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ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

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ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ ऋग्वैदिक ऋचाओं में देखने को मिलती हैं। इस काल में धर्म का अर्थ ईश्वर नामक रहस्यमयी सत्ता को समझना तथा उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना था। ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाएं इन्हीं दो मंतव्यों से आप्लावित हैं।

ऋग्वैदिक आर्यों का जीवन धर्ममय था। जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं था जिस पर धर्म की गहरी छाप न हो। इस काल का धर्म बड़ी उच्च-दशा में था तथा प्राकृतिक शक्तियों एवं उनके नियामक देवताओं की पूजा होती थी। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्यों का धर्म बहुदेववादी था।

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

(1.) ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास

ऋग्वैदिक आर्यों का ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास था जो इस जगत् का निर्माण तथा पालन करने वाला है। प्रारम्भ में आर्यों ने वरुण को देवाधिदेव माना परन्तु बाद में उसका स्थान इन्द्र ने ले लिया। बाद में आर्यों ने अनुभव किया कि इन्द्र के ऊपर भी कोई परमसत्ता है, जो समूचे ब्रह्माण्ड को संचालित करती है तथा स्रष्टा ही सृष्टि के रूप में विस्तृत है।

वह प्रकाश के रूप में ज्योतिर्मय आकाश में व्याप्त है, वसु के रूप में अन्तरिक्ष में निवास करता है, प्राण के रूप में मनुष्य के अन्तःस्थल में विद्यमान है। वस्तुतः सृष्टा, सृष्टि, प्रकृति और मानव एक ही अनुशासन से निष्पन्न होकर तथा एक ही अनुशासन से ग्रथित होकर समन्वित हैं। ऋग्वेद तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया है- ‘अग्नि वाक् में प्रतिष्ठित है और वाक् हृदय में, हृदय मुझ में, मैं अमृत्व में और अमृत्व ब्रहा में सन्निहित है।’

(2.) ऐकेश्वरवाद में विश्वास

अनेक देवताओं में विश्वास करते हुए भी ऋग्वैदिक आर्यों के धर्म का मूलाधार एकेश्वरवाद था। उनका एक ही ईश्वर था जिसे वे प्रजापति कहते थे जो सर्वव्यापी था।

ऋषियों का कहना था- ‘सत एक ही है। विद्वान उसे अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि विभिन्न नामों से पुकारते है।’

आर्यों ने इनके उपर भी एक परम तत्त्व की प्रतिष्ठता की और उसे हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा विश्वकर्मा नामों की संज्ञा दी। एकेश्वरवाद की यही पराकाष्ठा मानी जाती है।

इसी एक तत्त्व को आर्यों ने  ‘सत’ नाम से पुकारा। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सत का ज्ञान ही आत्मा का ज्ञान है। संसार के विभिन्न जीव विभिन शरीर अवश्य धारण किए हुए हैं पर उन सब की आत्मा एक ही है। मोह जनित भेदों को नष्ट करके उस परमसत् से साक्षात्कार करना ही जीवन का परम लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आर्य-ऋषि परम-तत्त्व की ओर उन्मुख होने लगे।

(3.) प्राकृतिक शक्तियों की उपासना

प्राकृतिक घटनाएं यथा- वर्षारंभ, सूर्य एवं चंद्र का उदय, नदियों तथा पर्वतों आदि का अस्तित्त्व, आर्यों के लिए पहेली-जैसे थे। ऋग्वेद में ऐसी अनेक दैवी शक्तियों का समावेश है जिनकी स्तुति में विभिन्न ऋषि-कुलों ने सूक्तों की रचना की। इस प्रकार ऋग्वैदिक-काल में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा आरंभ हुई।

ऋग्वैदिक आर्यों का विश्वास था कि सूर्य, चन्द्र, वायु, मेघ आदि में ईश्वर निवास करता है। इसलिए वे इन सबकी उपासना करते थे। आर्यों ने सर्वप्रथम ‘द्यौस’ तथा ‘पृथ्वी’ की पूजा की। आर्यों का विश्वास था कि द्यौस तथा पृथ्वी की अनुकम्पा से ही मानव-जीवन सम्भव था। इन दोनों को अन्य समस्त देवताओं का जन्मदाता मान लिया गया।

आकाश देवता को ‘वरुण’ कहा जाने लगा। पृथ्वी और आकाश के मध्य में विद्यमान समस्त वस्तुओं में वरुण का वास माना गया। ऋग्वेद में वरुण के दो रूपों का उल्लेख मिलता है। एक रूप में सुख-समृद्धि देने वाला, सहृदय, सृष्टि के निर्माता का, तो दूसरा रूप है विनाश तथा अभिशाप देने वाले का।

ऋग्वैदिक आर्यों की मान्यता थी कि वरुण की भक्ति, पूजा तथा प्रार्थना से वह प्रसन्न होता है और पापियों के पाप क्षमा कर देता है। कुछ विद्वानों का माना है कि वरुण की उपासना से ही आर्यों में कर्मवाद और भक्तिमार्ग के सिद्धान्तों का उदय हुआ। जब वरुण को वृत्रासुर ने बंदी बना लिया तब इंद्र ने वृत्रासुर को मारकर वरुण को मुक्त करवाया तथा तथा उसे पुनः देवत्व प्रदान किया।

वरुण के साथ ही ‘मित्र’ की भी पूजा की जाने लगी। आर्यों ने बहिर्जगत् के प्रकाश का मानवीकरण करके उसे ‘मित्र’ का नाम दिया। दोनों को संयुक्त रूप से ‘मित्रावरुण’ कहा गया। बहिर्जगत में ‘सूर्य’ का भी बड़ा महत्त्व था। अतः आर्यों ने सूर्य को भी देवता माना। उसे सम्पूर्ण चर-अचर का रक्षक तथा मनुष्यों के समस्त सत् असत् कर्मों का दृष्टा माना गया।

सूर्य के व्यापक रूप को ‘सविता’ कहा गया। सविता में सूर्य का व्यक्त तथा रात्रि को अव्यक्त रहने वाला रूप दोनों ही सम्मिलित हैं। सविता को पाप-मोचन देवता भी माना गया है।

ऋग्वैदिक आर्यों ने ‘विष्णु’ को विश्व का संरक्षक माना। विष्णु, भक्तों की प्रार्थना पर तुरन्त सहायता के लिए पहॅुंचने वाला देवता है। ऋग्वेद में उसके तीन पदों का उल्लेख है, जिसके अनुसार वह समस्त ब्रह्मण्ड में भ्रमण करता है। विष्णु के व्यापक स्वरूप के कारण उसे ‘उरु-गाय’ अर्थात् व्यापक रूप से गमनशील, और ‘उरु-क्रम’ अर्थात् व्यापक रूप से अतिक्रमण करने वाला आदि नामों से पुकारा गया है।

ऋग्वैदिक आर्यों के लिए विष्णु के समान ही ‘अग्नि’ का भी विशेष महत्त्व था। ऋग्वेद में अग्नि की प्रार्थना सम्बन्धी लगभग 200 मंत्र हैं जो अग्नि के महत्त्व को प्रकट करते हैं। यज्ञ में अग्नि का विशेष महत्त्व था। इसीलिए उसे ‘पुरोहित’, ‘यज्ञिय’ और ‘होता’ कहा गया। अग्नि को देवताओं का मुख्य माना गया है, क्योंकि उसी के द्वारा आहुतियाँ समस्त देवताओं तक पहुँचती हैं। दाहकर्म के लिए भी अग्नि अनिवार्य थी। अग्नि को समस्त लोकों के राक्षसों को भगाने वाला कहा गया है।

वैदिक आर्य ‘सोमरस’ के प्रेमी थे। उन्होंने ‘सोम’ को भी देवता मान लिया तथा सोम को सूर्य और विद्युत से उत्पन्न हुआ बताया। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में वनस्पति से इस पेय के तैयार करने की विधि का वर्णन मिलता है परन्तु इस वनस्पति की सही पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। देवताओं के अनुरोध पर सोम चंद्रमा में समा गया जहाँ से वह जल एवं वनस्पतियों को प्राप्त हुआ।

आँधी, तूफान और वर्षा का देवता ‘इन्द्र’ था। ऋग्वेद में इसे सर्वाधिक शक्तिशाली देवता माना गया है। उसे आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी से भी अधिक बड़ा माना गया है। एक स्थान पर उसे ‘वृत्र’ नामक असुर का वध करके बादलों में रुके हुए जल को मुक्त कराने वाला कहा गया है। वृत्र को शीत, कोहरे और पाले का असुर माना गया है।

ऋग्वेद में इन्द्र की प्रार्थना करने वाली लगभग 250 ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद में उपरोक्त देवताओं के साथ-साथ मरुत, वात, पर्जन्य, अश्विन, यम, रुद्र, पूषण आदि देवताओं का उल्लेख है। देवियों में उषा, अदिति, सिन्धु, आरुयानी और सरस्वती के नाम उल्लेखनीय हैं। ‘उषा’ का अर्थ है- अरुणोदय के पूर्व की वेला। ‘अदिति’ का अर्थ है- सर्वव्यापिनी प्रकृति। ‘आरुयानी’ का तात्पर्य वन-देवी से है और मानवी बुद्धि का दैवीकरण ‘सरस्वती’ के रूप में किया गया था।

(4.) देवताओं का मानवीकरण

ऋग्वेद के अधिकांश मंत्र, विभिन्न देवताओं की स्तुतियाँ हैं। आराध्य और उपास्य देवों की प्रशंसा करते हुए ऋषिगण उनके गुणों का निर्देशन करते हैं। प्रारम्भिक स्तुतियाँ देवताओं को प्राकृतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं किन्तु बाद में अग्नि को अग्निदेव तथा सूर्य को सूर्यदेव आदि संज्ञाओं से सम्बोधित किया गया है।

इससे आभास होता है कि प्राकृतिक शक्ति को ही दिव्य शक्ति में परिवर्तित किया गया। इसके लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। उनमें मानव अथवा पशु गुणों का आरोपण करके उन्हें जीवित शक्तियाँ माना। धीरे-धीरे प्रत्येक देवता की एक पत्नी भी स्वीकार कर ली गई तथा उसे देवी माना गया। कालान्तर में वैदिक देवता और देवियों में मानवीय दुर्बलताओं का भी दिग्दर्शन किया गया तथा यह माना गया कि वे मनुष्यों की तरह कार्य कर  सकते हैं।

(5.) देवताओं का वर्गीकरण

ऋग्वेद में 33 देवताओं की प्रार्थना की गई है जिन्हें तीन वर्गों में बांटा गया है। प्रत्येक वर्ग में 11 देवता हैं, जिनमें से एक सर्वप्रधान है- (1) आकाश के देवता- आकाश के देवता में द्यौस, वरुण, मित्र, सविता, पूषण, उषा, अदिति तथा अश्विन आदि सम्मिलित थे। आकाश के सर्वश्रेष्ठ देवता सूर्य हैं। (2) मध्य-स्थान के देवता- मध्य स्थान के देवताओं में इन्द्र, मरुत, वायु, पर्जन्य आदि आते हैं। मध्य-स्थान के सर्वश्रेष्ठ देवता वायु अथवा इन्द्र हैं। (3) पृथ्वी के देवता- पृथ्वी के देवताओं में पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति, सरस्वती आदि आते थे। पृथ्वी के प्रधान देवता अग्नि हैं।

(6.) देवताओं की विशेषताएँ

ऋग्वैदिक-काल के देवताओं में कुछ निश्चित विशेषताएँ पाई जाती हैं- (1) समस्त देवी-देवता सदाचार तथा नैतिकता के प्रतीक हैं। (2) समस्त देवता दयावान तथा शुभचिन्तक हैं। कोई भी देवता दुष्ट स्वभाव का नहीं है। (2) समस्त देवता अलग-अलग गुणों एवं शक्तियों वाले हैं और इनके कार्य भी विभिन्न प्रकार के हैं। (3) समस्त देवता जन्म लेते हैं परन्तु फिर अमर हो जाते हैं। (4) समस्त देवता वायु में भ्रमण करते हैं जिनके रथों में घोड़े अथवा अन्य पशु-पक्षी जुते रहते हैं। (5) इन्हें मानव-स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है तथा इन्हें मनुष्य के खाद्य-पदार्थ, यथा दूध, अन्न आदि की बलि दी जाती है।

(7.) देवियों की तुलना में देवताओं को प्रमुखता

आर्यों ने उषा काल का प्रतिनिधित्व करने वाली उषस् और अदिति जैसी देवियों की भी पूजा की किंतु ऋग्वैदिक-काल में इन देवियों को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया। पितृत्ंत्रात्मक समाज के वातावरण में देवियों की अपेक्षा इन्द्र एवं वरुण आदि देवताओं को अधिक महत्त्व मिलना स्वाभाविक था।

(8.) धार्मिक कृत्य

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देवताओं की आराधना मुख्यतः स्तुतिपाठ और यज्ञाहुति से की जाती थी। ऋग्वैदिक-काल में स्तुति पाठ का बड़ा महत्त्व था। स्तुति पाठ अकेले और सामूहिक रूप में होते थे। आर्यों का विश्वास था कि प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचती है और ईश्वर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होता है। गायत्री मन्त्र का बड़ा महत्त्व था और इसका पाठ दिन में तीन बार अर्थात् प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सन्ध्या समय किया जाता था। आरम्भ में प्रत्येक कबीले अथवा कुल का अपना एक विशिष्ट देवता होता था। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण कबीले के सदस्य इस स्तुतिगान में भाग लेते थे। ‘यज्ञ’ ऋग्वैदिक आर्यों की उपासना पद्धति के मुख्य अंग थे। इसलिए ऋग्वेद-धर्म को ‘यज्ञ-धर्म’ कहा जाता है। यज्ञों में अन्न, घी, जौ तथा सुगन्धित सामग्री की आहुति दी जाती थी तथा देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र, धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना की जाती थी। प्रारम्भ में प्रत्येक आर्य यजन कार्य स्वयं करत था, परन्तु बाद में ब्राह्मण अथवा पुरोहित की सहायता ली जाने लगी। सम्पूर्ण ‘जन’ अर्थात् ‘कबीले’ द्वारा दी जाने वाली यज्ञबलि को ग्रहण करने के लिए अग्नि और इंद्र का आह्नान किया जाता था। ऋग्वैदिक-काल में यज्ञाहुति के अवसर पर कोई अनुष्ठान अथवा मंत्रपाठ नहीं होता था। उस समय शब्द की चमत्कारिक शक्ति को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता था जितना उत्तर-वैदिक-काल में दिया जाने लगा था।

ऋग्वैदिक-काल में आर्य, आध्यात्मिक उन्नति अथवा मोक्ष के लिए देवताओं की आराधना नहीं करते थे। वे इन देवताओं से मुख्यतः संतति, पशु, अन्न, धन, स्वास्थ्य आदि मांगते थे। ऋग्वेद में वृहत एवं व्ययात्मक यज्ञों का भी उल्लेख मिलता है, जो प्रायः राजाओं और धनी व्यक्तियों द्वारा करवाए जाते थे।

(9.) पितरों की पूजा

ऋग्वैदिक आर्यों में पितरों की पूजा प्रचलित थी। उनका मानना था कि पितरों की कृपा प्राप्त करने से कष्ट क्षीण होते हैं।

(10.) सदाचार पर बल

ऋग्वैदिक आर्यों में सदाचार पर बहुत बल दिया जाता था। चोरी, डकैती, मिथ्या भाषण, निरपराधों एवं निःशक्तों की हत्या, पराये धन का हरण आदि कार्य निकृष्ट माने जाते थे। जादू, टोना-टोटका, धोखा, व्यभिचार आदि को पाप समझते थे। ऋग्वेद में पाप पुण्य और स्वर्ग-नर्क की परिकल्पना भी मिलती है। आर्यों का विश्वास था कि पुण्यकर्म करने वाले लोग मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग में रहते हैं तथा पापकर्म करने वाले लोग नर्क एवं अन्धकूप में धकेले जाते हैं।

(11.) दान

ऋग्वैदिक आर्यों में दान देने की परम्परा थी। आर्य अपने पुरोहितों को गाय, रथ, घोड़े, दास-दासियां दान करते थे। पुरोहितों को दान देने के जितने भी उल्लेख मिलते हैं उनमें गायों और स्त्री दासों के रूप में दान देना बताया गया है, भूखंड के रूप में कभी नहीं।

(12.) मंदिरों तथा मूर्तियों का अभाव

ऋग्वैदिक-काल में मन्दिरों का निर्माण नहीं हुआ था और न मूर्ति-पूजा प्रचलित थी किन्तु ऋग्वेद में एक स्थान पर दस गायें देकर इन्द्र की प्रतिमा लेने का उल्लेख आया है। इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वैदिक आर्य मूर्ति-पूजा से परिचित थे। उनकी पूर्ववर्ती एवं समकालीन सैन्धव सभ्यता में मूर्ति-पूजा बड़े स्तर पर प्रचलित थी।

(13.) आत्मा एवं मोक्ष सम्बन्धी विचार

आर्य लोग अमरता में विश्वास करते थे। कुछ विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक आर्यों में पुनर्जन्म की भावना का उदय हो चुका था। ऋग्वेद में मोक्ष का उल्लेख नहीं मिलता परन्तु पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कहना कठिन है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ उसे सहज मानव धर्म का स्वरूप प्रदान करती हैं जो दूसरों के प्रति करुणा तथा सहअस्तित्व के सिद्धांत में विश्वास रखता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

आर्यों का आर्थिक जीवन

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आर्यों का आर्थिक जीवन

आर्यों का आर्थिक जीवन अध्ययन की दृष्टि से दो भागों में रखा जा सकता है। पहला है- ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन और दूसरा है उत्तरवैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन। इस अध्याय में में हम ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन

ऋग्वैदिक आर्यों का आर्थिक जीवन सरल था, उसमें जटिलता उत्पन्न नहीं हुई थी। प्रारंभिक ऋग्वैदिक आर्यों की अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः पशुचारी थी, अन्न-उत्पादक नहीं थी, इसलिए लोगों से नियमित करों की उगाही बहुत कम होती थी। भूमि अथवा अनाज के दान के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता। समाज में कबीलाई बंधन शक्तिशाली थे। करों की उगाही अथवा भू-संपत्ति के आधार पर सामाजिक वर्ग अभी अस्तित्त्व में नहीं आए थे। इस काल की आर्थिक दशा इस प्रकार से थी-

(1) गाँवों की व्यवस्था

ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में रहते थे। ऋग्वेद में नगरों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। गाँव पास-पास होते थे। वन्य पशुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षा के लिए मिट्टी के घरों वाली बस्तियों की झाड़ियों अथवा अन्य कांटों आदि से किलेबंदी की जाती थी। अधिकांश घर बांस तथा लकड़ी के बने होते थे।

(2) कृषि

ऋग्वैदिक आर्यों का प्रधान व्यवसाय कृषि था। प्रत्येक परिवार का अलग खेत होता था परन्तु चरागाह सबका एक होता था। खेती हल से की जाती थी। ऋग्वेद के आरंभिक भाग में फाल के उल्लेख मिलते हैं। उनके फाल सम्भवतः लकड़ी के बने होते थे। ऋग्वैदिक लोग बुवाई, कटाई और मंडाई से परिचित थे। उन्हें विभिन्न ऋतुओं की भी अच्छी जानकारी थी। ये लोग प्रधानतः गेहूँ तथा जौ की खेती करते थे। इस काल के आर्य, फल तथा तरकारी भी पैदा करते थे।

(3) पशु-पालन

ऋग्वैदिक आर्यों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशु-पालन था। पशुओं में गाय का सर्वाधिक महत्त्व था, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयोगी होती थी। गाय को अध्न्या कहा गया है अर्थात् जो मारी न जाय। ऋग्वेद में गाय के बारे में आए बहुत सारे उल्लेखों से यही सिद्ध होता है कि आर्य पशुपालक थे। अधिकांश लड़ाइयां उन्होंने गायों के लिए लड़ी थीं।

ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का उपयोग हुआ हैं। जिसका अर्थ ‘गायों की खोज’ होता है। गाय को सबसे बड़ी सम्पत्ति समझा जाता था। बैलों से हल जोतने तथा गाड़ी खींचने के काम लिया जाता था। घोड़ों का प्रयोग रथों में किया जाता था। आर्यों द्वारा पाले जाने वाले अन्य पशु, भेड़, बकरी तथा कुत्ते थे। कुत्ते घरों तथा बस्तियों की रखवाली करते थे।

(4) पशुओं का शिकार

ऋग्वैदिक आर्य मांस खाते थे। इसलिए वन्य पशुओं का शिकार भी उनकी जीविका का साधन था। ये लोग धनुष-बाण तथा लोहे के भालों द्वारा सूअर, हरिण तथा भैंसों का शिकार करते थे और पक्षियों को जाल में फंसा कर पकड़ते थे। शेरों को चारों ओर से घेर कर मारा जाता था।

(5) मृद्भाण्ड

हरियाणा के भगवानपुरा से और पंजाब के तीन स्थलों से चित्रित धूसर मृदभांड और बाद के काल के हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। भगवानपुरा में मिली वस्तुओं का तिथि निर्धारण ई.पू.1600 से ई.पू.1000 तक किया गया है। ऋग्वेद की रचना इस काल में हो रही थी। इन चारों स्थानों का भौगोलिक क्षेत्र वही है जो ऋग्वेद में दर्शाया गया है।

यद्यपि इन चारों स्थलों पर चित्रित धूसर पात्र मिले हैं फिर भी यहाँ से न तो लौह-सामग्री और न ही अनाज मिले हैं। अतः हम चित्रित धूसर मृद्भांड की एक लौह-पूर्व अवस्था के बारे में सोच सकते हैं जो ऋग्वैदिक अवस्था की समकालिक है।

(6) दस्तकारी के कार्य

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ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार आदि शिल्पकारों के उल्लेख मिलते हैं। इनसे पता चलता है कि आर्य लोग इन शिल्पों से भली-भांति परिचित थे। तांबे अथवा कांसे के लिए प्रयुक्त अयस शब्द से ज्ञात होता है कि उन्हें धातुकर्म की जानकारी थी। जब वे उप-महाखंड के पश्चिमी भाग में बसे हुए थे तब वे सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की खानों से तांबा प्राप्त करते होंगे। ऋग्वैदिक-काल के बढ़ई रथ तथा गाड़ियाँ बनाते थे। ये लोग लकड़ी के प्याले भी बनाते थे और उन पर बहुत अच्छी नक्काशी करते थे। शिल्पी ताम्बे एवं कांसे के विभिन्न प्रकार के बर्तन, अस्त्र-शस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। सुनार, सोने-चांदी के आभूषण बनाते थे। चर्मकार लोग चमड़े की वस्तुएँ बनाते थे। सीना-पिरोना, चटाइयां बुनना, ऊनी तथा सूती कपड़े बनाना आदि भी जीविका के साधन थे। कुम्हार चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

(7) व्यापार

ऋग्वैदिक आर्यों की जीविका का एक साधन व्यापार भी था। ये लोग विदेशी तथा आन्तरिक दोनों प्रकार का व्यापार करते थे। प्रारम्भ में व्यापार वस्तु-विनिमय द्वारा होता था। बाद में गाय द्वारा मूल्य आंका जाने लगा और अन्त में सोने-चांदी से बनी मुद्राओं का प्रयोग होने लगा। इस काल में निष्क नामक मुद्रा का व्यवहार होने लगा। कपड़े, चमड़े तथा चद्दरें व्यापार की मुख्य वस्तुएँ होती थीं। माल ले जाने के लिए गाड़ियों तथा रथों का प्रयोग किया जाता था। नदियों को पार करने के लिए नावों का प्रयोग होता था।

(8) ऋण की प्रथा

ऋग्वैदिक-काल में ब्याज पर ऋण देने की प्रथा थी। वैश्य, साहूकार तथा महाजन यह कार्य करते थे और यह उनकी जीविका का प्रमुख साधन होता था। ऋण चुकाना एक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था और न चुकाने पर उसे निश्चित समय तक महाजन की सेवा करनी पड़ती थी।

ऋग्वैदिक सामाज में कलाओं का विकास

बौद्धिक परिपक्वता के कारण ऋग्वैदिक-काल के लोगों ने विभिन्न प्रकार की रचनात्मक कलाओं का विकास किया। वे सही अर्थों में कला-प्रेमी थे।

(1) काव्य कला

ऋग्वैदिक आर्य, काव्य-कला में बड़े कुशल थे। ऋग्वेद पद्य शैली में लिखा गया है। ऋग्वेद का अधिकांश काव्य धार्मिक गीति-काव्य है। इस काल की कविता में स्वाभाविकता तथा सौन्दर्य है। उषा की प्रशंसा में ऋषियों ने बड़ी भावुकता प्रकट की है।

(2) लेखन कला

यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक आर्य लेखन-कला से परिचित थे अथवा नहीं परन्तु डॉ. भण्डारकर आदि अनेक विद्वानों की धारणा है कि वे इस कला को जानते थे। उस काल के मृदभाण्डों पर बनी आकृतियां ब्राह्मी लिपि जैसी दिखती हैं।

(3) अन्य कलाएँ

ऋग्वैदिक आर्य अन्य कई कलाओं में प्रवीण थे। गृह निर्माण-कला में वे इतने निपुण थे कि सहस्र-स्तम्भ तथा सहस्र-द्वार के भवनों का निर्माण करते थे। ऋग्वैदिक आर्य कताई, बुनाई, रगांई, धातु-कला, संगीत कला, नृत्य कला एवं गायन कला में भी निपुण थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

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आर्यों का आर्थिक जीवन

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

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उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था की जानकारी उस काल के साहित्य से मिलती है। इस काल में आर्यों ने उन्नत राजनीतिक व्यवस्था विकसित कर ली थी।

ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद एवं ब्राह्मण ग्रंथों (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद) की रचना हुई। ऋग्वेद के बाद में लिखे गए, इन ग्रन्थों के रचना काल को उत्तर-वैदिक-काल कहते हैं। पी. वी. काणे के अनुसार उत्तर-वैदिक-कालीन ग्रंथ, उत्तरी गंगा की घाटी में लगभग ई.पू.1000-600 में रचे गए थे। ऋग्वैदिक तथा उत्तर-वैदिक-काल की सभ्यता एवं संस्कृति में पर्याप्त अन्तर है।

उत्तर-वैदिक सभ्यता स्थलों की पुरातात्त्विक खुदाइयों एवं अन्वेषण के परिणाम स्वरूप 500 बस्तियों के अवशेष मिले हैं। इन्हें चित्रित धूसर भाण्ड वाले स्थल कहते हैं क्योंकि इन स्थलों पर बसे हुए लोगों ने मिट्टी के चित्रित एवं भूरे कटोरों और थालियों का उपयोग किया। वे लोहे के औजारों का भी उपयोग करते थे। बाद के वैदिक ग्रंथों और चित्रित धूसर भाण्डों के लौह अवस्था वाले पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर हम ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के पूर्वार्द्ध के पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र, हरियाणा और राजस्थान के लोगों के जीवन के बारे में कुछ जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

उत्तर-वैदिक-कालीन बस्तियाँ

कृषि और विविध शिल्पों के कारण उत्तर-वैदिक-काल के लोग अब स्थायी जीवन बिताते थे। पुरातात्त्विक खुदाई तथा अन्वेषण से हमें उत्तर-वैदिक-काल की बस्तियों के बारे में कुछ जानकारी मिलती है। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थान न केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली (कुरु-पांचाल) में, अपितु पंजाब एवं हरियाणा के समीपवर्ती क्षेत्र मद्र और मत्स्य (राजस्थान) में भी मिले हैं। कुल मिलाकर ऐसे 500 स्थल मिले हैं जो प्रायः ऊपरी गंगा की घाटी में स्थित हैं।

इनमें से हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा और नोह जैसे चंद स्थलों की ही खुदाई हुई है। चूँकि यहाँ की बस्तियों के भौतिक अवशेष एक मीटर से तीन मीटर की ऊँचाई तक व्याप्त हैं, इसलिए अनुमान होता है कि यहाँ एक से तीन सदियों तक बसवाट रही। ये अधिकतर नई बस्तियाँ थीं। इनके पहले इन स्थानों पर बस्तियाँ नहीं थीं। लोग मिट्टी की ईटों के घरों में अथवा लकड़ी के खंभों पर आधारित टट्टर और लेप के घरों में रहते थे।

यद्यपि उनके घर घटिया प्रकार के थे परन्तु चूल्हों और अनाजों (चावल) के अवशेषों से पता चलता है कि चित्रित धूसर भांडों का उपयोग करने वाले उत्तर-वैदिक-कालीन लोग खेती करते थे और स्थायी जीवन बिता रहे थे। वे लोग लकड़ी के फालों वाले हल से खेत जोतते थे, इसलिए किसान अधिक पैदा नहीं कर पाते थे। इस समय का किसान, नगरों के उत्थान में अधिक योगदान करने में समर्थ नहीं था।

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तर-वैदिक-काल में आर्यों की राजनीतिक स्थिति में बड़ा परिवर्तन हो गया था। इस काल में राजन्य ने शेष तीन वर्णों पर अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। ऐतरेय ब्राह्मण में राजन्य के सापेक्ष, ब्राह्मण को जीविका-खोजी और दान ग्रहण करने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसे हटाया जा सकता था। वैश्य को दान देने वाला कहा गया है। राजन्य द्वारा उसका इच्छापूर्वक दमन किया जा सकता था। सबसे कठोर बातें शूद्रों के बारे में पढ़ने को मिलती हैं। उसे दूसरों का सेवक, दूसरों के आदेश पर काम करने वाला और दूसरों द्वारा मनमर्जी से पीटने योग्य कहा गया है।

(1.) शासन क्षेत्र में परिवर्तन

ऋग्वैदिक आर्यों की राज-सत्ता केवल सप्त-सिन्धु क्षेत्र तक सीमित थी, परन्तु उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में वे पंजाब से लेकर गंगा-यमुना के दोआब में स्थित समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गए थे। भरत और पुरु नामक दो प्रमुख कबीले एकत्र हुए और इस प्रकार कुरु-जन कहलाए। आरम्भ में ये लोग दोआब के सीमांत में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच के प्रदेश में बसे हुए थे परन्तु कुरुओं ने शीघ्र ही दिल्ली और दोआब के उत्तरी भाग पर अधिकार जमा लिया।

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इस क्षेत्र को कुरुदेश कहते हैं। शनैःशनैः ये लोग पंचालों से मिलते गए। वर्तमान बरेली, बदायूँ और फर्रूखाबाद जिलों में फैला हुआ, उस समय का पंचाल राज्य अपने दार्शनिक राजाओं और ब्राह्मण पुरोहितों के लिए प्रसिद्ध था। कुरु-पंचालों का दिल्ली और उत्तरी तथा मध्य दोआब पर अधिकार स्थापित हो गया। मेरठ जिले के हस्तिनापुर स्थान पर उन्होंने अपनी राजधानी स्थापित की। महाभारत युद्ध की दृष्टि से कुरु कबीले के इतिहास का बड़ा महत्त्व है, और यही युद्ध महाभारत की प्रमुख घटना है। समझा जाता है कि यह युद्ध ई.पू.950 के आसपास कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़ा गया था। ये दोनों ही कुरु जन के सदस्य थे। परिणामतः लगभग सम्पूर्ण कुरु कबीला नष्ट हो गया। कालान्तर में आर्यों ने दक्षिण-भारत में भी अपनी सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार आरम्भ किया। उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम चरण में, ई.पू.600 के आसपास, वैदिक लोग दोआब से पूर्व की ओर कोशल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और विदेह (उत्तरी बिहार) में फैल चुके थे। यद्यपि कोसल का रामकथा से बड़ा सम्बन्ध है, पर वैदिक साहित्य में राम का कोई उल्लेख नहीं मिलता। पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में वैदिक आर्यों को ऐसे लोगों का सामना करना पड़ा जो ताम्बे के औजारों और काले एवं लाल रंग के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे।

ये लोग यहाँ लगभग 1800 ई.पू. में बसे हुए थे। आर्यों को इस क्षेत्र में सम्भवतः ऐसे लोगों की बस्तियां भी जहां-तहां मिलीं जो काले और लाल बर्तनों का उपयोग करते थे। अनुमान होता है कि ये लोग एक मिश्रित संस्कृति वाले थे जिसे हड़प्पा कालीन संस्कृति नहीं कहा जा सकता। उत्तर-वैदिक लोगों के शत्रु जो भी रहे हों, उनका प्रत्यक्षतः किसी बड़े और सुसम्बद्ध क्षेत्र पर अधिकार नहीं था और उनकी संख्या उत्तरी गंगा की घाटी में बहुत अधिक नहीं थी, विस्तार के दूसरे चरण में भी उत्तर-वैदिक आर्यों की सफलता का कारण लोहे के औजारों और घोड़ों वाले रथों का उपयोग किया जाना था।

(2.) राजन्य की शक्तियों में वृद्धि

ऋग्वैदिक-काल में राज्य का आकार बहुत छोटा होता था परन्तु उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना की गई और राजन्य अर्थात् राजा पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गए। अब वीर विजयी राजन्य स्वयं को र्साभौम, एकराट् आदि उपाधियों से विभूषित करने लगे। राजन्य अपने प्रभाव में वृद्धि के लिए राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध आदि यज्ञ करने लगे। ये यज्ञ राजन्य की सार्वभौम सत्ता के सूचक होते थे।

समझा जाता था कि राजसूय यज्ञों से राजाओं को दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। अश्वमेध यज्ञ में जितने क्षेत्र में राजा का घोड़ा निर्बाध विचरण करता था उतने क्षेत्र पर उस राजा का अधिकार हो जाता था। वाजपेय यज्ञ में अपने सगोत्रीय बंधुओं के साथ रथों की दौड़़ होती थी। इन सब आयोजनों और अनुष्ठानों से लोग प्रभावित होते थे। साथ ही राजा की शक्ति और प्रभाव भी बढ़ता था। अब राजन्य को देवता का स्वरूप समझा जाने लगा। राजन्य की आज्ञा का पालन करना आवश्यक था। यद्यपि राजन्य का पद अब भी वंशानुगत था परन्तु निर्वाचन-प्रणाली भी आरम्भ हो गई थी। निर्वाचन राजवंश तक ही सीमित था।

(3.) जनपद एवं राष्ट्र की धारणा का उदय

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में राज्य के विस्तार के साथ राजन्य अथवा राजा की शक्ति बढ़ती गई। कबीलाई अधिकार प्रदेश-विशेष तक सीमित थे। राजन्य का शासन कई कबीलों पर होता था परन्तु आर्यों के प्रमुख कबीलों ने उन प्रदेशों पर भी अधिकार जमा लिया जहाँ दूसरे कबीले बसे हुए थे। आरम्भ में प्रत्येक प्रदेश को वहाँ बसे हुए कबीले का नाम दिया गया था, पर अंत में जनपद नाम, प्रदेश नाम के रूप में रूढ़ हो गया। आरम्भ में पंचाल एक कबीले का नाम था परन्तु बाद में यह एक प्रदेश का नाम हो गया। राष्ट्र शब्द, जो प्रदेश का सूचक है, पहली बार इसी काल में प्रकट हुआ।

(4.) सीमित राजतंत्र

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में राजन्य ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अधिक स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश हो गया था परन्तु राजन्य पर पुरोहित का नियन्त्रण होता था। पुरोहित सोम को अपना राजन्य मानता था और वह राजन्य की समस्त आज्ञाएँ मानने के लिए बाध्य नहीं था।

कभी-कभी पुरोहित, राजन्य के विरुद्ध विद्रोह भी कर देता था। राजन्य को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह पुरोहित के साथ कभी भी धोखा नहीं करेगा। राज्य के नियमों की पालना करना तथा ब्राह्मणों की रक्षा करना राजन्य का परम धर्म होता था। राजन्य पर धर्म का भी बहुत बड़ा नियन्त्रण रहता था। अतः उसे धर्मानुकूल शासन करना होता था। 

(5.) पदाधिकारियों में वृद्धि

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था में ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा पदाधिकारियों की संख्या तथा उनके अधिकारों में बड़ी वृद्धि हो गयी। ऋग्वैदिक-काल में केवल तीन पदाधिकरी थे- पुरोहित, सेनानी तथा ग्रामणी परन्तु अब स्थपति, निषाद-स्थपति, शतपति आदि नये पदाधिकारी भी उत्पन्न हो गए थे।

स्थपति सम्भवतः राज्य के एक भाग का शासक होता था और उसे शासन के साथ-साथ न्यायिक कार्य भी करने होते थे। निषाद-स्थपति सम्भवतः उस पदाधिकरी को कहते थे जो उन आदिवासियों पर शासन करता था, जिन पर आर्यों ने विजय प्राप्त कर ली थी।

शतपति नामक पदाधिकरी के अनुशासन में सम्भवतः सौ गाँव रहते थे। अब पुराने पदाधिकारियों के अधिकारों में भी वृद्धि हो गयी थी। राजन्य अपने सिंहासन से उतर कर पुरोहित को प्रणाम करता था। अब राजन्य रण-क्षेत्र में कम ही जाया करता था, इसलिए सेनानी रण-क्षेत्र में सेना का संचालन करता था। फलतः उसके प्रभाव में भी वृद्धि हो गयी थी।

उत्तर-वैदिक-काल में भी राजन्य की कोई स्थायी सेना नहीं होती थी। युद्ध के अवसर पर जन से सैनिक टुकड़ियां एकत्र की जाती थीं। युद्ध में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अनुष्ठान यह था कि राजन्य को अपनी प्रजा (विश्) के साथ एक पात्र में भोजन करना पड़ता था। ग्रामणी के अधिकार तथा प्रभाव में तो इतनी वृद्धि हो गयी थी कि उसे राजकृत अर्थात् राजन्य को बनाने वाला कहने लगे थे। राजकाज चलाने में राजमहिषी भी राजन्य की सहायता करती थी।

(6.) सभा तथा समिति के अधिकारों में कमी

यद्यपि सभा तथा समिति का अस्तित्त्व उत्तर-वैदिक-काल में भी बना रहा परन्तु अब उनके अधिकार तथा प्रभाव में बड़ी कमी हो गयी। समिति बड़ी संस्था थी और सभा छोटी। अब राज्य-विस्तार बढ़ जाने के कारण समिति का जल्दी-जल्दी बुलाया जाना सम्भव नहीं था। इसलिए राजन्य उसके परामर्श की उपेक्षा करने लगा और अधिकांश कार्य अपने निर्णय से करने लगा। सभा का महत्त्व भी घट गया।

(7.) न्याय व्यवस्था में सुधार

उत्तर-वैदिक-कालीन न्याय-व्यवस्था ऋग्वैदिक-काल की न्याय-व्यवस्था की अपेक्षा अधिक सुदृढ़़ तथा व्यापक हो गई थी। अब राजन्य न्यायिक कार्य में पहले से अधिक रुचि लेने लगा परन्तु वह अपने न्यायिक अधिकारों को प्रायः अपने पदाधिकारियों को दे देता था।

गाँवों के झगड़ों का निर्णय ग्राम्यवादिन करता था जो गाँव का न्यायाधीश होता था। ब्राह्मण की हत्या बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था। ब्राह्मण को प्राण-दण्ड नहीं दिया जाता था। सोने की चोरी तथा सुरापान बड़े अपराध समझे जाते थे। दीवानी मुकदमों का निर्णय प्रायः पंचों द्वारा किया जाता था।

(8.) जनपद राज्यों का आरम्भ

उत्तर-वैदिक-काल में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जनपद राज्यों का आरम्भ हुआ। न केवल गोधन की प्राप्ति के लिए, अपितु भूमि पर अधिकार के लिए भी युद्ध होने लगे। कौरवों और पांडवों के बीच लड़ा गया महाभारत युद्ध सम्भवतः इसी काल में हुआ।

(9.) राजन्य को भेंट व्यवस्था

वैदिक-काल का प्रधानतः पशुपालक समाज, अब कृषक बन गया। अब वह अपने राजन्य को प्रायः भेंट देने में समर्थ था। कृषकों के बल पर राजाओं की शक्ति बढ़ी और उन्होंने उन पुरोहितों को खूब दान-दक्षिणा दी जिन्होंने वैश्यों अर्थात् सामान्य प्रजा के विरोध में अपने आश्रयदाताओं की सहायता की। शूद्रों के छोटे समुदाय का काम सेवा करना था।

(10.) कर व्यवस्था

इस काल में करों की वसूली और दक्षिणा आम बात हो गई। इन्हें सम्भवतः संगृहित्री नामक अधिकारी जमा करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

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उत्तरवैदिक समाज

नारद संहिता, गार्गी संहिता और वृहत संहिता ज्योतिष साहित्य के ऐसे ग्रन्थ हैं जिनसे उत्तरवैदिक समाज की जानकारी प्राप्त होती है। कल्पसूत्र साहित्य में विविध सामाजिक और धार्मिक विधि-विधानों तथा नियम- निर्देशों का वर्णन है। यद्यपि उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों के गृह-निर्माण, वेश-भूषा, खान-पान, मनोरंजन आदि में विशेष परिवर्तन नहीं हुए थे परन्तु सामाजिक जीवन के कई क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन हुए।

उत्तरवैदिक-कालीन आर्यों की सामाजिक दशा

(1.) पिता की शक्तियों में वृद्धि

उत्तरवैदिक समाज में, परिवार में पिता की शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई। अब पिता अपने पुत्र को उत्तराधिकार से वंचित कर सकता था। राज-परिवारों में ज्येष्ठाधिकार को अधिकाधिक महत्त्व दिया जाने लगा। राज-परिवारों के अतिरिक्त अन्य परिवारों में परिवार की संयुक्त सम्पत्ति पर पिता के समस्त पुत्रों का समान अधिकार होता था। कभी-कभी पिता अपने जीवन-काल में ही अपने पुत्रों में परिवार की संयुक्त सम्पत्ति का विभाजन कर देता था और फिर उन्हें अपना अलग परिवार बसाने की अनुमति दे-देता था। इस काल में पूर्व-पुरुषों की पूजा होने लगी।

(2.) उत्तरवैदिक समाज में गोत्र व्यवस्था

उत्तर-वैदिक-काल में गोत्र व्यवस्था दृढ़ हुई। गोत्र शब्द का अर्थ है गोष्ठ अथवा वह स्थान जहाँ समस्त कुल के गोधन को एक साथ रखा जाता था परन्तु बाद में इस शब्द का अर्थ हो गया- एक मूल पुरुष के वंशज। गोत्रीय बहिर्विवाह की प्रथा आरम्भ हो गई। एक ही गोत्र अथवा पूर्व-पुरुष वाले समुदाय के सदस्यों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लग गया।

(3.) नगरों का प्रादुर्भाव

ऋग्वैदिक आर्य गाँवों में निवास करते थे। ऋग्वेद में नगर शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है परन्तु जब उत्तर-वैदिक आर्य गंगा-यमुना के उपजाऊ मैदानों में आ गए तब उन्होंने बड़े-बड़े नगरों को बसाया तथा नगरों में निवास करना आरम्भ किया। अब यही नगर, राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन के केन्द्र बन गए। नगरों की वास्तविक शुरूआत का आभास उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम दौर में मिलता है। हस्तिनापुर और कौशाम्बी को उत्तर-वैदिक-काल के अंतिम दौर के आदिम पद्धति के नगर माना जा सकता है। इन्हें प्राक्-नगरीय स्थल कहा जा सकता है।

(4.) खान-पान

उत्तरवैदिक समाज के आर्यों का भोजन ऋग्वैदिक-काल जैसा ही था। उसमें विशेष अन्तर नहीं आया था। अन्न, दूध, वनस्पति से बने हुए पदार्थ एवं माँस उनके भोजन के मुख्य अंग थे। अन्न में गेहूँ, जौ, चावल मुख्य थे। चावल की खेती अधिक की जाने लगी थी। दूध से दही, मक्खन और घी तैयार किया जाता था। दूध में दूसरी वस्तुओं को पकाकर कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते थे।

 वैदिक साहित्य में ओदन, क्षीरोदन तथा तिलोदन आदि शब्दों का उल्लेख अनेक बार हुआ है। दूध में चावलों को पकाकर ‘क्षीरोदन’ अर्थात् खीर और तिलों को पकाकर ‘तिलोदन’ बनाई जाती थी। ऋग्वैदिक-काल की भाँति इस युग में भी साग-सब्जियों तथा फलों का सेवन प्रचुरता से होता था। सामान्यतः भेड़, बकरा-बकरी, बैल और कभी-कभी घोड़े का माँस खाया जाता था। शिकार में मारे गए पशु-पक्षियों का मांस भी खाया जाता था किंतु सामान्यतः मांस-भक्षण को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था, ब्राह्मणों के लिए इसका निषेध हो गया था।

अथर्ववेद के एक सूक्त में मांस-भक्षण तथा सुरापान को पाप बताया गया है। अतः स्पष्ट है कि अंहिसा के विचार को श्रेष्ठ समझा जाता था। अब सोम के स्थान पर मासर, पूतिका, अर्जुनानी आदि अन्य पेय पदार्थों का प्रयोग होने लगा था। समाज के निम्न वर्गों में सुरापान बढ़ रहा था।

(5.) स्त्रियों की दशा में परिवर्तन

उत्तरवैदिक समाज में स्त्रियों की दशा पहले से बिगड़ गई। राजवंशों तथा सम्पन्न परिवारों में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित हो गई थी। इसलिए घरों में स्त्रियों का जीवन कलहपूर्ण हो गया। कन्याओं को दुःख का कारण समझा जाने लगा। अथर्ववेद में पुत्री के जन्म पर खिन्नता का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर पुत्री के लिए ‘कृषण’ शब्द का उल्लेख किया गया है।

‘गोमिल-गृह सूत्र’ में कन्याओं द्वारा यज्ञोपतीत धारण करने का उल्लेख मिलता है। यज्ञोपवीत विधाध्ययन का चिह्न है। स्पष्ट है कि इस युग में भी स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। उपनिषदों में कुछ विदुषी स्त्रियों का उल्लेख है। जनक की राजसभा में गार्गी ने याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ किया था। गन्धर्व-गृहीता नामक महिला परम विदुषी तथा भाषण कला में निपुण थी। मैत्रेयी जैसी विदुषी महिला भी इसी युग में हुई। यज्ञादि धार्मिक अवसरों और सार्वजनिक सभाओं में स्त्रियाँ अब भी भाग लेती थीं।

गोद लेने की प्रथा का विकास हो गया था। गोद के लिए भाई की सन्तान को प्राथमिकता दी जाती थी। कुछ कन्याएँ अविवाहित रूप में आजीवन अपने पति के परिवार में रहती थी। यदा-कदा कन्याओं का विक्रय होता था और दहेज-प्रथा प्रचलित हो गई थी। विधवा स्त्री के लिए नियोग की प्रथा अब भी प्रचलित थी। विधवा स्त्री को विवाह करने का अधिकार था। सती-प्रथा का उल्लेख इस युग में भी नहीं मिलता है। पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं हुआ था।

(6.) उत्तरवैदिक समाज में वैवाहिक सम्बन्ध में जटिलता

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उत्तरवैदिक समाज में विवाह को पवित्र एवं आवश्यक संस्कार समझा जाता था किंतु विवाह सम्बन्धी नियम कठोर हो गए थे। अविवाहित पुरुष को यज्ञ करने का अधिकार नहीं था। यज्ञादि के लिए पुत्र का होना आवश्यक था और पुत्र-प्राप्ति के लिए विवाह आवश्यक था। ‘सगोत्री विवाह’ अच्छा नहीं समझा जाता था। भिन्न गोत्र में विवाह करना अच्छा समझा जाता था। अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि विधवा-विवाह तथा बहु-विवाह प्रथाओं का प्रचलन हो गया था। मनु की दस पत्नियाँ थीं। याज्ञवल्क्य ऋषि के मैत्रेयी और कात्यायनी नामक दो पत्नियाँ थी। ऐतरेय ब्राह्मण में हरिश्चन्द्र नामक व्यक्ति की 100 पत्नियों का उल्लेख है परन्तु बहु-विवाह के ये उदाहरण धनी एवं राजपरिवारों तक ही सीमित थे। साधारण लोग केवल एक विवाह करते थे।  ‘एक पुरुष-एक पत्नी’, यही सामान्य व्यवस्था थी। एक स्त्री के एक से अधिक पति नहीं होते थे। विवाह युवावस्था में किया जाता था तथा बाल-विवाह का प्रचलन नहीं था। सपिण्ड, सगोत्र और सप्रवर विवाहों पर प्रतिबन्ध लगने लगा था और सूत्रकाल के आते-आते इस प्रकार के विवाहों पर स्पष्ट रूप से निषेध कर दिया गया। विवाह सामान्यतः सजातीय होते थे। उच्च-वर्ण की कन्या का विवाह निम्न-वर्ण में नहीं होता था।

उत्तरवैदिक साहित्य में अन्तर्जातीय विवाहों के उल्लेख भी मिलते हैं। तैतिरीय संहिता में आर्य पुरुष और शूद्र कन्या के विवाह का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण में ऋषि च्यवन और राजकन्या सुकन्या के विवाह का उल्लेख है। इस प्रकार के अन्तर्जातीय विवाहों के बारे में विद्वानों की मान्यता है कि साधारणतः श्रेष्ठ जाति के पुरुष निम्न जाति की स्त्रियों के साथ विवाह कर सकते थे। अर्थात् अनुलोम विवाह होते थे परन्तु प्रतिलोम विवाह वर्जित थे।

स्त्री, पुरुष की सहधर्मिणी थी तथा घर एवं समाज में स्त्री का बहुत सम्मान था। शतपथ ब्राह्मण में उसे पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है। धर्म-सूत्रों में तो स्त्रियों के प्रति उदार रुख अपनाया गया है। उदाहरणार्थ, वशिष्ठ धर्मसूत्र में लिखा है कि चाहे पत्नी दोषी हो, झगड़ालू हो, घर छोड़कर चली गई हो, उसके साथ बलात्कार हुआ हो, उसे त्यागा नहीं जाएगा।

धर्मसूत्रों में पत्नी को त्यागने वाले पति के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है। आपस्तम्ब सूत्र में लिखा है कि जिस पति ने अन्याय से अपनी पत्नी का परित्याग किया हो, वह गधे का चमड़ा ओढकर प्रतिदिन सात गृहों में यह कहते हुए भिक्षा माँगे कि उस पुरुष को भिक्षा प्रदान करो, जिसने अपनी पत्नी को त्याग दिया है।

इस युग में माता के पद को बहुत उँचा और पवित्र समझा जाता था। वशिष्ठ सूत्र में माता का स्थान उपाध्याय, आचार्य और पिता से श्रेष्ठ माना गया है। इस प्रकार इस युग में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी। परन्तु कुछ विद्वानों का मानना है कि उत्तरवैदिक युग के अन्तिम चरण में स्त्रियों की स्थिति में काफी गिरावट आ गई थी। कन्याओं को बेचने तथा दहेज लेने के उल्लेख मिलते हैं।

ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि एक अच्छी स्त्री वह है जो उत्तर नहीं देती। शतपथ ब्राह्मण कहता है कि पत्नी को पति के पहले भोजन नहीं करना चाहिए। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को दुःख का कारण माना गया है। मैत्रायनी संहिता में स्त्री को जुआ और शराब की भाँति पुरुष का दोष माना गया है।

(7.) उत्तरवैदिक समाज में वर्ण-व्यवस्था में जटिलता

ऋग्वैदिक युग के रथेष्ठ और राजन्य उत्तर-वैदिक-काल में क्षत्रिय कहलाने लगे। यज्ञकर्ता, ब्रह्मवादी एवं तत्त्वचिन्तक, ब्राह्मण कहलाते थे। कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य करने वाले लोगों को वैश्य कहा जाता था। अनार्य लोग शूद्र कहलाते थे। उत्तर-वैदिक-कालीन ग्रंथों में प्रथम तीन वर्णों को उच्च और शूद्रों को निम्न समझा जाता था।

तीनों उच्च वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों का उपनयन संस्कार होता था। चौथे वर्ण का उपनयन संस्कार नहीं हो सकता था। ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ गई थी। ब्राह्मणों को देवताओं का प्रिय माना जाने लगा। इस युग में सामाजिक प्रभुता तथा प्रतिष्ठा के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों में प्रतिस्पर्धा होती थी। इस कारण कुछ क्षत्रियों ने विशिष्ट ज्ञान अर्जित किया।

उनकी विद्वता से प्रभावित होकर ब्राह्मण भी उन क्षत्रियों के पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाने लगे। श्वेतकेतु आरुणेय ने जैवलि नामक क्षत्रिय से और गार्ग्य नामक ब्राह्मण ने राजा अजातशुत्र से शिक्षा प्राप्त की थी।

ऋग्वैदिक-काल में वैश्य शब्द का उल्लेख नहीं है किंतु उत्तरवैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि वैश्यों का सामाजिक स्तर ब्राह्मणों तथा क्षत्रिय से निम्न था। चूँकि यह वर्ण विविध व्यवसायों के द्वारा राष्ट्र की समृद्धि के लिए प्रयत्नशील था, अतः इसकी उपेक्षा करना सम्भव नहीं था। इसलिए वैश्यों को भी विद्या की प्राप्ति तथा यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों को द्विज कहा जाता था।

 शूद्रों पर कई तरह के प्रतिबंध थे किंतु राज्याभिषेक से सम्बन्धित ऐसे कई सार्वजनिक अनुष्ठान थे जिनमें शूद्र, सम्भवतः मूल कबीले के सदस्यों की हैसियत से भाग लेते थे। कुछ विशेष वर्गों के शिल्पियों को, जैसे रथकारों को, समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त था और उन्हें उपनयन संस्कार के अधिकारियों की सूची में सम्मिलित किया गया था।

उत्तरवैदिक समाज में वर्ण-व्यवस्था जाति-प्रथा का रूप लेती जा रही थी। कार्य अथवा व्यवसाय के स्थान पर जन्म, जाति का आधार होने लगा था। उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल की चार जातियों के अतिरिक्त दो और जातियाँ बन गयी थीं। इनमें से एक निषाद कहलाती थी और दूसरी व्रात्य। निषाद लोग अनार्य थे। सम्भवतः ये लोग भील जाति के थे। व्रात्य लोग सम्भवतः आर्य एवं अनार्य रक्त-मिश्रण से उत्पन्न हुए थे। विभिन्न व्यवसायों के अनुसार बढ़ई, लोहार, मोची आदि उपजातियाँ बनने लगी थीं और अन्तर्जातीय-विवाह को घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा था।

(8.) उत्तरवैदिक समाज में आश्रम-व्यवस्था की दृढ़ता

ऋग्वेद में आश्रम व्यवस्था  की जानकारी नहीं मिलती। उत्तरवैदिक-काल के ग्रन्थों में केवल तीन आश्रमों- (1.) ब्रह्मचर्य (2.) गृहस्थ (3.) वानप्रस्थ आश्रम की जानकारी मिलती है, अंतिम अथवा चौथे आश्रम की स्थापना स्पष्ट रूप से नहीं हुई थी। सूत्र-ग्रन्थों में चारों आश्रमों की जानकारी मिलती है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। आश्रम व्यवस्था केवल द्विज जातियों के लिए थी। शूद्रों के लिए एकमात्र गृहस्थ आश्रम ही बताया गया था।

(9.) वंशानुगत उद्योग-धन्धे

अब व्यवसाय वंशानुगत हो गया था और एक परिवार के लोग एक ही व्यवसाय करने लगे थे। यही कारण था कि उपजातियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

(10.) शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि

वैदिक यज्ञों में वृद्धि हो जाने के कारण शिक्षा के महत्त्व में वृद्धि हो गई। यद्यपि शिक्षा का मुख्य विषय वेदों का अध्ययन ही था परन्तु वैदिक मन्त्रों के साथ-साथ विज्ञान, गणित, भाषा, युद्ध-विद्या आदि की भी शिक्षा दी जाने लगी। विद्यार्थी, गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करता था और ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करता था। शिक्षा समाप्त होने पर वह गुरु को दक्षिणा देकर घर आता था और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

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उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म ऋग्वैदिक काल के धर्म से थोड़ा अधिक जटिल था। उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म मुख्यतः विभिन्न प्रकार के यज्ञों की अवधारणा पर आधारित था।

ऋग्वैदिक-काल का धर्म, सरल तथा आडम्बरहीन था परन्तु उत्तर-वैदिक काल का धर्म जटिल तथा आडम्बरमय हो गया। इस काल में उत्तरी दोआब में ब्रह्माण धर्म के प्रभाव के अंतर्गत आर्य संस्कृति का विकास हुआ। अनुमान होता है कि सम्पूर्ण उत्तर-वैदिक साहित्य का संकलन कुरु-पांचाल प्रदेश में हुआ। यज्ञकर्म और इससे सम्बन्धित अनुष्ठान और विधियां इस संस्कृति की मेरूदंड थीं।

(1.) ब्राह्मणों की प्रधानता

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म ब्राह्मणों की प्रधानता पर आधारित था। इस काल में उनका महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना इसी काल में हुई। इन ग्रन्थों के रचयिता ब्राह्मण थे और इनका सम्बन्ध भी ब्राह्मणों से ही था। वेदों तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के सच्चे ज्ञान का अधिकारी ब्राह्मणों को ही समझा जाता था। ब्राह्मण ही यज्ञ करता और कराता था, इसलिए उसका आदर-सम्मान भी अधिक था।

इस काल में ब्राह्मण का स्थान इतना ऊँचा हो गया था कि वह भू-सुर, भू-देव आदि नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। यज्ञों के प्रसार के कारण ब्राह्मणों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई थी। आरम्भ में पुरोहितों के सोलह वर्गों में से ब्राह्मण एक वर्ग मात्र था, परन्तु शनैः शनैः इन्होंने दूसरे पुरोहित-वर्गों को पछाड़ दिया और ये सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वर्ग बन गए। ये अपने और अपने यजमानों के लिए पूजा-पाठ और यज्ञ करते थे।

साथ ही, कृषि कर्म से सम्बन्धित समारोहों का आयोजन भी करते थे। ये अपने आश्रयदाता राजा के लिए युद्ध में सफलता की कामना करते थे और बदले में राजा की ओर से दान-दक्षिणा तथा सुरक्षा का वचन मिलता था। उच्चाधिकार के लिए ब्राह्मणों का कभी-कभी योद्धा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रियों से संघर्ष भी होता था परन्तु जब इन दो उच्च वर्णों का निम्न वर्णों से मुकाबला होता था तो ये आपसी मतभेदों को भुला देते थे। उत्तर-वैदिक-काल के अंत में इस बात पर बल दिया जाने लगा कि इन दो उच्च वर्णों को परस्पर सहयोग करके शेष समाज पर शासन करना चाहिए।

(2.) यज्ञ के महत्त्व में वृद्धि

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म यज्ञों की प्रधानता पर आधारित था। इस युग में यज्ञों के महत्त्व में इतनी अधिक वृद्धि हो गई थी कि इसे यज्ञों का युग कहा जाना चाहिए। इस काल में रचा जाने वाला यजुर्वेद, यज्ञ प्रधान ग्रन्थ है। उसमें यज्ञों के विधान की विस्तृत विवेचना की गई है। यज्ञों को करने में भी सरलता न रह गई थी। गृहस्थ स्वयं यज्ञ नहीं कर सकता था वरन् उसे याज्ञिकों की आवश्यकता पड़ती थी। यज्ञ में समय भी अधिक लगता था।

बहुत से यज्ञ वर्ष भर चलते थे और उनमें बहुत अधिक धन व्यय करना पड़ता था। राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ केवल राजा ही कर सकते थे। इस कारण सर्वसाधारण के लिए यज्ञ करवाना कठिन कार्य हो गया। यज्ञों का आयोजन सामूहिक रूप से और निजी रूप से भी होता था। सामूहिक यज्ञों में राजन्य और उस जन-समुदाय के समस्त सदस्य भाग लेते थे।

निजी यज्ञ अलग-अलग लोगों द्वारा अपने-अपने घरों में आयोजित किए जाते थे, क्योंकि इस काल में वैदिक लोग स्थायी जीवन बिताते थे और उनके अपने सुव्यवस्थित कुटुम्ब थे। अग्नि को व्यक्तिगत रूप से आहुति दी जाती थी और ऐसी प्रत्येक क्रिया एक अनुष्ठान अथवा यज्ञ का रूप धारण कर लेती थी।

(3.) विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रारम्भ

उत्तर-वैदिक-काल में पूरी आर्य संस्कृति ही यज्ञमय दिखाई देती है। शतपथ ब्राह्मण कहता है– ‘ऋक् पृथ्वी है, यजुष् अन्तरक्षि है और साम द्युलोक है, अतः इनमें विहित उपचारों के द्वारा अर्थात् अग्नि, इन्द्र, और सूर्य के आह्वान द्वारा मनुष्य इन तीनों लोकों को जीत लेता है।’

भौतिक यज्ञ करने से मनुष्य विश्व की शक्तियों का आह्वान करके उन्हें अपने में धारण करता है। अतः इस युग में विभिन्न उद्देश्यों को लेकर विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विधान हुआ।

दैनिक यज्ञ

प्रत्येक परिवार में प्रतिदिन पाँच महायज्ञ होते थे-

(अ) देवयज्ञ

इस यज्ञ में अग्नि को भोजन, घी, दूध, दही की आहुति दी जाती है।

(ब) भूतयज्ञ

इस यज्ञ में प्रजापति, काम, विश्वैदेवी तथा पृथ्वी, जल, वायु एवं आकाश नामक चारों तत्त्वों को भोजन की बलि दी जाती है।

(स) पितृयज्ञ

इसमें पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर भोजन एवं जल फेंका जाता है।

(द) ब्रह्मयज्ञ

इसमें वैदिक पाठों का स्वाध्याय करना पड़ता है।

(य) मनुष्य यज्ञ

इसमें स्वयं भोजन करने से पहले किसी अतिथि को भोजन कराया जाता है।

अग्निहोत्र

इन पांच यज्ञों के साथ-साथ व्यक्ति को प्रतिदिन प्रातः एवं सायंकाल में ‘अग्निहोत्र’ करना होता था जिसके अंतर्गत सूर्योदय से पहले सूर्य और प्रजापति को और सूर्यास्त के बाद अग्नि और प्रजापति को जौ और चावल की आहुति दी जाती थी।

मासिक यज्ञ

दैनिक यज्ञों के साथ-साथ प्रत्येक मास में कुछ निश्चित यज्ञों को करने का प्रावधान किया गया था। महीने में दो बार, प्रतिपदा और पूर्णिमा को ‘दर्शपूर्णमासेष्टि’ की जाती है, इनमें क्रमशः अग्नि और इन्द्र तथा अग्नि और सोम को ‘पुरोडाश’ दिया जाता था। उत्तरवैदिक आर्यों के अनुसार अग्नि तीन प्रकार की होती है- गार्हपत्य, दक्षिण और आह्वनीय। गार्हपत्य अग्नि की वेदी गोल होती है। दक्षिण-अग्नि की वेदी अर्द्धवृत्त के आकार की होती है। आह्वनीय अग्नि की वेदी चौकोर होती है।

वार्षिक यज्ञ

वर्ष में तीन बार बसन्त ऋतु, वर्षा ऋतु और शरद् ऋतु के आरम्भ में क्रमशः ‘वैश्वदेव’, ‘वरुणप्रधान’ और ‘साकमेध’ यज्ञ किए जाते थे। पहले में अग्नि, सोम सविता, सरस्वती और पूषा के लिए पाँच तर्पण किए जाते थे और इसके बाद मरुतों को पुरोडाश, विश्वदेवों को दूध और द्यावा एवं पृथ्वी को पुराडोश दिया जाता था।

दूसरे अर्थात् वरुण-प्रधान यज्ञ में आटे से बनी मेण्ढे और भेड़ की मूर्तियाँ दूध के साथ वरुण और मरुतों को भेंट की जाती थीं। वर्षा के लिए करीर के फलों की बलि दी जाती थी। इसके बाद हल के दो भागों की पूजा होती थी। गृह उपचारों में श्रावण पूर्णिमा को विष्णु, वर्षा ऋतु और श्रावण के देवता को पकवान चढ़ाया जाता था।

मार्ग-शीर्ष की पूर्णिमा को आग्रहायणी पर्व मनाया जाता था। इस अवसर पर घरों की सफाई व सफेदी की जाती थी। शरद या वसन्त में पशुधन की वृद्धि के लिए शुलगव यज्ञ किया जाता था जिसमें रुद्र को बैल की बलि दी जाती थी।

सोमयज्ञ: वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। इसे धनी व्यक्ति करते थे। यह प्रायः वसन्त में नए वर्ष के आरम्भ में किया जाता था। इसे करने से पहले 16 याज्ञिक नियुक्त किए जाते थे जो यजमान और उसकी पत्नी को दीक्षित करते थे। फिर सोम की बूँटी गाड़ी में भर कर लाई जाती थी। पहले दिन गर्म दूध की आहुति होती थी। दूसरे दिन सोम को वेदी पर लाकर सिलबटे से पीसा और छन्ने से छाना जाता था। फिर इसे कलशों में भरकर दूध में मिलाया जाता था और कटोरों में देवताओं को भेट किया जाता था।

प्रायः दिन में तीन बार सोम की स्तुति होती था। तीसरे दिन अग्नि और सोम को बलि दी जाती थी और अन्त में यजमान अवभृव नामक स्नान करता था। सोमयज्ञ भी सात प्रकार के थे। इनमें ‘वाजपेय यज्ञ’ शक्ति प्राप्त करने के लिए किये जाते थे। इसमें रथों की दौड़़ होती थी। ‘राजसूय यज्ञ’ और ‘अश्वमेध यज्ञ’ राजाओं के लिए थे तथा लम्बे चलते थे। कुछ यज्ञों में पशु-बलि दी जाती थी किन्तु पशुबलि को सामान्यतः अच्छा नहीं समझा जाता था। पशुबलि के समय लोग मुँह दूसरी ओर फेर लेते थे और इस अपराध के लिए देवताओं से क्षमा माँगते थे।

(4.) यज्ञों में बलि का चलन

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म न केवल यज्ञों की प्रधानता पर आधारित था अपितु इस काल में यज्ञों में बलिप्रथा भी आरम्भ हो गई थी। ऋग्वेद काल में यज्ञ में केवल फल तथा दूध की बलि दी जाती थी परन्तु अब यज्ञ में पशु तथा सोम की बलि का महत्त्व हो गया। बड़ी-बड़ी बलियों और यज्ञों के अवसर पर राजाओं की ओर से समाज के समस्त वर्गों के लोगों को जिमाया जाता था। ऐसा नहीं था कि सभी लोग यज्ञों में बलि करते थे। ऐसा केवल क्षत्रिय राजाओं द्वारा किए जाने वाले कुछ अनुष्ठानों ही किया जाता था। इस काल में भी मांसाहार को बहुत बुरा माना जाता था।

(5.) याज्ञिक वर्ग की उत्पत्ति

यज्ञों की संख्या तथा महत्त्व में वृद्धि हो जाने तथा उनमें जटिलता आ जाने से ब्राह्मणों में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो गया जो यज्ञों का विशेषज्ञ होता था। इस वर्ग का एकमात्र व्यवसाय अपने यजमान के यहाँ यज्ञ कराना तथा उससे यज्ञ-शुल्क एवं दान प्राप्त करना हो गया। ब्राह्मण उन सोलह प्रकार के पुरोहितों में से एक थे जो यज्ञों का नियोजन करते थे।

समस्त पुरोहितों को उदारतापूर्वक दान-दक्षिणा दी जाती थी। यज्ञों के अवसर पर जो मंत्र पढ़े जाते थे, उनका उच्चारण यज्ञकर्ता को बड़ी सावधानी से करना होता था। यज्ञकर्ता को यजमान कहते थे। यज्ञ की सफलता यज्ञ के अवसर पर उच्चारित चमत्कारिक शक्ति वाले शब्दों पर निर्भर करती थी। वैदिक आर्यों द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठान दूसरे हिन्द-यूरोपीय लोगों में भी देखने को मिलते हैं परन्तु अनेक अनुष्ठानों का विकास भारत भूमि में हुआ।

यज्ञ विधियों का आविष्कार, संयोजन एवं विकास ब्राह्मण पुरोहितों ने किया। उन्होंने बहुत सारे अनुष्ठानों का आविष्कार किया, इनमें से अनेक अनुष्ठान आर्येतर प्रजाओं से लिए गए थे। उत्तरवैदिक साहित्य में मिलने वाले उल्लेखों के अनुसार राजसूय यज्ञ करने वाले प्रधान पुरोहित को 2,40,000 गायें दक्षिणा के रूप में दी जाती थीं।

पुरोहितों को यज्ञों में, गायों के साथ-साथ सोना, कपड़ा और घोड़े भी दिए जाते थे। यद्यपि पुरोहित दक्षिणा के रूप में कभी-कभी भूमि भी मांगते थे, तथापि यज्ञ की दक्षिणा के रूप भूमि-दान की प्रथा उत्तर-वैदिक-काल में भली-भाँति स्थापित नहीं हुई थी। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि अश्वमेध यज्ञ में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम इन समस्त दिशाओं का, पुरोहित को दान कर देना चाहिए। बड़े स्तर पर पुरोहितों को भूमि-दान किया जाना सम्भव नहीं था। एक उल्लेख ऐसा भी मिलता है कि पुरोहितों को दी जाने वाली भूमि ने अपना हस्तांतरण सम्भव नहीं होने दिया।

(6.) उच्चकोटि का दार्शनिक विवेचन

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म उच्च कोटि के दार्शनिक विवेचन पर आधारित था। ई.पू.600 के आसपास, उत्तर-वैदिक-काल का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल में, विशेषतः पंचाल और विदेह में, पुरोहितों के आधिपत्य, कर्मकांड एवं अनुष्ठानों के विरुद्ध प्रबल आंदोलन आरम्भ हुआ तथा उपनिषदों की रचना हुई। इन दार्शनिक ग्रंथों में अनुष्ठानों की आलोचना की गई और सम्यक् विश्वासों एवं ज्ञान पर बल दिया गया।

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इस काल के याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों द्वारा आत्मन् को पहचानने और आत्मन् तथा ब्रह्म के सम्बन्ध को सही रूप में समझने पर बल दिया गया। ब्रह्मा सर्वोच्च देव के रूप में उदित हुए। पंचाल और विदेह के कुछ क्षत्रिय राजाओं ने भी इस प्रकार के चिन्तन में भाग लिया और पुरोहितों के एकाधिकार वाले धर्म में सुधार करने के लिए वातावरण तैयार किया। उनके उपदेशों से स्थायित्व और एकीकरण की विचारधारा को बल मिला। आत्मा की अपरिवर्तनशीलता और अमरता पर बल दिए जाने से स्थायित्व की संकल्पना मजबूत हुई, राजशक्ति को इसी की आवश्यकता थी। आत्मा और ब्रह्मा के सम्बन्धों पर बल दिए जाने से उच्च अधिकारियों के प्रति स्वामिभक्ति की विचारधारा को बल मिला। इस काल की दार्शनिक विवेचना के अन्य प्रधान ग्रन्थ आरण्यक हैं। पुनर्जन्म के सिद्धान्त का अनुमोदन भी इसी युग में किया गया। इसके अनुसार मनुष्य का आगामी जन्म उसके कर्मों पर निर्भर रहता है तथा अच्छा कार्य करने वाला, अच्छी योनि में और बुरा कार्य करने वाला बुरी योनि में जन्म लेता है। इस युग में ज्ञान की प्रधानता पर बल दिया गया। मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक समझा गया। षड्दर्शन अर्थात् सांख्य, योग, न्याय वैशेषिक, पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा की रचना इसी काल में हुई।

स्तुति पाठ

जिन भौतिक कारणों से लोग पूर्वकाल में देवताओं की आराधना करते थे, उन्हीं कारणों से अब भी करते थे परन्तु पूजा-पद्धति में काफी परिवर्तन हो गया था। स्तुति पाठ पहले की तरह ही होते थे, पर देवताओं को संतुष्ट करने की दृष्टि से अब उनका उतना महत्त्व नहीं रह गया था।

(7.) देवताओं के महत्त्व में परिवर्तन

उत्तर-वैदिक-काल में ऋग्वैदिक-काल के देवताओं का महत्त्व घट रहा था और उनका स्थान अन्य नये देवता ग्रहण कर रहे थे। इन्द्र और अग्नि को, पहले जैसा महत्त्व नहीं था। इस युग में प्रजापति का महत्त्व देवताओं से अधिक हो गया। ऋग्वैदिक-काल के दूसरे कई गौण देवताओं को भी उच्च स्थान प्रदान किए गए।

पशुओं के देवता रुद्र, उत्तर-वैदिक-काल में एक महत्त्वपूर्ण देवता बन गए। रुद्र को महादेव तथा पशुपति के नाम से पुकारा जाने लगा। रुद्र के साथ-साथ शिव का महत्त्व बढ़ने लगा। विष्णु अब उन लोगों के संरक्षक देवता समझे जाने लगे जो ऋग्वैदिक-काल में अर्द्ध-घुमंतू जीवन बिताते थे और अब स्थायी जीवन बिताने लगे थे।

विष्णु, वासुदेव कहलाने लगे। भागवत सिद्धान्त का बीजारोपण भी इसी युग में हो गया था। जब समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र में विभाजित हो गया तो प्रत्येक वर्ण के पृथक देवता अस्तित्त्व में आ गए। पूषन को प्रारम्भ में गौ-रक्षक समझा जाता था किंतु बाद में शूद्रों का देवता बन गया।

(8.) आडम्बर तथा अन्ध विश्वासों में वृद्धि

उत्तर-वैदिक-काल के आर्यों के उत्तरी मैदान में बस जाने के कारण वे मानसून पर अत्यधिक निर्भर रहने लगे। फलतः उन्हें अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि का सामना करना पड़ा। कृषि पर कीट-पतंगों एवं रोगों का आक्रमण होता था। अतः फसलों को नष्ट होने से बचाने के लिए मन्त्र-तन्त्र का प्रयोग होने लगा जिनका उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

ऋग्वैदिक-काल का विशुद्ध धर्म अब धीरे-धीरे आडम्बरों तथा अन्ध-विश्वासों का जाल बनने लगा था। अब यह विश्वास हो गया था कि यज्ञों तथा मन्त्रों द्वारा न केवल देवताओं को वश में किया जा सकता है वरन् उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। अब भूत-प्रेत तथा मन्त्र-तन्त्र में लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा था। अथर्ववेद में भूत-प्रेतों का वर्णन है और तन्त्र-मन्त्रों द्वारा इनसे रक्षा का उपाय भी बताया गया है। कुछ प्रतीक-वस्तुओं की भी पूजा होने लगी। उत्तर-वैदिक-काल में मूर्ति-पूजा भी आरम्भ हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

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उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था में ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा क्रमशः परिवर्तन होता गया था तथा अब उसमें जटिलता आने लगी थी। अब वे गाँवों के अतिरिक्त नगरों में भी निवास करने लगे थे और उनका जीवन अधिक सम्पन्न हो गया था।

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था की प्रमुख गतिविधियाँ

(1.) धातु-ज्ञान में वृद्धि

आर्यों को ऋग्वैदिक-काल में ताम्र, स्वर्ण तथा अयस् आदि धातुओं का ज्ञान प्राप्त था परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में उन्हें लौह-अयस्, ताम्र-अयस्, रांगा, सीसा तथा चांदी का भी ज्ञान था। इस काल में लाल-अयस् तथा कृष्ण-अयस् का भी उल्लेख मिलता है। सम्भवतः लाल-अयस का तात्पर्य ताम्बे से और कृष्ण-अयस् का तात्पर्य लोहे से था।

(2.) लोहे के उपयोग में वृद्धि

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उत्तर-वैदिक-काल में लोहे का अधिकाधिक उपयोग होने लगा। पाकिस्तान के गांधार प्रदेश में 1000 ई.पू. के आसपास गाढ़े गए शवों के साथ लोहे के बहुत सारे औजार और उपकरण मिले हैं। इस प्रकार की लौह निर्मित वस्तुएं बिलोचिस्तान से भी मिली हैं। लगभग उसी समय से पूर्र्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी लोहे का उपयोग हो रहा था। पुरातात्विक अन्वेषण से ज्ञात होता है कि 800 ई.पू. के लगभग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीरों के फलक और भालों के फलक जैसे लोहे के औजार बनने लग गए थे। लोहे के इन हथियारों से उत्तर-वैदिक आर्यों ने उत्तरी दो आब में बसे अपने बचे-खुचे शत्रुओं को परास्त किया होगा। उत्तरी गंगा की घाटियों के जंगलों को साफ करने के लिए लोहे की कुल्हाड़ी का उपयोग हुआ होगा। उस काल में वर्षामान 35 से 65 सेंटीमीटर तक होने से ये जंगल बहुत घने नहीं रहे होंगे। वैदिक-काल के अंतिम चरण में लोहे का ज्ञान पूर्वी उत्तर प्रदेश और विदेह में फैल गया था। ई.पू. सातवीं सदी से इन प्रदेशों में लोहे के औजार मिलने लग जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे का प्रयोग सर्वाधिक हुआ। लोहे के हथियारों का उपयोग लगातार बढ़ते जाने के कारण योद्धा-वर्ग महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा। नए कृषि औजारों और उपकरणों की सहायता से किसान आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगे।

राजा, सैनिक और प्रशासकीय आवश्यकताओं के लिए, इस अतिरिक्त उपज को एकत्र कर सकता था। इस अतिरिक्त उपज को ईसा-पूर्व छठी सदी में स्थापित हुए नगरों के लिए भी जमा किया जा सकता था। इन भौतिक लाभों के कारण किसान का कृषि कार्य में लगातार लगे रहना स्वाभाविक था। लोग अपनी पुरानी बस्तियों से बाहर निकलकर समीप के नए क्षेत्रों में फैलने लगे। इस प्रकार लोहे का उपयोग बढ़ते जाने से आर्यों का ग्राम्य प्रधान जीवन नगरीकरण की ओर बढ़ने लगा तथा छोटे-छोटे जन के स्थान पर बड़े-बड़े जनपद राज्यों की स्थापना का मार्ग खुल गया।

(3.) भूमिपतियों का प्रादुर्भाव

ऋग्वैदिक-काल में भूमिपतियों का कहीं नाम नहीं था परन्तु अब बड़े-बड़े भूमिपतियों का प्रादुर्भाव हो रहा था। बहुत से भूमिपति सम्पूर्ण गाँव के स्वामी होते थे। गाँव के लोगों पर उनका बड़ा प्रभाव रहता था।

(4.) वैश्यों के काम का निर्धारण

उत्तर-वैदिक-काल में वैश्य वर्ग के अंतर्गत सामान्य प्रजा का समावेश होता था। उन्हें कृषि और पशुपालन जैसे उत्पादक कार्य सौंपे गए थे। कुछ वैश्य शिल्पकार भी थे। वैदिक-काल के अंत में वे व्यापार में जुट गए। उत्तर-वैदिक-काल में सम्भवतः केवल वैश्य ही भेंट अथवा उपहार देते थे। क्षत्रिय, वैश्यों से प्राप्त भेंट पर अपनी जीविका चलाते थे। सामान्य कबीलाई प्रजा को भेंट देने वालों की स्थिति में पहुँचने में लंबा समय लगा। कई ऐसे अनुष्ठान थे जिनके माध्यम से विश् अथवा वैश्यों को राजन्य के अधीन बनाया जाता था।

(5.) कृषि में आमूलचूल परिवर्तन

वैदिक-काल के आर्य मुख्यतः पशुपालक थे किंतु उत्तर-वैदिक-काल मे कृषि में बड़ी उन्नति हो गयी थी। अब आर्य लोग गंगा-यमुना की अत्यन्त उपजाऊ भूमि में पहुँच गए थे। अब वे बड़े-बड़े हलों का प्रयोग करने लगे थे। कृषि सम्बन्धी लोहे के औजार बहुत थोड़े मिले हैं किंतु इसमें संदेह नहीं कि उत्तर-वैदिक-कालीन लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि ही था।

कुछ वैदिक ग्रंथों में छः आठ, बारह और चौबीस बैलों द्वारा जोते जाने वाले हलों के उल्लेख मिलते हैं। इसमें अतिश्योक्ति हो सकती है। हलों के फाल लकड़ी के होते थे। उत्तरी गंगा की नरम मिट्टी में इनसे संभवतः काम चल जाता था। यज्ञों में होने वाली पशु-बलि के कारण पर्याप्त बैल उपलब्ध नहीं हो सकते थे। इसलिए कृषि आदिम स्तर की थी परन्तु इसमें संदेह नहीं कि यह व्यापक स्तर पर होती थी।

शतपथ ब्राह्मण में हल की जुताई से सम्बन्धित अनुष्ठानों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। प्राचीन आख्यानों के अनुसार सीता के पिता विदेहराज जनक भी स्वयं हल जोतते थे। उस जमाने में राजन्य और राजकुमार भी शारीरिक श्रम करने में संकोच नहीं करते थे। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर कहा जाता है। बाद में उच्च वर्णों के लोगों द्वारा हल जोतने पर निषेध लग गया।

इस काल के कृषक विभिन्न प्रकार की खादों का भी प्रयोग करने लगे थे। वैदिक लोग यव (जौ) पैदा करते रहे परन्तु उत्तर-वैदिक काल में उनकी मुख्य पैदावार धान (चावल) और गेहूँ बन गया। कालांतर में गेहूँ का स्थान प्रमुख हो गया। आज भी उत्तर प्रदेश और पंजाब के लोगों का मुख्य अनाज गेहूँ ही है। दोआब में पहुँचने पर वैदिक लोगों को चावल की भी जानकारी मिली। वैदिक ग्रंथों में चावल को व्रीहि कहा गया है।

हस्तिनापुर से चावल के जो अवशेष मिले हैं वे ईसा पूर्व आठवीं सदी के हैं। अनुष्ठानों में चावल के उपयोग के विधान मिलते हैं परन्तु अनुष्ठानों में गेहूँ का बहुत कम उपयोग होता था। उत्तर-वैदिक-काल में कई तरह की दालें भी उगाई जाती थीं।

(6.) वाणिज्य तथा व्यापार में उन्नति

उत्तर-वैदिक-काल में, ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा व्यापार तथा वाणिज्य में अधिक वृद्धि हो गयी थी। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि अब वे एक विशाल मैदान के निवासी बन गए थे जो बड़ा ही उपजाऊ तथा धन-सम्पन्न था। इस काल में व्यापारियों का एक अलग वर्ग बन गया था जिन्हें वणिक कहते थे। धनी व्यापारी श्रेष्ठिन् कहलाता था।

आर्य लोगों का आन्तरिक व्यापार पहाड़ियों में रहने वाले किरातों के साथ होता था, जिन्हें ये कपड़े देकर औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ प्राप्त करते थे। अब ये लोग समुद्र से भी परिचित हो गए थे और बड़ी-बड़ी नावों द्वारा सामुद्रिक व्यापार भी करते थे। अब आर्य लोग निष्क, शतमान तथा कृष्णाल नाम की मुद्राओं का प्रयोग करने लगे थे जिससे व्यापार में बड़ी सुविधा होने लगी।

(7.) अन्य व्यवसायों की उन्नति

ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अब उद्योग धन्धों में भी अधिक वृद्धि हो गई थी और कार्य विभाजन का सिद्धान्त दृढ़ हो गया था। यजुर्वेद में उन सब व्यवसायों का उल्लेख है जिन्हें इस काल की आर्य प्रजा करती थी। इनमें शिकारी, मछुए, पशुपालक, हलवाह, जौहरी, चटाई बनाने वाले, धोबी, रंगरेज, जुलाहे, कसाई, सुनार, बढ़ई आदि आते हैं।

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था में कलाओं की भूमिका

उत्तर-वैदिक-काल में कला के क्षेत्र में भी कई परिवर्तन दिखाई देते हैं। काव्य-कला का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया था।

(1.) नगर एवं गृह निर्माण कला

ऋग्वैदिक-काल के बड़े गांव, उत्तरवैदिक-काल में बड़े-बड़े नगरों में परिवर्तित होने लगे थे। तैत्तिरीय ब्राह्मण में नगर में निवास करने वालों को नगरिन कहा गया है। राज्यों की राजधानियों में बडे-बड़े विशाल भवन एवं महल बनने लगे थे। हस्तिनापुर में ई.पू.900 से ई.पू. 500 की अवधि के स्तरों की खुदाई में बस्ती के अस्तित्त्व और नगरीय जीवन के प्रारंभ होने के प्रमाण मिलते हैं परन्तु पुरातत्त्व की यह जानकारी हस्तिनापुर के सम्बन्ध में महाभारत से मिलने वाली जानकारी से मेल नहीं खाती।

क्योंकि इस महाकाव्य का वर्तमान स्वरूप बहुत बाद में, ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में लिखा गया था, जब भौतिक जीवन की काफी उन्नति हो चुकी थी। उत्तर-वैदिक काल के लोग कच्ची और पक्की ईटों, मिट्टी बाँस तथा अन्य प्रकार की लकड़ी की सहायता से बनाए जाते थे। लकड़ी के बड़े बड़े लठ्ठों की सहायता से घर की छत बनाई जाती थी। घास-फूस और रबर इत्यादि की सहायता से छत पाटी जाती थी।

घर में अनेक कक्ष होते थे जिनमें फर्नीचर भी प्रयुक्त होता था। हस्तिनापुर की खुदाई में मिट्टी के जो स्मारक मिले हैं वे भव्य और टिकाऊ नहीं रहे होंगे। आगे चलकर हस्तिनापुर बाढ़ में बह गया। इसलिए कुरु-जन प्रयाग के समीप कौशाम्बी में जाकर बस गया।

(2.) धातु शिल्प कला

उत्तर-वैदिक-काल में अनेक कलाओं और शिल्पों का उदय हुआ। हमें लुहारों और धातुकारों के बारे में जानकारी मिलती है। लगभग 1000 ई.पू. के आसपास निश्चय ही इनका सम्बन्ध लोहे के उत्पादन से रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार से 1000 ई.पू. के पहले के तांबे के कई औजार मिले हैं उनसे वैदिक और अवैदिक दोनों ही समाजों में ताम्रकारों का अस्तित्त्व सूचित होता है।

वैदिक लोगों ने सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की तांबे का उपयोग किया था। वैदिक लोगों ने सर्वप्रथम ताम्र धातु का उपयोग किया था। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थलों से भी तांबे के औजार मिले हैं। इन ताम्र-वस्तुओं का उपयोग मुख्यतः युद्ध, आखेट और आभूषणों के लिए भी होता था।

(3.) बर्तन निर्माण कला

उत्तर-वैदिक-काल के लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से परिचित थे- काले एवं लाल भांड, काले रंग के भांड, चित्रित धूसर भांड और लाल भांड। अंतिम किस्म के भांड उन्हें अधिक प्रिय थे। ये भांड प्रायः पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मिले हैं परन्तु इस युग के विशिष्ठ भांड हैं- चित्रित धूसर भांड। इनमें कटोरे और थालियां मिली हैं जिनका उपयोग उच्च वर्णों के लोगों द्वारा पूजा-पाठ अथवा भोजन अथवा दोनों कामों के लिए होता था। चित्रित धूसर भांडों के साथ कांच की वस्तुएं और कंकण मिले हैं। उनका उपयोग भी उच्च वर्ग के सदस्य ही करते होंगे।

(4.) वस्त्र कला

इस काल में सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। वस्त्र रंग-बिरंगे एवं सिले हुए होते थे। ऋग्वैदिक-काल की भांति वास, अधिवास, नीवी, तार्प्य, पगड़ी, उत्तरीय, अन्तरीय, कम्बल, शॉल आदि वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। धनी और राजपरिवारों के सदस्यों के वस्त्रों पर सोने-चाँदी की जरी का काम होता था। साधु-सन्यासी एवं आदिवासी लोग मृग चर्म का प्रयोग करते थे।

(5.) आभूषण निर्माण कला

पुरातात्त्विक खुदाई और वैदिक ग्रंथों से विशिष्ट शिल्पों के अस्तित्त्व के बारे में जानकारी मिलती है। उत्तर-वैदिक-काल के ग्रंथों में जौहरियों के भी उल्लेख मिलते हैं। ये सम्भवतः समाज के धनी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। स्त्री पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। उनके आभूषण ऋग्वैदिक-काल के समान ही थे। आभूषणों में कीमती पत्थरों को जड़ा जाता था। इस युग में चाँदी के आभूषणों का प्रयोग बढ़ गया जबकि ऋग्वैदिक-काल में चाँदी के आभूषण बहुत कम थे।

(6.) मनोरंजन

आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन के साधनों में ऋग्वेदकाल की तुलना में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। पहले की भाँति नृत्य, संगीत, जुआ, घुड़दौड़़, रथ-दौड़़ आदि मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

(7.) बुनाई कला

बुनाई का काम केवल स्त्रियाँ करती थीं, फिर भी यह काम बड़े पैमाने पर होता था।

(8.) काव्य कला

ऋग्वेद में केवल स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है, परन्तु यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा सूत्रों की रचना के द्वारा काव्य-क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत कर दिया गया। यजुर्वेद में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है। सामवेद गीति-काव्य है। संगीत-कला पर उसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अथर्ववेद में भूत-प्रेत से रक्षा तथा तन्त्र-मन्त्र का विधान है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में उच्चकोटि की दार्शनिक विवेचना है। सूत्रों की रचना इसी काल में हुई। सूत्रों के प्रादुर्भाव से, सूचनाओं को संक्षेप में लिखने की कला की उन्नति हुई।

(9.) खगोल विद्या

इस काल में खगोल विद्या की भी उन्नति हुई तथा आर्यों को अनेक नए नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त हो गया।

(10.) अन्य कलाएं

उत्तर-वैदिक-काल में चर्मकार, कुम्हार तथा बढ़ई आदि शिल्पों ने बहुत उन्नति की।

(11.) औषधि विज्ञान

औषधि-विज्ञान अब भी अवनत दशा में था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था बहुत ही उन्नत दशा में थी और समाज में चारों ओर विविध प्रकार के कार्य हो रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तर वैदिक साहित्य

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उत्तर वैदिक साहित्य

उत्तर वैदिक साहित्य का अर्थ उन ग्रंथों से हैं जो वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के बाद लिखे गए। इनमें सांख्य, योग आदि षड्दर्शन ग्रंथ, स्मृतियाँ पुराण, रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्य ग्रंथ आते हैं।

उत्तर वैदिक साहित्य का अर्थ उन ग्रंथों से हैं जो वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के बाद लिखे गए। इनमें सांख्य, योग आदि षड्दर्शन ग्रंथ, स्मृतियाँ पुराण, रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्य ग्रंथ आते हैं। उत्तर वैदिक साहित्य का रचनाकाल कई शताब्दियों में विस्तृत है।

उत्तर वैदिक साहित्य – दर्शन ग्रन्थ

आर्यों ने अन्य कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की भी रचना की, जिनका विश्व संस्कृति पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अनेक ऋषियों ने दर्शन-शास्त्र के ग्रंथों का निर्माण किया। प्रमुख भारतीय दर्शनों की संख्या छः है-

(1.) कपिल मुनि का सांख्य-दर्शन,

(2.) पतन्जलि का योग-दर्शन,

(3.)  कण्व का वैशेषिक दर्शन,

(4.) गौतम का न्याय-दर्शन,

(5.) जैमिनि का पूर्व मीमांसा दर्शन तथा

(6.) बादरायण का उत्तर-मीमांसा दर्शन।

हिन्दू-धर्म के अध्यात्मवाद का भवन षडदर्शन के इन्हीं छः स्तम्भों पर खड़ा है।

महाकाव्य

महाकाव्यों की रचना ई.पू.800 से ई.पू. 400 के बीच हुई। महाकाव्यों का आशय संस्कृत भाषा में लिखे दो महाकाव्यों से है-

(1.) रामायण- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मिीकि ने की।

(2.) महाभारत- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। महाभारत का एक अंश गीता कहलाता है जिसमें निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया गया है। रामायण एवं महाभारत का हिन्दू-समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी भारतीय समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है।

स्मृतियाँ

आर्यों ने स्मृतियों की भी रचना की। स्मृतियों में मनु स्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति तथा नारद स्मृति प्रमुख हैं। मनुस्मृति की रचना शुंगकाल में ई.पू.200 से ई.पू.100 के बीच होनी अनुमानित है। याज्ञवलक्य स्मृति की रचना ईस्वी 100 से ईस्वी 300 के बीच होनी अनुमानित है। नारद स्मृति की रचना ई.100 से ई.400 के बीच होनी अनुमानित है। ई.400 से ई.600 की अवधि में कात्यायन स्मृति एवं वृहस्पति स्मृति की भी रचना हुई। ये दोनों ही स्मृतियां अब तक अप्राप्य हैं। कुछ स्मृतियां, यथा- पराशर स्मृति, शंख स्मृति, देवल स्मृति का रचना काल ई.600 से ई.900 के बीच का माना जाता है।

पुराण

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प्रमुख पुराणों की संख्या 18 है जिनमें विष्णु-पुराण, शिव पुराण, स्कन्द पुराण तथा भागवत पुराण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वायु पुराण, विष्णु-पुराण, मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण आदि प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण की रचना ई.600 से ई.900 के बीच मानी जाती है। महाकाव्यों तथा पुराणों में वैदिक आदर्शों का प्रतिपादन किया गया है। अन्तर यह है कि महाकाव्यों में इसे मनुष्य के मुख से और पुराणों मे देवताओं के मुख से प्रतिपादित बताया गया है। 18 प्रमुख पुराणों के बाद 18 उप-पुराणों की रचना हुई। इनमें- आदि, आदित्य, बृहन्नारदीय, नन्दीश्वर, बृहन्नन्दीश्वर, साम्ब, क्रियायोगसार, कालिका, धर्म, विष्णुधर्मोत्तर, शिवधर्म, विष्णु धर्म, वामन, वारुण, नारसिंह, भार्गव और बृहद्धर्म पुराण सम्मिलित हैं। महापुराणों में वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण सबसे पुराने हैं और इनमें उस काल तक की ऐतिहासिक जानकारी है जब गुप्त सम्राटों का राज्य मगध से लेकर अयोध्या और प्रयाग तक विस्तृत था। भारतीय पुराण भारत के अति प्राचीन इहिास एवं वैदिक संस्कृति की जानकारी उपलब्ध करवाते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

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उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

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उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था से तात्पर्य वेदों की रचना के बाद के काल में आश्रम व्यवस्था के स्वरूप से है। इस कालखण्ड में बुद्धकाल, मौर्यकाल तथा शुंगकाल में आर्यों की आश्रम व्यवस्था का अध्ययन किया गया है।

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था में आश्रमों का विभाजन वैदिक काल की आश्रम व्यवस्था के अनुरूप ही था। उसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था किंतु चूंकि बुद्ध के आविर्भाव से लेकर मौर्य काल तक के कालखण्ड में देश में बौद्धों की संख्या अधिक हो गई थी इसलिए वे वैदिक आश्रम व्यवस्था को स्वीकार नहीं करते थे।

उत्तर वैदिक आश्रमव्यवस्था

बौद्ध काल में आश्रम व्यवस्था की स्थिति

छठी शताब्दी ईसा पूर्व के काल को बौद्ध काल कहा जाता है। इस काल में भारत में अनेक धार्मिक सम्प्रदायों का अभ्युदय हुआ जिनमें बौद्ध और जैन-धर्म प्रमुख थे। इन धर्मों के अनुयाई प्राचीन आश्रम-मर्यादा का पालन नहीं करते थे। धर्मसूत्रों और स्मृतियों आदि प्राचीन ग्रंथों में वर्णाश्रम धर्म पर आधारित आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत किया गया है परन्तु बौद्ध साहित्य से प्राचीन भारतीय समाज का वास्तविक चित्र प्राप्त होता है।

जातक कथाएं और गौतम बुद्ध के संवाद तत्कालीन समाज की जानकारी देते हैं। बौद्ध साहित्य में गृहस्थ के लिए ‘गहपति’ (गृहपति) शब्द का प्रयोग किया गया है। कुछ गहपति अतुल धन के स्वामी होते थे और कुछ साधारण गृहस्थ भी। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर चलने वाले गृहपति को बौद्ध साहित्य में ‘उपासक’ कहा गया है। कोई भी गहपति या किसी भी परिवार का सदस्य यहाँ तक कि बालक भी ‘भिक्षुव्रत’ ग्रहण करके बौद्धसंघ का सदस्य बन सकता था।

स्त्रियों को भी भिक्षुणी बनने का अधिकार था। भिक्षुाओं एवं भिक्षुणियों को बौद्ध संघारामों में निःशुल्क भोजन, आश्रय एवं वस्त्र मिलते थे तथा उन्हें धर्म चर्चा एवं प्रतिदिन कुछ समय के लिए भिक्षाटन के अतिक्ति कोई काम नहीं करना पड़ता था। इसलिए समाज के बहुत से निर्धन एवं आलसी लोग बौद्धभिक्षु बन गए। इस कारण प्राचीन आर्यों द्वारा स्थापित वर्ण, आश्रम एवं पुरुषार्थ सम्बन्धी व्यवस्थाएं टूटने लगीं।

मौर्य काल में आश्रम-व्यवस्था की स्थिति

मौर्य काल में आश्रम-व्यवस्था के स्वरूप की जानकारी कौटिल्य के अर्थशास्त्र और यूनानी लेखकों के विवरण से प्राप्त होती है। कौटिल्य ने चारों आश्रमों के ‘स्वधर्म’ इस प्रकार बताए हैं-

(1.) ब्रह्मचारी आश्रम

ब्रह्मचारी का स्वधर्म स्वाध्याय, अग्निकर्म (यज्ञ), अभिषेक, भैक्षव्रत (भिक्षा द्वारा निर्वाह), आचार्य के प्रति सेवा या भक्ति है। आचार्य के अभाव में ब्रह्मचारी अपने गुरु-पुत्र अथवा अपने से ज्येष्ठ ब्रह्मचारी के प्रति सेवा या भक्ति रखता था।

(2.) गृहस्थ आश्रम

गृहस्थ के स्वधर्म अपने व्यवसाय द्वारा आजीविका कमाना, अपने से समान स्थिति वाले परिवार में विवाह करना जिसका ऋषि (गोत्र) अपने परिवार के ऋषि से भिन्न हो, ऋतुगामित्व (पत्नी के साथ मासिक धर्म के पश्चात् सहवास); देवता, पितर, अतिथि तथा भृत्यों के प्रति कर्त्तव्यों का पालन करने में अपनी आय खर्च करना और शेष राशि से अपना एवं अपने परिवार का निर्वाह करना।

(3.) वानप्रस्थ आश्रम

वानप्रस्थी का स्वधर्म ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना, भूमि पर शयन करना, जटा धारण करना, अजिन (मृगचर्म) ओड़ना, अग्निहोत्र तथा अभिशेष करना, देवता, पितर तथा अतिथियों की पूजा करना और वन्य-आहार (कंद, मूल एवं फल) से निर्वाह करना था।

(4.) परिव्राज्य आश्रम

परिव्राज्य के स्वधर्म इन्द्रियों पर पूर्ण संयम रखना, अनारम्भ (कोई भी व्यवसाय नहीं करना) निष्किंचनत्व (कोई भी सम्पत्ति न रखना), संग-त्याग (किसी की भी संगति नहीं करना), अनेक स्थानों से भिक्षा ग्रहण कर निर्वाह करना, जंगल में निवास करना तथा बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता रखना था।

कौटिल्य द्वारा वर्णित आश्रमों के स्वधर्म, स्मृति-ग्रन्थों में वर्णित स्वधर्मों से कुछ भिन्न हैं। कौटिल्य ने सर्वप्रथम गृहस्थ का स्वधर्म निर्दिष्ट किया। अतः कौटिल्य की दृष्टि में गृहस्थ आश्रम का महत्त्व सर्वाधिक था। कौटिल्य की सम्मति में स्वधर्म का पालन करना श्रेयस्कर है तथा राज्य का कर्त्तव्य है कि  वह समस्त प्रजा को वर्ण-धर्म और आश्रम धर्म में स्थिर रखे।

द्विज वर्ग के लिए आवश्यक था कि उनके परिवार का प्रत्येक बालक सोलह वर्ष तक ब्रह्मचारी रहकर विद्याध्ययन करे तथा अपने शरीर, मन और बुद्धि को भलिभाँति विकसित कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करे। गृहस्थ का कर्त्तव्य था कि वह अपनी पत्नी, सन्तान, माता-पिता, अवयस्क भाई-बहिन और अपने परिवार की विधवा स्त्रियों का भरण-पोषण करे। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता था, उसके लिए बारह पण दण्ड का विधान था।

कौटिल्य ने व्यवस्था दी कि कोई भी मनुष्य अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा न करे। यदि कोई मनुष्य अपनी पत्नी और सन्तान के भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था किए बिना ही प्रवज्या ग्रहण कर ले तो उसे दण्ड दिया जाय। यही दण्ड उस व्यक्ति के लिए भी है, जो किसी स्त्री को प्रव्रज्या दे। ऐसे मनुष्य ही परिव्राजक बनें जिनमें सन्तानोत्पत्ति की शक्ति नष्ट हो गयी हो और जिन्होंने धर्मस्थों (धर्मस्थ न्यायालयों के न्यायधीशों) से परिव्राजक होने की अनुमति प्राप्त कर ली हो।

किसी ऐसे परिव्राजक को जनपद में न आने दिया जाए, जिसने वानप्रस्थ ग्रहण किए बिना ही प्रव्रज्या ग्रहण कर ली हो। कौटिल्य के अनुसार मनुष्य को अपना पूरा जीवन गृहस्थ आश्रम में ही व्यतीत नहीं करना चाहिए। परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के बाद मनुष्य को वानप्रस्थी बनना चाहिए और अन्त में सन्यास लेकर अकिंचनवृत्ति स्वीकार करनी चाहिए।

बौद्धकाल, मौर्यकाल एवं परवर्ती कालों में भी बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों के अनुयाई आश्रम-व्यवस्था का अनुसरण नहीं करते थे। लाखों लोग किसी बौद्ध आचार्य से प्रव्रज्या ग्रहण करके भिक्षु बन जाते थे। जब सनातन पौराणिक धर्म पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगा तब धर्मसूत्रों के आचार्यों ने व्यवस्था दी कि जब भी व्यक्ति को वैराग्य उत्पन्न हो जाय, वह परिव्राजक बन जाए, चाहे वह ब्रह्मचर्य आश्रम में हो और चाहे गृहस्थ या वानप्रस्थ में।

कौटिल्य इस मत से सहमत नहीं था। उसने व्यवस्था दी कि केवल ऐसे व्यक्ति ही परिव्राजक बनें जिन्होंने अपनी पत्नी, सन्तान और परिवारजनों के भरण-पोषण की व्यवस्था कर दी हो, जिनमें सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो चुकी हो और जिन्होंने प्रव्रज्या के लिए धर्मस्थों से अनुमति प्राप्त कर ली हो।

बुद्ध के समय से ही कुछ स्त्रियों ने प्रव्रज्या ग्रहण करके भिक्षुणी बनना प्रारम्भ कर दिया था तथा भिक्षुणियों के पृथक् संघ स्थापित हो गए थे किन्तु कौटिल्य को स्त्रियों का परिव्राजिका बनना पसन्द नहीं था। इसलिए कौटिल्य ने व्यवस्था दी कि यदि कोई व्यक्ति स्त्रियों को परिव्राजक बनाए तो उसे दण्ड दिया जाए किंतु मौर्य युग एवं उसके बाद भी स्त्रियां पूर्ववत् परिव्राजिका बनती रहीं। कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र में ऐसी परिव्राजिकाओं का उल्लेख हुआ है जिनका उपयोग गुप्तचरों के रूप में किया जाता था।

यूनानी लेखकों के विवरणों से भी भारत के सन्यासियों का परिचय मिलता है। सिकन्दर ने तक्षशिला में पन्द्रह ऐसे सन्यासियों को देखा जो सांसारिक जीवन को त्याग कर ध्यान, तपस्या और समाधि में समय व्यतीत कर रहे थे। सिकन्दर इन सन्यासियों की साधना-विधि जानना चाहता था। अतः जब सिकन्दर की ओर से ओनेसिक्रितस इन सन्यासियों से मिला, तो उनमें से एक सन्यासी ने कहा- ‘अश्वारोहियों के लम्बे चोगे और ऊँचे बूट पहन कर कोई व्यक्ति साधना-विधि नहीं जान सकता। यदि सचमुच इसे जानना चाहते हो तो तुम्हें अपने समस्त वस्त्र उतार कर गर्म चट्टानों पर हमारे साथ बैठना होगा।’

यूनानी लेखकों ने दण्डी नामक वृद्ध सन्यासी का उल्लेख किया है जो जंगल में पर्णकुटी में निवास करता था और उसके अनेक शिष्य थे। सिकन्दर ने ओनेसिक्रितस को उसे बुलाने के लिए भेजा। ओनेसिक्रितस ने दण्डी के पास जाकर कहा- ‘परम-शक्ति-सम्पन्न द्यौ-देवता के पुत्र सिकन्दर ने तुम्हें बुलाया है। वह समस्त मनुष्यों का स्वामी एवं अधीश्वर है। यदि तुम उसके आदेश को स्वीकार करके उसके पास चलोगे तो वह बहुमूल्य उपहारों से तुम्हें सन्तुष्ट करेगा किन्तु यदि तुमने उसके आदेश का पालन नहीं किया तो वह तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देगा।’

दण्डी ने उपेक्षापूर्ण हंसी हंसते हुए कहा-

‘सबका अधिपति ईश्वर है वह कभी किसी का बुरा नहीं करता। ज्योति, जीवन, शान्ति, जल, शरीर और आत्मा का वही स्रष्टा है। मै उस ईश्वर का उपासक हूँ जो युद्ध नहीं करता और जिसे हत्या से घृणा है। सिकन्दर ईश्वर नहीं है, क्योंकि उसे भी एक दिन मरना है, वह अपने को संसार का स्वामी कैसे समझ सकता है! सिकन्दर मुझे जिन उपहारों का लालच दिखा रहा है, मेरे लिए वे अनुपयोगी हैं। संसार के लोग जिन वस्तुओं का संग्रह करते हैं, मेरे लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। उनसे मनुष्य को केवल चिन्ता और दुःख की प्राप्ति होती है। मैं पर्णशय्या पर निश्चिंत होकर सोता हूँ, क्योंकि मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसकी रक्षा के लिए मुझे चिन्ता करनी पड़े। यदि मेरे पास स्वर्ण होता तो मुझे सुख की नींद कैसे आ सकती थी। सिकन्दर मेरा सिर काट सकता है किन्तु मेरी आत्मा को नष्ट करने की शक्ति उसमें नहीं है। सिकन्दर अपना डर, उन लोगों को दिखाए, जिन्हें स्वर्ण और सम्पत्ति की चाह हो और जो मृत्यु से डरते हों। हम ब्राह्मण न तो मौत से डरते हैं और न हमें सम्पत्ति से कोई प्रेम है। इसलिए तुम सिकन्दर से कहो कि जो कुछ तुम्हारे पास है और जो तुम दूसरों को दे सकते हो, दण्डी को उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए वह सिकन्दर के पास नहीं जाएगा, किन्तु यदि सिकन्दर दण्डी से कुछ प्राप्त करना चाहे तो वह मेरे पास आ सकता है।’

ओनेसिक्रितस से दण्डी का उत्तर सुनकर सिकन्दर को भारत के संन्यासियों के जीवन दर्शन का परिचय मिला।

शुंग काल में आश्रम-व्यवस्था की स्थिति

मौर्यवंश के पतन के बाद वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ। उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था की दृष्टि से यह कालखण्ड अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस काल के चिन्तकों ने गृहस्थाश्रम को अधिक महत्त्व दिया। महाभारत का वर्तमान स्वरूप शुंग काल में तैयार हुआ था। अतः महाभारत में शुंग काल की आश्रम व्यवस्था का परिचय मिलता है।

महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि जिस प्रकार समस्त प्राणी अपने जीवन के लिए माता पर आश्रित होते हैं वैसे ही अन्य समस्त आश्रमों की स्थिति का आधार गृहस्थ आश्रम है। शान्तिपर्व के एक प्रकरण में विदेह के राजा जनक और उसकी पत्नी के बीच का वार्तालाप संकलित है।

जब राजा जनक ने संन्यास लेने का विचार किया तब जनक की रानी ने कहा- ‘वे संन्यास ग्रहण करके कर्त्तव्यों से विमुख हो रहे हैं।’

महाभारत में कर्त्तव्यपालन से विमुख होकर संन्यासी बनने वाले व्यक्तियों की उपमा उन कुत्तों से की गई जो भोजन की आशा में दूसरों के मुंह की ओर देखते रहते हैं। शान्तिपर्व में एक कथा दी गई है जिसमें किशोर-वय के भिक्षुओं ने इन्द्र के समझाने पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना स्वीकार कर लिया था। महाभारत-युद्ध की समाप्ति के बाद युधिष्ठिर को अपने बन्धु-बान्धवों के विनाश पर बड़ा संताप हुआ और उसने वैरागी होकर भिक्षुवृत्ति ग्रहण करने का विचार किया।

इस पर अन्य पाण्डवों ने उसे समझाया कि ‘यह पाप-पूर्ण वृत्ति है। जो मनुष्य अकेला रहता है तथा पुत्र-पौत्रों, देवताओं, ऋषियों एवं अतिथियों का भरण-पोषण नहीं करता, उस मनुष्य में और जंगली पशुओं में कोई अन्तर नहीं है। जंगली पशु-पक्षी कभी मोक्ष प्राप्त नहीं करते। वृक्ष और पहाड़ सांसारिक झंझटों से दूर अकेले खड़े रहते हैं, वे भी मोक्ष-सिद्धि नहीं कर पाते।

मनुष्य को अपने सामाजिक कर्त्तव्यों के प्रति सजग होना चाहिए, तभी वह पितृऋण, देव-ऋण और ऋषि-ऋण से मुक्त हो सकता है। यह गृहस्थ आश्रम द्वारा ही सम्भव है। जो लोग केवल मोक्ष को अपना लक्ष्य मानकर गृहस्थ धर्म की उपेक्षा करते हैं, वे निन्दनीय हैं।’

वैदिक धर्म के इस पुनरुत्थान काल में समाज का नेतृत्व जिन ब्राह्मणों के पास था, वे भिक्षु या सन्यासी बने बिना ही एवं गृहस्थ आश्रम में रहते हुए ही अपने धार्मिक कर्त्तव्यों का पालन किया करते थे। पुराणों, स्मृतियों तथा अन्य प्राचीन साहित्य में भी गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई।

मनु के अनुसार कहा कि जिस प्रकार वायु को पाकर ही समस्त प्राणी जीवन धारण करने में समर्थ होते हैं, वैसे ही समस्त आश्रम गृहस्थ पर आधारित होकर अपनी सत्ता को कायम रख सकते हैं। ब्रह्माण्ड-पुराण और विष्णु-पुराण के अनुसार अन्य समस्त आश्रम, गृहस्थ आश्रम में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः वही सबसे श्रेष्ठ है। वायु-पुराण में गृहस्थ आश्रम को शेष तीनों आश्रमों की ‘प्रतिष्ठायोनि’ कहा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

आश्रम व्यवस्था पर अन्य लेख

आर्यों की आश्रम व्यवस्था

ब्रह्मचर्य आश्रम

गृहस्थ आश्रम

वानप्रस्थ आश्रम

संन्यास आश्रम

आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव

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भारतीय संस्कृति में रामायण

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव जितना गहरा एवं व्यापक है, उतना और किसी ग्रंथ का नहीं है। भारतीय संस्कृति का निर्माण इसी ग्रंथ के आदर्शों पर हुआ है।

भारतीय लोक-जीवन में रामायण, महाभारत एवं पुराणों का महत्व सदियों से है। इन ग्रंथों को वेदों के समान आदर दिया जाता है। रामायण भारतीयों का आदि-काव्य है जिसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में की थी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव अत्यंत प्राचीन काल से है।

महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने संस्कृत में की थी। रामायण एवं महाभारत के रचनाकालों में सदियों का अंतर है किंतु इनके रचनाकाल को सम्मिलित रूप से महाकाव्य काल कहा जाता है। पुराणों की रचना भी सदियों के अंतराल में होती रही किंतु उनके रचना काल को भी समग्र रूप से पुराण काल कहा जाता है।

महाकाव्यों के अवतरण की पृष्ठभूमि

उपनिषदों में वैदिक धर्म के आडम्बर युक्त जटिल कर्मकाण्डों तथा यज्ञों का विरोध किया गया था और निर्गुण ब्रह्म, कर्मवाद, मोक्ष आदि सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया किन्तु उपनिषदों का अगोचर निर्णुण ब्रह्म इतना गूढ़ और सूक्ष्म था कि केवल बुद्धिजीवी वर्ग ही उसे समझ सकता था। सामान्य मनुष्यों के लिए वह अत्यन्त कठिन था। इस कारण उपनिषदों के ज्ञान से जनसाधारण की धार्मिक आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं।

उपनिषदों ने मोक्ष प्राप्ति के लिए ब्रह्म से साक्षात्कार, मनन निदिध्यासन तथा समाधि आदि नवीन साधन बताए किंतु उनका पालन भी जनसाधारण के लिए सम्भव नहीं था। न उनके लिए घर-बार छोड़़कर परिव्राजक बनना और ब्रह्म की प्राप्ति का प्रयत्न करना सम्भव था। इस कारण जनसाधारण की धार्मिक आकांक्षाओं को पूरा करने की लिए वैदिक धर्म के अंतर्गत कतिपय नवीन धार्मिक मत उत्पन्न हुए जिन्होंने उपनिषदों की मूल विचारधारा को सुरक्षित रखा किंतु उनके बाह्य रूप पर्याप्त भिन्नता लिए हुए थे।

इनमें से कुछ आस्तिक धर्म थे जो वेद, ईश्वर तथा ब्राह्मणों में आस्था रखते थे किंतु यज्ञादि कर्मकाण्डों के स्थान पर ईश्वर के किसी विशिष्ट रूप शिव, विष्णु, दुर्गा आदि को अपना आराध्य मानते थे तथा अपने आराध्यदेव को प्रसन्न करने के लिए भक्ति को एकमात्र साधन मानते थे। दूसरे नास्तिकवादी धर्म एवं मत थे जो वेदों के प्रामाण्य, ईश्वरवाद तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व को अस्वीकर करते थे तथा उचित आचार-विचार को ही संसार तथा कर्मबंधन से छूटने का उपाय मानते थे।

आस्तिक एवं नास्तिक विचारधाराओं के अंतर्गत बहुत से मत उत्पन्न हुए जिनमें से अधिकांश अल्पजीवी सिद्ध हुए किंतु चार धर्म जनमानस में गहराई तक अपनी पैठ बनाने में सफल रहे। इनमें से आस्तिक विचारधारा के अंतर्गत वैष्णव धर्म एवं शैव धर्म तथा नास्तिक विचारधारा के अंतर्गत जैन-धर्म एवं बौद्ध धर्म थे।

आस्तिक विचारधारा के अंतर्गत वैष्णव धर्म का बीज वेदों में उपलब्ध था। महाकाव्य काल में यह बीज प्रस्फुटित होकर सुंदर पौधे का आकार लेने लगा। रामायण में राम को तथा महाभारत में श्रीकृष्ण को युग-पुरुष के रूप में वर्णित किया गया तथा उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया। राम तथा कृष्ण के रूप में जनसामान्य के समक्ष भक्त-वत्सल भगवान का विराट रूप सामने आया जो सर्वशक्तिमान, शत्रुहंता, दयालु, भक्तों की पुकार सुनने वाला, दुष्टों का विनाश करने वाला तथा धर्म की स्थापना करने वाला रूप था। इन दोनों ग्रंथों में विविध कथाओं के माध्यम से भगवान के गुणों और विशेषताओं का निरूपण किया गया जिससे जनसामान्य में भगवान के प्रति आस्था का उदय हो सके।

श्रीराम का काल

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग की कुल अवधि 12,96,000 वर्ष थी। इस युग में भगवान विष्णु के तीन अवतार- वामन, परशुराम एवं श्रीराम हुए। इनमें से राम तीसरे थे जो कि विष्णु के सातवें अवतार थे। इसके बाद द्वापर युग आया जिसकी अवधि 8,64,000 वर्ष रही। द्वापर के बाद ई.पू. 3,102 में कलियुग आरम्भ हुआ।

यदि भगवान श्रीराम को त्रेता के अंतिम खण्ड में माना जाए तो उनका जन्म आज से कम से कम 8,69,119 वर्ष पहले हुआ। वैज्ञानिक इस तिथि को स्वीकार नहीं करते क्योंकि तब तक धरती पर मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। कतिपय वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भगवान राम का जन्म ई.पू. 5,114 अर्थात् आज से लगभग 7,133 वर्ष पूर्व हुआ। पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा रामेश्वरम् और श्रीलंका के बीच स्थित रामसेतु को कार्बन डेटिंग के आधार पर 7000 वर्ष पुराना आकलित किया है।

रामायण का रचनाकाल

रामायण तथा महाभारत के वास्तविक रचना काल के बारे में विद्वानों ने अलग-अलग धारणाएं प्रस्तुत की हैं किंतु अधिकांश भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वान रामायण तथा महाभारत की रचना को बुद्ध से भी पहले की मानते हैं। इनमें से भी रामायण की रचना महाभारत की रचना से पहले हुई थी। महाभारत में महर्षि वाल्मीकि का उल्लेख हुआ है।

रामायण के अयोध्या काण्ड के 109वें सर्ग के चौतीसवें श्लोक में बुद्ध का स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार हुआ है- ‘यथा हि चोरः तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।’ अर्थात् ‘बुद्ध यानी जो नास्तिक है और नाम मात्र का बुद्धिजीवी है, वह चोर के समान दंड का अधिकारी है।’

निश्चित रूप से यह श्लोक रामायण में बहुत बाद में जोड़ा गया है किंतु इस उक्ति के आधार पर कुछ विद्वान मानते हैं कि रामायण की रचना, बुद्ध के आविर्भाव के पश्चात् हुई। मैकडॉनल ने रामायण के मूल रूप को ई.पू. 500 की रचना स्वीकार किया है। विख्यात पाश्चात्य विद्वान वेबर ने रामायण में उल्लिखित ‘यवन’ शब्द के आधार पर रामायण को यवन आक्रमण के बाद की अर्थात् ई.पू. चौथी शताब्दी की रचना माना है।

अर्थात् इन दोनों के अनुसार रामायण की रचना बुद्ध के बाद हुई। विन्टरनित्स के अनुसार इस ग्रन्थ की मूल रचना ई.पू. चौथी शताब्दी में हुई तथा इसका अन्तिम स्वरूप दूसरी शताब्दी ईस्वी के लगभग निश्चित हुआ था।

बौद्ध साहित्य के कई प्रारम्भिक ग्रंथों पर रामायण का प्रभाव देखा जा सकता है। दशरथ जातक पर यह प्रभाव सर्वाधिक दिखाई देता है तथा इस जातक में श्रवण कुमार की कथा का भी उल्लेख है। प्रसिद्ध विद्वान सिलवा लेवी के अनुसार सद्धर्मस्मृति उपाख्यान निश्चित रूप से वाल्मीकि का ऋणी है क्योंकि इस ग्रन्थ में जम्बू द्वीप का वर्णन काफी अंशों में रामायण के वर्णन से मेल खाता है।

सद्धर्मस्मृति उपाख्यान में नदियों, समुद्रों, देशों एवं द्वीपों को उन्हीं नामों से सम्बोधित किया गया है जिन नामों से उनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हो चुका है। रामायण के अयोध्या काण्ड में मिथिला एवं विशाला नामक दो भिन्न नगरों का उल्लेख है जब कि बुद्ध के समय तक दोनों नगर वैशाली के रूप में एक हो गए थे। अतः इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि रामायण, बुद्ध पूर्व की रचना है।

रामायण की रचना महाभारत से पहले हुई। महाभारत में न केवल महर्षि वाल्मीकि एवं रामायण का उल्लेख हुआ है अपितु राम से सम्बन्धित स्थानों को तीर्थ के रूप में स्वीकार किया गया है। रामायण में वर्णित भारतीय भौगोलिक सीमाएं महाभारत कालीन भारत की अपेक्षा काफी न्यून हैं। इसके विपरीत रामायण में कहीं भी महाभारत एवं उसके किसी पात्र का उल्लेख नहीं हुआ है। अतः रामायण महाभारत के पूर्व की रचना है।

महर्षि पाणिनी का काल ई.पू. पांचवीं शताब्दी सिद्ध हो चुका है। रामायण में यत्र-तत्र अपाणिनीय प्रयोग मिलते हैं जिनसे सिद्ध होता है कि रामायण की रचना पाणिनी के आविर्भाव से पूर्व हुई। डा. याकोबी ने रामायण की भाषा के आधार पर इसे ई.पू. 800 से ई.पू. 600 के बीच की रचना माना है। याकोबी के अनुसार रामायण के प्रथम एवं सप्तम काण्ड प्रक्षिप्त हैं। उनमें आए हुए बुद्ध एवं यवनों के उल्लेख मूल रामायण के नहीं हैं। रामायण के वे भाग जिनमें राम, पुरुषोत्तम के रूप में निरूपित हैं, निश्चित ही बुद्ध से पहले लिखे गए।

महर्षि वाल्मीकि का परिचय

महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ के रचियता थे। इस ग्रंथ का प्रधान लक्ष्य मानव के चरित्र का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करना था। महर्षि वाल्मीकि आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। वाल्मीकि के सम्बन्ध में महाभारत एवं पुराणों में कथाएं मिलती हैं। इन ग्रंथों में वाल्मीकि को ‘भार्गव’ अर्थात् भृगुवंश में उत्पन्न बताया गया है। महाभारत के ‘रामोपाख्यान’ के रचयिता को भी भार्गव कहा गया है।

एक आख्यान के अनुसार वाल्मीकि जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु किरातों के साथ रहने से वे ‘रत्नाकर’ नामक डाकू बन गए। एक बार उन्होंने देवर्षि नारद आदि सप्त-ऋषियों को लूटने के लिए उनका मार्ग रोका। उन ऋषियों ने वाल्मीकि से कहा कि जिन कुटुम्बियों के लिए तुम नित्य पाप-संचय करते हो, उनसे जाकर पूछो कि वे तुम्हारे इस पाप के सहभागी बनने के लिए तैयार हैं या नहीं!

इस पर वाल्मीकि ने नारद आदि सप्तऋषियों को वृक्ष से बांध दिया और अपने घर जाकर वही प्रश्न पूछा। वाल्मीकि के परिजनों ने उत्तर दिया कि परिवार का भरण-पोषण करना तुम्हारा कर्त्तव्य है और परिवार तुम्हारे पाप का भागीदार नहीं है। यह उत्तर सुनकर वाल्मीकि के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। नारद ने उन्हें राम-राम जपने का उपदेश दिया किंतु वाल्मीकि राम-राम नहीं बोल सके और ‘मरा-मरा’ जपने लगे।

इस प्रकार ‘मरा-मरा’ स्वतः ही ‘राम-राम’ हो गया। कई वर्षों तक निश्चल रहकर तपस्या करने से दीमकों ने उनके शरीर पर अपना घर अर्थात् ‘वाल्मीक’ बना लिया। उनकी घनघोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें ‘वाल्मीक’ से बाहर निकलने का निर्देश देते हुए कहा कि वाल्मीक में तपस्या करने के कारण तुम्हारा दूसरा जन्म हुआ है। आज से तुम वाल्मीकि नाम से जाने जाओगे। कुछ पुराणों के अनुसार इससे पूर्व उनका नाम ‘च्यवन’ था किंतु स्कन्द पुराण में ऋषि बनने से पूर्व इनका नाम ‘अग्निशर्मन’ दिया गया है।

ऋषि बन जाने के बाद वाल्मीकि ने आध्यात्मिक जीवन आरम्भ किया। बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए। ऋषि भरद्वाज भी उनके शिष्य थे। एक बार वे भरद्वाज के साथ नदी में स्नान करके लौट रहे थे, तब मार्ग में उन्होंने एक व्याध को, अपने बाण से मैथुनासक्त क्रौंच पक्षियों का शिकार करते हुए देखा। उनमें से एक पक्षी मर गया और उसका साथी करुण क्रंदन करने लगा। वाल्मीकि का हृदय करुणा से द्रवित हो उठा और उनके मुख से एक छन्द फूट पड़ा-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमरू शास्वती समा।

यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्।।

अर्थात- हे निषाद! तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।

 मुख से अकस्मात निकले हुए शब्दों को एक श्लोक का रूप प्राप्त होते देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु क्रोध में निषाद को इतना बड़ा शाप देने का उन्हें दुःख भी हुआ। तभी परमपिता ब्रह्मा प्रकट हुए और कहा- ‘पछताने का कोई कारण नहीं है। यह श्लोक तुम्हारी कीर्ति का कारण बनेगा। इसी छन्द में तुम राम के चरित्र की रचना करो।’ ब्रह्माजी के आदेशानुसार वाल्मीकि ने चौबीस हजार श्लोकों से युक्त ‘रामायण’ नामक महाकाव्य का सृजन किया।

वाल्मीकि रामायण में आए एक उल्लेख के अनुसार एक बार तप एवं स्वाध्याय में मग्न एवं भाषण-कुशल नारद से वाल्मीकि ने प्रश्न किया कि इस संसार में ऐसा कौन महापुरुष है जो आचार-विचार एवं पराक्रम में आदर्श माना जा सकता है? नारद ने उन्हें रामकथा का सार सुनाया, वाल्मीकि ने उसी कथा को श्लोकबद्ध करके रामायण की रचना की। इस वृत्तान्त से प्रतीत होता है कि उस काल में श्रीराम के जीवन से सम्बन्धित कुछ कथाएं प्रचलित थीं, वाल्मीकि ने उन्हीं को आधार बनारक छन्देबद्ध महाकाव्य की रचना की।

रामायण में आए एक उल्लेख के अनुसार श्रीराम द्वारा अपनी पत्नी सीता का त्याग करने पर महर्षि वाल्मीकि ने ही गर्भवती सीता को अपने आश्रम में आश्रय दिया। वाल्मीकि के आश्रम में सीता के दो जुडवां पुत्र हुए। महर्षि ने ही उन बालकों के नाम ‘कुश’ एवं ‘लव’ रखे। सीता के दोनों पुत्र वाल्मीकि के आश्रम में पलकर बड़े हुए।

वाल्मीकि ने ही लव और कुश के बड़े होने पर उन्हें स्वयं के द्वारा रचित रामायण का सस्वर पाठ करना सिखाया। लव और कुश स्थान-स्थान पर जाकर रामायण का गायन करने लगे। जिस समय श्रीराम अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब कुश एवं लव ने यज्ञ के घोड़े को पकड़ लिया और वे अयोध्या पहुँचे। वहाँ भी उन्होंने रामायण का गायन किया। उनके गायन से श्रीराम मन्त्रमुग्ध हो गए और राम को ज्ञात हुआ कि ये ऋषिकुमार नहीं अपितु श्रीमराम और सीता के पुत्र हैं। श्रीराम ने सीता को अपने पास बुलवा लिया।

वाल्मीकि स्वयं सीता के साथ राम-सभा में उपस्थित हुए और उन्होंने सीता के सतीत्व की साक्षी दी। उन्होंने अपने सहस्र वर्षों के तप एवं सत्यप्रतिज्ञा को साक्षी बनाकर श्रीराम से सीता को स्वीकार करने की प्रार्थना की। वाल्मीकि के कहने पर ही देवी सीता ने पतिव्रत धर्म की शपथ लेकर भूमि में प्रवेश किया। महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में केवल यही वृत्तान्त प्राप्त होता है।

रामायण का वर्तमान रूप

रामायण के वर्तमान स्वरूप में बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड नामक सात अध्याय हैं तथा 24,000 श्लोक हैं। विद्वानों की मान्यता है कि मूल रामायण में अयोध्याकाण्ड से लेकर लंकाकाण्ड तक केवल पांच काण्ड ही थे, बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड बाद में जोड़े गए।

बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य अध्यायों से भिन्न है तथा इन अध्यायों के बहुत से कथन अन्य पांच अध्यायों से मेल भी नहीं खाते। वाल्मीकि ने पांच अध्यायों वाले मूल रामायण ग्रन्थ में राम को उनके युग का महान् पुरुष माना है और उसी रूप में उनका चरित्र चित्रण किया है किन्तु बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में राम को विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि ये दोनों काण्ड बाद के युग के हैं।

पाठ की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण के चार प्रामाणिक संस्करण उलपब्ध है- उदिच्य पाठ, दक्षिणात्य पाठ, गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठ। वर्तमान में तीन लेखकों की अत्यंत प्रसिद्ध रामायण उपलब्ध हैं- वाल्मीकि रामायण, वेदव्यास कृत अध्यात्म रामायण और तुलसीदास कृत रामचरित मानस। इन तीनों की मूल कथा समान है किंतु कवियों ने तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक धारणाएं अपने-अपने ढंग से वर्णित की हैं। इस कारण तीनों ग्रंथों के पात्रों के चरित्र-चित्रण में परिवर्तन हो गया है। महर्षि वाल्मीकि के राम एक महापुरुष हैं जिनमें मानवीय दृढ़ताएं एवं दुर्बलताएं हैं किन्तु वेदव्यास एवं तुलसीदास के राम घट-घटवासी एवं सर्वशक्तिमान विष्णु के अवतार हैं। वे पतित-पावन एवं मोक्षदायक हैं।

रामायण की कथा

रामायण की कथा संक्षेप में इस प्रकार से है- अयोध्या के ईक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ की तीन रानियां- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी थीं। उनके चार पुत्र- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न हुए। राम का विवाह विदेह के राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ। वृद्धावस्था में दशरथ, अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को राज्य देकर संसार से निवृत्त होना चाहते थे किंतु रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे- अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य और कौशल्या-पुत्र राम को चौदह वर्ष का बनवास।

राम ने अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वन-गमन किया और चित्रकूट में रहने लगे। राजा दशरथ की, पुत्र-वियोग में मृत्यु हो गयी। कैकेयी के पुत्र भरत ने राज्य पर बड़े भाई राम का अधिकार माना और वे राम-लक्ष्मण एवं सीता को वापस लाने के लिए वन गए।

राम अपने पिता के वचनों का पालन करने के लिए चौदह वर्ष वन में व्यतीत करने के निश्चय पर अडिग रहे। तब राजकुमार भरत श्रीराम की चरण-पादुकाएं लेकर अयोध्या लौट गए। राम, लक्ष्मण और सीता, चित्रकूट छोड़कर गोदावरी नदी के तट पर चले गए तथा वहाँ पंचवटी नामक स्थान पर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।

लंका का राजा रावण, राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में सीता का अपहरण करके लंका ले गया। राम ने किष्किन्धा के राजा सुग्रीव, उनके सेनानायक हनुमान एवं उनकी सेना की सहायता से रावण पर आक्रमण किया तथा उसे पराजित करके सीता को वापस प्राप्त किया। इस कार्य में रावण के छोटे भाई विभीषण ने राम की सहायता की। राम, लक्ष्मण और सीता चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर अयोध्या लौट आए जहाँ राम का राज्याभिषेक किया गया।

रावण के यहाँ रहने के कारण कुछ अयोध्यावासी, देवी सीता की पवित्रता पर संदेह करते हुए राजा रामचंद्र की आलोचना करने लगे। अतः राम ने गर्भवती सीता का त्याग कर दिया। देवी सीता महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहने लगीं जहाँ उन्होंने कुश एवं लव नामक जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि ने उन्हें स्वयं द्वारा रचित रामायण सुनाई तथा उन्हें रामायण के गायन का निर्देश दिया।

जब राम ने अश्वमेध यज्ञ किया तब कुश और लव ने यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया तथा वे अयोध्या पहुँचे। कुश और लव ने राम के समक्ष रामायण का गायन किया। राम को ज्ञात हुआ कि वे देवी सीता एवं श्रीराम के ही पुत्र हैं तो राम ने सीता को अयोध्या बुलवाया। वाल्मीकि सीता को लेकर अयोध्या पहुँचे, जहाँ वाल्मीकि के कहने पर देवी सीता ने पतिव्रत धर्म की शपथ ली तथा भूमि में प्रवेश किया।

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव

आर्य-संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रन्थ

रामायण प्राचीन आर्यों की उच्च आदर्श युक्त संस्कृति की संवाहक है। रामकथा के माध्यम से वाल्मीकि ने आर्यों के संघर्षमय जीवन, त्याग, वचन पालन एवं सामाजिक मर्यादा-पालन के लिए प्राण तक त्यागने की परम्पराओं का वर्णन किया है। आर्यों के साथ-साथ इस ग्रन्थ में वानर संस्कृति एवं राक्षस संस्कृति की परम्पराओं का भी वर्णन किया गया है।

वानर एवं राक्षस दोनों ही अनार्य संस्कृतियां थीं किंतु इन दोनों में बहुत अंतर था। वानर जाति आर्यों की मित्र थी जबकि राक्षस जाति आर्यों की शत्रु थी। वाल्मीकि ने आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को, वानर संस्कृति के प्रतीकों के रूप में सुग्रीव, बाली एवं हनुमान को तथा राक्षस संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में रावण को प्रस्तुत किया गया है।

राम उच्च सामाजिक मर्यादाओं के पालन के पक्षधर हैं तथा निजी स्वार्थों की अपेक्षा परिवार एवं समाज में नैतिकता, सत्य, न्याय और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं किंतु राक्षस-राज रावण अनीति, अन्याय एवं अत्याचार के माध्यम से विजय प्राप्त करना चाहता है। उसके लिए पारिवारिक सम्बन्ध, सामाजिक मर्यादाएं एवं नैतिकता कुछ भी मूल्य नहीं रखती है।

राम-रावण का युद्ध वस्तुतः आर्य और अनार्य संस्कृतियों के संघर्ष की गाथा है जिसमें सत्य की असत्य पर, न्याय की अन्याय पर तथा नैतिकता की अनैतिकता पर विजय होती है।

रामायण में आर्य पारिवारिक जीवन के उच्चतम आदर्शों का निरूपण हुआ है। राम अपने सम्पूर्ण जीवन में स्वयं को आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र एवं आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका जीवन-चरिर्त्र  आज भी भारतीय संस्कृति का आदर्श माना जाता है। राम, आर्य जीवन के उच्च आदर्श के प्रतीक हैं।

वे आदर्श पुत्र होने के कारण, पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके, चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करते हैं, आदर्श भाई होने के कारण वे सहर्ष अपने भाई भरत को राज्य देना स्वीकार करते हैं। राजकुमार भरत भी आदर्श भाई का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तथा ज्येष्ठ भाई राम के होते हुए राजपद स्वीकार नहीं करते। देवी सीता आदर्श पत्नी का कर्त्तव्य निभाती हैं और राजमहलों का सुख त्यागकर अपने पति राम के साथ वन-गमन करती हैं। लक्ष्मण भी भ्रातृत्व भावना का उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वे अपने पिता का राज्य, अपना परिवार और महलों के सुख छोड़कर वनवासी भाई के साथ वन के कष्टों को सहर्ष स्वीकार करते हैं।

आदर्श राजा होने के कारण ही राम ने प्रजा द्वारा की जा रही आलोचना को स्वीकार किया और अपनी प्राणप्रिय सीता का त्याग किया किन्तु आदर्श पति होने के कारण उन्होंने किसी अन्य स्त्री से विवाह नहीं किया और एक-पत्नीव्रत का पालन किया जो उस युग में असाधारण बात थी। देवी सीता का चरित्र भारतीय नारीत्व का साक्षात् प्रतीक है।

भारतीय स्त्रियों के दैनिक जीवन में सीता की पवित्रता और पतिव्रत धर्म आज भी आदर्श का प्रतिमान है। पतिव्रत एवं पत्नीव्रत का जैसा सुन्दर आदर्श राम-सीता के दाम्पत्य जीवन से मिलता है, वह अन्यत्र मिलना दुष्कर है। दशरथ ने पिता का, भरत और लक्ष्मण ने भाई का, कौशल्या और सुमित्रा ने माता का, सुग्रीव ने मित्र का तथा हनुमान ने सेवक का जो आदर्श प्रस्तुत किया है, वह आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणा स्रोत है।

रामायणकार वाल्मीकि ने यथार्थ जीवन के सम्बन्ध में दृष्टि प्रस्तुत की है न कि काल्पनिक आदर्श के सम्बन्ध में। वालमीकि ने राम के एक पत्नीव्रत की असाधारणता को कहीं गौरव प्रदान नहीं किया। जबकि वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग के अनुसार राजा दशरथ की तीन सौ पचास रानियां बताई गई हैं। स्वयं दशरथ के पुत्र इस बात का उपालम्भ देते हैं कि राजा दशरथ काम-पाश में बंधे हुए कैकयी के वशवर्ती थे। राम का अपनी पत्नी सीता के प्रति अनुराग कम नहीं था।

वे शरद् ऋतु में स्वयं को अकेला जानकर लक्ष्मण से कहते हैं- ‘सीता को न देखकर शोक से अभितप्त शरद् के चार मास मुझे सौ वर्षों जैसे जान पड़ते हैं। मैं प्रिया के बिना दुःखी हूँ।’ सीता का अपहरण हो जाने के बाद विलाप करते हुए क्रुद्ध राम लक्ष्मण से कहते हैं- ‘यदि सीता मुझे सकुशल वापिस नहीं मिली तो मैं तीनों लोकों को नष्ट कर दूँगा। तुम इस समय मेरे पराक्रम से जगत् को आकुल और मर्यादाहीन हुआ देखोगे।’  सीता के लिए राम का जगत् को नष्ट करने का संकल्प अपनी पत्नी के प्रति समर्पण भाव को व्यक्त करता है।

एक स्थान पर राम पुनः लक्ष्मण से कहते हैं- ‘लोगों की ऐसी धारणा है कि समय बीतने से शोक दूर हो जाता है किन्तु प्राणप्रिय सीता को न देखकर मेरा शोक तो उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। मुझे इस बात का दुःख नहीं कि सीता दूर है और उसका हरण कर लिया गया है, मुझे दुःख इस बात का है कि उसका यौवन बीता जा रहा है।’

इससे स्पष्ट है कि वाल्मीकि द्वारा प्रस्तुत भारतीय संस्कृति काल्पनिक एवं खोखले आदर्शवाद पर नहीं अपितु जीवन के कटु यथार्थ को भी पूरी तरह समझती है।

वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य के नायक राम को महापुरुष ही रहने दिया, उन्हें अवतार घोषित नहीं किया जबकि सोलहवीं सदी के कवि तुलसीदास ने राम को विष्णु का अवतार बनाकर शील, सौन्दर्य एवं शक्ति का चरम रूप प्रस्तुत किया। वाल्मीकि के राम आर्य-संस्कृति के पूर्णतम प्रतिनिधि हैं। हजारों साल तक आर्य जाति राम के आदर्शों पर चलती रही। आज भी भारतीय समाज का सबसे बड़ा आदर्श राम ही हैं।

रामायण में धर्म एवं नैतिकता

रामायण का प्रधान लक्ष्य मनुष्य के चरित्र का वह आदर्श प्रस्तुत करना है जिससे मनुष्य देवत्व पर पहुँचता है। रामायण के अनुसार चरित्र ही धर्म है और चरित्रवान राम धर्म के मूर्तरूप हैं। यह चरित्र सत्यनिष्ठा, वचन पालन एवं शौर्य पर आधारित है। इस धर्म की कुँजी मन का संयम, इन्द्रियों पर अधिकार और कर्त्तव्यपालन की तत्परता है।

परिवार एवं समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना, लोक-जीवन की मर्यादा की रक्षा करना और समाज की व्यवस्था को बनाए रखने में योगदान करना इसका महान् आचार है। यही वह धर्म-बन्धन है जो जीवन को उचित मार्ग पर ले जाता है। इस धर्म-बन्धन में बंधा हुआ मनुष्य स्वार्थ से परमार्थ को श्रेष्ठ समझते हुए लोक-कल्याण की साधना में लगा रहता है।

इसीलिए राम विमाता कैकेयी के कहने मात्र से राज्य पर अपने नैसर्गिक अधिकार को त्याग देते हैं। वाल्मीकि के राम युद्ध-भीरू नहीं हैं। वे प्रजाजनों को आश्वस्त करते हुए कहते हैं- ‘मैं अकेला ही सारी पृथ्वी को अपने बाणों से नष्ट करके अपना अभिषेक करा सकता हूँ किंतु मैं अधर्म से डरता हूँ, क्योंकि मैं धर्म के बन्धन से बंधा हुआ हूँ।’

अतः राम का संकल्प है कि वह लोभ, मोह, अज्ञान या किसी भी तामसी प्रवृत्ति से सत्य के सेतु को नहीं तोड़ेंगे। जीवन का अमूल्य कोष धर्म और सत्य है जिसके खो जाने से मनुष्य सर्वथा दरिद्र हो जाता है किन्तु इस कोष की वृद्धि से वह देवता बन जाता है। वाल्मीकि के राम ने किसी काल्पनिक मोक्ष के लिए धर्म का मार्ग अपनाने की बजाए मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर सन्तुलित समाज, व्यवस्थित राष्ट्र, मर्यादित आचार और संयत व्यवहार की आधारशिला पर धर्म का सुदृढ़ प्रसाद खड़ा किया है।

मनुष्य मानवीय-दुर्बलताओं से ग्रस्त होता है किंतु वाल्मीकि ने राम के जिन गुणों का उल्लेख किया है वे गुण एक साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकते। राम में पिता के प्रति आज्ञाकारिता, छोटे भाइयों भरत एवं लक्ष्मण के प्रति वात्सल्य, गुरुओं के प्रति आदर, पत्नी के प्रति अनुराग, सुग्रीव एवं विभीषण के प्रति मित्रता, राज्य तथा ऐश्वर्य के प्रति अनासक्ति, रावण जैसे दुष्ट के विरुद्ध प्रति पराक्रम आदि गुण बताए हैं।

वाल्मीकि ने राम के भीतर सहृदयता, कोमलता, अनुकम्पा, शास्त्रज्ञान, सौम्यता तथा जितेन्द्रिय आदि गुणों को भी दर्शाया है। राम अपने जीवन में प्रत्येक स्थल पर आदर्शों की प्रतिष्ठा करते हुए दिखाई देते हैं। राम ने प्रजा और परिवारजनों के आग्रह को अस्वीकार करके अपने पिता के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए वन-गमन स्वीकार किया।

उनके इस आचरण में बड़प्पन दिखाने का भाव नहीं है अपितु नैतिकता की भव्यता है। राम भली-भांति जानते थे कि राजा का आचरण, प्रजा के लिए अनुकरणीय हो जाता है इसलिए राजा को जीवन के हर क्षण में प्रजाजन के समक्ष उच्च-आदर्श रखना चाहिए। जब जबालि ने राम से यह कहा कि माता, पिता, भाई आदि कोई किसी का नहीं होता, अतः राम को चाहिए कि वह लौटकर अयोध्या चला जाए और राज्य का भोग करे।

तब राम ने उत्तर दिया- ‘ऐसा करके मैं यथेष्टचारी कहलाऊँगा और प्रजा-जन भी मेरा ही अनुसरण करेंगे, क्योंकि प्रजा, राजा का अनुसरण करती है। देवताओं एवं ऋषियों ने सत्य को मान्यता दी है, सत्यवादी इस लोक और परलोक दोनों में शाश्वत कल्याण को प्राप्त होता है।’ इस प्रकार वाल्मीकि ने राम के माध्यम से धर्म एवं नैतिकता के मानदण्डों की स्थापना की है।

आदर्श स्त्री के रूप में सीता

जिस प्रकार वाल्मीकि के राम, भारतीय पुरुषों के आदर्श हैं उसी प्रकार देवी सीता, भारतीय नारियों की आदर्श हैं। वह पति-परायण, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा विकट परिस्थितियों में भी पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली नारी हैं। जब राम को वन-गमन का आदेश होता है, तब जनक जैसे बड़े राजा की पुत्री और दशरथ जैसे बड़े राजा की पुत्रवधू होते हुए भी वे चौदह वर्ष की दीर्घ अवधि का वनवास स्वीकार करती हैं क्योंकि भारतीय नारी का आदर्श हर स्थिति में अपने पति का साथ निभाना है।

वनवास में सीता अपने देवर लक्ष्मण को पुत्रवत् स्नेह देती हैं। जब रावण पंचवटी से सीता का अपहरण करके लंका ले जाता है और उन्हें नाना प्रकार के भय दिखाकर अपनी पत्नी बनने को कहता है, तब भी सीता रावण को अपने पति के बल का परिचय देकर अपने सतीत्व की रक्षा करती हैं।

जब राम-रावण युद्ध में राम विजयी होते हैं तब सीता अपने सतीत्व को सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा देने को सहर्ष तत्पर हो जाती हैं। एक साधारण धोबी के कहने पर जब राम, सीता का त्याग कर देते हैं, तब भी वह अपने पति के प्रति किसी प्रकार का दुर्भाव मन में न लाकर वाल्मीकि आश्रम में जीवन व्यतीत करती हैं और अपने पुत्रों- कुश एवं लव का समुचित पालन-पोषण करके मातृत्व के कर्त्तव्य का निर्वाह करती हैं।

अन्त में अपने पति की मर्यादा की रक्षा करने के लिए, ताकि भविष्य में भी कोई व्यक्ति उनके पति पर अंगुली न उठा सके, सीता भूमि में प्रवेश करती हैं। इस प्रकार सीता का आचरण और उनका पातिव्रत्य आज भी भारतीय नारियों के लिए सबसे बड़ा आदर्श है।

रामायण का साहित्यिक महत्त्व

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रामायण संस्कृत भाषा का ही नहीं अपितु विश्व की किसी भी भाषा का पहला महाकाव्य है। साहित्यिक दृष्टि से रामायण एक अनुपम ग्रंथ है। भाव, भाषा और कथा तीनों ही स्तर पर रामायण एक विलक्षण ग्रंथ है। इसमें संस्कृत भाषा के क्लिष्टमत और सरलतम छन्दों एवं अलंकारों का प्रयोग किया गया है। पूरे ग्रंथ में अलंकारों का चमत्कारपूर्ण-विन्यास तथा रसों का पूर्ण परिपाक मिलता है।  रामायण की कथा में शृंगार, वीर, शान्त, रौद्र, वात्सल्य, प्रेम, करुणा, वीभत्स, भक्ति आदि समस्त रसों का यथास्थान प्रयोग किया गया है। पाठक की रुचि एवं उत्सुकता को बनाए रखने के लिए शृंगार, वीर तथा करुणा रसों के माध्यम से कथा को अत्यंत रोचक एवं ग्राह्य बनाया गया है। अयोध्याकाण्ड में राम को वनवास का आदेश देते समय पिता दशरथ की मनोदशा, माता कौशल्या एवं सुमित्रा का भाव-विह्वल होकर मातृ-प्रेम का प्रदर्शन, सीता का पातिव्रत्य धर्म, लंका में सीता की मनोदशा, दुःख के क्षणों में भी राम का सौम्य चरित्र आदि विभिन्न भावों का मनोवैज्ञानिक ढंग से अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है। साहित्यिक-सौन्दर्य की अनुभूति इस महाकाव्य की प्रमुख विशेषता है। ग्रंथ में प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन के साथ-साथ नारी-सौन्दर्य का अनुपम वर्णन किया गया है। चित्रकूट, गंगा नदी, पम्पासरोवर, पंचवटी वन, दण्डक वन के मनोरम दृश्य तथा शरद् एवं वर्षा ऋतु के मनोहारी वर्णन के साथ ही बाली की पत्नी तारा के अनुपम सौन्दर्य का भी सुंदर वर्णन किया गया है।

 नारी-सौन्दर्य के अन्तर्गत वाल्मीकि ने लंका-काण्ड में हनुमान द्वारा लंका में सीता को खोजते समय जिन अनेक सुन्दर स्त्रियों को देखा उन स्त्रियों के अंग-प्रत्यंगों तथा चेष्टाओं का भी आकर्षक वर्णन किया गया है। सुन्दर-काण्ड में जब हनुमान लंका में पहुँच कर रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं, तब महल की नारियों के सौन्दर्य का अनुपम वर्णन करते हुए वाल्मीकि ने लिखा है-

 ‘रति के परिश्रम से खिन्न रावण की सूक्ष्म कटि वाली स्त्रियां जहाँ-तहाँ खाली स्थानों में सो रही थीं। कोई सुन्दर वर्ण की नृत्य-कुशल नारी अपने लिटाए अंगों में नृत्य के विभ्रमों को प्रकट कर रही थी, कोई सर्वांग-सुन्दरी पटह नामक वाद्य यन्त्र को वैसे ही आलिंगित किए हुए थी जैसे कोई अपने प्रियतम का आलिंगन करती है। इसी प्रकार कोई कमल-लोचना वीणा का आलिंगन किए हुए थी। रावण की पत्नी मन्दोदरी मुक्ता-मणियों से युक्त आभूषणों से अलंकृत थी और अपनी शोभा से स्वयं भवन को सुन्दर बना रही थी। उसका गोरा बदन स्वर्ण की आभा की भांति प्रकाशवान था।’

रामायण में मानव की अन्तः-प्रकृति और मनोवृत्तियों का बड़ा स्वाभाविक चित्रण हुआ है। इन समस्त दृष्टियों से रामायण काव्य-कला का सुन्दर उदाहरण है। संस्कृत साहित्य एवं भारत की विभिन्न साहित्यिक कृतियों पर इसका प्रभाव है। संस्कृत के महाकवि कालीदास एवं भवभूति तथा लोकभाषा के कवि गोस्वामी तुलसीदास की कृतियां वाल्मीकि की रामायण से सर्वाधिक प्रभावित हुई हैं। निःसन्देह रामायण संस्कृत भाषा एवं भारतीय संस्कृति का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व एवं साहित्यिक जगत् का अनूठा ग्रंथ है।

रामायण का ऐतिहासिक महत्त्व

ऐतिहासिक तथ्यों की उपलब्धता की दृष्टि से भी रामायण का अत्यधिक महत्त्व है। डॉ. याकोबी के अनुसार, विषय-वर्णन की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण दो भागों में विभाजित की जा सकती है- (1.) बालकाण्ड और अयोध्याकाण्ड में वर्णित अयोध्या की घटनाएं जिनका केन्द्र बिन्दु इक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ हैं, (2.) दण्डकारण्य एवं रावण-वध से सम्बन्धित घटनाएं जिनका केन्द्र बिन्दु रावण है।

इनमें से अयोध्या की घटनाएं ऐतिहासिक हैं, जिनका सम्बन्ध निर्वासित इक्ष्वाकुवंशीय राजकुमार से है। रावण-वध से सम्बन्धित घटनाओं का मूल उद्गम वेदों में वर्णित देवताओं की कथाओं में देखा जा सकता है। अतः डॉ. याकोबी के अनुसार, रामकथा से सम्बन्धित इन सारे आख्यान काव्यों की रचना इक्ष्वाकु वंश के सूतों ने सर्वप्रथम की, जिनमें रावण और हनुमान से सम्बन्धित प्रचलित आख्यानों को मिलाकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की।

रामायण में वर्णित रामकथा, आर्यों द्वारा की गई दक्षिण विजय का प्रथम वर्णन है। दक्षिण भारत के प्राचीनतम शिलालेखों में उत्तरी भारत के इक्ष्वाकुवंशीय राजा रामचन्द्र का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है कि राम के दक्षिण प्रवेश के पश्चात् दक्षिण भारत में आर्यों की सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव फैला। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महर्षि वाल्मीकि ने अपनी अद्भुत प्रतिभा द्वारा विविध सूत्रों को समेट कर एक उत्कृष्ट मौलिक काव्य की सृष्टि की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – रामायण एवं महाभारत कालीन संस्कृतियाँ

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव

भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा

भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव

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कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन

यदि यह कहा जाए कि भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव रामायण से भी अधिक है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। जहाँ रामायण आदर्श समाज का चित्रण करते हुए समाज को अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, वहीं महाभारत में समाज के वास्तविक स्वरूप का चित्रण करते हुए, मानव मात्र को अच्छाई के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया गया है।

महाभारत युद्ध का काल

नृवंश विज्ञानी, जीव विज्ञानी, पुरातत्व विज्ञानी तथा भौतिक विज्ञानी मानते हैं कि धरती पर वर्तमान मानव अर्थात् होमो सेपियन सेपियन की शुरुआत आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले हुई एवं उसकी उन्नत पीढ़ी ‘क्रोमैगनन मैन’ की शुरुआत आज से लगभग 40 हजार साल पहले हुई।

पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 10,000 साल पहले आदमी ने कृषि और पशु पालन करना आरंभ किया। भारत में भी खेती आरम्भ होने का काल यही माना जाता है। अतः महाभारत का युद्ध इस काल के बाद का ही है। क्योंकि महाभारत के युद्ध का समय मनुष्य के कृषि आरम्भ करने से काफी बाद का है।

भारत में आदमी द्वारा हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाने के प्राचीनतम अवशेष आज से लगभग 6600 वर्ष पुराने मिले हैं। अतः माना जा सकता है कि महाभारत का युद्ध इस तिथि के बाद ही हुआ क्योंकि महाभारत काल में मिट्टी के बर्तन बनाने की कला काफी विकसित हो चुकी थी।

हस्तिनापुर से हुई खुदाई में पेंटेड ग्रे रंग के मिट्टी के बर्तन तथा ताम्बे के तीर, तलवारें आदि मिले हैं। इनकी अवधि ई.पू. 3138 से लेकर ई.पू. 3000 अर्थात् आज से लगभग 5156 वर्ष से लेकर 5018 वर्ष पुरानी है। कुरुक्षेत्र में हुई खुदाई से प्राप्त ताम्बे के शस्त्रों की अवधि भी यही है।

सी. वी. वैद्य एवं करन्दीकर के अनुसार महाभारत के युद्ध का काल ई.पू. 3102 है। ताकेश्वर भट्टाचार्य ने इसका काल ई.पू. 1432 माना है। अन्य साहित्यिक, पौराणिक स्रोतों के आधार पर भी भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ।

महाभारत ग्रंथ का रचना काल

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महाभारत की रचना का मूल समय ई.पू.चौथी शताब्दी माना जाता है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) में सामने आया। मूल महाभारत में चौबीस हजार श्लोक थे जिससे इसे ‘चतुर्विंशति साहस्री संहिता’ अथवा ‘साहस्री संहिता’ कहा जाता था। बाद में इसके श्लोकों की संख्या बढ़कर एक लाख हो गई जिसके कारण इसे ‘शतसाहस्री संहिता’ कहा गया। पाणिनि के अष्टाध्यायी में वेदव्यास या महाभारत का उल्लेख नहीं मिलता, किंतु पतंजलि के व्याकरण-महाभाष्य में महाभारत की कथा का उल्लेख अनेक बार हुआ है। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत का निर्माण पाणिनि के बाद में एवं पतंजलि से पहले हुआ होगा। रामायण में दिए गए भौगोलिक विवरण, महाभारत से प्राचीनतर हैं। महाभारत में महर्षि वाल्मीकि तथा रामायण दोनों का उल्लेख है। महाभारत में संक्षिप्त रामकथा भी दी गई है जिसे अलग से ‘अध्यात्म रामायण’ कहा जाता है। महाभारत का एक हिस्सा ‘हरिवंश पुराण’ कहलाता है। इसमें भी रामायण के नाट्य प्रदर्शन का विवरण है। इनसे स्पष्ट है कि महाभारत की रचना, रामायण की रचना के बाद हुई। भाषा की दृष्टि से महाभारत की भाषा कई स्थानों पर ‘ब्राह्मणों’ और ‘उपनिषदों’ की भाषा से साम्य रखती है।

इससे प्रतीत होता है कि महाभारत के कुछ अंश उत्तर-वैदिक युग के बाद के है। महाभारत के अनेक स्थलों पर यूनानी, शक,पह्लव आदि विदेशी जातियों का उल्लेख है। ये जातियाँ  ई.पू. पहली और दूसरी शताब्दी में भारत में आयीं।

मेक्डॉनल्ड ने इसे ई.पू. 500 और डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने इसे ई.पू. 200 की रचना माना है। आर.जी. भण्डारकर का मत है कि ई.पू. 500 तक महाभारत एक प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ बन चुका था। हैप्किन्स का मत है कि महाभारत ग्रंथ को वर्तमान स्वरूप में आने के लिए पांच चरणों से गुजरना पड़ा-

(1.) भारतवंश के गान, जो ई.पू.400 तक बन चुके थे, (मौर्यकाल से पूर्व)

(2.) पाण्डवों का वीरकाव्य जो ई.पू.400 और ई.पू.200 के बीच में लिखा गया, (मौर्यकाल)

(3.) श्रीकृष्ण को भगवान मानने वाले भागवत धर्म का ग्रन्थ जिसकी रचना ई.पू.200 से ई.200 के मध्य हुई, (शुंगकाल)

(4.) कुछ बाद के पर्व और आरम्भिक पर्व की प्रस्तावनाएं जो ई.200 से ई.400 के बीच किसी समय जोड़ी गई (गुप्तकाल)

(5.) बाद के प्रक्षेप और सम्पूर्ण ग्रन्थ का सम्पादन जो ई.400 के बाद हुआ। (गुप्तकाल)

ई.442 का एक गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें एक लाख श्लोक वाले महाभारत का उल्लेख है। अतः इस समय तक महाभारत का वर्तमान रूप निश्चित रूप से तैयार हो चुका था।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि महाभारत की मूल रचना र्ई.पू. चार सौ के आसपास अर्थात् मौर्यकाल में हुई तथा इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी अर्थात् गुप्तकाल में सामने आया।

महर्षि वेदव्यास का परिचय

ताम्रयुगीन भारतीय सभ्यता में हुए एक युद्ध की कथा के माध्यम से प्राचीन आर्य संस्कृति के वैभव को समग्र रूप से प्रस्तुत करने वाले ‘महाभारत’ नामक महाकाव्य के रचियता वेद व्यास हैं। उन्हें वैदिक संहिताओं को लिपिबद्ध करने, वैदिक शाखाओं का प्रवर्तन करने, ब्रह्मसूत्रों का प्रणयन करने, महाभारत ग्रन्थ की रचना करने तथा वैदिक संस्कृति को पुनर्जीवित करने वाला तत्त्वज्ञानी माना जाता है।

वेदव्यास को सर्वज्ञ, सत्यवादी, सांख्य, योग, धर्म आदि शास्त्रों का ज्ञाता एवं दिव्य दृष्टि वाला महापुरुष माना जाता है। उन्हें भगवान कहकर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की महानता का ज्ञान कराया जाता है।

वेदव्यास का मूल नाम कृष्ण द्वैपायन था। उनके पिता महर्षि पाराशर थे। महाभारत के आदि पर्व में आए उल्लेख के अनुसार एक बार महर्षि पाराशर तीर्थयात्रा करते हुए यमुना नदी के किनारे पहुँचे। उस समय धीवरों के राजा दाशराज की कन्या सत्यवती नाव खे रही थी। महर्षि पाराशर उस नाव में बैठे। नाव में महर्षि, सत्यवती के सौन्दर्य पर मोहित हो गए और उन्होंने सत्यवती के समक्ष रति-इच्छा प्रकट की।

सत्यवती धीवर की कन्या थी इसलिए उसकी देह से सदैव मछली की दुर्गन्ध निकला करती थी, उसे मत्स्यगंधा भी कहते थे। सत्यवती ने महर्षि पाराशर से कहा कि नदी के दोनों तरफ महर्षिगण स्नान कर रहे हैं, इसलिए यह कैसे सम्भव है! तब पाराशर ने अपनी तपस्या के प्रभाव से चारों ओर कोहरा पैदा कर दिया। उस कोहरे में पाराशर ने रति-इच्छा पूरी की, फिर सत्यवती को वरदान दिया कि पुत्र को जन्म देने के बाद वह फिर से कन्या बन जोयगी और उसके शरीर से दुर्गन्ध की बजाए सुगन्ध आया करेगी।

महर्षि पाराशर के वरदान से सत्यवती की कोख से यमुना के एक द्वीप पर एक पुत्र पैदा हुआ। घने अन्धकार में वीर्याधान करने के कारण यह पुत्र एकदम कृष्ण-वर्ण का उत्पन्न हुआ, इसलिए उसका नाम कृष्ण पड़ा और चूँकि वह यमुना के एक द्वीप पर उत्पन्न हुआ इसलिए द्वैपायन कहलाया।

पुत्र को जन्म देने के बाद सत्यवती पुनः कन्या बन गई और उसकी देह से सुगंध निकलने लगी जो एक योजन अर्थात् आठ मील दूर से भी अनुभव की जा सकती थी। इस कारण सत्यवती का नाम योजनगंधा भी पड़ गया। इसी सत्यवती का विवाह कुरुवंशी राजा शान्तनु से हुआ था जिनसे चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न हुए और उसी से कुरुवंश आगे बढ़ा।

 सामविधान ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार वेदव्यास विष्वक्सेन नामक आचार्य के शिष्य थे। पौराणिक साहित्य में उन्हें भगवान का अवतार कहा गया है। वैशाख पूर्णिमा को उनकी जयन्ती मनाई जाती है। आषाढ़ पूर्णिमा को उन्हीं के नाम पर ‘व्यास पूर्णिमा’ कहा जाता है।

पुराणों के अनुसार कृष्ण द्वैपायन ने चतुष्पाद वैदिक ग्रन्थ (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद) का विभाजन कर उसकी तीन स्वतन्त्र संहिताएं (ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद) बनायीं, इस कारण इन्हें वेद-व्यास कहा गया। घृताची नामक अप्सरा से इन्हें शुकदेव  नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। घृताची को अरणी भी कहा जाता है।

कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य के रुग्ण होने के कारण वेदव्यास ने माता सत्यवती के निर्देश से विचित्रवीर्य की रानियों अम्बिका एवं अम्बालिका तथा एक दासी से नियोग किया जिससे क्रमशः धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर नामक नियोगज पुत्र उत्पन्न हुए। शांतनु, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र, पाण्डु, अभिमन्यु, परीक्षित, जनमेजय तथा शतानीक नामक आठ पीढ़ी के कुरूवंशी राजा वेदव्यास के समकालीन थे।

प्राचीन साहित्य में वेदव्यास को चिरंजीव कहा गया है। वेदव्यास ने अत्यन्त कठोर तपस्या करके बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कीं। वे दूर-श्रवण, दूर-दर्शन आदि अनेक विद्याओं में प्रवीण थे। द्रौपदी स्वयंवर तथा इन्द्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में महर्षि वेदव्यास स्वयं उपस्थित थे।

पाण्डवों के वनवासकाल में वे पाण्डवों को धीरज बंधाते रहते थे। महाभारत-युद्ध के समय वेदव्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की ताकि संजय धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन सुना सके। पाण्डवों की विजय के बाद वेदव्यास ने युधिष्ठिर को राजधर्म और राजदण्ड का उपदेश दिया।

महाभारत की रचना प्रक्रिया एवं वर्तमान स्वरूप

महाभारत की रचना मूलतः वेदव्यास ने की। शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद् में ‘इतिहास पुराण’ का उल्लेख मिलता है किन्तु इन ग्रन्थों में उल्लिखित ‘इतिहास पुराण’ स्वतन्त्र ग्रन्थ न हेाकर, आख्यान एवं उपाख्यान के रूप में ब्राह्मण ग्रन्थों में सम्मिलित किए गए थे। ये आख्यान अत्यन्त छोटे होते थे। इस कारण उनका विभाजन ‘पर्व’ एवं ‘उपपर्व’ आदि में नहीं किया जाता था।

वेदव्यास ने ब्राह्मण ग्रन्थों में निर्दिष्ट ‘इतिहास पुराण’ के आख्यानों को पर्व एवं उपपर्व आदि से युक्त साहित्य में ढाल दिया। इस प्रकार उनकी कृति एक नवीन साहित्यिक ग्रंथ बन गई। वर्तमान समय में महाभारत में 18 पर्व और एक लाख श्लोक हैं। आकार की विशालता तथा विषय-वस्तु की विविधता के कारण यह विश्व का सबसे बड़ा ग्रन्थ और सबसे बड़ा महाकाव्य है किंतु वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत इतना बड़ा नहीं था।

महाभारत ग्रन्थ के विकास के सम्बन्ध में तीन अवस्थाओं का उल्लेख मिलता है। वेदव्यास ने वैशम्पायन आदि अपने पांच शिष्यों को महाभारत सिखाया। वैशम्पायन ने सर्पसत्र के समय जनमेजय के सामने महाभारत की कथा सुनाई। वैशम्पायन का यह आख्यान प्रश्नोत्तर के रूप में है। इस प्रकार वेदव्यास के मूल महाभारत में वैशम्पायन द्वारा परिवर्द्धन हुआ। इसके बाद शौनक ऋषि ने द्वादशवर्षीय यज्ञ के अन्त में नैमिषारण्य में महाभारत की कथा सुनाई।

वेदव्यास ने महाभारत को ‘जय’ नाम दिया। जब वैशम्पायन ने जनमेजय को इसकी कथा सुनाई तब इसके 24,000 श्लोक थे और इसका नाम ‘भारत’ पड़ गया। शौनक ऋषि ने इस कथा में परिवर्द्धन करके इसका नाम ‘महाभारत’ कर दिया। आश्वलायन गृह्यसूत्र के समय महाभारत नाम प्रचलित था। इस समय तक इसके श्लोकों की संख्या एक लाख हो गयी जिसके कारण इसे ‘शतसाहस्री संहिता’ कहा गया।

वर्तमान समय में अध्यात्म रामायण, भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम तथा हरिवंश पुराण महाभारत के भीतर समाहित हैं। महाभारत में प्राचीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थितियों की जानकारी मिलती है। यह ग्रंथ धर्म, अर्थ, नीति, दर्शन, तत्त्वज्ञान एवं मोक्ष आदि सिद्धांतों का ज्ञान कराने वाले अपूर्व ग्रन्थ है।

महाभारत की कथा-वस्तु

हस्तिनापुर के कुरुवंशी राजा शान्तनु के बड़े पुत्र का नाम देवव्रत था। जब शान्तनु ने धीवर-कन्या सत्यवती से विवाह किया तब सत्यवती द्वारा शर्त रखे जाने पर कि मेरी कोख से जन्मा पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा होगा, देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचारी होने की शपथ ली ताकि देवव्रत या उसके वंशज कभी राज्य पर दावा नहीं करें।

इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत को भीष्म कहा जाता था। राजा शांतनु को रानी सत्यवती से चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक पुत्र हुए। इनमें से चित्रांगद राजा बना किंतु उसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गई तो छोटा पुत्र विचित्रवीर्य राज्य का अधिकारी हुआ। विचित्रवीर्य संतान उत्पन्न करने में अक्षम थे इसलिए माता सत्यवती के आदेश पर वेदव्यास ने विचित्रवीर्य की दो रानियों अम्बा एवं अम्बिका से तथा उसकी एक दासी से नियोग किया जिससे क्रमशः धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर नामक तीन पुत्र हुए।

इनमें से बड़े पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे और पाण्डु जन्म से ही पाण्डु-रोग (पीलिया) से ग्रस्त थे। विदुर दासी-पुत्र थे। बड़े पुत्र धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने के कारण छोटे पुत्र पाण्डु को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी, गांधार देश की राजकुमारी थी। उसे एक सौ पुत्र हुए जो कौरव कहलाते थे।

महाराज पाण्डु की दो रानियां थीं- कुंती एवं माद्री। एक बार महाराज पाण्डु ने शिकार खेलते हुए भ्रमवश एक ऋषि को मार डाला। ऋषि ने महाराज पाण्डु को भयानक शाप दे दिया। महाराज पाण्डु शाप-मुक्त होने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए अपनी दोनों रानियों के साथ वन को चले गए। महाराज पाण्डु के लौट आने तक के लिए धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। बनवास काल में कुन्ती ने युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को तथा माद्री ने नकुल एवं सहदेव को जन्म दिया। पाण्डु पुत्र होने के कारण ये पांचों राजकुमार पाण्डव कहलाए।

वनवास काल में ही महाराज पाण्डु की मृत्यु हो गई और छोटी रानी माद्री सती हो गई। महारानी कुंती, स्वर्गीय महाराज पाण्डु के पांचों राजकुमारों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई। गुरु द्रोणाचार्य ने एक सौ कौरव राजकुमारों एवं पांच पाण्डव राजकुमारों को शिक्षा दी।

हस्तिनापुर का भावी राजा कौन होगा, इस प्रश्न पर कौरव एवं पाण्डव एक दूसरे के शत्रु हो गए। तीसरे पाण्डव अर्जुन ने एक स्वयंवर को जीतकर पांचाल देश की राजकुमारी द्रोपदी से विवाह किया किन्तु माता कुन्ती द्वारा अनजाने में कहे गए एक कथन के कारण शेष चारों पाण्डवों का भी द्रोपदी से विवाह कर दिया गया।

भीष्म पितामह की मध्यस्थता में पाण्डवों ने अपने पिता के राज्य का कुछ भाग प्राप्त कर इन्द्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाया। पाण्डवों ने दिग्विजय का आयोजन करके अपने राज्य को काफी विस्तृत कर लिया और ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट हो गया। उसने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया जिसमें देश भर के राजा उपस्थित हुए।

ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन पाण्डवों का इतना उत्थान सहन नहीं कर सका। उसने पाण्डवों का सर्वनाश करने के उद्देश्य से उन्हें द्यूत-क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया। उस काल में द्यूतक्रीड़ा के निमंत्रण को युद्ध के निमत्रण की तरह समझा जाता था तथा कोई भी क्षत्रिय इसे अस्वीकार नहीं कर सकता था।

दुर्योधन तथा उसके मामा शकुनि की धूर्तता के कारण राजा युधिष्ठिर जुए में अपना राज्य तथा अपनी महारानी द्रोपदी को खो बैठे। श्रीकृष्ण के धिक्कारने पर धृतराष्ट्र ने द्रोपदी पुनः पाण्डवों को लौटा दी तथा पांचों पाण्डवों को अपनी पत्नी द्रोपदी सहित तेरह वर्षों के लिए वनवास में जाना पड़ा जिनमें से तेरहवां वर्ष अज्ञातवास के रूप में व्यतीत करना था। पकड़े जाने पर दुबारा वनवास जाने की शर्त थी।

पांचों पाण्डव बारह वर्ष वनवास में तथा तेरहवां वर्ष विराट नगर के राजा के यहाँ अज्ञातवास में बिताकर हस्तिनापुर लौटे और अपना राज्य मांगा किंतु दुर्योधन ने सुईं की नोक जितनी भूमि भी पाण्डवों को देने से मना कर दिया। पाण्डवों के ममेरे भाई एवं यदु-वंशी राजा श्रीकृष्ण, कौरवों और पाण्डवों में मेल कराने के लिए हस्तिनापुर गए किंतु दुर्योधन ने उनकी बात भी नहीं मानी।

इस पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों का पक्ष ग्रहण किया। जब दोनों सेनाएं युद्धक्षेत्र में पहुँचीं तो अर्जुन ने यह कहकर युद्ध करने में संकोच दिखाया कि मैं भूमि के लिए अपने बांधवों को नहीं मारना चाहता। इस पर श्रीकृष्ण ने उसे कर्म करने का उपदेश दिया और अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया।

श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन पुनः युद्ध के लिए तैयार हुआ और कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पाण्डवों के बीच 18 दिन तक तक भीषण युद्ध हुआ। चूंकि इस युद्ध में समस्त बड़े भारत वंशी राजाओं ने युद्ध किया था इसलिए इसे महाभारत का युद्ध कहा जाता है। युद्ध में दोनों पक्षों को भयानक क्षति पहुँची किंतु अन्त में पाण्डव विजयी रहे। समस्त कौरव भाई अपनी सेनाओं एवं परिजनों सहित मृत्यु को प्राप्त हुए।

युद्ध में विजय के उपलक्ष्य में पाण्डवों ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया और छत्तीस वर्ष तक राज्य करने के बाद अर्जुन के पौत्र परीक्षित को राज्य सौंपकर द्रोपदी सहित तपस्या करने हिमाचल में चले गए और वहीं उन्होंने देहत्याग किया।

महाभारत के दो प्रमुख संस्करण उपलब्ध होते हैं- उत्तरी तथा दक्षिणी। इनेक कथावृत्तांत में कुछ अन्तर है। महाभारत के प्रकाशित तथा पूर्ण संस्करणों में कलकत्ता, बम्बई तथा कुम्भकोणम् के संस्करण महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। यद्यपि अब भण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना द्वारा प्रकाशित महाभारत का संस्करण ही सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है तथापि गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित महाभारत के संस्करण को भारत में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

महाभारत में वर्णित धार्मिक परिस्थितियाँ

यद्यपि महाभारत की कथा कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए युद्ध से सम्बन्धित है तथापि इसमें अनेक आख्यानों, उपाख्यानों एवं धर्म-दर्शन की चर्चाओं के माध्यम से विशाल ताना-बाना बुना गया है। मूल कथा के साथ-साथ अनेक प्राचीन कथाओं को भी स्थान दिया गया है।

नीति सम्बन्धी प्रवचानों का अविरल प्रवाह पूरी कथा के साथ-साथ चलता है। इस ग्रंथ में आर्यों के प्राचीन धर्म के विविध रूप एवं पक्ष दर्शाए गए हैं। वैदिक यज्ञों एवं विविध अनुष्ठानों का विशद वर्णन किया गया है जिनसे तत्कालीन संस्कृति के दर्शन सहज ही हो जाते हैं। विष्णु के दशावतारों की कथाएं एवं रामकथा उपाख्यानों के रूप में प्राप्त होती हैं।

भगवान शिव, दुर्गा, राम एवं कृष्ण की पूजा बार-बार बताई गई है। पाण्डवों का भगवान शिव, हनुमान एवं स्वर्ग के विभिन्न देवी-देवताओं का पाण्डवों के साथ सम्पर्क एवं सम्बन्ध बताया गया है। इस ग्रंथ में भारत की बहुत सी नदियों, पर्वतों, वनों एवं वृक्षों आदि का उल्लेख हुआ है तथा उनकी पूजा होती हुई दिखाई गई है। लोक के अंतर्गत प्रचलित भूत, प्रेत, पिशाच, विद्याधर, नाग, यक्ष, गन्धर्व एवं किन्नर आदि का भी वर्णन किया गया है और कई स्थानों पर बलि प्रथा का उल्लेख हुआ है।

सम्पूर्ण ग्रंथ में ऋषि-आश्रमों, राजप्रासादों और ब्रह्मणों के घरों में वैदिक यज्ञों का उल्लेख किया गया है जिनमें सूर्य, इन्द्र और अग्नि आदि देवताओं का आह्वान होता हुआ दिखाया जा रहा है। सामान्य गृहस्थों को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और दुर्गा आदि की पूजा करते हुए दिखाया गया है।

महाभारत में यज्ञों और पशु-बलियों के साथ-साथ हिडिम्बा की कथा के माध्यम से नरबलि का भी उल्लेख किया गया है जो राक्षसों में प्रचलित थी और आर्य इसे उचित नहीं मानते थे। ऐतरेय, शतपथ एवं तैत्तिरीय ब्राह्मणों में पुरुषमेध के उन्मूलन का उल्लेख है। रामायण एवं महाभारत में इस सम्बन्ध में वर्णित उल्लेख संभवतः वहीं से लिए गए हैं।

वेदव्यास के महाभारत में प्राचीन भारतीय समाज में गाने-बजाने, खेलने-कूदने, मेले-तमाशे करने, कुश्ती-दंगल करने, देवताओं के निमित्त उत्सव मनाने, शिशु जन्म के संस्कार करने, नंदीमुख कर्म, षष्ठी पूजा, श्राद्ध कर्म, धार्मिक मेलों के आयोजन आदि का वर्णन मिलता है। महाभारत में आए उल्लेखों के अनुसार तत्कालीन समाज में हाथी, बैल, हंस, गरुड़ आदि पशु-पक्षियों को पवित्र माना जाता था। समाज में भूत-प्रेत एवं पिशाचों को वश में करना, टोने-टोटके करना आदि अंध-विश्वासों का भी वर्णन है।

भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव

महाभारत में जीवन-दृष्टियाँ

महाभारत के उद्योग पर्व के 42वें अध्याय में जीवन जीने की तीन दृष्टियों का उल्लेख हुआ है- (1.) नियतिवादी, (2.) प्रज्ञावादी और (3.) अध्यात्मवादी।

धृतराष्ट्र नियतिवादी दृष्टिकोण के पक्षधर हैं। वे कहते हैं- ‘किसी बात के होने या न होने में मनुष्य का केाई हाथ नहीं होता, सब कुछ भाग्य पर निर्भर है। अतः किसी प्रकार के परिश्रम या अध्यवसाय के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, काम-धन्धे के प्रति उपेक्षा भाव रखना चाहिए और किसी वस्तु की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए।’

विदुर धृतराष्ट्र के इस दर्शन से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं- ‘पुरुषार्थ एवं पराक्रम से अनर्थ को टाला जा सकता है और बुद्धि से अपना भविष्य सुधारा जा सकता है। मनुष्य का लक्षण कर्म है और कर्म को छोड़कर बैठना मृत्यु है। अतः सदाचारपूर्वक कर्म करते हुए अपना उत्थान करना चाहिए यही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।’

जब धृतराष्ट्र और विदुर एक-दूसरे के मत से सहमत नहीं होते हैं तब ऋषि सनत्सुजात को बुलाया जाता है। सनत्सुजात कहते हैं- ‘प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद अमृत या अमरता है। प्रमाद के कारण आसुरी वृत्ति वाले मनुष्य मृत्यु से पराजित होते हैं और अप्रमाद अर्थात् संत प्रवृत्ति वाले ब्रह्मस्वरूप या अमर हो जाते हैं। कुछ लोग प्रमाद के स्थान पर यम को मृत्यु का एक रूप कहते हैं। दृढ़तापूर्वक यम-नियमों का पालन करके जो ब्रह्माचर्य प्राप्त होता है, उसे ही कुछ लोग अमृत और अमरता से जोड़ते हैं।’

इस प्रकार महाभारत के इस अध्याय में इन तीनों जीवन-दृष्टियों पर गहनता से विचार किया गया है।

वर्णाश्रम व्यवस्था और सदाचार

महाभारत ने शील और सदाचार को सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार माना है। महाभारत के अनुसार समाज के चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) गुण और कर्म पर आधारित हैं। बालक के उपनयन के बाद शिक्षा, शील और सदाचार से उसके वर्ण का निर्णय होता है। महाभारत के वन-पर्व में अजगर के प्रश्न करने पर कि, ‘ब्राह्मण कौन है?’ युधिष्ठिर कहते हैं- ‘जिस व्यक्ति में सत्य, दान, क्षमा, शील, दया, दम और अंहिसा हो वही ब्राह्मण है।’

अजगर फिर प्रश्न करता है कि क्या ये गुण शूद्र में हो तो वह ब्राह्मण कहलाएगा? युधिष्ठिर कहते हैं- ‘यदि शूद्र में ये गुण हैं तो निश्चय ही वह ब्राह्मण है, जिसमें चरित्र नहीं है, वह शूद्र है।’ इस प्रकार महाभारत कालीन समाज में वर्णों की व्यवस्थाएं गुण, कर्म और स्वभाव पर टिकी हैं न कि जाति, कुल और परम्परा पर।

महाभारत के शान्ति पर्व में चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। महाभारत के शान्ति पर्व में कहा गया है- ‘सबसे गहरा रहस्य यह है कि मनुष्य से अधिक श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।’ इस प्रकार महाभारत मनुष्य के मनुष्य होने को बड़ा मानता है न कि उसके वर्ण या व्यवासाय को।

महाभारत में आदर्श

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के रूप में आर्य संस्कृति के प्रतिमानों को धर्म एवं नीति के सुदृढ़ आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया है। महाभारत का प्रत्येक पात्र अपने आप में विशिष्ट है और वह किसी न किसी गुण अथवा अवगुण का प्रतिनिधित्व करता है।

वेदव्यास ने श्रीकृष्ण को नारायण का अवतार मानकर ही उनसे सम्बन्धित प्रसंग लिखे हैं। कुरुराज्य का मंत्री विदुर भी श्रीकृष्ण की भांति एक आदर्श पात्र है। वह नीतिशास्त्र एवं धर्मशास्त्र का ज्ञाता है। स्पष्टभाषी होने के कारण वह राज्यलोभी धृतराष्ट्र को धर्म एवं नीति पर चलने के लिए प्रेरित करता है तथा धृतराष्ट्र को उसके पुत्रमोह के लिए धिक्कारता है।

भीष्म के रूप में वेदव्यास ने एक अलग तरह का आदर्श प्रस्तुत किया है। वे धर्म और न्याय के प्रतीक होते हुए भी अपनी प्रतिज्ञा के कारण हस्तिानापुर के राजसिंहासन से बंधे हुए हैं और द्रौपदी के वस्त्रहरण पर भी चुप रहते हैं। इतना ही नहीं भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त होते हुए भी भीष्म युद्ध-भूमि में अधर्मी दुर्योधन की तरफ से लड़ते हैं। वे चाहते हैं कि इस युद्ध में धर्म अर्थात् पाण्डव पक्ष की विजय हो, इसलिए वे पाण्डवों को अपनी मृत्यु का तरीका बताते हैं।

इसी प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण भी मनुष्य के गुणों की पराकाष्ठा है। वे सत्यवादी हैं, कष्ट सहकर भी धर्म के पथ से च्युत नहीं होते। वनपर्व में वे अदृश्य यक्ष द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों में धर्म का पक्ष लेते हैं और अपने बलशाली भाई भीम या अर्जुन के स्थान पर अपनी विमाता माद्री के पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना करते हैं। उनमें सत्य और धर्म पर अडिग रहने के प्रति उत्साह है न कि युद्ध में विजय प्राप्त करने पर।

वेदव्यास ने भीमसेन के रूप में शारीरिकि बल एवं नीति का समन्वय किया है। अर्जुन के रूप में उन्होंने शौर्य, ईश-भक्ति और भ्रातृत्व प्रेम से युक्त अदुभुत पात्र की रचना की है। नकुल और सहदेव के रूप में उन्होंने विमाता के पुत्रों को अपने बड़े भाइयों के प्रति विनय एवं सदाशयी रहने वाला दिखाया है। पांचों भाई अत्यंत बलशाली होते हुए भी धर्म के मार्ग पर चलते हैं और बड़ों के सामने विनम्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं। वे निरंतर विपत्तियों का सामना करते हुए भी धैर्य नहीं खोते।

महाभारत की द्रौपदी एक आदर्श नारी है। पांच पतियों की पत्नी होते हुए भी वह सती, साध्वी और पतिव्रता है। महारानी द्रौपदी के चरित्र के द्वारा वेदव्यास ने भारतीय नारियों के समक्ष अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। वन-पर्व में द्रौपदी के गुणों का बहुत सुन्दर वर्णन हुआ है। पाण्डवों के वन में निवास करने के दौरान एक बार श्रीकृष्ण और सत्यभामा उनसे मिलने आते हैं।

सत्यभामा द्रौपदी से पूछती है- ‘उसके पांचों पति किस तरह उसके अनुकूल रहते हैं?’

द्रौपदी कहती है– ‘मैं अंहकार, काम और क्रोध को छोड़कर पाण्डवों की सेवा करती हूँ। मैं कभी उन्हें कटु-वचन नहीं कहती, असभ्य की भांति व्यवहार नहीं करती। पतियों के अभिप्रायपूर्ण संकेत का सदैव अनुसरण करती हूँ। देवता, मनुष्य, गन्धर्व या कितना भी रूपवान-सम्पन्न पुरुष मेरे सामने आ जाए, फिर भी मेरा मन पाण्डवों को नहीं छोड़ता। पतियों और उनके सेवकों को भोजन कराए बिना मैं कभी भोजन नहीं करती। उनके सोने के बाद ही मैं सोती हूँ। बाहर से जब मेरे पति आते हैं, तब मैं मुस्कराकर उनका स्वागत करती हूँ। मेरे पति जिस बात को या वस्तु को पसन्द नहीं करते, मैं भी उसे त्याग देती हूँ। गुरुजनों की सेवा-सुश्रुषा से ही मेरे पति मेरे अनुकूल रहते हैं।’

द्रौपदी के इस कथन में आदर्श नारी का चरित्र स्पष्ट होता है। इस आख्यान के माध्यम से वेदव्यास भारतीय नारियों को पति से प्रेम करने एवं उसके प्रति अनुरक्त रहने की शिक्षा देते हैं।

ज्ञान का विश्व-कोष

महाभारत ज्ञान का विश्व-कोष है। इस ग्रन्थ में मानवीय व्यवहार की जटिलताओं एवं सुंदरताओं की विशद व्याख्या की गई है। इसकी समग्रता के सम्बन्ध में स्वयं वेदव्यास ने कहा है- ‘इस ग्रन्थ में जो कुछ सत्य है, वह अन्यत्र है परन्तु जो कुछ इसमें नहीं है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है।’

निःसन्देह यह ग्रन्थ तत्कालीन धार्मिक, नैतिक और ऐतिहासिक आदर्शों का अमूल्य भण्डार है। महाभारत समस्त दर्शनों का सार एवं स्मृतियों का विस्तृत विवेचन-ग्रन्थ है तथा इसमें स्थान-स्थान पर आए उपाख्यानों के द्वारा लोकधर्म के विभिन्न अंगों पर बड़ी गहराई तक प्रकाश डाला गया है।

मानव जीवन की ऐसी कोई समस्या या ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिस पर इस ग्रन्थ में विस्तृत विवेचन न किया गया हो। आदि पर्व में महाभारत को केवल इतिहास ही नहीं, अपितु धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र भी कहा गया है।

महाभारत में कौरव-पाण्डवों के राजनीतिक संघर्ष का इतिहास तो है ही परन्तु साथ ही वह आर्य-संस्कृति और हिन्दू-धर्म के सर्वांगीण विकास की गाथा भी है। इस विशाल ग्रंथ में अनेक प्राचीन कथाएं सुंदर बागीचों की तरह सजाई गई हैं। इन कथाओं में दुष्यन्त-शकुन्तला की कथा, रामकथा, शिव-कथा, सावित्री एवं सत्यवान की कथा, मत्स्यावतार सहित दशावतार की कथा, नल और दमयन्ती की कथा आदि प्रमुख हैं।

महाभारत एक श्रेष्ठ धर्मशास्त्र है जिसमें पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन के विधि-विधानों तथा धर्म की विस्तृत व्याख्या की गई है। शान्ति-पर्व में राजधर्म, आपद्धर्म एवं मोक्ष का तथा अनुशासन-पर्व में दान का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह नीतिशास्त्र का भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। शान्ति-पर्व में भीष्म पितामह द्वारा धर्म एवं राजनीति पर लम्बा व्याख्यान दिया गया है। सभा-पर्व में नारद का राजनीतिक विषय पर व्याख्यान है।

विदुर के रूप में महाभारत की कथा को एक ऐसा दुर्लभ पात्र दिया गया है जिसकी कल्पना करना भी कठिन हैं। दासी-पुत्र, मंत्री एवं कनिष्ठ-भ्राता होते हुए भी विदुर सत्य के तेज से प्रकाशित हैं और धर्म एवं नीति के व्याख्याकार हैं। विदुर की भांति संजय भी अंधे राजा को सदैव सत्य ही बताते हैं किंतु पुत्र मोह से ग्रस्त धृतराष्ट्र उनकी बातों से सहमत नहीं होता और उन्हें बार-बार झिड़कता है किंतु न तो विदुर और न संजय कभी भी अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हैं।

इस कारण विदुर नीति एवं संजय नीति का भारतीय संस्कृति में बहुत आदर हुआ। उन्हें आज भी अनुकरणीय माना जाता है। महाभारत अध्यात्म का भी अनुपम ग्रन्थ है। इसमें श्रीमद्भागवद्गीता, सनत्सुजात के उपदेश, अनुगीता, पाराशर गीता, मोक्ष धर्म आदि महत्त्वपूर्ण अंश संकलित हैं। महाभारत में श्रेष्ठ धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक सिद्धान्तों का समावेश होने से इसे ‘हिन्दू-धर्म का वृहत् कोष’ कहा गया है। पौराणिक आख्यानों-उपाख्यानों का समावेश होने से इसे ‘पुराण-संहिता’ भी माना गया है।

महाभारत में मोक्ष के साधनों के रूप में कर्म, भक्ति, ज्ञान, तप आदि मार्गों का विवेचन होने से इसे ‘मोक्षशास्त्र’ भी कहते हैं। महाभारत में मोक्ष के साधनों और सांसारिक सुखों के बीच समन्वय किया गया है और चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की, मानव-जीवन के लक्ष्य के रूप में प्रतिष्ठा हुई है। धर्म को प्रधान पुरुषार्थ माना गया है।

महाभारत के अनुसार मनुष्य को धर्म का उल्लंघन किए बिना अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। इस ग्रन्थ में प्रवृत्ति, निवृति, कर्म और सन्यास सम्बन्धी विचारों का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन एवं समन्वयन हुआ है। महाभारत की शिक्षा का सार यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोककल्याण के लिए धर्मसम्मत कर्त्तव्य का पालन करता रहे।

साहित्यिक महत्त्व

साहित्य की दृष्टि से महाभारत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। एक प्रौढ़ महाकाव्य में जो लक्षण होने चाहिए, वे सभी लक्षण इस ग्रंथ में अपनी उच्चता के साथ उपस्थित हैं। भाषा, विचार, भाव, कथा, रोचकता, लोकोपयोगिता आदि विभिन्न दृष्टियों से यह उच्च कोटि का साहित्यिक ग्रंथ है। छंद, अलंकार, रस आदि की दृष्टि से भी यह एक प्रौढ़ रचना है।

 इस ग्रंथ की कथा में शृंगार रस, भक्ति रस और शान्त रस का परिपाक स्थान-स्थान पर हुआ है। वात्सल्य रस एवं वीभत्स रस भी अपने चरमोत्कर्ष के साथ उपस्थित हैं। स्वयं वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में लिखा है कि भविष्य में जितने भी लेखक होंगे, वे अपने ग्रंथों का लेखन इस ग्रंथ को आधार बनाकर करेंगे।

महाकाव्यों में इतिहास

रामायण तथा महाभारत दोनों ही महाकाव्यों में प्राचीन हिन्दू सभ्यता का वर्णन है। कुछ पाश्चात्य विद्वानों की धारणा है कि ये ग्रन्थ पूर्णतः लाक्षणिक हैं जिनमें कोई ऐतिहासिक सामग्री नहीं हैं परन्तु उनका मत गलत है। यह माना जा सकता है कि आलंकारिक वर्णनों एवं क्षेपकों आदि के कारण इनमें उपलब्ध तत्कालीन ऐतिहासिक सामग्री और बाद की ऐतिहासिक सामग्री को अलग कर पाना कठिन है किंतु ये ग्रंथ पूर्णतः अनैतिहासिक नहीं हैं।

राम तथा उनकी अयोध्या, रावण तथा उसकी लंका, रामसेतु निर्माण, राम-रावण युद्ध, कौरव तथा उनका हस्तिनापुर, पाण्डव तथा उनका इंद्रप्रस्थ, कौरव-पाण्डव युद्ध, श्रीकृष्ण एवं उनकी द्वारिका और कुरुक्षेत्र का मैदान सभी कुछ ऐतिहासिक सिद्ध हो चुके हैं।

भौतिक साक्ष्यों की कार्बन डेटिंग राम के काल को ई.पू. 5000 सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रकार महाभारत का युद्ध ई.पू.3102 के लगभग निर्धारित करते हैं। माना जाता है कि राम के वास्तविक काल के बाद रामायण का तथा महाभारत के वास्तविक काल के बाद महाभारत ग्रंथ का प्रणयन हुआ होगा।

उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया जा सकता है कि भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव युगातीत है। अर्थात् काल के प्रभाव से महाभारत का महत्व कम नहीं हुआ है, अपतिु समय के साथ इसमें वृद्धि होती चली गई है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – महाकाव्यकाल में भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव

भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा

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