शैव सिद्धांत (Shaiva Siddhanta) शैव दर्शन की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली शाखाओं में से एक है। यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में अत्यधिक प्रचलित है और इसे ‘शुद्ध अद्वैत’ या ‘द्वैत-अद्वैत’ के एक संतुलित रूप में देखा जाता है।
शैव सिद्धांत का मूल आधार 28 शैव आगम (Shaiv Agam) ग्रंथ हैं। दक्षिण भारत के अधिकांश शिव मंदिरों (जैसे चिदंबरम और रामेश्वरम) में आज भी कामिक और कारण आगम के अनुसार ही पूजा-अर्चना की जाती है।
शैव सिद्धांत का दर्शन
1. तीन मुख्य तत्व: पति, पशु और पाश
शैव सिद्धांत का पूरा दर्शन तीन शाश्वत तत्वों (पदार्थों) के इर्द-गिर्द घूमता है। इसे समझने के लिए नीचे दिए गए त्रिकोण को आधार माना जा सकता है-
- पति (Pati): इसका अर्थ है ‘स्वामी’ या ‘ईश्वर’। यहाँ भगवान शिव ही ‘पति’ हैं। वे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और दयालु हैं। वे सृष्टि के कर्ता, धर्ता और संहारक हैं, लेकिन वे माया से निर्लिप्त रहते हैं।
- पशु (Pashu): इसका अर्थ है ‘जीव’ या ‘आत्मा’। प्रत्येक मनुष्य एक ‘पशु’ है क्योंकि वह अज्ञान और बंधनों में बंधा हुआ है। आत्मा स्वभाव से शिव के समान ही है, लेकिन मल (अशुद्धि) के कारण अपनी शक्तियों को भूल चुकी है।
- पाश (Pasha): इसका अर्थ है ‘जाल’ या ‘बंधन’। वे तत्व जो आत्मा को ईश्वर से दूर रखते हैं, पाश कहलाते हैं।
2. आत्मा के तीन बंधन (मल)
शैव सिद्धांत के अनुसार, ‘पशु’ (आत्मा) तीन प्रकार के बंधनों या अशुद्धियों से जकड़ा होता है:
- आणव मल (Anava Mala): यह सबसे सूक्ष्म और जन्मजात अहंकार है। यह आत्मा को यह अनुभव कराता है कि वह “अपूर्ण” है।
- मायिक मल (Mayika Mala): यह माया का बंधन है, जो हमें भौतिक संसार के प्रति आकर्षित करता है और दृश्य जगत को ही सत्य मानने पर मजबूर करता है।
- कार्मिक मल (Karma Mala): यह हमारे अच्छे और बुरे कर्मों का फल है, जिसके कारण आत्मा को बार-बार जन्म लेना पड़ता है।
3. शिव के पाँच कृत्य (Pancha-Kritya)
शैव सिद्धांत मानता है कि भगवान शिव निरंतर पाँच कार्य करते हैं, जिन्हें ‘पञ्चकृत्य’ कहा जाता है:
- सृष्टि (Srishti): जगत का निर्माण।
- स्थिति (Sthiti): जगत का पालन।
- संहार (Samhara): विनाश या पुनर्चक्रण।
- तिरोभाव (Tirobhava): अज्ञान का पर्दा डालना ताकि जीव अपने कर्मों का फल भोग सके।
- अनुग्रह (Anugraha): कृपा करना जिससे जीव को मोक्ष प्राप्त हो सके।
4. प्रमाणिक ग्रंथ और साहित्य
शैव सिद्धांत के ज्ञान को दो स्तरों पर समझा जाता है-
- संस्कृत आगम: 28 मुख्य आगम (जैसे कामिक, कारण, अजैत आदि)।
- तमिल स्त्रोत (तिरुमुराई): 63 नयनारों (शिव भक्तों) द्वारा रचित भक्ति गीत। इनमें ‘तेवरम’ और ‘तिरुवाचकम’ सबसे प्रमुख हैं।
- मेयकंद शास्त्र: 14 दार्शनिक ग्रंथ जिन्हें ‘मेयकंद देव’ और उनके शिष्यों ने लिखा। इनमें ‘शिवज्ञान बोधम’ को शैव सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र ग्रंथ माना जाता है।
5. मुक्ति का मार्ग
शैव सिद्धांत में मुक्ति केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि चर्या, क्रिया, योग और ज्ञान के समन्वित अभ्यास से मिलती है। जब भक्त शिव की अनन्य भक्ति करता है, तो शिव की ‘शक्ति’ (शक्तिपात) के माध्यम से ‘पाश’ कट जाते हैं।
इस अवस्था में आत्मा शिव में विलीन नहीं होती (जैसा कि केवलाद्वैत मानता है), बल्कि वह शिव के साथ अद्वैत संबंध में रहती है—जैसे नमक पानी में घुल जाता है, फिर भी अपना अस्तित्व (स्वाद के रूप में) रखता है। इसे ‘सायुज्य’ मुक्ति कहा जाता है।
शैव आगम
शैव सिद्धांत के अनुसार, भगवान शिव के मुख से 28 मुख्य आगम (Mula Agamas) प्रकट हुए हैं। इन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-
शिवभेद : जो शिव के सद्योजात आदि पाँच मुखों से प्रकट हुए और द्वैत दर्शन पर आधारित हैं।
रुद्रभेद : जो अद्वैत-द्वैत का मिश्रण हैं।
भगवान शिव के मुख्य आगमों की सूची (संख्या: 28)
क. शिवभेद आगम (संख्या: 10)
ये आगम भगवान शिव के सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से ऋषियों को प्राप्त हुए।
- कामिक आगम (Kamika): यह सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत आगम है, जिसमें मंदिर वास्तुकला और अनुष्ठानों का व्यापक वर्णन है।
- योगज आगम (Yogaja): योग साधना और ध्यान की विधियों पर केंद्रित।
- चिन्त्य आगम (Chintya): सूक्ष्म दर्शन और चिंतन से संबंधित।
- कारण आगम (Karana): मंदिर निर्माण और दैनिक पूजा के नियमों का वर्णन।
- अजित आगम (Ajita): अभिषेक और उत्सवों की विस्तृत व्याख्या।
- दीप्त आगम (Dipta): दीपदान, प्रकाश और आंतरिक ऊर्जा पर आधारित।
- सूक्ष्म आगम (Sukshma): तंत्र के सूक्ष्म रहस्यों की व्याख्या।
- सहस्र आगम (Sahasra): सहस्रार चक्र और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वर्णन।
- अंशुमान आगम (Amshuman): मूर्तिकला (Iconography) और शारीरिक विज्ञान पर केंद्रित।
- सुप्रभेद आगम (Suprabheda): क्रिया पाद और कर्मकांडों का विस्तृत वर्णन।
ख. रुद्रभेद आगम (संख्या: 18)
इनका संबंध रुद्र शक्तियों से माना जाता है और ये साधना के गहरे पहलुओं को छूते हैं।
- विजय आगम (Vijaya): विजय प्राप्ति और शत्रुओं (आंतरिक व बाह्य) के दमन हेतु।
- निःश्वास आगम (Nishvasa): प्राण और श्वास की क्रियाओं पर आधारित।
- स्वायंभुव आगम (Svayambhuva): स्वयंभू चेतना और आत्मा के स्वरूप की व्याख्या।
- अनल आगम (Anala): अग्नि तत्व और हवन अनुष्ठानों पर केंद्रित।
- वीर आगम (Vira): वीर शैव परंपरा और साहसपूर्ण साधनाओं का वर्णन।
- रौरव आगम (Raurava): मोक्ष और जन्म-मरण के चक्र की व्याख्या।
- मकुट आगम (Makuta): मुकुट धारण और राजसी पूजा पद्धतियाँ।
- विमल आगम (Vimala): शुद्धता और मानसिक शुद्धि की विधियाँ।
- चन्द्रज्ञान आगम (Chandrajnana): चंद्रमा की कलाओं और ज्योतिषीय प्रभाव पर आधारित।
- बिम्ब आगम (Bimba): प्रतिबिंब और दिव्य स्वरूप के दर्शन।
- प्रोद्गीत आगम (Prodgita): मंत्रों और गायन के माध्यम से साधना।
- ललित आगम (Lalita): कोमल साधनाओं और सौंदर्य शास्त्र का वर्णन।
- सिद्ध आगम (Siddha): सिद्धियों की प्राप्ति और सिद्ध पुरुषों की परंपरा।
- संतान आगम (Santana): वंश वृद्धि और परंपरा की निरंतरता।
- सर्वोक्त आगम (Sarvokta): सभी आगमों का सार संक्षेप।
- पारमेश्वर आगम (Parameshvara): परमेश्वर के विराट स्वरूप की उपासना।
- किरण आगम (Kirana): ज्ञान की किरणों और अज्ञान के नाश पर आधारित।
- वापुल आगम (Vatula): ब्रह्मांडीय कंपन और शक्ति के संचार का वर्णन।
उप-आगम (संख्या: 207)
मुख्य 28 आगमों के अतिरिक्त इनके 207 उप-आगम (Upagamas) भी हैं। शैव सिद्धांत के अनुसार, इन ग्रंथों का अध्ययन और पालन करने से मनुष्य ‘पशु’ (जीवात्मा) के बंधनों से मुक्त होकर ‘शिवत्व’ को प्राप्त करता है।
– यह आलेख व्यापक शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर तैयार किया गया है।
निष्कर्ष
शैव सिद्धांत एक ऐसा दर्शन है जो भक्ति (Heart) और दर्शन (Intellect) को जोड़ता है। यह सिखाता है कि हम बंधन में भले ही हों, लेकिन हमारी मूल प्रकृति ‘शिव’ ही है।



