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महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा

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महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से बहुत उन्नत थी। आर्यों ने मानव जीवन की उन्नति की लिए बहुमुखी चिंतन किया था।

महाकाव्य काल में आर्यों की राजनीतिक दशा

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा में राजनीतिक दशा का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। महाकाव्य काल तक आते-आते आर्यों का प्रसार पूर्व की ओर अंग तक हो गया। देश में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हुई। कुरु, पांचाल, कौशाम्बी, कौशल, काशी, विदेह, मगध तथा अंग इस युग के विशाल राज्य थे। महाजनपद की अवधारणा महाकाव्य काल के पश्चवर्ती बुद्धकाल में आई। महाकाव्य काल के राजा ‘महाराजाधिराज, सम्राट तथा चक्रवर्ती’ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे जो उनके राज्य विस्तार एवं प्रभुत्व की शक्ति प्रतीक थीं।

 चक्रवर्ती राजा चतुरंगिणी सेना रखते थे जिसमें अश्व, गज, रथ तथा पैदल सैनिक होते थे। शक्तिशाली राजा दिग्विजय का आयोजन करते थे तथा उसके पश्चात् राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठान करते थे। श्रीराम एवं युधिष्ठिर ने दिग्विजय यज्ञ किए।

महाकाव्य काल में राजपद वंशानुगत होता था तथ ज्येष्ठ पुत्र को मिलता था परन्तु ज्येष्ठ पुत्र यदि शरीर से दोषपूर्ण होता था तो उसे राजपद नहीं दिया जाता था। महाभारत में धृतराष्ट्र को अन्धा होने के कारण राजा नहीं बनाया गया। राजा धर्मानुकूल शासन करते थे और वे सर्वाधिकार सम्पन्न होते हुए भी निरंकुश नहीं होते थे।

राज्याभिषेक के अवसर पर राजा को प्रजा-पालन की शपथ लेनी पड़ती थी। राजा के लिए दुष्टों का दमन करना आवश्यक समझा जाता था। रामायण एवं महाभारत दोनों में प्रजापलन एवं दुष्टों का दमन राजा के आवश्यक गुण बताए गए हैं। महाभारत स्पष्टतः अन्यायी एवं दुराचारी शासकों के वध का निर्देश करता है। वेण, नहुष, निमि तथा सुदास आदि अत्याचारी राजाओं को प्रजा द्वारा मार डाला गया था।

राजा मंत्रिपरिषद् की सलाह पर शासन-कार्य करता था। रामायण में राजदरबार में मन्त्रियों के अतिरिक्त गुरु, ऋषि, पुरोहित, विद्वान तथा सैनिक पदाधिकारियों का उल्लेख है जो विभिन्न विषयों पर राजा को परामर्श देते थे। राम के राजतिलक के समय राज्य के प्रमुख पुरुषों की एक सभा हुई थी।

रामायण के अयोध्याकाण्ड में शासन के 18 विभागों का उल्लेख हुआ है जो निम्नलिखित अधिकारियों के अधीन थे-

(1) मन्त्री, (2) पुरोहित, (3) युवराज, (4) चमूपति (मुख्य सेनापति), (5) द्वारपाल, (6) अन्तर्वेशक (अन्तःपुर का निरीक्षक), (7) कारागार अधिकारी, (8) द्रव्य संचयकृत (राजभवन का मुख्य परिचारक), (9) विनियोजक (मुख्य कायाधिकारी), (10) प्रदेष्टा (मुख्य न्यायाधीश), (11) नगराध्यक्ष, (12) कार्य-निर्माणकृत (मुख्य अभियन्ता), (13) धर्माध्यक्ष, (14) सभाध्यक्ष, (15) दण्डपाल, (16) दुर्गपाल, (17) राष्ट्रान्तपालक (सीमारक्षक) तथा (18) अटवीपाल (अरण्य संरक्षक)।

महाभारत में भी राजा के अनेक मन्त्रियों का उल्लेख है। एक स्थान पर कहा गया है कि जिस प्रकार पशु मेघ पर, स्त्री अपने पति पर तथा ब्राह्मण वेद पर निर्भर करते हैं उसी प्रकार राजा अपने मन्त्रियों पर निर्भर करता है। इस ग्रन्थ में मन्त्रियों की संख्या 36 उल्लिखित है जो चारों वर्णों से लिए जाते थे। शासन में पुरोहितों का स्थान महत्वपूर्ण था।

मंत्रियों के विभागों को तीर्थ कहा जाता था। महाभारत काल में मुख्यतः राजतन्त्रीय व्यवस्था प्रचलित थी किंतु महाभारत में पाँच गणतन्त्रात्मक राज्यों का भी उल्लेख है- अन्धक, वृष्णि, यादव, कुकुर तथा भोज। इन पाँचों का एक संघ था जिसके अध्यक्ष श्रीकृष्ण थे। इस संघ के अन्तर्गत प्रत्येक गण को स्वायत्तता प्राप्त थी।

महाकाव्य काल में आर्यों की धार्मिक स्थिति

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा में धार्मिक स्थिति का बड़ा महत्व है। महाकाव्य काल तक आते-आते वैदिक धर्म का स्वरूप बिल्कुल परिवर्तित हो गया। पूर्व-वैदिक कालीन ‘कर्मकाण्ड-प्रधान धर्मों’ तथा उत्तर-वैदिक कालीन ‘ज्ञान प्रधान धर्मों’ का समन्वय होकर इस समय धर्म का व्यावहारिक रूप सामने आया जो सर्व-साधारण के लिए सुलभ था। प्राचीन वैदिक देवताओं का महत्व कम हो गया था तथा नए देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हो रही थी।

इनमें विष्णु, शिव, गणेश, पार्वती, दुर्गा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश (शिव) को त्रिमूर्ति कहा गया तथा उन्हें क्रमश. सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता एवं संहर्त्ता स्वीकार किया गया। शीघ्र ही ब्रह्मा का महत्व कम हो गया तथा शिव और विष्णु महाकाव्य कालीन धर्म के प्रमुख देवता हो गए। अवतारवाद एवं पुनर्जन्म की अवधारणाओं का समावेश हुआ।

राम और कृष्ण विष्णु के अवतार मान लिए गए। यह धारणा प्रचलित हुई कि ईश्वर अपने भक्तों की सहायता के लिए समय-समय पर पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। वह धर्म की स्थापना करते हैं, सज्जनों की रक्षा करते हैं तथा दुष्टों का विनाश करते हैं। महाभारत के भगवत्गीता वाले अंश में भगवान के बारे में यह धारणा प्रमुख रूप से स्थापित की गई है।

महाकाव्यों ने सामान्य जनता के समक्ष मोक्ष-प्राप्ति का एक सरल उपाय प्रस्तुत किया। यह था भक्ति का साधन जो सभी के लिए समान रूप से सुलभ था। इसके अनुसार ईश्वर, अपने उपासक द्वारा की गई भक्ति से प्रसन्न होकर उपासक को सभी पापों से मुक्त करके अपनी शरण में ले लेते हैं। महाभारत में पंचरात्र धर्म का वर्णन मिलता है जो आगे चलकर वैष्णव-धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ।

महाभारत में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मान्यता के अनुसार धर्मपालन की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें शैव तथा शाक्त धर्मों के प्रति सहिष्णुता तथा उदारता पर भी बल दिया गया है। भगवद्गीता महाभारत के ‘भीष्म-पर्व’ का अंश है। इसमें कर्म, भक्ति तथा ज्ञान इन तीनों का सुन्दर समन्वय मिलता है। गीता में कर्म की महत्ता प्रतिपादित की गयी है।

भक्ति का महत्व बताते हुए कृष्ण स्वयं यह कहते हैं- ‘सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में आ। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।’ रामायण तथा महाभारत में अनेक वैदिक यज्ञों का उल्लेख मिलता है परन्तु यज्ञों में होने वाली हिंसा का विरोध किया गया है तथा चित्त-शुद्धि को ही एकमात्र साधन स्वीकार किया गया।

दोनों महाकाव्यों में सत्य, अहिंसा, सदाचार, तप, त्याग आदि के पालन का उपदेश दिया गया है। महाकाव्यों का मुख्य उद्देश्य समाज में सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा करना था। विभिन्न कथाओं तथा चरित्रों के माध्यम से असत्य पर सत्य तथा अन्याय पर न्याय की विजय प्रदर्शित की गयी है। रामायण में सच्चरित्रता पर विशेष बल दिया गया है तथा कहा गया है कि यह चरित्र ही है जो मनुष्य को देवता की कोटि में पहुँचाता है। महाकाव्यों द्वारा प्रतिपादित आदर्श प्रत्येक युग के लिए अनुकरणीय है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वैदिक युग से चले आ रहे धार्मिक विश्वासों तथा क्रियाकलापों में महाकाव्य काल में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपनिषद काल में स्वतंत्र धार्मिक चिंतन की जो प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई थी, वह इस युग में अपने चरम पर पहुँच गई।

महाकाव्य काल में आर्यों की सामाजिक दशा

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा की वास्तविक तस्वीर सामाजिक अवस्था से ज्ञात होती है। महाकाव्य युगीन समाज भी वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था। ऋग्वेद के समान रामायण में भी कहा गया है कि विराट पुरुष के मुँह से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उरुभाग से वैश्य तथा पैरों से शूद्र वर्णों की उत्पत्ति हुई। चारों वर्णों में ब्राह्मण अब भी सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। रामायण तथा महाभारत में ब्राह्मणों की कई कोटियां बताई गई हैं। कुछ ब्राह्मण क्षत्रिय कर्म करते थे तथा कुछ ब्राह्मण कृषि तथा पशुपालन द्वारा भी अपनी जीविका चलाते थे।

सामाजिक व्यवस्था में शूद्रों का स्थान सबसे नीचे था। उन्हें न तो तपस्या का अधिकार था और न वे विद्याध्ययन के लिए गुरुकुलों में जा सकते थे। रामायण में शम्बूक नामक एक शूद्र का उल्लेख हुआ है जो अनाधिकार तप करने के कारण राम के हाथों मारा गया किंतु राम ने निषादराज तथा शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया तथा केवट का अनुरोध स्वीकार करके उसे भी सम्मान दिया। अतः कहा जा सकता है कि इए काल में शूद्रों के सम्मान की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी।

महाभारत में आए एक प्रसंग के अनुसार एकलव्य नामक निषाद बालक को द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से मना कर दिया, जब उसने अपनी निष्ठा एवं लगन से स्वयं ही धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त कर ली तो द्रोणाचार्य ने उसके दायें हाथ का अंगूठा कटवा लिया किन्तु इस काल में शूद्रों की स्थिति में सुधार के चिह्न भी मिलते है। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि शूद्र-सेवकों का भरण-पोषण करना द्विज का कर्त्तव्य है।

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राजा की मंत्रिपरिषद में शूद्र प्रतिनिधि भी रखे जाते थे। युधिष्ठिर ने राजसूय यंत्र के अवसर पर शूद्र प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया था। महाभारत के शान्तिपर्व में लिखा गया है कि चारों वर्णों को वेद पढ़ना चाहिए तथा शूद्र से भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। महाभारत में विदुर, मातंग, कायव्य आदि व्यक्तियों को, जन्मना शूद्र होते हुए भी प्रतिष्ठित स्थान दिए गए। उन्हें सेवावृत्ति, कृषि, पशुपालन, वाणिज्य आदि का भी अधिकार था। महाकाव्य काल में वर्णों के साथ-साथ जातियों के नाम भी मिलते हैं। रामायण में यवन और शक तथा महाभारत में यवन, शक, किरात, पह्लव, आदि विदेशी जातियों का भी उल्लेख है। समाज में चार आश्रमों का विधान इस युग में भी देखने को मिलता है। शान्तिपर्व में चारों आश्रमों को ब्रह्मलोक में पहुँचने के चार सोपान बताए गए हैं। चारों आश्रमों में गृहस्थ आश्रम का सर्वाधिक महत्व था। महाकाव्य काल में स्त्रियों की दशा वैदिक-काल की अपेक्षा हीन थी। फिर भी समाज में उनके महत्व को पूर्णतः नकारा नहीं गया था। बाल-विवाह नहीं होते थे। उच्च-वर्ग की स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं। रामायण में कौशल्या और तारा को ‘मंत्रविद्’ कहा गया है। अत्रेयी ‘वेदान्त’ का अध्ययन करती हुई तथा सीता ‘संध्या’ करती हुई दिखाई गई हैं।

महाभारत में द्रौपदी को ‘पण्डिता’ कहा गया है। वह युधिष्ठिर तथा भीष्म से धर्म एवं नैतिकता पर वार्तालाप करती है। महाभारत स्त्री को धर्म, अर्थ तथा काम का मूल बताता है। अनुशासन पर्व में कहा गया है कि स्त्रियाँ समृद्धि की देवी हैं। अतः समृद्धि चाहने वाले व्यक्ति को उनका सम्मान करना चाहिये।

समाज में बहुविवाह तथा अन्तर्जातीय-विवाह का प्रचलन था। उच्च कुल के लोग अनेक पत्नियाँ रखते थे। क्षत्रिय कुलों में विवाह स्वयंवर प्रथा द्वारा होते थे। नियोग की प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें पति के नपुंसक अथवा रुग्ण होने पर पत्नी पर-पुरुष के साथ सन्तानोत्पत्ति हेतु सम्पर्क कर सकती थी।

महाभारत में सती-प्रथा के उदाहरण भी प्राप्त होते हैं, जैसे- माद्री अपने पति पाण्डु के साथ सती हो गई थी किन्तु ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ स्त्रियों ने अपने पतियों की मृत्यु के बाद सतीत्व का अनुसरण नहीं किया। महारानी कुंती महाराज पाण्डु के साथ सती नहीं हुईं। अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नियाँ भी सती नहीं हुई थीं।

महाभारत में हजारों यादव-विधवाओं का उल्लेख है जो अर्जुन के साथ द्वारिका से हस्तिनापुर तक गयी थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि शक-सीथियनों के आक्रमणों के कारण समाज में सती-प्रथा का प्रचलन बढ़ने लगा था। कहीं-कहीं पर्दा-प्रथा के उल्लेख भी मिलते हैं। इस प्रथा पर भी विदेशी आक्रमणों का ही प्रभाव था। महाभारत में वेश्याओं के भी उल्लेख मिलते है।

महाकाव्य काल में आर्यों की आर्थिक दशा

ऋग्वैदिक-काल, उत्तरवैदिक-काल तथा उपनिषद काल की तरह महाकाव्य काल में भी कृषि तथा पशुपालन आर्थिक जीवन के मुख्य आधार थे। हलों द्वारा कृषि होती थी जिन्हें बैलों की सहायता से खींचा जाता था। रामायण में राजा जनक को तथा महाभारत में युधिष्ठिर को हल चलाते हुए दिखाया गया है। इससे कृषि की महत्ता प्रतिपादित होती है।

सिंचाई के लिए अधिकतर वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता था किंतु ‘कुल्याओं’ (छोटी नहरों) का भी उल्लेख मिलता है। राज्य कृषि की उन्नति की ओर विशेष ध्यान देता था। उस काल में गेहूँ, जौ, उड़द, चना, तिल तथा चावल प्रमुख फसलें थी। भूमि उपजाऊ थी। गाय, बैल, हाथी, घोड़े भेड़ प्रमुख पालतू पशु थे। पशुओं की देख-रेख के लिए राज्य की ओर से ‘गोपाध्यक्ष’ नामक पदाधिकारी नियुक्त किया जाता था।

कृषि एवं पशुपालन के साथ-साथ व्यवसाय एवं व्यापार भी उन्नति पर थे। महाभारत में अनेक व्यवसाइयों का उल्लेख मिलता है जो विभिन्न स्थानों में श्रेणियाँ बनाकार निवास करते थे। प्रमुख व्यवसायियों में स्वर्णकार, लौहकार, बढ़ई, खनक, कुम्भकार, चर्मकार, रजक, शौण्डिक, तन्तुवाय, कम्बलकार, वैद्य, मालाकार, नापित आदि सम्मिलित थे। शिल्पी अपने कार्य में निपुणता प्राप्त कर चुके थे।

वे हाथीदांत, स्वर्ण, मणि तथा विविध रत्नों से सुन्दर आभूषण बनाते थे।  आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही व्यापार उन्नति पर थे। व्यापार मुख्यतः वैश्य जाति के लोग ही करते थे। रामायण में ‘यवद्वीप (वर्तमान में जावा)’ तथा ‘सुवर्णद्वीप (वर्तमान में सुमात्रा)’ का उल्लेख हुआ है जहाँ भारतीय व्यापारी जाया करते थे।

महाभारत में भी समुद्री यात्राओं, द्वीपों, जलपोतों आदि का उल्लेख है निससे ज्ञात होता है कि उस समय समुद्री व्यापार उन्नति पर था। कम्बोज, गन्धार, सिन्ध, प्राग्ज्योतिष (असम), विन्ध्यप्रदेश, चीन तथा बाह्लीक आदि देशों से व्यापार होता था तथा अनेक वस्तुएं मंगवायी जाती थीं। कम्बोज तथा बाह्लीक उत्तम घोड़ों के लिए विख्यात थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – महाकाव्यकाल में भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव

भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

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श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन मानव मात्र को शांति देने वाला है। यह मनुष्य को ज्ञान, योग, भक्ति एवं कर्म के पथ पर चलने का सुझाव देता है। यह दर्शन महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित है।   

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन जानने से पहले इस पुस्तक का संक्षिप्त परिचय एवं इसकी रचना की पृष्ठभूमि जाननी आवश्यक है। महाभारत नामक महाकाव्य में कौरव-पाण्डव युद्ध की मूल कथा के साथ-साथ अध्यात्म-रामायण, विष्णु-सहस्रनाम, अनुगीता, श्रीमद्भगवत्गीता और हरिवंश-पुराण आदि ग्रंथ भी समाहित हैं। महाभारत की कथा के आधार पर भारतीय जन मानस में यह धारणा प्रचलित है कि भगवद्गीता, भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुई। भगवान ने गीता का उपदेश अपने शिष्य अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया।

महाभारत के भीष्मपर्व में 23 से 40वें अध्याय तक गीता के अट्ठारह अध्याय वर्णित हैं। साहित्यिक एवं पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर भारत में मान्यता है कि महभारत का युद्ध ईस्वी पूर्व 3102 में अर्थात् आज से लगभग 5120 वर्ष पूर्व हुआ। अतः भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश देने की घटना उसी समय हुई होगी।

श्रीमद्भगवत्गीता का रचनाकाल

आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार, दर्शनत्रशास्त्री तथा अन्य क्षेत्रों के विद्वान महाभारत युद्ध के काल को महाभारत ग्रंथ का रचना काल नहीं मानते। उनके अनुसार ग्रंथ की रचना, युद्ध के बहुत बाद में हुई। महाभारत नामक ग्रंथ की रचना का मूल समय ई.पू. चौथी शताब्दी माना जाता है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी में सामने आया। अतः गीता भी उसी काल की अथवा उसके बाद के किसी काल की रचना होनी चाहिए।

बाली द्वीप से गीता की एक अत्यंत प्राचीन पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें केवल अस्सी श्लोक ही हैं। बहुत से विद्वान इसी को गीता की मूल प्रति मानते हैं जिसे बाद में 700 श्लोकों में बदल दिया गया। भारतीय मुख्य भूमि और बाली द्वीप के बीच आर्यों एवं द्रविड़ों का आना-जाना रामायण काल एवं उससे भी पहले से है। अतः बाली में मिली गीता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आधुनिक काल में प्राप्त श्रीमद्भगवत्गीता में चार मनुओं का उल्लेख है-

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत्। (4, 1)

महर्षयरू सप्त पूर्वे चत्वारो मनुस्तथा। (10, 6)

बाद में मनुओं की संख्या बढ़कर 14 हो गई। कुछ पुराणों में 28 मनुओं की मान्यता भी है। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता का लेखन पौराणिक काल से पहले उस समय हुआ जब देश में चार मनुओं को ही मान्यता थी। यह काल उपनिषदों का काल है। पुराण उस समय भविष्य के गर्भ में थे। इसीलिए गीता पुराण नहीं है, उपनिषद है।

गीता में उपलब्ध सामग्री पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि वर्तमान गीता में  ब्रह्मसूत्र, तीन वेद तथा वेदांत का उल्लेख है। सांख्य दर्शन तथा योग का विचार भी गीता में अपने चरम पर है। गीता में अहिंसा, शील, यज्ञकर्म, पीपल की श्रेष्ठता, कुबेर यक्ष आदि की पूजा का उल्लेख किया गया है। ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर गीता की रचना के काल का अनुमान लगाया जा सकता है। गीता में अवतारवाद को पूरी तरह स्थापित किया गया है और श्रेष्ठ कर्म को भी योग बताया गया है।

आधुनिक भाषाशास्त्री, इतिहासकार तथा दर्शनशास्त्री यह सिद्ध करने में सफल रहे हैं कि मूल रूप में भगवद्गीता, महाभारत का हिस्सा नहीं थी, यह गुप्त शासकों के काल में प्रक्षेपक के रूप में महभारत में जोड़ी गई। इस घटना का उल्लेख पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्त शासकों के समय भारत आए फाह्यान ने किया है। वह लिखता है- ‘भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों देशवासी चर्चा करते थे।’

गीता के काल पर विशद् शोध करने वाले प्रोफसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता पहले अलग ग्रंथ थी, गुप्तकाल के आसपास यह महाभारत में सन्निवेशित हुई। इस कथन से यह सिद्ध होता है कि गुप्तकाल में गीता न केवल मौजूद थी अपितु महाभारत का हिस्सा बन गई थी। इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि गीता के 80 श्लोक, महाभारत में जुड़ने से पहले ही 700 श्लोकों में बदले गए होंगे।

आधुनिक शोधों के आधार पर माना गया है कि भगवद्गीता की रचना ई.पू. पांचवी शताब्दी में हुई। अर्थात् मौर्य काल से भी सौ साल पहले। बाद में इसके मूल पाठ में अनेक हेर-फेर होते रहे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् के अनुसार गीता की मूल रचना ई.पू.200 में अर्थात् शुंगकाल में हुई थी और इसका वर्तमान स्वरूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदांती द्वारा तैयार किया गया था।

गीता का प्राचीन स्वरूप

गुप्तकाल से पहले भारत में एक भी ग्रंथ ऐसा नहीं मिला है जिसमें भगवद्गीता का उल्लेख किया गया हो किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता इससे पहले अस्तित्व में नहीं थी। वह किसी स्वतंत्र ग्रंथ की तरह दर्शनशास्त्र का एक ग्रंथ थी। उसे भगवान की वाणी के रूप में मान्यता नहीं मिली थी और उस काल की गीता का दर्शन भी आज की गीता से भिन्न था।

होपकिन्स का विचार है कि गीता का अब जो कृष्ण-प्रधान स्वरूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णु-प्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई निस्सम्प्रदाय रचना थी। संभवतः विलम्ब से लिखा गया कोई उपनिषद्।

पाश्चात्य विद्वान गर्बे के अनुसार भगवद्गीता पहले, सांख्य-योग सम्बन्धी एक ग्रंथ था जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव की पूजा पद्धति आ मिली और ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर, इसका मेल, वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। भारत में गर्बे का सिद्धांत सामान्यतः अस्वीकार किया जाता है।

हाल्ट्ज्मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णु-प्रधान बनाया गया स्वरूप मानते हैं। कीथ का विश्वास है कि मूलतः गीता, श्वेताश्वतर के ढंग की एक उपनिषद् थी परंतु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। बार्नेट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्ड हो गईं।

फर्कुहार लिखता है कि यह एक पुरानी पद्य-उपनिषद् है जो संभवतः श्वेताश्वतर के बाद लिखी गई है और जिसे किसी कवि ने कृष्णवाद का समर्थन करने के लिए ईसा के बाद के किसी सन् में भगवद्गीता के वर्तमान स्वरूप में ढाल दिया है।

रूडोल्फ ओटो का कथन है कि मूल गीता, किसी महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धांतिक साहित्य नहीं था। ओटो का विश्वास है कि सैद्धांतिक अंश प्रक्षिप्त है। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है।

इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचारों की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिरा कर एक जगह मिलाई गई हैं। पश्चिमी दार्शनिक सुकरात की मृत्यु ईसा से 399 साल पहले हुई। उनके विचारों में गीता के बहुत से सिद्धांतों का समावेश है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि उस काल में गीता का दर्शन धरती के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका था।

पुराने आचार्यों ने भगवद्गीता को, भक्त को सुनाई गई देववाणी की बजाए एक दार्शनिक विमर्श के धरातल पर ही देखा है। बहुत से भारतीय मानते हैं कि भारत में श्रीकृष्ण के जन्म से बहुत पहले से बहुत से उपनिषद मौजूद थे।

भगवान श्री कृष्ण ने उन उपनिषदों के श्रेष्ठ विचारों के सार को गीता के रूप में उच्चारित किया। अतः यह कहा जा सकता है कि गीता के विचार किसी एक समय में प्रकट नहीं हुए। ये सैंकड़ों वर्षों के चिंतन का परिणाम हैं जो ईसा से लगभग पांच सौ साल पहले ठोस रूप ले चुके थे। बाली द्वीप से मिली गीता के 80 श्लोकों को गीता का एक प्रारम्भिक रूप माना जाना चाहिए।

भगवद्गीता का वास्तविक लेखक

भारतीय जनमानस इस बात को मानता है कि भगवद्गीता मूलतः भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, उपदेश के रूप में कही। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देने से पहले, अर्जुन से कहते हैं- ‘तुझसे पहले मैं गीता का पावन ज्ञान सूर्यदेव को सुना चुका हूँ।’

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने लिखा है कि जिस प्रकार हमें भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लखकों के नाम ज्ञात नहीं हैं, उसी प्रकार हमें गीता के रचयिता का नाम भी ज्ञात नहीं है। सर्वपल्ली राधाकृष्ण के अनुसार, गीता की रचना का श्रेय, भगवान वेदव्यास को दिया जाता है जो महाभारत के पौराणिक संकलनकर्ता हैं।

आधुनिक काल के अनेक विद्वानों का मानना है कि युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को 700 श्लोक बोलकर सुनाना संभव नहीं हुआ होगा। उन्होंने कुछ महत्वूपर्ण बातें कही होंगी जिन्हें बाद में किसी लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया होगा।

कृष्ण का उद्देश्य, मुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान की सर्वशक्तिशाली इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।

चौथी शताब्दी ईस्वी के गुप्तकालीन कवि कालीदास के ग्रंथों रघुवंश एवं कुमारसंभव में गीता का उल्लेख हुआ है। सातवीं शताब्दी के हर्षकालीन कवि बाणभट्ट के ग्रंथ कादंबरी में भी गीता का उल्लेख मिलता है।

पांचवी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों के शासन काल में चीनी-यात्री फाह्यान भारत आया। उसने लिखा है- ‘भाइयों के बीच झगड़े को लेकर लिखे गए एक बड़े ग्रंथ में उपदेशात्मक वचनों को जोड़ने को लेकर उन दिनों भारतवासी चर्चा किया करते थे।’

अर्थात् फाह्यान यह कहता है कि उसके भारत में आने से कुछ समय पहले महाभारत में गीता का समावेश किया गया था। इससे पहले ‘गीता’ एक स्वतंत्र ग्रंथ था। यह बात फाह्यान को किसी भारतीय ने बताई होगी।

सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री-यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक ऐसी कथा का उल्लेख किया है जो गीता के प्रसंग से मिलती-जुलती है। गीता के विधिवत् और नियमित अध्ययन एवं टीका लिखने का काम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य से प्रारंभ होता है। शंकराचार्य इस ग्रंथ के पहले टीकाकार माने जाते हैं।

प्रोफेसर दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने माना है कि गीता, गुप्तकाल के आसपास ही महाभारत में सन्निवेशित हुई। प्रोफेसर मेघनाद देसाई मानते हैं कि आदि शंकराचार्य के पूर्व, भारतीय ग्रंथों में गीता का उल्लेख बहुत कम हुआ है। आदि शंकराचार्य का जन्म ई.788 में माना जाता है। अर्थात् आठवीं शताब्दी के बाद ही भारत के साहित्य में गीता का उल्लेख होने लगा।

 प्रो. देसाई विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि गीता के लिखने वाले कम से कम तीन लेखक थे, जो तीन अलग-अलग समयों में हुए। वे यह भी मानते हैं कि गीता अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग श्रोताओं को संबोधित थी। प्रो. देसाई के अनुसार प्रथम लेखक के श्रोता- पंडित, मुनि, योगी, तत्वदर्शी इत्यादि थे। दूसरे लेखक के श्रोता- चुने हुए यति, योगी आदि थे, जबकि तीसरे लेखक के श्रोता आमजन थे।

डॉ. देसाई इस विवेचना में वे डॉ. गजानन खेर से काफी सहायता लेते हैं। खेर ने मराठी में ‘मूल गीता की खोज’ नामक शोध ग्रंथ लिखा था। प्रो. देसाई का मानना है कि गीता के तीसरे लेखक बादरायण थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी। वे इन दोनों ग्रंथों में बहुत सी समानताएं पाते हैं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता पर काफी विस्तार से लिखा है। उनकी मान्यता है कि बौद्ध धर्म के प्रतिकार के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने भगवद्गीता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया।

स्वामी विवेकानंद ने लिखा है- ‘गीता एक ऐसा सुंदर गुलदस्ता है, जिसमें उपनिषदों से चुन-चुनकर दार्शनिक सूक्तियों के खूबसूरत फूल सजाए गए हैं। गीता के लेखक ने अद्वैत, योग, ज्ञान, भक्ति आदि को सम्मिश्रित करने का काम किया है। उसने सभी सम्प्रदायों से सर्वश्रेष्ठ चुनाव किया और गीता की माला में पिरो दिया।’

इस प्रकार कहा जा सकता है कि गीता किसी एक लेखक की लिखी हुई नहीं है, उसे बहुत लम्बे कालखण्ड में बार-बार परिवर्द्धित करके वर्तमान स्वरूप तक लाया गया। गीता का विचार निश्चित रूप से भगवान श्रीकृष्ण से पहले भी मौजूद था। इसीलिए वैष्णवीय तन्त्रसार में कहा गया है-

सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपाल नंदनः

पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता, दुग्धम् गीतामृतम् महत्।

अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीतामृत रूपी दुग्ध प्राप्त किया तथा पृथा के पुत्र अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक उसका सेवन किया।

गीता की उपनिषदों से समानता

गीता और उपनिषदों में शब्दों और विचारों की पर्याप्त समानता पाई जाती है। कठोपनिषद् का निम्नलिखित श्लोक गीता के द्वितीय अध्याय के बीसवें श्लोक से लगभग शब्दशः उद्धृत किया गया है-

न जायते भ्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चित्र बभूव कश्चित्।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

(कठोपनिषद्, 1.2.18)

इसी प्रकार कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक का गीता के द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक से तादाम्य है-

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्।

उभौ तौ न विजानोतो नायं हन्ति न हन्यते।।

(कठोपनिषद्, 1.2.19)

भगवत्गीता के द्वितीय अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक से भाव ग्रहण किया गया है-

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यतः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विद्युः।

आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः।।

(कठोपनिषद्, 1.2.7)

भगवत्गीता के आठवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कठोपनिषद का निम्नलिखित श्लोक लगभग शब्दशः उद्धृत किया गया है-

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वयन्ति।

यदिच्छतो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।

(कठोपनिषद्, 1.2.15)

देवयान और पितृयान मार्गों का विचार सर्वप्रथम वेदों में आया था। इस विचार को उपनिषदों ने ग्रहण किया और बाद में गीता ने भी ग्रहण कर लिया। गीता के आठवें अध्याय के चौबीसवें एवं पच्चीसवें श्लोक में इसका वर्णन है-

कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।

एवं त्ययि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

(ईशावास्योपनिषद्, 2)

गीता के ग्यारहवें अध्याय का विषय ‘विश्वरूप दर्शन’ मुण्डकोपनिषद् के निम्नलिखित श्लोक से प्रेरित है-

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो दिशः श्रोत्रे, वाग् विवृताश्च वेदाः।

वायुः प्राणो, हृदय विश्वमस्य पदभ्यां ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा।।

(मुण्डकोपनिषद्, 2.1.4.)

गीता के तृतीय अध्याय का बयालीसवां श्लोक कठोपनिषद के निम्नलिखित श्लोक के दर्शन से साम्य रखता है-

इन्द्रियेभ्यः पराहह्यार्था अर्थेभ्यश्चः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।

(कठोपनिषद्, 1.3,10-11)

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गीता ने श्वेताश्वतरोपनिषद् के ईश्वरवाद और भक्ति तथा उपसना के महत्व को भी ग्रहण किया है। कठोपनिषद् में जिस अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन किया गया है ठीक वैसा ही गीता के पन्द्रहवें अध्याय में भी किया गया है परन्तु जहां कठोपनिषद् ने अश्वत्थ वृक्ष को ‘ब्रह्म’ माना है और ‘सद्’ मानने के कारण उसका नाश असम्भव माना है वहीं गीता ने उसको ‘संसार’ और ‘असद्’ माना है और इसलिए उसको उखाड़ फैंकने का उपदेश दिया है। अश्वत्थ शब्द का प्रयोग संसार के लिए ही उचित बैठता है क्योंकि अश्वत्थ का शाब्दिक अर्थ है- जो कल तक नहीं ठहरता, अर्थात् नाशवान्। यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वेदों एवं उपनिषदों से लिए गए संदर्भों की गीता में पुनरावृत्ति मात्र नहीं की गई है अपितु उन दार्शनिक सिद्धांतों का आगे विकास करने की दृष्टि से उन्हें ग्रहण किया गया है। उपनिषद् शास्त्रार्थ की तरह लिखे गए हैं जबकि गीता व्याख्यान की तरह है। उपनिषदों में ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों मार्गों का विवरण होने पर भी ज्ञान पर अधिक जोर दिया गया है, गीता उपनिषदों से अधिक व्यावहारिक और समन्वयवादी है। गीता में ‘कर्म’ और ‘भक्ति’ पर विशेष बल दिया गया है तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति का समन्वय किया गया है। डॉ. राधाकृष्णन् के अनुसार गीता में परस्पर विरोधी तत्वों का समवन्य करके उन्हें पूर्णता दी गई है।

स्वयं वेदव्यासजी ने गीता के अंत में कहा है-

गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरै।

यां स्वयं पद्मानाभस्य मुखपद्माद्विनिसृता।।

अर्थात् गीता को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अन्तःकरण में धारण कर लेना मुख्य कर्त्तव्य है। जो कि स्वयं श्री पद्मनाभ भगवान् विष्णु के मुखारविन्द से निकली हुई है। फिर अन्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन है! विलियम वॉन हम्बोल्ट ने लिखा है- ‘गीता किसी ज्ञात भाषा में उपस्थित गीतों में सम्भवतः सर्वाधिक सुन्दर और एकमात्र दार्शनिक गीत है।’

क्या गीता में बहुत से ग्रंथों के सिद्धांतों का मेल है ?

भारतीय चिंतन परम्परा अनेक दार्शनिक मतों का उदय हुआ जिनमें परस्पर विरोधी विचार प्रकट किए गए हैं। गीता के लेखक ने इन विरोधी एवं असंगत दिखाई पड़ने वाले तत्वों को मिलकार एक क्रमबद्ध सूत्र में पिरो दिया है जिन्हें स्वीकार करके, पाठक सच्चे आत्मिक जीवन की ओर बढ़ सकता है।

गीता पर भाष्य एवं टीकाएँ

संस्कृत साहित्य परम्परा में उन ग्रन्थों को ‘भाष्य’ कहते हैं जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नये दर्शन को मान्यता पाने के लिए उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा गीता पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था अर्थात् उनका भाष्य उनकी टीकाएँ लिखनी होती थीं। इस कारण गीता पर अनेक दार्शनिकों एवं धर्माचार्यों ने टीकाएँ लिखीं। संप्रदायों के अनुसार उन टीकाओं की संक्षिप्त सूची इस प्रकार है-

(1.) अद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ: शंकराचार्य कृत शांकराभाष्य,  श्रीधर कृत सुबोधिनी, मधुसूदन सरस्वती कृत गूढ़ार्थ दीपिका।

(2.) विशिष्टाद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : यामुनाचार्य कृत गीता अर्थसंग्रह, जिस पर वेदांत देशिक कृत गीतार्थ-संग्रह रक्षा टीका है। रामानुजाचार्य कृत गीताभाष्य, जिस पर वेदांत देशिक कृत तात्पर्य चंद्रिका टीका है।

(3.) द्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : मध्वाचार्य कृत गीताभाष्य, जिस पर जयतीर्थकृत प्रमेय दीपिका टीका है, मध्वाचार्य कृत गीता-तात्पर्य निर्णय।

(4.) शुद्धाद्वैत सम्पद्राय के आचार्यों द्वारा गीता की टीकाएँ : वल्लभाचार्य कृत तत्व दीपिका, जिस पर पुरुषोत्तम कृत अमृत तरंगिणी टीका है।

(5.) कश्मीरी लेखकों द्वारा गीता की टीकाएँ: अभिनव गुप्त कृत गीतार्थ संग्रह। आनंदवर्धन कृत ज्ञानकर्मसमुच्चय।

आधुनिक काल के लेखकों द्वारा गीता की टीकाएं –

भावार्थ दीपिका : संत ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वरकृत

ज्ञानेश्वरी : संत ज्ञानेश्वर (मराठी अनुवाद)

गीतारहस्य : बालगंगाधर तिलक

Essays on Gita  : अरविन्द घोष

ईश्वरार्जुन संवाद   : परमहंस योगानन्द

गीता तत्व विवेचनी टीका : जयदयाल गोयन्दका

भगवदगीता का सार : स्वामी क्रियानन्द

गीता साधक संजीवनी : स्वामी रामसुखदास

अनासक्ति योग : मोहनदास गांधी

गीता-प्रवचन : विनोबा भावे

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

वर्तमान समय में गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। नौवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य द्वारा रचित गीताभाष्य में भी श्लोकों की संख्या 700 बताई गई है– ‘तं धर्मं भगवता यथोपदिष्ट वेदव्यासः सर्वज्ञोभगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैः पनिबंध।’

20वीं सदी के लगभग जावा की भाषा में भीष्मपर्व का एक अनुवाद हुआ जिसमें गीता के अनेक मूल श्लोक सुरक्षित हैं। श्रीपाद कृष्ण बेल्वेलकर के अनुसार जावा के इस प्राचीन संस्करण में गीता के केवल साढ़े इक्यासी श्लोक मूल संस्कृत के हैं। उनसे भी वर्तमान पाठ का समर्थन होता है। गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र की गणना ‘प्रस्थानत्रयी’ में की जाती है।

गीता के माहात्म्य में उपनिषदों को गौ और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि उपनिषदों की जो अध्यात्म विद्या थी, उसको गीता सर्वांश में स्वीकार करती है। उपनिषदों की अनेक विद्याएँ गीता में हैं। जैसे, संसार के स्वरूप के सम्बन्ध में अश्वत्थ विद्या, अनादि अजन्मा ब्रह्म के विषय में अव्ययपुरुष विद्या, परा प्रकृति या जीव के विषय में अक्षरपुरुष विद्या और अपरा प्रकृति या भौतिक जगत के विषय में क्षरपुरुष विद्या। इस प्रकार वेदों का ब्रह्मवाद और उपनिषदों का अध्यात्म, दोनों ही गीता में संयोजित हैं, उसे ही ब्रह्मविद्या कहा गया है।

गीता में ब्रह्मविद्या का आशय निवृत्तिपरक ज्ञानमार्ग से है। इसे सांख्य-मत कहा जाता है जिसके साथ निवृत्ति-मार्गी जीवन-पद्धति जुड़ी हुई है किंतु गीता उपनिषदों के युग से आगे बढ़कर उस काल की देन है जब भारत में एक नया दर्शन जन्म ले रहा था और जो गृहस्थों के प्रवृत्ति-धर्म को निवृत्ति-मार्ग के समान फलदायी मानता था।

गीता में ‘योगशास्त्रे’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अभिप्राय ‘कर्मयोग’ से है। गीता में योग की दो परिभाषाएँ बताई गई हैं। एक निवृत्ति मार्ग की सृष्टि से जिसमें ‘समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है अर्थात् गुणों के वैषम्य में साम्यभाव रखना ही योग है। यह सांख्य सम्मत परिभाषा है।

गीता में योग की दूसरी परिभाषा ‘योगः कर्मसु कौशलम’ के रूप में दी गई है जिसका अर्थ है कि ऐसे उपाय से कर्म करना जिससे वह कर्म, बंधन का कारण न बने और कर्म करनेवाला व्यक्ति स्वयं को उसी असंग या निर्लेप स्थिति में रखे जो ज्ञानमार्गियों को मिलती है। इसी युक्ति का नाम बुद्धियोग है और यही गीता के योग का सार है।

गीता के अठारह अध्याय हैं जिनमें से दूसरे अध्याय में प्रयुक्त ‘तस्य प्रज्ञाप्रतिष्ठिता’ का अभिप्राय ‘निर्लेप कर्म की क्षमतावली बुद्धि’ से है। यह संन्यास द्वारा वैराग्य प्राप्त करने की स्थिति नहीं थी अपितु कर्म करते हुए प्रतिक्षण मन को वैराग्ययुक्त स्थिति में स्थिर करने की युक्ति थी। यही गीता का कर्मयोग है। गीता में अनेक स्थलों में ‘सांख्य के निवृत्ति मार्ग’ और ‘कर्म के प्रवृत्तिमार्ग’ की व्याख्या की गई है और दोनों को श्रेयस्कर बताया गया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म.दर्शन मूलतः उपनिषदों के दर्शन पर आधारित है। जहाँ उपनिषदों में परस्पर विरोधी एवं भिन्न-भिन्न दर्शन प्रस्तुत किए गए हैं, वहीं पर श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म.दर्शन उन समस्त दर्शनों का समन्यव प्रस्तुत करता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भगवद्गीता का दर्शन

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

गीता के अठारह अध्याय

गीता के अठारह अध्याय

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गीता के अठारह अध्याय

गीता के अठारह अध्याय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पृथा के पुत्र अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिए गए उपदेशों के एक निश्चित क्रम में हैं तथा विषय-वस्तु एवं दर्शन की दृष्टि से वे एक दूसरे से सम्बद्ध हैं।

प्रथम अध्याय

गीता के प्रथम अध्याय का नाम अर्जुन-विषाद-योग है। वह गीता के उपदेश का विलक्षण दृश्य प्रस्तुत करता है जिसमें श्रोता अर्जुन और वक्ता श्रीकृष्ण जीवन की प्रगाढ़ समस्या के समाधान के लिये प्रवृत्त होते हैं। अर्जुन वीर क्षत्रिय था किंतु अपने ही बंधु-बांधवों को युद्ध के मैदान में खड़ा देखकर वह क्षत्रियोचित कर्म भूलकर श्रीकृष्ण से युद्ध से विमुख होने की आज्ञा मांगने लगा।  उसका तर्क धर्मयुक्त जान पड़ता है जिसमें वह भूमि के लिए स्वजनों का वध नहीं करना चाहता किंतु उसने स्वयं ही उसे कायरता कहा है। इस प्रकार पहले अध्याय में भूमिका रूप में अर्जुन ने भगवान से अपनी स्थिति कही है।

द्वितीय अध्याय

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दूसरे अध्याय का नाम सांख्य-योग है। अर्जुन को प्रियजनों के जीवन के लिए कातर होकर रोते हुए देखकर कृष्ण उसे ध्यान दिलाते हैं कि क्षत्रिय होने के कारण उसे इस प्रकार का क्लैव्य प्रदर्शित करना उचित नहीं है। वे अर्जुन को भारत के दो प्राचीन एवं विख्यात दर्शनों की जानकारी देते हैं जिससे अर्जुन को कर्त्तव्य का वास्वतिक ज्ञान हो तथा वह कातरता एवं क्लैव्य का त्याग कर दे। कृष्ण ने अर्जुन की युक्तियों को प्रज्ञावाद का झूठा रूप कहा। कृष्ण कहते हैं कि प्रज्ञादर्शन काल, कर्म और स्वभाव से होने वाले संसार की सब घटनाओं और स्थितियों को अनिवार्य रूप से स्वीकार करता है। जीना और मरना, जन्म लेना और बढ़ना, विषयों का आना और जाना। सुख और दुःख का अनुभव, ये तो संसार में होते ही हैं, इसी को प्राचीन आचार्य पर्यायवाद का नाम भी देते थे। काल की चक्रगति इन समस्त स्थितियों को लाती और ले जाती है। जीवन के इस स्वभाव को जान लेने पर शोक नहीं होता। यही भगवान का व्यंग्य है कि प्रज्ञायुक्त दृष्टिकोण को मानते हुए भी अर्जुन इस प्रकार के मोह में क्यों पड़ा है? प्रज्ञावाद के अनुसार जीवन की नित्यता और शरीर की अनित्यता निश्चित है। ‘नित्य जीव’ के लिए शोक करना उतना ही व्यर्थ है जितना ‘अनित्य शरीर’ को बचाने की चिंता। ये दोनों अपरिहार्य हैं।

जन्म और मृत्यु बारी-बारी से होते ही हैं, ऐसा समझकर शोक करना उचित नहीं है। दूसरा दृष्टिकोण स्वधर्म का है। जन्म से ही प्रकृति ने सबके लिए एक धर्म नियत किया है। उसमें जीवन का मार्ग, इच्छाओं की परिधि, कर्म की शक्ति सभी कुछ आ जाता है। इससे निकल कर भागा नहीं जा सकता। कोई भागे भी तो प्रकृति उसे फिर खींच लाती है।

इस प्रकार भगवान ने अर्जुन को काल के परिवर्तन, जीव की नित्यता और व्यक्ति के स्वधर्म का ज्ञान कराया है जिसे सांख्य की बुद्धि कहा गया है। इससे आगे भगवान ने योगमार्ग की बुद्धि का भी वर्णन किया। यह बुद्धि कर्म या प्रवृत्ति मार्ग के आग्रह की बुद्धि है। कर्मयोगी को कर्म करते हुए कर्म के फल की आसक्ति से बचना आवश्यक है।

अर्जुन को संदेह हुआ कि क्या इस प्रकार की बुद्धि प्राप्त करना संभव है, व्यक्ति कर्म करे और फल की इच्छा न करे? इसलिए अर्जुन ने पूछा कि इस प्रकार का दृढ़ प्रज्ञावाला व्यक्ति जीवन का व्यवहार कैसे करता है? आना, जाना, खाना, पीना, कर्म करना, उनमें लिप्त होकर भी निर्लेप कैसे रहा जा सकता है?

कृष्ण ने मन के संयम की व्याख्या करते हुए अर्जुन को बताया कि काम, क्रोध, भय, राग, द्वेष के द्वारा मन का सौम्यभाव बिगड़ जाता है और इंद्रियाँ वश में नहीं रहतीं। बाहर से कोई विषयों को छोड़ भी दे तो भी भीतर का मन नहीं मानता। विषयों का स्वाद जब मन से जाता है, तभी मन प्रफुल्लित, शांत और सुखी होता है। इसे गीता में ब्राह्मी-स्थिति कहा है।

तीसरा अध्याय

तीसरे अध्याय का नाम कर्म-योग है। अर्जुन भगवान से प्रश्न करता है कि सांख्य और योग इन दोनों मार्गों में आप किसे अच्छा समझते हैं और क्यों नहीं यह निश्चित कहते कि मैं इन दोनों में से किसे अपनाऊँ? इस पर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि लोक में दो निष्ठाएँ या जीवन-दृष्टियाँ हैं- सांख्यवादियों के लिए ज्ञानयोग और कर्ममार्गियों के लिए कर्मयोग। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि संसार में कोई व्यक्ति कर्म छोड़ ही नहीं सकता।

प्रकृति तीनों गुणों (सत्, रज एवं तम) के प्रभाव से व्यक्ति को कर्म करने के लिए बाध्य करती है। कर्म से बचने वाले बाहरी रूप से तो कर्म छोड़कर बैठ जाते हैं किंतु मन उसमें ही डूबा रहता है। यह मिथ्याचार है। मन में कर्मेद्रियों को रोककर कर्म करना ही श्रेयस्कर है। कर्म के बिना तो भोजन के लिए अन्न भी नहीं मिल सकता। श्रीकृष्ण ने कर्म के विधान को चक्र के रूप में उपस्थित किया।

न केवल विभिन्न मनुष्यों के कर्मचक्र सामाजिक व्यवस्था में अरों की तरह परस्पर पिरोए हुए हैं अपितु पृथ्वी के मनुष्य और स्वर्ग के देवता दोनों का सम्बन्ध भी कर्मचक्र पर आश्रित है। धरती पर मनुष्य कृषि करते हैं और दैवीय शक्तियाँ वृष्टि का जल भेजती हैं। अन्न और पर्जन्य दोनों कर्म से उत्पन्न होते हैं। एक में मानवीय कर्म, दूसरे में दैवीय कर्म। कर्म के पक्ष में लोकसंग्रह की युक्ति भी दी गई है, अर्थात् कर्म के बिना समाज का ढाँचा खड़ा नहीं रह सकता।

राजा जनक जैसे ज्ञानी भी कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। कृष्ण ने स्वयं अपना ही दृष्टांत देकर कहा कि मैं नारायण का रूप हूँ, मेरे लिए कुछ कर्म शेष नहीं है। फिर भी तंद्रारहित होकर कर्म करता हूँ और अन्य लोग मेरे मार्ग पर चलते हैं। अंतर इतना ही है कि मूर्ख लिप्त होकर कर्म करते हैं और ज्ञानी असंग-भाव से कर्म करते हैं।

चौथा अध्याय

गीता के चौथे अध्याय का नाम ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग है। इसमें बाताया गया है कि ज्ञान प्राप्त करके कर्म करते हुए भी कर्मसंन्यास का फल किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। इसमें सच्चे कर्मयोग को चक्रवर्ती राजाओं की परंपरा में घटित माना है। मांधाता, सुदर्शन आदि अनेक चक्रवर्ती राजाओं के दृष्टांत दिए गए हैं।

 भगवान अर्जुन को अपना संकल्प भी बताते हैं कि जब भी धर्म की हानि होती है मैं साधुओं की रक्षा एवं धर्म के उत्थान के लिए अवतार लेता हूँ। गीता के इसी अध्याय में कहा गया है- ‘क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।’ अर्थात् इस लोक में कर्मां से सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है। अर्थात् इस अध्याय में कर्म का महत्व भलीभांति स्थापित कर दिया गया है किंतु उस कर्म में असंग भाव होना चाहिए अर्थात् फल की आसक्ति से बचकर कर्म करना चाहिए।

पांचवा अध्याय

गीता के पाँचवे अध्याय का नाम कर्म-संन्यास-योग है। इस अध्याय में फिर मनुष्य के कर्म और अनासक्ति भाव सम्बन्धी युक्तियाँ और भी दृढ़ रूप में कही गई हैं। इसमें कर्म के साथ मन के सम्बन्ध को विशुद्ध करने पर बल दिया गया है। यह भी कहा गया है कि साधना के उच्च धरातल पर पहुँचकर सांख्य और योग में कोई भेद नहीं रह जाता।

किसी एक मार्ग पर ठीक प्रकार से चले तो समान फल प्राप्त होता है। जीवन के समस्त कर्मों का समर्पण कर देने से व्यक्ति शांति के ध्रुव-बिंदु पर पहुँच जाता है और जल में खिले कमल के समान कर्म रूपी जल से लिप्त नहीं होता।

छठा अध्याय

गीता के छठे अध्याय का नाम आत्म-संयम-योग है जिसका विषय नाम से ही प्रकट है। जितने विषय हैं उन सबसे इंद्रियों का संयम ही कर्म और ज्ञान का निचोड़ है। सुख और दुःख में मन की समान स्थिति को ही योग कहते हैं।

सातवाँ अध्याय

गीता के सातवें अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञान-योग है। वैदिक दृष्टि में मानव मात्र के लिए विज्ञान जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। सृष्टि के वैविध्य का ज्ञान ही विज्ञान है और वैविध्य से एकत्व स्थापित करना ज्ञान है। ये दोनों दृष्टियाँ मानव के लिए उचित हैं। विज्ञान की दृष्टि से गीता ने प्रकृति के दो रूपों- अपरा और परा की सुनिश्चित व्याख्या दी है।

अपरा प्रकृति में आठ तत्व हैं, पंचभूत, मन, बुद्धि और अहंकार। जिस अंड से मानव का जन्म होता है। उसमें ये आठों तत्व रहते हैं किंतु यह प्राकृत सर्ग है अर्थात् यह जड़ है। इसमें ईश्वर की चेष्टा के संपर्क से जो चेतना आती है उसे परा प्रकृति कहते हैं; वही जीव है। आठ तत्वों के साथ मिलकर जीवन नौवाँ तत्व हो जाता है। इस अध्याय में भगवान के अनेक रूपों का उल्लेख किया गया है (जिनका और अधिक विस्तार विभूतियोग नामक दसवें अध्याय में है)।

सातवें अध्याय में विशेष भगवती दृष्टि का भी उल्लेख है जिसका सूत्र- ‘वासुदेवः सर्वमिति’ अर्थात् सब वसु या शरीरों में एक ही देवतत्व है, उसी की संज्ञा ‘विष्णु’ है किंतु लोक में अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अनेक नामों और रूपों में उसी एक देवतत्व की उपासना की जाती है।

आठवाँ अध्याय

गीता के आठवें अध्याय का नाम ‘अक्षर-ब्रह्म-योग’ है। उपनिषदों में अक्षर विद्या का विस्तार हुआ। गीता में उस अक्षर विद्या का सार दिया गया है- ‘अक्षर ब्रह्म परमं’ अर्थात् परब्रह्म की संज्ञा अक्षर है। मनुष्य, अर्थात् जीव और शरीर की संयुक्त रचना का ही नाम अध्यात्म है। जीवसंयुक्त भौतिक देह की संज्ञा क्षर है और केवल शक्तितत्व की संज्ञा आधिदैवक है। देह के भीतर जीव, ईश्वर तथा भूत ये तीन शक्तियाँ मिलकर जिस प्रकार कार्य करती हैं उसे अधियज्ञ कहते हैं। गीता के अनुसार ‘ऊँ’ एकाक्षर ब्रह्म है।

नौवाँ अध्याय

गीता के नौवें अध्याय का नाम राज-गुह्य-योग है। इसमें कहा गया है कि अध्यात्म विद्या विद्याराज्ञी है और यह गुह्य ज्ञान सबमें श्रेष्ठ है। राजा शब्द का एक अर्थ मन भी था। अतएव मन की दिव्य शक्तियों को किस प्रकार ब्रह्ममय बनाया जाय, इसकी युक्ति ही राजविद्या है। इस क्षेत्र में ब्रह्मतत्व का निरूपण ही प्रधान है, उसी से व्यक्त जगत का बारंबार निर्माण होता है।

वेद का समस्त कर्मकांड, यज्ञ, अमृत, और मृत्यु, संत और असंत, और जितने भी देवी देवता है, सबका पर्यवसान ब्रह्म में है। लोक में जो अनेक प्रकार की देवपूजा प्रचलित है, वह भी अपने अपने स्थान में ठीक है।

दसवाँ अध्याय

गीता के दसवें अध्याय का नाम विभूति-योग है। इसका सार यह है कि लोक में स्थित समस्त देवता एक ही भगवान की विभूतियाँ हैं। मनुष्य के समस्त गुण और अवगुण भगवान की शक्ति के ही रूप हैं। कोई पीपल पूज रहा है। कोई पहाड़, नदी या समुद्र को, कोई उनमें रहने वाले मछली और कछुओं को। इस प्रकार कितने ही देवी-देवता हैं, उनका कोई अंत नहीं।

विश्व के इतिहास में देवताओं की यह भरमार सर्वत्र पाई जाती है। भागवतों ने इनकी सत्ता को स्वीकारते हुए सबको विष्णु का रूप मानकर समन्वय की एक नई दृष्टि प्रदान की। इसी का नाम विभूति-योग है। जो सत्व जीव बल युक्त अथवा चमत्कार युक्त हैं, वे सब भगवान का रूप हैं। इतना मान लेने से मनुष्य ‘चित्त-निर्विरोध’ स्थिति में पहुँच जाता है।

ग्यारहवाँ अध्याय

गीता के ग्यारहवें अध्याय का नाम विश्व-रूप-दर्शन-योग है। इसमें भगवान ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया। विराट रूप का अर्थ है मानवीय धरातल और परिधि के ऊपर जो अनंत विश्व का प्राणवंत रचना विधान है, उसका साक्षात दर्शन। विष्णु का जो चतुर्भुज रूप है, वह मानवीय धरातल पर सौम्यरूप है।

बारहवाँ अध्याय

गीता के बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है। जब अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देखा तो उसके मस्तक का विस्फोट होने लगा। उसने कहा- ‘दिशो न जाने न लभे च शर्म।’ तब भगवान ने अर्जुन को बताया कि मेरे शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने का सबसे सुगम एवं सर्वोच्च साधन भक्ति है। इस पथ का अनुसरण करने वाले व्यक्ति में दिव्यगुण उत्पन्न हो जाते हैं।

तेरहवाँ अध्याय

गीता के तेरहवें अध्याय का नाम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ है। इस अध्याय में भगवान ने अर्जुन को प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के बारे में बताया है। भगवान कहते हैं कि शरीर क्षेत्र है, उसको जानने वाला जीवात्मा क्षेत्रज्ञ है। प्रकृति अचेतन गतिविधि है और पुरुष निष्क्रिय चेतना है। शरीर वह क्षेत्र है जिसमें वृद्धि, ह्रास और मृत्यु जैसी घटनाएं घटती हैं तथा निष्क्रिय और अनासक्त चेतन इन सब घटनाओं का साक्षी होता है, वह क्षेत्रज्ञ है।

चौदहवाँ अध्याय

चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रय-विभाग-योग है। यह अध्याय समस्त वैदिक, दार्शनिक और पौराणिक चिंतन का निचोड़ है। इसमें सत्व, रज तथा तम नामक तीन गुणों की अनेक व्याख्याएँ हैं। गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रधान या प्रकृति है। गुणों के वैषम्य से ही वैकृत सृष्टि का जन्म होता है। अकेला सत्व शांत स्वभाव से निर्मल प्रकाश की तरह स्थिर रहता है और अकेला तम भी जड़वत निश्चेष्ट रहता है किंतु दोनों के बीच में छाया हुआ रजोगुण उन्हें चेष्टा के धरातल पर खींच लाता है। गति तत्व का नाम ही रजस है।

पन्द्रहवाँ अध्याय

पन्द्रहवें अध्याय का नाम पुरुषोत्तम-योग है। इसमें विश्व का अश्वत्थ (पीपल) के रूप में वर्णन किया गया है जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं। उसके पत्ते वेद हैं और शाखाएं नीचे की ओर एवं शाश्वत हैं। यह अश्वत्थ रूपी संसार महान विस्तार वाला है। देश और काल में इसका कोई अंत नहीं है किंतु इसका मूल या केंद्र जिसे जिसे ऊर्ध्व भी कहते हैं, वह ब्रह्म ही है।

एक ओर वह परम तेजवान है जो विश्वरूपी अश्वत्थ को जन्म देता है तथा सूर्य और चंद्र के रूप में प्रकट है, दूसरी ओर वही चैतन्य, प्राणी शरीर में आया हुआ है। श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। नर या पुरुष के तीन प्रकार हैं- क्षर, अक्षर और अव्यय। पंचभूतों का नाम क्षर है, प्राण का नाम अक्षर है और मनस्तत्व या चेतना की संज्ञा अव्यय है। इन्हीं तीन नरों की एकत्र स्थिति से मानवी चेतना का जन्म होता है उसे ही ऋषियों ने वैश्वानर अग्नि कहा है।

सोलहवाँ अध्याय

गीता के सोलहवें अध्याय का नाम दैवासुर-सम्पद-विभाग-योग है। इस अध्याय में देवों एवं असुरों की संपत्तियों का वर्णन किया गया है। ये दोनों सम्पदाएं एक-दूसरे से बिलकुल विरुद्ध हैं। दैवी संपत्ति कल्याण करने वाली है और आसुरी-संपत्ति बाँधने वाली तथा नीच योनियों और नरकों में ले जाने वाली है। जो साधक इन दोनों विभागों को ठीक रीति से जान लेगा, वह आसुरी संपत्ति का सर्वथा त्याग कर देगा। आसुरी संपत्ति का सर्वथा त्याग होते ही दैवी संपत्ति स्वतः प्रकट हो जाएगी। दैवी संपत्ति प्रकट होते ही एकमात्र परमात्मा से सम्बन्ध रह जाएगा।

सत्रहवाँ अध्याय

सत्रहवें अध्याय का नाम ‘श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग’ है। इस अध्याय का सम्बन्ध सत, रज और तम नामक तीन गुणों से ही है। जिस मनुष्य में जिस गुण का प्रादुर्भाव होता है, उसकी श्रद्धा या जीवन की निष्ठा वैसी ही बन जाती है। यज्ञ, तप, दान, कर्म ये सब तीन प्रकार की श्रद्धा से संचालित होते हैं। यहाँ तक कि आहार भी तीन प्रकार का है। भगवान ने उनके भेद और लक्षण बताए हैं।

अठारहवाँ अध्याय

अठारहवें अध्याय का नाम ‘मोक्ष-संन्यास-योग’ है। इसमें गीता के समस्त उपदेशों का सार एवं उपसंहार दिया गया है। यहाँ पुनः मानव जीवन के लिए तीन गुणों का महत्व कहा गया है। पृथ्वी के मानवों में और स्वर्ग के देवताओं में कोई भी ऐसा नहीं जो प्रकृति के चलाए हुए इन तीन गुणों से बचा हो।

मनुष्य को सतर्क होकर चलना आवश्यक है जिससे वह अपनी बुद्धि और वृत्ति को बुराई से बचा सके और क्या कार्य है, क्या अकार्य है, इसको पहचान सके। धर्म और अधर्म को, बंध और मोक्ष को, वृत्ति और निवृत्ति को जो बुद्धि ठीक से पहचनाती है, वही सात्विक बुद्धि है और वही मानव की सच्ची उपलब्धि है।

इस प्रकार गीता के गीता के अठारह अध्याय भारतीय उपनिषदों का तारतम्यपूर्ण सार प्रस्तुत करते हैं तथा समाज के समक्ष ज्ञान, भक्ति एवं कर्म पर आधारित एक नवीन आदर्श की स्थापना करते हैं। गीता के अठारह अध्यायों की समाप्ति पर अर्जुन को ज्ञान की प्राप्ति होती है और वह समस्त संदेहों को त्यागकर कर्म के पथ पर प्रवृत्त होता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भगवद्गीता का दर्शन

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

गीता के अठारह अध्याय

ब्राह्मण धर्म से असंतोष

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ब्राह्मण धर्म से असंतोष

आर्यों ने जिस वैदिक धर्म की स्थापना की थी, वह धर्म उत्तर वैदिक काल तथा महाकाव्य काल में ब्राह्मण धर्म के रूप में विकसित हुआ किंतु ईसा छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में प्रजा में ब्राह्मण धर्म से असंतोष उत्पन्न हो गया जिसके कारण भारत में वैचारिक एवं धार्मिक क्रांति ने जन्म लिया।

ईसा के जन्म से लगभग 3500 वर्ष पहले भारत भूमि पर सिंधु-संस्कृति का उद्भव हुआ था जो लगभग 2000 वर्ष तक अपनी सुगन्ध बिखेरकर ई.पू. 1500 के आसपास काल के गाल में समा गई। सिंधु-घाटी के ऊपरी क्षेत्र अर्थात् सप्तसिंधु प्रदेश में वैदिक-आर्य-संस्कृति प्रकाश में आनी आरम्भ हुई। कुछ विद्वान ऋग्वेद का रचना काल ई.पू.2500 से ई.पू.1000 के बीच मानते हैं।

अर्थात् इन विद्वानों के अनुसार वैदिक संस्कृति के प्रकाश में आने की घटना ई.पू.2500 से कुछ पहले हुई होगी। जबकि पी. वी. काणे के अनुसार ऋग्वेद की रचना ई.पू.4000 से लेकर ई.पू.1000 के बीच की अवधि में हुई। अतः काणे आदि विद्वानों के अुनसार वैदिक संस्कृति का उद्भव ई.पू. 4000 से पहले हुआ होगा। इस दृष्टि से वैदिक संस्कृति, सिंधु-संस्कृति की पूर्ववर्ती अथवा समकालीन थी।

वैदिक संस्कृति ईसा के जन्म से लगभग 600 वर्ष पूर्व तक बिना किसी बाधा के निरंतर विकास करती रही। छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में वैदिक संस्कृति के सामने जैन-धर्म तथा बौद्ध धर्म नामक दो बड़ी चुनौतियों ने जन्म लिया जिनके कारण ईसा पूर्व की छठी शताब्दी को भारतीय संस्कृति के इतिहास में बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्रांति का समय माना जाता है।

वैदिक धर्म का आधार ज्ञान अर्थात् वेद था किंतु समय के साथ यज्ञों एवं कर्मकाण्डों की जटिलता बढ़ती गई तथा समाज में अनेक प्रकार के अन्धविश्वास पनप गए। ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक आते-आते जीवन के प्रत्येक अंग में विभिन्न प्रकार की रुढ़ियों तथा पुराहितों के बढ़ते हुए अधिकारों के कारण अनेक प्रकार की विकृतियों ने जन्म ले लिया।

इस कारण जन साधारण में वैदिक-काल से चली आ रही तार्किकता और संतुलित चिंतन पद्धति का अभाव हो गया। पुरातन परम्पराओं एवं मान्यताओं की आड़ में जनता का शोषण किया जाने लगा। इसलिए कुछ लोगों में वैदिक परम्पराओं से विश्वास उठने लगा और वे सत्य की खोज में लग गए। ये लोग किसी भी बात को स्वीकार करने से पूर्व उसे परखना चाहते थे। इस दृष्टि से हम इस युग को धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन का युग भी कह सकते हैं।

ब्राह्मण धर्म से असंतोष के कारण

प्रजा हजारों सालों से वैदिक धर्म का पालन करती आ रही थी, वैदिक धर्म ही कालांतर में ब्राह्मण धर्म कहलाने लगा था फिर प्रजा भी ब्राह्मण धर्म से असंतोष उत्पन्न हुआ, तो उसके पीछे कई कारण थे।

वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रांति का युग

पुरातन परम्पराओं को संदेह की दृष्टि से देखने की यह प्रवृत्ति उस काल में न केवल भारत में अपितु विश्व की अन्य सभ्यताओं में भी देखी जा सकती है। उस काल में अनेक देशों में ऐसे बड़े विचारक हुए जिन्होंने परम्परागत धार्मिक मान्यताओं, रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों को अमान्य घोषित करके मानव जाति को चिंतन की नवीन दिशा प्रदान की। चीन में महात्मा कन्फयूशियस और लाओत्से ने, यूनान में हिराक्लिटस और पाइथोगेरस ने, ईरान में महात्मा जरथ्रुस्त्र ने और भारत में महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध ने परम्परागत धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। उनके विचारों ने अपने अपने देश के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए जिनके कारण मानव संस्कृति ने अगले चरण में प्रवेश किया।

भारत में सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के कारण

भारत में छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व की सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

(1.) धर्म के वास्तविक स्वरूप की खोज के प्रयास

ऋग्वैदिक-काल में मनुष्य जीवन को सुखपूर्वक व्यतीत करने के लिए आश्रम व्यवस्था आरम्भ होने लगी थी। उत्तरवैदिक-काल में आश्रम व्यवस्था पूरी तरह विकसित हो गई। इस व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य को 50 वर्ष की आयु के पश्चात्  वानप्रस्थ आश्रम में एवं 75 वर्ष की आयु के पश्चात् सन्यास आश्रम में व्यतीत करने का प्रावधान किया गया।

वानप्रस्थ एवं सन्यास के दौरान मनुष्य धर्म, अध्यात्म तथा दर्शन के विविध पक्षों से लेकर मनुष्य जीवन की सार्थकता एवं मृत्यु के बाद मिलने वाले पुनर्जन्म, कर्मानुसार गति आदि विषयों पर निरंतर चिंतन करता था। तीर्थों एवं वनों में भ्रमण करते रहने से उसका सम्पर्क अपने ही जैसे बहुत से चिंतनशील व्यक्तियों से होता था।

निरंतर चिंतन एवं सम्पर्क के कारण वे धर्म के वास्तविक स्वरूप को खोजने का प्रयास करने लगे। इन लोगों के भीतर धर्म के वर्तमान स्वरूप के बारे में असंतोष उत्पन्न होने लगा। इसी असंतोष ने आगे चलकर भारतीय धर्म का स्वरूप बदल दिया। 

(2.) उपनिषदों के विचारों का प्रचार

अनेक उपनिषदों में वैदिक धर्म की कमजोरियों की चर्चा की गई जिन्होंने प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान आकर्षित किया तथा वे इन बुराइयों का विरोध करने लगे। अनेक उपनिषदों ने कर्मकाण्ड की भी आलोचना की तथा ज्ञान की प्राप्ति को ही मोक्ष का साधन बताया। उन्होंने अहिंसा तथा आचरण की पवित्रता पर जोर दिया। इस प्रकार उपनिषदों ने ही जैन एवं बौद्ध मत की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

(3.) ब्राह्मणों की प्रधानता से असंतोष

ब्राह्मण धर्म से असंतोष का एक प्रमुख कारण ब्राह्मणों की प्रधानता से असंतोष का उत्पन्न होना था। उत्तरवैदिक-काल में पुरोहितों, यज्ञकर्ताओं एवं अनुष्ठानकर्ताओं की स्थिति सर्वोपरि हो गई। इन्हें ब्राह्मण कहा जाता था। वे समाज की शिक्षण और यजन सम्बन्धी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताएं पूरी करते थे। सम्पूर्ण समाज उन्हें विशेष आदर देता था। यज्ञों तथा धार्मिक कर्मकाण्डों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ ब्राह्मणों की प्रधानता भी बढ़ गई।

उस युग में जीवन की प्रत्येक समस्या को सुलझाने का एकमात्र आधार वेद ही माने जाते थे और वेदों को पढ़ने और उनकी व्याख्या करने का विशेषाधिकार ब्राह्मण वर्ग के पास था, अतः उनका प्रभुत्व बढ़ने लगा। शिशु के जन्म से लेकर वृद्धावस्था में मृत्यु होने तक ऐसा कोई कार्य नहीं था जो ब्राह्मणों से पूछे बिना पूरा हो सके।

इससे ब्राह्मण वर्ग अहंकारी और सुविधाभोगी बन गया। पौराणिक काल तक आते-आते समाज में ब्राह्मणों का प्रभुत्व सर्वोपरि हो गया। ब्राह्मणों के इस प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। जैन एवं बौद्ध मत, ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध उत्पन्न प्रतिक्रिया के परिणाम थे।

(4.) बहुदेववाद से असंतोष

ब्राह्मण धर्म से असंतोष का एक प्रमुख कारण ब्राह्मण धर्म का बहुदेववाद भी था। यद्यपि ऋग्वैदिक आर्यों ने एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था तथापि एकेश्वरवाद का सिद्धान्त आर्य प्रजा में लोकप्रिय नहीं हो पाया था। इस कारण वैदिक धर्म बहुदेववादी हो गया। सृष्टि की लगभग समस्त शक्तियाँ देवी-देवता मान ली गईं। यहाँ तक कि राजा-रानियों और प्रसिद्ध योद्धाओं को भी देवता मान लिया गया।

देवी-देवताओं को संतुष्ट रखने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, हवन, उपासना, जप-तप आदि किए जाते थे। बुद्ध एवं महावीर के प्रयासों से इस काल में पुनः एकेश्वरवाद ने जोर पकड़ा और लोग सोचने लगे कि जब ‘ब्रह्म’ सर्वत्र व्याप्त है तो इतने सारे देवी-देवताओं की उपासना की क्या आवश्यता है? उनका यह भी मानना था कि मनुष्य को अपने आत्मोत्कर्ष के लिए देवताओं पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य-विधाता हैं। इस नवीन चिंतन के कारण समाज में बहुदेववादी ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध असन्तोष उठ खड़ा हुआ।

(5.) यज्ञ एवं कर्मकाण्ड से असंतोष

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ऋग्वैदिक-काल में आर्यों का धर्म सरल तथा आडम्बरहीन था। वे यज्ञ और अनुष्ठान स्वयं कर लेते थे। यज्ञ के लिए पुरोहित की आवश्यकता नहीं थी परन्तु धीरे-धीरे कर्मकाण्ड और तरह-तरह के विधि विधानों की प्रधानता बनी। अब पुरोहितों की सहायता लेना आवश्यक हो गया। उन्हें भी देवताओं के समान पूज्य समझा जाने लगा। पहले एक पुरोहित से काम चल जाता था। अब उनकी संख्या सात और सात से बढ़कर सत्रह हो गई। कुछ यज्ञ तो वर्षों तक चलते थे। ब्राह्मणों ने यज्ञों को अपने रोजगार का मुख्य साधन बना लिया था इसलिए उन्होंने यज्ञों को कर्मकाण्ड से पूर्ण, अत्यधिक जटिल, कठोर तथा खर्चीला बना दिया। यज्ञों में पशुबलि पर अत्यधिक जोर दिया जाने लगा। साधारण व्यक्ति के लिए ऐसे यज्ञों को करवाना असम्भव हो गया। ब्राह्मणों ने धर्म के आधार पर पुनर्जन्म और स्वर्ग-नर्क की धारणाएँ पैदा करके जनता का शोषण करना शुरु कर दिया। वे जादू-टोना, झाड़-फूंक, तन्त्र-मन्त्र आदि के नाम पर प्रजा से धन लेते थे। इस कारण जनसामान्य में विरोध की भावना पनपने लगी। निर्धन लोग मौजूदा धर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ थे और उन्हें भी मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा थी। पशुबलि के विरुद्ध भी समाज में बड़ा विरोध था। यही कारण था कि जब महावीर तथा बुद्ध ने धर्म के सरल एवं अहिंसक स्वरूप को प्रस्तुत किया तो बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई बन गए।

(6.) क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों की प्रतिस्पर्द्धा

ब्राह्मण धर्म से असंतोष का एक प्रमुख कारण क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों में वर्चस्त की प्रतिस्पर्द्धा का उत्पन्न होना भी था। ऋग्वैदिक आर्यों की सामाजिक व्यवस्था उदार एवं लचीली थी। यद्यपि वर्ण व्यवस्था अस्तित्त्व में आ चुकी थी किंतु वह कर्म पर आधारित थी और कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था। चारों वर्णों की समाज में समान आवश्यकता थी परन्तु धार्मिक जटिलता के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था भी जटिल होने लगी।

अब चारों वर्णों को वंशानुगत सीमाओं में बाँध दिया गया। अर्थात् अब वर्ण का निश्चय व्यक्ति के कर्म के आधार पर न होकर जन्म के आधार पर होने लगा। ऋग्वैदिक समाज में ब्राह्मणों को उनके साधनामय, त्यागमय एवं सादगीपूर्ण जीवन के लिए सर्वोपरि स्थान दिया गया था तथा क्षत्रियों को देश की रक्षा तथा शासन-व्यवस्था का भार सौंपा गया था। अतः समाज में इन दोनों वर्णों की स्थिति श्रेष्ठ थी परन्तु बाद में क्षत्रियों को ब्राह्मणों की प्रभुता अखरने लगी।

वे स्वयं को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानने लगे। शतपथ ब्राह्मण में उनकी प्रतिक्रिया का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है जिसमें क्षत्रिय को ब्राह्मण से श्रेष्ठ बताया गया है। उपनिषद् काल में ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच प्रभुत्व की प्रतिस्पर्द्धा और अधिक बढ़ गई। इस काल में क्षत्रियों ने भी दार्शनिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में अपनी धाक जमाने का प्रयत्न किया।

 भारतीय दर्शन की एक विशेष शाखा ‘ब्रह्मविद्या’ की स्थापना का श्रेय क्षत्रिय विद्वानों को ही है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के इस संघर्ष की झलक साहित्यिक रचनाओं में भी मिलती है। ब्राह्मण ग्रन्थों में जहाँ कहीं भी चतुर्वर्णों का उल्लेख है, वहाँ सदैव पहले ब्राह्मणों का उल्लेख है, उनके बाद क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का। जबकि बौद्ध-ग्रन्थों में पहले क्षत्रिय वर्ण का उल्लेख है और फिर ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र वर्णों का।

वैश्यों के पास धन-सम्पत्ति थी परन्तु ब्राह्मण वैष्यों को अपने बराबर सम्मान देने को तैयार नहीं थे। अतः वैश्यों में भी ब्रह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया और उन्होंने क्षत्रियों का साथ दिया। शूद्र पहले से ही उपेक्षित थे। इसलिए उन्हें मौजूदा धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था से कोई लगाव नहीं था। यही कारण था कि जब महावीर और बुद्ध ने एक नवीन धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था प्रस्तुत की तो क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों ने उसका स्वागत किया।

(7.) अनार्य संस्कृतियों में असंतोष

अनार्य संस्कृतियों में असंतोष उत्पन्न होने से भी प्रजा के बड़े वर्ग में ब्राह्मण धर्म से असंतोष हो गया। यद्यपि उत्तरी भारत में वैदिक धर्म ईसा से ढाई हजार साल पहले से फल-फूल रहा था तथापि ई.पू. छठी शताब्दी तक पूर्वी भारत पूर्ण रूपेण आर्य संस्कृति के प्रभाव में नहीं आया था। वह अनार्य संस्कृति का गढ़ समझा जाता था। आर्य प्रवृत्ति-मार्गी थे। वे संसार-त्याग, वैराग्य, काया-क्लेश आदि सिद्धान्तों में विश्वास नहीं करते थे।

इसके विपरीत पूर्वी भारत में उत्पन्न होने वाले जैन एवं बौद्ध मत, दोनों ही निवृत्ति-मूलक थे। यह आर्यों की प्रवृत्ति-मूलक संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह था। ब्राह्मणों के विरुद्ध असन्तोष का एक बड़ा कारण वेद तथा उन पर आधारित ग्रंथ थे। ब्राह्मणों की दृष्टि में वैदिक ज्ञान ईश्वर प्रदत्त था और कोई भी वेद विरुद्ध बात अधर्म थी परन्तु समाज में एक ऐसा प्रबुद्ध वर्ग तैयार हो रहा था जो वेदों को पूर्ण मानने को तैयार नहीं था।

उनकी दृष्टि में वैदिक-ज्ञान सीमित था और उसमें अनेक त्रुटियाँ थीं। उनका मानना था कि केवल वेद मन्त्रों में आस्था रखने और मन्त्रों का उच्चारण करते रहने से सभ्यता का विकास नहीं होगा। उपनिषदों में भी इसी प्रकार की भावना दिखाई पड़ती है।

बौद्ध साहित्य से ज्ञात होता है कि समाज का एक वर्ग ‘वेद प्रामाण्य’ के विषय पर ब्राह्मणों का कट्टर आलोचक था। जैन-धर्म के बाइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा तेबीसवें तीर्थंकर महावीर और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध ने भी वेदों की मान्यताओं के विरुद्ध विचार व्यक्त किए।

(8.) संस्कृत के विरुद्ध असंतोष

इस काल में बोलचाल की भाषा प्राकृत तथा पालि थी परन्तु समस्त धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में थे। धार्मिक कर्मकाण्ड भी संस्कृत भाषा में सम्पादित कराये जाते थे। केवल ब्राह्मण ही इस भाषा में व्यवहार कर सकते थे। जनसामान्य को न तो संस्कृत लिखना-पढ़ना आता था और न वह संस्कृत के मन्त्रों का अर्थ समझ पाती थी। अतः इस भाषा के विरुद्ध भी असन्तोष पनप रहा था। लोग धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए भी किसी सरल भाषा को चाहते थे ताकि वे भी धार्मिक बातों को समझ सकें।

इस प्रकार छठी शताब्दी ई.पू. तक आते-आते जनसामान्य धार्मिक रुढ़ियों तथा सामाजिक बन्धनों को तोड़ने के लिए तत्पर हो चुका था। वैदिक धर्म के  कर्मकाण्डों एवं वर्ण आधारित सामाजिक व्यवस्था से उसका विश्वास उठने लगा था। अतः इस समय जनसामान्य में ऐसी किसी भी नवीन धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्था का अवतरण हो सकता था जो समाज के प्रत्येक वर्ग को एक समान समझने एवं एक समान व्यवहार करने की सुविधा देती हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – जैन धर्म

ब्राह्मण धर्म से असंतोष

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

जैन-धर्म के सिद्धान्त

जैन धर्म

जैन धर्म का साहित्य तथा भारतीय संस्कृति को देन

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

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पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी जैन धर्म के अंतिम दो तीर्थंकर हैं तथा दोनों ही जैन धर्म के सिद्धांतों एवं जैन दर्शन के प्रणेता हैं किंतु इनके दर्शन में कुछ अंतर है।

जैन-धर्म का जन्म

जैन-धर्म का जन्म कब हुआ, इसके बारे में ठीक से नहीं कहा जा सकता। जैन साहित्य के अनुसार जैन-धर्म आर्यों के वैदिक धर्म से भी पुराना है किंतु जैन-धर्म का प्रादुर्भाव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था इसलिए जैन-धर्म वैदिक धर्म से पुराना नहीं हो सका। जैन-धर्म की स्थापना एवं विकास में योग देने वाले तपस्वी सन्यासियों को तीर्थंकर कहा जाता है।

जैन-धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव तथा दूसरे तीर्थंकर अरिष्टनेमि का नाम ऋग्वेद के सूक्तों से ग्रहण किया गया है। विष्णु-पुराण एवं भागवत् पुराण में भी ऋषभदेव की कथा का उल्लेख है जहाँ ये नारायण के अवतार माने गए हैं। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। प्रथम बाईस तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है क्योंकि उनके बारे में निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते किंतु तेईसवें एवं चौबीसवें तीर्थंकर निश्चित रूप से ऐतिहासिक व्यक्ति थे।

भगवान पार्श्वनाथ

जैन साहित्य के अनुसार पार्श्वनाथ का जन्म महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व आठवीं सदी ईसा पूर्व में हुआ था। उनका उल्लेख ब्राह्मण साहित्य में भी मिलता है। वे काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उनकी माता का नाम वामा था। भारतीय पुराणों में अश्वसेन नामक एक नागराजा का उल्लेख मिलता है। जैन मूर्तियों में मिलने वाला नाग पार्श्वनाथ का प्रतीक है।

पार्श्वनाथ का विवाह कुशस्थल की राजकन्या प्रभावती के साथ हुआ था। 30 वर्ष की अवस्था तक उन्होंने वैभव-विलास का जीवन व्यतीत किया। फिर गृहस्थ जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में निकल गए। 83 दिनों की घोर तपस्या के बाद उन्हें वाराणसी के सम्मेद पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद लगभग 70 वर्ष तक उन्होंने धर्म प्रचार का काम किया। 100 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित मार्ग का अनुसरण करने वाले ‘निग्रन्थ’ कहलाए, जिसका अर्थ होता है- ‘सांसरिक बन्धनों से मुक्त हो जाने वाले।’ इस प्रकार जैन-धर्म का पुराना नाम ‘निग्रन्थ धर्म’ है जिसमें राग-द्वेष का कोई स्थान नहीं है।

पार्श्वनाथ के अनुयाइयों की संख्या बहुत अधिक थी। जैन साहित्य में पार्श्वनाथ की अनुयाई स्त्रियों का भी उल्लेख मिलता है। महावीर स्वामी के माता-पिता भी पार्श्वनाथ के अनुयाई थे। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयाइयों को संगठित करके चार गणों की स्थापना की तथा उन्हें अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह नामक चार सिद्धान्तों पर चलने को कहा।

पार्श्वनाथ ने ब्राह्मणों के बहुदेववाद और यज्ञवाद का विरोध किया। वे वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते थे तथा हिंसात्मक यज्ञों के विरोधी थे। जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था में भी उनका विश्वास नहीं था। पार्श्वनाथ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी है। अतः स्पष्ट है कि महावीर स्वामी, जैन-धर्म के संस्थापक नहीं थे।

उनके जन्म से सैंकड़ों वर्ष पूर्व जैन-धर्म संगठित हो चुका था। उसके अपने विधि-विधान थे। जीवन-यापन की विशेष व्यवस्था थी। उनके अपने चार संघ थे। प्रत्येक संघ एक-एक गणधर की देखरेख में काम करता था। महावीर स्वामी ने उनकी मौजूदा व्यवस्था में सुधार करके उसे लोकप्रिय बनाया। इसीलिए उन्हें जैन-धर्म का सुधारक माना जाता है।

महावीर स्वामी

जैन-धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ई.पू. 599 में वैशाली के निकट कुण्डग्राम के ज्ञातृक क्षत्रिय कुल में हुआ। कुछ स्रोत महावीर का जन्म ई.पू. 540 में होना बताते हैं। उनके पिता सिद्धार्थ, ज्ञातृक क्षत्रियों के छोटे से राज्य कुण्डग्राम के राजा थे। महावीर की माता का नाम त्रिशला था जो लिच्छवी वंश के प्रसिद्ध राजा चेटक की बहिन थी।

महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धनाम था। उनके जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि बड़ा होने पर वह या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा अथवा परमज्ञानी भिक्षु। वर्धमान को बाल्यकाल में क्षत्रियोचित शिक्षा दी गई। युवावस्था में उनका विवाह यशोदा नामक सुन्दर राजकन्या के साथ किया गया।

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इस वैवाहिक सम्बन्ध से उनके एक पुत्री भी हुई जिसका विवाह जमालि नामक क्षत्रिय सरदार के साथ किया गया। वर्धमान जब 30 वर्ष के हुए तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। इस घटना से उनकी निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति और अधिक मजबूत हो गयी। उन्होंने अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर घर त्याग दिया और भिक्षु बन गए। महावीर ने तेरह माह तक भिक्षु के वस्त्र धारण करके घोर तपस्या की। परन्तु उन्हें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता नहीं मिली। इस पर उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ के सम्प्रदाय को छोड़़ दिया और अकेले ही तपस्या करने लगे। उनके वस्त्र जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गए तब वर्धमान निर्वस्त्र रहने लगे। उनके नग्न शरीर को कीट-पतंग काटने लगे परन्तु वे पूर्णतः उदासीन रहे। बारह वर्ष तक शरीर की उपेक्षा कर वे सब प्रकार के कष्ट सहते रहे। उन्होंने संसार के समस्त बन्धनों का उच्छेद कर दिया। संसार से वे सर्वथा निर्लिप्त हो गए। अन्त में जम्भियग्राम (जृम्भिका) के समीप उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) सरिता के तट पर महावीर को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। तभी उन्हें ‘केवलिन्’ की उपाधि मिली। इन्द्रियों को जीत लेने के कारण वे ‘जिन’ कहलाए। साधना में अपूर्व साहस दिखलाने के लिए वे महावीर कहलाए। समस्त सांसारिक बन्धनों को तोड़ देने से वे ‘निग्रन्थ’ कहलाए।

सत्य का ज्ञान हो जाने के बाद महावीर ने जनसामान्य को जीवनयापन का सही मार्ग दिखाने का कार्य प्रारम्भ किया। वे अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्थान-स्थान पर घूमने लगे। मगध, काशी, कोसल आदि राज्य उनके प्रचार क्षेत्र थे। महावीर स्वामी का कई राजवंशों से निकट का सम्बन्ध था, इसलिए उन्हें अपने विचारों के प्रचार में उन राजवंशों से काफी सहायता मिली।

उनकी सत्यवाणी तथा जीवन के सरल मार्ग से प्रभावित होकर सैंकड़ों लोग उनके अनुयाई बन गए। राजा-महाराजा, वैश्य-व्यापारी तथा अन्य लोग उनके उपदेशों का अनुसरण करने लगे और धीरे-धीरे उनके अनुयाइयों की संख्या काफी बढ़ गई। जैन साहित्य के अनुसार लिच्छवी का राजा चेटक, अवन्ती का प्रद्योत, मगध के राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु, चम्पा का राजा दधिवाहन और सिन्धु-सौबीर का राजा उदयन सहित अनेक तत्कालीन राजा, महावीर स्वामी के अनुयाई थे। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार बिम्बिसार और प्रद्योत, महात्मा बुद्ध के अनुयाई थे।

इससे पता चलता है कि उस युग के हिन्दू शासक धार्मिक दृष्टि से काफी उदार तथा सहिष्णु थे और वे ज्ञानी पुरुषों का समान रूप से आदर करते थे। इसी कारण जैन और बौद्ध दोनों धर्मों ने उन्हें अपना-अपना अनुयाई मान लिया। अन्त में ई.पू.527 में 72 साल की आयु में पावापुरी (पटना) में महावीर स्वामी को मोक्ष प्राप्त हुआ। कुछ स्रोत उनका निधन ई.पू. 467 में होना मानते हैं। उनके निधन के बाद भी जैन-धर्म उनके बताए सिद्धांतों पर चलता रहा तथा उनके मुख्य शिष्य जैन-संघ का प्रबंध करते रहे।

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी के दर्शन में अंतर

भगवान पार्श्वनाथ तथा महावीर स्वामी के सिद्धान्तों में विशेष अंतर नहीं था। पार्श्वनाथ ने चार व्रतों की आवश्यकता पर जोर दिया था, महावीर स्वामी ने उनके साथ ‘ब्रहाचर्य’ नामक एक और व्रत जोड़ दिया। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयाइयों को वस्त्र पहनने की स्वीकृति दे दी थी परन्तु महावीर स्वामी ने जैन भिक्षुओं को निर्वस्त्र रहने को कहा। महावीर अपने बताए सिद्धांतों में से दो सिद्धांतों- ब्रह्मचर्य एवं वैराग्य पर अधिक जोर देते थे।

जैन गण

महावीर के शिष्यों में साधु एवं गृहस्थ, स्त्री एवं पुरुष, धनी एवं निर्धन सभी थे। ये शिष्य आगे चलकर 11 समूहों में बंट गए जिन्हें ‘गण’ कहते थे। प्रत्येक समूह का नेता ‘गणधर’ कहलाता था। इस प्रकार के 13 गणों का उल्लेख पाया जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – जैन धर्म

ब्राह्मण धर्म से असंतोष

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

जैन-धर्म के सिद्धान्त

जैन धर्म

जैन धर्म का साहित्य तथा भारतीय संस्कृति को देन

जैन-धर्म के सिद्धान्त

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जैन-धर्म के सिद्धान्त

जैन-धर्म के सिद्धान्त बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की अपेक्षा थोड़े क्लिष्ट हैं। इस कारण जन साधारण की समझ में नहीं आते हैं। इसी कारण जैन धर्म को बौद्ध धर्म की अपेक्षा कम लोकप्रियता प्राप्त हुई।

निवृत्ति मार्ग

जैन धर्म, आर्यों के प्रवृत्तिमूलक धर्म के विरुद्ध निवृत्तिमार्गी था। वह आर्यों की भाँति इस संसार के समस्त सुखों की कामना नहीं करता। उसके लिए संसार के समस्त सुख, दुःखमूलक तथा व्याधि रूप हैं। क्योंकि संसार के सुखों को भोगने से कामनाएँ शान्त नहीं होतीं, अपितु बढ़ती हैं।

मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से पीड़ित है। गृहस्थ जीवन में भी सुख-शान्ति नहीं है। जैन-धर्म के अनुसार सारा संसार दुःखमय है। इस दुःख का कारण कभी तृप्त न होने वाली तृष्णा है जिससे मनुष्य आजीवन घिरा रहता है। बौद्ध धर्म की भाँति जैन-धर्म की मुख्य समस्या भी दुःख और दुःख-विरोध हैं। जैन-धर्म के अनुसार मनुष्य का सुख सांसारिक सुखों को भोगने में नहीं है अपितु इस संसार को त्यागने में है।

मनुष्य को सब कुछ त्यागकर, कभी अन्त न होने वाले दुःखों को त्यागकर, संसार से कोई सम्बन्ध न रखकर तथा भिक्षु बनकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। इस प्रकार जैन-धर्म वस्तुतः भिक्षु धर्म है। यह निवृत्ति मार्ग है जो आर्यों की प्रवृत्तिमूलक विचारधारा के विपरीत था।

जीव और अजीव

महावीर के अनुसार सम्पूर्ण दृश्य जगत् ‘जीव’ और ‘अजीव’ नामक दो तत्त्वों में विभक्त है। ये दोनों ही तत्त्व शाश्वत हैं, अनादि और अनन्त हैं। इनसे ही मिलकर यह जगत् बनता है। इसलिए जगत भी अनादि और अनन्त है। जीव तथा अजीव का कर्त्ता कोई नहीं है। जीव चैतन्य द्रव्य है और अजीव चैतन्य रहित है। जैन-धर्म में आत्मा के अस्तित्त्व को विश्वास सहित और ज्ञानपूर्वक माना गया है।

जीव ही आत्मा है तथा यह सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। जीव का विस्तार शरीर के अनुसार होता है। इसका कार्य अनुभूति है अर्थात् जीव को सुख दुःख सन्देह, ज्ञान आदि का अनुभव होता है। जीव, अजीव के ढाँचे (शरीर) में रहता है। अजीव अवस्था अर्थात् जड़ पदार्थ को पुद्गल कहते हैं। पुद्गल उस वस्तु को कहते हैं जिसे जोड़कर बड़ा किया जा सके अथवा तोड़कर छोटा किया जा सके।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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इसके सबसे लघुत्तम भाग अर्थात् परमाणुओं के आपस में मिलने से भौतिक संसार के विभिन्न रूप बनते हैं, जिनके पाँच गुण हैं– स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द। इस प्रकार, जीव और अजीव के मिलने से जगत् की रचना होती है। जीव और अजीव के सम्बन्ध का माध्यम कर्म है। पुद्गल ही कर्म है जो जीव को घेरे रहता है जैसे खान के भीतर धातु मिट्टी में मिली रहती है, इसी प्रकार जीव इस कर्म नामक बारीक ‘मैटर’ से सना रहता है। वह हर समय जीवन से चिपटा रहता है। कर्म, जीव पर रूप, रंग, रस और गन्ध की विशिष्ट छाप लगाते हैं जिसे ‘लेश्या’ कहते हैं। इनसे पृथक होना अर्थात् पुद्गल से अलग होना, कर्म के बन्धन को तोड़ना है। कर्म के बन्धन को तोड़ने का अर्थ है- जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होना। इसी का नाम मोक्ष है। इस प्रकार जीव के दो रूप होते हैं- मुक्त जीव और बद्ध जीव। जो जीव त्रिरत्न तथा पंचव्रतों के पालन के कारण जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गए, वे मुक्त जीव हैं किंतु जो जीव जन्म-मरण के बंधने में बंधे होते हैं, वे बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव भी दो प्रकार के होते हैं- स्थावर एवं जंगम। जल, पृथ्वी, वायु और वनस्पति स्थावर जीव हैं जिनमें एक ही इन्द्रिय होती है। मुष्य, पशु और पक्षी जंगम जीव हैं जिनमें पांच इंद्रियां होती हैं।

अजीव अचेतन तत्त्व हैं इसके अंतर्गत पांच पदार्थ आते हैं- धर्म, अधर्म, काल, आकाश तथा पुद्गल। यह समस्त संसार जीव एवं अजीव के घात-प्रतिघात से संचालित होता है।

बन्ध और मुक्ति

बन्ध के दो मुख्य कारण हैं- राग और द्वेष। इनसे ही चार कषायों- क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय एवं विकास होता है। राग और द्वेष जीव में आसक्ति या कामना उत्पन्न करते हैं। इससे जीव अपना विवेक खो बैठता है और संसार में भटकता रहता है। वह राग और द्वेष से उत्पन्न कषायों- हिंसा, झूठ, चोरी, लोभ आदि का आश्रय लेता है।

जैन आगम में कर्म, ‘क्रिया’ को नहीं कहते अपितु ‘पुद्गल-परमाणुओं’ को कहते हैं। पुद्गल-परमाणुओं का बहना या बनना ‘आश्रव’ कहलाता है। यही आश्रव व्यक्ति के कर्मबन्ध का कारण होता है। वह हिंसा आदि को सत्य और पाने योग्य समझकर आचरण करता है तथा कर्मों के बन्धनों में बंध जाता है। इसी को बन्ध कहते हैं। आश्रव और बन्ध पुनर्जन्म के मुख्य कारण हैं।

राग और द्वेष दुःख ही पैदा नहीं करते, सुख भी पैदा करते हैं। जो कर्म दुःख के कारण होते हैं उन्हे पाप कहा जाता है और सुख के कारण होते है उन्हें पुण्य कहा जाता है। पाप और पुण्य दोनों का जन्म आसक्ति के कारण होता है। ‘पुण्य-बन्ध’ से जीव का जो शरीर बनता है वह ‘पाप-बन्ध’ से बनने वाले शरीर से भिन्न किस्म का होता है।

‘पाप बन्ध’ की अवस्था में जीव पूर्ण रूप से ‘कषाय-ग्रस्त’ हो जाता है परन्तु ‘पुण्य-बन्ध’ की अवस्था में ‘कषाय’ जीव की विवेक शक्ति को पूरी तरह से नहीं दबा पाते। ‘पुण्य-बन्ध’ की अवस्था में जीव में यह विवेक बना रहता है कि क्या चीज ग्रहण करने योग्य है और क्या त्याज्य है? इस प्रकार की जिज्ञासा का उदय ही राग-द्वेष पर रोक लगाता है।

इस रोक को ‘संवर’ कहते हैं। संवर के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे संचित कर्म कटते हैं या नष्ट हो जाते हैं। कर्म-नाश की इस प्रकिया को ‘निर्जरा’ कहते हैं। पूर्ण निर्जरा की स्थिति का ही दूसरा नाम ‘मुक्ति’ है।

मोक्ष अथवा निर्वाण

राग-द्वेष या आसक्ति के बन्धन से मुक्ति ही ‘मोक्ष’ है। मोक्ष का ही दूसरा नाम ‘निर्वाण’ है। निर्वाण, जैन-धर्म का चरम लक्ष्य है। इसके लिए कर्म-फल से मुक्ति पाना आवश्यक है। निर्वाण की अवस्था में मनुष्य समस्त प्रकार की कामनाओं से मुक्त होकर अन्नत शान्ति को प्राप्त करता है।

निर्वाण का अर्थ अस्तित्त्व की समाप्ति नहीं है। इसका अभिप्राय जीव के भौतिक अंश अर्थात् पुद्गल के विनाश से है। जीव का आत्मिक तत्त्व कभी समाप्त नहीं होता। निर्वाण का अर्थ शून्यता, अकर्मण्यता अथवा निष्क्रियता भी नहीं है। निर्वाण प्राप्त व्यक्ति विशुद्ध रूप में देख-सुन सकता है।

जैन-धर्म के सिद्धान्त – त्रिरत्न

जीव के लिए कैवल्य अथवा मोक्ष की प्राप्ति सरल नहीं है। महावीर ने कैवल्य प्राप्ति के लिए तीन साधन बताए जो जैन-धर्म में ‘त्रिरत्न’ के नाम से प्रसिद्ध हैं- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र। जैन-धर्म के अनुसार पूर्व जन्म के कर्म-फल को नष्ट करने तथा इस जन्म के कर्म-फल से बचने के लिए ‘त्रिरत्नों’ का पालन करना आवश्यक है। इसी से मनुष्य निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है।

(1.) सम्यक ज्ञान

सम्यक ज्ञान का अर्थ है सही विचार अर्थात् सत् और असत् का भेद समझ लेना। जैन-धर्म के अनुसार तीर्थंकरों की शिक्षाओं के ध्यानपूर्वक अध्ययन से सत् और असत् का भेद ग्रहण हो जाता है। यह सत्य और पूर्ण ज्ञान ही सम्यक् ज्ञान है।

ज्ञान पाँच प्रकार का होता है-

1. मति ज्ञान- जो इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होता है, जैसे नाक के द्वारा गन्ध का ज्ञान होना।

2. श्रुति ज्ञान- वह ज्ञान जो सुनकर अथवा वर्णन के द्वारा प्राप्त होता है। इसे शास्त्र ज्ञान भी कहते हैं।

3. अवधि ज्ञान- अर्थात् दूर देश और काल का ज्ञान।

4. मन पर्याय- अन्य व्यक्तियों के भावों और विचारों को जान लेने वाला ज्ञान और

5. केवल्य ज्ञान- देश-काल की सीमाओं से परे का सम्पूर्ण ज्ञान। यह पूर्ण ज्ञान है, जो निग्रन्थों को प्राप्त होता है।

जीव में पूर्ण ज्ञान रहता है परन्तु भौतिक आवरण के कारण वह छिप जाता है। भौतिक तत्त्व का नाश होते ही जीव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह निग्रन्थ हो जाता है।

(2.) सम्यक् दर्शन

सम्यक् दर्शन का अर्थ है- यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा। तीर्थंकरों और जैन शास्त्रों में निहित ज्ञान के प्रति संशय रहित पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा ही सम्यक् दर्शन है। इसके आठ अंग हैं- (1.) सन्देह अथवा संशय को दूर करना, (2.) सांसारिक सुखों की इच्छा को दूर करना, (3.) आसक्ति-विरक्ति को दूर करना, (4.) गलत रास्ते से दूर रहना, (5.) मिथ्या धारणाओं से दूर रहना, (6.) सही विश्वास पर जमे रहना, (7.) समस्त प्राणियों से समान प्रेम रखना और (8.) जैन-धर्म के सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था रखना।

इन आठ अंगों का पालन करने के लिए तीन प्रकार की गलतियों से बचना आवश्य है- (1.) अन्ध-विश्वास से बचना (2.) देवी-देवताओं के पूजन से पुण्य प्राप्ति की आशा से बचना और (3.) कपटी साधु सन्तों के कपटजाल से बचना।

(3.) सम्यक चरित्र

तीर्थंकरों द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलकर नैतिक एवं सदाचार पूर्ण जीवन-यापन करना ही सम्यक चरित्र है। इन्द्रियाँ जीव के बाह्य उपकरण हैं और इनकी सहायता से वह बाह्य जगत की जानकारी प्राप्त करता है।

उदाहरण के लिए आँख का काम है देखना। प्रत्येक जीव सुन्दर दृश्य को देखना पसन्द करेगा और असुन्दर दृश्य से आँखें हटा लेगा अर्थात् सुन्दर दृश्य में उसकी आसक्ति है परन्तु जो जीव सुन्दर-असुन्दर के भेद के प्रति उदासीन होकर अनासक्त हो जाता है, उसके लिए समस्त दृश्य एक समान हो जाते हैं। इसी को सम्यक-आचरण कहते हैं।

बाह्य जगत के विषयों के प्रति सम-दुःख-सुख-भाव ही सम्यक आचरण है और इसी को सम्यक-चरित्र कहते हैं। सम्यक् चरित्र के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पंच अणुव्रतों का पालन किया जाना चाहिए। पंचव्रत के पालन में महावीर ने गृहस्थों और यतियों में भेद किया है। क्योंकि ये दोनों एक जैसे नियम नहीं पाल सकते। सामान्य श्रावक के लिए ये पंच-अणुव्रत रूप में और मुनियों के लिए पंच-महाव्रत के रूप में हैं।

जैन-धर्म के सिद्धान्त – पंच अणुव्रत

(1.) अहिंसा अणुव्रत: निरपराध को दण्डित या पीड़ित नहीं करना।

(2.) सत्य अणुव्रत: प्रेम, द्वेष एवं उद्वेग आदि वृत्तियों को संयमित करके सच बोलना।

(3.) अस्तेय अणुव्रत अथवा अचौर्याणुव्रत: किसी की वस्तु न चुराना और कोई पड़ी हुई वस्तु न उठाना।

(4.) ब्रह्मचर्य अणुव्रत: अपने दाम्पत्य में संतुष्ट रहना तथा मन-वचन-कर्म से पर-स्त्री या पर-पुरुष से सम्पर्क न रखना।

(5.) अपरिग्रह अणुव्रत अथवा परिग्रह परमाणु व्रत: आवश्यकता से अधिक धन तथा धान्य का संग्रह नहीं करना।

जैन यतियों एवं साधुओं के लिए निर्धारित पंचव्रत, पंच महाव्रत कहलाते हैं।

जैन-धर्म के सिद्धान्त – पंच महाव्रत

(1.) अहिंसा

मन, वचन और कर्म से किसी का अहित नहीं करना ही अहिंसा है। अहिंसा का उपदेश ही महावीर स्वामी की शिक्षाओं और जैन-धर्म के सिद्धान्तों का मूल मन्त्र है। अहिंसा का व्यापक अर्थ प्राणी-मात्र के प्रति दया, समानता और उपकार की भावना रखने से है। गृहस्थों के लिए पूर्ण अहिंसाव्रत धारण करना कठिन है, इसलिए उनके लिए स्थूल अहिंसा का विधान किया गया है जिसका अर्थ है- निरपराधियों की हिंसा नहीं करना।

(2.) सत्य

महावीर स्वामी ने सत्य वचन पर अत्यधिक जोर दिया, क्योंकि बिना सत्य भाषण के अहिंसा का पालन सम्भव नहीं है। महावीर स्वामी का उपदेश था कि मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में सत्य बोलना चाहिए।

(3.) अस्तेय

अस्तेय का अर्थ है- ‘जो वस्तु अपनी नहीं है, उसे ग्रहण नहीं करना।’ महावीर स्वामी ने चोरी को महान् अनैतिक कार्य बताया तथा इससे दूर रहने को कहा। उन्होंने गृहपति की अनुमति के बिना किसी के घर में नहीं जाने तथा भिक्षा में प्राप्त अन्न को गुरु की इच्छा के बिना ग्रहण न करने को भी अस्तेय में सम्मिलित किया।

(4.) अपरिग्रह

अपरिग्रह का अर्थ है– ‘संग्रह न करना’ और इसका व्यापक अर्थ है- ‘किसी भी वस्तु में ममत्व नहीं रखना।’ महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नहीं रखता, वह संसार के मायाजाल से दूर रहता है।

(5.) ब्रह्मचर्य

पार्श्वनाथ ने उपरोक्त चार महाव्रत ही बताए थे, महावीर स्वामी ने चार व्रतों में पाँचवाँ व्रत जोड़कर इन्हें त्रिरत्नों की प्राप्ति का साधन बताया। ब्रह्मचर्य का अर्थ विपरीत लिंगी शरीर से दूर रहना होता है।

जैन-धर्म के सिद्धान्त – सात शील व्रत

महावीर के धर्म में पाँच व्रतों के साथ-साथ सात शील व्रतों के पालन का भी निर्देशन किया गया-

(1.) दिग्व्रत: अपनी क्रिया को कुछ विशिष्ट दिशाओं में सीमित करना।

(2.) देशव्रत: अपना कार्य कुछ विशिष्ट देशों तक सीमित रखना। 

(3.) अनर्थ दण्डव्रत: बिना कारण अपराध का भागी न बनाना। 

(4.) सामयिक: अपने ऊपर विचार करने के लिए समय का कुछ भाग निश्चित करना।

(5.) प्रोषधोपवास: प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की अष्टमियों और चतुर्दशियों को उपवास करना।

(6.) उपभोग-प्रतिभोग परिणाम: दैनिक उपभोग की वस्तुओं और पदार्थों को नियमित करना।

(7.) अतिथि संविभाग: घर आए साधु या उपासक को भोजन कराने के बाद भोजन करना।

पाँच समिति

जैन-धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में पाँच बातों की सतर्कता बरतनी चाहिए-

(1.) ईर्या समिति: चलते-फिरते समय सावधानी रखना ताकि किसी जीव को कष्ट न पहुंचे।

(2.) भाषा समिति: बोलते समय सावधानी रखना ताकि किसी मानव को ठेस न पहुँचे।

(3.) एषणा समिति: खाना खाते समय सावधानी बरतना ताकि कोई जीव न मरे।

(4.) आदान निक्षेप समिति: वस्तुओं को उठाते, रखते और प्रयोग करते समय सावधानी रखना जिससे दूसरे को कष्ट न हो।

(5.) उत्सर्ग समिति: मल-मूत्र त्याग में सावधानी रखना तथा गन्दगी न फैलाना।

जैन-धर्म के सिद्धान्त – अनेकान्तवाद अथवा स्याद् वाद

जैन दर्शन के अनुसार वस्तु के अनन्त स्वरूप हैं। ज्ञानी अथवा अर्हत् या जीवनमुक्त व्यक्ति ही उन वस्तुओं की अनन्त्ता को जान सकते हैं। सामान्य जन वस्तु के कुछ स्वरूपों को ही जानते हैं। ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की हो सकती है-

(1.) है,

(2.) नहीं है,

(3.) है और नहीं है,

(4.) कहा नहीं जा सकता,

(5.) है, किन्तु कहा नहीं जा सकता,

(6.) नहीं है और कहा नहीं जा सकता,

(7.) है और नहीं है, किन्तु कहा नहीं जा सकता।

जैन-धर्म में इसे अनेकान्तवाद, स्याद्वाद अथवा सप्त-भंगी का सिद्धान्त कहते हैं। यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति किसी एक स्वरूप को जाने हुए हो और दूसरा किसी और स्वरूप को।यह भी सम्भव है कि वक्ता जाने हुए स्वरूप को भी आवश्यकतानुसार अंशमात्र ही कहे। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के इस प्रकार के कथन परस्पर-विरोधी प्रतीत हो सकते हैं।

जबकि वे अपनी-अपनी दृष्टि से ठीक हैं। यदि मनुष्य तटस्थ भाव से उसी वस्तु का दर्शन करता है और जैसी वह उसे दिखाई देती है, वह वैसी ही उसे बताता है तो वह बताना सत्य ही कहा जाएगा, असत्य नहीं। समझ और विवेक के परिणाम की भिन्नता के कारण स्वरूप को समझने में कल्पना की अधिकता रहेगी ही।

अनेकान्तावाद अथवा स्यादवाद इसी दृष्टि को जगाता है। वस्तु के अनेक स्वरूपों को जानने के लिए ‘आविष्ट बुद्धि’ नहीं अपितु ‘निर्मल बुद्धि’ चाहिए। यदि बुद्धि निर्मल है तो विविधता चाहे भाव की हो या विचार या कर्म की हो, वह विचित्र न लग कर स्वाभाविक लगेगी। स्याद्वादी वही हो सकता है जो निर्मल अन्तःकरण वाला है, प्रशान्त है और जिसकी संवेदना सूक्ष्म को ग्रहण करती है।

तपस्या और उपवास

महावीर ने आत्मा को वश में करने तथा पाँच आचरणों का पालन करने में तपस्या और उपवास पर सर्वाधिक बल दिया। उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बताई- एक बाह्य तथा दूसरी आन्तरकि। बाह्य तपस्या में व्रत, अन्न त्याग, भिक्षाचार्य तथा कष्ट सहन करना मुख्य हैं। आन्तरिक तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान तथा शरीर त्याग सम्मिलित है।

बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में आन्तरिक तपस्या करने की क्षमता आती है और उससे आदमी में अच्छे विचारों का विकास होता है। महावीर स्वामी ने तपस्या का सबसे  सरल उपाय उपवास बताया है। इससे शरीर एवं आत्मा शुद्ध होते हैं और मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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जैन धर्म

जैन धर्म विश्व के सबसे पुराने धर्मों में से है। वर्तमान समय में जैन-धर्म के सिद्धांत, दर्शन एवं मान्यताओं पर महावीर स्वामी का प्रभाव सबसे अधिक है।

महावीर स्वामी की मान्यताएँ

महावीर स्वामी ने जैन-धर्म के सिद्धांत निर्धारित करने से पहले, उस युग में प्रचलित धार्मिक और सामाजिक बुराइयों के सम्बन्ध में कई बातें कहीं-

(1.) वेदों के ज्ञान में विश्वास नहीं

महावीर स्वामी ने जीवन में नैतिकता का पालन करने पर जोर दिया तथा ब्राह्मण धर्म के सिद्धांतों, वेदों, यज्ञों और कर्मकाण्ड का विरोध किया। उनका कहना है था कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि वैदिक ज्ञान ही एकमात्र पूर्ण और निर्विवाद है। उनके अनुसार वेद ईश्वरीय कृति न होकर मानवीय कृति थे। अहिंसावादी होने के कारण महावीर, हिंसक यज्ञों को स्वीकार नहीं कर सकते थे। उनके अनुसार यज्ञ तथा कर्मकाण्ड यांत्रिक थे और उनसे मनुष्य की अन्तःशुद्धि सम्भव नहीं थी।

(2.) ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं

महावीर का विचार था कि मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान् है और शक्ति तथा नैतिकता है, वही भगवान् है। इसके आधार पर माना जाता है कि जैन-धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करता तथा वह ईश्वर को सृष्टि का निर्माता नहीं मानता। जैन-धर्म के अनुसार संसार वास्तविक है और इसका कभी भी विनाश नहीं होता।

संसार छः द्रव्यों का समुच्चय है। ये द्रव्य हैं- (1.) जीव, (2.) पुद्गल, (3.) धर्म, (4.) अधर्म, (5.) आकाश और (6.) काल। ये समस्त द्रव्य शाश्वत, नित्य और अनश्वर हैं। अतः सृष्टि भी अनादि और अनन्त है। उपरोक्त द्रव्यों के संगठन एवं विघटन के कारण इनसे निर्मित पदार्थों के रूप में परिवर्तन होता रहता है।

(3.) आत्मा के अस्तित्त्व में विश्वास

महावीर आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तन हो सकते हैं किन्तु आत्मा अजर-अमर है और सदैव एक सी बनी रहती है। वे जीव को ही आत्मा मानते हैं और उनके अनुसार जीव केवल मनुष्य, पशु और वनस्पति में ही नहीं है, अपितु विश्व के कण-कण में समाया है।

(4.) कर्मफल एवं पुनर्जन्म में विश्वास

महावीर स्वामी का मानना था कि यदि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली जाए तो कर्मों के बन्धन नष्ट हो सकते हैं और निर्वाण प्राप्त हो सकता है। उनका उपदेश था-‘मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्म-फल का नाश करे और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्म-फल संगृहीत न करे, ऐसा करने से मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी।’

इसका अर्थ यह हुआ कि जैन-धर्म कर्म-फल एवं पुनर्जन्म दोनों में विश्वास रखता है। मनुष्य की उन्नति-अवनति स्वयं उसके कर्मों पर निर्भर करती है। किए हुए कर्मों का फल भोगे बिना जीव का छुटकारा नहीं हो सकता। इस प्रकार, कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है।

(5.) सामाजिक समानता में विश्वास

महावीर स्वामी ने आर्यों की वर्ण व्यवस्था का विरोध किया और जैन-धर्म का द्वार बिना किसी भेदभाव के समस्त वर्णों के लिए खोल दिया। उनकी मान्यता थी कि समस्त देहधारियों की आत्मा एक जैसी है तथा निर्वाण व्यक्तिगत पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

इसलिए मोक्ष प्राप्ति के सम्बन्ध में किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। महावीर स्वामी के बाद उनके अनुयाई समानता के इस सिद्धान्त को व्यवहार में नहीं ला सके और उनमें जाति-भेद के संस्कार विद्यमान रहे। यही कारण है कि जैन-धर्म शूद्र कही जाने वाली जातियों को नहीं अपना सका।

(6.) स्त्री स्वातन्त्र्य में विश्वास

बाईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने स्त्रियों को निर्वाण-प्राप्ति की अधिकारिणी माना था। महावीर स्वामी ने भी उनके इस विचार का अनुसरण किया तथा अपने धर्म तथा संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिए। इस कारण अनेक स्त्रियों ने जैन-धर्म की दीक्षा ली। पुरुषों की भाँति स्त्रियों के भी दो वर्ग थे- एक श्रमणियों का और दूसरा श्राविकाओं का। इन्हें भी उपासना करने तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करने का अधिकार था।

जैन-धर्म का संगठन

अनुश्रुति के अनुसार महावीर स्वामी के शिष्य समुदाय में 14 हजार श्रमण, 36 हजार श्रमणियाँ, 1 लाख 69 हजार श्रावक तथा 3 लाख 18 हजार श्राविकाएं थीं। महावीर ने पावापुरी में जैन-संघ की स्थापना की जिसके अध्यक्ष वे स्वयं थे। महावीर स्वामी के जीवन में 11 गणधर अर्थात् मुख्य प्रचारक थे। जब महावीर का निधन हुआ तब केवल केवल एक गणधर सुधर्मन् ही जीवित बचे थे।

 अगले 22 वर्ष तक यही सुधर्मन् जैन संघ के अध्यक्ष रहे। तदनंतर जम्बू स्वामी जैन संघ के नायक हुए जो लगभग 44 वर्षों तक जैन संघ के प्रमुख रहे। उन्होंने मथुरा तथा शूरसेन में जैन-धर्म का व्यापक प्रचार किया। उनके उपरांत जैन संघ का विशेष विवरण प्राप्त नहीं होता। मगध के अंतिम नंद शासक के समय सम्भूति विजय जैन संघ के अध्यक्ष थे।

उनके बाद भद्रबाहु जैन संघ के छठे अध्यक्ष हुए जो सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समकालीन थे। भद्रबाहु ने जैन-धर्म के प्रमुख ग्रंथ कल्पसूत्र की रचना की। इसमें तेईस तीर्थंकरों की जीवनियां, जैन संघ के प्रमुखों तथा मतों के विवरण हैं एवं जैन साधुओं के लिए बनाए गए नियम लिखे हुए हैं। जैन-धर्म के इतिहास में आचार्य भद्रबाहु का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

जैन-धर्म का प्रचार एवं प्रसार

महावीर स्वामी के प्रयत्नों से जैन-धर्म का प्रचार बड़े उत्साह से आरम्भ हुआ। लोगों द्वारा इस धर्म को तेजी से अपनाने के कई कारण थे-

(1.) इसका मुख्य कारण स्वयं महावीर स्वामी का इसके प्रचार-प्रसार में भाग लेना था। वे स्वयं साल के आठ माह तक स्थान-स्थान पर घूम-घूमकर अपने मत का प्रचार करते थे तथा वर्षा ऋतु के चार मास किसी एक स्थान पर बिताते थे।

(2.) महावीर स्वामी ने जन-भाषा ‘पालि’ में अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया जिससे लोगों ने उनके उपदेशों एवं विचारों को बड़ी सरलता से समझ लिया। अन्य लोक-भाषाओं में जैन-धर्म के साहित्य की रचना हुई जिससे यह धर्म आसानी से लोकप्रिय बन गया।

(3.) जैन-धर्म के शीघ्र प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक समानता की भावना थी। महावीर ने अपने धर्म का द्वार समस्त जाति के लिए समान रूप से खोल रखा था। इस कारण वैदिक धर्म की कठोर वर्ण व्यवस्था में उपेक्षित अनुभव कर रहे लोगों ने महावीर के विचारों को अपना लिया।

(4.) जैन-धर्म के प्रचार-प्रसार में महावीर स्वामी द्वारा संस्थापित जैन-संघों ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

(5.) जैन-धर्म के दार्शनिक ग्रंथों ने इस धर्म को जनता की दृष्टि में आदरणीय बना दिया। जैन मुनि इन्द्रभूति, वायुभूति, भद्रबाहु, जिनसेन, गुणभद्र, हेमचन्द्र आदि ने विविध ग्रन्थों की रचना करके इसके प्रचार-प्रसार में विपुल योगदान दिया।

(6.) महावीर की सफलता को ब्राह्मणों के विरुद्ध क्षत्रियों की सफलता के रूप में देखा गया। इस भावना से प्रेरित होकर बहुत से राजाओं, राजपुत्रों एवं क्षत्रियों ने इस धर्म को अपना लिया।

(7.) महावीर स्वामी राजवंश से सम्बन्धित थे और भारत में कई राजवंशों के साथ उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। इस कारण इस धर्म को राज्याश्रय मिल गया जिसने इस धर्म के प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। ईस्वी सन् के प्रारम्भ होने तक जैन-धर्म लगभग सम्पूर्ण भारत में फैल गया किंतु जैन-धर्म का प्रसार बौद्ध धर्म तथा वैष्णव धर्म की भाँति नहीं हो पाया।

समय-समय पर इसका विकास अवरुद्ध भी होता रहा किंतु यह भारत में स्थायित्व प्राप्त करने में सफल रहा। राजपूतकाल में इसका आंशिक रूप में पुनरुत्थान भी हुआ। आज भी महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात सहित भारत के अनेक प्रांतों में जैन-धर्म के लगभग 45 लाख अनुयाई निवास करते हैं। भारत की जनसंख्या में इनका योगदान लगभग 0.4 प्रतिशत है।

जैन-धर्म को राज्याश्रय

महावीर स्वामी ने समकालीन मगध शासकों- बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदायीभद्र अथवा उदयन ने जैन-धर्म को संरक्षण प्रदान किया। अवन्ती, वत्स, अंग, चम्पा, सौबीर आदि राज्यों के शासकों ने भी इसे स्वीकार कर इसके प्रसार में सहयोग दिया। वज्जि, लिछच्वी एवं मगध वंश से महावीर का पारिवारिक सम्बन्ध होने से उस पूरे क्षेत्र में जैन-धर्म का तेजी से प्रसार हुआ।

सिकन्दर के आक्रमण के समय जैन साधु सिंधु-नदी के तट तक विद्यमान थे। जैन जैन ग्रंथों के अनुसार सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम समय में जैन-धर्म स्वीकार कर लिया था। मौर्य-सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रपौत्र सम्प्रति ने जैन-धर्म को दक्षिण भारत में फैलाने में सहयोग दिया। ईसा पूर्व द्वितीय शती में कलिंगराज खारवेल ने जैन-धर्म ग्रहण किया और विशाल जैन प्रतिमा का निर्माण करवाया।

उज्जैन नरेश गर्दभिल्ल, उसके पुत्र विक्रम तथा जैन मुनि कालकाचार्य के उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ईसा पूर्व पहली शती में मालवा की राजधानी उज्जैन इस धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र थी। कुषाण नरेशों के समय मथुरा में जैन-धर्म का खूब प्रसार हुआ। पांचवीं से बारहवीं शती ईस्वी तक दक्षिण भारत के गंग, कदम्ब, चौलुक्य तथा राष्ट्रकूट राजाओं ने जैन-धर्म को आश्रय एवं प्रोत्साहन दिया।

राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष (ई.814-74) ने जैन-धर्म के प्रचार में विशेष रुचि दिखाई। चौलुक्य राजा सिद्धराज एवं उसके पुत्र कुमारपाल, जैन-धर्म के महान् संरक्षक थे। हेमचंद्र नामक प्रसिद्ध जैन मुनि कुमारपाल की सभा में ही था।

राजपूत काल में अनेक चौहान, प्रतिहार, परमार आदि राजपूत राजा भी जैन-धर्म के प्रति आदर का भाव रखते थे और जैन मंदिरों तथा उपाश्रयों को भूमि एवं भेंट आदि प्रदान करते थे। जब भारत भूमि पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हो गए तब राजपूत राजाओं ने जैन-धर्म को संरक्षण देना लगभग समाप्त कर दिया। इससे जैन-धर्म की क्षति हुई।

जैन-धर्म में विभाजन

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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महावीर स्वामी के जीवनकाल में ही जैन-धर्म में मतभेद उत्पन्न हो गया। स्वयं उन्हीं के दामाद जमालि क्षत्रिय का महावीर स्वामी से ‘क्रियमाणकृत’ के सिद्धान्त पर मतभेद हो गया और वह जैन-संघ से अलग हो गया। महावीर स्वामी की पुत्री ‘प्रियदर्शना’ भी लगभग 1000 भिक्षुणियों के साथ जैन-संघ से पृथक हो गई परन्तु कालान्तर में वह अपनी समस्त अनुयाइयों के साथ संघ में वापस लौट आई। इस घटना से जैन-धर्म के प्रचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। महावीर स्वामी के बाद जैन यातियों में भी आचार सम्बन्धी परिवर्तन होने लगे। महावीर के निर्वाण के 160 वर्ष पश्चात् मगध में 12 वर्ष का लम्बा अकाल पड़ा जिसके फलस्वरूप बहुत से जैन भिक्षुओं को आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में मगध छोड़़कर मैसूर चले जाना पड़ा। बहुत से जैन साधु, आचार्य सम्भूति विजय के शिष्य स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रह गए। मगध के इस जैन समुदाय ने प्राचीन जैन ग्रंथों के संकलन के लिए पाटलिपुत्र में एक सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में द्वादष अंगों का संकलन किया गया जिन्हें जैन-धर्म के सिद्धांतों का महत्त्वपूर्ण संकलन माना जाता है। इस संकलन के समय महावीर के बताए सिद्धांतों में बहुत से परिवर्तन कर दिए गए। प्राचीन जैन साधु नग्न रहते थे परन्तु अब कुछ साधु वस्त्र धारण करने लगे।

इस सम्मेलन को ‘प्रथम जैन परिषद्’ एवं ‘पाटलिपुत्र-वाचना’ कहा जाता है। अकाल समाप्त होने के बाद जब भद्रबाहु अपने शिष्यों के साथ पाटलिपुत्र आए तो उन्होंने इन परिवर्तनों को स्वीकार करने से मना कर दिया।

दिगम्बर एवं श्वेताम्बर सम्प्रदाय

इस कारण जैन-धर्म दो शाखाओं- दिगम्बर और श्वेताम्बर में बंट गया। मगध के जैन साधुओं ने श्वेत वस्त्र पहनने आरम्भ कर दिए थे इसलिए वे श्वेताम्बर कहलाए जबकि नग्न रहने वाले साधुओं को दिगम्बर कहा गया। श्वेताम्बरों की तुलना में दिगम्बर सम्प्रदाय को अधिक लोकप्रियता हुई। इसलिए इन दोनों सम्प्रदायों में मतभेद और बढ़े।

यद्यपि इन दोनों सम्प्रदायों के सिद्धांतों एवं दार्शनिक चिंतन में विशेष अंतर नहीं है तथापि बाह्य स्वरूप में कुछ अन्तर हैं-

क्र.स.दिगम्बर सम्प्रदायश्वेताम्बर सम्प्रदाय
1.दिगम्बर सम्प्रदाय अधिक कट्टरपंथी है और इसके अनुयाई, धर्म के नियमों का पालन कठोरता से करते हैं।श्वेताम्बर सम्प्रदाय उदारवादी है और इसके अनुयाई मानवीय दुर्बलताओं को ध्यान में रखकर, नियम-पालन में अधिक कठोरता नहीं बरत्ते।
2.दिगम्बर सम्प्रदाय के साधु निर्वस्त्र रहते हैं।श्वेताम्बर सम्प्रदाय के साधु श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।
3.दिगम्बर सम्प्रदाय स्त्रियों को इसी जीवन में निर्वाण प्राप्त करने की अधिकारिणी नहीं मानता।श्वेताम्बर सम्प्रदाय उनको निर्वाण की अधिकारिणी मानता है।
4.दिगम्बर सम्प्रदाय का विश्वास है कि ‘कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति के बाद व्यक्ति को आहार की आवश्यकता नहीं रहती।श्वेताम्बर वालों का मत है कि इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता रहती है।
5.दिगम्बर सम्प्रदाय के मतानुसार भगवान महावीर ने विवाह किया ही नहीं था। न उनके कोई पुत्री थी।श्वेताम्बर मत की मान्यता है कि भगवान महावीर ने यशोदा से विवाह किया  था और उनके प्रियदर्शना नामक पुत्री हुई थी।
6.दिगम्बर मत के अनुसार 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ पुरुष थे।श्वेताम्बर मत के अनुसार 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ स्त्री थे।
7.दिगम्बर सम्प्रदाय आगमों को प्रमाण नहीं मानता।श्वेताम्बर सम्प्रदाय आगमों को प्रमाण मानता है।

कालान्तर में जैन-धर्म की दोनों शाखाएं भी तेरापन्थी, मन्दिर मार्गी, स्थानकवासी आदि अन्य उपशाखाओं में बंट गई और जैन-धर्म भी, हिन्दू-धर्म की भांति अनेक मत-मतान्तरों में विभाजित हो गया।

जैन-धर्म को व्यापक लोकप्रियता न मिलने के कारण

बौद्ध धर्म की तुलना में जैन-धर्म अधिक व्यापक नहीं हो पाया। इसके कई कारण थे-

(1.) जैन-धर्म के सीमित प्रसार का मुख्य कारण इस धर्म में दार्शनिक पक्ष की प्रधानता होना और इसके आचरण सम्बन्धी नियमों में कठोरता का होना था। अहिंसा, नग्नता, केशलुंचन, संथारा तथा काया-क्लेश के सिद्धान्त जनसामान्य के लिए कभी भी आकर्षण का विषय नहीं हो सकते थे।

(2.) महावीर स्वामी ने जाति-प्रथा का विरोध किया था परन्तु उनके अनुयाई इस सिद्धान्त को हृदय से नहीं अपना पाए और संघ में प्रवेश के लिए उच्च जातियों के लोगों को ही प्राथमिकता दी जाती रही। इससे जैन-धर्म निम्न जातियों में अलोकप्रिय हो गया।

(3.) महावीर ने ईश्वर एवं देवी-देवताओं की पूजा का निषेध किया था किंतु जैन धर्मावलम्बियों ने ईश्वर की जगह तीर्थंकरों को पूजना आरम्भ कर दिया तथा अपनी सुविधानुसार नए देवी-देवताओं के अस्तित्त्व की कल्पना कर ली। सामान्य हिन्दू ईश्वर को छोड़़कर तीर्थंकरों तथा वैदिक देवी-देवताओं के स्थान पर जैन देवी-देवताओं को पूजने को तैयार नहीं हुआ।

(4.) ब्राह्मण धर्म की तुलना में जैन-धर्म अधिक लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका। समय के साथ-साथ इस धर्म में ब्राह्मण धर्म की अनेक बातें घुस गईं। ब्राह्मण धर्म की जाति-व्यवस्था, धार्मिक तथा सामाजिक संस्कार, भक्तिवाद और उसके देवी देवता भी जैन-धर्म में प्रवेश पा गए। इसलिए जैन-धर्म का बाह्य स्वरूप हिन्दू-धर्म जैसा ही हो गया और उसमें नवीनता का अभाव हो गया।

(5.) भारतीय जनसमुदाय सैंकड़ों सालों से कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास करता आया था किंतु जैन दर्शन में संचित कर्मों की पुद्गल के रूप में कल्पना की गई जो एक प्रकार का अजीव अर्थात् ‘मैटर’ था। परम्परागत भारतीय समाज पुद्गल के सिद्धांत पर विश्वास नहीं कर सका।

(6.) जैन संघों का संगठन जनतन्त्रात्मक नहीं था। जैन संघों की शक्ति प्रारम्भ से ही धर्माचार्यों अथवा गणधरों के हाथों में केन्द्रित रही। इस कारण अन्य लोगों ने स्वयं को उपेक्षित अनुभव किया।

(7.) जैन संघों में प्रगतिशील वैधानिक व्यवस्था का अभाव था। इसलिए संघों की व्यवस्था पर कुछ लोग हावी हो गए और उन्होंने मनमाने ढंग से कार्य किया जिससे शेष लोग दूर छिटक गए।

(8.) जैन संघों में उद्देश्य के लिए समर्पित ऐसे विद्वानों की कमी रही जो अन्य धर्मों के दार्शनिक विचारों का खण्डन करके अपने धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित कर पाते। इस कारण यह धर्म अन्य धर्मों की दौड़़ में बहुत पीछे रह गया।

(9.) भारत के कुछ शासकों ने जैन-धर्म को आश्रय अवश्य दिया परन्तु इस धर्म को अशोक, कनिष्क तथा हर्ष जैसे आश्रयदाता नहीं मिल पाए जो उसे देशव्यापी बना देते।

(10.) अन्य धर्मों की प्रतिद्वन्द्विता के कारण जैन-धर्म के प्रसार को धक्का लगा। यद्यपि बौद्ध धर्म उसका मुख्य प्रतिद्वन्द्वी था तथापि हिन्दू-धर्म की शैव एवं वैष्णव शाखाओं के उत्थान ने भी इस धर्म की प्रगति को अवरुद्ध किया।

(11.) दिगम्बर, श्वेताम्बर, तेरापंथी, मंदिरमार्गी, स्थानकवासी आदि शाखाओं के परस्पर मतभेदों ने भी जैन-धर्म के विकास को अवरुद्ध किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – जैन धर्म

ब्राह्मण धर्म से असंतोष

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

जैन-धर्म के सिद्धान्त

जैन धर्म

जैन धर्म का साहित्य तथा भारतीय संस्कृति को देन

जैन धर्म का साहित्य तथा भारतीय संस्कृति को देन

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जैन धर्म का साहित्य

जैन-धर्म का साहित्य

जैन-धर्म का साहित्य बहुत विशाल है। अधिकांश में वह दार्शनिक साहित्य है। जैन-धर्म का मूल साहित्य ‘प्राकृत’ भाषा में लिखा गया है। मागधी भाषा में लिखा गया जैन साहित्य भी प्रचुर मात्रा में मिलता है। जैन विद्वानों ने कन्नड़, तमिल और तेलगु भाषाओं में भी अनेक ग्रन्थ लिखे। महावीर स्वामी के बाद जैन विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक ग्रन्थों की रचना की।

महावीर स्वामी की गतिविधियों का केन्द्र मगध था इसलिए उन्होंने लोकभाषा अर्धमागधी में उपदेश दिए जो जैन आगमों में सुरक्षित हैं। श्वेताम्बर सम्प्रदाय ‘आगमों’ को प्रमाण मानता है जबकि दिगम्बर सम्प्रदाय आगमों को प्रमाण नहीं मानता। दिगम्बर सम्प्रदाय की मान्यताओं के अनुसार आगम साहित्य कालदोष से विच्छिन्न हो गया है, इसलिए मान्य नहीं है।

दिगंबर सम्प्रदाय ‘षट्खंडागम’ को स्वीकार करता है जो 12वें अंग दृष्टिवाद का अंश माना गया है। दिगंबरों के प्राचीन साहित्य की भाषा ‘शौरसेनी’ है। जैन मुनियों ने आगे चलकर अपभ्रंश तथा अपभ्रंश की उत्तरकालीन लोक-भाषाओं में भी ग्रंथों की रचना की।

विषय-वस्तु की दृष्टि से सम्पूर्ण जैन साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1.) आगम साहित्य- आगम, ज्ञान के अक्षय भण्डार होने के कारण गणिपिटक तथा संख्या में बारह होने से द्वादशांगी नाम से भी पुकारे जाते हैं। आगम साहित्य के भी दो भाग हैं-

(अ.) अर्थागम- तीर्थंकरों द्वारा उपदिष्ट वाणी अर्थागम है।

(ब.) सूत्रागम- तीर्थंकरों के प्रवचन के आधार पर गणधरों द्वारा रचित साहित्य सूत्रागम है। आचरंगसूत्र में जैन भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम दिए गए हैं। भगवतीसूत्र में महावीर स्वामी के माध्यम से जैन-धर्म के सिद्धान्तों की विवेचना की गई है। आचार्य भद्रबाहु रचित ‘कल्पसूत्र’ अत्यंत प्रसिद्ध है।

(2.) आगमेतर साहित्य- स्वयंभू, पुष्प दंत, हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरी आदि जैन रचनाकारों ने पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य, रास काव्य आदि विविध ग्रंथों की रचना की। उन्होंने संस्कृत साहित्य में प्रचलित लोक-कथाओं को भी अपनी रचनाओं का आधार बनाया और उन कथाओं की परिणति अपने धर्म के अनुसार दिखाई।

आगमों का संकलन

जैन-आगमों में तीर्थंकरों के उपदेशों तथा गणधरों द्वारा की गई उनकी व्याख्याओं का संकलन है। इनका प्रथम संकलन महावीर स्वामी के निधन के लगभग 160 वर्ष पश्चात् पाटलिपुत्र में हुआ। इसे प्रथम जैन परिषद कहा जाता है। इस संकलन के समय महावीर के बताए सिद्धांतों में बहुत से परिवर्तन कर दिए गए।

इस सम्मेलन में आगमों के 12 अंग संकलित किए गए। कुछ समय पश्चात् जब आगम साहित्य का विच्छेदन होने लगा तो महावीर के निर्वाण के 827 या 840 वर्ष बाद (ईस्वी 300 या 313 में) मथुरा में आर्य स्कन्दिल की अध्यक्षता में एक और जैन सम्मेलन आयोजित हुआ। इसे द्वितीय जैन परिषद् कहा जाता है। इसमें विभिन्न साधुओं की स्मृति के आधार पर आगमों के 12 अंगों का नए सिरे से संकलन किया गया। इन्हें ‘माथुरी-वाचना’ कहते हैं।

मथुरा सम्मेलन के लगभग 153 वर्ष बाद अर्थात् महावीर के निर्वाण के 980 या 993 वर्ष बाद (ईस्वी 453-466 में) वलभी में देवर्षि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में जैन साधुओं का तीसरा सम्मेलन हुआ, जिसे तृतीय जैन परिषद भी कहा जाता है। इस परिषद् में आगमों का अन्तिम बार संकलन किया गया। इन्हें ‘वलभी-वाचना’ भी कहा जाता है।

वर्तमान आगम इसी संकलना के रूप हैं। प्रथम परिषद में जिन द्वादश अंगों की रचना हुई थी, उनमें से एक अंग लुप्त हो गया। ग्यारह अंग ही शेष बचे थे। कुछ विद्वान इस सम्मेलन का समय ई.512 मानते हैं।

जैन आगमों की उक्त तीन संकलनाओं के इतिहास से अनुमान होता है कि आगम साहित्य को बार-बार विपुल क्षति उठानी पड़ी जिसके कारण आगम साहित्य अपने मौलिक रूप में सुरक्षित नहीं रह सका। संभवतः इसी कारण बौद्ध साहित्य की तुलना में जैन साहित्य अत्यल्प है तथा इसमें अनेक विकार आ जाने की संभावना से दिगम्बर सम्प्रदाय ने आगमों को अस्वीकार कर दिया।

जैन आगमों का महत्त्व

वैदिक साहित्य में जो स्थान वेदों का और बौद्ध साहित्य में त्रिपिटक का है, वही स्थान जैन साहित्य में आगमों का है। जैन आगमों की संख्या 46 है-

(क) 12 अंग: आयारंग, सूयगडं, ठाणांग, समवायांग, भगवती, नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अंतगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, पण्हवागरण, विवागसुय, दिठ्ठवाय।

(ख) 12 उपांग: ओवाइय, रायपसेणिय, जीवाभिगम, पन्नवणा, सूरियपन्नति, जम्बुद्दीवपन्नति, निरयावलि, कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया, वण्हिदसा।

(ग) 10 पइन्ना: चउसरण, आउरपचक्खाण, भत्तपरिन्ना, संथर, तंदुलवेयालिय, चंदविज्झय, देविंदत्थव, गणिविज्जा, महापंचक्खाण, वोरत्थव।

(घ) 6 छेदसूत्र: निसीह, महानिसीह, ववहार, आचारदसा, कप्प (बृहत्कल्प), पंचकप्प।

(च) 4 मूलसूत्र: उत्तरज्झयण, आवस्सय, दसवेयालिय, पिंडनिज्जुति। नंदि और अनुयोग।

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से पाँचवी शताब्दी ईस्वी तक के भारत की आर्थिक तथा सामाजिक दशा का चित्रण करने वाला यह साहित्य अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। आयारंग, सूयगडं, उत्तरज्झयण, दसवेयालिय आदि ग्रन्थों में जैन भिक्षुओं के आचार-विचारों का विस्तृत वर्णन है। यह वर्णन बौद्धों के धम्मपद, सुत्तानिपात तथा महाभारत (शान्ति पर्व) आदि ग्रन्थों से काफी मेल खाता है। डॉ. विण्टरनीज आदि पश्चिमी विद्वानों के अनुसार यह साहित्य, श्रमण-काव्य का प्रतीक है।

भगवती कल्पसूत्र, ओवाइय, ठाणांग, निरयावलि आदि ग्रन्थों में श्रमण भगवान महावीर, उनकी चर्या, उनके उपदेशों तथा तत्कालीन राजा, राजकुमार और उनके युद्धों आदि का विस्तृत वर्णन है, जिससे तत्कालीन इतिहास की अनेक अनुश्रुतियों का पता लगता है

नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अन्तगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, विवागसुय आदि ग्रन्थों में महावीर द्वारा कही हुई कथा-कहानियों तथा उनकी शिष्य-शिष्याओं का वर्णन है, जिनसे जैन परम्परा सम्बन्धी अनेक बातों का परिचय मिलता है। रायपणेसिय, जीवाभिगम तथा पन्नवणा आदि ग्रन्थों में वास्तुशास्त्र, संगीत, वनस्पति आदि सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों का वर्णन है जो प्रायः अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता है।

छेदसूत्रों में साधुओं के आहार-विहार तथा प्रायश्चित आदि का विस्तृत वर्णन है, जिसकी तुलना बौद्धों के विनय-पिटक से की सकती है। वृहत्कल्पसूत्र (1-50) में बताया गया है कि जब महावीर साकेत (अयोध्या) सुभूमिभाग नामक उद्यान में विहार करते थे तो उस समय उन्होंने भिक्षु-भिक्षुणियों को साकेत के पूर्व में अंग-मगध तक दक्षइ के कौशाम्बी तक तथा उत्तर में कुणाला (उत्तरोसल) तक विहार करने की अनुमति दी।

इससे पता लगता है कि आरम्भ में जैन-धर्म का प्रचार सीमित था तथा जैन श्रमण मगध और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़़कर अन्यत्र नहीं जा सकते थे। निस्सन्देह छेदसूत्रों का यह भाग उतना ही प्राचीन है जितने स्वयं महावीर।

कनिष्क कालीन मथुरा के जैन शिलालेखों में भिन्न-भिन्न गण, कुल और शाखाओं का उल्लेख है। यह वर्णन भद्रबाहु के कल्पसूत्र में वर्णित गण, कुल और शाखाओं से मेल खाता है। इससे जैन आगम ग्रन्थों की प्रामाणिकता का पता चलता है। संभवतः इस समय तक जैन-धर्म में श्वेताम्बर और दिगम्बर का भेद नहीं था। जैन आगमों के विषय, भाषा आदि में जो पालि-त्रिपिटक से समानता है, वह भी इस साहित्य की प्राचीनता को दर्शाती है।

बौद्धों के पालि-सूत्रों की अट्टकथाओं की तरह जैनों के आगमों की भी अनेक टीका-टिप्पणियाँ, दीपिका, निवृत्ति, विवरण, अवचूरि आदि लिखी गईं। इस साहित्य को सामान्यतः चार भागों- निर्युक्ति, भाष्य, चूर्णि और टीका में विभक्त किया जाता है, आगम को मिलाकर इन्हें ‘पांचांगी’ कहा जाता है। आगम साहित्य की तरह यह साहित्य भी महत्त्वपूर्ण है तथा इसमें आगमों के विषयों का विस्तार किया गया है। इस साहित्य में अनेक अनुश्रुतियाँ संकलित हैं तथा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। वृ

हत्कल्पभाष्य, व्यवहारभाष्य, निशीथचूर्णि, आवश्यकचूर्णि, आवश्यकटीका, उत्तराध्ययन टीका आदि टीका-ग्रन्थों में पुरातत्त्व सम्बन्धी विविध सामग्री मिलती है, जिससे प्राचीन भारत के रीति-रिवाज, मेले त्यौहार, साधु-सम्प्रदाय, अकाल, बाढ़, चोर-लुटेरे, सार्थवाह, व्यापारिक मार्ग, शिल्पकला, वास्तुकला, पाककला, आभूषण निर्माण आदि विविध विषयों की जानकारी मिलती है।

लोक-कथा और भाषा शास्त्र की दृष्टि से भी यह साहित्य महत्त्वपूर्ण है। चूर्णि-साहित्य में प्राकृत मिश्रित संस्कृत का उपयोग किया गया है, जो भाषाशास्त्र की दृष्टि से विशेष महत्त्व का है, और साथ ही यह उस महत्त्वपूर्ण काल का द्योतक है जब जैन विद्वान ‘प्राकृत’ का आश्रय छोड़़कर संस्कृत भाषा की ओर बढ़ रहे थे।

जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन

यद्यपि जैन-धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ तथापि इस धर्म ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विभिन्न पक्षों को गहराई तक प्रभावित किया और भारतीय दर्शन, साहित्य तथा कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जैन-धर्म की भारतीय संस्कृति को प्रमुख देन इस प्रकार से है-

(1.) दार्शनिक क्षेत्र में

जैन विचारधारा ने ज्ञान-सिद्धान्त, स्याद्वाद और अहिंसा आदि के विचारों को पनपाकर भारतीय दार्शनिक चिन्तन को अधिक तटस्थ और गौरवपूर्ण बनाने में योगदान दिया। ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक जीव की आत्मा पूर्ण ज्ञानयुक्त है किंतु सांसारिक पर्दा उसके ज्ञान के प्रकाश को प्रकट नहीं होने देता। अतः प्राणी मात्र को इस पर्दे को हटाकर ज्ञान को समझना चाहिए। ऐसा करने पर वह ‘निग्रन्थ’ हो जाता है। विचार-समन्वय के लिए अनेकान्त दर्शन जैन-धर्म की महत्त्वपूर्ण देन है।

भगवान् महावीर ने इस दर्शन की मूल भावना का विश्लेषण करते हुए सांसारिक प्राणियों को बोध दिया- ‘किसी बात को, सिद्धान्त को एक तरफ से मत देखो, एक ही तरह उस पर विचार मत करो। तुम जो कहते तो वह सच होगा, पर दूसरे जो कहते हैं, वह भी सच हो सकता है। इसलिए सुनते ही भड़को मत। वक्ता के दृष्टिकोण से विचार करो।’

आज संसार में जो तनाव और द्वन्द्व है, वह दूसरों के दृष्टिकोण को न समझने के कारण है। संस्कृति के रक्षण और प्रसार में जैन-धर्म की यह देन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय समाज को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाकर जैन-धर्म ने भारतीय जीवन में नवीन चेतना का प्रसार किया। अहिंसा की नीति आज भी भारत की आन्तरिक एवं बाह्य नीतियों की प्रमुख अंग है।

(2.) साहित्य के क्षेत्र में

भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भी जैन-धर्म ने सांस्कृतिक समन्वय को प्रोत्साहन दिया। जैनाचार्यों ने देश में प्रचलित विभिन्न भाषाओं एवं लोक-भाषाओं को अपनाकर उन्हें समुचित सम्मान दिया। जैन-साधु एवं प्रचारक जहाँ कहीं भी वे गए, उन्होंने वहाँ की भाषाओं को अपने उपदेश और साहित्य का माध्यम बनाया। उनकी इसी उदार प्रवृत्ति के कारण मध्ययुगीन विभिन्न जनपदीय भाषाओं के मूल रूप सुरक्षित रह सके।

जैन लेखकों ने प्राकृत और संस्कृत भाषा को समृद्ध किया और भारतीय पौराणिक सामग्री को अपनी मान्यताओं के साथ समन्वित किया। इससे भारत के आध्यात्मिक चिन्तन को सर्वसाधारण तक पहुँचाने में बड़ी सहायता मिली। विमल सूरी ने प्राकृत भाषा में ‘षडमचरिय’ लिखकर राम कथा को जैन रूप दिया। सातवीं सदी में रविषेण ने ‘पद्मपुराण’ की रचना की और स्वयंम्भू ने अपभ्रंश में ‘षडमचरिउ’ लिखा।

आठवीं सदी में जिनसेन (द्वितीय) ने ‘हरिवंश पुराण’ की रचना की जो महाभारत और हरिवंश पुराण का जैन रुपान्तरण था। तेरहवीं सदी में देवप्रभ ने ‘पाण्डव चरित’ लिखा। सोलहवीं सदी में शुभचन्द्र ने ‘पाण्डव पुराण’ की रचना की। कथा साहित्य के विकास में भी जैन लेखकों ने विपुल योगदान दिया। पादलिप्त ने ‘तरंगवती’ की रचना की। चौदहवी सदी में इसी रचना के आधार पर ‘तरंगलीला’ बनी।

आठवीं सदी में हरिभद्र ने ‘समरादित्य कथा’ की रचना की। दसवीं सदी में सिद्धर्षि ने ‘उपमिति प्रपंच कथा’, चौदहवीं सदी में धर्मचन्द्र ने ‘मलय सुन्दरी कथा’ और बाद में बुद्धि विजय ने ‘पद्मावती कथा’ की रचना की। नाटक और गीत काव्य के क्षेत्र में भी जैन लेखकों की बड़ी देन है। उनके लिखे ‘हमीर-मद मर्दन‘, ‘मोहराज पराजय’ और ‘एरबुद्ध-रोहिणेय’ उल्लेखनीय नाटक हैं। जैन मुनियों ने नीति, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा चिकित्सा पर भी अनेक ग्रन्थों की रचना की।

(3.) कला के क्षेत्र में

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जैन-धर्म ने भारतीय कला-संसार के निर्माण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राचीन एवं मध्य-काल में जैन मुनियों द्वारा निर्मित कलात्मक स्मारक, मूर्तियां, मन्दिर, मठ और गुफाएं देश के विभिन्न प्रांतों में आज भी देखी जा सकती हैं। उड़ीसा के पुरी जिले में उदयगिरी और खण्डगिरी में 35 जैन गुफाएं मिली हैं। एलोरा में भी कई जैन गुफाएँ स्थित हैं। इन गुफाओं में जैन-धर्म प्रतिमाओं की तक्षण-कला देखते ही बनती है। मध्य भारत में खजुराहो नामक स्थान पर 10वीं तथा 11वीं शताब्दी के कई मन्दिर बने हुए हैं। राजस्थान में आबूपर्वत पर देलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मन्दिर हैं जो संगमरमर पत्थर से बने हुए हैं। इन मन्दिरों में मूर्ति कला के साथ-साथ बेल-बूटों, तोरणद्वारों, नक्काशी आदि का काम भारत की तक्षण कला के चरम को प्रदर्शित करता है। कठियावाड़ की गिरनार और पालीताना पहाड़ियों में, राजस्थान में रणकपुर नामक स्थान पर, बिहार में पारसनाथ और मैसूर में श्रवण-बेलगोला नामक स्थान पर जैन मन्दिर अथवा मंदिर समूह बने हुए हैं। शत्रुंजय पहाड़ी पर 500 जैन मन्दिर हैं। यहाँ जैन तीर्थंकरों की चतुर्मुखी मूर्तियाँ हैं। श्रवण बेलगोला में गोमतेश्वर की प्रतिमा दर्शकों को अचंभित कर देती है। 60 फुट उँची यह प्रतिमा एक पर्वत-शिखर पर स्थित है।

पूरे देश में फैली हुई जैन-धर्म की ये कलाकृतियाँ समकालीन भारतीय कला पर पर्याप्त प्रकाश डालती हैं। जैन साधुओं ने चित्रकला के क्षेत्र में अद्भुत कार्य किया। उन्होंने हजारों की संख्या में चित्रित पोथियां तैयार कीं जो आज भी देश के अनेक पोथी भण्डारों में संकलित हैं। इनमें चमकीले रंगों का प्रयोग किया गया है जो आज भी बिल्कुल नए दिखाई देते हैं।

(4.) अन्य क्षेत्रों में योगदान

जैन-धर्म ने प्राचीन आर्यों की धार्मिक एवं सामाजिक विषमताओं का विरोध किया जिसके कारण ब्राह्मणों ने वैदिक धर्म के भीतर व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। जैन-धर्म ने मनुष्य के कुल के आधार पर ‘उच्च’ और ‘हेय’ का निर्णय करने वाले ब्राह्मणों की आलोचना की तथा कर्म के आधार पर व्यक्ति की पहचान करने पर जोर दिया।

जैन-धर्म ने स्त्री को धर्म ग्रन्थों को पढ़ने का अधिकार देकर तथा उन्हें मोक्ष की अधिकारिणी मानकर स्त्री के ऋग्वैदिक-कालीन गौरव एवं आत्मसम्मान को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इस प्रकार जैन-धर्म ने सामाजिक समानता एवं समरता को पुनः प्रतिष्ठित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

जैन-धर्म ने सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। विचार-समन्वय के लिए ‘अनेकान्त दर्शन’ जैसी उदार चिंतन भावना, जैन-धर्म की महत्त्वपूर्ण देन है। आचार-समन्वय की दिशा में जैन-धर्म ने ‘मुनि धर्म’ और ‘गृहस्थ धर्म’ की व्यवस्था दी तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का संतुलन स्थापित किया।

जैन-धर्म में जातिवाद, क्षेत्रीयता तथा भाषाई विवाद आदि संकुचित मानसिकता को स्वीकार नहीं किया गया और उसने स्वयं को भारत के किसी एक क्षेत्र, या जाति या भाषा तक सीमित नहीं किया। जैन-धर्म अपनी समन्वय भावना के कारण ही सगुण और निर्गुण भक्ति के विवाद में नहीं पड़ा। प्राचीन साहित्य के संरक्षक के रूप में जैन-धर्म की विशेष भूमिका रही है। जैन साधुओं ने जीर्ण-शीर्ष एवं दुर्लभ ग्रन्थों का प्रतिलेखन कर उनकी रक्षा की और स्थान-स्थान पर ग्रन्थ भण्डारों की स्थापना कर, इस अमूल्य निधि को सुरक्षित रखा।

जैन-धर्म पर आरोप लगाया जाता है कि उसने संसार को दुःखमूलक बताकर निराशा की भावना फैलाई है, जीवन में वैराग्य की अधिकता पर बल देकर मानव के मन में पलने वाली अनुराग भावना और कला-प्रेम को कुण्ठित किया है। जैन-धर्म पर इस प्रकार के आरोप लगाना उचित नहीं है। जैन-धर्म ने जीवन के इस पक्ष को कभी भी भुलाया नहीं।

लेखनकला, काव्य, साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, गायन एवं वादन सभी क्षेत्रों के उन्नयन में जैन-धर्म ने अपना विपुल योगदान दिया। जैन-धर्म की वैराग्य भावना मनुष्य मात्र को आसक्ति से उत्पन्न होने वाले दुःखों से दूर करके उन्हें परम आनंद की उपलब्धि कराने के लिए है। जैन-धर्म ने ईश्वर अथवा देवी-देवताओं का मुखापेक्षी बनने की बजाए मनुष्य को स्वयं अपना भाग्य-विधाता बनने का मार्ग सुझाया है। जैन-धर्म की दृष्टि में मनुष्य का कर्म एवं पुरुषार्थ ही उसे ऊंचा उठा सकता है। जैन धर्म की यह विचारधारा मानव समाज की उन्नति का सबसे बड़ा कारण है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – जैन धर्म

ब्राह्मण धर्म से असंतोष

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

जैन-धर्म के सिद्धान्त

जैन धर्म

जैन धर्म का साहित्य तथा भारतीय संस्कृति को देन

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

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महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म दोनों ही समाज के समक्ष पूरी तरह स्पष्ट थे। उनकी सरलता और सहजता इस एक उपदेश से भी स्पष्ट हो जाती है- हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बनकर विचरो। तुम अपनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूँढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ।   

महात्मा बुद्ध

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध दूसरी धार्मिक क्रांति के प्रणेता गौतम बुद्ध थे जिन्हें शाक्य मुनि, भगवान बुद्ध तथा महात्मा बुद्ध भी कहा जाता है। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता शुद्धोदन, शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। शाक्यों का गणराज्य भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर हिमालय की तराई में स्थित था जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी।

सिद्धार्थ का जन्म

कपिलवस्तु एवं देवदह के मध्य, वर्तमान नौतनवा स्टेशन से 8 मील पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहाँ उस काल में लुम्बिनी नामक गांव स्थित था। बौद्ध सूत्रों के अनुसार ईसा से 563 वर्ष पूर्व कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की महारानी मायादेवी अपने पिता के घर आ रही थीं कि मार्ग में लुम्बिनी वन में वैशाख मास की पूर्णिमा को महारानी ने एक बालक को जन्म दिया। इस बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया।

सिद्धार्थ का बचपन

सिद्धार्थ के जन्म के एक सप्ताह पश्चात ही उनकी माता मायादेवी का स्वर्गवास हो गया। अतः सिद्धार्थ का पालन-पोषण उनकी मौसी एवं विमाता प्रजापति ने किया। सिद्धार्थ बचपन से ही विचारवान, करुणावान एवं एकान्तप्रिय थे। संसार में व्याप्त रोग, जरा एवं मृत्यु आदि कष्टों को देखकर उनका हृदय पीड़ित मनुष्यों के लिए करुणा से भर जाता था।

सिद्धार्थ का वैवाहिक जीवन

पिता शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को क्षत्रियोचित शिक्षा दिलवाई तथा सोलह वर्ष की आयु में उनका विवाह दण्डपाणि नामक राजा की सुंदर राजकन्या यशोधरा के साथ कर दिया। सिद्धार्थ का मन घर-परिवार एवं सांसारिक बातों में नहीं लग सका। वे इन बातों की ओर से उदासीन रहते थे।

राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए प्रत्येक मौसम के अनुकूल अलग-अलग प्रासाद बनवाए तथा प्रत्येक प्रासाद में विभिन्न ऋतुओं के अनुरूप ऐश्वर्य और भोग विलास की सामग्री उपलब्ध करवाई। सिद्धार्थ को अपने दाम्पत्य जीवन से एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया। लगभग 12 वर्ष तक गृहस्थ जीवन का सुख भोग लेने पर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक प्रवृत्तियों में नहीं लग सका।

महाभिनिष्क्रमण

लगभग 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने ज्ञान की खोज में घर छोड़़ने का निर्णय लिया। एक रात्रि में वे अपने घोड़े पर बैठकर 30 योजन दूर निकल गए। गोरखपुर के समीप अनोमा नदी के तट पर उन्होंने अपने राजसी वस्त्र एवं आभूषण उतार दिए और तलवार से अपना जूड़ा काट कर सन्यासी बन गए। इस प्रकार उन्होंने राजसी सुख एवं परिवार का त्याग कर दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म एवं साहित्य में ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहा जाता है।

सत्य और ज्ञान की खोज में महात्मा बुद्ध

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सन्यासी हो जाने के बाद बुद्ध तप तथा साधना में लीन हो गए। सबसे पहले वे वैशाली के आलाकालाम नामक एक तपस्वी के पास ज्ञानार्जन हेतु गए किन्तु वहाँ उनकी ज्ञान पिपासा शान्त नहीं हो पाई। इसके बाद वे राजगृह के ब्राह्मण उद्रक रामपुत के पास गए। इन दोनों गुरुओं से सिद्धार्थ ने योग साधना और समाधिस्थ होना सीखा परन्तु इससे उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। इसलिए वे उरुवेला की वनस्थली में जाकर तपस्या में लीन हो गए। यहाँ उन्हें कौडिल्य आदि पाँच ब्राह्मण सन्यासी भी मिले। अपने इन ब्राह्मण  साथियों के साथ वे उरुवेला में कठोर तपस्या करने लगे। सिद्धार्थ ने पहले तो तिल और चावल खाकर तप किया परन्तु बाद में उन्होंने आहार का सर्वथा त्याग कर दिया जिससे उनका शरीर सूख गया। तप करते-करते सिद्धार्थ को 6 वर्ष बीत गए परन्तु साधना में सफलता नहीं मिली। जनश्रुति है कि एक दिन नगर की कुछ स्त्रियाँ गीत गाती हुई उस ओर से निकलीं जहाँ सिद्धार्थ तपस्यारत थे। उनके कान में स्त्रियों का एक गीत पड़ा जिसका भावार्थ इस प्रकार था- ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़़ो। ढीला छोड़़ने से उनसे सुरीला स्वर नहीं निकलेगा परन्तु वीणा के तारों को इतना भी मत कसो कि वे टूट जाएं।’

तपस्वी सिद्धार्थ ने अपने हृदय में गीत के भावों पर विचार किया तथा अनुभव किया कि नियमित आहार-विहार से ही योग साधना सिद्ध हो सकती है। किसी भी बात की अति करना ठीक नहीं है, अतः मनुष्य को मध्यम मार्ग ही अपनाना चाहिए। अतः उन्होंने फिर से आहार करना शुरु कर दिया। सिद्धार्थ में यह परिवर्तन देखकर उनके पाँचों ब्राह्मण साथियों ने उन्हें पथ-भ्रष्ट समझकर उनका साथ छोड़़ दिया और वे सारनाथ चले गए।

बुद्धत्व की प्राप्ति

साथी तपस्वियों के चले जाने से सिद्धार्थ विचलित नहीं हुए और उन्होंने ध्यान लगाने का निश्चय किया। वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान की अवस्था में बैठ गए। सात दिन तक ध्यानमग्न रहने के पश्चात् वैसाख पूर्णिमा की रात को जब सिद्धार्थ ध्यान लगाने बैठे तो उन्हें बोध हुआ। उन्हें साक्षात् सत्य के दर्शन हुए। तभी से वे बुद्ध अथवा गौतम बुद्ध के नाम से विख्यात हुए। बुद्ध के जीवन में ज्ञान-प्राप्ति की यह घटना ‘सम्बोधि’ कहलाती है।

उस समय बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी। जिस वृक्ष के नीचे उन्हें बोध प्राप्त हुआ, उसे ‘बोधि-वृक्ष’ कहा गया। जिस स्थान पर यह घटना घटी, वह स्थान ‘बोधगया’ कहलाया। इस घटना के बाद भी महात्मा बुद्ध चार सप्ताह तक बोधि-वृक्ष के नीचे रहे और धर्म के स्वरूप का चिन्तन करते रहे।

मज्झिम प्रतिपदा

बुद्ध ने साधना का मध्यम-मार्ग अपनाया तथा इसी का उपदेश दिया। इस मार्ग के अनुसार काम-वासना अर्थात् विषय-भोग में फंसना और घनघोर तप करके शरीर को कष्ट देना, दोनों ही व्यर्थ हैं। इसी को मध्यम मार्ग अथवा ‘मज्झिम प्रतिपदा’ कहा जाता है।

धर्म-चक्र प्रवर्तन

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महात्मा बुद्ध ने सबसे पहले बोधगया में तपस्यु और मल्लिक नामक दो बनजारों को अपने ज्ञान का उपदेश दिया। इसके बाद बुद्ध अपने ज्ञान एवं विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने के उद्देश्य बोधगया से निकल पड़े और सारनाथ पहुँचे। यहाँ उन्हें वे पाँचों ब्राह्मण साथी मिल गए जो उन्हें छोड़़कर चले गए थे। बुद्ध ने उन्हें अपने ज्ञान की, धर्म के रूप में दीक्षा दी।

यह घटना बौद्ध धर्म के इतिहास में ‘धर्म-चक्र प्रवर्तन’ के नाम से जानी गई तथा वे पांचों शिष्य ‘पंचवर्गीय’ कहलाए। यहाँ से महात्मा बुद्ध काशी गए और वहाँ अपने ज्ञान का प्रसार करने लगे। जब बुद्ध के शिष्यों की संख्या बढ़ गई तब उन्होंने एक संघ की स्थापना की तथा उनके लिए आचरण के नियम निर्धारित किए।

इस संघ की सहायता से महात्मा बुद्ध लगभग 45 वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे। वे अंग, मगध, वज्जि, कौशल, काशी, मल्ल, शाकय, कोलिय, वत्स, सूरसेन आदि जनपदों में घूमते रहे। केवल वर्षा काल में वे एक स्थान पर निवास करते थे। राजगृह एवं श्रावस्ती से उन्हें विशेष प्रेम था। अपने उपदेशों में उन्होंने जनभाषा को अपनाया तथा जाति-पाँति और ऊँच-नीच की भावना से दूर रहते हुए मानव समाज को अपने उपदेशों से लाभान्वित किया। अपने शिष्य आनन्द के अनुरोध पर उन्होंने स्त्रियों को भी बौद्धधर्म की दीक्षा देना स्वीकार कर लिया।

महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण

इस प्रकार जीवन-यापन करते हुए ई.पू. 544 में 80 वर्ष की आयु में गोरखपुर के निकट कुशीनारा में गौतम बुद्ध ने देह-त्याग किया। बुद्ध के शरीर त्यागने की घटना को बौद्ध लोग ‘महापरिनिर्वाण’ कहते हैं। उनका अन्तिम उपदेश था- ‘हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बनकर विचरो तुम अपनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूँढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ।’

नैतिक जीवन पर आधारित धर्म

बुद्ध के समय में लोगों में आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य, और मोक्ष आदि विषयों पर घोर वाद-विवाद होते थे। महात्मा बुद्ध इन विवादों में नहीं पड़े। उन्होंने इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए तथा मनुष्य को नैतिकता पर आधारित जीवन जीने का उपदेश दिया। उन्होंने संसार तथा मानव जीवन को असत्य नहीं माना। वे इस विवाद में नहीं पड़े कि संसार तथा मनुष्य अमर हैं या नश्वर, सीमित हैं या असीम! जीव और शरीर एक है या अलग।

जब किसी ने उनसे इन प्र्रश्नों का उत्तर देने का आग्रह किया तो भी वे मौन रहे। उन्होंने जीवन को जैसा भी है, वैसा मानकर व्यावहारिक दृष्टि अपनाने का उपदेश दिया। उन्होंने अपने धर्म की इतनी अधिक नैतिक व्याख्या की कि कुछ विद्वानों की दृष्टि में बौद्ध धर्म, वास्तव में धर्म नहीं होकर आचार-शास्त्र मात्र था।

मूलतः बौद्ध धर्म कोई पृथक दर्शन नहीं है क्योंकि बुद्ध ने ईश्वरीय सत्ता, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म आदि प्रश्नों पर विचार प्रकट नहीं किए। आज जो कुछ भी बौद्ध दर्शन के नाम से विख्यात है, वह महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद का विकास है। बौद्ध धर्म आध्यात्म शास्त्र भी नहीं है, क्योंकि बुद्ध ने सृष्टि सम्बन्धी विषय पर भी अपने विचार प्रकट नहीं किए।

उनका धर्म तो व्यावहारिक धर्म था। वह मनुष्य की उन्नति का साधन था। वह जीवन का विषय है और इसी जीवन में निर्वाण दिलाता है। वह नितान्त बुद्धिवादी है, उसमें अन्ध-विश्वासों के लिए स्थान नहीं है तथा उसका आधार मानव मात्र का कल्याण है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

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बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्यों को दिए गए उपदेशों एवं शिष्यों के प्रश्नों के समाधान के रूप में दिए गए व्याख्यानों पर आधारित हैं। बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी शिष्य परम्परा द्वारा बौद्ध धर्म के सिद्धांत समय-समय पर विस्तारित एवं संकुचित होते रहे।

बौद्ध धर्म के मुख्य सिद्धान्त इस प्रकार थे-

चार आर्य सत्य (चत्वारि आर्य सत्यानि)

बौद्ध धर्म की आधारशिला है, उसके चार आर्य सत्य। उसके अन्य समस्त सिद्धान्तों का विकास इन्हीं चार आर्य-सत्यों के आधार पर हुआ है। ये चार आर्य सत्य निम्नलिखित प्रकार से हैं-

(1.) सर्वं दुःखम्

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सर्वं दुःखम् अर्थात् हर जगह दुःख है। यह बौद्ध धर्म का पहला सिद्धांत है। आगे के सारे सिद्धांत इसी सिद्धांत पर आधारित हैं। महात्मा बुद्ध ने सम्पूर्ण मानवता को ना-ना प्रकार के दुःखों से संत्रस्त देखा। इसलिए वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मानव तथा मानवेतर जीवन ही दुःख है। जन्म के साथ कष्ट होता है, नाश भी कष्टमय है, रोग कष्टमय है, मृत्यु कष्टमय है, अरुचिकर से संयोग कष्टमय है, सुखकर से वियोग कष्टमय है, जो भी वासना असंतुष्ट रह जाती है, वह भी कष्टप्रद है। राग से उत्पन्न पंचस्कंध ही कष्टमय है। समस्त संसार में आग लगी है तब आनंद मनाने का अवसर कहाँ है! सुख मनाने से दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रिय-सुख के विषयों में खो जाने से भी दुःख उत्पन्न होता है। महासागरों में जितना जल है उससे अधिक आंसू तो मानवों ने बहाए होंगे। पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मनुष्य पर मृत्यु हावी न हो। दुःख के तीर से घायल मनुष्य को उसे निकाल देना चाहिए। जीवन दुःखों से परिपूर्ण है। सभी उत्पन्न वस्तुएं दुःख और कष्ट हैं। जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, शोक, क्लेश, आकांक्षा और नैराश्य सभी आसक्ति से उत्पन्न होते हैं। अतः ये सब भी दुःख हैं। इस प्रकार हर ओर दुःख है। भगवान बुद्ध का विचार था कि मनुष्य को अपने दुखों की पहचान करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

(2.) दुःख समुदय

दुःख समुदयः अर्थात् दुःख का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। महात्मा बुद्ध के अनुसार जन्म-मरण के चक्र को चलाने वाली तृष्णा दुःखों का मूल कारण है। यह तृष्णा तीन प्रकार की है- (1.) काम-तृष्णा- इन्द्रिय सुखों के लिए, (2.) भव-तृष्णा- जीवन के लिए।

(3.) विभव-तृष्णा

वैभव के लिए। उनका कहना था कि यह तृष्णा पुनर्भव को करने वाली, आसक्ति और राग के साथ चलने वाली और यत्र-तत्र रमण करने वाली है। यह वैसे ही है जैसे कि काम-तृष्णा या भव तृष्णा। इस तृष्णा का जन्म कैसे होता है?

इसका समाधान करते हुए बुद्ध ने कहा- ‘रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श तथा मानसिक वितर्क और विचारों से जब मनुष्य आसक्ति करने लगता है तो तृष्णा का जन्म होता है। सभी दुःख उपाधियों से उत्पन्न होते हैं जो कि अविद्या के कारण हैं। अविद्या, दुःखों का मूल है और जीवैष्णा के कारण है।’

(3.) दुःख निरोध

दुःख निरोध अर्थात् दुःखों का नाश संभव है।  जिस प्रकार संसार में दुःख हैं और दुःखों के कारण हैं, उसी प्रकार, दुःखों का नाश भी सम्भव है। बुद्ध की दृष्टि में तृष्णाओं के मूलोच्छेदन से दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। उनका कहना था- ‘संसार में जो कुछ भी प्रिय लगता है, संसार में जिससे रस मिलता है उसे जो दुःखस्वरूप समझेंगे और उससे डरेंगे वे ही तृष्णा को छोड़ सकेंगे। रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान का विरोध ही दुःख निरोध है।’

(4.) दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् (दुःखनिरोध मार्ग)

दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् अर्थात् दुःखों के नाश के उपाय भी हैं। बुद्ध के अनुसार ‘अष्टांगपथ’ अथवा ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ पर चलकर कोई भी व्यक्ति दुःखों पर विजय प्राप्त कर सकता है। इसमें आठ अंगों की व्यवस्था है। इस मार्ग को ‘दुःख निरोधगामिनि प्रतिपद्’ तथा ‘दुःख निरोध मार्ग’ भी कहा जाता है।

आर्य अष्टांगिक मार्ग

इसे अष्टांग पथ भी कहते हैं। अष्टांग पथ ‘बौद्ध धर्म का नीति-शास्त्र’ है। यह मध्यम मार्ग है। इसमें आत्मासक्ति रखना और स्वयं को कष्ट देना दोनों का ही निषेध है। इस प्रकार महात्मा बुद्ध ने आध्यात्मिक और नैतिक दोनों दृष्टि से मध्यम मार्ग अपनाया। दो ऐसी सीमाएं हैं जिनका अनुसरण कभी नहीं करना चाहिए- (1.) इन्द्रिय विषयों के सुखों और वासनाओं की पूर्ति का निम्नतम मार्ग। (2.) दूसरा आत्मा को कष्ट देने की आदत। ये दोनों ही त्याज्य एवं कष्टमय हैं।

बुद्ध के अनुसार ‘अष्टांग मार्ग मनुष्य की आंख खोलता है और बुद्धि प्रदान करता है, जो शांति, अन्तर्दृष्टि, उच्च प्रज्ञा और निर्वाण की ओर ले जाता है।’ अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग इस प्रकार से हैं-

(1.) सम्मादिट्ठि (सम्यक् दृष्टि)

अविद्या के कारण संसार तथा आत्मा के सम्बन्ध में मिथ्या दृष्टि प्राप्त होती है। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, सदाचार और दुराचार में भेद करना ही सही सम्यक् दृष्टि है। इसी से चार आर्य सत्यों का सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान श्रद्धा और भावना से युक्त होना चाहिए। सम्यक् दृष्टि चारों आर्य सत्यों का ‘सत्’ ध्यान है जो निर्वाण की ओर ले जाता है।

(2.) सम्मा संकप्प (सम्यक संकल्प)

सम्यक् संकल्प का अर्थ इन्द्रिय सुखों से लगाव तथा दूसरों के प्रति बुरी भावनाओं और उनको हानि पहुँचाने वाले विचारों का मूलोच्छेदन करने का निश्चय है। कामना और हिंसा से मुक्त आत्म-कल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक संकल्प है। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प में परिवर्तित होनी चाहिए।

(3.) सम्मा वाचा (सम्यक वाणी)

सम्यक् संकल्प से हमारे वचनों का नियंत्रण होना चाहिए। सत्य, विनम्र और मृदु वचन तथा वाणी पर संयम ही सम्यक वाणी है। प्रत्येक को अधम्म (अशुभ) से बचकर धम्म (शुभ) ही बोलाना चाहिए। शत्रुता को कठोर शब्दों से नहीं अपितु अच्छी भावनाओं से दूर किया जा सकता है। मन को शांत करने वाला एक हितकारी शब्द हजारों निरर्थक शब्दों से अच्छा है।

(4.) सम्मा कम्मन्त (सम्यक् कर्मान्त)

सब कर्मों में पवित्रता रखना। हिंसा, द्रोह तथा दुराचरण से बचते रहना और सत्कर्म करना ही सम्यक् कर्मान्त है। जीवनाश, चोरी, कामुकता, झूठ, अतिभोजन, सामाजिक मनोरंजन, प्रसाधन, आभूषण धारण करना, आरामदेह बिस्तरों पर सोना तथा सोना चांदी उपयोग में लाना आदि दुराचरणों से बचना ही सम्यक् कर्मान्त है।

(5.) सम्मा आजीव (सम्यक् आजीव)

न्यायपूर्ण मार्ग से आजीविका चलाना। जीवन-निर्वाह से निषिद्ध मार्गों का त्याग करना ही सम्यक् आजीव है। अस्त्र-शस्त्र, पशु, गोश्त, शराब और जहर आदि का व्यापार नहीं करना चाहिए। दबाव, धोखा, रिश्वत, अत्याचार, जालसाजी, डकैती, लूट, कृतघ्नता आदि से जीविकोपार्जन नहीं करना चाहिए।

(6.) सम्मा वायाम् (सम्यक् व्यायाम)

इसे सम्यक् प्रयत्न भी कहते हैं। इसका अर्थ है सत्कर्मों के लिए निरन्तर उद्योग करते रहना। इसमें आत्म संयम्, इन्द्रिय निग्रह, शुभ विचारों को जाग्रत करने और मन को सर्वभूतहित पर जमाए रखने का ‘सत्’ प्रयत्न करना शामिल है।

(7.) सम्मासति (सम्यक स्मृति)

सम्यक् समाधि के लिए सम्यक् स्मृति आवश्यक है। इसमें शरीर की अशुद्धियों, संवेदना, सुख, दुःख और तटस्थ वृत्ति का स्वभाव, लोभ, घृणा और भ्रमयुक्त मन का स्वभाव, धर्म, पंचस्कंधों, इन्द्रियों, इन्द्रियों के विषयों, बोधि के साधनों तथा चार आर्यसत्यों का स्मरण सम्मिलित है। सम्यक् स्मृति का अर्थ शरीर, चित्त, वेदना या मानसिक अवस्था को उनके यथार्थ रूप में स्मरण रखना है।

 उनके यथार्थ स्वरूप को भूल जाने से मिथ्या विचार मन में घर कर लेते हैं और उनके अनुसार क्रियाएं होने लगती हैं, आसक्ति बढ़ती है और दुःख सहन करना पड़ता है। सम्यक् स्मृति से आसक्ति नष्ट होकर दुःखों से छुटकारा मिलता है तथा मनुष्य सम्यक् समाधि में प्रवेश के योग्य हो जाता है।

(8.) सम्मा समाधि (सम्यक् समाधि)

राग-द्वेष से रहित होकर चित्त की एकाग्रता को बनाए रखना ही सम्यक् समाधि है। निर्वाण तक पहुँचने से पूर्व सम्यक् समाधि की चार अवस्थाएं आती हैं-

(i.) पहली अवस्था में शांत चित्त से चार आर्य सत्यों पर विचार किया जाता है। विरक्ति तथा शुद्ध विचार अपूर्व आनंद प्रदान करते हैं।

(ii.) दूसरी अवस्था में मनन आदि प्रयत्न दब जाते हैं, तर्क-वितर्क अनावश्यक हो जाते हैं, संदेह दूर हो जाते हैं और आर्य-सत्यों के प्रति निष्ठा बढ़ती है। इस अवस्था में आनंद तथा शांति का अनुभव होता है।

(iii.) तीसरी अवस्था में तटस्थता आती है। मन को आनंद तथा शांति से हटाकर उपेक्षाभाव लाने का प्रयत्न किया जाता है। इससे चित्त की साम्यावस्था रहती है परन्तु समाधि में आनंद के प्रति उदासीनता आ जाती है।

(iv.) चौथी अवस्था पूर्ण शांति की है जिसमें सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं। चित्त की साम्यावस्था, दैहिक सुख और ध्यान का आनंद आदि किसी बात का ध्यान नहीं रहता अर्थात् चित्त-वृत्तियों का निरोध हो जाता है। यह पूर्ण शांति, पूर्ण विराग और पूर्ण निरोध की अवस्था है। इसमें दुःखों का सर्वथा निरोध होकर अर्हंत पद अथवा निर्वाण प्राप्त हो जाता है। यह पूर्ण प्रज्ञा की अवस्था है।

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त – मध्यमा प्रतिपदा

मध्यमा प्रतिपदा बौद्ध धर्म का प्रमुख सिद्धांत है। दुःख से छुटकारा पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग बताया। वह विशुद्ध आचार-तत्त्वों पर आधारित था। उसमें न तो शारीरिक कष्ट एवं क्लेश से युक्त कठोर तपस्या को उचित बताया गया और न ही अत्यधिक सांसारिक भोग विलास को। वस्तुतः वह दोनों अतियों के बीच का मार्ग था। इसलिए उसे मध्यमा-प्रतिपदा भी कहा गया है। इसके पालन से मनुष्य निर्वाण-पथ की ओर अग्रसर हो सकता है।

शील, समाधि और प्रज्ञा

अष्टांग-पथ का अनुसरण करने से मनुष्य के भीतर शील, समाधि और प्रज्ञा का उदय होता है जो कि बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग के तीन प्रधान अंग हैं। अखण्ड समाधि से ‘प्रज्ञा’ का उदय होता है। ‘प्रज्ञा’ पदार्थ ज्ञान है। प्रज्ञा का स्थान बौद्धिक स्थान से बहुत ऊँचा है। प्रज्ञा से कामासव, भवासव और अविद्यासव का नाश होता है तथा यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है जिसके बिना सदाचार असम्भव है और सदाचार के बिना ज्ञान की पूर्णता असम्भव है।

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त – दस शील

 महात्मा बुद्ध ने शील या नैतिकता पर अत्यधिक बल दिया। उन्होंने अपने अनुयाइयों को मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने को कहा। इसके लिए उन्होंने दस शील का पालन करने को कहा। इन्हें हम सदाचार के नियम भी कह सकते हैं। दस शील इस प्रकार से हैं-

(1.) अहिंसा व्रत का पालन करना,

(2.) सदा सत्य बोलना,

(3.) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना,

(4.) अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं का संग्रह न करना,

(5.) ब्रहाचर्य अर्थात् भोग विलास से दूर रहना,

(6.) नृत्य का त्याग, 

(7.) सुगन्धित पदार्थों का त्याग, 

(8.) असमय में भोजन का त्याग,

(9.) कोमल शय्या का त्याग,

(10.) कामिनी एवं कंचन का त्याग।

सदाचार के दस नियमों में से प्रथम पाँच नियम, महावीर स्वामी के पाँच अणुव्रतों के समान हैं। बुद्ध के अनुसार इन पाँच नियमों का पालन करना गृहस्थ, साधु तथा उपासकों आदि सबके लिए आवश्यक है। इनका पालन करते हुए सांसारिक रहकर भी मनुष्य सन्मार्ग की ओर बढ़ सकता है। अर्थात् बुद्ध ने गृहस्थ लोगों को भी उज्जवल भविष्य का आश्वासन दिया किंतु जो व्यक्ति संसार की मोह-माया छोड़कर भिक्षु-जीवन बिताता है, उसके लिए शील के समस्त दस नियमों का पालन करना आवश्यक है। इस प्रकार, शील के नियमों का पालन करने में गृहस्थों की अपेक्षा भिक्षुओं के लिए कड़े नियम बनाए गए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

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