Saturday, June 22, 2024
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अध्याय – 10 – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म (ब)

ऋग्वैदिक आर्यों का सामाजिक जीवन

ऋग्वेद से तत्कालीन समाज की जानकारी मिलती है जिसके अनुसार सामाजिक संरचना का आधार सगोत्रता थी। अनेक ऋग्वैदिक राजाओं के नामों से प्रकट होता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कुल अथवा गोत्र से होती थी। लोग जन (कबीले) के हित को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है परन्तु जनपद शब्द का एक बार भी प्रयोग नहीं हुआ।

लोग, जन के सदस्य थे, क्योंकि अभी राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। ऋग्वेद में कुटुम्ब अथवा कबीले के अर्थ में जिस दूसरे महत्त्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है विश्। इस शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है। सम्भवतः विश् को लड़ाई के उद्देश्य से ग्राम नामक छोटी इकाइयों में बांटा गया था। जब ये ग्राम एक-दूसरे से लड़ते थे तो संग्राम हो जाता था। बहुसंख्यक वैश्य वर्ण का उद्भव विश् से ही हुआ।

(1.) पारिवारिक जीवन: ऋग्वेद में परिवार के लिए कुल शब्द का प्रयोग हुआ है। कुल में न केवल माता, पिता, पुत्र, दास आदि का समावेश होता था अपितु कई अन्य लोग भी होते थे। अनुमान होता है कि पूर्व वैदिक-काल में परिवार के लिए गृह शब्द का प्रयोग होता था। प्राचीनतम हिन्द-यूरोपीय भाषाओं में इसी शब्द का उपयोग भान्जे, भतीजे, पोते आदि के लिए भी हुआ है। इसका अर्थ यह है कि पृथक् कुटुम्बों (अर्थात् कबीलों) की स्थापना की दिशा में पारिवारिक सम्बन्धों का विभेदीकरण बहुत अधिक नहीं हुआ था, और कुटुम्ब एक बड़ी सम्मिलित इकाई था।

रोमन समाज की तरह यह एक पितृतंत्रात्मक परिवार था, जिसमें पिता मुखिया था। उसे गृहपति कहा जाता था। गृहपति के रूप में परिवार की समस्त सम्पत्ति पर उसका अधिकार होता था। परिवार के समस्त सदस्यों को उसके आदेश का पालन करना होता था। आज्ञा की अवहेलना करने वाले सदस्य को वह अपनी इच्छानुसार कठोर दण्ड दे सकता था।

परिवार के समस्त सदस्यों के लालन-पालन, विवाह तथा उनकी उन्नति का ध्यान रखना उसका मुख्य कर्त्तव्य होता था। एक परिवार की अनेक पीढ़ियां एक घर में रहती थीं। इस काल के सामाजिक संगठन का मूलाधार भी कुटुम्ब ही था। पिता ही कुटुम्ब का प्रधान होता था। वह अपने कुटुम्ब के सदस्यों पर दया तथा सहानुभूति रखता था परन्तु अयोग्य सन्तान के साथ कठोर व्यवहार करता था।

कुटुम्ब में पिता को बहुत अधिकार प्राप्त थे। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। विवाह के उपरान्त भी पुत्र को अपनी पत्नी के साथ अपने पिता के घर में रहना होता था। वधू को अपने श्वसुर गृह के अनुशासन में रहना होता था। इस प्रकार इस काल में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। अतिथि सत्कार पर बल दिया जाता था और इसकी गणना पाँच महायज्ञों में होती थी। भगवानपुरा में तेरह कमरों वाला एक कच्चा भवन मिला है। इससे यह प्रमाणित हो सकता है कि इस भवन में या तो बड़ा परिवार रहता था या कुटुम्ब का मुखिया रहता था।

(2.) सन्तान की स्थिति: विवाह का प्रधान लक्ष्य सन्तान उत्पन्न करना होता था। ऋग्वैदिक आर्य युद्धों में लड़ने के लिए अनेक बहादुर पुत्रों की प्राप्ति हेतु भगवान से प्रार्थना करते थे। पुत्र उत्पन्न होने पर बड़ा उत्सव मानाया जाता था। लोग कन्या की आकांक्षा नहीं करते थे परन्तु उत्पन्न हो जाने पर उसके साथ सहानुभूति रखते थे और उसकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करते थे। विश्ववारा, घोषा, अपाला आदि स्त्रियों को इतनी उच्च-कोटि की शिक्षा दी गई थी कि वे वेद-मन्त्रों की भी रचना कर सकती थीं। ऋग्वेद में संतान और गोधन की प्राप्ति के लिए बार-बार इच्छा व्यक्त की गई है, किन्तु किसी भी सूक्त में पुत्री की प्राप्ति के लिए इच्छा व्यक्त नहीं की गई है।

(3.) विवाह की व्यवस्था: ऋग्वैदिक-काल के विभिन्न संस्कारों में विवाह का सर्वाधिक महत्त्व था। विवाह को एक उच्च एवं पवित्र संस्कार समझा जाता था। सामान्यतः माता-पिता ही अपने पुत्र-पुत्री के विवाह सम्बन्ध निर्धारित करते थे परन्तु कुछ स्थानों पर लड़के-लड़की की पूर्व-स्वीकृति लिए जाने के उदाहरण भी मिलते हैं। जन-साधारण में बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु राजवंशों में बहु-विवाह की प्रथा थी।

यद्यपि भाई-बहिन तथा पिता-पुत्री में विवाह वर्जित था तथापि आदिम प्रथाओं के प्रतीक बचे हुए थे। यम की जुड़वां बहन यमी ने यम के सम्मुख प्रेम का प्रस्ताव रखा था किंतु यम ने इसका विरोध किया था। बहुपतित्त्व के बारे में भी कुछ सूचना मिलती है। मरुतों ने रोदसी को मिलकर भोगा, और अश्विनी भाई सूर्य-पुत्री सूर्या के साथ रहते थे परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलते हैं। सम्भवतः ये मातृतंत्रात्मक अवस्था के अवशेष थे। पुत्र को, माता का नाम दिए जाने के भी कुछ उदारहण मिलते है, जैसे, मामतेय

कुछ लोग दहेज देकर और कुछ लोग दहेज लेकर कन्यादान करते थे। दहेज वही लोग देते थे जिनकी कन्या में कुछ त्रुटि होती थी। इसी प्रकार धन देकर वही लोग विवाह करते थे जिनके पुत्र में कोई त्रुटि होती थी। विवाह एक पवित्र बन्धन समझा जाता था और एक बार इस बन्धन में बंध जाने पर, आजीवन बन्धन नहीं टूट सकता था।

विधवा-विवाह का ऋग्वेद में कहीं संकेत नहीं मिलता। दस्युओं के साथ विवाह का निषेध था। ऋग्वेद में नियोग-प्रथा और विधवा-विवाह के अस्तित्त्व के बारे में भी जानकारी मिलती है। बाल-विवाह के अस्तित्त्व का कोई उदाहरण नहीं मिलता।

अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल में 16-17 वर्ष की आयु में विवाह होते थे। ऋग्वेद में अन्तर्जातीय विवाहों का भी उल्लेख है। अनुलोम तथा प्रतिलोम दोनों प्रकार के विवाहों के उदाहरण मिलते हैं। अनुलोम विवाह के अन्तर्गत ब्राह्मण विमद और राजकन्या कमद्यु तथा ब्रह्मर्षि श्यावाश्व तथा राजकन्या दार्भ्य के विवाहों का उल्लेख मिलता है। प्रतिलोम विवाह में देवयानि का राजा ययाति के साथ और ब्राह्मण कन्या शाश्वती का राजा असंग के साथ विवाह का उल्लेख मिलता है।

(4.) स्त्रियों की दशा: ऋग्वैदिक-काल में पुरुष की प्रधानता होने पर भी स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। ऋग्वेद में स्त्री को अग्नि देवता के समान माना गया है तथा कुछ मंत्रों में उसे उषा देवी के समान गौरव दिया गया है। फिर भी, ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पुत्रों की कामना देखने को मिलती है। विवाहिता स्त्रियाँ गृहस्वामिनी समझी जाती थीं और समस्त धार्मिक कार्यों में अपने पति का हाथ बंटाती थीं।

पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ समस्त उत्सवों में भाग लेती थीं। ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में पत्नी ही घर है, पत्नी ही गृहस्थी है, पत्नी ही आनन्द है, जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है आदि विचारों के प्रमाण मिलते हैं। वे पति की अर्द्धागिनी तथा गृह-स्वामिनी समझी जाती थीं।

स्त्रियाँ यज्ञ-याजन तथा धार्मिक उत्सवों में स्वतन्त्रतापूर्वक भाग लेती थी किंतु स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती थीं, उन्हें अपने पुरुष-सम्बन्धियों के सरंक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। विवाह के पूर्व कन्याओं को अपने पिता के संरक्षण तथा नियंत्रण में रहना पड़ता था। पिता के न रहने पर वह अपने भाई के संरक्षण में रहती थी। विवाह हो जाने पर वह पति के और विधवा हो जाने पर पुत्र के संरक्षण में रहती थी।

इस प्रकार स्त्री को सदैव किसी न किसी पुरुष का संरक्षण प्राप्त था। परिवार में स्त्री का मुख्य कार्य गृह-प्रबन्धन करना तथा बच्चों का लालन-पालन करना था। था। स्त्रियां सभा-समिति में भाग लेती थीं। वे पुत्रियों के साथ यज्ञों में भी सम्मिलित होती थीं। सूक्तों की रचना करने वाली घोषा, अपाला, लोपमुद्रा, पांच स्त्रियों के बारे में जानकारी मिलती है, किन्तु बाद के ग्रंथों में ऐसी 20 स्त्रियों के उल्लेख मिलते हैं। सूक्तों की रचना मौखिक रूप में होती थी। उस काल की कोई लिखित सामग्री नहीं मिलती।

(5.) नियोग-प्रथा: कुछ विद्वानों ने ऋग्वेद के एक अंश के आधार पर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि समाज में सती-प्रथा प्रचलित थी परन्तु उनके तर्कों में विशेष बल नहीं है। अधिकांश विद्वानों का माना है कि ऋग्वैदिक-काल में आर्यों में सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी अपितु इसके स्थान पर नियोग-प्रथा का प्रचलन था जिसके अन्तर्गत विधवा-स्त्री को पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने देवर अथवा कुटुम्ब के किसी अन्य व्यक्ति के साथ पत्नी के रूप में रहने की स्वीकृति प्राप्त थी।

नियोग-प्रथा से उत्पन्न सन्तान समाज में घृणित नहीं समझी जाती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में सधवा स्त्री को भी पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपने पति के जीवनकाल में ही किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति थी। ऋग्वैदिक-काल में विधवा-विवाह के स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलते।

(6.) वेश-भूषा: ऋग्वैदिक आर्य सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण धारण करते थे। ये लोग प्रायः तीन वस्त्र पहनते थे। कमर से नीचे धोती जैसा वस्त्र होता था जिसे ‘नीवि’ कहते थे। दूसरा वस्त्र काम कहलाता था और तीसरा वस्त्र अधिवास अथवा ‘द्रापि’ था जिसे शॉल की तरह ओढ़ा जाता था। वे सिर पर पगड़ी भी पहनते थे जिसे ‘ऊष्णीय’ कहते थे। ये लोग रंग-बिरंगे ऊनी तथा सूती वस्त्र पहनते थे।

कुछ वस्त्रों पर सोने का भी काम किया जाता था जिन्हें वे उत्सव के अवसर पर पहनते थे। स्त्री एवं पुरुष लम्बे बाल रखते थे जिनमें वे तेल डालते थे और कंघी करते थे। स्त्रियाँ चोटी बनाती थीं तथा जूड़ा बांधती थीं और पुरुष अपने बाल कुण्डल के आकार के रखते थे।

यद्यपि दाढ़ी रखने की प्रथा थी परन्तु कुछ लोग दाढ़ी मुंडवा भी लेते थे। ऋग्वैदिक आर्य, आभूषणों का भी प्रयोग करते थे जो प्रायः सोने के बने होते थे। भुजबन्ध, कान की बाली, कंगन, नूपुर आदि का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे। स्त्रियां सिर पर कुम्ब नामक विशेष प्रकार का आभूषण धारण करती थीं।

(7.) भोजन: चावल, जौ, फल, तरकारी, घी तथा दूध-दही ऋग्वैदिक आर्यों का मुख्य भोजन था। अनाज को भूनकर अथवा पीसकर, घी-दूध के साथ खाया जाता था। ये लोग फल तथा तरकारी का अधिक प्रयोग करते थे। कुछ पशुओं का मांस खाया जाता था।

(8.) पेय-पदार्थ: ऋग्वैदिक आर्य दो प्रकार के पेय पदार्थों का प्रयोग करते थे। एक को सोम कहते थे और दूसरे को सुरा। सोम एक वृक्ष के रस से बनाया जाता था जिसमें मादकता नहीं होती थी। यज्ञ के अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। सुरा में मादकता होती थी और यह अन्न से बनाई जाती थी। ऋग्वेद में सुरापान की निन्दा की गई है। ब्राह्मण इसे घृणा की दृष्टि से देखते थे।

(9.) मनोरंजन: ऋग्वैदिक आर्यों के आमोद-प्रमोद के प्रधान साधनों में रथ-संचालन, द्यूतर्कीड़ा, नृत्य एवं गायन, वाद्ययंत्र बजाना तथा पशु-पक्षियों का शिकार करना सम्मिलित थे। वे अपने जीवन को सुखी और आनन्दपूर्ण बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। जीवन को उल्लास के साथ बिताना उनका सहज स्वभाव था। वे लोग आमोद-प्रमोद के लिए विविध उत्सवों का आयोजन करते थे जिनमें नृत्य, गायन एवं वाद्यों के प्रदर्शन से अपना मनोरंजन करते थे।

इन आयोजनों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भाग लेते थे। नृत्य के साथ वीणा और करताल का प्रयोग होता था। गान में विभिन्न प्रकार के मन्त्रों तथा गीतों का और वाद्य संगीत में वीणा, दुन्दुभी, शंख, झांझ और मृदंग का प्रयोग होता था। विभिन्न अवसरों पर घुड़दौड़़, रथदौड़़ और मल्ल-युद्ध आयोजित किए जाते थे।

(10.) लेखन कला: यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों के पास ऋग्वेद जैसा महान् ग्रंथ था तथापि अधिकांश विद्वान मानते हैं कि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तथा उस काल का समस्त ज्ञान मौखिक था किंतु यह मत सही प्रतीत नहीं होता। उस काल की संस्कृत भाषा काफी उन्नत थी जिसका व्याकरण सम्बन्धी ठाठ देखते ही बनता है। प्रत्येक क्रिया के अलंकार, वचन, पुरुष आदि सुनिश्चित हैं और कारक एवं विभक्तियाँ के रूप भी नियत हैं।

इसके उपरांत भी यदि ऋग्वैदिक-काल के आर्य लेखन कला से अपरिचित थे तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। डॉ. भण्डारकर ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्यों को ऋग्वैदिक समय से ही लेखन कला का ज्ञान था और उनकी ब्राह्मी लिपि, प्रागैतिहासिक काल के मिट्टी के बर्तनों पर प्राप्त चिह्नों से विकसित हुई परन्तु डॉ. आर. सी. मजूमदार का मानना है कि जब तक निश्चित साक्ष्य नहीं मिलते तब तक यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा।

(11.) शिक्षा: ऋग्वैदिक-काल में शिक्षा सामान्यतः मौखिक होती थी। गुरु, शिष्यों को वेद-मन्त्रों की शिक्षा देते थे। विद्यार्थी उन्हें कण्ठस्थ कर लेते थे। शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि को बढ़ाना तथा आचरण को शुद्ध बनाना होता था। प्रत्येक ऋषिकुल एक वैदिक विद्यालय की तरह था जहाँ ऋषि-मुनि, कुमारों को शिक्षा देते थे। सभंवतः लड़के और लड़कियां दोनों ही पढ़ते थे। इसलिए कुछ स्त्रियां ऋगवेद के मंत्रों का निर्माण करती थीं। गायत्री मन्त्र उस युग के ज्ञान का उच्चतम मंत्र माना जाता था। उच्चारण के सात प्रकार और वाक् की चार अवस्थाओं का उल्लेख भी मिलता है।

(12.) औषधि: ऋग्वैदिक आर्य, स्वास्थ्य के प्रति सचेत थे। अश्विन औषधि-शास्त्र के देवता थे और उनकी पूजा की जाती थी। औषधियाँ जड़ी-बूटियों की होती थीं। उस काल में चिकित्सा करना व्यवसाय बन गया था।

(13.) आश्रम-व्यवस्था: ऋग्वैदिक काल में आश्रम-व्यवस्था का स्वरूप सामने नहीं आया था। इस समाज के लोग विभिन्न प्रकार के कर्म करते थे और सभी आर्य कहलाते थे।

(14.) गृह-व्यवस्था: ऋग्वैदिक आर्यों के घर बांस, लकड़ी तथा सरपत के बने होते थे। प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी जिसमें सदैव अग्नि जलती रहती थी। प्रत्येक घर में पुरुषों के लिए एक अलग बैठक और स्त्रियों के लिए अलग कक्ष होता था।

(15.) शव विसर्जन: इस काल में आर्य, मृतक शरीर को या तो जलाते थे या गाड़ते थे परन्तु विधवाओं को जलाया नहीं जाता था वरन् उन्हें गाड़ा जाता था।

(16.) नैतिकता: आर्यों के जीवन में नैतिक मूल्यों को बड़ा महत्त्व दिया गया था। अतिथियों, वृद्धों तथा गुरुजनों का आदर करना तथा अपने से छोटे के साथ स्नेह रखना उत्तम समझा जाता था। चोरी, लूट-पाट, व्यभिचार आदि अनैतिक कार्यों को पाप की दृष्टि से देखा जाता था। आर्यों के जीवन में समाज सेवा की भावना का विशेष महत्त्व था।

सामाजिक वर्गीकरण

(1.) वर्ण-व्यवस्था: ऋग्वैदिक-काल में व्यवसाय पर आधारित विभाजन प्रारंभ हो चुका था परन्तु यह विभाजन अभी सुस्पष्ट नहीं था। ऋग्वेद के प्रारम्भिक मण्डलों में वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी उल्लेख नहीं मिलता। वैश्य और शूद्र शब्दों का उल्लेख दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में ही मिलता है।

वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप कर्म और श्रम के सिद्धान्त पर आधारित था। कर्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्व हो सकता था। आवश्यकतानुसार लोग अपना वर्ण बदल भी सकते थे क्योंकि वर्ण-विभाजन जन्मजात नहीं था। इस सम्बन्ध में कठोर नियमों  का अभाव था। वर्णों में परस्पर खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्ध पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था।

शूद्र द्वारा बनाए गए भोजन को करने पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था और उनके सम्पर्क में आने अथवा उनका स्पर्श करने को अपवित्रता नहीं माना जाता था। ऋग्वेद में एक परिवार के सदस्य का कथन है- ‘मैं कवि हूँ, मेरा पिता वैद्य है, और मेरी माँ पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते हैं…।’ इसी प्रकार, देवापि और शान्तनु नामक दो भाइयों का उल्लेख मिलता है। देवापि पुरोहित थे और शान्तनु राजा। इससे स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक-काल में वर्ण-व्यवस्था कर्म प्रधान थी, न कि जन्म प्रधान।

(2.) आर्य-अनार्य का विभेद: ऋग्वेद में लगभग ई.पू.1500-1000 के पश्चिमोत्तर भारत के लोगों के शारीरिक रूप-रंग के बारे में जानकारी मिलती है। रंग के लिए वर्ण शब्द का उपयोग हुआ है। आर्य गौर वर्ण के थे जबकि भारत के मूल निवासी काले वर्ण के थे। रंग-भेद ने सामाजिक वर्गीकरण में आंशिक योग दिया होगा किंतु सामाजिक विभेद का सबसे बड़ा कारण, आर्यों की स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त करना था।

आर्यों ने काले वर्ण के स्थानीय निवासियों को अनार्य कहा। आर्यों एवं अनार्यों की शारीरिक रचना में भी भेद था। आर्यों की नाक ऊँची होती थी जबकि इसके विरुद्ध अनार्यों की नाक बैठी हुई आर्य लोग यज्ञ-अनुष्ठान, व्रतों का पालन करने वाले थे। आर्यों में अपने रक्त की विशुद्धता को कायम रखने की कामना थी। इस प्रकार समाज में दो वर्ग बन गए। दोनों वर्ग रंग, शरीर रचना, संस्कृति, जाति और भाषा की दृष्टि से नितान्त भिन्न थे। ऋग्वेद में उल्लेख है कि- ‘उग्र प्रकृति के ऋषि ने दोनों वर्णों का पोषण किया’।

(3) आर्यों में विभेद: आर्य कबीलों के मुखिया और पुरोहित, शत्रु राजा की पराजय के बाद मिले धन को परस्पर बांट लेते थे। विजय से प्राप्त धन पर असामान अधिकार के कारण सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुईं। वैश्यों एवं शूद्रों की तुलना में राजा और पुरोहित अधिक ऊंचे उठ गए। सामान्य जन बचा-खुचा धन प्राप्त करते थे। धीरे-धीरे ऋग्वैदिक समाज तीन समूहों में बंट गया- योद्धा, पुरोहित और सामान्य जन।

(4) दास व्यवस्था: ऋग्वेद के चौथे एवं दसवें मंडल में पहली बार शूद्रों का उल्लेख मिलता है। आर्यों ने दासों और दस्युओं को जीतकर अधीन बनाया तथा उन्हें शूद्र कहा। ऋग्वेद में पुरोहितों को दास सौंपने के उल्लेख बार-बार मिलते हैं। घर का काम करने वाली मुख्यतः दासियां थीं। घरेलू दासों के तो उल्लेख मिलते हैं किंतु श्रमिकों के नहीं। अतः अनुमान होता है कि ऋग्वैदिक-काल के दासों को कृषि अथवा अन्य उत्पादन कार्यां में नहीं लगाया जाता था।

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