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चौदह माह की बच्ची से बलात्कार

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Rape with a girl child

(9 अक्टूबर 2018 को लिखा गया लेख) चौदह माह की बच्ची से बलात्कार भारत की तमाम राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ी करती है।

हमाम में नंगे राजनीतिक दल !

इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां बलात्कार होते हैं और कुछ माह की बच्चियों से लेकर हर आयु की औरतों से बलात्कार होते हैं। कुछ बलात्कार केवल खबर बनकर रह जाते हैं तो कुछ बलात्कारों की चीखें देश के हर कोने में सुनाई देती हैं। गुजरात में 14 साल की एक बच्ची से बलात्कार हुआ। बलात्कारी बिहार से गुजरात में मजदूरी करने आया था।

इस बलात्कार का बदला लेने के लिए गुजरात विधान सभा के कांग्रेसी विधायक अल्पेश ठाकुर अपने साथियों के साथ लाठियां और सरिये लेकर घरों से बाहर आए। उन्होंने बदला लेने का नया तरीका ईजाद किया। उन्होंने यह कहकर पूरे देश की आत्मा पर ही हमला कर दिया कि यूपी और बिहार के लोग रात की रोटी खाकर गुजरात छोड़ दें।

उन्होंने यूपी तथा बिहार से रोजी-रोटी कमाने आए मजदूरों को रात के नौ बजे से सुबह के नौ बजे के बीच में गुजरात छोड़कर जाने का अल्टीमेटम दिया।

आनन-फानन में पचास हजार गुजराती गुजरात छोड़कर चल दिए। जब ये मजदूर अपने सिरों पर गठरियां लेकर पटना और बनारस के रेल्वे स्टेशनों पर उतरे तो पूरे देश में कोहराम मचना शुरु हो गया।

इस कोहराम की चीखें गुजरात के कांग्रेसी नेताओं के लिए आनंद का विषय बनकर गूंजीं। उनकी तो जैसे पौ बारह हो गई। गुजरात के कांग्रेसियों ने गुजरात सरकार पर असफलता, अकर्मण्यता और निष्क्रियता का आरोप लगा दिया। अर्जुन मोड़वाड़िया ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपा ने ही ये हमले करवाए हैं क्योंकि भाजपा का चरित्र दंगे करवाने का रहा है।

महाराष्ट्र कांग्रेेस के अध्यक्ष संजय निरुपम सबसे पहले उछलकर सामने आए। उन्होंने अपने तल्ख बौद्धिक अंदाज में कहा कि मोदीजी यह न भूलें कि उन्हें भी बनारस जाना है। शायद संजय निरुपम खुद भूल गए हैं कि वे बिहार से आते हैं और महाराष्ट्र में बैठे हैं। वे शायद ये भी भूल गए कि कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता तो इटली से आती हैं और उन्हें कहीं नहीं जाना है।

कांग्रेस की एक महिला प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल पर भाजपा पर दंगे भड़काने का अरोप लगाते हुए कहा कि यदि अल्पेश ठाकुर जिम्मेदार हैं तो अभी तक उन्हें बुक क्यों नहीं किया गया? उनका कहने का अर्थ यह था कि अल्पेश पर बेवजह इल्जाम लगाया जा रहा है, असली मुजरिम तो भाजपा की गुजरात सरकार है।

बिहार से लालू यादव के सुपुत्र जो उपमुख्य मंत्री की कुर्सी भोग चुके हैं, उनकी भी लॉटरी लग गई। उन्होंने भी कांग्रेस के साथ सुर मिलाते हुए कहा कि गुजरात में जो कुछ हुआ उसके लिए नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार जिम्मेदार है।

कम्युनिस्टों की भी जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई। एक सुर से भाजपा को गरियाते हुए कह रहे हैं कि भाजपा का तो चरित्र ही दंगे-फसाद करवाने का रहा है।

भाजपा के नेता भी इस घटना के पीछे कांग्रेस को दोषी बताते हुए नहीं थक रहे। इस बार तो खैर भाजपाइयों की मजबूरी है किंतु यदि गुजरात में कांग्रेस सत्ता में होती और भाजपा विपक्ष में होती तो दोनों ओर से संवादों की भाषा बदल जाती। हां बातें केवल और केवल यही होतीं।

देश का यह कैसा चरित्र है! क्या हमारी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को समस्याओं के मूल में जाना और उनके निराकरण के लिए गंभीर चिंतन करना आता ही नहीं है! चीख-पुकार तो इस बात पर मचनी चाहिए थी कि इस देश में छोटी बच्चियों से लेकर हर आयु की औरत से बलात्कार कैसे हो जाता है! चिंता तो इस बात पर होनी चाहिए थी कि एक शांतिप्रिय राज्य के लोग अचानक ही दूसरे प्रांतों से आए लोगों पर हमलावर कैसे बन जाते हैं।

हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्या चौदह माह की बच्ची से बलात्कार जैसी घटनाओं को रोकने के लिए देश की न्यायिक व्यवस्था में भी कोई सुधार करने की आवश्यकता है!

इन दोनों समस्याओं का मूल हमारे सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने में है। इस सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने की बात न करके अपने वोटों की चिंता करना सभी राजनीतिक दलों को राजनीति के हमाम में नंगा सिद्ध करता है, और कुछ नहीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मानव जाति का डी.एन.ए. क्या अप्सराओं ने बदला !

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मानव जाति का डी.एन.ए.
मानव जाति का डी.एन.ए.

मानव जाति का डी.एन.ए. क्या अप्सराओं ने बदला! पढ़ने-सुनने में यह बात विचित्र सी लगती है किंतु इस बात पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

संसार में ऐसा कोई देश नहीं होगा जिसमें अप्सराओं के अस्तित्व के बारे में विश्वास नहीं किया जाता। उनके बारे में सामान्य धारणा है कि अप्सराएं लाखों साल से युवा बनी हुई हैं। वे सुंदर और बेहद आकर्षक नारियां है जो स्वर्गलोक में रहती हैं। वे नृत्य एवं गायन में विशेष दक्ष होती हैं तथा मनुष्यों के साथ पत्नी के रूप में रहने धरती पर आती हैं।

हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के साथ-साथ बौद्ध ग्रंथों में भी अप्सराओं का उल्लेख किया गया है। जैन ग्रंथ भी अप्सराओं का उल्लेख करते हैं। मुस्लिम संस्कृति में उन्हें जन्नत की हूर कहा जाता है तथा माना जाता है कि जो व्यक्ति धरती पर इस्लाम का कार्य करते हुए शहीद होगा, उसे जन्नत में हूरें प्राप्त होंगी।

यूनानी ग्रंथों में अप्सराओं को ‘निफ’ कहा गया है। इसाई पौराणिक कथाओं में अप्सराओं को ‘एल्फ’ कहकर पुकारा गया है। ईसाई एवं हिन्दू धर्म में मान्यता है कि अप्सराएं धरती के मानवों के साथ कुछ समय के लिए पत्नी के रूप में भी रहती हैं।

इस लेख में हमने भारतीय संस्कृत ग्रंथों में वर्णित उन अप्सराओं चर्चा की है जिन्होंने कुछ राजाओं एवं ऋषियों के साथ पत्नी के रूप में रहकर भारतीय आर्यों का डीएनए बदल दिया।

हालांकि आधुनिक विज्ञान हमें देवताओं की संतान नहीं बताएगा, वह हमें सदैव अफ्रीकी मूल की नीग्रो महिला की संतान के रूप में चित्रित करेगा जो वास्तव में बंदर जाति की मादा थी किंतु भारतीय शास्त्रों के अनुसार हम देवताओं की संतान हैं तथा हमारे शरीर में अप्सराओं के रक्त का भी मिश्रण हुआ है।

भारतीयों का पहला ग्रंथ है- ऋग्वेद। ऋग्वेद से लेकर महाभारत तथा अनेक पुराणों में स्वर्ग तथा उसमें रहने वाले देवी-देवताओं और अप्सराओं का उल्लेख हुआ है। अनेक संस्कृत ग्रंथों के अनुसार धरती पर मानव जाति के जन्म लेने से पहले, हिमालय पर्वत के किसी ठण्डे भाग में देवता नामक जाति रहती थी।

देवत गण ज्ञान-विज्ञान एवं संस्कृति में आज के मानवों से काफी उन्नत थे। वे पलक झपकते ही हजारों मील की यात्रा करते थे। वे अमर थे तथा उनके पास खाने-पीने के लिए अद्भुत वस्तुएं थीं। उनके गले के फूल कभी मुर्झाते नहीं थे।

देवता लोग अपने देश को स्वर्ग कहते थे जैसे आज हम अपने देश को भारत कहते हैं। दिव्य शक्तियों का स्वामी होने के कारण उन्हें ‘देवता’ कहते थे तथा कभी मृत्यु न होने के कारण उन्हें अमर कहते थे। स्वर्ग में रहने के कारण उन्हें ‘सुर’, कहा जाता था तथा उनके शत्रुओं को असुर कहा जाता था। सुरों की स्त्रियां सुरा कहलाती थीं। स्त्री-देवता अथवा देवताओं की स्त्री होने के कारण उन्हें ‘देवी’ कहते हैं।

जिस प्रकार मानव समाज ने प्राचीन काल में मंदिरों में नृत्य एवं कीर्तन करने के लिए देवदासियां नियुक्त की थीं तथा सार्वजनिक मनोरंजन के लिए नगरवधुएं नियुक्त की थीं, उसी प्रकार स्वर्ग नामक देश में देवताओं का मनोरंजन करने के लिए कुछ स्त्रियों को नियुक्त किया गया था जिन्हें अप-सुरा अर्थात् ‘निम्न स्तर की देवी’ कहते थे।

इन्हीं अप-सुराओं को हम अप्सरा कहते हैं। चूंकि ये स्वर्गलोक की स्त्रियां थीं तथा स्वर्गलोक धरती के ठण्डे प्रदेश में स्थित था इसलिए ये अप्सराएं गोरे रंग की, आकार में लम्बी और बहुत सुंदर होती थीं।

जब धरती पर मानव संस्कृति का विकास हुआ और साइबेरिया, तिब्बत अथवा पामीर के पठार के आसपास के ठण्डे प्रदेशों में आर्य जाति का उद्भव हुआ तब देवताओं ने आर्य जाति से सम्पर्क स्थापित किया।

देवताओं ने आर्यों को रथ, विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, खेती के लिए उन्नत बीज, गाय, घोड़ा जैसी उपयोगी वस्तुएं प्रदान कीं। आर्यों को संस्कृत भाषा, देवनागरी लिपि तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद नामक तीन वेद देवताओं से ही प्राप्त हुए।

देवताओं से प्राप्त हुए ज्ञान के कारण आर्यों ने राजन्य नामक व्यवस्था स्थापित की। प्रारम्भिक आर्य, देवताओं के राजा इन्द्र तथा विभिन्न देवताओं की पूजा करते थे ताकि उनसे दिव्य शक्तियां प्राप्त हो सकें। यज्ञ एवं हवनों में भी देवताओं को भाग दिया जाता था।

जब देव जाति एवं मानव जाति में सम्पर्क हो गया तो स्वर्ग के देवी-देवता तथा अप्सराएं भी मानव बस्तियों में आने लगे जिसे वे धरती कहते थे। उनके लम्बे सम्पर्क से मानव जाति का डी.एन.ए. बदलने लगा।

देवी-देवता तथा अप्सराएं सामान्यतः मानव समाज के उच्च वर्ग अर्थात् ऋषि, राजा एवं श्रेष्ठि आदि से सम्पर्क रखते थे। आर्यों की सेवा टहल करने वाले निम्न तबके से उनका सम्पर्क नहीं था जिन्हें तब शूद्र कहा जाता था।

कालांतर में देव जाति अपने भोग-विलास के कारण तथा असुरों से निरंतर होने वाले युद्धों के कारण कमजोर होती चली गई तथा देवताओं से प्राप्त ज्ञान एवं विज्ञान के बल पर आर्य ऋषि एवं राजा इतने शक्तिशाली हो गए कि वे देवासुर संग्रामों में भी भाग लेने लगे। इक्ष्वाकु वंश के कई आर्य राजाओं ने देवासुर संग्रामों में देवताओं की सहायता की।

जब राजा दशरथ जैसे इक्ष्वाकु राजा स्वर्ग में जाते थे तो इन्द्र उन्हें अपने सिंहासन के आधे भाग पर बैठाता था।

स्वर्ग का राजा इन्द्र कोई स्थाई व्यक्ति नहीं था, वह अपने तप के क्षीण होने पर बदल जाता था। इसलिए देवताओं से प्राप्त हुए दिव्य ज्ञान के बल पर कुछ आर्य राजा एवं ऋषि तपस्या करके इन्द्र का स्थान प्राप्त करना चाहते थे। अतः इन्द्र इन राजाओं एवं ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिए स्वर्गलोक की अप्सराओं को धरती पर भेजता था। ये अप्सराएं इन राजाओं एवं ऋषियों के साथ पत्नी के रूप में रहकर उनकी तपस्या भंग कर देती थीं।

अप्सराओं द्वारा आर्यों के साथ पत्नी के रूप में रहने का एक कारण और भी था। देवताओं के पास दिव्य शक्तियां थीं जबकि मनुष्य इन दिव्य शक्तियों का स्वामी नहीं था। इस कारण मनुष्य, देवताओं की तुलना में काफी कमजोर था।

इसलिए स्वर्गलोक से कुछ अप्सराओं को आर्य राजाओं के पास भेजा जाता था ताकि वे आर्य राजाओं के सम्पर्क से दिव्य गुणों एवं विशिष्ट शक्तियों से सम्पन्न संतान उत्पन्न कर सकें और अप्सराओं के गर्भ से उत्पन्न मानव, देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता कर सकें।

यही कारण है कि कुछ अप्सराएं धरती पर अकार राजाओं एवं ऋषियों की पत्नी के रूप में रहीं तथा उनके गर्भ से पवनपुत्र हनुमान, बालिपुत्र अंगद, गंगापुत्र भीष्म तथा आचार्य द्रोण जैसे शक्तिसम्पन्न मानवों ने जन्म लिया।

जिस राजा ‘भरत’ के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ हुआ है, उस भरत की माता ‘शकुंतला’ का जन्म स्वर्ग की अप्सरा मेनका के गर्भ से हुआ था, शकुंतला के पिता ऋषि विश्वामित्र थे। अप्सरा का दौहित्र होने से राजा भरत विशिष्ट शक्तियों के स्वामी थे। उन्होंने भारत देश को एकसूत्र में पिरोया तथा एक शक्तिशाली केन्द्रीय राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की।

 गंगापुत्र भीष्म ‘गंगा’ नामक अप्सरा के पुत्र थे। कुछ लोग भ्रमवश उन्हें गंगा-नदी का पुत्र कहते हैं। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था।

अप्सराओं और मानवों के पुत्र-पुत्रियां होने के और भी बहुत से उदाहरण मिलते हैं। महर्षि भरद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य का जन्म घृताची नामक अप्सरा के गर्भ से हुआ था। द्रोणाचार्य अपने समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे।

महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेव का जन्म भी घृताची के गर्भ से हुआ था। भारत की संस्कृति पर शुकदेव का बहुत प्रभाव पड़ा। महर्षि च्वन के पौत्र रूरू का जन्म भी स्वर्ग की अप्सरा घृताची के गर्भ से हुआ था। इस प्रकार मानव जाति का डी.एन.ए. बदलता चला गया।

ऋषि विश्वासु की पुत्री प्रमद्वारा का जन्म स्वर्ग की अप्सरा मेनका के गर्भ से हुआ था। प्रमद्वारा का विवाह घृताची के पुत्र रूरू से हुआ। इनकी कथा देवी भागवत पुराण में मिलती है। कन्नौज नरेश कुशनाभ की सौ पुत्रियों का जन्म घृताची के गर्भ से हुआ था।

माना जाता है कि आज से लगभग चालीस हजार साल पहले जब धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई और वर्तमान गर्मयुग आरम्भ हुआ तो धु्रवों एवं पहाड़ों की बर्फ पिघल गई जिससे धरती पर जल प्लावन अर्थात् जलप्रलय हुई जिसमें स्वर्गलोक नष्ट हो गया। संभवतः देवता अपने विमानों में बैठकर किसी अन्य ग्रह पर चले गए। यही कारण है कि अब धरती पर न देवता आते हैं, न देवियां और न अप्सराएं।

जलप्लावन के समय देवपुत्र मनु ने आर्य बस्तियों की रक्षा की। इसी कारण हम आज मनुष्य, मानव एवं मनुपुत्र कहलाते हैं।

अतः कहा जा सकता है कि जिस प्रकार देवी-देवताओं ने आर्यों को ज्ञान-विज्ञान दिया, उसी प्रकार अप्सराओं ने मानव जाति का डी.एन.ए. दिया। उन्होंने मनुष्यों की संतानों को जन्म देकर धरती के मनुष्यों में स्वर्गलोक के प्राणियों का डीएनए डाल दिया। संभवतः अप्सराओं के मनुष्यों के साथ पत्नी के रूप में रहने के पीछे यही सबसे बड़ा कारण था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दूधर्म में परकाया प्रवेश की ऐतिहासिकता !

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परकाया प्रवेश - bharatkaitihas.com
परकाया प्रवेश

हिन्दूधर्म में परकाया प्रवेश को अस्वाभाविक घटना समझा जाता है किंतु यह प्राणियों का स्वाभाविक धर्म है। परकाया प्रवेश का अर्थ है एक देह को छोड़कर दूसरी देह में प्रवेश करना। माँ के गर्भ में संतान का शरीर बनता है, वहाँ नवीन आत्मा का निर्माण नहीं होता।

माँ के गर्भ में बनने वाली शिशु देह में हँसने-रोने एवं बोलने वाला जीवात्मा कहाँ से आता है? निश्चित रूप से वह किसी अन्य देह को छोड़कर आता है जिसे इसी प्रकृति प्रदत्त एवं स्वाभाविक प्रक्रिया के द्वारा नवीन शरीर की प्राप्ति हाती है।

परमात्मा, देवगण, योगीजन, सिद्धजन और कुछ अन्य प्रकार के दैवीय अस्तित्वों को मां के गर्भ में बन रहे शिशु-शरीर में प्रवेश करने की अनिवार्यता नहीं है। वे स्वयं अपनी शक्तियों के बल पर इच्छानुसार शरीर का निर्माण कर सकते हैं जिसे योगज शरीर कहा जाता है।

माँ के पेट में बन रहे शिशु में आत्मा प्रवेश नहीं करता, जीवात्मा प्रवेश करता है। वह किसी अन्य स्थान से आकर उस निर्माणाधीन शरीर का स्वामी बनता है।

आत्मा और जीवात्मा में अंतर है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है जिसे सुख, दुःख, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, नींद एवं थकान का अनुभव नहीं होता किंतु जीवात्मा को होता है। आत्मा की मृत्यु नहीं होती किंतु जीवात्मा की होती है।

जीवात्मा की मृत्यु और जीवित मनुष्य की मृत्यु में अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए जीवात्मा के स्वरूप को समझना जरूरी हो जाता है।

आत्मा से ही जीवात्मा बनता है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध अंश है किंतु जब आत्मा कर्मों के बंधन से संस्कारित हो जाता है तो वह जीवात्मा का रूप ले-लेता है। परमात्मा, आत्मा एवं जीवात्मा का कोई लिंग नहीं है इसलिए उन्हें स्त्री-लिंग या पुल्लिंग दोनों से सम्बोधित किया जा सकता है।

स्त्री देह और पुरुष देह में आकर बैठने वाला जीवात्मा एक ही होता है। वह अपने संस्कारों के आवरण के कारण मोहयुक्त होकर स्त्री-देह या पुरुष-देह का चयन करता है।

जीवात्मा अपने जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों के कारण काले, गोरे, अमीर, गरीब, स्वस्थ, रुग्ण आदि प्रकार की देह का चयन करता है। जीवात्मा के ये संस्कार उसके द्वारा किए गए कर्मों से उत्पन्न होते हैं।

यदि पुनर्जन्म संभव है और शाश्वत सत्य है तो परकाया प्रवेश की घटनाएं भी संभव हैं और शाश्वत सत्य हैं।

परकाया प्रवेश की थोड़ी बहुत शक्ति प्रत्येक प्राणी में होती है। यदि हम चींटी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते तो इसका अर्थ है कि चींटी ने किसी न किसी रूप में हमारे भीतर प्रवेश कर लिया है। यह परकाया प्रवेश का सबसे छोटा रूप है जिसमें एक प्राणी केवल संवेदना या भावना बनकर दूसरे प्राणी के मन, बुद्धि एवं हृदय में प्रवेश कर जाता है।

जब यह संवेदना या भावना विराट रूप धर लेती है तो एक प्राणी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ दूसरे प्राणी की देह में प्रवेश कर लेता है।

यहाँ प्रत्येक शब्द पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण अस्तित्व का अर्थ है संस्कारों से युक्त आत्मा अर्थात् जीवात्मा। इसमें शरीर या देह सम्मिलित नहीं है। एक जीवात्मा किसी अन्य जीवात्मा में प्रवेश नहीं कर सकता है, केवल दूसरी काया अथवा किसी दूसरे प्राणी की काया में प्रवेश कर सकता है।

हमारी इस वीडियो में परकाया प्रवेश की जिस संदर्भ में चर्चा की जानी है वह आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा किए गए परकाया प्रवेश की है। अर्थात् एक जीवात्मा द्वारा एक शरीर में निवास करते हुए ही, अपना शरीर छोडकर, दूसरे जीवित या मृत शरीर में प्रवेश कर जाना।

तंत्र सा‘, ‘मंत्र महार्णव’, ‘मंत्र महोदधि’ आदि तंत्र सम्बधी प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है।

‘व्यास भाष्य’ के अनुसार अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास; निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और नाड़ियों में संयम स्थापित करके चित्त के उनमें आवागमन के मार्ग का आभास किया जाता है।

चित्त के परिभ्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद साधक, योगी, तपस्वी अथवा संत पुरूष अपनी समस्त इन्द्रियों सहित चित्त को निकालकर परकाया प्रवेश कर जाते हैं।

‘भोजवृत्ति’ के अनुसार भौतिक बन्धनों के कारणों को समाधि द्वारा शिथिल किया जाता है। नाड़ियों में इन बन्धनों के कारण ही चित्त अस्थिर रहता है। नाड़ियों की शिथिलता से चित्त को अपने लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद योगी अथवा साधक अपने चित्त को इन्द्रियों सहित दूसरे अन्य किसी शरीर में प्रविष्ट करवा सकता है।

जैन धर्म में सूक्ष्मतर शरीर अर्थात् आत्मा को अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, अशब्द, अरस, चैतन्य स्वरूप और इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य कहा गया है। स्थूल और सूक्ष्म के अतिरिक्त आत्मा को धर्म में संसारी और मुक्त रूप से जाना गया है।

यूनानी पद्धति में परकाया प्रवेश को छाया पुरूष से जोड़ा गया है।

विभिन्न त्राटक क्रियाओं द्वारा परकाया प्रवेश के रहस्य को सिद्ध किया जा सकता है। हठ योगी परकाया प्रवेश सिद्धि में त्राटक क्रियाओं द्वारा मन की गति को स्थिर और नियंत्रित करने के बाद परकाया प्रवेश में सिद्ध होते हैं।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ परकाया प्रवेश की घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनमें महाभारत तथा योग वसिष्ठ आदि भी सम्मिलित हैं।

महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में आई एक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र किसी कारण, ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गया। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा के शिष्य ‘विपुल’ को योग दृष्टि से ज्ञात हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु-पत्नी से बदला लेने वाला है। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु-पत्नी के शरीर में प्रवेश करके उसे इन्द्र से बचाया।

महाभारत के शान्ति पर्व में वर्णन है कि सुलभा नामक एक विदुषी महिला, अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट होकर, अन्य विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक नहीं था।

योग वसिष्ठ नामक ग्रंथ में महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को परकाया प्रवेश की विधि समझाते हुए कहते हैं कि जिस तरह वायु पुष्पों से गंध ख्रींचकर उसका सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से करा देती है, उसी तरह योगी, रेचक के अभ्यास से कुंडलिनी रूपी घर से बाहर निकलकर दूसरे शरीर में जीव का सम्बन्ध कराते हैं।

‘पातंजलि योगसूत्र’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में कई शरीर धारण तथा परकाया प्रवेश जैसी अनेक योग विभूतियों का वर्णन है।

बहुत से नाथ योगियों को भी परकाया प्रवेश की विद्या प्राप्त थी। नाथ साहित्य में योगी मछन्दरनाथ का बड़ा आदर है। नाथ साहित्य में उल्लेख मिलता है कि योगी मछन्दरनाथ ने एक बार एक बकरे के शरीर में परकाया प्रवेश किया। एक योगिनी को इस बात का पता चल गया। उसने मछंदरनाथ को उस बकरे के शरीर में ही सीमित कर दिया तथा अपने घर में बांध लिया।

जब कई दिनों तक गुरु वापस नहीं लौटे तो उनके शिष्य गोरखनाथ, मछंदरनाथ को ढूंढने निकले। बहुत से स्थानों का भ्रमण करते हुए गोरखनाथ कामरूप नामक देश में पहुंचे। आज का आसाम एवं बंगाल ही उस काल का कामरूप है।

गोरखनाथ को अपने गुरु मच्छंदरनाथ कामरूप देश के एक गांव में एक रूपसी तांत्रिक युवती के घर में बकरे के रूप में बंधे हुए मिले। गोरखनाथ ने जोर से आवाज लगाई- जाग मछंदर गोरख आया।

गोरख की आवाज सुनकर मछंदर को अपनी सिद्धियां पुनः स्मरण हो गईं और वे संकलप मात्र से बकरे का शरीर त्याग कर फिर से अपने मूल शरीर में आ गए।

‘भगवान् शंकराचार्य के अनुसार यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्र बार जप कर लिया जाए तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

रानी चूड़ाला द्वारा अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश की घटना बहुत प्रसिद्ध है। इस आख्यान के अनुसार शिखिध्वज नामक एक राजा समाधि में बैठ गए। उनकी रानी चूड़ाला पर उनके शरीर की रक्षा की जिम्मेदारी थी।

चूड़ाला दिन में कुंभ नामक एक व्यक्ति के मृत शरीर में परकाया प्रवेश करके अपने पति के शरीर की रक्षा करती थी और रात्रि में वह मदनिका नामक एक मृत स्त्री के शरीर में प्रवेश करके जीवन-संगिनी के रूप में अपने पति की सेवा करती थी।

ऐसा करते हुए बहुत दिन बीत गए किंतु राजा शिखिध्वज की समाधि नहीं टूटी।  एक दिन चूड़ाला ने अपने पति की नाड़ी परीक्षा की तथा उनके जीव की सही स्थिति का पता लगाया। वह समझ गई कि उसके पति जीवित तो हैं किंतु समाधि की जिस अवस्था में पहुंच गए हैं, वहाँ से उन्हें जगाया जाना संभव नहीं है।

अतः देवी चूड़ाला ने अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश करने का निर्णय लिया। यह एक अनोखी घटना होने वाली थी। ठीक उसी प्रकार की जिस प्रकार देवी सुलभा ने राजा जनक के जीवित रहते ही उनके शरीर में प्रवेश कर लिया था।

चूड़ाला ने शिखिध्वज के शरीर में प्रवेश करके उनकी चेतना को स्पंदित किया और स्वयं बाहर आकर अपने शरीर में प्रवेश कर गई, जैसे कोई चिड़िया अपने घोंसले में घुस जाती है।

बाहर आकर चूड़ाला एक पुष्पाच्छादित वृक्ष के नीचे बैठकर सामगायन करने लगी। चेतना के स्पंदित होते ही राजा शिखिध्वज की समाधि भंग हो गई और सामगायन सुनकर वे जागृत अवस्था में आ गए।

परकाया प्रवेश गृहस्थों के लिए नहीं है, केवल सिद्धों और योगियों के लिए है। यह योगियों का कौतुक मात्र है। परकाया प्रवेश का कोई लाभ नहीं है। न इसकी आवश्यकता है।

न इससे मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मा की उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए निष्काम कर्म एवं नवधा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्या है भैरवी साधना का रहस्य ?

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mystery of bhairavi sadhna
mystery of bhairavi sadhna

भारतीय तंत्रशास्त्र में भैरवी साधना का रहस्य बताया गया है। इसे बड़ी साधना माना जाता है। तांत्रिक मत के अनुसार ऋग्वेद में सांकेतिक रूप से पंच-चक्रों का उल्लेख हुआ है। इन्हीं पंच-चक्रों में से एक है- भैरवी चक्र। भैरवी चक्र दो प्रकार के होते हैं, एक है चीनाचारा चक्र और दूसरा है शैवमतीय चक्र। चक्र-पूजा हिमालय पर्वत में स्थित चीनाचारा से आरम्भ हुई। यहाँ चीन से आशय हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित एक गांव से है। बहुत काल बाद में चक्रपूजा के साथ पञ्च-चक्रों के अनुकरण में पंच-मकारों को जोड़ा गया।

वामर्माग में पंचमकारों- मद्य, मीन, मांस, मैथुन तथा मुद्रा के माध्यम से साधक की उन्नति का मार्ग ढूंढा गया तथा तंत्र-मंत्र और यंत्र के बल पर सिद्धियों की कामना की गई। इस मत में भैरवी साधना जैसी अनेक साधना पद्धितियों का निर्माण किया गया जिनमें साधक को भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना अनिवार्य था।

तंत्र शास्त्र के अनुसार भैरवी के दस प्रकार हैं। तांत्रिक मतों के अनुसार जब भगवान शिव ने दक्ष के यज्ञ में अपना अपमान होते हुए देखा तो शिव वहाँ से जाने लगे। इस पर सती ने दस शरीर धारण करके दसों दिशाओं में शिवजी के जाने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया।

इन्हें दशविद्या कहा जाता है। यही दस भैरवियां हैं। इनमें से पाताल भैरवी, शमशान भैरवी तथा त्रिपुर भैरवी अधिक प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त कौलेश भैरवी, रुद्र भैरवी, नित्य भैरवी, चैतन्य भैरवी आदि भी होती हैं। इन सबके ध्यान और पूजन की विधियां अलग-अलग हैं ।

तंत्र सधाना में दीक्षा लेने वाली हर स्त्री को भैरवी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है- माँ, शक्ति, शिव की संगिनी। तंत्र ग्रंथों में भगवान शिव भी माँ पार्वती को भैरवी कहकर ही पुकारते हैं। कोई भी तंत्रमार्गी स्त्री ‘भैरवी’ और पुरुष ‘भैरव’ कहकर सम्बोधित किया जाता है।

सनातन मान्यता के अनुसार गुरु-शिष्या के बीच विवाह नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, एक ही गुरु से दीक्षित स्त्री-पुरुष परस्पर विवाह नहीं कर सकते क्योंकि वे गुरु भाई और गुरु बहन होते हैं किंतु कौल मत के अनुसार स्त्री-पुरुष के धर्म-गुरु अलग होने से गृहस्थी में तनाव रह सकता है।

इसलिए कौल मार्गियों ने दो विपरीत नियमों को स्वीकार किया। पहला यह कि एक गुरु के शिष्य एवं शिष्याएं आपस में विवाह कर सकते हैं। दूसरा यह कि गुरु भी अपनी शिष्याओं से विवाह कर सकता है।

तंत्र साधना की कुछ मर्यादाएं निश्चित की गईं जिनकी पालना प्रत्येक साधक को करनी अनिवार्य थी। इस मत के अनुसार भैरवी ‘शक्ति’ का ही एक रूप होती है। तंत्र की सम्पूर्ण भावभूमि ‘शक्ति’ पर आधारित है। इस साधना के माध्यम से साधक को इस तथ्य का साक्षात् कराया जाता है कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का माध्यम नहीं, वरन् शक्ति का उद्गम भी होती है।

शक्ति प्राप्ति की यह क्रिया केवल सदगुरु ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं एवं संवेदनाओं का ज्ञान होता है। इसी कारण तंत्र के क्षेत्र में स्त्री समागम के साथ-साथ गुरु के मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता पड़ती थी।

शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था।

मद्य और माँस के साथ-साथ मीन, मुद्रा, मैथुन आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।

साधारण-तान्त्रिक एवं सिद्ध-तान्त्रिक, दोनों ही अपनी-अपनी साधनाओं के द्वारा ब्रह्म को पाने का प्रयास करते थे किंतु जन-साधारण इन सिद्ध-तान्त्रिकों से डरने लगा।

पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था।

कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोलकर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था। इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का समुचित प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती थी।

भैरवी साधना में कई भेद हैं। प्रथम प्रकार की साधना में स्त्री और पुरुष निर्वस्त्र होकर एक दूसरे से तीन फुट की दूरी पर आमने सामने बैठ कर, एक दूसरे की आँखों में देखते हुए शक्ति मंत्रों का जाप करते हैं।

लगातार ऐसा करते रहने से साधक के अन्दर का काम-भाव ऊर्ध्वमुखी होकर उर्जा के रूप में सहस्र-दल का भेदन करता है।

वहीं अन्तिम चरण में स्त्री और पुरुष सम्भोग करते हुए, स्वयं को नियंत्रण में रखते हैं। दोनों ही शक्ति-मंत्रों का जाप करते हैं और प्रयास करते हैं की स्खलन न हो।

पुरुष के लिए स्खलन पूर्णतः वर्जित होता है क्योंकि स्खलन से उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है। यदि यह आरम्भिक चरणों में हो जाए तो पुरुष साधक की शक्ति का कम ह्रास होता है किंतु साधना के मध्य अथवा अंतिम चरणों में ऐसा हो तो साधन की शक्ति नष्ट हो जाती है तथा साधाना भंग हो जाती है।

एक चक्र के भेदन के बाद ऐसा होने पर बहुत हानि नहीं होती परन्तु किसी चक्र के पास पहुंचकर स्खलन होने पर शक्ति का क्षरण होता है।

इस प्रक्रिया में गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जब काम का आवेग चढ़ता है तो साधक उसे नियंत्रित नहीं कर सकता है। अतः गुरु ही साधक को बताता है कि कैसे उसे नियंत्रित करके ऊपर की और मोड़ा जाए।

इसमें भैरवी का स्खलन होने पर भी, साधक की साधना पर बहुत अंतर नहीं पड़ता क्योंकि साधक को प्राप्त होने वाली शक्ति भैरवी के माध्यम से ही प्राप्त होती है, अतः भैरवी स्वयं सिद्ध होती जाती है।

सहस्र-दल का भेदन करने के लिए आज तक जितने भी प्रयोग हुए हैं, उन सभी प्रयोगों में इसे सबसे अनूठा माना जाता है।

ऐसे साधक को साधना के तुरन्त बाद दिव्य ध्वनियाँ एवं ब्रह्माण्ड में गूंज रहे दिव्य मंत्र सुनाई पड़ते हैं। साधक को दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। साधक के मन में कई महीनों तक दुबारा काम-भाव की उत्पत्ति नहीं होती।

 प्रत्येक साधना में कोई न कोई कठिनाई अवश्य होती है, उसी प्रकार इस साधना में स्वयं पर नियंत्रण रखना सबसे बड़ी कठिनाई है।

धीरे-धीरे भैरवी-साधना, काम-वासना पूर्ति का माध्यम बन कर रह गई। साधक गण, सहस्र-दल भेदन को भूल गए और परम पिता-परमात्मा को भी। इस कारण भैरवी-साधना व्यभिचार-साधना बन गई।

तांत्रिकों की मान्यता है कि जब तक साधक के पास सही मंत्र एवं दीक्षा नहीं होगी, तब तक साधक चाहे कितना भी अभ्यास करे भैरवी साधना का रहस्य बताया जानना असंभव है। भैरवी-तंत्र के अनुसार भैरवी ही गुरु है और गुरु ही भैरवी का रूप है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ऊंदरिया पंथ के साधक साधना-भ्रष्ट साथी की हत्या करते थे!

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ऊंदरिया पंथ
ऊंदरिया पंथ

आज से लगभग पचास साल पहले तक ऊंदरिया पंथ, अरावली की पहाड़ियों में स्थित जयसमंद झील के निकट निवास करने वाले आदिवासियों में प्रचलित था। इस समय इस पंथ की क्या स्थिति है, यह ज्ञात नहीं है।

ऊंदरिया पंथ की संगतों का आयोजन किसी एकांत एवं निर्जन स्थान पर किया जाता था। अरावली की पहाड़ियों में स्थित ये स्थान इतने गुप्त होते थे कि कोई साधारण इंसान तो वहाँ पहुंच ही नहीं सकता था। फिर भी इस पंथ की कुछ जानकारी शेष मानव समाज के सामने आ गई।

इस पंथ ने कब जन्म लिया तथा किसने इस पंथ की स्थापना की, यह ज्ञात नहीं है। इस पंथ का दार्शनिक आधार भी ज्ञात नहीं है और यह भी ज्ञात नहीं है कि इस पंथ के साधक किस सिद्धि के प्रयोजन से यह साधना करते थे! इस पंथ की सदस्यता किस प्रकार दी जाती थी, उसकी भी जानकारी इस पंथ के बाहर किसी को नहीं है!

फिर भी यह निश्चित है कि यह एक वाम मार्गी साधना है। चूंकि इस पंथ की साधना में नियंत्रित मैथुन पर सर्वाधिक जोर दिया जाता है इसलिए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इस साधना का उद्देश्य मनुष्य देह में परमानंद का विस्फोट करके कुण्डलिनी जागरण करना अथवा सहस्रदल भेदन करना आदि रहा होगा।

इस पंथ की साधना सभाओं में स्त्री और पुरुष को जोड़े से आना होता था तथा वे पूर्ण निर्वस्त्र होकर एक बड़े समूह में गोलाकर बैठकर साधना करते थे। साधना के समय प्रत्येक साधक को अपने मन एवं शरीर पर नियंत्रण करना होता था तथा संयम का पालन करना होता था।

इस गोले में एक तरफ पुरुष तथा एक तरफ स्त्रियां बैठती थीं। इनके बीच में एक बड़ा थाल रखा जाता था। इस थाल में सिके हुए मोटे आटे में शक्कर मिलाकर तैयार किया गया एक चूरमा रखा जाता था। इस चूरमे को भी साधना स्थल पर तैयार किया जाता था। यह चूरमा माताजी के भोग के लिए बनाया जाता था। इस चूरमे से सटा हुआ एक कच्चा धागा छत से लटकाया जाता था।

साधना स्थल के लिए ऐसे मकान का चयन किया जाता था जिसकी छतें घास-फूस से बनी होती थीं। इस घास-फूस के नीचे लकड़ी की बल्लियां तथा ऊपर केवेलू होते थे। इस धागे को छत की किसी बल्ली से लटकाया जाता था तथा उसके नीचे चूरमे का थाल रखा जाता था।

 इसके बाद निर्वस्त्र बैठे हुए स्त्री-पुरुष साधक, देवी के आगमन के लिए प्रार्थना करते थे। जब कोई चुहिया इस धागे के सहारे आकर चूरमा खा लेती थी, तब यह समझा जाता था कि देवी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली है तथा उसने प्रसन्न होकर प्रसाद ग्रहण कर लिया है।

कभी-कभी चुहिया के आने में कई-कई दिन लग जाते थे। तब तक समस्त साधक निर्वस्त्र एवं निराहार रहकर साधना करते थे। चुहिया चहल-पहल युक्त या शोर-शराबे के बीच आने में झिझकती थी इसलिए साधक कम से कम हरकत करते थे तथा पूर्ण रूप से मौन रहते थे।

चुहिया का आह्वान रात्रि के समय ही किया जाता था। दिन के समय साधक निर्वस्त्र एवं निराहार रहकर भजन भाव करते थे और देवी को प्रसन्न करने के लिए एक दूसरे के जनन अंगों को स्पर्श करते हुए नाचते थे।

यदि नृत्य के दौरान किसी साधक में काम-भाव जागृत हो जाता था या वह किसी से छेड़खानी कर बैठता था तो उस साधक की तपस्या भंग समझी जाती थी। उसे अन्य साधक मिलकर दण्डित करते थे। इस दौरान उसकी पिटाई की जाती थी। यहाँ तक कि उसकी हत्या भी कर दी जाती थी। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

भजन, गायन एवं नृत्य के समस्त उपक्रम देवी को प्रसन्न करने के लिए होते थे जो रात्रि में चुहिया के रूप में आने वाली होती थी। रात्रि के समय समस्त साधक भजन एवं नृत्य बंद कर देते तथा फिर से गोल घेरे में बैठकर चुहिया के आगमन की प्रतीक्षा में टकटकी लगाकर थाल की ओर देखते रहते थे।

वाममार्गी साधना के दौरान स्त्री देह की अनिवार्यता आदिम युग से चले आ रहे विभिन्न समाजों में थी। यहां तक कि उनका प्रसार अन्य रूपों में मध्यकालीन पंथों में भी हो गया था। गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय की एक शाखा में भजन एवं साधना के लिये एक युवा सुंदर एवं परकीया स्त्री की आवश्यकता होती थी।

ऊंदरिया पंथ की अब क्या स्थिति है तथा इस पंथ के कितने साधक बचे हैं और वे कहाँ निवास करते हैं, इसके बारे में आधुनिक समाज के लोगों को कुछ भी पता नहीं है। शाक्त मत की वाम साधना में खड़े होने वाले पंथों में ऊंदरिया पंथ सबसे अलग माना जा सकता है जिसमें कामातुर होने वाले साथी की हत्या तक कर दी जाती थी। ऐसा उल्लेख अन्य पंथों के साधना इतिहास में नहीं मिला है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कूण्डापंथियों की रहस्यमयी साधना का साधन है नारीदेह !

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कूण्डापंथियों की रहस्यमयी साधना
कूण्डापंथियों की रहस्यमयी साधना

कूण्डापंथियों की रहस्यमयी साधना वामाचारी तंत्र साधना का ही कोई अंग है। इन पंथों को ऊपरी तौर से देखने से पता नहीं चल पाता के ये शैव मत के नाथ पंथ में से निकले हैं या शाक्त मत में से।

भारत में हिन्दू धर्म के भीतर तीन प्रमुख सम्प्रदाय हैं- शैव, शाक्त एवं वैष्णव। शैव सम्प्रदाय के भीतर नाथ पंथ का उद्भव हुआ। कालांतर में नाथों की भी बहुत सी शाखाएं बन गईं। शैवों की तरह शाक्तों में भी नाथ संप्रदाय के कुछ सिद्धांतों को किसी न किसी रूप में अपनाकर लोक-उपासना के जो आयाम खुले, उनमें कूण्डापंथ, आई पंथ, गूदड़ पंथ, दस पंथ, अलखिया पंथ आदि साधना पद्धतियों का विकास हुआ।

कूण्डा पंथ की साधना का आधार शक्ति साधना ही है। आगे चलकर कुण्डा पंथियों ने अरावली की पहाड़ियों में कांचलिया पंथ की स्थापना की तथा इससे मिलते-जुलते पंथों में राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के क्षेत्रों में ऊंदरिया पंथ तथा चोली-पूजन नामक वाम पंथों की स्थापना हुई। इन सभी सम्प्रदायों में कुछ लक्षण नाथ पंथ के तो कुछ लक्षण शाक्त मत के दिखाई पड़ते हैं।

इन पंथों का तत्व दर्शन शाक्त मत से लिया गया है जिसमें नारी देह को मोक्ष प्राप्ति हेतु साधन माना गया है किंतु इसका साधना रूप भैरवी साधना जैसी शाक्त तांत्रिक परम्पराओं से काफी हटकर है।

भैरवी साधना की विभिन्न परम्पराओं में भैरव तथा भैरवी केवल दो ही साधक होते हैं जो किसी निर्जन स्थान पर तंत्र साधन एवं सिद्धि-लाभ करते हैं किंतु कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथा तथा चोली-पूजन पंथों में स्त्री एवं पुरुष साधकों द्वारा सामूहिक साधना की जाती है। बीसपंथियों में भी इसी प्रकार की परम्पराएं एवं क्रियाविधियां हैं।

जिस प्रकार भैरवी साधना में किसी गुरु का मार्ग दर्शन अनिवार्य है, उसी प्रकार कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथा तथा चोली-पूजन पंथों में भी किसी दक्ष गुरु का होना अनिवार्य है जो साधकों को आत्मानुशासन में रख सके तथा उनकी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर सके।

शाक्त मत के उपासकों के अनुसार भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव ‘हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि’ के रूप में ‘मनो-दैहिक’ रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।

हर्षोन्माद की स्थिति को प्राप्त करने के लिए ही शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था।

मद्य और माँस के साथ-साथ मीन (मछली), मुद्रा (विशेष क्रियाएँ), मैथुन (स्त्री संसर्ग) आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।

पाँच मकारों के द्वारा साधक की देह में अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था। कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोलकर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था। इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति करने का प्रावधान था।

 कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथा तथा चोली पूजन पंथों की साधना विधि में कुण्डलिनी जागरण की कोई अवधारणा नहीं है फिर भी साधक के लिए अपनी साधना को उच्चतम स्तर पर ले जाकर सिद्धि प्राप्त करने की अवधारणा मौजूद है।

यद्यपि कूण्डा पंथ का प्रणेता थार रेगिस्तान के प्रसिद्ध शासक रावल मल्लीनाथ को माना जाता है किंतु रावल मल्लीनाथ से पहले भी इस पंथ के सिद्धांत एवं साधना विधियां प्रचलित थीं। इस पंथ के साधकों में धारू मेघवाल, उगमसी भाटी एवं मल्लीनाथ की रानी रूपांदे भी मल्लीनाथ के समकालीन साधक हैं तथा ये लोग मिलकर ही मल्लीनाथ को इस पंथ में लेकर आए थे।

उगमसी भाटी ने रूपां के हाथ में तांबे की वेल पहनाकर उसे अपनी शिष्या बनाया। जब रूपांदे का विवाह महेवा के राजा मल्लीनाथ के साथ हो गया तब उगमसी भाटी महेवा में आए और उन्होंने जागरण का आयोजन किया। रूपांदे को भी उस जागरण में पहुंचने का निमंत्रण मिला किंतु महल के दरवाजे बंद होने से रूपांदे महल से बाहर नहीं निकल सकती थी।

निश्चित रूप से उस काल में भी कूण्डा पंथ की साधना पद्धति को शेष समाज द्वारा अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। अन्यथा रानी रूपांदे पर उस जागरण में जाने पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया होगा।

कूण्डा पंथ की कथाओं के अनुसार मल्लीनाथ के महल के दरवाजे रात्रि में चमत्कारिक रूप से खुल गए तथा रानी रूपांदे राजा मल्लीनाथ को बताए बिना ही जागरण में पहुंच गई। इस पर राजा मल्लीनाथ उसे मारने के लिए तलवार लेकर पहुंचा किंतु रूपांदे की थाली में रखा मांस का प्रसाद चमत्कारिक रूप से फूलों में बदल गया तो मल्लीनाथ भी उगमसी भाटी का शिष्य हो गया।

शिष्य बनाने से पहले राजा मल्लीनाथ को पीला कपड़ा लटकाकर गुरु उगमसी भाटी के सामने बैठाया गया, राजा की आंखें बांध दी गईं, कानों में कुण्डल पहनाए गए, सेली-सींगी धारण कराई गई, राणा रतनसी ने राजा के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उगमसी भाटी ने गुरुमंत्र देकर राव मल्लीनाथ को अपना शिष्य बनाया।

कानों में कुण्डल और सेली-सींगी धारण कराने से यह कहा जा सकता है कि नाथ पंथ में दी जाने वाली दीक्षा से इसकी बहुत समानता है। गुरु के प्रति अगाध निष्ठा और शिष्य के समर्पण भाव को भी नाथों की गुरुभक्ति के अथवा भक्तिमूल में देखना अधिक समीचीन होगा।

आगे चलकर राजा मल्लीनाथ ने कूण्डा पंथ को विधिवत् एक सम्प्रदाय का रूप दिया किंतु इसकी साधना विधियां बहुत गोपनीय रखी गईं। रेगिस्तानी क्षेत्रों में राजा मल्लीनाथ को चमत्कारी योगी एवं सिद्धपुरुष माना जाता है।

उगमसी भाटी, धारु मेघवाल तथा रानी रूपादे ने मिलकर उस काल में बड़े सत्संगों का आयोजन किया तथा रेगिस्तान में बसने वाली सैंकड़ो दलित जातियों को कूण्डा पंथ में सम्मिलित किया। मान्यता है कि रावल मल्लीनाथ, रानी रूपादे, धारूजी मेघवाल, धारू की बड़ी भाभी देवू, एलू, दलु कुम्हार तथा नामदेव छींपा नामक सात साधक एक ही साथ योगबल द्वारा अंतर्ध्यान हुए थे।

कूण्डा पंथ एक वाममार्गी पंथ है। इस पंथ की साधना विधि अत्यंत गोपनीय है तथा इस विधि को पंथ में दीक्षित साधक के अतिरिक्त और किसी को नहीं बताया जाता। अतः इस पंथ की साधना विधि विश्वसनीय ढंग से मानव समाज के सामने नहीं आ सकी हैं। कूण्डा पंथ की साधना विधि के बारे में जो भी अनुमान लगाए जाते हैं वे कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथ तथा चोली-पूजन पंथ की साधना विधियों पर आधारित हैं क्योंकि कांचलिया पंथ की स्थापना कूण्डा पंथ के साधकों ने की थी तथा ऊंदरिया पंथ एवं चोली पूजन पंथ की साधना पद्धतियां, कांचलिया पंथ से बहुत मिलती-जुलती है।

अतः यह निश्चित है कि कूंडा पंथ में भी आध्यात्मिक साधना की विचित्र प्रणाली का प्रावधान किया गया होगा। कूण्डा पंथ की मान्यता है कि यदि कोई कूण्डा पंथी साधक किसी अन्य गृहस्थ को कूण्डा पंथ में दीक्षित नहीं करता है तो मृत्यु के पश्चात उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती, वह भटकती रहती है।

इस साधना पद्धति में स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से समागम करते हैं। साधना स्थल पर बहुत से पुरुष साधक एवं बहुत सी स्त्री साधिकांए होती हैं। इस प्रक्रिया में एक साधक एक ही स्त्री साधक से समागम करता है। इस समागम के दौरान पति-पत्नी के सम्बन्ध का निर्वहन नहीं किया जाता किंतु समागम पूरी तरह मुक्त नहीं होता। इसके नियम होते हैं। कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथ तथा चोली-पूजन पंथ के नियम समाज के सामने आ चुके हैं किंतु कूण्डा पंथ के नियमों की जानकारी नहीं है।

फिर भी अनुमान किया जाता है कि किसी कूण्डे में साधिका स्त्रियों का कोई वस्त्र डाल दिया जाता होगा। गुरु द्वारा किसी पद्धति या नियम के तहत एक-एक पुरुष साधक को कूण्डे में से एक वस्त्र निकालने को कहा जाता होगा। जिस पुरुष के हाथ में जिस स्त्री का वस्त्र आता होगा, उसी साधिका के साथ उसे समागम करना होता होगा।

गुरु किस प्रक्रिया के तहत पुरुष साधक को बुलाता है, समागम के दौरान स्खलन के क्या नियम हैं, स्खलन से प्राप्त तरल का क्या किया जाता है, आदि नियम ज्ञात नहीं हैं।

 माना जाता है कि सिद्धों की मंडल क्रियाविधि अपनाने वाले साधक, कुंडा पंथी कहे गए। रेगिस्तानी प्रदेश में रहने वाले ये सिद्ध कौन थे? इस विषय पर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कूंडा पंथ के संस्थापकों में धारू मेघवाल नामक प्रसिद्ध व्यक्ति हुआ है। वह साध कहलाता था तथा कुंडापंथी स्वयं को साध कहते है किंतु हर किसी को अपने धर्म के बारे में नहीं बताते। मेघवाल, अपने पंथ को सिद्धों में से एक सिद्ध समझते है। इनमें कई सिद्ध हो चुके है।

रेगिस्तान के सिद्धों की मण्डल क्रियाविधि क्या थी, यह भी ज्ञात नहीं है। संभवतः वह कूण्डे में स्त्री-साधिकाओं के वस्त्र एकत्रित करके उन्हें साधकों में वितरित करने जैसी ही कोई क्रिया रही होगी जिसे मण्डल क्रियाविधि कहते होंगे।

भारत भूमि पर प्रचलित बहुत से वामपंथों में स्त्री समागम को साधना का आधार बनाया गया है। इसकी सार्थकता इस भावना में निहित है कि प्रजनन और ब्रह्माण्ड की असीमता अद्भुत हैं। इन्हें रोकने की कोई भी कोशिश सृष्टि के लिए विनाशकारी साबित होगी। यह समागम मृत शरीर के साथ भी हो सकता है। क्योंकि वामपंथों के अनुसार शव और जीवित शरीर में केवल आत्मा का भेद है और आत्मा को छोड़कर सब कुछ नश्वर है किंतु इस नश्वरता में भी सुंदरता है और आंगिक समागम उस सुंदरता का सजीव चित्रण माना जाता है।

अघोरपंथी, आदिनाथी, बीसनामी, कुंडापंथी तथा दसनामी सम्प्रदाय की साधना पद्धतियों में बहुत सी समानताएं होती हैं। ये सभी सम्प्रदाय अपनी साधना के दौरान होने वाले कीर्तनों में तंदूरा बजाते हैं। तेरहताली नृत्य में भी तंदूरा बजाया जाता है। वादक इसे बाएं हाथ से पकड़ता है तथा दाहिने हाथ की एक अंगुलि से बजाता हे। यह सितार की तरह दिखता है किंतु इसमें कुंडी तुम्बे की न होकर लकड़ी की होती है।

स्वामी नारायण द्वारा रचित पुस्तक ‘श्री हरिचरितअमृत सागर’ में कूण्डा पंथियों की निंदा करते हुए लिखा गया है-

कुंडा पंथी शक्ति उपासी, तिनके कबुं ने बैठत पासी।

प्रत्यक्ष हरि बिन वात हि सबही, तिनको अभाव कीने तबही।

लूनी नदी के किनारे तिलवाड़ा में कूण्डा पंथ के संस्थापक मल्लीनाथजी का मंदिर बना हुआ है जहाँ उनकी स्मृति में प्रविर्ष एक विशाल पशुमेला लगता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांचलिया पंथ की तंत्रसाधना अघोरियों तथा भैरवी साधकों से ली गई है !

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कांचलिया पंथ की तंत्रसाधना
कांचलिया पंथ की तंत्रसाधना

कांचलिया पंथ की तंत्रसाधना अघोरियों तथा भैरवी साधकों से ली गई है ! मानव देह में सहजानन्द का विस्फोट करना ही इसका उद्देश्य जान पड़ता है जिसकी ऊर्जा से मानव सहस्रदल का भेदन करता है।

वाम साधना या अघोर साधना में संसार की प्रत्येक वस्तु को ईश्वरीय रचना मानकर उन्हें समान भाव से देखा जाता है। इस परम्परा के साधकों के लिए बुरा, त्याज्य या घृणित कुछ भी नहीं है।

अघोरियों के के लिए यज्ञकुण्ड से निकल रही सुवासित अग्नि और चिता से उठ रही लपटें एक समान पवित्र हैं। इसलिए वे चिता की अग्नि में भोजन बनाते हैं। चिता में से मुर्दा देह को निकालकर उसका मांस वैसे ही खाते हैं, जैसे इंसान अपने घर में अनाज की रोटियां बनाकर खाता है।

अघोरी साधक अपनी साधना को पक्की करने के लिए शमशान में निवास करते हैं, मृत शरीर पर बैठकर साधना करते हैं, मृत मनुष्य के कपाल में भोजन करते हैं, चिता की भस्म शरीर पर लपेटते हैं और मृत शरीर के साथ सहवास करते हैं।
अघोर पंथ की यही चिंतन पद्धति, शाक्त मत के बहुत से पंथों में प्रवेश कर गई है। यही कारण है कि शाक्त मत के कुछ पंथों में स्त्री और पुरुष के भोग के समय बहने वाला तरल इन पंथों के साधकों के लिए उतना ही पवित्र है जितनी कि संसार की अन्य कोई वस्तु।

कांचलिया पंथ के साधक इस तरल को वाणी कहते हैं तथा उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इस पंथ की स्थापना, कूण्डा पंथ के साधकों द्वारा अरावली की पहाड़ियों में की गई।

कूण्डा पंथ की स्थापना चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र के शासक राव मल्लीनाथ ने की थी। हालांकि इस पंथ की साधना विधियां पहले से ही रेगिस्तानी क्षेत्र में मौजूद थीं।

कांचलिया पंथ की स्थापना निश्चित रूप से चौदहवीं शताब्दी के बाद की है।

अरावली की पहाड़ियों में गोगूंदा के पास एक स्थान है जरगाजी, यहाँ कांचलिया पंथ की खास धूणी है। जरगाजी रूणीचे के शासक बाबा रामदेव के सेवक थे। मान्यता है कि एक बार लोकदेवता रामदेवजी अपने सेवक जरगाजी पर बहुत प्रसन्न हुए तथा उन्होंने जरगाजी को आशीर्वाद दिया कि मेरे साथ तेरा नाम भी अमर रहेगा। बाबा रामदेव भी राव मल्लीनाथ के समकालीन थे तथा उन्होंने कामड़ पंथ की स्थापना की थी।

कूण्डा तथा कामड़, दोनों ही पंथों के अनुयाई बलाई, रेगर, चमार, मेघवाल तथा मोग्या आदि जातियों के लोग होते हैं। इन लोगों की महिलाएं रामदेवजी के भजनों के साथ तेरह ताली नृत्य करती हैं। शिवरात्रि के दिन जरगाजी में एक विशाल मेला लगता है जिसमें कामड़ पंथ के अनुयाई बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। ये लोग तंदूरे की तान पर बहुत मधुर भजन गाते हैं। रात्रि में रात्रिजगा होता है। बहुत से श्रद्धालु, कामड़ पंथ के लोगों से झमा दिलवाते हैं।

संभवतः कामड़ पंथ के कुछ लोग कूण्डा पंथ में सम्मिलित हो गए थे तथा उन्हीं में से कुछ साधकों ने अरावली की पहाड़ियों में कांचलिया पंथ की स्थापना की। अकेला पुरुष या अकेली स्त्री कांचलिया पंथ के सदस्य नहीं हो सकते। पति-पत्नि संयुक्त रूप से ही कांचलिया पंथ ग्रहण कर सकते हैं। इस पंथ का एक गुरु होता है तथा उसका एक कोटवाल होता है। यह गुरु, किसी भी सदस्य के निवेदन पर संगत का आयोजन करता है।

आयोजक की ओर से इस संगत का सारा खर्च वहन किया जाता है। उसकी ओर से साधकों के लिए चूरमा-बाटी का प्रबन्ध किया जाता है तथा साधकों के लिए पाट पूरा जाता है।

गुरु के आदेश से कोटवाल, संगत के आयोजन की सूचना, गुप्त रूप से साधकों तक पहुंचाता है। रात को लगभग 10 बजे साधक गण एक निश्चित एकांत स्थान पर एकत्रित होने लगते हैं।

संगत आरम्भ करने से पहले, साधक लोग मिलकर दाल-बाटी-चूरमा तैयार करते हैं और सामहिक रूप से धूप-ध्यान करके भोजन करते हैं।

आयोजन स्थल पर पाट पूरा जाता है। इसके लिए धरती पर सवा हाथ लम्बा सफेद कपड़ा बिछाया जाता है। इसके ऊपर लाल कपड़ा बिछाया जाता है तथा इसके चारों किनारों पर पंचमेवा- खारक, बादाम, किशमिश, पिश्ता एवं मिश्री रखी जाती है।

कपड़े के बीच में सतिया बनाया जाता है। इसके ऊपर चंद्रमा तथा सूरज बनाए जाते हैं। इन दोनों के बीच में रामदेवजी का घोड़ा बनाया जाता है। इसके नीचे रामदेवजी के पगल्ये बनाये जाते हैं जिसके दोनों ओर पांच-पांच टोपे बनाए जाते हैं।
सतिए पर कलश स्थापित किया जाता है। इस कलश पर जोत रखी जाती है। पाट पूजने की इस प्रक्रिया में सवा सेर चावल लिए जाते हैं। इसी पाट के पास मिट्टी के एक चौड़े बर्तन या केवेलू में चूरमे तथा खोपरे की धूप लगाई जाती है।

रात्रि के लगभग दो बजे तक भजनभाव होते हैं। भजन समाप्ति के बाद गुरु के निर्देशानुसार सभी साधक स्त्रियां अपनी कांचलियां खोलकर कोटवाल को देती हैं। कोटवाल इन कांचलियों को कलश के पास रखे मिट्टी के कूंडे में डाल देता है।
पाट पर रखे चावलों में से गुरु अपने हाथ में चावल के कुछ दाने लेता है जिसे सादके धारना कहते हैं।

पांच की संख्या वाले सादके ‘मोती’ कहलाते हैं। पांच से कम-ज्यादा की संख्या में आने वाले सादके ‘जोड़’ कहलाते हैं। यदि सादके पांच से कम आते हैं तो उन्हें फिर से पाट पर रख दिया जाता है तथा नए सादके लिए जाते हैं। मोती प्राप्त होने पर ही साधक को कांचली दी जाती है।

जब मोती प्राप्त हो जाता है तो गुरु, मन में धारे हुए व्यक्ति को कूंडे में पड़ी हुई कांचलियों में से एक कांचली निकालकर देता है। गुरु के हाथ में जिस साधिका की कांचली आती है, साधक को उसी साधिका के साथ भोग करने का आदेश दिया जाता है।

साधक तथा साधिका कलश के पास लटकाए गए एक पर्दे के पीछे जाकर भोग करते हैं। भोग स्वरूप पुरुष शरीर से जो तरल बहता है, साधिका उस तरल को हाथ में लेकर पर्दे की ओट से बाहर आती है। इस तरल को वाणी कहते हैं।

गुरु के पास एक पात्र रखा होता है जिसमें उस वाणी को एकत्रित किया जाता है। इस प्रकार गुरु बारी-बारी से सादके धारता रहता है और कांचली उठाकर-उठाकर पुरुष साधकों को देता रहता है।

जब सबकी बारी पूरी हो जाती है तो जितनी भी वाणी एकत्रित होती है उसमें मिश्री मिला दी जाती है और सभी स्त्री-पुरुष साधकों को प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है। कोटवाल द्वारा प्रसार वितरण करने की इस क्रिया को वाणी फेरना कहते हैं।

वाणी के साथ-साथ चूरमे तथा पंचमेवे के प्रसाद भी होते हैं। चूरमे का प्रसाद ‘कोली’ तथा पंचमेवे का प्रसाद ‘भाव’ कहलाता है।

प्रसाद वितरण करने वाला व्यक्ति, साधक से कुछ सवाल पूछता है जो इस प्रकार होते हैं-
कोटवाल पूछता है- हुकम?
साधक जवाब देता है- हड़ूमान को।
कोटवाल पूछता है- आग्या?
जवाब मिलता है- ईश्वर की।
प्रश्न होता है- दुवो?
जवाब मिलता है- चारी, चारी जुग में हुवो।
प्रश्न होता है- चौकी?
जवाब मिलता है- हिंगलाज की।
प्रश्न होता है- परमाण?
जवाब मिलता है- संत चढ़ै निरवाण।
प्रश्न होता है- थेगो?
जवाब मिलता है- अलख रा घर देखो।

सभी साधकों से बारी-बारी से यही प्रश्न पूछे जाते हैं और सभी साधक यही जवाब देकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने तक प्रातः हो जाती है और संगत बिखेर दी जाती है।

जब यह गुरु किसी साधक के घर जाता है तो साधक अपनी पत्नी को गुरु के समक्ष समर्पित करता है। गुरु, अपनी इस साधिका शिष्या के साथ भोग करता है तथा इस क्रिया से प्राप्त वाणी को घर के सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। अरावली पर्वत में जन्म लेने वाले बीसनामी पंथियों में भी यह परम्परा कुछ अंतर के साथ प्रचलित थी।

इस साधना का चरम क्या है, तथा इस साधना को प्राप्त करने से किस सिद्धि की प्राप्ति होती है, यह ज्ञात नहीं है। काल के प्रवाह में बहुत कुछ बह गया है और बहुत कुछ बदल रहा है। अब ये परम्पराएं शनैः-शनैः समाप्त हो रही हैं। यदि कहीं हैं भी तो अत्यंत गोपनीय हैं, उनके बारे में शेष मानव समाज को कुछ ज्ञात नहीं होता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चोलीपूजन पंथ की साधना का लक्ष्य मनो-दैहिक परमानंद का विस्फोट है !

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चोलीपूजन पंथ की साधना
चोलीपूजन पंथ की साधना

चोलीपूजन पंथ की साधना का लक्ष्य मनो-दैहिक परमानंद का विस्फोट है! मनो-दैहिक परमानंद की प्राप्ति भगवद् प्राप्ति का पथ नहीं है। अतः इसे भक्ति का पथ नहीं माना जा सकता। यह तंत्र का अंग है। कहा जा सकता है कि यह पंचमकार साधना का एक प्रकार है।

भारत भूमि पर वेदों की रचना के साथ ही इहलोक एवं परलोक की धारणा विकसित हुई। वैदिक ऋषियों ने मानव जाति को यह विचार दिया कि मनुष्य को ईश्वर की प्रार्थना, स्तुति, यज्ञ, तपस्या आदि के माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न करके जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या की अवधारणा ही हजारों साल की अवधि में अलग-अलग साधनाओं में बदल गई।

याज्ञिकों ने यज्ञ के माध्यम से, योगियों ने योग के माध्यम से तथा उपासकों ने ईश्वर की भक्ति के माध्यम से जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने का प्रयास किया और इन्हें मोक्ष प्राप्ति का मार्ग कहा गया। इन्हीं अवधारणाओं के चलते भारतीय समाज में एक ओर शुद्ध-सात्विक ईशभक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ तो दूसरी ओर वाम साधनाएं व्यापक रूप से प्रचलन में आईं।

भारतीय योगी एवं भक्तजन जहाँ दैहिक सुख छोड़कर जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहे थे, वहीं वाम साधकों ने मनोदैहिक सुख के चरम बिंदु पर पहुंचकर मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया। अघोर पंथ इसी विचारधारा की देन है। अघोरी लोग जलती हुई चिता से मांस निकाल कर खा जाते हैं, उल्टी और शौच भी खा जाते हैं।

कुछ वाम पंथ ऐसे भी विकसित हुए जो स्त्री देह को अपनी साधना का मुख्य आधार बताते थे। इनमें से राजस्थान के कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ तथा चोली पूजन पंथ प्रमुख हैं। राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से से लेकर मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के काछी, टीमर, मछुआ आदि जातियों में चोली पूजन साधना पद्धति प्रचलित थी। आज भी यह परम्परा कुछ लोगों में प्रचलित हो सकती है।

इन जातियों के अनेक व्यक्ति अघोर तंत्र में आस्था रखते थे और पंचमकारों अर्थात् मद्य और माँस के साथ-साथ मीन, मुद्रा, मैथुन का सेवन करते हुए साधना करते थे। इसलिए निश्चत रूप से चोली पूजन परम्परा अघोर पंथ के सिद्धांतों को लेकर स्थापित की गई किंतु इसमें शक्ति पूजा का समावेश किया गया जिसके कारण यह शैवों के अघोर पंथ से अलग होकर शाक्त सम्प्रदाय की वाममार्गी साधना का हिस्सा बन गई।

चोलीपूजन पंथ की साधना का लक्ष्य अलग-अलग रूपों में भी दिखाई देता है। इसे देवी उपासना का वामाचारी रूप भी कहा जा सकता है। चोली पूजन पंथ की मान्यता के अनुसार जब किसी व्यक्ति या परिवार की कोई मनौती पूरी हो जाती थी तो वह व्यक्ति एवं उसका परिवार, देवी का आभार प्रकट करने के लिए देवी की चोली के पूजन का आयोजन करवाते थे।

चोलीपूजन पंथ की साधना का आयोजन रात्रि के समय किसी एकांत, गुप्त एवं नियत स्थान पर किया जाता था। इसमें भाग लेने वाले लोग सपत्नीक ही हो सकते थे। चोली पूजन की प्रक्रिया इस प्रकार से है-

चोलीपूजन पंथ की साधना में पंचों-मकारों का प्रयोग किया जाता है। आयोजन का पुजारी किसी बड़े पात्र में मदिरा भरकर उसकी पूजा करता है। स्त्री-साधिकाएं अपनी चोली उतारकर पात्र की मदिरा में भिगोकर उससे अपना वक्ष साफ करती हैं। इसके बाद वे अपनी चोली को उसी घड़े में डाल देती हैं।

जब स्त्री साधिकाएं इस क्रिया को सम्पन्न करती हैं, तब तक पुरुष साधक, उस घडे के चारों ओर घेरा बनाकर नाचते हुए शराब पीते हैं।

जब समस्त स्त्री साधिकाएं अपनी चोली उतारकर वक्ष साफ कर लेती हैं तब पुजारी देवी-प्रतिमा की पूजा करके उसे नई चोली धारण करवाता है तथा देवी के समक्ष मेमने की बलि देता है। मेमने का मांस उसी समय पकाकर देवी को भोग लगाया जाता है। इस समय भी मदिरा-पान का दौर जारी रहता है।

देवी की चोली बदलने, मेमने की बलि देने तथा मेमने के मांस का प्रसाद वितरित करने के बाद प्रत्येक पुरुष साधक, मदिरा के घड़े में से एक-एक करके चोली उठाता है तथा जिस महिला की चोली उसके हाथ में आती है, वह उसके पास जाकर खड़ा हो जाता है। जब सभी चोलियों का बंटवारा हो जाता है तब सारे स्त्री-पुरुष देवी की प्रतिमा के समक्ष यौनक्रीड़ा करते हैं।

चोलीपूजन पंथ की साधना का चरम क्या है और इस साधना के माध्यम से किस सिद्धि की प्राप्ति की अभिलाषा की जाती है, यह ज्ञात नहीं है किंतु वाममार्गी तंत्रों के अनुसार अनुमान लगाया जा सकता है कि विभिन्न वामपंथों में मद्य, माँस, मछली, मुद्रा एवं मैथुन आदि क्रियाओं के माध्यम से जिस सिद्धि एवं मोक्ष की कामना की जाती है, कुछ उसी प्रकार का ध्येय चोली पूजन पंथ का रहा होगा।

पंचमकार आधारित समस्त साधनाओं का तत्व चिंतन, ऊर्जा निर्माण एवं एकत्रीकरण पर आधारित है। पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती है और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता है। कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता है और दसवें द्वार को खोल कर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता है। साधक के अन्दर का काम-भाव ऊर्ध्वमुखी होकर उर्जा के रूप में सहस्र-दल का भेदन करता है।

इस अवस्था में कुंडलिनी, सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना से ऊपर की ओर उठती है तथा मार्ग में कई चक्रों को भेदती हुई सिर के शीर्ष में अन्तिम चक्र में प्रवेश करती है और वहाँ यह अपने पति-प्रियतम शिव के साथ हर्षोन्मादित होकर मिलती है। इस प्रकार वाम-साधना में काम-भाव का उच्चतम प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है।

वाममार्गी तंत्रों के अनुसार भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव ‘हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि’ के रूप में ‘मनो-दैहिक’ रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट ही परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।

कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथ, बीसनामी पंथ तथा चोली पूजन पंथों की साधना विधि में कुण्डलिनी जागरण की कोई अवधारणा नहीं है फिर भी अपनी साधना को उच्चतम स्तर पर ले जाकर सिद्धि प्राप्त करने की अवधारणा अवश्य मौजूद रही होगी।

चूंकि इन पंथों के साधना पक्ष को जनसामान्य से अत्यंत गोपनीय रखा जाता था, इसलिए इनके बारे में शेष मानव समाज को अधिक जानकारी नहीं है। इस पंथ के लोग अपने किसी निकटवर्ती परिवार को धीरे-धीरे विश्वास में लेकर उन्हें अपने पंथ में सम्मिलित करते हैं और वह भी इसकी साधना पद्धति को अत्यंत गोपनीय रखता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मी टू का वायरस एक-दूसरे पर थूकने के लिए उकसा रहा है!

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मी टू का वायरस देश में प्रवेश कर गया है जिसने भारतीय स्त्रियों और पुरुषों को बेहिचक एक दूसरे पर थूकने का बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है। देश वाकई में बड़ी तरक्की कर रहा है, अमरीका बन रहा है, मेरा देश बदल रहा है।

बड़े-बड़े चेहरे जो कल तक अपनी सफलताओं से चमका करते थे अब थूके जाने के कारण गंदे और थूक से सने हुए दिख रहे हैं।

मी टू का वायरस लगभग एक साल पहले अमरीका में जन्मा तथा भारत में इसे फिल्म एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता लेकर आईं और नाना पाटेकर पर दस साल पुराना अपना आरोप दोहराया कि ‘हॉर्न ओके प्लीज’ गीत की शूटिंग के दौरान नाना ने उसके साथ बदसलूकी की थी।

नाना पाटेकर अब 67 साल के हैं तथा उन्होंने तनुश्री पर गलत आरोप लगाने का इल्जाम लगाते हुए कानूनी नोटिस भी भेजा है।

सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (सिनटा) ने कहा है कि वह नाना पाटेकर के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न आरोपों की निष्पक्ष जांच एवं समाधान करने के लिए तैयार है।

तनुश्री के बाद भारत की कई जानी-मानी महिलाओं ने मनोरंजन और मीडिया जगत में यौन शोषण से जुड़े अपने अनुभव साझा किए जिनके बाद मशहूर अभिनेता और निर्देशक रजत कपूर का चेहरा गंदा दिखाई देने लगा।

रजत कपूर पर एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2007 में जब वह उनका साक्षात्कार लेने गईं थी तब कपूर के व्यवहार से वह असहज हो गई थीं। रजत कपूर ने माफी मांगते हुए कहा है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश की और वह दिल से माफी मांगते हैं।

 खबर यह भी है कि अंग्रेजी के एक प्रमुख अखबार के दिल्ली ब्यूरो चीफ ने अपने ऊपर लगे आरोपों के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

अभिनेता रितिक रोशन ने फिल्मकार विकास बहल की नई फिल्म ‘सुपर 30’ में काम करने से लगभग मना कर दिया है क्योंकि बहल पर यौन शोषण करने के आरोप लगे हैं। विकास बहल पर यह आरोप पिछले साल लगा था। इस साल तो आरोप को दोहराया गया है।

कॉमेडी ग्रुप ए आई बी ने यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे गुर-सिमरन खंबा को छुट्टी पर भेज दिया है। ग्रुप के संस्थापक तन्मय भट्ट, मामले के स्पष्ट होने तक ए आई बी की दैनिक गतिविधियों से अलग रहेंगे।

लेखक-कॉमेडियन उत्सव चक्रवर्ती तथा गुर-सिमरन खंबा पर यौन दुव्यर्वहार करने के आरोप हैं, जबकि तन्मय भट्ट, आरोपियों के खिलाफ कदम ना उठाने को लेकर निशाने पर हैं। उत्सव चक्रवर्ती पर पिछले हफ्ते कई महिलाओं ने बेवजह नग्न तस्वीरें भेजने के आरोप लगाए।

दिल्ली में इंडियन वीमेंस प्रेस कोर ने मीडिया घरानों से यौन शोषण की शिकायतों पर ध्यान देने के लिए संस्था गठित करने की मांग की है।

इसी बीच प्रोड्यूसर विन्ता ने फिल्म अभिनेता आलोक नाथ पर अपने 20 साल पुराने आरोपों को दोहराया है और कहा है कि पहले किसी ने नहीं सुनी किंतु आज सोशियल मीडिया सुन रहा है। आलोक नाथ ने विन्ता के आरोपों झूठा बताया है।

केन्द्रीय मंत्री एम जे अकबर का चेहरा भी थूक से सना हुआ दिखाई दे रहा है।

समझदार स्त्री-पुरुष कृपया एक-दूसरे पर न थूकें!

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि यौन उत्पीड़न और शोषण को लेकर मन में बना हुआ गुस्सा कभी नहीं जाता। मैं बहुत खुश हूँ कि मीटू अभियान भारत में भी शुरू हो गया है।

कुल मिलाकर पूरे दूश में थूका-थाकी का दौर तेजी से आरम्भ हो गया है। कुछ और चेहरे गंदे किए जा सकते हैं।

निश्चित रूप से भारत में महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न के मामले बहुत ज्यादा होते हैं और वे शर्मनाक हैं किंतु इस थूका-थाकी समस्या का हल नहीं होने वाला।

स्त्री और पुरुष अनंत काल से एक दूसरे के सहचर हैं। प्रकृति से उन्हें एक दूसरे के प्रति दैहिक आकर्षण का वरदान मिला है। इस कारण स्त्री अपनी इच्छओं पर नियंत्रण करना जानती है और पुरुष अपने उन्मुक्त आचरण के कारण गलतियों करता है जो कई बार अपराध बन जाती हैं।

अतः निश्चित रूप से जब स्त्री-पुरुष साथ काम करते हैं तो पुरुष के मन में रागात्मकता का उदय स्त्री की अपेक्षा अधिक होता है। सुंदर स्त्री को देखकर किस का मन नहीं डोला। मैं यह नहीं कह रहा कि पुरुष को मन डोलाने की छूट मिलनी चाहिए अपितु एक प्राकृतिक स्थिति की चर्चा कर रहा हूं।

हमारी संस्कृति में पुरुष को ब्रह्मचारी रहने और स्त्री को पुत्रवती होने का आशीर्वाद वस्तुत इन दोनों की मनोभूमि एवं सहज प्रवृत्ति को संतुलति करने के लिए दिया जाता है।

मीटू कोई जादू की छड़ी नहीं है जो पुरुषों की मूल प्रवृत्ति को बदल देगा। न वह स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग संसार की रचना करेगा। इसी संसार में एक दूसरे की खूबियों और कमियों से सामंजस्य बैठाते हुए ही भव सागर पार होगा।

कृपया एक दूसरे पर मत थूकिए। स्त्रियां उदार हृदय की स्वामिनी होती हैं, अपने पुरुष सहकर्मियों के गलती करने पर उन्हें रोकें, उनकी प्रताड़ना करें, उन्हें भविष्य में गलती न दोहराने के लिए चेताएं। यदि इतने पर भी पुरुष न माने तो पुलिस में उनके विरुद्ध यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाएं।

पुरुषों को भी चाहिए कि सभ्य समाज में आचरण का तरीका सीखें। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें। पराई स्त्री को पराई ही समझें। किसी की मजबूरी का फायदा न उठाएं। भारतीय संस्कृति में स्त्री-पुरुष के बीच मर्यादाओं की जो लाइनें खींची गई हैं, उन्हें अमल में लाएं।

यह कौन नहीं जानता कि यौन उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में औरतों की शिकायतें वाजिब हैं किंतु कुछ मामले ऐसे होते हैं जो पहले तो परस्पर सहमति से होते हैं और बाद में रेप का प्रकरण में बदल दिए जाते हैं। हनी ट्रैप भी युगों-युगों से पुरुषों के लिए समस्या बना हुआ है। फिर भी ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो समस्त स्त्री समाज से घृणा करता हो।

कहने का आशय यह कि मानव समाज को स्त्री और पुरुष के साथ-साथ रहने लायक बना रहने दें। मीटू से किसी का भला नहीं होगा। यदि मीटू का बुखार जल्दी ही नहीं उतरा तो इस देश में बहुत से चेहरे थूक से सने हुए दिखाई देंगे।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि देश के दुश्मनों ने देश की समरसता को भंग करने के लिए यह विषैला वाइरस देश की हवाओं में घोला हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

समलैंगिक अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे ?

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क्या समलैंगिक अब अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे? संसार में बहुत से देशों में समलैंगिकता अपराध नहीं है। न कानून उन्हें रोकता है और न समाज।

सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितम्बर 2018 को दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है तथा सन् 1860 के कानून का आधा हिस्सा समाप्त कर दिया है।

इसके साथ ही भारतीय कानून की धारा 377 का आधा हिस्सा सदा के लिए इतिहास बनकर रह गया है जिसके अंतर्गत यह प्रावधान था कि समलैंगिक अर्थात् दो स्त्रियां या दो पुरुष परस्पर शारीरिक सम्बन्ध बनाने पर अपराधी माने जाते थे।

इस कानून का आधा हिस्सा अब भी जीवित है जिसके अंतर्गत न तो किसी बच्चे के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए जा सकते हैं, न किसी जानवर के साथ ऐसा किया जा सकता है और न किसी भी व्यक्ति के साथ जबर्दस्ती की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से यह तो स्पष्ट हो गया है कि दो स्त्री, दो पुरुष या दो बाईसैक्सुअल व्यक्ति अब बंद कमरे के भीतर कुछ भी करें, कानून और समाज दोनों को उनके कमरे में झांकने का अधिकार नहीं होगा किंतु अब कानून और समाज को कुछ नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

इनमें से सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि क्या दो समलैंगिक व्यक्ति एक दूसरे से विवाह करके दाम्पत्य जीवन जी सकते हैं?

दूसरी बड़ी समस्या यह होगी कि अब समलैंगिक लोग समाज, सरकार और कानून से यह मांग करेंगे कि उन्हें स्त्री, पुरुष या किन्नर से अलग किसी लिंग के रूप में मान्यता दी जाए।

प्रकृति का नियम यह है कि दो विपरीत सैक्स वाले प्राणी समागम के द्वारा संतानोत्पत्ति करते हैं। उनमें से एक नर एवं एक मादा होता है। चूंकि समलैंगिकों में स्थिति इसके विपरीत है तथा कानून ने उन्हें वैधानिकता प्रदान कर दी है इसलिए वे स्वयं को स्त्री या पुरुष कहलवाना पसंद नहीं करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी भी माइनोरिटी कम्यूनिटी पर मैजोरिटी कम्यूनिटी की मान्यताओं, विचारों एवं परम्पराओं को नहीं लादा जा सकता। यदि समलैंगिकों की संख्या कम है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गलत हैं या वे गैरकानूनी काम कर रहे हैं।

निकट भविष्य में सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी को आधार बनाकर कुछ लोग जानवरों के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने का अधिकार मांगेंगे।

उनका तर्क भी यही होगा कि भले ही बहुसंख्यक समाज जानवरों से सम्बन्ध बनाने की अनुमति नहीं देता हो, लेकिन समाज में बहुत छोटा ही सही किंतु एक ऐसा वर्ग भी है जो पशुओं से सम्बन्ध बनाना चाहता है। 

हो सकता है कि कुछ लोग बच्चों से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने की मांग करें। ऐसीस्थितियों में कानून का रुख क्या होगा, यह तो आने वाला भविष्य ही बताएगा।

संसार में बहुत से देशों में समलैंगिकता अपराध नहीं है। न तो कानून ही उन्हें ऐसा करने से रोकता है और न समाज।

भारत हजारों साल पुरानी मान्यताओं वाला देश है। उसकी सांस्कृतिक जड़ें बहुत पुरानी हैं जिसमें समलैंगिकता को न केवल हेयदृष्टि से देखा जाता है अपितु नैतिकता की दृष्टि से भी बुरा माना जाता रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने देश के इस सांस्कृतिक चिंतन परम्परा को नकारते हुए कहा है कि समय के साथ कानून में बदलाव होना चाहिए।

भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को चार पुरुषार्थों के रूप में माना गया है जिसका मोटा-मोटा व्यावहारिक अर्थ यह होता है कि धर्म पूर्वक अर्जित किए गए अर्थ और काम से मोक्ष की प्राप्ति होती है किंतु अब समाज को धर्मपूर्वक काम अर्जित करने के अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा।

क्योंकि वैसे भी धर्मनिरपेक्ष समाज में धर्म पूरी तरह निजी एवं व्यक्तिगत मान्यताओं का पुलिंदा है, कानून किसी को धर्म की परिभाषा तय करने का अधिकार नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही अब भारत में सामाजिक मान्यता पर धार्मिक आस्था लादे जाने के दिन पूरी तरह लद गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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