Monday, May 20, 2024
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25. हिन्दू धर्म ग्रंथ ईक्ष्वाकु वंशी राजा रामचंद्र को पौने दो करोड़ साल पुराना बताते हैं!

 ईक्ष्वाकु वंशी राजा दशरथ के चार पुत्र हुए। बड़े पुत्र रामचंद्र अपने शील, सौंदर्य एवं शक्ति के कारण सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के प्रिय थे। राजा रामचंद्र अयोध्या के 64वें ईक्ष्वाकुवंशी राजा थे। वे भी त्रेता युग में हुए।

इतिहासकार अब तक श्रीराम का जीवनकाल निश्चित नहीं कर पाए हैं। रामायण मीमांसा के रचनाकार स्वामी करपात्रीजी, पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र, श्रीराघवेंद्रचरितम् के रचनाकार श्रीभागवतानंद गुरु आदि के अनुसार श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। ये सभी विद्वान अपने मत के समर्थन में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं अन्य पुराणों से प्रमाण देते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग की कुल अवधि 12 लाख 96 हजार वर्ष थी। इस युग में भगवान विष्णु के तीन अवतार- वामन, परशुराम एवं श्रीराम हुए। इनमें से राम तीसरे थे जो कि विष्णु के सातवें अवतार थे। इसके बाद द्वापर युग आया जिसकी अवधि 8 लाख 64 हजार वर्ष रही।

द्वापर के बाद ई.पू. 3 हजार 102 में कलियुग आरम्भ हुआ। यदि भगवान श्रीराम को त्रेता के अंतिम खण्ड में माना जाए तो उनका जन्म आज से कम से कम 8 लाख 69 हजार 119 वर्ष पहले हुआ। वैज्ञानिक इस तिथि को स्वीकार नहीं करते क्योंकि तब तक धरती पर मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। कतिपय वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भगवान राम का जन्म ई.पू. 5 हजार 114 अर्थात् आज से लगभग 7 हजार वर्ष पूर्व हुआ।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

वाल्मीकि रामायण की रचना का काल आज से लगभग 2800 वर्ष पुराना माना जाता है। इस ग्रंथ में पहली बार रामकथा का परिपक्व स्वरूप उभर कर सामने आया। इससे पहले भी रामकथाओं के अनेक ग्रंथ थे, वे अब नष्ट हो गए हैं। महर्षि वाल्मीकि ने उन ग्रंथों एवं हिन्दू जनमानस में प्रचलित कथाओं के आधार पर रामायण नामक ग्रंथ की रचना की। आज हमारे पास रामकथा को बताने वाला सबसे पुराना ग्रंथ यही है। इसमें श्रीराम के जीवन से जुड़े स्थलों का वर्णन किया गया है।

अब तक प्राप्त प्राचीनतम उल्लेख के अनुसार आज से लगभग 2 हजार साल पहले अर्थात् प्रथम शताब्दी ईस्वी में उज्जैन के राजा शकारि विक्रमादित्य ने इक्ष्वाकुओं की राजधानी अयोध्या की यात्रा की तथा रामायण में वर्णित स्थान पर पहले से ही स्थित मंदिर का भव्य नवनिर्माण करवाया।

जब पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में चीनी यात्री फाह्यान अयोध्या आया तो उसने अयोध्या में कुछ बड़े बौद्ध मंदिरों को देखा। उसने अयोध्या के किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। इससे प्रतीत होता है कि इस काल तक बौद्धों ने हिन्दुओं के प्राचीन मंदिरों को तोड़ डाला था। अथवा बौद्ध होने के कारण फाह्यान को हिन्दू मंदिरों का उल्लेख करने में कोई रुचि नहीं थी।

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सातवीं शताब्दी ईस्वी में जब ह्वेसांग अयोध्या आया, तब तक अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध एवं जैन मंदिर बन चुके थे। वह भी बौद्ध था तथा उसने भी अयोध्या के किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। ऑस्ट्रिया के एक पादरी फादर टाइफैन्थेलर ने सत्रहवीं शताब्दी में अयोध्या की यात्रा की तथा लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या यात्रा का वर्णन किया। इस वर्णन का फ्रैंच अनुवाद ई.1786 में बर्लिन से प्रकाशित हुआ।

फादर टाइफैन्थेलर ने लिखा है- ‘अयोध्या के रामकोट मौहल्ले में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है जिसमें काले रंग की कसौटी के 14 स्तम्भ लगे हुए हैं। इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों सहित जन्म लिया। जन्मभूमि पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया। आज भी हिन्दू इस स्थान की परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दण्डवत करते हैं।’

ई.1889-91 में अलोइज अंटोन नामक इंग्लिश पुरातत्वविद् की देख-रेख में अयोध्या का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया गया जिसमें उसने अयोध्या के निकट तीन टीले देखे जिन्हें मणिपर्वत, कुबेरपर्वत तथा सग्रीवपर्वत कहा जाता था। ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने माना है कि इन टीलों के नीचे बड़े बौद्ध मठों के अवशेष हैं जिनका उल्लेख ह्वेसांग ने किया था। स्वतंत्रता के पश्चात् अयोध्या नगर में हुई खुदाइयों में अयोध्या में मानव सभ्यता को ईसा से 1,700 वर्ष पूर्व अर्थात् आज से 3,700 वर्ष पूर्व पुरानी माना गया।

निश्चय ही इसके पूर्व की सभ्यता नष्ट हो गई होगी क्योंकि रामसेतु पुल की कार्बन डेटिंग से इस तथ्य की पुष्टि हो चुकी है कि मानव निर्मित इस सेतु का निर्माण आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था। अर्थात् अयोध्या में निश्चित रूप से आज से सात हजार साल पहले भी सभ्यता रही होगी जो काल के प्रवाह में नष्ट हो चुकी होगी।

अतः हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार रामचंद्र का जन्म आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था।

हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में हुए उल्लेखों के अनुसार अयोध्या में श्रीराम के जीवन से जुड़े स्थलों पर तीन मंदिर बनाए गए। पहला मंदिर श्रीराम की जन्मभूमि पर था जिसे ‘जन्मस्थानम्’ कहा जाता था। दूसरा मंदिर ‘त्रेता के ठाकुर’ कहलाता था जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया। तीसरा मंदिर ‘स्वर्गद्वारम्’ कहलाता था जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया।

सात हजार वर्ष की अवधि में अयोध्या ने जाने कितनी करवटें ली होंगी किंतु हिन्दुओं को राजा रामचंद्र से जुड़े तीनों मंदिर जन्मस्थानम्, त्रेता के ठाकुर एवं स्वर्गदारम् याद रहे। अयोध्या के धार्मिक महत्व के कारण ही बौद्धों एवं जैनों ने भी अयोध्या को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया किंतु धार्मिक संकीर्णता के चलते उन्होंने अपने ग्रंथों में श्रीराम से सम्बद्ध मंदिरों का उल्लेख नहीं किया।

ईस्वी 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। ई.1528 में बाबर ने अपने सेनापति मीर बाकी को आदेश दिया कि वह अयोध्या का ‘जन्मस्थानम्’ नामक मंदिर तोड़ दे ताकि अयोध्या की धार्मिक पहचान मिटाई जा सके। कुछ हिन्दू राजाओं ने हँसवर के राजगुरु देवीनाथ पांडे के नेतृत्व में मीर बाकी पर आक्रमण किया। इस युद्ध में 1,74,000 हिन्दू सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी। युद्ध में विजय प्राप्त करके मीर बाकी ने राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ डाला तथा उसके स्थान पर एक मस्जिदनुमा ढांचा बना दिया।

इस मस्जिदनुमा ढांचे को खड़ा करने में राम जन्मभूमि मंदिर के भग्नावशेषों को काम में लिया गया जिसमें काले रंग के कसौटी पत्थर के चौदह स्तम्भ भी सम्मिलित थे जिन पर हिन्दुओं के धार्मिक चिह्न उत्कीर्ण थे। मीर बाकी ने इस ढांचे के सामने एक शिलालेख अंकित करवाया जिसमें इस स्थल का ‘फरिश्ते का जन्म स्थान’ के रूप में उल्लेख किया।

चूंकि यह काम मुगल आक्रांता बाबर के सेनापति मीर बाकी ने किया था, इसलिए मुसलमानों ने इस ढांचे को बाबरी मस्जिद कहा। मुगल दस्तावेजों में इसे ‘मस्जिद जन्मस्थानम्’ कहा जाता रहा। जब भारत के छठे मुगल बादशाह औरंगजेब ने ई.1669 में उत्तर भारत के समस्त मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए तो उसकी सेनाओं ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के दो मंदिरों ‘त्रेता के ठाकुर’ तथा स्वर्गद्वारम् को भी नष्ट कर दिया।

इसके बाद पूरे पांच सौ सालों तक हिन्दू अयोध्या के जन्मस्थानम् मंदिर को फिर से प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते रहे। नवम्बर 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या का जन्मस्थानम् मंदिर स्थल फिर से हिन्दुओं को लौटा दिया है और अब इस स्थान पर एक भव्य मंदिर बनाने की तैयारियां चल रही हैं।

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