Saturday, February 24, 2024
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अध्याय – 26 – भारत में परिवारिक जीवन (स)

संयुक्त परिवार प्रणाली

संयुक्त परिवार प्रणाली भारतीय जीवन शैली की सबसे बड़ी विशेषता है। गृह्यसूत्रों में बड़े परिवारों का उल्लेख किया गया है। बौद्ध युग में भी परिवार बड़े हुआ करते थे। अनेक जातकों में ऐसे परिवारों का उल्लेख हुआ है जो अपने सदस्यों के सहयोग एवं सहायता से चलते थे। ऐसे कुटुम्बों का भी उल्लेख हुआ है जिनके सदस्य अपनी इच्छा के अनुसार पिता आदि को दुःखी छोड़कर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और उन्होंने सम्पत्ति में अपना अधिकार स्वयं ही अवरुद्ध कर लिया। स्त्रियाँ भी बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर अपने परिवारों से दूर, किसी बौद्ध विहार अथवा संघाराम में जाकर रहने लगती थीं।

संयुक्त परिवार के आधार-तत्त्व

संयुक्त परिवार के दो आधार माने गए हैं- (1.) सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध। (2) परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का पालन। अर्थात् परिवार के सदस्यों के परस्पर सम्बन्ध मधुर होने चाहिए एवं प्रत्येक सदस्य को परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार से दूर रहकर धनोपार्जन करता है और उसकी सम्पत्ति एवं निवास स्थान अलग हैं परन्तु यदि वह अपने परिवार के प्रति उन कर्त्तव्यों का पालन करता है जो एक संयुक्त परिवार के सदस्य के लिए आवश्यक होते हैं, तो दूर रह रहा परिवार एकल नहीं माना जाता।

संयुक्त परिवार में गृह-स्वामी के अधिकार

प्राचीन और मध्य काल में व्यक्ति की संतान एवं सम्पत्ति की सुरक्षा करने और आजीविका के साधन एवं कौशल प्राप्त करने के लिए संयुक्त परिवार का होना आवश्यक था। परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष संयुक्त परिवार का मुखिया होता था। उसे गृहस्वामी कहते थे। वह परिवार के सदस्यों को अनुशासन में रखता था, उन्हें धर्माचरण पर चलने का मार्ग दिखाता था, परिवार के सदस्यों की सुरक्षा करता था और उनकी उदर-पूर्ति की व्यवस्था करता था।

वह परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों, याज्ञिक अनुष्ठानों, एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थिर करने सम्बन्धी निर्णय लेता था तथा उचित समय आने पर परिवार एवं सम्पत्ति का विभाजन भी करता था। साधारणतः परिवार के अन्य सदस्यों को गृहस्वामी की आज्ञाओं और निर्णयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होता था।

संयुक्त परिवार के स्वरूप को ठीक से समझ न पाने के कारण पाश्चात्य लेखकों ने संयुक्त परिवार के मुखिया को स्वेच्छाचारी बताया है परन्तु यह सत्य नहीं है। यद्यपि परिवार के मुखिया के अधिकार बहुत व्यापक होते थे, तथापि वह परिवार के अन्य सदस्यों की भावनाओं एवं उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखता था और महत्त्वपूर्ण निर्यय लेने से पहले उनसे  विचार-विमर्श करता था।

संयुक्त परिवार में सदस्यों के अधिकार

संयुक्त परिवार के समस्त सदस्य एक ही भवन अथवा भवन-परिसर में एक साथ रहते थे। परिवार के समस्त सदस्यों का भोजन एक ही रसोईघर में बनता था। परिवार की सम्पत्ति में समस्त पुरुष सदस्यों का समान अधिकार होता था। परिवार के कई सदस्य धन अर्जित करते थे परन्तु उन सब की आय अलग-अलग न होकर परिवार की संयुक्त निधि होती थी जिससे पूरे परिवार का व्यय चलता था। इस दृष्टि से संयुक्त परिवार एक आर्थिक इकाई था। संयुक्त परिवार धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र था। देव-पूजन एवं धार्मिक अनुष्ठान में परिवार के समस्त स्त्री एवं पुरुष सदस्य भाग लेते थे।

संयुक्त परिवार में पुत्र का महत्त्व

संयुक्त परिवार में पुत्र का महत्त्व अत्यधिक था। समाज में धारणा प्रचलित थी कि आत्मा ही पुत्र के रूप में जन्म लेती है। (आत्मा वै जायते पुत्रः)। इस प्रकार पुत्र के रूप में मनुष्य अमरत्व एवं निरंतरता को प्राप्त करता है। पुत्र उत्पन्न करना ही विवाह का मुख्य उद्देश्य था। पुत्र उत्पन्न होने पर पिता ‘पितृ ऋण’ से मुक्त हो जाता था। पुत्रों में भी ज्येष्ठ पुत्र का स्थान अन्य पुत्रों की अपेक्षा विशिष्ट था। श्राद्ध में ज्येष्ठ पुत्र ही पिण्ड और तर्पण देने का अधिकारी होता है। पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र का कर्त्तव्य था कि वह अपने छोटे भाईयों का पुत्र के समान पालन करे। 

संयुक्त परिवार का विभाजन

हिन्दू-धर्मशास्त्र परिवार के विभाजन को उचित नहीं मानते। मनु ने लिखा है कि परिवार के सदस्यों को परिवार छोड़़ने पर पाप लगता है। पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उसकी सम्पत्ति को बराबर बांट सकते हैं किंतु उचित यह है कि छोटे भाई अपने बड़े भाई के साथ वैसे ही रहें जैसे पिता के साथ रहते थे। नारद स्मृति में क्रोधी, विषयी और शास्त्र-विरुद्ध आचरण करने वाले पिता से सम्पत्ति बंटवाने का निर्देश दिया है।

पूर्व-मध्य-युग में सम्पत्ति के विभाजन को लेकर दो विचारधाराओं का विकास हुआ। इनमें से पहली थी विज्ञानेश्वर द्वारा प्रतिपादित मिताक्षरा और दूसरी थी जीमूतिवाहन द्वारा प्रवर्तित दायभाग। प्रथम विचारधारा के अनुसार पुत्र के उत्पन्न होते ही सम्पत्ति में उसका अधिकार हो जाता था। दूसरे विचार के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद पुत्र का सम्पत्ति पर अधिकार सृजित होता था। इस काल में संयुक्त परिवार की साझी सम्पत्ति पर गृहस्वामी का अधिकार होता था और संयुक्त परिवार के किसी सदस्य द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर केवल उसी सदस्य का अधिकार होता था।

संयुक्त परिवार से लाभ

(1.) सामाजिक सुरक्षा कवच

संयुक्त परिवार, परिवार के प्रत्येक सदस्य का सुरक्षा कवच है। संकट के समय में वह परिवार के सदस्यों की सहायता प्राप्त करता है तथा किसी भी विपत्ति का सामना कर सकता है जबकि एकल-परिवार के सदस्यों में विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।

(2.) सामाजिक सम्मान की गारण्टी

संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य की योग्यता और अनुभव अलग-अलग होता है जिसका लाभ परिवार के प्रत्येक सदस्य को मिलता है। इससे परिवार के सदस्यों को समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्राप्त होता है। समाज के बुरे व्यक्ति उस परिवार पर अपवाद आरोपित करने, झगड़ा खड़ा करने अथवा कीचड़ उछालने का दुःसाहस नहीं कर पाते।

(3.) कम व्यय में जीवन-यापन

 परिवार के समस्त सदस्यों के एक साथ रहने के कारण कम व्यय में अधिक साधन जुटा लिए जाते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग से संसाधन जुटाने की आवश्यकता नहीं रहती। इस कारण कम व्यय में अधिक लोगों का जीवन-यापन संभव हो जाता है।

(4.) सहकारी एवं सहयोगी संस्था

संयुक्त परिवार में बच्चों का लालन-पालन घर की सभी महिलाएं मिलकर करती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक सदस्य अपना-अपना कार्य तय कर लेता है। इस कारण परिवार एक सहकारी संस्था बन जाता है। परिवार के समस्त सदस्य एक-दूसरे के साथ सहयोग करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं।

जवाहरलाल नेहरू के अनुसार संयुक्त पारिवार व्यवस्था परिवार के सदस्यों के लिए बीमा-कवच का काम करती है और इसमें मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से निर्बल लोगों के लिए भी सभी सुरक्षाएं उपलब्ध रहती हैं। रोगी की सेवा-सुश्रुषा भी संयुक्त परिवार में अधिक अच्छी होती है।

(5.) जीवनयापन के साधन के रूप में

कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग एवं व्यापार आदि गतिविधियों में एक से अधिक व्यक्तियों के नियोजन की आवश्यकता होती है। संयुक्त परिवार प्रणाली में यह श्रम-शक्ति परिवार के भीतर ही उपलब्ध हो जाती है। पूरी तरह विश्वसनीय एवं अपने पैतृक व्यवसाय में दक्ष होने के कारण यह मानव-शक्ति अनुचरों की अपेक्षा अधिक अच्छे परिणाम देती है।

(6.) व्यक्तिगत उन्नति के लिए समान अवसर एवं सुविधाएँ

संयुक्त परिवार में समस्त सदस्यों को व्यक्तिगत उन्नति के लिए समान सुविधाएं प्राप्त होती हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य के कौशल एवं दक्षता का लाभ कमजोर सदस्य को भी समान रूप से प्राप्त होता है। इससे कमजोर सदस्य को भी व्यक्तिगत उन्नति के अधिक अवसर प्राप्त हो जाते हैं।

(7.) बच्चों का व्यक्तित्व विकास

संयुक्त परिवार में सभी भाइयों के बच्चों को घर के वृद्ध सदस्यों से मार्गदर्शन एवं संस्कार सहज रूप से प्राप्त होते हैं। संयुक्त परिवार में रहते हुए बच्चे में तेरा-मेरा जैसे संकीर्ण विचारों का प्रादुर्भाव नहीं होता और उनमें मिल-बांटकर खाने एवं रहने की प्रवृत्ति का विकास होता है।

(8.) अधिकार और कर्त्तव्य का समन्वय

संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य को अपने से बड़ों का आदर करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना होता है तथा अपने से छोटे एवं कमजोर सदस्य को सहायता एवं संरक्षण देना होता है। इससे उन्हें अधिकार एवं कर्त्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करना आ जाता है।

(9.) आनंद का सृजन

संयुक्त परिवार में सभी सदस्य मिलजुल कर रहते हैं, तीज-त्यौहार एवं पारिवारिक उत्सव मनाते हैं। परस्पर चलने वाले संवादों एवं हास-परिहास के कारण उन्हें एकाकीपन तथा नीरसता नहीं झेलनी पड़ती अपितु परिवार के सदस्यों में प्रेम बढ़ता है और आनंददायी वातावरण सृजित होता है।

परिवार के छोटे-छोटे बच्चों की किलकारियों एवं बाल-सुलभ चेष्टाओं के कारण प्रत्येक सदस्य को आनंद का अनुभव होता है। भाई-बहिन का प्रेम, माँ का वात्सल्य, देवर-भाभी का हास-परिहास, दादा-दादी एवं नाना-नानी के पोते-पोती या दौहित्र आदि के साथ मनोविनोद के प्रसंग केवल संयुक्त परिवार में ही संभव हैं।

(10.) समाज सेवा की प्रेरणा

संयुक्त परिवार के सदस्यों में दूसरे मानवों के प्रति सम्मान, मैत्री एवं करुणा के भाव अधिक होते हैं। इसलिए वे देश एवं समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक सिद्ध होते हैं। संयुक्त परिवार में रहने से व्यक्ति का नैतिक स्तर ऊँचा रहता है। वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज सेवा जैसे कार्य भी करते हैं।

(11.) कृषि-भूमि का संरक्षण

संयुक्त परिवार के कारण कृषि-भूमि के विभाजन की गति मंद होती है। जबकि एकल परिवार प्रथा में  कृषि-भूमि का विभाजन तेजी से होता है।

संयुक्त परिवार प्रणाली की दुर्बलताएँ एवं हानियाँ

संयुक्त परिवार प्रणाली में अनेक गुण होते हुए भी कुछ दोष भी निहित हैं जिनके कारण तथा देश एवं समाज की बदली हुई परिस्थितियों के कारण संयुक्त परिवार प्रणाली लुप्त होने के कगार पर है।

(1.) जिम्मेदारियों के प्रति उपेक्षा भाव

संयुक्त परिवार में कुछ लोगों को बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है तो कुछ लोग बिना कुछ किए ही समस्त सुविधाओं का उपभोग करते हैं। ऐसी स्थिति में काम से बचने की प्रवृत्ति वाले सदस्य मानते हैं कि बाकी लोग काम कर रहे हैं, इसलिए मैं न करूं तो क्या हानि है! जबकि काम करने वाले सदस्य सोचते हैं कि जब दूसरा सदस्य काम नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूं! इस प्रवृत्ति के कारण परिवार में बिखराव उत्पन्न होने लगता है।

(2.) परस्पर झगड़ों का कारक

संयुक्त परिवार में विभिन्न प्रवृत्तियों के सदस्यों को एक साथ रहना होता है, जिनमें बहुधा सामंजस्य का अभाव होता है। परिवार में आने वाली बहुएँ भिन्न पारिवारिक परिवेश से आती हैं और प्रायः ससुराल के नए वातावरण में स्वयं को असुरक्षित अनुभव करती हैं। इस कारण सास-बहू, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी में व्यक्तित्व का टकराव होता है। ये झगड़े पुरुष सदस्यों में भी आरम्भ हो जाते हैं और प्रायः इतने बढ़ जाते हैं कि परिवार टूटकर बिखर जाते हैं।

(3.) स्त्रियों की स्वतंत्रता का हनन

संयुक्त परिवार में स्त्रियों की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा दूसरे सदस्यों की उपस्थिति के कारण अपने पति एवं बच्चों के साथ वार्तालाप करने, अपनी रुचि का भोजन बनाने, इच्छानुसार वस्त्र पहनने एवं स्वतंत्रता पूर्वक घर से बाहर जाने के अवसर नहीं मिल पाते। उसे घर के बड़े सदस्यों से पर्दा करना पड़ता है और स्वयं को दाब-ढंक कर रखना पड़ता है।

बोलते समय भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। कई बार उसे अपने पति की कम आय अथवा पीहर वालों की कमजोर आर्थिक स्थिति को लेकर व्यंग्य एवं ताने भी सुनने पड़ते हैं। यदि पति बेरोजगार है तो पत्नी को नौकरानी की तरह काम करना पड़ता है। इससे उस स्त्री तथा उसके बच्चों के मनोविज्ञान पर बुरा असर पड़ता है।

(4.) व्यक्तित्व विकास में बाधक

संयुक्त परिवार में रहने के कारण व्यक्ति न तो अपनी इच्छानुसार खा सकता है और न पहन सकता है। वह अपनी इच्छित वस्तु खरीदकर भी नहीं ला सकता। उसे अपनी पत्नी और बच्चों की इच्छाओं को पूरा करने से पहले दूसरे सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना पड़ता है। इस कारण परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी अभिलाषाओं पर अंकुश लगाना पड़ता है।

संयुक्त परिवार के विघटन के कारण

(1.) आर्य संस्कृति का मुख्य आधार ‘परिवार’ था जबकि पाश्चात्य संस्कृति व्यक्ति-स्वातंत्र्य में विश्वास करती है। जब देश में पाश्चात्य विचारों का प्रवेश हुआ तो भारतीयों ने भी ‘व्यक्तिवाद’ को अपना लिया। कुटीर उद्योगों के विनाश, औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण जैसी प्रवृत्तियों ने लोगों को काम-धंधे की तलाश में बड़ी संख्या में गांव छोड़कर शहरों की ओर जाना पड़ा।

(2.) संयुक्त परिवार के सदस्यों के सरकारी नौकरियों एवं बड़ी-बड़ी कम्पनियों में दूर पदस्थापन होने से भी संयुक्त परिवार बिखर गए और लोग अपने बीवी-बच्चों एवं शहरी सुख-सुविधाओं के बीच रहने के अभ्यस्त हो गए।

(3.)  पुरानी पीढ़ी के लोग पुरातन परम्पराओं के पक्षधर होते हैं तथा परिवार का संचालन उसी पद्धति पर करना चाहते हैं जबकि नई पीढ़ी के लोगों की मान्यताओं में तेजी से बदलाव आने के कारण वे पुरानी पीढ़ी की बातों से सहमत नहीं होते। इस कारण भी संयुक्त परिवारों का तेजी से विघटन हुआ।

(4.) परम्परागत परिवार में सास अपनी बहू को अपने अनुशासन में रखना चाहती है किंतु बहू सास को व्यर्थ का बोझ समझकर उससे दूर रहना चाहती है। सास चाहती है कि बहू पर्दा करे, घर की चारदीवारी से बाहर न निकले, सुबह उठकर सास-ससुर के पैर छुए, सास-ससुर की उपस्थिति में अपने पति से बातचीत न करे और जो कुछ सास कहे, उसे चुपचाप स्वीकार कर ले परन्तु पढ़ी-लिखी बहू पुरातनपंथी सास की बातों को दकियानूसी मानती है। इस कारण भी संयुक्त परिवार तेजी से टूटते चले गए।

(5.) बढ़ती हुई आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के कारण अब परिवार का व्यय एक सदस्य की कमाई से नहीं चलता। अतः औरतें भी नौकरी करना चाहती हैं। ऐसे लोगों के लिए संयुक्त परिवार में रहना कठिन हो जाता है। जब घर की कुछ औरतें नौकरी करती हैं और कुछ नहीं करतीं तो उनमें बराबरी के अधिकार को लेकर संघर्ष आरम्भ हो जाता है। कमाने वाली औरतें अपने धन पर अपना अधिकार समझती हैं जबकि न कमाने वाली औरतें और पुरुष सदस्य औरत की कमाई पर पूरे परिवार का अधिकार समझते हैं। इससे घर का वातावरण प्रेम-युक्त नहीं रह पाता।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य के इस युग में न तो नई पीढ़ी ही पुरानी पीढ़ी के नियंत्रण में रहना चाहती है और न पढ़ी-लिखी नारी ही संयुक्त परिवार के दायित्वों का निर्वहन करना चाहती है। इस कारण संयुक्त परिवार की परम्परा लगभग लुप्त हो गई है, विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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