Tuesday, January 20, 2026
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अकबर का मजहबी चिन्तन (144)

अकबर का मजहबी चिन्तन (Akbar’s religious thought) जहाँ अकबर के भीतर अंसतोष को जन्म देता था वहीं दूसरी ओर सभी मजहबों के नेताओं को निराश करता था। अकबर का मजहबी चिन्तन न तो अकबर को मुसलमान रहने देता था और न किसी और मजहब को अपनाने देता था। इस कारण विभिन्न मुल्ला-मौलवी उसे इस्लाम का दुश्मन मानने लगे थे तो अन्य मजहबों के नेता उसे नास्तिक कहते थे।

अकबर ने अपने भीतर अध्यात्मिक शून्यता (Spiritual emptiness) का अनुभव करके ई.1575 में फतहपुर सीकरी के किले में एक इबादतखाने (Ibadatkhana) का निर्माण करवाया जिसमें अकबर का मजहबी चिन्तन कोई निश्चित आकार ले सके। इस इबादतखाने में विभिन्न धर्मों के विद्वानों को आमंत्रित किया जाता था। इबादतखाने में बहस करने के दौरान मुल्ला लोग अपने-अपने मत के प्रति इतने कट्टर हो जाते थे कि वे एक दूसरे की बात सुनने की बजाय एक-दूसरे पर अपनी बात थोपने का प्रयास करते थे और इसमें असफल रहने पर अकबर की उपस्थिति में ही एक दूसरे को मारने के लिए डण्डे उठा लेते थे। उनके इस आचरण के कारण अकबर उनसे उकता गया।

Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar - www.bharatkaitihas.com
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डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इबादतखाने से उदासीन होने के बाद भी अकबर का मजहबी चिन्तन समाप्त नहीं हुआ। वह निरंतर सत्य की खोज में लगा रहा। उसने विभिन्न धर्मों के विद्वानों तथा विशेषज्ञों को अपने महल में बुलवाकर उनके साथ सत्य की खोज के लिए धार्मिक चर्चाएं जारी रखीं। सुन्नी मत में दिलचस्पी समाप्त हो जाने के पश्चात अकबर (Akbar) शिया विद्वानों की ओर आकर्षित हुआ। गिलान के श्रेष्ठ विद्वान हकीम अबुल फतह ने अकबर को विशेष रूप से प्रभावित किया। एक अन्य शिया मुल्ला मोहम्मद याजदी बादशाह के अत्यंत निकट आ गया और उसने बादशाह को शिया बनाने का प्रयत्न किया किंतु अकबर को शिया मत में कोई शांति और समाधान प्राप्त नहीं हुआ और वह सूफियों की ओर आकर्षित हुआ। शेख फैजी (Shaikh Faizi) और बदख्शां (Badakhshan) के मिर्जा सुलेमान ने जो साहिबेहाल (Sahibe-Haal) अर्थात् अल्लाह-दृष्टा (One who is spiritually enlightened) समझे जाते थे, अकबर को सूफी मत के सिद्धांतों और क्रियाओं जैसे अल्लाह से साक्षात करने के रहस्य से परिचित करवाया। यद्यपि अकबर स्वभाव से ही रहस्यवादी था और और उसका दावा था कि कई बार उसे रहस्यात्मक अनुभूतियां हुई थीं किंतु सूफी मत अपने उद्देश्य के लिए उसे पर्याप्त और संतोषजनक प्रतीत नहीं होता था। इसलिए उसने अन्य धर्मों में समाधान ढूंढने की चेष्टा की।

ई.1578 में अकबर ने महयार्जी राना को आमन्त्रित कर पारसी धर्म के सिद्धान्तों को समझा और गोवा से दो ईसाई पादरियों को बुलाकर ईसाई धर्म के मूल तत्त्वों के जानने का प्रयत्न किया। अकबर इन विद्वानों से धार्मिक चर्चाओं के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं पर भी विचार-विमर्श किया करता था।  

डॉ. श्रीवास्तव ने लिखा है कि अकबर ने पुरुषोत्तम नामक हिन्दू विद्वान तथा देवी नामक हिन्दू विदुषी को अपने महल में आमंत्रित कर तथा हिन्दू साधुओं एवं योगियों से सम्पर्क स्थापित करके हिन्दू-धर्म का ज्ञान प्राप्त किया। बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि इन चर्चाओं से अकबर के ज्ञान-कोष में विपुल वृद्धि हो गई तथा उसका दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक, उदार और सहिष्णु हो गया।

सत्य तक पहुंचने के लिए उसकी जिज्ञासा वृद्धि इतनी अधिक और तीव्र थी कि रात्रि में आराम और नींद त्याग कर भी वह अपने शयनकक्ष में ब्राह्मण विद्वान पुरुषोत्तम (Purushottam) और देवी (Devi) तथा अन्य मत संप्रदायों के धर्मशास्त्रियों से विचार-विमर्श करता रहता था किंतु हिंदू, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई, कोई भी मत उसके अंतरप्रदेश को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सका। एक सच्चे जिज्ञासु की भांति अकबर का मजहबी चिन्तन चलता रहा तथा अकबर वैज्ञानिक भाव से सत्य की खोज करने में लगा रहा

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने अपनी पुस्तक मुंतखब-उत्-तवारीख (Muntakhab-ut-Tawarikh) लिखा है कि जहांपनाह हरेक की राय इकट्ठी करते थे। खासकर ऐसे लोगों की जो मुसलमान नहीं थे और उनमें से जो कोई बात उनको पसंद आती, उसे रख लेते और जो उनके मिजाज और मर्जी के खिलाफ जातीं, उन सबको फैंक देते।

शुरु बचपन से जवानी तक और जवानी से बुढ़ापे तक, जहांपनाह बिल्कुल अलग-अलग तरह की हालतों में से और सब तरह के मजहबों, दस्तूरों और फिरकेवाराना अकीदों में से गुजरे हैं और जो कुछ किताबों में मिल सकता है, उस सबको उन्होंने छांटने के अपने खास गुण से इकट्ठा किया है और तहकीकात की उस रूह से इकट्ठा किया है जो हर इस्लामी उसूल के खिलाफ है।

बदायूनी लिखता है कि बादशाह के दिल में पत्थर की लकीर की तरह यह यकीन जमा हो गया है कि सभी मजहबों में समझदार आदमी हैं और सभी कौमों में परहेजगार, सोचने वाले और चमत्कारी ताकतों वाले आदमी हैं। अगर कोई सच्चा इल्म इस तरह हर जगह मिल सकता है तो सच्चाई किसी एक ही मजहब में कैसे बंद रह सकती है?

पण्डित नेहरू (Jawahar Lal Nehru) ने लिखा है कि अकबर ने वर्षों तक सब मतों के आचार्यों से अपनी मजहबी चर्चाएं और बहसें जारी रक्खीं। यहाँ तक कि अंत में सब मतों के आचार्य अकबर से उकता गए और उन्होंने अकबर को अपने-अपने खास मजहब में मिलाने की आशा छोड़ दी। अंत में जेजुइट पादरियों ने अपनी पुस्तकों में लिखा कि बादशाह में हम उस नास्तिक की सी आम गलती देखते हैं जो दलील को ईमान का दास बनाने से इन्कार करता है।

इतिहासकारों के अनुसार अब अकबर किसी एक मजहब के दायरे में बँधकर नहीं रह सकता था। वह समस्त मजहबों से ऊपर उठ गया था। वह जान गया था कि हर मजहब एवं पंथ में कुछ न कुछ बाह्याडम्बर हैं और हर मजहब एवं पंथ में कुछ न कुछ विशेषताएं हैं। इतना होने पर भी समस्त मजहबों एवं पंथों का ध्येय एक है। उनके मौलिक तत्त्व एक जैसे हैं।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि रात और दिन लोग ज्ञान-विज्ञान के गूढ़तम प्रश्नों, इतिहास की विचित्रताओं, प्रकृति के आश्चर्यों और ईश्वरीय ज्ञान संबंधी तत्वों की खोजबीन करते रहते थे। बादशाह ने इन सभी पक्षों को देखा-भाला है। सभी तरह की धार्मिक क्रियाओं और मत-विश्वासों को देखा-समझा है और अपनी संग्रह बुद्धि तथा इस्लाम के सिद्धांत के प्रतिकूल खोजबीन की भावना से उन चीजों का संग्रह कर लिया है जिन्हें लोग पुस्तकों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

आईने अकबरी के अनुसार अकबर की जीवन भर की खोजबीन का परिणाम यह हुआ कि अकबर यह विश्वास करने लगा था कि सभी धर्मों में समझदार लोग होते हैं और वे स्वतंत्र विचारक भी होते हैं जब सत्य सभी धर्मों में है तो यह समझना भूल है कि सच्चाई सिर्फ इस्लाम तक सीमित है (Truth is limited only to Islam)। जबकि इस्लाम अन्य पंथों, मजहबों एवं धर्मों की अपेक्षाकृत नवीन है जिसकी आयु (अकबर के काल में) केवल एक हजार वर्ष की होगी!

इस प्रकार अकबर का मजहबी चिन्तन अकबर को सही दिशा में तो ले जा रहा था किंतु वह किसी एक सिद्धांत पर ठहर नहीं पा रहा था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

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