Home Blog Page 62

मुहम्मद अली जिन्ना को जेल गए बिना ही पाकिस्तान कैसे मिला!

0

अंग्रेजों के राज में हजारों लोगों को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता था क्योंकि वे वंदेमातरम् गाते थे या वंदेमातरम् का नारा लगाते थे। जबकि मुहम्मद अली जिन्ना को जेल गए बिना ही पाकिस्तान मिल गया।

तिरंगा झण्डा हाथ में लेकर चलने वाले को गिरफ्तार कर लिया जाता था। अखबार में लेख लिखने पर गिरफ्तार कर लिया जाता था। यहाँ तक कि गांधी टोपी लगाने वालों को भी लात-घूसों से पूजा जाता था।

बालगंगाधर तिलक को अखबार निकालने, लेख लिखने, भाषण देने पर ही न जाने कितनी बार जेल में डाला गया। ऐसा भी कई बार हुआ जब तिलक ने किसी अंग्रेज अधिकारी के अत्याचारों के खिलाफ लेख लिखा और तिलक पर उस अंग्रेज अधिकारी की हत्या के षड़यंत्र का आरोप लगाकर जेल में ठूंस दिया गया। माण्डले जेल आज भी तिलक के कदमों को याद करके रो पड़ती है।

वीर सावरकर को दो बार काले पानी की सजा दी गई तथा उन्हें दो बार आजन्म कारवास की सजा दी गई। उन्हें जेल में कोल्हू पेरने के लिए विवश किया जाता था तथा भरपेट खाना नहीं दिया जाता था। विरोध करने पर कोड़ों से मारा जाता था। उनका कुसूर केवल यह था कि उन्होंने मदनलाल धींगरा द्वारा अंग्रेज अधिकारी वायली की हत्या के बाद धींगरा के समर्थन में एक लेख लिखा था।

उन दिनों भारत में यह कहावत चल पड़ी थी कि गांधीजी ने जितना चरखा नहीं फेरा उतना तो वीर सावरकर ने अंग्रेजों की जेलों में कोल्हू पेरा था।

क्रांतिकारी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को जेल में ही फांसी दी गई तथा उनकी मृत देह को जलाकर नदी में बहा दिया गया। वीर प्रतापसिंह बारहठ को बरेली जेल में जीवित जला कर मारा गया।

सुभाषचंद्र बोस को तो अंग्रेज जेल से बाहर देखना ही नहीं चाहते थे। उन्हें न जाने किस-किस अपराध में कितनी बार जेल में डाले रखा गया किंतु अंग्रेज ऐसी कोई जेल नहीं बना पाए जिसमें सुभाष बाबू को हमेशा के लिए बंद करके रखा जा सकता!

कांग्रेस में भी एक भी ऐसा बड़ा नेता नहीं था जिसने जेल में कुछ महीने या कुछ साल न गुजारे हों। अरविंद घोष, लाला लाजपतराय तथा विपिनचंद्र पाल ने अपने जीवन का बहुत सा समय अंग्रेजो की जेलों में बिताया।

गांधी, नेहरू और पटेल को बात-बात पर और न जाने कितनी बार जेलों में डाला गया।

हैरानी यह सोचकर होती है कि जब सावरकर, भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों तथा सुभाष, गांधी, नेहरू और पटेल जैसे कांग्रेसियों को भारत की आजादी मांगने के अपराध में बार-बार जेल जाना पड़ा तब भारत की सड़कों पर कत्ले आम करवाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली खाँ तथा सुहरावर्दी जैसे किसी भी मुस्लिम लीगी नेता को एक बार भी जेल क्यों नहीं जाना पड़ा?

भारत को पाने के लिए हमारे नेताओं को जेल पर जेल की गई तब फिर जिन्ना, लियाकत अली और सुहरावर्दी को एक बार भी जेल गए बिना, पाकिस्तान कैसे मिल गया?

पंजाब प्रांत में ई.1937 से पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार चल रही थी। ई.1946 में मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को आदेश दिया कि वे इस सरकार को गिरा दें।

मुस्लिम लीग के गुण्डों ने तुरंत ही सड़कों पर छुरेबाजी एवं आगजनी शुरु कर दी जिससे घबराकर पंजाब के अंग्रेज गवर्नर ने यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार को बर्खास्त करके मुस्लिम लीग की सरकार बनवा दी। इस हिंसा के लिए एक भी मुस्लिम लीगी नेता को गिरफ्तार नहीं किया गया।

जब मुहम्मद अली जिन्ना एवं लियाकत अली ने अगस्त 1946 में कलकत्ता में सीधी कार्यवाही का आह्वान किया तो मुस्लिम लीग के गुण्डों ने हजारों निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या कर दी। तब भी गवर्नर जनरल लॉर्ड वैवेल की सरकार ने जिन्ना और लियाकत अली सहित मुस्लिम लीग के किसी भी नेता को गिरफ्तार नहीं किया! न उन पर कोई मुकदमा चलाया!

जब सीधी कार्यवाही के दौरान बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने खुलेआम हिंसा की कार्यवाही में भाग लिया तब वैवेल सरकार ने सुहरावर्दी की सरकार को बर्खास्त नहीं किया, उसे गिरफ्तार नहीं किया! न उस पर कोई मुकदमा चलाया!

कांग्रेस के नेताओं तथा अंग्रेज अधिकारियों को राष्ट्रीय स्वयं संगठन हिंसक कार्यवाहियों वाला संगठन दिखता था किंतु उन्हें यह दिखाई क्यों नहीं दिया कि मुस्लिम लीग ने ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ के नाम से 40 हजार लोगों की खूनी एवं हथियारबंद फौज खड़ी कर ली है और वह प्रतिदिन निर्दोष नागरिकों के साथ हिंसा कर रही है।

जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में विभिन्न पक्षों से बात कर रहा था, उसी दौरान अप्रेल 1946 में नई दिल्ली में मुस्लिम लीग के नेताओं ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए भड़काऊ भाषण दिए।

मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा- यदि कोई भी अंतरिम व्यवस्था मुसलमानों पर थोपी गई तो मैं स्वयं को किसी भी खतरे, परीक्षा या बलिदान जो भी मेरे से मांगा जा सकता है, को झेलने के लिए शपथ लेता हूँ।

यही शपथ अधिवेशन में उपस्थित सभी मुस्लिम सदस्यों ने ली। पंजाबी नेता फिरोज खाँ नून ने कहा- जो विनाश हम करेंगे, उससे चंगेज खां और हलाकू ने जो किया, उसे भी शर्म आ जाएगी। उसने यह भी कहा कि यदि ब्रिटेन अथवा हिन्दुओं ने पाकिस्तान नहीं दिया तो रूस यह कार्य करेगा।

बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने कहा- ‘यदि हिन्दू सम्मान और शांति से रहना चाहते हैं तो कांग्रेस को पाकिस्तान की स्वीकृति देनी चाहिए।’

सीमांत नेता कयूम खाँ ने घोषणा की- ‘मुसलमानों के पास सिवाय तलवार निकालने के और कोई मार्ग नहीं बचेगा।’

बंगाल लीग के जनरल सैक्रेटरी अब्दुल हाशिम ने कहा- ‘जहाँ न्याय और समता असफल हो, चमचमाता इस्पात मसले को तय करेगा।’

पंजाब के शौकत हयात खाँ ने कहा- ‘मेरे प्रांत की लड़ाकू जाति केवल एक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रही है। आप हमें केवल एक अवसर दीजिए और हम नमूना पेश कर देंगे जबकि ब्रिटिश सेना अभी भी मौजूद है।’

इतनी खतरनाक कार्यवाहियों एवं बयानबाजियों एवं धमकियों के बावजूद यदि अंग्रेज सरकार जिन्ना और उसके दोस्तों को गिरफ्तार नहीं कर रही थी तो इसके पीछे लॉर्ड मिण्टो द्वारा ई.1906 में तैयार की गई एक नीति काम कर रही थी जिसका सार इस प्रकार है-

जब लाल-बाल और पाल के नेतृत्व में उग्रवादी कांग्रेसी नेताओं ने देश की आजादी की मांग तेज कर दी तो अँग्रेजों ने तब के अलगाववादी मुसिलम नेताओं को कांग्रेस के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमान करने का निश्चय किया।

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो के निजी सचिव स्मिथ ने अलीगढ़ कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल आर्किबाल्ड को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि- ‘यदि आगामी सुधारों के बारे में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल मुसलमानों के लिए अलग अधिकारों की मांग करे और इसके लिए वायसराय से मिले तो वायसराय को उनसे मिलने में प्रसन्नता होगी।’

इस निमंत्रण को पाकर अलगाववादी-मुस्लिम नेताओं की बांछें खिल गईं। 1 अक्टूबर 1906 को 36 मुस्लिम नेताओं का प्रतिनिधि मण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला में लॉर्ड मिन्टो से मिला और उन्हें एक आवेदन पत्र दिया जिसके माध्यम से कई तरह की मांगें सरकार के समक्ष रखी गईं।

लॉर्ड मिण्टो ने इन लोगों का स्वागत किया तथा कहा कि आपकी हर मांग उचित है तथा आपकी हर मांग पूरी की जाएगी। आप को केवल इतना करना है कि कांग्रेस द्वारा चलाई जा रही देश-विरोधी गतिविधियों से दूर रहना है।

उस समय के अलगाववादी मुस्लिम नेताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि अंग्रेज सरकार अचानक उन्हें इतना सम्मान देगी और कांग्रेस के खिलाफ लड़ने में उनकी सहायता करेगी। एक तरह से इन अलगाववादी नेताओं की लॉटरी लग गई थी।

इस प्रकार अंग्रेज अधिकारियों ने अलगाववादी मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने तथा साम्प्रदायिकता की खाई को चौड़ा करने का काम आरम्भ कर दिया। अंग्रेज चाहते थे कि भारत के अलगाववादी मुसलमान, कांग्रेस से अलग होकर एक बड़ा राजनीतिक दल खड़ा कर लें।

इस अलगाववादी प्रतिनिधि मण्डल की उत्तेजना को देखकर अँग्रेज अधिकारी अच्छी तरह समझ गये कि वे इन नेताओं को भारत की आजादी के आन्दोलन के खिलाफ आसानी से काम ले सकते हैं। इस बात की पुष्टि स्वयं लॉर्ड मिण्टो की पत्नी मैरी मिन्टो की डायरी से होती है।

जिस दिन यह प्रतिनिधि मण्डल शिमला से अपने घरों को लौटा, उसी शाम एक ब्रिटिश अधिकारी ने वायसराय की पत्नी मैरी मिन्टो को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘मैं आपको संक्षेप में सूचित करता हूँ कि आज एक बहुत बड़ी बात हुई है। आज राजनीतिज्ञता पूर्ण एक ऐसा कार्य हुआ है जिसका प्रभाव भारत तथा उसकी राजनीति पर चिरकाल तक पड़ता रहेगा। भारत के 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष अर्थात् कांग्रेस में सम्मिलित होने से रोक लिया है।’

इंग्लैण्ड के समाचारपत्रों ने भी शिमला में आए अलगाववादी मुसलमानों के प्रतिनिधि मण्डल को अंग्रेजों की बहुत बड़ी विजय बताया और अलगाववादी मुसलमानों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की।

यह प्रथम अवसर था जब वायसराय के निमंत्रण पर भारत के विभिन्न भागों के मुसलमान नेता शिमला में एकत्रित हुए थे।

ई.1923 के कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि यह प्रतिनिधि मण्डल, सरकारी आदेश से लॉर्ड मिन्टो के पास गया था।

जब ये अलगाववादी मुस्लिम नेता वापिस अपने घरों को लौटे तब वे पूरे राजनीतिज्ञ बन चुके थे। अब उनके कंधों पर सर सैयद अहमद द्वारा तराशी गई अलीगढ़ की राजनीति को सारे देश में फैलाने की जिम्मेदारी थी।

मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने के इस काम के लिए भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने 16 अक्टूबर 1906 को गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो को पत्र लिखकर बधाई दी।

इस सम्मेलन के दो साल के भीतर ही ई.1908 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई जो देश में कांग्रेस तथा हिन्दू महासभा द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों को विफल करने के उद्देश्य से बनाई गई थी।

शिमला में गवर्नर द्वारा मुस्लिम नेताओं को दिया गया आश्वासन ब्रिटिश सरकार द्वारा शीघ्र ही पूरा किया और ई.1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम में, ब्रिटिश-भारत की प्रत्येक विधान सभा के लिए मुसलमानों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से अधिक सदस्य चुनने का अधिकार दिया गया।

इसके बाद अंग्रेज सरकार की यह नीति हो गई कि जब भी कांग्रेस या हिन्दू महासभा या कोई अन्य राष्ट्रवादी संगठन आजादी की मांग को लेकर आंदोलन करे तो उसे लाठी-घूंसों से निबटो और जेल में पटको किंतु यदि जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग कुछ भी खून-खराबा करे तो उससे कुछ मत कहो।

यही कारण था कि जिन्ना और उसके दोस्तों को एक बार भी जेल गए बिना पाकिस्तान मिल गया। खुद लॉर्ड माउंटबेटन ने जिन्ना को थाली में परसोकर पाकिस्तान भेंट किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलवर महाराजा जयसिंह ने लेडी वायसराय के कुत्ते को अपने डेरे में नहीं घुसने दिया !

0

अलवर महाराजा जयसिंह की गिनती भारत के इतिहास में बीसवीं सदी के महान व्यक्तियों में होती है। महाराजा स्वतंत्र विचारों के धनी और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। उनकी राष्ट्रभक्ति असंदिग्ध थी। इस कारण अंग्रेज उनकी तरफ से सदैव ही आशंकित रहते थे।

अलवर महाराजा जयसिंह केवल 10 वर्ष की आयु में राजा बने थे। वे स्वयं को भगवान श्रीराम का अवतार समझते थे तथा अपने हाथ की दिव्य अंगुलियों को ढंकने के लिये सिल्क के काले रंग के दस्ताने पहनते थे। यहाँ तक कि एक बार उन्होंने ब्रिटिश सम्राट से हाथ मिलाते समय भी अपने दस्ताने उतारने से मना कर दिया था।

भारत में ऐसा करने की हिम्मत केवल दो राजाओं में थी, एक थे उदयपुर के महाराणा फतेहसिंह तथा दूसरे थे अलवर के महाराजा जयसिंह। इन दोनों को ही अंग्रेजों ने राजगद्दी से हटाया।

उदयपुर का राज्य तो उनके पुत्र भूपालसिंह को दे दिया गया तथा महाराणा अपने राज्य में बने रहे किंतु अलवर का राज्य छीनकर महाराजा जयसिंह को अलवर राज्य से निकाल दिया गया।

अलवर के इस महान राजा के बारे में आज लोग भूल गए हैं किंतु उनका इतिहास भारत के प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी है। युवाओं को उनका जीवन चरित्र अवश्य पढ़ना चाहिए।

वे खेलों के मैदान में भवागन नटवर नागर कृष्ण की सी कलाबाजियां दिखाने में कुशल थे। चाहे पोलो हो या क्रिकेट, घुड़सवारी हो या शिकार, इन सब में वे असाधारण थे। ऐसे व्यक्ति के प्रति वीर पूजा के भाव स्वतः ही जागते हैं। अतः जनता उनकी प्रशंसक थी।

अंग्रेज उनसे इस कारण दुखी रहते थे कि वह अंग्रेजों को अपने से बड़ा नहीं मानते थे। एक बार महाराजा ग्रीष्म प्रवास पर शिमला गए। वहां उन्हें ज्ञात हुआ कि भारत के वायसराय का परिवार भी शिमला आया हुआ है। महाराजा ने सदाशयता के नाते लेडी वायसराय को सायंकालीन भोजन के लिए अपने डेरे पर आमंत्रित किया। लेडी वायसराय संध्या काल में अपने पालतू कुत्ते के साथ महाराजा के डेरे पर पहुंची।

अलवर महाराजा जयसिंह ने नियम बना रखा था कि उनके डेरे में कोई कुत्ता प्रवेश नहीं कर सकता था। लेडी वायसराय को महाराजा के नियम से अवगत करवाया गया तथा अनुरोध किया कि वह कुत्ता, अपने सेवकों के साथ डेरे के बाहर छोड़ दे किंतु लेडी वायसराय ने जवाब दिया कि वह हिन्दुस्तान के स्वामी की पत्नी है और अपने कुत्ते को जहां चाहे लेजा सकती है।
महाराजा के अधिकारियों ने महाराजा को लेडी वायसराय के कुत्ते सहित आगमन की सूचना दी। महाराजा ने उन्हें कहा कि लेडी को आदर पूर्वक डेरे में लाया जाए किंतु उनके कुत्ते को डेरे से बाहर रोक लिया जाए।

सेवकों ने महाराजा को बताया कि लेडी अपने कुत्ते के साथ ही डेरे के भीतर आने की जिद्द कर रही है। इस पर महाराजा ने अपने अधिकारियों से कहा कि वे लेडी वायसराय से आग्रह करें कि वे अपनी जिद्द छोड़ दें।

महाराजा के इस जवाब से लेडी वायसराय नाराज हो गई और डेरे के बाहर से ही बिना भोजन किए लौट गई।
जब इस घटना की जानकारी देश भर के अंग्रेज अधिकारियों को हुई वे सन्न रह गए किंतु देशवासियों का सीना महाराजा के इस स्वाभिमान पूर्वक आचरण की सूचना पाकर गर्व से फूल गया।

महाराजा को बाद में इसकी कीमत अपना राज्य तथा अपने प्राण गंवाकर चुकानी पड़ी। महाराजा को उनके राज्य से निष्कासित करने के लिए अंग्रेजों ने कई चालें चलीं। उनके बारे में प्रचारित किया गया कि अलवर नरेश जयसिंह ने एक बार अपने घोड़े को इसलिए पैट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया क्योंकि वह रेस नहीं जीत सका था।

कोरफील्ड ने लिखा है कि महाराजा अपनी प्रजा की अपेक्षा अपने कुत्तों का अधिक ध्यान रखते थे। उनके बारे में दुष्प्रचार किया गया कि महाराजा के खर्चे बहुत बढ़े हुए थे जिसके कारण वे ऋण के बोझ से दबे हुए थे।

एक तत्कालीन इतिहासकार ने महाराजा के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए लिखा है-‘महाराजा जयसिंह अपने समय का बहुत विद्वान और दार्शनिक नरेश था। महाराजा जितनी कुशाग्र बुद्धि रखता था उतना ही निरंकुश था। वह हिन्दी भाषा का प्रेमी था, यों अंग्रेजी और फारसी का भी अच्छा ज्ञान रखता था।’

महाराजा को अंग्रेजी और हिन्दी पर समान अधिकार था और उन्हें संस्कृत का भी ज्ञान था।

महाराजा जायसिंह एक योग्य प्रशासक थे जिन्होंने अलवर राज्य का शासन प्रबंध आधुनिक रीति के अनुसार किया। वे पोलो तथा रैकेट के अच्छे खिलाड़ी थे। वे हिन्दू दर्शन के प्रकाण्ड ज्ञाता और उच्च कोटि के वक्ता थे। वे कई मायनों में अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में भाग लिया। ़ ़ ़़ महाराजा जयसिंह महान क्षमताओं से युक्त थे’।

बीसवीं सदी के परतंत्र भारत में बीकानेर नरेश गंगासिंह के साथ अलवर नरेश जयसिंह भी नरेन्द्र मण्डल की राजनीति में अग्रणी रहे थे। जयसिंह ने लंदन में ई.1931 में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भी भाग लिया था।

महाराजा की क्षमाशीलता की अनेक कहानियां प्रचलित थीं। राज्य का एक पदाधिकारी को नौकरी से निकाल दिया गया। वह कई दिनों तक हताश होकर इधर-उधर फिरता रहा। एक दिन उसने नीचे लिखा हुआ उर्दू पद्य महाराज की सेवा में डाक से भेजा-

मेरे गुनाह ज़ियादा हैं, या तेरी रहमत।
हिसाब करके बतादे, मेरे रहीम मुझे।।
महाराजा ने उस कर्मचारी को बहाल कर दिया।

एक बार एक गरीब बुढ़िया जयसमन्द बान्ध में डूबने लगी। महाराज भी अपने अंगरक्षकों सहित वहीं थे। गहरे पानी में डूबती बुढ़िया की दयनीय दशा देखकर भी किसी का कर्मचारी का साहस उसे बचाने का न हुआ। महाराजा ने स्वयं जल में कूदकर बुढ़िया के प्राणों की प्राण रक्षा की।

पण्डित मोतीलाल नेहरू ने एक बार शिमला में महाराजा के बारे में कहा था कि यह देश के लिये दुर्भाग्य की बात है कि उनका जनम राजकुमार के रूप में हुआ अन्यथा देश को एक बहुत योग्य और बड़ा नेता मिला होता।

एडविन मांटेग्यू ने महाराजा जयसिंह के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए अपनी डायरी में लिखा है- ‘महाराजा जयसिंह के समान कोई अन्य भारतीय इतना बुद्धिमान नहीं है।’

28 फरवरी 1920 के अपने भाषण में मांटेग्यू चैम्सफोर्ड ने कहा था- ‘अलवर का शासन प्रबंध तो उत्तम है, प्रजा की प्रसन्नता तथा सांत्वना और भी बड़ी बात हैं जिन पर अलवर नरेश का पूरा ध्यान है। महाराजा ने बन्धों के निर्माण कार्य द्वारा भूमि को सजला और शस्य श्यामला बनाने का जो प्रयत्न किया है, उनसे अकाल का भय न रहेगा और कृषक प्रजा सुखी रहेगी।’

इसके बावजूद कुछ अंग्रेज अधिकारी महाराजा जयसिंह से शत्रुता रखते थे और उन्हें पदच्युत करना चाहते थे। मेवों द्वारा राज्य में भयानक विद्रोह करने तथा राज्य के एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी द्वारा किसानों पर अत्याचार किए जाने से मची साम्प्रदायिक मार-काट के बाद अंग्रेजों ने बड़े ही मनमाना ढंग से 16 जून 1934 को महाराजा जयसिंह को उनके राज्य से बाहर निकाल दिया। महाराजा को राज्य छोड़कर विलायत जाना पड़ा।

19 मई 1937 को पेरिस में टेनिस खेलते हुए रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। कुछ भारतीय इतिहासकारों को महाराजा की मृत्यु के पीछे अंग्रेजों का षड़यंत्र लगता है।

शरीर त्याग से 4 घण्टे पूर्व तक महाराजा रघुनाथजी के ध्यान में मग्न रहे। अलवर महाराजा जयसिंह की मृत्यु पर झालावाड़ नरेश महाराजराणा राजेन्द्रसिंह ने लिखा था-

कैसो रंग मांहि भंग कियो है कराल काल,
सूखी फुलवारी आज रम्य काम काज की।
मिट गयो वीरता के भाल को तिलक लाल,
टूट गई आज ढाल क्षत्रिय समाज की।
सूख गयो हाय! आज प्रेम को अगाध सिन्धु,
कविता मिलेगी कहां रस सिर ताज की।
उर पर आरी चली काल की कटारी चली,
स्वर्ग को सवारी चली प्यारे जयराज की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्या गांधीजी राष्ट्रपिता हैं

0

क्या गांधीजी राष्ट्रपिता हैं ? यह एक ऐसा उलझा हुआ प्रश्न है जिसका जवाब नहीं दिया जा सकता।

मोहनदास करमचंद गांधी निश्चित रूप से भारत की आजादी की लड़ाई का एक बड़ा चेहरा थे। वे बीसवीं सदी में दुनिया भर में जननेता और राजनीतिज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हुए।

वे कुछ समय के लिए लंदन तथा दक्षिण अफ्रीका में बैरिस्टर रहे किंतु प्रिटोरिया सरकार के कर्मचारियों ने उन्हें चलती ट्रेन से फैंक दिया और वे भारत आ गए।

भारत में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन नामक कई आंदोलनों की शुरुआत की किंतु उनके द्वारा चलाए गए ये आंदोलन या तो बीच में ही बंद कर दिए गए या स्वयं असफल हो गए।

गांधीजी को कुशल वक्ता, लेखक और पत्रकार के रूप में भी जाना जाता है किंतु जब देश को आजादी मिली तो उनकी बात सुनने और मानने वाला कोई नहीं था। इसलिए वे 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में नहीं थे, कलकत्ता के मियांबाग में उपवास कर रहे थे।

गांधीजी बड़े अर्थशास्त्री भी थे। उन्होंने भारत के लिए जो आर्थिक नीतियां सुझाईं थीं, उनकी प्रशंसा हर भारतीय करता है किंतु उन सिद्धांतों पर अमल कोई नहीं करता।

उन्हें महात्मा तथा राष्ट्रपिता जैसे महान शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। इस बात पर भी कई लोगों को ऐतराज है।
हमारा ये वीडियो इसी बात की सत्यता जानने के लिए है कि क्या गांधीजी, वास्तव में भारत के राष्ट्रपिता हैं ? क्या दो रेडियो संदेशों ने उन्हें राष्ट्रपिता बनाया ?

गाँधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी ?

इसकी कोई वैधानिकता है भी अथवा नहीं ?

वर्ष 2005 में केन्द्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद कुछ नागरिकों ने भारत सरकार से उन दस्तावेजों की मांग की जिनके आधार पर गांधीजी को राष्ट्रपिता घोषित किया गया या उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई!
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस प्रार्थना पत्र के जवाब में संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत सरकार ने गांधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि नहीं दी।

अर्थात् भारत सरकार ने उन्हें कभी भी राष्ट्रपिता घोषित नहीं किया।

प्रश्न उठता है कि जब उन्हें सरकार द्वारा जारी लाखों दस्तावेजों में राष्ट्रपिता कहा जाता रहा है तो उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि क्यों नहीं दी गई ?

इस प्रश्न का जवाब यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 8 (1) में सरकार को शैक्षिक और सैन्य खिताब के अतिरक्ति और कोई उपाधि देने की अनुमति नहीं है। राष्ट्रपिता न तो शैक्षिक उपाधि है और न सैनिक।

जब कानून गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता नहीं हैं तो फिर किस अधिकार से हैं?

इस प्रश्न का जवाब यह है कि यह केवल एक राजनीतिक बयान है जो दो बड़े नेताओं द्वारा केवल दो बार रेडियो पर दोहराया गया और गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता कहलाने लगे।

4 जून 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश में गांधीजी को ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया। इस वक्तव्य में राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था। उन्हें ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया गया था।
6 जुलाई 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से गांधीजी के लिए पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ शब्द का प्रयोग किया।
दूसरी बार 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या होने के बाद देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत की जनता के नाम रेडियो पर दिए गए संदेश में कहा कि राष्ट्रपिता अब नहीं रहे।

बस इन दो रेडियो संदेशों ने गांधीजी को भारत का राष्ट्रपिता बना दिया।

लगे हाथों गांधीजी के नाम के साथ जुड़े महात्मा शब्द पर भी विचार कर लिया जाए। सबसे पहले 12 अप्रैल 1919 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को लिखे एक पत्र में उन्हें ‘महात्मा’ शब्द से सम्बोधित किया। बस तभी से गांधीजी महात्मा हो गए।

इस प्रकार गांधीजी के नाम के साथ जुड़े ये दोनों विशेषण संवैधानिक स्थिति का नहीं अपितु भावनात्मक स्थिति का प्रदर्शन करते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मृत्यु के समय कष्ट होता है ?

0

इस संसार में समस्त प्राणी मृत्यु से भयभीत रहते हैं। उनमें से मनुष्य नामक प्राणी, मृत्यु का भय सर्वाधिक अनुभव करता है। संसार भर की सभ्यताओं में यह विश्वास किया जाता है कि मनुष्य को मृत्यु के समय कष्ट होता है।

जाने कब और किस रूप में मृत्यु आकर प्राणी को दबोच ले, कोई नहीं जानता। हमारे धर्म ग्रंथों में मृत्यु का ऐसा भयावह वर्णन किया गया है कि उसे पढ़कर आदमी की रूह कांप जाती है। मृत्यु के समय शरीर से प्राण निकलने की प्रक्रिया बड़ी भयानक बताई गई है।

मृत्यु के समय कष्ट होता है, इसे किसी प्रयोगशाला में अब तक सिद्ध नहीं किया जा सका है। भारतीय धर्मशास्त्र मृत्यु को नींद की गहरी अवस्था मानते हैं जबकि अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मृत्यृ नींद नहीं है, अपितु सांसारिक नींद से जागने और ईश्वर की ओर उन्मुख होने की प्रक्रिया है।

गरुड़ पुराण एवं महाभारत आदि कुछ ग्रंथों में मृत्यु के तुरंत बाद वैतरणी नदी पार करने में होने वाले असीम कष्टों का वर्णन किया गया है। उसके बाद कर्मों के फल के अनुसार स्वर्ग-नर्क भोगने की बात कही गई है।

स्वर्ग मिला तो ठीक अन्यथा नर्क के कष्ट और भी भयानक बताए गए हैं। स्वर्ग और नर्क भोगने की अवधि पूरी होने के बाद फिर से माँ के पेट में नौ माह उलटे लटक कर कष्ट भोगने की बातें बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर कही गई हैं।

संसार में अधिकतर लोगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि आज तक किसी ने मृत्यु के बाद लौटकर यह नहीं बताया कि मरते समय कितना कष्ट होता है किंतु मरने वाले के चेहरे पर मांसपेशियों के तनाव से यह अनुभव किया जा सकता है कि मृत्यु के समय अपार कष्ट होता है।

जबकि वास्तविकता यह है कि कुछ लोग मरने के बाद फिर से अपनी देह में लौटकर आते हैं। कुछ लोग मरने के चार-पांच घण्टे बाद अर्थियों से उठ-बैठते हैं तो कुछ लोग शमशान पहुंचकर जीवित होते हैं।

शरीर में लौटकर आने वाले व्यक्तियों ने प्रायः अपने अनुभव सुनाए हैं किंतु यह कभी नहीं बताया कि उन्हें मृत्यु के समय किसी भयानक दर्द का सामना करना पड़ा था। वे मरने के क्षण से लेकर देह में वापस लौटने के क्षण के बीच का उल्लेख एक रोचक सपने के समान करते हैं।

अपनी मृत अवस्था में वे किसी यात्रा का उल्लेख करते हैं, किसी से मिलने का उल्लेख करते हैं तथा किसी व्यक्ति द्वारा किन्ही लोगों को आदेश दिए जाने का उल्लेख करते हैं कि इस व्यक्ति की मृत्यु का समय नहीं हुआ, इसलिए इसे फिर से इसके शरीर में डालकर आओ।

कभी भी किसी ने भी मृत्यु के समय या फिर से देह में लौटते समय किसी दर्दनाक अनुभव होने का उल्लेख नहीं किया है। हां वे एक धक्का लगने जैसा अनुभव अवश्य करते हैं।

हमारे धर्मग्रंथों में मृत्यु के समय जिस दर्द के होने का उल्लेख किया गया है वह लोगों को नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए दिखाया गया एक काल्पनिक भय है। उसमें सच्चाई नहीं है।

वास्तव में मृत्यु एक दर्द रहित प्रक्रिया है। जिस प्रकार किसी ऑपरेशन के पहले हमें बहुत भय लगता है किंतु ऑपरेशन के समय एनेस्थेशिया दिए जाने के कारण दर्द का अनुभव तक नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृति मृत्यु के समय जीवात्मा को विशेष प्रकार के एनेस्थेशया देती है जिसके कारण न तो शरीर को दर्द होता है और न शरीर को छोड़कर जाने वाले जीवात्मा को।

जिन लोगों के चेहरे की मांसपेशियों में, मृत्यु के समय या बाद भी तनाव दिखाई देता है, वह मनुष्य के द्वारा मृत्यु के समय भोगी गई दर्दनाक स्थिति के कारण नहीं होता अपितु मरने से पहले उनके मन में मृत्यु का जो भय होता है, उसके कारण उनके चेहरे की मांसपेशियां तनाव में आ जाती हैं।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि दो बच्चों को एक ही प्रकार का इंजेक्शन लगाने पर एक बच्चा तो चीख-चीख कर आसमान भर देता है जबकि दूसरा बच्चा आराम से इंजेक्शन लगवा लेता है, वह उफ तक नहीं करता।
पहला बच्चा जो इंजेक्शन के लगने पर चीखता-चिल्लाता है, वह वस्तुतः उसी समय से रोने लगता है जिस समय उसे ज्ञात होता है कि उसे इंजेक्शन लगेगा।

ठीक यही स्थिति मृत्यु के सम्बन्ध में है, हम मृत्यु के भय से स्वयं को इतना भयभीत कर लेते हैं कि हमारे चेहरे की मांसपेशियां स्वतः उसी प्रकार खिंच जाती हैं जिस प्रकार कष्ट में खिंचनी चाहिए।

एक और उदाहरण लेते हैं। एक व्यक्ति को किसी देश के न्यायालय ने मृत्यु दण्ड दिया। वैज्ञानिकों ने उसके साथ एक प्रयोग किया। उसे एक कोबरा सांप दिखाकर कहा गया कि एक माह बाद तुम्हें इस कोबरा के दंश से मरवाया जाएगा। उस व्यक्ति को प्रतिदिन वह कोबरा दिखाया गया तथा एक माह बाद उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसे केवल दो सुइयां चुभाई गईं।

सुइयों के चुभते ही वह व्यक्ति छटपाने लगा और थोड़ी ही देर में मर गया। उसका शरीर भी ठीक वैसे ही नीला पड़ गया जैसा कि सर्पदंश के समय होता है। वैज्ञानिकों के द्वारा परीक्षण किए जाने पर ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति के शरीर में वही जहर पाया गया जो कि कोबरा सांप में होता है।

मृतक के शरीर में जहर कहां से आया, जबकि उसे सर्पदंश तो लगवाया ही नहीं गया था? निश्चित रूप से यह जहर उसी सजायाफ्ता व्यक्ति के मन में बैठे हुए डर ने पैदा किया था।

मृत्यु के मामले में भी ठीक ऐसा ही होता है। मृत्यु हमें दर्द नहीं देती, हम स्वयं अपने आपको दर्द देने के लिए जीवन भर तैयार करते हैं।

अब हम मृत्यु की घटना को आध्यात्मिक स्तर पर समझने का प्रयास करते हैं। मनुष्य की मृत्यु सामान्यतः तीन प्रकार से होती है, वृद्धावस्था आने पर होने वाली स्वाभाविक मृत्यु, बीमारी के कारण किसी भी आयु में होने वाली मृत्यु तथा दुर्घटना, हत्या या फांसी आदि में होने वाली अचानक मृत्यु।

इनमें से वृद्धावस्था में होने वाली स्वाभाविक मृत्यु तथा बीमारी की अवस्था में होने वाली मृत्यु के समय आदमी लेटा हुआ रहता है। ऐसी अवस्था में मृत्यु होने पर मनुष्य का सूक्ष्म शरीर अर्थात् एस्ट्रल बॉडी अर्थात् जीवात्मा, मरणासन्न मनुष्य के स्थूल शरीर से बाहर निकल कर उसके ऊपर तैरने लगता है। स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म शरीर एक मुलायम डोरी से कनैक्टेड रहते हैं।

जिस प्रकार जन्म की एक घड़ी आ जाती है, उसके बाद जीव मां के पेट में नहीं रुक सकता, उसी प्रकार मृत्यु की भी एक घड़ी आ जाती है, उसके बाद मनुष्य अपने स्थूल शरीर में नहीं रुक सकता। अतः जीवात्मा, स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर के बीच की कॉड को झटका देकर तोड़ डालता है। कई बार जीवात्मा को लेने आई दूसरी जीवात्माएं मरणासन्न व्यक्ति की सहायता करती हैं तथा वे दाई अथवा नर्स की भूमिका निभाती हैं।

स्थूल शरीर सिल्वर कॉड के टूटने की इस घटना को देखता है और उसके चेहरे पर तनाव एवं दर्द के भाव उत्पन्न होते हैं जबकि इस प्रक्रिया में ठीक वैसे ही कोई कष्ट नहीं होता जैसे जन्म के समय आम्बल नाल काटने पर न मां को और न बच्चे को कोई कष्ट होता है। या हमें बाल एवं नाखून काटने पर होता है।

दुर्घटना, हत्या एवं फांसी आदि से होने वाली मृत्यु में मनुष्य प्रायः बैठा हुआ या खड़ा होता है। ऐसी अवस्स्था में होने वाली मृत्यु की घटनाओं को मनुष्य अपनी आंखों से मृत्यु को निकट आते हुए देखता है।

एक उदाहरण से इस समझते हैं। माना जाए कि कोई मनुष्य सड़क पर चल रहा है और वह अचानक अपने सामने तेज गति से आते हुए किसी ट्रक को देखता है। वह समझ जाता है कि उसका इस ट्रक के नीचे कुचल कर मरना तय है। ऐसी अवस्था में वह पूरा जोर लगाकर आगे या पीछे भागने का प्रयास करता है किंतु मनुष्य के सड़क पार करने से पहले ही ट्रक इतना नजदीक आ जाता है कि वह समझ जाता है कि अगले ही क्षण वह ट्रक के नीचे होगा।

ऐसी भयावह स्थिति में भय के कारण मनुष्य की एस्ट्रल बॉडी अर्थात् सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से स्वयं कूदकर बाहर आ जाती है। अर्थात् मनुष्य ट्रक शरीर पर चढ़ने से पहले ही मर जाता है। किसी भूत-प्रेत को देखकर दम निकल जाना, किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु का समाचार सुनकर मर जाना, जैसी स्थितियां इसी प्रकार की घटनाओं का परिणाम हैं।

अतः प्रत्येक मनुष्य के लिए इसे समझना आवश्यक है कि मृत्यु एक सहज स्वाभाविक क्रिया है, चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ प्राणी जन्म और मृत्यु की घटना को चौरासी लाख बार भोगता है, उसे इसका पूरा अनुभव होता है। प्रकृति भी इस काम में प्राणी की पूरी सहायता करती है। अतः मृत्यु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वामी विवेकानंद शिकागो उद्बोधन के बाद क्यों रोए!

0

स्वामी विवेकानंद का शिकागो उद्बोधन एक अंतर्राष्ट्रीय महत्व की घटना है। कहा जाता है कि शिकागो सम्मेलन में उद्बोधन देने के बाद स्वामीजी रात्रि में रोए। इस आलेख में हम इस बात पर विचार करेंगे कि क्या स्वामीजी उस रात्रि में सचमुच रोए थे!

सदियों की गुलामी भोगने के बाद हिन्दू जाति में पहले मनुष्य स्वामी विवेकानंद हुए जिन्होंने विश्व मंच पर खड़े होकर सम्पूर्ण हिन्दू जाति को ललकार कर कहा था कि हम बहुत रो चुके हैं, अब हमें रोने की आवश्यकता नहीं है। उठो अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। उन्होंने कहा ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं। यह हमीं हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि यहां कितना अंधेरा है।

स्वामी विवेकानंद केवल 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन धरती पर रहे। इस अवधि में भी लगभग चार साल उन्होंने अमरीका एवं यूरोप की धरती पर बिताए। इस प्रकार अपने सक्रिय जीवन का बहुत कम हिस्सा उन्हें भारत में रहकर भारतीयों के बीच बिताने के लिए उपलब्ध हुआ। स्वामी विवेकानंद को भारतीयों से पहले अमरीकियों और यूरोपवासियों ने पहचाना। भारत ने तो स्वामी विवेकानंद को अमरीकियों एवं यूरोपवासियों की आंखों से देखा।

विगत एक हजार सालों से भी अधिक समय से गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए भारत के पास वह आंख ही कहाँ बची थी जो वह स्वामी विवेकानंद को पहचान सकती! अमरीकियों ने उन्हें देखा तो दीवाने होकर उनकी तरफ दौड़ पड़े।

यूरोपियनों ने उन्हें देखा तो उनके समक्ष नतमस्तक हो गए। भारत की धरती से बाहर पैर रखने से पहले स्वामी रामकृष्ण परमहंस, खेतड़ी नरेश अजीतसिंह तथा गुरुभाई अभेदानंद जैसे कुछ ही लोग स्वामीजी को पहचान पाए थे कि यह धधकती हुई ज्वाला किसी दिन भारत का उद्धार करेगी।

कहा जाता है कि जब स्वामीजी ने 11 सितम्बर 1893 के शिकागो सम्मेलन में अपना सम्बोधन माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका जैसे शब्दों से आरम्भ किया तो उस हॉल में बैठे सात हजार लोग हैरान रह गए। वे लोग लेडीज एण्ड जैण्टलमैन सुनने के अभ्यस्त थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि किसी व्यक्ति के लिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति भाई और बहिन हो सकता है!

उस हॉल में बैठे यूरोपियन्स को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई कि एक गुलाम देश से आया हुए निर्धन युवा तपस्वी अपने शासकों के लिए ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स जैसे बराबरी वाले शब्दों का प्रयोग करने का साहस रखता है!

भारत के बुद्धिवादियों का मानना है कि ‘माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका’ ने पश्चिमी सभ्यता के लोगों पर जादू का सा असर किया क्योंकि वहां किन्हीं दो अनजान स्त्री-पुरुष के बीच भाई-बहिन जैसे पवित्र सम्बन्ध की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

यह सही है कि स्वामीजी द्वारा उच्चारित ‘माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका’ ने पश्चिमी सभ्यता के लोगों पर जादुई असर किया किंतु यह पूरी वास्तविकता नहीं है। पूरी वास्तविकता इससे कहीं बहुत आगे और कहीं बहुत गहरी है।

स्वामीजी ने यदि माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका के स्थान पर कुछ और शब्दों का प्रयोग किया होता तो भी पश्चिमी सभ्यता के लोगों के दिलों पर इतना ही जादुई असर हुआ होता।

बुद्धिवादी समाज द्वारा इस जादुई असर के कारणों की बुद्धिवादी व्याख्या की गई है, सम्पूर्ण व्याख्या नहीं की गई है। स्वामीजी के शब्दों के जादुई असर की सम्पूर्ण व्याख्या के लिए हमें बुद्धिवादियों की ओर नहीं अपितु आस्थावादियों की ओर देखना पड़ेगा।

इस वीडियो में, मैं जो कहना चाहता हूँ, उसे कहने से पहले मैं बुद्धिवादियों द्वारा स्वामीजी के जीवन के विश्लेषण के सम्बन्ध में प्रस्तुत इस निष्कर्ष का स्मरण कराना चाहता हूँ कि स्वामीजी बहुत कम समय के जीवन में 1500 वर्ष का कार्य कर गए। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि वे मात्र प्रसिद्ध नहीं थे अपितु ‘सिद्ध’ थे। इसी शब्द में स्वामीजी की सफलता का रहस्य छिपा हुआ है। वे सिद्ध थे, इसीलिए उनके शब्दों ने पश्चिमी जगत् के बुद्धिजीवियों पर जादुई असर किया।

स्वामी विवेकानंद के लिए समस्त भारतीय उनके अपने थे किंतु अन्य देशों के लोग भी पराए नहीं थे। इसीलिए वे पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचने में सफल हुए। उनके जीवन का उद्देश्य हिन्दुओं को इस योग्य बनाना था जिससे वे पूरी दुनिया के समक्ष आत्मविश्वास और बराबरी के साथ खड़े हो सकें। वे जानते थे कि हिन्दू जाति में अध्यात्म की पवित्र और उज्जवल ज्वाला धधक रही है किंतु उसे अज्ञान और गुलामी की राख ने ढंक लिया है।

स्वामीजी इस राख को ज्ञान की कुरेदनी से हटाना चाहते थे। वे जानते थे कि अज्ञान की धूल ने हिन्दुओं को कूपमण्डूक बना दिया है जिसके कारण स्वामीजी को हिन्दुओं का ही सर्वाधिक विरोध सहन करना पड़ता था।

उन्होंने कई बार इस बात को कहा कि जब भी मैं कोई महान कार्य करना चाहता हूँ, तब मुझे मौत की घाटी से गुजरना पड़ता है। अपने ही देश के कूपमण्डूक हिन्दुओं द्वारा किए जा रहे विरोध के उपरांत भी स्वामीजी अपना कार्य करते रहे और वे शिकागो में भारत की आत्मा की आवाज बनकर जा पहुंचे।

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की 17 दिवसीय धर्मसंसद के दौरान शिकागो शहर में छः व्याख्यान दिए जिनके माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और दर्शन को पश्चिमी बुद्धिजीवियों के समक्ष रखा। उनके व्याख्यानों ने भारत की परिभाषा बदल दी।

विवेकानंद के व्याख्यानों से पहले धर्मसंसद केवल इस बात पर बहस कर रही थी कि दुनिया के लिए ईसाईवाद अच्छा है या यहूदीवाद! स्वामीजी ने उस बहस का रुख मोड़कर उसे हिन्दूवाद अर्थात् हिन्दुत्व पर ला दिया। दुनिया भर से आए 7000 बुद्धिजीविायों ने पहली बार हिंदुत्व के बारे में सुना और जाना।

स्वामीजी के व्याख्यानों ने न केवल शिकागो धर्मससंद की दिशा बदली अपितु पूरी दुनिया के चिंतन की दिशा भी बदल दी। पश्चिम के लोग पागलों की तरह स्वामीजी को सुनने के लिए दौड़ पड़े।

जब स्वामी विवेकानंद समुद्र के किनारे भ्रमण करने जाते तो दुनिया भर के नर-नारी उनके सामने खड़े हो जाते। स्वामीजी चलते रहते और हिन्दुत्व के बारे में बोलते रहते। दुनिया उन्हें सुनती रहती और उलटे पैरों चलती रहती। जब स्वामीजी बोलना बंद करते तो लोग हैरान होकर स्वयं को देखते कि कैसे वे उल्टे पैरों इतनी देर तक चलते रहे।

स्वामीजी के मुख से निकले हिन्दुत्व का जादू पूरी दुनिया के सिर चढ़कर बोलने लगा। जिस भारत को अंग्रेजों ने सांप और सपेरों का देश कहकर पूरी दुनिया में बदनाम कर रखा था, वह देश अध्यात्म और दर्शन की भूमि के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित हो गया और संसार भर का प्यारा बन गया।

दुनिया भर से मिले इसी प्यार ने भारत को मात्र अगले 54 वर्षों में आजादी दिलवा दी। विगत हजार सालों से भी अधिक समय से गुलामी भोग रहा भारत मात्र पचास साल में आजाद हो जाए, यह स्वामीजी के शिकागो चमत्कार ही परिणाम था।

स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारतवासियों की सोती हुई आत्मा को झिंझोड़ कर उठा दिया अपितु पूरी दुनिया को भारत की वास्तविक आत्मा का दर्शन करवाकर उसे आदरणीय एवं वंदनीय बना दिया। ऐसे भारत को भला अब संसार की कौनसी शक्ति गुलाम बनाकर रख सकती थी!

कहा जाता है कि 11 सितम्बर 1893 को दिए गए शिकागो उद्बोधन के बाद रात में स्वामीजी फूट-फूट कर रोए। यह बात पूरी दुनिया को बीबीसी की अमरीकी महिला एंकर एमिली ब्यूकान ने बताई थी। स्वामीजी को बीबीसी की इसी अमरीकी महिला ने शिकागो सम्मेलन में प्रवेश दिलवाया था। वही स्वामीजी को अपने घर ले गई थी।

लगभग आधी रात के बाद एमिली ने स्वामीजी के कमरे से किसी के रोने की आवाज सुनी। जब एमिली ने स्वामीजी के कमरे में झांककर देखा तो स्वामीजी रो रहे थे। एमिली ने आश्चर्यचकित होकर स्वामीजी से उनके रोने का कारण पूछा।

एक शोधकर्ता ने हाल ही में दावा किया है कि स्वामीजी ने कहा कि जो नाम और प्रसिद्धि मुझे आज मिली है, इस नाम और यश का मैं क्या करूँगा। मुझे तो अपने भारतवासियों के बारे में सोच कर रोना आ रहा है जो आज भी गरीबी में रह रहे हैं।

आधुनिक शोधकर्ता भले ही कुछ भी दावा करते रहें किंतु स्वामीजी के रोने का कारण कुछ और ही था। एमिली ब्यूकान के अतिरिक्त कुछ अन्य लोगों ने भी स्वामीजी को रोते हुए देखा था। इन लोगों का कहना था कि जब स्वामीजी से उनके रोने का कारण पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया कि उन्हें भगवान का वियोग सताता है, अर्थात् उन्हें भगवान की याद आती है जिसके कारण उन्हें रोना आ जाता है।

यह सर्वविदित है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को दिव्य-दृष्टि प्रदान करके भगवती काली के दर्शन करवाए थे। जब एक बार स्वामी विवेकानंद ने काली को अपनी आंखों से देख लिया तो वे माँ के बार-बार दर्शन करने के लिए छटपटाने लगे।

स्वामीजी को काली माता की याद उसी तरह आती थी जिस तरह हमें अपने बिछुड़े हुए माता-पिता, पुत्र-पुत्री एवं भाई-बहिनों की याद आती है। कोई विदेशी व्यक्ति जिसने हिन्दुत्व को न समझ हो, वह बहुत कठिनाई से ही इस बात को समझ सकता है कि कोई व्यक्ति परमात्मा के लिए वियोग की पीड़ा को इतनी गहराई से अनुभव करे कि उसे रोना आ जाए। हालांकि हिन्दुओं के लिए इस पीड़ा को अनुभव करना अधिक कठिन है।

ईश्वर का स्मरण होने पर स्वामीजी कई बार रो पड़ते थे। एक बार उनके खेतड़ी प्रवास में मैनाबाई नामक एक गायिका ने उन्हें सूरदासजी द्वारा रचित एक पद सुनाया-

प्रभुजी मोरे अवगुण चित न धरो।

समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो।।

इस पद को सुनकर स्वामीजी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। स्वामी विवेकानंद सम्पूर्ण भारत भूमि को तीर्थ एवं देवभूमि मानते थे। इसलिए वे भारत माता की वंदना देवी की तरह करते थे। जब चार साल के विदेश भ्रमण के बाद स्वामीजी भारत लौटे तो वे भारत माता को प्रणाम करते हुए रो पड़े थे।

स्वामीजी के रोने का कारण समझना है तो हमें मीरांबाई का यह पद स्मरण करना चाहिए-

हे री! मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोय!

कबीर ने भी लिखा है-

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै!
दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै!

चैतन्य महाप्रभु से लेकर साध्वी ऋतंभरा को दुनिया ने बार-बार रोते हुए देखा है। प्रेम में भावुकता, भावुकता में विरह और विरह में आंसू! ये तो साथ-साथ ही प्रकट होते हैं।

यदि यह प्रेम, भावुकता और विरह ईश्वर के प्रति हो तो अश्रुओं की मात्रा और कीमत दोनों समझी जा सकती हैं। स्वामी विवेकानंद के रोने का यही कारण था। वे ईश्वर से प्रेम करते थे। उन्हें ईश्वर से प्रेम करना हिन्दुत्व ने सिखाया था।

मात्र साढ़े उन्तालीस वर्ष की आयु में स्वामीजी धरती छोड़कर परमात्मा के पास चले गए किंतु वे जो कुछ भारत माता तथा भारतवासियों के लिए करके गए वह डेढ़ हजार वर्ष में किया जाने वाला कार्य था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अकबर की मूर्खता (161)

0
अकबर की मूर्खता - www.bharatkaitihas.com
अकबर की मूर्खता

अकबर ने एक धूर्त व्यक्ति को अपने दरबार में अथर्ववेद के फारसी अनुवाद के काम पर रख लिया जो मूलतः ब्राह्मण था और यह कहता था कि वह अथर्ववेद को पढ़कर मुसलमान बना है क्योंकि अथर्ववेद में लिखा है कि ब्राह्मण भी मांस खा सकता है। अकबर उस धूर्त की धूर्तता को नहीं समझ सका और उस धूर्त ने अकबर की मूर्खता का खूब लाभ उठाया।

अकबर ने सैनिक व्यय की पूर्ति तथा शाही खजाने में वृद्धि के लिए भू-राजस्व से होने वाली आय को बढ़ाने का विचार किया तथा इसके लिए पूरी सल्तनत में भूमि की नाप-जोख करके प्रत्येक एक करोड़ की आय वाली इकाई पर करोड़ियों की नियुक्ति की।

करोड़ियों को यह दायित्व दिया गया कि वे भूमि कर वसूलने के साथ-साथ अपने क्षेत्र में स्थित समस्त बंजर भूमि को तीन साल की अवधि में उपजाऊ भूमि में बदल दें ताकि शाही खजाने में अधिक कर प्राप्त हो सके।

जिन बेईमान करोड़ियों ने शहंशाह की इच्छा के अनुरूप काम नहीं किया तथा किसानों को परेशान किया, राजा टोडरमल ने उन करोड़ियों को हथकड़ी, बेड़ी एवं डण्डा लगाकर जेलों में बंद कर दिया जहाँ उनमें से अधिकांश करोड़ी मृत्यु को प्राप्त हो गए।

हमने पिछले कुछ आलेखों में चर्चा की थी कि अकबर को हिन्दुओं के प्रसिद्ध ग्रंथों में छिपा ज्ञान प्राप्त करने का चस्का लग गया था और वह चाहता था कि अन्य मुस्लिम अमीर एवं शहजादे भी इन ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करें।

इसलिए अकबर ने महाभारत आदि कुछ ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया जिनकी चित्रित प्रतियों को अकबर के अमीरों ने बड़ी ऊंची कीमत देकर खरीदा।

जब इन पुस्तकों को लोकप्रियता मिलने लगी तो अकबर ने मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी को निर्देश दिए कि वह सिंहासन बत्तीसी का फारसी में अनुवाद करके बादशाह की सेवा में प्रस्तुत करे।

बदायूंनी की सहायता के लिए एक हिन्दू विद्वान को भी नियुक्त किया गया ताकि वह बदायूंनी को सिंहासन बत्तीसी के मर्म की जानकारी दे सके। इस ग्रंथ में उज्जैन के एक प्राचीन राजा विक्रमादित्य की बुद्धिमत्ता की बत्तीस कहानियां लिखी गई हैं।

हिन्दुओं में मान्यता है कि ये कहानियां कपोल-कल्पित नहीं हैं, अपितु सत्य-घटनाओं पर आधारित हैं। हिन्दुओं का यह भी मानना है कि उज्जैन का राजा विक्रमादित्य चमत्कारी एवं बुद्धिमान पुरुष था जिसने अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन किया था।

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

हिन्दू मानते हैं कि सिंहासन बत्तीसी की कथाओं की घटनाएं राजा विक्रमादित्य के साथ वास्तव में घटित हुई थीं। कुछ लोग इस विक्रमादित्य को ईसा की प्रथम शताब्दी में हुए उज्जैन का राजा शकारि विक्रमादित्य मानते हैं जिसने अयोध्याजी में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का नवनिर्माण करवाया था तथा भारत-भूमि को शकों से मुक्त करवाकर शकारि संवत् चलाया था जिसे अब शक संवत् कहा जाता है। भारत सरकार आज भी इस शक-संवत के कैलेण्डर को मान्यता देती है।

जब अकबर ने सिंहासन बत्तीसी की कथाओं को सुना तो वह राजा विक्रमादित्य से बहुत प्रभावित हुआ तथा उसने मुल्ला बदायूंनी ने आदेश दिया कि वह इस पुस्तक का फारसी में अनुवाद करे।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने सिंहासनी बत्तीसी के फारसी अनुवाद का शीर्षक ‘नामा-ए-खिराद-अफ्जा’ अर्थात् बौद्धिक आनंद की पुस्तक रखा। जब अकबर ने इस पुस्तक के अनुवाद को पढ़ा तो अकबर बड़ा प्रसन्न हुआ। अकबर ने इस अनुवाद को अपने व्यक्तिगत पुस्तकालय में सम्मिलित कर लिया।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि इन्हीं दिनों दक्षिण भारत से एक ब्राह्मण अकबर के दरबार में आया। उसका मूल नाम पण्डित भावन था। उसने हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण कर लिया था।

बदायूंनी ने लिखा है कि पण्डित भावन का दावा था कि उसने अथर्ववेद को पढ़कर हिन्दू से मुसलमान होने की प्रेरणा प्राप्त की है क्योंकि अथर्ववेद में लिखा है कि विशेष परिस्थिति में हिन्दू भी गाय का मांस खा सकता है और शव को जलाने के स्थान पर धरती में गाड़ भी सकता है।

भावन का दावा था कि अथर्ववेद में एक श्लोक है जिसमें यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति इस श्लोक को नहीं पढ़ेगा तो वह नहीं बचेगा। इस श्लोक में अल अक्षरों का बारम्बार प्रयोग हुआ है।

मुल्ला बदायूंनी का मानना था कि यह श्लोक ‘ला-इलाह-इलिल्लाह’ से मेल खाता है। इसी से भावन को हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की प्रेरणा मिली थी।

वस्तुतः पण्डित भावन ने अकबर की कृपा पाने के लिए हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था और अपनी तरफ से मनगढ़ंत बातें अकबर और मुल्ला बदायूंनी को सिखाई थीं। इस प्रकार भावन ने अकबर को जमकर मूर्ख बनाया तथा अकबर की मूर्खता का जमकर लाभ उठाया।

अकबर ने मुल्ला बदायूंनी से कहा कि वह अथर्ववेद का फारसी में अनुवाद करे तथा इस कार्य में अथर्ववेद के विद्वान पण्डित भावन की भी सहायता ले जो कि अब मुसलमान हो गया था।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि इस पुस्तक के बहुत से विचार इस्लाम के नियमों से मेल खाते हैं किंतु मुल्ला बदायूंनी को उसके बहुत से अंशों का फारसी में अनुवाद करने में कठिनाई आई।

यहाँ तक कि पण्डित भावन भी अथर्ववेद के उन अंशों के अर्थ नहीं बता सका। इससे स्पष्ट है कि पण्डित भावन एक धूर्त व्यक्ति था। उसे अथर्ववेद का कुछ भी ज्ञान नहीं था।

उसने अकबर को मूर्ख बनाकर पद, प्रतिष्ठा एवं धन ऐंठने के उद्देश्य से अथर्ववेद में एक ऐसी ऋचा घुसाने का असफल प्रयास किया जिससे लगे कि अथर्ववेद में अल्लाह शब्द का उल्लेख किया गया है तथा जो कोई भी व्यक्ति इस ऋचा को नहीं पढ़ेगा, वह धरती पर जीवित नहीं बचेगा।

जब मुल्ला बदायूंनी ने अकबर को बताया कि मैं अथर्ववेद के कुछ अंश समझने में असमर्थ हूँ तथा पण्डित भावन भी इस कार्य में मेरी सहायता नहीं कर पा रहा है तो अकबर ने आदेश दिया कि इस कार्य में शेख फैजी, तथा हाजी इब्राहीम की सहायता ली जाए। अकबर की मूर्खता यह अकबर की मूर्खता का एक और उदाहरण था, जो लोग संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं को अच्छी तरह नहीं जानते थे, वे किसी संस्कृत ग्रंथ का फारसी में अनुवाद कैसे कर सकते थे?

अकबर की मूर्खता के ऐसे और भी उदाहरण इतिहास में देखने को मिलते हैं। मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि हाजी इब्राहीम की बड़ी इच्छा थी कि वह अथर्ववेद के फारसी अनुवाद का काम करे किंतु वह कुछ भी नहीं कर सका।

इसी वर्ष अकबर की बुआ गुलबदन बेगम जो हुमायूँ की बहिन तथा बाबर की पुत्री थी, हज करने के लिए आगरा से रवाना हुई। बाबर की दौहित्री सलीमा बेगम जो कि मूलतः बैराम खाँ की बीवी थी और अब अकबर की बीवी के रूप में सुल्तान बेगम कहलाती थी, भी गुलबदन बेगम के साथ हज पर गई।

पाठकों को स्मरण होगा कि सलीमा बेगम बाबर की बेटी गुलरुख बेगम की पुत्री थी।

गुलबदन बेगम और सलीमा बेगम एक साल तक गुजरात में ठहरी रहीं और उसके बाद वे मुसलमानों के चार धामों अर्थात् कर्बला, कुम, मशहद और मक्का के लिए रवाना हुईं। जब वे भारत के लिए लौटने लगीं तो मार्ग में उनका जहाज टूट गया।

इस कारण उन्हें एक साल तक अदन में रुकना पड़ा। जब वे लौटकर आगरा आईं तो अकबर ने उनका बड़ा स्वागत किया। उसके बाद प्रतिवर्ष शाही परिवार के एक सदस्य को बहुत सारा धन एवं उपहार देकर मक्का भेजा जाने लगा। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि इस प्रकार शाही खजाने के भारी खर्च पर सोना और अन्य बहुमूल्य नजरानों के साथ शहंशाह अपने परिवार के लोगों को मक्का भेजने लगा। इससे अकबर की ख्याति मध्यएशिया में तेजी से फैलने लगी। पांच-छः साल तक यह क्रम जारी रखा गया किंतु बाद में इसे बंद कर दिया गया।

बदख्शां के मिर्जा को धन-दौलत एवं हाथी-घोड़े (162)

0
बदख्शां के मिर्जा
बदख्शां के मिर्जा

बदख्शां के मिर्जा को अकबर ने धन-दौलत एवं हाथी घोड़े भिजवाए। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर ने अपने एक भाई के पुत्र मिर्जा सुलेमान को बदख्शां का शासक बनाया था। हुमायूँ ने भी अपने इस चचेरे भाई को बदख्शां का शासक बनाए रखा था।

अकबर ने दरबारी मुल्लाओं से सिंहासन बत्तीसी एवं अथर्ववेद के फारसी अनुवाद तैयार करवाए तथा अपने परिवार के सदस्यों को मक्का भेजकर वहाँ के लोगों के लिए बहुत सा धन एवं उपहार भिजवाए। इससे अकबर की ख्याति पूरे मध्य-एशिया में तेजी से फैलने लगी।

ई.1576 में अकबर का चाचा मिर्जा सुलेमान जो कि बदख्शां का शासक था, अकबर से शरण मांगने भारत आया।

जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान में रहा, मिर्जा सुलेमान ने हुमायूँ के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन किया था किंतु जब हुमायूँ ने दूसरी बार हिंदुस्तान पर अधिकार जमाया तो मिर्जा सुलेमान गद्दारी करने पर उतर आया। उसने काबुल पर अधिकार करने का कई बार प्रयास किया।

जब मिर्जा सुलेमान सेना के बल पर काबुल पर अधिकार नहीं कर सका तो उसने काबुल के शासक मिर्जा हकीम खाँ से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। मिर्जा हकीम हुमायूँ का छोटा पुत्र तथा अकबर का सौतेला भाई था।

एक बार मिर्जा सुलेमान ने अपने जवांई मिर्जा हकीम को मारने तथा काबुल पर अधिकार करने का प्रयास किया था। तब अकबर ने पंजाब से सेना भिजवाकर हकीम खाँ के राज्य की रक्षा की थी।

जब हकीम खाँ अकबर द्वारा भेजी गई सेना की सहायता से अपने श्वसुर मिर्जा सुलेमान को परास्त करके फिर से काबुल पर अधिकार करने में सफल रहा तो मिर्जा सुलेमान बदख्शां लौट गया तथा वहीं पर शासन करने लगा।

मिर्जा सुलेमान अपना बचा हुआ जीवन शांति से बदख्शां में निकाल सकता था किंतु उसकी दो बेगमों के बीच ऐसा झगड़ा उठ खड़ा हुआ कि मिर्जा सुलेमान को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा और अपने भतीजे अकबर से शरण प्राप्त करने के लिए भारत की ओर भागना पड़ा।

बदख्शां के शासक मिर्जा सुलेमान की पत्नी हरम बेगम एक वीर महिला थी। वह अफगानिस्तान के किबचाक कबीले के सरदार की बेटी थी और हाथ में हथियार लेकर युद्धक्षेत्र में जाया करती थी।

एक बार जब हुमायूँ को उसके सौतेले भाई कामरान ने काबुल से निकाल दिया था, तब इसी हरम बेगम ने हुमायूँ को एक सेना बनाकर दी थी जिसके बल पर हुमायूँ काबुल पर फिर से अधिकार कर सका था।

हरम बेगम न केवल सुंदर, वीर और महत्वाकांक्षिणी थी, अपितु वह शासन कार्य में भी दक्ष थी। उसका अपने पति पर इतना अधिकार था कि बदख्शां का शासन प्रायः वही चलाया करती थी।

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

एक बार मिर्जा कामरान ने हरम बेगम पर मोहित होकर उसे अपने पास आने का निमंत्रण भेजा था ताकि कामरान हरम बेगम को भोग सके। तब हरम बेगम ने अपने जेठ हुमायूँ, पति सुलेमान तथा पुत्र मिर्जा इब्राहीम के हाथों कामरान को दण्डित करवाया था। इसका इतिहास हम ‘बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान‘ में लिख चुके हैं।

जब हुमायूँ ने कामरान की आंखें फोड़कर उसे मक्का भिजवा दिया तब कामरान की पत्नी खानिम बेगम ने कामरान के साथ मक्का न जाकर अपने पीहर काशगर जाकर रहने का विचार किया। जब वह काबुल से काशगर जा रही थी तो मार्ग में बदख्शां से होकर निकली।

 मिर्जा सुलेमान ने खानिम बेगम की बड़ी आवभगत की। हरम बेगम की तरह खानिम बेगम भी बला की खूबसूरत थी। इसलिए मिर्जा सुलेमान की नीयत बिगड़ गई और उसने खानिम बेगम की लल्लो-चप्पो करके उससे विवाह कर लिया।

हरम बेगम अपनी इस नई सौत को सहन नहीं कर सकी तथा उसने खानिम बेगम से दुश्मनी बांध ली। कुछ समय बाद जब हरम बेगम के पुत्र मिर्जा इब्राहीम की मृत्यु हो गई तब खानिम बेगम ने प्रयास किया कि मिर्जा इब्राहीम की जागीर खानिम के बेटे मिर्जा शाहरुख को मिल जाए।

हरम बेगम ने खानिम के इस प्रयास का विरोध किया। उसने अपने पक्ष के अमीरों से मिलकर खानिम बेगम तथा उसके पुत्र मिर्जा शाहरुख के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

दूसरी तरफ खानिम बेगम भी बदख्शां के कुछ अमीरों को अपने पक्ष में लेकर हरम बेगम के विरुद्ध डट गई। कुछ समय बाद हरम बेगम खुद ही मर गई। अब बदख्शां में शांति स्थापित हो जानी चाहिए थी किंतु दोनों बेगमों के बीच शुरु हुआ झगड़ा, अब चाचा-भतीजे का झगड़ा हो गया जो कि अब सौतेले पिता-पुत्र भी थे।

खानिम बेगम चाहती थी कि मिर्जा सुलेमान, पंद्रह साल के मिर्जा शाहरुख को बदख्शां का सुल्तान बना दे। मिर्जा सुलेमान शाहरुख को बदख्शां का शासक नहीं बनाना चाहता था क्योंकि मिर्जा शाहरुख कामरान का बेटा था, न कि सुलेमान का। बदख्शां के बहुत से अमीर खानिम बेगम के रूपजाल में फंस कर मिर्जा शाहरुख के साथ हो गए और मिर्जा सुलेमान कमजोर पड़ गया।

मिर्जा सुलेमान अपने जवांई मिर्जा हकीम खाँ के पास पहुंचा ताकि वह काबुल से सेना प्राप्त करके मिर्जा शाहरुख को परास्त कर सके। मिर्जा हकीम खाँ ने अपने चाचा जो कि उसका श्वसुर भी था, की कोई सहायता नहीं की तथा उसे भारत जाने की सलाह दी।

मिर्जा सुलेमान अपने ही पुत्रों, भतीजों एवं जवांई की तरफ से निराश होकर भारत में शरण पाने के लिए रवाना हुआ जहाँ का शासक अकबर भी उसका भतीजा ही था।

जब अकबर को ज्ञात हुआ कि मिर्जा सुलेमान फतहपुर सीकरी आ रहा है तो अकबर ने उसके स्वागत में नगर एवं महल सजाने के आदेश दिए। दीवाने-आम में भी खूब सजावट की गई।

फतहपुर सीकरी में आने वाली सड़क के दोनों तरफ पांच हजार हाथी-घोड़े एवं ऊँट सजाकर खड़े किए गए। कुछ चीतों को भी कीमती कपड़ों से सजाकर खड़ा किया गया। अकबर के अमीरों ने मार्ग में कई कोस आगे बढ़कर मिर्जा सुलेमान का स्वागत किया।

स्वयं अकबर भी सीकरी से तीन कोस अर्थात् लगभग 10 किलोमीटर आगे आया। जब सुलेमान का घोड़ा आता हुआ दिखाई दिया तो अकबर ने घोड़े से उतरकर तथा कुछ दूर पैदल चलकर अपने चचेरे-चाचा का स्वागत किया। सुलेमान ने भी घोड़े से उतरकर अपने भतीजे का सिजदा किया।

अकबर ने मिर्जा सुलेमान को गले लगा लिया। अकबर ने वे दिन अपनी आंखों से देखे थे जब संसार में कोई भी शहजादा अकबर के पिता का साथ देने को तैयार नहीं था, तब अकबर के इसी चचेरे चाचा ने अकबर के पिता का साथ दिया था और कई बार उसके प्राण बचाए थे। अकबर ने मिर्जा सुलेमान से कहा कि आप चिंता न करें, मैं पंजाब से एक सेना खानेजहाँ के नेतृत्व में बदख्शां भेजूंगा ताकि कृतघ्न कामरान के कृतघ्न पुत्र मिर्जा शाहरुख को बदख्शां से निकाला जा सके। अकबर ने बड़ी संख्या में हाथी-घोड़े एवं धन-दौलत उपहार के रूप में सुलेमान को भेंट किए।

अकबर की दोस्त थी खानिम बेगम! (163)

0
अकबर की दोस्त
अकबर की दोस्त

कहने को तो खानिम बेगम अकबर की चाची थी किंतु उन दोनों की आयु में अधिक अंतर नहीं था। इस कारण दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। इस प्रकार अकबर के बचपन की दोस्त थी खानिम बेगम!

बदख्शां का शासक मिर्जा सुलेमान अपनी पत्नी, भतीजे, जंवाई एवं मंत्रियों से धोखा खाकर अपने राज्य से हाथ धो बैठा तथा अपने अन्य भतीजे अकबर से सैनिक सहायता लेने के लिए भारत आया। अकबर उसका स्वागत करने के लिए स्वयं फतहपुर सीकरी से बाहर आया और तीन कोस आगे आकर अपने चाचा से मिला।

अकबर ने मिर्जा सुलेमान को बड़ी संख्या में हाथी-घोड़े एवं धन-दौलत उपहार के रूप में भेंट किए तथा उसे विश्वास दिलाया कि मैं पंजाब से एक सेना खानेजहाँ के नेतृत्व में बदख्शां भेजूंगा ताकि कृतघ्न कामरान के कृतघ्न पुत्र मिर्जा शाहरुख को बदख्शां से निकाला जा सके।

मिर्जा सुलेमान ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अकबर को उसी प्रकार अपना बादशाह मान लिया, जिस प्रकार मिर्जा सुलेमान अकबर के दादा बाबर को और अकबर के पिता हुमायूँ को अपना बादशाह मानता था। अकबर मिर्जा सुलेमान को अपने महलों में ले गया।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि अकबर ने मिर्जा सुलेमान के लिए हथियापोल में विशेष आवास बनवाया जहाँ नक्कारखाना बना हुआ था। शाम के समय अकबर प्रायः इबादतखाने में जाया करता था, अब वह अपने चाचा सुलेमान को भी उसमें ले जाने लगा।

मिर्जा सुलेमान के लिए इबादतखाना एक विस्मयकारी एवं आह्लादकारी स्थान सिद्ध हुआ। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि मिर्जा सुलेमान शेखों एवं दरवेशों का सान्निध्य प्राप्त करके आनंद से चीखने लगता। वह सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित होने में कभी भी चूक नहीं करता था।

मुल्ला लिखता है कि एक दिन जब मैंने अपनी इबादत पूरी की तो मिर्जा सुलेमान ने मुझे टोका कि मैंने इबादत के बाद फातिहा क्यों नहीं पढ़ा! इस पर मैंने उससे कहा कि पैगम्बर के समय इबादत के बाद फातिहा पढ़ने का रिवाज नहीं था।

मेरा यह जवाब सुनकर मिर्जा सुलेमान नाराज हो गया। वह बोला कि क्या तुम यह कहना चाहते हो कि जो लोग इबादत के बाद फातिहा पढ़ते हैं, उन्हें इस्लाम का ज्ञान नहीं है तथा उनमें बुद्धि भी नहीं है?

इस पर मैंने मिर्जा सुलेमान से कहा कि हमें लिखित नियमों की पालना करनी चाहिए न कि फालतू के पचड़ों की। अकबर हम दोनों की यह बहस सुन रहा था, उसने मुझे आदेश दिया कि मैं फातिहा पढ़ूं। इस पर मैंने बादशाह के आदेश की पालना करते हुए फातिहा पढ़ा।

इस प्रकरण के माध्यम से मुल्ला बदायूंनी ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि मिर्जा सुलेमान ने अकबर का विश्वास एवं स्नेह जीत लिए।

मुल्ला लिखता है कि पंजाब के शासक खानेजहाँ को आदेश दिया गया कि वह पांच हजार तीर-कमान-धारियों के साथ मिर्जा सुलेमान की सेवा में बदख्शां जाए तथा मिर्जा शाहरुख से बदख्शां प्राप्त करके मिर्जा सुलेमान के सुपुर्द कर दे और उसके बाद स्वयं लाहौर लौट आए।

इसी के साथ मुल्ला बदायूंनी इस प्रकरण को यह लिखकर बंद कर देता है कि वास्तव में मसला दूसरे ही प्रकार से हो गया। मुल्ला यह नहीं बताता कि मसला दूसरी प्रकार से कैसे हुआ।

अबुल फजल इस प्रकरण में थोड़ी जानकारी और देता है। हालांकि वह भी पूरी जानकारी नहीं देता किंतु जितना भी उसने लिखा है उससे अनुमान हो जाता है कि अकबर मिर्जा सुलेमान की कोई सहायता नहीं कर पाया और वह चाहकर भी कामरान के बेटे शाहरुख को बदख्शां से बाहर नहीं निकाल पाया। इसका कारण जानने के लिए हमें थोड़े पुराने इतिहास में जाना होगा।

पाठकों को स्मरण होगा कि मिर्जा कामरान का एक पुत्र अकबर के पिता हुमायूँ के पास भी रहा करता था जिसका नाम मिर्जा अबुल कासिम था। मिर्जा कामरान की बेटी गुलरुख बेगम और गुलरुख बेगम का पुत्र इब्राहीम हुसैन मिर्जा भी हुमायूँ के पास रहते थे। जब अकबर बादशाह बना तो कामरान की औलादें अकबर के संरक्षण में रहने लगीं।

बहुत से मुगल अमीर कामरान की औलादों को अकबर के विरुद्ध भड़काते रहते थे। अतः अकबर ने अपना भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए अपने चचेरे भाई मिर्जा अबुल कासिम की बिना किसी अपराध के ही हत्या करवा दी थी।

इस कारण कामरान की बेटी गुलरुख बेगम और उसका बेटा इब्राहीम हुसैन मिर्जा भी बागी हो गए थे। बाद में अकबर ने मिर्जा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की भी हत्या करवा दी थी और गुलरुख बेगम दक्षिण भारत के राज्यों में भाग गई थी।

चूंकि बदख्शां का नया शासक मिर्जा शाहरुख उसी कामरान का बेटा था, इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि अकबर को उसे भी नष्ट करने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। फिर भी अकबर के लिए मिर्जा शाहरुख के विरुद्ध कदम उठाना आसान नहीं था। इसका एक विशेष कारण यह था कि शाहरुख की माता खानिम बेगम अकबर की बचपन की दोस्त थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब मिर्जा अस्करी एक साल के बालक अकबर को हुमायूँ के शिविर में से उठा कर ले गया था, तब मिर्जा कामरान ने अकबर को अपने हरम में रखा था जहाँ हुमायूँ की बुआ खानजादः बेगम ने अकबर को पाला था।

मिर्जा कामरान के हरम में बहुत सारी औरतें थीं जिनमें हर समय कुछ न कुछ वृद्धि होती रहती थी। कुछ समय बाद कामरान ने खानिम बेगम नामक एक बहुत सुंदर लड़की से विवाह किया। इस प्रकार खानिम बेगम से अकबर का पहला परिचय अपनी चाची के रूप में हुआ।

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

जब हुमायूँ और कामरान की बुआ खानजादः बेगम कामरान के शिविर से हुमायूँ के पास चली गई तो अकबर की जिम्मेदारी कामरान की नई पत्नी खानिम बेगम को सौंप दी गई। कहने को तो खानिम बेगम अकबर की चाची थी किंतु उन दोनों की आयु में अधिक अंतर नहीं था। इस कारण खानिम बेगम अकबर की दोस्त बन गई।

समय के साथ दोनों के रिश्तों में बदलाव आया। जब हुमायूँ ने कामरान की आंखें फोड़कर उसे मक्का भेज दिया तो खानिम बेगम ने मिर्जा सुलेमान से निकाह कर लिया। इस नए रिश्ते में भी खानिम बेगम अकबर की चाची लगती थी। इस प्रकार अकबर और खानिम बेगम के बीच दोस्ती का जो रिश्ता बचपन में कायम हुआ था, वह आगे भी चलता रहा। इस रिश्ते में भी खानम बेगम अकबर की दोस्त बनी रही।

जब अकबर साढ़े तेरह वर्ष का हुआ तो वह अपने पिता हुमायूँ के साथ काबुल से भारत चला आया। उन बातों को अब बीस साल हो चुके थे। इस कारण अब वह दोस्ती केवल स्मृतियों में ही बची थी।

इस बीच समय कई बार करवटें ले चुका था। खानिम बेगम अपने पहले पति से हुए बेटे के साथ, अपने दूसरे पति मिर्जा सुलेमान के छोटे से बदख्शां राज्य पर कब्जा किए बैठी थी और उसका दूसरा पति मिर्जा सुलेमान अकबर से सहायता लेने के लिए फतहपुर सीकरी में शरण लिए हुए था।

भारत के विशाल प्रदेशों का स्वामी अकबर इस समय तक इतना शक्तिशाली हो चुका था कि वह न केवल बदख्शां के भाग्य का निर्णय कर सकता था अपितु सम्पूर्ण अफगानिस्तान को अपने पैरों तले रौंद सकता था!

अतः खानिम बेगम ने भी अपने दूत अकबर के पास भिजवाने का निश्चय किया ताकि वह अपना पक्ष अकबर के समक्ष रखकर अकबर को मिर्जा सुलेमान की सहायता करने तथा अपने पुत्र शाहरुख के विरुद्ध कार्यवाही करने से रोक सके। कुछ ही दिनों बाद शाहरुख मिर्जा के दूत अब्दुल रहमान बेग और मिर्जा अशाक भी अकबर के दरबार में आ पहुंचे।

 कहने को वे मिर्जा शाहरुख द्वारा भेजे गए थे किंतु वास्तव में वे खानिम बेगम के दूत थे और उसी के आदेश पर अकबर के पास आए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि खानिम बेगम का विचार था कि मिर्जा सुलेमान ने, न जाने बादशाह पर क्या प्रभाव डाला होगा!

उससे अवश्य ही शाहरुख मिर्जा के सम्मान की क्षति हुई होगी। अब्दुल रहमान बेग और मिर्जा अशाक ने खानिम बेगम और उसके पुत्र शाहरुख मिर्जा की प्रार्थना अकबर के समक्ष प्रस्तुत की तो अकबर ने स्नेह और शिष्टता से उस प्रार्थना को स्वीकार किया। फिर उनको विदा कर दिया।

अकबर ने कुछ दिनों पहले ही पंजाब के सूबेदार खानेजहाँ को आदेश दिए थे कि वह बदख्शां पर कार्यवाही करके मिर्जा सुलेमान को उसका राज्य वापस दिलवाए किंतु अब अकबर ने अपना इरादा बदल दिया तथा खानेजहाँ को बंगाल का सूबेदार बनाकर भेज दिया।

मिर्जा सुलेमान ने अपनी आशा पूरी होते हुए नहीं देखकर हज्जाज पर जाने का निश्चय किया। उसका सोचना था कि शायद वहाँ जाने से बदख्शां प्राप्त करने का कोई मार्ग खुल जाए। जब सुलेमान ने अकबर से हज्जाज जाने की अनुमति मांगी तो अकबर ने कुलीज खाँ तथा रूपसिंह को आदेश दिया कि वे सुलेमान को गुजरात के बंदरगाह तक पहुंचा दें। मिर्जा सुलेमान को हज्जाज रवाना कर दिया गया। इस प्रकार अकबर ने अपनी बचपन की दोस्त खानिम बेगम की बात रख ली और बदख्शां उसके पुत्र शाहरुख के पास ही रह गया।

अकबर के शत्रु (164)

0
अकबर के शत्रु - www.bharatkaitihas.com
अकबर के शत्रु

उत्तर-पश्चिम के पहाड़ों से आने वाले अकबर के शत्रु अकबर को जीवन भर तंग करते रहे!

भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित पर्वतीय मार्गों से ईसा से भी कई हजार साल पहले से विदेशी आक्रमण होते रहे हैं। ये लोग भोजन-पानी, आवास एवं धन-दौलत पाने के लिए दुर्गम हिंदुकुश पर्वत को लांघकर भारत में घुसा करते थे।

अकबर का बाबा बाबर तथा पिता हुमायूँ भी उन्हीं आक्रांताओं में से थे किंतु अब उन्हीं का वंशज अकबर भारत के विशाल उत्तरी क्षेत्रों का स्वामी था। उत्तर-पश्चिमी सीमा से आने वाले लोगों एवं अकबर के पूर्वजों का खून भले ही एक था किंतु अब वे अकबर के शत्रु थे तथा अकबर के लिए आक्रांता थे।

इस कारण अकबर के लिये यह आवश्यक था कि वह अपनी सल्तनत की सुरक्षा के लिये गजनी, काबुल, कन्दहार, बिलोचिस्तान तथा सिंध आदि सीमांत प्रदेशों पर अपना प्रभाव स्थापित रखे और वहाँ सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण करके उनमें मजबूत सैन्य बल रखे ताकि अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान आदि क्षेत्रों के लड़ाके भारत में प्रवेश न कर सकें। 

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

चूंकि बदख्शां अफगानिस्तान के धुर उत्तर में स्थित था तथा उज्बेकिस्तान उससे भी ऊपर था, इसलिए बदख्शां एवं ट्रांसऑक्सिाना की राजनीति से अकबर के राज्य की सुरक्षा को कोई विशेष खतरा नहीं था, फिर भी काबुल, कन्दहार, बिलोचिस्तान, गजनी तथा सिंध की ओर सेअकबर के शत्रु जीवन भर आते रहे। इस कारण अकबर को अपनी सेना, शक्ति, समय एवं धन इन शत्रुओं से लड़ने में व्यय करना पड़ा।

पाठकों को स्मरण होगा कि चूचक बेगम जो कि अकबर की सौतेली माँ थी, ने एक बार अपने पुत्र हकीम खाँ को हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने की योजना बनाई थी। उसे उजबेग सरदारों से भी प्रोत्साहन एवं समर्थन मिला था। इसलिये हकीम खाँ ने पंजाब पर आक्रमण किया था।

उजबेगों ने भी उसका साथ दिया था। तब अकबर ने स्वयं एक सेना लेकर पंजाब के लिए प्रस्थान किया था ताकि हकीम खाँ और उसके साथ आए उज्बेक लड़ाकों को दण्डित किया जा सके।

उस समय तो हकीम खाँ भयभीत होकर काबुल भाग गया था और अकबर ने भी उसे अपना छोटा भाई समझकर उसका पीछा नहीं किया था। इसके बाद ई.1580 तक हकीम खाँ चुप बैठा रहा। ई.1581 में अपने अमीरों के उकसाने पर हकीम खाँ ने फिर से पंजाब पर आक्रमण किया।

इस बार अकबर ने उसका पीछा किया और उसे काबुल से भी निकाल बाहर किया। जब हकीम खाँ ने अकबर से क्षमा-याचना की तो अकबर ने उसे फिर से काबुल का शासक बना दिया। इसके बाद हकीम खाँ ने फिर कभी विद्रोह नहीं किया। ई.1585 में हकीम की मृत्यु हो गई और अकबर ने फिर से काबुल पर प्रत्यक्ष अधिकार कर लिया।

अफगानिस्तान तथा भारत की पश्चिमोत्तर सीमा के मध्य स्थित पहाड़ी प्रदेश सदियों से कबाइली क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र में उजबेग, रोशनियाँ, युसुफजई आदि जातियों के कबीले निवास किया करते थे जो बड़े ही विद्रोही प्रकृति के थे।

काबुल की रक्षा के लिए इन कबीलों पर नियंत्रण रखना आवश्यक था। इसलिये अकबर ने इन कबीलों को परास्त करके उन्हें अपने नियंत्रण में लाने का निश्चय किया। अकबर ने सबसे पहले उजबेगों का दमन आरम्भ किया क्योंकि उजबेगों तथा मुगलों की पुश्तैनी शत्रुता थी और उन्हीं से अकबर को सबसे बड़ा खतरा था।

उजबेगों की शक्ति छिन्न-भिन्न करने के बाद अकबर ने रोशनिया कबीले का दमन किया। इसके बाद अकबर ने बीरबल तथा जैनी खाँ को यूसुफजाइयों का दमन करने भेजा। ये दोनों सेनापति सहयोग से काम नहीं कर सके। इस कारण यूसुफजाइयों ने बीरबल को मार डाला।

इस पर अकबर ने राजा टोडरमल तथा शाहजादा मुराद की अध्यक्षता में एक सेना भेजी। इस सेना ने यूसुफजाइयों को परास्त करके उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार पश्चिमोत्तर प्रदेश के कबाइली क्षेत्रों पर अकबर का नियंत्रण हो गया।

ई.1586 में अकबर ने राजा भगवानदास तथा कासिम खाँ की अध्यक्षता में एक सेना काश्मीर पर आक्रमण करने के लिये भेजी। पर्वतीय प्रदेश होने के कारण काश्मीर में मुगल सेना को भयानक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परन्तु अन्त में वह काश्मीर के शासक यूसुफ खाँ तथा उसके पुत्र याकूत को परास्त करने में सफल हुई।

पिता-पुत्र को बन्दी बनाकर बिहार भेज दिया गया और मानसिंह को काश्मीर का शासक बना दिया गया। इस प्रकार काश्मीर मुगल साम्राज्य का अंग बन गया।

पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा के लिए सिन्ध पर भी अधिकार करना आवश्यक था। उत्तरी सिन्ध पहले से ही मुगल साम्राज्य के अधीन था। अब केवल दक्षिणी सिन्ध को जीतना शेष था, जहाँ पर मिर्जा जानी, थट्टा को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्रता पूर्वक शासन कर रहा था।

ई.1590 में अकबर ने मुल्तान के हाकिम अब्दुर्रहीम खानखाना को थट्टा पर अधिकार करने भेजा। मिर्जा जानी मुगलों की विशाल सेना का सामना नहीं कर सका और उसने थट्टा तथा सिंहवान के दुर्ग मुगलों को समर्पित कर दिये। अकबर ने मिर्जा जानी के साथ उदारता का व्यवहार किया और उसे अपना जागीरदार बना लिया।

सिन्ध विजय के उपरान्त अकबर ने बिलोचिस्तान पर अधिकार करने का निश्चय किया। इन दिनों बिलोचिस्तान अफगानों के अधिकार में था। ई.1595 में अकबर ने मासूम खाँ की अध्यक्षता में एक सेना बिलोचिस्तान पर आक्रमण करने के लिए भेजी। इस सेना ने सम्पूर्ण बिलोचिस्तान को जीत लिया। इस प्रकार यह क्षेत्र भी अकबर के अधीन हो गया।

कन्दहार सामरिक तथा व्यापारिक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण नगर था। इसे भारत का फाटक कहा जाता था। इससे होकर विदेशी सेनाएँ भारत में प्रवेश करती थीं। फारस के शाह तथा दिल्ली के बादशाह दोनों की दृष्टि कन्दहार पर लगी रहती थी।

इन दिनों कन्दहार (कांधार) पर फारस के शाह का अधिकार था। महाभारत काल में इसे गांधार कहते थे। फारस के शाह ने मुजफ्फर हुसैन मिर्जा को कन्हदार का प्रांतपति बना रखा था। किसी कारण से फारस का शाह, मुजफ्फर हुसैन मिर्जा से नाराज हो गया।

उजबेग लोग भी कन्दहार पर आक्रमण करके मिर्जा को तंग कर रहे थे। इस स्थिति में मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने कन्दहार का दुर्ग अकबर को समर्पित कर दिया। इस प्रकार बिना युद्ध किये ही कन्दहार पुनः मुगलों के अधिकार में आ गया। फिर भी पश्चिमोत्तर के पहाड़ों में रहने वाले अकबर के शत्रु कभी शांति से नहीं बैठे।

दक्षिण के शिया राज्य (165)

0
दक्षिण के शिया राज्य - www.bharatkaitihas.com
दक्षिण के शिया राज्य

अकबर पूरे भारत पर अधिकार करना चाहता था इसलिए दक्षिण के शिया राज्य अकबर की आंखों की किरकिरी बने हुए थे।

विंध्याचल की पहाड़ियाँ भारत को उत्तर-भारत तथा दक्षिण-भारत में विभक्त करती हैं। उत्तर भारत के कई शासक दक्षिण भारत पर आक्रमण करके उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित करते आये थे।

अकबर ने दक्षिण भारत पर अधिकार करने का निश्चय किया, इसके कई कारण थे। पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर ने सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करने का निश्चय किया था। अब तक वह पूर्व में बिहार, उड़ीसा, एवं बंगाल के आखिरी छोर तक अधिकार कर चुका था।

पश्चिम में गजनी से लेकर काबुल एवं कांधार तक का क्षेत्र उसके अधीन था। उत्तर में कांगड़ा एवं कश्मीर उसके अधीन थे। जबकि दक्षिण में वह केवल गुजरात एवं मालवा तक ही पहुंच सका था।

इन दिनों दक्षिण भारत की दशा अत्यंत शोचनीय थी। बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पाँच स्वतन्त्र राज्यों- अहमद नगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर तथा बरार में विभक्त हो गया था।

जब तक विजय नगर का हिन्दू राज्य जीवित था, तब तक ये पाँचों राज्य संगठित होकर उससे मोर्चा लेते रहे परन्तु जब ई.1565 में विजयनगर की पराजय तथा उसका उन्मूलन हो गया तब दक्षिण के मुसलमान राज्य सर्वोच्चता के लिए परस्पर संघर्ष करने लगे। अकबर ने दक्षिण की इस राजनीतिक कुव्यवस्था से लाभ उठाने का निश्चय किया। 

दक्षिण के राज्यों में इन दिनों शिया, सुन्नी तथा महदवी लोग एक-दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयास कर रहे थे। अकबर को लगता था कि दक्षिण भारत के मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता अंततः इस्लाम का ही नुक्सान कर रही थी इसलिये अकबर ने दक्षिण भारत को मुगल सल्तनत के अधीन लाने का निश्चय किया।

इन दिनों अरब सागर के तट पर पुर्तगालियों की शक्ति तेजी से बढ़ रही थी। ये लोग अपनी राजनीतिक तथा व्यापारिक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ ईसाई धर्म का प्रचार भी कर रहे थे। वे धार्मिक उन्माद के कारण मुसलमानों पर बड़े अत्याचार करते थे। इसलिये अकबर ने उन्हें अरब सागर के तट से उन्मूलित करने का निश्चय किया।

पुर्तगालियों को उन्मूलित करने के दो उपाय थे- या तो अकबर स्वयं एक विशाल जहाजी बेड़े का निर्माण करके पुर्तगालियों पर आक्रमण करता या फिर वह दक्षिण भारत के राज्यों पर अधिकार करके उनके साधनों से पुर्तगालियों पर आक्रमण करता। अनेक कारणों से जहाजी बेड़े का निर्माण कर पाना संभव नहीं था। इसलिये अकबर ने दक्षिण के राज्यों को मुगल साम्राज्य के अधीन लाने का निर्णय किया।

दक्षिण भारत पर आक्रमण करने का एक बड़ा कारण और भी था। साम्राज्य विस्तार के लिये अकबर ने विशाल सेना का निर्माण कर लिया था। इस सेना को राजधानी के निकट रखना अत्यंत खतरनाक था। वह किसी भी समय विद्रोह कर सकती थी। सेना की विभिन्न टुकड़ियों में संघर्ष न हो इसके लिये उसे निरन्तर युद्धों में संलग्न रखना आवश्यक था।

इस सेना का वेतन चुकाने के लिये धन की आवश्यकता रहती थी। सेना की इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति दक्षिण भारत पर आक्रमण करके की जा सकती थी।

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

अकबर के दक्षिण अभियान की चर्चा आरम्भ करने से पहले हमें दक्षिण भारत के पांच शिया मुस्लिम राज्यों के उदय के इतिहास की कुछ चर्चा करनी चाहिए। आज जिस भूभाग को महाराष्ट्र के नाम से जाना जाता है, किसी समय उस भूभाग पर देवगिरि नामक अत्यंत प्राचीन राज्य स्थित था।

ई.1306 में अल्लाउदीन खिलजी के गुलाम मलिक काफूर ने देवगिरि के राजा रामचंद्र और उसके परिवार को कैद करके दिल्ली भेज दिया था और देवगिरि को दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया था। तब से दक्षिण में मुस्लिम शासन का आरंभ हुआ।

इसी देवगिरि में हसन गंगू नामक एक शिया मुसलमान का जन्म हुआ। फरिश्ता ने लिखा है कि बड़े होने पर हसन गंगू ने एक ब्राह्मण के यहाँ नौकरी कर ली।

एक दिन उस ब्राह्मण ने हसन गंगू की भाग्य-रेखाओं को देखकर बताया कि एक दिन तू इस प्रदेश का राजा बनेगा। उसी ब्राह्मण के निर्देश पर हसन गंगू मुहम्मद बिन तुगलक की सेना में भर्ती हो गया और शीघ्र ही वह दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का सबसे विश्वस्त आदमी बन गया।

ई.1347 में देवगिरि का सुल्तान मर गया। स्थितियाँ कुछ इस तरह की बनीं कि हसन गंगू ‘हसन अब्दुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह’ के नाम से देवगिरि का सुल्तान बन गया और उसने अपने ब्राह्मण स्वामी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिये अपने नवनिर्मित राज्य का नाम ‘बहमनी राज्य’ रख दिया। अपने उसी पुराने ब्राह्मण स्वामी को हसन ने अपना प्रधानमंत्री बनाया।

कुछ लोग हसन गंगू की इस कहानी को झूठ मानते हैं। उनके अनुसार हसन गंगू एक विदेशी मुसलमान था। वह कुछ विद्रोहियों के साथ राजधानी दिल्ली छोड़कर दक्षिण भारत की ओर भाग आया था। उसने इस्माइल अफगान को सुल्तान के पद से हटा दिया और 3 अगस्त 1347 को स्वयं दक्कन का सुल्तान बन गया।

हसन गंगू ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया। उसने जफर खाँ की उपाधि धारण की तथा अल्लाउद्दीन बहमनशाह के नाम से सुल्तान की गद्दी पर बैठा। उसके राज्य को बहमनी सल्तनत कहा गया। वह स्वयं को ईरान के शाह बहमन बिन असफन्द यार का वंशज बताता था।

हसन गंगू के वंशज एक से बढ़कर एक क्रूर और अत्याचारी सुल्तान हुए तथा उन्होंने अपनी पूरी शक्ति अपने पड़ौसी विजयनगर साम्राज्य को कुचलने में लगाई। ई.1422 में अहमदशाह बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह हसन गंगू की पांचवी पीढ़ी में था।

उसने विजयनगर पर आक्रमण करके बीस हजार स्त्री पुरुषों को मौत के घाट उतारा। विजयनगर के राजा देवराय को अपनी प्रजा की रक्षा के लिये अहमदशाह की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

ई.1461 में हसन गंगू की सातवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुमायूँ बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह क्रूरता की जीती-जागती मिसाल था। उसे इतिहास में जालिम हुमायूँ कहा गया है।

उसके अमीर जब प्रातः उसे सलाम करने जाते थे तो अपने बच्चों से अंतिम विदा लेकर जाते थे क्योंकि उनके वापिस जीवित लौटने की निश्चितता नहीं थी। वह कुसूरवार को ही नहीं अपितु उसके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार देता था।

हसन खाँ गंगू के वंशज पौने दो सौ साल तक बहमनी राज्य पर शासन करते रहे। ई.1538 में इस वंश के अंतिम सुल्तान कलीमुल्ला शाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इलहमातउल्ला वेश बदल कर मक्का भाग गया। उसके बाद बहमनी राज्य पाँच राज्यों में विभक्त हो गया।

पहला राज्य अहमदनगर, दूसरा खानदेश, तीसरा बीजापुर, चौथा बरार और पाँचवा गोलकुण्डा। इन पाँचों राज्यों में शिया मुस्लिम शासन करने लगे। वे सब के सब अपने आप को बादशाह कहते थे। जब पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर में भारत के विशाल क्षेत्र अकबर के अधीन हो गए तब अकबर ने दक्षिण भारत के इन पांचों शिया राज्यों को निगलने की तैयारी आरम्भ कर दी।

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...