Wednesday, May 22, 2024
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अध्याय – 67 : भारतीय राजनीति में गांधीजी का योगदान – 2

असहयोग आन्दोलन

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था और गोरी सरकार ने युद्ध समाप्ति के बाद भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देने का आश्वासन दिया था परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद सरकार ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 ई. के माध्यम से मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा की। यह भारतीय जनता के साथ विश्वासघात था क्योंकि इन सुधारों से भारतीयों को स्वशासन का अधिकार नहीं मिला। इससे गांधीजी को निराशा हुई किन्तु गांधीजी ने सरकार के साथ सहयोग की नीति को नहीं छोड़ा। 1919 ई. के सुधार अधिनियम से समस्त राष्ट्रवादी असन्तुष्ट थे किन्तु गांधीजी उसे कार्यान्वित करने के पक्ष में थे। उन्होंने अपने पत्र यंग इण्डिया के माध्यम से जनता से अपील की कि इन सुधारों को सफल बनाने के लिये कार्य करें।

रोलट एक्ट

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान क्रांतिकारियों को कुचलने के लिये सरकार ने भारत रक्षा अधिनियम पारित किया था। युद्ध समाप्ति के बाद इस अधिनियम की अवधि भी समाप्त होने वाली थी। फरवरी 1919 में भारत सरकार ने न्यायाधीश रोलट की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर एक विधेयक प्रस्तावित किया। यह रोलट एक्ट कहलाता है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति पर सन्देह होने मात्र पर बन्दी बनाया जा सकता था और बिना मुकदमा चलाये, कितने ही समय तक जेल में रखा जा सकता था। उस पर गुप्त रूप से मुकदमा चलाकर उसे दण्डित किया जा सकता था। गांधीजी ने घोषणा की कि यदि यह विधेयक पारित किया गया तो वे इसके विरोध में सत्याग्रह करेंगे। भारत सरकार ने भारतीय नेताओं के विरोध की अनदेखी करके 21 मार्च 1919 को इस अधिनियम को लागू कर दिया। गांधीजी ने जनता से अपील की कि वे 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल करें। गांधीजी की अपील पर 6 अपै्रल को सारे देश में हड़ताल रखी गई तथा जुलूस निकाले गये। दिल्ली में जुलूस का नेतृत्व स्वामी श्रद्धानन्द ने किया। जब जुलूस दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकट पहुँचा तब पुलिस ने जुलूस पर गोली चलाई। इससे 5 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई तथा बहुत से लोग घायल हो गये। लाहौर में भी गोली चली। पंजाब में कई स्थानों पर उपद्रव हुए। पंजाब के उपद्रवों के समाचार सुनकर गाँधीजी 8 अप्रेल 1919 को दिल्ली की तरफ रवाना हुये। मार्ग में उन्हें सरकार का आदेश मिला कि वे दिल्ली और पंजाब में प्रविष्ट न हों। गाँधीजी ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस पर उन्हें पलवल में बंदी बनाकर वापिस भेज दिया गया।

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड

9 अप्रेल 1919 को अमृतसर के दो लोकप्रिय नेताओं- डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार करके अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया। इससे अमृतसर में उत्तेजना फैल गई और जनता ने अपने नेताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये जिला मजिस्ट्रेट के आवास की तरफ कूच किया। सेना ने लोगों को रोकने के लिये गोली चलाई जिससे दो व्यक्ति मर गये। जनता ने मृत व्यक्तियों के शवों को कन्धों पर डालकर जुलूस निकाला तथा अपना मार्च जारी रखा। जनता ने मार्ग में स्थित नेशनल बैंक के भवन में आग लगा दी और एक यूरोपियन मैनेजर की हत्या कर दी। जनता ने कुल पाँच अँग्रेजों की हत्या कर दी और कई भवनों में आग लगा दी। 10 अप्रेेल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल डायर आंदोलन पर नियन्त्रण करने के लिये अमृतसर पहुँचा। उसने बहुत से लोगों को बंदी बना लिया।

13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक आम सभा आयोजित की गई। जनरल डायर ने इस सभा को असंवैधानिक घोषित कर दिया। सरकारी अधिकारियों ने सभा पर प्रतिबन्ध लगने का नोटिस नगर में अच्छी तरह नहीं घुमाया गया और हजारों लोगों को बाग में एकत्रित होने दिया। जब आठ-दस हजार लोग बाग में पहुँच गये तब जनरल डायर 200 भारतीय और 50 अँग्रेज सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग पहुँचा। उस समय सभा की कार्यवाही शान्तिपूर्वक चल रही थी। जनरल डायर ने बिना कोई चेतावनी दिये जनता पर गोलियां चलवाईं। गोली चलाना तभी बन्द किया गया जब कारतूस समाप्त हो गये। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इस गोलीकाण्ड में 379 लोग मारे गये और एक से दो हजार लोग घायल हुये। इस गोलीकाण्ड में मृत एवं घायल लोगों की वास्तविक संख्या अधिक थी।

इस हत्याकाण्ड से पूरे देश में अँग्रेजों के विरुद्ध घृणा फैल गई। सरकार ने इस काण्ड की जांच के लिये हण्टर समिति नियुक्त की। जनरल डायर ने हण्टर समिति के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लोगों को तितर-बितर होने का आदेश देने के दो या तीन मिनट बाद गोली चलाने का आदेश दिया। स्पष्ट है कि इतने कम समय में आठ-दस हजार लोगों की भीड़ तितर-बितर नहीं हो सकती थी।

लाहौर, गुजरावालां, कसूर तथा अन्य स्थानों पर भी ऐसे अत्याचार किये गये। पंजाब में मार्शल-लॉ लागू कर दिया गया तथा मार्शल-लॉ के उल्लघंन के आरोप में लगभग 300 व्यक्तियों को बन्दी बनाया गया। इनमें से 15 व्यक्तियों को मृत्यु-दण्ड, 6 व्यक्तियों को हमेशा के लिये देश-निकाला और शेष व्यक्तियों को कठोर कारावास की सजा दी गई। मार्च 1920 में हण्टर समिति ने रिपोर्ट दी जिसमें सरकारी अधिकारियों के दृष्टिकोण को ठीक ठहराया गया किंतु जनरल डायर को नौकरी से हटा दिया गया। इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों ने डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक घोषित किया। इंग्लैण्ड की जनता ने उसके गुजारे के लिये चन्दा एकत्रित किया। इंग्लैण्ड की सरकार ने जनरल डायर को साम्राज्य की सुरक्षा के लिए की गई सेवाओं के लिये सोर्ड ऑफ ऑनर (सम्मान की तलवार) तथा 2000 पौण्ड भेंट किये। इन कार्यवाहियों ने भारतीयों पर बहुत बुरा प्रभाव डाला। जो लोग अँग्रेजी सरकार के अच्छे शासन की प्रशंसा किया करते थे, वे भी अब सरकार से घृणा करने लगे।

खिलाफत आन्दोलन

तुर्की का सुल्तान विश्व के मुसलमानों का खलीफा कहलाता था। प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध, जर्मनी का साथ दिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद 10 अगस्त 1919 को तुर्की के साथ सेब्रे की सन्धि हुई जिसके अनुसार तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया गया तथा खलीफा को नजरबन्द कर दिया गया। अतः भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आन्दोलन आरम्भ किया। मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली इस आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। गांधीजी ने इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वर्णिम अवसर समझकर इस आन्दोलन का समर्थन किया। 24 नवम्बर 1919 को दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन हुआ जिसमें गंाधीजी को अध्यक्ष चुना गया। गांधीजी ने परामर्श दिया कि यदि अँग्रेज तुर्की-समस्या का उचित हल न निकालें तो असहयोग एवं बहिष्कार की नीति अपनाई जाये। 20 मई 1920 को खिलाफत समिति ने गांधीजी के असहयोग कार्यक्रम को स्वीकार कर लिया।

असहयोग आन्दोलन और उसकी प्रगति

जब गांधीजी को अँग्रेजों के विरुद्ध भारतीय मुसलमानों का सहयोग मिलने का पूरा विश्वास हो गया तो गांधीजी ने अँग्रेज सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन चलाने का निश्चय किया। इसके लिए सितम्बर 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुलाया गया जिसकी अध्यक्षता लाला लाजपतराय ने की। इस अधिवेशन में गांधीजी के क्रमिक अहिंसक असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम स्वीकार किया गया। स्वयं गांधीजी द्वारा प्रस्तुत किये गये इस प्रस्ताव की तीन मांगें थीं-

(1.) खिलाफत के साथ की गई भूल सुधारी जायें,

(2.) पंजाब में की गई भूलें सुधारी जायें,

(3.) स्वराज स्थापित किया जाये। 

यदि सरकार इन मांगों को स्वीकार नहीं करती है तो जनता द्वारा असहयोग आंदोलन आरम्भ किया जाये जिसके अंतर्गत निम्नलिखित कार्य किये जायें-

(1.) सरकारी उपाधियाँ व अवैतनिक पदों को छोड़ दिया जाये तथा विभिन्न सरकारी संस्थाओं में जो लोग नामित हुए हैं, वे अपने पदों से त्यागपत्र दे दें।

(2.) सरकारी स्वागत समारोहों तथा सरकारी अधिकारियों द्वारा उनके सम्मान में किये जाने वाले अन्य सरकारी व अर्द्ध सरकारी उत्सवों में भाग न लें।

(3.) सरकारी तथा सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूलों एवं कॉलेजों का बहिष्कार किया जाये तथा भारतीय छात्रों के लिए राष्ट्रीय विद्यापीठों की स्थापना की जाये।

(4.) वकीलों व मुवक्किलों द्वारा ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार किया जाये तथा आपसी विवादों के लिए पंचायती अदालतें स्थापित की जायें।

(5.) कौंसिलों के चुनाव में खड़े प्रत्याशी अपने नाम वापिस लें। यदि कोई प्रत्याशी चुनाव लड़े तो मतदाता उसे वोट न दें।

(6.) सैनिक, क्लर्क तथा श्रमिक, मेसोपोटामिया में सेवाएं देने से मना करें।

(7.) विदेशी सामान का बहिष्कार किया जाये।

देशबंधु चितरंजनदास, लाला लाजपतराय, श्रीमती ऐनीबेसेंट, विपिनचन्द्र पाल, मदनमोहन मालवीय तथा मुहम्मदअली जिन्ना आदि नेताओं ने गांधीजी द्वारा प्रस्तुत लगभग समस्त प्रस्तावों का विरोध किया। नई विधान परिषदों के बायकाट के प्रस्ताव पर इन नेताओं ने विशेष रूप से कड़ा विरोध जताया किन्तु गांधीजी ने पं. मोतीलाल नेहरू और अली बन्धुओं के समर्थन से प्रस्ताव पारित करवा लिया। इसके बाद गांधीजी और अली बन्धुओं ने असहयोग आन्दोलन के पक्ष में वातावरण तैयार करने के लिये देश के विभिन्न भागों का दौरा किया। नवम्बर 1920 में नये विधान मण्डलों के चुनाव हुए। देश के लगभग दो-तिहाई मतदाता वोट देने नहीं गये। स्पष्ट है कि कांग्रेस को जनता का भारी समर्थन मिला।

नागपुर अधिवेशन

दिसम्बर 1920 में नागपुर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता विजय राघवाचार्य ने की। इस अधिवेशन में असहयोग के प्रस्ताव को दोहराया गया तथा उसके कार्यक्रम के अन्त में एक धारा जोड़ दी गई कि यदि आवश्यकता पड़ी तो कर देने से मना किया जा सकता है। इस अधिवेशन के माध्यम से जन-साधारण का आह्वान किया गया कि वे चरखा कातें तथा कपड़ा बुनें। नागपुर अधिवेशन में मजदूरों और किसानों के सम्बन्ध में भी प्रस्ताव आये। उनकी न्यायोचित मांगों का समर्थन किया गया और सरकारी दमन की निन्दा की गई। इस अधिवेशन में भाषा के आधार पर प्रान्तों के गठन का प्रस्ताव भी पारित किया गया।

आन्दोलन की प्रगति

कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिये जाने के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि ख्याति प्राप्त लोगों ने तथा जन साधारण ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं। गांधीजी ने कैसरे-हिन्द स्वर्ण पदक तथा जुल युद्ध पदक लौटा दिये। गांधीजी और अली बन्धुओं ने देश भर में दौरे करके सार्वजनिक सभाएं कीं और स्थानीय लोगों से सम्पर्क करके असहयोग आंदोलन को समर्थन देने का आह्वान किया। चितरंजनदास, मोतीलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, विट्ठलभाई एवं वल्लभभाई पटेल ने वकालत छोड़ दी। सरकारी स्कूलों व न्यायलायों का बहिष्कार होने लगा। कांग्रेस के आह्वान पर काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, राष्ट्रीय कॉलेज लाहौर, जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली अािद शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई। सेठ जमनालाल बजाज ने उन वकीलों को जीवन निर्वाह के लिए एक लाख रुपया दिया जिन्होंने अपनी वकालत छोड़कर असहयोग आन्दोलन में भाग लिया था। जब ड्यूक ऑफ कनाट 1919 के सुधारों का उद्घाटन करने भारत आया तो उसका स्वागत हड़तालों से किया गया। स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई गईं और सार्वजनिक रूप से हजारों चरखे काते गये।

इस सफलता को देखकर गांधीजी ने भविष्यवाणी की कि 31 दिसम्बर 1921 तक स्वराज्य आ जायेगा। करोड़ों लोगों ने उनकी बात का विश्वास किया। जनता गांधीजी के आह्वान पर बड़े से बड़ा बलिदान करने को तैयार थी परन्तु कोई यह नहीं जानता था कि एक साल में स्वराज किस रास्ते से आयेगा? 1921 ई. में जब देश में असहयोग आन्दोलन चरम पर था, ब्रिटिश सरकार ने अपने युवराज प्रिन्स ऑफ वेल्स को भारत भेजा। 17 नवम्बर 1921 को प्रिन्स ऑफ वेल्स बम्बई पहुँचा। ब्रिटिश अधिकारियों ने उसके शाही स्वागत की तैयारी की किन्तु बम्बई की जनता ने उसका स्वागत हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों से किया। इस हड़ताल में बम्बई के हजारों श्रमिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं जिससे बहुत से लोग मारे गये। सैंकड़ों लोगों को बंदी बनाया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस की गोली से 30 लोग मरे और 200 से अधिक लोगों को बंदी बनाया गया। प्रिन्स ऑफ वेल्स भारत में जहाँ भी गया, भारतवासियों ने उसका स्वागत इसी तरह से किया।

जब बम्बई में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए तथा पुलिस ने गोली चलाई तो गांधीजी ने पांच दिन का उपवास कर प्रायश्चित किया और कांग्रेस वर्किंग कमेटी से मांग की कि बम्बई की घटनाओं के कारण आन्दोलन को वापस लेने के प्रश्न पर विचार करना चाहिए। वर्किंग कमेटी ने इस परिस्थिति पर विचार किया और कांग्रेस कमेटियों को पूर्ण अहिंसा का वातावरण स्थापित करने का आदेश दिया। उधर सरकार ने अपना दमन-चक्र तेज कर दिया। मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास, लाला लापतराय, डॉ. किचलू आदि नेताओं एवं हजारों स्वयं सेवक आदि को बंदी बना लिया गया। 1921 ई. के अन्त तक लगभग 20 हजार राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न जेलों में बन्द थे। दिसम्बर 1921 में मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में एक शिष्ट मण्डल वायसराय से मिला। दोनों पक्षों के बीच एक समझौता वार्त्ता हुई परन्तु असफल रही। इसके बाद धर-पकड़ और तेज हो गई। 1922 ई. में देश की विभिन्न जेलों में 30 हजार राजनीतिक बंदी थे।

आन्दोलन का स्थगित किया जाना

दिसम्बर 1921 में अहमदाबाद में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ। निर्वाचित अध्यक्ष देशबन्धु चितरंजन दास के जेल में होने के कारण दिल्ली के हकीम अजमल खाँ ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की। अधिवेशन में घोषणा की गई कि देश में तब तक अहिंसक असहयोग आंदोलन जोरदार ढंग से चलाया जाये जब तक स्वराज स्थापित नहीं हो जाता। गांधीजी को कांग्रेस का डिक्टेटर नियुक्त किया गया और कांग्रेस महासमिति के सारे अधिकार उनको सौंप दिये गये। फरवरी 1922 में गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को पत्र लिखकर सूचित किया कि यदि एक सप्ताह में सरकार ने दमन चक्र बन्द नहीं किया तो कर न देने का आन्दोलन चलाया जायेगा। 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले में चौरी-चौरा नामक स्थान पर पुलिस ने अहिंसात्मक आन्दोलनकारियों पर गोली चलाई। जब उनकी गोलियां समाप्त हो गयीं, तब वे भागकर थाने में छिप गये। उत्तेजित भीड़ ने थाने को आग लगा दी जिससे एक पुलिस सब इंस्पेक्टर और 21 सिपाही जलकर राख हो गये। गांधीजी हिंसा के पक्ष में नहीं थे, अतः उन्होंने आन्दोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। अचानक आन्दोलन स्थगित करने के कारण अनेेक नेताओं ने गांधीजी की तीव्र आलोचना की।

सुभाषचन्द्र बोस ने लिखा है- ‘डिक्टेटर का फरमान उस वक्त मान लिया गया किन्तु कांग्रेस शिविर में नियमित विद्रोह फैल गया। कोई भी न समझ सका कि महात्मा ने चौरीचोरा की विच्छिन्न घटना का इस्तेमाल सारे देश के आन्दोलन का गला घोट देने में क्यों किया….. जबकि जनता का जोश उबल रहा था, उस वक्त पीछे हटने का आदेश देना राष्ट्र के दुर्भाग्य के अलावा और कुछ न था।’

पं. नेहरू ने लिखा है- ‘ऐसे समय, जबकि लगता था कि हम अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं और सब मोर्चों पर आगे बढ़ रहे हैं, अपने संघर्ष के बन्द कर दिये जाने का समाचार हमें मिला तो हम बहुत नाराज हुए।’

यद्यपि प्रकट रूप से यह आन्दोलन केवल चौरी-चौरा की घटना के कारण स्थगित किया गया था तथापि वास्तविकता यह थी कि बाहर से शक्तिशाली दिखाई देने वाला यह आन्दोलन आंतरिक रूप से कमजोर हो रहा था। सरकार की दमनकारी नीति से जनता में निराशा और भय उत्पन्न हो रहा था। 1921 ई. के अन्त में मलाबार के मोपलाओं द्वारा हिन्दुओं पर किये गये अत्याचारों से भी आन्दोलन को क्षति पहुँची थी। आंदोलन स्थगित किये जाने के बाद सरकार ने 10 मार्च 1922 को गांधीजी को बंदी बना लिया और उन्हें राजद्रोह फैलाने के अपराध में 6 वर्ष का साधारण कारावास दिया गया। 3 फरवरी 1924 को बीमारी के कारण गांधीजी को छोड़ दिया गया।

आन्दोलन की असफलता के कारण

बहुत से इतिहासकारों ने स्वीकार किया है कि गांधीजी द्वारा आन्दोलन स्थगित किये जाने का अभिप्राय उसकी असफलता को स्वीकार करना था। आन्दोलन की असफलता के कुछ निश्चित कारण थे-

(1.) 1920-21 ई. में होने वाले विधानमंडलों के चुनाव का बहिष्कार किया गया। इस कारण कांग्रेसी सदस्यों ने निर्वाचन में भाग नहीं लिया किन्तु सरकार के वफादार और अन्य लोगों को निर्वाचन में भाग लेने से नहीं रोका जा सका और वे विधान मण्डलों में प्रवेश पा गए। विधान मण्डलों के बहिष्कार से कांग्रेस घाटे में रही।

(2.) गांधीजी ने अपने सहयोगियों से परामर्श किये बिना ही अचानक आन्दोलन स्थगित कर दिया। देशबन्धु चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस आदि नेताओं ने गांधीजी के इस कार्य की आलोचना की। आन्देालन को उस समय समाप्त करना बहुत बड़ी भूल था, जबकि वह अपने चरम पर था।

(3.) यह सही है कि आन्दोलन पूर्णतः अहिंसात्मक नहीं रह सका किन्तु हिंसा के लिए आन्दोलनकारी, उत्तरदायी नहीं थे। ब्रिटिश सरकार ने शान्तिपूर्ण सत्याग्रहियों पर अमानवीय अत्याचार करके उन्हें हिंसा करने के लिये उकसाया था।

(4.) गांधीजी ने ब्रिटिश शासकों की हिंसा, गोली वर्षा और उनके द्वारा की गई सैकड़ों भारतीयों की हत्या की निन्दा में एक शब्द भी नहीं कहकर अपनी लोकप्रियता को खो दिया। बहुत से विचारकों की मान्यता है कि यदि आन्दोलन कुछ दिन और चलता तो संकट-ग्रस्त अँग्रेज सरकार को कुछ समझौता करने के लिए विवश होना पड़ता किन्तु अचानक स्थगन से कुछ भी प्राप्त नहीं हो सका।

(5.) खिलाफत, मुसलमानों का धार्मिक मामला था। तुर्की के मुसलमान भी इसमें रुचि नहीं रखते थे किंतु गांधीजी ने मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने के लिए इसे अपना निजी मामला बना लिया। इस प्रकार गांधीजी इस राष्ट्रीय आन्दोलन को संर्कीणता की ओर ले गये। ऐसी स्थिति में इसका असफल होना स्वाभाविक था।

(6.) मुसलमानों ने आन्दोलन के अहिंसात्मक स्वरूप को ठीक से समझा ही नहीं था। अतः अचानक आन्दोलन समाप्त करने पर मुसलमानों ने यह प्रचार करना आरम्भ किया कि गांधीजी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया। इससे देश में उत्तेजना फैल गई और साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।

(7.) सरकार का दमन-चक्र अत्यंत कठोर था। सरकार द्वारा दी जाने वाली अमानवीय यातनाएं सहन करना आम आदमी के लिये कठिन था। अतः आन्दोलन का गतिशील रहना असम्भव था।

असहयोग आन्दोलन का महत्त्व

असहयोग आन्दोलन एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त करने में असफल रहा। इससे जनता में गांधीजी के विरुद्ध असन्तोष और निराशा की लहर फैल गई। फिर भी, इस आन्दोलन के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। अनेक क्षेत्रों में इसके अच्छे परिणाम निकले-

(1.) असहयोग आन्दोलन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को नया स्वरूप दिया। राष्ट्रीय आन्दोलन के पहले चरण में नौरोजी तथा गोखले आदि नरमपंथी नेताओं ने भारतीयों को यह मार्ग दिखाया कि सरकार को याचिकाएं देकर अपनी बात मनवाई जाये। दूसरे चरण में लाल, बाल तथा पाल ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति त्यागने का मार्ग दिखाया। इस तीसरे चरण में गांधी ने भारतीयों को सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह का मार्ग दिखाया।

(2.) इस आन्दोलन से भारतीयों में राजनीतिक जागृति का और अधिक विकास हुआ तथा स्वराज की मांग प्रबल हुई। पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘गांधी के असहयोग आन्दोलन ने आत्मनिर्भरता एवं अपनी शक्ति संचित करने का पाठ पढ़ाया। सरकार भारतीयों के ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक सहयोग पर निर्भर करती है और यदि यह सहयोग नहीं दिया गया तो सरकार का सम्पूर्ण ढांचा कम से कम सिद्धान्ततः लड़खड़ा जायेगा। सरकार पर दबाव डालने का यही सर्वाधिक प्रभावशाली ढंग है।’

(3.) इस आंदोलन में पहली बार कांग्रेस ने सविनय प्रार्थना पत्र भेजने की नीति का परित्याग करके ब्रिटिश सरकार से सीधी टक्कर ली। अतः प्रत्येक व्यक्ति में राष्ट्रीय आन्दोलन में सहयोग देने तथा देश के लिए कुछ बलिदान करने की भावना जागृत हुई। इससे कांग्रेस का आन्दोनल जन-साधारण में गहराई तक प्रवेश कर गया।

(4.) असहयोग आंदोलन के माध्यम से गांधीजी ने देशवासियों को सरकार की आलोचना करना सिखाया। इससे पूर्व जनता, सरकार की आलोचना करने से डरती थी किन्तु अब वह निर्भीक हो गयी तथा अब जेल जाना देश-भक्ति का प्रतीक बन गया।

(5.) गांधीजी ने स्वराज प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक सत्याग्रह का जो अस्त्र हाथ में लिया, उसका अँग्रेज सरकार के पास कोई उत्तर नहीं था। शान्त सत्याग्रहियों पर गोली चलाना, अथवा लाठियां बरसाना घृणित समझा गया। इससे जनमत, सरकार के प्रबल विरुद्ध हो गया।

(6.) इस आंदोलन ने सरकार के मन में जनता का भय उत्पन्न कर दिया। बम्बई के तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड लायड ने लिखा है- ‘गांधीजी ने हमें डरा दिया था। उनके कार्यक्रम ने हमारी जेलें भर दी थीं। आप, लोगों को सदैव गिरफ्तार करते नहीं रह सकते, तब जबकि उनकी संख्या 31,90,00,000 हो। अगर उन लोगों ने गांधीजी का दूसरा कदम उठाया होता तथा टैक्स देने से इन्कार कर दिया होता तो ईश्वर जाने, तब हम कहाँ होते।’

अतः भविष्य में होने वाले राष्ट्रीय आन्दोलन के लिये यह हथियार महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

(7.) आन्दोलन के दौरान कांग्रेस ने राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना, चरखा चलाना व खादी तैयार करना, स्वदेशी माल को अपनाना आदि कई रचनात्मक कार्य हाथ में लिये। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से भारतीयों के आर्थिक शोषण में कमी आई।

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