Friday, January 16, 2026
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अपराजित पृच्छा : शक्ति-पूजा और शिल्प परम्परा का अद्भुत ग्रंथ!

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अपराजित पृच्छा

भारतीय संस्कृति में शक्ति-पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहन है। देवी-पूजन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस परंपरा को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने वाला अद्भुत ग्रंथ है – अपराजित पृच्छा

अपराजित पृच्छा का परिचय

यह भारतीय शिल्पशास्त्र और आगम परंपरा का ऐसा देदीप्यमान ग्रंथ है जो न केवल शक्ति-पूजा की विधियों और तत्त्वों का विवेचन करता है, बल्कि तंत्र-साधना के रहस्यों को भी उजागर करता है। यह ग्रंथ भारतीय कला, स्थापत्य और धर्मशास्त्र की अमूल्य धरोहर है।

अपराजित पृच्छा एक संस्कृत ग्रंथ है, जिसे 12वीं-13वीं शताब्दी के आसपास लिखा गया माना जाता है। गुजरात के चालुक्य राजाओं के संरक्षण में रचित यह ग्रंथ, विश्वकर्मा के मानस पुत्र अपराजित द्वारा पूछे गए प्रश्नों और उनके पिता द्वारा दिए गए उत्तरों के रूप में संकलित है।

यह ग्रंथ मुख्यतः वास्तुशास्त्र, मूर्तिशास्त्र और पूजा-विधान पर केंद्रित है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण, मंदिरों की संरचना और पूजा-पद्धति का विस्तृत वर्णन मिलता है। शक्ति-पूजा की परंपरा को इसमें विशेष स्थान दिया गया है, जिससे यह ग्रंथ भारतीय धार्मिक जीवन का दर्पण बन जाता है।

शक्ति-पूजा परंपरा में अपराजितपृच्छा का महत्व

1. शक्ति-पूजा की परंपरा

भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा माना गया है। देवी को आदिशक्ति, जगतजननी और धर्मरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा की विधियों का उल्लेख इस दृष्टि से अद्भुत है कि यह केवल अनुष्ठानिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देवी-पूजन को जीवन की समग्र साधना से जोड़ता है।

  • देवी की मूर्तियों के निर्माण में सौंदर्य और शास्त्रीयता का संतुलन
  • पूजा में मंत्र, यंत्र और तंत्र का प्रयोग
  • शक्ति को मातृभाव से लेकर रक्षक और संहारक तक विभिन्न रूपों में स्वीकार करना
  • साधक के जीवन में शक्ति की उपस्थिति को आत्मबल और सामाजिक कल्याण से जोड़ना

2. शक्ति का दार्शनिक स्वरूप

अपराजितपृच्छा में शक्ति को केवल एक देवी के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा के रूप में स्वीकार किया गया है। ग्रंथ के अनुसार, शिव और शक्ति का संबंध अविभाज्य है। जहाँ शिव ज्ञान हैं, वहीं शक्ति क्रिया और इच्छा का स्वरूप हैं। शक्ति-पूजा के इस ग्रंथ में देवी को आद्या कहा गया है, जो सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं।

3. प्रतिमा विज्ञान और शक्ति के विविध रूप

शक्ति-पूजा परंपरा में मूर्तिकला का बड़ा महत्व है, और अपराजितपृच्छा इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डालती है। इसमें देवी के विभिन्न रूपों के आयुध (हथियार), वाहन, मुद्रा और उनके स्वरूप का सूक्ष्म विवरण मिलता है:

  • महिषासुरमर्दिनी: देवी के इस पराक्रमी रूप के दस, अठारह या बीस हाथों के आयुधों का वर्णन इसमें विस्तार से है।
  • सप्तमातृका: ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, इंद्राणी, वाराही और चामुंडा के शास्त्रीय स्वरूप का वर्णन शक्ति उपासना के सामाजिक और आध्यात्मिक पक्ष को दर्शाता है।
  • महाविद्या और योगिनी: ग्रंथ में 64 योगिनियों और उनके मंदिर विधान का भी उल्लेख है, जो मध्यकालीन भारत के तांत्रिक प्रभाव को रेखांकित करता है।

4. शक्तिपीठ और वास्तु विधान

इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शक्ति-पूजा को वास्तु (Architecture) के साथ जोड़ता है। अपराजितपृच्छा में बताया गया है कि शक्ति के मंदिर किस दिशा में होने चाहिए और उनके गर्भगृह की योजना कैसी होनी चाहिए।

  • पीठ विधान: इसमें विभिन्न प्रकार के पीठों (Altars) का वर्णन है, जो तंत्र साधना के लिए आवश्यक होते हैं।
  • मंडप संरचना: देवी मंदिरों के मंडप और शिखर की ऊँचाई के नियमों को शक्ति के दिव्य तेज के अनुरूप निर्धारित किया गया है।

5. तंत्र और उपासना पद्धति

अपराजितपृच्छा केवल एक शिल्प-ग्रंथ नहीं है, अपितु यह आगम परंपरा का संवाहक भी है। इसमें बीज मंत्रों, यंत्रों की रचना और साधना के मुहूर्त पर बल दिया गया है। ग्रंथ स्पष्ट करता है कि मूर्ति केवल पत्थर नहीं है; जब उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और शक्ति का आह्वान होता है, तब वह साक्षात चैतन्य हो उठती है।

इसमें शक्ति की सौम्य (जैसे लक्ष्मी, सरस्वती) और रौद्र (जैसे काली, भैरवी) दोनों प्रकृतियों की उपासना का समन्वय मिलता है। यह ग्रंथ बताता है कि साधक की मनोकामना के अनुसार देवी के किस रूप की आराधना की जानी चाहिए।

6. कला और स्थापत्य में योगदान

‘अपराजित पृच्छा’ का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी है। इसमें मंदिर-निर्माण की सूक्ष्म विधियाँ दी गई हैं। देवी-पूजन के लिए विशेष प्रकार के मंदिरों, गर्भगृहों और वेदियों का उल्लेख मिलता है।

  • मंदिर की दिशा, आकार और अनुपात का निर्धारण
  • मूर्तियों की मुद्रा, आयाम और भावाभिव्यक्ति
  • पूजा के लिए आवश्यक उपकरण और वेदियाँ
  • शक्ति-पूजा हेतु विशेष रूप से निर्मित यंत्रों का विवरण

इस प्रकार यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य कला का भी अद्भुत मार्गदर्शक है।

7. दार्शनिक दृष्टि

‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं माना गया, बल्कि इसे दार्शनिक साधना का रूप दिया गया है। शक्ति को ब्रह्म की अभिन्न अभिव्यक्ति मानते हुए साधक को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित किया गया है।

  • शक्ति को सृष्टि, स्थिति और संहार की त्रिगुणात्मक शक्ति के रूप में देखा गया है।
  • पूजा का उद्देश्य केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है।

साधक को शक्ति के माध्यम से आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करने की प्रेरणा दी जाती है।

8. सामाजिक महत्व

शक्ति-पूजा भारतीय समाज में स्त्री-शक्ति के सम्मान का प्रतीक रही है। ‘अपराजित पृच्छा’ इस परंपरा को और अधिक सुदृढ़ करता है। देवी को मातृभाव से लेकर योद्धा रूप तक स्वीकार करना समाज में स्त्री की बहुआयामी भूमिका को मान्यता देता है।

  • स्त्री को सृजनकर्ता और रक्षक दोनों रूपों में प्रतिष्ठित करना
  • समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जगाना
  • सामूहिक पूजा और उत्सवों के माध्यम से सामाजिक एकता को बढ़ावा देना

9. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

ऐतिहासिक दृष्टि से अपराजितपृच्छा का लेखक भुवनदेव को माना जाता है। यह ग्रंथ उस समय लिखा गया जब भारत में शक्ति संप्रदाय (Shaktism) अपने चरमोत्कर्ष पर था। खजुराहो से लेकर उड़ीसा और गुजरात के मोढेरा तक, जो भी भव्य मंदिर बने, उनके पीछे अपराजितपृच्छा जैसे ग्रंथों का शास्त्रीय आधार रहा है।

यह ग्रंथ हमें यह भी बताता है कि मध्यकालीन समाज में नारी शक्ति को ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रतीक के रूप में कितनी प्रधानता दी जाती थी। कला, धर्म और दर्शन का ऐसा संगम विरल ही देखने को मिलता है।

मानासर और अपराजितपृच्छा का संबंध

शिल्पशास्त्र की परंपरा में मानसार और अपराजितपृच्छा को अक्सर एक ही श्रेणी में रखा जाता है, हालांकि मानसार मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय (द्रविड़) परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है और अपराजितपृच्छा उत्तर भारतीय (नागर/मारू-गुर्जर) परंपरा का।

मानासर की तरह ही अपराजितपृच्छा भी मान (Measurement) और प्रमाण (Proportion) पर अत्यधिक बल देती है। इन ग्रंथों के अनुसार, यदि कोई भवन सही माप और अनुपात में नहीं है, तो वह न केवल सौंदर्यहीन होगा, अपितु निवास करने वालों के लिए अशुभ भी हो सकता है।

निष्कर्ष

अपराजित पृच्छा शक्ति-पूजा परंपरा का अद्भुत ग्रंथ है, जो भारतीय धर्म, दर्शन, कला और समाज का समन्वित चित्र प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ हमें बताता है कि शक्ति-पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की समग्र साधना है। देवी-पूजन के माध्यम से साधक आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करता है, वहीं समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान और एकता का भाव भी विकसित होता है।

अपराजितपृच्छा शक्ति-पूजा की परंपरा का एक ऐसा अक्षय कोष है, जो साधक, शिल्पी और इतिहासकार—तीनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति की उपासना केवल कर्मकांड नहीं, अपितु कला और वास्तु के माध्यम से उस परम चेतना को अपने भीतर उतारने की एक प्रक्रिया है। आज भी जब हम प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण देवी प्रतिमाओं को देखते हैं, तो उनमें अपराजितपृच्छा के शब्द ही जीवंत होकर मुस्कुराते प्रतीत होते हैं।

इस प्रकार ‘अपराजित पृच्छा’ भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा का प्रतिनिधि है, जिसमें शक्ति को जगतजननी, रक्षक और संहारक के रूप में स्वीकार कर जीवन के हर आयाम से जोड़ा गया है। यह ग्रंथ आज भी हमें प्रेरित करता है कि शक्ति-पूजा केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे जीवन और समाज में भी शक्ति का आदर और सम्मान बना रहे।

कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गए! (84)

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कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप

वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।

राजा जयमल के आदेश के बाद चित्तौड़ दुर्ग में जौहर की ज्वाला धधक उठी। जब दुर्ग के भीतर से गगनचुम्बी लपटें उठने लगीं तो वे अकबर (AKBAR) के शिविर तक दिखाई देने लगीं।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक जौहर फत्ता सिसोदिया के मकान में किया गया था और एक राणा के मुख्य सेवकों ने किया था। एक राठौड़ों ने किया था। इनमें कोठरिया का रावत साहिबखान मुख्य था। एक बहुत बड़ा जौहर चौहानों की हवेली में हुआ था जहाँ का मुख्य सरदार ईसरदास चौहान था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लखता है कि लगभग 300 स्त्रियाँ इसमें जल मरी थीं। अबुल फजल (ABUL FAZAL) का यह विवरण अधूरा है। किले में जौहर की ज्वाला कई जगह धधकी थी तथा ठीक से कहा नहीं जा सकता कि इसमें भाग लेने वाली स्त्रियों, लड़कियों एवं बच्चों की संख्या कितनी थी!

रात के समय आकाश में ऊँची उठती अग्नि की लपटों को देखकर अकबर (AKBAR) बहुत विस्मित हुआ, उसने अपने मंत्रियों से इस अग्नि का कारण पूछा।

इस पर आम्बेर के राजा भगवानदास ने कहा कि जब हिन्दू वीर, युद्ध-क्षेत्र में मरने का निश्चय कर लेते हैं तो अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में जलाकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं, इसलिये सावधान हो जाना चाहिये, कल सूर्योदय होते ही किले के दरवाजे खुलेंगे।

 राजा भगवानदास की यह बात सुनकर मुगल सेना को तैयार रहने के लिए कहा गया। 25 फरवरी 1568 को प्रातः होते ही किले के भीतर युद्ध के नगाड़े बजने लगे। मुगल सेना ने हैरान होकर देखा कि चित्तौड़ी वीर किले का दरवाजा खोलकर बाहर आ रहे हैं।

उन्होंने केसरिया पाग बांधी हुई है तथा देह पर केसरिया बाना धारण किया हुआ है। उनके माथे वीरत्व के दर्प से दमदमा रहे हैं। जिस प्रकार आज का बाल-सूर्य प्राची में उषा द्वारा सजाए गए लाल पथ पर प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मेवाड़ी आन-बान और शान की रक्षा के लिए दुर्ग से बाहर निकले मेवाड़ी वीर रक्त के लाल पथ पर अग्रसर हो रहे थे।

मुगल सेना केवल इतना ही देख सकी किंतु वास्तविकता यह भी थी कि प्रत्येक हिन्दू वीर के माथे पर कुछ देर पहले ही उनकी पत्नियों, माताओं एवं बहिनों द्वारा अग्नि की लाल लपटों में प्रवेश करने से पहले अपने हाथों से कुमकुम और रोली के टीके सजाए गए थे।

प्रत्येक वीर की पगड़ी में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र था और उनके मुख में पहले से ही तुलसी दल रखा हुआ था। वे गंगाजल पीकर तथा गले में तुलसी की कण्ठी डालकर दुर्ग से बाहर निकले थे।

उत्तर भारत के हिन्दुओं में विगत हजारों सालों से यह परम्परा रही है कि जब किसी शव को शमशान भूमि में ले जाया जाता है तो उसके मुँह में तुलसी दल और गंगाजल रखे जाते हैं तथा गले में तुलसी की कण्ठी धारण करवाई जाती है। इन चित्तौड़ी वीरों ने युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं को मारते हुए प्राणोत्सर्ग करने का निश्चय किया था, इसलिए वे पहले से ही ये सब तैयारियां करके आए थे।

चित्तौड़ी वीरों को दुर्ग के दरवाजे से बाहर निकलते देखकर मुगल सेना ने भी उन पर आक्रमण किया। राजा जयमल मेड़तिया ने अश्व पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु टूटी हुई टांग के कारण अश्व पर सवार नहीं हो सका।

इस पर राजा जयमल ने अपने साथी सरदारों से कहा कि मैं पैर टूट जाने के कारण घोड़े पर नहीं चढ़ सकता परन्तु लड़ने की इच्छा तो रह गई है। इस पर जयमल के 23 वर्षीय भतीजे कल्ला राठौड़ ने अपने 60 वर्षीय काका जयमल को अपने कंधे पर बिठा लिया और बोला- अब लड़ने की आकांक्षा पूरी कर लीजिये!

इसके बाद दोनों वीरों ने अपने दोनों हाथों में तलवारें पकड़ीं और शत्रु दल पर टूट पड़े। भारत का इतिहास वीरता की घटनाओं से भरा पड़ा है किंतु इस तरह की घटना इतिहास में कहीं और नहीं हुई।

वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।

जयमल और कल्ला चार हाथों से शत्रुओं का संहार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिसके कारण उनके सामने पड़ने वाले मुगलों के पैर टिक नहीं पा रहे थे। इन दोनों वीरों ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए हनुमान पोल दरवाजे से मुगलों को बाहर खदेड़ दिया।

हनुमान पोल पार करने के कुछ ही समय बाद, भैरव पोल से पहले, राजा जयमल को बंदूक की गोलियां लगीं जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुआ। शत्रु को मारते हुए मरने की उसकी साध पूरी हुई। वीरों का वसंत संभवतः इसी को कहते हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने इन्हीं क्षणों की वंदना करने के लिए वीरों का कैसा हो वसंत कविता लिखी थी-

कह दे अतीत अब मौन त्याग, लंके तुझमें क्यों लगी आग

ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;

बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत।

यह बताना समीचीन होगा कि राजा जयमल महाराणा सांगा का भांजा था। वह अपने ननिहाल के ममत्व का कर्ज चुकाकर इस नश्वर संसार से गया। अकबर (AKBAR) ने फतहनामा-ए-चित्तौड़ में जयमल राठौड़ की तुलना 1000 घुड़सवारों से की थी।

राजा जयमल द्वारा युद्धक्षेत्र में अपने जीवन का वसंत मनाकर वीरगति प्राप्त करने के बाद उसका भतीजा कल्ला राठौड़ और अधिक उग्र हो गया। उसने अकेले ही मुगलों को पीछे खदेड़ना आरम्भ किया। बहुत से मुगल सैनिक उसके पीछे लगे हुए थे।

भैरव पोल दरवाजे तक पहुंचने से कुछ ही पहले एक मुगल सैनिक ने वीर कल्ला राठौड़ का सिर काट दिया। चित्तौड़ अंचल में मान्यता है कि सिर कटने के बाद कल्ला राठौड़ का धड़ दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए रनेला नामक स्थान पर पहुंचा, जहाँ पर उनकी पत्नी कृष्णकांता उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।

अपने पति के सिर विहीन धड़ को प्रचण्ड रूप धारण करके आया देखकर रानी कृष्णकांता ने वहीं पर चिता जलाई तथा अपने पति के साथ चिता में बैठ गई।

कल्लाजी राठौड़ को मेवाड़ अंचल में लोकदेवता माना गया। संकटग्रस्त लोग आज भी उनकी मनौती मानते हैं। रनेला में जिस स्थान पर कल्लाजी का धड़ भूशायी हुआ था, लोकदेवता कल्लाजी का मुख्य मंदिर है।

चित्तौड़ दुर्ग में राजा जयमल राठौड़ एवं कल्ला राठौड़ की छतरियां बनी हुई हैं। कल्ला राठौड़ की छतरी 4 खंभों की है और जयमल राठौड़ की छतरी छः खंभों की है। किसी कवि ने लिखा है-

‘जठै झड्या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।

कमधज कट बणिया कमंद गढ़ थारै चित्तौड़।’

राजस्थान, गुजरात एवं मध्यप्रदेश में कल्ला राठौड़ के लगभग 500 मंदिर हैं। इनमें से 175 मंदिर अकेले बांसवाड़ा जिले में हैं। इन मंदिरों में शनिवार एवं रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। मान्यता है कि जो बीमारी कल्लाजी के मंदिर में ठीक नहीं होती वह बीमारी आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को जयमलजी के मंदिर में ठीक होती है। इनमें से कई मंदिरों में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में पूजे जाते हैं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

सुप्रभेदागम: शैव आगम, दर्शन और मंदिर वास्तुकला का अद्भुत ग्रंथ

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सुप्रभेदागम - www.bharatkaitihas.com
सुप्रभेदागम

सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) हिन्दू धर्म के शैव संप्रदाय की शैव सिद्धांत (Shaiva Siddhanta) परंपरा  का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सामान्यतः ‘आगम’ शब्द का प्रयोग जैन और शैव (हिंदू) दोनों परंपराओं में किया जाता है, जिससे कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।

आगम क्या है? (What is Agama?)

शैव दर्शन में ‘आगम’ वे पवित्र ग्रंथ हैं जिन्हें भगवान शिव के मुख से निःसृत माना जाता है। शैव संप्रदाय में ‘आगम’ ग्रंथों को वेदों के समान ही प्रामाणिक माना जाता है, जो भगवान शिव द्वारा प्रकट किए गए माने जाते हैं।

सुप्रभेदागम क्या है? (What is Suprabhedagama?)

सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) शैव संप्रदाय के 28 प्रमुख आगमों में से एक है। इसे ‘शैव सिद्धांत’ के अंतर्गत ‘पूर्व आगमों’ की श्रेणी में रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य साधक को ज्ञान, योग, क्रिया और चर्या के माध्यम से शिवत्व की प्राप्ति कराना है। यह न केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला (द्रविड़ शैली) के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका के रूप में भी जाना जाता है।

सुप्रभेदागम के महत्वपूर्ण तथ्य

1. अट्ठाइस मुख्य शैवागमों में से एक

शैव परंपरा में कुल 28 मूल आगम (Original Agamas) माने जाते हैं। सुप्रभेदागम इन्हीं 28 प्रमुख ग्रंथों में से एक है। इसे भगवान शिव के ‘वामदेव’ मुख से प्रकट हुआ माना जाता है।

2. वेदों का सार

सुप्रभेदागम में कहा गया है कि ‘सिद्धांत’ वेदों का सार है। यह ग्रंथ द्वैत और अद्वैत दोनों प्रकार के दार्शनिक विचारों पर चर्चा करता है।

3. सुप्रभेदागम की संरचना और विभाग

सुप्रभेदागम को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

  1. पूर्व भाग (Purvabhaga): इसमें मुख्य रूप से मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और अनुष्ठानों का वर्णन है।
  2. उत्तर भाग (Uttarabhaga): इसमें व्यक्तिगत साधना, दीक्षा और दार्शनिक सिद्धांतों पर जोर दिया गया है।

अन्य आगमों की तरह, सुप्रभेदागम भी चार प्रमुख भागों (पादों) में विभाजित है:

1. चर्या पाद (Charya Pada)

यह भाग दैनिक आचरण और अनुशासन से संबंधित है। इसमें भक्त के व्यक्तिगत आचरण, दैनिक जीवन, स्वच्छता, और बाहरी पूजा के नियमों का विवरण मिलता है।

2. क्रिया पाद (Kriya Pada)

सुप्रभेदागम का सबसे विस्तृत हिस्सा यही है। इसमें शिल्प शास्त्र (Architectural Science), मंदिर निर्माण, मूर्ति विज्ञान (Iconography) और पूजा विधियों का विस्तृत विवरण मिलता है।

  • मंदिर निर्माण: भूमि चयन से लेकर नींव (अधिष्ठान) और शिखर निर्माण तक की तकनीक।
  • प्रतिमा लक्षण: शिवलिंग और विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के माप और निर्माण की विधि।

3. योग पाद (Yoga Pada)

यह आंतरिक साधना का मार्ग है। इसमें प्राणायाम, ध्यान और चक्रों के भेदन के माध्यम से आत्मा को परमात्मा (शिव) से जोड़ने की प्रक्रिया बताई गई है।

4. ज्ञान पाद (Jnana Pada)

यह भाग दार्शनिक सिद्धांतों और मोक्ष की व्याख्या करता है। इसमें पति (ईश्वर), पशु (जीव) और पाश (बंधन) के त्रैत सिद्धांत की व्याख्या की गई है, जो शैव सिद्धांत का मूल आधार है।

सुप्रभेदागम का महत्व

1. सुप्रभेदागम और अध्यात्म (Spirituality)

सुप्रभेदागम हमें ‘शिवोहम’ (मैं शिव हूँ) का बोध कराता है। यह सिखाता है कि भक्ति केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि एक विज्ञान है। इसके अनुसार:

  • दीक्षा: बिना गुरु की दीक्षा के आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
  • मुक्ति: संसार के बंधनों (पाश) से मुक्त होकर शिव के समान गुण प्राप्त करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

2. सुप्रभेदागम और मंदिर वास्तुकला (Architecture and Iconography)

दक्षिण भारतीय वास्तुशास्त्र (Architecture) और शिल्पशास्त्र में सुप्रभेदागम का विशेष महत्व है। दक्षिण भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण और उनमें मूर्तियों की स्थापना सुप्रभेदागम ग्रंथ में दिए गए निर्देशों के आधार पर की गई है।

सुप्रभेदागम का ऐतिहासिक महत्व इसके वास्तुकला संबंधी विवरणों के कारण बढ़ जाता है। चोल और पल्लव काल के कई मंदिरों का निर्माण इसी आगम के सिद्धांतों के अनुसार किया गया है।

  • विमान निर्माण: यह ग्रंथ मंदिर के ऊपरी ढांचे (विमान) के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करता है।
  • अनुष्ठानिक शुद्धता: गर्भगृह की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशिष्ट नियमों का उल्लेख है।
  • जीर्णोद्धार: यदि कोई मंदिर क्षतिग्रस्त हो जाए, तो उसके पुनरुद्धार के लिए ‘संप्रोक्षण’ की विधि भी इसमें वर्णित है।

निश्चित रूप से, सुप्रभेदागम में वर्णित मंदिर वास्तुकला अत्यंत वैज्ञानिक और विस्तृत है। इस ग्रंथ के अनुसार, मंदिर केवल एक भवन नहीं, बल्कि भगवान का ‘स्थूल शरीर’ है।

3. सुप्रभेदागम के अनुसार मंदिर के विभिन्न अंग (Parts of Temple)

सुप्रभेदागम के अनुसार, मंदिर के अंगों की तुलना मानव शरीर से की जाती है:

  • अधिष्ठान (Base): पैर
  • पाद/स्तंभ (Pillars): जंघा (Thighs)
  • प्रस्तर (Roof level): कंधा (Shoulders)
  • शिखर (Top): सिर (Head)
  • स्तूपिका (Finial): शिखा (Crown/Tuft)

4. सुप्रभेदागम की अनूठी विशेषता: ‘षड्वर्ग’ सिद्धांत

सुप्रभेदागम मंदिर की ऊंचाई को निर्धारित करने के लिए षड्वर्ग’ (Shadvarga) गणना पर जोर देता है। इसमें छह प्रमुख मापदंड होते हैं:

  1. आय (Income)
  2. व्यय (Expenditure)
  3. योनि (Source/Orientation)
  4. वार (Weekday)
  5. नक्षत्र (Star)
  6. अंश (Quality/Portion)

इन गणनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर का निर्माण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ सामंजस्य बिठा सके और वहां पूजा करने वाले भक्तों को शांति प्राप्त हो।

सुप्रभेदागम में मंदिर निर्माण एवं शिल्प शास्त्र की प्रमुख विधियाँ

नीचे दी गई तालिका सुप्रभेदागम के क्रिया पाद में वर्णित मंदिर निर्माण के प्रमुख चरणों और उनके तकनीकी महत्व को दर्शाती है:

क्रम संख्याचरण (Phase)विवरण और महत्व (Description & Significance)
1भू-परीक्षा (Land Testing)भूमि के रंग, गंध, स्वाद और बनावट के आधार पर उसकी उपयुक्तता की जाँच।
2कर्पण (Ploughing)निर्माण से पहले भूमि की शुद्धि के लिए उसे जोतना और वहां पवित्र बीज बोना।
3पद विन्यास (Grid Planning)मंदिर के नक्शे को वर्गाकार ग्रिड (जैसे 8×8 या 9×9) में विभाजित करना, जिसे ‘वास्तु पुरुष मंडल’ कहते हैं।
4अधिष्ठान (Foundation)मंदिर का आधार या चबूतरा। सुप्रभेदागम में इसके विभिन्न प्रकार जैसे ‘पादबंध’ और ‘प्रतिबंध’ बताए गए हैं।
5स्तंभ (Pillars)खंभों के माप, उनकी आकृति (गोलाकार, वर्गाकार या अष्टकोणीय) और उन पर की जाने वाली नक्काशी के नियम।
6प्रस्तर (Entablature)स्तंभों के ऊपर का हिस्सा जो छत को सहारा देता है, इसमें सजावटी तत्वों का विवरण होता है।
7विमान (Vimana)गर्भगृह के ऊपर का शिखर। ग्रंथ में एक-मंजिला (अल्प) से लेकर बहु-मंजिला शिखरों का वर्णन है।
8मूर्तिकला (Iconography)शिवलिंग की ऊँचाई और चौड़ाई का अनुपात (ताल मान) और मूर्तियों के आयुध (हथियार) एवं मुद्राएँ।

निष्कर्ष

सुप्रभेदागम भारतीय ज्ञान परंपरा का वह अनमोल रत्न है जो अध्यात्म और विज्ञान (वास्तुकला) के बीच सेतु का कार्य करता है। चाहे आप एक इतिहासकार हों, एक वास्तुकार हों या शिव के अनन्य भक्त, इस ग्रंथ का अध्ययन जीवन और ब्रह्मांड के प्रति एक नई दृष्टि प्रदान करता है। हमें अपनी प्राचीन विरासत को सहेजना चाहिए और उसके महत्व को आधुनिक संदर्भों में भी समझना चाहिए।

👉 डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

ग्रंथ परिचय

नटराज शिव के तांडव में छिपा हिन्दू दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

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नटराज शिव के तांडव में छिपा हिन्दू दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

नटराज का शाब्दिक अर्थ है— नृत्य का राजा। यह शिव का वह अद्वितीय रूप है जिसमें वे नृत्य के माध्यम से सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की शाश्वत प्रक्रिया को व्यक्त करते हैं। यह रूप भारतीय दर्शन, कला और संस्कृति में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है।

नटराज शिव के तांडव में छिपा दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

परिचय

भारतीय संस्कृति में नटराज का स्वरूप केवल एक मूर्ति या प्रतिमा नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय सत्य और जीवन की गति का प्रतीक है। भगवान शिव का यह रूप दर्शाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक निरंतर नृत्य है, जिसमें जन्म, पालन और विनाश की प्रक्रियाएँ एक साथ चलती रहती हैं।

भगवान शिव का यह स्वरूप उनके ‘आनंद तांडव’ को दर्शाता है, जिसमें सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार समाहित है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा, जीवन चक्र और मोक्ष  का जीवंत प्रतीक है।

नटराज का दार्शनिक महत्व

  • सृष्टि का नृत्य: शिव का नटराज रूप यह स्पष्ट करता है कि ब्रह्मांड की रचना और उसका संचालन किसी स्थिर प्रक्रिया से नहीं, बल्कि निरंतर गति और कंपन से होता है।
  • तांडव के दो रूप:
    • रौद्र तांडव – विनाश और प्रलय का प्रतीक।
    • आनंद तांडव – आनंद, सृजन और जीवन की निरंतरता का प्रतीक।
  • वैज्ञानिक दृष्टि: आधुनिक भौतिकविज्ञानी भी मानते हैं कि ब्रह्मांड की गति और ऊर्जा को नृत्य के रूप में समझा जा सकता है। इसीलिए नटराज का नृत्य “कॉस्मिक डांस” कहलाता है।

नटराज स्वरूप के प्रमुख प्रतीक और उनके अर्थ

नटराज की प्रतिमा के हर अंग और मुद्रा के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है-

1. अग्नि का घेरा (प्रभा मंडल)

नटराज के चारों ओर जो ज्वालाओं का घेरा है, वह ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि पूरा संसार ऊर्जा और अग्नि से व्याप्त है और समय के चक्र में निरंतर परिवर्तनशील है।

2. डमरू (सृष्टि का आरंभ)

शिव के ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू है। डमरू की ध्वनि ‘नाद’ (ब्रह्मांडीय कंपन) का प्रतीक है। माना जाता है कि इसी ध्वनि से क्वाण्टम उत्पन्न होते हैं जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। यह समय (Time) के प्रवाह को भी दर्शाता है।

3. अग्नि (विनाश की शक्ति)

ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि की लपटें हैं। यदि डमरू निर्माण का प्रतीक है, तो अग्नि विनाश का। यह सिखाता है कि जो जन्मा है, उसका अंत निश्चित है ताकि नई रचना हो सके।

4. अभय मुद्रा (संरक्षण)

दूसरा दाहिना हाथ ‘अभय मुद्रा’ में है, जो भक्तों को भय से मुक्ति, सुरक्षा और शांति का आश्वासन देता है। यह संदेश देता है कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों को डरने की आवश्यकता नहीं।

5. अपस्मार पुरुष (अज्ञानता का अंत)

नटराज जिस बौने राक्षस के ऊपर नृत्य कर रहे हैं, उसका नाम अपस्मार’ है। यह अज्ञानता, अहंकार और विस्मृति का प्रतीक है। शिव का उस पर पैर रखना दर्शाता है कि ज्ञान और सचेत अवस्था के माध्यम से ही हम अपनी बुराइयों पर विजय पा सकते हैं।

6. उठा हुआ पैर (मुक्ति का मार्ग)

शिव का उठा हुआ बायां पैर मोक्ष’ या मुक्ति का प्रतीक है। उनकी ओर इशारा करता हुआ हाथ (गजहस्त मुद्रा) यह बताता है कि भगवान के चरणों में ही परम शांति और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति संभव है।

7. नृत्य की मुद्रा

जीवन की गति, संतुलन और लय।

पंचकृत्य: नटराज के नृत्य के पांच कार्य

नटराज का नृत्य ब्रह्मांड की पांच महत्वपूर्ण गतिविधियों को दर्शाता है, जिन्हें पंचकृत्य’ कहा जाता है:

  1. सृष्टि (Creation): डमरू के माध्यम से नवीन ऊर्जा का संचार।
  2. स्थिति (Preservation): अभय मुद्रा के माध्यम से संतुलन बनाए रखना।
  3. संहार (Destruction): अग्नि के माध्यम से पुरानी चीजों का अंत।
  4. तिरोभाव (Illusion): संसार की माया, जिसमें जीव उलझा रहता है।
  5. अनुग्रह (Grace/Liberation): उठा हुआ पैर, जो भक्त पर कृपा और मुक्ति का प्रतीक है।

नटराज और जीवन दर्शन

नटराज का नृत्य हमें यह सिखाता है कि:

  • जीवन स्थिर नहीं है, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील है।
  • सृजन और विनाश दोनों ही आवश्यक हैं।
  • अज्ञान का अंत करके ही आनंद और मुक्ति प्राप्त होती है।

कला और आध्यात्मिकता का संगम ही जीवन को पूर्णता देता है।

सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व

  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य: नटराज का स्वरूप भरतनाट्यम और अन्य नृत्य शैलियों में प्रेरणा का स्रोत है।
  • मंदिरों में प्रतिष्ठा: चिदंबरम का नटराज मंदिर विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ शिव को ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में पूजा जाता है।
  • आधुनिक संदर्भ: हाल ही में भारत मंडपम (G-20 शिखर सम्मेलन) में 27 फुट ऊँची नटराज प्रतिमा स्थापित की गई, जो भारतीय कला और दर्शन की वैश्विक पहचान बनी।

नटराज और आधुनिक विज्ञान (CERN का संबंध)

दिलचस्प बात यह है कि नटराज की अवधारणा केवल धर्म तक सीमित नहीं है। आधुनिक भौतिकी (Physics) में क्वांटम फील्ड थ्योरी’ और कणों के कंपन की तुलना शिव के नृत्य से की गई है।

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी फ्रिटजॉफ कैपरा ने अपनी पुस्तक द ताओ ऑफ फिजिक्स में लिखा है कि उप-परमाणु कणों (Sub-atomic particles) का निरंतर होने वाला नृत्य नटराज के नृत्य जैसा ही है। यही कारण है कि जिनेवा स्थित दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला CERN के बाहर नटराज की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।

निष्कर्ष

नटराज की मूल अवधारणा यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक नृत्य है, जिसमें शिव स्वयं नर्तक हैं। उनका नृत्य हमें जीवन की गति, संतुलन और शाश्वत सत्य का बोध कराता है। यह रूप भारतीय संस्कृति का अनमोल रत्न है, जो कला, दर्शन और विज्ञान तीनों को जोड़ता है। नटराज की प्रतिमा हमें यह सिखाती है कि जीवन गतिमान है। निर्माण और विनाश एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब हम अपने भीतर के अहंकार (अपस्मार) को दबाकर ज्ञान की ज्योति जलाते हैं, तभी हम उस आनंद तांडव का अनुभव कर सकते हैं।

इस प्रकार नटराज की अवधारणाकला, दर्शन और विज्ञान का एक अनूठा समन्वयन है जो सदियों से मानवता को प्रेरित करता आ रहा है।

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ग्रंथ परिचय

कामिकागम (Kamikagama): शैव दर्शन और मंदिर वास्तुकला का आधार स्तंभ

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कामिकागम

कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त परंपरा का एक प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें मंदिर निर्माण, पूजा-विधि और तांत्रिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

शैव दर्शन और मंदिर वास्तुकला का आधार स्तंभ कामिकागम

कामिकागम शैव आगम साहित्य के 28 मुख्य ग्रंथों (किरण, कारण, कामिक आदि) में सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित माना जाता है। यह ‘शैव सिद्धांत’ परंपरा का मूल ग्रंथ है, जो न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि दक्षिण भारतीय मंदिरों की वास्तुकला, अनुष्ठानों और मूर्तिशिल्प का संविधान भी है।

परिचय

भारतीय धार्मिक साहित्य में आगम ग्रंथों  का विशेष स्थान है। इनमें से कामिकागम ग्रंथ (Kamikagama Granth) शैवसिद्धान्त परंपरा का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है। इसे कामिकातन्त्र  भी कहा जाता है। विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ लगभग 12वीं शताब्दी में लिखा गया। इसमें मंदिर निर्माण, पूजा-पद्धति, अनुष्ठान और तांत्रिक विधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

कामिकागम की संरचना और वर्गीकरण

इस ग्रंथ में कुल 75 अध्याय हैं। पूर्वभाग में मंदिर निर्माण, मूर्ति-स्थापना, स्नान, अर्चन, नैवेद्य, अग्निकार्य, वास्तु-नियम आदि का वर्णन है। उत्तरभाग में तांत्रिक साधनाओं और गूढ़ विधियों का विवरण मिलता है।

कामिकागम को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

  1. पूर्व भाग (Purva Pada): इसमें मंदिर निर्माण, भूमि चयन, वास्तु शास्त्र और लिंग स्थापना जैसे विषयों का विस्तार से वर्णन है।
  2. उत्तर भाग (Uttara Pada): इसमें दैनिक पूजा (नित्य नैमित्तिक), उत्सव, प्रायश्चित विधान और विसर्जन की प्रक्रियाओं का उल्लेख है।

इस ग्रंथ को चर्या’ (आचरण) और क्रिया’ (कर्मकांड) के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध माना जाता है।

कामिकागम की विषय-वस्तु

यद्यपि कामिकागम ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य शिवभक्ति को व्यवस्थित रूप देना है तथापि यह  केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं है, अपितु धर्म, विज्ञान और कला का संगम है। इस ग्रंथ में निम्नलिखित विषयों को समाहित किया गया है-

  • मंदिर निर्माण के नियम: भूमि परीक्षण, वास्तु-निर्धारण, शिल्प और स्थापत्य की विधियाँ।
  • पूजा-विधि: स्नान, अर्चन, नैवेद्य, दीपदान और यज्ञ की प्रक्रिया।
  • अनुष्ठान: अग्निकार्य, बलि, ग्राम-पूजन और देवताओं की स्थापना।
  • तांत्रिक साधना: मंत्रोच्चारण, ध्यान और योग की विधियाँ।

1. मंदिर वास्तुकला और शिल्पशास्त्र (Vastu & Architecture)

कामिकागम में मंदिर निर्माण के लिए भूमि के परीक्षण से लेकर ‘शिखर’ निर्माण तक के सूक्ष्म नियम दिए गए हैं। इसमें गर्भगृह की माप, स्तंभों की संख्या और द्वारों की दिशा का वैज्ञानिक विवरण मिलता है। आज भी दक्षिण भारत के अधिकांश मंदिरों (जैसे चिदंबरम और मदुरै) में इसी आगम के नियमों का पालन किया जाता है।

2. प्रतिमा लक्षण (Iconography)

भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों, जैसे नटराज, दक्षिणामूर्ति और सोमस्कंद की मूर्तियों को बनाने के सटीक नियम और अनुपात (ताल मान) कामिकागम में वर्णित हैं। यह मूर्तिकारों के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है।

3. आध्यात्मिक दर्शन (Shaiva Siddhanta Philosophy)

यद्यपि यह क्रिया प्रधान है, लेकिन इसमें ‘पति-पशु-पाश’ का दर्शन अंतर्निहित है।

  • पति: परमेश्वर शिव।
  • पशु: जीवात्मा।
  • पाश: बंधन (माया, कर्म और आणव मल)।

कामिकागम के अनुसार, अनुष्ठानों और भक्ति के माध्यम से इन बंधनों को काटकर शिवत्व प्राप्त किया जा सकता है।

4. अनुष्ठान और उत्सव (Rituals and Festivals)

अभिषेक, षोडशोपचार पूजा और वार्षिक ब्रह्मोत्सव का जैसा वर्णन कामिकागम में है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें मंत्रों के शुद्ध उच्चारण और मुद्रा (हाथों के संकेत) के महत्व पर बल दिया गया है।

कामिकागम का धार्मिक महत्व

कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का मार्गदर्शन करता है, बल्कि मंदिर संस्कृति को भी व्यवस्थित करता है। दक्षिण भारत के कई मंदिरों में आज भी पूजा-पद्धति इसी ग्रंथ के अनुसार होती है।

सांस्कृतिक योगदान

  • शिल्पकला और वास्तुशास्त्र: मंदिर निर्माण की शैलियाँ आज भी वास्तुशास्त्र के अध्ययन में उपयोगी हैं।
  • संगीत और नृत्य: पूजा-विधियों में संगीत और नृत्य का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय कला परंपरा को समृद्ध करता है।
  • समाज और धर्म: यह ग्रंथ समाज में धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक एकता स्थापित करने में सहायक रहा।
कामिकागमविवरण
मूल भाषासंस्कृत
शाखाशैव सिद्धांत
प्रकार२८ मूल आगमों में प्रथम
मुख्य देवताभगवान शिव

कामिकागम की प्रासंगिकता

डिजिटल युग में, भारतीय विरासत और शैव आगम के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है। कामिकागम न केवल शोधकर्ताओं के लिए बल्कि वास्तुकला के छात्रों के लिए भी एक अमूल्य संसाधन है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में धर्म और विज्ञान (Engineering & Aesthetics) एक दूसरे के पूरक थे।

निष्कर्ष

कामिकागम भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है जिसने सदियों से मंदिरों को जीवंत बनाए रखा है। इसमें मंदिर निर्माण से लेकर पूजा-विधि और तांत्रिक साधना तक का विस्तृत विवरण मिलता है। यह ग्रंथ न केवल शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का मार्गदर्शक है, बल्कि भारतीय संस्कृति और कला का भी महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह हमें सिखाता है कि बाह्य अनुष्ठान और आंतरिक शुद्धि दोनों ही मोक्ष के मार्ग हैं। दक्षिण भारतीय मंदिरों की दिव्यता को समझने के लिए कामिकागम का अध्ययन अनिवार्य है। आज के समय में जब हम भारतीय परंपराओं को पुनः समझने का प्रयास कर रहे हैं, कामिकागम ग्रंथ हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।

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ग्रंथ परिचय

समरांगण सूत्रधार – भारतीय स्थापत्य कला का विश्वकोश

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राजा भोज द्वारा निर्मित धार का मंदिर

समरांगण सूत्रधार (Samrangana Sutradhara) राजा भोज (Raja Bhoj) द्वारा रचित 11वीं शताब्दी का अद्वितीय ग्रंथ है। इसमें भारतीय स्थापत्य कला (Indian architecture) मंदिर निर्माण (Temple construction) , नगर नियोजन (Town planning), मूर्तिकला (Sculpture) और प्राचीन यंत्रविद्या (Ancient engineering) के गहन सिद्धांत मिलते हैं।

राजा भोज द्वारा रचित स्थापत्य ग्रंथ – समरांगण सूत्रधार

समरांगण सूत्रधार का परिचय

समरांगण सूत्रधार (Samarangana Sutradhara) 11वीं शताब्दी (ई.1000–1055) का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, जिसे परमार वंश के महान राजा भोज ने रचा था। यह ग्रंथ भारतीय वास्तुशास्त्र और स्थापत्य कला का विश्वकोश माना जाता है। इसमें न केवल मंदिर निर्माण के नियम बताए गए हैं, बल्कि मूर्तिकला, नगर नियोजन और यंत्रविद्या तक का विस्तृत वर्णन मिलता है।

समरांगण सूत्रधार को भारतीय स्थापत्य कला का विश्वकोश (Encyclopedia of Indian architecture) कहा जाता है।यह ग्रंथ न सिर्फ प्राचीन भारतीय स्थापत्य की उन्नत समझ को दिखाता है, बल्कि आधुनिक वास्तु-विचार के लिए भी समृद्ध स्रोत है।

समरांगण सूत्रधार की संरचना

समरांगण सूत्रधार ज्ञानकोशीय ग्रंथ है, इसमें कुल 83 अध्याय हैं, जिनमें नगर-योजना, भवन-शिल्प, मंदिर-निर्माण, मूर्तिकला, मुद्राएँ और यंत्र-विधानों का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ दिखाता है कि प्राचीन भारत की वास्तु परंपरा कितनी व्यवस्थित, वैज्ञानिक और अनुभव-समृद्ध थी।

  • इसमें लगभग 7,430 श्लोक और 83 अध्याय हैं।
  • ग्रंथ का सबसे पूर्ण संस्करण 15वीं शताब्दी में संकलित हुआ।

समरांगण सूत्रधार की विषय-वस्तु

  • इस ग्रंथ में वर्णित सिद्धांत वास्तुशास्त्र की शास्त्रीय नींव को मजबूत करते हैं, जैसे भूमि-परीक्षा, माप-प्रणाली (हस्तादि एकक), दिशा-संतुलन और ऊर्जा प्रवाह की अवधारणा। राजा भोज नगर-योजना में जल-स्रोत, जलवायु, संसाधन और सुरक्षा जैसे व्यावहारिक पक्षों पर ज़ोर देते हैं, जो आधुनिक शहरी नियोजन की सोच से भी मेल खाते हैं।
  • समरांगण सूत्रधार को भारतीय स्थापत्य परंपरा का एक मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है शोध संस्थान और वास्तु-विशेषज्ञ आज भी इस ग्रंथ का अध्ययन करते हैं।
  • इस ग्रंथ का बड़ा भाग नगरों और भवनों की योजना पर केंद्रित है, जिसमें भूमि-चयन, दिशाओं का महत्व, सड़कों की रूपरेखा, दुर्ग-निर्माण और महलों की संरचना जैसे विषय आते हैं। छोटे आलय (घर) से लेकर महालय (महल) और मंदिर तक, कैसे बनाए जाएँ, उनके अनुपात, माप और सौंदर्य-मानकों को सूक्ष्मता से बताया गया है।

स्थापत्य और वास्तुशास्त्र

समरांगण सूत्रधार में मंदिर निर्माण की विधियाँ, भूमि चयन, दिशा-निर्धारण और मूर्तियों की स्थापना के नियम दिए गए हैं।

  • मंदिर वास्तु: गर्भगृह, मंडप, शिखर और तोरण की संरचना का विस्तृत वर्णन।
  • नगर नियोजन: सड़कों, चौक, जलस्रोत और आवासीय क्षेत्रों की योजना।
  • मूर्तिकला: देव प्रतिमाओं के अनुपात और सौंदर्यशास्त्र।

यंत्रविद्या और तकनीक

समरांगण सूत्रधार में यंत्रों और स्वचालित मशीनों का भी उल्लेख है। भोज ने उड़ने वाले यंत्रों, यांत्रिक दरवाजों और स्वचालित मूर्तियों का वर्णन किया है। यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता में तकनीकी कल्पनाएँ कितनी उन्नत थीं। यन्त्रविधान अध्याय में विभिन्न यंत्रों और मशीनों का उल्लेख मिलता है, जिससे यह ग्रंथ तकनीकी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है और भोज की वैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाता है।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

  • समरांगण सूत्रधार भारतीय वास्तु परंपरा का प्रमाण है।
  • यह ग्रंथ दर्शाता है कि भारतीय स्थापत्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से भी विकसित था।
  • राजा भोज को “भारतीय स्थापत्य पुनर्जागरण का अग्रदूत” कहा जाता है और यह ग्रंथ उनकी बहुआयामी प्रतिभा का साक्ष्य है।

आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता

आज सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण के खतरों को देखते हुए सतत विकास के साथ-साथ पर्यावरण-संतुलन और सांस्कृतिक वास्तु की चर्चा बढ़ रही है। समरांगण सूत्रधार के सिद्धांत इस दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करते हैं। मिश्रित उपयोग वाली बसाहट, पैदल चलने योग्य नगर और प्रकृति के अनुकूल निर्माण जैसे विचार इस ग्रंथ में प्राचीन रूप से मौजूद हैं। इसी कारण यह ग्रंथ परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु की तरह भारतीय ज्ञान-परंपरा की समृद्धि को सामने लाता है।

निष्कर्ष

समरांगण सूत्रधार केवल एक स्थापत्य ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, विज्ञान और कला का अद्वितीय संगम है। राजा भोज ने इस ग्रंथ के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को वास्तु और तकनीकी ज्ञान का अमूल्य भंडार दिया। आज भी यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य और वास्तुशास्त्र के अध्ययन में मार्गदर्शक है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

ग्रंथ परिचय

कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ ने चित्तौड़ के पराक्रम को अमर बना दिया (85)

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कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़

कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ ने चित्तौड़ के पराक्रम को अमर बना दिया – ईसरदास चौहान ने अकबर के हाथी की सूण्ड काट कर अकबर पर व्यंग्य कसा!

 राजपूताने के इतिहास में दो कल्लाजी राठौड़ (KALLA RATHORE) हुए हैं। दोनों ही मुगल बादशाह अकबर (AKBAR) के समकालीन थे। दोनों ही रणक्षेत्र में लड़ते हुए काम आए। दोनों को ही लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। दोनों के थानों पर मेले लगते हैं।

एक कल्लाजी राठौड़ चित्तौड़ दुर्ग (CHITTOR FORT) की लड़ाई में अमर हुए थे और दूसरे कल्लाजी राठौड़ सिवाना दुर्ग (SIWANA FORT) की लड़ाई में अमर हुए थे। एक कल्लाजी राठौड़ तो अकबर के जीवन से दूर जा चुके थे और दूसरे कल्लाजी राठौड़ से अकबर (AKBAR) का सामना होने में अभी कुछ समय शेष था। उनकी चर्चा हम यथा समय करेंगे।

चित्तौड़ के किले में जब राजा जयमल एवं कल्लाजी राठौड़ चार हाथों से तलवारें चलाते हुए मुगल सैनिकों को काटने लगे तब डोडिया सांडा (DODIYA SANDA) ने घोड़े पर सवार होकर शत्रु सेना में भारी मारकाट मचाई। वह मुगल सैनिकों के सिरों को काटता और उन्हें धरती पर लुढ़काता हुआ गंभीरी नदी के पश्चिमी तट तक जा पहुंचा।

डोडिया के इस विकराल रूप को देखकर मुगल सैनिकों ने डोडिया सांडा को घेर लिया। सैंकड़ों मुगलों ने उस पर तड़ातड़ वार करने आरम्भ किए। अंततः वीर डोडा उनके सिर काटता हुआ स्वयं भी काम आया।

हिन्दुओं का प्रचण्ड आक्रमण देखकर अकबर ने कई सधाये हुए हाथियों को सूण्डों में खाण्डे पकड़ाकर आगे बढ़ाया। कई हजार सवारों के साथ अकबर भी हाथी पर सवार होकर किले के भीतर घुसा। उसके आगे-आगे हाथियों का प्रचण्ड दल चल रहा था। ईसरदास चौहान (ISARDAS CHOUHAN) मुगल सैनिकों के सिर काटता हुआ अकबर (AKBAR) के हाथी तक जा पहुंचा।

ईसरदास ने एक हाथ से अकबर (AKBAR) के हाथी का दांत पकड़ा और दूसरे से हाथी की सूंड पर खंजर मारकर कहा- ‘गुणग्राहक बादशाह को मेरा मुजरा पहुंचे।’ वस्तुतः ईसरदास चौहान ने ऐसा कहकर अकबर पर भारी व्यंग्य किया था जिससे अकबर बुरी तरह से तिलमिला गया।

कुछ दिन पहले ही मुगल बादशाह ने ईसरदास चौहान को अपने पास बुलवाया था और उसके समक्ष प्रस्ताव रखा था कि मैं गुणग्राहक बादशाह हूँ, गुणियों की कद्र करता हूँ। आप बहुत वीर हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप चित्तौड़ का दुर्ग छोड़कर मेरी तरफ आ जाएं। तब ईसरदास ने यह कहा था कि फिर कभी उचित अवसर आने पर मैं बादशाह को मुजरा करूंगा।

आज ईसरदास ने अकबर को उसी वार्तालाप का स्मरण दिलाते हुए उस पर व्यंग्य किया था। ईसरदास चौहान वहीं पर काम आया। देखते ही देखते चित्तौड़ी वीरों ने प्रचण्ड रूप धारण कर लिया। वे मुगलों को गाजर-मूली की तरह काटने लगे और स्वयं भी युद्ध की अग्नि में अपने प्राणों की आहुति देने लगे।

चित्तौड़ी वीरों ने अकबर द्वारा दुर्ग की तरफ दौड़ाए गए कई हाथियों के दांत तोड़ डाले और कइयों की सूण्डें काट डालीं जिससे वे जोर-जोर से चिंघाड़ने लगे और गुस्से में पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। बहुत से हाथी वहीं मर गए और बहुत से दोनों तरफ के सैनिकों को कुचलते हुए भाग निकले।

केलवा का ठाकुर फत्ता सिसोदिया (FATTA SISODIA) बड़ी बहादुरी से लड़ा परन्तु एक हाथी ने उसे सूण्ड से पकड़कर पटक दिया जिससे वह सूरजपोल के भीतर काम आया। उसे चित्तौड़ के इतिहास में फतहसिंह चूण्डावत के नाम से जाना जाता है। वह राजा जयमल राठौड़ का बहनोई था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि बादशाह ने मुझे बताया कि जब बादशाह गोविंद शरण के मंदिर में पहुंचा तो एक महावत ने एक आदमी को अपने हाथी से कुचलवाया। हाथी उसको अपनी सूंड में पकड़कर बादशाह के सामने लाया।

महावत ने कहा कि मैं इस आदमी का नाम तो नहीं जानता परंतु यह कोई सरदार जान पड़ता है। इसके चारों ओर बहुत से आदमियों ने प्राणों का बलिदान किया है। अंत में ज्ञात हुआ कि वह फत्ता सिसोदिया था।

जिस समय उसको बादशाह के सामने उपस्थित किया गया, उस समय उसमें कुछ प्राण थे परंतु फिर शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई।

राव संग्रामसिंह, राठौड़ नेतसी आदि अनेक हिन्दू सरदार काम आए। 25 फरवरी 1568 को वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं में राजराणा जैता सज्जावत एवं राजराणा सुलतान आसावत भी थे। ये दोनों अपना मोर्चा छोड़कर सूरजपोल दरवाजे पर रावत साईंदास चूंडावत की सहायता करने के लिए पहुंचे और वहीं पर काम आए।

कोठारिया का रावत साहिबखान चौहान भी वीरता से लड़ते हुए काम आया। लावा सरदारगढ़ का ठाकुर सांडासिंह डोडिया घोड़े पर सवार होकर तलवार चलाते हुए गंभीर नदी के पश्चिम में वीरगति को प्राप्त हुआ।

 मेड़तिया सरदारों में विजयसिंह, जीतसिंह, र्दुजन रायमलोत तथा ईश्वरदास वीरमदेवोत भी वीरगति को प्राप्त हुए। जयमल राठौड़ का भाई प्रतापसिंह राठौड़ भी इस युद्ध में काम आया।

सलूंबर रावत साईंदास चूंडावत सूरजपोल की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। उसका इकलौता पुत्र कुंवर अमर सिंह भी यहीं वीरगति को प्राप्त हुआ। इस तरह रावत साईंदास चूंडावत का वंश यहीं समाप्त हुआ। अकबर (AKBAR) ने इस युद्ध के बाद जिन तीन योद्धाओं की तुलना 1 हजार घुड़सवारों से की, उनमें से एक रावत साईंदास चूंडावत भी था।

बड़ी सादड़ी का राजराणा सुरतान सिंह झाला (RAJRANA SURTAN SINGH JHALA) भी सूरजपोल की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। बल्लू सिंह चौहान (BALLUSINGH CHOUHAN) भी रणखेत रहा। यह पृथ्वीराज चौहान का वंशज था। मदारिया का रावत दूदा भी बहुत से शत्रुओं को मार कर शहीद हुआ।

आमेर के दूदा शेखावत तथा कमर चंद कछवाहा भी काम आए। महाराणा उदयसिंह की एक रानी जालौर के सोनगरा चौहानों की राजकुमारी थी जिसका नाम जयवंता बाई (RANI JAIWANTA BAI) था। उसकी कोख से महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था।

रानी जयवंता बाई के पीहर वालों ने ईश्वर दास वीरमदेवोत के साथ मिलकर लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। बल्लू सिंह सोलंकी अकबर (AKBAR) के मांडलगढ़ आक्रमण के समय मांडलगढ़ छोड़कर चित्तौड़ आ गया था। उसने भी इस युद्ध में अपना बलिदान दिया। 

वीरगति पाने वालों में कल्लाजी राठौड़, राजा जयमल राठौड़ तथा फत्ता सिसोदिया साहित लगभग सत्रह सौ राजपूत महाराणा उदयसिंह (MAHARANA UDAISINGH) के सम्बन्धी थे। इस युद्ध में कुछ अफगान बंदूकचियों ने भी महाराणा उदयसिंह की ओर से भाग लिया था किंतु जब अकबर ने चित्तौड़ के दुर्ग में प्रवेश किया तो उनमें से एक भी नहीं मारा गया। इसके कारण पर स्वयं अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने खुलासा किया है।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम करवाया अकबर ने तीस हजार लोगों का! (86)

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चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम करवाया अकबर ने तीस हजार लोगों का!

जिस अकबर को पश्चिमी इतिहासकार तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूभारत का महान् राजा” और अकबर दी ग्रेट बताते नहीं थकते हैं, उसी अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग (CHITTOR FORT) में कत्लेआम करवाकर तीस हजार निरपराध हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया।

महान् कहे जाने वाले मुगल बादशाह अकबर (AKBAR THE GREAT) के समकालीन एवं पश्चवर्ती हिन्दू तथा मुसलमान लेखकों ने अकबर के चित्तौड़ घेरे (Siege of Chittor) के समय हुए युद्ध का वर्णन अपने-अपने दृष्टिकोण से किया है।

अकबर (AKBAR) का दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘ऐसी जंग आज से पहले ना किसी ने देखी और ना सुनी। इन चार महीनों में हजारों वाक्य लिखने लायक थे पर मैं सब-कुछ बयान नहीं कर सकता।’

अबुल फजल ने दुर्गरक्षकों द्वारा केसरिया किए जाने का उल्लेख नहीं किया है। उसने सारा विवरण इस प्रकार लिखा है जिससे ऐसा लगे कि राजपूतों की ओर से कोई प्रतिरोध नहीं किया गया और बादशाह की सेना ने उन्हें बड़ी आसानी से मार दिया। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का यह विवरण अबुल फजल की रचना में स्पष्ट झलकता है।

अबुल फजल लिखता है कि जयमल के मारे जाने पर सब राजपूतों का उत्साह भंग हो गया था और टूटी हुई प्राचीर के पास कोई राजपूत सैनिक दिखाई नहीं देता था। तो भी गाजियों अर्थात् शाही सैनिकों को सब ओर से एकत्र करके सावधानी बरती गई और उन्हें आदेश दिया गया कि प्रातःकाल दुर्ग में प्रवेश किया जाए।

बादशाह के आदेशानुसार प्रातःकाल होने पर योद्धाओं ने दुर्ग में प्रवेश करके पराजित लोगों को मारना और बांधना आरम्भ कर दिया। राजपूतों ने प्राण-प्रण से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हो गए। अकबर (AKBAR) ने आदेश दिया कि साबात के सामने से मजबूत हाथी दुर्ग में लाए जाएं। इस पर मधुकर, जंगिया, सब्दालिया और कादिरा नामक कई हाथी मंगवाए गए।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि महान् मुगल बादशाह अकबर (AKBAR) स्वयं भी एक विशाल हाथी पर सवार हुआ। उसके साथ कई हजार प्यादे थे। ईसरदार चौहान ने मधुकर नामक हाथी की सूंड पर खंडार मारा और एक हाथ से उसका दांत पकड़कर कहा मेरे इस कार्य की खबर अकबर को दे देना।

एक राजपूत ने जंगिया नामक हाथी की सूंड अपनी तलवार से काट डाली। फिर भी मरने से पहले वह हाथी खूब लड़ा। उसने 30 आदमियों को पहले ही आहत कर दिया था, अब 15 आदमियों को और मार डाला। कादिर नामक एक हाथी इस शोर को सुनकर दुर्ग में घुस गया और एक तंग मार्ग पर उसने कितने ही लोगों को कुचल डाला।

उस समय प्राचीर पर खड़ा हुआ बादशाह इस दृश्य को देख रहा था। जब सब्दालिया नामक हाथी दुर्ग में घुसा तो एक राजपूत ने झपटकर उसकी सूण्ड पर घाव कर दिया परंतु हाथी ने उसको अपनी सूंड में पकड़कर मार डाला। यह भी अकबर ने अपनी आंखों से देखा।

आरंभ में केवल 50 हाथी ही दुर्ग में घुसाए गए थे। फिर इनकी संख्या 300 कर दी गई। इन्होंने सब राजपूतों को कुचल डाला। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का यह दृश्य अत्यंत भयावह था।

अबुल फजल लिखता है कि दुर्ग में लड़ने वाले राजपूतों की संख्या 8 हजार थी परंतु चालीस हजार किसान इनकी सेवा करने आ पहुंचे थे। महान् मुगल बादशाह ने इन लोगों से निबटने के लिए दुर्ग में प्रवेश किया। इस पर बहुत से दुर्ग-रक्षक तथा किसान मंदिरों में घुस गए। उन्होंने समझा कि मूर्तियां उनके प्राण बचा लेंगी।

अबुल फजल ने जिन्हें किसान लिखा है, वस्तुतः उनमें दुर्ग के आसपास रहने वाले भील एवं विभिन्न जातियों के लोग सम्मिलित रहे होंगे। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम में इनकी भी भागीदारी दर्ज हुई।

अबुल फजल लिखता है कि कुछ लोग अपने घर में ही अपने अंत की प्रतीक्षा करते रहे। फिर कुछ लोग अपनी तलवारें लेकर मुसलमान सैनिकों का सामना करने के लिए आए और मारे गए। मंदिरों में से भी आदमी निकले और गाजियों ने उनको भी मार डाला।

अबुल फजल लिखता है कि प्रातःकाल से मध्यान्ह तक लगभग तीन हजार सैनिक मारे गए। जब ई.1303 में सुल्तान अलाउद्दीन ने छः मास और 7 दिन के घेरे के बाद यह दुर्ग जीता था तब उसने कृषकों को नहीं मारा था। क्योंकि कृषक उस लड़ाई में सम्मिलित नहीं हुए थे परंतु इस अवसर पर कृषकों ने बड़ा जोश और सक्रियता दिखाई। इसलिए महान् मुगल बादशाह ने उन्हें मारने के आदेश दिए।

इस पर कृषकों ने अकबर के पास जाकर इस युद्ध में अपनी सक्रियता के बारे में कई कारण बताए परंतु अकबर ने उनके तर्क स्वीकार नहीं किए तथा उसने अपनी सेना को आदेश दिए कि दुर्ग में मौजूद प्रत्येक कृषक को मार दिया जाए। इस पर शहंशाह की सेना ने लगभग 30 हजार मनुष्यों को मार डाला तथा लगभग इतने ही मनुष्यों को बंदी बना लिया। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम की यह घटना महान कहे जाने वाले अकबर (AKBAR THE GREAT) के इतिहास को कलंकित करने वाली है।

अबुल फजल लिखता है कि एक आश्चर्यजनक बात यह हुई कि महान् मुगल बादशाह अकबर ने अफागन बंदूकचियों की दुर्ग में बड़ी तलाश करवाई क्योंकि अकबर (AKBAR) उनसे बड़ा तंग था किंतु बहुत तलाश करने पर भी उन बंदूकचियों का पता नहीं चला।

अंत में ज्ञात हुआ कि वे लोग बादशाह की सेना को भुलावे में डालकर दुर्ग से सुरक्षित निकल गए। जब बादशाह की सेना दुर्ग में लूटमार करने में लगी थी, तब ये अफगान बंदूकची, जिनकी संख्या लगभग 1000 थी, अपनी स्त्रियों एवं बच्चों को अपनी पगड़ियों से बांध कर ले गए। बादशाह के सैनिकों को पता नहीं चल सका कि वे कौन लोग हैं!

क्योंकि महान् मुगल बादशाह के सैनिकों ने समझा कि ये लोग शाही सेना के सैनिक हैं तथा दुर्ग के कैदियों को पकड़कर ले जा रहे हैं। इस प्रकार उन अफगान बंदूकचियों की युक्ति सफल हो गई और वे अकबर की सेना की आंखों में धूल झौंककर दुर्ग से बाहर चले गए।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि उस दिन चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम इतना भयानक था कि ऐसा कोई घर एवं मार्ग नहीं था जहाँ पर मुर्दों के ढेर नहीं लगे हों परंतु तीन स्थानों पर मारे जाने वालों की संख्या बहुत अधिक थी।

दुर्ग में महाराणा उदयसिंह के महल में बहुत से राजपूत इकट्ठे हो गए थे। वह दो-दो, तीन-तीन करके बाहर निकले और उन्होंने अपने प्राणों को रण में न्यौछावर कर दिया। बहुत से राजपूत महादेव के मंदिर में एकत्रित हो गए थे। उन्होंने रामपुर दरवाजे के बाहर अपने शरीर त्याग दिए।

उस दिन शाही सेना में जरा बलीकूची के अतिरिक्त और कोई नहीं मारा गया। महान् मुगल बादशाह (Akbar) ने अल्लाह को धन्यवाद दिया और दोपहर के बाद वह अपने शिविर में चला गया।

राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि किले में प्रवेश करते समय आठ हजार राजपूतों ने बड़े महंगे दामों पर अपने प्राणों को बेचा। अकबर को इस वीरता का सम्मान करना चाहिए था किंतु वह चूक गया। उसने चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का आदेश दिया। तीस हजार आदमियों ने प्राण गंवाए। कहा जाता है कि मरे हुए लोगों के जनेऊ को तौला गया तो उनका वजन 47 मन हुआ। इस प्रकार फरवरी 1568 में अकबर ने सदा के लिए निर्जन चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayun ) लिखता है कि दोपहर बाद शहंशाह ने थैला भराई बंद करने का आदेश दिया और मुकाम पर लौट गया। थैला भराई से मुल्ला बदायूंनी का आशय किस चीज से है, इसके बारे में ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता किंतु ऐसा लगता है कि जो शव किले में बिखरे पड़े थे उन्हें थैलों में बंद करके वहाँ से हटाया गया था।

अकबर (AKBAR) वहाँ पर वह तीन दिन रहा तथा विजय के पत्र लिखे और अपनी विजय के समाचार सभी दिशाओं में भेज दिए। युद्ध समाप्त होने के बाद तीन अकबर दिनों तक चित्तौड़ दुर्ग के सैनिक शिविर में रहा। उसने चित्तौड़ दुर्ग अब्दुल मजीद आसिफ खाँ के सुपुर्द कर दिया तथा चित्तौड़ नामक नवीन सरकार का गठन करके आसफ खाँ को इस सरकार का सूबेदार बना दिया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

चित्तौड़ से पलायन कर गए हजारों राजपूत परिवार (87)

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चित्तौड़ से पलायन

जब अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करके उसमें रहने वाले तीस हजार हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया तो  हजारों राजपूत परिवार चित्तौड़ को स्वतंत्र कराने का संकल्प लेकर गाड़ियों में बैठकर चित्तौड़ से पलायन कर गए!

 24 फरवरी 1568 को चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने के बाद अकबर (AKBAR) ने दुर्ग में कत्लेआम के आदेश दिए। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अकबर के आदेश से तीस हजार लोग मार दिए गए तथा इतने ही बंदी बना लिए गए।

कहा नहीं जा सकता कि चित्तौड़ दुर्ग में काम आए आठ हजार चित्तौड़ी सैनिकों की संख्या तथा जौहर में प्राण देने वाली स्त्रियों एवं बच्चों की संख्या इन 30 हजार में सम्मिलित है, अथवा उनसे अलग है! कई लोग शंका करते हैं कि एक दुर्ग में आखिर कितने लोग आ सकते हैं!

ज्ञातव्य है कि चित्तौड़ का दुर्ग लगभग 8 किलोमीटर लम्बे और 2 किलोमीटर चौड़े पहाड़ पर बना हुआ है। इस दुर्ग का क्षेत्रफल लगभग 280 हैक्टेयर है। यह भारत का विशालतम दुर्ग है। इस दुर्ग में आज भी एक नगर बसा हुआ है।

अकबर से हुई लड़ाई के समय दुर्ग में लगभग 8 हजार सैनिक तैनात थे। उनके परिवार के सदस्यों की संख्या अलग थी। अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग का पतन होने लगा था, तब आसपास के क्षेत्रों से रहने वाले 40,000 किसान भी दुर्ग की रक्षा के लिए आ गए थे।

अकबर (AKBAR) ने दुर्ग में इन्हीं में से तीस हजार मनुष्यों का कत्ल करवाया था क्योंकि दुर्ग में रहने वाले सैनिकों एवं उनके परिवारों के सदस्यों में से तो अधिकांश लोग या तो साका के अंतर्गत अपने प्राण दे चुके थे, या दुर्ग छोड़कर जा चुके थे।

चित्तौड़ के इस युद्ध में एक भूला-बिसरा पन्ना उन लोगों का भी है जो दुर्ग पर विदेशियों का अधिकार होते देखकर वहाँ से अपने परिवारों को साथ लेकर निकल गए थे। चित्तौड़ से पलायन करते समय उन्होंने प्रण लिया कि वे तब तक धरती पर अपना घर नहीं बनाएंगे जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं हो जाएगा।

चित्तौड़ तो जहांगीर (JAHANGIR) के शासन काल में पुनः स्वतंत्र होकर महाराणा के पास आ गया किंतु इन लोगों की गाड़ियां कभी चित्तौड़ दुर्ग में नहीं लौटीं। हजारों राजपूत परिवारों की चित्तौड़ से पलायन की ऐतिहासिक परिणति यह है कि साढ़े पांच सौ साल बीत जाने पर भी उनके वंशज बैलगाड़ियों में बैठे हुए आज भी पूरे देश में घूम रहे हैं।

युद्धकर्म छूट जाने पर इन लोगों ने लुहार का काम पकड़ लिया और वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमने लगे। समय बीतने के बाद वे गाड़िया लुहार कहलाने लगे। आज भी राजस्थान की गाड़िया लोहार एक ऐसी अनोखी घुमक्कड़ जाति है, जो अपना घर नहीं बनाती, एक स्थान पर टिक कर नहीं रहती। यह जीवनशैली चित्तौड़ से पलायन की देन है।

बैलगाड़ी ही इनका चलता-फिरता घर है। इनका जीवन इसी बैलगाड़ी में पूरा होता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सभी-कुछ बैलगाड़ी में होते हैं। यह परंपरा चित्तौड़ से पलायन की स्मृति को जीवित रखती है।

गाड़िया लोहारों में मान्यता है कि जब वे युद्ध के बाद अपने घरों को लौट रहे थे, तब मार्ग में इन्हें एक रथ पर बैठे भगवान मिले। भगवान के रथ की धुरी टूट गयी थी। इन लोगों ने भगवान के रथ की धुरी जोड़ दी। तब भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हें लोहे के काम में पराजित नहीं होना पड़ेगा।

तभी से गाड़िया लोहार पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही कार्य करते आ रहे हैं। ये लोग लोहे को पीटकर आजीविका चलाते हैं। पुरुष आग से गर्म लोहे को निकालकर एरन पर रखते हैं और स्त्रियां घन (भारी हथौड़े) से चोट करती हैं।

ये लोहे के तरह-तरह के सामान और औजार भी बनाते हैं जिनमें चिमटा, हंसिया, खुरपी, कुल्हाड़ी, करछली आदि होते हैं। इन लोगों की गाड़ियाँ बहुत कलात्मक ढंग से बनी होती हैं। गाड़ी के विविध हिस्सों में पीतल के गोल कलात्मक पतरे कील से जड़े रहते हैं।

गाड़ी के पहिये भी भव्य और भारी होते हैं जो किसी ऐतिहासिक रथ के पहिए की तरह दिखते हैं। इनकी गाड़ी का रंग गहरा काला होता है ताकि इनकी सुंदर बहू-बेटियों को किसी की बुरी नजर नहीं लगे।

गाड़िया लुहार पुरुष धोती और बंडी पहनते हैं जबकि महिलाएं कलात्मक पहनावा पहनती हैं। वे गले में चांदी का कड़ा, हाथों में भुजाओं तक कांच, लाख, सीप एवं तांबे की चूड़ियां, नाक में लंबी नथ, पांव में चांदी के भारी कड़े, कानों में पीतल या सीप की बालियां पहनती हैं।

 सिर पर आठ-दस तरह की चोटियां गूंथती हैं जिनमें कौड़ियों की माला जैसी गुंथाई भी होती है। महिलाएं अपने पैरों की लंबाई से आधा फुट छोटा छींटदार लहंगा पहनती हैं। कमर में कांचली पहनती हैं तथा अपने शरीर पर गोदने गुदवाती हैं जिसे गाड़िया लुहारों का पहचान-चिन्ह भी माना जाता है।

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ये लोग कई प्रतिज्ञाओं का पालन करते हैं। सिर पर टोपी नहीं पहनते, पलंग पर नहीं सोते, घर नहीं बनाते, दिया नहीं जलाते, कुएं से पानी नहीं भरते, बड़ी नली का हुक्का काम में नहीं लेते, कमर में काले रंग के अतिरिक्त अन्य किसी रंग का नाड़ा नहीं बांधते, अन्य जाति की स्त्री से विवाह नहीं करते, स्वजन की मृत्यु पर विलाप नहीं करते, एक से अधिक कंघा नहीं रखते। कंघा टूटने पर उसे जमीन में गाढ़ते हैं। नया कंघा कुलदेवी की तस्वीर के समक्ष रखकर पवित्र करते हैं। ये लोग माचिस से कभी आग नहीं जलाते, बल्कि इनकी अंगीठी में सुलगते कोयले के कुछ टुकड़े हमेशा पड़े रहते हैं। इनमें मान्यता है, नई आग जलाने से पुरखों की आत्माएं कष्ट पाती हैं। ये लोग प्रायः कुत्ते पालते हैं। विवाह होने पर नवदम्पत्ति अपने जीवन की पहली रात गाड़ी में गुजारते हैं तथा प्रण लेते हैं कि वे अपनी भावी संतान को चलती बैलगाड़ी में जन्म देंगे, ताकि उसमें भी घुमक्कड़ संस्कार समा सकें। इन लोगों में विवाह के तरीके अनोखे होते हैं। दुल्हन पाने के लिए दूल्हे को एक से दस किलो तक चांदी दुल्हन के पिता को भेंट करनी होती है। इनके विवाह में मोरपंख का बड़ा महत्व है। अग्नि के चारों ओर फेरे लेने के उपरांत दुल्हन अपने पति को एक मोरपंख भेंट करती है चित्तौड़ से पलायन के साढ़े पाँच सौ साल बाद भी इतिहास का यह भूला-बिसरा पन्ना सड़कों पर चलता.फिरता दिखाई देता है।

अबुल फजल लिखता है कि जब चित्तौड़ का घेरा शुरू हुआ था तो अकबर (AKBAR) ने संकल्प लिया था कि चित्तौड़ दुर्ग को जीतने के बाद वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की पैदल यात्रा करेगा। इसलिए 28 फरवरी 1568 को अकबर ने वापसी के नगाड़े बजवाए और तपते हुए मरुस्थल में जब बड़ी ही गर्म लू चल रही थी तो उसने पैदल यात्रा करना शुरू कर दी।

 अबुल फजल ने चाटुकारिता की समस्त सीमाएं लांघकर फरवरी के महीने में चित्तौड़ और अजमेर के बीच में तपता हुआ मरुस्थल दिखाया है और वहाँ गर्म लूओं का बहना दिखाया है। न तो इस क्षेत्र में मरुस्थल है, न वह फरवरी के महीने में तपता है और न भारत के किसी भी भूभाग में फरवरी के महीने में लूएं चलती हैं।

इस क्षेत्र में फरवरी का महीना आज भी काफी ठण्ठा होता है। आज से पांच सौ साल पहले फरवरी का महीना और भी अधिक ठण्डा रहा होगा!

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अपने वायदे के अनुसार पूरे रास्ते पैदल चलकर रमजान माह की सातवीं तारीख को अकबर (AKBAR) अजमेर पहुंच गया। वहाँ वह ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गया। खैरात बांटी, अच्छे और नेक काम किए तथा दस दिन बाद सवार होकर राजधानी के लिए चल पड़ा।

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रणथंभौर पर अभियान – अकबर भारत विजय की ओर (88)

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रणथंभौर पर अभियान

चित्तौड़ का गर्व धूल में मिलाने के बाद बादशाह अकबर (AKBAR THE GREAT) ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा  में अपनी सेनाएं भेजीं तथा स्वयं रणथंभौर पर अभियान करने चल दिया। वह भारत विजय के अपने अभियान को बड़ी तेजी से कार्यान्वित करना चाहता था।

चित्तौड़गढ़ हाथ से निकल जाने के बाद महाराणा उदयसिंह (MAHARANA UDAISINGH) कुछ समय के लिए कुम्भलगढ़ में रहा किंतु कुछ समय बाद महाराणा अपने बचे हुए हिन्दू सैनिकों के साथ उदयपुर पहुँचा और उसने अपने अधूरे पड़े महलों को पूरा कराया।

ई.1572 के आरम्भ में महाराणा उदयसिंह गोगूंदा (GOGUNDA) आया। 15 फरवरी 1572 को गोगूंदा में ही महाराणा उदयसिंह का निधन हुआ जहाँ उसकी छतरी बनी हुई है। चित्तौड़ दुर्ग के पतन से महाराणा की शक्ति इतनी अधिक क्षीण हो चुकी थी कि वह चित्तौड़ को दुबारा लेने का प्रयास नहीं कर सका।

उधर अकबर (AKBAR) भी अजमेर होता हुआ आगरा चला गया। अकबर जयमल (JAIMAL) और फत्ता (FATTA) को तो अपने अधीन नहीं कर सका किंतु आगरा पहुंचकर उसने हाथियों पर चढ़ी हुई जयमल और फत्ता की पाषाण प्रतिमाएं बनवाकर आगरा दुर्ग के द्वार पर खड़ी करवाईं।

औरंगजेब के शासन काल में जब फ्रैंच यात्री बर्नियर (Bernier) भारत आया था, तब भी ये मूर्तियां वहीं पर खड़ी थीं। बर्नियर की यात्रा के छः साल बाद औरंगजेब ने इन मूर्तियों को तुड़वा दिया।

जिस वर्ष अकबर (AKBAR) ने चित्तौड़ का किला जीता, अर्थात् ई.1568 में बंगाल के शासक सुलेमान ने अकबर (AKBAR) की अधीनता स्वीकार कर ली। उसने अकबर (AKBAR) के नाम का खुतबा पढ़वाया, अकबर (AKBAR) के नाम के सिक्के ढलवाए तथा खानखाना मुनीम खाँ से भेंट करके उससे संधि कर ली।

वस्तुतः बंगाल का शासक सुलेमान उड़ीसा के हिन्दू राजा को मारकर उसका राज्य हड़पना चाहता था, इसलिए उसने मुनीम खाँ से दोस्ती कर ली ताकि जब सुलेमान उड़ीसा के हिन्दू राज्य पर हमला करे तो मुगल सेना, सुलेमान के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करे।

जब खानखाना मुनीम खाँ बंगाल के शासक सुलेमान से संधि करके लौट गया तब सुलेमान ने उड़ीसा के राजा के साथ छल करके उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। सुलेमान की इस कार्यवाही पर मुगलों ने कोई आपत्ति नहीं की।

पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर ने बादशाह बनते समय संकल्प लिया था कि वह सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करेगा। इस कारण जिस दिन से उसने बादशाहत संभाली थी, उसी दिन से अकबर इस दिशा में काम कर रहा था।

यदि हम उसके दरबारियों एवं समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों को पढ़ें तो हम जान पाएंगे कि अकबर (AKBAR) ने अपने जीवन में तीन ही काम किए।

पहला यह कि वह जीवन भर अफगानियों एवं राजपूतों के राज्यों को अपने अधीन करने में लगा रहा। दूसरा यह कि जब तक उसके शरीर में दम रहा, वह जंगलों में जाकर शिकार खेलता रहा और तीसरा यह कि वह जीवन भर पराई औरतों को पाने के लिए तरह-तरह के उपाय करता रहा।

जब औरतों से उसका जी भर जाता तो वह शिकार खेलने चल देता था, जब शिकार से जी भर जाता तो वह युद्ध करने चला जाता था। जब युद्ध करने से जी भर जाता तो फिर से औरतों की तलाश में लग जाता था।

चित्तौड़ से लौटने के बाद अकबर (AKBAR) लगभग नौ माह तक अपने रनिवास में व्यस्त रहा। वर्ष 1568 के अंत में अकबर ने महाराणा उदयसिंह के दूसरे सबसे सुदृढ़ दुर्ग रणथंभौर पर अभियान करने का विचार किया।

दिल्ली से निकटता तथा मालवा और मेवाड़ के मध्य स्थित होने के कारण AKBAR के लिए यह आवश्यक हो गया था कि रणथंभौर पर अभियान करे तथा इस दुर्ग पर अधिकार जमाये।

मान्यता है कि रणथंभौर दुर्ग को सातवीं शताब्दी ईस्वी में चंद्रवंशी राजा रंतिदेव ने बनवाया था। अधिकतर विद्वान इस दुर्ग को नौवीं शताब्दी ईस्वी में चौहानों द्वारा निर्मित मानते हैं।

रणथंभौर का दुर्ग अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ एक पार्वत्य दुर्ग है। यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर बना हुआ है, उसकी समुद्र तल से ऊँचाई 1578 फुट है। दुर्ग लगभग 500 फुट ऊंचा है। दुर्ग की परिधि लगभग 12 किलोमीटर तथा कुल क्षेत्रफल लगभग 11.45 वर्ग किलोमीटर है।

यह दुर्ग विषम आकार वाली सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है। बीच-बीच में गहरी खाइयां और नाले हैं। ये सारे नाले चम्बल एवं बनास नदियों में जाकर मिलते हैं। रणथंभौर दुर्ग ऊंचे गिरि शिखर पर बना हुआ है। अपने निर्माण के समय यह दुर्ग घने जंगलों से घिरा हुआ था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि यह दुर्ग पहाड़ियों के बीच में स्थित है। इसीलिए इस दुर्ग के बारे में कहा जाता है कि इस दुर्ग ने कवच धारण कर रखा है जबकि अन्य दुर्ग नंगे हैं। वह लिखता है कि यह दुर्ग रण नामक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है जिसके कारण इस दुर्ग का नाम रणतःपुर है जिसका अर्थ होता है- ‘रण की घाटी में स्थित नगर।’

इस दुर्ग का प्रचलित नाम रणथंभौर है जो रण तथा थंभ नामक दो पहाड़ियों के नाम पर है। रण उस पहाड़ी का नाम है जो किले से ठीक नीचे स्थित है तथा थंभ उस पहाड़ी का नाम है जिस पर यह दुर्ग स्थित है।

अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान की रानी रखल देवी ने इस दुर्ग के जैन मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाया था। 12वीं शताब्दी के जैन लेखक सिद्धसेन सूरी ने इस दुर्ग को प्रमुख जैन तीर्थों में गिना है। मुहम्मद गौरी से लड़ने के लिये युद्ध पर जाने से पहले सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने इसी दुर्ग में अपनी सेना एकत्रित की थी।

ई.1192 में तराईन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान का राज्य समाप्त हो गया किंतु उसके बाद भी यह दुर्ग चौहानों के अधिकार में बना रहा। ई.1226 में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने एक विशाल सेना लेकर रणथंभौर पर अभियान किया।

मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि अल्लाह की रहमत से ई.1226 में रणथंभौर के उस मजबूत किले पर सुल्तान इल्तुतमिश का अधिकार हो गया, जिसे लेने में 70 बादशाह असफल हो गए थे।

रणथंभौर पर अभियान में असफल होने वाले 70 बादशाह कौनसे थे, इसके बारे में मिनहाज कुछ भी सूचना नहीं देता है। फिर भी मिनहाज के इस कथन से इस बात का आभास हो जाता है कि दिल्ली के मुसलमानों को रणथंभौर पर आसानी से जीत नहीं मिल सकी थी।

जब ई.1236 में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई तो पृथ्वीराज चौहान के वंशजों ने रणथंभौर पर अभियान किया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशाह एवं उसकी माता शाह तुर्कान, रणथंभौर दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को कोई सहायता नहीं भेज सके।

इस कारण दिल्ली की तुर्की सेना रणथंभौर दुर्ग में फंस गई। कुछ माह बाद जब इल्तुतमिश की पुत्री रजिया दिल्ली की सुल्तान बनी तो उसने राजपूतों से समझौता करके अपने सैनिकों को रणथंभौर दुर्ग से बाहर निकाला।

जिस समय हम्मीरदेव चौहान इस दुर्ग का शासक था उस समय 12 मार्च 1291 को दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु जब वह इस दुर्ग को नहीं जीत पाया तो यह कहकर दिल्ली लौट गया कि- ‘जलालुद्दीन खिलजी ऐसे दस किलों को मुसलमान के एक बाल के तुल्य भी नहीं समझता।’

 ई.1301 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर की ओर अभियान किया और दुर्ग रक्षकों को रिश्वत खिलाकर अपनी सेना को दुर्ग में घुसाने में सफल हो गया।

दुर्ग का पतन होता देखकर राजा हम्मीर देव चौहान की रानियों एवं दुर्ग में रहने वाली महिलाओं ने जौहर किया। आज रणथंभौर एक बार फिर इतिहस के उसी मुहाने पर आ खड़ा हुआ था। अकबर (AKBAR) की सेनाएं रणथंभौर के लिए चल पड़ीं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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अपराजित पृच्छा : शक्ति-पूजा और शिल्प परम्परा का अद्भुत ग्रंथ!

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भारतीय संस्कृति में शक्ति-पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहन है। देवी-पूजन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि...
कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप - www.bharatkaitihas.com

कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गए! (84)

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वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में...
सुप्रभेदागम - www.bharatkaitihas.com

सुप्रभेदागम: शैव आगम, दर्शन और मंदिर वास्तुकला का अद्भुत ग्रंथ

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सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) हिन्दू धर्म के शैव संप्रदाय की शैव सिद्धांत (Shaiva Siddhanta) परंपरा  का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सामान्यतः 'आगम' शब्द का प्रयोग...
नटराज शिव - www.bharatkaitihas.com

नटराज शिव के तांडव में छिपा हिन्दू दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

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नटराज का शाब्दिक अर्थ है— नृत्य का राजा। यह शिव का वह अद्वितीय रूप है जिसमें वे नृत्य के माध्यम से सृष्टि के सृजन,...
कामिकागम - www.bharatkaitihas.com

कामिकागम (Kamikagama): शैव दर्शन और मंदिर वास्तुकला का आधार स्तंभ

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कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त परंपरा का एक प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें मंदिर निर्माण, पूजा-विधि और तांत्रिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है। शैव दर्शन और...
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