Wednesday, June 19, 2024
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अध्याय – 11 – उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म (स)

उत्तरवैदिक-कालीन आर्यों की आर्थिक स्थिति

उत्तर-वैदिक-काल में आर्यों की आर्थिक दशा में क्रमशः परिवर्तन होता गया था तथा अब उसमें जटिलता आने लगी थी। अब वे गाँवों के अतिरिक्त नगरों में भी निवास करने लगे थे और उनका जीवन अधिक सम्पन्न हो गया था।

(1.) धातु-ज्ञान में वृद्धि: आर्यों को ऋग्वैदिक-काल में ताम्र, स्वर्ण तथा अयस् आदि धातुओं का ज्ञान प्राप्त था परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में उन्हें लौह-अयस्, ताम्र-अयस्, रांगा, सीसा तथा चांदी का भी ज्ञान था। इस काल में लाल-अयस् तथा कृष्ण-अयस् का भी उल्लेख मिलता है। सम्भवतः लाल-अयस का तात्पर्य ताम्बे से और कृष्ण-अयस् का तात्पर्य लोहे से था।

(2.) लोहे के उपयोग में वृद्धि: उत्तर-वैदिक-काल में लोहे का अधिकाधिक उपयोग होने लगा। पाकिस्तान के गांधार प्रदेश में 1000 ई.पू. के आसपास गाढ़े गए शवों के साथ लोहे के बहुत सारे औजार और उपकरण मिले हैं। इस प्रकार की लौह निर्मित वस्तुएं बिलोचिस्तान से भी मिली हैं। लगभग उसी समय से पूर्र्वी पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी लोहे का उपयोग हो रहा था।

पुरातात्विक अन्वेषण से ज्ञात होता है कि 800 ई.पू. के लगभग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीरों के फलक और भालों के फलक जैसे लोहे के औजार बनने लग गए थे। लोहे के इन हथियारों से उत्तर-वैदिक आर्यों ने उत्तरी दो आब में बसे अपने बचे-खुचे शत्रुओं को परास्त किया होगा। उत्तरी गंगा की घाटियों के जंगलों को साफ करने के लिए लोहे की कुल्हाड़ी का उपयोग हुआ होगा। उस काल में वर्षामान 35 से 65 सेंटीमीटर तक होने से ये जंगल बहुत घने नहीं रहे होंगे।

वैदिक-काल के अंतिम चरण में लोहे का ज्ञान पूर्वी उत्तर प्रदेश और विदेह में फैल गया था। ई.पू. सातवीं सदी से इन प्रदेशों में लोहे के औजार मिलने लग जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे का प्रयोग सर्वाधिक हुआ। लोहे के हथियारों का उपयोग लगातार बढ़ते जाने के कारण योद्धा-वर्ग महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा। नए कृषि औजारों और उपकरणों की सहायता से किसान आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगे। राजा, सैनिक और प्रशासकीय आवश्यकताओं के लिए, इस अतिरिक्त उपज को एकत्र कर सकता था।

इस अतिरिक्त उपज को ईसा-पूर्व छठी सदी में स्थापित हुए नगरों के लिए भी जमा किया जा सकता था। इन भौतिक लाभों के कारण किसान का कृषि कार्य में लगातार लगे रहना स्वाभाविक था। लोग अपनी पुरानी बस्तियों से बाहर निकलकर समीप के नए क्षेत्रों में फैलने लगे। इस प्रकार लोहे का उपयोग बढ़ते जाने से आर्यों का ग्राम्य प्रधान जीवन नगरीकरण की ओर बढ़ने लगा तथा छोटे-छोटे जन के स्थान पर बड़े-बड़े जनपद राज्यों की स्थापना का मार्ग खुल गया।

(3.) भूमिपतियों का प्रादुर्भाव: ऋग्वैदिक-काल में भूमिपतियों का कहीं नाम नहीं था परन्तु अब बड़े-बड़े भूमिपतियों का प्रादुर्भाव हो रहा था। बहुत से भूमिपति सम्पूर्ण गाँव के स्वामी होते थे। गाँव के लोगों पर उनका बड़ा प्रभाव रहता था।

(4.) वैश्यों के काम का निर्धारण: उत्तर-वैदिक-काल में वैश्य वर्ग के अंतर्गत सामान्य प्रजा का समावेश होता था। उन्हें कृषि और पशुपालन जैसे उत्पादक कार्य सौंपे गए थे। कुछ वैश्य शिल्पकार भी थे। वैदिक-काल के अंत में वे व्यापार में जुट गए। उत्तर-वैदिक-काल में सम्भवतः केवल वैश्य ही भेंट अथवा उपहार देते थे। क्षत्रिय, वैश्यों से प्राप्त भेंट पर अपनी जीविका चलाते थे। सामान्य कबीलाई प्रजा को भेंट देने वालों की स्थिति में पहुँचने में लंबा समय लगा। कई ऐसे अनुष्ठान थे जिनके माध्यम से विश् अथवा वैश्यों को राजन्य के अधीन बनाया जाता था।

(5.) कृषि में आमूलचूल परिवर्तन: वैदिक-काल के आर्य मुख्यतः पशुपालक थे किंतु उत्तर-वैदिक-काल मे कृषि में बड़ी उन्नति हो गयी थी। अब आर्य लोग गंगा-यमुना की अत्यन्त उपजाऊ भूमि में पहुँच गए थे। अब वे बड़े-बड़े हलों का प्रयोग करने लगे थे। कृषि सम्बन्धी लोहे के औजार बहुत थोड़े मिले हैं किंतु इसमें संदेह नहीं कि उत्तर-वैदिक-कालीन लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि ही था।

कुछ वैदिक ग्रंथों में छः आठ, बारह और चौबीस बैलों द्वारा जोते जाने वाले हलों के उल्लेख मिलते हैं। इसमें अतिश्योक्ति हो सकती है। हलों के फाल लकड़ी के होते थे। उत्तरी गंगा की नरम मिट्टी में इनसे संभवतः काम चल जाता था। यज्ञों में होने वाली पशु-बलि के कारण पर्याप्त बैल उपलब्ध नहीं हो सकते थे। इसलिए कृषि आदिम स्तर की थी परन्तु इसमें संदेह नहीं कि यह व्यापक स्तर पर होती थी।

शतपथ ब्राह्मण में हल की जुताई से सम्बन्धित अनुष्ठानों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। प्राचीन आख्यानों के अनुसार सीता के पिता विदेहराज जनक भी स्वयं हल जोतते थे। उस जमाने में राजन्य और राजकुमार भी शारीरिक श्रम करने में संकोच नहीं करते थे। कृष्ण के भाई बलराम को हलधर कहा जाता है। बाद में उच्च वर्णों के लोगों द्वारा हल जोतने पर निषेध लग गया।

इस काल के कृषक विभिन्न प्रकार की खादों का भी प्रयोग करने लगे थे। वैदिक लोग यव (जौ) पैदा करते रहे परन्तु उत्तर-वैदिक काल में उनकी मुख्य पैदावार धान (चावल) और गेहूँ बन गया। कालांतर में गेहूँ का स्थान प्रमुख हो गया। आज भी उत्तर प्रदेश और पंजाब के लोगों का मुख्य अनाज गेहूँ ही है। दोआब में पहुँचने पर वैदिक लोगों को चावल की भी जानकारी मिली। वैदिक ग्रंथों में चावल को व्रीहि कहा गया है।

हस्तिनापुर से चावल के जो अवशेष मिले हैं वे ईसा पूर्व आठवीं सदी के हैं। अनुष्ठानों में चावल के उपयोग के विधान मिलते हैं परन्तु अनुष्ठानों में गेहूँ का बहुत कम उपयोग होता था। उत्तर-वैदिक-काल में कई तरह की दालें भी उगाई जाती थीं।

(6.) वाणिज्य तथा व्यापार में उन्नति: उत्तर-वैदिक-काल में, ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा व्यापार तथा वाणिज्य में अधिक वृद्धि हो गयी थी। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि अब वे एक विशाल मैदान के निवासी बन गए थे जो बड़ा ही उपजाऊ तथा धन-सम्पन्न था। इस काल में व्यापारियों का एक अलग वर्ग बन गया था जिन्हें वणिक कहते थे। धनी व्यापारी श्रेष्ठिन् कहलाता था।

आर्य लोगों का आन्तरिक व्यापार पहाड़ियों में रहने वाले किरातों के साथ होता था, जिन्हें ये कपड़े देकर औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ प्राप्त करते थे। अब ये लोग समुद्र से भी परिचित हो गए थे और बड़ी-बड़ी नावों द्वारा सामुद्रिक व्यापार भी करते थे। अब आर्य लोग निष्क, शतमान तथा कृष्णाल नाम की मुद्राओं का प्रयोग करने लगे थे जिससे व्यापार में बड़ी सुविधा होने लगी।

(7.) अन्य व्यवसायों की उन्नति: ऋग्वैदिक-काल की अपेक्षा अब उद्योग धन्धों में भी अधिक वृद्धि हो गई थी और कार्य विभाजन का सिद्धान्त दृढ़ हो गया था। यजुर्वेद में उन सब व्यवसायों का उल्लेख है जिन्हें इस काल की आर्य प्रजा करती थी। इनमें शिकारी, मछुए, पशुपालक, हलवाह, जौहरी, चटाई बनाने वाले, धोबी, रंगरेज, जुलाहे, कसाई, सुनार, बढ़ई आदि आते हैं।

उत्तरवैदिक-काल में कलाओं का विकास

उत्तर-वैदिक-काल में कला के क्षेत्र में भी कई परिवर्तन दिखाई देते हैं। काव्य-कला का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो गया था।

(1.) नगर एवं गृह निर्माण कला: ऋग्वैदिक-काल के बड़े गांव, उत्तरवैदिक-काल में बड़े-बड़े नगरों में परिवर्तित होने लगे थे। तैत्तिरीय ब्राह्मण में नगर में निवास करने वालों को नगरिन कहा गया है। राज्यों की राजधानियों में बडे-बड़े विशाल भवन एवं महल बनने लगे थे। हस्तिनापुर में ई.पू.900 से ई.पू. 500 की अवधि के स्तरों की खुदाई में बस्ती के अस्तित्त्व और नगरीय जीवन के प्रारंभ होने के प्रमाण मिलते हैं परन्तु पुरातत्त्व की यह जानकारी हस्तिनापुर के सम्बन्ध में महाभारत से मिलने वाली जानकारी से मेल नहीं खाती।

क्योंकि इस महाकाव्य का वर्तमान स्वरूप बहुत बाद में, ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में लिखा गया था, जब भौतिक जीवन की काफी उन्नति हो चुकी थी। उत्तर-वैदिक काल के लोग कच्ची और पक्की ईटों, मिट्टी बाँस तथा अन्य प्रकार की लकड़ी की सहायता से बनाए जाते थे। लकड़ी के बड़े बड़े लठ्ठों की सहायता से घर की छत बनाई जाती थी। घास-फूस और रबर इत्यादि की सहायता से छत पाटी जाती थी।

घर में अनेक कक्ष होते थे जिनमें फर्नीचर भी प्रयुक्त होता था। हस्तिनापुर की खुदाई में मिट्टी के जो स्मारक मिले हैं वे भव्य और टिकाऊ नहीं रहे होंगे। आगे चलकर हस्तिनापुर बाढ़ में बह गया। इसलिए कुरु-जन प्रयाग के समीप कौशाम्बी में जाकर बस गया।

(2.) धातु शिल्प कला: उत्तर-वैदिक-काल में अनेक कलाओं और शिल्पों का उदय हुआ। हमें लुहारों और धातुकारों के बारे में जानकारी मिलती है। लगभग 1000 ई.पू. के आसपास निश्चय ही इनका सम्बन्ध लोहे के उत्पादन से रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार से 1000 ई.पू. के पहले के तांबे के कई औजार मिले हैं उनसे वैदिक और अवैदिक दोनों ही समाजों में ताम्रकारों का अस्तित्त्व सूचित होता है।

वैदिक लोगों ने सम्भवतः राजस्थान के खेतड़ी की तांबे का उपयोग किया था। वैदिक लोगों ने सर्वप्रथम ताम्र धातु का उपयोग किया था। चित्रित धूसर भांडों वाले स्थलों से भी तांबे के औजार मिले हैं। इन ताम्र-वस्तुओं का उपयोग मुख्यतः युद्ध, आखेट और आभूषणों के लिए भी होता था।

(3.) बर्तन निर्माण कला: उत्तर-वैदिक-काल के लोग चार प्रकार के मिट्टी के बर्तनों से परिचित थे- काले एवं लाल भांड, काले रंग के भांड, चित्रित धूसर भांड और लाल भांड। अंतिम किस्म के भांड उन्हें अधिक प्रिय थे। ये भांड प्रायः पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मिले हैं परन्तु इस युग के विशिष्ठ भांड हैं- चित्रित धूसर भांड। इनमें कटोरे और थालियां मिली हैं जिनका उपयोग उच्च वर्णों के लोगों द्वारा पूजा-पाठ अथवा भोजन अथवा दोनों कामों के लिए होता था। चित्रित धूसर भांडों के साथ कांच की वस्तुएं और कंकण मिले हैं। उनका उपयोग भी उच्च वर्ग के सदस्य ही करते होंगे।

 (4.) वस्त्र कला: इस काल में सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। वस्त्र रंग-बिरंगे एवं सिले हुए होते थे। ऋग्वैदिक-काल की भांति वास, अधिवास, नीवी, तार्प्य, पगड़ी, उत्तरीय, अन्तरीय, कम्बल, शॉल आदि वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। धनी और राजपरिवारों के सदस्यों के वस्त्रों पर सोने-चाँदी की जरी का काम होता था। साधु-सन्यासी एवं आदिवासी लोग मृग चर्म का प्रयोग करते थे।

(5.) आभूषण निर्माण कला: पुरातात्त्विक खुदाई और वैदिक ग्रंथों से विशिष्ट शिल्पों के अस्तित्त्व के बारे में जानकारी मिलती है। उत्तर-वैदिक-काल के ग्रंथों में जौहरियों के भी उल्लेख मिलते हैं। ये सम्भवतः समाज के धनी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। स्त्री पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। उनके आभूषण ऋग्वैदिक-काल के समान ही थे। आभूषणों में कीमती पत्थरों को जड़ा जाता था। इस युग में चाँदी के आभूषणों का प्रयोग बढ़ गया जबकि ऋग्वैदिक-काल में चाँदी के आभूषण बहुत कम थे।

(6.) मनोरंजन: आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन के साधनों में ऋग्वेदकाल की तुलना में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। पहले की भाँति नृत्य, संगीत, जुआ, घुड़दौड़़, रथ-दौड़़ आदि मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

(7.) बुनाई कला: बुनाई का काम केवल स्त्रियाँ करती थीं, फिर भी यह काम बड़े पैमाने पर होता था।

(8.) काव्य कला: ऋग्वेद में केवल स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है, परन्तु यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा सूत्रों की रचना के द्वारा काव्य-क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत कर दिया गया। यजुर्वेद में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है। सामवेद गीति-काव्य है। संगीत-कला पर उसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अथर्ववेद में भूत-प्रेत से रक्षा तथा तन्त्र-मन्त्र का विधान है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में उच्चकोटि की दार्शनिक विवेचना है। सूत्रों की रचना इसी काल में हुई। सूत्रों के प्रादुर्भाव से, सूचनाओं को संक्षेप में लिखने की कला की उन्नति हुई।

(9.) खगोल विद्या: इस काल में खगोल विद्या की भी उन्नति हुई तथा आर्यों को अनेक नए नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त हो गया।

(10.) अन्य कलाएं: उत्तर-वैदिक-काल में चर्मकार, कुम्हार तथा बढ़ई आदि शिल्पों ने बहुत उन्नति की।

(11.) औषधि विज्ञान: औषधि-विज्ञान अब भी अवनत दशा में था।

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