Wednesday, May 22, 2024
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अध्याय – 13 – महाकाव्य काल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव (स)

महाकाव्य काल में आर्यों की राजनीतिक दशा

महाकाव्य काल तक आते-आते आर्यों का प्रसार पूर्व की ओर अंग तक हो गया। देश में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हुई। कुरु, पांचाल, कौशाम्बी, कौशल, काशी, विदेह, मगध तथा अंग इस युग के विशाल राज्य थे। महाजनपद की अवधारणा महाकाव्य काल के पश्चवर्ती बुद्धकाल में आई। महाकाव्य काल के राजा ‘महाराजाधिराज, सम्राट तथा चक्रवर्ती’ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे जो उनके राज्य विस्तार एवं प्रभुत्व की शक्ति प्रतीक थीं।

 चक्रवर्ती राजा चतुरंगिणी सेना रखते थे जिसमें अश्व, गज, रथ तथा पैदल सैनिक होते थे। शक्तिशाली राजा दिग्विजय का आयोजन करते थे तथा उसके पश्चात् राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठान करते थे। श्रीराम एवं युधिष्ठिर ने दिग्विजय यज्ञ किए।

महाकाव्य काल में राजपद वंशानुगत होता था तथ ज्येष्ठ पुत्र को मिलता था परन्तु ज्येष्ठ पुत्र यदि शरीर से दोषपूर्ण होता था तो उसे राजपद नहीं दिया जाता था। महाभारत में धृतराष्ट्र को अन्धा होने के कारण राजा नहीं बनाया गया। राजा धर्मानुकूल शासन करते थे और वे सर्वाधिकार सम्पन्न होते हुए भी निरंकुश नहीं होते थे।

राज्याभिषेक के अवसर पर राजा को प्रजा-पालन की शपथ लेनी पड़ती थी। राजा के लिए दुष्टों का दमन करना आवश्यक समझा जाता था। रामायण एवं महाभारत दोनों में प्रजापलन एवं दुष्टों का दमन राजा के आवश्यक गुण बताए गए हैं। महाभारत स्पष्टतः अन्यायी एवं दुराचारी शासकों के वध का निर्देश करता है। वेण, नहुष, निमि तथा सुदास आदि अत्याचारी राजाओं को प्रजा द्वारा मार डाला गया था।

राजा मंत्रिपरिषद् की सलाह पर शासन-कार्य करता था। रामायण में राजदरबार में मन्त्रियों के अतिरिक्त गुरु, ऋषि, पुरोहित, विद्वान तथा सैनिक पदाधिकारियों का उल्लेख है जो विभिन्न विषयों पर राजा को परामर्श देते थे। राम के राजतिलक के समय राज्य के प्रमुख पुरुषों की एक सभा हुई थी।

रामायण के अयोध्याकाण्ड में शासन के 18 विभागों का उल्लेख हुआ है जो निम्नलिखित अधिकारियों के अधीन थे-

(1) मन्त्री, (2) पुरोहित, (3) युवराज, (4) चमूपति (मुख्य सेनापति), (5) द्वारपाल, (6) अन्तर्वेशक (अन्तःपुर का निरीक्षक), (7) कारागार अधिकारी, (8) द्रव्य संचयकृत (राजभवन का मुख्य परिचारक), (9) विनियोजक (मुख्य कायाधिकारी), (10) प्रदेष्टा (मुख्य न्यायाधीश), (11) नगराध्यक्ष, (12) कार्य-निर्माणकृत (मुख्य अभियन्ता), (13) धर्माध्यक्ष, (14) सभाध्यक्ष, (15) दण्डपाल, (16) दुर्गपाल, (17) राष्ट्रान्तपालक (सीमारक्षक) तथा (18) अटवीपाल (अरण्य संरक्षक)।

महाभारत में भी राजा के अनेक मन्त्रियों का उल्लेख है। एक स्थान पर कहा गया है कि जिस प्रकार पशु मेघ पर, स्त्री अपने पति पर तथा ब्राह्मण वेद पर निर्भर करते हैं उसी प्रकार राजा अपने मन्त्रियों पर निर्भर करता है। इस ग्रन्थ में मन्त्रियों की संख्या 36 उल्लिखित है जो चारों वर्णों से लिए जाते थे। शासन में पुरोहितों का स्थान महत्वपूर्ण था।

मंत्रियों के विभागों को तीर्थ कहा जाता था। महाभारत काल में मुख्यतः राजतन्त्रीय व्यवस्था प्रचलित थी किंतु महाभारत में पाँच गणतन्त्रात्मक राज्यों का भी उल्लेख है- अन्धक, वृष्णि, यादव, कुकुर तथा भोज। इन पाँचों का एक संघ था जिसके अध्यक्ष श्रीकृष्ण थे। इस संघ के अन्तर्गत प्रत्येक गण को स्वायत्तता प्राप्त थी।

महाकाव्य काल में आर्यों की धार्मिक स्थिति

महाकाव्य काल तक आते-आते वैदिक धर्म का स्वरूप बिल्कुल परिवर्तित हो गया। पूर्व-वैदिक कालीन ‘कर्मकाण्ड-प्रधान धर्मों’ तथा उत्तर-वैदिक कालीन ‘ज्ञान प्रधान धर्मों’ का समन्वय होकर इस समय धर्म का व्यावहारिक रूप सामने आया जो सर्व-साधारण के लिए सुलभ था। प्राचीन वैदिक देवताओं का महत्व कम हो गया था तथा नए देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हो रही थी।

इनमें विष्णु, शिव, गणेश, पार्वती, दुर्गा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश (शिव) को त्रिमूर्ति कहा गया तथा उन्हें क्रमश. सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता एवं संहर्त्ता स्वीकार किया गया। शीघ्र ही ब्रह्मा का महत्व कम हो गया तथा शिव और विष्णु महाकाव्य कालीन धर्म के प्रमुख देवता हो गए। अवतारवाद एवं पुनर्जन्म की अवधारणाओं का समावेश हुआ।

राम और कृष्ण विष्णु के अवतार मान लिए गए। यह धारणा प्रचलित हुई कि ईश्वर अपने भक्तों की सहायता के लिए समय-समय पर पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। वह धर्म की स्थापना करते हैं, सज्जनों की रक्षा करते हैं तथा दुष्टों का विनाश करते हैं। महाभारत के भगवत्गीता वाले अंश में भगवान के बारे में यह धारणा प्रमुख रूप से स्थापित की गई है।

महाकाव्यों ने सामान्य जनता के समक्ष मोक्ष-प्राप्ति का एक सरल उपाय प्रस्तुत किया। यह था भक्ति का साधन जो सभी के लिए समान रूप से सुलभ था। इसके अनुसार ईश्वर, अपने उपासक द्वारा की गई भक्ति से प्रसन्न होकर उपासक को सभी पापों से मुक्त करके अपनी शरण में ले लेते हैं। महाभारत में पंचरात्र धर्म का वर्णन मिलता है जो आगे चलकर वैष्णव-धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ।

महाभारत में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मान्यता के अनुसार धर्मपालन की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें शैव तथा शाक्त धर्मों के प्रति सहिष्णुता तथा उदारता पर भी बल दिया गया है। भगवद्गीता महाभारत के ‘भीष्म-पर्व’ का अंश है। इसमें कर्म, भक्ति तथा ज्ञान इन तीनों का सुन्दर समन्वय मिलता है। गीता में कर्म की महत्ता प्रतिपादित की गयी है।

भक्ति का महत्व बताते हुए कृष्ण स्वयं यह कहते हैं- ‘सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में आ। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।’ रामायण तथा महाभारत में अनेक वैदिक यज्ञों का उल्लेख मिलता है परन्तु यज्ञों में होने वाली हिंसा का विरोध किया गया है तथा चित्त-शुद्धि को ही एकमात्र साधन स्वीकार किया गया।

दोनों महाकाव्यों में सत्य, अहिंसा, सदाचार, तप, त्याग आदि के पालन का उपदेश दिया गया है। महाकाव्यों का मुख्य उद्देश्य समाज में सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा करना था। विभिन्न कथाओं तथा चरित्रों के माध्यम से असत्य पर सत्य तथा अन्याय पर न्याय की विजय प्रदर्शित की गयी है। रामायण में सच्चरित्रता पर विशेष बल दिया गया है तथा कहा गया है कि यह चरित्र ही है जो मनुष्य को देवता की कोटि में पहुँचाता है। महाकाव्यों द्वारा प्रतिपादित आदर्श प्रत्येक युग के लिए अनुकरणीय है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वैदिक युग से चले आ रहे धार्मिक विश्वासों तथा क्रियाकलापों में महाकाव्य काल में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपनिषद काल में स्वतंत्र धार्मिक चिंतन की जो प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई थी, वह इस युग में अपने चरम पर पहुँच गई।

महाकाव्य काल में आर्यों की सामाजिक दशा

महाकाव्य युगीन समाज भी वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था। ऋग्वेद के समान रामायण में भी कहा गया है कि विराट पुरुष के मुँह से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उरुभाग से वैश्य तथा पैरों से शूद्र वर्णों की उत्पत्ति हुई। चारों वर्णों में ब्राह्मण अब भी सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। रामायण तथा महाभारत में ब्राह्मणों की कई कोटियां बताई गई हैं। कुछ ब्राह्मण क्षत्रिय कर्म करते थे तथा कुछ ब्राह्मण कृषि तथा पशुपालन द्वारा भी अपनी जीविका चलाते थे।

सामाजिक व्यवस्था में शूद्रों का स्थान सबसे नीचे था। उन्हें न तो तपस्या का अधिकार था और न वे विद्याध्ययन के लिए गुरुकुलों में जा सकते थे। रामायण में शम्बूक नामक एक शूद्र का उल्लेख हुआ है जो अनाधिकार तप करने के कारण राम के हाथों मारा गया किंतु राम ने निषादराज तथा शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया तथा केवट का अनुरोध स्वीकार करके उसे भी सम्मान दिया। अतः कहा जा सकता है कि इए काल में शूद्रों के सम्मान की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी।

महाभारत में आए एक प्रसंग के अनुसार एकलव्य नामक निषाद बालक को द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से मना कर दिया, जब उसने अपनी निष्ठा एवं लगन से स्वयं ही धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त कर ली तो द्रोणाचार्य ने उसके दायें हाथ का अंगूठा कटवा लिया किन्तु इस काल में शूद्रों की स्थिति में सुधार के चिह्न भी मिलते है। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि शूद्र-सेवकों का भरण-पोषण करना द्विज का कर्त्तव्य है।

राजा की मंत्रिपरिषद में शूद्र प्रतिनिधि भी रखे जाते थे। युधिष्ठिर ने राजसूय यंत्र के अवसर पर शूद्र प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया था। महाभारत के शान्तिपर्व में लिखा गया है कि चारों वर्णों को वेद पढ़ना चाहिए तथा शूद्र से भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। महाभारत में विदुर, मातंग, कायव्य आदि व्यक्तियों को, जन्मना शूद्र होते हुए भी प्रतिष्ठित स्थान दिए गए। उन्हें सेवावृत्ति, कृषि, पशुपालन, वाणिज्य आदि का भी अधिकार था।

महाकाव्य काल में वर्णों के साथ-साथ जातियों के नाम भी मिलते हैं। रामायण में यवन और शक तथा महाभारत में यवन, शक, किरात, पह्लव, आदि विदेशी जातियों का भी उल्लेख है। समाज में चार आश्रमों का विधान इस युग में भी देखने को मिलता है। शान्तिपर्व में चारों आश्रमों को ब्रह्मलोक में पहुँचने के चार सोपान बताए गए हैं। चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम का सर्वाधिक महत्व था।

महाकाव्य काल में स्त्रियों की दशा वैदिक-काल की अपेक्षा हीन थी। फिर भी समाज में उनके महत्व को पूर्णतः नकारा नहीं गया था। बाल-विवाह नहीं होते थे। उच्च-वर्ग की स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं। रामायण में कौशल्या और तारा को ‘मंत्रविद्’ कहा गया है। अत्रेयी ‘वेदान्त’ का अध्ययन करती हुई तथा सीता ‘संध्या’ करती हुई दिखाई गई हैं।

महाभारत में द्रौपदी को ‘पण्डिता’ कहा गया है। वह युधिष्ठिर तथा भीष्म से धर्म एवं नैतिकता पर वार्तालाप करती है। महाभारत स्त्री को धर्म, अर्थ तथा काम का मूल बताता है। अनुशासन पर्व में कहा गया है कि स्त्रियाँ समृद्धि की देवी हैं। अतः समृद्धि चाहने वाले व्यक्ति को उनका सम्मान करना चाहिये।

समाज में बहुविवाह तथा अन्तर्जातीय-विवाह का प्रचलन था। उच्च कुल के लोग अनेक पत्नियाँ रखते थे। क्षत्रिय कुलों में विवाह स्वयंवर प्रथा द्वारा होते थे। नियोग की प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें पति के नपुंसक अथवा रुग्ण होने पर पत्नी पर-पुरुष के साथ सन्तानोत्पत्ति हेतु सम्पर्क कर सकती थी।

महाभारत में सती-प्रथा के उदाहरण भी प्राप्त होते हैं, जैसे- माद्री अपने पति पाण्डु के साथ सती हो गई थी किन्तु ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ स्त्रियों ने अपने पतियों की मृत्यु के बाद सतीत्व का अनुसरण नहीं किया। महारानी कुंती महाराज पाण्डु के साथ सती नहीं हुईं। अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ भी सती नहीं हुई थीं।

महाभारत में हजारों यादव-विधवाओं का उल्लेख है जो अर्जुन के साथ द्वारिका से हस्तिनापुर तक गयी थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि शक-सीथियनों के आक्रमणों के कारण समाज में सती-प्रथा का प्रचलन बढ़ने लगा था। कहीं-कहीं पर्दा-प्रथा के उल्लेख भी मिलते हैं। इस प्रथा पर भी विदेशी आक्रमणों का ही प्रभाव था। महाभारत में वेश्याओं के भी उल्लेख मिलते है।

महाकाव्य काल में आर्यों की आर्थिक दशा

ऋग्वैदिक-काल, उत्तरवैदिक-काल तथा उपनिषद काल की तरह महाकाव्य काल में भी कृषि तथा पशुपालन आर्थिक जीवन के मुख्य आधार थे। हलों द्वारा कृषि होती थी जिन्हें बैलों की सहायता से खींचा जाता था। रामायण में राजा जनक को तथा महाभारत में युधिष्ठिर को हल चलाते हुए दिखाया गया है। इससे कृषि की महत्ता प्रतिपादित होती है।

सिंचाई के लिए अधिकतर वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता था किंतु ‘कुल्याओं’ (छोटी नहरों) का भी उल्लेख मिलता है। राज्य कृषि की उन्नति की ओर विशेष ध्यान देता था। उस काल में गेहूँ, जौ, उड़द, चना, तिल तथा चावल प्रमुख फसलें थी। भूमि उपजाऊ थी। गाय, बैल, हाथी, घोड़े भेड़ प्रमुख पालतू पशु थे। पशुओं की देख-रेख के लिए राज्य की ओर से ‘गोपाध्यक्ष’ नामक पदाधिकारी नियुक्त किया जाता था।

कृषि एवं पशुपालन के साथ-साथ व्यवसाय एवं व्यापार भी उन्नति पर थे। महाभारत में अनेक व्यवसाइयों का उल्लेख मिलता है जो विभिन्न स्थानों में श्रेणियाँ बनाकार निवास करते थे। प्रमुख व्यवसायियों में स्वर्णकार, लौहकार, बढ़ई, खनक, कुम्भकार, चर्मकार, रजक, शौण्डिक, तन्तुवाय, कम्बलकार, वैद्य, मालाकार, नापित आदि सम्मिलित थे। शिल्पी अपने कार्य में निपुणता प्राप्त कर चुके थे।

वे हाथीदांत, स्वर्ण, मणि तथा विविध रत्नों से सुन्दर आभूषण बनाते थे।  आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही व्यापार उन्नति पर थे। व्यापार मुख्यतः वैश्य जाति के लोग ही करते थे। रामायण में ‘यवद्वीप (वर्तमान में जावा)’ तथा ‘सुवर्णद्वीप (वर्तमान में सुमात्रा)’ का उल्लेख हुआ है जहाँ भारतीय व्यापारी जाया करते थे।

महाभारत में भी समुद्री यात्राओं, द्वीपों, जलपोतों आदि का उल्लेख है निससे ज्ञात होता है कि उस समय समुद्री व्यापार उन्नति पर था। कम्बोज, गन्धार, सिन्ध, प्राग्ज्योतिष (असम), विन्ध्यप्रदेश, चीन तथा बाह्लीक आदि देशों से व्यापार होता था तथा अनेक वस्तुएं मंगवायी जाती थीं। कम्बोज तथा बाह्लीक उत्तम घोड़ों के लिए विख्यात थे।

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