Tuesday, April 23, 2024
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प्रथम सिद्ध सरहपाद

चौरासी सिद्धों की परम्परा में हुए प्रथम सिद्ध सरहपाद ने भारत के साहित्य, दर्शन एवं अध्यात्म को गहराई तक प्रभावित किया किंतु दुर्भाग्य से देश पर विदेशियों के शासन काल में उनका साहित्य कई शताब्दियों के लिए गुमनामी के अंधेरे में चला गया। इस कारण भारत के लोग सरहपाद के बारे में भूल गए।

हीनयान-महायान

छठी शताब्दी ईस्वी में जब कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य और मण्डन मिश्र आदि वेदांतियों ने बौद्धधर्म में फैली कुरीतियों पर आघात किया तो बौद्धधर्म दो भागों में बंट गया जिन्हें ‘हीनयान’ और ‘महायान’ कहा जाता है। हीनयान बौद्धधर्म का चिन्तन पक्ष या सैद्धान्तिक पक्ष था और महायान व्यावहारिक पक्ष। महायान का और भी आगे विभाजन हुआ तथा उसमें व्रजयान एवं सहजयान आदि मत उत्पन्न हो गए।

सिद्धों का उद्भव

महायान में बौद्ध दर्शन एवं उसके साधना पक्ष को लेकर नवीन धारणाएं अपनाने की छूट थी। कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने करुणा पर अडिग रहते हुए, मठ का जीवन त्यागकर, सरल साधना का मार्ग अपनाया और यहीं से वे तंत्र और अभिचार की ओर मुड़े। कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधाना में नए-नए प्रयोग किए। इन्हीं में से कुछ साधक सिद्ध कहलाए। सिद्धों की इस परम्परा में कुल चौरासी सिद्ध हुए।

 प्रथम सिद्ध सरहपाद  

राहुल सांकृत्यायन ने चौरासी सिद्धों में से दस को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण माना है जिनमें सरहपाद सर्वप्रथम हैं। उनका समय आठवीं शताब्दी ईस्वी माना जाता है। सरहपाद के आविर्भाव के समय बौद्धधर्म में तंत्र-मंत्र आदि कुरीतियों का बोलबाला था। इन कुरीतियों और दार्शनिक अन्तर्द्वन्द्व की पृठभूमि में सिद्धों का पदार्पण हुआ। सरहपाद के दर्शन ने कई शताब्दियों तक न केवल बौद्धधर्म को अपितु हिन्दू धर्म को भी प्रभावित किया।

सरहपाद का जीवन काल

डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य ने सरहपा का समय संवत् 690 (ई.633) निर्धारित किया है। राहुल सांकृत्यायन ने उनका जन्म सं. 750 (ई.693) में होना माना है। इस आधार पर डॉ. रामप्रसाद सिंह ने सरहपा का निधन ई.780 के आसपास होना माना है। कुछ विद्वान सरहपा की आयु सौ साल मानकर उनका जन्म ई.680 में और मृत्यु 780 में अनुमानित करते हैं। मगधराज धर्मपाल (शासनकाल ई.770-810) सरहपा का समकालीन था जिसने बड़ी संख्या में बौद्ध मठ एवं विहार बनवाए थे तथा विक्रमशिला का विश्वप्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय बनवाया था। 

 प्रथम सिद्ध सरहपाद का वास्तविक नाम

सरहपाद के बचपन का नाम सरोज था। जब उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्धधर्म स्वीकार किया तब उनका नाम राहुलभद्र रखा गया। जब उन्होंने बौद्धधर्म के अंतर्गत वज्रयान की दीक्षा ली तो उन्हें सरोजवज्र नाम दिया गया। जब सरहपाद ने बौद्धधर्म एवं वज्रयान छोड़कर गृहस्थ जीवन अपना लिया और गृहस्थी पालने के लिए सरकण्डे के सरह (बाण) बनाने का काम आरम्भ तब उन्होंने अपना नाम सरह रख लिया।

उनके शिष्यों ने सरह के साथ आदर-सूचक शब्द ‘पाद’ जोड़ दिया जिससे वे सरहपाद हो गए। यही नाम आगे चलकर सरहपा हो गया। अपने जीवन काल के अंतिम भाग में वे इसी नाम से जाने जाते थे।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

 प्रथम सिद्ध सरहपाद सरहपा का जन्म बिहार राज्य के भागलपुर अनुमंडल के राज्ञी कस्बे के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे शैशव अवस्था से ही तीव्र बुद्धि के थे। उन्होंने प्रबुद्ध ब्राह्मण परिवार और ब्राह्मणी व्यवस्था में रहकर घर में ही वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत, व्याकरण एवं विविध संस्कृत साहित्य अध्ययन किया।

विवाह

जब सरोज वयस्क हुए तो उनका मन ब्राह्मण धर्म की रूढ़ियों और परम्पराओं से विचलित होने लगा। यह देखकर उनके माता-पिता ने एक ब्राह्मण कन्या से उनका विवाह कर दिया परन्तु सरोज का मन परिवार में नहीं रम सका।

गृहत्याग

एक दिन सरोज नदी के किनारे भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उनका ध्यान सहज रूप से विकसित होती हुई प्रकृति की ओर गया। उन्होंने देखा कि मनुष्य को छोड़कर प्रकृति की किसी भी रचना पर किसी भी बाह्य व्यवस्था का अथवा कृत्रिमता का नियंत्रण नहीं है। प्रकृति की प्रत्येक रचना सहज रूप में विकसित होती है। इस चिंतन के कारण सरोज ने सहज जीवन की खोज करने का निश्चय किया तथा गृहस्थी से विरक्ति अनुभव की। उन्होंने गृहत्याग कर दिया और वे जीवन के सहज स्वरूप की खोज में इधर-उधर भटकने लगे।

बौद्ध गुरु की शरण में

कुछ दिनों तक इधर-उधर घूमने के बाद सरोज नालंदा पहुँचे जहाँ उन्होंने बुद्ध की करुणा सम्बन्धी शिक्षा से प्रभावित होकर बौद्धधर्म के शास्त्र पढ़ने को लिए नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने का निश्चय किया। नालंदा विश्वविद्यालय में उनकी द्वार-परीक्षा हुई जिसमें वे उत्तीर्ण हो गए।

सरोज ने अपना परम्परागत गृहस्थ-वेश त्यागकर चीवर धारण कर लिया। यहाँ उन्हें भिक्खु राहुलभद्र कहा गया। वे बौद्ध भिक्षु हरिभद्र के शिष्य बन गए। हरिभद्र प्रसिद्ध बौद्ध-आचार्य शांतरक्षित के शिष्य थे। राहुलभद्र अपने आचार्य हरिभद्र से अत्यधिक प्रभावित हुए।

नालंदा में अध्यापन

राहुलभद्र अपनी पारिवारिक शिक्षण परम्परा के कारण वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों के ज्ञाता थे। बौद्ध गुरुओं की शिक्षा से राहुलभद्र बौद्धधर्म के विद्वान बन गए और अध्ययन पूर्ण होने पर नालंदा विश्वविद्यालय में ही शिक्षक नियुक्त हो गए। नालंदा में उनका सम्पर्क नागार्जुन, शान्तरक्षित और दिङ्नाग जैसे उद्भट बौद्ध विद्वानों से हुआ।

काव्य रचना

अध्यापनकाल में राहुलभद्र ने कविताएं लिखना आरम्भ किया। उन्होंने संस्कृत भाषा के साथ-साथ अपभ्रंश एवं मागधी (मगही) में भी कविताएं लिखीं। उन्होंने बौद्धधर्म का प्रचार करने के लिए मागधी भाषा को चुना। हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें पुरानी हिन्दी का पहला कवि माना जाता है।

नालंदा का त्याग

कुछ समय बाद राहुलभद्र को बौद्ध दर्शन की अनिवार्यताएं खलने लगीं। उन्हें लगा कि बौद्धधर्म की भिक्षु जीवन शैली, स्त्री सम्पर्क से निषेध, मठ अथवा विहार में निवास एवं चीवर धारण करने जैसी अनिवार्यताएं मानव के सहज जीवन के विकास में अवरोधक है। इस कारण राहुलभद्र ने नालंदा विश्वविद्यालय छोड़ दिया और फिर से भटकने लगे।

सरहकन्या से विवाह

राहुलभद्र कई दिनों तक इधर-उधर विचरण करते हुए राजगृह नामक नगर में ऐसे स्थान पर पहुँचे, जहाँ कुछ लोग सरकंडों से बाण बनाते थे। राहुलभद्र ने देखा कि ये लोग प्रकृति के सुन्दरतम स्थान में रहकर सहज रूप से अपने-अपने कर्म में लगे हैं।

उन्होंने सरहकन्या नामक एक सुन्दर किशोरी को भी देखा जो तरुणाई में ही योगिनी के रूप में अपना जीवन सहज रूप से व्यतीत कर रही थी। राहुलभद्र सरहकन्या पर मोहित हो गए और उससे विवाह करके उसके साथ रहने लगे। राहुलभद्र ने गृहस्थी चलाने के लिए सरह (बाण) बनाने का काम आरंभ कर दिया। उन्होंने अपने बौद्ध नाम का त्याग कर दिया तथा अपना नाम ‘सरह’ रख लिया।

सहज जीवन जीने के उपदेश

राजगृह में रहकर सरह लोगों को अपना सहज कर्म करने तथा सहज जीवन जीने की शिक्षा देने लगे। धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग उनके शिष्य बन गए। उनके शिष्यों ने सरह को श्रद्धा एवं विनय से सरहपाद कहना आरम्भ कर दिया। धीरे-धीरे वे सहरपा कहलाने लगे।

सहजयान का उदय

सरहपा इस काल तक बहुज्ञ और बहुश्रुत हो गए थे। वे बौद्धधर्म की वज्रयान शाखा में दीक्षित हुए थे किंतु उनके सिद्धांत न तो बौद्ध मत से मेल खाते थे और न व्रजयान से। इसलिए उनके द्वारा दिए जा रहे उपदेशों को सहजयान कहा जाने लगा।

भारत भ्रमण

सरहपा किसी एक स्थान पर नहीं टिक सकते थे। इसलिए कुछ समय बाद उन्होंने राजगृह का त्याग कर दिया और अपनी पत्नी सरहकन्या के साथ देश का भ्रमण करने लगे। वे तपोवन होते हुए बोधगया पहुँचे। वहाँ कुछ दिन ठहर कर दक्षिण की तरफ यात्रा करते हुए विदिशा पहुँचे। श्रीपर्वत पर उनकी भेंट बौद्ध विद्वान नागार्जुन से हुई।

जब सरहपा जनसाधारण को सहजयान का उपदेश देते हुए भारत भ्रमण करने लगे तो उनके शिष्यों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने लगी। तदन्तर वे विंध्याचल पहुँचे। यहाँ उन्होंने बड़ी संख्या में पशुबलि होते हुए देखी। सरहपा ने  पशुबलि का प्रबल विरोध किया। पहले तो लोग उनसे सहमत नहीं हुए किंतु धीरे-धीरे उनकी बात मान गए।

इसके बाद सरहपा फिर से उत्तर भारत लौट आए तथा प्रयाग पहुँचे। जब वे प्रयाग में जनसाधारण के बीच घूम-घूम कर सहजयान के उपदेश देने लगे तो अन्य धर्मावलम्बियों ने उनका विरोध किया। कई बार मारपीट की स्थिति उत्पन्न हो गई। फिर भी सरहपा ने उनके प्रति करुण भाव रखकर उन्हें सहज मार्ग पर चलने का उपदेश दिया।

विभिन्न धर्मों के मठाधीश भले ही सहरपा का विरोध कर रहे थे किंतु जनसाधारण को उनकी बातें समझ में आ रही थीं। इसलिए प्रयाग में भी लोग बड़ी संख्या में उनके शिष्य हो गए। इसके बाद सरहपा ने काशी में ब्राह्मण धर्मावलम्बियों के आडम्बरों का घोर विरोध किया और गंगाजी के किनारे निर्जन स्थान पर बैठकर चौदह दिनों तक साधना की। यहाँ से वे रामधाम साकेत गये और सरयू नदी के किनारे पर रहने वाले कुछ साधु-संतों को नैरात्म-करुणा का रहस्य बताया।

सरहपा ने वृन्दावन पहुंचकर नैरात्मक करुणा के उपदेश दिए। इसके पश्चात् वे हिमालय की तराई में पहुंचकर कुछ दिन रुके। अंत में उन्होंने अपनी यात्रा को विराम देने का निश्चय किया। वे पुनः राजगृह पहुंचे और वहीं पर उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया।

सरहपाद का साहित्य

डॉ. रामकुमार वर्मा ने  प्रथम सिद्ध सरहपाद को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। इनकी रचनाओं का प्रभाव उस काल के हिन्दी साहित्य की परम्परा पर पड़ा है। राहुल सांकृत्यायन ने 32 ग्रंथों की चर्चा की है जो सरहपाद के नाम से मिलते हैं।

सरहपाद ने एक दार्शनिक एवं चिंतक के रूप में देश, धर्म एवं समाज के समक्ष नवीन आदर्श प्रस्तुत किया तथा भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में नई क्रांति को जन्म दिया। उनमें उपनिषदों की करुणा तथा बुद्ध की मध्यम जीवन पद्धति का मिश्रण था। उन्हीं का अनुकरण करके नाथों एवं कबीरपंथियों ने अपना काव्य रचा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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