Saturday, February 24, 2024
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जिन्ना को दे दो पूरी सरकार

गांधीजी का मानना था कि जिन्ना को पाकिस्तान कभी नहीं मिलेगा, जब तक कि अंग्रेज पाकिस्तान बनाकर उसे न दे दें। गांधीजी अपने साथियों को समझा-समझा कर हार गए थे, अंग्रेज ऐसा कभी नहीं करेंगे, जब तक कांग्रेस का बहुमत इसके विरोध में खड़ा है। विभाजन का फैसला वायसराय के नहीं कांग्रेस के हाथ में है।

कांग्रेस चाहे तो इसे रोक सकती है। अंग्रेजों से कह दो कि वे चले जाएं। जो जैसा है, उसे वैसा ही छोड़कर चले जाएं। उनके पीछे जो भी होगा, हम देख लेंगे। भुगत लेंगे। अगर देश भर में आग लग जाती है, तो लग जाने दो, देश इस आग में तप कर कुन्दन की तरह निखर कर सामने आएगा, देश को अखण्ड रहने दो।

गांधीजी को लगता था कि यदि अंग्रेज सरकार और कांग्रेस धैर्यपूर्वक कुछ समय व्यतीत करें और भारत की आजादी को कुछ दिन के लिए टाल दिया जाए तो भारत का विभाजन रुक सकता है। इसलिए जब गांधीजी ने माउण्टबेटन से पहली बार वार्ता की तो गांधीजी ने उनसे बार बार कहा- ‘भारत को तोड़ियेगा नहीं, काटियेगा नहीं। खून की नदियां बहती हैं तो बहें।’

31 मार्च 1947 को गांधीजी ने एक सार्वजनिक वक्तव्य में कहा– ‘यदि कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार होगी तो यह मेरी मृत्यु के बाद ही होगा। मैं भारत का विभाजन आजीवन नहीं होने दूंगा।’ जब अंतरिम सरकार पूरी तरह विफल साबित होने लगी और जिन्ना किसी भी तरह पाकिस्तान का हठ छोड़ने को तैयार हनीं हुआ तब गांधीजी ने वायसराय को सुझाव दिया कि वे जवाहरलाल के स्थान पर जिन्ना को पूरी सरकार दे दें।

माउण्टबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल जॉनसन ने लिखा है- ‘गांधी ने सम्पूर्ण समस्या को हल करने के लिए आश्चर्यजनक प्रस्ताव रखा। वह यह था कि वर्तमान मंत्रिमण्डल को भंग करके जिन्ना को पूर्णतः मुस्लिम मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।’

माउंटबेटन ने पूछा- ‘जिन्ना की प्रतिक्रिया क्या होगी?’

गांधी ने उत्तर दिया- ‘जिन्ना कहेंगे, यह धूर्त गांधी की चाल है।’

माउंटबेटन ने प्रश्न किया- ‘और क्या उनका कहना सही नहीं होगा?’

गांधी ने कहा- ‘नहीं। मैं बिल्कुल दिल से कह रहा हूँ।’

इस पर माउंटबेटन ने कहा- ‘यदि आप इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की औपचारिक स्वीकृति ला कर दे सकें तो ……. मैं भी विचार करने को राजी हूँ।’

मोसले ने इस घटना को इस प्रकार लिखा है- ‘गाधीजी ने दो दिन माउण्टबेटन से लगातार मुलाकात की तथा दूसरे दिन माउण्टबेटन के समक्ष एक योजना रखी। यह योजना ऐसी थी जिसे देखकर वैवेल चीख उठता। उसकी योजना थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग का गतिरोध आसानी से हटाया जा सकता है। वायसराय को चाहिए कि मि. जिन्ना को बुलाकर सरकार बनाने का काम सौंपा जाए। इस सरकार में सिर्फ मुसलमान ही रहें या हिन्दू और मुसलमान दोनों, यह जिन्ना की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। वायसराय के वीटो के अलावा यह सरकार अपनी मर्जी से शासन चलाने में पूर्ण स्वतंत्र हो। वायसराय ने तुरन्त जवाब दिया कि योजना बड़ी आकर्षक है और वह सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा, यदि कांग्रेस भी इसे व्यावहारिक समझे।

….. कांग्रेस ने इस योजना को बुरी तरह ठुकरा दिया और वायसराय ने भी गांधी को लिखा कि इस योजना के सम्बन्ध में उसके विचारों के बारे में भी गलतफहमी हुई है।’

मोसले ने इस योजना की विफलता का दोष वायसराय पर मंढ़ा है। वे लिखते हैं- ‘बैठक के तुरंत बाद माउण्टबेटन और उसके अधिकारियों ने इस योजना की हत्या शुरू कर दी क्योंकि उनका यह विश्वास था कि यह योजना काम में नहीं लाई जा सकती। यह काम इतनी अच्छी तरह से किया गया कि बहुत जल्द गांधी ने घोषणा कर दी कि वह वायसराय के साथ बातचीत में और हिस्सा नहीं लेगा, सिर्फ कांग्रेस के मामलों में सलाह दिया करेगा।’

आशा और निराशा में झूलने लगा देश

गांधी, नेहरू एवं पटेल आदि अधिकतर कांग्रेसी हिन्दू नेता भारत के विभाजन के विरुद्ध थे। नेहरू विभाजन को लेकर संभवतः अब भी असमंजस में थे। उन्हें लगता था कि कांग्रेस के राष्ट्रवादी मुसलमानों की सहायता से भारत विभाजन को रोका जा सकता है। वे इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि अधिकतर कांग्रेसी मुस्लिम नेता नेहरू-पटेल और गांधी की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे।

एक बार वल्लभभाई पटेल ने हंसी-हंसी में परंतु अति दुःख के साथ कहा था कि- ‘कांग्रेस में केवल एक राष्ट्रीय मुसलमान रह गया है और वह जवाहरलाल नेहरू है।’ राजाजी राजगोपालाचारी जैसे कुछ लोग बेकार के पचड़े में पड़कर भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा समझते थे कि भारत का युक्ति-युक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये। उस समय भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक घनश्यामदास बिड़ला जो कि पिछले बहुत समय से कांग्रेस के बड़े नेताओं को आजादी की लड़ाई के लिए धन एवं संसाधन उपलब्ध कराते रहे थे, भी राजाजी के विचारों से सहमत थे।

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरू से विभाजन स्वीकार करने का अनुरोध किया

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरूजी के नाम एक पत्र लिखकर उन्हें विभाजन की मांग को स्वीकार कर लेने का सुझाव दिया- ‘साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्ति-युक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का ही विरोध कैसे किया जा सकता है……। अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है। मुझे तो पूरा विश्वास है कि अगर आप पाकिस्तान देने को तैयार हो जायें तो मुसलमान उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उनका स्वीकार करना या न करना बाद की बात है फिलहाल हमारा पाकिस्तान की मांग का विरोध करना मुसलमानों के मन में पाकिस्तान की प्यास ही बढ़ायेगा।’

बँटवारा ही एकमात्र रास्ता

वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना ने 1947 की गर्मियों में पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। अस्पतालों और दंगे से तबाह गांवों में उसने साम्प्रदायिक क्रूरता के दृश्य देखे- हाथ-कटे बच्चे, पेट-कटे हुए गर्भवती औरतें, सारे परिवार में अकेला बचा रहने वाला बच्चा! ….. उसका दृढ़ विश्वास हो गया कि उसके पति और साथी ठीक कहते है, बंटवारा ही एकमात्र रास्ता है।

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