दूर था इसलिए शासन में सभी महत्वपूर्ण पद पंजाब के मुसलमानों द्वारा हथिया लिए गए थे।
यद्यपि पूर्वी पाकिस्तान का निवासी सुहरावर्दी कुछ समय के लिए पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भी रहा तथापि पाकिस्तान की सत्ता में पूर्वी-पाकिस्तान की कोई आवाज नहीं थी। ई.1966 में पूर्वी-पाकिस्तान के अवामी लीग नामक राजनीतिक दल के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने राष्ट्रपति अयूब के सैनिक शासन का विरोध करते हुए पूर्वी-पाकिस्तान के नागरिकों के लिए स्वायत्त शासन के अधिकारों की मांग की। इस पर पाकिस्तान की सरकार शेख मुजीब-उर-रहमान की शत्रु हो गई और बंगालियों की हत्या करने लगी।
पाकिस्तान की सरकार ने ई.1968 में मुजीब-उर-रहमान पर पाकिस्तान सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र करने का आरोप लगाया जिसमें कहा गया कि मुजीब ने ई.1962 के भारत-चीन युद्ध में एवं ई.1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत के सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर पाकिस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र किया। अयूब खाँ के इन मिथ्या आरोपों के कारण पूरे पूर्वी-बंगाल में अयूब खाँ की सरकार के विरुद्ध घृणा फैल गई।
पूर्वी पाकिस्तान में चल रही राजनीतिक गतिविधियों का असर पश्चिमी-पाकिस्तान के गैर-पंजाबी मुसलमानों पर पड़े बिना भी नहीं रहा। ई.1967 में अयूब खाँ की सरकार के विदेश मंत्री एवं सिन्धी नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने सरकार से त्याग-पत्र देकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी बनाई। इसी बीच पाकिस्तान के अन्य प्रांतों द्वारा भी स्वायत्तता की मांग की जाने लगी और अयूब खाँ के लिए देश का शासन चलाना असम्भव हो गया।
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26 मार्च 1969 को जनरल मुहम्मद याह्या खाँ ने अयूब खाँ की सरकार का तख्ता पलट दिया तथा स्वयं राष्ट्रपति बन गया। इस प्रकार पाकिस्तान में एक सैनिक शासन हटकर दूसरा सैनिक शासन आ गया। 31 मार्च 1970 को पाकिस्तान का संविधान फिर से स्थगित कर दिया गया। याह्या खाँ ने एक लीगल फ्रेमवर्क ऑर्डर जारी करके देश में एक-सदन वाली संसदीय पद्धति के लिए चुनाव करवाने का निर्णय लिया जबकि सामान्यतः विश्व के समस्त लोकतांत्रिक देशों में दो सदन होते हैं जिन्हें लोकसभा एवं राज्यसभा अथवा कॉमन हाउस एवं अपर हाउस आदि कहा जाता है। याह्या खाँ ने आदेश जारी किए कि जनरल इलैक्शन्स के बाद ही देश का नया संविधान लिखा जाएगा।
22 नवम्बर 1954 को पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान एवं नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटीयर प्रोविंसेज को मिलाकर ‘इण्टिीग्रेटेड प्रोविंस ऑफ वेस्ट पाकिस्तान’ का गठन किया गया था किंतु याह्या खाँ की सरकार ने ‘इण्टिीग्रेटेड प्रोविंस ऑफ वेस्ट पाकिस्तान’ का विघटन करके फिर से पुरानी वाली स्थिति बहाल कर दी। इस कारण पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान एवं नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटीयर प्रोविंसेज नामक प्रांत फिर से अस्तित्व में आ गए। 7 दिसम्बर 1970 को नए विधिक नियमों के तहत पाकिस्तान में केन्द्रीय सरकार के गठन के लिए एकल सदन हेतु चुनाव करवाए गए।
चुनावों से ठीक एक माह पहले पूर्वी-पाकिस्तान में ‘भोला-चक्रवात’ ने कहर बरपाया। यह संसार में अब तक आए चक्रवाती तूफानों में सर्वाधिक भयावह सिद्ध हुआ। इसमें 5 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। पाकिस्तान की याह्या खाँ सरकार ने चक्रवात से प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए कोई कदम नहीं उठाए। इससे पूर्वी-पाकिस्तान में पश्चिमी-पाकिस्तान के नेतृत्व में चल रही सरकार के विरुद्ध पहले से ही व्याप्त घृणा अपने चरम पर पहुंच गई।
इस समय तक पूर्वी-पाकिस्तान की जनसंख्या पश्चिमी-पाकिस्तान से अधिक हो चुकी थी। क्योंकि पश्चिमी पाकिस्तान के लाखों हिन्दू या तो मार डाले गए थे, या फिर वे भारत भाग गए थे। यही हाल पश्चिमी पाकिस्तान में भारत से आए मुसलमानों का किया गया था। इसलिए इन चुनावों में पूर्वी-पाकिस्तान की शेख मुजीबुररहमान की पार्टी अवामी लीग को अभूतपूर्व विजय प्राप्त हुई।
केन्द्रीय सदन अर्थात् नेशनल एसेम्बली में कुल 313 सीटों का प्रावधान किया गया था जिनमें से 169 सीटों पर पूर्वी-पाकिस्तान के नेता मुजीबुररहमान की अवामी लीग पार्टी ने जीत प्राप्त कर ली। इसी प्रकार प्रांतीय विधान सभा में 310 सीटों में से शेख मुजीब की पार्टी ने 298 सीटें प्राप्त कर लीं।
नेशनल एसेम्बली में जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को 81 सीटें मिलीं और वह मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। जिस मुस्लिम लीग ने भारत से लड़कर पाकिस्तान लिया था, उसका इन चुनावों में तिनका-तिनका बिखर गया। इन चुनावों में मुस्लिम लीग के नाम से दो पार्टियों ने चुनाव लड़ा। इनमें से कौंसिल मुस्लिम लीग को केवल 7 सीटें, तथा मुस्लिम लीग (कय्यूम) को 9 सीटें मिलीं।
बाकी सीटें विभिन्न छोटी-छोटी पार्टियों में बिखर गईं। नेशनल एसेम्बली में अवामी लीग को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद याह्या खाँ ने अवामी लीग को सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं दिया। जब अवामी पार्टी ने विरोध प्रदर्शन किए तो शेख मुजीबुररहमान को बंदी बना लिया गया। इस पर पूर्वी-बंगाल की जनता ने अवामी लीग के नेतृत्व में पश्चिमी-पाकिस्तान से अलग होने के लिए बांग्ला मुक्ति आंदोलन शुरू कर दिया। जब पाकिस्तान ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए पूर्वी-पाकिस्तान में सेना तैनात की तो पूर्वी-पाकिस्तान से बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे।
बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम के दौरान भयानक हिंसा हुई। इस आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तान की सेना द्वारा 26 मार्च 1971 को पूर्वी-पाकिस्तान में ऑपरेशन सर्चलाइट आरम्भ किया गया। इस ऑपरेशन की आड़ में पाकिस्तान की सेना ने बंगाली मुसलमानों का जमकर नरसंहार किया।
बंगालियों की हत्या का ऐसा सिलसिला चला, जिसकी मिसाल इतिहास में मिलनी कठिन है। पहले मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा था, अब मुसलमान मुसलमानों को ही मार रहे थे। उनके लिए इंसान किसी कीड़े-मकोड़े की तरह था जिसे कभी भी, कितनी भी क्रूरता से मारा जा सकता था। जमात-ए-इस्लाम नामक संगठन के लड़ाकों ने इस युद्ध में पाकिस्तान की सेना का साथ दिया।
नौ माह तक चले इस मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की सेना और जमात-ए-इस्लाम के लड़ाकों ने पूर्वी-पाकिस्तान में कई लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया। यह संख्या 3 लाख से 30 लाख के बीच बताई जाती है। इस दौरान 2 लाख से 4 लाख बंगाली औरतों से बलात्कार किए जिनमें हिन्दू एवं मुस्लिम औरतें बिना किसी भेद के बलात्कार की शिकार हुईं। दिसम्बर 2011 में बीबीसी न्यूज रिपोर्ट में एक रिसर्च के हवाले से दावा किया गया कि बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम में तीन लाख से पांच लाख लोग मारे गए। इस दौरान कुछ कट्टर धार्मिक लोगों ने नारा दिया कि बंगाली महिलाएं पब्लिक प्रोपर्टी हैं।
इस नरसंहार एवं बलात्कारों के कारण अस्सी लाख से एक करोड़ हिन्दुओं ने पूर्वी-पाकिस्तान छोड़ दिया और वे भारत आ गए। लगभग 3 करोड़ लोग पूर्वी-पाकिस्तान से विस्थापित हुए। इस दौरान उर्दू-भाषी बिहारियों एवं बंाग्ला-भाषी बंगालियों के बीच भी हिंसक झड़पें हुईं। इन झड़पों में लगभग डेढ़ लाख उर्दू-भाषी बिहारी मारे गए। एक अन्य अनुमान के अनुसार मरने वाले उर्दू-भाषी बिहारियों की संख्या पांच लाख थी।
सुप्रसिद्ध पत्रकार तारेक फतह ने 1970 के बांगलादेश नरसंहार में मारे गए लोगों की संख्या 10 लाख बताई है। बांग्लादेश के नरसंहार पर टिप्पणी करते हुए तारेक फतेह ने लिखा है- ‘बंगाल जो नवजागरण का पालना था, हत्यारों के हत्थे चढ़ गया था।’ याह्या खाँ एवं उसके साथियों ने पूर्वी-पाकिस्तान के मुक्ति-आंदोलन को भारत-समर्थित युद्ध माना एवं उसका बदला लेने के लिए भारत पर आक्रमण कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ और पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश नाम से अलग राष्ट्र बना।
शेख हसीना का संयुक्त राष्ट्र महासभा में वक्तव्य
22 सितम्बर 2017 को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक वक्तव्य दिया कि पाकिस्तान की सेना ने वर्ष 1971 में जघन्य सैन्य अभियान चलाकर मुक्ति संग्राम के दौरान 30 लाख निर्दाेष बंगालियों की हत्या की। उन्होंने कहा कि बांग्ला देश की संसद ने नरसंहार के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए 25 मार्च 2017 को नरसंहार दिवस घोषित किया।
पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी-पाकिस्तान पर 25 मार्च 1971 की आधी रात को हमला किया जिसके बाद आधिकारिक तौर पर 9 महीने चले युद्ध में 30 लाख लोग मारे गए। तथा 20,000 से ज्यादा महिलाओं का शोषण किया गया। बांगलादेश भले ही पाकिस्तान से अलग हो गया हो किंतु वहाँ की परिस्थितियाँ भी पाकिस्तान से कुछ कम बुरी नहीं हैं।
बांग्लादेश बनने के केवल चार साल बाद ई.1975 में शेख मुजीब-उर-रहमान की सरकार को सैनिक-तख्ता-पलट के माध्यम से हटा दिया गया। इस दौरान शेख मुजीब, उसकी पत्नी तथा तीन पुत्र मौत के घाट उतार दिए गए। लम्बी राजनीतिक लड़ाई के बाद शेख मुजीब की पुत्री शेख हसीना ने ई.1996 में बांग्लादेश में सरकार बनाई किंतु उसे भी सैनिक-तख्ता-पलट के माध्यम से हटाकर जेल में डाल दिया गया।
इस पुस्तक के लिखे जाने के समय यही शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं, वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बनी हैं। बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकारें बहुत कम रही हैं जबकि जनता को सैनिक शासन और आपतकाल अधिक झेलना पड़ा है। बंगालियों की हत्या का सिलसिला कुछ कम अवश्य हुआ है किंतु थमा नहीं है।
अब बांगलादेश में तो बंगालियों की हत्या होती ही है, भारत में रह गए पश्चिमी बंगाल भी हिन्दुओं की हत्या का सिलसिला आरम्भ हो गया है। ऐसा लगता है मानो बंगाली जनता हत्याओं के लिए अभिशप्त है। बंगाली भद्रलोक बंगालियों की रक्षा करने में असमर्थ है। वर्तमान समय में पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगभग वही काम कर रही हैं जो बंगाल के विभाजन से पहले हुसैन सुहरावर्दी ने किया था।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...