Monday, May 20, 2024
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कूण्डापंथियों की रहस्यमयी साधना का साधन है नारीदेह !

कूण्डापंथियों की रहस्यमयी साधना वामाचारी तंत्र साधना का ही कोई अंग है। इन पंथों को ऊपरी तौर से देखने से पता नहीं चल पाता के ये शैव मत के नाथ पंथ में से निकले हैं या शाक्त मत में से।

भारत में हिन्दू धर्म के भीतर तीन प्रमुख सम्प्रदाय हैं- शैव, शाक्त एवं वैष्णव। शैव सम्प्रदाय के भीतर नाथ पंथ का उद्भव हुआ। कालांतर में नाथों की भी बहुत सी शाखाएं बन गईं। शैवों की तरह शाक्तों में भी नाथ संप्रदाय के कुछ सिद्धांतों को किसी न किसी रूप में अपनाकर लोक-उपासना के जो आयाम खुले, उनमें कूण्डापंथ, आई पंथ, गूदड़ पंथ, दस पंथ, अलखिया पंथ आदि साधना पद्धतियों का विकास हुआ।

कूण्डा पंथ की साधना का आधार शक्ति साधना ही है। आगे चलकर कुण्डा पंथियों ने अरावली की पहाड़ियों में कांचलिया पंथ की स्थापना की तथा इससे मिलते-जुलते पंथों में राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के क्षेत्रों में ऊंदरिया पंथ तथा चोली-पूजन नामक वाम पंथों की स्थापना हुई। इन सभी सम्प्रदायों में कुछ लक्षण नाथ पंथ के तो कुछ लक्षण शाक्त मत के दिखाई पड़ते हैं।

इन पंथों का तत्व दर्शन शाक्त मत से लिया गया है जिसमें नारी देह को मोक्ष प्राप्ति हेतु साधन माना गया है किंतु इसका साधना रूप भैरवी साधना जैसी शाक्त तांत्रिक परम्पराओं से काफी हटकर है।

भैरवी साधना की विभिन्न परम्पराओं में भैरव तथा भैरवी केवल दो ही साधक होते हैं जो किसी निर्जन स्थान पर तंत्र साधन एवं सिद्धि-लाभ करते हैं किंतु कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथा तथा चोली-पूजन पंथों में स्त्री एवं पुरुष साधकों द्वारा सामूहिक साधना की जाती है। बीसपंथियों में भी इसी प्रकार की परम्पराएं एवं क्रियाविधियां हैं।

जिस प्रकार भैरवी साधना में किसी गुरु का मार्ग दर्शन अनिवार्य है, उसी प्रकार कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथा तथा चोली-पूजन पंथों में भी किसी दक्ष गुरु का होना अनिवार्य है जो साधकों को आत्मानुशासन में रख सके तथा उनकी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर सके।

शाक्त मत के उपासकों के अनुसार भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव ‘हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि’ के रूप में ‘मनो-दैहिक’ रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।

हर्षोन्माद की स्थिति को प्राप्त करने के लिए ही शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था।

मद्य और माँस के साथ-साथ मीन (मछली), मुद्रा (विशेष क्रियाएँ), मैथुन (स्त्री संसर्ग) आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।

पाँच मकारों के द्वारा साधक की देह में अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था। कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोलकर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था। इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति करने का प्रावधान था।

 कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथा तथा चोली पूजन पंथों की साधना विधि में कुण्डलिनी जागरण की कोई अवधारणा नहीं है फिर भी साधक के लिए अपनी साधना को उच्चतम स्तर पर ले जाकर सिद्धि प्राप्त करने की अवधारणा मौजूद है।

यद्यपि कूण्डा पंथ का प्रणेता थार रेगिस्तान के प्रसिद्ध शासक रावल मल्लीनाथ को माना जाता है किंतु रावल मल्लीनाथ से पहले भी इस पंथ के सिद्धांत एवं साधना विधियां प्रचलित थीं। इस पंथ के साधकों में धारू मेघवाल, उगमसी भाटी एवं मल्लीनाथ की रानी रूपांदे भी मल्लीनाथ के समकालीन साधक हैं तथा ये लोग मिलकर ही मल्लीनाथ को इस पंथ में लेकर आए थे।

उगमसी भाटी ने रूपां के हाथ में तांबे की वेल पहनाकर उसे अपनी शिष्या बनाया। जब रूपांदे का विवाह महेवा के राजा मल्लीनाथ के साथ हो गया तब उगमसी भाटी महेवा में आए और उन्होंने जागरण का आयोजन किया। रूपांदे को भी उस जागरण में पहुंचने का निमंत्रण मिला किंतु महल के दरवाजे बंद होने से रूपांदे महल से बाहर नहीं निकल सकती थी।

निश्चित रूप से उस काल में भी कूण्डा पंथ की साधना पद्धति को शेष समाज द्वारा अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। अन्यथा रानी रूपांदे पर उस जागरण में जाने पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया होगा।

कूण्डा पंथ की कथाओं के अनुसार मल्लीनाथ के महल के दरवाजे रात्रि में चमत्कारिक रूप से खुल गए तथा रानी रूपांदे राजा मल्लीनाथ को बताए बिना ही जागरण में पहुंच गई। इस पर राजा मल्लीनाथ उसे मारने के लिए तलवार लेकर पहुंचा किंतु रूपांदे की थाली में रखा मांस का प्रसाद चमत्कारिक रूप से फूलों में बदल गया तो मल्लीनाथ भी उगमसी भाटी का शिष्य हो गया।

शिष्य बनाने से पहले राजा मल्लीनाथ को पीला कपड़ा लटकाकर गुरु उगमसी भाटी के सामने बैठाया गया, राजा की आंखें बांध दी गईं, कानों में कुण्डल पहनाए गए, सेली-सींगी धारण कराई गई, राणा रतनसी ने राजा के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उगमसी भाटी ने गुरुमंत्र देकर राव मल्लीनाथ को अपना शिष्य बनाया।

कानों में कुण्डल और सेली-सींगी धारण कराने से यह कहा जा सकता है कि नाथ पंथ में दी जाने वाली दीक्षा से इसकी बहुत समानता है। गुरु के प्रति अगाध निष्ठा और शिष्य के समर्पण भाव को भी नाथों की गुरुभक्ति के अथवा भक्तिमूल में देखना अधिक समीचीन होगा।

आगे चलकर राजा मल्लीनाथ ने कूण्डा पंथ को विधिवत् एक सम्प्रदाय का रूप दिया किंतु इसकी साधना विधियां बहुत गोपनीय रखी गईं। रेगिस्तानी क्षेत्रों में राजा मल्लीनाथ को चमत्कारी योगी एवं सिद्धपुरुष माना जाता है।

उगमसी भाटी, धारु मेघवाल तथा रानी रूपादे ने मिलकर उस काल में बड़े सत्संगों का आयोजन किया तथा रेगिस्तान में बसने वाली सैंकड़ो दलित जातियों को कूण्डा पंथ में सम्मिलित किया। मान्यता है कि रावल मल्लीनाथ, रानी रूपादे, धारूजी मेघवाल, धारू की बड़ी भाभी देवू, एलू, दलु कुम्हार तथा नामदेव छींपा नामक सात साधक एक ही साथ योगबल द्वारा अंतर्ध्यान हुए थे।

कूण्डा पंथ एक वाममार्गी पंथ है। इस पंथ की साधना विधि अत्यंत गोपनीय है तथा इस विधि को पंथ में दीक्षित साधक के अतिरिक्त और किसी को नहीं बताया जाता। अतः इस पंथ की साधना विधि विश्वसनीय ढंग से मानव समाज के सामने नहीं आ सकी हैं। कूण्डा पंथ की साधना विधि के बारे में जो भी अनुमान लगाए जाते हैं वे कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथ तथा चोली-पूजन पंथ की साधना विधियों पर आधारित हैं क्योंकि कांचलिया पंथ की स्थापना कूण्डा पंथ के साधकों ने की थी तथा ऊंदरिया पंथ एवं चोली पूजन पंथ की साधना पद्धतियां, कांचलिया पंथ से बहुत मिलती-जुलती है।

अतः यह निश्चित है कि कूंडा पंथ में भी आध्यात्मिक साधना की विचित्र प्रणाली का प्रावधान किया गया होगा। कूण्डा पंथ की मान्यता है कि यदि कोई कूण्डा पंथी साधक किसी अन्य गृहस्थ को कूण्डा पंथ में दीक्षित नहीं करता है तो मृत्यु के पश्चात उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती, वह भटकती रहती है।

इस साधना पद्धति में स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से समागम करते हैं। साधना स्थल पर बहुत से पुरुष साधक एवं बहुत सी स्त्री साधिकांए होती हैं। इस प्रक्रिया में एक साधक एक ही स्त्री साधक से समागम करता है। इस समागम के दौरान पति-पत्नी के सम्बन्ध का निर्वहन नहीं किया जाता किंतु समागम पूरी तरह मुक्त नहीं होता। इसके नियम होते हैं। कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथ तथा चोली-पूजन पंथ के नियम समाज के सामने आ चुके हैं किंतु कूण्डा पंथ के नियमों की जानकारी नहीं है।

फिर भी अनुमान किया जाता है कि किसी कूण्डे में साधिका स्त्रियों का कोई वस्त्र डाल दिया जाता होगा। गुरु द्वारा किसी पद्धति या नियम के तहत एक-एक पुरुष साधक को कूण्डे में से एक वस्त्र निकालने को कहा जाता होगा। जिस पुरुष के हाथ में जिस स्त्री का वस्त्र आता होगा, उसी साधिका के साथ उसे समागम करना होता होगा।

गुरु किस प्रक्रिया के तहत पुरुष साधक को बुलाता है, समागम के दौरान स्खलन के क्या नियम हैं, स्खलन से प्राप्त तरल का क्या किया जाता है, आदि नियम ज्ञात नहीं हैं।

 माना जाता है कि सिद्धों की मंडल क्रियाविधि अपनाने वाले साधक, कुंडा पंथी कहे गए। रेगिस्तानी प्रदेश में रहने वाले ये सिद्ध कौन थे? इस विषय पर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कूंडा पंथ के संस्थापकों में धारू मेघवाल नामक प्रसिद्ध व्यक्ति हुआ है। वह साध कहलाता था तथा कुंडापंथी स्वयं को साध कहते है किंतु हर किसी को अपने धर्म के बारे में नहीं बताते। मेघवाल, अपने पंथ को सिद्धों में से एक सिद्ध समझते है। इनमें कई सिद्ध हो चुके है।

रेगिस्तान के सिद्धों की मण्डल क्रियाविधि क्या थी, यह भी ज्ञात नहीं है। संभवतः वह कूण्डे में स्त्री-साधिकाओं के वस्त्र एकत्रित करके उन्हें साधकों में वितरित करने जैसी ही कोई क्रिया रही होगी जिसे मण्डल क्रियाविधि कहते होंगे।

भारत भूमि पर प्रचलित बहुत से वामपंथों में स्त्री समागम को साधना का आधार बनाया गया है। इसकी सार्थकता इस भावना में निहित है कि प्रजनन और ब्रह्माण्ड की असीमता अद्भुत हैं। इन्हें रोकने की कोई भी कोशिश सृष्टि के लिए विनाशकारी साबित होगी। यह समागम मृत शरीर के साथ भी हो सकता है। क्योंकि वामपंथों के अनुसार शव और जीवित शरीर में केवल आत्मा का भेद है और आत्मा को छोड़कर सब कुछ नश्वर है किंतु इस नश्वरता में भी सुंदरता है और आंगिक समागम उस सुंदरता का सजीव चित्रण माना जाता है।

अघोरपंथी, आदिनाथी, बीसनामी, कुंडापंथी तथा दसनामी सम्प्रदाय की साधना पद्धतियों में बहुत सी समानताएं होती हैं। ये सभी सम्प्रदाय अपनी साधना के दौरान होने वाले कीर्तनों में तंदूरा बजाते हैं। तेरहताली नृत्य में भी तंदूरा बजाया जाता है। वादक इसे बाएं हाथ से पकड़ता है तथा दाहिने हाथ की एक अंगुलि से बजाता हे। यह सितार की तरह दिखता है किंतु इसमें कुंडी तुम्बे की न होकर लकड़ी की होती है।

स्वामी नारायण द्वारा रचित पुस्तक ‘श्री हरिचरितअमृत सागर’ में कूण्डा पंथियों की निंदा करते हुए लिखा गया है-

कुंडा पंथी शक्ति उपासी, तिनके कबुं ने बैठत पासी।

प्रत्यक्ष हरि बिन वात हि सबही, तिनको अभाव कीने तबही।

लूनी नदी के किनारे तिलवाड़ा में कूण्डा पंथ के संस्थापक मल्लीनाथजी का मंदिर बना हुआ है जहाँ उनकी स्मृति में प्रविर्ष एक विशाल पशुमेला लगता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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