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काश्मीर पर कबाइली आक्रमण

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काश्मीर पर कबाइली आक्रमण करवाकर पाकिस्तान ने न केवल महाराजा हरिसिंह की पीठ में छुरा भौंका अपितु भारत के साथ भी विश्वासघात किया। जिन्ना ने कहा था कि मुसलमान अपने देश पाकिस्तान में शांति के साथ रहेंगे किंतु जिन्ना के मुसलमान एक भी दिन शांति से नहीं बैठे!

काश्मीर देश का एक मात्र राज्य था जिसका राजा हिन्दू था किंतु राज्य की बहुसंख्य जनता मुस्लिम थी। रेडक्लिफ ने भारत का जो भौगोलिक विभाजन किया था, उसमें काश्मीर को यह सुविधा थी कि वह भारत या पाकिस्तान किसी भी देश में मिले, या फिर पूर्णतः अलग रहे। भारत की आजादी के बाद काश्मीर नरेश हरिसिंह ने भारत एवं पाकिस्तान से अलग रहने का निर्णय लिया। जिन्ना काश्मीर पर अपना नैसर्गिक अधिकार समझता था। इसके तीन प्रमुख कारण थे-

(1) पाकिस्तान तथा काश्मीर की सीमाएं एक दूसरे से मिलती थीं।

(2) काश्मीर में हिन्दुओं की बजाय मुस्लिम जनसंख्या अधिक थी।

(3) काश्मीर से कुछ नदियां निकलती थीं जो कुछ दूरी तक भारत में बहने के बाद पाकिस्तान में प्रवेश करती थीं और वे पाकिस्तान के लिए जीवन-रेखा सिद्ध होने वाली थीं।

जब काश्मीर पाकिस्तान में नहीं मिला और काश्मीर के राजा ने भारत एवं पाकिस्तान दोनों से अलग रहने का निर्णय लिया तो 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर कबाइली आक्रमण आक्रमण करवा दिया। पाकिस्तान की वर्दीधारी सेना भी इन पख्तून कबाइलियों के साथ भेजी गई। यह सेना बारामूला में आकर लूटपाट करने लगी। महाराजा हरिसिंह ने भारत सरकार से सहायता मांगी।

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सरदार पटेल ने काश्मीर को बचाने की इच्छा व्यक्त की किंतु नेहरू और माउण्टबेटन ने उनका यह कहकर विरोध किया कि जब तक काश्मीर का राजा भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त न करे तब तक भारतीय सेना काश्मीर में न भेजी जाए। इस पर पटेल ने श्रीनगर तथा बारामूला दर्रे को बचाने के लिए रक्षामंत्री बलदेवसिंह को विश्वास में लेकर भारतीय सुरक्षा दलों को काश्मीर की सीमा पर भारतीय क्षेत्रों में इस प्रकार नियोजित किया जिससे उन्हें तत्काल युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सके। उन्होंने श्रीनगर से पठानकोट तक सड़क बनाने का भी कार्य करवाया। जब पाकिस्तान की सेनाएं श्रीनगर से केवल 35 किलोमीटर दूर रह गईं तो हरिसिंह ने भारत में विलय के कागज पर हस्ताक्षर किए।

 अब नेहरू और माउण्टबेटन काश्मीर में भारतीय सेना को भेजने के लिए विवश थे किंतु माउण्टबेटन मानते थे कि थे मुस्लिम-बहुल राज्य होने तथा पाकिस्तान से सीमाएं लगने से काश्मीर को पाकिस्तान में मिलना चाहिए। जबकि सरदार पटेल मानते थे कि सदियों से हिन्दू राजा का राज्य होने के कारण काश्मीर को भारत में मिलना चाहिए। माउण्टबेटन ने नेहरू को सलाह दी कि वे इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाएं।

सरदार पटेल ने इस प्रस्ताव का विरोध किया परन्तु पण्डित नेहरू, माउण्टबेटन की बातों में आ गए। माउण्टबेटन और नेहरू तो जूनागढ़ के मामले को भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाना चाहते थे किंतु वहाँ भी सरदार वल्लभभाई पटेल और सरदार बलदेवसिंह ने सैनिक कार्यवाही करके जूनागढ़ को बचा लिया था। इसी प्रकार का निर्णय काश्मीर के मामले में भी लिया गया।

उपप्रधान मंत्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रक्षामंत्री सरदार बलदेवसिंह से बात करके पंजाब के गुरदासपुर के रास्ते भारतीय थलसेना को काश्मीर में घुसा दिया और भारतीय वायुसेना के विमान श्रीनगर में उतार दिए। दूसरी ओर माउण्टबेटन की सलाह पर पं. नेहरू इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। 1 जनवरी 1948 को भारत ने सुरक्षा परिषद् में शिकायत की कि भारत के एक अंग काश्मीर पर सशस्त्र कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया है और पाकिस्तान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, दोनों तरीकों से उन्हें सहायता दे रहा है।

इस आक्रमण से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलाने तथा कबाइलियों को सैनिक सहायता न देने को कहा जाये और पाकिस्तान की इस कार्यवाही को भारत पर आक्रमण माना जाये।

15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान ने भारत के आरोपों को अस्वीकार कर दिया और भारत पर बदनीयती का आरोप लगाते हुए कहा कि जम्मू-काश्मीर का भारत में विलय असंवैधानिक है और इसे मान्य नहीं किया जा सकता। सुरक्षा परिषद् ने इस समस्या के समाधान के लिए पांच राष्ट्रों की एक समिति गठित की और इस समिति को मौके पर स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने को कहा।

संयुक्त राष्ट्र समिति ने काश्मीर आकर मौके का निरीक्षण किया और 13 अगस्त 1948 को दोनों पक्षों से युद्ध बन्द करने और समझौता करने हेतु कई सुझाव दिये, जिन पर दोनों पक्षों के बीच लम्बी वार्त्ता हुई। अंत में 1 जनवरी 1949 को दोनों पक्ष युद्ध-विराम के लिए सहमत हो गये।

यह भी तय किया गया कि अन्तिम फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जायेगा। इसके लिए एक अमरीकी नागरिक चेस्टर निमित्ज को प्रशासक नियुक्त किया गया परन्तु पाकिस्तान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और जनमत-संग्रह नहीं हो पाया।

निमित्ज ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। नेहरू एवं माउण्टबेटन ने काश्मीर की समस्या को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाकर बुरी तरह उलझा दिया। इसके लिये सरदार पटेल जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गये। नेहरू की ही गलत नीतियों के कारण ई.1962 में चीन ने भी काश्मीर का बड़ा भू-भाग दबा लिया जो अब भी उसके कब्जे में हैं। ई.1965 में पाकिस्तान और भारत के बीच काश्मीर को लेकर एक बार पुनः युद्ध हुआ तथा पाकिस्तान ने काश्मीर का बहुत बड़ा भू-भाग दबा लिया जो आज भी पाकिस्तान के कब्जे में है।

जब काश्मीर में पाकिस्तान द्वारा आरोपित युद्ध चल रहा था तो भारत सरकार ने पाकिस्तान को बंटवारे में तय हुई सम्पत्तियों का हस्तांतरण रोक दिया। ब्रिटिश-भारत की सम्पत्तियों का 17.5 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को दिया जाना था। नकदी की देखरेख रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के पास थी और उसने कई महीनों के लिए 75 करोड़ रुपए की रकम का हस्तांतरण रोक दिया। गांधीजी के दबाव पर नेहरू सरकार को 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देने पड़े।

काश्मीर पर कबाइली आक्रमण करवाकर पाकिस्तान को वे नदियाँ तो नहीं मिलीं जिन्हें वह संगीनों के बल पर हथियाना चाहता था किंतु काश्मीर में छिड़ी जंग के चलते पाकिस्तान के हिस्से आने वाला 1,65,000 टन हथियार, गोला-बारूद और अन्य रक्षा सामग्री भारत में ही फंस गई। 31 मार्च 1948 तक भारत ने इसमें से केवल 4,730 टन ही जारी किया और फिर 18,000 टन 10 सितम्बर 1948 तक दिया। पाकिस्तान का दावा था कि इस तारीख तक भारत के पास पाकिस्तान के हिस्से की 1,42,000 टन युद्ध-सामग्री बकाया थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बीकानेर महाराजा सादूलसिंह पर पाकिस्तानी मकड़जाल

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भारत की आजादी के समय बीकानेर रियासत भारत के उन राज्यों में सम्मिलित थी जिन्होंने भारत में सम्मिलित होने के लिए सबसे पहले अपनी सहमति दी थी। जब पाकिस्तान बन गया तो मुहम्मद अली जिन्ना ने बीकानेर महाराजा सादूलसिंह पर नए सिरे से पाकिस्तानी मकड़जाल फैंका! दुर्भाग्य से बीकानेर महाराजा सादूलसिंह इस मकड़जाल में फंस गया।

बीकानेर के अधिकारियों तथा बहावलपुर राज्य के प्रधानमंत्री नवाब मुश्ताक अहमद गुरमानी के मध्य भारत सरकार के सैन्य अधिकारी मेजर शॉर्ट की अध्यक्षता में बीकानेर में एक बैठक रखी गयी। 7 नवम्बर 1947 को मेजर शार्ट की मध्यस्थता में दोनों रियासतों के मध्य शरणार्थियों एवं सीमा सम्बन्धी विवादों पर चर्चा हुई तथा एक समझौता भी हुआ। इसके बाद उसी दिन शाम की ट्रेन से मेजर शॉर्ट दिल्ली चला गया और गुरमानी को भी सरकारी रिकॉर्ड में बहावलपुर जाना अंकित कर दिया गया जबकि महाराजा ने गुरमानी को गुप्त मंत्रणा के लिए लालगढ़ में ही रोक लिया।

तीन दिन तक गुरमानी लालगढ़ में रहा। इस दौरान राजमहल का सारा स्टाफ मुसलमानों का रहा। अपवाद स्वरूप कुछ ही हिन्दू कर्मचारियों को महल में प्रवेश दिया गया। इनमें से राज्य के जनसम्पर्क अधिकारी बृजराज कुमार भटनागर भी थे। उन्हें इसलिए प्रवेश दिया गया कि वे महाराजा के अत्यंत विश्वस्त थे तथा उर्दू के जानकार थे। 10 नवम्बर तक गुरमानी और सादूलसिंह के बीच गुप्त मंत्रणा चलती रही।

इस दौरान सादूलसिंह का झुकाव पाकिस्तान की ओर हो गया। यह निर्णय लिया गया कि प्रायोगिक तौर पर छः माह के लिए बीकानेर और बहावलपुर राज्यों के मध्य एक व्यापारिक समझौता हो। समझौता लिखित में हुआ तथा दोनों ओर से हस्ताक्षर करके एक दूसरे को सौंप दिया गया।

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बृजराज कुमार भटनागर ने यह बात बीकानेर में हिन्दुस्तान टाइम्स के संवाददाता दाऊलाल आचार्य को बता दी। यह समाचार 17 नवम्बर 1947 को हिन्दुस्तान टाइम्स के दिल्ली संस्करण में तथा 18 नवम्बर को डाक संस्करण में प्रकाशित हुआ जिससे दिल्ली और बीकानेर में हड़कम्प मच गया। बीकानेर प्रजा परिषद के नेताओं ने इस संधि का विरोध करने का निर्णय लिया और दिल्ली जाकर भारत सरकार को ज्ञापन देने की घोषणा की।

यह रक्षा से सम्बद्ध मामला था तथा संघ सरकार के अधीन आता था इसलिए पटेल ने तुरंत एक सैन्य सम्पर्क अधिकारी को बीकानेर तथा बहावलपुर की सीमा पर नियुक्त किया और बीकानेर महाराजा को लिखा कि वे इस अधिकारी के साथ पूरा सहयोग करें। बीकानेर के गृह मंत्रालय द्वारा समाचार पत्र के संवाददाता को समाचार का स्रोत बताने के लिए कहा गया। उन्हीं दिनों बीकानेर सचिवालय की ओर से रायसिंहनगर के नाजिम को एक तार भेजा गया। इस तार में रायसिंहनगर के नाजिम को सूचित किया गया था कि बहावलपुर रियासत से हमारा व्यापार यथावत चल रहा है। रायसिंहनगर में रेवेन्यू विभाग के भूतपूर्व पेशकार मेघराज पारीक ने वह तार नाजिम के कार्यालय से चुरा लिया और दाऊलाल आचार्य को सौंप दिया। इस तार के प्रकाश में आने के बाद बीकानेर राज्य का गृह विभाग शांत होकर बैठ गया।

बीकानेर महाराजा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचारों का विरोध करते हुए भारत सरकार को लिखा कि- ‘बीकानेर प्रजा परिषद और बीकानेर राज्य के सम्बन्ध ठीक नहीं हैं, इसलिए प्रजा परिषद के एक कार्यकर्ता ने जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स का संवाददाता भी है, इस खबर को प्रकाशित करवाया है ताकि बीकानेर राज्य पर दबाव बनाकर उसे उपनिवेश सरकार द्वारा अधिग्रहीत कर लिया जाये। क्या प्रजा परिषद बीकानेर राज्य को जूनागढ़ तथा हैदराबाद के समकक्ष रखना चाहती है?’

बीकानेर महाराजा सादूलसिंह ने सरदार पटेल से अनुरोध किया कि वह इस सम्बन्ध में दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही में सहायता करें तथा एक आधिकारिक बयान जारी करके इस आरोप को निरस्त करें। इस पर रियासती विभाग ने एक वक्तव्य जारी किया कि कुछ समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार प्रकाशित किए गये हैं कि बीकानेर, पाकिस्तान एवं बहावलपुर के मध्य एक व्यापारिक संधि हुई है।

यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यह समचार पूर्णतः आधारहीन है। ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है। बहावलपुर के मुख्यमंत्री सीमा के दोनों तरफ रह रहे शरणार्थियों में भय फैलने से रोकने के लिए किए जा रहे प्रयासों के लिए मैत्री यात्रा पर आये थे।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि बीकानेर महाराजा सादूलसिंह ने अंतरिम सरकार बनाकर आंशिक मात्रा में सत्ता जनता को सौंपी अवश्य पर रियासत को अलग इकाई रखने हेतु जो पापड़ बेले गये और दुराभिसंधियां की, उनकी सूचना दाऊलाल आचार्य एवं मूलचंद पारीक ने यथासमय उच्चस्थ विभागों को पहुंचायीं, वह तो देशभक्ति की अनोखी मिसाल है। उसी के कारण बीकानेर रियासत भारत में रह पायी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान से आगे

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इस्लाम के नाम पर, जेहाद के नाम पर, काफिरों के साथ न रह पाने के नाम पर, चाकू-छुरों और हथियारों के जोर पर पाकिस्तान तो बन गया किंतु पाकिस्तान से आगे क्या? पाकिस्तान से आगे था केवल पाकिस्तान में रह गए हिन्दुओं का रक्तपात, पाकिस्तानी सिक्खों से हिसां, गरीबी, लूटपाट, आटे की कमी, नागरिक अधिकारों का हनन आदि-आदि, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं!

लाखों लोगों के प्राणों की आहुति लेकर तथा लाखों लोगों को जीते-जी नर्क में धकेलकर पाकिस्तान तो बन गया किंतु पाकिस्तान की आगे की यात्रा आसान नहीं थी। अब तक पाकिस्तान निर्माण के लिए मुस्लिम लीग के नेताओं द्वारा अविभाजित भारत की मुस्लिम जनता को इस नाम पर जोड़े रखा गया था कि मुसलमानों का एक अलग देश होना चाहिए जहाँ भारत के समस्त मुसलमान आराम से रह सकें किंतु अब मुस्लिम लीग के नेताओं को अलग मुस्लिम देश मिल गया था और वे भारत से जा चुके थे।

भारत के अधिकांश धनी एवं शिक्षित मुसलमान अपनी इच्छा से भारत में रहे थे किंतु वे करोड़ों निर्धन एवं अशिक्षित मुसलमान जो पाकिस्तान जाना चाहते थे किंतु अपने काम-धंधों, खेतों-खलिहानों, ढोर-डंगरों और घर-नोहरों को छोड़कर जा नहीं पाए थे, उन्हें यह समझने में बहुत समय लगा कि उन्हें पाकिस्तान न तो कभी मिलना था और न मिल सकता है। निर्धन एवं अशिक्षित मुसलमानों के मन में यह भ्रम उत्पन्न किया गया था कि वे जहाँ बैठे हैं, उन्हें उनका पाकिस्तान वहीं मिल जाएगा। उन्हें यह भी कभी समझ में नहीं आया कि ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता था, न वे ये समझ पाए कि उन्हें मुस्लिम लीगी नेताओं द्वारा छला गया है।

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दूसरी ओर पाकिस्तान नामक नए मुल्क के मुसलमानों को जोड़े रखने के लिए मुस्लिम लीगी नेताओं को जो नया आधार चाहिए था, मुस्लिम लीगी नेता उससे वंचित थे। उनकी गोद में न केवल पाकिस्तान आ गिरा था अपितु कभी खत्म न होने वाली समस्याओं का एक नासूर भी उन्हें प्राप्त हो गया था। पूर्वी-पाकिस्तान और पश्चिमी-पाकिस्तान के बीच 1600 किलोमीटर की हवाई दूरी थी। एक ऐसी सरकार का ढांचा तैयार करना जो पंजाबी दबदबे वाले पश्चिमी-पाकिस्तान और बंगाली बोलने वाले पूर्वी-पाकिस्तान को एक साथ चला सके, मुश्किम काम था।

नवनिर्मित पाकिस्तान में उत्पन्न होने वाले कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण कारखाने भारत में रह गए थे। पाकिस्तान के हिस्से में विश्व के 75 प्रतिशत जूट उत्पादक क्षेत्र आए थे किंतु जूट का सामान तैयार करने वाली एक भी मिल पाकिस्तान को नहीं मिली, सारी मिलें भारत में रह गई थीं। अविभाजित भारत से पाकिस्तान को कपास के लगभग एक-तिहाई खेत मिल गए थे किंतु सूती मिलों का केवल तीसवां हिस्सा ही मिला था।

गैर मुस्लिम उद्यमी जिनका आजादी से पहले पाकिस्तान वाले क्षेत्र के व्यापार पर दबदबा था, अपने व्यापार बंद करके अपनी पूंजी के साथ भारत चले गए थे। जबकि भारत से बहुत कम मुस्लिम पूंजीपति पाकिस्तान आए थे। पूंजी के पलायन से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का दम घुटने लगा जिसे पाकिस्तान के नेताओं ने पाकिस्तान का आर्थिक तौर पर गला घोंटने की हिन्दू चाल समझा।

भारत में रह गए मुसलमानों के प्रश्न पर
जिन्ना द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का त्याग

पाकिस्तान निर्माण के बाद भी 3.54 करोड़ मुसलमान भारत में रह गए। अर्थात् अविभाजित भारत की कुल मुस्लिम जनसंख्या का लगभग एक तिहाई भाग। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष खलीकउज्जमां ने लिखा है कि कराची के लिए रवाना होने से कुछ दिन पहले 1 अगस्त 1947 को मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने निवास 10 औरंगजेब रोड दिल्ली में संविधान सभा के मुस्लिम सदस्यों को विदाई पार्टी के लिए आमंत्रित किया।

इस अवसर पर मि. रिजवानउल्लाह ने जिन्ना से भारत में रह जाने वाले मुसलमानों के भविष्य एवं भारत में उनकी संवैधानिक स्थिति को लेकर प्रश्न पूछे। इन प्रश्नों को सुनकर जिन्ना विचलित हो गया, उसके पास इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं था।

भावी पाकिस्तान का गवर्नर जनरल एवं पाकिस्तान की संविधान सभा का अध्यक्ष घोषित किए जाने के बाद 11 अगस्त 1947 को जिन्ना द्वारा संविधान सभा में दिए गए भाषण में उसने द्विराष्ट्र के सिद्धांत को त्याग दिया।

जिन्ना ने आश्चर्यजनक रूप से एकाएक सेक्यूलर घोषणा की- ‘आप देखेंगे कि वक्त के साथ देश के नागरिक की हैसियत से हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा, मुसलमान मुसलमान नहीं रहेगा, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, क्योंकि ये हर व्यक्ति का व्यक्तिगत ईमान है, बल्कि सियासी हैसियत से।’

जिन्ना की धर्म-निरपेक्षता के बदलते हुए रंगों का विश्लेषण करते हुए तारेक फतेह ने लिखा है-

‘भविष्य का पाकिस्तानी समान अधिकार, विशेषाधिकार और जिम्मेदारियों के साथ रंग, जाति, सम्प्रदाय या समुदाय से अलग केवल एक नागरिक होगा। राज्य के काम में धर्म की कोई भूमिका नहीं होगी। ये केवल किसी की व्यक्तिगत आस्था तक सीमित होगा।

….. चंद महीनों में उन्होंने (जिन्ना ने) अपना रास्ता बदल लिया और एक मध्ययुगीन अमीर की तरह बोलना शुरू कर दिया। इसमें उन्होंने अपने देश से इस्लाम की रक्षा के लिए गोलबंद होने की अपील की और इसके साथ ही अपने ही वादों की मौत का रास्ता साफ कर दिया।

…… पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना सिर्फ एक साल रहे लेकिन इतने ही समय में उन्होंने एक सर्वोच्च प्रशासक के मानक तय कर दिए। लोकतांत्रिक नेताओं की बजाय मुगल शासकों की कार्य-प्रणाली अपनाकर।

……. क्या इस्लामिक राज्य का यही मॉडल था जिसका इंतजार 20वीं सदी के मुसलमान कर रहे थे? यह मनमाने तरीके से खलीफाओं के शासन जैसा था, जो गवर्नर जनरल के नाम से चलता था। इसमें विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं थी, साथ ही धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत को भी पूरी तरह छोड़ दिया गया था। जबकि कुछ ही महीने पहले इसके प्रति कटिबद्धता जताई गई थी।’

दो भाइयों का सहमति से हुआ बंटवारा था यह!

भारत-पाकिस्तान के विभाजन ने 5 से 10 लाख लोगों के प्राण ले लिए, 1.40 करोड़ लोग बे-घर हुए तथा एक करोड़ स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए किंतु भारत और पाकिस्तान दोनों ही तरफ के कुछ लोगों ने प्रेम और सहिष्णुता के नाम पर ढोंग और पाखण्ड की चादर को ओढ़े रखा। वे इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते थे कि यह दो जातियों के बीच चरम पर पहुंच चुकी नस्ली-घृणा का परिणाम था।

गांधीजी के पौत्र राजमोहन गांधी ने लिखा है- ‘बापू (गांधीजी) दोनों देशों के बीच अच्छे सम्बन्धों के लिए कम उत्साहित नहीं थे, वे मानते थे कि नया देश दो भाइयों के बीच सहमति से हुए बंटवारे से पैदा हुआ था।’

गांधीजी से उलट कुछ लोग बड़ी चतुराई से सच्चाई को स्वीकार भी करते हैं। अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने लिखा है- ‘ज्यादातर पाकिस्तानी और भारतीय एक-दूसरे को दुश्मन के तौर पर ही देखते हैं न कि हालात के चलते जुदा हुए दो भाइयों के तौर पर।

…… दोनों देशों के बीच तनाव के बीज काफी शुरुआत में पड़ गए थे। जिन्ना का मेल-मिलाप वाला रुख न तो मुस्लिम लीग में नजर आता था और न ही पाकिस्तान की सिविल और मिलिट्रि ब्यूरोक्रेसी में कहीं दिखाई पड़ता था। इन लोगों को विभाजन के दौरान पैदा हुई नफरत की भावना को बरकरार रखते हुए इस नए मुल्क को अपने अधिकार में रखना ज्यादा आसान लगता था।

भारत के नेताओं, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की नए पाकिस्तान के प्रति बेरुखी के चलते खासतौर पर दोनों देशों के बीच संपत्तियों के बंटवारे के मामले में अनुदार होने से भी सम्बन्धों की सहजता कायम होना और कठिन हो गया।’

गांधीजी की नकली और बनवाटी बातें पाकिस्तान का भविष्य नहीं सुधार सकती थीं। नेहरू और पटेल ने पाकिस्तान का भविष्य देख लिया था। फिर भी कांग्रेस पाकिस्तान से अपनी ओर से प्रेम का प्रदर्शन करती रही किंतु पाकिस्तान कभी सुधर नहीं सका। इस कारण न पाकिस्तान में कुछ बचा न पाकिस्तान से आगे कुछ बचा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जिन्ना का पाकिस्तान बनाम पाकिस्तान का जिन्ना!

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मुहम्मद अली जिन्ना ने पंजाब और बंगाल में लगभग पांच लाख भारतीयों का रक्त बहाकर पाकिस्तान तो पा लिया किंतु न तो जिन्ना का पाकिस्तान किसी काम का नहीं था!

पाकिस्तान बनने के बाद मुहम्मद अली जिन्ना एकांतप्रिय और चिड़चिड़ा हो गया। राष्ट्र का बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा अधिकार उसने अपने हाथों में रखा हुआ था।

जिन्ना के सैन्य-सचिव कर्नल बर्नी ने अपनी डायरी में लिखा है- ‘जिन्ना की दशा उस बच्चे जैसी हो गई थी जिसे किसी चमत्कारवश चांद मिल गया हो और अब वह एक पल के लिए भी उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

…… भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान सरकार को दी गई काम चलाऊ अग्रिम राशि शीघ्र ही समाप्त हो गई। इसलिए भारत से भाग-भाग कर पाकिस्तान आए कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर दी गई। जिन्ना को वह अपमान सहना पड़ा जो उस जैसे गर्वीले व्यक्ति के लिए शर्म से डूब मरने वाली बात थी।

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…… पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना की सरकार ने ब्रिटिश ओवरसीज एयर कार्पोरेशन से एक हवाई जहाज चार्टर किया जो शरणार्थियों के वहन में उपयोग हुआ था। सरकार ने उस कार्पोरेशन के भुगतान का एक चैक जारी किया जो बाउंस हो गया। क्योंकि खाते में उतनी रकम नहीं थी।’

1947 में नए प्रधानमंत्री और कैबीनेट की शपथ ग्रहण के एक सप्ताह बाद जब पाकिस्तान में लोग रमजान के बाद ईद-उल-फित्र की पहली छुट्टी मना रहे थे, तब जिन्ना ने उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत की जनमत से चुनी गई सरकार को अपदस्थ कर दिया। सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. खान के पास पर्याप्त बहुमत था किंतु जिन्ना ने वहाँ अपनी पार्टी की सरकार बनवा दी। जब जिन्ना द्वारा बनवाई गई सरकार प्रांतीय विधान सभा में विश्वास मत प्राप्त करने में असफल रही तो जिन्ना ने सभी बर्खास्त सदस्यों को गिरफ्तार करवा दिया और इस तरह से कृत्रिम बहुमत तैयार किया गया। ……. नौ माह बाद जिन्ना ने सिंध प्रांत की सरकार को अपदस्थ किया जो स्वयं उनके दल की थी। इसके बाद जिन्ना ने पंजाब सूबे की सरकार के राजमहल में तख्ता पलट करने का प्रयास किया।

जिन्ना द्वारा भारत को बदनाम करने के प्रयास

किसी समय हिन्दू-मुस्लिम एकता का दूत माने जाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने जीवन की अधिकतम ऊर्जा पाकिस्तान प्राप्त करने में लगाई। केवल एक वही था जिसकी वजह से पाकिस्तान का निर्माण होकर रहा किंतु जब पाकिस्तान का निर्माण हो गया तब जिन्ना ने भारत पर पाकिस्तान से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं रखने का आरोप लगाया। पाकिस्तान बनने के सात माह बाद उसने पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत पॉल एलिंग से कहा कि उसकी (जिन्ना की) इच्छा थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच वैसा ही सहयोग रहे जैसा अमरीका और कनाडा के बीच रहता है।

पॉल एलिंग ने वाशिंगटन भेजे गए अपने डिप्लोमेटिक टेलिग्राम में लिखा कि जिन्ना ने पाकिस्तान की भारत के साथ सैन्य स्तर पर ऐसी रक्षात्मक साझेदारी की चर्चा की जिसकी कोई तय सीमा नहीं थी। ये उसी तरह की साझेदारी होती जैसी कि अमेरिका ओर कनाडा के बीच है, जिसमें दो पड़ौसियों के बीच मोटे तौर पर बिना पहरे वाली सीमा होती, साझा सैन्यबल होता, मुक्त व्यापार होता और तमाम रास्तों के जरिए एक दूसरे के इलाके में दाखिल होने की आजादी होती।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जिन्ना का मोहभंग – भारत वापस लौटना चाहता था जिन्ना !

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पाकिस्तान से मुहम्मद अली जिन्ना का मोहभंग शीघ्र ही हो गया। उसके अनुयायी जिस तरह का पाकिस्तान बना रहे थे, जिन्ना ने उस तरह के पाकिस्तान की कल्पना नहीं की थी। इस कारण अब जिन्ना पाकिस्तान छोड़कर भारत लौटना चाहता था किंतु वापसी के सारे रास्ते वह स्वयं ही बंद करके गया था। जिन्ना के मुसलमानों ने हिन्दुओं और सिक्खों का जितना खून बहाया था उतना खून तो हूणों और मंगोलों भी हिन्दुओं और बौद्धों का नही बहाया था।

पाकिस्तान बन जाने के बाद भी जिन्ना के लोग भारत की छुंरी में पीठ भौंकने से नहीं चूक रहे थे। इस पर भी पाकिस्तान के लेखक सदैव भारत को हमलावर और स्वयं को पाकसाफ बताते रहे। संयुक्त राज्य अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने लिखा है-

‘ब्रिटिश-भारत से निकले इन दोनों स्वतंत्र उपनिवेशों के बीच दोस्ताना रिश्तों के अपने वादे की हिफाजत जिन्ना ने लगातार मरते दम तक की। उन्हें बंटवारे के दौरान होने वाली हिंसा का अंदाजा नहीं था जिसको ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और अकाली दल की बयानबाजियों ने भड़काया था।

…….. पाकिस्तान को धार्मिक राष्ट्र बनाने की बजाय धर्मनिरपेक्षता को इसके लिए उपयुक्त माना। …….. जिन्ना इस बात के लिए भी इच्छुक थे कि भारत और पाकिस्तान लगातार एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते न रहें।

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…… उन्होंने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल पद से रिटायर होने के बाद मुंबई के अपने पैतृक घर पर लौटने की इच्छा भी जताई थी।’ दिसम्बर 1947 में कराची में ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की बैठक हुई। 450 सदस्यों में से केवल 300 सदस्यों ने इस बैठक में भाग लिया। इस बैठक में एक सदस्य ने जानना चाहा कि क्या जिन्ना फिर से भारत के मुसलमानों का नेतृत्व अपने हाथों में लेना चाहेंगे? जिन्ना ने तुरन्त जवाब दिया- ‘यदि परिषद् ऐसा फैसला लेगी तो मैं भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व करने तथा उनकी कठिनाइयों को बांटने के लिए तुरन्त भारत लौट जाऊंगा।

…… हिन्दुस्तान में एक मुस्लिम लीग अवश्य होना चाहिए। यदि आप लीग को समाप्त करने का विचार कर रहे हैं तो आप ऐसा कर सकते हैं; परन्तु मुझे लगता है कि यह एक बड़ी भूल होगी। मैं जानता हूँ कि वहाँ (भारत में) कुछ प्रयास हो रहा है। मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा अन्य लोग भारत में मुसलमानों की पहचान समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा मत होने दीजिए। ऐसा मत कीजिए।’

जिन्ना के पाकिस्तान चले जाने के बाद भी भारत सरकार ने जिन्ना का बंबई के माउंट प्लीजेंट रोड पर स्थित बंगला अधिग्रहीत नहीं किया था। इसे लेकर संविधान सभा के भीतर एवं बाहर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से बड़े अटपटे प्रश्न पूछे जाते थे। अंततः नेहरू ने पाकिस्तान में हिंदुस्तान के पहले उच्चायुक्त श्रीप्रकाश से टेलिफोन पर कहा कि जिन्ना के बंगले को लेकर उनकी सरकार की स्थिति बहुत संकोच-जनक होती जा रही है।

इसलिए वे जिन्ना से मिलकर, इस बारे में उनकी ख्वाहिश का पता कर लें और यह भी जानकारी लें कि वे उस बंगले का कितना किराया चाहेंगे? श्रीप्रकाश ने जिन्ना से जब यह पूछा तो वह अवाक रह गए। फिर लगभग कातर स्वर में कहा- ‘श्रीप्रकाश, जवाहरलाल से कहो, वे मेरा दिल न तोड़ें, शायद तुम नहीं जानते हो कि बंबई को मैं कितना प्यार करता हूँ। अभी भी मेरी मंशा बंबई लौटकर उसी बंगले में रहने की है।’

श्रीप्रकाश जिन्ना के पास वकालात का प्रशिक्षण ले चुके थे और उसके स्नेहभाजन थे। जिन्ना के कहने पर ही नेहरू ने उन्हें पाकिस्तान में भारत का पहला उच्चायुक्त नियुक्त किया था। ….. जिन्ना के मन में कहीं गहरे विभाजन का अंतर्द्वन्द्व चल रहा था। चाहे-अनचाहे पाकिस्तान जो शकल अख्तियार करने लगा था, वह उनकी गंभीर चिंता का सबब बनता जा रहा था। पाकिस्तान से जिन्ना का मोहभंग हो चुका था।

जिन्ना के अंतिम दिनों के संस्मरण में ले. कर्नल डॉ. इलाहीबक्श ने लिखा है कि गहरी उदासी के आलम में जिन्ना ने उनसे कहा था, डॉक्टर पाकस्तिान मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान मुस्लिम लीग का विभाजन

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दिसम्बर 1947 में कराची में हुई ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की बैठक में भारत एवं पाकिस्तान के लिए दो स्वतंत्र मुस्लिम लीग गठित करने का निर्णय लिया गया। ई.1934 से मुहम्मद अली जिन्ना ही ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का अध्यक्ष था किंतु अब जिन्ना ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग का अध्यक्ष रह गया। ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग के लिए दूसरे अध्यक्ष की तलाश की गई।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग भी पाकिस्तान की राजनीति में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकी।

पाकिस्तान ने लिया गांधीजी का बलिदान

जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ, उस समय दोनों देशों के सैनिक, आर्थिक एवं वित्तीय संसाधनों का भी बंटवारा किया गया। अखण्ड भारत के जो प्रांत पाकिस्तान में मिलने वाले थे, उन प्रांतों पर भारत सरकार का 300 करोड़ रुपए का कर्ज था जो उन प्रांतों द्वारा भारत सरकार को लौटाया जाना था।

यह तय किया गया कि पाकिस्तान इस कर्ज को चार साल में चुकाएगा। विभाजन के समझौते के अनुसार भारत के प्रति पाकिस्तान की देनदारियां 300 करोड़ रुपए थीं। यह राशि 15 अगस्त 1952 के बाद 50 समान किश्तों में पाकिस्तान द्वारा भारत को चुकाई जानी थी।

पाकिस्तान इस ऋण-अदायगी के लिए प्रतिवर्ष अपने बजट में 7.5 करोड़ रुपये का प्रावधान करता था किंतु उसने यह राशि भारत को कभी नहीं चुकाई। दूसरी तरफ पाकिस्तान भारत से प्रतिरक्षा भण्डारों के बदले में 55 करोड़ रुपए मांगता था।

गोपाल गोडसे ने लिखा है कि भारत सरकार की तरफ से पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपए दिए जाने थे जिसमें से 20 करोड़ रुपए तुरंत ही पाकिस्तान को दे दिए गए। शेष 55 करोड़ रुपए तब दिए जाने थे जब कि पाकिस्तान में जा रहे प्रांत अपना कर्ज भारत सरकार को चुका देंगे। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा भारत सरकार से 55 करोड़ रुपए की मांग की। इस पर सरदार पटेल ने कहा कि पाकिस्तान को यह राशि काश्मीर समस्या का समाधान होने के बाद दी जाएगी।

पटेल का कहना था कि पाकिस्तान इस राशि का उपयोग भारत के विरुद्ध हथियार खरीदने में करेगा। नेहरू मंत्रिमण्डल ने पटेल के इस निर्णय पर स्वीकृति दे दी। जिन्ना ने इस राशि के लिए माउंटबेटन पर दबाव डाला। माउंटबेटन ने गांधीजी से कहा कि वे नेहरू और पटेल से बात करके पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाएं। पटेल ने गांधीजी को साफ इन्कार कर दिया तो गांधीजी 13 जनवरी 1948 को पटेल के विरुद्ध दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए। गांधीजी के उपवास का निर्णय पटेल को भाया नहीं और वे दिल्ली छोड़कर बम्बई चले गए।

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उपवास तोड़ने की जो शर्तें गांधीजी ने रखी थीं, उन्हें देश की जनता ने पसंद नहीं किया। पाकिस्तान को 55 करोड़ की रकम बिना शर्त, अविलम्ब दे दी जाए। उनके इस आग्रह ने असंख्य व्यक्तियों को आक्रोश से भर दिया। 12 जनवरी 1948 को पत्रकारों के बीच सरदार पटेल ने एक वक्तव्य दिया-

‘काश्मीर पर आक्रमण के प्रतिरोध की प्रक्रिया के रूप में इस संधि की कार्यवाही को अभी स्थगित करके हमने न्यायोचित कार्य किया है। हम इस संधि के प्रति निष्ठावान हैं, वचनबद्ध हैं, यह हमने पाकिस्तान शासन को एक बार नहीं, अनेक बार कहा है किंतु इस संधि में रुपया देने की निश्चित अवधि जैसा कोई बन्धन हमारे ऊपर नहीं है। पाकिस्तान ने अपनी सेना की सहायता से हमसे सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है और उसके और अधिक विस्तार की भयानक संभावना है। ऐसी अवस्था में संधि का दुरुपयोग संभव है। ऋण के उत्तरदायित्व को स्वीकार करना, और सम्पत्ति का बंटवारा करना जैसे संधि में समाविष्ट अनुबन्धों पर उसका विपरीत परिणाम होगा। उस दशा में पाकिस्तान किसी भी प्रकार से सन्धि की शेष राशि प्राप्त करने के लिए अपनी मांग न्याय-संगत रूप से प्रस्तुत नहीं कर सकेगा। ‘

गांधीजी के दबाव में नेहरू ने 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दे दिए। विचित्र स्थिति थी, जिस देश से हिन्दुओं की कटी हुई लाशों की ट्रेनें आ रही थीं और जो देश भारत के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा था, भारत उसी देश को 55 करोड़ रुपए दे रहा था जबकि अभी तक पाकिस्तान के प्रांतों का 300 करोड़ रुपए का कर्ज वापिस लौटना बाकी था। उन्हीं दिनों गांधीजी ने घोषणा की कि वे जिन्ना को मनाने के लिए एक डेलिगेशन के साथ भारत-पाकिस्तान की सीमा पार करके पाकिस्तान जाएंगे ताकि पाकिस्तान को पुनः भारत में मिलाया जा सके।

गांधीजी ने बम्बई के कपास व्यापारी जहांगीर पटेल को पाकिस्तान भेजा ताकि वह जिन्ना से मिलकर गांधीजी की पाकिस्तान यात्रा का प्रबंध कर सके। …… भारत से पैदल चलकर पाकिस्तान पहुंचना और वहाँ भी हर जगह पैदल ही घूमना, इस उपाय से गांधीजी निःसंदेह एक विलक्षण आध्यात्मिक आभा का प्रकाशन करते किंतु उस समय उनके पैरों में इतनी भी शक्ति नहीं थी कि उठकर बिड़ला हाउस के लॉन तक जा सकते।

उन्हीं दिनों एक और घटना हुई। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिन्दू शरणार्थी अपना सर्वस्व गांवाकर भारत आ रहे थे, उनमें से बहुत से हिन्दू दिल्ली भी आए और उन्होंने हिन्दू मंदिरों, गुरुद्वारों तथा स्कूलों में शरण ली। जब दिल्ली के समस्त सार्वजनिक स्थल शरणार्थियों से भर गए तो पाकिस्तान से आए कुछ हिन्दू शरणार्थी दिल्ली की एक मस्जिद में घुस गए। जब गांधीजी को यह ज्ञात हुआ तो वे मस्जिद के सामने धरने पर बैठ गए और शरणार्थियों से मस्जिद खाली करवाने के लिए सरकार पर दवाब बनाने लगे।

सरकार को हिन्दू शरणार्थियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करनी पड़ी। जिस समय हिन्दू शरणार्थियों को मस्जिद से उठाकर फैंका जा रहा था, उस समय दिल्ली में तेज बारिश हो रही थी जिसके कारण औरतें और बच्चे ठण्ड से ठिठुरने तथा रोने लगे। कहा जाता है कि महाराष्ट्र से दिल्ली आए नाथूराम गोडसे नामक एक युवा पत्रकार ने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा। हिन्दू बच्चों को अपने ही देश में पिटते, रोते और ठण्ड तथा भूख से कांपते देखकर गोडसे का मन रोने लगा। उसने गांधीजी का वध करने का प्रण लिया।

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने अपना प्रण पूरा किया और दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधीजी को गोली मार दी। गोडसे ने अपने कृत्य को गांधी वध बताते हुए, इसका निर्णय इतिहास पर छोड़ दिया कि अगर भविष्य में तटस्थ इतिहास लिखा जाएगा तो वह अवश्य ही गोडसे के साथ न्याय करेगा।

जिस प्रकार गांधीजी भारत में अधिक दिन जीवित नहीं रह सके, जिस प्रकार मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सका, उसी प्रकार पाकिस्तान मुस्लिम लीग भी पाकिस्तान की राजनीति में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान से मोहभंग

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पाकिस्तान का जनक मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान को अपनी रचना समझता था तथा निरंकुश शासक की तरह व्यवहार करता था इसलिए पाकिस्तान बनने के कुछ ही समय बाद जिन्ना के साथियों ने जिन्ना की उपेक्षा करनी आरम्भ कर दी। इस कारण जिन्ना का पाकिस्तान से मोहभंग हो गया था। इस सम्बन्ध में कुछ चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं।

पाकिस्तानी पत्रकार जमर नियाजी ने अपनी पुस्तक ‘प्रेस इन चेन्स’ में लिखा है-

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‘अपने द्वारा निर्मित किए गए पाकिस्तान से जिन्ना का पूरी तरह से मोह भंग हो चुका था। लियाकत अली खाँ ने जिन्ना के निर्देशों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी थी। इस सब ने जिन्ना को बिना बात के लियाकत अली खाँ को झिड़कने के लिए उकसाया और उसने (जिन्ना ने) निराशा में यह भी कह दिया कि वह (जिन्ना) वापस जाकर नेहरू से कहना पसंद करेगा कि अतीत को भूलकर फिर से साथ हो जाएँ। जिन्ना का फिजीशियन जो इस घटना का साक्षी था, ने इस कथन को प्रमाणित किया है। यह बीमार जिन्ना के दुःखद अंत के कुछ दिन पहले की बात है।’

30 अक्टूबर 1947 को जिन्ना ने लाहौर में कहा- ‘कुछ लोग जरूर यह सोच सकते हैं कि 3 जून की योजना का अंगीकरण मुस्लिम लीग की एक भूल थी।’ जिन्ना ने भारत विभाजन के समय लाखों लोगों की मौत एवं विशाल सम्पत्ति की बर्बादी के लिए उकसाने वाली अव्यवस्था के लिए सेनाओं को दोषी ठहराया। अंत में मौतों का स्प्ष्टीकरण देते हुए जिन्ना ने कहा- ‘हमारा मजहब हमें सिखाता है कि हमें मौत के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। एक धार्मिक कारण के लिए शहीद की मौत से अधिक बेहतर उद्धार मुसलमानों के लिए कोई नहीं है।’

पाकिस्तान को नकार दिया जिन्ना की बेटी ने

मुहम्मद अली जिन्ना की पुत्री दीना वाडिया भारत-पाक विभाजन के बाद अपने पिता के साथ पाकिस्तान नहीं गई जो कि पाकिस्तान का गवर्नर जनरल था। उसने ई.1938 में एक भारतीय पारसी युवक नेविले वाडिया से विवाह कर लिया था। इसलिए वह अपने पति के साथ भारत में ही रही तथा अपनी मृत्यु होने तक साधारण नागरिक की हैसियत से भारत के बम्बई शहर में ही रहती रही। उसे अपने पिता के पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं था।

जिन्ना की बीमारी

जिन्ना को ई.1941 से फेंफड़ों का संक्रमण तथा खांसी रहती थी। वह सिगरेट बहुत पीता था। इस कारण उसे क्षय रोग हो गया था और उसका जीवन अधिक नहीं बचा था किंतु उसने अपनी बीमारी को इस तरह छिपाए रखा कि इस बात को उसके निजी चिकित्सक के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था। पाकिस्तान बनने के कुछ दिन बाद ही उसकी बीमारी बढ़ गई।

जिन्ना की मृत्यु

जब जिन्ना की तबियत अधिक खराब होने लगी तो 14 जुलाई 1948 को उसे स्वास्थ्य लाभ के लिए बलूचिस्तान में स्थित जियारत नामक स्थान पर ले जाया गया। वहाँ भी जब स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ तो उसे 13 अगस्त 1948 को क्वेटा ले जाया गया। 5 सितम्बर से उसकी हालत और अधिक बिगड़ने लगी तथा 11 सितम्बर को उसे गवर्नर जनरल के विशेष विमान से क्वेटा से कराची लाया गया। जहाँ से उसे एक एम्बुलेंस में लिटाकर उसके पैतृक निवास ले जाया गया। 11 सितम्बर 1948 को ही रात में जिन्ना का निधन हो गया। इस प्रकार पाकिस्तान बने अभी ठीक से तेरह महीने भी नहीं हुए थे कि 11 सितम्बर 1948 को जिन्ना का निधन हो गया। ऐसा लगता था कि इस धरती पर वह जैसे पाकिस्तान बनाने के लिए ही आया हो। काम खत्म, जिंदगी खत्म।

लियाकत अली द्वारा मुहम्मद अली की उपेक्षा

जिन्ना की बहिन फातिमा जिन्ना ने अपनी पुस्तक ‘माई ब्रदर’ में लिखा है- ‘जब बीमार जिन्ना कराची हवाई अड्डे पर पहुंचा तो उसका स्वागत करने के लिए कोई वहाँ कोई उपस्थित नहीं था। …… ऐसा लियाकत अली के निर्देश पर हुआ। जिन्ना सड़क पर दो घण्टे से अधिक असहाय अवस्था में पड़ा रहा क्योंकि रास्ते में एम्बुलेंस खराब हो गई थी।’

यह सब जिन्ना और लियाकत अली के बीच गहरी दरार के संकेत थे। पाकिस्तान में नियुक्त भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त श्रीप्रकाश ने लिखा है- ‘दरअसल जिन्ना की मौत तो क्वेटा में ही हो गई थी। जिन्ना के शव को कराची स्थित उसके पैतृक निवास पर पहुंचने के बाद भी आधी रात तक प्रधानमंत्री लियाकत अली सहित किसी को भी जिन्ना की मृत्यु के बारे में नहीं बताया गया।’

यदि जिन्ना दो वर्ष पहले मर जाता

बहुत से लेखकों ने यह मुद्दा उठाया है कियदि भारतीय नेताओं को यह बात पता चल गई होती तो वे भारत की आजादी की जल्दी मचाने की बजाय कुछ दिन शांति से बैठकर जिन्ना की मृत्यु की प्रतीक्षा करते और उसी के साथ भारत विभाजन का खतरा सदैव के लिए टल जाता। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर के साथ एक साक्षात्कार में स्वयं लॉर्ड माउण्टबेटन ने यह बात स्वीकार की।

माउण्टबेटन ने कहा- ‘अगर जिन्ना दो वर्ष पहले अपनी बीमारी से मर जाते तो हम भारत को एक रख सकते थे। वही थे जिन्होंने इसे (भारत की अखण्डता को) असम्भव बना दिया था। जब तक मैं जिन्ना से मिला नहीं, मैं सोच भी नहीं सकता था कि कितनी असम्भव स्थिति है।’

ऐसा नहीं था कि केवल जिन्ना का ही पाकिस्तान से मोहभंग हुआ था, पाकिस्तान से मोहभंग की स्थिति अन्य कई नेताओं की थी। उन सबके अलग-अलग कारण थे। कुछ मुसलमान नेताओं की सम्पत्तियां भारत में रह गई थीं, अब वे उन सम्पत्तियों को याद करके पछताते थे। कुछ मुसलमानों के रिश्तेदार एवं परिवार के सदस्य भारत में ही रह गए थे। इस कारण उनका भी पाकिस्तान से मोहभंग हो गया था।

मण्डल जैसे कुछ दलित नेता जो हिन्दुओं से दूर भागकर पाकिस्तान में आए थे, पाकिस्तान के मुसलमान उनके हाथ का पानी पीने को तैयार नहीं थे, इसलिए उनका भी पाकिस्तान से मोहभंग हो गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जिन्ना के उत्तराधिकारी

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पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना ने भारत में जिस हिंसक राजनीति का आविष्कार किया था, जिन्ना के उत्तराधिकारी उसी लकीर पर आगे बढ़े। इसमें आश्चर्य करने जैसा कुछ भी नहीं था। जिन्ना के उत्तराधिकारी वस्तुतः न केवल उसकी राजनीतिक विरासत के अधकारी थी अपितु उसके विचारों के भी उत्तराधिकारी थे।

पाकिस्तानी नेताओं का इस्लाम खतरे में !

पाकिस्तान के नेताओं के पास पाकिस्तान की जनता को एक रखने और मुस्लिम लीग के नियंत्रण में बनाए रखने के लिए किसी उत्तेजक एवं सनसनीखेज मुद्दे की आवश्यकता थी जो पाकिस्तान के मुसलमानों के लिए योजक सामग्री का काम कर सके। इसलिए पाकिस्तान के मुस्लिम लीगी नेता, पाकिस्तान की जनता को भारत का नाम लेकर डराने लगे।

भारत उनका पानी रोक रहा है, भारत उनका गोला-बारूद रोक रहा है, भारत उनका रुपया रोक रहा है, भारत ने उनका काश्मीर छीन लिया है, भारत ने हैदराबाद, भोपाल और जूनागढ़ पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया है, भारत किसी भी समय पाकिस्तान पर आक्रमण कर सकता है, जैसी बातें पाकिस्तानी नेताओं के भाषणों, प्रेस-सम्बोधनों एवं व्यक्तिगत वार्तालापों में छाई रहतीं।

इससे पाकिस्तान की जनता में भारत के प्रति एक विशेष प्रकार का फोबिया उत्पन्न हो गया। पाकिस्तानी नेताओं के भाषणों में यह बात अनिवार्य रूप से होती थी कि जब तक भारत का अस्तित्व है तब तक पाकिस्तान का इस्लाम खतरे में है। यह ठीक ऐसा ही था जैसे भारत में माताएं रोते हुए बच्चों को चुप करने के लिए किसी अनजाने भूत या बाबा का नाम लेकर डराती हैं। भय और आतंक का एक अनजाना साया पाकिस्तानियों के मानस-पटल पर छाता जा रहा था।

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आजादी के सात माह के भीतर ही बंगाली नेता हुसैन सुहरावर्दी ने पाकिस्तान की संसद को चेताया- ‘मुल्क एक खतरनाक रास्ते पर निकल चुका है। तुम लोग सिर्फ मुस्लिमों की भावनाओं को भड़काने और उनको एकजुट रखने के लिए पाकिस्तान के खतरे में होने का रोना रो रहे हो, ताकि तुम खुद सत्ता में बने रह सको। …… पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बन रहा है जिसकी बुनियाद सिर्फ जज्बात रहेंगे, इस्लाम के खतरे में होने के जज्बात या फिर पाकिस्तान के जज्बे के खतरे में होने के।’

सुहरावर्दी ने भांप लिया था कि मुस्लिम लीग के नेता पाकिस्तान को एक ऐसा राज्य बना रहे हैं जिसे सिर्फ हमले का भूत दिखाकर कब्जे में रखा जा सकेगा और जिसे एक-जुट रखने के लिए पाकिस्तान और भारत के बीच लगातार संघर्ष को भड़काए रखना होगा। ऐसा देश खतरों और शंकाओं से भरा होगा। पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ गुस्से की राष्ट्रीय अवधारणा को बढ़ावा देता है। जिन्ना के उत्तराधिकारी निरंकुशता एवं धर्मांधता के मामले में जिन्ना से भी आगे निकलने वाले थे। पाकिस्तानी लेखक एवं सुप्रसिद्ध पत्रकार तारेक फतेह ने लिखा है-

‘जिन्ना के निधन के बाद इस्लामवादी पूरे हमलावर मूड में आ गए। ऐसे लोग जिन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया था अब उसके अभिभावक बन गए। आधुनिक संविधान बनाने की सभी आशाएं बिखर गईं, जब पूरी दुनिया के इस्लामवादी पाकिस्तान में इकट्ठा होकर खिलाफत के तहत एक और मुल्क बनाने के सपने देखने लगे।

मिस्र के इस्लामपंथी सैद रामादान पाकिस्तान के इस्लामीकरण के लिए कराची आए और पौलेंड के धर्मांतरित मुसलमान मोहम्मद असद ने देश के वजूद से जुड़े प्रमुख सिद्धांतों को लिखने का काम हाथ में लिया।

….. पाकिस्तान की देशी भाषाओं को किनारे लगा दिया गया और एक प्रस्ताव तैयार किया गया जिसके मुताबिक अरबी को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा को बनाने की बात थी …… एक ऐसी भाषा जिसे पाकिस्तानी नहीं बोलते।’

1948 में जिन्ना की मृत्यु के बाद पाकिस्तान का अधिनायकवादी मॉडल लगातार मजबूत होता चला गया। मई 1949 में जब पूर्वी पाकिस्तान के तंगेल के उपचुनावों में मुस्लिम लीग का प्रत्याशी एक नई उभरती हुई पार्टी से हार गया तो प्रधानमंत्री लियाकत अली ने इस परिणाम को अस्वीकार करते हुए संविधान सभा के नवनिर्वाचित सदस्य को कई अन्य विपक्षी कार्यकर्ताओं के साथ जेल भेज दिया। इनमें प्रसिद्ध कम्यूनिस्ट नेता मोनी सिंह भी था जो 22 साल जेल में अथवा भूमिगत रहा। उसे दुबारा स्वतंत्रता तभी मिली जब 1971 में पाकिस्तान टूट गया।

पाकिस्तान के हुक्मरानों की कोशशि यही है कि किस तरह अवाम को भारत के खिलाफ भड़काया जाए। उनका ध्यान हुकूमत की अंधेरगर्दी से हटाकर भारत की तरफ उलझाया जाए। जब भी अपनी हुकूमत खतरे में पाते हैं, ‘काश्मीर पाकिस्तान का’ नारा लगाते हैं,। यही अयूब खाँ ने किया यही याह्या खाँ ने और शायद हर शासक ऐसा ही करता चला जाएगा……. नफरत को मरने नहीं दिया जाता, उसे और बढ़ाया जाता है।

‘हिन्दुस्तान का भेड़िया आया, भेड़िया आया’ की गुहारें मचाकर वहां का हर डिक्टेटर और हर मुल्ला जनता को बेवकूफ बनाता है और खुद मलाई-मक्खन उड़ाता है। यही कारण है कि वहाँ के शासक राष्ट्रनिर्माण की बातें कम और इस्लाम के पुनर्जागरण की बातें ज्यादा बोलते हैं। खुद इक्कीसवीं सदी में रहकर जनता को सोलहवीं सदी से आगे नहीं बढ़ने देना चाहते। ये वास्तव में जिन्ना के उत्तराधिकारी हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध : एक दूसरे से दूर होते चले गए भारत-पाकिस्तान

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भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध पाकिस्तान बनने से पहले ही खराब हो चुके थे। वे कभी सुधर ही नहीं सके। जवाहरलाल नेहरू को पाकिस्तान के कुछ नेताओं से बड़ा प्रेम था किंतु वे भी भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों को बनाकर नहीं रख सके। जवाहर लाल नेहरू सरकार के लिए सबसे पहला खतरा पाकिस्तान द्वारा करवाए गए कबाइली हमले के रूप में ही उत्पन्न हुआ था।

बंटवारे के लगभग एक दशक तक भारत और पाकिस्तान के बीच आना-जाना सरल था। ब्रिटिश काल में बनी रेल-लाइन के सहारे बड़ी संख्या में लोग इधर से उधर जाते थे।

ई.1951 में पाकिस्तान ने अपने लिए नया नागरिकता कानून तैयार किया, इसके बाद जून 1952 में पाकिस्तान से भारत में आने-जाने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य किया गया। यहाँ तक कि तब तक भी एक भारतीय-पाकिस्तानी पासपोर्ट दोनों देशों में आने-जाने के लिए वैध था तथा अंतर्राष्ट्रीय पासपोर्ट 1965 के बाद आवश्यक किया गया। इसके बाद ही वीजा लागू किया गया। यह घटना उस दौर में भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध के स्तर में और अधिक गिरावट की पुष्टि करती है।

विभाजन के बाद दोनों ही देशों में एक दूसरे के लेखकों की पुस्तकें बेची जाती थीं। दोनों देशों के उर्दू शायर बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे देश में जाकर अपनी शायरी पढ़ते थे। व्यापार भी बिना किसी रोक-टोक एवं बिना किसी बाधा के जारी था। दोनों तरफ के राजनेता एवं प्रशासनिक अधिकारी एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। अखबारों के सम्पादक एवं प्रोफेसर भी लगातार एक दूसरे से मिलते रहते थे किंतु धीरे-धीरे यह सब बंद होता चला गया और दोनों देश एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो गए।

बहुत से मुसलमान तो ऐसे भी थे जो रहते तो भारत में थे किंतु स्वयं को पाकिस्तान का नागरिक समझते रहे। बहुत से मुसलमान पाकिस्तान में जाने के बाद पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से भारत लौट आए। पाकिस्तान ने भारत की इस उदारता का लाभ उठाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। एक बार पाकिस्तान ने भारत के उत्तर प्रदेश के निवासी मुहम्मद इस्माइल को भारत में पाकिस्तान का हाईकमिश्नर घोषित कर दिया जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक था ही नहीं।

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जब समाचार पत्रों में यह मामला उछला, तब पाकिस्तान को अपना कदम वापिस लेना पड़ा। इस नियुक्ति के माध्यम से पाकिस्तान यह जताना चाहता था कि भारत में रह रहे सभी मुसलमान वास्तव में पाकिस्तानी ही हैं। पाकिस्तान चले गए बहुत से मुस्लिम नेता यह मानते रहे कि वे पाकिस्तान में रहते हुए भी भारत में स्थित अपनी सम्पत्तियों के मालिक बने रहेंगे। चौधरी खलीक उज्जमां पाकिस्तान बनने से पहले भारत की केन्द्रीय विधान सभा में विपक्ष का नेता हुआ करता था। वह ई.1947 में पाकिस्तान चला गया तथा कराची में रहने लगा। वह पाकिस्तान मुस्लिम लीग का अध्यक्ष बन गया, फिर भी भारत में अपनी सम्पत्ति की देखभाल करने आता रहा। यही वह व्यक्ति था जिसने ई.1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव रखा था। वह स्वयं को उत्तर प्रदेश का ही नागरिक मानता रहा।

जोगिंदर नाथ मण्डल जो मुस्लिम लीग की तरफ से जवाहरलाल नेहरू के अंतरिम मंत्रिमण्डल में मंत्री बना था, दलित कहे जाने वाले समुदाय का बंगाली राजनीतिज्ञ था। ई.1947 में वह अपने पुराने दोस्त मुहम्मद अली जिन्ना के निमंत्रण पर पाकिस्तान चला गया क्योंकि जिन्ना का मानना था कि भारत की राजनीति में ऊँची जाति के लोगों का वर्चस्व था। जिन्ना ने उसे पाकिस्तान का कानून मंत्री बनाया।

ई.1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दू-मुस्लिम दंगे और जिन्ना के निधन के बाद मंडल को अलग-थलग कर दिया गया तथा कैबीनेट के मंत्री की हैसियत से जो फाइलें मण्डल तक जानी चाहिए थीं, वे भी गोपनीय कहकर रोक दी गईं। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ ने जब इस्लाम को राज्य का आधिकारिक धर्म बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया तो मंडल ने महसूस किया कि अब पाकिस्तान में उसके दिन गिनती के ही बचे हैं।

अक्टूबर 1950 में अपने ऊपर हुए मौखिक और शारीरिक हमलों के बाद वह भारत में शरण लेने के लिए कलकत्ता भाग आया। पाकिस्तान सरकार को दिए गए अपने इस्तीफे में उसने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके भविष्य का ख्याल नहीं रखने के लिए जिन्ना के उत्तराधिकारियों की निंदा की।

भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध न कभी सुधरने थे और न कभी सुधरेंगे। वर्तमान समय में भारत.पाकिस्तान सम्बन्ध अपने सबसे निचले स्तर पर हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नदी जल विभाजन – पाकिस्तान का पानी खतरे में

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जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो केवल जनसंख्या एवं भूमि का ही बंटवारा नहीं हुआ, नदियों का बंटवारा भी हुआ किंतु पाकिस्तान ने जिस तरह भूमि के बंटवारे को विवादास्पद बना दिया, उसी प्रकार नदी जल विभाजन को भी विवादास्पद बना दिया।

जबकि वास्तविकता यह थी कि जितनी जनसंख्या पाकिस्तान को मिली थी उसके अनुपात में पाकिस्तान को भूमि भी अधिक मिली थी और नदी जन विभाजन भी पिकस्तान के पक्ष में हुआ था। अविभाजित भारत में हुई 1941 की जनगणना रिपोर्ट में कहा गया था कि सिंधु नदी जल प्रणाली पर 4.60 करोड़ जनसंख्या निर्भर करती है।

रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हुए विभाजन के बाद इसमें से 2.50 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान में चली गई तथा 2.10 करोड़ जनसंख्या भारत में रह गई। …… इस विभाजन के बाद सतलज, रावी और व्यास नदियों से निकलने वाली नहरों के हैडवर्क्स तथा इन नदियों से निकलने वाली 25 में से 20 नहरें भारत में रहीं। एक नहर भारत और पाकिस्तान दोनों के क्षेत्रों में बहती है। भारत चाहता तो पाकिस्तान को जाने वाली समस्त नहरों का पानी रोक सकता था किंतु भारत ने ऐसा नहीं किया।

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20 दिसम्बर 1947 को पाकिस्तान एवं भारत के अभियंताओं के बीच नदी जल विभाजन के लिए इन नहरों के सम्बन्ध में एक यथास्थिति समझौता हुआ जिसकी अवधि 31 मार्च 1948 को समाप्त होनी थी। इसके बाद नया समझौता किया जाना था किंतु वह नहीं हुआ। जिस दिन समझौता समाप्त हुआ, भारत ने उसी दिन दो महत्वपूर्ण नहरों में पानी की आपूर्ति बंद कर दी और एक नया स्थाई समझौता किए जाने की मांग की। पानी की आपूर्ति पुनः एक माह बाद आरम्भ हुई जब दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति हुई कि पाकिस्तान को दूसरे विकल्प का समय दिए बिना पानी की आपूर्ति बंद नहीं की जाएगी।

भारत के नेता नदी जल विभाजन को एक तकनीकी समस्या मानते थे किंतु पाकिस्तान के नेताओं ने इसे पाकिस्तान की कृषि बर्बाद करने की भारतीय साजिश माना। भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार पुनः यथास्थिति बनाए रखने का अस्थाई समझौता हो गया किंतु स्थाई समझौता होना आवश्यक था। इसलिए विश्व बैंक के अध्यक्ष की मध्यस्थता स्वीकार की गई।

विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने इस समस्या के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया जिसमें भारत, पाकिस्तान एवं विश्वबैंक के अभियंता सम्मिलित किए गए। इस समिति ने 5 जून 1954 को भारत एवं पाकिस्तान को निम्नलिखित सुझाव दिए-

(1) सिंधु, झेलम और चिनाव के सारे जल का उपयोग पाकिस्तान को करने दिया जाए तथा झेलम नदी के उस जल को जो काश्मीर में उपयोग में लाया जाता है, उसे भारत को उपयोग में लेने दिया जाए।

(2) सतलज, रावी और व्यास का समस्त जल भारत को उपयोग में लेने दिया जाए। उसमें से कुछ जल भारत 5 वर्ष तक पाकिस्तान को दे।

(3) प्रत्येक देश अपनी भूमि में बांध इत्यादि बनाएगा परंतु योजक नहरों का खर्च भारत उस सीमा तक सहन करेगा, जहाँ तक उसका लाभ भारत को मिलेगा। यह खर्च 40 से 60 लाख के बीच आता है।

(4) विश्व-बैंक की समिति के अनुसार भारत को अपनी 2 लाख एकड़ भूमि के लिए सिंधु नदी जलक्षेत्र का 20 प्रतिशत जल मिलना था। पाकिस्तान को अपनी 4 लाख एकड़ भूमि के लिए 80 प्रतिशत जल मिलना था।

इस समिति की सिफारिशों को मानने से भारत को बहुत हानि होने वाली थी तथा पाकिस्तान को बहुत लाभ होने वाला था क्योंकि योजक नहरों का निर्माण भारत को करना था और उसे केवल 20 प्रतिशत जल मिलना था साथ ही भारत को चिनाव नदी के जल से सदा के लिए वंचित कर दिया गया था। इसके बावजूद भारत ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया जबकि पाकिस्तान ने बहुत सारी ना-नुकर एवं शर्तों के साथ 5 अगस्त 1954 को इन प्रस्तावों को स्वीकार किया।

विश्व-बैंक समिति द्वारा प्रस्तावित इस समझौते को स्वीकार करने के बाद पाकिस्तान ने भारत में सतलुज नदी पर बन रहे भाखड़ा बांध पर आपत्ति खड़ी कर दी एवं विश्व-बैंक से भारत द्वारा समझौते के उल्लंघन की शिकायत की। विश्व-बैंक ने इस शिकायत की जांच की तो पाया कि इस बांध की योजना ई.1920 में बनी थी तथा ई.1946 से इस बांध पर काम चल रहा था।

ई.1952 में गठित विश्व-बैंक समिति को भी इस बांध के बारे में बताया गया था तथा इसका निर्माण समझौते के अंतर्गत ही हो रहा है। ई.1957 में जब सुहरावर्दी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री था, उसने नहरों के जल-बंटवारे को लेकर एक बार फिर से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

1 जून 1957 को सुहरावर्दी ने एसोसिएटेड प्रेस को दिए गए साक्षात्कार में कहा-

‘हम पर भारत की पकड़ के दो शिकंजे नहरी जल एवं काश्मीर हैं। …… भारत ने बांध बना लिए हैं तथा सतलुज एवं दो अन्य नदियों जो पाकिस्तान के पश्चिमी भाग में सिंचाई हेतु जल की आपूर्ति करती हैं, को काट देने का भारत का इरादा है। ऐसा करने के लिए वे अगले वर्ष तैयार रहेंगे। काश्मीर से निकलने वाली तीन नदियों के जल को भी वे नियंत्रित कर सकते हैं।

भारत दावा करता है कि उसे राजस्थान के रेगिस्तान को सिंचित करने के लिए पानी चाहिए। वे पाकिस्तान से कहते हैं कि जल में आने वाली कमी की पूर्ति काश्मीर से निकलने वाली तीनों नदियों के पानी की आवक से कर लें। इसके लिए खर्चीले बांधों एवं नहरों की आवश्यकता होगी, परन्तु मैं नहीं सोचता कि इस योजना के लिए वे हमें कुछ भी चुकाने का सच्चा इरादा रखते हैं।’

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री सुहरावर्दी बड़ी बेशर्मी के साथ भारत से निकलने वाली नदियों के पानी को पाकिस्तान में काम लेने के लिए, न केवल भारत में बनने वाली योजक नहरों एवं बांधों के लिए पैसा मांग रहा था अपितु बड़ी बेशर्मी और ढिठाई के साथ उसे पाकिस्तान में बनने वाले बांधों एवं नहरों के लिए भी भारत से पैसा चाहिए था।

इस पर टिप्पणी करते हुए भारतीय सिंचाई मंत्री एस. के. पाटिल ने एक वक्तव्य दिया-

‘सुहरावर्दी ने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है कि वे नहरी जल-विवाद के बारे में सभी तथ्य एवं सत्य को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करेंगे।’

30 अक्टूबर 1958 को कराची में एक समाचारपत्र सम्मेलन में पाकिस्तान के नए सैनिक शासक जनरल अयूब खाँ ने काश्मीर एवं नहरी जल मसलों पर भारत के साथ युद्ध छेड़ने की धमकी दी। उसने यह भी कहा-

‘पाकिस्तान की जल समस्या के निपटारे के लिए बनी परियोजनाओं को पूरा होने के लिए 10 से 15 वर्ष लगेंगे। अतः इस अवधि में भारत को उसे जल देना चाहिए तथा इन योजनाओं का व्यय भी वहन करना चाहिए। पानी की जो मात्रा हमें अब तक मिलती रही है, वह मिलती रहनी चाहिए अन्यथा हमारी भूमि बंजर हो जाएगी। हमारे पास जो भी संभव है, उसके लिए अन्य रास्ता अपनाने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं रहेगा।’

बेशर्मी के मामले में पाकिस्तानी सैनिक शासक अयूब खाँ प्रधानमंत्री सुहरावर्दी से भी मीलों आगे निकल गया था। वह न केवल पाकिस्तान में बनने वाली नहरों एवं बांधों के लिए भारत से धनराशि मांग रहा था अपितु उसके लिए युद्ध छेड़ने की धमकी भी दे रहा था। यह तो पिण्डारियों की भाषा थी जिन्हें ई.1818 में अंग्रेजों ने कुचलकर पूरे भारत से मिटा दिया था। लगता था अब वही भाषा एक बार फिर से, पाकिस्तान में प्रकट हो रही थी।

भारत के अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बनाए गए दबाव के बाद 17 अप्रेल 1959 को वाशिंगटन में नहरी जल के सम्बन्ध में एक नए अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। 6 एवं 7 मई 1959 को भारतीय संसद में इस समझौते की जानकारी देते हुए भारत के सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्री एम. एम. इब्राहीम ने कहा कि दोनों देशों की सरकारों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया है तथा यह विश्वास दिलाया है कि इस समझौते से राजस्थान नहर का कार्य प्रभावित नहीं होगा।

19 सितम्बर 1960 को कराची में जनरल अयूब एवं भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मध्य सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

1. भारत को तीन पूर्वी नदियों- सतलुज, रावी और व्यास के पानी का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार होगा।

2. पाकिस्तान को पश्चिम की तीन नदियों- झेलम, चिनाव एवं सिन्धु के पानी के पूर्ण प्रयोग का अधिकार होगा।

3. विश्व बैंक और 6 मित्र राष्ट्र अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और पश्चिमी जर्मनी, भारत एवं पाकिस्तान दोनों के योजक नहरों के निर्माण हेतु 1977 तक धन देंगे। तब तक के लिए भारत पाकिस्तान को यथावत् पानी देना जारी रखेगा।

4. भारत ने पाकिस्तान को नई नहरें एवं बांध निर्माण हेतु 100 करोड़ रुपया देना स्वीकार किया।

5. पाकिस्तान को जो पानी मिलेगा, उसकी अवधि पाकिस्तान की प्रार्थना पर बढ़ाई भी जा सकती है परन्तु उसी अनुपात में दी जाने वाली धनराशि की मात्रा में कमी हो सकती है।

भारत-विभाजन के साथ ही पाकिस्तान से चल रहे गम्भीर जल-विवाद के उपरांत भी भारत सरकार की ढिलाई के कारण पिछले बहत्तर सालों से भारत के हिस्से का पानी पाकिस्तान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में बहता रहा है जिसके कारण भारत के पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली आदि राज्यों की जनता प्रादेशिक नदी-जल समझौतों के अनुसार जल की मात्रा प्राप्त करने में असमर्थ है एवं दिल्ली सरकार पर दबाव बनाकर अधिक जल प्राप्त करने तथा दूसरे प्रांत को जल न देने के लिए संघर्षरत है।

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान की ओर से हुए उरीएवं पुलमावा आतंकवादी हमलों के बाद भारत की पुरानी नीति में बदलाव करते हुए भारत की जनता से वायदा किया है कि वे पाकिस्तान के साथ हुए नदी जल विभाजन समझौते के अनुसार पाकिस्तान को जल जाने देंगे। भारत की नदियों से पाकिस्तान को जा रहे अतिरिक्त जल में से भारतीयों के हिस्से के जल को पाकिस्तान की ओर बहने से रोकेंगे।

यदि ऐसा हुआ तो पंजाब, दिल्ली, हरियाणा एवं राजस्थान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में पर्याप्त जल बहने लगेगा तथा उत्तर-पश्चिमी भारत की जनता को सिंचाई एवं पेयजल के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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