एक बार ब्रिटिश संसद के अध्यक्ष बर्नाड वैदरहिल डॉ. बलराम जाखड़ से कहा था कि मैं भी जाट हूँ । यह किस्सा सुनाने से पहले हम राजस्थान के एक गांव में रहने वाली सुनहरी बालों वाली लड़की का किस्सा जानते हैं।
उन्नीस सौ नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में, मैं नागौर में जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के पद पर पदस्थापित था। जब कारगिल का युद्ध हुआ तो नागौर जिले में भारतीय थल सेना की एक पूरी डिवीजन तैनात की गई।
नागौर राजस्थान के लगभग केन्द्र में स्थित है। इसलिये यहाँ से राजस्थान के पाकिस्तान से लगते हुए पूरे बॉर्डर पर अर्थात् श्रीगंगानगर जिले के हिन्दूमलकोट से लेकर बाड़मेर जिले के शाहगढ़ तक भारतीय सैनिक टुकड़ियों को एक ही समय में पहुंचाया जा सकता था।
उस बटालियन के कुछ उच्च सैन्य अधिकारी नियमित रूप से मेरे कार्यालय में आते थे और मुझसे नागौर जिले की भौगोलिक, सामाजिक, राजनैतिक संरचना के बारे में पूछताछ करते रहते थे। उनमें से कुछ अधिकारी थोड़े खुल गये तो आवश्यकता होने पर अवकाश के दिन मेरे निवास पर भी आने लगे।
एक दिन कर्नल मलिक (पूरा नाम अब याद नहीं) ने मुझसे कहा कि मैं हरियाणा का जाट हूँ। नागौर जिले में भी बहुत बड़ी संख्या में जाट रहते हैं, उनकी कुछ विशेषताएं बताइये।
मैंने कर्नल मलिक से कहा कि इस प्रश्न का जवाब मैं बाद में दूंगा, मेरे साथ चलिये आज मैं आपको स्पार्टा की राजकुमारी दिखाकर लाता हूँ। कर्नल उत्सुकतावश मेरे साथ चल दिया। मैं कर्नल और उसके साथी अधिकारियों को निकटवर्ती गांव की एक प्राइमरी स्कूल में ले गया।
वहाँ उसे मैंने सात-आठ साल की एक ऐसी लड़की दिखाई जो देहयष्टि से सचमुच यूनानी दिखती थी। उसकी पतली लम्बी गर्दन, सुनहरी बाल, गोरा रंग और भूरापन लिये हुए सुन्दर शरबती सी आंखें। कर्नल हैरान रह गया।
बोला, क्या यह सचमुच स्पार्टा से आई है? मैंने हंसकर जवाब दिया। यह तो इसी गांव की बच्ची है किंतु ऐसा लगता है कि सैंकड़ों साल पहले इसके पूर्वज अवश्य यूनान से आये होंगे। इसी कारण यह ऐसी दिखाई देती है।
मैंने कर्नल को बताया कि यह अकेली ऐसी लड़की नहीं है, यहाँ बहुत से बच्चे ऐसे मिल जायेंगे जिनके बाल बचपन में सुनहरी रंग के होते हैं और जब वे बड़े होते हैं तो उनके बाल काले हो जाते हैं।
कर्नल ने मुझसे पूछा, तो क्या जाटों के पूर्वज यूनान से भारत आये थे? मैं इस प्रश्न का कोई समुचित जवाब तो नहीं दे सका किंतु मैंने उसे कुछ वर्ष पहले घटित हुआ एक किस्सा सुनाया जो भारतकी लोकसभा के अध्यक्ष डॉ. बलराम जाखड़ के साथ घटित हुआ था।
एक बार संसद अध्यक्षों का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ जिसमें डॉ. बालराम जाखड़ भी गये। वहाँ उनकी भेंट ब्रिटिश संसद के अध्यक्ष बर्नाड वैदरहिल से हुई। बातों-बातों में जाखड़ ने उन्हें बताया कि ‘मैं भारत के पंजाब राज्य का रहने वाला हूँ और जाट कम्यूनिटी से हूँ।’
इस पर वैदरहिल ने भी जाखड़ को अपना परिचय देते हुए कहा, मैं भी जाट हूँ ।
कर्नल मलिक इस घटना को सुनकर हैरान रह गया।
मैंने कर्नल को यह भी बताया कि मैंने सुना है कि डेनमार्क देश में एक जिला जुटलैण्ड नाम से जाना जाता है और यह माना जाता है कि जाट मूलतः जुटलैण्ड के निवासी हैं। कर्नल मेरी इस बात से सोच में पड़ गया और मुझसे विदा लेकर चला गया।
बाद में एक दिन उसने मुझे बताया कि वह कई स्कूलों और गांवों में जाकर जाट जाति के बच्चों को देखकर आया है, आपकी बात सही है। ऐसे कई बच्चे हैं जिन्हें यदि यूरोपियन्स की तरह कपड़े पहना दिये जायें तो कोई कह ही नहीं सकता कि ये भारतीय हैं।
इस प्रकार सामान्य रूप से आरम्भ हुआ वार्तालाप न केवल उस कर्नल के लिये अपितु मेरे लिये भी इतिहास की पहेली बन गया।
जब कुछ साल बाद मैंने नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास लिखा तो इस प्रश्न पर भी कुछ तथ्य जुटाने की चेष्टा की और अपनी तरफ से निष्कर्ष प्रस्तुत किया, जिसे उस समय बेहद सराहा गया। इन तथ्यों की चर्चा लगभग पूरे राजस्थान में हुई।
जाट कौन हैं – कहाँ से आए हैं! इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना आसान नहीं है। यह एकप्राचीन भारतीय जातिहै। भारत की अन्य बहुत सी जातियों की तरह इस जाति का इतिहास भी उलझा हुआ है।
आज सम्पूर्ण उत्तर भारत में जाट जाति बड़ी संख्या में निवास करती है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में जाट जाति का सघन अधिवास दृष्टिगोचर होता है।
जाटों की देहयष्टि उत्तर भारत में निवास करने वाली कतिपय आर्य जातियों यथा ब्राह्मणों, राजपूतों, महेश्वरियों, अग्रवालों, मालियों, मीणों, गूजरों आदि से कुछ निश्चित भिन्नताएं लिये हुए है।
देहयष्टि के आधार पर कतिपय इतिहासकारों ने जाटों को विदेशी मूल के आर्य तो कुछ इतिहासकारों ने भारतीय आर्य ठहराने की चेष्टा की है।
अनके विदेशी इतिहासकारों ने गुर्जरों और अनेक क्षत्रिय कुलों की भांति जाटों को विदेशी मूल का माना है। उन्होंने गुर्जरों को खिजरों की, राजपूतों को हूणों की तथा जाटों को सीथियनों की संतान माना है।
निःसंदेह जाट कृषक और पशुपालक जाति है किंतु निरी कृषक और पशुपालक जाति नहीं है। आवश्यकता होने पर जाट जाति ने हथियार उठाने में संकोच नहीं किया।
सत्रहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब के जीवनकाल का अधिकांश समय उत्तर भारत में जाट शक्ति का दमन करने में और दक्षिण भारत में मराठा शक्ति का दमन करने में लगा।
जब अठारहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह कमजोर हो गये और मराठों ने उत्तर भारत कीराजपूत रियासतों को रौंदकर रख दिया तब भरतपुर के जाट हथियार उठाकर मराठों का सामना करने के लिये आगे आये।
जब ई.1757 में अहमदशाह अब्दाली के भय से मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) लाल किले में बंद होकर बैठ गया और मराठे नर्बदा को पार करके दक्खिन को भाग गये तब भरतपुर के जाट मथुरा की रक्षा के लिये 10 हजार जाट सैनिकों के सिर कटवाने को तत्पर हुए।
अंग्रेजों के शासन काल में भी और वर्तमान प्रजातान्त्रिक सरकारों के काल में भी जाट जाति के युवक प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में सेना में भरती होते हैं तथा भारतीय सेना में गोरखा, राजपूत एवं मराठा रेजीमेंट की तरह जाट रेजीमेंट भी अस्तित्व में है।
केन्द्र सरकार एवं अनेक राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग, पुलिस विभाग एवं राजस्व आदि विभागों में भी जाट जाति के व्यक्ति बहुत बड़ी संख्या में नौकरी करते हैं।
भारत में जाटों के अतिरिक्त ऐसी कोई अन्य जाति नहीं है जो कृषि, पशुपालन, व्यापार तथा युद्ध आदि अलग-अलग प्रवृत्तियों के कार्यों में समान रूप से प्रतिभा सम्पन्न हो।
जाट एक ऐसी जाति है जिसमें काले रंग का व्यक्ति शायद ही कभी देखने को मिलता है। इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाये तो जाट गोरे, पतले, लम्बे और परिश्रमी देहयष्टि वाले ही हैं।
इसलिये इतिहास की दृष्टि से यह जानना रोचक तथा महत्त्वपूर्ण होगा कि जाट कौन हैं – कहाँ से आए हैं! ये भारतीय मूल के हैं अथवा विदेशों से आकर भारत में बसे हैं।
जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत
इतिहासकारों द्वारा जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जितने मत स्थापित किये गये, उतने अधिक मत किसी अन्य जाति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्थापित नहीं किये गये। इनमें से कुछ प्रमुख मत तथा उनकी व्याख्याएं इस प्रकार से हैं-
मत-1. जाट ईसा की प्रारम्भिक सदी में सीथियनों के भारत आक्रमण के समय उनके साथ बाहर से आये थे। सम्भवतः जाट सीथियनों से ही उत्पन्न हुए थे।
व्याख्या- यह मत हेरोडोटस के मत के आधार पर ईस्वी 1820 के आसपास कर्नल टॉड ने स्थापित किया था।
निष्कर्ष- यह मत सही नहीं माना जा सकता क्योंकि सीथियनों के भारत पर आक्रमण से पूर्व भी जाट सिंध में रहते थे।
मत-2. जाट, जाठर क्षत्रिय हैं तथा ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए हैं।
व्याख्या- यह मत ईस्वी 1869 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) के विद्वान अंगद शास्त्री द्वारा प्रतिपादित किया गया था। उन्होंने पुराणों में से यह श्लोक उद्धृत किया-
क्षत्र शून्ये पुरा लोके मार्गवेन यदा लोके।
विलोक्या क्षत्रियां धरणी कन्यास्तेषां सहस्रशः
ब्राह्मणान् जगृहुस्मिन् पुत्रोत्पादन लिप्सया।
जठरे धारितं गर्भ संरक्ष्य विधिवत् पुरा।।
पुत्रान् सुषुविरे कन्या जाठरान् क्षात्रवंशजान्ं।
अर्थात् जब परशुराम ने भारतखण्ड को क्षत्रियों से रहित कर दिया तो क्षत्रिय कन्याओं ने भारत खण्ड को क्षत्रिय रहित जानकर ब्राह्मणों से गर्भाधान स्वीकार किया और अपने जठर में धारित गर्भ की रक्षा करके जाठर नाम के क्षत्रवंशीय पुत्रांे को उत्पन्न किया जो आगे चलकर जाट कहलाये।
निष्कर्ष- यह मत अपने समर्थन में पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता है। अतः यह अधिक विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
पुराणों के अनुसार परशुराम द्वारा क्षत्रियों का संहार कर देने के बाद समाज की रक्षा करने के लिये महर्षि वसिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर यज्ञोत्सव आयोजित करके समाज के जिन चार वीरों को क्षेत्रिय धर्म अपनाने का आदेश दिया गया था वे प्रतिहार, परमार, चौलुक्य तथा चाहमान नामों से प्रसिद्ध हुए न कि जाठर। जाट मूलतः वैश्य वर्ण के अंतर्गत आने वाला कृषक वर्ग है। जाटों ने मुगलों के भारत में आने के बाद छोटे-छोटे राज्य स्थापित अवश्य किये किंतु इनका कोई प्राचीन साम्राज्य या राजवंश नहीं था।
मत-3. वेदों में जिन्हें ‘ज्येष्ठ कहा गया है, वही आगे चलकर जाट कहलाये।
व्याख्या- यह मत यजुर्वेद के इस मंत्र के आधार पर स्थिर किया गया है- ‘इमम् देवाऽसपत्नं सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जान राज्यायेन्द्र स्येन्द्रियाय……।
निष्कर्ष- पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में इसे स्वीकार नहीं किया जा सका। ज्येष्ठ से ‘जेठ’ बनता है, न कि जाट।
मत- 4. महाभारत में राजसूय यज्ञ के अवसर पर भगवान कृष्ण को ज्येष्ठ की उपाधि दी गई थी। श्रीकृष्ण के वंशज यदु तथा जाट नाम से प्रसिद्ध हुए।
व्याख्या-इस मत के समर्थन में कहा जाता है कि जाटों के गोत्र यदुवंशियों से मेल खाते हैं।
निष्कर्ष- जिस प्रकार जाटों के गोत्र यदुवंशियों से मेल खाते हैं उसी प्रकार चन्द्रवंशियों एवं सूर्यवंशियों से भी मेल खाते हैं, अतः इस तथ्य को प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मत-5. जाटों की उत्पत्ति शिव की जटाओं से हुई।
व्याख्या- इस मान्यता के अनुसार जब सृष्टि की रचना हुई तब महादेव ने अपनी जटा में से कुछ भस्म निकालकर देवी पार्वती को दी। पार्वती ने उस भस्म का पुतला बनाकर महादेव से उसमें प्राण डालने की प्रार्थना की।
महादेव ने पुतले में प्राण फूंक दिये। पार्वती ने उसका नाम ‘हरतीतरवाल’ रखा। हरतीतरवाल के दो बेटे गोदारा और पूनिया हुए जिनमें से जाटों की दो खापें गोदारा और पूनिया बनी। पीछे से और भी कौमें जाटों में मिल गईं।
इसी प्रकार की एक कथा पुराण में अन्य स्थान पर भी मिलती है। इस कथा के अनुसार जब सती के पिता दक्ष ने यज्ञ किया और उसमें शिवजी को नहीं बुलाया तो सती बिना बुलाये ही अपने पिता के घर जा पहुंची।
वहाँ सती अपने पति भगवान शिव का यज्ञ भाग न देखकर अपने पति के अपमान के कारण योगानल से जलकर भस्म हो गई। शिवजी ने दक्ष को दण्ड देने के लिये अपनी जटा से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया। इसी वीरभद्र के वंशज जाट कहलाये।
निष्कर्ष- जाटों का शिवजी की जटाओं से जो सम्बन्ध स्थापित किया गया है, वह एक ऐतिहासिक रूपक प्रतीत होता है जिसमें ऐतिहासिक सच्चाई छिपी हुई है। इस पर हम विस्तार से चर्चा आगे चलकर करेंगे।
मत-6. जाट बाल्हीक कबीले की जर्तिका शाखा से उत्पन्न हुए हैं।
व्याख्या- इस मत का प्रतिपादक जेम्स कैम्पबैल नामक विद्वान था। ग्रियर्सन ने भी इसी मत को स्वीकार किया है। वराह मिहिर की पुस्तक में जटासुराः तथा जटाधराः नामक जाति के लोगों को कावेरी के उत्तर-पूर्व और दक्षिण में निवास करना बताया गया है। जेम्स कैम्पबैल कहता है कि जर्तिका विदेशी थे तथा जिस समय कुषाणों ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय जर्तिका भी भारत में आये। यही जर्तिका आगे चलकर जाट कहलाये।
ग्रियर्सन का कहना है कि महाभारत में मद्र देश के प्रसंग में मद्रक तथा जर्तिका कबीलों का वर्णन आया है। ये दोनों कबीले, बाल्हीक अथवा वाहीक कहे गये हैं। महाभारत में कहा गया है कि गंगा-यमुना, कुरुक्षेत्र और हिमालय से बाहर तथा रावी, चेनाव, झेलम, सतलुज, व्यास और सिंधु नदी के बीच में बाह्लीक देश है। वहां आपगा नदी के तट पर शाकल नामक नगर है, उसमें जर्तिका बाह्लीक जाति के नीच मनुष्य रहते हैं।
ग्रियर्सन कहता है कि हिमालय में वर्णित यह प्रदेश आज का पंजाब है। भारत और पाकिस्तान दोनों का संयुक्त पंजाब। पंजाब में आज भी बहुत बड़ी संख्या में जाट निवास करते हैं। अतः स्पष्ट है कि जर्तिका जाति ही आगे चलकर जाटों में बदल गई।
इस मत को के. आर. कानूनगो, ठाकुर देशराज तथा डॉ. रणजीत सिंह आदि ने गलत ठहराया है। उनके अनुसार महाभारत में जिस जर्तिका जाति का वर्णन आया है, वे आज के कश्मीरी हैं, न कि जाट। अपने समर्थन में ये विद्वान महाभारत के कर्ण पर्व में कर्ण द्वारा शल्य को कहे गये इस वक्तव्य का उल्लेख करते हैं-
‘वे (जर्तिका) धान और गुड़ की शराब बनाकर पीते हैं और लहसुन के साथ गोमांस खाते हैं। इनमें पिता, पुत्र, माता, श्वसुर और सास, चाचा, बहिन, मित्र, अतिथि, दास तथा दासियों के साथ मिलकर शराब पीने और गोमांस खाने की परम्परा है। इनकी स्त्रियां शराब में धुत्त होकर नंगी नाचती हैं। वे गोरे रंग तथा ऊँचे कद की हैं।
इस प्रदेश की ़िस्त्रयां बाहर दिखाई देने वाली मालाएं और चन्दन आदि सुगन्धि लगाकर, शराब पीकर, मस्त होकर, नंगी होकर, घर-द्वार और नगर के बाहर हँसती-गाती और नाचती हैं। वे ऊनी कम्बल लपेटती हैं, उन स्त्रियों का स्वर गधे और ऊँट के समान होता है। उनमें प्रत्येक प्रकार के शिष्टाचार की कमी है। वे खड़ी होकर पेशाब करती हैं।’
मद्रराज शल्य को नीच ठहराता हुआ कर्ण कहता है- ‘किसी समय बाह्लीक देश का एक व्यक्ति कुरुजांगल (आज का नागौर-बीकानेर क्षेत्र) में आया। एक दिन वह उदास मन से स्त्रियों के बारे में सोचने लगा कि ऊन के कम्बल की साड़ी पहनने वाली मेरी मोटी, गोरी स्त्री मेरा स्मरण करती होगी। इसलिये मैं शतद्रु तथा इरावती को पार करके अपने देश जाऊंगा तथा बड़ी-बड़ी चूड़ियांे को पहनने वाली उन सुन्दर स्त्रियों को देखूंगा। सुखद मार्गों वाले पीलू-कैर और शमी (खेजड़ी) वाले वन में, मैं कब जाऊंगा? ……. जो सूअर, मुर्गा, गाय, गधा, ऊँट और भेड़ का मांस नहीं खाते उनका जन्म निरर्थक है………….।’
कर्ण आगे कहता है – ‘हे शल्य! जहां पीलू और दाख का विशाल वन है उसी देश में सतलुज, रावी, व्यास, झेलम, चिनाव और सिंधु नदियां बहती हैं, उन देशों का नाम आरट्ट है। वहां के मनुष्य अधर्मी होते हैं। वे मिट्टी और काठ के बर्तनों में खाते हैं, उन्हीं बर्तनों को कुत्ते चाटते हैं, उन्हीं में ये लोग घृणा रहित होकर भोजन करते हैं। वे बकरी, गधी और ऊँटनी का दूध पीते हैं। उनकी सृष्टि प्रजापति से नहीं हुई। वे तो वाही और हीक नामक पिशाच दम्पत्ति की संतान हैं।’
निष्कर्ष- कानूनगो तथा उनके मत के अन्य विद्वानों का कहना है कि बाह्लीक देश कोई ठण्डा प्रदेश था तभी तो वहां की स्त्रियां ऊनी कम्बल की साड़ियां पहनती थीं। अतः बाह्लीक देश का जर्तिका कबीला कश्मीरियों का पूर्वज था, न कि जाटों का। जर्तिका जाति गौमांस खाती थी किंतु जाट तो गाय के पुजारी हैं, उसे माता मानते हैं। जर्तिका जाति को बाही तथा हीक पिशाच दम्पत्ति से उत्पन्न बताया गया है। इसका अर्थ है कि वे आर्यों से अलग थे जबकि जाट तो आर्य हैं। इस प्रकार ये विद्वान जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्तिका मत का खण्डन करते हैं।
मत-7. जाटों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण द्वारा बनाये गये ‘ज्ञाति’ संघ से हुई है।
व्याख्या- इस मत के प्रतिपादक ठाकुर देशराज हैं। उनका मानना है कि यदुवंश की अन्धक तथा वृष्णि शाखाओं ने एक राजनैतिक संघ स्थापित किया। इस संघ के भीतर कंस को परास्त करने के उपरान्त श्रीकृष्ण ने यादवों के अनेक प्रजातन्त्रीय समूहों को एकत्रित करके जरासन्ध की दृष्टि से दूर एक ऐसी शासन प्रणाली की नींव डाली जो प्रजातन्त्रीय थी तथा उसमें कोई भी जाति सम्मिलित हो सकती थी।
यह संघ ‘ज्ञाति’ कहलाता था। इसमें सम्मिलित होने वाले व्यक्ति को अपने पूर्व वंश से पुकारे जाने के स्थान पर ‘ज्ञाति’ कहा जाता था। इस प्रकार विभिन्न जातियांे का समूह ‘ज्ञाति’ कहलाया और आगे चलकर जाट बन गया।
निष्कर्ष- यह मत स्वीकार नहीं किया जा सकता। जाट जाति एक स्वतंत्र तथा सबसे भिन्न जाति है। यह विभिन्न प्रकार की जातियों का समूह नहीं है, इस बात की पुष्टि जाटों की शारीरिक रचना को देखने मात्र से हो जाती है।
मत-8. जाट अजातीय हैं।
व्याख्या- यह मान्यता लोक प्रचलित है। इसके अनुसार जब महाभारत के युद्ध में क्षत्रिय पुरुष नष्ट हो गये तब श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय नारियां विभिन्न वर्णों के पुरुषों को सौंप दी। इन क्षत्रिय स्त्रियों से उत्पन्न संतान की कोई एक जाति नहीं थी। अतः वे अजातीय कहलाये और आगे चलकर ‘जाट’ बन गये।
निष्कर्ष- यह मत भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। वस्तुतः ठाकुर देशराज ने श्रीकृष्ण द्वारा जिस ‘ज्ञाति’ संघ की स्थापना की कल्पना की है, वह कल्पना इसी मत का परिष्कृत रूप मात्र है।
मत- 9. जाट दसरेक जाति के वंशज हैं।
व्याख्या- राजशेखर रचित काव्यमीमांसा के पंचादेशों में दसरेक जनपद के एक दूत का वर्णन है। उसका मुख बकरे का सा, आंखें बंदर की सी भूरी तथा कन्धा भूरे बालों से युक्त बताया गया है। अपने गुह्य स्थानों को ढंकने के लिये उसने फटे-पुराने चिथड़े काम में लिये थे और वह मूली खाता आ रहा था जिससे ऐसा प्रतीत होता था कि यह पिशाच है। उसकी भाषा भी प्राचीन राजस्थानी अपभ्रंश जैसी है। इस दूत के ‘दसरेक जनपद’ को आज का पश्चिमी राजस्थान तथा इस दूत को प्राचीन आभीर माना जाता है। आचार्य परमेश्वर सोलंकी ने इन आभीरों को जाटों का पूर्वज अनुमानित किया है।
निष्कर्ष- राजशेखर की काव्यमीमांसा में वर्णित दसरेक जनपद का व्यक्ति जाट है, यह किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं होता। आभीरों की संतानें जाट हुईं, इस सम्बन्ध में भी कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता। अतः यह मत पूर्णतः गल्पमात्र है।
मत- 10. जाट नागवंशी हैं।
व्याख्या- जाटों में तक्षक, कालिय, कुठर तथा कुण्डु आदि गोत्र पाये जाते हैं। अतः इस मत को मानने वाले विद्वानों का कहना है कि जाट ‘जितनाग’ नामक जाति के वंशज हैं। पुराणों में नागों की इन शाखाओं का प्रमुखता से उल्लेख हुआ है- (1.) तक्षक, (2.) जितनाग, (3.) वसाति, (4.) कालपौनिया, (5.) कलकल।
जितनागों से जाटों की उत्पत्ति हुई तथा वसाति, जाटों के वैस वंश के नाम से विख्यात हुआ। वैस वंश की चार शाखाएं कादियान, सांगवान, सौराण तथा जाखड़ आज भी प्रचलित हैं। डॉ. योगेन्द्रपाल शास्त्री के अनुसार होशियारपुर (पंजाब) के समीप श्रीमालपुर वसाति जाटों की जन्म भूमि थी।
हेरोडोटस कहता है कि जित लोग एकेश्वरवादी थे। डिगायन के अनुसार ये बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। कर्नल टॉड ने अग्निवंश से उत्पन्न क्षत्रियों के छत्तीस कुलों में जित नामक राजकुल भी वर्णन किया है।
कर्नल टॉड को ईस्वी 1820 में कोटा से दक्षिण में कुछ दूरी पर स्थित कुनसूयां नामक गांव में एक प्राचीन शिलालेख प्राप्त हुआ था। इस शिलालेख के अनुसार जित वंश के किसी राजा ने यदुकुल की किसी स्त्री से विवाह किया था।
ज्वालाप्रसाद मिश्र ने भी एक प्राचीन शिलालेख का हवाला देते हुए लिखा है कि जित तक्षक वंशीय हैं। इस शिलालेख के अनुसार- ‘विख्यात जित् पार्वती के स्तनों से निकलने वाले अमृत का पान करता है, जिसके पूर्व पुरुष वीर तुरक्ष (तक्षक) महादेव के गले में हार की भांति विराजमान रहते हैं।’
कर्नल टॉड ने तक्षकों की गणना छत्तीस राजकुलों में की है। यह राजवंश महाभारत के समय भी अस्तित्व में था। कर्नल टॉड के अनुसार तक्षक शकद्वीप से भारत में आये थे और एक समय इन्होंने अपने पराक्रम से सारे भूमण्डल को कंपा दिया था।
निष्कर्ष- यह मत पूर्णतः सही नहीं जान पड़ता कि जाट नागों की जित अथवा तक्षक शाखा से हैं। नाग नगर व्यवस्था बनाकर रहने वाले थे। जबकि जाट ग्राम्य सभ्यता के निवासी हैं। इस मत में से इतना तथ्य स्वीकार किया जा सकता है कि जब जाट जाति पूरे उत्तर भारत में फैल गई थी, तब नागों के कुछ कबीले जाट जाति में सम्मिलित हो गये।
मत-11. जाट आर्य हैं।
व्याख्या- नेसफील्ड ने लिखा है- ‘यदि सूरत शक्ल, कुछ समझे जाने वाली चीज है तो जाट सिवाय आर्यों के कुछ नहीं हो सकते।’
हैवेल ने लम्बे कद, सुन्दर चेहरा, पतली-लम्बी नाक, चौड़े कन्धे, लम्बी भुजाएं, शेर की सी कमर और हिरण की सी पतली टांगों के कारण इन्हें आर्य ठहराया है।
चिन्तामणि वैद्य ने लिखा है कि जाट हूणों के सम्बन्धी नहीं अपितु शत्रु थे। जाटों ने हूणों का सामना किया और उन्हें परास्त किया। वे सुन्दर, लम्बी और बड़ी नाक वाले हैं।
इलियट इनकी बोली एवं शारीरिक गठन से इन्हें आर्यों का वंशज बताता है।
निष्कर्ष- इस मत के विरोध में कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता। आज भी हिमालय पर्वत पर जो परम्पारगत आर्य कबीले निवास करते हैं और जिनका बाह्य दुनिया से सम्पर्क कम रहा है, वे देहयष्टि में जाट जाति के काफी निकट प्रतीत होते हैं। अतः इस मत को मानने में कोई आपत्ति नहीं है।
मत-12. जाट विदेशी मूल के हैं।
व्याख्या- विभिन्न विदेशी विद्वानों तथा कतिपय भारतीय विद्वानों ने आर्यों के विदेशी जाति होने के सम्बन्ध में मुख्यतः तीन सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं- 1. यूरोपीय सिद्धांत, 2. मध्य एशिया का सिद्धांत, 3. आर्कटिक प्रदेश का सिद्धांत।
यदि उपरोक्त तीनों सिद्धांतों में से किसी भी एक मत को सही मान लिया जाता है तो जाट भी सम्पूर्ण आर्य जाति की तरह विदेशी मूल के ठहरते हैं।
निष्कर्ष- चूंकि आर्यों के भारत में बाहर से आने का सिद्धांत अधिकांश भारतीय इतिहासकारों द्वारा अमान्य घोषित कर दिया गया है, इसलिये जाटों के सम्बन्ध में भी यह धारणा अमान्य हो जाती है। क्योंकि जाट भी आर्य ही हैं।
मत-13. जाट जुटलैण्ड के निवासी हैं।
व्याख्या- इस सिद्धांत की स्थापना करने वालों का कहना है कि डेन्मार्क में जुटलैण्ड नामक एक जिला है। जाट मूलतः वहीं के रहने वाले हैं।
इस मत के समर्थन में ‘डेन्मार्क’ शब्द की संस्कृत शब्द के ‘धेनुमार्ग’ शब्द से समानता को भी देखा जा सकता है। धेनुमार्ग का अर्थ होता है- गायों का मार्ग, जहाँ बहुत बड़ी संख्या में गायें विचरण करती हैं।
आज भी डेन्मार्क पूरे विश्व में सर्वाधिक दुग्धोत्पादन के लिये प्रसिद्ध है।
निष्कर्ष- जाटों का मुख्य व्यवसाय खेती तथा पशुपालन है। अतः इस मत को मानने में कोई अतिश्योक्ति दिखाई नहीं देती कि धेनुमार्ग (डेन्मार्क) में जाट रहते थे। वे गायें पालते थे और उनका मूल स्थान आज भी जुटलैण्ड कहलाता है।
यहाँ एक बात यह भी देखनी होगी कि ‘जाट’ भारत से लेकर जर्मनी तक पाये जाते हैं।
वास्तविकता क्या है ?
जाटों को विदेशी विद्वानों ने शक, कुषाण, हूण, यूची अथवा विदेशी जातियों की संतान होना बताया है, वस्तुतः ये विद्वान एक सोची समझी साजिश के तहत ऐसी मान्यताएं स्थापित करते थे। उन्होंने न केवल जाटों को अपितु गुर्जरों, चौलुक्यों, चावड़ों, प्रतिहारों तथा राठौड़ों को भी विदेशी ठहराने का प्रयास किया।
अंग्रेज एवं अन्य यूरोपीय जातियां जो मध्यकाल में भारत आईं और उन्नीसवीं शताब्दी में देश की वास्तविक शासक बन गईं तो उन्होंने यहाँ की जनता को यह समझाने का प्रयास किया कि न केवल हम, अपितु भारत के पुराने शासक क्षत्रिय अथवा राजपूत भी विदेशी थे। अतः हमसे घृणा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
विदेशी विद्वानों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर दिया कि सम्पूर्ण आर्य जाति ईरान, यूनान, उत्तरी ध्रुव, भूमध्य सागर के तट अथवा किसी अन्य प्रदेश से भारत में आये। ये मान्यताएं भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराओं के आधार पर अमान्य ठहराई जा चुकी हैं। जाटों को विदेशी बताना भी इन विदेशी विद्वानों का यही कारण था।
भारतीय समाज का इतिहास ऋग्वेद से मिलना प्रारम्भ होता है। ऋग्वेद में जाति व्यवस्था का नहीं अपितु वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है। जातियां तब बनी ही नहीं थीं।
भारतीय समाज के इतिहास की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत है। इस पुस्तक में क्षत्रिय जातियों अथवा क्षत्रिय वंशों का विस्तार से उल्लेख हुआ है।
महाभारत में मद्रकों के साथ जाटतृकों का उल्लेख भी हुआ है। महाभारत में जाटतृक (अथवा जर्तिका) जाति के रहने का जो स्थान बताया गया है, वह आधुनिक पंजाब ही है। अतः इस बात की प्रबल की सम्भावना है कि जाटों की उत्पत्ति जाटतृकों से हुई हो।
कर्ण द्वारा मद्रराज शल्य को जाटतृकों के बारे में जो ऊँची-नीची बातें कही गई हैं, वे शाश्वत सत्य नहीं मानी जा सकतीं। कर्ण अपने परिवार एवं समाज से च्युत व्यक्ति था। उसके दुष्ट स्वभाव के कारण ही दुर्योधन ने उसे अपना मित्र एवं सेनापति बनाया था।
मद्रराज शल्य की बहिन माद्री कुरुवंशी महाराज पाण्डु को ब्याही गई थी। पाण्डु की महारानी किसी हीन कुलोजात राजकुल की नहीं हो सकती थी। मद्रराज शल्य निःसंदेह कर्ण से श्रेष्ठ था।
कर्ण का स्वभाव श्रेष्ठ पुरुषों से द्रोह करने तथा उन्हें येन-केन-प्रकरेण नीचा दिखाने का था। अतः कर्ण की किसी बात का विश्वास नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा यह कहा जाना कि जर्तिका स्त्रियां शराब पीकर और नशे में नंगी होकर नाचती हैं तथा जिन बर्तनों को कुत्ते चाटते हैं, उन्हीं में जर्तिका लोग भोजन करते हैं, सिवाय दुष्टता के और कुछ नहीं है।
यदि ये लोग ऐसे होते तो इनकी राजकुमारी महाभारत काल के सर्वशक्तिशाली, परम प्रतापी नरेश पाण्डु को न ब्याही गई होती।
लेखक की धारण है कि आज के जाट महाभारत में वर्णित जाटतृक अथवा जर्तिका जाति के वंशज हैं जो बाह्लीक (स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के संयुक्त पंजाब) देश में रहते थे और वहां से चलकर इनका प्रसार भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, चीन, तिब्बत, मंगोलिया, स्पेन, स्कैण्डिवेनिया, नो-वो गोर्ड, मिश्र, यूनान, तुर्किस्तान, अरब, इंग्लैण्ड, ग्रीक, रोम तथा जर्मनी तक हुआ।
विभिन्न देशों के जाटों ने कालान्तर में अपने देश की सभ्यता, संस्कृति और धर्म को अपना लिया।
यद्यपि भारत के जाटों में नागों के अतिरिक्त अन्य कई जातियां सम्मिलित हैं तथापि वर्तमान समय में जाट अपने मूल स्वरूप से निकटता बनाये रखने में केवल भारत में ही सफल हो सके हैं। वे यहाँ आज भी वैदिक सभ्यता को अपनाये हुए हैं, कृषिकर्म में संलग्न हैं तथा अपने स्वातंत्र्य-प्रिय स्वभाव के कारण सबसे अलग दिखाई देते हैं।
जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ भ्रामक बातों का निराकरण यहीं कर देना उचित होगा। जाटों को आर्येतर जाति मानने, नागों से उत्पन्न होने अथवा शिवजी की जटाओं से उत्पन्न होना बताये जाने के कुछ कारण हैं।
वस्तुतः जिस समय भारतीय समाज वैदिक सभ्यता से आगे निकलकर पौराणिक काल में पहुंचा तो ना-ना प्रकार की जातियां उत्पन्न हो गईं। इन जातियों की उत्पत्ति ऊपर से नीचे हुई थी।
अर्थात् भारतीय समाज में प्रारम्भ में समस्त आर्य ब्राह्मण थे। वे ईश्वर तथा सत्य के साथ-साथ प्रकृति के रहस्यों की खोज करते थे। वे प्रकृति से प्राप्त कन्द, मूल, फल आदि पर जीवन यापन करते थे।
जब उन्हें दूसरे देशों से आने वाले आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा करने की आवश्यकता अनुभव हुई तो कुछ ब्राह्मण क्षत्रियों में परिवर्तित हो गये। ऐसा करते समय आर्यों ने देवताओं से अस्त्र-शस्त्र एवं उनके संचालन का ज्ञान प्राप्त किया।
जब समाज के भरण-पोषण के लिये कृषि कर्म एवं पशुपालन की आवश्यकता हुई तो कुछ ब्राह्मण एवं क्षत्रिय; वैश्यों में परिवर्तित हो गये।
सभ्यता और समाज के और आगे बढ़ने पर अनुचरों और सेवकों की आवश्यकता हुई तो कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य; शूद्र कर्म करने लगे। इन शूद्रों में अन्त्यज सम्मिलित नहीं थे। इन शूद्रों में कुम्हार, सुथार, नाई, माली आदि जातियां सम्मिलित थीं न कि चाण्डाल तथा डोम जैसी अन्त्यज कही जाने वाली जातियां। अंत्यज जातियां तो बहुत आगे चलकर उत्पन्न हुईं।
जैसे-जैसे समाज बढ़ता गया, उसे अनुशासनबद्ध रखने के प्रयास भी बढ़ते गये। ब्राह्मणों ने समाज को धार्मिक अनुशासन में तथा क्षत्रियों ने प्रशासनिक एवं सामरिक अनुशासन में आबद्ध किया।
इस सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मणों का देवताओं से सीधा सम्पर्क था। चूंकि देवता पहाड़ों में रहते थे इसलिये ब्राह्मण धरती के देवता कहे जाने लगे।
जब देव जाति नष्ट हो गई और आक्रांताओं से समाज की रक्षा के लिये क्षत्रियों को ही जूझना पड़ा तो वे राजा बन गये और ब्राह्मण या तो उनके पुरोहित एवं मंत्री बनकर रह गये या मानव समाज से दूर जंगलों एवं पर्वतों में ऋषि-मुनि बनकर तपस्या करने लगे।
कुछ वैश्यों ने जो कि कृषि कर्म एवं पशुपालन में संलग्न थे, ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों की बनाई व्यवस्थाओं को मानने से इन्कार कर दिया और वे स्वतंत्र आचरण करने लगे। यही कारण है कि ब्राह्मणों ने इन्हें अजातीय (बिना जात का) कहकर अपनी खीझ उतारनी चाही। यही कृषिकर्मा लोग आगे चलकर जाट कहलाये।
आगे चलकर आर्यों की नाग उपजाति भी इन्हीं जाटों में विलीन हो गई। समय-समय पर अन्य क्षत्रिय जातियां भी युद्धकर्म त्यागकर कृषि एवं पशुपालन में संलग्न हो गईं तथा वे भी जाटों में सम्मिलित हो गये।
यही कारण है कि जाटों में नागों के तक्षक, कालिय, कुठर तथा कुण्डु गोत्र पाये जाते हैं तो क्षत्रियों के गहलोत, दाहिमा, पंवार, यादव, तंवर तथा मॉर गोत्र भी मिलते हैं।
जाटों की स्त्रियां सिर पर बोर धारण करती हैं जो कि जाटों की नागों से निकटता का परिचायक है। जाटों और नागों की निकटता के सम्बन्ध में दो प्रमाण और दिये जा सकते हैं। एक तो यह कि जहां-जहां नाग रहते थे, उस पूरे क्षेत्र में अब जाट बहुलता से पाये जाते हैं।
नागौर नगर नागों द्वारा बसाया गया था इस कारण नागौर, नागपुर, नागद्रह, अहिच्छत्रपुर (बरेली) तथा अन्य नामों से जाना जाता था। इस क्षेत्र में जाट बहुलता से रहते हैं।
कहा जाता है कि जन्मेजय के नागयज्ञ के बाद बचे हुए नाग इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से चलकर राजस्थान से लेकर नागपुर (महाराष्ट्र) तथा उसके नीचे तक फैल गये।
यही कारण है कि दिल्ली से लेकर हिसार, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर तथा जैसलमेर आदि जिलों में बड़ी संख्या में जाट रहते है। वस्तुतः इस पूरे क्षेत्र में नागों की बस्तियां थीं जिनके साथ-साथ जाट रहते थे।
नाग नगरों में तथा जाट गांवों एवं ढाणियों में रहते थे। नागों से जाटों की निकटता का दूसरा प्रमाण यह है कि जाटों को भगवान शंकर की जटाओं से उत्पन्न होना बताया गया है। नाग भगवान शंकर के गले में रहते हैं तो जाट नागों से श्रेष्ठ होने के कारण शंकर के सिर की जटाओं से निकले हैं। यही ऐतिहासिक रूपक इस मिथक के पीछे दिखाई देता है।
जाट आज भी ब्राह्मणों की बहुत सारी व्यवस्थाओं को नहीं मानते। जाटों में विधवा विवाह अथवा नाते की प्रथा प्रचलित है। स्त्रियां सामान्यतः पर्दा नहीं करतीं। वंशानुगत अधिकार में जाटों का विश्वास नहीं है। ये वर्गवाद में भी विश्वास नहीं करते। उत्पादन एवं श्रम को महत्व देते हैं।
कानूनगो ने जाटों के बारे में लिखा है कि जाट व्यक्तिवादी हैं और व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं। जाट वही करता है जो उसकी दृष्टि में ठीक जंचे और कहीं-कहीं वह उसे जानबूझ कर भी करता है जो उसे गलत लगे।
डॉ. रणजीत सिंह ने लिखा है कि चारित्रिक दृष्टि से जाट प्राचीन आंग्ल-सैक्सन और रोमनवासियों के समान प्रतीत होता है। स्वभाव की दृष्टि से वह जर्मनों से मेल खाता है। इवेटशन कहता है कि जाट बातों द्वारा कठिनता से सहमत होता है।
ये सब टिप्पणियां इस बात की द्योतक हैं कि जाटों ने भारतीय आर्य होते हुए भी ब्राह्मणों की व्यवस्था को पूरी तरह नहीं स्वीकारा।
क्षत्रियों से भी इनका पूरा विरोध रहा। जहां कहीं भी जाटों ने अपना शासन स्थापित करना चाहा, क्षत्रियों ने उनका बड़ा भारी विरोध किया किंतु भरतपुर, गोहद, धौलपुर, पंजाब तथा अन्य कुछ स्थानों पर जाटों ने अपने राज्य कायम किये।
जाटों का विरोध केवल ब्राह्मण अथवा क्षत्रियों से ही नहीं रहा अपितु अंग्रेजों के शासनकाल में तेजी से पनपी महाजनी व्यवस्था को भी जाटों ने पूरी तरह से ललकारा।
यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति पर जितना प्रभाव ब्राह्मणों द्वारा बनाई धर्म-व्यवस्था, क्षत्रियों द्वारा बनाई गई शासन व्यवस्था और वैश्यों द्वारा करवाये गये लोकोपकारक कार्यों का है, उतना ही व्यापक और गहरा प्रभाव जाटों के व्यक्ति-स्वातंत्र्य चेतना का भी है।
आजाद भारत में जाटों ने उत्तर भारत की खेती को संवारा है तो भारतीय सेना को लाखों वीर सैनिक भी उपलब्ध कराये हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था पर जाटों का गहरा प्रभाव है।
शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी जाट जाति के विद्वान व्यक्तियों ने मील के पत्थर स्थापित किये हैं। यह धर्म-प्राण जाति, गौ-सेवा के प्रति जितनी समर्पित है, उतनी समर्पित कोई अन्य जाति नहीं है।
निष्कर्ष
आदि मनु के समय में और उनके बहुत बाद के काल में भी आर्य बस्तियां भारत से लेकर मध्य एशिया तथा यूरोप महाद्वीप तक फैली हुई थीं। उस काल में अलग-अलग देश अस्तित्व में आने आरम्भ नहीं हुए थे। इसलिये उस समय धरती के जिस क्षेत्र में आर्य जाति विस्तृत थी उस पूरे भू-क्षेत्र को भारत कहा जाना चाहिये।
उस काल में कौनसा आर्य कबीला कहां रहता था और घूमते-घूमते कहाँ जाकर निवास करने लगा, इस सम्बन्ध में कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया जा सकता। हो सकता है कि जाट उस समय जुटलैण्ड में रहते हों।
निष्कर्षतः इतना ही कहा जा सकता है कि जाट जाति आखण्ड भारत के संयुक्त पंजाब क्षेत्र की रहने वाली प्राचीन एवं विशुद्ध आर्य जाति है और पूर्णतः भारतीय है। यह नैतिक परम्पराओं पर आधारित धर्मप्रेमी एवं गौसेवक जाति है।
क्या गुर्जर जनजाति है! इस विषय पर विचार करने से पहले हमें गुर्जरों के अधिवास क्षेत्र पर एक दृष्टि डालनी चाहिए। उत्तर भारत में गुर्जरों का अधिवास बड़ी संख्या में पाया जाता है। यह जाति कश्मीर की घाटियों से लेकर, पंजाब की नदी क्षेत्रों, राजस्थान के मैदानों तथा नीचे मध्यप्रदेश आदि प्रांतों में पाई जाती है। इनकी मांग है कि चूंकि गुर्जरों में जनजातीय लक्षण पाए जाते हैं, इसलिए इन्हें जनजाति स्वीकार किया जाए।
कौन हैं गुर्जर!
क्या गुर्जर जनजाति है! इस विषय पर विचार करने से पहले हमें गुर्जरों के इतिहास पर एक दृष्टि डालनी चाहिए। गुर्जर जाति के बारे में अभी तक विद्वानों द्वारा निर्विवाद रूप से यह निर्णय नहीं लिया जा सका है कि यह एक आर्य जाति है अथवा आर्येतर जाति है। इसका किसी भारतीय जनजातीय कबीले से उद्भव हुआ है अथवा यह जाति भारत के बाहर के किसी भू प्रदेश से किसी कालखण्ड में भारतवर्ष में आयी है।
प्राचीन क्षत्रियों के वंशज
क्या गुर्जर जनजाति है! इस विषय पर विचार करते समय हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्या वे प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं?
सुप्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार प्राचीनकाल में गुर्जर नाम का एक राजवंश था जिसके मूल पुरुष के नाम से उसके वंशज गुर्जर कहलाये। गुर्जर किन्हीं प्राचीन क्षत्रिय राजवंश की संतान हैं, इसके पक्ष में गुर्जर प्रदेश की उपस्थिति एक बड़ा प्रमाण जान पड़ता है।
बहुत से गुर्जरों का भी मानना है कि वे प्राचीन कालीन गुर्जर नामक क्षत्रिय जाति की संतान हैं। उनका दावा है कि गुर्जर प्रतिहार वंश ही उनका मूल वंश है।
कुछ लोग चौहान शासक पृथ्वीराज चौहानको भी गुर्जर मानते हैं क्योंकि पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् में पृथ्वीराज को गुर्जरेश्वर कहा गया है।
कुछ लोग मिहिरभोज को गुर्जर राजा मानते हैं, जबकि मिहिरभोज प्रतिहार था। वस्तुतः ये लोग प्रतिहारों को ही गुर्जर मानते हैं इसलिए मिहिरभोज को भी गुर्जर राजा मानते हैं।
कुछ लोग मिहिरकुल को गुर्जर मानते हैं जबकि मिहिरकुल तो हूण था।
यदि मिहिरभोज को गुर्जर स्वीकार कर लिया जाए तो गुर्जर विशुद्ध रूप से भारतीय हैं और यदि मिहिरकुल को गुर्जर माना जाए तो गुर्जर विदेशी सीथियन माने जाएंगे। यह दावा अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाता।
इस प्रकार आजकल कुछ लोग गुर्जरों के इतिहास को उलझा रहे हैं।
गुर्जर प्रदेश एवं गुजरात
क्या गुर्जर जनजाति है! इस विषय पर विचार करते समय हमें गुर्जर प्रदेश एवं गुजरात जैसे राजनीतिक क्षेत्रों अथवा इकाइयों पर पर भी विचार करना चाहिए।
सातवीं शताब्दी ईस्वी एवं उसके बाद के काल में राजस्थान के नागौर जिले में स्थित डीडवाना से लेकर दक्षिण में भड़ौंच तक का सारा प्रदेश गुर्जरों के अधीन था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ई.641 में भारत की यात्रा की। उसने अपनी पुस्तक में गुर्जर देश का वर्णन किया है और उसकी राजधानी भीनमाल होना बताया है।
ह्वेनसांग गुर्जर देश की परिधि 833 मील अर्थात् 1333 किलोमीटर बताता है। इससे अनुमान होता है कि गुर्जरात्रा बहुत बड़ा प्रदेश था और उसकी लम्बाई 300 मील (480 किलोमीटर) रही होगी।
ह्वेनसांग का बताया हुआ गुर्जर देश महाक्षत्रप रुद्रदामा के शक राज्य के अन्तर्गत था किंतु रुद्रदामा के गिरिनार के शक संवत् 72 (वि.सं. 207 या ई.150) से कुछ ही बाद के लेख में उसके अधीनस्थ देशों के जो नाम दिये हैं उनमें गुर्जर नाम नहीं है और उसके स्थान पर ‘श्वभ्र’ और ‘मरु’ नाम लिखे गये हैं जिससे प्रतीत होता है कि ई.150 के आसपास तक ‘गुर्जर देश’ नाम प्रसिद्धि में नहीं था।
शक क्षत्रपों का राज्य समाप्त होने के बाद के किसी कालखण्ड में जो क्षेत्र गुर्जर जाति के अधीन रहा होगा, उसके लिये गुर्जरात्रा शब्द प्रयुक्त हुआ होगा।
ह्वेनसांग के विवरण से हमें ह्वेनसांग के समय के महत्वपूर्ण मार्र्गाें के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। ह्वेनसांग सतलुज नदी से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ा तथा आठ सौ ‘ली’ चलने के बाद पो-लि-ये-ट-लो अर्थात् पारियात्र प्रदेश की ओर बढ़ा।
रैनण्ड ने इसे बैराठ माना है किन्तु इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। यहाँ से वह पाँच सौ ली पूर्व में चलने पर मो-टू-लो अर्थात् मथुरा पहुंचा। अन्य मार्ग वलभी से एक हजार आठ सौ ली उत्तर में चलकर कुचेलो पहुंचा जिसकी राजधानी पिलो मोला थी। पिलोमोलो की संगति भीनमाल से की जाती है।
प्रतिहार राजा भोजदेव (प्रथम) के वि.सं. 200 अर्थात् ई.843 के दानपत्र में गुर्जरात्रा भूमि में आधुनिक डीडवाना (अब नागौर जिले में) को शामिल बताया है।
कालिंजर से मिले 9वीं शती के एक शिलालेख में जोधपुर राज्य के मंगलानक गांव को गुर्जरात्रा में शामिल बताया है। यह गांव डीडवाना से थोडे़ अन्तर पर ही है। इन दोनों शिलालेखों से तथा ह्वेनसांग के वर्णन से ज्ञात होता है कि सातवीं से नौंवी शताब्दी के बीच जोधपुर राज्य का उत्तर से दक्षिण तक का समस्त पूर्वी भाग गुर्जरात्रा में शामिल था।
इसी तरह दक्षिण और लाट के राठौड़ों तथा प्रतिहारों के बीच लड़ाइयों के वृत्तान्त से जाना जाता है कि गुर्जर देश की दक्षिणी सीमा लाट से जा मिली थी। कालान्तर में यह सीमा सिमटते-सिमटते जोधपुर राज्य के ठीक दक्षिण में आबू पर्वत के दूसरी ओर तक ही सिमट गई।
गुर्जर देश पर गुर्जरों का अधिकार कब हुआ और कब तक रहा, इस कालखण्ड की निश्चित तिथियाँ बता पाना संभव नहीं है किन्तु अनुमान लगाया जाता है कि शक क्षत्रपों का राज्य समाप्त होने के बाद यहाँ गुर्जरों का अधिकार हुआ होगा और ई.628 से पहले किसी समय में गुर्जरों की सत्ता नष्ट हो गई होगी क्योंकि ई.628 में भीनमाल पर चावड़ा वंश के राजा व्याघ्रमुख नाम अथवा उपाधि वाले राजा का शासन था।
भारतीय जनजाति!
क्या गुर्जर जनजाति है! डा. बी. एन. पुरी के अनुसार गुर्जर अत्यंत प्राचीन काल से अन्य जनजातीय कबीलों की तरह भारत में ही निवास करते थे।
के. एम. मुंशी के अनुसार गुर्जर शब्द जाति का वाचक न होकर देश विशेष का सूचक है। चूंकि भारत में ही गुर्जर प्रदेश था इसलिये गुर्जर एक भारतीय जाति है।
यह एक सामान्य प्रचलित धारणा रही है कि गुर्जर प्रदेश पर अधिकार कर लेने के कारण प्रतिहार शासक इतिहास में गुर्जर प्रतिहार के नाम से प्रसिद्ध हुए किंतु कुछ विद्वान यह दावा करते हैं कि गुर्जर और प्रतिहार अलग-अलग संज्ञाएं न होकर एक ही संज्ञा है। उनके अनुसार गुर्जर प्रतिहार ही आगे चलकर गुर्जर कहलाने लगे।
बहुत से विद्वान गुर्जर प्रतिहारों की तरह बड़गूजरों को भी गुर्जर बताते हैं जबकि बड़गूजर जनजातीय कबीले से उत्पन्न न होकर मेवाड़ की राणा शाखा से उत्पन्न हुए हैं तथा बड़गूजरों एवं गूजरों में कोई सम्बन्ध नहीं है।
विदेशी मूल के हैं गुर्जर!
डॉ. हार्नले, वूलर, विसेन्ट स्मिथ तथा पी. सी. बागची आदि इतिहासकार गुर्जरों को श्वेत हूणों का वंशज मानते हैं। इन विद्वानों के अनुसार गुर्जर हूणों के साथ या उनके आने के शीघ्र पश्चात् भारत में आये तथा अधिक संख्या में राजपूताने में बस गये।
प्रसिद्ध इतिहासकार सर जेम्स काम्फेल एवं ए. एम. टी. जैक्सन आदि कई विद्वानों का विचार है कि मध्य ऐशिया में रहने वाले खजर (अथवा खर्जर) कबीलों से गुर्जरों की उत्पत्ति हुई। खजर श्वेत हूणों की एक श्रेणी थी। खजर लोगों की एक श्रेणी गोर्जियन थी, यह गोर्जियन ही गुर्जर कहलाये।
कनिंघम, गिर्यर्सन, डॉ. गुणानंद जुयाल तथा राहुल सांकृत्यायन आदि अनेकानेक विद्वानों ने इनका सम्बन्ध श्वेत हूणों, यूचियों, खर्जरों, सीथियनों, कुषाणों एवं शकों से जोड़ा है। केनेडी आदि इतिहासकारों के अनुसार गुर्जर सूर्योपासक हैं तथा ये किसी समय ईरान से भारत में आये।
कर्नल टॉड, भण्डारकर, तथा बी. ए. स्मिथ आदि इतिहासकारों का मानना है कि गुर्जर सीथियन जातियों से उत्पन्न हुए।
अनेक विद्वान गुर्जरों की उत्पत्ति मध्य एशिया, समरकंद, बलख, बुखारा, ताहिया, गोर्जिया, सीस्तान, खोटान तथा कैस्पियन सागर के निकटवर्ती स्थान से मानते हैं। डॉ. मोहियुद्दीन तथा डॉ. रामप्रसाद खटाना के अनुसार जॉर्जिया गुर्जरों का मूल स्थान था। ये अत्यंत प्राचीन काल में जॉर्जिया से चलकर छोटे-छोटे समूहों में भारत पहुंचे तथा उत्तर भारत के विभिन्न भागों में निवास करने लगे।
गौचर ही कहलाये गूजर!
कुछ विद्वानों के अनुसार गौचर शब्द से गुर्जर शब्द की उत्पत्ति हुई है। गुर्जर जाति हजारों वषों से गौ-चारण का कार्य करती रही है। आज भी उत्तर भारत में बसने वाले गुर्जरों का मुख्य धंधा कृषि एवं गौ-पालन ही है। जिस प्रकार चरवाहे रेबारी कहलाने लगे उसी प्रकार गौचर गुर्जर कहलाने लगे। गुर्जरों की उत्पत्ति के बारे में आज जितने भी मत प्रचलित हैं, उनमें यह मत सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़ता है।
वृषभान कुमारी भी हैं गूजरी
गूजर शब्द भारतीय संस्कृति में अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। ब्रज साहित्य में वृषभान कुमारी राधाजी को भी गूजरी कहकर पुकारा गया है। वस्तुतः दूध के व्यवसाय से जुड़ी हुई होने के कारण ही राधाजी को गूजरी कहा गया है। ब्रजसाहित्य में सुंदर स्त्री को भी गूजरी अथवा गुजरिया कहकर पुकारा गया है।
चौपड़ा समिति के अनुसार गुर्जर जनजाति नहीं
गुर्जर जाति लम्बे समय से अपने लिए जनजाति वर्ग में आरक्षण की मांग करती रही है। उनका कहना है कि हम एक जनजातीय समूह हैं। इसलिए हमें जनजाति माना जाए।
गुर्जरों को जनजाति आरक्षण वर्ग में सम्मिलित किये जाने की मांग पर विचार करने के लिये राजस्थान सरकार ने जस्टिस जसराज चौपड़ा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की।
इस समिति ने 17 नवम्बर 2007 को सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में कुल 294 पृष्ठ हैं जिनमें से 192 पृष्ठों में समिति ने अपनी अनुशंसाएं लिखीं। शेष 102 पृष्ठों में सम्बन्धित दस्तावेज और संलग्नक दिये। समिति ने 147 गांवों का दौरा करके गुर्जर और मीणा जाति के रहन-सहन और आर्थिक स्थिति का गहन अध्ययन किया जिससे कई महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य सामने आये हैं।
समिति ने गुर्जरों को जनजातीय आरक्षण के योग्य नहीं माना तथा यह भी कहा कि राज्य में बसने वाली मीणा जाति सहित कई अन्य जातियां जिन्हें वर्तमान में जनजाति वर्ग में आरक्षण की सुविधा मिल रही है, वे जनजातीय वर्ग से आरक्षण की सुविधा पाने की योग्यता नहीं रखतीं।
समिति ने अनुशंसा की कि जनजाति वर्ग में आरक्षण देने के आधार की समीक्षा हो तथा इसे बदला जाये ताकि समाज के सभी वर्गों के साथ न्याय हो सके। रिपोर्ट मंे कहा गया कि गुर्जरों की एक तिहाई आबादी अर्थात् 8 लाख गुर्जर 13 तहसीलों में अत्यंत पिछड़े हाल में बसे हुए हैं।
सवाईमाधोपुर, अलवर, राजसमन्द सहित लगभग आधा दर्जन जिलों में बसे गुर्जरों में जनजातीय गुण भी पाये गये हैं। सवाईमाधोपुर जिले के खण्डार और डांग क्षेत्र के गुर्जर बहुल क्षेत्र आदिम श्रेणी के काफी निकट हैं। इसी जिले की बौंली तहसील और अलवर जिले के छिंद क्षेत्र में भी भौगोलिक एकाकीपन के लक्षण हैं।
उदयपुर संभाग में बसे ”हेरा का गुर्जर” वर्ग में जनजातियों के चिह्न मिले हैं। भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ जिलों में जाति पंचायत का प्रचलन है। कोटा और बंूदी जिलों के देसी गुर्जर दूसरे क्षेत्रों से आये गुर्जरों से विवाह नहीं करते।
जस्टिस चौपड़ा समिति की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में गुर्जरों के पास राज्य का 20 प्रतिशत पशुधन है तथा प्रति गुर्जर परिवार औसतन 6.45 बीघा जमीन उपलब्ध है जबकि प्रदेश में प्रति परिवार औसतन 6.67 बीघा जमीन उपलब्ध है।
गुर्जरों के पास 47 लाख 67 हजार 508 पशु हैं जिनमें से 18 लाख 28 हजार 837 बकरियां, 5 लाख 70 हजार 745 गाय एवं बैल, 13 लाख 21 हजार 465 भैंस, 10 लाख 26 हजार 803 भेड़, 16 हजार 655 ऊंट, 2 हजार 474 घोड़े तथा 529 गधे हैं।
जस्टिज जसराज चौपड़ा समिति ने माना है कि कृषि भूमि तथा पशुधन के इस विपुल स्वामित्व को देखते हुए राजस्थान के गुर्जर अधिक पिछड़ी स्थिति में नहीं हैं।
निष्कर्ष
इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक, ऐतिहासिक एवं आर्थिक आधार पर गुर्जर एक जनजाति नहीं है, गुर्जर भारत की प्राचीन काल की उच्च जाति है किंतु जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि जिस आधार पर कुछ अन्य जातियों को जनजातीय वर्ग में सम्मिलित किया गया है तो हमें गुर्जरों की मांग न्यायसंगत जान पड़ती है।
भारतीय दर्शन परम्परा ऋग्वेद के प्राकट्य से आरम्भ होती है। सनातन धर्म की मान्यता है कि वेद समस्त विद्याओं की पुस्तक है। अर्थात् वेद जो कि चार संहिताओं में संकलित है, दर्शन नामक विद्या की भी मूल पुस्तक है। वेदों के दर्शन में किसी तरह का विरोधाभास नहीं है। वेदों का दर्शन ही उपनिषदों का आधार बना।
उपनिषदों के कालसे भारतीय दर्शन परम्परा में परस्पर विरोधी विचारों का प्रवाह हुआ ताकि वेदों में प्रस्तुत दर्शन के मूल संदेश को समझा जा सके। यही कारण है कि भारतीय धर्म, अध्यात्म एवं दार्शनिक चिंतन में दो परस्पर विरोधी धाराएं अत्यंत प्राचीन काल से विकसित हो पाईं। इनमे से पहली धारा है- वैचारिक कट्टरता एवं दूसरी धारा है- सहिष्णुता।
एकमात्र अपने ही मत तथा अपने ही इष्टदेव में सर्वोच्च आस्था रखे जाने के कारण भारतवर्ष में धार्मिक संप्रदायवादप्रारम्भ से ही विद्यमान रहा है। अपने गुरु के वचनों को ब्रह्म-वाक्य मानकर केवल उन्हीं के द्वारा उच्चारित शब्दों को ही स्वीकार करना भारतीय संप्रदायवाद की विशेषता रही है।
दूसरी ओर भारत भूमि पर समय-समय पर ऐसी दिव्य विभूतियों का अवतरण हुआ जिन्होंने सांप्रदायिक संकीर्णता को नकार कर जनकल्याण एवं राष्ट्रकल्याण को प्रधानता देते हुए सांप्रदायिक समन्वय को अपनाया तथा भारतीय संस्कृति को नवीन दिशा प्रदान की।
भारतीय दर्शन परम्परा षड्दर्शन के रूप में प्रकट हुई। दर्शन के ये समस्त छः अंग अर्थात् सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, वेदांत और वैशेषिक; पूर्णतः आस्तिक हैं अर्थात् वे वेदों को प्रामाणिक मानते हैं। मीमांसा को छोड़कर अन्य सभी दर्शन ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं।
इतनी सारी मूलभूत समानताओं के उपरांत भी भारतीय दर्शन परम्परा में बाह्य विरोधों तथा अध्यात्मिक धरातल पर प्रकट होने वाली अन्तमुर्खी समन्वयवादी प्रतिक्रियाओं के निरंतर प्रवाह से भारतीय अध्यात्म में अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद और शुद्धाद्वैतवाद जैसे विलक्षण दार्शनिक सिद्धांतांे एवं मान्यताओं की प्रतिष्ठापना हुई।
भारतीय दार्शनिक सिद्धांतों के प्रकट होने का एक सुनिश्चित क्रम रहा। ईसा पूर्व 6 हजार साल पहले ऋग्वेद का प्राकट्य हुआ। ईसा पूर्व 1000 से लेकर ईसा पूर्व 600 तक उपनिषदों का दर्शन सामने आया। ईस्वी पूर्व 6ठी शताब्दी में उपनिषदों के विरोध में बौद्धों का शून्यवाद प्रकट हुआ। भारतीय दर्शन परम्परा में विरोधी तत्वों का समावेश यहीं से आरम्भ हुआ।
शून्यवाद की प्रतिक्रिया में ईस्वी 8वीं शताब्दी में शंकराचार्य का अद्धैतवादप्रकट हुआ। शंकर के अद्वैतवाद की प्रतिक्रिया में ईस्वी 11वीं शताब्दी से लेकर ईस्वी 16वीं शताब्दी की अवधि में विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद और शुद्धाद्वैतवाद प्रकट हुए।
रामानुजाचार्य (ईस्वी 11-12वीं शताब्दी) ने विशिष्टाद्वैतवाद की, माध्वाचार्य (ईस्वी 13वीं वींशताब्दी) ने द्वैतवाद की, निम्बार्काचार्य (ईस्वी 12-13वीं शती) ने द्वैताद्वैतवाद की और वल्लभाचार्य (ईस्वी 15-16वीं शताब्दी) ने शुद्धाद्वैतवाद की स्थापना की।
शंकराचार्य के मायावाद और रहस्यवाद के सिद्धांतों को काटने के लिये रामानुजाचार्य तथा माध्वाचार्य ने विष्णु-भक्ति का प्रचार किया। निम्बार्काचार्य ने राधा और कृष्ण की भक्ति का प्रचार किया एवं वल्लभाचार्य ने भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की उपासना को ईश भक्ति का साधन बनाया।
विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतों के प्रतिपादकों का भारतीय जनमानस में कितना गहरा आदर है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि रामानुजाचार्य को भगवान् संकर्षण का अवतार माना जाता है। मध्वाचार्य को वायुदेव का, निम्बार्काचार्य को भगवान के प्रिय आयुध सुदर्शन चक्र का तथा वल्लभाचार्य को अग्निदेव का अवतार माना जाता है।
रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैतवाद को समझने के लिये अन्य मतों का भी संक्षिप्त परिचय होना आवश्यक है।
शून्यवाद
बौद्धों ने जगत् तथा ईश्वर की सत्ता को नकार दिया और संपूर्ण जगत को दुखमय मानकर शून्य को ही परम तत्व मान लिया। उनके अनुसार परम तत्व न सत् है, न असत् है, न सत् और असत् दोनों है और न दोनों से भिन्न ही है। इस प्रकार वह इन चारों कोटियों से विलक्षण तत्व है। वह अलक्षण है। इसी को शून्यवाद तथा प्रतीत्यसमुत्पाद भी कहा जाता है। इस प्रकार बौद्धों के अनुसार ब्रह्म और जगत् दोनों ही असत्य हैं।
अद्वैतवाद
शंकराचार्य का अद्वैतवाद समस्त दार्शनिक जगत को एक अनुपम देन है। इसके प्रतिपादन का उद्देश्य शून्यवाद का खण्डन करके प्राचीन आस्तिक दर्शन की पुर्नस्थापना करना था। यहाँ इस बात को समझा जाना आवश्यक है कि अद्वैतवाद का प्राकट्य केवल बौद्धों के शून्यवाद की प्रतिक्रिया में नहीं हुआ अपितु इसकी हुंकार में इस्लाम का मार्ग रोकने की प्रबल अभीप्सा दिखायी पड़ती है।
अद्वैतवाद के अनुसार निर्गुण ब्रह्म ही सर्वोच्च परमार्थ तत्व है। वह अद्वैत, निर्विशेष, चिन्मात्र तथा निरुपाधि है। इस प्रकार निर्गुण ब्रह्म ही पूर्ण एवं एकमात्र सत्य है। ब्रह्म निर्गुण है किंतु शून्य नहीं है। आत्मा और ब्रह्म दोनों में कोई अंतर नहीं है। जो कुछ जीव में है, वही जगत् में है।
शंकर के मत को मायावाद भी कहा जाता है। शंकर के अनुसार माया ईश्वर की शक्ति है तथा व्यवहारिक है। शंकर द्वारा प्रतिपादित मत का सर्वाधिक खण्डन-मण्डन हुआ। इसमें श्रद्धा रखने वालों ने शंकर को आदि जगत् गुरु कहा तो इसका खण्डन करने वालों ने शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध तक कह डाला। दूसरे शब्दों में शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है।
विशिष्टाद्वैतवाद
रामानुज का वेदांत दर्शन विशिष्टाद्वैत के नाम से प्रसिद्ध है। भारतीय दर्शन परम्परा में यह दर्शन श्री संप्रदाय भी कहलाता है। रामानुजाचार्य के अनुसार तीन परम् मूल तत्व- चित्, अचित् और ईश्वर हैं। ईश्वर तो प्रधान अंगी है तथा चित् और अचित् उसके दो विशेषण अथवा अंग हैं। इसलिये यह मत ‘विशिष्ट-अद्वैत वाद’ कहलाता है।
शंकर के अद्वैतवाद के विरुद्ध, रामानुज ने ब्रह्म को जीव से भिन्न माना है परंतु साथ ही उन्होंने द्वैतवाद का खण्डन भी किया है। उनके अनुसार कारण रूप ब्रह्म से जीव जगत् अनन्य है। इस कारण इन दोनों में अभेद है।
रामानुज के अनुसार जीव ब्रह्म का अंश है किंतु जीव ब्रह्म नहीं है क्योंकि यदि यह मान लिया जाये कि जीव ब्रह्म है तो जीव के समस्त दोष ब्रह्म पर भी लागू हो जाते हैं। इस कारण जीव और ब्रह्म में अभेद भी है और भेद भी है। इस भेद-अभेद की व्याख्या को रामानुज यहाँ पर आकर समाप्त करते हैं कि ब्रह्म और जीव का अभेद मुख्य है तथा भेद गौण। इस कारण ब्रह्म और जीव में अभेद है किंतु वह विशिष्ट प्रकार का अद्वैत है।
द्वैतवाद
मध्वाचार्य ने बारहवीं शताब्दी ईस्वी में ब्रह्मसूत्र की व्याख्या की तथा उसके आधार पर शंकर के अद्वैत सिद्धांत का खण्डन करके द्वैतवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया। माध्वाचार्य केे दार्शनिक मत को ‘द्वैतवाद’ कहते हैं।
माध्वाचार्य के मत में पाँच भेदों को आधार माना जाता है- जीव-ईश्वर, जीव-जीव, जीव-जगत्, ईश्वर-जगत्, जगत्-जगत्। इनमें भेद स्वतः सिद्ध है। भेद के बिना वस्तु की स्थिति असंभव है।
माध्वाचार्य के अनुसार जगत् और जीव ईश्वर से पृथक् हैं किंतु ईश्वर द्वारा नियंत्रित हैं। सगुण ईश्वर जगत् का स्रष्टा, पालक और संहारक है। ईश्वर द्वारा नियंत्रित होने पर भी ‘जीव’ अपने कर्म का कर्त्ता और फल का भोक्ता है। ईश्वर में नित्य-प्रेम ही भक्ति है जिससे जीव मुक्त होकर, ईश्वर के समीप स्थित होकर, आनन्दभोग करता है। भौतिक जगत् ईश्वर के अधीन है और ईश्वर की इच्छा से ही सृष्टि और प्रलय में यह क्रमशः स्थूल और सूक्ष्म अवस्था में स्थित होता है।
द्वैताद्वैतवाद
भारतीय दर्शन परम्परा में निम्बार्क ने भी रामानुज की भांति ब्रह्म और जीव के बीच भेद और अभेद दोनों तरह का सम्बन्ध स्वीकार किया है। मध्वाचार्य भी रामानुज की भांति भेद और अभेद दोनों को ही वास्तविक माना है किंतु जहाँ निम्बार्क के लिये ब्रह्म और जीव के मध्य भेद और अभेद का स्तर एक ही है वहीं रामानुज के लिये अभेद प्रमुख है और भेद गौण।
शुद्धाद्वैतवाद
भारतीय दर्शन परम्परा में प्रतिष्ठित इस मत के अनुसार ब्रह्म शुद्ध है तथा ब्रह्म में से जीव और जगत् उत्पन्न हुए हैं। इस कारण जीव भी शुद्ध है, जगत भी शुद्ध है और इसी कारण उनका अद्वैत भी शुद्ध है। इसी मान्यता के कारण इस मत को ‘शुद्ध-अद्वैत वाद’ कहते हैं।
भारतीय दर्शन परम्परा का यह सिद्धांत मानता है कि ईश्वर, जीव तथा जगत में कोई अंतर नहीं है किंतु माया नामक शक्ति के कारण ब्रह्म, जीव और जगत् से भिन्न प्रतीत होता है। अर्थात् ब्रह्म भी सत्य है, जगत् भी सत्य है।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य गोस्वामी तुलसीदासकी गुरुपरम्परा के आचार्य थे। वे तुलसीदासजी से लगभग 537 वर्ष पहले अर्थात् ई.1017 में जन्मे।
तुलसीदास की गुरुपरम्परा वास्तव में दक्षिण भारत के आळवार संतों के काल से आरम्भ होती है। आळवार संतों ने दक्षिण भारत में विष्णु भक्ति का नया मार्ग प्रशस्त किया जो वैदिक परम्पराओं का एक नवीन विकास था। आळवार संतों की भक्ति-परम्परा में ग्यारहवीं शताब्दि ईस्वी में विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्तक आचार्य रामानुजाचार्य का जन्म हुआ।
द्वैतावाद एवं अद्वैतावाद का समन्वय
आठवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य ने उपनिषदों के ‘सत्य एक है, दो नहीं’ जैसे वाक्यों को लेकर अद्वैत सिद्धांत का प्रतिपादन किया परन्तु द्वैतवाद के समर्थकों का कहना था कि ‘आत्मा व ब्रह्म एक नहीं हैं, दो हैं।’ इनका समन्वय करते हुए रामानुजाचार्य ने ‘विशिष्टाद्वैत’ का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार आत्मा एवं ब्रह्म दो होते हुए भी उनमें विशिष्ट प्रकार का अद्वैत है।
रामानुजाचार्य ने स्वीकार किया कि परमसत् (सत्य) के तीन स्तर हैं- (1) ब्रह्म अर्थात ईश्वर, (2) चित् अर्थात आत्मतत्व एवं (3) अचित् अर्थात प्रकृति तत्व।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य ने प्रतिपादित किया कि अंतिम दोनों स्तर, प्रथम स्तर से पृथक नहीं हैं, अपितु विशिष्ट रूप से ब्रह्म के ही दो स्वरूप हैं और उसी पर आधारित हैं। ठीक वैसे ही जैसे शरीर और आत्मा मूलतः पृथक नहीं हैं तथा संसार में शरीर आत्मा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्य करता है। उसी प्रकार चित् (आत्मा) तथा अचित् (प्रकृति), ब्रह्म या ईश्वर के शरीर सदृश्य हैं।
रामानुज का जन्म तमिलनाडु प्रांत में चेन्नई से लगभग 45 किमी. दूर श्रीपेरुम्बुदृरम् में केशव सोमया और कान्तिमति दम्पत्ति के घर हुआ। उनकी शिक्षा पेरुम्बुदूर से कुछ दूर कांचीपुरम में पेरिय नम्बि इत्यादि पांच आचार्यों के द्वारा हुई। रामानुज अद्भुत प्रतिभा के धनी थे इस कारण उन्होंने शीघ्र ही शास्त्रों पर अधिकार कर लिया।
शिक्षा प्राप्त करने के बाद रामानुज ने संन्यास-ग्रहण कर लिया। उन्हें तिरुपुरकुळि में यादव प्रकाश ने वैष्णव परम्परा में दीक्षित किया। रामानुज को भूलोक-वैकुण्ठ नाम से प्रसिद्ध श्रीरंगम के वैष्णव-मठ का अध्यक्ष बनाया गया। वे आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
मान्यता है कि 10वीं शताब्दी ईस्वी में नाथ मुनिगल वैष्णव परम्परा में सर्वप्रथम आचार्य हुए। उन्होंने आळवार भक्त-कवियों द्वारा भगवान विष्णु की अर्चा मूर्ति के समक्ष गाये गये चार हजार भक्तिपूर्ण गेय पदों का संग्रह किया जो ‘नालाइर दिव्य प्रबंध’ नाम से प्रसिद्ध है। मुनिगल के पौत्र आळवंदार आचार्य हुए जो यामुनाचार्य नाम से जाने जाते हैं।
यामुनाचार्य के पश्चात रामानुजाचार्य ने वैष्णव तत्व के प्रचार-प्रसार को तमिलनाडु से बाहर भी फैलाया तथा कर्नाटक के तोण्डसुर में जयस्तम्भ स्थापित किया। रामानुजाचार्य ने तमिलनाडु में श्रीरंगम के रंगनाथ (विष्णु) मंदिर में आचार्य पद पर अधिष्ठित रहते हुए मन्दिर में सेवा-अर्चा एवं अन्य व्यवस्थाओं से संबंधित नियमों का निर्धारण किया। इसी स्थान पर ई.1137 में 120 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
अपने निधन से पूर्व अपने परम शिष्य मुदलियाण्डान के पुत्र कन्दाई आण्डान की प्रार्थना पर रामानुज ने अपनी भौतिक देह की प्रतिमा शिल्पी द्वारा बनवाने की अनुमति प्रदान की और शिल्पी ने उनकी वह प्रतिमा का निर्माण किया जिसका आलिंगन कर आचार्य ने उसे अपनी समस्त शक्ति प्रदान कर दी।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य की इस प्रतिमा को श्रीपेरुम्बुदुरम् में लाकर स्थापित किया गया। इसे रामानुज का स्वानुभूतित, अर्चा-विग्रह कहा जाता है। आळवार तिरुनगर, श्रीरंगम तथा तिरुनारायणपुरम (कर्नाटक) में भी रामानुजाचार्य के अर्चा-विग्रह स्थापित हैं। रामानुज को यतिराज भी कहा जाता है। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की।
1. वेदार्थ संग्रहम्
प्रस्तुत ग्रन्थ उपनिषदों में प्रकाशित तीन बुनियादी दार्शनिक तत्वों की उद्घोषणा पर प्रकाश डालता है-1. यथार्थता का दर्शन, 2. मार्ग का दर्शन और 3. अन्त का दर्शन। प्रथम, ब्रह्म की प्रकृति से सम्बन्धित है। द्वितीय भक्ति की प्रकृति से सम्बद्ध है। तृतीय ब्रह्म-प्राप्ति के साथ सम्बन्ध रखता है।
उपरोक्त दर्शनों को आगे विस्तार करते हुए उपनिषदों के दर्शन-चिन्तन के पांच प्रभागों को आच्छादित किया गया है- आत्मा, ब्रह्म, सम्पूर्णत्व की बाधाएं, सम्पूर्णत्व की ओर प्रगतिशील प्रविधि और सम्पूर्णत्व की प्रकृति।
रामानुज दर्शन में दिव्य आत्मा के बारे में कुछ विशिष्ट सिद्धान्त हैं- धर्मभूत ज्ञान एवं स्वरूपभूत ज्ञान। ब्रह्म विश्वात्मा है और मूलाधार है। रामानुजाचार्य प्रस्तुत ग्रन्थ में, उपनिषदों द्वारा प्रस्तुत निष्कर्ष के विभिन्न पक्षों की चर्चा करते हैं।
वेदार्थ संग्रहम, दार्शनिक प्रवृत्ति अर्थात् सत्य के प्रति भक्ति-निष्ठा, व्यापक दृष्टिकोण, आवश्यक और खुले मस्तिष्क के भीतर के अन्तर्ज्ञान की गहराई के विशिष्ट गुणों का वर्णन करता है।
2. वेदान्त सारम्
प्रस्तुत ग्रन्थ में वेदों का सांगोपांग विश्लेषण किया गया है तथा बताया गया है कि भक्ति-योग आत्मज्ञान का उपाय है और मोक्ष-प्राप्ति में परमानन्द सन्निहित है। विवेक, विमोख (स्वतन्त्रता), अभ्यास, क्रिया, कल्याण (पवित्रता), अनवसदा (बलहीनता का अभाव) और अनुद्दर्शा (अति आनन्द का अभाव) से भक्ति प्रस्फुटित होती है।
रामानुज का मानना है कि ब्रह्म उच्चतम है, सर्वाेत्तम है और महानतम है। नारायण वैकुण्ठवासी हैं और उनकी पत्नी श्री, अथवा महालक्ष्मी हैं। समस्त प्राकृतिक सृष्टि अत्यधिक सुन्दर है जो उनकी देन है। भक्ति का विशद वर्णन करते हुए श्रीरामानुज सिद्ध करते हैं कि प्रपत्ति द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयास किया जा सकता है किंतु भगवान के चयन, कृपा एवं दया के बिना कोई भी अपने ही प्रयासों से उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता।
3. श्री भाष्यम्
महर्षि व्यास के ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों के यथार्थ अर्थ को सुदृढ़ निश्चय करने और मोक्ष के सच्चे पथ को निस्सन्देह सुस्थापित करने के लिए लिखे गये थे। विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य ने महर्षि व्यास के ब्रह्मसूत्रों की व्याख्या के रूप में श्रीभाष्यम् ग्रन्थ की रचना की थी। इसमें चार अध्याय हैं, प्रत्येक अध्याय के चार पादम् (चरण) हैं जिनमें 156 अधिकरणम (प्रभाग अथवा शीर्षक) हैं।
प्रथम अध्याय के अनुसार श्रियःपति, अर्थात् नारायण सम्पूर्ण विश्व के सृष्टिकर्ता हैं, मूलभूत हैं।
द्वितीय अध्याय ‘अरिरोधाध्यम्’ है जिसमें स्मृतियों, उपनिषदों आदि के संगत शब्दों एवं सूक्तियों के सहारे संशयों एवं विरोधों का निराकरण किया गया है।
तृतीय अध्याय परमात्मा के साथ एकाकार होने के लिए अनुपालनीय प्रविधि पर प्रकाश डालता है।
चतुर्थ फलाध्याय, प्राप्य फलों, उसके उपायों और प्रत्येक के परिणाम पर हमारा ध्यान आकर्षित करता है।
संक्षेप में, चारों अध्याय परमात्मा के दिव्य कल्याण गुणों की स्तुति करते हैं। मान्यता है कि इस ग्रन्थ का ‘श्रीभाष्यम्’ नामकरण स्वयं सरस्वती देवी ने किया था।
4. वेदांत दीपम्
वेद परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करते हैं। वेदान्त वेदों का सार है। प्रस्तुत ग्रन्थ ‘श्रीभाष्यम’ का संक्षिप्त रूप है और सारगर्भित है।
इसमें चार अध्याय हैं। प्रथम ‘समानाध्याय’ है। यह हमें बताता है कि समस्त उपनिषद् ब्रह्म को सृष्टिकर्ता मानते हैं।
द्वितीय अध्याय ‘अविरोधाध्याय’ है। यह अध्याय सिद्ध करता है कि ब्रह्म को विश्व के सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार करने में वेदों अथवा अन्य सम्बद्ध ग्रन्थों में कोई विरोध नहीं है। तृतीय ‘साधनाध्याय, में मोक्ष-प्राप्ति हेतु परमात्मा की पूजा-आराधना संबंधी बातें हैं। चतुर्थ फलाध्याय, फल अथवा मोक्ष की प्रकृति और उसके दूसरे पहलुओं के बारे में चर्चा करता है।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य का मानना था कि जैसे वर्ष की प्रत्येक ऋतु में गोलाकार रूप में उत्पाद होते हैं वैसे ही समस्त युगों और कल्पों आदि में पूर्व की तरह ही उन्हीं सारी वस्तुओं की सृष्टि की जाती है। वेद जिस प्रकार पहले अविनाशी रहे और जिस प्रकार उनका अध्ययन एवं वेद-घोष होते थे वैसे ही आज भी हैं। वेद इसी प्रकार सदैव स्वयं परमात्मा की भांति अमर रहेंगे।
5. गीता भाष्यम्
भगवद्गीता पर रामानुजाचार्य की टीका ‘गीता भाष्यम्’ है। गीता महाभारत ग्रंथ का ही अंग है। प्रस्तुत ग्रन्थ में रामानुजाचार्य सिद्ध करते हैं कि परमात्मा की जानकारी के लिए सर्वप्रथम उस पर सम्पूर्ण विश्वास करना चाहिए। विश्वास के समानार्थी हैं भक्ति, उपासना, श्रद्धा, निष्ठा आदि।
भगवद्-प्रेम, प्रकृति-प्रेम भक्ति है। भक्ति-मार्ग में प्रगति-क्रम इस प्रकार है- कर्मयोग ज्ञानयोग का मार्गदर्शन करता है तथा अपनी आत्मानुभूति द्वारा ज्ञानयोग भक्तियोग का मार्ग खोलता है। भक्तियोग जीवन के अंतिम उद्देश्य का तत्काल मार्ग है।
गीता भाष्यम् में रामानुज का कथन है कि भक्तियोग के प्रारम्भ की बाधाएं भगवान के पद्मपादों की शरण द्वारा दूर की जा सकती है। ऐसी अड़चनों से बचने के लिए कठिन प्रायश्चितों की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रभु के दिव्य चरण-कमलों में शरणागति अथवा प्रपत्ति के बिना कोई भी जीव कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। प्रस्तुत ग्रन्थ देवत्व के प्रति प्रगति करने और मानवता के लिए विश्वसनीय मार्गदर्शिका है।
6. गद्यत्रयम्
गद्यत्रयम् में तीन ग्रंथ हैं जो शरणागति अथवा प्रपत्ति के गद्यगीत हैं। ये हैं- शरणागति गद्यम्, श्री रंगगद्यम् और श्रीवैकुण्ठगद्यम्। ये तीनों ग्रंथ समग्र रूप से गद्यत्रयम् कहलाते हैं। वैष्णवों द्वारा इन ग्रंथों का नित्य पाठ किया जाता है।
‘शरणागति गद्यम्’ में प्रथमचूर्णिका के प्रथम वाक्य में ही रामानुज सर्वप्रथम श्री अथवा महालक्ष्मी की शरण में जाते हुए उनसे प्रार्थना करते हैं कि उन्हें प्रपत्ति प्रदान करें- शरणमह प्रपद्ये। श्रियःपति अर्थात् भगवान विष्णु महालक्ष्मी की अनुशंसा से ही जीवात्मा के महापापों को क्षमा करते हैं और उनके द्वारा संस्तुत जीवात्मा को अपनी शरण देते हैं।
शरणागति अथवा प्रपत्ति सिद्धांत श्री वैष्णवम् की रीढ़ की हड्डी है, सबसे महत्वपूर्ण विषय है। ‘शरणागति गद्यम्’ और ‘श्रीरंगगद्यम्’ दोनों प्रथम पुरुष, एकवचन में रचित हैं और अपने उच्चतम उद्देश्य ‘शरणागति’ प्राप्त करने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है। मान्यता है कि रामानुज द्वारा अपने शिष्यों को प्रदान किया गया अनुदेश ‘वैकुण्ठ गद्यम्’ के रूप में है जो मनुष्य की मुक्ति के लिए एकमात्र उपाय के रूप में प्रपत्ति का उचित ढंग से निष्पादन करता है।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य ने ‘श्रीरंगगद्यम्’ में प्रपत्ति के लिए विशिष्ट रूप से अपेक्षित योग्यताओं की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत ग्रंथ में पाँच चूर्णिकाएँ और दो श्लोक हैं।
‘शरणागति गद्यम्’ और ‘श्रीरंगगद्यम्’ दोनों कृतियों की रचना करने के लिए रामानुज को भगवान महाविष्णु के विशेष अनुग्रह एवं परम कृपा के रूप में परमपद श्रीवैकुण्ठ के प्रत्यक्ष दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
‘वैकुण्ठ गद्यम्’ मुक्त जीवात्मा के चक्षुओं द्वारा श्रीवैकुण्ठ का आँखों देखा दिव्य वर्णन है जो दिव्याद्भुत विशेषणों से बिल्कुल ओतप्रोत है और पाठक एवं श्रोता दोनों को निश्चित रूप से मंत्रमुग्ध कर देता है।
प्रस्तुत ग्रंथ का मुख्य संदेश यह है कि भगवान श्रीमन्नारायण के चरणकमलों में की जानेवाली शरणागति, नारायणसायुज्यम का फल, परिणाम श्रीमन्नारायण के समीप होने और उनके चरण-कमलों में लीन होने का सौभाग्य प्रदान करेगी। अर्थात् ईश्वर की शरणागति ग्रहण करने से ही आत्मा को सालोक्यम्, सारूप्यम्, शुद्ध स्तवं एवं सामीप्यम् आदि मोक्षों की प्राप्ति संभव हैं।
वैकुण्ठ गद्यम्’ में अनन्त, गरुड़, विश्वक्सेन, द्वारपालक जैसे नित्यसूरियों द्वारा निष्पादित दिव्य कैंकर्यों, भगवान की दिव्य सेवाओं की सुदंरतम रीति से प्रशंसा की गयी है। इस ग्रंथ में प्रतीक्षित मुक्ति के लिए प्राप्त होनेवाली असीम और अपार निधि की संक्षिप्त झाँकी अद्भुत ढंग से चित्रित की गई है।
नित्य ग्रन्थम्
‘नित्यग्रन्थम्’ वैष्णव भक्तों को नित्य कर्मानुष्ठान के बारे में पथ-प्रर्दशन करने के लिए रामानुज द्वारा रचित एक संक्षिप्त विधान है। रामानुजाचार्य का निर्देश है कि वैष्णव को प्रतिदिन, वेदों, स्मृतियों और पुराणों में निर्धारित धार्मिक कार्यों को नियमित रूप से करना चाहिए। प्रस्तुत ग्रंथ में रामानुजाचार्य से पूर्व के आचार्यों यथा नाथमुनि, यामुनाचार्य आदि की पम्परा से अग्रसर और अनुपालनीय भगवत् आराधना क्रम की सुस्पष्ट व्याख्या की गई है।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य के लौकिक कार्य
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य ने भक्तिग्रंथों के प्रणयन के साथ-साथ लौकिक कार्य भी किए। उन्होंने देवालय के भीतर और बाह्य भव्य निर्माण के लिए जनसाधारण का समर्थन व सहयोग प्राप्त किया। उन्होंने प्रत्येक कार्य के लिए पृथक-पृथक समिति गठित की और समाज के समस्त समुदायों को साथ लेकर कार्य करवाए।
वे प्रत्येक व्यक्ति के साथ मिलजुल कर रहते थे। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह पंडित हो या अनपढ़, गंवार हो या नागरी, बूढ़ा हो या बालक, स्त्री हो या पुरुष, ब्राह्मण हो या चाण्डाल, कभी भी उनसे आराम से मिल सकता था।
रामानुज की मान्यता थी कि प्रत्येक मानव बराबर है। मानवों में कोई भी उच्च या नीच नहीं है। इसलिए रामानुज ने गांव के निम्न समझे जाने वाले लोगों का ‘तिरुकुलत्तार’ नामकरण किया तथा उन्हें मेलकोट्टे के विष्णु भगवान के मंदिर के अंदर ले जाकर मूल स्वयंम्भू विष्णु भगवान श्रीचेंलप्पिळळ के दर्शन कराये। आज से एक हजार साल पहले के समय में यह एक बड़ी सामाजिक क्राँति थी।
विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य चाहते थे कि मुसलमान भी विष्णुभक्ति करें। इसलिए उन्होंने श्रीरंगम के भगवान श्रीरंगनाथ के साथ एक मुस्लिम कन्या का विवाह करवाया। इस मंदिर में शोभायमान सुलतानी, नामक तुलुक्क नाच्चियार की सन्निधि भी रामानुज सम्प्रदाय के सार रूपी भागवत् समधर्म एवं समता दृष्टि का ज्वलन्त दृष्टान्त है।
रामानुज ने कर्नाटक राज्य के तिरुनारायणपुरम् में भी दिल्ली के किसी नवाब की पुत्री का विवाह चेंल्लप्पिळळ अर्थात् भगवान विष्णु के साथ कराया तथा उसे बीबी नाच्चियार नाम दिया।
एक बार दिल्ली के किसी मुसलमान आक्रांता नवाब ने भगवान चेंल्लप्पिळलै अर्थात् भगवान विष्णु का विग्रह उठा लिया और उसे अपनी पुत्री की कमर में बांध दिया। इस पर रामानुज ने गांव के हरिजनों को बुलवाया तथा उनसे कहा कि वे भगवान के विग्रह को पुनः प्राप्त कर लें। रामानुज के इतना कहते ही चेंल्लप्पिळलै का विग्रह स्वतः ही नवाब की बेटी की कमर से नीचे उतरकर रामानुजाचार्य के पास चला आया। रामानुज ने इस विग्रह को मेलक्कोट्टै के मंदिर में पुनः प्रतिष्ठित करवाया।
एक बार किसी निम्न समझी जानी वाली जाति के विल्लिदासन ने एक वेश्या से विवाह कर लिया। उसकी जाति के लोगों ने विल्लिदासन का बहुत विरोध किया। इस पर रामानुज ने उन दोनों को श्रीरंगम मठ में रख लिया। इस पर ब्राह्मण समुदाय ने रामानुज का कठोर विरोध किया परन्तु रामानुज ने उनके विरोध की परवाह नहीं की।
रामानुज के गुरु आचार्य गोष्ठिपूर्ण के पास एक परम रहस्यमय महामंत्र अष्टाक्षर था। आचार्य गोष्ठिपूर्ण ने वह मंत्र रामानुज को दिया। रामानुज ने आसपास के गाँवों के लोगों को बुलाया तथा स्वयं मंदिर के गोपुर के ऊपर खड़े होकर लोगों को परम रहस्य महामंत्र अष्टाक्षर सुना दिया। रामानुज की मान्यता थी कि ईशभक्ति का कोई भी मंत्र कुछ विशेष लोगों के लिए नहीं है, सबके लिए है। इस कार्य में उन्होंने अपने गुरु के शाप की भी परवाह नहीं की।
जब गुरु ने कहा कि इस कार्य के लिए तू नर्क में जाएगा। इस पर रामानुज अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया कि अष्टाक्षर महामंत्र के रहस्य को सार्वजनिक कर देने से जब सैकड़ों लोग स्वर्ग जाएँगे और एक ही व्यक्ति मैं, नरक जाऊँगा तो मैं नरक जाने के लिए तैयार हूँ।
उस काल में मैसूर राज्य अकालग्रस्त रहता था। इसलिए रामानुज ने तोण्डनूर में ढाई मील लम्बी और एक मील चौड़ी मोती झील का निर्माण करवाया। इस झील से आज भी हजारों एकड़ भूमि की सिंचाई होती है।
इस प्रकार तुलसी की गुरुपरम्परा के महान् संत विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य का हिन्दू जाति पर बड़ा उपकार है। उन जैसे महान् आचार्यों के कारण ही आज हिन्दू समाज भगवान् विष्णु की भक्ति जैसी महान परम्पराओं को जीवित रखे हुए है।
वैष्णव संत रामानंद का जन्म ईस्वी 1299 में हुआ। उनके अवतरण से पहले हिन्दू धर्म में याज्ञिक कर्मकाण्ड के वैभवपूर्ण आयोजन होते थे। कर्मकाण्ड की जटिलताके कारण उस काल में वैदिक धर्म जनसामान्य की पहुँच से दूर होता जा रहा था। एक समय ऐसा भी आया जब वैदिक धर्म केवल राजाओं, पुरोहितों और श्रेष्ठियों के लिये सुलभ रह गया।
इस प्रवृत्ति के विरोध में वैष्णव संत रामानंद से बहुत पहले, ईसा पूर्व छठी शताब्दी मेंगौतम बुद्धने शून्यवाद का प्रतिपादन किया। दार्शनिक पक्ष की सरलता के कारण गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित धर्म सर्वसाधारण के लिये सुलभ हो गया। इस कारण गौतम बुद्ध के सिद्धांतों पर आधारित धर्म शीघ्र ही लोकप्रिय होकर जनमानस में गहरी पैठ बनाने में सफल हो गया तथा प्रजा वैदिक धर्म से दूर होने लगी।
लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक बौद्धधर्म भारत भूमि तथा उससे बाहर दूर-दूर तक फैलकर अत्यंत मजबूत हो गया। बौद्धधर्म से महायान, हीनयान, मंत्रयान, वज्रयान एवं तंत्रयान प्रकट हुए जिनसे भारत भूमि पर अनेकानेक वाममार्गी संप्रदायों का बोलबाला हो गया।
बौद्ध धर्म की तरह हिन्दू धर्म के दो प्रमुख पंथ शैवमत तथा शाक्तमतभी वाममार्गियों की चपेट में आकर अपना प्राचीन स्वरूप खो बैठे तथा इन दोनों ही पंथों में पंच मकारों अर्थात् मांस, मदिरा, मैथुन, मीन तथा मुद्रा जैसी विकृत क्रियाओं का प्रचलन हो गया। जैन धर्म जिसका स्वरूप महावीर स्वामी द्वारा बताए गए सरल सिद्धांतों पर निर्धारित हुआ था, उसकी भी कुछ शाखाएं तंत्रमार्गियों की चपेट में आ गई।
तंत्र साधकशवों पर साधना करते थे, शमशान में निवास करते थे, चिताओं से शव खींचकर खाते थे। स्त्रियों की देह भोगकर अपने चक्रों को जगाने का प्रयास करते थे। बहुत से भोले-भाले गृहस्थ भी इनसे प्रभावित होकर वैदिक धर्म की पूजा-पद्धति को भूलकर तंत्र-मंत्र के चक्करों में बर्बाद होने लगे।
राष्ट्र में फैले इस घनघोर अनाचार का प्रतिकार करने के लिये गुप्त शासकों (तीसरी शताब्दी से छठी शताब्दी ईस्वी) ने वैदिक धर्म के भीतर विकसित हो रहे विष्णुधर्म के उत्थान का बीड़ा उठाया। इस काल में भगवान विष्णु एवं उनके अवतारों के विविध स्वरूपों का अंकन विग्रहों एवं चित्रों में किया गया। यह युग भारतीय इतिहास में ‘स्वर्ण युग’ के नाम से जाना जाता है।
छठी शताब्दी मेंहूणों के हाथों गुप्तों का पराभव हो गया। हूणों ने संपूर्ण उत्तरी भारत में भगवान विष्णु की मूर्तियों को भारी क्षति पहुंचायी। उन्होंने बौद्ध मठों पर भी आक्रमण किया। हजारों मठ, स्तूप और मंदिर नष्ट कर दिये गये। गुप्तों के पराभव के कारण भागवत धर्म अथवा वैष्णव धर्म को राजकीय संरक्षण मिलना कम हो गया जिसके कारण बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने अपना प्रभाव बढ़ाया। उस समय देश के अधिकांश राजा या तो बौद्ध धर्म के अनुयायी थे या फिर जैन धर्म के।
इस समय तक भारत भूमि पर जितने भी बाह्य आक्रमण हुए थे उनसे राष्ट्र की राज्यशक्ति को तो हानि पहुंची थी किंतु उनके द्वारा राष्ट्र की जनता को अपना धर्म त्याग कर आक्रांताओं का धर्म अपनाने की बाध्यता उत्पन्न नहीं की गयी थी। आठवीं शताब्दी में देश की सीमाओं पर इस्लाम ने पहली दस्तक दी। अहिंसावादी दर्शन से प्रभावित राज्य शक्ति एवं सामान्य प्रजा इस चुनौती का सामना करने में समर्थ नहीं थी। ठीक इसी समय भारत भूमि पर आदिजगद्गुरु शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ। उन्होंने बौद्ध धर्म के ‘शून्यवाद’ की प्रतिक्रिया में ‘अद्वैतवाद’ का सिद्धांत दिया तथा वेदविहित याज्ञिक कर्मकाण्ड की पुनर्स्थापना की। कुमारिल भट्ट ने भी स्थान-स्थान पर बौद्धों से शास्त्रार्थ कर शून्यवाद को ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बौद्ध धर्म के शून्यवाद की प्रतिक्रिया नाथों के आविर्भाव के रूप में भी हुई। नाथों और सिद्धों ने यौगिक क्रियाओं के माध्यम से निर्गुण भक्ति का मार्ग पकड़ा और बौद्धों के शून्यवाद को अपने अंदर समाहित कर लिया। शून्यवाद के विरोध में उठ खड़ी होने वाली ये समस्त धारायें शैवधर्म के अंतर्गत उत्पन्न होने वाली, एक दूसरे से भिन्न एवं परिष्कृत शाखायें थीं।
शंकराचार्य के अद्वैत, कुमारिल भट्ट के शास्त्रार्थ, नाथों के योग तथा सिद्धों की उलटबांसियों ने बौद्धधर्म को तो रसातल में पहुँचा दिया किंतु शैवधर्म की ये शाखायें न तो दार्शनिक स्तर पर, न मनोवैज्ञानिक स्तर पर और न ही राजनीतिक स्तर पर इस्लाम से टक्कर लेने में समर्थ थीं। शाक्तधर्म जैनधर्म की भी दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं राजनीतिक स्तर पर यही स्थिति थी।
जिस समय इस्लाम भारत का द्वार खटखटा रहा था, उस समय दक्षिण भारत में 6ठी से 9वीं शताब्दी के बीच आलवार संतों का उदय हुआ। इन संतों की तीन सौ साल लम्बी एक सुदीर्घ परम्परा में 12 संद हुए। ये सभी तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि एवं सन्त थे। इस प्रकार वैष्णव संत रामानंद से बहुत पहले, अलावार संतों ने हिन्दू धर्म का पुनरुद्धार किया।
आलवार संतों के पदों का संग्रह ‘दिव्य प्रबन्ध’ कहलाता है जिसे दक्षिण भारत में ‘वेदों’ के तुल्य माना जाता है। आलवार सन्त ही वस्तुतः भक्ति आन्दोलन के जन्मदाता माने जाते हैं। ये लोग भगवान विष्णु या नारायण की उपासना करते थे।
बाहर आलवार संत-कवियों के नाम इस प्रकार हैं- (1) पोय्गै आलवार, (2) भूतत्तालवार, (3) पेयालवार, (4) तिरुमालिसै आलवार, (5) नम्मालवार, (6) मधुरकवि आलवार, (7) कुलशेखरालवार, (8) पेरियालवार, (9) आण्डाल, (10) तोण्डरडिप्पोड़ियालवार, (11) तिरुप्पाणालवार तथा (12) तिरुमंगैयालवार।
आलवार संतों ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को भगवान की भक्ति करने का समान अधिकार है। इस बारह संतों में से कुछ निम्न कही जाने वाली जातियों में उत्पन्न हुए थे। ये लोग पूरे तमिल प्रदेश में पदयात्रा करके भगवान विष्णु की भक्ति का प्रचार करते थे। इनके भावपूर्ण लगभग 4000 गीत ‘मालायिर दिव्य प्रबन्ध’ नामक ग्रंथ में संग्रहित हैं। यह ग्रंथ भक्ति तथा ज्ञान का अद्भुत कोश है।
इस प्रकार जिस समय इस्लाम भारत भूमि पर चढ़कर आया, ठीक उसी समय दक्षिण भारत में भगवान ने आलवार संतों के रूप में विष्णुभक्तों के ऐसे शक्तिपुंज का बीजारोपण कर दिया जो आगे चलकर इस्लाम का सामना करने वाली थी किंतु विष्णुभक्ति की इस धारा को दक्षिण से चलकर उत्तर भारत में पहुंचने में कुछ समय की आवश्यकता थी।
जब मुस्लिम आक्रांता हिन्दुकुश पर्वत को रौंदते हुए और पंजाब को कुचलते हुए गंगा-यमुना के मैदानों में घुसने लगे तब उनका सामना करने के लिये चार क्षत्रियवंश सामने आये। इन्हें प्रतिहार, परमार, चाहमान तथा चौलुक्य के नाम से जाना गया। इन चारों राज्यवंशों ने आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक मुस्लिम आक्रमणकारियों का सामना किया एवं उन्हें भारतभूमि में राज्य स्थापित नहीं करने दिया।
दुर्भाग्य से इन चारों शक्तियों ने बाह्य आक्रमणों के विरुद्ध अपनी शक्ति लगाने के साथ-साथ आपस में भी एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति रखी। इस कारण ये तीन सौ वर्ष की अवधि में ये चारों शक्तियां इस्लाम के हाथों बुरी तरह पराजित हुईं।
ई.1001 मंे महमूद गजनवी ने पंजाब के राजा जयपाल को परास्त कर बुरी तरह अपमानित किया। अपमानित जयपाल जीवति ही अग्नि में प्रवेश कर गया। इस घटना से भारतवर्ष की आत्मा कांप उठी। ई.1008 में जयपाल के पुत्र आनंदपाल ने दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, कालिंजर तथा ग्वालिअर आदि राजाओं से सहायता प्राप्त कर महमूद गजनवी का मार्ग रोका किंतु भारतीय राजाओं का यह समूह मुस्लिम आक्रांता के हाथों बुरी तरह पराजित हुआ।
ई.1018 में महमूद गजनवी ने मथुरा को तोड़ा। अगले ही वर्ष गजनवी फिर लौट कर आया। इस बार उसने कन्नौज के दस हजार मंदिरों को तोड़ा। ई.1025 तक वह लगातार आक्रमण करता रहा।
ई. 1175 से भारत भूमि पर मुहम्मद गौरी के आक्रमण आरंभ हुए। उसने भारत पर सत्रह आक्रमण किये। हर बार वह बड़ी संख्या में भारतीय स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को पकड़ कर ले गया। हर बार उसने भारत में भयानक मारकाट मचायी। हर बार उसने लाखों गायों की हत्या की।
ई.1193 में मुहम्मद गौरी ने दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान की हत्या कर दी जिससे भारत भूमि पर मुस्लिम शासन स्थापित हो गया। इससे राष्ट्र की आंतरिक परिस्थितियों में पूरी तरह बदलाव आ गया। राष्ट्र को अब बाहर से आने वाले आक्रांताओं से सामना नहीं करना था। अपितु आक्रांता ही अब देश के शासक थे।
मुहम्मद गौरी की सेनाओं ने राष्ट्र के आत्म-गौरव एवं देवालयों को भारी क्षति पहुंचायी। बड़ी संख्या में लोगों को बलपूर्वक इस्लाम ग्रहण करने के लिये बाध्य किया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये, लाखों स्त्रियों का सतीत्व नष्ट किया, देवप्रतिमाओं का खण्डन किया, धर्म ग्रंथों को नष्ट किया तथा तीर्थ स्थान अपवित्र कर दिये।
मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके उनमें मस्जिदें बना दीं। लाखों लोग पराधीन और असहाय स्थिति में अपना धर्म त्यागने को विवश हो गये। संपूर्ण राष्ट्र में हाहाकार मच गया। हिन्दू धर्म विनाश के कगार पर आ खड़ा हुआ।
जब राज्य शक्ति राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा करने में असमर्थ रही तो जन सामान्य ने आध्यात्मिक शक्ति का सहारा ढूंढा। अतः राष्ट्र को एक ऐसे धर्म की आवश्यकता अनुभव हुई जो जागतिक स्तर पर स्वधर्म में बने रहने के लिये आवश्यक मनोबल प्रदान कर सके, मनोवैज्ञानिक स्तर पर संकट के समय अपनी तथा अपने परिजनों की रक्षा के लिये ईश्वरीय सहायता का भरोसा प्रदान कर सके तथा पारलौकिक स्तर पर आत्म कल्याण का विश्वास उपलब्ध करवा सके।
ऐसे कठिन समय में वैष्णव आचार्यों द्वारा जनसामान्य को ईश्वर के सगुण साकर स्वरूप की भक्ति की ओर प्रेरित किया गया। इस हेतु रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद की, माध्वाचार्य ने द्वैतवाद की, निम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैतवाद की और महाप्रभु वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैतवाद की प्रतिष्ठापना की। इन मतों की स्थापना आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवाद के सिद्धांत की प्रतिक्रिया के रूप में की गयी किंतु अब वे मत इस्लाम से लड़ने के प्रमुख हथियार बन गए थे।
शंकराचार्य के मायावाद और रहस्यवाद को काटकर सहज सुलभ भक्ति मार्ग का प्रतिपादन करने के लिये रामानुजाचार्य ने श्री संप्रदाय की स्थापना की। चौदहवीं शताब्दी में इस संप्रदाय के प्रधान आचार्य राघवानंद हुए, उन्होंने वैष्णव संत रामानंद को श्री संप्रदाय का प्रमुख बनाया। रामानंद ने बैकुण्ठवासी विष्णु के स्थान पर पृथ्वीलोक पर लीला करने वाले राम को अपना इष्ट बनाया। तुलसी इस परंपरा के सबसे बड़े उत्तराधिकारी सिद्ध हुए।
माध्वाचार्य ने विष्णु-भक्ति का, निम्बार्काचार्य ने राधा और श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। वल्लभाचार्य ने बालश्रीकृष्ण की उपासना पर बल दिया और पुष्टि मार्ग का प्रवर्तन किया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जन्म ईसा की चौदहवीं शताब्दी में वैष्णव संत रामानंद के जन्म से पहले भारत भूमि पर मुस्लिम आक्रांता शासन कर रहे थे जो हिन्दुओं को इस्लाम में लाने के लिए भयानक अत्याचार कर रहे थे। उनका सामना करने के लिए न केवल राजनीतिक स्तर पर अपितु अध्यात्मिक स्तर पर भी हलचल तेज थी।
रामानंद की समन्वयवादी परम्परा के बारे में पढ़ने से पहले हमें उनकी गुरुपरम्परा के आचार्य रामानुज एवं राघवानंदाचार्य के बारे में संक्षेप में जानना चाहिए।
रामानुजाचार्य
श्रीरामानुजाचार्य का प्राकट्य वि.सं. 1074 (ई.1017) में दक्षिण भारत में हुआ। उन्होंने श्री वैष्णव संप्रदाय के विशिष्टाद्वैत मत की स्थापना की। वे भगवान् संकर्षण के अवतार माने जाते हैं। उनका संप्रदाय श्री संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें विष्णु या नारायण की उपासना पर बल दिया गया। इस संप्रदाय में अनके अच्छे-अच्छे संत और महात्मा होते रहे।
राघवानंदाचार्य
रामानुजाचार्य की शिष्य परंपरा में विक्रम की चौदहवीं शताब्दी में श्री संप्रदाय के प्रधान आचार्य राघवानंद हुए। राघवानंद, रामानंद को दीक्षा देकर निश्चिंत हुए।
रामानंदाचार्य
रामानंद श्री संप्रदाय के प्रमुख वैष्णव आचार्य हुए। भारत के मध्यकालीन इतिहास में रामानंद ऐसे अद्भुत संत हैं जो अपने समन्वयवादी दृष्टिकोण से समाज एवं राष्ट्र को नवीन दिशा देने में समर्थ हुए हैं। रामानंद ने देशव्यापी पर्यटन द्वारा अपने संप्रदाय का प्रचार किया। इनके दो ग्रंथ मिलते हैं- वैष्णव मताब्ज भास्कर तथा रामार्चन पद्धति।
रामानुज के शिष्य होते हुए भी रामानंद ने अपनी उपासना पद्धति का विशिष्ट रूप रखा। इन्होंने उपासना के लिये बैकुंठ निवासी विष्णु का रूप न लेकर लोक में लीला करने वाले विष्णु के अवतार राम का आश्रय लिया। इनके इष्टदेव राम हुए तथा मूलमंत्र हुआ राम नाम।
रामानंद का जीवनकाल
रामानंदाचार्य के जीवनकाल का सही निर्धारण अब तक नहीं किया जा सका है। हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने रामानंद का काल 12वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध का माना है। दूसरी ओर उनके शिष्यों में कबीर, रैदास और नरहरि के नाम लिये जाते हैं। शिष्यों की नामावली को यदि सही माना जाये तो रामानंद का 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में होना सही नहीं है।
यदि रामानंद 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए तो कबीर, रैदास और नरहरि रामानंद की शिष्य परंपरा में तो हो सकते हैं किंतु रामानंद के स्वयं के शिष्य नहीं हो सकते। क्योंकि कबीर का समय वि.सं. 1455 (ई. 1398) माना जाता है। जबकि यह सर्वविदित मान्यता है कि रामानंद कबीर के गुरु थे और दोनों संत समकालीन थे।
इसी प्रकार यदि नरहरि रामानंद के शिष्यथे तो भी रामानंद का जीवन 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में नहीं हो सकता। नरहरि गोस्वामी तुलसीदास के गुरु थे। तुलसीदास ने सं. 1631 (ई. 1574) में रामचरित मानसका लेखन आरंभ किया था तथा संवत् 1680 (ई. 1623) में शरीर का त्याग किया था। इस काल निर्धारण के आधार पर नरहरि रामानंद और तुलसीदास दोनों के समकालीन उसी अवस्था में हो सकते हैं जब रामानंद का जीवन काल 15वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य माना जाये।
इसी प्रकार रामानंद के अन्य शिष्य रैदास भी मीरां के गुरु माने जाते हैं। मीरां अकबर की समकालीन थीं इस प्रकार यह काल भी सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के लगभग आता है।
गीताप्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ के संतवाणी अंक में रामानंदाचार्य के आविर्भाव का समय वि.सं. 1324 (ई.1267) और अन्तर्धान होने का समय वि.सं. 1515 (ई. 1458) विनिर्दिष्ट किया गया है। इस काल गणना के अनुसार रामानंद की आयु 191 वर्ष बैठती है जो कि उचित प्रतीत नहीं होती। अतः विभिन्न साक्ष्यों का विवेचन करने के बाद निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि रामानंद 15वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य विद्यमान थे।
रामानंद की समन्वयवादी परम्परा
रामानंद ने उत्तरी भारत में रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैत सिद्धांत का जोरों से प्रचार किया। उन्होंने विष्णु के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों की उपासना पर बल दिया। उनकी शिष्य परम्परा में राजा और रंक, ब्राह्मण और चर्मकार, सगुणवादी और निर्गुणवादी तथा स्त्री और पुरुष सभी प्रकार के व्यक्ति थे। ईश्वर की कृपा के अधिकारी होने के सम्बन्ध में रामानंद स्वयं कहते हैं-
अपेक्ष्यते तत्र कुलं बलं च नो न चापि कालो न हि शुद्धता च।
– वैष्णवमताब्जभास्कर 99
अर्थात्- भगवान के चरणों में अटूट अनुराग रखने वाले सभी लोग चाहे वे समर्थ हों या असमर्थ, भगवत् शरणागति के नित्य अधिकारी हैं। भगवत् शरणागति के लिये न तो श्रेष्ठ कुल की आवश्यकता है, न किसी प्रकार की शुद्धि ही अपेक्षित है। सब समय और शुचि-अशुचि सभी अवस्थाओं में जीव उनकी शरण ग्रहण कर सकता है।
दानं तपस्तीर्थनिषेवणं जपो न चात्स्यहिंसासदृशं सुपुण्यम्।
अर्थात्- दान, तप, तीर्थसेवन एवं मंत्रजाप, सभी उत्तम हैं किंतु इनमें से कोई भी अहिंसा के समान पुण्यदायक नहीं है। अतः सर्वश्रेष्ठ वैष्णव धर्म का पालन करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह अपने सुदृढ़ धर्म की वृद्धि के लिये सब प्रकार की हिंसा का परित्याग कर दे।
भक्तापचार मासोढुं दयालुरपि स प्रभुः।
न शक्तस्तेन युष्माभिः कर्त्तव्यो न च स क्कचित्।
– श्री रामानंद दिग्विजय 12/5
अर्थात्- यद्यपि प्रभु दयालु हैं, तथापि अपने भक्तों की अवहेलना को नहीं सह सकते। अतः तुम लोग कभी भी प्रभु के भक्त का अपराध न करना।
यद्यपि रामानंदाचार्य ने राम को ही अपना इष्टदेव घोषित किया किंतु उन्होंने श्री हरि नारायण विष्णु के बैकुण्ठवासी स्वरूप की भी स्तुति की तथा उनके लौकिक अवतार दशरथनंदन श्रीराम के साथ साथ देवकीनंदन श्रीकृष्ण की भी स्तुति करने में पूरा उत्साह दिखाया है। रामानंद की समन्वयवादी परम्परा आगे चलकर उनकी शिष्य परम्परा में भी पूरे वेग से दिखायी पड़ती है।
वैष्णव संत रामानंद तथा रामानंद के शिष्य पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में भारतीय जनमानस का अध्यात्मिक नेतृत्व करने के लिए विशेष भूमिका निभाने में सफल रहे। इस आलेख में रामानंद तथा उनके शिष्यों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत पर मुगलों का शासन था और मुसलमानों ने राष्ट्र के हर अंग पर शिकंजा कस लिया था। हिन्दुओं को अपने धर्म पर टिके रहना कठिन हो रहा था और वे निराशा के सागर में गोते लगा रहे थे। सनातन धर्म की ऐसी दुरावस्था देखकर वैष्णव संतों ने हिन्दू समाज को भक्ति का मार्ग दिखाने का अद्भुत कार्य किया। इस काल में श्रीसम्पद्राय में रामानंद नामक आचार्य हुए जिन्होंने शिष्यों की एक अद्भुत मण्डली तैयार की।
रामानंद के शिष्य – हिन्दू धर्म की सभी जातियों में
रामानंद के शिष्य विभिन्न जातियों के, विभिन्न आयु वर्ग के तथा विभिन्न रुचियों वाले अर्थात् सगुणोपासक एवं निगुणोपासक संत थे। रामानंद की शिष्य मण्डली के सदस्य विलक्षण प्रतिभा वाले, उच्च कोटि के संत एवं सच्चे समाज सुधारक हुए। उन्होंने देश में भक्ति की ऐसी सरिता बहाई कि जनसाधारण को ईश्-भक्ति के रूप में अपनी मुक्ति का मार्ग दिखाई देने लगा और हिन्दू समाज निराशा के पंक से बाहर निकलने में सफल रहा।
संत शिरोमणि रामानंद के शिष्य वास्तव संख्या कितनी थी, इसके सम्बन्ध में कोई निश्चित मत स्थापति नहीं किया जा सकता। सहज अनुमान किया जा सकता है कि इस युग प्रवर्तक विभूति के शिष्यों की संख्या अत्यधिक रही होगी। भारत भ्रमण के समय में स्थान-स्थान पर लोग उनके व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मानने लगे होंगे। फिर भी उनके 12 प्रमुख शिष्यों का उल्लेख कई स्रोतों से मिलता है। इन शिष्यों के बारे में एक दोहा भी कहा जाता है-
अनतानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि।
पीपा, भगवानन्द, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि।
इन नामों को इस प्रकार से पढ़ा जा सकता है- अनंतानंद, कबीर, सुखानंद, सुरसुरानंद, पद्मावति, नरहरि, पीपा, भावानंद, रैदास, धन्ना, सेना तथा सुरसुरानंद की धर्मपत्नी।
रामानंदाचार्य तथा उनके शिष्यों का एक चित्र अनेक पुस्तकों में प्रकाशित होता रहा है जिसमें मध्य स्थान में एक चौकी पर रामानंदाचार्य विराजमान हैं तथा उनके दोनों तरफ अर्द्धगोलाकार क्रम में उनके शिष्य सुशोभित हैं। सभी शिष्यों के तिलक एवं छापे एक समान हैं। प्रायः कबीर एवं तुलसी के चित्रों में इस प्रकार के तिलक एवं छापे मिलते हैं। यह चित्र विश्वसनीय नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें सभी बारह शिष्य पुरुष हैं, जबकि रामानंदाचार्य के 12 प्रमुख शिष्यों में दो चित्र स्त्री शिष्यों के होने चाहिये।
यदि शिष्यों की इस नामावली को ध्यान से देखा जाये तो इनमें से कबीर जुलाहे थे तथा कपड़ा बुनकर जीवन यापन करते थे। रैदास चर्मकार थे तथा जूतियां गांठकर जीवन यापन करते थे। पीपा राजा थे तथा गागरोन दुर्ग के स्वामी थे। नरहरिदास काशी की कुलीन परम्परा के सुंस्कृत ब्राह्मण थे। सुरसुरानंद की पत्नी तथा पदमावती भी रामानंद की शिष्य मण्डली में थी। अर्थात् रामानंद की शिष्यमण्डली में पुरुष एवं स्त्री दोनों को स्थान मिला।
रामानंदाचार्य के शिष्यों में से कबीर, पीपा तथा रैदास कवि थे। इन्हें मध्ययुगीन भक्तिकाल में संतकवि की प्रतिष्ठा प्राप्त है। कवि होने के कारण इन संतों की महिमा काल व लोक की सीमाओं को पार करके दूर दूर तक प्रकाशित हुई।
जिस संत के शिष्यों में राजा एवं काशी के पण्डित से लेकर जुलाहे और चर्मकार तक अर्थात् समाज के सभी वर्गों के लोग हों, सगुणोपासक से लेकर निगुणोपासक हों, स्त्री एवं पुरुष हों, उस संत की समन्वयवादी प्रवृत्ति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
गुरु के विशाल व्यक्तित्व की छाप
रामानंदाचार्य के शिष्यों में से कबीर, नरहरि, पीपा तथा रैदास युगप्रवर्तक संत सिद्ध हुए जिन्होंने भारतीय मनीषा को झकझोर कर रख दिया। रामानंद के शिष्यों पर गुरु के विशाल व्यक्तित्व की कितनी गहरी छाप रही होगी, इसका अनुमान इन शिष्यों द्वारा लिखे हुए पदों से लगाया जा सकता है। कबीर ने लिखा है-
गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपके गोबिंद दियो बताय।
नरहरि स्वयं कवि नहीं थे। उन्होंने रामानंद से जो पाया था वह सब ब्याज सहित तुलसीदासजी को प्रदान कर दिया। इसलिये नरहरि की वाणी तुलसी के रूप में प्रकट हुई मानी जा सकती है। तुलसी ने अपने गुरु नरहरि के लिये लिखा है-
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।
तुलसी के काव्य में अभिव्यक्त प्रगाढ़ गुरु-भक्ति, वस्तुतः संत नरहरि की अपने गुरु रामानंद के प्रति समर्पित गुरु-भक्ति की अभिव्यक्ति ही है। संत रैदास ने अपने गुरु की वंदना में लिखा है-
साधो सतगुरु सब जग चेला। अबकै बिछुरे मिलन दुहेला।
रामानंद के शिष्य अध्यात्म की दो शाखाओं पर अग्रसर हुए। इनमें से कबीर तो निर्गुणियों के तारणहार हो गये और नरहरि सगुणोपासकों की एकमात्र आशा। एक ही गुरु से ज्ञान पाकर उनके शिष्य इतने अंतर पर जा खड़े हुए और उन्होंने अपने-अपने मार्ग से संसार को जगाने का काम किया, यह एक आश्चर्य के ही समान है। सगुणोपासकों और निर्गुणोपासकों के भारी दार्शनिक अंतर के उपरांत भी रामानंद के शिष्य एक दूसरे के काफी निकट खड़े हैं।
एक ओर तो निर्गुणिया कबीर अचानक सगुणोपासकों के आराध्य दशरथ नंदन को ही ईश्वर स्वीकार करते हुए कह उठते हैं-
दशरथ सुत तिहुं लोक समाना। राम नाम का मरम है आना।
तो दूसरी ओर सगुणोपासना की ध्वजा उठाने वाले तुलसी अचानक निर्गुणियों की वाणी बोलने लग जाते हैं-
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।
नाभादास कृत भक्तमाल में रामानंदाचार्य के इन अद्वितीय शिष्यों का संक्षिप्त वर्णन मिलता है।
रामानंद के प्रमुख शिष्य
अनंतानंद
रामानंद संप्रदाय के ग्रंथों में इनका नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। इन्हें भी अपने गुरु के ही समान जगद्गुरु कहकर संबोधित किया गया है। नाभादास ने भक्तमाल में लिखा है-
अनंतानंद पद परिस कै लोकपाल से ते भए।
अर्थात्- अनंतानंद के शिष्य अपने गुरु के चरणों का स्पर्श करके लोकपालों के समान शक्तिशाली हो गये। अनंतानंद के बचपन का नाम छन्नूलाल था। वे ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए थे। अनंतानंद ने ‘श्रीहरि भक्ति सिंधु वेला’ नामक ग्रंथ की रचना की।
भक्तमाल के अनुसार अनंतानंद के एक शिष्य का नाम नरहरि था। अब यह निर्धारित करना कठिन है कि ये वही नरहरि हैं जो रामानंदाचार्य के शिष्यों में गिने जाते हैं। अथवा कोई भिन्न व्यक्ति हैं। अनुमान यही होता है कि रामानंदाचार्य के शिष्य नरहरि तथा अनंतानंद के शिष्य नरहरि, एक ही व्यक्ति हैं क्योंकि काल गणना के अनुसार भी यही अधिक उपयुक्त सिद्ध होता है।
यदि नरहरि अनंतानंद के शिष्य थे फिर भी वे रामानंदाचार्य के प्रमुख शिष्यों में स्थान पा गये हैं तो भी कुछ अतिश्योक्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि शिष्य का शिष्य होने से नरहरि रामानंदाचार्य के भी शिष्य कहे जा सकते हैं।
श्री रामानंदाचार्य के साकेतवासी होने पर अनंतानंद को ही वैष्णवाचार्य के पीठ पर अभिषिक्त किया गया था किंतु गुरु विरह को सहन नहीं कर पाने के कारण एक वर्ष बाद ही वे अपने वरिष्ठ शिष्य कृष्णदासजी को आचार्य पीठ पर अभिषिक्त करके स्वयं स्वच्छंद परिभ्रमण के लिये निकल पड़े। मान्यता है कि उन्होंने 113 वर्ष की आयु में साकेत गमन किया।
संत कबीर
कबीर का प्राकट्य काल विवादास्पद है और उनका कुल गोत्र आदि भी अज्ञात है। मान्यता है कि कबीर का जन्म विक्रम संवत 1455 में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को सोमवार के दिन हुआ। यह भी मान्यता है कि कबीर ब्राह्मण कुलोत्पन्न थे तथा किसी कुमारी के पुत्र होने के कारण माता द्वारा लोकलाज के भय से मार्ग में छोड़ दिये गये थे जहाँ से नीरु-नीमा नामक दम्पत्ति उन्हें अपने घर ले आया और अपने पुत्र की ही तरह इनका लालन पालन किया। यही बालक इतिहास में संत कबीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनकी विधिवत् शिक्षा दीक्षा नहीं हुई थी किंतु इन पर माता सरस्वती की विशेष कृपा रही। ये गृहस्थ संत थे तथा इनके एक पुत्र एवं एक पुत्री भी थी। कबीर का निधन मगहर में वि.सं. 1549 में हुआ। इस मान्यता के अनुसार उनकी आयु 94 वर्ष हुई।
कबीर निर्गुणवादी थे किंतु अपने गुरु रामानंद के प्रभाव के कारण उन्होंने भगवान के सगुण उपाधियों वाले नामों का भी प्रयोग किया है। कबीर ने सिद्धों और नाथों की रहस्यमयी वाणी को जनोपयोगी वाणी में ढाल दिया। वाम मार्ग का निराकरण करके वैष्णव मत का प्रतिपादन करने में उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। एक स्थान पर वे कहते हैं-
साखत बामन मत मिलो, वैष्णो मिलो चण्डाल।
अंक माल दे भेंटिए मानो मिले गोपाल।
रामानंद द्वारा हिंसा के विरोध में मुखर किया गया स्वर कबीर की वाणी में इस प्रकार दिखायी देता है-
बकरी पाती खात है तिनकी काढ़ी खाल।
जे नर बकरी खात हैं तिनका कौन हवाल।
सुखानंद
ये उज्जैन के ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम त्रिपुरारि भट्ट तथा माता का नाम जाम्बुवती था। इनके बचपन का नाम चंद्रहरि था। नाभादास ने भक्तमाल में इनके बारे में लिखा है-
भक्तिदास भए हरण भुज सुखानंद पारस परस।
सुख सागर की छाप राग गौरी रुचि न्यारी।
पद रचना गुरु मंत्र मनो आगम अनुहारी।
हरि गुरु कथा अपार भाल राजत लीला भर।
भक्तिदास भए हरण भुज सुखानंद पारस परस।
सुरसुरानंद
इनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. सुरेश्वर शर्मा तथा माता का नाम सरला था। इनका जन्म वैशाख कृष्ण नवमी गुरुवार को वसंत ऋतु में हुआ था। जन्म का संवत ज्ञात नहीं है। इन्हें नारद मुनि का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि सरयू के तट पर इन्हें भगवान श्रीराम ने दर्शन दिये। नाभादास ने भक्तमाल में इनका परिचय दिया है।
संत नरहरि
संत नरहरि को शिष्य के रूप में प्राप्त करना, रामानंद की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। नरहरि को रामानंदाचार्य से जो विराट व्यक्तित्व प्राप्त हुआ उसका संपूर्ण उपयोग तुलसीदास जैसे युगप्रवर्तक शिष्य को तैयार करने में हुआ। नरहरि सूकरखेत के रहने वाले थे। उनके जीवन चरित के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं होती है किंतु गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में नरहरि को बारम्बार स्मरण किया है और अगाध श्रद्धा के साथ नमन किया है।
इन्हें नरहर्यानंद भी कहा जाता है। इनका जन्म वृंदावन में हुआ। इनके जन्म की तिथि वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की तृतीया मानी जाती है। इनका जन्म संवत ज्ञात नहीं है। आप रामचरित मानस के रचियता तुलसीदास के गुरु थे। नाभादास ने भक्तमाल में लिखा है-
नपट नरहर्यानंद को कर दाता दुर्गा भई
घर पर लकड़ी नहिं शक्ति को सदन उजारैं।
शक्ति भक्त सो बोलि दिनहिं प्रति बरही डारैं।
लगी परोसनि हबस भवानी भय सो मारैं।
बदले की बेगारि मूडि वाके शिर डारैं
भगत प्रसंग ज्यों कालिका लडू देखि तन में तई
निपट नरहर्यानंद को कर दाता दुर्गा भई।
वस्तुतः रामानंद का विशाल दृष्टिकोण तुलसीदास की लेखनी के माध्यम से पूरे ठाठ-बाट के साथ प्रकट हुआ। लोककल्याण का जो चरम भाव तुलसी की लेखनी में प्रकट हुआ उसका वर्णन शब्दातीत है। वे लिखते हैं-
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।
अर्थात्- जो व्यक्ति सब के हित का साधन करता है उसे भला कैसे दुख हो सकता है ठीक उसी प्रकार जैसे पारस मणि के होने पर कोई निर्धन नहीं रह सकता। कहने का आशय यह कि तुलसी ने परहित को पारस मणि के समान परिणाम देने वाला माना है।
रामानंद का समन्वयवादी दृष्टिकोण तुलसी की लेखनी में अपने चरम को प्राप्त कर गया है जब तुलसी, शिव और राम को एक दूसरे का स्वामी, एक दूसरे का सेवक और एक दूसरे का सखा घोषित करते हुए कहते हैं-
‘सेवक स्वामि सखा सिय पिय के।’
इसी प्रकार रामचरित मानस के बालकाण्ड में शिव, पार्वती से कहते हैं-
जो नहिं करहिं राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।
कुलिस कठोर निठुर सोई छाती। सुनि हरि चरित न जो हरषाती।
दूसरी ओर रामचरित मानस के लंकाकाण्ड में राम, अपने मंत्रियों से कहते हैं-
सिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।
उत्तरकाण्ड में तो तुलसी के राम, अपने भक्तों को शिवभक्ति की प्रेरणा देने के लिये हाथ जोड़ते हुए दिखायी देते हैं-
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहऊँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।
यह सब रामानंद की अद्भुत समन्वयवादी दृष्टि का ही प्रसाद है जो तुलसीदास, वैष्णव और शैव संप्रदायों में समन्वय स्थापित करने के लिये शिव और राम को एक दूसरे का आराध्य बताते हैं। यद्यपि शिव, विष्णु का ऐक्य कोई सर्वथा नवीन कल्पना नहीं थी तथापि बीज रूप से चले आ रहे इस दर्शन को रामानंद ने अध्यात्मिक जल से सींच कर प्रस्फुटित किया।
तुलसी ने शाक्तों को भी वैष्णव धर्म के निकट लाने के लिये पार्वती की स्तुति के माध्यम से नवीन भक्तिरस की वर्षा की। बालकाण्ड में वे जनकनंदिनी सीता के मुख से पार्वती की स्तुति इन शब्दों में करवाते हैं-
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ वेद नहिं जाना।
भव भव विभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बर दायिनी पुरारि पिआरी।
संत पीपा
राजस्थान में कालीसिंध नदी के तट पर स्थितगागरौण राज्य के खींची चौहान शासक जैतसिंह की तीसरी पीढ़ी के वंशज थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1417 में चैत्री पूर्णिमा के दिन हुआ। अपने पिता की मृत्यु के बाद वे गागरौण के शासक हुए।
वैष्णव संत रामानंद की कृपादृष्टि प्राप्त होने पर पीपा ने अपने भाई अचलदास खींची को गागरोन का राजपाट देकर रामानंदाचार्य का शिष्यत्व ग्रहण किया। जब वे राजपाट त्याग कर गुरु की सेवा में पहुँचे तो गुरु ने कहा कि कुएँ में गिर जाओ। पीपा उसी समय कुंए की ओर चल पड़े। पीपा को देह आसक्ति से मुक्त हुआ जानकर रामानंदाचार्य ने उन्हें अपनी शरण में ले लिया। संत पीपा की सहधर्मिणी भी रानी से सन्यासिन बन गयी तथा जीवन भर इन्हीं के साथ रही।
रामानंद ने हिंसा को सबसे बड़ा पाप और हर हालत में त्याज्य बताया। संत पीपा का यह अकेला दोहा ही न केवल पीपा के अपितु रामानंद के व्यक्तित्व को प्रकट करने में समर्थ है-
जीव मारे जमर करे खाता करे बखान। पीपा यूं प्रत्यक्ष कहे, थाली में धके मसान।
अर्थात्- जो लोग जीवहत्या करते हैं और मांस का भक्षण करते समय उसके स्वाद का गुणगान करते हैं, पीपा को उनकी थाली में शमशान धधकता हुआ दिखाई देता है।
संत पीपा के नीति परक दोहे आज भी पूरे राजस्थान में बड़े चाव से कहे सुने जाते हैं। उन्होंने सदाचार तथा शाकाहार पर बहुत जोर दिया। उनके अनुयायी आज भी स्वयं को पीपा क्षत्रिय कहते हैं। संत पीपा के दोहों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
दारू में दुर्वट बड़ी, कुत्ता पिये न काग।
जो कोई दारू पिये, तिनका बड़ा कुभाग।।
X X X
पीपा पाप न कीजिये अलगौ रइजै आप।
करणी जासी आपरी कुण बेटो कुण बाप।।
भावानंद
भावानंद को राजा जनक का पुनर्जन्म माना जाता है। इनका जन्म मिथिला क्षेत्र में बहुवर्ह नामक गाँव में मिश्र ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके बचपन का नाम विट्ठल पंत था। कहा जाता है कि रामानंदाचार्य की गुफा के बाहर पहुँच कर प्रणाम करते ही इन्हें भगवत्कृपा प्राप्त हो गयी। वे उसी समय वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित होकर रामानंदाचार्य के शिष्य हो गये।
रैदास
इन्हें धर्मराज का अवतार माना जाता है। इनका पहला जन्म विदुर के रूप में तथा दूसरा जन्म वाराणसी में एक ब्राह्मण कुल में हुआ। तीसरे जन्म में ये रैदास के रूप में प्रकट हुए । इनका जन्म वि.सं. 1465 में तथा साकेत गमन वि.सं. 1584 में हुआ। ये मीरां के गुरु भी कहे जाते हैं। यद्यपि इस बात पर मतभेद अधिक है। ये अपने युग की महान विभूतियों में से एक हुए हैं। इनका यह पद बहुत प्रसिद्ध है-
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा॥
धन्ना
इनका पूरा नाम धन्ना जाट था। ये एक कृषक परिवार में पन्ना जाट के घर में पैदा हुए। इनकी माता का नाम रेवा था। इनका जन्म वैशाख मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में हुआ। एक बार एक ब्राह्मण इनके घर में ठहरा। उसे पूजापाठ करते हुए देखकर ये भी धर्म-कर्म की ओर प्रवृत्त हुए। ये रामानंदाचार्य की शरण ग्रहण करने के लिये काशी आये तथा उनसे वैष्णव मत में दीक्षा ग्रहण की।
सेन
इनका जन्म बांधवगढ़ के निवासी उग्रसेन नापति के घर में हुआ। इनकी माता का नाम यशोदा था। ये वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को रविवार के दिन पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में पैदा हुए। जन्म का संवत प्राप्त नहीं होता है। नाभादास ने भक्तमाल में इनका परिचय दिया है। कहा जाता है कि भीष्म पिता को कलियुग में सेन के रूप में मृत्युलोक में आना पड़ा।
महिला शिष्य
रामानंद की दो महिला भक्तों पद्मावती एवं सुरसुरानंद की धर्मपत्नी के जीवन चरित्र के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त नहीं होती है।
रामानंद के शिष्यों पर व्यंग्योक्ति अलंकार
रामानंदाचार्य के शिष्यों की जातियों की ओर संकेत करते हुए किसी अज्ञात कवि ने व्यंग्य पूर्वक लिखा है-
जाट जुलाह जुरे दरजी, मरजी में रहै रैदास चमारौ
ऐते बड़े करुणा निधि को इन पाजिन ने दरबार बिगारौ।
ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हीं भक्तों की ओर संकेत करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने ब्रह्माजी के मुख से पार्वतीजी की स्तुति के बहाने से कहा है-
जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निसानी।
तिन रंकन कौ नाक संवारत हौं आयौ नकबानी।
अर्थात्- जिन दरिद्रों के भाग्य में मैंने सुख का कोई संकेत अंकित नहीं किया, उनके द्वारा की गई भोलेनाथ की भक्ति के कारण उन दरिद्रों के लिये स्वर्ग संवारते-संवारते मेरी नाक में दम आ गया है।
वस्तुतः रामानंद न केवल वैष्णव संप्रदायों में समन्वयवादी दृष्टिकोण उत्पन्न करने वाले संत थे अपितु अपने शिष्यों में उन्होंने शैव, शाक्त और वैष्णव संप्रदायों को भी निकट लाने की दृष्टि प्रदान की। उन्होंने हिंसा का जो प्रबल विरोध किया वह भारतीय जनमानस में गहराई तक पैठ गया। आज पूरे विश्व में भारत को अहिंसा का पुजारी कहकर सराहा जाता है, इसके पीछे रामानंदाचार्य और उनके शिष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत के मध्यकालीन इतिहास में घटित हुए भक्ति आंदोलन में दशरथनंदन राम का प्रबलता से प्रतिष्ठित होना भी रामानंद की ही देन मानी जा सकती है। रामानंद के शिष्य नरहरिदास के अकेले शिष्य तुलसीदास ही बैकुण्ठवासी विष्णु के लौकिक अवतार के रूप में राम को भारतीय मनीषा में जो स्थान दिला गए, वैसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।
वस्तुतः शंकराचार्य के बाद इतनी विशाल और व्यापक दृष्टि को लेकर आने वाले आचार्य रामानंद ही थे। उनके योगदान का वास्तविक मूल्यांकन किये जाने के लिये व्यापक शोध की आवश्यकता है।
गोस्वामी तुलसीदासका काव्य सामाजिक चेतना के जिन स्वरों को पाठकों के समक्ष रखता है, वे स्वर वेदों से आने वाली स्तुतियों, उपनिषदों से आने वाले दर्शनों एवं पुराणों से आने वाली भक्तिकथाओं से तो प्रेरित हैं ही, उनमें तत्कालीन समय की झलक भी पर्याप्त मात्रा में देखने को मिलती है। तुलसी अपने समय को पहचानते हैं तथा उसे भविष्य के भारत से अलग करते हैं।
निःसंदेह गोस्वामी तुलसीदास का काव्य युगांतरकारी है। राष्ट्रीय पीड़ा को स्वर देने में इतना सक्षम और सशक्त साहित्य और कोई कवि आज तक नहीं रच सका। काव्य-पण्डितों की दृष्टि में तुलसीदास भक्तकवि थे, वे दास्यभाव के भक्त थे, वे समाज को भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले युग-पुरुष थे परंतु यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो गोस्वामी तुलसीदास भक्तकवि होने के साथ-साथ और भी बहुत कुछ थे।
यदि यह कहा जाए कि तुलसीदास हिन्दू धर्म के पुनरुद्धारक थे, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यदि यह कहा जाए कि तुलसीदास अपने समय के निर्माता थे तो इसमें भी कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। यदि यह कहा जाए कि तुलसीदास भविष्य के भारत के निर्माता थे, तो उसमें भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
यह बहुत ही दुःख की बात है कि कम्युनिस्टों से प्रभावित भारतीय इतिहासकार सोलहवीं सदी को मुगल बादशाह अकबर की सदी मानते हैं। यही कारण है कि मैंने कई अवसरों पर इस बात को स्पष्ट किया है कि सोलहवीं सदी गोस्वामी तुलसीदास की थी न कि अकबर की!
अब तक उपलब्ध ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्रोतोंके आधार पर यह मान्यता स्थापित की गई है कि रामचरित मानस के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1554 (ई.1497) में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ तथा उनका निधन संवत 1680 (ई.1623) में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ। अर्थात् उनकी जन्मतिथि एवं पुण्यतिथि एक ही थी। इन तिथियों से तुलसीदासजी की आयु 126 वर्ष बैठती है। संभव है कि उन्हें इतना लम्बा जीवन न मिला हो किंतु उन्होंने लम्बी आयु पाई, इसमें कोई संदेह नहीं है।
तुलसीदासजी के जन्म के समय तक ईरान एवं अफगानिस्तान से आए तुर्क मुसलमानों को हिन्दुकुश पर्वत से लेकर बंगाल की खाड़ी के बीच में स्थित उत्तर भारत के मैदानों पर शासन करते हुए तीन सौ साल का समय बीत चुका था। विदेशी भूमियों से आए मुसलमान आक्रांता भारत के नर-नारियों को मुसलमान बनाने के लिए उस काल में तरह-तरह के अत्याचार करते थे।
जो हिन्दू भयभीत होकर मुसलमान बन जाते, वे तो अपने परिवार को सुरक्षित बचा लेते थे जबकि अपनी टेक पर दृढ़ रहने वाले हिन्दुओं को उस काल में अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। उनके दुःखों का पार न था। आक्रांता सैनिक हिन्दुओं की स्त्रियों को बलपूर्वक छीन लेते, उनके घरों को जला देते, बच्चों को जीवित ही आग में फैंक देते। उनकी झौंपड़ियों मेें रखे अनाज, कपड़ों एवं बरतनों को लूट लेते। खेतों में खड़ी फसलों को आग के हवाले कर देते।
आक्रांता सैनिक यहीं नहीं रुकते थे। वे हिन्दुओं के तीर्थों को गाय के मांस एवं रक्त से दूषित कर देते, मंदिरों में मांस फैंक देते, मंदिरों को तोड़कर उन पर मस्जिद बना देते तथा ऐसा हर कार्य करते थे जिससे हिन्दू जाति निराश होकर मुसलमान बन जाए। बहुत से दुष्ट-हृदय आक्रांता तो हिंदुओं के मुंह में पान की पीक थूकते तथा उनके मुंह में पेशाब करते थे।
जिस समय गोस्वामी तुलसीदास लगभग 30 साल के हुए, उस समय भारत में युगांतकारी सत्ता परिवर्तन हुआ तथा ईरानी एवं अफगानी मुसलमानों की जगह समरकंद से आए मंगोलों ने भारत पर अधिकार कर लिया जो भारत में आकर मुगल कहलाने लगे। ये मूलतः चीनी थे तथा इनमें भी तुर्कों का रक्तमिश्रण हुआ था फिर भी ‘मुगल’ अपने पूर्ववर्ती ‘तुर्क मुसलमानों’ की अपेक्षा कुछ उदार थे।
इसका कारण संभवतः यह था कि जब मंगोल मुसलमान नहीं बने थे, तब उन्होंने अरब से आने वाले तुर्क मुसलमानों से भारी लोहा लिया था। तुर्कों एवं मंगोलों ने एक दूसरे पर भारी अत्याचार किए थे। यहाँ तक कि मंगोलों ने तुर्क मुसलमानों के खलीफा को दरी में लपेट कर लातों से मारते हुए उसके प्राण लिए थे।
सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगलों ने भारत पर अधिकार तो कर लिया किंतु उनके हाथों परास्त हुए अफगानी एवं ईरानी मुसलमानों की सेनाओं के लाखों सैनिक मुगलों एवं मुगल अमीरों की सेनाओं में भरती हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू प्रजा पर विगत तीन शताब्दियों से चला आ रहा अत्याचार इस काल में भी पूर्ववत् जारी रहा।
हिन्दू देवालयों एवं पवित्र स्थानों को ध्वस्त किये जाने का क्रम, गोस्वामी तुलसीदास के जीवनकाल में भी अनवरत चल रहा था। तुलसीदासजी ने ये दृश्य अपनी आंखों से देखे थे। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास का काव्य अपने समय का आंखों देखा इतिहास बताता है। अपने काव्यग्रंथ कवितावली में गोस्वामीजी ने अपने काल के मुस्लिम शासकों के बारे में लिखा है कि इस कठिन समय में शासक बड़े दयाहीन हैं, राजवर्ग बड़ा ही धोखेबाज है-
कालु कराल, नृपाल कृपाल न, राज समाज बड़ो ही छली है।
तत्कालीन समाज का चित्रण करते हुये, गोस्वामीजी ने लिखा है- किसान के पास खेत नहीं है, भिखारी को भीख नहीं मिल रही है, व्यापारियों के पास व्यापार नहीं है। जीविका नहीं मिलने के कारण लोग दुःखी हो रहे हैं-
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि
बनिक को न बनिज न चाकर को चाकरी
जीविका विहीन लो सीद्यमान सोच बस
कहै एक एकन सौं, कहाँ जाय का करी।
गोस्वामी तुलसीदास का काव्य हमें बताता है कि तुलसी अपने समय की राजसत्ता के हिन्दू-विरोधी तथा दमनकारी रूप से बहुत व्यथित थे। उन्होंने अनुभव किया कि पूरा हिन्दू समाज ही नैराश्य के सागर में गोते लगा रहा है और हर प्रकार से कुण्ठित एवं पददलित है। तुलसीदासजी ने भारतीय समाज को निराशा और कुंठा से मुक्त करने के उद्देश्य से त्रेतायुग में हुए विष्णुअवतार श्रीराम के उदात्त चरित्र को नए सिरे से हिन्दू समाज के समक्ष रखा।
तुलसी के राम अपने पूर्ववर्ती समस्त रामकथाओं के राम से पूरी तरह अलग हैं। तुलसी के राम भक्तवत्सल हैं, अंतर्यामी हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। इन सब गुणों से ऊपर, तुलसी के राम संकल्पबद्ध दुष्टहंता हैं। वे भुजा उठाकर दुष्टों के विनाश का प्रण करते हैं-
निशिचरहीन करहुं मही भुज उठाइ प्रन कीन्ह।
तुलसी बाबा ने हिन्दू प्रजा में मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध उठ खड़े होने योग्य साहस जुटाने का मंत्र फूंकने के लिए पतित-पावनी रामकथा का आश्रय लिया।
जब ई.1556 में 14 साल का अकबर भारत में मुगलों का तीसरा बादशाह हुआ, तब तुलसीदासजी की आयु 59 वर्ष रही होगी। गोस्वामीजी ने अपनी आयु का अंतिम भाग अकबर के शासनकाल में बिताया। इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि अकबर ने गोस्वामीजी को अपने दरबार में आने का निमंत्रण भिजवाया था। इस तथ्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने जीवनकाल में ही तुलसीदास कितनी लोकप्रियता प्राप्त कर चुके थे।
चूंकि तुलसी बाबा ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध अकबर के शासनकाल में बिताया था, इसलिए स्वाभाविक ही है कि गोस्वामी तुलसीदास का काव्य विशेषकर रामचरित मानस एवं कवितावली में आया सामाजिक दुर्दशा का वर्णन अकबर एवं उसके शासनकाल से सम्बद्ध रहा होगा। हमें उन भारतीय इतिहासकारों की बुरी नीयत को समझना चाहिए जो अकबर को महान बताते हैं। ऐसे इतिहासकारों में समस्त कम्युनिस्ट इतिहासकार एवं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हैं।
गुसाईं तुलसीदास ने तत्कालीन आक्रांता सैनिकों द्वारा हिन्दुओं पर किए जा रहे भीषण अत्याचारों का आरोपण रामचरित मानस में राक्षसों के कुकर्मों के रूप में किया। जब तुलसी बाबा निशाचरों, को परिभाषित करते हैं तब तो स्पष्ट लगता है मानो वे तत्कालीन शासकों एवं उनके सैनिकों की ही चर्चा कर रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास का काव्य इन्हीं वर्णनों से भरा पड़ा है।
तुलसीदासजी ने अपने समय के राजसमाज, को ‘बड़ो ही छली’ कहा है। विनयपत्रिका में भी तुलसीदास यही भाव दोहराते हैं- राज समाज अनेक कुचालों से भर गया है। वे नित नई कुचालें चल रहे हैं। स्पष्ट है कि तुलसीदासजी देख पा रहे थे कि अकबर किस प्रकार सुलहकुल, दीनेइलाही एवं मीना बाजार जैसी नीतियाँ अपना कर हिन्दू समाज को छल रहा था।
इस काल में अकबर तथा उसके शहजादे हिन्दू नारियों से विवाहकर रहे थे और हिन्दुओं को उच्च वेतन वाली नौकरियों पर रखकर उन्हें प्रलोभित कर रहे थे। ये सब बातें अकबर की ‘मधुमिश्रित कूटनीति’ अर्थात् ‘शुगरकोटेड डिप्लोमैसी’ के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। वह येन-केन प्रकरेण हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहता था।
बालकाण्ड में वर्णित रावण का चरित्र अकबर के चरित्र का ही निरूपण है। रावण के कुकर्मों तथा अकबर की नीतियों में अद्भुत समानता नजर आती है। रामचरित मानस में गोस्वामीजी ने लिखा है-
किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठ सबही के पंथहिं लागा।।
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।।
अर्थात्- रावण हठपूर्वक किन्नर, सिद्ध, मनुज, देव, नाग आदि के पीछे लग गया जिसके कारण ब्रह्माजी की सृष्टि के समस्त शरीरधारी नर-नारी रावण के अधीन हो गए।
राक्षसों के आचरण के कारण धरती के मानवों की बड़ी दुर्दशा हुई-
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।
गोस्वामी तुलसीदास के समय में मुगल सैनिक इन्हीं राक्षसों की तरह आचरण कर रहे थे। इन अत्याचारों से उत्पन्न कुंठा एवं निराशा से बाहर निकलने के लिए गुसाईं बाबा ने हिन्दुओं को भगवान विष्णु के राम अवतार की कथा सुनाई। ऐसे राम जिन्होंने धरती पर अवतार लेकर राक्षसों का संहार किया तथा समाज को उनके संत्रास से मुक्ति दिलवाई।
तुलसी बाबा की रामचरित मानस को पढ़कर समाज में उत्साह का नए सिरे से संचार हुआ। रामचरित मानस के अंत में तुलसीदासजी ने हिन्दू समाज को रामराज्य का मार्ग दिखाया। उत्तरकाण्ड में तुलसीदासजी ने रामराज्य का विशद वर्णन किया है। उन्होंने मानव समाज के समक्ष रामराज्य की ऐसी अभिनव अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें कोई भी व्यक्ति किसी से शत्रुता का भाव नहीं रखे, सब लोग प्रेमपूर्वक रहें तथा अपने-अपने धर्म का पालन करें-
बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।
रामराज्य की संकल्पना के माध्यम से गोस्वामीजी भारत की प्रजा को यह संदेश देने में सफल हुए कि यदि प्रजा रामजी के आदर्शों पर चले तो सम्पूर्ण धरती को सुखी बनाया जा सकता है। ऐसी धरती जिसमें न भय होगा न शोक और न रोग-
राम राज बैठे त्रैलोका, हर्षित भए गए सब सोका।
तुलसी बाबा ने विष्णु के अवतार श्रीराम का ऐसा लोकनायक स्वरूप चित्रित किया, जिस पर प्रजा विश्वास कर सके। प्रजा को अपना नायक, जननायक अथवा महानायक ढूंढने के लिए किसी राजा की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता न हो वह स्वयं अपने भीतर ही राम को पा सके। तुलसीदास के राम जन-जन के मन में लोकनायक बनकर युगों-युगों के लिए स्थापित हो गए। ऐसे महानायक को पूजने वाली प्रजा को अधिक समय तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता था।
तुलसी के राम इतने विलक्षण हैं कि वे एक ही समय में शस्त्र, शास्त्र, धर्म एवं नीति के पथ पर चलते हुए, अपने कर्म और आचरण के माध्यम से अपने पक्ष में लोकमत तैयार करते हैं। अपने लिए कुछ नहीं रखते, प्रजा के लिए ही सबकुछ अर्पित करते हैं।
गुसाईं तुलसीदास ने अपने जीवन काल में ही रामकथा को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास किया। उन्होंने सैंकड़ों गांवों में रामलीलाओं का मंचन करवाया। उनके प्रयासों से हिन्दू समाज का खोया हुआ आत्मबल और विश्वास लौट आया। हिन्दुओं ने अब बड़ी दृढ़ता से मुसलमान हो जाने से मना करना आरम्भ कर दिया। जब मुगल शासकों को प्रजा का सहयोग मिलना बंद हो गया और प्रजा के मन से शासकों का भय जाता रहा तो मुगल सत्ता ही मिट्टी की भीत की तरह भरभराने लगी।
समाज के विघटन का सबसे बड़ा कारण होता है वर्गभेद, जो जाति-पांति, छूत-अछूत तथा छोटे-बड़े के भाव में प्रकट होता है। तुलसीदासजी के समय में ये कुरीतियां अपने चरम पर पहुंच चुकी थीं। इसलिये उन्होंने वर्गभेद पर करारा प्रहार किया। तुलसी निश्चय ही वर्णाश्रम धर्म के समर्थक थे। लेकिन वे वर्णाश्रम व्यवस्था के तात्त्विक रूप के प्रतिपादक थे, विकृत रूप के नहीं। तुलसीदास वर्ण-आधारित भेदभाव के विरोधी थे।
उनका प्रयास शास्त्रीय मर्यादा तथा लोक व्यवहार में समन्वय स्थापित करने का था। जब राम वनगमन करते हैं तो वे निषादराज को अपना मित्र कहकर गले लगाते हैं। इसका प्रभाव सम्पूर्ण हिन्दू समाज पर पड़ता है। जब भरतजी अयोध्यावासियों को साथ लेकर चित्रकूट जाते हैं तो सामाजिक परम्परा के अनुसार निषादराज गुह महर्षि वसिष्ठ को दूर से ही दण्डप्रणाम करता है-
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू, कीन्ह दूरि तें दण्ड प्रनामू।
ब्राह्मण, पुरोहित, ऋषि, राजगुरु आदि इतने सारे उच्च सामाजिक आयामों पर प्रतिष्ठित वसिष्ठ मुनि निषादराज गुह को अपने शरीर से लगा लेते है-
रामसखा ऋषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
वस्तुतः सामाजिक जीवन में जब तक इस तरह का भाव उत्पन्न नहीं होगा, तब तक कोई भी राष्ट्र सुखपूर्वक मुस्कुरा नहीं सकता। इसलिए तुलसी बाबा ने अपना सम्पूर्ण साहित्य ऐसा ही समाज बनाने के लिए समर्पित कर दिया। कुछ क्षुद्र मानसिकता वाले राजनेता आजकल तुलसीदास को ब्राह्मणवादी और सामन्तवादी कहकर उनकी निंदा करते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि तुलसी के हृदय में दीन, दुखियों व दरिद्रों के प्रति जितनी वेदना थी, उतनी शायद ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले-
जेहि दीन पियारे वेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।
X X X
बन्दउ सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न।
तुलसी बाबा ने समाज की दरिद्रता को रावण कहा है-
दारिद दसानन दबाई दुनी, दीनबन्धु! दुरित दहन देखि तुलसी हाहाकरी।
तुलसीदास का यह हाहाकार वस्तुतः तुलसी के समय की ही अनुगूंज है। तुलसीदास अपने काल में हिन्दू धर्म में व्याप्त पाखण्डों से भी अत्यन्त व्यथित थे। वे देख रहे थे कि सर्वत्र असत्य और हिंसा का बोलबाला है। इसलिये तुलसी ने समाज के समक्ष एक बार पुनः उपनिषदों के इस मर्म को नई शब्दावली में प्रस्तुत किया-
परम धरम श्रुति विदित अहिंसा। परनिंदा सम अघ न गिरीसा।
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धरम न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।
वे तुलसी बाबा ही थे जिन्होंने सोलहवीं सदी के कठिन समय में हिन्दू समाज को एक करने के लिए बहुत ही सरल शब्दावली में समाज को बताया कि दूसरों की भलाई करने से अधिक बड़ा कोई धर्म नहीं है। वे जानते थे कि यदि प्रजा परोपकार की भावना के सूत्र से एक-दूसरे से जुड़ी रहेगी तो समाज बड़ी आसानी से शासक वर्ग के अत्याचारों का सामना कर सकेगा-
परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।
इस प्रकार हम देखते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास का काव्य तत्कालीन समय की झलक ही नहीं देता, उसका आंखों देखा इतिहास भी बताता है।
गोस्वामी तुलसीदासकी दृष्टि उनके साहित्य में निहित लोकहित पर टिकी हुई है। उनके साहित्य के सम्बन्ध में लोकदृष्टि पर जितनी अधिक बात हुई है, उतनी बात किसी और साहित्यकार की दृष्टि पर नहीं हुई। यह एक अद्भुत बात है कि जिसकी दृष्टि सबसे अधिक स्पष्ट है, उसी की दृष्टि पर सर्वाधिक बात हुई।
यद्यपि गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि के विभिन्न आयाम हैं तथापि मैं इस आलेख में उनके साहित्य में निहित दृष्टि के केवल एक आयाम की चर्चा कर रहा हूँ- तुलसी की दृष्टि में लौकिक दुखों का महत्व।
संत साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह इस जीवन को नश्वर बताकर मृत्यु के बाद मिलने वाले जीवन पर अधिक जोर देता है किंतु तुलसीदासजी की दृष्टि में मनुष्य का वर्तमान जीवन बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। पार्वतीजी की महिमा का बखान करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं-
भव भव विभव पराभव कारिणी, बिस्व बिमोहिनी स्वबस बिहारिणी।
अर्थात्- आपने इस संसार को संभव बनाया है, आपने ही वैभव दिया है और आप ही इस संसार का पराभव करने वाली हैं। इस उक्ति के माध्यम से गोस्वामीजी पार्वतीजी के साथ-साथ संसार की महत्ता को भी प्रकारांतर से स्थापित करते हैं। स्पष्ट है कि पार्वती जैसी महान शक्ति ने किसी अनुपयोगी चीज की रचना तो नहीं की होगी!
‘नहीं दरिद्र सम दुख जग माहीं’ अथवा ‘नारी कित सिरजी जग माहीं’ अथवा ‘नहीं दरिद्र कोउ दुखी न दीना’ जैसी पंक्तियां सांसारिक सुखों एवं दुखों की ही तो स्वीकार्यता है।
गोस्वामीजी जब भी बात करते हैं, दैहिक, दैविक और भौतिक दुखों की बात करते हैं। उनकी दृष्टि जितनी संसार से ऊपर के सुखों पर टिकी हुई है, उतनी ही संसार के भीतर स्थित दुखों पर भी टिकी हुई है-
दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहीं काहुहि व्यापा।
अल्प मृत्यु नहीं कवनिउ पीरा, सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।
गोस्वामीजी ने जीवन के कष्टों को बहुत लम्बे समय तक झेला था, इसलिए वे मनुष्य को पानी का बुलबुला और जगत् को मिथ्या नहीं बताते हैं। उनका आराध्य देव भी अन्य भक्त-कवियों के आराध्य देवों से भिन्न प्रकार का है-
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू, लोक लाह, परलोक निबाहू।
तुलसीदासजी को केवल परलोक के सुखों की चिंता नहीं है, उन्हें लोक लाभ पहले चाहिए और परलोक में निर्वाह बाद में। रामचरित मानस की उपयोगिता के बारे में वे कहते हैं-
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा, सेवत सादर समन कलेसा।
गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि का सौंदर्य इस तथ्य में निहित है कि वे भौतिक शोकों के नष्ट होने की बात करते हैं, किसी मोक्ष या मुक्ति का आश्वासन नहीं देते। क्योंकि उनकी दृष्टि में कष्टों से मुक्ति पा जाना, यहाँ तक कि पेट भर भोजन पा जाना भी अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष जैसी बड़ी उपलब्धियों से कम नहीं है-
बारे ते ललात द्वार-द्वार दीन जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को।
अर्थात्- उनकी इस चौपाई में यह बात प्रकारांतर से निहित है कि सुरसरि (गंगाजी) इसलिए अच्छी हैं क्योंकि वे इस जगत् का भला करती हैं।
वे राम नाम स्मरण की बात भी इसी कामना में करते हैं कि इसके गायन से भव सार पार कर लिया जाएगा-
गाई गाई भव सागर तरहिं।
राम नाम मनि दीप धरू जीह देहरीं द्वार,
तुलसी भीतर बाहरो जो चाहसि उजियार।
भायं कुभायं अनख आलसहूं। नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।
तुलसी या संसार में भांति-भांति के लोग,
सब से हिल-मिल चाहिए नदी नाव संयोग।
इस तरह का दृष्टिपरक चिंतन साहित्य में कब शामिल होता है? जब कवि या साहित्यकार सत्य का अनुभव केवल अपने चिंतन से नहीं अपितु अनुभव से करता है। वे हनुमान बाहुक में अपने शरीर की पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं-
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